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बुधवार, 19 मई, 2021 पास्का का सातवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 19 मई, 2021

पास्का का सातवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 20:28-38



28) आप लोग अपने लिए और अपने सारे झुण्ड के लिए सावधान रहें। पवित्र आत्मा ने आप को झुण्ड की रखवाली का भार सौंपा है। आप प्रभु की कलीसिया के सच्चे चरवाहे बने रहें, जिसे उन्होंने अपना रक्त दे कर प्राप्त किया।

29) मैं जानता हूँ कि मेरे चले जाने के बाद खूंखार भेडि़ये आप लागों के बीच घुस आयेंगे, जो झुण्ड पर दया नहीं करेंगे।

30) आप लोगों में भी ऐसे लोग निकल आयेंगे, जो शिष्यों को भटका कर अपने अनुयायी बनाने के लिए भ्रान्तिपूर्ण बातों का प्रचार करेंगे।

31) इसलिए जागते रहें और याद रखें कि मैं आँसू बहा-बहा कर तीन वर्षों तक दिन-रात आप लागों में हर एक को सावधान करता रहा।

32) अब मैं आप लोगों को ईश्वर को सौंपता हूँ तथा उसकी अनुग्रहपूर्ण शिक्षा को, जो आपका निर्माण करने तथा सब सन्तों के साथ आप को विरासत दिलाने में समर्थ है।

33) मैंने कभी किसी की चाँदी, सोना अथवा वस्त्र नहीं चाहा।

34) आप लोग जानते हैं कि मैंने अपनी और अपने साथियों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए अपने इन हाथों से काम किया।

35) मैंने आप को दिखाया कि इस प्रकार परिश्रम करते हुए, हमें दुर्बलों की सहायता करनी और प्रभु ईसा का कथन स्मरण रखना चाहिए कि लेने की उपेक्षा देना अधिक सुखद है।"

36) इतना कह कर पौलुस ने उन सबों के साथ घुटने टेक कर प्रार्थना की।

37) सब फूट-फूट कर रोते और पौलुस को गले लगा कर चुम्बन करते थे।

38) उसने उन से यह कहा था कि वे फिर कभी उसे नहीं देखेंगे। इस से उन्हें सब से अधिक दुःख हुआ। इसके बाद वे उसे नाव तक छोड़ने आये।



सुसमाचार : योहन 17:11-19



परमपावन पिता! तूने जिन्हें मुझे सौंपा है, उन्हें अपने नाम के सामर्थ्य से सुरक्षित रख, जिससे वे हमारी ही तरह एक बने रहें।

12) तूने जिन्हें मुझे सौंपा है, जब तक मैं उनके साथ रहा, मैंने उन्हें तेरे नाम के सामर्थ्य से सुरक्षित रखा। मैंने उनकी रक्षा की। उनमें किसी का भी सर्वनाश नहीं हुआ है। विनाश का पुत्र इसका एक मात्र अपवाद है, क्योंकि धर्मग्रन्थ का पूरा हो जाना अनिवार्य था।

13) अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ। जब तक मैं संसार में हूँ, यह सब कह रहा हूँ जिससे उन्हें मेरा आनन्द पूर्ण रूप से प्राप्त हो।

14) मैंने उन्हें तेरी शिक्षा प्रदान की है। संसार ने उन से बैर किया, क्योंकि जिस तरह मैं संसार का नहीं हूँ उसी तरह वे भी संसार के नहीं हैं।

15) मैं यह नहीं माँगता कि तू उन्हें संसार से उठा ले, बल्कि यह कि तू उन्हें बुराई से बचा।

16) वे संसार के नहीं है जिस तरह मैं भी संसार का नहीं हूँ।

17) तू सत्य की सेवा में उन्हें समर्पित कर। तेरी शिक्षा ही सत्य है।

18) जिस तरह तूने मुझे संसार में भेजा है, उसी तरह मैंने भी उन्हें संसार में भेजा है।

19) मैं उनके लिये अपने को समर्पित करता हूँ, जिससे वे भी सत्य की सेवा में समर्पित हो जायें।



📚 मनन-चिंतन




आज का सुसमाचार प्रभु येसु के उस महापुरोहिताई प्रार्थना के अंश से लिया गया है जो प्रभु येसु इस संसार में अपनी अंतिम घटनाओं से पूर्व करते है। आज के उस प्रार्थना के अंश में हम पाते है कि येसु अपने उन शिष्यों के लिए विशेष प्रार्थना करते है जो उनके जाने के बाद इस संसार में ईश्वर के कार्यो को आगे बढ़ायेंगे।

जब तक शिष्य उनके साथ थे वे सुरक्षित थे, प्रभु येसु ईश्वर से शिष्यों के लिए प्रार्थना करते है कि ईश्वर उन्हे बुराई से बचा। और जिस प्रकार पिता ने पुत्र को इस संसार में भेजा, उसी प्रकार पुत्र ने शिष्यों को इस संसार में भेजा है और प्रभु येसु चाहते कि वे भी येसु के समान सत्य की सेवा में समर्पित हो जायें।

प्रभु येसु का अपने शिष्यों के लिए प्रार्थना करना हम सबको यह बताता है कि वे अपने शिष्यों से कितना प्रेम करते थे और एक भले चरवाहे के रूप में उनकी देखरेख करते थे। प्रभु येसु के बाद शिष्यों ने ईश्वर का सेवा कार्य पूरी लगन और ईमानदारी से सम्पन्न किया और जिस कार्य के लिए वे चुने गये थे उस कार्य को अपनी अंतिम सास तक पूर्ण किया। हम ईश्वर और उसकी योजनाओं के लिए धन्यवाद देते हुए उस कार्य को जारी रखने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें। आमेन!



📚 REFLECTION



Today’s gospel is taken from that part of high priestly prayer which Lord Jesus prayed before his last events in this world. In the part of that prayer today we find that Lord Jesus specially pray for the disciples who will carry forwad the work of God after him.

Till the time when the disciples were with him, he protected them. Lord Jesus prays for the disciples to God for their protection; and as the Son is being sent by the Father into the world, so also Son has sent them into the world and Lord Jesus wants that they also may be sanctified in truth.

