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मंगलवार, 02 नवंबर, 2021

 

मंगलवार, 02 नवंबर, 2021

सब मृतविश्वासियों का स्मरणोत्सव

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पहला मिस्सा

पहला पाठ : योब का ग्रन्थ 19:1,23-27


1) अय्यूब ने उत्तर देते हुए कहाः

23 (23-24) ओह! कौन मेरे ये शब्द लिखेगा? कौन इन्हें लोहे की छेनी और शीशे से किसी स्मारक पर अंकित करेगा? इन्हें सदा के लिए चट्टान पर उत्कीर्ण करेगा?

25) मैं यह जानता हूँ कि मेरा रक्षक जीवित हैं और वह अंत में पृथ्वी पर खड़ा हो जायेगा।

26) जब मैं जागूँगा, मैं खड़ा हो जाऊँगा, तब मैं इसी शरीर में ईश्वर के दर्शन करूँगा।

27) मैं स्वयं उसके दर्शन करूँगा, मेरी ही आँखे उसे देखेंगी। मेरा हृदय उसके दर्शनों के लिए तरसता है।


अथवा -पहला पाठ : रोमियों 5:5-11


5) आशा व्यर्थ नहीं होती, क्योंकि ईश्वर ने हमें पवित्र आत्मा प्रदान किया है और उसके द्वारा ही ईश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उमड़ पड़ा है।

6) हम निस्सहाय ही थे, जब मसीह निर्धारित समय पर विधर्मियों के लिए मर गये।

7) धार्मिक मनुष्य के लिए शायद ही कोई अपने प्राण अर्पित करे। फिर भी हो सकता है कि भले मनुष्य के लिए कोई मरने को तैयार हो जाये,

8) किन्तु हम पापी ही थे, जब मसीह हमारे लिए मर गये थे। इस से ईश्वर ने हमारे प्रति अपने प्रेम का प्रमाण दिया है।

9) जब हम मसीह के रक्त के कारण धार्मिक माने गये, तो हम निश्चिय ही मसीह द्वारा ईश्वर के दण्ड से बच जायेंगे।

10) हम शत्रु ही थे, जब ईश्वर के साथ हमारा मेल उसके पुत्र की मृत्यु द्वारा हो गया था और उसके साथ मेल हो जाने के बाद उसके पुत्र के जीवन द्वारा निश्चय ही हमारा उद्धार होगा।

11) इतना ही नहीं, अब तो हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा ईश्वर से हमारा मेल हो गया है; इसलिए हम उन्हीं के द्वारा ईश्वर पर भरोसा रख कर आनन्दित हैं।


सुसमाचार : योहन 6:37-40


37) पिता जिन्हें मुझ को सौंप देता है, वे सब मेरे पास आयेंगे और जो मेरे पास आता है, मैं उसे कभी नहीं ठुकराऊँगा ;

38) क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, बल्कि जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पूरी करने के लिए स्वर्ग से उतरा हूँ।

39) जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा यह है कि जिन्हें उसने मुझे सौंपा है, मैं उन में से एक का भी सर्वनाश न होने दूँ, बल्कि उन सब को अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँ।

40) मेरे पिता की इच्छा यह है कि जो पुत्र को पहचान कर उस में विश्वास करता है, उसे अनन्द जीवन प्राप्त हो। मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा।"


दूसरा मिस्सा

पहला पाठ : इसायाह 25:6-9


6) विश्वमण्डल का प्रभु इस प्रर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी।

7) वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा,

8) श्वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है।

9) उस दिन लोग कहेंगे - “देखो! यही हमारा ईश्वर है। इसका भरोसा था। यह हमारा उद्धार करता है। यही प्रभु है, इसी पर भरोसा था। हम उल्लसित हो कर आनन्द मनायें, क्योंकि यह हमें मुक्ति प्रदान करता है।“


अथवा -पहला पाठ : रोमियों 8:14-23


14) लेकिन यदि आप आत्मा की प्रेरणा से शरीर की वासनाओें का दमन करेंगे, तो आप को जीवन प्राप्त होगा।

15) जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित हैं, वे सब ईश्वर के पुत्र हैं- आप लोगों को दासों का मनोभाव नहीं मिला, जिस से प्रेरित हो कर आप फिर डरने लगें। आप लोगों को गोद लिये पुत्रों का मनोभाव मिला, जिस से प्रेरित हो कर हम पुकार कर कहते हैं, "अब्बा, हे पिता!

16) आत्मा स्वयं हमें आश्वासन देता है कि हम सचमुच ईश्वर की सन्तान हैं।

17) यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो हम उसकी विरासत के भागी हैं-हम मसीह के साथ ईश्वर की विरासत के भागी हैं। यदि हम उनके साथ दुःख भोगते हैं, तो हम उनके साथ महिमान्वित होंगे।

18) मैं समझता हूँ कि हम में जो महिमा प्रकट होने को है, उसकी तुलना में इस समय का दुःख नगण्य है;

19) क्योंकि समस्त सृष्टि उत्कण्ठा से उस दिन की प्रतीक्षा कर रही है, जब ईश्वर के पुत्र प्रकट हो जायेंगे।

20) यह सृष्टि तो इस संसार की असारता के अधीन हो गयी है-अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि उसकी इच्छा से, जिसने उसे अधीन बनाया है- किन्तु यह आशा भी बनी रही

21) कि वह असारता की दासता से मुक्त हो जायेगी और ईश्वर की सन्तान की महिमामय स्वतन्त्रता की सहभागी बनेगी।

22) हम जानते हैं कि समस्त सृष्टि अब तक मानो प्रसव-पीड़ा में कराहती रही है और सृष्टि ही नहीं, हम भी भीतर-ही-भीतर कराहते हैं।

23) हमें तो पवित्र आत्मा के पहले कृपा-दान मिल चुके हैं, लेकिन इस ईश्वर की सन्तान बनने की और अपने शरीर की मुक्ति की राह देख रहे हैं।


सुसमाचार : मत्ती 25:31-46


31) "जब मानव पुत्र सब स्वर्गदुतों के साथ अपनी महिमा-सहित आयेगा, तो वह अपने महिमामय सिंहासन पर विराजमान होगा

32) और सभी राष्ट्र उसके सम्मुख एकत्र किये जायेंगे। जिस तरह चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग करता है, उसी तरह वह लोगों को एक दूसरे से अलग कर देगा।

33) वह भेड़ों को अपने दायें और बकरियों को अपने बायें खड़ा कर देखा।

34) "तब राजा अपने दायें के लोगों से कहेंगे, ’मेरे पिता के कृपापात्रों! आओ और उस राज्य के अधिकारी बनो, जो संसार के प्रारम्भ से तुम लोगों के लिए तैयार किया गया है;

35) क्योंकि मैं भूखा था और तुमने मुझे खिलाया; मैं प्यासा था तुमने मुझे पिलाया; मैं परदेशी था और तुमने मुझको अपने यहाँ ठहराया;

36) मैं नंगा था तुमने मुझे पहनाया; मैं बीमार था और तुम मुझ से भेंट करने आये; मैं बन्दी था और तुम मुझ से मिलने आये।’

37) इस पर धर्मी उन कहेंगे, ’प्रभु! हमने कब आप को भूखा देखा और खिलाया? कब प्यासा देखा और पिलाया?

38) हमने कब आपको परदेशी देखा और अपने यहाँ ठहराया? कब नंगा देखा और पहनाया ?

39) कब आप को बीमार या बन्दी देखा और आप से मिलने आये?"

40) राजा उन्हें यह उत्तरदेंगे, ’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुमने मेरे भाइयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, जो कुछ किया, वह तुमने मेरे लिए ही किया’।

41) "तब वे अपने बायें के लोगों से कहेंगे, ’शापितों! मुझ से दूर हट जाओ। उस अनन्त आग में जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है;

42) क्योंकि मैं भूखा था और तुम लोगों ने मुझे नहीं खिलाया; मैं प्यासा था और तुमने मुझे नहीं पिलाया;

43) मैं परदेशी था और तुमने मुझे अपने यहाँ नहीं ठहराया; मैं नंगा था और तुमने मुझे नहीं पहनाया; मैं बीमार और बन्दी था और तुम मुझ से नहीं मिलने आये’।

44) इस पर वे भी उन से पूछेंगे, ’प्रभु! हमने कब आप को भूखा, प्यासा, परदेशी, नंगा, बीमार या बन्दी देखा और आपकी सेवा नहीं की?"

