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इतवार, 18 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 18 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 23:1-6


1) “धिक्कार उन चरवाहों को जो मेरे चरागाह की भेड़ों को नष्ट और तितर-बितर हो जाने देते हैं!“ यह प्रभु की वाणी है।

2) इसलिए प्रभु, इस्राएल का ईश्वर अपनी प्रजा को चराने वालों से यह कहता है, “तुम लोगों ने मेरी भेड़ों को भटकने और तितर-बितर हो जाने दिया; तुमने उनकी देखरेख नहीं की। देखो! मैं तुम लोगों को तुम्हारे अपराधों का दण्ड दूँगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

3) “इसके बाद मैं स्वयं अपने झुण्ड की बची हुई भेड़ों को उन सभी देशों से एकत्र कर लूँगा, जहाँ मैंने उन्हें बिखेर दिया है; मैं उन्हें उनके अपने मैदान वापस ले चलूँगा और वे फलेंगी-फूलेंगी।

4) मैं उनके लिए ऐसे चरवाहों को नियुक्त करूँगा, जो उन्हें सचमुच चरायेंगे। तब उन्हें न तो भय रहेगा, न आतंक और न उन में से एक का भी सर्वनाश होगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

5) प्रभु यह कहता है: “वे दिन आ रहे हैं, जब मैं दाऊद के लिए एक न्यायी वंशज उत्पन्न करूँगा। वह राजा बन कर बुद्धिमानी से शासन करेगा और अपने देश में न्याय और धार्मिकता स्थापित करेगा।

6) उसके राज्यकाल में यूदा का उद्धार होगा और इस्राएल सुरक्षित रहेगा और उसका यह नाम रखा जायेगा- प्रभु ही हमारी धार्मिकता है।“



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 2:13-18



13) आप लोग पहले दूर थे, किन्तु ईसा मसीह से संयुक्त हो कर आप अब मसीह के रक्त द्वारा निकट आ गये है;

14) क्योंकि वही हमारी शान्ति हैं। उन्होंने यहूदियों और गैर-यहूदियों को एक कर दिया है। दोनों में शत्रुता की जो दीवार थी, उसे उन्होंने गिरा दिया है।

15) और अपनी मृत्यु द्वारा विधि-निषेधों की संहिता को रद्द कर दिया। इस प्रकार उन्होंने यहूदियों तथा गैर-यहूदियों को अपने से मिला कर एक नयी मानवता की सृष्टि की और शान्ति की स्थापित की है।

16) उन्होंने क्रूस द्वारा दोनों का एक ही शरीर में ईश्वर के साथ मेल कराया और इस प्रकार शत्रुता को नष्ट कर दिया।

17) तब उन्होंने आ कर दोनों को शान्ति का सन्देश सुनाया - आप लोगों को, जो दूर थे और उन लोगों को, जो निकट थे;

18) क्योंकि उनके द्वारा हम दोनों एक ही आत्मा से प्रेरित हो कर पिता के पास पहुँच सकते हैं।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 6:30-34


30) प्रेरितो ने ईसा के पास लौट कर उन्हें बताया कि हम लोगों ने क्या-क्या किया और क्या-क्या सिखलाया है।

31) तब ईसा ने उन से कहा, ’’तुम लोग अकेले ही मेरे साथ निर्जन स्थान चले आओ और थोड़ा विश्राम कर लो’’; क्योंकि इतने लोग आया-जाया करते थे कि उन्हें भोजन करने की भी फुरसत नही रहती थी।

32) इस लिए वे नाव पर चढ़ कर अकेले ही निर्जन स्थान की ओर चल दिये।

33) उन्हें जाते देख कर बहुत-से लोग समझ गये कि वह कहाँ जा रहे हैं। वे नगर-नगर से निकल कर पैदल ही उधर दौड़ पड़े और उन से पहले ही वहाँ पहुँच गये।

34) ईसा ने नाव से उतर कर एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे और वह उन्हें बहुत-सी बातों की शिक्षा देने लगे।



📚 मनन-चिंतन


भीड़ की भीड़ प्रभु येसु के पीछे-पीछे क्यों चली आती थी? सुसमाचार में कई जगह हम पढ़ते हैं कि जहाँ भी प्रभु येसु जाते थे, लोग वहाँ उनसे भी पहले पहुँच जाते थे. चाहे प्रभु येसु अंजान जगह पर जाएँ, या सुनसान, निर्जन स्थान पर जाएँ, चाहे किसी दूर-दराज के गॉंव जाएँ, लोग उन्हें खोज ही लेते थे. कई बार तो उन्हें भीड़ से बचने के लिए नाव पर चढ़कर सुसमाचार सुनाना पड़ता था. ऐसा ही दृश्य हम आज के सुसमाचार में देखते हैं, जहाँ शिष्य लोग ख़ुशी-ख़ुशी सुसमाचार का प्रचार करने के बाद लौटे थे. प्रभु येसु चाहते थे कि वे थोड़ा सा आराम कर लें क्योंकि लोग आ रहे थे, उन्हें खाना खाने की भी फुर्सत नहीं मिल पा रही थी, इसलिए वे उन्हें एक निर्जन स्थान पर ले जाते हैं, लेकिन लोग उन्हें जाते हुए देख लेते हैं, उनसे पहले ही वहाँ पैदल पहुँच जाते हैं. प्रभु येसु को वे बिना चरवाहे की भेड़ों के समान प्रतीत होते हैं.

शुरू से ही ईश्वर और उसकी प्रजा के बीच के सम्बन्ध को अलग-अलग प्रतीकों द्वारा व्यक्त किया जाता रहा है, उन्हीं में से एक है - चरवाहा और भेड़ें. आज के पहले पाठ में हम पढ़ते हैं, कि ईश्वर ने जिन चरवाहों को अपनी भेड़ों के ऊपर नियुक्त किया उन्होंने ही भेड़ों को तितर-बितर कर दिया है, उनकी उचित देख-भाल नहीं की. कुछ ऐसा ही हम नबी एज़ेकिएल के ग्रन्थ के 34 वें अध्याय में देखते हैं. लोगों का जो सम्बन्ध ईश्वर के साथ प्रारम्भ से था वह वैसा का वैसा नहीं रहा, धीरे-धीरे लोग ईश्वर से दूर होते गये. वे सही रास्ते से भटकते चले गये, और इसके लिए कुछ हद तक वे लोग ज़िम्मेदार थे, जिन्हें ईश्वर ने लोगों को सम्भाले रखने की ज़िम्मेदारी दी. उन्होंने लोगों को ईश्वर के करीब लाने की अपेक्षा, अपने बुरे जीवन द्वारा व लोगों के शोषण द्वारा उन्हें ईश्वर से और दूर कर दिया.

प्रभु येसु के समय यह तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है, जब प्रभु येसु धर्म के उन ठेकेदारों और धार्मिक नेताओं को धिक्कारते हैं, उनकी कमियों और दोषों की ओर इंगित करते हैं. उनके जीवन के कुछ उदाहरण ऐसे हैं जिनके कारण लोग ईश्वर के पास नहीं बल्कि उनसे दूर हो चले थे, जैसे कि बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना, अपने आकर्षित करने वाले कपडे पहनना, लम्बी-लम्बी और खोखली प्रार्थनाएं करना, लोगों पर नियमों के अनावश्यक भार डालना, लोगों को गुमराह करना, नबियों की हत्या करना इत्यादि. प्रभु येसु उनकी तुलना चोर और डाकू तथा भाड़े के मजदूरों से करते हैं (योहन 10:8,12). इसीलिए प्रभु येसु स्वयं उनके लिए सच्चे और भले चरवाह बनकर आये ताकि उन्हें हरे-हरे चरागाहों में ले चलें, चोर, डाकुओं और भेडियों से उनकी रक्षा कर सकें. एक भला और सच्चा चरवाहा ही भेड़ों की सही स्थिति और उनके कष्ट जानता है.