Praying for the disciples by Jesus tells us that how much He loved the disciples and he took care of them like the good Shepherd. After Jesus the disciples carry forward the work of God with full dedication and honesty and for the work which they were being chosen they fulfilled it till their last breath. Thanking God and his plans let’s pray that the work of God may continue to go on. Amen!


 -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, 18 मई, 2021 पास्का का सातवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 18 मई, 2021

पास्का का सातवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 20:17-27



17) पौलुस ने मिलेतुस से एफ़ेसुस की कलीसिया के अध्यक्षों को बुला भेजा

18) और उनके पर उन से यह कहा, ’’आप लोग जानते हैं कि जब मैं पहले एहल एशिया पहुँचा, तो उस दिन से मेरा आचरण आपके बीच कैसा था।

19) यहूदियों के षड्यन्त्रों के कारण मुझ पर अनेक संकट आये, किन्तु मैं आँसू बहा कर बड़ी विनम्रता से प्रभु की करता रहा।

20) जो बातें आप लोगों के लिए हितकर थीं, उन्हें बताने में मैंने कभी संकोच नहीं किया, बल्कि मैं सब के सामने और घर-घर जा कर उनके सम्बन्ध में शिक्षा देता रहा।

21) मैं यहूदियों तथा यूनानियों, दोनों से अनुरोध करता रहा है कि वे ईश्वर की ओर अभिमुख हो जायें और हमारे प्रभु ईसा में विश्वास करें।

22) अब में आत्मा की प्रेरणा से विवश हो कर येरुसालेम जा रहा हूँ। वहाँ मुझ पर क्या बीतेगी, मैं यह नहीं जानता;

23) किन्तु पवित्र आत्मा नगर-नगर में मुझे विश्वास दिलाता है कि वहाँ बेडि़याँ और कष्ट मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

24) किन्तु मेरी दृष्टि में मेरे जीवन का कोई मूल्य नहीं। मैं तो केवल अपनी दौड़ समाप्त करना और ईश्वर की कृपा का सुसमाचार सुनाने का वह कार्य पूरा करना चाहता हूँ, जिसे प्रभु ईसा ने मुझे सौंपा।

25) ’’मैं आप लोगों के बीच राज्य का सन्देश सुनाता रहा। अब, मैं जानता हूँ कि आप में कोई भी मुझे फिर कभी नहीं देख पायेगा।

26) इसलिए मैं आज आप लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैं किसी के दुर्भाग्य का उत्तरदायी नहीं हूँ;

27) क्योंकि मैंने आप लोगों के लिए ईश्वर का विधान पूर्ण रूप से स्पष्ट करने में कुछ भी उठा नहीं रखा।



सुसमाचार : योहन 17:1-11अ



1) यह सब कहने के बाद ईसा अपनी आँखें उपर उठाकर बोले, ’’पिता! वह घडी आ गयी है। अपने पुत्र को महिमान्वित कर, जिससे पुत्र तेरी महिमा प्रकट करे।

2) तूने उसे समस्त मानव जाति पर अधिकार दिया है, जिससे वह उन सबों को अनन्त जीवन प्रदान करे, जिन्हें तूने उसे सौंपा है।

3) वे तुझे, एक ही सच्चे ईश्वर को और ईसा मसीह को, जिसे तूने भेजा है जान लें- यही अनन्त जीवन है।

4) जो कार्य तूने मुझे करने को दिया था वह मैंने पूरा किया है। इस तरह मैंने पृथ्वी पर तेरी महिमा प्रकट की है।

5) पिता! संसार की सृष्टि से पहले मुझे तेरे यहाँ जो महिमा प्राप्त थी, अब उस से मुझे विभूषित कर।

6) तूने जिन लोगो को संसार में से चुनकर मुझे सौंपा, उन पर मैने तेरा नाम प्रकट किया है। वे तेरे ही थे। तूने उन्हें मुझे सौंपा और उन्होंने तेरी शिक्षा का पालन किया है।

7) अब वे जान गये हैं कि तूने मुझे जो कुछ दिया है वह सब तुझ से आता है।

8) तूने जो संदेश मुझे दिया, मैने वह सन्देश उन्हें दे दिया। वे उसे ग्रहण कर यह जान गये है कि मैं तेरे यहाँ से आया हूँ और उन्होंने यह विश्वास किया कि तूने मुझे भेजा।

9) मैं उनके लिये विनती करता हूँ। मैं ससार के लिये नहीं, बल्कि उनके लिये विनती करता हूँ, जिन्हें तूने मुझे सौंपा है; क्योंकि वे तेरे ही हैं।

10) जो कुछ मेरा है वह तेरा है और जो तेरा, वह मेरा है। मैं उनके द्वारा महिमान्वित हुआ।

11) अब मैं संसार में नहीं रहूँगा; परन्तु वे संसार में रहेंगे और मैं तेरे पास आ रहा हूँ।



📚 मनन-चिंतन



यदि हमें प्रभु येसु का इस संसार में आने का मक्सद को जानना है तो हमें संत योहन का सुसमाचार अध्याय 17 पढ़ना चाहिए जहॉं प्रभु येसु पिता ईश्वर से प्रार्थना करते हुए अपने ह्दय को खोल कर प्रस्तुत करते है। अध्याय 17 की प्रार्थना को प्रभु येसु की महापुरोहिताई प्रार्थना के रूप में भी जाना जाता है।

आज के सुसमाचार में हम अध्याय 17 के कुछ अंश पर मनन चिंतन करते है जो प्रभु येसु की महापुरोहिताई प्रार्थना में से लिया गया है। येसु इस प्रार्थना की शुरुआत ऑंखे उपर उठाकर करते है, ‘‘पिता! वह घड़ी आ गयी है। अपने पुत्र को महिमान्वित कर, जिससे पुत्र तेरी महिमा प्रकट करे।’’ इस प्रार्थना भरे वार्तालाप में प्रभु येसु उस घड़ी के विषय में बातचीत कर रहें जिसके लिए वे भेजे गये थे; अर्थात् दुखभोग, मरण एवं पुनरुत्थान। हम इस संसार में जीना चाहते है परंतु प्रभु येसु इस संसार में मरने के लिए आये जिससे हम सब पाप की दासता से मुक्त हो जायें।

