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आज का पवित्र वचन इतवार, 30 मई, 2021 पवित्र त्रित्व का महापर्व

 

इतवार, 30 मई, 2021

पवित्र त्रित्व का महापर्व

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पहला पाठ : विधि-विवरण ग्रन्थ 4:32-34,39-40



32) ईश्वर ने जब पृथ्वी पर मनुष्य की सृष्टि की थी, तुम सब से ले कर अपने पहले के प्राचीन युगों का हाल पूछो। क्या पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक कभी इतनी अद्भुत घटना हुई है?

33) क्या इस प्रकार की बात कभी सुनने में आयी है? क्या और कोई ऐसा राष्ट्र है, जिसने तुम लोगों की तरह अग्नि में से बोलते हुए ईश्वर की वाणी सुनी और जीवित बच गया हो?

34) ईश्वर ने आतंक दिखाकर, विपत्तियों, चिन्हों, चमत्कारों और युद्धों के माध्यम से, अपने सामर्थ्य तथा बाहुबल द्वारा तुम लोगों को मिस्र देश से निकाल लिया है - यह सब तुमने अपनी आँखों से देखा है। क्या और कोई ऐसा ईश्वर है, जिसने इस तरह किसी दूसरे राष्ट्र म

39) आज यह जान लो और इस पर मन-ही-मन विचार करो कि ऊपर आकाश में तथा नीचे पृथ्वी पर प्रभु ही ईश्वर है; उसके सिवा कोई और ईश्वर नहीं है।

40) मैं तुम लोगों को आज उसके नियम और आदेश सुनाता हूँ। तुम उनका पालन किया करो, जिससे जो देश तुम्हारा प्रभु-ईश्वर तुम्हें सदा के लिए देने वाला है, उस में तुम को और तुम्हारे पुत्रों को सुख-शांति तथा लम्बी आयु मिल सकें।“



दूसरा पाठ: रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 8:14-17



14) लेकिन यदि आप आत्मा की प्रेरणा से शरीर की वासनाओें का दमन करेंगे, तो आप को जीवन प्राप्त होगा।

15) जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित हैं, वे सब ईश्वर के पुत्र हैं- आप लोगों को दासों का मनोभाव नहीं मिला, जिस से प्रेरित हो कर आप फिर डरने लगें। आप लोगों को गोद लिये पुत्रों का मनोभाव मिला, जिस से प्रेरित हो कर हम पुकार कर कहते हैं, ’’अब्बा, हे पिता!

16) आत्मा स्वयं हमें आश्वासन देता है कि हम सचमुच ईश्वर की सन्तान हैं।

17) यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो हम उसकी विरासत के भागी हैं-हम मसीह के साथ ईश्वर की विरासत के भागी हैं। यदि हम उनके साथ दुःख भोगते हैं, तो हम उनके साथ महिमान्वित होंगे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 28:16-20



16) तब ग्यारह शिष्य गलीलिया की उस पहाड़ी के पास गये , जहाँ ईसा ने उन्हें बुलाया था।

17) उन्होंने ईसा को देख कर दण्डवत् किया, किन्तु किसी-किसी को सन्देह भी हुआ।

18) तब ईसा ने उनके पास आ कर कहा, ’’मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है।

19) इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।

20) मैंने तुम्हें जो-जो आदेश दिये हैं, तुम-लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ और याद रखो- मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ।’’



📚 मनन-चिंतन



हम सब ख्रीस्तीय पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर सभी कार्य करते है, विशेष रूप से प्रार्थना की शुरुआत और अंत। पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा तीन व्यक्ति है परंतु एक ईश्वर है और इसी त्रियेक ईश्वर का पर्व हम आज मनाते है, जिसे पवित्र त्रित्व के महापर्व से जाना जाता है।

मनुष्यों ने हमेशा से ही ईश्वर के बारे में जानने की कोशिश की है। प्रभु येसु और पवित्र आत्मा के द्वारा हमने ईश्वर और उनकी योजनाओं के बारे में कई रहस्य या सिद्धांत को समझा और जाना है परंतु जरूरी नहीं कि हम ईश्वर के हर रहस्य को समझ पाये। उनमें से एक रहस्य पवित्र त्रित्व का है जो हमारे इस क्षणिक दिमाग में कभी भी नहीं समा सकता।

आज के तीनों पाठ आज के पर्व के संदर्भ के अनुसार है। पहला पाठ में हमे शक्तिशाली पिता ईश्वर के विषय में बताया गया है जिसने इस अद्भुत सृष्टि की रचना की और महान चमत्कारों द्वारा इस्राएल को बचाया; वह पिता एक शक्तिशाली ईश्वर है और उसके सिवा कोई और ईश्वर नहीं है।

दूसरे पाठ में पवित्र आत्मा के विषय में बताया गया है। पवित्र आत्मा ईश्वर बाहर नहीं परंतु हमारे भीतर बसने वाला ईश्वर है क्योकि हमारा शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है। जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित है उनमें ईश्वर के जीवन का संचार है और वह इस संसार से परे रहकर ईश्वर के पुत्र के मनोभाव के अनुसार जीवन बिताता है।

सुसमाचार में हम प्रभु येसु के अंतिम आदेश के बारे में जानते है जहॉं प्रभु येसु अपने शिष्यों से कहते है कि, ’’मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।’’ प्रभु येसु जाते जाते पवित्र त्रित्व के नाम को उजागर कर के जाते है।

पवित्र त्रित्व का पर्व हमारे लिए त्रियेक ईश्वर को जानने का और प्रार्थना करने का सुंदर अवसर है परंतु इस रहस्य या सिद्धांत को पूर्ण रूप से समझना हमारे दिमाग के बस की बात नहीं। एक ईश्वर में तीन जन- इस रहस्य को समझाने के लिए कई विद्वानों ने कई उदाहरण देकर समझना चाहा परंतु किसी ने भी एक ठोस रूप से इसकी गहराई को समझा नहीं पाया है।

पवित्र त्रित्व का पर्व एकता का पाठ पढ़ाती है। जिस प्रकार पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अलग अलग व्यक्ति है परंतु वे एक है। जिस प्रकार प्रभु येसु कहते है मै पिता में हूॅं और पिता मुझमें है ठीक उसी प्रकार पवित्र आत्मा भी पिता और पुत्र में हैं और वे पवित्र आत्मा में अर्थात् वे तीनों एक है। आज के पर्व की आशीष द्वारा हम भी ईश्वर में एक बनें रहें जिस प्रकार प्रभु येसु हमारे लिए चाह रखते है, ’’सब के सब एक हो जायें। पिता! जिस तरह तू मुझ में है और मैं तुझ में, उसी तरह वे भी हम में एक हो जायें’’ (योहन 17ः21)। आमेन!



📚 REFLECTION



We all Christians do all the works in the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit, especially before and after the prayer. Father, Son and Holy Spirit are three persons but one God and this triune God’s feast we are celebrating today which is popularly known as Feast of Holy Trinity.

Humans have always tried to know about God. Because of Jesus and the Holy Spirit we understood many mysteries or concept about God and his plans but it is not necessary that we may understand every mystery. Among those mystery is the mystery of Holy Trinity which our temporary minds cannot contain it.