ईश्वर ने हम सभी को अपनी ख़ुशी से अपने लिए बनाया है और हमारी आत्मा उसी ईश्वर के लिए सदा प्यासी रहती है (स्तोत्र 42:2). इसी प्यास के कारण हम जाने-अनजाने में भी ईश्वर को खोजते रहते हैं, क्योंकि ईश्वर को पाना और उसे मिलन ही हमारे जीवन का अंतिम उद्देश्य है. जो लोग इस उद्देश्य से भटक जाते हैं, इस उद्देश्य को भूल जाते हैं, वे अपने जीवन में खालीपन महसूस करते हैं. उस खालीपन को दूर करने के लिए बिना चरवाहे की भेड़ों के समान यहाँ-वहाँ भटकते हैं. खालीपन को दूर करने और शान्ति पाने के लिए नयी-नयी चीज़ें ट्राई करते हैं, संसारिकता, धन-दौलत और ऐशो-आराम में संतुष्टि पाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमारी वास्तविक और अनन्त संतुष्टि केवल ईश्वर में है, वही हमारा भला और सच्चा चरवाहा है. आइये हम पूरे ह्रदय से उसके पास जाएँ. आमेन.



📚 REFLECTION



Why is it that so many people came searching Jesus? We read in the gospels that wherever Jesus went, people reached there even before him. Whether Jesus went to known places or unknown places, deserted or secluded places or remote unknown villages, people always found their way to reach him. Many times he had to use boat to preach because of the crowd that was pressing on him. Something similar we see in the gospel today when the disciples happily returned after their mission work and they were filled with joy and excitement. Jesus wanted them to rest for a while because so many people were coming and going that they did not even have time to eat peacefully, so he takes them to a deserted place where nobody could disturb them, but people see them leaving and they reach the place even before them, walking on foot. Jesus felt pity for them and they seemed to him like sheep without shepherd.

The relationship between God and His people has been expressed through various imageries and symbols, one of such express is that of Shepherd and sheep. God is the Shepherd and the people are sheep. We see in the first reading of today, the shepherds whom God had appointed for caring His sheep, they scattered them, they did not care for them. Similar words we see in the 34th chapter of prophet Ezekiel. This relationship of people with God could not remain the same, they offended God and went away from God gradually. They went astray from the right path, and people and leaders who were given the responsibility to care for the sheep, they responsible for the downfall of the people to some extent. Instead of leading people towards God, their scandalous life became a means sending people away from God and cause for their exploitation.

This became all the more clear at the time of Jesus, when he condemns these leaders and false teachers of the religion. He points out their wrongful conduct and exploitative ways. There were many examples of their wrongful conduct that kept people away from them as well as from God. Some such examples are – they liked to be greeted in the markets, wear very royal and attractive clothes, make empty and long prayers, burn the people with unnecessary laws, misleading the people in the matters of religion and killing the prophets etc. Jesus compares them with theives and decoits who want to steal and kill, they were like hired servants who didn’t care for the sheep (John10:8,12). Therefore Jesus came down as the Good Shepherd who would take his sheep to green pastures and give them rest, protect and safeguard them from thieves and robbers. A good shepherd knows his sheep and their needs and can take care of them well.

God has created us out of His free will and for His own happiness and put a thirst in souls, so that they always thirst for God (Psalm 42:2). It is because of this thirst within us that we search and long for God, it becomes our only goal and destiny. Those who forget their destiny and goal, they feel emptiness and dryness within. They want to fill that emptiness and hence go around restlessly like sheep without shepherd. They try new things, they try to attain happiness and fulfilment through wealth, money, pleasure and luxuries, but all in vain because our true happiness lies in finding God. Only God ca become our True and Good Shepherd. Let us turn towards our Good Shepherd. Amen.



मनन-चिंतन -2


Have a break have a kit-kat. अंतराल लो kit-kat खाओ. Break हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आज के सुसमाचार में हम देखते है कि प्रेषित कार्य के बाद वापस लौटे शिष्यों को प्रभु आराम करने का निमत्रंण देते है।

फादर जैरी ओरबोस अपनी श्रमततल व्तइवे एक किताब में येसु द्वारा दिये गये इस आराम के तीन कारण बताते है। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक।

शारीरिक: शिष्यों ने अपना प्रेषित कार्य इतने जोशखरोश के साथ किया कि उनके पास आराम के बारे में सोचने तक का समय नहीं था। उन्होंने उनकी शारीरिक क्षमता की परवाह न रखते हुए काम किया। यदि इस गति के साथ वे काम करना जारी रखते तो वे शायद बीमार भी हो सकते थे। इस बात को मन में रखते हुए प्रभु उन्हें आराम करने के लिए कहते है।

मानसिक: बाइबिल में हम देखते है कि जब कुछ महिलाऐं बच्चों को आर्शीवाद के लिए प्रभु के पास लाती है तो शिष्यगण नाराज हो कर उनको दूर कर देते है। भीड बढ़ने पर उनकी आशंका होती थी। यहॉं पर हम देखते है कि वे पहले से ही थक चुके थे और ऊपर से भीड उमड पड रही थी। उनके अच्छे कार्यों को प्रभु गुस्से में डुबाना नहीं चाहते थे। भीड में शिष्य चिडचिडेपन के कारण लोगों से गुस्सा कर सकते थे। यह सब देखते हुए येसु ने उनको आराम करने भेजा।

आध्यात्मिक: आष्टा सेमिनारी में हमारा ARA (Action Reflection Action) नामक कार्यक्रम हुआ करते थे। इसका उद्देश्य यह था कि लोगों के बीच सामाजिक जागरूकता के कार्य करने के बाद मनन चिंतन करके और भी अच्छी तरीके से उसको करना। यही योजना प्रभु के मन में थी। उन्होंने अपने शिष्यों को आराम करने के लिए इसीलिए कहा कि वे अपने कार्यों पर मनन-चिन्तन करें और यह समझे की प्रभु की कृपा कितनी बडी मात्रा में उनके कार्यों पर बनी रही। यह आराम उनके आगे के मिशन कार्यों के लिए जोश और ऊर्जा प्रदान कर सकता था।

हम सब अपनी गाडियों की सर्विसिंग कराते है इस तरह हम गाडी को break या विश्राम देते है। इंजन का तेल (Engine oil) बदलने से तथा पहियों को तेल से रमाने से गाडी की क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रकार गाडी के समान हमें भी विश्राम की जरूरत है लेकिन ज्यादातर लोग यह विश्राम लेना नहीं चाहते हैं।

