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सोमवार, 24 मई, 2021 माता मरियम, कलिसिया की माता

 

सोमवार, 24 मई, 2021

माता मरियम, कलिसिया की माता

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पहला पाठ : उत्पत्ति 3:9-15



9) प्रभु-ईश्वर ने आदम से पुकार कर कहा, ''तुम कहाँ हो?''

10) उसने उत्तर दिया, ''मैं बगीचे में तेरी आवाज सुन कर डर गया, क्योंकि में नंगा हूँ और मैं छिप गया''।

11) प्रभु ने कहा, ''किसने तुम्हें बताया कि तुम नंगे हो? क्या तुमने उस वृक्ष का फल खाया, जिस को खाने से मैंने तुम्हें मना किया था?''

12) मनुष्य ने उत्तर दिया, ''मेरे साथ रहने कि लिए जिस स्त्री को तूने दिया, उसी ने मुझे फल दिया और मैंने खा लिया''।

13) प्रभु-ईश्वर ने स्त्री से कहा, ''तुमने क्या किया है?'' और उसने उत्तर दिया, ''साँप ने मुझे बहका दिया और मैंने खा लिया''।

14) तब ईश्वर ने साँप से कहा, ''चूँकि तूने यह किया है, तू सब घरेलू तथा जंगली जानवरों में शापित होगा। तू पेट के बल चलेगा और जीवन भर मिट्टी खायेगा।

15) मैं तेरे और स्त्री के बीच, तेरे वंश और उसके वंश में शत्रुता उत्पन्न करूँगा। वह तेरा सिर कुचल देगा और तू उसकी एड़ी काटेगा''।

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अथवा - पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:12-14



12) प्रेरित जैतून नामक पहाड़ से येरूसालेम लौटे। यह पहाड़ येरूसालेम के निकट, विश्राम-दिवस की यात्रा की दूरी पर है।

13) वहाँ पहुँच कर वे अटारी पर चढ़े, जहाँ वे ठहरे हुए थे। वे थे-पेत्रुस तथा योहन, याकूब तथा सिमोन, जो उत्साही कहलाता था और याकूब का पुत्र यूदस।

14) ये सब एकहृदय हो कर नारियों, ईसा की माता मरियम तथा उनके भाइयों के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे।



सुसमाचार : योहन 19:25-34



25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं।

26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, "भद्रे! यह आपका पुत्र है"।

27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, "यह तुम्हारी माता है"। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।

28) तब ईसा ने यह जान कर कि अब सब कुछ पूरा हो चुका है, धर्मग्रन्थ का लेख पूरा करने के उद्देश्य से कहा, "मैं प्यासा हूँ"।

29) वहाँ खट्ठी अंगूरी से भरा एक पात्र रखा हुआ था। लेागों ने उस में एक पनसोख्ता डुबाया और उसे जूफ़े की डण्डी पर रख कर ईसा के मुख से लगा दिया।

30) ईसा ने खट्ठी अंगूरी चखकर कहा, "सब पूरा हो चुका है"। और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिये।

31) वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन कू्रस पर रह जाये क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्यौहार पडता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड दी जाये और शव हटा दिये जायें।

32) इसलिये सैनिकेां ने आकर ईसा के साथ क्रूस पर चढाये हुये पहले व्यक्ति की टाँगें तोड दी, फिर दूसरे की।

33) जब उन्होंने ईसा के पास आकर देखा कि वह मर चुके हैं तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोडी;

34) लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।



📚 मनन-चिंतन



आज हमारे समक्ष मॉं मरियम का पर्व है जिसे हम माता मरियम, कलीसिया की माता के रूप में मनाते है। मॉं मरियम को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि वह येसु-ईश्वर की माता बन सकें। स्वर्गदूत गाब्रिएल मरियम के पास संदेश देेते है कि उनके द्वारा मुक्तिदाता का जन्म होगा। गाब्रिएल के उस कथन पर अपनी सहमति देने के बाद मरियम येसु की माता बनती है-येसु अर्थात् ईश्वर की माता। जब प्रभु येसु कू्रस पर थे तब येसु ने अपनी माता मरियम को हम सभी के लिए मॉं के रूप में दिया, यह सब उस कू्रस के पास हुआ जब येसु ने मॉं मरियम से कहा, ‘‘भद्रे! यह आपका पुत्र है’’ तथा संत योहन से कहा, ‘‘यह तुम्हारी माता है’’।

आज का पर्व हमें बताता है कि मॉ मरियम न केवल हमारी माता है परंतु कलीसिया की भी माता है। प्रभु येसु जो ‘शरीर अर्थात् कलीसिया के शीर्ष है’ (कलो. 1ः18) और हम सब मिलकर मसीह का शरीर हैं (1 कुरिंथ. 12ः27)। यदि मॉं मरियम शरीर के शीर्ष अर्थात् येसु की मॉं है तब वे कलीसिया रूपी शरीर के सभी अंगों की मॉं है। कलीसिया की स्थापना प्रभु येसु ने की तथा यह कलीसिया पेंतेकोस्त के दिन पवित्र आत्मा के आगमन से सामर्थ्य से भर गई। जिस दिन कलीसिया पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गई उस समय मॉं मरियम उस कलीसिया के साथ थी। इस हेतु हर साल पेंतेकोस्त के पर्व के दूसरे दिन ही हम कलीसिया की मॉं मरियम का पर्व मनाते है।

प्रभु येसु के स्वर्गारोहण के बाद मॉं मरियम ने कलीसिया को सहारा दिया और उस कलीसिया को उस महान शक्ति पवित्र आत्मा को ग्रहण करने के लिए प्रार्थना में संजोय रखा। मॉं मरियम का कलीसिया को सम्भालने, आगे बढ़ाने, प्रार्थना में समय बिताने में अहम् भूमिका रही है। इस हेतु भी मॉं मरियम कलीसिया की मॉं है।

आज जब हम यह पर्व को मनाते है तो हम मॉ मरियम से प्रार्थना करें कि वह सदा अपनी कलीसिया को अपने आश्रय में रखें और निरंतर प्रभु येसु के पथ चिन्हांे पर चलने में मदद करें। आमेन!



