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सोमवार, 22 नवंबर, 2021 वर्ष का चौंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

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पहला पाठ: दानिएल का ग्रन्थ 1:1-6,8-20


1) यूदा के राजा यहोयाकीम के राज्यकाल के तीसरे वर्ष बाबुल के राजा नबूकदनेज़र ने येरुसालेम आ कर उसके चारों ओर घेरा डाला।

2) प्रभु ने यूदा के राजा यहोयाकीम को और ईश्वर के मन्दिर के कुछ पात्रों को नबूकदनेज़र के हाथ जाने दिया। उसने उन्हें शिनआर देश भिजवाया और पात्रों को अपने देवताओं के कोष में रखवा दिया।

3) राजा ने खोजों के अध्यक्ष अशपनज को कुछ ऐसे इस्राएली नवयुवकों को ले आने का आदेश दिया, जो राजवंशी अथवा कुलीन हों,

4) शारीरिक दोषरहित, सुन्दर, समझदार, सुशिक्षित, प्रतिभाशाली और राज-दरबार में रहने योग्य हों। अशपनज ने उन्हें खल्दैयियों का साहित्य और भाषा पढायी।

5) राजा ने राजकीय भोजन और अंगूरी में से उनके लिए खाने-पीने का दैनिक प्रबंध किया। उन्हें तीन वर्ष का प्रशिक्षण दिया जाने वाला था और उसके बाद वे राजा की सेवा में नियुक्त किये जाने वाले थे।

6) उन में यूदावंशी दानिएल, हनन्या, मीशाएल और अज़र्या थे।

8) दनिएल ने निश्चय किया कि वह राजकीय भोजन और अंगूरी खा-पी कर अपने को अशुद्ध नहीं करेगा और उसने खोजों के अध्यक्ष से निवेदन किया कि वह उसे उस दूषण से बचाये रखें।

9) ईश्वर की कृपा से खोजों का अध्यक्ष दानिएल के साथ अच्छा और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करता था।

10) उसने दानिएल से कहा, ’’मैं राजा, अपने स्वामी से डरता हूँ। उन्होंने तुम्हारा खानपान निश्चित किया है। यदि वह देखेंगे कि समवयस्क नवयुवकों की तुलना में तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ है, तो मेरा जीवन जोखिम में पड़ जायेगा।’’

11) उसके बाद दानिएल ने भोजन के प्रबन्धक से, जिसे खोजों के अध्यक्ष ने दानिएल, हनन्या, मीशाएल और अजर्या पर नियुक्त किया था, कहा,

12) ’’आप कृपया दस दिन तक अपने सेवकों की परीक्षा ले- हमें खाने के लिए तरकारी और पीने के लिए पानी दिलायें।

13) इसके बाद आप हमारा और राजकीय भोजन का सेवन करने वाले युवकों का चेहरा देख लें और जो आप को उचित जान पड़े, वही हमारे साथ करें।’’

14) उसने उनका निवेदन स्वीकार कर लिया और दस दिन तक उनकी परीक्षा ली।

15) दस दिन बाद के राजकीय भोजन खाने वाले युवकों की तुलना में अधिक स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट दीख पड़े।

16) उस समय से प्रबन्धक उनके लिए निर्धारित किया हुआ खान-पान हटा कर उन्हें तरकारी देता रहा।

17) ईश्वर ने उन चार नवयुवकों को ज्ञान, समस्त साहित्य की जानकारी और प्रज्ञा प्रदान की। दानिएल को दिव्य दृश्यों और हर प्रकार के स्वप्नों की व्याख्या करने का वरदान प्र्राप्त था।

18) राजा द्वारा निर्धारित अवधि की समाप्ति पर खाजों के अध्यक्ष ने नवयुवकों को नबूकदनेज़र के सामने प्रस्तुत किया।

19) राजा ने उनके साथ वार्तालाप किया और उन में कोई भी दानिएल, हनन्य, मीशाएल और अजर्या की बराबरी नहीं कर सका। वे राजा की सेवा में नियुक्त हो गये।

20) जब जब राजा ने किसी समस्या पर उन से परामर्श लिया, तो उसने पाया कि समस्त राज्य के किसी भी ज्योतिषी अथवा ओझा से उनकी प्रज्ञा और विवेक दसगुना श्रेष्ठ था।



सुसमाचार : सन्त लूकस 21:1-4



1) ईसा ने आँखें ऊपर उठा कर देखा कि धनी लोग ख़ज़ाने में अपना दान डाल रहे हैं।

2) उन्होंने एक कंगाल विधवा को भी दो अधेले डालते हुए देखा

3) और कहा, ‘‘मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ-इस कंगाल विधवा ने उन सबों से अधिक डाला है।

4) उन्होंने तो अपनी समृद्धि से दान दिया, परन्तु इसने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला।’’



मनन-चिंतन



पूर्ण चढ़ावाः सुसमाचार में विधवा ने अपना सब कुछ ईश्वर को अर्पित किया। उसने अपने लिए कुछ भी पीछे नहीं रखा। यह एक पूर्ण चढ़ावा था। प्रेरित चरित 5ः1-11 में, हम अनानीयस और सफीरा के बारे में सुनते हैं, जिन्होंने खेत की कीमत का एक अंश वापस रखा और पेत्रुस से झूठ बोलकर अपनी जान गंवा दी। संत अगस्तीन कहते हैं, ‘‘जहाँ तुम्हारा आनंद है, वहाँ तुम्हारा खजाना है; जहाँ तुम्हारा खजाना है, वहाँ तुम्हारा दिल है; जहाँ तुम्हारा दिल है, वहाँ तुम्हारी खुशी है’’। हमें उस खजाने का आनंद लेने के लिए खुद को पूरी तरह से देने की जरूरत है। विलियम बार्कले लिखते हैं, ‘‘क्या प्रकृति का पूरा क्षेत्र मेरा था, वह एक भेंट थी जो बहुत छोटी थी। प्रेम इतना अद्भुत, इतना दिव्य जो मेरी आत्मा, मेरा जीवन, मेरा सब कुछ मांगता है।’’

ईश्वर बलिदान को महत्व देता हैः ईश्वर देने वाले के बलिदान को महत्व देता है। दी गई राशि से अधिक वह उस हृदय या प्रेम को देखता है जिसके साथ कोई उसे देता है, मदर तेेरेसा कहती है ‘‘यदि आप वह देते हैं जिसकी आपको आवश्यकता नहीं है, तो वह देना नहीं होता,’’ ईश्वर को इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं है कि हम कितना देते हैं, लेकिन हम कैसे देते हैं। ईश्वर उपहार की मात्रा को नहीं बल्कि देने वाले के मनोभाव को देखता है।

सुसमाचार में विधवा को हमारे लिए अपने जीवन को ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और हमारे दैनिक जीवन में किए जाने वाले बलिदानों के लिए एक आदर्श बनने दें।



REFLECTION


Complete offering: The widow in the gospel offered to God all that she had. She did not hold back anything for her. It was a complete offering. In Acts. 5:1-11 we hear about Ananias and Sapphira, who kept back part of the proceeds of the land and lying to Peter losing their life. St. Augustine says “Where your pleasure is, there is your treasure; where your treasure is, there is your heart; where your heart is, there is your happiness”. We need to give ourselves completely to enjoy that that treasure. William Barclay writes “Were the whole realm of nature mine, that were an offering far too small. Love so amazing, so divine demands my soul, my life, my all”.

God values the Sacrifice: God values the sacrifice of the giver. More than the amount given he sees the heart or the love with which one gives Mother Theresa says “If you give what you do not need, it isn’t giving,” God is not interested in how much we give, but in how we give. God does not look at the amount of the gift but at the spirit of the giver.

Let the widow in the gospel become a model for us in total surrendering of our life to God and the sacrifices that we need to make in our daily life.


