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रविवार, 20 अगस्त, 2023 वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

 *✞ CATHOLIC BIBLE MINISTRY ✞*

*रविवार, 20 अगस्त, 2023*

*वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह*

*पहला पाठ*
इसायाह 56:1. 6-7

1) प्रभु यह कहता है- “न्याय बनाये रखो- और धर्म का पालन करो; क्योंकि मेरी मुक्ति निकट है और मेरी न्यायप्रियता शीघ्र ही प्रकट हो जायेगी।

6) “जो विदेशी प्रभु के अनुयायी बन गये हैं, जिससे वे उसकी सेवा करें, वे उसका नाम लेते रहें और उसके भक्त बन जायें और वे सब, जो विश्राम-दिवस मनाते हैं और उसे अपवत्रि नहीं करते-

7) मैं उन लोगों को अपने पवत्रि पर्वत तक ले जाऊँगा। मैं उन्हें अपने प्रार्थनागृह में आनन्द प्रदान करूँगा। मैं अपनी बेदी पर उनके होम और बलिदान स्वीकार करूँगा; क्योंकि मेरा घर सब राष्ट्रों का प्रार्थनागृह कहलायेगा।“
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*दूसरा पाठ*
रोमियों 11:13-15.29-32

13) मैं आप गैर-यहूदियों से यह कहता हूँ- ’मैं तो गैर-यहूदियों में प्रचार करने भेजा गया और इस धर्मसेवा पर गर्व भी करता हूँ।

14) किन्तु मैं अपने रक्त-भाइयों में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करने की और इस प्रकार उन में कुछ लोगों का उद्धार करने की आशा भी रखता हूँ;

15) क्योंकि यदि उनके परित्याग के फलस्वरूप ईश्वर के साथ संसार का मेल हो गया है, तो उनके अंगीकार का परिणाम मृतकों में से पुनरूत्थान होगा।

29) क्योंकि ईश्वर न तो अपने वरदान वापस लेता और न अपना बुलावा रद्द करता है।

30) जिस तरह आप लोग पहले ईश्वर की अवज्ञा करते थे और अब, जब कि वे अवज्ञा करते हैं, आप ईश्वर के कृपापात्र बन गये हैं,

31) उसी तरह अब, जब कि आप ईश्वर के कृपापात्र बन गये हैं, वे ईश्वर की अवज्ञा करते हैं, किन्तु बाद में वे भी दया प्राप्त करेंगे।

32) ईश्वर ने सबों को अवज्ञा के पाप में फंसने दिया, क्योंकि वह सबों पर दया दिखाना चाहता था।
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*सुसमाचार*
सन्त मत्ती 15:21-28

21) ईसा ने वहाँ से बिदा होकर तीरूस और सिदोन प्रान्तों के लिए प्रस्थान किया।

22) उस प्रदेश की एक कनानी स्त्री आयी और पुकार-पुकार कर कहती रही, ’’प्रभु दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए। मेरी बेटी एक अपदूत द्वारा बुरी तरह सतायी जा रही है।’’

23) ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया। उनके शिष्यों ने पास आ कर उनसे यह निवेदन किया, ’’उसकी बात मानकर उसे विदा कर दीजिए, क्योंकि वह हमारे पीछे-पीछे चिल्लाती आ रही है’’।

24) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं केवल इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास भेजा गया हूँ।

25) इतने में उस स्त्री ने आ कर ईसा को दण्डवत् किया और कहा, ’’प्रभु! मेरी सहायता कीजिए’’।

26) ईसा ने उत्तर दिया, ’’बच्चों की रोटी ले कर पिल्लों के सामने डालना ठीक नहीं है’’।

27) उसने कहा, ’’जी हाँ, प्रभु! फिर भी स्वामी की मेज़ से गिरा हुआ चूर पिल्ले खाते ही हैं’’।