📚 REFLECTION



Today we have the feast of Mother Mary celebrated as Mary, the mother of the Church. It was the blessed fortune of Mother Mary to become the mother of Jesus. Angel Gabriel gave the message to Mary that through him the Saviour will be born. Giving the consent on the sayings of Gabriel Mary becomes the Mother of Jesus i.e Mother of God. When Jesus was crucified on the cross Jesus gave her mother to be our mother, all this happened near the cross when Jesus said to Mary, “Woman, here is your son” and to John he said, “Here is your mother.”

Today’s feast tells us that Mother Mary is not only our mother but also the Mother of the Church. Lord Jesus who is the ‘head of the body, the church’ (Col 1:18) and ‘we are the body of Christ and individually members of it’ (1Cor 12:27). If the Mother Mary is the mother of the head then she is the mother of body-the Church too. Church was established by Jesus and was empowered by the Holy Spirit on the day of Pentecost. When the Church was empowered by the Holy Spirt that time Mother Mary was with the Church. Due to this every year the feast of Mary the Mother of Church is being celebrated the next day to the feast of Pentecost.

After the Ascension of Lord Jesus Mother Mary gave the support to the Church and gathered the Church in prayer to receive the Holy Spirit. The role of Mother Mary in caring the, in the growth of the Church and leading the Church in prayer was eminent. For this reason too she is also the mother of the Church.

When we are celebrating today’s feast Let’s pray to Mother Mary that she may always keep the Church in her shelter and help continually to walk in the path of Jesus Christ. Amen!


 -Br Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन इतवार, 23 मई, 2021 पेंतेकोस्त का पर्व

 

इतवार, 23 मई, 2021

पेंतेकोस्त का पर्व

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 2:1-11



1) जब पेंतेकोस्त का दिन आया और सब शिष्य एक स्थान पर इकट्ठे थे,

2) तो अचानक आँधी-जैसी आवाज आकाश से सुनाई पड़ी और सारा घर, जहाँ वे बैठे हुए थे, गूँज उठा।

3) उन्हें एक प्रकार की आग दिखाई पड़ी जो जीभों में विभाजित होकर उन में से हर एक के ऊपर आ कर ठहर गयी।

4) वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त वरदान के अनुसार भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलने लगे।

5) पृथ्वी भर के सब राष्ट्रों से आये हुए धर्मी यहूदी उस समय येरुसालेम में रहते थे।

6) बहुत-से लोग वह आवाज सुन कर एकत्र हो गये। वे विस्मित थे, क्योंकि हर एक अपनी-अपनी भाषा में शिष्यों को बोेलते सुन रहा था।

7) वे बड़े अचम्भे में पड़ गये और चकित हो कर बोल उठे, ’’क्या ये बोलने वाले सब-के-सब गलीली नहीं है?

8) तो फिर हम में हर एक अपनी-अपनी जन्मभूमि की भाषा कैसे सुन रहा है?

9) पारथी, मेदी और एलामीती; मेसोपोतामिया, यहूदिया और कम्पादुनिया, पोंतुस और एशिया,

10 फ्रुगिया और पप्फुलिया, मिश्र और कुरेने के निकवर्ती लिबिया के निवासी, रोम के यहूदी तथा दीक्षार्थी प्रवासी,

11) क्रेत और अरब के निवासी-हम सब अपनी-अपनी भाषा में इन्हें ईश्वर के महान् कार्यों का बख़ान करते सुन रहे हैं।’’



दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 12:3-7, 12-13



3) इसलिए मैं आप लोगों को बता देता हूँ कि कोई ईश्वर के आत्मा से प्रेरित हो कर यह नहीं कहता, "ईसा शापित हो" और कोई पवित्र आत्मा की प्रेरणा के बिना यह नहीं कह सकता, "ईसा ही प्रभु है"।

4) कृपादान तो नाना प्रकार के होते हैं, किन्तु आत्मा एक ही है।

5) सेवाएँ तो नाना प्रकार की होती हैं, किन्तु प्रभु एक ही हैं।

6) प्रभावशाली कार्य तो नाना प्रकार के होते हैं, किन्तु एक ही ईश्वर द्वारा सबों में सब कार्य सम्पन्न होते हैं।

7) वह प्रत्येक को वरदान देता है, जिससे वह सबों के हित के लिए पवित्र आत्मा को प्रकट करे।

12) मनुष्य का शरीर एक है, यद्यपि उसके बहुत-से अंग होते हैं और सभी अंग, अनेक होते हुए भी, एक ही शरीर बन जाते हैं। मसीह के विषय में भी यही बात है।

13) हम यहूदी हों या यूनानी, दास हों या स्वतन्त्र, हम सब-के-सब एक ही आत्मा का बपतिस्मा ग्रहण कर एक ही शरीर बन गये हैं। हम सबों को एक ही आत्मा का पान कराया गया है।



सुसमाचार : योहन 20:19-23



19) उसी दिन, अर्थात सप्ताह के प्रथम दिन, संध्या समय जब शिष्य यहूदियों के भय से द्वार बंद किये एकत्र थे, ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, "तुम्हें शांति मिले!"

20) और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, "तुम्हें शांति मिले!

21) जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ।"

22) इन शब्दों के बाद ईसा ने उन पर फूँक कर कहा, "पवित्र आत्मा को ग्रहण करो!

23) तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे, वे अपने पापों से मुक्त हो जायेंगे और जिन लोगों के पाप क्षमा नहीं करोगे, वे अपने पापों से बँधे रहेंगे।



📚 मनन-चिंतन



सही और गलत इस जिंदगी के दो ऐसे पहलु है जिससे हर कोई वाकिफ है। हर कोई जानता है कि क्या सही है और क्या गलत। धूम्रपान करने वाला व्यक्ति जानता है कि धूम्रपान उसके शरीर के लिए हानिकारक है फिर भी वह धूम्रपान करता है। चोरी करने वाला व्यक्ति जानता है कि चोरी करना गलत है फिर भी वह चोरी करता है। क्रोध, ईर्ष्या, लालच एक व्यक्ति के लिए हानिकारक है फिर भी वे न चाहते हुए भी क्रोध, ईर्ष्या या लालच करते है। हमारे जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि हम सही इंसान बनना चाहते है परंतु हम बन नही पाते। इसका क्या कारण है? इसका एक ही कारण है कि हमारे जीवन में पवित्र आत्मा क्रियाशील नहीं है। हम जितना भी अपने बल शक्ति बुद्धि से अपने आप को बदलना चाहे तो हम नहीं बदल सकते। हमारे परिवर्तन में केवल हमारा सहायक पवित्र आत्मा ही मदद कर सकता है। पवित्र आत्मा ही वह ईश्वर है जो हमारे जीवन को अंदर से बदल सकता है। प्रभु येसु जानते थे कि हम अपने आप से बदलाव नहीं कर पायेंगे इसलिए प्रभु येसु ने वह सहायक प्रदान करने की प्रतिज्ञा की थी।