मनन-चिंतन - 2



प्रभु ईश्वर के सामने जो बात मायने रखती है वह भेंट की मात्रा नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता है। उत्पत्ति 4:3-4 में कहा गया है, " काइन ने भूमि उपज का कुछ अंश प्रभु को अर्पित किया। हाबिल ने भी अपनी सर्वोत्तम भेड़ों के पहलौठे मेमनों को प्रभु को अर्पित किया।" यह स्पष्ट है कि काइन ने अपनी भेंट की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया। उसने “कुछ अंश” अर्पित किया, जैसे वह एक औपचारिकता पूरी कर रहा हो। लेकिन हाबिल ने चुने हुए उपहारों की भेंट चढ़ायी; उसने प्रभु को सर्वश्रेष्ठ वस्तुएं अर्पित की। बलिदान की भावना चढ़ावे की गुणवत्ता को बढ़ाती है। 2समुएल 24:24 में दाऊद ने जोर देकर कहा, "मैं प्रभु, अपने ईश्वर को मुफ़्त में प्राप्त होम-बलियाँ नहीं चढ़ाना चाहता"। जब हमारे पास ज़रूरत से ज़्यादा सम्पत्ति होती है और उसका एक अंश प्रभु को चढ़ाते हैं, तो वह कोई महान कार्य नहीं होता है, लेकिन अगर हमारे पास अपनी ज़रूरत की पूर्ती के लिए पर्याप्त संपत्ति है या उससे भी कम है, तो उनमें से कुछ ईश्वर को अर्पित करना एक महान हो जाता है। अगर ईश्वर की या दूसरों की सेवा में हमें अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ती है, तो वह सबसे बड़ा कार्य बनता है। संत लूकस 21:1-4 में बताया गया है कि उस गरीब विधवा ने “तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला”। वह सब कुछ देती है। ऐसा करने को सक्षम होने के लिए, वह एक ऐसी महिला होनी चाहिए, जो पूरी तरह ईश्वर के लिए समर्पित हो, जो ईश्वर की उदारता में विश्वास करती हो और यह मानती हो कि ईश्वर को कुछ चढ़ाते समय हिस्साब नहीं लगाना चाहिए।



REFLECTION


What matters before God is not quantity of the offering, but the quality of it. Gen 4:3-4 says, “Cain brought to the Lord an offering of the fruit of the ground, and Abel for his part brought of the firstlings of his flock, their fat portions”. It is evident that Cain did not bother about the quality of his offering to God. He offered something, as if he was fulfilling a formality. But Abel offered chosen gifts; he offered the best to God. One of the things that adds to the quality greatly is the sacrifice involved in the offerings. In 2Sam 24:24 David insists, “I will not offer burnt offerings to the Lord my God that cost me nothing”. When we offer from what we have in excess, there is nothing great about, but if we offer to the point of being hurt, it becomes great. If it means dying, that is the greatest offering. The poor widow at the temple, mentioned by Lk in 21:1-4, put in “all she had to live on”. She gives everything. To be able to do that, she should be a woman who has single-minded devotion in her heart for God, believes in the generosity of God and does not count when it is a matter of offering something to God.


 -Br. Biniush topno


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इतवार, 21 नवंबर, 2021

 

इतवार, 21 नवंबर, 2021

वर्ष का चौंत्तीसवाँ सामान्य इतवार

ख्रीस्तराजा का समारोह

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पहला पाठ : दानिएल 7:13-14


13) तब मैंने रात्रि के दृश्य में देखा कि आकाश के बादलों पर मानवपुत्र-जैसा कोई आया। वह वयोवृद्ध के यहाँ पहुँचा और उसके सामने लाया गया।

14) उसे प्रभुत्व, सम्मान तथा राजत्व दिया गया। सभी देश, राष्ट्र और भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी उसकी सेवा करेंगे। उसका प्रभुत्व अनन्त है। वह सदा ही बना रहेगा। उसके राज्य का कभी विनाश नहीं होगा।



दूसरा पाठ : प्रकाशना 1:5-8



5) और ईसा मसीह की ओर से आप लोगों को अनुग्रह और शान्ति प्राप्त हो! मसीह विश्वसनीय साक्षी, पुनर्जीवित मृतकों में से पहलौठे और पृथ्वी के राजाओं के अधिराज हैं। वह हम को प्यार करते हैं। उन्होंने अपने रक्त से हमें पापों से मुक्त किया।

6) और अपने ईश्वर और पिता के लिए हमें याजकों का राजवंश बनाया। उनकी महिमा और उनका सामर्थ्य अनन्त काल तक बना रहे! आमेन!

7) देखो, वही बादलों पर आने वाले हैं। सब लोग उन्हें देखेंगे। जिन्होंने उन को छेदा, वे भी उन्हें देखेंगे और पृथ्वी के सभी राष्ट्र उन पर विलाप करेंगे। यह निश्चित है। आमेन!

8) जो है, जो था और जो आने वाला है, वही सर्वशक्तिमान् प्रभु-ईश्वर कहता है- आल्फा और ओमेगा (आदि और अन्त ) मैं हूँ।

सुसमाचार : योहन 18:33-37

33) तब पिलातुस ने फिर भवन में जा कर ईसा को बुला भेजा और उन से कहा, "क्या तुम यहूदियों के राजा हो?"

34) ईसा ने उत्तर दिया, "क्या आप यह अपनी ओर से कहते हैं या दूसरों ने आप से मेरे विषय में यह कहा है?"

35) पिलातुस ने कहा, "क्या मैं यहूदी हूँ? तुम्हारे ही लोगों और महायाजकों ने तुम्हें मेरे हवाले किया। तुमने क्या किया है।"

36) ईसा ने उत्तर दिया, "मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता तो मेरे अनुयायी लडते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं है।"

37) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, "तो तुम राजा हो?" ईसा ने उत्तर दिया, "आप ठीक ही कहते हैं। मैं राजा हूँ। मैं इसलिये जन्मा और इसलिये संसार में आया हूँ कि सत्य के विषय में साक्ष्य पेश कर सकूँ। जो सत्य के पक्ष में है, वह मेरी सुनता है।"



मनन-चिंतन



आज मसीह/ख्रीस्त राजा के पर्व पर आइए हम उन दो मूलभूत गुणों पर विचर करें जो येसु के राजत्व और राज्य को दूसरों से अलग बनाते हैं ।

विनम्र सेवा में उपयोग की जाने वाली आधिकारिक शक्तिः-शक्ति और अधिकार के बिना एक राजा एक सामान्य नागरिक के बराबर होता हैं । राजा के प्रति प्रजा की निष्ठा, अधीनता और आज्ञाकारिता राजा की शक्ति और अधिकार पर निर्भर करती है । येसु ने अधिकार के साथ बात की जिसका कोई भी विरोध नहीं कर सकता था क्योंकि वो अधिकार उन्हें ऊपर से सौंपा गया था । लेकिन उन्होंने मानवता की सेवा के लिए हमेशा विनम्रता से अपने अधिकार और शक्ति का इस्तेमाल किया । उन्होंने हमें भूखे को खाना खिलाना, नंगों को कपडें पहनाना और एकाकी को सात्वना देना सिखाया । वह एक राजा है जो दया और करूणा से ओत-प्रोत/भरा हुआ है । संत पौलुस हमें बताते है ”वह वास्तव में ईश्वर थेे और उनको पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें, फिर भी उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया और उन्होंने मनुष्य का रूप धारण करने के बाद, मरण तक, हॉं क्रूस पर मरण तक आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन बना लिया “(फिलिप्पियों 2ः6-8)। अपने जीवन को त्याग देने की हद तक सेवा करना उनके जीवन का आदर्श था । उन्होंने स्वय कहा, “मानव पुत्र अपनी सेवा कराने नही, बल्कि सेवा करने तथा बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है “(मत्ती 20ः28)। मानवता के प्यार के लिए उन्होंने खुद को क्रूस पर चढ़ा दिया और हमें दर्द का अर्थ /और उद्धेश्य दिखाया ।

क्षेत्रों के बिना/सीमांकन के बिना चिरस्थायी राज्यः येसु का राज्य किसी के भी द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता कयोंकि वह शक्ति, धन या लोकप्रियता पर आधारित । नहीं बना है । उसका राज्य न्याय और सच्चाई,प्रेम और शांति, पवित्रता और अनुग्रह से बना है । प्रत्येक राज्य अपने सीमांकन द्वारा सीमित है । लेकिन येसु के राज्य की कोई सीमा नहीं है । उसका राज्य उन लोगों का राज्य है जिन्हें ईश्वर ने बुलाया है । उनके राज्य में प्रवेश करने की केवल दो मॉंगे हैः परिवर्तन और विश्वासं । इस प्रकार जो लोग अपने पापों पर पश्चाताप करते हैं और मसीह और उसके सुसमाचार में विश्वास करते है। वे ईश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकते है ।

एक पश्चातापी हृदय और विश्वास की घोषणा के साथ आइए हम उसके अनंत राज्य में प्रवेश करें और उसके प्रति अपनी वफादारी और आज्ञाकारिता को प्रजा के रूप में घोषित करें ।


REFLECTION




Today on the feast of Christ the King let us reflect on two basic qualities that make Jesus’ kingship and Kingdom different from the others.