Today’s all the three readings are based on today’s feast. First reading is about the Almighty Father who created this wonderful creation and with great miracles He rescued Israelites; The Father is Almighty God and there is no other.

Second Reading is about the Holy Spirit. Holy Spirit God is a God who wants to live not outside but inside of us because our body is the temple of the Holy Spirit. Those who are led by the Spirit in them God’s power flows and setting themselves apart they live according to the mind of children of God.

In the Gospel we read about the mandate of Jesus where Lord Jesus says to the disciples, “All authority in heaven and on earth has been given to me. Go therefore and make disciples of all nations, baptizing them in the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit.” Before going Jesus manifest the name of the Holy Trinity.

The feast of Holy Trinity is a beautiful opportunity to know about triune God and to pray to Him, but to understand the mystery or concept fully is out of our brain. Three persons in one God- to understand this mystery many scholars tried to understand through various examples but none of them have explained the depth of it in a concrete manner.

The feast of Holy Trinity teaches us the lesson of unity. As the Father, Son and the Holy Spirit are three different persons but they are united as one. As Lord Jesus says I am in the Father and Father is in me similarly Holy Spirit is also in the Father and the Son and they in the Holy Spirit that is to say they three are one. By the grace of today’s feast we also may remain one in God as Lord Jesus wants for us, “that they may be one, as you, Father, are in me and I am in you, may they also be in us.” Amen!



मनन-चिंतन -2


आज माता कलीसिया परम पवित्र त्रित्व का महापर्व मनाती है। कलीसिया की शिक्षायें हमें बताती हैं कि हमारे विश्वास का आधार ही पवित्र त्रित्व है। पवित्र त्रित्व के बारे में हमारा ज्ञान पवित्र धर्मग्रन्थ में वर्णित बातों पर आधारित है। हमारी धर्मशिक्षा में भी हमें सिखाया जाता है कि हमारे धर्म की चार बड़ी सच्चाइयों में से एक यह भी है कि केवल एक ईश्वर है और एक ईश्वर में तीन जन हैं- पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। इस परम सच्चाई के बारे में यह भी सच है कि पवित्र त्रित्व के इस रहस्य को समझना टेढ़ी खीर है अर्थात् इसे समझना बहुत मुश्किल है, क्योंकि माता कलीसिया हमें सिखाती है कि तीनों एक ही ईश्वर हैं और तीनों सिर्फ एक ही नहीं बल्कि पूर्ण रूप से एक दूसरे से भिन्न व अलग-अलग जन हैं।

मनुष्य की सृष्टि ईश्वर ने की है। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान एवं सर्वत्र है। वहीं दूसरी ओर मनुष्य का ज्ञान, शक्ति और क्षमता सीमित है। इस सीमित क्षमता के साथ उस असीम ईश्वर व सृष्टिकर्ता के रहस्य को पूर्ण रूप से समझना असम्भव है। पवित्र त्रित्व के रहस्य को समझने की कठिनाई के बारे में सन्त अगस्टीन की लोकप्रिय कहानी प्रचलित हैः सन्त अगस्टीन पवित्र त्रित्व के रहस्य को समझने के लिए तीस वर्षों तक अध्ययन करते रहे। एक बार वे समुन्द्र के किनारे इसी रहस्य को समझने के लिये मनन-चिन्तन में व्यस्त थे कि तभी उनकी नज़र एक छोटे बालक पर पड़ी जो समुन्द्र के किनारे पर एक छोटा सा गड्ढा बनाकर एक सीप के माध्यम से उस गड्ढे को भरने का प्रयास कर रहा था। सन्त अगस्टीन ने जब उससे पूछा कि वह क्या करना चाहता है तो बालक ने उत्तर दिया कि वह उस समुन्द्र के पूरे जल को उस छोटे से गड्ढे में भरना चाहता है। सन्त अगस्टीन को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे सम्भव है, इतना विशाल सागर उस छोटे से गड्ढे में कैसे समा सकता है। उस बालक ने उत्तर दिया कि तुम भी तो वही कर रहे हो, सर्वशक्तिमान ईश्वर के रहस्य को अपने छोटे से सीमित ज्ञान से समझने का प्रयास कर रहे हो। और यह बताकर वह बालक अन्तर्ध्यान हो गया।

पवित्र बाईबिल का अध्ययन करने पर हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तीनों जन - पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अलग-अलग हैं और अलग-अलग समय पर सक्रिय हैं। पुराने व्यवस्थान में सिर्फ पिता ईश्वर ही कार्य करते हुए दिखाई देते हैं। चाहे वह सृष्टि की रचना हो, इब्राहीम का बुलावा हो, या मिश्र की दासता से इस्रायलियों को बाहर निकालने का कार्य हो, अथवा नबियों को भेजकर लोगों को सही मार्ग पर लाने का कार्य हो। ऐसा प्र्रतीत होता है कि पुराने व्यवस्थान का युग पिता ईश्वर का युग है और पुत्र और पवित्र आत्मा कहीं स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते। उसी तरह चारों सुसमाचारों में हम मुख्य रूप से प्रभु येसु के बारे में पढते और सुनते हैं। हालांकि पिता और पवित्र आत्मा भी यदा-कदा दिखाई देते हैं। वहीं सुसमाचारों के बाद की पुस्तकों में हमें मुख्य रूप से पवित्र आत्मा की भूमिका दिखाई देती है। लेकिन सत्य तो यह है कि तीनों जन एक साथ, एक समान रूप से सदैव सक्रिय हैं। क्योंकि वे एक ही हैं, अलग नहीं हैं। जब प्रभु येसु क्रूस पर मरकर दुनिया को मुक्ति प्रदान करते हैं तो इसमें वे अकेले नहीं, बल्कि तीनों जन एक साथ हैं।

जब पिता ईश्वर इस दुनिया की रचना करते हैं तो हमें तीनों के दर्शन होते हैं। ’’... अथाह गर्त पर अन्धकार छाया हुआ था और ईश्वर का आत्मा सागर पर विचरता था।’’ (उत्पत्ति ग्रन्थ 1:2) आत्मा भी प्रारम्भ से विद्यमान था। सन्त योहन के सुसमाचार के प्रारम्भ में हम पढते हैं- ’’आदि में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था, और शब्द ईश्वर था।’’ (योहन 1:1) आगे पढते हैं कि सब कुछ शब्द के द्वारा ही उत्पन्न हुआ। यानि कि सृष्टि के पहले कार्य से ही हर कार्य में वे एक साथ हैं। प्रभु येसु के मिशन के प्रारम्भ में भी हम तीनों को एक साथ देखते हैं। मत्ती 3:16-17 में हम पढते हैं कि बपतिस्मा के समय पवित्र आत्मा कपोत के रूप में उन पर उतरा और स्वर्ग से पिता ईश्वर की वाणी सुनाई दी, ’’यह मेरा प्रिय पुत्र है...।’’ बल्कि प्रभु येसु के हर कार्य में पवित्र आत्मा उनके साथ था। प्रभु येसु पिता का कार्य करते थे (देखें योहन 4:34) “मेरे पिता का कार्य करना ही मेरा भोजन है”। लूकस 4:18 में लिखा है - ’’प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है...।’’ पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा तीनों अलग होते हुए भी एक हैं और एक होते हुए भी अलग हैं।