पेंतेकोस्त का पर्व जिसे आज हम सम्पूर्ण कलीसिया के साथ मना रहें है, उस पवित्र आत्मा के आगमन का पर्व है जहॉं पर पवित्र आत्मा उन शिष्यों पर उतरा और उनके जीवन को बदल कर रख दिया। जो शिष्य डर से छिपे हुए थे वे अब निडर हो कर लोगों के समक्ष येसु ख्रीस्त का साक्ष्य निडर हो कर दे रहें थे। जो अपना जीवन बचाना चाहते थे वे अब येसु के लिए मरने के लिए भी तैयार थे।

हमारे इस जीवन में सबसे ज्यादा जरूरत धन दौलत, यश, बुद्धि या प्रतिभा की नहीं परंतु सबसे ज्यादा जरूरत हमें पवित्र आत्मा की है, इसका महत्व प्रभु येसु हमें लूकस 11ः13 में बताते है, ‘‘बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीजें देते हो, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता मॉंगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा?’’ प्रभु येसु अप्रत्यक्ष रूप से यह बताना चाह रहें थें कि हमें पिता ईश्वर से क्या मॉगने की जरूरत है। हमारे जीवन के हर समस्या का समाधान पवित्र आत्मा है। जिसके भीतर पवित्र आत्मा क्रियाशील है उसके जीवन में आनंद ही आनंद है और वे इस संसार से परे हो जाते है, इस संसार के दुख पीड़ा खुशी, चिंता से ऊपर उठ कर ऊपर ही बाते सोचते है।

बपतिस्मा संस्कार में हम सभी को पवित्र आत्मा मिलता है तथा ढृढ़ीकरण संस्कार में हमें पूर्ण रूप से पवित्र आत्मा फल, उपहार और वरदान के साथ प्राप्त होता है। तब सवाल उठता है कि जब हमें पवित्र आत्मा प्राप्त है तो हम इस दुनिया में हताश और निराश क्यों है? इसका एक ही कारण है और वह यह है कि हमने अब तक पवित्र आत्मा को अपने जीवन में कार्य करने नहीं दिया, हमने उसे क्रियाशील होने नहीं दिया।

संत पौलुस गलातियों के नाम पत्र में हमें बहुत अच्छी तरह से समझाते है कि, ‘‘शरीर तो आत्मा के विरुद्ध इच्छा करता है और आत्मा शरीर के विरुद्ध। ये दोनो एक दूसरे के विरोधी है। इसलिए आप जो चाहते हैं, वही नहीं कर पाते हैं’’(गला 5ः17)। हमारे मन में दो आवाजें आती है एक है आत्मा का और दूसरा है हमारे शरीर का। यदि हम शरीर की आवाज़ सुनेंगे तो हम शरीर को तृप्त करने वाले कार्य करेंगे और हम शरीरिक अर्थात् संासारिकता में ही सिमट कर रह जायेंगे; परंतु हम पवित्र आत्मा की आवाज़ सुनकर उसके अनुसार कार्य करते जायेंगे तो हम पवित्र होते जायेंगे और हमारे जीवन में पवित्र आत्मा कार्य करता रहेगा।

इस संसार में श्रेष्ठ या उत्तम जीवन पवित्र आत्मा से भरा जीवन जीना है क्योकि शारीरिक जीवन जीना आसान है और इसे तो हर कोई जी रहा है। हमारे जीवन की सफलता हमारे नाम, शौहरत या धन दौलत से बिताया हुआ जीवन नहीं अपितु पवित्र आत्मा से बिताया हुआ जीवन है।

आईये आज के दिन जब सारी कलीसिया पवित्र आत्मा के आगमन पेंतेकोस्त का पर्व मना रही है हम प्रभुु से यही प्रार्थना करें कि संसार भर में सभी निरंतर पवित्र आत्मा की आवाज़ सुनकर अपने जीवन में आगे बढ़े जिससे हमारे जीवन में पवित्र आत्मा क्रियाशील हो जाये और हमारा जीवन परिवर्तन हो जायें। आमेन!



📚 REFLECTION



Right and wrong or good and bad are the two dimesions of this life of which everyone is well aware of. Everyone knows what is good and what is bad, what is right and what is wrong. One who smokes he knows that smoking is injurious to his health but still he smokes. Thieves know that stealing is wrong but still they steal. Anger, jealousy, greed is harmful for any person but still many become angry, jealousy and greedy even if they are not willing. This happens in our lives very often that we want to be good human being but we fail to be. What is the reason behind it? The only reason for this is that Holy Spirit is not active in our lives. With whatever efforts, strength, power, intelligent of ours we use to change ourselves, we will not be able to change ourselves by our own. For the change in us only our helper the Holy Spirit can help us. Holy Spirit is the Triune God who can transform us from within. Lord Jesus knew that we will not be able to change ourselves by our own that is why Lord Jesus has promised to send the Holy Spirit.

The feast of Pentecost which we are celebrating along with the whole churh is the feast of coming of the Holy Spirit where Holy Spirit descended on the apostles and transformed their lives. Those disciples who were hiding in fear were now giving the witness to Jesus with boldness in front of all. Those who wanted to save their lives were now ready to die for Jesus.

In this life the most needed thing is not wealth, fame, intelligence or talent but it is the Holy Spirit which we need the most. The importance of this is told by Jesus in Luke 11:13, “If you then, who are evil, know how to give good gifts to your children, how much more will the heavenly Father give the Holy Spirit to those who ask him!” Lord Jesus wants to tell indirectly that what we need to ask from the Father Almighty. Every solution to the problems of our lives is Holy Spirit. In those whom Holy Spirit is active, their lives are full of joy and they are set apart from this world; they rise above pain, sorrows, happiness, worry and aspire for the things that are above.