पुराने जमाने में कपडे धोने और बर्तन मांझने में बहुत समय लगता था। कुॅए और हैंडपंप से पानी निकालते थे, चूल्हा लकडी से जलाते थे। यह सब करने के लिए भी बहुत समय लगता था लेकिन फिर भी लोगों के पास आराम करने के लिए, break लेने के लिए पर्याप्त समय था। आजकल कपडे और बर्तन धोने के लिए मशीन है, पानी नल खोलने पर उपलब्ध है, गैस और बिजली से चूल्हे जलते है। इस मशीनों के कारण समय की काफी बचत होती है। फिर भी आज break लेने के लिए किसी के पास समय नहीं है। सब व्यस्त रहते है।

वैसे तो प्राकृतिक तौर पर तो हम सब break लेते है। सुबह से tea break, lunch break शाम को लंबे आराम के लिए सोने का break लेते है। break लेना भूल जाते है या लेना नहीं चाहते है उनके लिए भी प्रकृति का नियम है - बीमारी। किसी के बीमार होने से उनको तीन-चार दिन लगातार break मिलता है।

हम सबको break लेने की आदत अपनाना चाहिए। Break लेने से हम अपने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता बडा सकते है। साथ साथ और भी ऊर्जा के साथ प्रभु के लिए काम कर सकते है।


✍फादर मेलविन चुल्लिकल



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शनिवार, 17 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शनिवार, 17 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :निर्गमन 12:37-42



37) इस्राएलियों ने रामसेस से सुक्कोत की ओर प्रस्थान किया। बच्चों और स्त्रियों के अतिरिक्त पैदल चलने वाले पुरुषों की संख्या लगभग छः लाख थी।

38) बहुत से परदेशी उनके साथ हो लिये और भेड़-बकरियों तथा बैल-गायों के बहुत भारी झुण्ड भी।

39) वे मिस्र से जो गूँधा हुआ आटा अपने साथ ले गये थे, उन्होंने उसकी बेखमीर रोटियाँ पकायी। उनके पास खमीर नहीं था, क्योंकि वे इतनी जल्दी में मिस्र से निकाल दिये गये थे कि उन्हें रास्ते के लिए भोजन तैयार करने का समय तक नहीं मिला था।

40) इस्राएली चार सौ तीस वर्ष तक मिस्र में रहे थे।

41) जिस दिन ये चार सौ तीस वर्ष समाप्त हुए, उसी दिन प्रभु की समस्त प्रजा मिस्र से निकल गयी।

42) प्रभु उस रात जागरण करता रहा, जिससे वह इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले जाये। इसलिए समस्त इस्राएली पीढ़ी दर पीढ़ी उसी रात को प्रभु के आदर में जागरण करते है।



सुसमाचार : मत्ती 12:14-21



14) इस पर फ़रीसियों ने बाहर निकल कर ईसा के विरुद्ध यह परामर्श किया कि हम किस तरह उनका सर्वनाश करें।

15) ईसा यह जान कर वहाँ से चले गये।

बहुत-से लोग ईसा के पीछे हो लिये। वे सबों को चंगा करते थे,

16) किन्तु साथ-साथ यह चेतावनी देते थे कि तुम लोग मेरा नाम नहीं फैलाओ।

17) इस प्रकार नबी इसायस का यह कथन पूरा हुआ-

18) यह मेरा सेवक है, इसे मैने चुना है; मेरा परमप्रिय है, मैं इस पर अति प्रसन्न हूँ। मैं इसे अपना आत्मा प्रदान करूँगा और यह गैर-यहूदियों में सच्चे धर्म का प्रचार करेगा।

19) यह न तो विवाद करेगा और न चिल्लायेगा, और न बाज़ारों में कोई इसकी आवाज सुनेगा।

20) यह न तो कुचला हुआ सरकण्डा ही तोडे़गा, और न धुँआती हुई बत्ती ही बुझायेगा, जब तक वह सच्चे धर्म को विजय तक न ले जाये।

21) इसके नाम पर गैर-यहूदी भरोसा रखेंगे।



📚 मनन-चिंतन



आज का युग संचार का युग है, सूचनाएं दुनिया के एक कौने से दूसरे कौने में चंद सेकेंड्स में पहुँच जाती हैं. इन्टरनेट पर इतने सारे प्लेटफॉर्म्स हैं, जिनके द्वारा आप अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकते हैं, जैसे कि फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम आदि. कभी-कभी तो कन्फ्युसन होता है कि अपने विचार दूसरों तक पहुँचाने के लिए कौन सा प्लेटफार्म सबसे अच्छा है. बहुत से लोगों को लत होती है कि वे कुछ भी करते हैं, उसे तुरन्त मीडिया या सोशल मीडिया के द्वारा दूसरों को बताते हैं, कभी- कभी तो उसे बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं. यही आदत जीवन के हर पहलु में समा जाती है. ऐसा ही एक पहलु है, किसी की कुछ मदद करना या भलाई करना. पहले कहावत होती थी, नेकी कर दरिया में डाल, यानि कि किसी के साथ कुछ भलाई की तो उसे भूल जाओ, उसका ढिंढोरा मत पीटो, लेकिन आज उसके उल्टा हो रहा है.

प्रभु येसु जगह-जगह घूम-घूम कर लोगों को चंगाई प्रदान करते थे, उन्हें जीवन की अनमोल शिक्षा देते थे, लोगों का जीवन बदल देते थे और उनसे कहते थे कि किसी को बताना मत. लेकिन फिर भी लोग जोर-शोर से उसका प्रचार कर देते थे. आज का सुसमाचार हमें याद दिलाता है कि यदि हम किसी के लिए कुछ भला करते हैं, तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटना है. चौराहे पर चिल्लाकर उसका प्रचार नहीं करना है. लोग हमारे भले कार्यों को देखकर हमारी नहीं बल्कि स्वर्गीय पिता की महिमा करें, क्योंकि हम तो पिता ईश्वर के हाथों में कठपुतली मात्र हैं. पिता ईश्वर हमसे तभी प्रसन्न होंगे जब हम इस सिद्धांत का पालन करेंगे - नेकी कर और दरिया में डाल. आमेन.



📚 REFLECTION



Today we live in a world of communication revolution, here information travels from one corner to another corner of the world just within seconds. There are so many platforms on the internet where you can reach across the vast number of people, such as Facebook, Twitter Instagram etc. Sometimes even we get confused in choosing the best means of communication. Many people have got a kind of addiction to share with others on social media, whatever they do, and very often they share in an exaggerated manner. This attitude pervaded all aspects of our life, including the aspect of spiritual or moral life. Earlier it was said ‘do good and forget it’ meaning whenever you do any good to others, do not let it be known to others, keep it a secret, but today, it is the other way.

Jesus went around, from place to place doing good to others, healing them of their sicknesses and infirmities, preaching them the great mysteries and changing their lives. He always told people not to tell about it to anybody. But still many went around proclaiming it, what God had done for them. Today’s gospel reminds us that when we do good, help someone, we should not proclaim it to the world, on the crossroads. People should not praise us by seeing our good works rather they should give praise to the Heavenly Father because it is through the grace and blessings of the Heavenly Father that we do whatever we do. God will love us and be happy only when we follow this principle of keeping it secret when we do something good for others.


✍ -Fr. Johnson B.