पवित्र त्रित्व हमारे विश्वास का आधार है। हम पवित्र त्रित्व के नाम में ही बपतिस्मा ग्रहण कर ईश्वर की सन्तान व कलीसिया के सदस्य बनते हैं। पवित्र त्रित्व के ही नाम से हमारे सब कार्य प्रारम्भ और पूर्णता तक पहुँचते हैं। हमारी सारी प्रार्थनायें भी इसी पवित्र त्रित्व के नाम से प्रारम्भ होती हैं। आइये आज के इस पावन पर्व के अवसर पर हम प्रण लें कि पवित्र त्रित्व को हम अपने ख्रिस्तीय जीवन का आधार बनायेंगे और अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान देंगे। जिस तरह पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सदैव एक रहकर कार्य करते हैं उसी तरह हमारे परिवारों के सभी सदस्य सदा एक बने रहें। आमेन।


✍ फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)

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शनिवार, 29 मई, 2021 वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

 

शनिवार, 29 मई, 2021

वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह


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पहला पाठ : प्रवक्ता ग्रन्थ 51:12-20



12) तू अपने पर भरोसा रखने वालों की रक्षा करता और उन्हें उनके शत्रुओं के पंजे से छुड़ाता है।

13) मैंने पृथ्वी पर से प्रभु की दुहाई दी और मृत्यु से रक्षा की प्रार्थन की।

14) मैने कहा, "प्रभु! तू मेरा पिता है! घमण्डी शत्रुओं के सामने, मुझे विपत्ति के दिन, असहाय नहीं छोड़।

15) मैं निरन्तर तेरा नाम धन्य कहूँगा, मैं धन्यवाद के गीत गाता रहूँगा।" मेरी प्रार्थना सुनी गयी,

16) क्योंकि तूने मुझे विनाश से बचाया और विपत्ति से मेरा उद्धार किया।

17) इस कारण मैं तेरा धन्यवाद और तेरी स्तुति करूँगा, मैं प्रभु का नाम धन्य कहूँगा।

18) अपनी यात्राएँ प्रारम्भ करने से पहले मैं युवावस्था में आग्रह के साथ प्रज्ञा के लिए प्रार्थना करता था।

19) मैं मन्दिर के प्रांगण में उसके लिए अनुरोध करता था और अन्त तक उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहूँगा। वह फलते-फूलते हुए अंगूर की तरह मुझ में विकसित हो कर

20) मुझे आनन्दित करती रही। मैं सीधे मार्ग पर आगे बढ़ता गया और बचपन से ही प्रज्ञा का अनुगामी बना।



सुसमाचार : मारकुस 11:27-33



27) वे फिर येरूसालेम आये। जब ईसा मन्दिर में टहल रहे थे, तो महायाजक, शास्त्री और नेता उनेक पास आ कर बोले,

28) “आप किस अधिकार से यह सब कर रहे हैं? किसने आप को यह सब करने का अधिकार दिया?“

29) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं भी आप लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। यदि आप मुझे इसका उत्तर देंगे, तो मैं भी आप को बता दूँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।

30) बताइए, योहन का बपतिस्मा स्वर्ग का था अथवा मनुष्यों का?"

31) वे यह कहते हुए आपस में परामर्श करते थे- “यदि हम कहें, ’स्वर्ग का’, तो वह कहेंगे, ’तब आप लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया’।

32) यदि हम कहें, “मनुष्यों का, तो....।“ वे जनता से डरते थे। क्योंकि सब योहन को नबी मानते थे।

33) इसलिए उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, “हम नहीं जानते"। इस पर ईसा ने उन से कहा,“ तब मैं भी आप लोगों को नहीं बताऊँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ"।



📚 मनन-चिंतन



‘‘आप किस अधिकार से यह सब कर रहे हैं? किसने आप को यह सब करने का अधिकार दिया?’’ यह प्रश्न महायाजक, शास्त्री और नेताओं के द्वारा उस घटना के बाद पूॅंछा गया जब येसु ने मंदिर में बेचने और खरीदने वालों को बाहर कर दिया था। उस समय के अनुसार मंदिर और उसमें होने वाली गतिविधियों में महायाजक, शास्त्रियों और नेताओं का अधिकार होता था, वे वहॉं के कर्ता-धर्ता होते थे।

येसु द्वारा मंदिर में किये गये कार्य के लिए वे उनसे पॅूंछते है कि किस अधिकार के साथ यह सब किया। इस सवाल का जवाब देने के लिए येसु उनसे प्रश्न पूॅंछते है, ’योहन का बपतिस्मा स्वर्ग का था अथवा मनुष्यों का?’ उनके जवाब नहीं देने के कारण येसु उनसे कहते है, ’तब मै भी नहीं बताऊॅंगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हॅंू’।

इस पूरी घटना में हमें प्रभु येसु के अधिकार के विषय में मनन चिंतन करने का अवसर मिलता है। प्रभु येसु का अधिकार इस संसार से नहीं परंतु पिता ईश्वर से है। येसु मत्ती 28ः18 में कहते है, ’’मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है।’’ योहन 3ः31,33ब-35 कहता है, ‘‘जो ऊपर से आता है, वह सर्वोपरि है। जो पृथ्वी का है, वह पृथ्वी की बातें बोलता है। जो स्वर्ग से आता है, वह सर्वोपरि है। जिसे ईश्वर ने भेजा है, वह ईश्वर के ही शब्द बोलता है; क्योंकि ईश्वर उसे प्रचुर मात्रा में पवित्र आत्मा प्रदान करता है। पिता पुत्र को प्यार करता है औरउसने उसके हाथ सब कुछ दे दिया है।’’ इन वचनों से हमें पता चलता है कि येसु का सभी पर अधिकार है तथा जिसने येसु को भेजा है उन्हीं के द्वारा येसु को अधिकार भी प्राप्त है।

प्रभु येसु ने जो किया पूर्ण अधिकार के साथ किया जो उन्हें पिता से प्राप्त था। और उसी अधिकार के साथ वे अपने शिष्यों को इस संसार में भेजते है। आईये हम प्रार्थना करें कि जो अधिकार हमें येसु से मिला है इस संसार में ईश्वर की योजना को पूर्ण करने हेतु हम उसे पहचाने और उसी अनुसार कार्य करें। आमेन!



📚 REFLECTION



“By what authority are you doing these things? Who gave you this authority to do them?” This question was asked by the chief priest, scribes and the elders after the incident of chasing the buyers and sellers from the Temple by Jesus. According to that time chief priest, scribes and elders had the authority over the temple and the activities happening in the temple, they were the whole doer.

They ask Jesus’ authority over the things he did in the temple. Answering to the question Jesus asks them a question, ‘Did the baptism of John come from heaven, or was it of human origin? When they were not able to answer Jesus tells them, ‘Neither will I tell you by what authority I am doing these things.