We receive the Holy Spirit during the sacrament of Baptism and during the sacrament of confirmation we receive the Holy Spirit in full dimension with the fruits, gifts and charisms. Then the question arises when we have already received the Holy Spirit then why we are frustrated and disappointed in this world? The only reason for this is that we have not allowed the Holy Spirit to work in our lives, we did not allow him to be activated in our lives.

St. Paul explains us very well in the letter to the Galatians that, “For what the flesh desiresis opposed to the Spirit, and what the Spirit desires is opposed to the flesh; for these ae opposed to each other, to prevent you from doing what you want” (Gal 5:17). We hear the two voices in our hearts; one is the voice of the Spirit and another is the voice of the flesh. If we listen to the voice of the flesh then we will try to gratify the desires of the flesh and we will restrict ourselves to the flesh and worldliness; but if we listen to the voice of the Holy Spirit and do accordingly then slowly slowly we will become holy and Holy Spirit will start working in our lives.

The best life to live in this world is to live in the Holy Spirit because the worldly life is easy to live and many are living this life. The success of our life is not the life lived with name, fame, or wealth but it is the life lived in Holy Spirit.v

Along with the whole church which is celebrating the coming of the Holy Spirit the feast of Pentecost, let’s pray to God that all may listen to the voice of the Holy Spirit and go forward sot that Holy Spirit may become active in our lives and our lives may be a transformed one. Amen!



 -Br Biniush Topno



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शनिवार, 22 मई, 2021 पास्का का सातवाँ सप्ताह

 

शनिवार, 22 मई, 2021

पास्का का सातवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 28:16-20, 30-31


16) जब हम रोम पहुँचे, तो पौलुस को यह अनुमति मिली की वह पहरा देने वाले सैनिक के साथ जहाँ चाहे, रह सकता है।

17) तीन दिन बाद पौलुस ने प्रमुख यहूदियों को अपने पास बुलाया और उनके एकत्र हो जाने पर उन से कहा, भाइयो! मैंने न तो राष्ट्र के विरुद्ध कोई अपराध किया और न पूर्वजों की प्रथाओं के विरुद्ध, फिर भी मुझे बन्दी बनाया और येरुसालेम में रोमियों के हवाले कर दिया गया है।

18) वे सुनवाई के बाद मुझे रिहा करना चाहते थे, क्योंकि मैंने प्राणदण्ड के योग्य कोई अपराध नहीं किया था।

19) किंतु जब यहूदी इसका विरोध करने लगे, तो मुझे कैसर से अपील करनी पड़ी, यद्यपि मुझे अपने राष्ट्र पर कोई अभियोग नहीं लगाना था।

20) इसलिए मैंने आप लोगों से मिलने और बातें करने का निवेदन किया, क्योंकि इस्राएल की आशा के कारण मैं जंजीर पहने हूँ।’’

30) पौलुस पूरे दो वर्षों तक अपने किराये के मकान में रहा। वह सभी मिलने वालों का स्वागत करता था।

31) और आत्मविश्वास के साथ निर्विघ्न रूप से ईश्वर के राज्य का सन्देश सुनाता और प्रभु ईसा मसीह के विषय में शिक्षा देता था।


सुसमाचार : योहन 21:20-25


20) पेत्रुस ने मुड़ कर उस शिष्य को पीछे पीछे आते देखा जिसे ईसा प्यार करते थे और जिसने व्यारी के समय उनकी छाती पर झुक कर पूछा था, ’प्रभु! वह कौन है, जो आप को पकड़वायेगा?’

21) पेत्रुस ने उसे देखकर ईसा से पूछा, ’’प्रभ! इनका क्या होगा?’’

22) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’यदि मैं चाहता हूँ कि यह मेरे आने तक रह जाये तो इस से तुम्हें क्या? तुम मेरा अनुसरण करो।’’

23) इन शब्दों के कारण भाइयों में यह अफ़वाह फैल गयी कि वह शिष्य नहीं मरेगा। परन्तु ईसा ने यह नहीं कहा कि यह नहीं मरेगा; बल्कि यह कि ’यदि मैं चाहता हूँ कि यह मेरे आने तक रह जाये, तो इस से तुम्हें क्या?’

24) यह वही शिष्य है, जो इन बातों का साक्ष्य देता है और जिसने यह लिखा है। हम जानते हैं कि उसका साक्ष्य सत्य है।

25) ईसा ने और भी बहुत से कार्य किये। यदि एक-एक कर उनका वर्णन किया जाता तो मैं समझता हूँ कि जो पुस्तकें लिखी जाती, वे संसार भर में भी नहीं समा पातीं।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार के अंश में हम संत योहन के सुसमाचार के अंतिम पदों को पाते है जहॉं पर येसु संत योहन के विषय में पेत्रुस को बताते है तथा साथ ही साथ हमें यह पता चलता है कि संत योहन ने अपने सुसमाचार में प्रभु के कार्यो का विवरण तो दिया है परंतु सभी कार्यो का विवरण नहीं दिया क्योंकि वह इतने अधिक है कि इस पुस्तक में समा नहीं पाती।

संत योहन का सुसमाचार चारों सुसमाचार के बीच में अलग पहचान बना के रखता है। संत योहन अपने सुसमाचार में गहरी से गहरी रहस्यों को हमारे समक्ष प्रकट करते है।

प्रभु येसु संत योहन के विषय में कहते है, ‘‘यदि मैं चाहता हॅूं कि यह मेरे आने तक रह जाये तो इससे तुम्हें क्या?’’ आगे चलकर इतिहास हमें बताता है कि उन बारह शिष्यों में सभी को शहादत मिली सिवाय एक शिष्य के और वे शिष्य है संत योहन।

प्रभु के जीवन को और उनके कार्यो को हमारे समक्ष रखने में संत योहन का बहुत बड़ा योगदान रहा है। संत योहन प्रभु येसु के प्रिय शिष्य थे और उन्होने प्रभु येसु के अद्भुत कार्यों, चमत्कारों, घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शन किया है और वहीं चीज़ों को संत योहन साक्ष्य के रूप में हमारे सामने प्रकट करते है।

आईये हम प्रार्थना करें कि संत योहन के सुसमाचार द्वारा बहुतो का उद्धार हो और बहुत से लोग विश्वासी बनें। आमेन!