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शुक्रवार, 16 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह माउन्ट कार्मल की माता मरियम

 

शुक्रवार, 16 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

माउन्ट कार्मल की माता मरियम



पहला पाठ :निर्गमन 11:10-12:14


10) मूसा और हारून ने फिराउन के सामने ये सब चमत्कार दिखाये। परन्तु प्रभु ने फिराउन का हृदय कठोर कर दिया था। उसने इस्राएलियों को अपने देश से जाने की आज्ञा नहीं दी।

1) प्रभु ने मिस्र देश में मूसा और हारून से कहा,

2) ''यह तुम्हारे लिए आदिमास होगा; तुम इसे वर्ष का पहला महीना मान लो।

3) इस्राएल के सारे समुदाय को यह आदेश दो - इस महीने के दसवें दिन हर एक परिवार एक एक मेमना तैयार रखेगा।

4) यदि मेमना खाने के लिए किसी परिवार में कम लोग हों, तो जरूरत के अनुसार पास वाले घर से लोगों को बुलाओ। खाने वालों की संख्या निश्चित करने में हर एक की खाने की रुचि का ध्यान रखो।

5) उस मेमने में कोई दोश न हो। वह नर हो और एक साल का। वह भेड़ा हो अथवा बकरा।

6) महीने के दसवें दिन तक उसे रख लो। शाम को सब इस्राएली उसका वध करेंगे।

7) जिन घरों में मेमना खाया जायेगा, दरवाजों की चौखट पर उसका लोहू पोत दिया जाये।

8) उसी रात बेखमीर रोटी और कड़वे साग के साथ मेमने का भूना हुआ मांस खाया जायेगा।

9) इस में से कच्चा या उबला हुआ कुछ मत खाओं, बल्कि सिर, पैरों और अँतड़ियों के साथ पूरे को आग में भून कर खाओं।

10) अगले दिन के लिए कुछ भी नहीं रखा जायेगा। जो कुछ बच गया हो, उसे भोर के पहले ही जला दोगे।

11) तुम लोग चप्पल पहन कर, कमर कस कर तथा हाथ में डण्डा लिये खाओगे। तुम जल्दी-जल्दी खाओगे, क्योंकि यह प्रभु का पास्का है।

12) उसी रात मैं, प्रभु मिस्र देश का परिभ्रमण करूँगा, मिस्र देश में मनुष्यों और पशुओं के सभी पहलौठे बच्चों को मार डालूँगा और मिस्र के सभी देवताओं को भी दण्ड दूँगा।

13) तुम लोहू पोत कर दिखा दोगे कि तुम किन घरों में रहते हो। वह लोहू देख कर मैं तुम लोगों को छोड़ दूँगा, इस तरह जब मैं मिस्र देश को दण्ड दूँगा, तुम विपत्ति से बच जाओगे।

14) तुम उस दिन का स्मरण रखोगे और उसे प्रभु के आदर में पर्व के रूप में मनाओगे। तुम उसे सभी पीढ़ियों के लिए अनन्त काल तक पर्व घोषित करोगे।


सुसमाचार : मत्ती 12:1-8


1) ईसा किसी विश्राम के दिन गेहूँ के खेतों से हो कर जा रहे थे। उनके शिष्यों को भूख लगी और वे बालें तोड़-तोड़ कर खाने लगे।

2) यह देख कर फ़रीसियों ने ईसा से कहा, ’’देखिए, जो काम विश्राम के दिन मना है, आपके शिष्य वही कर रहे हैं’’।

3) ईसा ने उन से कहा, ’’क्या तुम लोगों ने यह नहीं पढ़ा कि जब दाऊद और उनके साथियों को भूख लगी, तो दाऊद ने क्या किया था?

4) उन्होंने ईश-मन्दिर में जा कर भेंट की रोटियाँ खायीं। याजकों को छोड़ न तो उन को उन्हें खाने की आज्ञा थी और न उनके साथियों को।

5) अथवा क्या तुम लोगों ने संहिता में यह नहीं पढ़ा कि याजक विश्राम के दिन का नियम तोड़ते तो हैं, पर दोषी नहीं होते?

6) मैं तुम से कहता हूँ- यहाँ वह है, जो मन्दिर से भी महान् है।

7) मैं बलिदान नहीं, बल्कि दया चाहता हूँ- यदि तुम लोगों ने इसका अर्थ समझ लिया होता, तो निर्दोषों को दोषी नहीं ठहराया होता;

8) क्योंकि मानव पुत्र विश्राम के दिन का स्वामी है।’’


📚 मनन-चिंतन


आज माता कलीसिया कारमेल पर्वत की माता मरियम का पर्व मनाती है. यह त्यौहार कारमेल धर्मसमाजों के लिए प्रमुख पर्व है, इसलिए आज हम विशेष रूप से उन्हें याद करें. इस त्यौहार की स्थापना पहले कारमेल की धर्मसमाजों के लिए सन 1332 में हुई थी, बाद में सन्त पापा बेनेडिक्ट 13वें ने 1726 में इसे पूरी कलीसिया के लिए पर्व घोषित किया. कहा जाता है कि माता मरियम ने 16 जुलाई 1251 में सन्त साइमन स्टॉक को दर्शन दिया और उसे एक स्कैपुलर (जिसे गले में पहनते हैं) दिया और वादा किया कि जो भी व्यक्ति इसे पहने हुए मृत्यु को प्राप्त करेगा वह नरक की आग में दण्ड से बच जायेगा. आज के दिन कारमेल की धर्म बहनें और पुरोहित इन स्कैपुलर को लोगों में बाँटते हैं. आखिर माता मरियम को यह आत्मविश्वास और अधिकार कहाँ से मिला कि वो इस तरह का वादा करती हैं? हम माता मरियम की प्रार्थना में भी उनसे 'अब और हमारे मरने के समय' प्रार्थना करने के लिए कहते हैं.

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु की माता और उनके भाई उनसे मिलने आते हैं, लेकिन प्रभु येसु उनके सगे-सम्बन्धी बनने के लिए एक नया मापदण्ड देते हैं, एक नयी परिभाषा देते हैं, और वह यह है, कि जो कोई स्वर्गीय पिता की इच्छा पूरी करता है, वही है मेरी माता, मेरी बहन और मेरे भाई. माता मरियम का प्रभु येसु के साथ खून का रिश्ता था, लेकिन उससे भी बढ़कर ईश्वर के मुक्ति कार्य में सबसे बड़े मानवीय सहयोग का रिश्ता भी था. माता मरियम ने अपने जीवन में स्वर्गीय पिता की इच्छा पूरी की इसलिए वह उनकी सदा-सदा के लिए माँ बनीं. ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, कभी-कभी सारी दुनिया से भिड़ जाना पड़ता है. माता मरियम के ये शब्द "देखिये मैं प्रभु की दासी हूँ, आपका कथन मुझमें पूरा हो" हमारे लिए सदैव प्रेरणा स्रोत बने रहें. आमेन.



📚 REFLECTION



Today Mother Church celebrates the feast of Our Lady of Mount Carmel. This is the principal feast the Carmelite Order so let us bring them before the Lord in a special way. This Feast was first instituted for the Carmelites in 1332 and later on it was extended to the whole Church by Pope Benedict XIII in 1726. It is said that on 16th July 1251 Mother Mary appeared to St. Simon Stock and gave him the scapular and promised him that he who dies in this will not suffer eternal fire. On this day Carmel sisters and fathers distribute these scapulars among the people. What gives Mother Mary the confidence and authority to make such a promise? Even in the Hail Mary prayer we implore her prayers ‘now and at the hour of our death.’