In this whole incident we get an opportunity to meditate upon the authority of Jesus. The Authority of Jesus is not from this world but from the Father Almighty. Mt 28:18 says, “All authority in heaven and on earth has been given to me.” John 3:31, 34-35 says, “The one who comes from above is above all; the one who is of the earth belongs to the earth and speaks about earthly things. The one who comes from heaven is above all. He whom God has sent speaks the words of God, for he gives the Spirit without measure. The Father loves the Son and has placed all things in his hands.” Through these words of God we come to know that Jesus have authority over everything and the One who has send Jesus, from Him only he received the authority also.

Whatever Jesus did, he did with full authority which he received from the Father. And with that authority he sends his disciples to the world. Let’s pray that the authority what we have received from Jesus in order to fulfill God’s plan, we may able to recognize it and act according to it. Amen!


✍ -Br Biniush Topno



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शुक्रवार, 28 मई, 2021 वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 28 मई, 2021

वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : प्रवक्ता ग्रन्थ 44:1,9-13



1) हम पीढ़ियों के क्रमानुसार अपने लब्ध प्रतिष्ठ पूर्वजों का गुणगान करें।

9) कुछ लोगों की स्मृति शेष नहीं रही। वे इस प्रकार लुप्त हो गये हैं, मानो कभी थे ही नहीं। वे इस प्रकार चले गये हैं, मानो उनका कभी जन्म नहीं हुआ और उनकी सन्तति की भी यही दशा है।

10) जिन लोगों के उपकार नहीं भुलाये गये हैं, उनके नाम यहाँ दिये जायेंगे।

11) उन्होनें जो सम्पत्ति छोड़ी है, वह उनके वंशजों में निहित है।

12) उनके वंशज आज्ञाओें का पालन करते हैं

13) और उनके कारण उनकी सन्तति भी। उनका वंश सदा बना रहेगा और उनकी कीर्ति कभी नहीं मिटेगी।



सुसमाचार : मारकुस 11:11-26



11) ईसा ने येरूसालेम पहुँच कर मन्दिर में प्रवेश किया। वहाँ सब कुछ अच्छी तरह देख कर वह अपने शिष्यों के साथ बेथानिया चले गये, क्योंकि सन्ध्या हो चली थी।

12) दूसरे दिन जब वे बेथानिया से आ रहे थे, तो ईसा को भूख लगी।

13) वे कुछ दूरी पर एक पत्तेदार अंजीर का पेड़ देख कर उसके पास गये कि शायद उस पर कुछ फल मिलें; किन्तु पास आने पर उन्होंने पत्तों के सिवा और कुछ नहीं पाया, क्योंकि वह अंजीर का मौसम नहीं था।

14) ईसा ने पेड़ से कहा, "फिर कभी कोई तेरे फल न खाये"। उनके शिष्यों ने उन्हें यह कहते सुना।

15) वे येरूसालेम पहुँचे। मन्दिर में प्रवेश कर ईसा वहाँ से बेचने और ख़रीदने वालों को बाहर निकालने लगे। उन्होंने सराफ़ों की मेज़ें और कबूतर बेचने वालों की चैकियाँ उलट दीं

16) और वे किसी को भी घड़ा लिये मन्दिर से हो कर आने-जाने नहीं देते थे।

17) उन्होंने, लोगों को शिक्षा देते हुए कहा, "क्या यह नहीं लिखा है- मेरा घर सब राष्ट्रों के लिए प्रार्थना का घर कहलायेगा; परन्तु तुम लोगों ने उसे लुटेरों का अड्डा बनाया है"।

18) महायाजकों तथा शास्त्रियों को इसका पता चला और वे ईसा के सर्वनाश का उपाय ढूँढ़ते रहे। वे उन से डरते थे, क्योंकि लोग मन्त्रमुग्ध हो कर उनकी शिक्षा सुनते थे।

19) सन्ध्या हो जाने पर वे शहर के बाहर चले जाते थे।

20) प्रातः जब वे उधर से आ रहे थे, तो शिष्यों ने देखा कि अंजीर का वह पेड़ जड़ से सूख गया है।

21) पेत्रुस को वह बात याद आयी और उसने कहा, "गुरुवर! देखिए, अंजीर का वह पेड़, जिसे आपने शाप दिया था, सूख गया है"।

22) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "ईश्वर में विश्वास करो।

23) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - यदि कोई इस पहाड़ से यह कहे, ’उठ, समुद्र में गिर जा’ , और मन में सन्देह न करे, बल्कि यह विश्वास करे कि मैं जो कह रहा हूँ, वह पूरा होगा, तो उसके लिए वैसा ही हो जायेगा।

24) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ - तुम जो कुछ प्रार्थना में माँगते हो, विश्वास करो कि वह तुम्हें मिल गया है और वह तुम्हें दिया जायेगा।

25) "जब तुम प्रार्थना के लिए खड़े हो और तुम्हें किसी से कोई शिकायत हो, तो क्षमा कर दो,

26) जिससे तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा कर दे।"


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार को जब हम ध्यान से समझेंगे तो हमे पता चलेगा कि आज के सुसमाचार के अंश में तीन भाग हैः पहला- अंजीर पेड़ और येसु के बीच संवाद, दूसरा- येरूसालेम मंदिर में येसु द्वारा बेचने और खरीददारों को बाहर निकालना और तीसरा- विश्वास के विषय में शिक्षा।

पहले घटना में प्रभु येसु अंजीर के पेड़ से फल न मिलने के कारण कहते है, ’फिर कभी कोई तेरे फल न खायें’। प्रभु फल की आशा के साथ उस अंजीर के पेड़ के पास गये जो पत्तेदार था यह सोच कर कि जिसमें पत्ते लगें है उसमें फल भी जरूर होगा, अक्सर अंजीर के पेड़ मंे पतझड़ के बाद जब पत्ते आ जाते है तब उसमें फल के अंकुर भी आ जाते है। जब येसु को वह नही मिला तो वह नाखुश हो जाते है। प्रभु हममें भी न केवल पत्ते परंतु फल भी देखना चाहते हैं। वह चाहते है कि हम न केवल बातें करें परंतु अपने जीवन में फल भी उत्पन्न करें।

दूसरी घटना में प्रभु येसु येरुसालेम मंदिर से बेचने और खरीददारों को बहार निकाल देतें है। प्रभु का मंदिर एक पवित्र जगह है जहॉं पर आराधना, प्रार्थना तथा बलि चढ़ायी जाती है। ऐसे पवित्र स्थान को कारोबार के लिए इस्तेमाल करना वहॉं पर हो रहें पवित्रता के कार्यो की अवहेलना है। हमें हर हालत में मंदिर की गरिमा और पवित्रता को बनाये रखना चाहिए।

तीसरी घटना में प्रभु येसु विश्वास का महत्व शिष्यों को समझाते है और कहते है, ‘तुम जो कुछ प्रार्थना में मॉंगते हो, विश्वास करों कि वह तुम्हें मिल गया है और वह तुम्हें दिया जायेगा’। हमारी प्रार्थनाआंे में विश्वास का होना बहुत जरूरी है।

आईये हम प्रार्थना करें कि हम अपने जीवन में फल उत्पन्न करें, गिरजाघरों और अपने शरीर रूपी मंदिर को पवित्र बनाये रखें तथा हमेंशा विश्वास के साथ प्रार्थना करें। आमेन!