45) तब राजा उन्हें उत्तर देंगे, ’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - जो कुछ तुमने मेरे छोटे-से-छोटे भाइयों में से किसी एक के लिए नहीं किया, वह तुमने मेरे लिए भी नहीं किया’।

46) और ये अनन्त दण्ड भोगने जायेंगे, परन्तु धर्मी अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे।"


तीसरा मिस्सा

पहला पाठ : प्रज्ञा ग्रन्थ 3:1-9


1) धर्मियों की आत्माएँ ईश्वर के हाथ में हैं। उन्हें कभी कोई कष्ट नहीं होगा।

2) मूर्ख लोगों को लगा कि वे मर गये हैं। वे उनका संसार से उठ जाना घोर विपत्ति मानते थे।

3) और यह समझते थे कि हमारे बीच से चले जाने के बाद उनका सर्वनाश हो गया है; किन्तु धर्मियों को शान्ति का निवास मिला है।

4) मनुष्यों को लगा कि विधर्मियों को दण्ड मिल रहा है, किन्तु वे अमरत्व की आशा करते थे।

5 थोड़ा कष्ट सहने के बाद उन्हें महान् पुरस्कार दिया जायेगा। ईश्वर ने उनकी परीक्षा ली और उन्हें अपने योग्य पाया है।

6) ईश्वर ने घरिया में सोने की तरह उन्हें परखा और होम-बलि की तरह उन्हें स्वीकार किया।

7) ईश्वर के आगमन के दिन वे ठूँठी के खेत में धधकती चिनगारियों की तरह चमकेंगे।

8) वे राष्ट्रों का शासन करेंगे; वे देशों पर राज्य करेंगे, किन्तु प्रभु सदा-सर्वदा उनका राजा बना रहेगा।

9) जो ईश्वर पर भरोसा रखते हैं, वे सत्य को जान जायेंगे; जो प्रेम में दृढ़ रहते हैं, वे उसके पास रहेंगे; क्योंकि जिन्हें ईश्वर ने चुना है, वे कृपा तथा दया प्राप्त करेंगे।


अथवा -पहला पाठ : प्रकाशना 21:1-7


1) तब मैंने एक नया आकाश और एक नयी पृथ्वी देखी। पुराना आकाश तथा पुरानी पृथ्वी, दोनों लुप्त हो गये थे और समुद्र भी नहीं रह गया था।

2) मैंने पवित्र नगर, नवीन येरुसालेम को ईश्वर के यहाँ से आकाश में उतरते देखा। वह अपने दुल्हे के लिए सजायी हुई दुल्हन की तरह अलंकृत था।

3) तब मुझे सिंहासन से एक गम्भीर वाणी यह कहते सुनाई पड़ी, "देखो, यह है मनुष्यों के बीच ईश्वर का निवास! वह उनके बीच निवास करेगा। वे उसकी प्रजा होंगे और ईश्वर स्वयं उनके बीच रह कर उनका अपना ईश्वर होगा।

4) वह उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा। इसके बाद न मृत्यु रहेगी, न शोक, न विलाप और न दुःख, क्योंकि पुरानी बातें बीत चुकी हैं।"

5) तब सिंहासन पर विराजमान व्यक्ति ने कहा, "मैं सब कुछ नया बना देता हूँ"।

6) इसके बाद उसने कहा, "ये बातें लिखो, क्योंकि ये विश्वासनीय और सत्य हैं"। उसने मुझ से कहा, "समाप्त हो गया है। आल्फा और ओमेगा, आदि और अन्त, मैं हूँ। मैं प्यासे को संजीवन जल के स्त्रोत से मुफ़्त में पिलाउँगा।

7) यह विजयी की विरासत है। मैं उसका ईश्वर होउँगा और वह मेरा पुत्र होगा।


सुसमाचार : मत्ती 5:1-12


(1) ईसा यह विशाल जनसमूह देखकर पहाड़ी पर चढ़े और बैठ गए। उनके शिष्य उनके पास आये।

(2) और वे यह कहते हुए उन्हें शिक्षा देने लगेः

(3) "धन्य हैं वे, जो अपने को दीन-हीन समझते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(4) धन्य हैं वे जो नम्र हैं! उन्हें प्रतिज्ञात देश प्राप्त होगा।

(5) धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं! उन्हें सान्त्वना मिलेगी।

(6) घन्य हैं, वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं! वे तृप्त किये जायेंगे।

(7) धन्य हैं वे, जो दयालू हैं! उन पर दया की जायेगी।

(8) धन्य हैं वे, जिनका हृदय निर्मल हैं! वे ईश्वर के दर्शन करेंगे।

(9) धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

(10) धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(11) धन्य हो तुम जब लोग मेरे कारण तुम्हारा अपमान करते हैं, तुम पर अत्याचार करते हैं और तरह-तरह के झूठे दोष लगाते हैं।

(12) खुश हो और आनन्द मनाओ - स्वर्ग में तुम्हें महान् पुरस्कार प्राप्त होगा। तुम्हारे पहले के नबियों पर भी उन्होंने इसी तरह अत्याचार किया।


मनन-चिंतन - 2


आज के पाठ हमेे दिवंगत आत्माओ के लिए प्रार्थना करने के लिए और साथ ही साथ अपने जीवन और मृत्यु के विषय पर मनन् चिंतन करने के लिए आमंत्रित करते है । जो शुद्धिकरण अवस्था में है वे संत बनने/घोषित होने के मार्ग पर है इसलिए कलीसिया में दिवंगतों के लिए प्रार्थना करना एक प्राचीन प्रथा है । इसका आधार हम पढते है मक्काबियों के दूसरे ग्रन्थ 12ः45 ”इसलिए उसने (यूदस ने)े प्रायश्चित्त के बलिदान का प्रबन्ध किया, जिससे मृतक अपने पाप से मुक्त हो जाये“ । मृतकों के लिए प्रार्थना करने का प्राथमिक उद्धेश्य पापों का प्रायश्चित करना था । यह हमारा विश्वास है कि हमारी प्रार्थना और भेंट द्वारा ईश्वर शोधक अग्नि की आत्माओं पर दया दिखाएॅंगे और उनके पाप क्षमा कर उन्हें अनंत जीवन प्रदान करेंगे । आज के दिन हम भी अपने जीवन और मृत्यु पर चिंतन करें । प्रवक्ता ग्रन्ध 14ः18 में लिखा है “जिस तरह हरे पंेड के पत्तो में कुछ फूटकर निकलते और कुछ गिर जाते है उसी तरह शरीर धारियों कि पीढियों में होता है - कोेई मरती और कोई उत्पन्न होती है यह वाक्य हमें ब्रह्मांड़ के प्राकृतिक रखाव कि प्रक्रिया का स्मरण दिलाता है । एक दिन हम सबका मरना निश्चित है । हम स्वयं को उस दिन के लिए तैयार करने हेतु आज क्या कर सकते है ? आज हम एक अच्छे लक्ष्य/उद्धेश्य के साथ यात्रा कर सकते है। इस दौरान अपने प्रतिदिन जीवन में हमें छोटी-छोटी मृत्यु को बलिदानों और आत्मा रिक्तीकरण के माध्यम से अनुभव करने की आवश्यकता है । आज जब हम अपने प्रियजनो की दिवंगत आत्माओं का स्मरण कर उनके लिए प्रार्थना करते है, तो आइए हम भी भजनकार के साथ अपने लिए प्रार्थना करे, ”प्रभु ! मुझे बता कि मेरा अन्त कब होगा, मेंरे कितने दिन शेष है, जिससे मैं समॅझू कि मैं कितना क्षण भंगुर हूॅं ?“ स़्तोत्र 39ः5



REFLECTION


Today’s reading invites us to pray for the departed souls as well as to reflect about our life and death.

Those in purgatory are in the purification stage and they are saints in the making. Therefore to praying for the departed is a custom in the church. It has its base in 2Macc 12:45 where we read “Therefore he (Judas) made atonement for the dead, so that they might be delivered from their sins”. The primary purpose of praying for the dead was for the atonement of sins. It is our belief that through our prayers and offerings God will show mercy on the souls in purgatory, forgive their sins and reward them with eternal life.

We are also reminded to reflect on our life and death today. Sir. 14:18 reads “Like abundant leaves on a spreading tree that sheds some and puts forth others, so are the generations of flesh and blood; one dies and another is born”. This verse reminds us of the natural pattern and process of the universe in its maintenance.