📚 REFLECTION


In today’s gospel passage we see the last verses of St. John’s gospel where Jesus tells about John to Peter and at the same time we come to know that though John have given the account of Lord’s work but he did not gave the account of all the works because they were so much that the book itself will not be able to contain it.

St. John’s gospel sets a separate recognition among the four gospels. St. John reveals in front of us the deepest mysteries in his gospel.

Jesus tells about John that, “If it is my will that he remain until I come, what is that to you? Later history tells us that among the twelve disciples eleven of them receive the martyrdom except one and that disciple is St. John.

St. John had made a great contribution to us by keeping before us the life of Jesus and his works. St. John was the beloved disciple of Jesus and He saw the wonderful works, miracles and events of Lord Jesus and the same thing he put in front of us as a witness.

Let’s pray that many may receive salvation through St. John’s gospel and many may become believers. Amen!



 -Br. Biniush Topno


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शुक्रवार, 21 मई, 2021 पास्का का सातवाँ सप्ताह

 

शुक्रवार, 21 मई, 2021

पास्का का सातवाँ सप्ताह



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 25:13-21



13) कुछ दिनों बाद राजा अग्रिप्पा और बेरनिस कैसरिया पहुँचे और फेस्तुस का अभिवादन करने आये।

14) वे वहाँ कई दिन रहे और इस बीच फ़ेस्तुस ने पौलुस का मामला राजा के सामने प्रस्तुत करते हुए कहा, ’’फेलिक्स यहाँ एक व्यक्ति को बन्दीगृह में छोड़ गया है।

15) जब मैं येरुसालेम में था, तो महायाजकों तथा नेताओं ने उस पर अभियोग लगाया और अनुरोध किया कि उसे दण्डाज्ञा दी जाये।

16) मैंने उत्तर दिया, जब तक अभियुक्त को अभियोगियों के आमने-सामने न खड़ा किया जाये और उसे अभियोग के विषय में सफाई देने का अवसर न मिले, तब तक किसी को प्रसन्न करने के लिए अभियुक्त को उसके हवाले करना रोमियों की प्रथा नहीं है’।

17) इसलिए वे यहाँ आये और मैंने दूसरे ही दिन अदालत में बैठ कर उस व्यक्ति को बुला भेजा।

18) किंतु जिन अपराधों का मुझे अनुमान था, उनके विषय में उन्होंने उस पर कोई अभियोग नहीं लगाया।

19) उन्हें केवल अपने धर्म से सम्बन्धित कुछ बातों में उस से मतभेद था और ईसा नामक व्यक्ति के विषय में, जो मर चुका है, किन्तु पौलुस जिसके जीवित होने का दावा करता है।

20) मैं यह वाद-विवाद सुन कर असमंजस में पड़ गया। इसलिए मैंने पौलुस से पूछा कि क्या तुम येरुसालेम जाने को तैयार हो, जिससे वहाँ इन बातों के विषय में तुम्हारा न्याय किया जाये।

21) किन्तु पौलुस ने आवेदन किया कि सम्राट् का फैसला हो जाने तक उसे बन्दीगृह में रहने दिया जाये। इसलिए मैंने आदेश दिया कि जब तक मैं उसे कैसर के पास न भेजूँ, तब तक वह बन्दीगृह में रहे।’’



सुसमाचार : योहन 21:15-19



15) जलपान के बाद ईसा ने सिमोन पेत्रुस से कहा, ’’सिमोन योहन के पुत्र! क्या इनकी अपेक्षा तुम मुझे अधिक प्यार करते हो?’’ उसने उन्हें उत्तर दिया, ’’जी हाँ प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ’’। उन्होंने पेत्रुस से कहा, ’’मेरे मेमनों को चराओ’’।

16) ईसा ने दूसरी बार उस से कहा, ’’सिमोन, योहन के पुत्र! क्या तुम मुझे प्यार करते हो?’’ उसने उत्तर दिया, ’’जी हाँ प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ’’। उन्होंने पेत्रुस से कहा, ’’मेरी भेडों को चराओ’’।

17) ईसा ने तीसरी बार उस से कहा, ’’सिमोन योहन के पुत्र! क्या तुम मुझे प्यार करते हो?’’ पेत्रुस को इस से दुःख हुआ कि उन्होंने तीसरी बार उस से यह पूछा, ’क्या तुम मुझे प्यार करते हो’ और उसने ईसा से कहा, ’’प्रभु! आप को तो सब कुछ मालूम है। आप जानते हैं कि मैं आपको प्यार करता हूँ।“ ईसा ने उससे कहा, मेरी भेड़ों को चराओ”।

18) ’’मैं तुम से यह कहता हूँ- जवानी में तुम स्वयं अपनी कमर कस कर जहाँ चाहते थे, वहाँ घूमते फिरते थे; लेकिन बुढ़ापे में तुम अपने हाथ फैलाओगे और दूसरा व्यक्ति तुम्हारी कमर कस कर तुम्हें वहाँ ले जायेगा। जहाँ तुम जाना नहीं चाहते।’’

19) इन शब्दों से ईसा ने संकेत किया कि किस प्रकार की मृृत्यु से पेत्रुस द्वारा ईश्वर की महिमा का विस्तार होगा। ईसा ने अंत में पेत्रुस से कहा, ’’मेरा अनुसरण करो’’।



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बुधवार, 19 मई, 2021 पास्का का सातवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 19 मई, 2021

पास्का का सातवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 20:28-38



28) आप लोग अपने लिए और अपने सारे झुण्ड के लिए सावधान रहें। पवित्र आत्मा ने आप को झुण्ड की रखवाली का भार सौंपा है। आप प्रभु की कलीसिया के सच्चे चरवाहे बने रहें, जिसे उन्होंने अपना रक्त दे कर प्राप्त किया।

29) मैं जानता हूँ कि मेरे चले जाने के बाद खूंखार भेडि़ये आप लागों के बीच घुस आयेंगे, जो झुण्ड पर दया नहीं करेंगे।