📚 REFLECTION



When we will understand today’s gospel carefully then we will know that today’s gospel passage has got three parts: First- The conversation between fig tree and Jesus, Second- Jesus driving out sellers and buyers in the Jerusalem Temple and Third- Teaching about faith.

In First incident because of not receiving fruit from the fig trees Jesus says, ‘May no one ever eat fruit from you again.’ Lord Jesus went to the fig tree which was with leaves hoping to get the fruit from it thinking that if leaves are there then there will be fruit also. Usually after the leaf shed when leaves come in the fig tree then the bud of fruit also comes. When Jesus did not get that then he was sad. Lord doesn’t only want leaves in us but also the fruit. He wants that we not only talk about but bear fruits in our lives.

In Second incident Lord Jesus chases away the buyers and sellers from the Jerusalem temple. God’ temple is a holy place where prayer and worship and sacrifice are being done. Using Like this holy place for business is a disregard to the sacred work that is going on there. With all means we need to keep up the dignity and holiness of the Temple.

In the Third incident Lord Jesus make the disciples to understand the importance of faith and says, ‘Whatever you ask for in prayer, believe that you have received it, and it will be yours’. Faith is very necessary to have in our prayers.

Let’s pray that we may always bear fruit in our lives, keep holy the churches and our bodies which are like temple and always pray with faith. Amen!

✍ -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 27 मई, 2021 वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

गुरुवार, 27 मई, 2021

वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : प्रवक्ता ग्रन्थ 42:15-25


15) अब मैं प्रभु के कार्यों का स्मरण करूँगा। मैंने जो देखा है, उसका बखान करूँगा। प्रभु ने अपने शब्द द्वारा अपने कार्य सम्पन्न किये और अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय किया।

16) सूर्य सब कुछ आलोकित करता है समस्त सृष्टि प्रभु की महिमा से परिपूर्ण है।

17) स्वर्गदूतों को भी यह सामर्थ्य नहीं मिला है कि वे उन सब महान् कार्यो का बखान करें, जिन्हें सर्वशक्तिमान् प्रभु ने सुस्थिर कर दिया है, जिससे विश्वमण्डल उसकी महिमा पर आधारित हो।

18) वह समुद्र और मानव हृदय की थाह लेता और उनके सभी रहस्य जानता है;

19) क्योंकि सर्वोच्च प्रभु सर्वज्ञ है और भविष्य भी उस से छिपा हुआ नहीं। वह भूत और भविष्य, दोनो को प्रकाश में लाता और गूढ़तम रहस्यों को प्रकट करता है।

20) वह हमारे सभी विचार जानता है, एक शब्द भी उस से छिपा नहीं रहता।

21) उसकी प्रज्ञा के कार्य सुव्यवस्थित हैं; क्योंकि वह अनादि और अनन्त है। उस में न तो कोई वृद्धि है।

22) और न कोई ह्रास और उसे किसी परामर्शदाता की आवश्यकता नहीं।

23) उसकी सृष्टि कितनी रमणीय है! हम उसकी झलक मात्र देख पाते हैं।

24) उसके समस्त कार्य अनुप्रमाणित और चिरस्थायी हैं; उसने जो कुछ बनाया है, वह उसका उद्देश्य पूरा करता है।

25) सब चीजें दो-दो प्रकार की होती हैं, एक दूसरी से ठीक विपरीत। उसने कुछ भी व्यर्थ नहीं बनाया।


सुसमाचार : मारकुस 10:46-52


46) वे येरीख़ो पहुँचे। जब ईसा अपने शिष्यों तथा एक विशाल जनसमूह के साथ येरीख़ो से निकल रहे थे, तो तिमेउस का बेटा बरतिमेउस, एक अन्धा भिखारी, सड़क के किनारे बैठा हुआ था।

47) जब उसे पता चला कि यह ईसा नाज़री हैं, तो वह पुकार-पुकार कर कहने लगा, "ईसा, दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए"!

48) बहुत-से लोग उसे चुप करने के लिए डाँटते थे; किन्तु वह और भी जोर से पुकारता रहा, "दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए"।

49) ईसा ने रुक कर कहा, "उसे बुलाओ"। लोगों ने यह कहते हुए अन्धे को बुलाया, "ढ़ारस रखो। उठो! वे तुम्हें बुला रहे हैं।"

50) वह अपनी चादर फेंक कर उछल पड़ा और ईसा के पास आया।

51) ईसा ने उस से पूछा, "क्या चाहते हो? मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?" अन्धे ने उत्तर दिया, "गुरुवर! मैं फिर देख सकूँ"।

52) ईसा ने कहा, "जाओ, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है"। उसी क्षण उसकी दृष्टि लौट आयी और वह मार्ग में ईसा के पीछे हो लिया।


📚 मनन-चिंतन


विश्वास हमारे लिए वह उपहार है जिसके जरिये हम अपने जीवन में चमत्कार देख सकते हैं। बाईबिल एक विश्वास की कहानी है जो हमें प्रभु में विश्वास करने के लिए मदद करती है। बाईबिल में कई ऐसी घटनाओं का विवरण है जहॉं पर विश्वास के कारण चिन्ह् और चमत्कार प्रकट होते है। प्रभु येसु मत्ती 17ः20 में कहते है, ’’यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो और तुम इस पहाड़ से यह कहो, ’यहॉं से वहॉं तक हट जा,’ तो यह हट जायेगा; और तुम्हारे लिए कुछ भी असम्भव नहीं होगा।’’ जो प्रभु में विश्वास करते है उनके लिए सबकुछ सम्भव है।

आज के सुसमाचार में जो चमत्कार का विवरण है उसकी नीव भी विश्वास ही है जहॉं पर प्रभु येसु उस अन्धे भिखारी, बरतिमेउस से कहते है, ’’जाओ, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है’’। जब विश्वास हमारे जीवन में एक सुनहरा उपहार है तो हम विश्वास में डगमगा क्यों जाते हैं? इसका उत्तर यह है कि जब कभी हम अपनी दृष्टि या अपना भरोसा येसु से छोड़कर दुनियाई चीज़ों में लगाते है तब हम विश्वास में कमजोर होते जाते है, जिस प्रकार पेत्रुस जब तक येसु में दृष्टि लगाये हुए था वह पानी में चल रहा था परंतु जब वह जैसे ही अपनी दृष्टि येसु से हटाकर लहरों पर डालता है तो वह डूबने लगता है।

आईये हम प्रभु येसु में दृष्टि लगाये रखें जिससे हमारा विश्वास मजबूत बना रहें और अपने जीवन में प्रभु के उपकारों और चमत्कारों को प्रकट होते देख सकें। आमेन!



📚 REFLECTION



Faith is that gift with which we can see wonders happening in our lives. Bible is the story of faith which helps us to believe in Jesus. In the Bible there are so many accounts where signs and wonders happened due to faith. Lord Jesus says in Mt 17:20, “For truly I tell you, if you have faith the size of a mustard seed, you will say to this mountain, ‘Move from here to there,’ and it will move; and nothing will be impossible for you.” Those who believe in God everything is possible for them.