One day all of us are sure to die. To prepare ourselves for that day is what we can do today. To journey with a good aim is what we can do today. For that we need to experience small deaths everyday of our life through sacrifices and self emptying.

As we pray for the departed souls of our beloved ones let us also pray for ourselves with the Psalmist “Lord let me know my end, and what is the measure of my days; let me know how fleeting my life is” Ps 39:4.



मनन-चिंतन - 2


आज कलीसिया सभी मृत विश्वासियों को याद करती है। मृत्यु के समय हमारा जीवन समाप्त नहीं होता बल्कि बदल जाता है। हम मृत्यु पर अमर हो जाते हैं। हमारी आत्मा सांसारिक निवास को छोड़कर स्वर्ग में चली जाती है। 1थेसलनीकियों 4: 13-20 में, संत पौलुस विश्वासियों से कहते हैं कि वे उन लोगों की तरह शोक न करें जिनकी कोई आशा नहीं है, लेकिन एक दूसरे को पुनर्जीवित प्रभु में आशा के साथ सांत्वना दें और प्रोत्साहित करें। काथलिक विश्वास के अनुसार मृत्यु पर प्रत्येक व्यक्ति विशेष न्याय (particular judgment) से गुजरता है और उसकी आत्मा की स्थिति के अनुसार कोई स्वर्ग या शोधकस्थल या नरक में जाता है। मृत्यु अनन्त जीवन का प्रवेश द्वार है। जो लोग स्वर्ग में हैं, उन्हें हमारी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है। जो नरक हैं उनकी मदद हमारी प्रार्थना से नहीं हो सकती। अमीर और लाज़रुस के दृष्टांत में, इब्राहीम नरक में पड़े अमीर आदमी से कहता है, “हमारे और तुम्हारे बीच एक भारी गर्त अवस्थित है; इसलिए यदि कोई तुम्हारे पास जाना भी चाहे, तो वह नहीं जा सकता और कोई भ़ी वहाँ से इस पार नहीं आ सकता” (लूकस 16:26)। जो नरक में हैं उनकी हालत अपरिवर्तनीय है। हमारी प्रार्थना केवल उन लोगों की मदद करती है जो शोधकस्थल में हैं, जो स्वर्गीय महिमा का आनंद लेने से पहले शुध्द किये जाने के समय से गुजरते हैं। चूँकि हम नहीं जानते कि कौन स्वर्ग में पहुँचा है या कौन नरक या शोधकस्थल में गया है, हम अपने सभी दिवंगत भाइयों और बहनों के लिए प्रार्थना करते रहते हैं। फिर भी हमारी प्रार्थनाएँ कभी बेकार नहीं जातीं। प्रभु प्रार्थना में हमारी उदारता और प्रेम को देखते हैं और बदले में हमें आशीर्वाद देते हैं। हम जिनके लिए प्रार्थना करते हैं अगर वे स्वर्ग में हैं, वे बदले में इश्वर के सिंहासन से सामने हमारे लिए मध्यस्थता करेंगे। हम सभी मृतविश्वासियों का स्मरणोत्सव मनाते हुए एक-दूसरे को भलाई करने के लिए प्रोत्साहित करें ताकि हम सब स्वर्ग पहुँच सकें और त्रिएकईश्वर के साथ अनन्त आनंद का अनुभव कर सकें। मृतविश्वासियों की आत्माएं ईश्वर की दया में शांति में निवास करें।



REFLECTION


Today the Church commemorates All the Faithful Departed. At death our life does not end but changes. We become immortal at death. Our soul leaves the earthly dwelling and moves to the heavenly one. In 1Thess 4:13-20, St. Paul tells the believers not to mourn like those who have no hope but to console and encourage one another with the hope in the Risen Lord. According to the Catholic faith at death each person undergoes the particular judgement and depending upon the status of one’s soul, one goes to heaven or purgatory or hell. Death is the entrance into everlasting life. Those who are in heaven do not need our prayers to assist them. Those who are hell cannot be helped by our prayers. In the parable of the rich man and Lazarus, Abraham tells the rich man in hell, “between you and us a great chasm has been fixed, so that those who might want to pass from here to you cannot do so, and no one can cross from there to us” (Lk 16:26). The condition of those who are hell is irreversible. Our prayer helps only those who are purgatory, who undergo a time of cleansing before they can enjoy the heavenly bliss. Since we do not know who has reached heaven or who has gone to hell or purgatory, we keep praying for all our departed brothers and sisters. Yet our prayers never go unrewarded. God sees our generosity and love in prayer and blesses us in return. If those for whom we pray are in heaven, they in turn will support us with their intercessions before the throne of God. As we celebrate the Commemoration of all the faithful departed, let us encourage one another to do good so as to reach heaven and enjoy the eternal bliss with the Holy Trinity.


 -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!

सोमवार, 01 नवंबर, 2021

 

सोमवार, 01 नवंबर, 2021

सब संतों का पर्व

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पहला पाठ :प्रकाशना 7:2-4,9-14


2) मैंने एक अन्य दूत को पूर्व से ऊपर उठते देखा। जीवन्त ईश्वर की मुहर उसके पास थी और उसने उन चार दूतों से, जिन्हें पृथ्वी और समुद्र को उजाड़ने का अधिकार मिला था, पुकार कर कहा,

9) इसके बाद मैंने सभी राष्ट्रों, वंशों, प्रजातियों और भाषाओं का एक ऐसा विशाल जनसमूह देखा, जिसकी गिनती कोई भी नहीं कर सकता। वे उजले वस्त्र पहने तथा हाथ में खजूर की डालियाँ लिये सिंहासन तथा मेमने के सामने खड़े थे

10) और ऊँचे स्वर से पुकार-पुकार कर कह रहे थे, "सिंहासन पर विराजमान हमारे ईश्वर और मेमने की जय!"

11) तब सिंहासन के चारों ओर खड़े स्वर्गदूत, वयोवृद्ध और चार प्राणी, सब-के-सब सिंहासन के सामने मुँह के बल गिर पड़े और उन्होंने यह कहते हुए ईश्वर की आराधना की,

12) "आमेन! हमारे ईश्वर को अनन्त काल तक स्तुति, महिमा, प्रज्ञा, धन्यवाद, सम्मान, सामर्थ्य और शक्ति ! आमेन !"

13) वयोवृद्धों में एक ने मुझ से कहा, "ये उजले वस्त्र पहने कौन हैं और कहाँ से आये हैं?

14) मैंने उत्तर दिया, "महोदय! आप ही जानते हैं" और उसने मुझ से कहाँ, "ये वे लोग हैं, जो महासंकट से निकल कर आये हैं। इन्होंने मेमने के रक्त से अपने वस्त्र धो कर उजले कर लिये हैं।


दूसरा पाठ :1 योहन 3:1-3


1) पिता ने हमें कितना प्यार किया है! हम ईश्वर की सन्तान कहलाते हैं और हम वास्तव में वही हैं। संसार हमें नहीं पहचानता, क्योंकि उसने ईश्वर को नहीं पहचाना है।

2) प्यारे भाइयो! अब हम ईश्वर की सन्तान हैं, किन्तु यह अभी तक प्रकट नहीं हुआ है कि हम क्या बनेंगे। हम इतना ही जानते हैं कि जब ईश्वर का पुत्र प्रकट होगा, तो हम उसके सदृश बन जायेंगे; क्योंकि हम उसे वैसा ही देखेंगे, जैसा कि वह वास्तव में है।

3) जो उस से ऐसी आशा करता है, उसे वैसा ही शुद्ध बनना चाहिए, जैसा कि वह शुद्ध है।


सुसमाचार : मत्ती 5:1-12अ


(1) ईसा यह विशाल जनसमूह देखकर पहाड़ी पर चढ़े और बैठ गए उनके शिष्य उनके पास आये।

(2) और वे यह कहते हुए उन्हें शिक्षा देने लगेः

(3) "धन्य हैं वे, जो अपने को दीन-हीन समझते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(4) धन्य हैं वे जो नम्र हैं! उन्हें प्रतिज्ञात देश प्राप्त होगा।

(5) धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं! उन्हें सान्त्वना मिलेगी।

(6) घन्य हैं, वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं! वे तृप्त किये जायेंगे।

(7) धन्य हैं वे, जो दयालू हैं! उन पर दया की जायेगी।

(8) धन्य हैं वे, जिनका हृदय निर्मल हैं! वे ईश्वर के दर्शन करेंगे।

(9) धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

(10) धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(11) धन्य हो तुम जब लोग मेरे कारण तुम्हारा अपमान करते हैं, तुम पर अत्याचार करते हैं और तरह-तरह के झूठे दोष लगाते हैं।