प्रभु येसु आगे चल कर ईश्वर से कहते है कि जो कार्य पिता ने उन्हें सौपा था वह कार्य उन्होने पूरा कर लिया है। जिन लोगों को पिता ईश्वर ने संसार से चुनकर येसु के हाथों में सौपा था, उन पर येसु ने ईश्वर का रहस्य प्रकट किया और वे जान गये है कि येसु कौन है और येसु के जाने के बाद वे इस संसार में रहकर ईश्वर के कार्यो को आगे बढ़ायेंगे।

प्रभु येसु ने अपनी प्रार्थना में अपने आने का मकसद हमारे सामने प्रकट किया है; वे इसलिए आये जिससे हम सब मुक्ति प्राप्त करें तथा शिष्यगण तैयार हो सके जिससे वे इस संसार में ईश्वर के कार्यो को आगे बढ़ा सकें। आईये जो ईश्वर ने इस संसार के लिए सोच कर रखा है हम उसमंे अपना सहयोग दें। आमेन!



📚 REFLECTION



If we want to know the purpose of Jesus’ coming in this world then we have to read the Gospel of John chapter 17 where opening his heart Lord Jesus prays to Father Almighty. The prayer of Chapter 17 is also known as Jesus’ high priestly prayer.

In today’s gospel we will meditate on some part of chapter 17 which is taken from the high priestly prayer of Jesus. Jesus starts this prayer by looking up towards heaven, “Father, the hour has come; glorify your Son so that the Son may glorify you.” In this prayerful conversation Jesus is talking about that hour for which he was being sent; i.e., passion, death and resurrection. We want to live in this world but Lord Jesus came in this world to die so that we may be free from the slavery of sin.

Lord Jesus further says that he as finished the work that was given by the Father. Those who were given from the world to Jesus, Jesus has revealed the mystery of God and they came tp know who Jesus really is and that they have to carry forward the work of God after Jesus.

Lord Jesus has revealed the purpose of his coming in his prayer; He came so that we may receive salvation and the disciples may get ready to carry forward the work of God in the world. Let’s cooperate with what the Lord has thought of this world. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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सोमवार, 17 मई, 2021 पास्का का सातवाँ सप्ताह

 

सोमवार, 17 मई, 2021

पास्का का सातवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 19:1-8



1) जिस समय अपोल्लोस कुरिन्थ में था, पौलुस भीतरी प्रदेशों का दौरा समाप्त कर एफे़सुस पहुँचा। वहाँ उसे कुछ शिष्य मिले।

2) उसने उन से पूछा, ’’क्या विश्वासी बनते समय आप लोगों को पवित्र आत्मा प्राप्त हुआ था?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ’’हमने यह भी नहीं सुना है कि पवित्र आत्मा होता है’’।

3) इस पर उसने पूछा, ’’तो, आप को किसका बपतिस्मा मिला?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ’’योहन का बपतिस्मा’’।

4) पौलुस ने कहा, ’’योहन पश्चात्ताप का बपतिस्मा देते थे। वह लोगों से कहते थे कि आप को मेरे बाद आने वाले में-अर्थात् ईसा में- विश्वास करना चाहिए।’’

5) उन्होंने यह सुन कर प्रभु ईसा के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण किया।

6) जब पौलुस ने उन पर हाथ रखा, तो पवित्र आत्मा उन पर उतरा और वे भाषाएँ बोलते और भविष्यवाणी करते रहे।

7) वे कुल मिला कर लगभग बारह पुरुष थे।

8) पौलुस तीन महीनों तक सभागृह जाता रहा। वह ईश्वर के राज्य के विषय में निस्संकोच बोलता और यहूदियों को समझाता था



सुसमाचार : योहन 16:29-33


29) उनके शिष्यों ने उन से कहा, ’’देखिये, अब आप दृष्टांतो में नहीं, बल्ेिक स्पष्ट शब्दों में बोल रहे हैं।

30) अब हम समझ गये है कि आप सब कुछ जानते हैं- प्रश्नों की कोई ज़रूरत नहीं रह गयी है। इसलिये हम विश्वास करते हैं कि आप ईश्वर के यहाँ से आये हैं।

31) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’क्या तुम अब विश्वास करते हो?

32) देखो! वह घडी आ रही है, आ ही गयी है। जब तुम सब तितर-बितर हो जाओगे और अपना-अपना रास्ता ले कर मुझे अकेला छोड दोगे। फिर भी मैं अकेला नहीं हूँ, क्योंकि पिता मेरे साथ है।

33) मैंने तुम लोगों से यह सब इसलिये कहा है कि तुम मुझ में शांति प्राप्त कर सको। संसार में तुम्हें क्लेश सहना पडेगा। परन्तु ढारस रखो- मैंने संसार पर विजय पायी है।



📚 मनन-चिंतन



जब परिवार के शीर्ष को कुछ हो जाता है तो परिवार तितर बितर हो जाता है। आज प्रभु येसु इसी के संदर्भ में अपने शिष्यों से वार्तालाप करते है कि वह समय आयेगा जब वे सब तितर बितर हो जायेंगे। ऐसे समय में प्रभु ढ़ारस रखने को कहते है।

प्रभु के बिना जीवन दुःख, परेशानी, दुविधा, भय, ंिचंता, अंधकार और असांमजस्य से भरा जीवन हैं। प्रभु के बिना जीवन जीना या प्रभु के अभाव में जीवन जीना हमारे लिए मृत्यु से बढ़कर नहीं है। परंतु हमारे जीवन में कई ऐसे क्षण आते है जब हम प्रभु के अभाव में जीवन व्यतीत करते है अर्थात् प्रभु को अपने जीवन से भूलकर अपने हिसाब से जीते है। ऐसे समय में हम व्याकुल हो जाते है और हमें समझ में नहीं आता कि क्या करें और कभी कभी हड़बड़ाहट में हम गलत कदम उठा लेते है। प्रभु येसु हमें यह बताना चाहते है कि जब कभी ऐसा क्षण आये तो ढ़ारस रखो और येसु में विश्वास करों।

आईये आज के दिन हम उन लोगों के लिए विशेष प्रार्थना करें जो प्रभु के अभाव में जीवन जी रहें है। ईश्वर उनके मन और ह्दय को आलोकित करें। आमेन!