In the Gospel today we see that mother and brothers of Jesus come to meet him. But Jesus gives us a new definition and criteria of being his kiths and kins. That criteria of being in the family is to do the will of the Heavenly Father. Whoever does so is the mother, brothers or sisters of Jesus. Mother Mary and Jesus had a bond of blood relationship, but more than there was relationship of greatest contribution in the salvific plan of God. Mother Mary was ready and always willing to do the will of God in her life, that’s why she became the mother of Jesus. We have to be ready to pay heavy price if we desire to do the will of God, we may have to face the whole world sometimes. May the words of Our Heavenly Mother “Behold the handmaid of the Lord, let it be with me according to your word” be our own words. Amen.


✍ -Fr. Johnson B.



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गुरुवार, 15 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 15 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :निर्गमन 3:13-20


13) मूसा ने झाड़ी में से प्रभु की वाणी सुन कर उस से कहा, ''जब मैं इस्राएलियों के पास पहुँच कर उन से यह कहॅूँगा - तुम्हारें पूर्वजों के ईश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, और वे मुझ से पूछेंगे कि उसका नाम क्या है, तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?''

14) ईश्वर ने मूसा से कहा, ''मेरा नाम सत् है। उसने फिर कहा, ''तुम इस्राएलियों को यह उत्तर दोगे जिसका नाम "सत्" है, उसी ने मुझे भेजा है।''

15) इसके बाद ईश्वर मूसा से कहा, ''तुम इस्राएलियों से यह कहोगे - प्रभु तुम्हारे पूर्वजों के ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब के ईश्वर ने मुझे तुम लोगों के पास भेजा है। यह सदा के लिए मेरा नाम रहेगा और यही नाम ले कर सब पीढ़ियॉँ मुझ से प्रार्थना करेंगी।

16) अब जा कर इस्राएल के नेताओं को एकत्र करो और उन से यह कहो, "प्रभु तुम्हारे पूर्वजों का ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक और याकूब का ईश्वर, मुझे दिखाई दिया और उसने मुझ से कहा - मैंने तुम लोगों की सुध ली है और मैं जानता हॅूँ कि मिस्र देश में तुम पर क्या बीत रही है।

17) मैंने यह निर्णय किया है : मैं तुम्हें मिस्र की दीनता से निकाल कर कनानियों, हित्तियों, अमोरियों, परिज्जियों, हिव्वियों और यबूसियों के देश ले जाऊँगा। जहाँ दूध और मधु की नदियाँ बहती हैं।

18) ''वे तुम्हारी बात मानेंगे और तुम इस्राएल के नेताओं के साथ मिस्र के राजा के पास जाओगे और उस से यह कहोगे, "प्रभु इब्रानियों का ईश्वर, हमें दिखाई दिया। हमें मरुभूमि में तीन दिन की यात्रा करने दीजिए, जिससे हम अपने प्रभु-ईश्वर को बलि चढ़ायें।"

19) मैं जानता हॅूँ कि जब तक मिस्र के राजा को विवश नहीं किया जायेगा, वह तुम लोगों को नहीं जाने देगा।

20) इसलिए मैं अपना भुजबल प्रदर्शित करूँगा और विविध चमत्कार दिखाकर मिस्रियों को सन्तप्त करूँगा। इसके बाद वह तुम लोगों को जाने देगा।


सुसमाचार : मत्ती 11:28-30


28) ’’थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगो! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।

29) मेरा जूआ अपने ऊपर ले लो और मुझ से सीखो। मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूँ। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शान्ति पाओगे,

30) क्योंकि मेरा जूआ सहज है और मेरा बोझ हल्का।’’


📚 मनन-चिंतन


निर्गमन ग्रन्थ के आरम्भ में हम देखते हैं कि इस्राएलियों की दासता के समय मिस्री लोग उन पर बहुत अत्याचार करते थे, वे युसूफ द्वारा किये गये उपकारों को भूल गये थे. लोगों की आह भरी पुकार ईश्वर तक पहुँची और ईश्वर ने उनकी सुधि ली. उसके बाद भी हम देखते हैं कि जब-जब लोगों पर विपत्ति या संकट आया, तब-तब ईश्वर द्रवित हुआ और उनके दुःख-दर्द मिटाए. यही है ईश्वर का वास्तविक रूप, वह करुणामय ईश्वर है. और इसीलिए प्रभु येसु आज के सुसमाचार में पूरी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सान्त्वना भरे शब्द कहते है, “ थके-मांदे और बोझ से दबे हुए लोगों, तुम सब के सब मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूंगा.” शायद ये शब्द पूरे नए व्यवस्थान में सबसे अधिक बार दुहराए जाने वाले शब्द हैं. प्रभु येसु का यह निमंत्रण बिना किसी भेद-भाव के सभी के लिए खुला निमंत्रण है.

इस दुनिया की भाग-दौड़ में हम इतने थककर चकना-चूर हो जाते हैं कि हमें खुद नहीं पता चलता. इतनी सारी चिंताएं हमें घेर लेती हैं कि चरों तरफ कोई आशा की किरण दिखाई नहीं देती. प्रभु येसु हमें सान्त्वना देते हैं और विश्राम देने का वादा करते हैं. वे कहते हैं कि तुम मेरा जुआ अपने ऊपर ले लो. शायद अगर आपने जुआ देखा होगा तो आप जानते होंगे कि उसमें दो बैल एक साथ जोते जाते हैं. दोनों बैलों को एक साथ चलना पड़ता है, कोई टेड़ा-सीधा नहीं चल सकता, कोई तेज़ या अधिक धीमे नहीं चल सकता है, कोई अकेला नहीं चल सकता, दोनों को एक जैसी चाल में, एक साथ चलना पड़ता है. उसी तरह से हमारी जीवन रुपी गाड़ी के जुए में एक तरफ प्रभु येसु को लेना है, और दूसरी तरफ हमें चलना है. हम अकेले इस जुए को नहीं ढो सकते, ईश्वर के बिना जीवन रुपी यह गाड़ी सफलता पूर्वक आगे नहीं बढ़ेगी, पहिये फँस जायेंगे और हम खींचते-खींचते थक जायेंगे. आईये हम अपने जीवन का नियंत्रण ईश्वर को दे दें और उसकी शरण में आकर विश्राम कर लें. आमेन.



📚 REFLECTION



In the very beginning of the book of Exodus we see the misery of the Israelites, the unjust exploitation by the Egyptian who had forgotten the good works done by Joseph. The painful cry of the Israelites reaches to the ears of God and He remembers them. Even later on we see in their lives, that whenever they faced difficulties and persecutions, God felt compassionate towards them and came to their aid. This is the real nature of God, He is compassionate God. Perhaps it is this compassion of God that makes Jesus to utter the most consoling words in the human history, “Come to me all you that are weary and carrying heavy burdens, and I will give you rest.” These are perhaps most quoted words of Jesus in the New Testament. This is an open invitation of Jesus to whole humanity, without any reservations.

We are so busy in rat race of daily life that we forget that we are heavily laden with so many burdens. So many worries surround us that sometimes no hope is seen anywhere. Jesus gives us consolation and assures us to give rest to our weary souls. He calls us to take His yoke. If you have seen a yoke, it has two sides and we need one each ox for each side. Both oxen have to move together with same momentum, one cannot go faster than the other or slower than the other. Yoke cannot be carried by a single ox alone. Same is the case of the yoke of our life. We alone cannot carry it, we need God the other side. We may not be able to pull this life alone without God, we may get tired and exhausted. Let us allow God to take control of our life and rest under the shade of His wings. Amen.