In today’s gospel where the description of miracle is given has also faith as its foundation where Lord Jesus says to the blind beggar Bartimaeus, “Go, your faith has made you well”. When faith is a golden gift for us then why do we waver in our faith? The only reason for this is that whenever we put our eyes or trust from Jesus to worldly things then we become weak in faith, as Peter until when he put his eyes on Jesus, he was walking on the water but as soon as he put his eyes from Jesus to the strong wind he began to sink.

Let’s put our eyes on Jesus so that our faith may remain strong and we may see many signs and wonders of God in our lives. Amen!


✍ -Br Biniush Topno


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बुधवार, 26 मई, 2021 वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 26 मई, 2021

वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : प्रवक्ता ग्रन्थ 36:1,4-5, 10-

17

1) सर्वेश्वर प्रभु! हम पर दया कर, हमें अपनी करुणा की ज्योति दिखा।

4) जिस तरह तूने उनके सामने हम पर अपनी पवित्रता को प्रदर्शित किया, उसी तरह उन में अपनी महिमा को हमारे सामने प्रदर्शित कर।

5) प्रभु! वे तुझे उसी प्रकार जान जायें, जिस प्रकार हम जान गये कि तेरे सिवा और कोई ईश्वर नहीं।

10) विलम्ब न कर, निश्चित समय याद कर, जिससे लोग तेरे महान् कार्यों का बखान करें।

11) जो भागना चाहे, वह आग में भस्म हो जाये और जो लोग तेरी प्रजा पर अत्याचार करते हैं, उनका सर्वनाश हो।

12) विरोधी शासकों का सिर तोड़ डाला, जो कहते हैं, "हमारे बराबर कोई नहीं"।

13) समस्त याकूबवंशियों को एकत्र कर, उन्हें पहले की तरह उनकी विरासत लौटा।

14) प्रभु! उस प्रजा पर दया कर, जो तेरी कहलाती है, इस्राएल पर, जिसे तूने अपना पहलौठा माना है।

15) अपने पवित्र नगर, अपने निवासस्थान येरूसालेम पर दया कर।

16) अपने स्तुतिगान से सियोन को भर दे और अपनी महिमा से अपने मन्दिर को।

17) अपनी पहली कृति का समर्थन कर और अपने नाम पर घोषित भविष्य वाणियाँ पूरी कर।



सुसमाचार : मारकुस 10:32-45



32) वे येरूसालेम के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। ईसा शिष्यों के आगे-आगे चलते थे। शिष्य बहुत घबराये हुए थे और पीछे आने वाले लोग भयभीत थे। ईसा बारहों को फिर अलग ले जा कर उन्हें बताने लगे कि मुझ पर क्या-क्या बीतेगी,

33) "देखो, हम येरूसालेम जा रहे हैं। मानव पुत्र महायाजकों और शास्त्रियों के हवाले कर दिया जायेगा। वे उसे प्राणदण्ड की आज्ञा सुना कर गै़र-यहूदियों के हवाले कर देंगे,

34) उसका उपहास करेंगे, उस पर थूकेंगे, उसे कोड़े लगायेंगे और मार डालेंगे; लेकिन तीसरे दिन वह जी उठेगा।"

35) ज़ेबेदी के पुत्र याकूब और योहन ईसा के पास आ कर बोले, "गुरुवर ! हमारी एक प्रार्थना है। आप उसे पूरा करें।"

36) ईसा ने उत्तर दिया, "क्या चाहते हो? मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?"

37) उन्होंने कहा, "अपने राज्य की महिमा में हम दोनों को अपने साथ बैठने दीजिए- एक को अपने दायें और एक को अपने बायें"।

38) ईसा ने उन से कहा, "तुम नहीं जानते कि क्या माँग रहे हो। जो प्याला मुझे पीना है, क्या तुम उसे पी सकते हो और जो बपतिस्मा मुझे लेना है, क्या तुम उसे ले सकते हो?"

39) उन्होंने उत्तर दिया, "हम यह कर सकते हैं"। इस पर ईसा ने कहा, "जो प्याला मुझे पीना है, उसे तुम पियोगे और जो बपतिस्मा मुझे लेना है, उसे तुम लोगे;

40) किन्तु तुम्हें अपने दायें या बायें बैठने देने का अधिकार मेरा नहीं हैं। वे स्थान उन लोगों के लिए हैं, जिनके लिए वे तैयार किये गये हैं।"

41) जब दस प्रेरितों को यह मालूम हुआ, तो वे याकूब और योहन पर क्रुद्ध हो गये।

42) ईसा ने उन्हें अपने पास बुला कर कहा, "तुम जानते हो कि जो संसार के अधिपति माने जाते हैं, वे अपनी प्रजा पर निरंकुश शासन करते हैं और सत्ताधारी लोगों पर अधिकार जताते हैं।

43) तुम में ऐसी बात नहीं होगी। जो तुम लोगों में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने

44) और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह सब का दास बने;

45) क्योंकि मानव पुत्र भी अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने और बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है।"


📚 मनन-चिंतन


’’मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूॅ।’’(मत्ती 11:29) प्रभु का यह वचन केवल शाब्दिक ही नहीं परंतु व्यवहारिक भी था। उन्होने अपने विनम्रता का प्रमाण शिष्यों के पैरों को धो कर दिया और से भी अधिक अपने ईश्वरीय महिमा को छोड़ इस संसार में एक साधारण मनुष्य के रूप में जीना उनके विनम्रता का सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

प्रभु ने कभी भी अपने को बड़ा नहीं समझा और इस कथन को वे अपने शिष्यों को शिक्षा के रूप में देते है कि, ‘‘जो तुम लोगों में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह सब का दास बने’’ यह शिक्षा प्रभु येसु तब देते है जब जेबेदी के पुत्र याकुब और योहन येसु के पास आकर उनके राज्य में दाये और बायें बैठने का कृपा मॉंगते है। प्रभु येसु उनके सांसारिक मन को जान जाते है वे जानते थे कि वे ईश्वर के राज्य को इस संसार के अनुसार समझ रहें थे जहॉं राजा और उनका राज्य होता है, सेना और सेनापति होते है इसलिए वे चाह रहे थे कि इस संसार में वे येसु के राज्य में दाये और बायें बैठने का वरदान मिलें।

प्रभु येसु उन्हे इस सांसारिक राजाओं और उनके शासन में होने वाली चीजों के बारे में अवगत कराते हुए कहते है कि तुममें ऐसी बात नहंी होगी। प्रभु शिष्यों में लोगो पर शासन करने वाला व्यक्ति नहीं परंतु विनम्रता से लोगों की सेवा करने वाला व्यक्ति के रूप में देखना चाहते थे। यह जीवन में हमें जो भी पद या अधिकार मिला है- एक परिवार में या समाज में, कार्यालय में या कलीसिया में, यह एक अवसर है प्रभु येसु के अनुयायी सिद्ध होने का जब हम विनम्रता पूर्वक अपनी सेवाएॅं देते है न कि अपने अहम् पर हावी होकर निरंकुश शासन करने का या सत्ताधारी लोगो पर अधिकार जताने का।

आईये हम प्रार्थना करें कि हम दिन प्रतिदिन विनम्र सेवा में आगे बढ़े। आमेन!