28) इस पर ईसा ने उत्तर दिया ’’नारी! तुम्हारा विश्वास महान् है। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।’’ और उसी क्षण उसकी बेटी अच्छी हो गयी।
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*मनन-चिंतन*
विश्वास हमारे सारी बाधाओं और बंधनों को तोड़ देता है। विश्वास के सामने न तो कोई सीमा है, न जाति है न रंग-रूप न धर्म। चाहे हम ख्रीस्तीय हो या अख्रीस्तीय, चाहे हम इस्राएली हो या गैर इस्राएली, चाहे हम गरीब हो या अमीर, चाहे हम किसी भी देश या जाति के हो, यदि हममें ईश्वर के प्रति विश्वास है तो वह विश्वास हमारे जीवन में परिवर्तन और चमत्कार लायेगा। जिंदगी भले ही हमारे विश्वास का इम्तेहान ले परंतु येसु कभी भी हमारा पक्षपात नहीं करेंगे क्योंकि ईश्वर रंग रूप नहीं परंतु सच्चे विश्वासियों का ह्दय देखता है।



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रविवार, 13 अगस्त, 2023 वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

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*रविवार, 13 अगस्त, 2023*

*वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह*



*पहला पाठ*
राजाओं का पहला ग्रन्थ 19:9a.11-13a

9) एलियाह होरेब पर्वत के पास पहुँचा और एक गुफा के अन्दर चल कर उसने वहाँ रात बितायी।

11) प्रभु ने उस से कहा, ‘‘निकल आओ, और पर्वत पर प्रभु के सामने उपस्थित हो जाओ“। तब प्रभु उसके सामने से हो कर आगे बढ़ा। प्रभु के आगे-आगे एक प्रचण्ड आँधी चली- पहाड़ फट गये और चट्टानें टूट गयीं, किन्तु प्रभु आँधी में नहीं था। आँधी के बाद भूकम्प हुआ, किन्तु प्रभु भूकम्प में नहीं था।

12) भूकम्प के बाद अग्नि दिखई पड़ी, किन्तु प्रभु अग्नि में नहीं था। अग्नि के बाद मन्द समीर की सरसराहट सुनाई पड़ी।

13) एलियाह ने यह सुनकर अपना मुँह चादर से ढक लिया और वह बाहर निकल कर गुफा के द्वार पर खड़ा हो गया।

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*दूसरा पाठ*
रोमियों 9: 1-5

1) मैं मसीह के नाम पर सच कहता हूँ और मेरा अन्तःकरण पवित्र आत्मा से प्रेरित हो कर मुझे विश्वास दिलाता है कि मैं झूठ नहीं बोलता-

2) मेरे हृदय में बड़ी उदासी तथा निरन्तर दुःख होता है।

3) मैं अपने रक्त-सम्बन्धी भाइयों के कल्याण के लिए मसीह से वंचित हो जाने के लिए तैयार हूँ।

4) वे इस्राएली हैं। ईश्वर ने उन्हें गोद लिया था। उन्हें ईश्वर के सान्निध्य की महिमा, विधान, संहिता, उपासना तथा प्रतिज्ञाएं मिली है।

5) कुलपति उन्हीं के हैं और मसीह उन्हीं में उत्पन्न हुए हैं। मसीह सर्वश्रेष्ठ हैं तथा युगयुगों तक परमधन्य ईश्वर हैं। आमेन।

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*सुसमाचार*
मत्ती 14:22-33

22) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा करदेंगे।

23) ईसा लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढे़। सन्ध्या होने पर वे वहाँ अकेले थे।

24) नाव उस समय तट से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।

25) रात के चैथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।

26) जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते हुए देखा, तो वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, ’’यह कोई प्रेत है‘‘, डर के मारे चिल्ला उठे।

27) ईसा ने तुरन्त उन से कहा, ’’ढारस रखो; मैं ही हूँ। डरो मत।‘‘

28) पेत्रुस ने उत्तर दिया, ’’प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की अज्ञा दीजिए‘‘।

29) ईसा ने कहा, ’’आ जाओ‘‘। पेत्रुस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा;

30) किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, ’’प्रभु! मुझे बचाइए’’।

31) ईसा ने तुरन्त हाथ बढ़ा कर उसे थाम लिया और कहा, ’’अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?’’