✍ -Fr. Johnson B


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बुधवार, 14 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 14 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ :निर्गमन 3:1-6, 9-12


1) मूसा अपने ससुर, मिदयान के याजक, यित्रों की भेडें चराया करता था। वह उन्हें बहुत दूर तक उजाड़ प्रदेश में ले जा कर ईश्वर के पर्वत होरेब के पास पहुँचा।

2) वहाँ उसे झाड़ी के बीच में से निकलती हुई आग की लपट के रूप में प्रभु का दूत दिखाई दिया। उसने देखा कि झाड़ी में तो आग लगी है, किन्तु वह भस्म नहीं हो रही है।

3) मूसा ने मन में कहा कि यह अनोखी बात निकट से देखने जाऊँगा और यह पता लगाऊँगा कि झाड़ी भस्म क्यों नहीं हो रही है।

4) निरीक्षण करने के लिए उसे निकट आते देख कर ईश्वर ने झाड़ी के बीच में से पुकार कर उससे कहा, ''मूसा! मूसा!'' उसने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।''

5) ईश्वर ने कहा, ''पास मत आओ। पैरों से जूते उतार दो, क्योंकि तुम जहाँ खड़े हो, वह पवित्र भूमि है।''

6) ईश्वर ने फिर उस से कहा, ''मैं तुम्हारे पिता का ईश्वर हूँ, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब का ईश्वर।'' इस पर मूसा ने अपना मुख ढक लिया; कहीं ऐसा न हो कि वह ईश्वर को देख ले।

9) मैंने इस्राएलियों की पुकार सुनी और उन पर मिस्रियों का अत्याचार देखा, इसलिए मैं तुम्हें फिराउन के पास भेजता हूँ।

10) तुम मेरी प्रजा इस्राएल को मिस्र देश से बाहर निकाल लाओ।

11) मूसा ने ईश्वर से कहा, ''मैं कौन हूँ जो फिराउन के पास जाऊॅँ और इस्राएलियों को मिस्र देश से बाहर निकाल ले जाऊॅँ?

12) ईश्वर ने उत्तर दिया, ''मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। मैंने तुम को भेजा है, तुम्हारे लिए इसका प्रमाण यह होगा कि जब तुम इस्राएल को मिस्र से निकाल लाओगें, तो तुम लोग इस पर्वत पर प्रभु की आराधना करोगें।''


सुसमाचार : मत्ती 11:25-27


25) उस समय ईसा ने कहा, ’’पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ; क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है।

26) हाँ, पिता! यही तुझे अच्छा लगा।

27) मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर कोई भी पुत्र को नहीं जानता। इसी तरह पिता को कोई भी नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है और वही, जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे।



📚 मनन-चिंतन


ईश्वर हमारा ह्रदय देखते हैं और खुद को हम पर प्रकट करते हैं. आज के पहले पाठ में हम नबी मूसा को देखते हैं, जिन पर ईश्वर खुद को प्रकट करते हैं एक जलती हुई झाड़ी के रूप में. नबी मूसा ईश्वर द्वारा चुने जाने से पूर्व एक साधारण मनुष्य थे, वह ठीक से बोल भी नहीं पाते थे, लेकिन ईश्वर उनको चुनते हैं और खुद को प्रकट करते हैं, अपना सामर्थ्य प्रकट करते हैं. कई बार हम मामूली इन्सान होने के बावज़ूद, हमारी बिना किसी योग्यता के ईश्वर हम पर स्वयं अपनी कृपा प्रकट करते हैं. और इसलिए प्रभु येसु आज के सुसमाचार में पिता ईश्वर की आराधना करते और उन्हें धन्यवाद देते हैं, क्योंकि वे अपने महान रहस्य हम निरे बच्चों पर प्रकट करते हैं. हम जानते हैं कि प्राचीन काल से ही ईश्वर ने विभिन्न नबियों द्वारा और महान कार्यों द्वारा अपने आप को हम पर प्रकट किया, लेकिन अब उसने अपने पुत्र के द्वारा स्वयं को प्रकट किया है (इब्रानियों 1:1-2).

किसी ने पिता ईश्वर को नहीं देखा है सिवाय उसके पुत्र हमारे प्रभु येसु ने. प्रभु येसु हमें बताते हैं कि पुत्र को छोड़कर कोई भी पिता को नहीं जानता. हम जानते हैं कि पुराने व्यवस्थान में जिस तरह से ईश्वर अपने आप को प्रकट किया उसी तरह से लोगों ने उनकी छवि बनाई. और कई बार वह छवि सटीक नहीं थी, उसमें कुछ खामियाँ थीं. लेकिन नये व्यवस्थान में प्रभु येसु पिता ईश्वर का वास्तविक चेहरा बनते हैं, और स्वर्ग और पिता ईश्वर के रहस्यों को हम पर प्रकट करते हैं. जितना हम प्रभु येसु को जानेंगे और समझेंगे उतना ही हम पिता ईश्वर को जानेंगे, क्योकि स्वयं प्रभु येसु ने कहा है, “जिसने मुझे देखा है, उसने पिता को भी देखा है" (योहन 14:9). और हम प्रभु येसु से होकर गये बिना पिता ईश्वर के पास नहीं आ सकते (योहन 14:6). आईये हम अपने जीवन में प्रभु येसु को और अधिक गहराई से जानने का प्रयास करें. आमेन.



📚 REFLECTION


God looks the disposition of our heart and accordingly reveals himself to us. The first reading today, describes about Moses to whom He revealed himself in the form of a burning bush which could consume itself. Moses was a very simple man before being chosen by God, in fact he could not even speak properly, but God chose him and revealed Himself and His glory to him. Very in spite of our nothingness and nothingness, God chooses to reveal Himself to us. That is why Jesus praises and adores the Heavenly Father for revealing Himself and the great mysteries to such simple children. We know that from very old times God spoke to us through various prophets and messengers, but now He has spoken to us through His son (cf Heb 1:1-2), He revealed Himself to us through His only son.

No one has seen the Father except the Son, our Lord Jesus Christ. Jesus tells us that no one knows the Father, except the Son. We know about the ways in which God revealed Himself to the people in the Old Testament Times, and people formed an image of God according to their understanding of that revelation. This image could not be fully correct, it was limited. But in the New Testament times, Jesus becomes the real face of God, He reveals the real image and the mysteries of the Father. The more we will try to understand and know Jesus, the more we will know the Father, because anyone who has seen Jesus, also has seen the Father (cf John 14:9). We cannot go to the Father except through Jesus (cf John 14:6). Let us ask the Lord for the grace to know Him more and more deeply. Amen.