📚 REFLECTION



When something happens to the head of the family then the family scatters. Today Lord Jesus talks about this context to his disciples that the time will come when they all will be scattered. In that situation Jesus says to take courage.

Without God life is full of sorrow, difficulties, confusion, fear, anxiety, darkness and disharmony. Living without God or living wvith the lack of God is no greater than death. But in our lives many moments come when we live without God, in other words we live according to our own ways forgetting God. We become anxious in this moment and do not understand what to do and sometimes take the wrong step in confusion. Lord Jesus wants to tell us that whenever like this situation comes take courage and believe in Jesus.

Let’s pray this day for those people who are living the life without God; May God enlighten their mind and heart. Amen!



 -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन स्वर्गारोहण का पर्व इतवार ,16 मई 2021

इतवार, 16 मई, 2021

स्वर्गारोहण का पर्व



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:1-11


1 थेओफिलुस! मैंने अपनी पहली पुस्तक में उन सब बातों का वर्णन किया,

2) जिन्हें ईसा उस दिन तक करते और सिखाते रहे जिस दिन वह स्वर्ग में आरोहित कर लिये गये। उस से पहले ईसा ने अपने प्रेरितों को, जिन्हें उन्होंने स्वयं चुना था, पवित्र आत्मा द्वारा अपना कार्य सौंप दिया।

3) ईसा ने अपने दुःख भोग के बाद उन प्रेरितों को बहुत से प्रमाण दिये कि वह जीवित हैं। वह चालीस दिन तक उन्हें दिखाई देते रहे और उनके साथ ईश्वर के राज्य के विषय में बात करते रहे।

4) ईसा ने प्रेरितों के साथ भोजन करते समय उन्हें आदेश दिया कि वे येरुसालेम नहीं छोड़े, बल्कि पिता ने जो प्रतिज्ञा की, उसकी प्रतीक्षा करते रहें। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने तुम लोगों को उस प्रतिज्ञा के विषय में बता दिया है।

5) योहन जल का बपतिस्मा देता था, परन्तु थोड़े ही दिनों बाद तुम लोगों को पवित्र आत्मा का बपतिस्मा दिया जायेगा’’।

6) जब वे ईसा के साथ एकत्र थे, तो उन्होंने यह प्रश्न किया- ‘‘प्रभु! क्या आप इस समय इस्राएल का राज्य पुनः स्थापित करेंगे ?’’

7) ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘पिता ने जो काल और मुहूर्त अपने निजी अधिकार से निश्चित किये हैं, तुम लोगों को उन्हें जानने का अधिकार नहीं है।

8) किन्तु पवित्र आत्मा तुम लोगों पर उतरेगा और तुम्हें सामर्थ्य प्रदान करेगा और तुम लोग येरुसालेम, सारी यहूदिया और सामरिया में तथा पृथ्वी के अन्तिम छोर तक मेरे साक्षी होंगे।’’

9) इतना कहने के बाद ईसा उनके देखते-देखते आरोहित कर लिये गये और एक बादल ने उन्हें शिष्यों की आँखों से ओझल कर दिया।

10) ईसा के चले जाते समय प्रेरित आकाश की ओर एकटक देख ही रहे थे कि उज्ज्वल वस्त्र पहने दो पुरुष उनके पास अचानक आ खड़े हुए और

11) बोले, ‘‘गलीलियो! आप लोग आकाश की ओर क्यों देखते रहते हैं? वही ईसा, जो आप लोगों के बीच से स्वर्ग में आरोहित कर दिये गये हैं, उसी तरह लौटेंगे, जिस तरह आप लोगों ने उन्हें जाते देखा है।’’



📖 दूसरा पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:1-13


1) ईश्वर ने आप लोगों को बुलाया है। आप अपने इस बुलावे के अनुसार आचरण करें - यह आप लोगों से मेरा अनुरोध है, जो प्रभु के कारण कै़दी हूँ।

2) आप पूर्ण रूप से विनम्र, सौम्य तथा सहनशील बनें, प्रेम से एक दूसरे को सहन करें

3) और शान्ति के सूत्र में बँध कर उस एकता को बनाये रखने का प्रयत्न करते रहें, जिसे पवित्र आत्मा प्रदान करता है।

4) एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए आप लोग बुलाये गये हैं।

5) एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास और एक ही बपतिस्मा।

6) एक ही ईश्वर है, जो सबों का पिता, सब के ऊपर, सब के साथ और सब में व्याप्त है।

7) मसीह ने जिस मात्रा में देना चाहा, उसी मात्रा में हम में प्रत्येक को कृपा प्राप्त हुई है।

8) इसलिए धर्मग्रन्थ कहता है- वह ऊँचाई पर चढ़ा और बन्दियों को ले गया। उसने मनुष्यों को दान दिये।

9) वह चढ़ा - इसका अर्थ यह है कि वह पहले पृथ्वी के निचले प्रदेशों में उतरा।

10) जो उतरा, वह वही है जो आकाश से भी ऊपर चढ़ा, जिससे वह सब कुछ परिपूर्ण कर दे।

11) उन्होंने कुछ लोगों को प्रेरित, कुछ को नबी, कुछ को सुसमाचार-प्रचारक और कुछ को चरवाहे तथा आचार्य होने का वरदान दिया।

12) इस प्रकार उन्होंने सेवा-कार्य के लिए सन्तों को नियुक्त किया, जिससे मसीह के शरीर का निर्माण तब तक होता रहे,

13) जब तक हम विश्वास तथा ईश्वर के पुत्र के ज्ञान में एक नहीं हो जायें और मसीह की परिपूर्णता के अनुसार पूर्ण मनुष्यत्व प्राप्त न कर लें।

सुसमाचार : सन्त मारकुस 16:15-20

15) इसके बाद ईसा ने उन से कहा, ’’संसार के कोने-कोने में जाकर सारी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओ।

16) जो विश्वास करेगा और बपतिस्मा ग्रहण करेगा, उसे मुक्ति मिलेगी। जो विश्वास नहीं करेगा, वह दोषी ठहराया जायेगा।