Authoritative Power used in humble service: A king without power and Authority is equal to an ordinary citizen. The loyalty, allegiance and obedience of the subjects to the king depend on the power and authority of the king. Jesus also spoke with authority which no one could oppose because it was assigned from above. But he always used his authority and power in humility for the service of humanity. . He taught us to feed the hungry, clothe the naked and console the lonely. He is a king who is full of compassion and mercy. St. Paul tells us, “even though He was in the form of God, did not regard equality with God as something to be grasped at, but emptied Himself, taking the form of a slave and being born in human likeness. He humbled Himself, becoming obedient to the point of death, even death on a cross” (Phil 2:6-8). Service to the point of giving up one’s life was his motto. He Himself said, “The Son of Man came not to be served but to serve, to give His life as a ransom for many” (Mt. 20:28). For the love of humanity he offered himself on the Cross and showed us the meaning and purpose of pain.

Everlasting Kingdom without territories: Kingdom of Jesus cannot be destroyed by anyone because it is not built on power, wealth or popularity. His kingdom is built on justice and truth, love and peace, holiness and grace. Every kingdom is limited by its territory. But kingdom of Jesus has no territories. His kingdom is a kingdom of people who are called by God. Entry to His kingdom has only two demands, conversion and faith. Thus those who repent of their sins and believe in Christ and his gospel could enter in the kingdom of God.

With a repentant heart and profession of faith let us enter into his everlasting kingdom and declare our loyalty and obedience to him as subjects.



मनन-चिंतन - 2



कुछ वर्ष पहले एक अमेरिकी सैनिक बस से स्वीडन की यात्रा कर रहा था और उसने अपने बगल में बैठे सहयात्री से कहा, “अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र देश है जहाँ जनसाधारण व्यक्ति भी व्हाइट हाउस (राष्ट्रपति भवन) जाकर राष्ट्रपति से मिलकर अपनी समस्याओं का समाधान कर सकता है”। उसके सहयात्री ने कहा- “वह तो कुछ भी नहीं है; स्वीडन में तो राजा खुद अपनी प्रज्ञा के साथ बस में बैठकर यात्रा करते हैं”। इसे सुनकर अमेरिकी सैनिक उठ कर चला गया और उसे बताया गया कि जिस बस पर वह सवार है उसी बस में राजा गुस्ताव अडोल्फ 6वें अपनी प्रजा के साथ यात्रा कर रहे हैं।

प्रभु येसु ख्रीस्त, हमारे राजा हमारी जीवनरूपी बस में हमेशा हमारे साथ स्वर्ग की यात्रा करते हैं, जो हमारा गंतव्य स्थान है। वही हमारे राजा और सर्वस्व है। उन्हीं में हम जीवन जीते और बने रहते हैं। वह हमारी जीवन की यात्रा के साथी ही नहीं, वे हमारे जीवन के केन्द्र बिन्दु भी हैं, आदि और अंत, अल्फा और ओमेगा हैं।

आज माता कलीसिया राजा राजेश्वर ख्रीस्त का पर्व मनाती है। यह त्यौहार हमारे लिए अंत्यत महत्वपूर्ण है क्योंकि आज की पूजन विधि के साथ यह पूजन-वर्ष सम्पन्न होता है। अगले इतवार को हम नये पूजन-वर्ष में प्रवेश करते हैं - आगमन काल।

‘राजा‘ शब्द येसु ख्रीस्त हमारे जीवन में ईश्वर के प्रतिरूप को उजागर करता है। हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त किसी अतीत के राजा नहीं, अपितु हमारे साथ हमारे बीच सदैव उपस्थित रहते हैं। प्रभु येसु ख्रीस्त ने अपने को इतिहास तक ही सीमित नहीं रखा वरन् अपनी प्रजा के साथ हमेशा-हमेशा के लिए रहने का वचन दिया है।

प्रभु येसु ख्रीस्त को राजा कहना विरोधाभास प्रतीत होता है, लेकिन यह हमारे विश्वास का केन्द्रिय विरोधाभास है। संत योहन आज के सुसमाचार में प्रभु येसु ख्रीस्त को राजा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इस बारे मे उनकी एक अलग समझ थी। वे एक अजीब से राजा थे। वे पिलातुस या रोमन गर्वनर से अलग थे। सुसमाचार में, पिलातुस येसु से पूछते हैं, “क्या तुम यहूदियों के राजा हो”? येसु उन्हें उत्तर देते हैं, “मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि यह मेरा राज्य इस संसार का होता तो, मेरे अनुयायी लड़ते और यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं है।” पिलातुस फिर येसु से पूछते हैं, “तो, तुम राजा हो”। येसु उत्तर देते हैं, “आप ठीक ही कहते हैं। मैं राजा हूँ। मैं इसलिए जन्मा और संसार में आया हूँ कि सत्य के विषय में साक्ष्य दूँ।” योहन १८:३६-३७)

अतः प्रभु येसु ख्रीस्त के राज्य की तुलना इस संसार से नहीं की जा सकती है। उनके राज्य में किसी प्रकार का ऊंच-नीच, धनी-गरीब और कोई ओहदे पद का भेद्भाव नहीं होता। उनके राज्य में सभी एक समान है उनमें कोई भेद भाव नहीं है। प्रभु येसु एक सांसारिक राजा नहीं हैं, बल्कि हमारे दिल के राजा हैं। वे दुनिया भर के लोगों के दिलों में राज करते हैं। वे शांति और उदारता, क्षमा और सहनशीलता, विनम्रता तथा सादगी के राजा हैं।

आज के पहले पाठ में, दानिएल के ग्रंथ में हमें बताया गया है कि नबी दानिएल यहूदियों में एक नयी आशा का संचार करते हैं जो अपने जीवन में विपत्तियों का सामना करते आये थे। नबी दानिएल के द्वारा उन्हें आश्वासन दिया जाता है कि अब से उन्हें किसी भी विपत्ति का सामना नहीं करना पडे़गा। वे अब से शंकामुक्त जीवन व्यतीत करेंगे और स्वर्ग से मानव पुत्र को आते हुए दिखाई देंगे और उनके जीवन में एक नयी आशा का संचार होगा जो ईश्वर की आत्मा द्वारा संचालित होगी। प्रभु येसु के द्वितीय आगमन के समय हम सभी उसी राजा के राज्य में उत्तराधिकारी बनने के लिए बुलाये गये हैं जो सदैव हमारे साथ रहते हैं।

अंत में हम इसे एक महान नाटककार के शब्द में कह सकते हैं, “प्रभु येसु ख्रीस्त ही एक ऐसे राजा हैं जो सभी सान्सारिक राजाओं से भिन्न थे; उनके राज्य में धनी और गरीब, छोटे और बड़े सभी रह सकते थे। राजा ने अपनी प्रजा के साथ सदैव रहने तथा उनकी सेवा के लिए जीवन समर्पित किया।”

आइये आज ख्रीस्त राजा राजेश्वर का पर्व मनाते हुये उनके जीवन के रहस्यों को समझें और उन्हीं की तरह सबो के साथ ईश्वरीय राज्य का बीज बोने के लिए अपने आप को तैयार करें जिससे हम भी प्रभु येसु की तरह अपने लिए नहीं, लेकिन दूसरों के लिए जीवन जी सकें। आमेन


-Br. Biniush topno


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शनिवार, 20 नवंबर, 2021

 

शनिवार, 20 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: मक्काबियों का पहला ग्रन्थ 6:1-13


1) जब अंतियोख पहाड़ी प्रांतों का दौरा कर रहा था, तो उसने सुना कि फारस देश का एलिमईस नगर अपनी संपत्ति और सोना-चाँदी के लिए प्रसिद्ध है।

2) और यह कि वहाँ का मंदिर अत्यंत समृद्ध है और उस में वे स्वर्ण ढाले, कवच और अस्त्र-शस्त्र सुरक्षित हैं, जिन्हें फिलिप के पुत्र सिंकदर, मकूदूनिया के राजा और यूनानियों के प्रथम शासक, ने वहाँ छोड दिया था।