(12) खुश हो और आनन्द मनाओ स्वर्ग में तुम्हें महान् पुरस्कार प्राप्त होगा।


मनन-चिंतन - 2


सभी गिरजाघरो में धार्मिक अवधारणा के अनुसार कलीसिया सब संतों का पर्व एक साथ मिलकर मनाती है । इसी तरह कलीसिया प्रत्येक घोषित संतो के नाम का पर्व वर्ष एक निश्चित दिन पर उनके नाम के अनुसार मनाया जाता हैं । परन्तु कुछ ऐसे भी अज्ञात और अघोषित संत है जिनका कोई पर्व दिवस नहीं हैं । वे हमारे माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन दोस्त या हमारे परिजन हो सकते है, जिन्होने अपना सम्पूर्ण जीवन ईश्वर पर भरोसा रखते हुए जिया है । आज हम उन सभी अज्ञात संतो का सम्मान करते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते है । इन साधारण सामान्य पुरूषों और महिलाओं को अपने विश्वास के प्रतिफल में ईश्वर आपने पवित्रता और स्वर्गीय महिमा का हिस्सेदार बनाने के लिए हम ईश्वर को धन्यवाद देते है । संतो में हम विविधताएॅं पाते है क्योंकि इसमें पवित्रता का एक प्रतिरूप/पैटर्न नहीं है । इसके अन्तर्गत विद्वान, बुद्धिजीवी दार्शनिक वैज्ञानिक, मिशनरी शहीद, मूर्ख, अमीर गरीब और साधारण पाए जाते है । इन संतो के जीवन द्वारा कलीसिया हमे आज यह याद दिलाती है कि ईश्वर हमे उनके प्रेम में जीने और लोगो के जीवन में उनके प्रेम को वास्तविक बनाने के लिए बुलाया है । संत आगस्टीन ने कहा -अगर ये और वह संत बन सकते है तो मैं क्यों नही ? यह पर्व हम में से प्रत्येक को चुनौती देता है कि ईश्वर की कृपा मिलने पर कोई भी व्यक्ति को अपना उम्र, जीवन शैलि परिस्थितीया संत बनने के लिए बाधा नहीं है । इसके लिए मसीह का अनुसरण करना होगा और बुराई से दूर रहकर भले कार्य करने होंगंे । “जो लोग मुझें प्रभु ! प्रभु ! कह कर पुकारते है उनमें सब के सब स्वर्ग-राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। जो मेंरे स्वर्गिय पिता की इच्छा पूरी करता है वही स्वर्गराज्य में प्रवेश करेगा“(मती 7ः21) यह पर्व हमारे लिए ईश्वर को धन्यवाद देने का अवसर है । ईश्वर ने संतो के साथ हमारे कई पूर्वजो को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है । अगर हमारा जीवन अखंडता सत्य, न्याय, दान, दया और करूणा में दूसरो के साथ बाटकर जीते है, तब भी हम पवित्रता में आगे बढ सकते है । इन वीर संतो के जीवन शैली का अनुगमन प्रभु येसु के उन स्वागत शब्द को सुनने के लिए हमें साक्ष्म बनाये । “शाबाश भले और ईमानदार सेवक ! तुम थोडे में ईमानदार रहे, मै तुम्हें बहुत पर नियुक्त करूंगा अपने स्वामी के आनन्द के सहभागी बनों” !! (मत्ती 25ः21)



REFLECTION


The Church celebrates the feast of each canonized saint on a particular day of the year. But there are many unknown and uncanonized saints who have no feast days. Some of them may be our own parents and grandparents, brothers and sisters, friends and relatives who have lived a life of faith placing their trust in God. Today we honor and pay our tribute to these Unknown saints. We thank God for giving ordinary men and women a share in His holiness and Heavenly glory as a reward for their Faith. There is diversity in saints. There isn’t one pattern of holiness to be found among them. There are scholars, intellectuals, philosophers, scientists, missionaries, martyrs, foolish, rich, poor and simple. The Church reminds us today that God’s call for holiness is universal, that all of us are called to live in His love and to make His love real in the lives of those around us. St. Augustine asked: “If he and she can become saints, why can’t I?” This feast challenges each one of us: anybody can, with the grace of God, become a saint, regardless of his or her age, lifestyle or living conditions. We all can become saints by choosing to follow Christ, doing good and avoiding evil. “Not everyone who says to me, ‘Lord, Lord,’ will enter the Kingdom of Heaven, but only the one who does the will of my Father in Heaven” (Mt 7:21). 2) The feast gives us an occasion to thank God for having invited so many of our ancestors to join the company of the saints. Holiness is related to the word wholesomeness. We grow in holiness when we live a life of integrity, truth, justice, charity, mercy, and compassion, sharing our blessings with others. May our reflection on the heroic lives of the saints and the imitation of their lifestyle enable us to hear from our Lord the words of grand welcome to eternal bliss: “Well done, good and faithful servant! Enter into the joys of your master” (Mt 25:21).



मनन-चिंतन - 2


आज के सुसमाचार में हम आशीर्वचन पाते हैं। ये वे मार्ग हैं जो हमें स्वर्गीय जीवन की ओर ले जाते हैं। जब सबसे पहले के ख्रीस्तीय धार्मिक समुदायों के पास धार्मिक व्यवस्था का कोई अन्य लिखित संविधान नहीं था, तब आशीर्वचन के अनुसार ही वे अपने जीवन को अनुशासित करते थे। संत पापा फ्रांसिस ने, 6 जून, 2016 को मिस्सा बलिदान के दौरान प्रवचन में पवित्र बाइबिल के आशीर्वचनों को "नया कानून" या “नयी संहिता” कहा। मूसा दस आज्ञाओं की पत्थर की पाटियाँ लेकर पहाड़ से नीचे उतर कर आये थे। प्रभु ने एक पहाड़ पर चढ़कर आशीर्वचनों की शिक्षा दी – नयी संहिता। वे गरीबों, विनीतों, शोक करने वालों, धार्मिकता के भूखों और प्यासों, दयालुओं, हृदय में निर्मल लोगों, शांतिप्रिय और सताए हुए लोगों को धन्य घोषित करते हैं क्योंकि ईश्वर उनसे प्यार करते हैं और वे स्वयं उनके जीवन में हस्तक्षेप करके उनको अनुग्रहित करेंगे। संत वे हैं, जिन्होंने अपने जीवन में आशीर्वचनों का पालन किया और परिणामस्वरूप वे ईश्वर के दर्शन का आनन्द लेते हैं।



REFLECTION


In today’s Gospel we find the beatitudes. They are the noble paths that lead to heavenly life. The earliest Christian religious communities were guided by the beatitudes even when they had no other written constitution of the religious order. Pope Francis, delivering a homily on June 6, 2016 called the beatitudes “the new law”. Moses brought the stone tablets of the Ten Commandments when he came down from the mountain the old law. Jesus went up on a mountain and taught the beatitudes – the new law. He declares the poor, the gentle, those who mourn, those who hunger and thirst for righteousness, the merciful, the pure in heart, the peacemakers and the persecuted to be blessed because God loves them; he takes their side and he himself will intervene in their lives to fill them with his blessings. The saints are those who followed the beatitudes in their lives and as a result they enjoy the beatific vision.


 -Br Biniush Topno


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शनिवार, 30 अक्टूबर, 2021

 

शनिवार, 30 अक्टूबर, 2021

वर्ष का तीसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ: रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 11; 1-2, 11-12, 25-29


1) इसलिए मन में यह प्रश्न उठता है, ‘‘क्या ईश्वर ने अपनी प्रजा को त्याग दिया है?’’ निश्चय ही नहीं! मैं भी तो इस्राएली, इब्राहीम की सन्तान और बेनयामीन-वंशी हूँ

2) ईश्वर ने अपनी उस प्रजा को, जिसे उसने अपनाया, नहीं त्यागा है। क्या आप नहीं जानते कि धर्मग्रन्थ एलियस के विषय में क्या कहता है, जब वह ईश्वर के सामने इस्राइल पर यह अभियोग लगाते हैं?

11) इसलिए मन में यह प्रश्न उठता है, क्या वे अपराध के कारण सदा के लिए पतित हो गये हैं? निश्चय ही नहीं! उनके अपराध के कारण ही गैर-यहूदियों को मुक्ति मिली है, जिससे वे गैर-यहूदियों की स्पर्धा करें।

12) जब उनके अपराध तथा उनकी अपूर्णता से समस्त गैर-यहूदी संसार की समृद्धि हो गयी है, तो उनकी परिपूर्णता से कहीं अधिक लाभ होगा!