✍ -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, 13 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 13 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :निर्गमन 2:1-15a



1) लेवी वंश के एक व्यक्ति ने एक लेवी वंशी कन्या से विवाह किया।

2) उसकी पत्नी गर्भवती हुई और उसको एक पुत्र उत्पन्ना हुआ। माता ने यह देख कर कि बच्चा सुन्दर है, उसे तीन महीनों तक छिपाये रखा।

3) जब वह उसे और अधिक समय तक छिपा कर नहीं रख सकी, तो उसने बेंत की एक टोकरी ले ली और उस पर चिकनी मिट्टी और डामर का लेप लगाया। उसने उस में बालक को रख कर उसे नील नदी के तट के सरकण्डों के बीच छोड़ दिया।

4) बालक की बहन कुछ दूरी पर यह देखने के लिए खड़ी रहा करती कि उस पर क्या बीतेगी।

5) फिराउन की पुत्री नील नदी में स्नान करने आयी। इस बीच उसकी सखियाँ नदी किनारे घूमती रहीं। उसने सरकण्डों के बीच उस टोकरी को देखा और अपनी दासी को उसे ले आने को भेजा।

6) उसने उसे खोल कर देखा कि उस में एक रोता हुआ बालक पड़ा है। उसे तरस आया और उसने कहा, यह इब्रानियों का कोई बालक होगा।

7) बालक की बहन ने फिराउन की पुत्री के पास आ कर पूछा, क्या मैं इब्रानी स्त्रियों में से किसी दाई को बुला लाऊँ, जो आपके लिए इस बालक को दूध पिलाया करे?

8) फिराउन की पुत्री ने उत्तर दिया, हाँ, यही करो। लड़की बालक की माता को बुला लायी।

9) फिराउन की पुत्री ने उस से कहा, इस बालक को ले जा कर मेरे लिए दूध पिलाओ। मैं तुम को वेतन दिया करूँगी। वह स्त्री बालक को ले गयी और उसने उसे दूध पिलाया।

10) जब बालक बड़ा हो गया, तो वह उसे फिराउन की पुत्री के पास ले गयी। इसने उसे गोद लिया और यह कहते हुए उसका नाम मूसा रखा कि ''मैंने इसे पानी में से निकाला।''

11) जब मूसा सयाना हो गया, तो वह किसी दिन अपने जाति-भाइयों से मिलने निकला। उसने उन्हें बेगार करते देखा और यह भी देखा कि एक मिस्री उसके एक इब्रानी भाई को पीट रहा है।

12) मूसा ने इधर-उधर दृष्टि दौड़ायी और जब उसे पता चला कि वहाँ कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हैं, तो उसने मिस्री को मार कर बालू में छिपा दिया।

13) वह दूसरे दिन फिर निकला और उसने दो इब्रानियों को लड़तें देखा। उसने अन्याय करने वाले से कहा, ''तुम अपने भाई को क्यों पीटते हो?''

14) उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, ''किसने तुम को हमारा शासक और न्यायकर्ता नियुक्त किया है? क्या तुम मुझ को भी मार डालना चाहते हो, जैसे कि तुमने उस मिस्री को मारा?'' मूसा यह सोच कर डर गया कि यह बात फैल गयी है।

15) फिराउन को भी इसका पता चला और उसने मूसा को मार डालना चाहा। मूसा फिराउन के अधिकार क्षेत्र से भाग निकला और मिदयान देश में बसने गया और वहाँ एक कुएँ के पास बैठ कर विश्राम करने लगा।



सुसमाचार : मत्ती 11:20-24



20) तब ईसा उन नगरों को धिक्कारने लगे, जिन्होंने उनके अधिकांश चमत्कार देख कर भी पश्चाताप नहीं किया था,

21) ’’धिक्कार तुझे, खोंराजि़न! धिक्कार तुझे, बेथसाइदा! जो चमत्कार तुम में किये गये हैं, यदि वे तीरूस और सिदोन में किये गये होते, तो उन्होंने न जाने कब से टाट ओढ़ कर और भस्म रमा कर पश्चाताप किया होता।

22) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, न्याय के दिन तेरी दशा की अपेक्षा तीरूस और सिदोन की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।

23) ’’और तू, कफ़रनाहूम! क्या तू स्वर्ग तक ऊँचा उठाया जायेगा? नहीं! तू अधोलोक तक नीचे गिरा दिया जायेगा; क्योंकि जो चमत्कार तुझ में किये गये हैं, यदि वे सोदोम में किये गये होते, तो वह आज तक बना रहता।

24) इसलिए मैं तुझ से कहता हूँ, न्याय के दिन तेरी दशा की अपेक्षा सोदोम की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।’’


📚 मनन-चिंतन


ईश्वर के आह्वान के प्रति उदासीन बने रहने से बड़ा कोई अपराध नहीं है. अगर ईश्वर हमें प्यार करते हैं तो बदले में हमें भी प्यार करना है, अगर ईश्वर हमसे मेल मिलाप करने के लिए कदम बढ़ाते हैं तो हमें भी अपने पापों को त्यागकर ईश्वर की कदम बढ़ाने हैं. आज के सुसमाचार में हम ऐसे नगरों को देखते हैं जो ईश्वर के प्रति न केवल उदासीन बने रहे बल्कि अपने पापों को भी नहीं त्यागा. ईश्वर ने उनके बीच खूब चिन्ह और चमत्कार दिखाए, जिसे देखकर उन्हें अपने पापों का अहसास होना था, ईश्वर की प्रभुता का अहसास होना था, लेकिन वे अपने पापों में ही मगन रहे. ऐसा कौन इन्सान या नगर है जिसे अपने पापों का हिसाब नहीं देना होगा? सभी पापी हैं, और ईश्वर हमें मौके पे मौका देते हैं कि हम अपने पापों के लिए पश्चाताप करें और दण्ड से बच जाएँ, जो इस पर ध्यान देते हैं वो बच भी जाते हैं.

ईश शास्त्र के अनुसार विश्वास की परिभाषा है - ईश्वर के कार्यों के प्रति हमारा प्रत्युत्तर. ईश्वर विभिन्न रूप में हमारे जीवन में चिन्ह और चमत्कार दिखाता है, और हम उन चिन्हों और चमत्कारों के प्रति क्या नजरिया रखते वही हमारे विश्वास का मापदण्ड है. कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके जीवन में ईश्वर अपनी उपस्थिति का आभास नहीं कराते. बहुत से लोग ईश्वर की उस उपस्थिति का अहसास कर अपने जीवन को बदल लेते हैं, और बहुत से लोग ईश्वर की उस उपस्थिति के प्रति अपना ह्रदय बन्द कर लेते हैं और पाप के रास्ते पर चलते रहते हैं. प्रभु येसु के द्वारा उन नगरों के लिए कहे गये धिक्कार भरे ये शब्द कहीं मेरे जीवन में भी लागू नहीं होते? आमेन.



📚 REFLECTION



There is no greater spiritual offence than to remain neutral or lukewarm to the intervention of God. If God loves us, then we also must love Him in return, If He takes a one step towards us to reconcile us to Himself, then we need to take more steps towards Him, leaving our sins behind and coming back to Him. In the gospel today we seen some cities which not only remained unresponsive to God’s call for repentance but also did not give up their sinful ways. God intervened in their lives by various mighty deeds, which were supposed to arouse them to repentance, supposed to arouse the fear of the Lord, but they happily remained in their sins. Who is there in this world who is not accountable for their sins before God? All have sinned and God time and again God gives us opportunity to repent for our sins and thus save ourselves from the wrath of the judgement day, and those who pay heed to this, save their souls.