3) इसलिए वह उस नगर पर अधिकार करने और उसे लूटने के उद्देश्य से चल पडा, किंतु वह ऐसा नहीं कर पाया; क्योंकि नागरिकों को उस अभियान का पता चल गया था।

4) उन्होंने हथियार ले कर उसका सामना किया और उसे भागना पड़ा। उसने दुःखी हो कर वहाँ से बाबुुल के लिए प्रस्थान किया।

5) वह फारस में ही था, जब उसे यह समाचार मिला कि जो सेना यहूदिया पर आक्रमण करने निकली थी, वह पराजित हो कर भाग रही है।

6) लीसियस एक विशाल सेना ले कर वहा गया था, किंतु उसे यहूदियों के सामने से पीछे हट जाना पडा। अब यहूदी अपने अस्त्रों, अपने सैनिकों की संख्या और पराजित सेनाओं की लूट के कारण शक्तिशाली बन गये थे।

7) उन्होंने येरुसालेम की होम-वेदी पर अन्तियोख द्वारा स्थापित घृणित मूर्ति को ढाह दिया, पहले की तरह मंदिर के चारों ओर ऊँची दीवार बनवायी और उसके नगर बेत-सूर की भी किलाबंदी की।

8) राजा यह सुन कर चकित रह गया वह बहुत घबराया, पलंग पर लेट गया और दुःख के कारण बीमार हो गया; क्योंकि वह जो चाहता था, वह नहीं हो पाया था।

9) वह इस तरह बहुत दिनों तक पड़ा रहा, क्योंकि एक गहरा विषाद उस पर छाया रहा। तब वह समझने लगा कि वह मरने को है

10) और उसने अपने सब मित्रों को बुला कर उन से कहा, ’’मुझे पर दुःख का कितना बड़ा पहाड टूट पड़ा है! मैं तो अपने शासन के दिनों में दयालु और लोकप्रिय था’।

11) मैंने पहले अपने मन में कहा, मैं कितना कष्ट सह रहा हूँ ओर मुझ पर दुःख का कितना बड़ा पहाड़ टूट पड़ा है। मैं तो अपने शासन के दिनों दयालु और लोकप्रिय था।

12) किंतु अब मुझे याद आ रहा है कि मैंने येरुसालेम के साथ कितना अत्याचार किया- मैं वहाँ के चाँदी और सोने के पात्र चुरा कर ले गया और मैंने अकारण यूदा के निवासियों को मारने का आदेश दिया।

13) मुझे लगता है कि मैं इसी से कष्ट भोग रहा हूँ और गहरे शोक के कारण यहाँ विदेश में मर रहा हूँ’’



सुसमाचार : सन्त लूकस 20:27-40



27) इसके बाद सदूकी उनके पास आये। उनकी धारणा है कि मृतकों का पुनरूत्थान नहीं होता। उन्होंने ईसा के सामने यह प्रश्न रखा,

28) ‘‘गुरूवर! मूसा ने हमारे लिए यह नियम बनाया-यदि किसी का भाई अपनी पत्नी के रहते निस्सन्तान मर जाये, तो वह अपने भाई की विधवा को ब्याह कर अपने भाई के लिए सन्तान उत्पन्न करे।

29) सात भाई थे। पहले ने विवाह किया और वह निस्सन्तान मर गया।

30) दूसरा और

31) तीसरा आदि सातों भाई विधवा को ब्याह कर निस्सन्तान मर गये।

32) अन्त में वह स्त्री भी मर गयी।

33) अब पुनरूत्थान में वह किसकी पत्नी होगी? वह तो सातों की पत्नी रह चुकी है।’’

34) ईसा ने उन से कहा, ‘‘इस लोक में पुरुष विवाह करते हैं और स्त्रियाँ विवाह में दी जाती हैं;

35) परन्तु जो परलोक तथा मृतकों के पुनरूत्थान के योग्य पाये जाते हैं, उन लोगों में न तो पुरुष विवाह करते और न स्त्रियाँ विवाह में दी जाती हैं।

36) वे फिर कभी नहीं मरते। वे तो स्वर्गदूतों के सदृश होते हैं और पुनरूत्थान की सन्तति होने के कारण वे ईश्वर की सन्तति बन जाते हैं।

37) मृतकों का पुनरूत्थान होता हैं मूसा ने भी झाड़ी की कथा में इसका संकेत किया है, जहाँ वह प्रभु को इब्राहीम का ईश्वर, इसहाक का ईश्वर और याकूब का ईश्वर कहते है।

38) वह मृतकों का नहीं, जीवितों का ईश्वर है, क्योंकि उसके लिये सभी जीवित है।’’

39) इस पर कुछ शास्त्रियों ने उन से कहा, ‘‘गुरुवर! आपने ठीक ही कहा’’।

40) इसके बाद उन्हें ईसा से और कोई प्रश्न पूछने का साहस नहीं हुआ।



मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार येसु के पुररूत्थान के संदर्भ/ में सदूकियों की सोच और ईश्वर की अवधारणा में दो गलतियों की ओर इंगित । करता है ।

सदूकी पुनरूत्थान की धारणा गलत थी कयोंकि पृथ्वी के संदर्भ में स्वर्ग के बारे में सोचना और समय के संदर्भ में अनंत काल के विषय में सोचने में त्रुटि थी । उनका यह मानना था कि स्वर्ग में जीवन पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता होगी । लेकिन येसु कहते है कि स्वर्ग इस दुनिया का एक सिलसिला या विस्तार के रूप में नही होगा । इन दोनों में मूलभूत अंतर यह कि स्वर्ग में लोग अब नही मर सकते । मृतयु के बिना जीवन एक अद्भुुत अनुभव है । संत पौलुस कुरिन्थियों के नाम अपने पहले पत्र में कहते है (15ः20-23) “किन्तु मसीह सचमुच मृतकों में से जी उठे ।

- - - उसी तरह सब मसीह के कारण पुर्नीवित किये जायेगे।

”हम येसु के पुनर्जीवित जीवन में सहभागी होंगे जिस पर मृत्यु की कोई भी शक्ति का वश नहीं है चूॅंकि यह एक अनंत जीवन है । इसलिए विवाह या संतानोत्पत्ति की कोई आवश्यकता नही है । यदि कोई संतान नहीं है तो रिश्ते भी अनंत जीवन में भिन्न-भिन्न हो जाएॅंगे । शारीरिक संबंध जो हम वर्तमान में अनुभव करते है अपितु वे रिश्ते इसकी तुलना में कई अधिक बडे़ होंगे । इसके साथ ही” उनका कहना है कि हर किसी के पास स्वर्गदूतों के समान एक स्वर्गीय/शरीर भी होगा । येसु ईश्वर के संदीर्भ में उन्हें जीवितों का ईश्वर कहकर संबोधित करते है । येसु उन्हें पूर्व का हवाला देते हुए उनका ध्यान निर्गमन गं्रथ 3ः6 पर आकर्षित करते हुए कहते है कि भले ही इब्राहीम, इसहाक और याकूब मर गए हों, परन्तु अभी भी ईश्वर उनका सच्चा ईश्वर है। वहं उनके लिए जीवित रहता है और वे उसकी उपस्थिति में रहते हुए उसके लिए जीवित रहते हैं इन तीन महान कुलपतियों के साथ ईश्वर का जो प्रेम और विश्वासयोग्य बंधन है, वह मृत्यु से भी नही टूट। सकता है ।

येसु का तात्पर्य है कि हमारे प्रति ईश्वर का प्रेम और विश्वास हमारे संसारिक जीवन और मृत्यु के बाद बना रहता है । ईश्वर अपने वादों को इस संसारिक जीवन से परे रखता है ।

येसु आज हमंे उसके प्रति विश्वास योग्य रहने के लिए आमंत्रित करते हैं ताकि उसके प्रेम और विश्वास के द्वारा हम उस अनन्त जीवन में प्रवेश कर सकें जिसकी उसने हम से प्रतिज्ञा की है ।



REFLECTION



Today’s gospel Jesus points out two mistakes in the thinking of Sadducees about the resurrection and their concept of God

Sadduees notion of resurrection was wrong because there was an error of thinking of heaven in terms of earth and thinking of eternity in terms of time. Their question of presumed that life in heaven will be a continuation of life on earth. But Jesus says that heaven is not going to be a continuation or an extension of this world. The fundamental difference is that, in heaven people can no longer die. A life without death is a wonderful experience. St. Paul says in 1Cor. 15:20-23 “Christ has been raised from the dead …. so all will be made alive in Christ”. We will be sharing the risen life of Jesus over which death has no power.