25) भाइयो! आप घमण्डी न बनें। इसलिए मैं आप लोगों पर यह रहस्य प्रकट करना चाहता हूँ -इस्राएल का एक भाग तब तक अन्धा बना रहेगा, जब तक गैर यहूदियों की पूर्ण संख्या का प्रवेश न हो जाये।

26) ऐसा हो जाने पर समस्त इस्राएल को मुक्ति प्राप्त होगी। जैसा कि लिखा है- सियोन में मुक्तिदाता उत्पन्न होगा और वह याकूब से अधर्म को दूर कर देगा।

27) जब मैं उनके पाप हर लूँगा, तो यह उनके लिए मेरा विधान होगा।

28) सुसमाचार के विचार से, वे तो आप लोगों के कारण ईश्वर के शत्रु हैं; किन्तु चुनी हुई प्रजा के विचार से, वे पूर्वजों के कारण ईश्वर के कृपापात्र हैं;

29) क्योंकि ईश्वर न तो अपने वरदान वापस लेता और न अपना बुलावा रद्द करता है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 14:1,7-11


1) ईसा किसी विश्राम के दिन एक प्रमुख फ़रीसी के यहाँ भोजन करने गये। वे लोग उनकी निगरानी कर रहे थे।

7) ईसा ने अतिथियों को मुख्य-मुख्य स्थान चुनते देख कर उन्हें यह दृष्टान्त सुनाया,

8) ’’विवाह में निमन्त्रित होने पर सब से अगले स्थान पर मत बैठो। कहीं ऐसा न हो कि तुम से प्रतिष्ठित कोई अतिथि निमन्त्रित हो

9) और जिसने तुम दोनों को निमन्त्रण दिया है, वह आ कर तुम से कहे, ’इन्हें अपनी जगह दीजिए’ और तुम्हें लज्जित हो कर सब से पिछले स्थान पर बैठना पड़े।

10) परन्तु जब तुम्हें निमन्त्रण मिले, तो जा कर सब से पिछले स्थान पर बैठो, जिससे निमन्त्रण देने वाला आ कर तुम से यह कहे, ’बन्धु! आगे बढ़ कर बैठिए’। इस प्रकार सभी अतिथियों के सामने तुम्हारा सम्मान होगा;

11) क्योंकि जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जायेगा।’’


📚 मनन-चिंतन


कुच्छ हासिल करने या दूसरों से सम्मान अर्जित करने की इच्छा होना स्वाभाविक है। हालांकि, यह आत्म-प्रचार अधिकांश तह दूसरों की कीमत पर हासिल किया जाता है। येसु का दृष्टान्त नीतिवचन की शिक्षा पर बल देता है: "राजा के सामने डींग मत मारो और बड़े लोगों के स्थान पर मत बैठो; क्योंकि किसी उच्चाधिकारी के सामने नीचा दिखाये जाने की अपेक्षा अच्छा यह है, कि राजा तुम से कहे, "यहाँ, आगे बढ़ कर बैठिए", (नीति० 25:6-7)।

सच्ची विनम्रता यह नहीं है कि आप अपने बारे में कम राय रखते हैं, या खुद को दूसरों से कमतर समझते हैं। वास्तव में, सच्ची नम्रता हमें अपने आप में व्यस्तता से मुक्त करती है। स्वयं को सच्चाई एवं वास्त्विकता से देखने का, सही निर्णय के साथ, स्वयं को उस रूप में देखने का अर्थ है जिस तरह से ईश्वर हमें देखता है (स्तोत्र १३९:१-४)। नम्रता अन्य सभी सद्गुणों की नींव है क्योंकि यह हमें परमेश्वर की दृष्टि से सही ढंग से देखने और न्याय करने में सक्षम बनाती है। विनम्रता ज्ञान, ईमानदारी, यथार्थवाद, शक्ति और समर्पण की ओर ले जाती है। इसी नम्रता को येसु हमें गले लगाने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।



📚 REFLECTION



It is natural to desire to achieve and to get respect and to earn esteem from others. However, self-promotion is most often achieved at the expense of others. Jesus' parable emphasizes the teaching of Proverbs: Do not put yourself forward in the king's presence or stand in the place of the great; for it is better to be told, "Come up here," than to be put lower in the presence of the prince (Prov. 25:6-7).

True humility is not having a low opinion of yourself, or thinking of yourself as inferior to others. In fact, true humility lets us free from preoccupation with ourselves. Viewing ourselves truthfully, with right judgment, means seeing ourselves the way God sees us (Psalm 139:1- 4). Humility is the foundation of all the other virtues because it enables us to see and judge correctly, the way God sees. Humility leads to knowledge, honesty, realism, strength, and dedication to give ourselves to something greater than ourselves. It is this humility that Jesus is inviting us to embrace.


 -Br Biniush Topno


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शनिवार, 30 अक्टूबर, 2021

 

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वर्ष का तीसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ: रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 11; 1-2, 11-12, 25-29

1) इसलिए मन में यह प्रश्न उठता है, ‘‘क्या ईश्वर ने अपनी प्रजा को त्याग दिया है?’’ निश्चय ही नहीं! मैं भी तो इस्राएली, इब्राहीम की सन्तान और बेनयामीन-वंशी हूँ

2) ईश्वर ने अपनी उस प्रजा को, जिसे उसने अपनाया, नहीं त्यागा है। क्या आप नहीं जानते कि धर्मग्रन्थ एलियस के विषय में क्या कहता है, जब वह ईश्वर के सामने इस्राइल पर यह अभियोग लगाते हैं?

11) इसलिए मन में यह प्रश्न उठता है, क्या वे अपराध के कारण सदा के लिए पतित हो गये हैं? निश्चय ही नहीं! उनके अपराध के कारण ही गैर-यहूदियों को मुक्ति मिली है, जिससे वे गैर-यहूदियों की स्पर्धा करें।

12) जब उनके अपराध तथा उनकी अपूर्णता से समस्त गैर-यहूदी संसार की समृद्धि हो गयी है, तो उनकी परिपूर्णता से कहीं अधिक लाभ होगा!

25) भाइयो! आप घमण्डी न बनें। इसलिए मैं आप लोगों पर यह रहस्य प्रकट करना चाहता हूँ -इस्राएल का एक भाग तब तक अन्धा बना रहेगा, जब तक गैर यहूदियों की पूर्ण संख्या का प्रवेश न हो जाये।

26) ऐसा हो जाने पर समस्त इस्राएल को मुक्ति प्राप्त होगी। जैसा कि लिखा है- सियोन में मुक्तिदाता उत्पन्न होगा और वह याकूब से अधर्म को दूर कर देगा।

27) जब मैं उनके पाप हर लूँगा, तो यह उनके लिए मेरा विधान होगा।

28) सुसमाचार के विचार से, वे तो आप लोगों के कारण ईश्वर के शत्रु हैं; किन्तु चुनी हुई प्रजा के विचार से, वे पूर्वजों के कारण ईश्वर के कृपापात्र हैं;

29) क्योंकि ईश्वर न तो अपने वरदान वापस लेता और न अपना बुलावा रद्द करता है।

सुसमाचार : सन्त लूकस 14:1,7-11

1) ईसा किसी विश्राम के दिन एक प्रमुख फ़रीसी के यहाँ भोजन करने गये। वे लोग उनकी निगरानी कर रहे थे।

7) ईसा ने अतिथियों को मुख्य-मुख्य स्थान चुनते देख कर उन्हें यह दृष्टान्त सुनाया,

8) ’’विवाह में निमन्त्रित होने पर सब से अगले स्थान पर मत बैठो। कहीं ऐसा न हो कि तुम से प्रतिष्ठित कोई अतिथि निमन्त्रित हो

9) और जिसने तुम दोनों को निमन्त्रण दिया है, वह आ कर तुम से कहे, ’इन्हें अपनी जगह दीजिए’ और तुम्हें लज्जित हो कर सब से पिछले स्थान पर बैठना पड़े।

10) परन्तु जब तुम्हें निमन्त्रण मिले, तो जा कर सब से पिछले स्थान पर बैठो, जिससे निमन्त्रण देने वाला आ कर तुम से यह कहे, ’बन्धु! आगे बढ़ कर बैठिए’। इस प्रकार सभी अतिथियों के सामने तुम्हारा सम्मान होगा;

11) क्योंकि जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जायेगा।’’