📚 मनन-चिंतन



प्रभु येसु का स्वर्गारोहण का पर्व एक ऐसा पर्व है जो प्रभु येसु के प्रभुत्व को दर्शाता है, जहॉं प्रभु येसु पुनरुत्थान के बाद चालीस दिनों तक अपने शिष्यों को दर्शन देने के बाद स्वर्ग में आरोहित किये जाते है। हर साल हम स्वर्गारोहण का पर्व पास्का पर्व के चालीस दिन बाद मनाते है। यह पर्व हमें उस घटना के बारे में बताता है जहॉं प्रभु येसु अपने शिष्यों के सामने आरोहित कर लिए जाते है।

स्वर्गारोहण का पर्व हमारे लिए निम्न बिंदुओं पर मनन चिंतन करने के लिए अवसर देता हैः

1. प्रभु येसु का प्रभुत्व- यह पर्व येसु का ईश्वर होने का प्रमाण हम सबके सामने रखता है। येसु सचमुच ही प्रभु थे और वे पुनर्जीवित शरीर के साथ स्वर्ग में आरोहित कर लिए जाते है। प्रभु येसु का ईश्वरत्व की छलक उन शिष्यों को देखने को मिलती है।

2. प्रभु येसु का पिता के पास जाना- प्रभु येसु ने इस संसार में रहते वक्त कई बार अपने शिष्यों को इस बारे में बताया कि वे पिता के पास चले जायेंगे। और हमारे लिए एक निवास स्थान तैयार करेंगे। वे जहॉं से आये थे वहीं वापस चले गये।

3. अपना सिंहासन पर पुनः राज करना- प्रभु येसु ने जिस महिमा और सिंहासन को छोड कर इस संसार में साधारण मनुष्य के रूप में जीवन बिताया, वे स्वर्गारोहण के बाद पुनः अपने सिंहासन पर सम्पूर्ण महिमा और सम्मान के साथ विराजमान है।

4. पवित्र आत्मा का भेजना- प्रभु येसु ने स्वर्ग जाने के बाद अपने शिष्यों और कलीसिया को अकेला नहीं छोड़ा परंतु जैसे उन्होने प्रतिज्ञा किया था कि उनके जाने के बाद एक सहायक को हमारे लिए भेजेंगे वे उस पवित्र आत्मा को पेंतेकोस्त के दिन भेज कर अपनी प्रतीज्ञा पूरी की।

5. येसु का आदेश- स्वर्गारोहण से पूर्व प्रभु येसु अपने शिष्यों को यह आदेश देकर जाते है कि संसार के कोने कोने में जाकर सारी सृष्टि को सुमाचार सुनाओं। यह कार्य या कर्तव्य केवल शिष्यों का ही नहीं परंतु सभी ख्रीस्तीय विश्वासियों का है कि वे जहॉं कहीं भी जाये या रहें सभी को सुसमाचार सुनाये। और यह कार्य प्रभु येसु के द्वितिय आगमन तक जारी रहेगा और इस हेतु पवित्र आत्मा सहायक के रूप में हमारी मदद करेगा।

आईये आज के पर्व के दिन हम विशेषकर प्रभु येसु के प्रभुत्व को स्मरण करते हुए उन्होने जो आदेश दिया है हम उसमें आगे बढ़ते जाये और सारी सृृष्टि को सुसमाचार सुनायें। आमेन!



📚 REFLECTION



The Feast of Ascension of the Lord is that feast which demonstrates the divinity of Jesus, where Lord Jesus is ascended into heaven after appearing for forty days before the disciples since his Resurrection. Every year we celebrate the feast of Ascension after the forty days of Easter. This feast tells about that event where Lord Jesus ascends into heaven infront of his disciples.

The feast of Ascension gives us an opportunity to reflect on the following points.

1. The Divinity of Jesus- This feast keeps infront of us the proof of Jesus being truly God. Jesus was indeed God and he was ascended into heaven with the resurrected body. The glimpse of Jesus Godliness/divinity was seen by the disciples.

2. Jesus goes to his Father- Lord Jesus has told of going to His Father to his disciples many times when he was with them on this Earth; and he will prepare the place fro us. He went to the place from where He came.

3. Getting back to his Throne- The glory and throne which Lord Jesus left and lived like a simple human being in this world, after the ascension he is sitting on his throne with all the glory and honour.

4. Sending of the Holy Spirit- After ascending to heave Lord Jesus did not leave his disciples and the Church all alone but as he promised of sending the helper to us, he fulfilled his promise by sending the Holy Spirit on the day of Pentecost.

5. The mandate of Jesus- Before the Ascension Lord Jesus gives the mandate to his disciples to go into the whole world and proclaim the good news to the whole creation. This work or obligation is not only of the disciples but also of all the Christian believers that where ever they go or where ever they live proclaim the good news to everybody; and this mandate will continue till the second coming of Lord Jesus and for this the Holy Spirit will help us.

Remembering the divinity of Lord Jesus on the occasion of today’s feast let’s march forward on the mandate given by Jesus and proclaim the good news to whole creation. Amen!



 -Biniush Topno



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शनिवार, 15 मई, 2021 पास्का का छठवाँ सप्ताह

 

शनिवार, 15 मई, 2021

पास्का का छठवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 18:23-28



23) पौलुस कुछ समय वहाँ रहा। तब फिर विदा हो कर उसने गलातिया और इसके बाद फ्रुगिया का भ्रमण करते हुए सब शिष्यों को ढारस बँधाया।

24) उस समय अपोल्लोस नामक यहूदी एफेसुस पहुँचा। उसका जन्म सिकन्दरिया में हुआ था। वह शक्तिशाली वक्ता और धर्मग्रन्थ का पण्डित था।

25) उसे प्रभु के मार्ग की शिक्षा मिली थी। वह उत्साह के साथा बोलता और ईसा के विषय में सही बातें सिखलाता था, यद्यपि वह केवल योहन के बपतिस्मा से परिचित था।

26) वह सभागृह में निस्संकोच बोलने लगा। प्रिसिल्ला और आक्विला उसकी शिक्षा सुनने के बाद उसे अपने साथ ले गये और उन्होंने अधिक विस्तार के साथ उसे ईश्वर का मार्ग समझाया।