Since it is an eternal life, there is no need for marriage or procreation. If no procreation the relationships also will be deferent in eternal life. There would be greater relationships than the physical relationships that we experience now. Added to that he says everyone will have a heavenly body like the angels as well.

Jesus speaks of God as the God of the living. Citing Ex. 3:6 he clarifies that even though Abraham, Isaac and Jacob have died, God remains their God. He remains alive to them and they remain alive to Him living in His presence. The bond of love and faithfulness that God has with these three great patriarchs has not been broken by death. Jesus implies that God’s love and faithfulness to us, also endures beyond our earthly life and death. God keeps His promises beyond this earthly life.

Jesus invites us today to remain faithful to him so that through his love and faithfulness we may enter into that eternal life which he has promised us.




मनन-चिंतन - 2



सदूकियों ने मृतकों के पुनरुत्थान का सवाल उठाया और यह प्रश्न किया कि पुनरुत्थान के बाद हमें किस तरह का जीवन मिलेगा। प्रभु येसु ने उन्हें समझाया कि पुनरुत्थान के समय हमारे जीवन और संबंधों को बदल दिया जाएगा। हम फिर स्वर्गदूतों की तरह होंगे। हम ईश्वर के परिवार में पैदा होंगे जहां सभी ईश्वर के बच्चों के साथ एक नए प्रकार के रिश्ते होंगे। संत पौलुस कहते हैं, "अभी तो हमें आईने में धुँधला-सा दिखाई देता है, परन्तु तब हम आमने-सामने देखेंगे। अभी तो मेरा ज्ञान अपूर्ण है; परन्तु तब मैं उसी तरह पूर्ण रूप से जान जाऊँगा, जिस तरह ईश्वर मुझे जान गया है।”(1कुरिन्थियों 13:12) संत योहन कहते हैं, "अब हम ईश्वर की सन्तान हैं, किन्तु यह अभी तक प्रकट नहीं हुआ है कि हम क्या बनेंगे। हम इतना ही जानते हैं कि जब ईश्वर का पुत्र प्रकट होगा, तो हम उसके सदृश बन जायेंगे; क्योंकि हम उसे वैसा ही देखेंगे, जैसा कि वह वास्तव में है। " (1योहन 3: 2)। हम स्वर्ग की आशा में इस दुनिया में रहते हैं। संत पौलुस हमारे सांसारिक शरीर तथा पुनर्जीवित शरीर के बीच के अन्तर को प्रकट करते हुए कहते हैं, “मृतकों के पुनरुत्थान के विषय में भी यही बात है। जो बोया जाता है, वह नश्वर है। जो जी उठता है, वह अनश्वर है। जो बोया जाता है, वह दीन-हीन है। जो जी उठता है, वह महिमान्वित है। जो बोया जाता है, वह दुर्बल है। जो जी उठता है, वह शक्तिशाली है। एक प्राकृत शरीर बोया जाता है और एक आध्यात्मिक शरीर जी उठता है। प्राकृत शरीर भी होता है और आध्यात्मिक शरीर भी।” (1 कुरिन्थियों 15:42-44)



REFLECTION



The Sadducees raised the question of the resurrection of the dead and the kind of life we shall have after the resurrection. Jesus explained to them that our life and relationships will be changed at the resurrection. We shall then be like angels. We will be born into the family of God where there will be a new kind of relationships with all God’s children. St. Paul says, “For now we see in a mirror, dimly, but then we will see face to face. Now I know only in part; then I will know fully, even as I have been fully known” (1Cor 13:12). St. John says, “What we do know is this: when he is revealed, we will be like him, for we will see him as he is” (1Jn 3:2). Let us live in this world in the hope of heaven. St. Paul distinguishes between the earthly body and the risen body in this way – “What is sown is perishable, what is raised is imperishable. It is sown in dishonor, it is raised in glory. It is sown in weakness, it is raised in power. It is sown a physical body, it is raised a spiritual body. If there is a physical body, there is also a spiritual body.” (1Cor 15:42-44)


 -Br. Biniush topno


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शुक्रवार, 19 नवंबर, 2021

 

शुक्रवार, 19 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: मक्काबियों का पहला ग्रन्थ 4:36-37,52-59



36) उस समय यूदाह और उसके भाइयों ने यह कहा, ’’हमारे शत्रु हार गये। हम जा कर मंदिर का शुद्धीकरण और प्रतिष्ठान करें।’’

37) समस्त सेना एकत्र हो गयी और सियोन के पर्वत की ओर चल पड़ी।

52) एक सौ अड़तालीसवें वर्ष के नौंवे महीने-अर्थात् किसलेव-के पच्चीसवें दिन, लोग पौ फटते ही उठे

53) और उन्होंने होम की जो नयी वेदी बनायी थी, उस पर विधिवत् बलि चढ़ायी।

54) जिस समय और जिस दिन गैर-यहूदियों ने वेदी को अपवत्रि कर दिया था, उसी समय और उसी दिन भजन गाते और सितार, वीणा तथा झाँझ बजाते हुए उन्होंने वेदी का प्रतिष्ठान किया।

55) सब लोगों ने दण्डवत् कर आराधना की और ईश्वर को धन्य कहा, जिसने उन्हें सफलता दी थी।

56) वे आनंद के साथ होम, शांति तथा धन्यवाद का यज्ञ चढा कर आठ दिन तक वेदी के प्रतिष्ठान का पर्व मनाते रहें।

57) उन्होंने मंदिर का अग्रभाग सोने की मालाओं तथा ढालों से विभूशित किया, फाटकों तथा याजकों की शालाओं को मरम्मत किया और उनमें दरवाजे लगाये।

58) लोगों में उल्लास था और उन पर लगा हुआ गैर-यहूदियों का कलंक मिट गया।

59) यूदाह ने अपने भाइयों तथा इस्राएल के समस्त समुदाय के साथ यह निर्णय किया कि प्रति वर्ष इसी समय, अर्थात् किसलेव के पच्चीसवें दिन से ले कर आठ दिन तक वेदी के पुनः प्रतिष्ठान का पर्व उल्लास तथा आन्नद के साथ मनाया जायेगा।



सुसमाचार : सन्त लूकस 19:45-48



45) ईसा मन्दिर में प्रवेश कर बिक्री करने वालों को यह कहते हुए बाहर निकालने लगे,

46) ‘‘लिखा है-मेरा घर प्रार्थना का घर होगा, परन्तु तुम लोगों ने उसे लुटेरों का अड्डा बनाया है’’।

47) वे प्रतिदिन मन्दिर में शिक्षा देते थे। महायाजक, शास्त्री और जनता के नेता उनके सर्वनाश का उपाय ढूँढ़ रहे थे,

48) परन्तु उन्हें नहीं सूझ रहा था कि क्या करें; क्योंकि सारी जनता बड़ी रुचि से उनकी शिक्षा सुनती थी।



मनन-चिंतन



जब प्रभु येसु ने पवित्र वचन की घोषणा की, तब गरीबों और आम लोगों ने उनकी प्रशंसा की और उनके संदेश को स्वीकार किया, लेकिन शक्तिशाली और प्रभावशाली लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया और उनका विरोध किया। जरूरतमंद लोग आसानी से ईश्वर को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन जिन लोगों की जरूरतें पहले से पूरी हो जाती हैं, उन्हें अपने जीवन में ईश्वर की भूमिका स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है। येसु स्वर्गिक पिता द्वारा उनके लिए निर्धारित किए गए मार्ग पर ही चलते थे। वे लोकप्रियता या विरोध के कारण पीछे नहीं हटते थे। वे ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के सीधे मार्ग पर चलते रहते थे। जब शैतान उन्हें अपने रास्ते से हटाने की कोशिश करता है, तब वे शैतान की चालों को समझ सकते हैं और उसे अपने सामने से निष्कासित करते हैं। स्वर्गराज्य के लिए सब कुछ नया करने के मकसद से, वे मंदिर की पवित्रता पर जोर देते हैं जिसे उनके समय के लोगों ने बाजार या लुटेरों के अड्डे में बदल दिया था। क्या हम येसु की तरफ हैं या फरीसियों और सदूकियों की तरफ?