📚 मनन-चिंतन

कुच्छ हासिल करने या दूसरों से सम्मान अर्जित करने की इच्छा होना स्वाभाविक है। हालांकि, यह आत्म-प्रचार अधिकांश तह दूसरों की कीमत पर हासिल किया जाता है। येसु का दृष्टान्त नीतिवचन की शिक्षा पर बल देता है: "राजा के सामने डींग मत मारो और बड़े लोगों के स्थान पर मत बैठो; क्योंकि किसी उच्चाधिकारी के सामने नीचा दिखाये जाने की अपेक्षा अच्छा यह है, कि राजा तुम से कहे, "यहाँ, आगे बढ़ कर बैठिए", (नीति० 25:6-7)।

सच्ची विनम्रता यह नहीं है कि आप अपने बारे में कम राय रखते हैं, या खुद को दूसरों से कमतर समझते हैं। वास्तव में, सच्ची नम्रता हमें अपने आप में व्यस्तता से मुक्त करती है। स्वयं को सच्चाई एवं वास्त्विकता से देखने का, सही निर्णय के साथ, स्वयं को उस रूप में देखने का अर्थ है जिस तरह से ईश्वर हमें देखता है (स्तोत्र १३९:१-४)। नम्रता अन्य सभी सद्गुणों की नींव है क्योंकि यह हमें परमेश्वर की दृष्टि से सही ढंग से देखने और न्याय करने में सक्षम बनाती है। विनम्रता ज्ञान, ईमानदारी, यथार्थवाद, शक्ति और समर्पण की ओर ले जाती है। इसी नम्रता को येसु हमें गले लगाने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।


📚 REFLECTION


It is natural to desire to achieve and to get respect and to earn esteem from others. However, self-promotion is most often achieved at the expense of others. Jesus' parable emphasizes the teaching of Proverbs: Do not put yourself forward in the king's presence or stand in the place of the great; for it is better to be told, "Come up here," than to be put lower in the presence of the prince (Prov. 25:6-7).

True humility is not having a low opinion of yourself, or thinking of yourself as inferior to others. In fact, true humility lets us free from preoccupation with ourselves. Viewing ourselves truthfully, with right judgment, means seeing ourselves the way God sees us (Psalm 139:1- 4). Humility is the foundation of all the other virtues because it enables us to see and judge correctly, the way God sees. Humility leads to knowledge, honesty, realism, strength, and dedication to give ourselves to something greater than ourselves. It is this humility that Jesus is inviting us to embrace.


 -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 29 अक्टूबर, 2021

 

शुक्रवार, 29 अक्टूबर, 2021

वर्ष का तीसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 9:1-5


1) मैं मसीह के नाम पर सच कहता हूँ और मेरा अन्तःकरण पवित्र आत्मा से प्रेरित हो कर मुझे विश्वास दिलाता है कि मैं झूठ नहीं बोलता-

2) मेरे हृदय में बड़ी उदासी तथा निरन्तर दुःख होता है।

3) मैं अपने रक्त-सम्बन्धी भाइयों के कल्याण के लिए मसीह से वंचित हो जाने के लिए तैयार हूँ।

4) वे इस्राएली हैं। ईश्वर ने उन्हें गोद लिया था। उन्हें ईश्वर के सान्निध्य की महिमा, विधान, संहिता, उपासना तथा प्रतिज्ञाएं मिली है।

5) कुलपति उन्हीं के हैं और मसीह उन्हीं में उत्पन्न हुए हैं। मसीह सर्वश्रेष्ठ हैं तथा युगयुगों तक परमधन्य ईश्वर हैं। आमेन।


सुसमाचार : सन्त लूकस 14:1-6


1) ईसा किसी विश्राम के दिन एक प्रमुख फ़रीसी के यहाँ भोजन करने गये। वे लोग उनकी निगरानी कर रहे थे।

2) ईसा ने अपने सामने जलोदर से पीडि़त एक मनुष्य को देख कर

3) शास्त्रियों तथा फ़रीसियों से यह कहा, ’’विश्राम के दिन चंगा करना उचित है या नहीं?’’

4) वे चुप रहे। इस पर ईसा ने जलोदर-पीडि़त का हाथ पकड़ कर उसे अच्छा कर दिया और विदा किया।

5) तब ईसा ने उन से कहा, ‘‘यदि तुम्हारा पुत्र या बैल कुएँ में गिर पड़े, तो तुम लोगों में ऐसा कौन है, जो उसे विश्राम के दिन ही तुरन्त बाहर निकाल नहीं लेगा?’’

6) और वे ईसा को कोई उत्तर नहीं दे सके।


📚 मनन-चिंतन


यहूदियों का धार्मिक नेतृत्व विशेषकर फरीसी लोग येसु से बहुत परेशान थे। दूसरी ओर, येसु ने चंगाई और बहाली के अपने सेवाकाई को निर्बाध रूप से जारी रखा। प्रत्येक घटना धार्मिक नेताओं से उनकी बढ़ती शत्रुता को उकसाती प्रतीत होती थी। फरीसियों के क्रोध को भड़काने वाली चीजों में से एक यह थी कि येसु विश्राम के दिन चमत्कार कर रहे थे। वे निश्चित थे कि येसु एक खतरनाक और अधार्मिक व्यक्ति थे, एक विश्राम दिवस तोड़ने वाला, जिसे हर कीमत पर रोका जाना चाहिए। इसलिए, हम उस फरीसी की मंशा पर ही सवाल उठा सकते हैं जिसने येसु को विश्राम के दिन खाने के लिए आमंत्रित किया था।

खाने के दौरान, शास्त्री और फरीसी येसु को बड़े शक की निगाह से देख रहे थे। वे येसु को पकड़ना चाहते थे ताकि वे उन पर विश्राम के दिन ईश्वर की व्यवस्था को तोड़ने का आरोप लगाया जा सकें। लेकिन येसु का ध्यान जलोदर से पीड़ित एक व्यक्ति की ज़रूरतों को पूरा करने पर लगा था।

इस अवसर पर येसु ने दो बातें स्थापित करते हैं। सबसे पहले, येसु अपने काम में केंद्रित है। वे इस बात की चिंता करने के बजाय कि उसके विरोधी क्या सोचेंगे और क्या करेंगे, अपने काम को पूरा करने में अधिक केंद्रित है । दूसरे, वे यह साबित करते है कि प्रेम का नियम विश्राम के नियम से बडा है। येसु विश्राम के दिन के लिए परमेश्वर की, अच्छा करने और चंगा करने के लिए, की मंशा की ओर इशारा करते हुए फरीसियों के तर्क की खामियों को दिखाते है: ।

हमारे जीवन में हमें अपने काम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और याद रखना चाहिये कि, प्यार कानूनीवाद को पीछे छोड़ देता है।



📚 REFLECTION



The Jews’ religious leadership particularly the Pharisees were terribly upset with Jesus. Jesus on the other hand continued unperturbedly his ministry of healing and restoration. Each incident seemed to incite increasing hostility from the religious leaders. One of the things that drew pharisees’ wrath was Jesus performing miracles on the Sabbath day. They were certain that Jesus was a dangerous and irreligious man, a Sabbath-breaker, who must be stopped at all costs. So, we may question the motive of the Pharisee who invited Jesus to dinner on the Sabbath, after he had already repeatedly broken their Sabbath regulations.

During the dinner, the scribes and Pharisees were watching Jesus carefully, with great suspicion. They wanted to catch Jesus so they might accuse him of breaking God's law on Sabbath. Jesus' attention was fixed on meeting the needs of a man who had dropsy.

Jesus establishes two things on this occasion. Firstly, Jesus is focused. He is more focused in fulfilling his work rather than worrying about what his opponents might think and do. Secondly, he proves that the law of love supersedes the law of rest. Jesus shows the loophole of the Pharisees' argument by pointing out God's intention for the Sabbath: to do good and to heal.

In our life, we must be focused on doing our work and in every situation, love supersedes legalism.