📚 REFLECTION


“I am gentle and humble in heart” (Mt 11:29). These words of Jesus were not merely words but it was very practical in his life. He demonstrated his humility by washing the feet of the disciples and more than that leaving the divine glory and living like a simple human person on this earth was the greatest example of his humility.

Lord Jesus never showed himself a great person and this statement he taught the disciples as a teaching that, “whoever wishes to become great among you must be your servant, and whoever wishes to be first among you must be slave of all.” This teaching was given by Jesus when James and John, the sons of Zebedee came to Jesus for asking the favour to sit on the right and left in his kingdom. Lord Jesus knew the worldly mind in them. He knew that they were thinking the Kingdom of God according to this world, where there is King and his kingdom, commanders and army that is why they were seeking to sit on the right and left in this world when Jesus kingdom will be established.

Lord Jesus making them aware of the things that happens in the worldly king and in their regime, tells them that it should not so happen among you. Lord Jesus wanted to see them not as a person ruling over the people but as a person serving the people. In this life whatever post or power we have received- whether in the family or in the society, in the office or in the Church, this is an opportunity to proof ourselves to be Jesus’ followers by giving our service to the people and not to be overcome by the ego and lord it over them or be tyrants over them.

Lets’ pray that day by day we may grow in humble service. Amen!


✍ -Br Biniush Topno



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मंगलवार, 25 मई, 2021 वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 25 मई, 2021

वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : प्रवक्ता ग्रन्थ 35:1-12


1) संहिता के अनुसार आचरण बहुत-सी बलियों के बराबर है।

2 (2-3) जो आज्ञाओें का पालन करता है, वह शांति का बलिदान चढ़ाता है।

4) परोपकार अन्न-बलि लगाने के बराबर है। जो भिक्षादान करता है, वह धन्यवाद का बलिदान चढ़ाता है।

5) बुराई का त्याग प्रभु को प्रिय होता है और अधर्म से दूर रहना प्रायश्चित के बलिदान के बराबर है।

6) फिर भी खाली हाथ प्रभु के सामने मत जाओ,

7) क्योंकि ये सब बलिदान आदेश के अनुकूल हैं।

8) धर्मी का चढ़ावा वेदी की शोभा बढ़ाता है और उसकी सुगन्ध सर्वोच्च ईश्वर तक पहुँचती है।

9) धर्मी का बलिदान सुग्राहय होता है, उसकी स्मृति सदा बनी रहेगी।

10) उदारतापूर्वक प्रभु की स्तुति करते रहो। प्रथम फलों के चढ़ावे में कमी मत करो।

11) प्रसन्नमुख हो कर दान चढ़ाया करो और खुशी से दशमांश देा।

12) जिस प्रकार सर्वोच्च ईश्वर ने तुम्हें दिया है, उसकी प्रकार तुम भी उसे सामर्थ्य के अनुसार उदारतापूर्वक दो;


सुसमाचार : मारकुस 10:28-31



28) तब पेत्रुस ने यह कहा, "देखिए, हम लोग अपना सब कुछ छोड़ कर आपके अनुयायी बन गये हैं।"

29) ईसा ने कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ - ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिए घर, भाई-बहनों, माता-पिता, बाल-बच्चों अथवा खेतों को छोड़ दिया हो

30) और जो अब, इस लोक में, सौ गुना न पाये- घर, भाई-बहनें, माताएँ, बाल-बच्चे और खेत, साथ-ही-साथ अत्याचार और परलोक में अनन्त जीवन।

31) बहुत-से लोग जो अगले हैं, पिछले हो जायेंगे और जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे।"



📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु का अनुयायी बनना एक सुखद अनुभव है। 2000 वर्षों से बहुत लोगों ने येसु और उनकी शिक्षाओं को जाना और प्रभु का अनुसरण करते हुए प्रभु के अनुयायी बनें। इसकी शुरुआत येसु के शिष्यों के द्वारा होती है जो सब कुछ छोड़ कर प्रभु येसु के पीछे हो लेते है।

आज का सुसमाचार उन सभी लोगों के लिए एक जीवनदायी वचन है जो प्रभु के अनुयायी है या प्रभु का अनुयायी बनना चाहते है। जब येसु के शिष्य प्रभु के पीछे हो लिये थे तब उनका जीवन अनिश्चिततओं से भरा हुआ था। उन्हें नहीं मालूम था कि आगे जा कर क्या होगा? इस दुविधा के कारण पेत्रुस उन सभी शिष्यांे की ओर से प्रश्न करते है, ’’देखिए, हम लोग अपना सब कुछ छोड़ कर आपके अनुयायी बन गये हैं।’’ प्रभु येसु इस प्रश्न का उत्तर देते हुए न केवल उन शिष्यों को आश्वासन देते है परंतु उन सभी को भी जो आगे चल कर प्रभु के अनुयायी बनने वाले है। येसु कहते है जिन्होने सुसमाचार के लिए जो कुछ छोड़ा है वे इस लोक में सौ गुना पायेंगे और परलोक में अनन्त जीवन पायेंगे। यह वचन एक सशक्त वचन है जो येसु के सभी अनुयायियांे की दुविधा को दूर करता है और उनमें साहस प्रदान करता है कि वे प्रभु के पथ से न भटकें।

आईये हम आज के वचन की महत्ता को समझकर यहीं प्रार्थना करें कि जितनें भी अनुयायी है उन्हें यह वचन हमेंशा आगे बढ़ने में मदद करें तथा अधिक से अधिक लोग प्रभु के अनुयायी बनने के लिए आगे आयें। आमेन!



📚 REFLECTION



To become the follower of Jesus is a pleasant experience. Since 2000 years many have recognized Jesus and his teachings and became the followers of Jesus. This all starts with the disciples who left everything and followed him.

Today’s gospel passage is lifegiving words to all those who are the followers of Jesus or who want to be Jesus’ followers. When the disciples of Jesus start following Jesus their life was full of uncertainities. They did not know that what will happen in future? Because of this anxiety Peter on the behalf of the disciples asks, “Look, we have left everything and followed you.” Lord Jesus answering to this question gives assurance not only to his disciples but also to those who will be his followers in future. Jesus says to them whoever has left everything for his sake and for the sake of the good news they will receive a hundredfold now in this age and eternal life in the age to come. These words are powerful words which remove the confusion of the followers of Jesus and fill them with courage so that they may not waver from the path of Jesus.

Understanding the importance of today’s words let’s pray that how many the followers are there these words may help them always to go ahead and many more may come forward to become his followers. Amen.


✍ -Br Biniush Topno



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सोमवार, 24 मई, 2021 माता मरियम, कलिसिया की माता

 

सोमवार, 24 मई, 2021

माता मरियम, कलिसिया की माता

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पहला पाठ : उत्पत्ति 3:9-15



9) प्रभु-ईश्वर ने आदम से पुकार कर कहा, ''तुम कहाँ हो?''