REFLECTION



When Jesus preached the Word, the poor and ordinary people acclaimed him and accepted his message, but the powerful and the influential rejected and opposed him. The people in need easily accept God but the people whose needs are already met find it difficult to accept the role of God in their lives. Jesus simply keeps himself on the path marked out for him by the heavenly Father. He does not get diverted by popularity or by opposition. He keeps going straight in doing the will of God. When Satan tries to divert him from his path, he is quick to sense the tricks of Satan and expel him from his presence. In an exercise of renewing everything for the Kingdom, he insists on the sanctity of the temple which the people of his time had turned into a market or den of robbers. Are we on the side of Jesus or on the side of the Pharisees and the Scribes?


 -Br. Biniush topno


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गुरुवार, 18 नवंबर, 2021

 

गुरुवार, 18 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: मक्काबियों का पहला ग्रन्थ 2:15-29


15) राजा के पदाधिकारी, जो लोगों को स्वधर्मत्याग के लिए बाध्य करते थे, बलिदानों का प्रबंध करने मोदीन नामक नगर पहुँचे।

16) बहुत-से इस्राएली उन से मिल गये किंतु मत्तथ्या और उसके पुत्र अलग रहे।

17) राजा के पदाधिकारो ने मत्तथ्या को सम्बोधित करते हुए कहा, ’’आप इस नगर के प्रतिष्ठित और शक्तिशाली नेता हैं। आप को अपने पुत्रों और भाइयों का समर्थन प्राप्त हैं।

18) आप सर्वप्रथम आगे बढ़ कर राजाज्ञा का पालन कीजिए, जैसा कि सभी राष्ट्र, यूदा के लोग और येरुसालेम के निवासी कर चुके हैं। ऐसा करने पर आपके पुत्र राजा के मित्र बनेंगे और सोना चाँदी और बहुत-से उपहारों द्वारा आपका और आपके पुत्रों का सम्मान किया जायेगा।’’

19) मत्तथ्या ने पुकार कर यह उत्तर दिया, ’’साम्राज्य के सभी राष्ट्र भले ही राजा की बात मान जायें, सभी आपने पुरखों का धर्म छोड़ दें और राजा के आदेशों का पालन करें,

20) किंतु मैं, मेरे पुत्र और मेरे भाई-हम अपने पुरखों के विधान के अनुसार ही चलेंगे।

21) ईश्वर हमारी रक्षा करे, जिससे हम उसकी संहिता और उसके नियमों का परित्याग न करें।

22) हम राजा की आज्ञाओं का पालन नहीं करेंगे और अपने धर्म का किसी भी प्रकार से उल्लंघन नहीं करेंगे।

23) मत्तथ्या ने इन शब्दों के तुरंत बाद एक यहूदी राजा के आदेशानुसार मोदीन की वेदी पर बलि चढ़ाने के लिए सब के देखते आगे बढा।

24) इस पर मत्तथ्या का धर्मोत्साह भड़क उठा और वह आगबबूला हो गया। उसने क्रोध के आवेग में आगे झपट कर उस यहूदी को वेदी पर मार डाला।

25) उसने बलि के लिए लोगों को बाध्य करने वाले पदाधिकारी का वध किया और वेदी का विध्वंस किया।

26) इस प्रकार मत्तथ्या ने पीनहास के सदृश संहिता के प्रति अपना उत्साह प्रदर्शित किया- पीनहास ने इसी तरह सालू के पुत्र ज़िम्री का वध किया था।

27) इसके बाद मत्तथ्या ने नगर भर में घूमते हुए ऊँचे स्वर से पुकार कर यह कहा, ’’जो संहिता के प्रति उत्साही हैं। और विधान को बनाये रखने के पक्ष में हैं, वे मेरे पीछे चले आयें’’।

28) इसके बाद वह और उसके पुत्र नगर में अपनी सारी संपत्ति छोड़ कर पहाड़ों पर भाग गये।

29) उस समय बहुत-से लोग, जिन्हें धर्म और न्याय प्रिय था, उजाड़ प्रदेश जा कर वहाँ बस गये।



सुसमाचार : सन्त लूकस 19:41-44



41) निकट पहुँचने पर ईसा ने शहर को देखा। वे उस पर रो पड़े

42) और बोले, ‘‘हाय! कितना अच्छा होता यदि तू भी इस शुभ दिन यह समझ पाता कि किन बातों में तेरी शान्ति है! परन्तु अभी वे बातें तेरी आँखों से छिपी हुई हैं।

43) तुझ पर वे दिन आयेंगे, जब तेरे शत्रु तेरे चारों ओर मोरचा बाँध कर तुझे घेर लेंगे, तुझ पर चारों ओर से दबाव डालेंगे,

44) तुझे और तेरे अन्दर रहने वाली तेरी प्रजा को मटियामेट कर देंगे और तुझ में एक पत्थर पर दूसरा पत्थर पड़ा नहीं रहने देंगे; क्योंकि तूने अपने प्रभु के आगमन की शुभ घड़ी को नहीं पहचाना।’’



मनन-चिंतन



आंसू हमारे अपने जीवन का हिस्सा है । हमारी ऑंखों में ऑंसू तब आते है जब कोई चीज हमारी ऑंखों में चली जाती है या दिलो में । आंसू भी सुसमाचार के वृतांतों का हिस्सा है । चारों सुसमाचार में, ऑंसू बहाने या विलाप के 26 संदर्भ है: पिता बीमार बेटी के लिए विलाप करता है, विधवा अपने इकलौते बेटे के लिए आंसू बहाती है, पापी स्त्री येसु के चरणों में रोती है, येसु का इनकार करने के कारण पेत्रुस फूट-फूट कर रोता है और इसी तरह अन्य संदर्भ है ।

येसु क्रूस को ढोते समय या क्रूस पर लटके हुए और कोड़ों की मार पर भी नही रोए, लेकिन उन्होंने समय-समय पर अपना दुख व्यक्त किया क्योंकि उन्हें उन लोगों के लिए सहानुभूति थी जिन्हें वे प्यार करते तथा जिनकी देखभाल करते थे । सहानुभूति सिर्फ दूसरों के लिए एक भावना नहीं है बल्कि खुद को दूसरे के स्थान पर रखना है । उन्होने अपने भाई लाजरूस को जीवित करके रोते हुए मार्था और मरियम को दिलासा दिया और मरियम मगदलेना के ऑसुओं को आनन्द में बदल दिया जब वे उनसे खाली कब्र पर मिलें । यीशु ने रोनेवालो को यह कहकर आशीष दी कि वे शान्ति प्राप्त करेंगे । संत पौलुस रोमियों को इसी समान मनोवृति रखने की सलाह देते है जब वे कहते है, “15) आनन्द मनाने वालों के साथ आनन्द मनायें, रोने वालों के साथ रोयें।“ (रोमियों 12ः15)

सुसमाचार दो अवसरों को दर्ज करते है जब येसु ने विलाप कियाः पहला अपने मित्र लाजरूस की मृत्यु पर (योहन 11ः35), दूसरा उस अवसर पर जब उन्होंने यंरूसालेम शहर के भविष्य के विनाश को देखा (लूकस 19ः41)।ष्

येसु येरूसालेम शहर के लिए उनके प्रेम के कारण रोते है । येरूसालेम दो प्रतिद्वंदी वंशजों बेनयामीन (साऊल का वंशज) और यूदा (दाऊद का वंशज) के बीच स्थित है। इसे शांति का शहर माना जाता था । लेकिन येसु को अस्वीकार करके वे पश्चाताप करने और उसे परमेश्वर के पुत्र के रूप में पहचानने में विफल रहे । उन्होंने शांति का एक मौका गंवा दिया और शहर के लिए तबाही लेकर आये ।

येसु ने लोगोें के अविश्वास पर विलाप किया । वे मसीह के प्रति उदासीन थे क्योंकि जीवन में सब चीजें ठीक चल रही थी । उन्होंने येसु को सार्वजनिक व्यवस्था या उनके आरामदायक जीवन के लिए एक खतरे के रूप में देखा । ईश्वर यह अपेक्षा करता है कि हम पूरे मन से उसकी पवित्र इच्छा के प्रति समर्पण करें

आइए हम लोगों के प्रति सहानुभूति रखें और ईश्वर के प्रति उदासीन होने से बचें ।



REFLECTION



Tears are part of our own lives. Tears form in our eyes when something gets into our eyes or when something gets into our hearts. Tears are part of the Gospel accounts as well. In four Gospels, there are 26 references to weeping: father weeping for ailing daughter, widow shedding tears for her only son, sinful woman weeping at the foot of Jesus, Peter weeping bitterly for denying Jesus and so on.