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 28 अक्टूबर, 2021

 

गुरुवार, 28 अक्टूबर, 2021

वर्ष का तीसवाँ सामान्य सप्ताह

सन्त सिमोन और यूदा थदेयुस, प्रेरित : पर्व

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 2:19-22


19) आप लोग अब परेदशी या प्रवासी नहीं रहे, बल्कि सन्तों के सहनागरिक तथा ईश्वर के घराने के सदस्य बन गये हैं।

20) आप लोगों का निर्माण भवन के रूप में हुआ है, जो प्रेरितों तथा नबियों की नींव पर खड़ा है और जिसका कोने का पत्थर स्वयं ईसा मसीह हैं।

21) उन्हीं के द्वारा समस्त भवन संघटित हो कर प्रभु के लिए पवित्र मन्दिर का रूप धारण कर रहा है।

22) उन्हीं के द्वारा आप लोग भी इस भवन में जोड़े जाते हैं, जिससे आप ईश्वर के लिए एक आध्यात्मिक निवास बनें।


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:12-19


12) उन दिनों ईसा प्रार्थना करने एक पहाड़ी पर चढ़े और वे रात भर ईश्वर की प्रार्थना में लीन रहे।

13) दिन होने पर उन्होंने अपने शिष्यों को पास बुलाया और उन में से बारह को चुन कर उनका नाम ’प्रेरित’ रखा-

14) सिमोन जिसे उन्होंने पेत्रुस नाम दिया और उसके भाई अन्द्रेयस को; याकूब और योहन को; फि़लिप और बरथोलोमी को,

15) मत्ती और थोमस को; अलफाई के पुत्र याकूब और सिमोन को, जो ’उत्साही’ कहलाता है;

16) याकूब के पुत्र यूदस और यूदस इसकारियोती को, जो विश्वासघाती निकला।

17) ईसा उनके साथ उतर कर एक मैदान में खड़े हो गये। वहाँ उनके बहुत-से शिष्य थे और समस्त यहूदिया तथा येरुसालेम का और समुद्र के किनारे तीरूस तथा सिदोन का एक विशाल जनसमूह भी था, जो उनका उपदेश सुनने और अपने रोगों से मुक्त होने के लिए आया था।

18) ईसा ने अपदूतग्रस्त लोगों को चंगा किया।

19) सभी लोग ईसा को स्पर्श करने का प्रयत्न कर रहे थे, क्योंकि उन से शक्ति निकलती थी और सब को चंगा करती थी।


📚 मनन-चिंतन


जब येसु ने अपना मिशन शुरू किया, तो उन्होनें अपने प्रेरित होने के लिए बारह लोगों को चुना। बारह के चुनाव में, हम एक विशेषता देखते हैं जो उन सभी बारहों के लिए समान थी कि येसु ने बहुत ही साधारण लोगों को चुना।

वे गैर-पेशेवर थे, जिनके पास कोई धन या पद नहीं था। वे मछुआरे थे। वे आम लोगों में से चुने गए थे जिन्होंने सामान्य काम किया था, उनके पास कोई विशेष शिक्षा नहीं थी, और उनके पास कोई सामाजिक लाभ का पद नहीं था। येसु ऎसे साधारण पुरुषों को चाहते थे जो एक कार्यभार ग्रहण कर सकें और इसे असाधारण रूप से अच्छी तरह से कर सकें। उनहोंने इन लोगों को इस लिए नहीं चुना कि वे क्या थे, बल्कि इसलिए कि वे उसके मार्गदर्शन और शक्ति के अधीन रहकर क्या बनने में सक्षम थे। संत पौलुस ने तत्थ को सुंदरता के साथ सारांशित किया, "ज्ञानियों को लज्जित करने के लिए ईश्वर ने उन लोगों को चुना है, जो दुनिया की दृष्टि में मूर्ख हैं। शक्तिशालियों को लज्जित करने के लिए उसने उन लोगों को चुना है, जो दुनिया की दृष्टि में दुर्बल हैं। गण्य-मान्य लोगों का घमण्ड चूर करने के लिए उसने उन लोगों को चुना है, जो दुनिया की दृष्टि में तुच्छ और नगण्य हैं, (१ कुरिन्थियों १:२७-२८) जब प्रभु हमें सेवा करने के लिए बुलाते हैं, तो हमें पीछे नहीं हटना चाहिए क्योंकि हम सोचते हैं कि हमारे पास देने के लिए बहुत कम या कुछ भी नहीं है। हमारे जैसे सामान्य लोग जो कुछ भी दे सकते हैं, प्रभु उसे लेते है और अपने राज्य में महानता के लिए उसका उपयोग करते है। हम अपना जीवन ईश्वर के लिये भेंट करें, और जैसा वह ठीक समझे, वैसा ही उसका उपयोग करे।



📚 REFLECTION



When Jesus embarked on his mission, he chose twelve men to be his apostles. In the choice of the twelve, we see a particular feature that was common to all twelve of them. Jesus chose very ordinary men.

They were non-professionals, who had no wealth or position. They were fishermen. They were chosen from the common people who did ordinary things, had no special education, and had no social advantages. Jesus wanted ordinary men who could take an assignment and do it extraordinarily well. He chose these men, not for what they were, but for what they would be capable of becoming under his guidance and power. St. Paul beautiful summarizes it, “But God chose what is foolish in the world to shame the wise; God chose what is weak in the world to shame the strong; God chose what is low and despised in the world, things that are not, to reduce to nothing things that are,” (1 Corinthians 1:27-28)

When the Lord calls us to serve, we must not hesitate back because we think that we have little or nothing to offer. The Lord takes what ordinary people, like us, can offer and uses it for greatness in his kingdom. we should make our life an offering to the Lord and allow him to use you as he sees fit.



मनन-चिंतन - 2


अपने बारह शिष्यों को चुनने से पहले प्रभु येसु ने पूरी रात प्रार्थना में बिताई। आज की दुनिया में हमें चयन के कई तरीके मिलते हैं। हमारे पास लिखित परीक्षा, मौखिक परीक्षा, इन्टर्व्यू और अन्य तरीके हैं। प्रभु येसु के पास चुनाव का एक ही तरीका है - विवेचन। वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि अपने स्वर्गिक पिता क्या चाहते हैं। यदि हम बारह शिष्यों के स्वभाव को देखें, तो हमें आश्चर्य होगा कि ये बारह येसु के समय के हजारों लोगों में से क्यों चुने गए। क्या वे अधिक बुद्धिमान, अधिक कुशल, अधिक प्रतिभाशाली, अधिक पढ़े-लिखे थे? नहीं। क्या वे अच्छे वक्ता थे? नहीं। क्या वे सार्वजनिक संबंधों में निपुण थे? बिलकुल नहीं। तो इन बारह का चयन कैसे हुआ? जवाब बस यही है - स्वर्गिक पिता की स्वतंत्र इच्छा। स्वर्गिक पिता ने उन्हें चुना और येसु ने बस अपने स्वर्गिक पिता की इच्छा को समझा और उन्हें बुलाया। जब हम निर्णय लेते हैं तो हम कभी पूछते हैं - "ईश्वर की इच्छा क्या है?"



SHORT REFLECTION


Before he chose the twelve disciples, Jesus spent the whole night in prayer. The choice is made out of discernment. In today’s world we find very many ways of selection. We have written texts, oral exams, interviews and other methods of selection. Jesus has only one way of choice – discernment. He tries to find out what the Heavenly Father wants. If we look at the temperaments of the twelve disciples, we shall wonder as why these twelve chosen from among thousands of people of the time of Jesus. Were they more intelligent, more efficient, more talented, more learned? Were they good speakers? Were they good at public relationships? How did these twelve get selected? The answer is simply – the Heavenly Father’s free will. The heavenly father simply chose them and Jesus simply discerned the heavenly Father’s will and called them. When we make decision do we ever ask – “What is the will of God?”