30) आप लोगों में भी ऐसे लोग निकल आयेंगे, जो शिष्यों को भटका कर अपने अनुयायी बनाने के लिए भ्रान्तिपूर्ण बातों का प्रचार करेंगे।

31) इसलिए जागते रहें और याद रखें कि मैं आँसू बहा-बहा कर तीन वर्षों तक दिन-रात आप लागों में हर एक को सावधान करता रहा।

32) अब मैं आप लोगों को ईश्वर को सौंपता हूँ तथा उसकी अनुग्रहपूर्ण शिक्षा को, जो आपका निर्माण करने तथा सब सन्तों के साथ आप को विरासत दिलाने में समर्थ है।

33) मैंने कभी किसी की चाँदी, सोना अथवा वस्त्र नहीं चाहा।

34) आप लोग जानते हैं कि मैंने अपनी और अपने साथियों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए अपने इन हाथों से काम किया।

35) मैंने आप को दिखाया कि इस प्रकार परिश्रम करते हुए, हमें दुर्बलों की सहायता करनी और प्रभु ईसा का कथन स्मरण रखना चाहिए कि लेने की उपेक्षा देना अधिक सुखद है।"

36) इतना कह कर पौलुस ने उन सबों के साथ घुटने टेक कर प्रार्थना की।

37) सब फूट-फूट कर रोते और पौलुस को गले लगा कर चुम्बन करते थे।

38) उसने उन से यह कहा था कि वे फिर कभी उसे नहीं देखेंगे। इस से उन्हें सब से अधिक दुःख हुआ। इसके बाद वे उसे नाव तक छोड़ने आये।



सुसमाचार : योहन 17:11-19



परमपावन पिता! तूने जिन्हें मुझे सौंपा है, उन्हें अपने नाम के सामर्थ्य से सुरक्षित रख, जिससे वे हमारी ही तरह एक बने रहें।

12) तूने जिन्हें मुझे सौंपा है, जब तक मैं उनके साथ रहा, मैंने उन्हें तेरे नाम के सामर्थ्य से सुरक्षित रखा। मैंने उनकी रक्षा की। उनमें किसी का भी सर्वनाश नहीं हुआ है। विनाश का पुत्र इसका एक मात्र अपवाद है, क्योंकि धर्मग्रन्थ का पूरा हो जाना अनिवार्य था।

13) अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ। जब तक मैं संसार में हूँ, यह सब कह रहा हूँ जिससे उन्हें मेरा आनन्द पूर्ण रूप से प्राप्त हो।

14) मैंने उन्हें तेरी शिक्षा प्रदान की है। संसार ने उन से बैर किया, क्योंकि जिस तरह मैं संसार का नहीं हूँ उसी तरह वे भी संसार के नहीं हैं।

15) मैं यह नहीं माँगता कि तू उन्हें संसार से उठा ले, बल्कि यह कि तू उन्हें बुराई से बचा।

16) वे संसार के नहीं है जिस तरह मैं भी संसार का नहीं हूँ।

17) तू सत्य की सेवा में उन्हें समर्पित कर। तेरी शिक्षा ही सत्य है।

18) जिस तरह तूने मुझे संसार में भेजा है, उसी तरह मैंने भी उन्हें संसार में भेजा है।

19) मैं उनके लिये अपने को समर्पित करता हूँ, जिससे वे भी सत्य की सेवा में समर्पित हो जायें।



📚 मनन-चिंतन




आज का सुसमाचार प्रभु येसु के उस महापुरोहिताई प्रार्थना के अंश से लिया गया है जो प्रभु येसु इस संसार में अपनी अंतिम घटनाओं से पूर्व करते है। आज के उस प्रार्थना के अंश में हम पाते है कि येसु अपने उन शिष्यों के लिए विशेष प्रार्थना करते है जो उनके जाने के बाद इस संसार में ईश्वर के कार्यो को आगे बढ़ायेंगे।

जब तक शिष्य उनके साथ थे वे सुरक्षित थे, प्रभु येसु ईश्वर से शिष्यों के लिए प्रार्थना करते है कि ईश्वर उन्हे बुराई से बचा। और जिस प्रकार पिता ने पुत्र को इस संसार में भेजा, उसी प्रकार पुत्र ने शिष्यों को इस संसार में भेजा है और प्रभु येसु चाहते कि वे भी येसु के समान सत्य की सेवा में समर्पित हो जायें।

प्रभु येसु का अपने शिष्यों के लिए प्रार्थना करना हम सबको यह बताता है कि वे अपने शिष्यों से कितना प्रेम करते थे और एक भले चरवाहे के रूप में उनकी देखरेख करते थे। प्रभु येसु के बाद शिष्यों ने ईश्वर का सेवा कार्य पूरी लगन और ईमानदारी से सम्पन्न किया और जिस कार्य के लिए वे चुने गये थे उस कार्य को अपनी अंतिम सास तक पूर्ण किया। हम ईश्वर और उसकी योजनाओं के लिए धन्यवाद देते हुए उस कार्य को जारी रखने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें। आमेन!



📚 REFLECTION



Today’s gospel is taken from that part of high priestly prayer which Lord Jesus prayed before his last events in this world. In the part of that prayer today we find that Lord Jesus specially pray for the disciples who will carry forwad the work of God after him.

Till the time when the disciples were with him, he protected them. Lord Jesus prays for the disciples to God for their protection; and as the Son is being sent by the Father into the world, so also Son has sent them into the world and Lord Jesus wants that they also may be sanctified in truth.

Praying for the disciples by Jesus tells us that how much He loved the disciples and he took care of them like the good Shepherd. After Jesus the disciples carry forward the work of God with full dedication and honesty and for the work which they were being chosen they fulfilled it till their last breath. Thanking God and his plans let’s pray that the work of God may continue to go on. Amen!