Jesus did not weep at the scourging, while carrying the cross or hanging on the cross, but he expressed his sorrow at times because he had an empathy for the people he loved and cared for. Empathy is not just a feeling for others but putting oneself in the place of another. St. Paul admonishes Romans to have the same attitude when he says, “Rejoice with those who are joyful; and weep with those who weep” (Rom 12:15)

The Gospels record two occasions when Jesus wept: the first at the death of his friend Lazarus (Jn.11:35), second on the occasion when he saw the future destruction of the City of Jerusalem (Lk.19:41).

Jesus weeps because of His love for the city of Jerusalem. Jerusalem is situated between two rivalry tribes Benjamin (tribe of Saul) and Judah (tribe of David). It was supposed to be the city of peace. But by rejecting Jesus they failed to repent and recognize him as son of God. They missed an opportunity for peace and brought destruction to the city.

Jesus lamented over the unbelief of the people. They were indifferent to Christ because things in life seemed to be going well. They saw Jesus as a threat to public order or their comfort zones. God expects that we surrender to His holy will with whole heart.

Let us be empathetic towards people and avoid being indifferent to God


 -Br. Biniush topno


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बुधवार, 17 नवंबर, 2021

 

बुधवार, 17 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: मक्काबियों का दूसरा ग्रन्थ 7:1,20-31

1) किसी अवसर पर सात भाई अपनी माता के साथ गिरफ्तार हो गये थे। राजा उन्हें कोड़े लगवा कर और यंत्रणा दिला कर बाध्य करना चाहता था कि वे सूअर का माँस खायें, जो संहिता में मना किया गया है।

20) माता विशेष रूप से प्रंशसनीय तथा प्रातः स्मरणीय है। एक ही दिन में अपने सात पुत्रों को अपनी आँखों के सामने मरते देखकर भी वह विचलित नहीं हुई; क्योंकि वह प्रभु पर भरोसा रखती थी।

21) वह अपने पूर्वजों की भाषा में हर एक का साहस बँधाती रही। उच्च संकल्प से प्रेरित हो कर तथा अपने नारी-हृदय में पुरुष का तेज भर कर, वह अपने पुत्रों से यह कहती थी,

22) ’’मुझे नहीं मालूम कि तुम कैसे मेरे गर्भ में आये। मैंने न तो तुम्हें प्राण तथा जीवन प्रदान किया और न तुम्हारे अंगों की रचना की।

23) संसार का सृष्टिकर्ता मानव जाति की रचना करता और सब कुछ उत्पन्न करता है। वह दया कर तुम्हें अवश्य ही फिर प्राण तथा जीवन प्रदान करेगा; क्योंकि तुम उसकी विधियों की रक्षा के लिए अपने जीवन का तिरस्कार कर रहे हो।’’

24) अंतियोख को लगा कि वह उसका तिरस्कार और निंदा कर रही है। अब केवल उसका सब से छोटा पुत्र जीवित रहा। अंतियोख ने उसे समझाया ही नहीं, बल्कि शपथ खा कर आश्वासन भी दिया कि ’’यदि तुम अपने पूर्वजों के रीति-रिवाजों का परित्याग करोगे, तो मैं तुम को धन और सुख प्रदान करूँगा, तुम्हें अपना मित्र बना कर उच्च पद पर नियुक्त करूँगा''।

25) जब नवयुवक ने उसकी बातों पर ध्यान ही नहीं दिया तो अंतियोख ने माता को बुला भेजा और उस से अनुरोध किया कि वह नवयुवक को समझाये, जिससे वह जीवित रह सके।

26) राजा के कई बार अनुरोध करने के बाद वह अपने पुत्र को समझाने को राजी हो गयी।

27) वह उस पर झुक गयी और क्रूर तानाशाह की अवज्ञा करते हुए उसके पूर्वजों की भाषा में उस से यह कहा, ’’बेटा! मुझ पर दया करो। मैंने तुम्हें नौ महीनों तक गर्भ में धारण किया और तीन वर्षों तक दूध पिलाया। मैंने तुम्हें खिलाया और तुम्हारी इस उमर तक तुम्हारा पालन-पोषण किया।

28) बेटा! मैं तुम से अनुरोध करती हूँ। तुम आकाश तथा पृथ्वी की ओर देखो- उन में जो कुछ है, उसका निरीक्षण करो और यह समझ लो कि ईश्वर ने शून्य से उसकी सृष्टि की है। मनुष्य भी इस प्रकार उत्पन्न हुआ है।

29) इस जल्लाद से मत डरो। अपने भाइयों के योग्य बनो और मृत्यु स्वीकार करो, जिससे मैं दया के दिन तुम्हें अपने भाइयों के साथ फिर पा सकूँ।’’

30) जब वह ऐसा कह चुकी थी, तो नवयुवक तुरंत बोल उठा ’’तुम देर क्यों करते हो? मैं राजा का आदेश नहीं मानूँगा। मैं अपने पुरखों को मूसा द्वारा प्रदत्त संहिता के नियमों का पालन करता हूँ।

31) और तुम राजा, अंतियोख! जिसने इब्रानियों पर हर प्रकार का अत्याचार किया, तुम ईश्वर के हाथ से नहीं बच सकोगे।

सुसमाचार : सन्त लूकस 19:11-28

11) जब लोग ये बातें सुन रहे थे, तो ईसा ने एक दृष्टान्त भी सुनाया; क्योंकि ईसा को येरुसालेम के निकट पा कर वे यह समझ रहे थे कि ईश्वर का राज्य तुरन्त प्रकट होने वाला है।

12) उन्होंने कहा, ‘‘एक कुलीन मनुष्य राजपद प्राप्त कर लौटने के विचार से दूर देश चला गया।

13) उसने अपने दस सेवकों को बुलाया और उन्हें एक-एक अशर्फ़ी दे कर कहा, ‘मेरे लौटने तक व्यापार करो’।

14) ‘‘उसके नगर-निवासी उस से बैर करते थे और उन्होंने उसके पीछे एक प्रतिनिधि-मण्डल द्वारा कहला भेजा कि हम नहीं चाहते कि वह मनुष्य हम पर राज्य करे।

15) ‘‘वह राजपद पा कर लौटा और उसने जिन सेवकों को धन दिया था, उन्हें बुला भेजा और यह जानना चाहा कि प्रत्येक ने व्यापार से कितना कमाया है।

16) पहले ने आ कर कहा, ‘स्वामी! आपकी एक अशर्फ़ी ने दस अशर्फि़य़ाँ कमायी हैं’।

17) स्वामी ने उस से कहा, ‘शाबाश, भले सेवक! तुम छोटी-से-छोटी बातों में ईमानदार निकले, इसलिए तुम्हें दस नगरों पर अधिकार मिलेगा’।

18) दूसरे ने आ कर कहा, ‘स्वामी! आपकी एक अशर्फ़ी ने पाँच अशर्फि़याँ कमायी हैं’

19) और स्वामी ने उस से भी कहा, ‘तुम्हें पाँच नगरों पर अधिकार मिलेगा’।

20) अब तीसरे ने आ कर कहा, ’स्वामी! देखिए, यह है आपकी अशर्फ़ी। मैंने इसे अँगोछे में बाँध रखा था।

21) मैं आप से डरता था, क्योंकि आप कठोर हैं। आपने जो जमा नहीं किया, उसे आप निकालते हैं और जो नहीं बोया, उसे लुनते हैं।’

22) स्वामी ने उस से कहा, ‘दुष्ट सेवक! मैं तेरे ही शब्दों से तेरा न्याय करूँगा। तू जानता था कि मैं कठोर हूँ। मैंने जो जमा नहीं किया, मैं उसे निकालता हूँ और जो नहीं बोया, उसे लुनता हूँ।

23) तो, तूने मेरा धन महाजन के यहाँ क्यों नहीं रख दिया? तब मैं लौट कर उसे सूद के साथ वसूल कर लेता।’

24) और स्वामी ने वहाँ उपस्थित लोगों से कहा, ‘इस से वह अशर्फ़ी ले लो और जिसके पास दस अशर्फि़याँ हैं, उसी को दे दो’।