According to theology, the faith is defined as our response towards God’s intervention in and around our lives. God intervenes in our lives through various events and persons, He shows signs and miracles and our response to those interventions of God decides our depth of faith. There is no one in this world in whose life God doesn’t show His presence. Many people respond positively to that divine presence and change their lives, and there are many who turn a deaf ear to the divine inspiration, they shut their hearts and continue to tread on the path of sin. Do the condemning words uttered by Jesus for the unrepentant cities, apply to my life as well? Let us ask ourselves. Amen.


✍ -Fr. Johnson B


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सोमवार, 12 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 12 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह




पहला पाठ :निर्गमन 1:8-14, 22


8) मिस्र देश में एक नये राजा का उदय हुआ, जो यूसुफ़ के विषय में कुछ नहीं जानता था।

9) उसने अपनी प्रजा से कहा, सुनो ये इस्राएली संख्या और शक्ति में हम से अधिक हो गये हैं।

10) हमें ऐसा उपाय सोच निकालना चाहिए, जिससे उनकी संख्या न बढ़ने पाये। कहीं ऐसा न हो कि युद्व छिड़ने पर ये हमारे शत्रुओं का साथ दें और हमारे विरुद्ध लड़ने के बाद देश से निकल भागें।

11) उन्होंने इस्राएलियों पर ऐसे अधिकारियों को नियुक्त किया, जो उन्हें बेगार में लगा कर उनका दमन करें। इस्राएलियों ने इस प्रकार फिराउन के लिए पितोम और रामसेस नामक गोदाम वाले नगर बनाये।

12) किन्तु उन पर जितना अधिक अत्याचार किया जाता था, उतना ही अधिक वे संख्या में बढ़ते और फैलते जाते थे। इस करण मिस्री उन से डरने लगे।

13) उन्होंने इस्राएलियों को बेगार में लगाया।

14) और उन से कठोर परिश्रम करा कर उनका जीवन कड़वा बना दिया। उन्होंने गारा और ईट बनाने और खेत में हर प्रकार का काम करने के लिए उन्हें बाध्य किया।

22) इसके बाद फिराउन ने अपनी समस्त प्रजा को यह आदेश दिया कि वह प्रत्येक नवजात इब्रानी लड़के को नील नदी में फेंक दे, किन्तु सब लड़कियों को जीवित रहने दे।



सुसमाचार : मत्ती 10:34-11:1


34) ’’यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर शांति लेकर आया हूँ। मैं शान्ति नहीं, बल्कि तलवार लेकर आया हूँ।

35) मैं पुत्र और पिता में, पुत्री और माता में, बहू और सास में फूट डालने आया हूँ।

36) मनुष्य के घर वाले ही उसके शत्रु बन जायेंगे।

37) जो अपने पिता या अपनी माता को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं है। जो अपने पुत्र या अपनी पुत्री को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं।

38) जो अपना क्रूस उठा कर मेरा अनुसरण नहीं करता, वह मेरे योग्य नहीं।

39) जिसने अपना जीवन सुरक्षित रखा है, वह उसे खो देगा और जिसने मेरे कारण अपना जीवन खो दिया है, वह उसे सुरक्षित रख सकेगा।

40) ’’जो तुम्हारा स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है वह उसका स्वागत करता है, जिसने मुझे भेजा है।

41) जो नबी का इसलिए स्वागत करता है कि वह नबी है, वह नबी का पुरस्कार पायेगा और जो धर्मी का इसलिए स्वागत करता है कि वह धर्मी है, वह धर्मी का पुरस्कार पायेगा।

42) ’’जो इन छोटों में से किसी को एक प्याला ठंडा पानी भी इसलिए पिलायेगा कि वह मेरा शिष्य है, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि वह अपने पुरस्कार से वंचित नहीं रहेगा।

1) अपने बारह शिष्यों को ये उपदेश देने के बाद ईसा यहूदियों के नगरों में शिक्षा देने और सुसमाचार का प्रचार करने वहाँ से चल दिये।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु आज हमसे कहते हैं, ‘जिसने अपना जीवन सुरक्षित रखा है वह उसे खो देगा और जिसने मेरे कारण अपना जीवन खो दिया है, वह उसे सुरक्षित रख सकेगा.” मनुष्य के जीवन की क्या कीमत है? क्या कोई ऐसी बस्तु या धन-दौलत है जिसके बदल में हम एक इन्सान के लिए जीवन खरीद सकते हैं? जीवन के वास्तविक मूल्य की झलक हमें कुछ दिन पहले कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान दिखी. जब लोग सांसों के लिए तड़प रहे थे, जब इलाज के लिए मारे-मारे फिर रहे थे, अपने जीवन के एक-एक पल के लिए लाखों रूपये लुटाने के लिए तैयार थे, चाहे कोई उनका सब कुछ ले ले लेकिन उनकी जान बचा ले. आपने जीवन की असली कीमत का एहसास हमें इस विपत्ति ने करा दिया, जीवन अनमोल है, अमूल्य है.

अगर हमारे जीवन की कोई भी कीमत नहीं लगा जा सकती तो सोचिये यह अमूल्य जीवन ईश्वर ने हमें मुफ्त में दिया है. क्या उसने हमसे हमारी सांसों के लिए कोई कीमत ली है? क्या हम अपने जीवन के बदले ईश्वर को कुछ दे सकते हैं? क्या हम अपनी खुद की ही कीमत चुका सकते हैं? स्तोत्रकार हमें समझाता है, “मनुष्य न तो अपने भाई का उद्धार कर सकता और न उसके जीवन का मूल्य ईश्वर को दे सकता है. प्राणों का मूल्य इतना ऊँचा है कि किसी के पास पर्याप्त धन नहीं है. (स्तोत्र-ग्रन्थ 49:8-9). क्या हमारा यह फ़र्ज़ नहीं बनता कि हम मुफ्त में मिले अपने इस अमूल्य जीवन के कुछ पल ईश्वर को दे दें. उसके साथ प्रार्थना में बिताएं, या उसके वचन को, उसके प्रेम को दूसरों तक ले जाने में बिताएं? अगर हम इस जीवन में ईश्वर से अन्जान बने रहेंगे तो ज़रूर प्रभु येसु भी अपने पिता के समक्ष हमें नकार देंगे, और हमारे लिए उससे बुरा कुछ नहीं हो सकता.



📚 REFLECTION



Today Jesus tells us, “Those who find their life, ill loose it, and those who loose their life for my sake will find it (Matthew 10:39). What is the price of human life? Is there any money or wealth that we can pay for buying life? We could see a glimpse of the real price of one’s life during the second wave of the ongoing pandemic. When people were gasping for breath, when we were running from one place to another for treatment, we were ready to pay lakhs of rupees for each moment of our life, we were ready to pay any price for saving our life. This situation has made us to realise the real worth of one’s life, it is priceless, no price is sufficient to buy life.

If this life is priceless, imagine how generous God must be to give us such a precious gift freely. Has He charged us any price for our breaths? Can we pay God something in return of our life? The psalmist says, “Truly no ransom avails for one’s life, there is no price one can give to God for it. For the ransom of life is costly, and can never suffice (Psalm 49:7-8). Don’t we feel obliged to give few moments from this freely received gift to God? Can we not spend few moments with Him in prayer, or in spreading His love to others? If we ignore God in this life then certainly Jesus also will ignore us before His Father in heaven, and there can nothing worse hen being disowned by the creator himself.



✍ -Fr. Johnson B


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