 -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, 18 मई, 2021 पास्का का सातवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 18 मई, 2021

पास्का का सातवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 20:17-27



17) पौलुस ने मिलेतुस से एफ़ेसुस की कलीसिया के अध्यक्षों को बुला भेजा

18) और उनके पर उन से यह कहा, ’’आप लोग जानते हैं कि जब मैं पहले एहल एशिया पहुँचा, तो उस दिन से मेरा आचरण आपके बीच कैसा था।

19) यहूदियों के षड्यन्त्रों के कारण मुझ पर अनेक संकट आये, किन्तु मैं आँसू बहा कर बड़ी विनम्रता से प्रभु की करता रहा।

20) जो बातें आप लोगों के लिए हितकर थीं, उन्हें बताने में मैंने कभी संकोच नहीं किया, बल्कि मैं सब के सामने और घर-घर जा कर उनके सम्बन्ध में शिक्षा देता रहा।

21) मैं यहूदियों तथा यूनानियों, दोनों से अनुरोध करता रहा है कि वे ईश्वर की ओर अभिमुख हो जायें और हमारे प्रभु ईसा में विश्वास करें।

22) अब में आत्मा की प्रेरणा से विवश हो कर येरुसालेम जा रहा हूँ। वहाँ मुझ पर क्या बीतेगी, मैं यह नहीं जानता;

23) किन्तु पवित्र आत्मा नगर-नगर में मुझे विश्वास दिलाता है कि वहाँ बेडि़याँ और कष्ट मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

24) किन्तु मेरी दृष्टि में मेरे जीवन का कोई मूल्य नहीं। मैं तो केवल अपनी दौड़ समाप्त करना और ईश्वर की कृपा का सुसमाचार सुनाने का वह कार्य पूरा करना चाहता हूँ, जिसे प्रभु ईसा ने मुझे सौंपा।

25) ’’मैं आप लोगों के बीच राज्य का सन्देश सुनाता रहा। अब, मैं जानता हूँ कि आप में कोई भी मुझे फिर कभी नहीं देख पायेगा।

26) इसलिए मैं आज आप लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैं किसी के दुर्भाग्य का उत्तरदायी नहीं हूँ;

27) क्योंकि मैंने आप लोगों के लिए ईश्वर का विधान पूर्ण रूप से स्पष्ट करने में कुछ भी उठा नहीं रखा।



सुसमाचार : योहन 17:1-11अ



1) यह सब कहने के बाद ईसा अपनी आँखें उपर उठाकर बोले, ’’पिता! वह घडी आ गयी है। अपने पुत्र को महिमान्वित कर, जिससे पुत्र तेरी महिमा प्रकट करे।

2) तूने उसे समस्त मानव जाति पर अधिकार दिया है, जिससे वह उन सबों को अनन्त जीवन प्रदान करे, जिन्हें तूने उसे सौंपा है।

3) वे तुझे, एक ही सच्चे ईश्वर को और ईसा मसीह को, जिसे तूने भेजा है जान लें- यही अनन्त जीवन है।

4) जो कार्य तूने मुझे करने को दिया था वह मैंने पूरा किया है। इस तरह मैंने पृथ्वी पर तेरी महिमा प्रकट की है।

5) पिता! संसार की सृष्टि से पहले मुझे तेरे यहाँ जो महिमा प्राप्त थी, अब उस से मुझे विभूषित कर।

6) तूने जिन लोगो को संसार में से चुनकर मुझे सौंपा, उन पर मैने तेरा नाम प्रकट किया है। वे तेरे ही थे। तूने उन्हें मुझे सौंपा और उन्होंने तेरी शिक्षा का पालन किया है।

7) अब वे जान गये हैं कि तूने मुझे जो कुछ दिया है वह सब तुझ से आता है।

8) तूने जो संदेश मुझे दिया, मैने वह सन्देश उन्हें दे दिया। वे उसे ग्रहण कर यह जान गये है कि मैं तेरे यहाँ से आया हूँ और उन्होंने यह विश्वास किया कि तूने मुझे भेजा।

9) मैं उनके लिये विनती करता हूँ। मैं ससार के लिये नहीं, बल्कि उनके लिये विनती करता हूँ, जिन्हें तूने मुझे सौंपा है; क्योंकि वे तेरे ही हैं।

10) जो कुछ मेरा है वह तेरा है और जो तेरा, वह मेरा है। मैं उनके द्वारा महिमान्वित हुआ।

11) अब मैं संसार में नहीं रहूँगा; परन्तु वे संसार में रहेंगे और मैं तेरे पास आ रहा हूँ।



📚 मनन-चिंतन



यदि हमें प्रभु येसु का इस संसार में आने का मक्सद को जानना है तो हमें संत योहन का सुसमाचार अध्याय 17 पढ़ना चाहिए जहॉं प्रभु येसु पिता ईश्वर से प्रार्थना करते हुए अपने ह्दय को खोल कर प्रस्तुत करते है। अध्याय 17 की प्रार्थना को प्रभु येसु की महापुरोहिताई प्रार्थना के रूप में भी जाना जाता है।

आज के सुसमाचार में हम अध्याय 17 के कुछ अंश पर मनन चिंतन करते है जो प्रभु येसु की महापुरोहिताई प्रार्थना में से लिया गया है। येसु इस प्रार्थना की शुरुआत ऑंखे उपर उठाकर करते है, ‘‘पिता! वह घड़ी आ गयी है। अपने पुत्र को महिमान्वित कर, जिससे पुत्र तेरी महिमा प्रकट करे।’’ इस प्रार्थना भरे वार्तालाप में प्रभु येसु उस घड़ी के विषय में बातचीत कर रहें जिसके लिए वे भेजे गये थे; अर्थात् दुखभोग, मरण एवं पुनरुत्थान। हम इस संसार में जीना चाहते है परंतु प्रभु येसु इस संसार में मरने के लिए आये जिससे हम सब पाप की दासता से मुक्त हो जायें।

प्रभु येसु आगे चल कर ईश्वर से कहते है कि जो कार्य पिता ने उन्हें सौपा था वह कार्य उन्होने पूरा कर लिया है। जिन लोगों को पिता ईश्वर ने संसार से चुनकर येसु के हाथों में सौपा था, उन पर येसु ने ईश्वर का रहस्य प्रकट किया और वे जान गये है कि येसु कौन है और येसु के जाने के बाद वे इस संसार में रहकर ईश्वर के कार्यो को आगे बढ़ायेंगे।

प्रभु येसु ने अपनी प्रार्थना में अपने आने का मकसद हमारे सामने प्रकट किया है; वे इसलिए आये जिससे हम सब मुक्ति प्राप्त करें तथा शिष्यगण तैयार हो सके जिससे वे इस संसार में ईश्वर के कार्यो को आगे बढ़ा सकें। आईये जो ईश्वर ने इस संसार के लिए सोच कर रखा है हम उसमंे अपना सहयोग दें। आमेन!