25) उन्होंने उस से कहा, ‘स्वामी! उसके पास तो दस अशर्फि़याँ हैं’।

26) "मैं तुम से कहता हूँ-जिसके पास कुछ है, उसी को और दिया जायेगा; लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उस से वह भी ले लिया जायेगा, जो उसके पास है।

27) और मेरे बैरियों को, जो यह नहीं चाहते थे कि मैं उन पर राज्य करूँ, इधर ला कर मेरे सामने मार डालो’।

28) इतना कह कर ईसा येरुसालेम की ओर आगे बढ़े।


मनन-चिंतन



प्रतिभा व्यक्ति की क्षमता के अनुसार दी जाती हैः प्रबंधकीय पद ईश्वर के मापदंडों को पूरा करने के बारे में है न कि दूसरों से अपनी तुलना करने के बारे में। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम क्या प्राप्त करते हैं बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि हम उसका उपयोग कैसे करते हैं। बोने वाले के दृष्टांत में अच्छी मिट्टी द्वारा साठ और तीस के कम उत्पादन के लिए कोई आपत्ति नहीं उठाई जाती है। (मत्ती 13ः8)। व्यक्ति जितना अधिक प्रतिभाशाली होता है, उसे उतनी ही अधिक जिम्मेदारियां दी जाती हैं। ‘‘जिसे बहुत दिया गया है, उस से बहुत माँगा जायेगा’’(लूकस 12ः48)।

प्रतिभाओं में वृद्धि की उम्मीदः एक बार प्रतिभाओं को दिए जाने के बाद प्राप्तकर्ता से प्रतिभाओं को बढ़ाने के लिए परिकलित जोखिम के साथ कड़ी मेहनत करने की अपेक्षा की जाती है। प्रतिभा जन्मजात होती है या अर्जित की जाती है। अकादमिक उत्कृष्टता, कला और संस्कृति, खेल और खेल आदि में जन्मजात प्रतिभाएँ होती हैं। प्रतिभाएँ भी वे गुण हैं जो ईश्वर हमें अलौकिक स्तर पर देते हैं, उदाहरण के लिए, प्रार्थना करने की कृपा, विभिन्न आवश्यकताओं के लिए हस्तक्षेप करना, लोगों को सलाह देना , ईश्वर के प्यार के लिए दान करना और इसी प्रकार से अन्य। प्रतिभाओं का दृष्टांत हमें चुनौती देता है कि हम अच्छे फल पैदा करने के लिए नियमित रूप से और दृढ़ता से हमारे ईश्वर द्वारा दी गई प्रतिभा, गुण और अनुग्रह को विकसित करें। एक बगीचे की तरह जिसे फूल पैदा करने के लिए नियमित रूप से देखभाल की जाती है, हमारी प्रतिभा को व्यक्तिगत या गुप्त रूप से नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें साझा करना चाहिए और जरूरतमंद भाइयों और बहनों के लाभ के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।

निष्क्रियता के कारण नुकसान और सजाः पुरानी कहावत है ‘‘यदि आप इसका उपयोग नहीं करते हैं, तो आप इसे खो देते हैं’’। जो कुछ उसे डर के मारे दिया गया था, उससे उसने कुछ नहीं किया। उपहारों और प्रतिभाओं के हमारे उपयोग में हम असफल हो सकते हैं और गलतियाँ कर सकते हैं, लेकिन दृष्टांत बताता है कि भयभीत निष्क्रियता से विफलता बेहतर है। यह इस बात की भी वकालत करता है कि भय कभी भी प्रभु के साथ हमारे संबंधों को नियंत्रित नहीं करना चाहिए। रिश्ते को प्यार से चलाना चाहिए। 1 योहन 4ः18 कहता है, ‘‘प्रेम में भय नहीं होता। पूर्ण प्रेम भय दूर कर देता है’’।

दृष्टान्त में व्यक्ति को जो कुछ उसे सौंपा गया है उसका कोई पहल या लाभ नहीं लेने के लिए दंडित किया जाता है। प्रकाश्ना 3ः16 में हम पढ़ते हैं, ‘‘लेकिन न तो तुम गर्म हो और न ठंडे, बल्कि कुनकुने हो, इसलिए मैं तुम को अपने मुख से उगल दूँगा’’।

आइए हम ईश्वर प्रदत्त प्रतिभाओं और अनुग्रहों के लिए आभारी हों और उन्हें दूसरों के लाभ के लिए उपयोग करने के लिए उनका गुणा करने का संकल्प लें, ऐसा न हो कि हम उन्हें खो न दें या हमारी निष्क्रियता के लिए दंडित न हों।



REFLECTION

Talents are given according to the capacity of the person: Stewardship is about meeting God’s standards and not about comparing ourselves to others. What is important is not what we receive but how we make use of it. In the parable of the sower no objection is raised for the under production of sixty and thirty by the good soil. (Mat. 13:8). The more talented the person the more responsibilities are given. “More will be asked of a man to whom more has been entrusted” (Lk 12:48).

Expectation to increase the talents: Once the talents are given the receiver is expected to work hard with calculated risk to increase the talents. Talents are inborn or acquired. There are inborn talents in academic excellence, art and culture, sports and games etc.. Talents are also the graces which God gives to us on the supernatural level, for example, the grace to pray, to intercede for various needs, to counsel people, to do charity for the love of God and so on. The parable of the talents challenges us to cultivate regularly and perseveringly our God given talents, qualities and graces to produce good fruits. Like a garden that is taken care of regularly in order to produce flowers our talents are not to be kept personally or secretly, but they must be shared and used for the benefit of brothers and sisters in need.

Loss and Punishment for inactivity: The old saying goes “If you don’t use it, you lose it”. He did nothing with what was given to him out of fear. In our use of gifts and talents we may fail and make mistakes, but the parable suggests that failure is preferable to fearful inactivity. It also advocates that fear should never govern our relationship with the Lord. The relationship should be governed by love. 1Jn. 4:18 says, “There is no fear in love but perfect love casts out fear”.

The person in the parable is punished for not taking any initiative or advantage of what has been entrusted to him. In Rev. 3:16 we read “So because you are lukewarm, and neither cold nor hot, I am about to spit you out of my mouth”.

Let us thankful for God-given talents and graces and vow to multiply them using them for benefit of others, lest we may not lose them or be punished for our inactivity.



मनन-चिंतन - 2


आज के सुसमाचार में हम अशर्फ़ियों का दृष्टांत पाते हैं। प्रथम सेवक ने उसे प्राप्त एक अशर्फ़ी ले कर व्यापार किया और दस अशर्फ़ियाँ कमा लीं और दूसरे ने व्यापार करके पाँच अशर्फ़ियाँ कमा ली। दोनों की सराहना करते हुए उनको उनके स्वामी ने पुरस्कृत किया। लेकिन तीसरे सेवक ने न केवल अपनी अशर्फ़ियों को छिपा कर रखा, बल्कि उसने यह कहते हुए स्वामी को दोषी ठहराया, “आप कठोर हैं। आपने जो जमा नहीं किया, उसे आप निकालते हैं और जो नहीं बोया, उसे लुनते हैं”। इस नौकर को फल उत्पन्न न करने के कारण स्वामी द्वारा दंडित किया गया। येसु के कई दृष्टांतों में हम पा सकते हैं कि वे हमें उत्पादक और फलदायी बनने की माँग करते हैं। उत्पादकता और फलदायकता अच्छे जीवन और विकास के संकेत हैं। प्रभु हममें अनुग्रह और सद्भाव के बीज बोते हैं। यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम उन बीजों को फलने-फूलने और उत्पादक बनने के लिए सक्षम करें।



REFLECTION



In today’s Gospel we find the parable of the talents. The first servant traded with the talent he received and made ten talents and the second made five talents by trading. Both of them were appreciated and rewarded by the master. But the third servant not only did not multiply the talents, but he also blamed the master saying, “you are a harsh man; you take what you did not deposit, and reap what you did not sow”. This servant was punished by the master for not being productive. In many of the parables of Jesus we can find Jesus demanding us to be productive and fruitful. Productivity and fruitfulness are signs of good life and growth. God sows seeds of graciousness and goodness in us. It is for us to enable those seeds to sprout, flourish and become productive.

 -Br. Biniush topno


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Praise the Lord!