27) जब अपोल्लोस ने अखै़या जाना चाहा, तो भाइयों ने उसकी सहायता की और शिष्यों के नाम पत्र दे कर निवेदन किया कि वे उसका स्वागत करें। अपोल्लोस के वहाँ पहुंचने के बाद उस से विश्वासियों को ईश्वर की कृपा से बहुत लाभ हुआ;

28) क्योंकि वह अकाट्य तर्कों से यहूदियों का खण्ड़न करता और सब के सामने धर्मग्रन्थ के आधार पर यह प्रमाणित करता था ही ईसा ही मसीह हैं।



सुसमाचार : योहन 16:23ब-28



23) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुम पिता से जो कुछ माँगोगे वह तुम्हें मेरे नाम पर वही प्रदान करेगा।

24) अब तक तुमने मेरा नाम ले कर कुछ भी नहीं माँगा है। माँगो और तुम्हें मिल जायेगा, जिससे तुम्हारा आनन्द परिपूर्ण हो।

25) मैंने तुम लोगो से यह सब दृष्टांतो में कहा है। वह समय आ रहा है, जब मैं फिर तुम लेागों से दृष्टांतो में कुछ नहीं कहूँगा, बल्कि तुम्हें स्पष्ट शब्दों में पिता के विषय में बताऊँगा।

26) तुम उस दिन मेरा नाम लेकर प्रार्थना करोग। मैं नहीं कहता कि तुम्हारे लिये पिता से प्रार्थना करूँगा।

27) पिता तो स्वयं तुम्हें प्यार करता है, क्योंकि तुम मुझे प्यार करते और यह विश्वास करते हो कि मैं ईश्वर के यहाँ से आया हूँ।

28) मैं पिता के यहाँ से संसार में आया हूँ। अब मैं संसार को छोड कर पिता के पास जा रहा हूँ।’’


📚 मनन-चिंतन


बचपन से हमें ईश्वर से प्रार्थना करना सिखाया गया है, बाईबिल में भी येसु हम से कहते है मॉंगो और तुम्हे दिया जायेगा। प्रार्थना का कई प्रारूप होता है जैसे कि आराधना, स्तुति, मध्यस्थता, पश्चाताप इत्यादि। परंतु अक्सर हम अधिकतर प्रार्थना में ईश्वर से अपने लिए और अपने परिजनों के लिए कुछ न कुछ दुआ करते है प्रार्थना करते है।

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु कहते है कि तुम पिता से जो कुछ मॉंगोगे वह तुम्हें मेरे नाम पर वही प्रदान करेगा। प्रभु येसु अपने नाम का महत्व समझाते है और उस शक्तिशाली नाम को हमें एक हथियार के रूप में प्रदान करते है। पिता ईश्वर जो हम से प्रेम करता है और हमारे मॉंगने से पहले ही जानता है कि हमारे लिए क्या क्या की जरूरत है तो वह ईश्वर प्रभु येसु के नाम पर हमारी लिए अच्छी चिजों क्यों नहीं प्रदान करेगा।

प्रभु येसु हमें यह परामर्श देते है कि जब कभी हम प्रार्थना करें तो उनका नाम लेकर प्रार्थना करें। ईश्वर हमारे लिए सर्वोत्तम चाह रखता है। मत्ती 6ः8 इस बात को बहुत अच्छी तरह से हमारे सामने रखता है, ‘‘तुम्हारे मॉंगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन-किन चीज़ों की जरूरत है।’’ हम बहुत सारी चीज़ों की ख्वाहीश रखते हैं; उनमें से कुछ तो हमारे स्वार्थ के लिए होती है और कुछ हमारी जरूरतों के लिए। जब हम प्रार्थना करते है तब हमें यह ध्यान रखनें की जरूरत है कि वह हम अपने ईच्छा की पूर्ती के लिए करते है या हम उस में ईश्वर की ईच्छा खोजते है।

हमारी प्रार्थना ईश्वर की ईच्छा और योजना के अनुसार होनी चाहिए। आईये हम प्रार्थनाओं को ईश्वर के समक्ष लोगों के लिए मध्यस्थता के रूप में अर्पित करें। आमेन!



📚 REFLECTION



From childhood onwards we were being taught to pray, in the bible too Jesus tells us Ask and you will receive. Prayer has got different formats like adoration, praise and worship, intersessions, penitentiary etc. But most often in the prayers we pray and ask for ourselves and for our relatives.

In today’s gospel Jesus says that whatever you ask in my name to the Father you will receive it. Lord Jesus explains the importance of his name and gives us that name as a powerful weapon for us. Father Almighty who loves us and knows what we need before our asking then why will not He will provide all good things in the name of Jesus.

Lord Jesus gives us the advice that when ever we pray we must pray in the name of Jesus. God seeks the best for us. Mt 6:8 very well expresses this in front of us, “Father knows what you need before you ask him.” We desire for many things; among them some are for selfish motives and some for our genuine needs. Whenever we pray we must keep in mind that whether we are praying for our will to be fulfilled or do we seek the will of God.

Our prayer should be based on God’s will and His plan. Let’s put forward the prayers and petitions of people in the form of intercessions. Amen!


 -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन शुक्रवार, 14 मई, 2021 प्रेरित सन्त मथियस - पर्व

 

शुक्रवार, 14 मई, 2021

प्रेरित सन्त मथियस - पर्व

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:15-17,20-26


15) उन दिनों पेत्रुस भाइयों के बीच खड़े हो गये। वहाँ लगभग एक सौ बीस व्यक्ति एकत्र थे। पेत्रुस ने कहा,

16) ’’भाइयो! यह अनिवार्य था कि धर्मग्रन्थ की वह भविष्यवाणी पूरी हो जाये, जो पवित्र आत्मा ने दाऊद के मुख से यूदस के विषय में की थी। यूदस ईसा को गिरफ्तार करने वालों का अगुआ बन गया था।

17) वह हम लोगों में एक और धर्मसेवा में हमारा साथी था।

20) स्त्रोत-संहिता मे यह लिखा है-उसकी ज़मीन उजड़ जाये; उस पर कोई भी निवास नहीं करे और-कोई दूसरा उसका पद ग्रहण करे।