📚 REFLECTION



If we want to know the purpose of Jesus’ coming in this world then we have to read the Gospel of John chapter 17 where opening his heart Lord Jesus prays to Father Almighty. The prayer of Chapter 17 is also known as Jesus’ high priestly prayer.

In today’s gospel we will meditate on some part of chapter 17 which is taken from the high priestly prayer of Jesus. Jesus starts this prayer by looking up towards heaven, “Father, the hour has come; glorify your Son so that the Son may glorify you.” In this prayerful conversation Jesus is talking about that hour for which he was being sent; i.e., passion, death and resurrection. We want to live in this world but Lord Jesus came in this world to die so that we may be free from the slavery of sin.

Lord Jesus further says that he as finished the work that was given by the Father. Those who were given from the world to Jesus, Jesus has revealed the mystery of God and they came tp know who Jesus really is and that they have to carry forward the work of God after Jesus.

Lord Jesus has revealed the purpose of his coming in his prayer; He came so that we may receive salvation and the disciples may get ready to carry forward the work of God in the world. Let’s cooperate with what the Lord has thought of this world. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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सोमवार, 17 मई, 2021 पास्का का सातवाँ सप्ताह

 

सोमवार, 17 मई, 2021

पास्का का सातवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 19:1-8



1) जिस समय अपोल्लोस कुरिन्थ में था, पौलुस भीतरी प्रदेशों का दौरा समाप्त कर एफे़सुस पहुँचा। वहाँ उसे कुछ शिष्य मिले।

2) उसने उन से पूछा, ’’क्या विश्वासी बनते समय आप लोगों को पवित्र आत्मा प्राप्त हुआ था?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ’’हमने यह भी नहीं सुना है कि पवित्र आत्मा होता है’’।

3) इस पर उसने पूछा, ’’तो, आप को किसका बपतिस्मा मिला?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ’’योहन का बपतिस्मा’’।

4) पौलुस ने कहा, ’’योहन पश्चात्ताप का बपतिस्मा देते थे। वह लोगों से कहते थे कि आप को मेरे बाद आने वाले में-अर्थात् ईसा में- विश्वास करना चाहिए।’’

5) उन्होंने यह सुन कर प्रभु ईसा के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण किया।

6) जब पौलुस ने उन पर हाथ रखा, तो पवित्र आत्मा उन पर उतरा और वे भाषाएँ बोलते और भविष्यवाणी करते रहे।

7) वे कुल मिला कर लगभग बारह पुरुष थे।

8) पौलुस तीन महीनों तक सभागृह जाता रहा। वह ईश्वर के राज्य के विषय में निस्संकोच बोलता और यहूदियों को समझाता था



सुसमाचार : योहन 16:29-33


29) उनके शिष्यों ने उन से कहा, ’’देखिये, अब आप दृष्टांतो में नहीं, बल्ेिक स्पष्ट शब्दों में बोल रहे हैं।

30) अब हम समझ गये है कि आप सब कुछ जानते हैं- प्रश्नों की कोई ज़रूरत नहीं रह गयी है। इसलिये हम विश्वास करते हैं कि आप ईश्वर के यहाँ से आये हैं।

31) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’क्या तुम अब विश्वास करते हो?

32) देखो! वह घडी आ रही है, आ ही गयी है। जब तुम सब तितर-बितर हो जाओगे और अपना-अपना रास्ता ले कर मुझे अकेला छोड दोगे। फिर भी मैं अकेला नहीं हूँ, क्योंकि पिता मेरे साथ है।

33) मैंने तुम लोगों से यह सब इसलिये कहा है कि तुम मुझ में शांति प्राप्त कर सको। संसार में तुम्हें क्लेश सहना पडेगा। परन्तु ढारस रखो- मैंने संसार पर विजय पायी है।



📚 मनन-चिंतन



जब परिवार के शीर्ष को कुछ हो जाता है तो परिवार तितर बितर हो जाता है। आज प्रभु येसु इसी के संदर्भ में अपने शिष्यों से वार्तालाप करते है कि वह समय आयेगा जब वे सब तितर बितर हो जायेंगे। ऐसे समय में प्रभु ढ़ारस रखने को कहते है।

प्रभु के बिना जीवन दुःख, परेशानी, दुविधा, भय, ंिचंता, अंधकार और असांमजस्य से भरा जीवन हैं। प्रभु के बिना जीवन जीना या प्रभु के अभाव में जीवन जीना हमारे लिए मृत्यु से बढ़कर नहीं है। परंतु हमारे जीवन में कई ऐसे क्षण आते है जब हम प्रभु के अभाव में जीवन व्यतीत करते है अर्थात् प्रभु को अपने जीवन से भूलकर अपने हिसाब से जीते है। ऐसे समय में हम व्याकुल हो जाते है और हमें समझ में नहीं आता कि क्या करें और कभी कभी हड़बड़ाहट में हम गलत कदम उठा लेते है। प्रभु येसु हमें यह बताना चाहते है कि जब कभी ऐसा क्षण आये तो ढ़ारस रखो और येसु में विश्वास करों।

आईये आज के दिन हम उन लोगों के लिए विशेष प्रार्थना करें जो प्रभु के अभाव में जीवन जी रहें है। ईश्वर उनके मन और ह्दय को आलोकित करें। आमेन!



📚 REFLECTION



When something happens to the head of the family then the family scatters. Today Lord Jesus talks about this context to his disciples that the time will come when they all will be scattered. In that situation Jesus says to take courage.

Without God life is full of sorrow, difficulties, confusion, fear, anxiety, darkness and disharmony. Living without God or living wvith the lack of God is no greater than death. But in our lives many moments come when we live without God, in other words we live according to our own ways forgetting God. We become anxious in this moment and do not understand what to do and sometimes take the wrong step in confusion. Lord Jesus wants to tell us that whenever like this situation comes take courage and believe in Jesus.

Let’s pray this day for those people who are living the life without God; May God enlighten their mind and heart. Amen!



 -Br. Biniush Topno


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