 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 27 अक्टूबर, 2021

 

बुधवार, 27 अक्टूबर, 2021

वर्ष का तीसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 8:26-30


26) आत्मा भी हमारी दुर्बलता में हमारी सहायता करता है। हम यह नहीं जानते कि हमें कैसे प्रार्थना करनी चाहिए, किन्तु हमारी अस्पष्ट आहों द्वारा आत्मा स्वयं हमारे लिए विनती करता है।

27) ईश्वर हमारे हृदय का रहस्य जानता है। वह समझाता है कि आत्मा क्या कहता है, क्योंकि आत्मा ईश्वर के इच्छानुसार सन्तों के लिए विनती करता है।

28) हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है;

29) क्योंकि ईश्पर ने निश्चित किया कि जिन्हें उसने पहले से अपना समझा, वे उसके पुत्र के प्रतिरूप बनाये जायेंगे, जिससे उसका पुत्र इस प्रकार बहुत-से भाइयों का पहलौठा हो।

30) उसने जिन्हें पहले से निश्चित किया, उन्हें बुलाया भी है: जिन्हें बुलाया, उन्हें पाप से मुक्त भी किया है और जिन्हें पाप से मुक्त किया, उन्हें महिमान्वित भी किया है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 13:22-30


22) ईसा नगर-नगर, गाँव-गाँव, उपदेश देते हुए येरूसालेम के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे।

23) किसी ने उन से पूछा, "प्रभु! क्या थोड़े ही लोग मुक्ति पाते हैं?’ इस पर ईसा ने उन से कहा,

24) "सँकरे द्वार से प्रवेश करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करो, क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ - प्रयत्न करने पर भी बहुत-से लोग प्रवेश नहीं कर पायेंगे।

25) जब घर का स्वामी उठ कर द्वार बन्द कर चुका होगा और तुम बाहर रह कर द्वार खटखटाने और कहने लगोगे, ’प्रभु! हमारे लिए खोल दीजिए’, तो वह तुम्हें उत्तर देगा, ’मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ के हो’।

26) तब तुम कहने लगोगे, ’हमने आपके सामने खाया-पीया और आपने हमारे बाज़ारों में उपदेश दिया’।

27) परन्तु वह तुम से कहेगा, ’मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ के हो। कुकर्मियो! तुम सब मुझ से दूर हटो।’

28) जब तुम इब्राहीम, इसहाक, याकूब और सभी नबियों को ईश्वर के राज्य में देखोगे, परन्तु अपने को बहिष्कृत पाओगे, तो तुम रोओगे और दाँत पीसते रहोगे।

29) पूर्व तथा पश्चिम से और उत्तर तथा दक्षिण से लोग आयेंगे और ईश्वर के राज्य में भोज में सम्मिलित होंगे।

30) देखो, कुछ जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे और कुछ जो अगले हैं, पिछले हो जायेंगे।"


📚 मनन-चिंतन


ईश्वर के राज्य के रहस्य को प्रकट करने के लिए येसु एक बंद दरवाजे के प्रतीक का उपयोग करते है। बहुत देर से आने वालों के लिए दरवाज़ा बंद होने के बारे में येसु का दृष्टांत बताता है कि उन्होंने अपने मेजबान को नाराज कर दिया था और बाहर रहने के योग्य थे। येसु ने इस दृष्टांत को इस सवाल के जवाब में बताया कि कौन स्वर्ग पहुंच पायेगा। येसु के समय के अधिकांश यहूदियों ने सोचा और सिखाया कि वे अपने आप बच जाएंगे क्योंकि वे ईश्वर के चुने हुए लोग थे। येसु ने उनका और उनकी धारणाओं का सामना यह कहकर किया कि ईश्वर के राज्य में प्रवेश स्वचालित नहीं है, लेकिन योग्य होने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

दूसरे, येसु ने चेतावनी दी है कि यदि हम संकरे दरवाजे से प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते हैं तो हमें बाहर रखा जा सकता है। स्वर्ग का मार्ग 'संकीर्ण द्वार' से होता है। संकरा दरवाजा 'कठिन रास्ता' होता है। येसु के लिए, संकरा द्वार क्रूस है। जिस द्वार से येसु गुजरे वह अस्वीकृति, उत्पीड़न और मृत्यु का था। हालांकि, इसके माध्यम से उन्होंने संसार को जीत लिया। क्रूस के द्वारा, येसु हमारे लिए उसके राज्य में प्रवेश करने का मार्ग खोलते हैं। लेकिन हमें क्रूस के मार्ग में येसु का अनुसरण करना चाहिए। ईश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए व्यक्ति को प्रलोभन, लालच, झूठे सिद्धांतों, और जो कुछ भी हमें ईश्वर की इच्छा को पूरा करने से रोकता है, के खिलाफ प्रयास करना चाहिए और संघर्ष करना चाहिए। हम अकेले प्रयास नहीं करते हैं। ईश्वर हमारे साथ हैं और उनकी कृपा काफी है। येसु ने हमें पूर्ण विजय का आश्वासन दिया है! क्योंकि वह स्वयं द्वार है। "मैं द्वार हूँ। जो कोई मेरे द्वारा प्रवेश करेगा वह उद्धार पाएगा।” ( योहन 10:9)।



📚 REFLECTION



Jesus uses the symbol of a shut door to reveal the mystery about the kingdom of God. Jesus' parable about the door being shut to those who come too late suggests that they had offended their host and deserved to remain outside. Jesus told this story in response to the question of who will make it to heaven. Most of the Jews of Jesus’ time thought and taught that they will automatically be saved because they were the chosen people of God. Jesus confronts them and their presumption by saying that the entry to the kingdom of God is not automatic but one must strive hard to be found worthy.

Secondly, Jesus warns that we can be excluded if we do not strive to enter by the narrow door. The way to heaven is through the ‘narrow door’. The narrow door stands for ‘hard way’. For Jesus, it is the cross that is a narrow door. A door through which he passed was of rejection, persecution, and death. However, it is through this he triumphed the world. Through the cross, Jesus opens the way for us to enter into his kingdom. But we must follow Jesus in the way of the cross. To enter the kingdom of God one must strive and struggle against the forces of temptation, allurement, false doctrines, and whatever would hinder us from doing the will of God. We do not strive alone. God is with us and his grace is sufficient. Jesus assures us of complete victory! For he himself is the door. “I am the gate. Whoever enters by me will be saved.” (John 10:9).



मनन-चिंतन - 2


किसी ने येसु से पूछा, "प्रभु! क्या थोड़े ही लोग मुक्ति पाते हैं?" प्रभु येसु सीधे सवाल का जवाब नहीं देते हैं, लेकिन उससे कहते हैं, “सँकरे द्वार से प्रवेश करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करो”। यदि आप येसु के जवाब देने के तरीके पर विचार करते हैं, तो आप समझेंगे कि येसु उसे बताना चाहते हैं कि उसे इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि कितने को बचाया जाएगा, बल्कि यह चिंता करनी चाहिए कि क्या वह खुद बच जाएगा। इसलिए अंत में प्रभु कहते हैं, " जब तुम इब्राहीम, इसहाक, याकूब और सभी नबियों को ईश्वर के राज्य में देखोगे, परन्तु अपने को बहिष्कृत पाओगे, तो तुम रोओगे और दाँत पीसते रहोगे"। हमें "अपने को बहिष्कृत" पाये जाने की संभावना के बारे में चिंता करनी चाहिए।

प्रभु येसु ने आज के सुसमाचार में तीन वास्तविकताओं पर जोर दिया है। सबसे पहले, वे कहते हैं कि स्वर्ग का दरवाजा संकीर्ण है। इसलिए यदि आप स्वर्ग में प्रवेश करने में रुचि रखते हैं, तो आपको यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि आप सही रास्ते पर हैं और आपका ध्यान संकीर्ण दरवाजे पर है। दूसरा, हमें स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए खुद को तैयार करने हेतु आवंटित समय सीमित है और अचानक समाप्त हो सकता है। यह मांग करता है कि हम हमें उपलब्ध समय बर्बाद न करें, लेकिन बिना किसी विलंब के उस पर काम करना जरूरी मानें। तीसरा, स्वर्ग में प्रवेश करने की संभावना उन सभी के लिए खुली है जो भलाई करते रहते हैं और बुराई करने वाले सभी के लिए बंद हैं। इसलिए हमें अपने बुरे तरीकों तथा आदतों को त्यागने और दूसरों का भला करने में व्यस्त होना चाहिए। हमें सभी के कल्याण के लिए काम करना होगा।



SHORT REFLECTION


Someone asked Jesus, “Will there be only a few saved?” Jesus does not answer the question directly, but tells him, “Try your hardest to enter by the narrow door…”. If you reflect on the way Jesus replies, you will understand that Jesus wants to tell him that he should not worry about how many will be saved, but should worry as to whether he himself will be saved. That is why at the end Jesus says, “Then there will be weeping and grinding of teeth, when you see Abraham and Isaac and Jacob and all the prophets of the kingdom of God, and yourself thrown out”. We should worry about the possibility of us ourselves “thrown out”.

Jesus emphasises three realities in today’s Gospel. Firstly, he states that the door to heaven is narrow. Hence if you are interested in entering heaven, you need to make sure that you are on the right path and that your focus is on the narrow door. Secondly, the time allotted to us to prepare ourselves to enter heaven is limited and can finish abruptly. This demands that we do not waste any time, but consider it urgent to work at it without procrastination. Thirdly, the possibility of entering heaven is open to all who do good and is closed to all who do evil. Therefore we need to abandon our evil ways and get busy doing good to others. We have to work for the welfare of everyone.


 -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!