21) इसलिए उचित है कि जितने समय तक प्रभु ईसा हमारे बीच रहे,

22) अर्थात् योहन के बपतिस्मा से ले कर प्रभु के स्वर्गारोहण तक जो लोग बराबर हमारे साथ थे, उन में से एक हमारे साथ प्रभु के पुनरुत्थान का साक्षी बनें’’।

23) इस पर इन्होंने दो व्यक्तियों को प्रस्तुत किया-यूसुफ को, जो बरसब्बास कहलाता था और जिसका दूसरा नाम युस्तुस था, और मथियस को।

24) तब उन्होंने इस प्रकार प्रार्थना की, ’’प्रभु! तू सब का हृदय जानता है। यह प्रकट कर कि तूने इन दोनों में से किस को चुना है,

25) ताकि वह धर्मसेवा तथा प्रेरितत्व में वह पद ग्रहण करे, जिस से पतित हो कर यूदस अपने स्थान गया।

26) उन्होंने चिट्ठी डाली। चिट्ठी मथियस के नाम निकली और उसकी गिनती ग्यारह प्रेरितों में हो गयी।


सुसमाचार : सन्त योहन 15:9-17


9) जिस प्रकार पिता ने मुझ को प्यार किया है, उसी प्रकार मैंने भी तुम लोगों को प्यार किया है। तुम मेरे प्रेम से दृढ बने रहो।

10) यदि तुम मेरी आज्ञओं का पालन करोगे तो मेरे प्रेम में दृढ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ बना रहता हूँ।

11) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि तुम मेरे आनंद के भागी बनो और तुम्हारा आनंद परिपूर्ण हो।

12) मेरी आज्ञाा यह है जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।

13) इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।

14) यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।

15) अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है क्योंकि मैने अपने पिता से जो कुछ सुना वह सब तुम्हें बता दिया है।

16) तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो, तुम्हारा फल बना रहे और तुम मेरा नाम लेकर पिता से जो कुछ माँगो, वह तुम्हें वही प्रदान करे।

17) मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ एक दूसरे को प्यार करो।


📚 मनन-चिंतन


प्रेरित संत मथियस एक ऐसा प्रेरित संत जिसे प्रभु येसु के बारह शिष्यों में से एक कहलाने का सौभाग्य मिला। संत मथियस का चुनाव यूदस के स्थान पर बहुत सोच विचार कर के किया गया। बारह संख्या इस्राएली जनता में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस्राएल के बारह वंश थे और यदि नयें इस्राएल को प्रेरितों से आना था तो उनका बारह होना आवश्यक था।

उनमें से एक यूदस इस्कारियोती ने येसु के साथ विश्वासघात कर स्वयं को फांॅसी लगा लिया था। प्रभु येसु के स्वर्गारोहण के बाद शिष्यगण अटारी पर प्रार्थना कर रहे थे- वहॉं पर पैत्रुस खड़े होकर यह कहा कि कोई दूसरा यूदस का पद ग्रहण करें। इस हेतु वे उनमें से चुनेंगे जो योहन के बपतिस्मा से येसु के पुनरुत्थान तक येसु के साथ रहे हो; और उनके बीच दो व्यक्तियों का नाम आता है जिसमें से संत मथियस का नाम चिठ्ठी के द्वारा सामने आता है और संत मथियस को बारहों में से एक चुना जाता है।

प्रभु येसु संत योहन 15ः16 में कहते है, ‘‘तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो।’’ प्रभु येसु विभिन्न लोगों को विभिन्न कार्यों के लिए चुनते है। संत मथियस भी उसी चुनाव में से एक था। संत मथियस के बारे में बाईबिल में ज्यादा तो नहीं लिखा हुआ है परंतु यह बताया जाता है कि संत पूरे निष्ठा से प्रभु येसु के सुसमाचार प्रचार प्रसार में अपने जीवन को न्योछावर कर दिया।

प्रभु का कार्य को सम्पन्न करने के लिए आज भी प्रभु बहुतों को चुनते और नियुक्त करते है जिससे कि वे फल उत्पन्न कर सकें। आज हमें संत मथियस जैसे कई लोग चाहिए जो अपना जीवन प्रभु के लिए समर्पित कर देते है- प्रभु के सुसमाचार के लिए प्रभु के स्वर्गराज्य के लिए। हम प्रार्थना करें कि संत मथियस के पर्व के दिन एक सच्चा बुलाहट सभी को प्राप्त हों। आमेन!



📚 REFLECTION



Apostle St. Matthias is the St. who got the priviledge to be called among the twelve. The selection of St. Matthias instead of Judas was done with lot of thinking. The number twelve has a great significance in Israelites. There were twelve tribes of Israel and if the new Israel has to come from the disciples then they have to be twelve.

Among them Judas Iscariot betrayed Jesus and committed suicide. After the Ascension of the Lord the believers were praying in the upper room- there Peter stood up and told about taking the position of an overseer in the place of Judas. For this they will select the person who was with Jesus from the baptism of John till Jesus’ Resurrection; and the two names come in front of them among whom St. Matthias is being selected through the lot and St. Matthias is chosen among the twelve.

Jesus tells in John 15:16, “You did not choose me but I chose you. And I appointed you to go and bear fruit.” Lord Jesus chooses different people for different works. St. Matthias was among that chosen one. About St. Matthias not much is being found in the bible but it is being said that St. with full dedication has sacrificed his life for the proclamation and evangelization of Jesus Gospel.

To do God’s work Lord chooses and appoints many even now so that they may bear fruit. Today we need people like St. Matthias who offer their lives for the Lord- for the Gospel of the Lord, for the Kingdom of God. Let’s pray that on the feast of St. Matthias true vocation may be received by many. Amen!