10) उसने उत्तर दिया, ''मैं बगीचे में तेरी आवाज सुन कर डर गया, क्योंकि में नंगा हूँ और मैं छिप गया''।

11) प्रभु ने कहा, ''किसने तुम्हें बताया कि तुम नंगे हो? क्या तुमने उस वृक्ष का फल खाया, जिस को खाने से मैंने तुम्हें मना किया था?''

12) मनुष्य ने उत्तर दिया, ''मेरे साथ रहने कि लिए जिस स्त्री को तूने दिया, उसी ने मुझे फल दिया और मैंने खा लिया''।

13) प्रभु-ईश्वर ने स्त्री से कहा, ''तुमने क्या किया है?'' और उसने उत्तर दिया, ''साँप ने मुझे बहका दिया और मैंने खा लिया''।

14) तब ईश्वर ने साँप से कहा, ''चूँकि तूने यह किया है, तू सब घरेलू तथा जंगली जानवरों में शापित होगा। तू पेट के बल चलेगा और जीवन भर मिट्टी खायेगा।

15) मैं तेरे और स्त्री के बीच, तेरे वंश और उसके वंश में शत्रुता उत्पन्न करूँगा। वह तेरा सिर कुचल देगा और तू उसकी एड़ी काटेगा''।

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अथवा - पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:12-14



12) प्रेरित जैतून नामक पहाड़ से येरूसालेम लौटे। यह पहाड़ येरूसालेम के निकट, विश्राम-दिवस की यात्रा की दूरी पर है।

13) वहाँ पहुँच कर वे अटारी पर चढ़े, जहाँ वे ठहरे हुए थे। वे थे-पेत्रुस तथा योहन, याकूब तथा सिमोन, जो उत्साही कहलाता था और याकूब का पुत्र यूदस।

14) ये सब एकहृदय हो कर नारियों, ईसा की माता मरियम तथा उनके भाइयों के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे।



सुसमाचार : योहन 19:25-34



25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं।

26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, "भद्रे! यह आपका पुत्र है"।

27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, "यह तुम्हारी माता है"। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।

28) तब ईसा ने यह जान कर कि अब सब कुछ पूरा हो चुका है, धर्मग्रन्थ का लेख पूरा करने के उद्देश्य से कहा, "मैं प्यासा हूँ"।

29) वहाँ खट्ठी अंगूरी से भरा एक पात्र रखा हुआ था। लेागों ने उस में एक पनसोख्ता डुबाया और उसे जूफ़े की डण्डी पर रख कर ईसा के मुख से लगा दिया।

30) ईसा ने खट्ठी अंगूरी चखकर कहा, "सब पूरा हो चुका है"। और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिये।

31) वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन कू्रस पर रह जाये क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्यौहार पडता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड दी जाये और शव हटा दिये जायें।

32) इसलिये सैनिकेां ने आकर ईसा के साथ क्रूस पर चढाये हुये पहले व्यक्ति की टाँगें तोड दी, फिर दूसरे की।

33) जब उन्होंने ईसा के पास आकर देखा कि वह मर चुके हैं तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोडी;

34) लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।



📚 मनन-चिंतन



आज हमारे समक्ष मॉं मरियम का पर्व है जिसे हम माता मरियम, कलीसिया की माता के रूप में मनाते है। मॉं मरियम को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि वह येसु-ईश्वर की माता बन सकें। स्वर्गदूत गाब्रिएल मरियम के पास संदेश देेते है कि उनके द्वारा मुक्तिदाता का जन्म होगा। गाब्रिएल के उस कथन पर अपनी सहमति देने के बाद मरियम येसु की माता बनती है-येसु अर्थात् ईश्वर की माता। जब प्रभु येसु कू्रस पर थे तब येसु ने अपनी माता मरियम को हम सभी के लिए मॉं के रूप में दिया, यह सब उस कू्रस के पास हुआ जब येसु ने मॉं मरियम से कहा, ‘‘भद्रे! यह आपका पुत्र है’’ तथा संत योहन से कहा, ‘‘यह तुम्हारी माता है’’।

आज का पर्व हमें बताता है कि मॉ मरियम न केवल हमारी माता है परंतु कलीसिया की भी माता है। प्रभु येसु जो ‘शरीर अर्थात् कलीसिया के शीर्ष है’ (कलो. 1ः18) और हम सब मिलकर मसीह का शरीर हैं (1 कुरिंथ. 12ः27)। यदि मॉं मरियम शरीर के शीर्ष अर्थात् येसु की मॉं है तब वे कलीसिया रूपी शरीर के सभी अंगों की मॉं है। कलीसिया की स्थापना प्रभु येसु ने की तथा यह कलीसिया पेंतेकोस्त के दिन पवित्र आत्मा के आगमन से सामर्थ्य से भर गई। जिस दिन कलीसिया पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गई उस समय मॉं मरियम उस कलीसिया के साथ थी। इस हेतु हर साल पेंतेकोस्त के पर्व के दूसरे दिन ही हम कलीसिया की मॉं मरियम का पर्व मनाते है।

प्रभु येसु के स्वर्गारोहण के बाद मॉं मरियम ने कलीसिया को सहारा दिया और उस कलीसिया को उस महान शक्ति पवित्र आत्मा को ग्रहण करने के लिए प्रार्थना में संजोय रखा। मॉं मरियम का कलीसिया को सम्भालने, आगे बढ़ाने, प्रार्थना में समय बिताने में अहम् भूमिका रही है। इस हेतु भी मॉं मरियम कलीसिया की मॉं है।

आज जब हम यह पर्व को मनाते है तो हम मॉ मरियम से प्रार्थना करें कि वह सदा अपनी कलीसिया को अपने आश्रय में रखें और निरंतर प्रभु येसु के पथ चिन्हांे पर चलने में मदद करें। आमेन!



📚 REFLECTION



Today we have the feast of Mother Mary celebrated as Mary, the mother of the Church. It was the blessed fortune of Mother Mary to become the mother of Jesus. Angel Gabriel gave the message to Mary that through him the Saviour will be born. Giving the consent on the sayings of Gabriel Mary becomes the Mother of Jesus i.e Mother of God. When Jesus was crucified on the cross Jesus gave her mother to be our mother, all this happened near the cross when Jesus said to Mary, “Woman, here is your son” and to John he said, “Here is your mother.”

Today’s feast tells us that Mother Mary is not only our mother but also the Mother of the Church. Lord Jesus who is the ‘head of the body, the church’ (Col 1:18) and ‘we are the body of Christ and individually members of it’ (1Cor 12:27). If the Mother Mary is the mother of the head then she is the mother of body-the Church too. Church was established by Jesus and was empowered by the Holy Spirit on the day of Pentecost. When the Church was empowered by the Holy Spirt that time Mother Mary was with the Church. Due to this every year the feast of Mary the Mother of Church is being celebrated the next day to the feast of Pentecost.

After the Ascension of Lord Jesus Mother Mary gave the support to the Church and gathered the Church in prayer to receive the Holy Spirit. The role of Mother Mary in caring the, in the growth of the Church and leading the Church in prayer was eminent. For this reason too she is also the mother of the Church.

When we are celebrating today’s feast Let’s pray to Mother Mary that she may always keep the Church in her shelter and help continually to walk in the path of Jesus Christ. Amen!


✍ -Br Biniush Topno


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