 -Br. Biniush Topno


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गुरुवार, 13 मई, 2021

 

गुरुवार, 13 मई, 2021

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पास्का का छठवाँ सप्ताह

पहला पाठ : प्रेरित-चरित 18:1-8


1) इसके बाद पौलुस आथेंस छोड़ कर कुरिन्थ आया,

2) जहाँ आक्विला नामक यहूदी से उसकी भेंट हुई। आक्विला का जन्म पोन्तुस में हुआ था। वह अपनी पत्नी प्रिसिल्ला के साथ इटली से आया था, क्योंकि क्लौदियुस ने यह आदेश निकला था कि सब यहूदी रोम से चले जायें। पौलुस उन से मिलने गया

3) और उनके यहाँ रहने तथा काम करने लगा; क्योंकि वह एक ही व्यवसाय करता था- वे तम्बू बनाने वाले थे।

4) पौलुस प्रत्येक विश्राम के दिन सभागृह में बोलता और यहूदियों तथा यूनानियों को समझाने का प्रयत्न करता था।

5) जब सीलस और तिमथी मकेदूनिया से पहुँचे, तो पौलुस वचन के प्रचार के लिए अपना पूरा समय देने लगा और यहूदियों को यह साक्ष्य देता रहा कि ईसा ही मसीह हैं।

6) किन्तु जब वे लोग पौलुस का विरोध और अपमान कर रहे थे, तो उसने अपने वस्त्र की धूल झाड़ कर उन से यह कहा, ’’तुम्हारा रक्त तुम्हारे सिर पड़े! मेरा अन्तःकरण शुद्ध है। मैं अब से ग़ैर-यहूदियों के पास जाऊँगा।’’

7) वह उन्हें छोड़ कर चला गया और तितियुस युस्तुस नामक ईश्वर-भक्त के यहाँ आया, जिसका घर सभागृह से लगा हुआ था।

8) सभागृह के अध्यक्ष क्रिस्पुस ने अपने सारे परिवार के साथ प्रभु में विश्वास किया। बहुत-से कुरिन्थी भी पौलुस की बातें सुन कर विश्वास करते और बपतिस्मा ग्रहण करते थे।



सुसमाचार : योहन 16:16-20



16 थोडे ही समय बाद तुम लोग मुझे नहीं देखोगे और फिर थोडे ही समय बाद मुझे देखोगे।

17) इस उनके कुछ शिष्यों ने आपस में यह कहा, ’’वह हम से यह क्या कहते हैं- थोडे ही समय बाद तुम मुझे नहीं देखोग और फिर थोडे ही समय बाद तुम मुझे देखोगे, और क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ?’’

18) इसलिये वे कहते थे, ’’वह जो ’थोडा समय’ कहते हैं इस का अर्थ क्या है? हम उनकी बात नहीं समझ पा रहे हैं।’’

19) ईसा ने यह जानकर कि वे मुझ से प्रश्न पूछना चाहते हैं, उन से कहा, ’’तुम आपस में मेरे इस कथन के अर्थ पर विचार विमर्श कर रहे हो कि ’थोडे ही समय बाद तुम मुझे नहीं देखोगे और फिर थोड़े ही समय बाद मुझे देखोगे।

20) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ ’’तुम रोओगे और विलाप करोगे, परंतु संसार आनंद मनायेगा। तुम शोक करोगे किन्तु तुम्हारा शोक आनन्द बन जायेगा।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ने अपने आर्शीवचन में हम सभी को कई सांत्वना भरे वचन दिये है उनमें से एक वचन है, ‘‘धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, उन्हें सान्त्वना मिलेगी’’ (मत्ती 5ः5)। प्रभु येसु का यह वचन हम सब के लिए एक आशावान वचन है जो हम सभी को सांत्वना प्रदान करता है। प्रभु हम सभी से कहना चाहते है कि जो प्रभु और प्रभु के राज्य के लिए शोक मनाता है उसे आगे चलकर सांत्वना प्राप्त होगी।

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु अपने विषय में बताते है कि वे किस प्रकार थोड़े समय के लिए शिष्यों को दिखाई नहीं देंगे और फिर थोड़े समय बाद वे दिखाई देंगे। आगे चल कर येसु कहते है कि तुम शोक करोगे किन्तु तुम्हारा शोक आनन्द बन जायेगा। हमारा प्रभु शोक को आनन्द में बदलने वाला प्रभु है।

हमारे जीवन में कई ऐसे क्षण आते है जो हमें शोक से भर देते है-जैसे जब हमारे किसी परिजन की मृत्यु होती है तो हम शोक से भर जाते है; जब हम प्रभु के मार्ग पर चलने की वजह से हम पर दुख, संकट, अत्याचार या अपमान किया जाता है तो हमारा ह्दय शोक से भर जाता है; जब हम दुष्टों को फलते फूलते देखते है तथा हमारे चारों ओर दुख, अंधेरे के बादल को घिरा हुआ पाते है तथा हमें कोई जवाब नहीं मिलता है तो हम शोक से भर जाते है। प्रभु येसु हम से कहते है कि तुम्हारा शोक आनन्द में बदल जायेगा, जिस प्रकार शिष्य प्रभु येसु के कू्रस मरण के बाद शोक में डूब गये थे परंतु पुनरुत्थान के बाद उनका शोक आनन्द में बदल गया; ठीक उसी प्रकार प्रभु हमारे शोक के बादल को आनन्द की किरणों से दूर कर देंगे। आईये हम प्रार्थना करें इस संसार में जो भी लोग शोक में डूबे हुए है वे सब प्रभु के पास आये जिससे उनका शोक आनन्द में बदल जाये। आमेन!



📚 REFLECTIONS



Lord Jesus has given many comforting words in his beatitudes, among them one is, “Blessed are those who mourn, for they will be comforted.” (Mt 5:4). These words of Lord Jesus are words of hope for us which gives comfort. Lord wants to tell us that those who mourn for the Lord and for the Lord’s Kingdom they will be comforted in future.

In today’s Gospel Jesus speaks about himself that for a little while the disciples will no longer see him and after a little while they will see him. He tells further that you will weep and mourn, but your pain will turn into joy. Our Lord is the Lord who turns mourning into joy.

In our lives many moments come when we are filled with mourning- for instances when some relatives die in the family we are filled of mourning; when pain, problems, persecution and insults are executed on us for being walking in the way of the Lord then our hearts are filled with mourning; when we see the wicked prospering and finding oneself surrounded by clouds of sorrow and darkness and when we doesn’t receive any answer then we are filled with grief or mourning. Lord Jesus tells us that your mourning will turn into joy, as the disciples were in grief when Jesus died on the cross but after the resurrection their mourning turned into joy; similarly Lord will remove the cloud of mourning through the rays of Joy. Let’s pray that those who are in grief in this world may come to Jesus so that their grief may turn to Joy. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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