32) वे नाव पर चढे और वायु थम गयी।

33) जो नाव में थे, उन्होंने यह कहते हुए ईसा को दण्डवत् किया ’’आप सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं’’।


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*मनन-चिंतन*
प्रभु येसु का जीवन एक प्रार्थनामय जीवन था। भले ही वे दिन भर में कितने ही व्यस्त क्यो न थे वे प्रार्थना करने के लिए समय निकाल ही लेते थे। अक्सर प्रभु येसु देर रात तक या बहुत सवेरे पिता ईश्वर से एकांत में प्रार्थना करते थे। प्रार्थना करना अर्थात् पिता ईश्वर से वार्तालाप के जरिये सम्बन्ध स्थापित करना है। प्रभु येसु को ईश्वर की ईच्छाओं को जानने और उसको पूर्ण करने का सामर्थ्य प्रार्थना के समय प्राप्त होता था। प्रभु येसु का यह पहलू हम सभी को एक प्रार्थनामय इंसान बनने और ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करने में मदद करें।


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जुलाई 23, 2023, रविवार वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

 जुलाई 23, 2023, रविवार


वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार




📒 पहला पाठ : प्रज्ञा-ग्रन्थ 12:13,16-19

13) तुझे छोड़ कर और कोई ईश्वर नहीं। तू ही समस्त सृष्टि की रक्षा करता है। यह आवश्यक नहीं कि तू किसी को इसका प्रमाण दे कि तेरे निर्णय सही है।

16) तेरा न्याय तेरे सामर्थ्य पर आधारित है। तू सब का स्वामी है और इसलिए सब पर दया करता है।

17) तू तभी अपना सामर्थ्य प्रकट करता है, जब तेरी सर्वशक्तिमत्ता पर सन्देह किया जाता है। तू उसी को दण्ड देता है, जो तेरी प्रभुता जान कर तुझे चुनौती देता है।

18) तू शक्तिशाली होते हुए भी उदारतापूर्वक न्याय करता और बड़ी कृपालुता से हम पर शासन करता है, क्योंकि तू इच्छानुसार अपना सामर्थ्य दिखा सकता है।

19) इस प्रकार तूने अपनी प्रजा को यह शिक्षा दी कि धर्मी को अपने भाइयों के प्रति सहृदय होना चाहिए और तूने अपने पुत्रों को यह भरोसा दिलाया कि पाप के बाद तू उन्हें पश्चात्ताप का अवसर देगा।

📒 दूसरा पाठ : रोमियों 8:26-27

26) आत्मा भी हमारी दुर्बलता में हमारी सहायता करता है। हम यह नहीं जानते कि हमें कैसे प्रार्थना करनी चाहिए, किन्तु हमारी अस्पष्ट आहों द्वारा आत्मा स्वयं हमारे लिए विनती करता है।

27) ईश्वर हमारे हृदय का रहस्य जानता है। वह समझाता है कि आत्मा क्या कहता है, क्योंकि आत्मा ईश्वर के इच्छानुसार सन्तों के लिए विनती करता है।

📒 सुसमाचार : मत्ती 13:24-43

24) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के सदृश है, जिसने अपने खेत में अच्छा बीज बोया था।

25) परन्तु जब लोग सो रहे थे, तो उसका बैरी आया और गेहूँ में जंगली बीज बो कर चला गया।

26) जब अंकुर फूटा और बालें लगीं, तब जंगली बीज भी दिखाई पड़ा।

27) इस पर नौकरों ने आकर स्वामी से कहा, ’मालिक, क्या आपने अपने खेत में अच्छा बीज नहीं बोया था? उस में जंगली बीज कहाँ से आ पड़ा?

28) स्वामी ने उस से कहा, ’यह किसी बैरी का काम है’। तब नौकरों ने उससे पूछा, ’क्या आप चाहते हैं कि हम जाकर जंगली बीज बटोर लें’?

29) स्वामी ने उत्तर दिया, ’नहीं, कहीं ऐसा न हो कि जंगली बीज बटोरते समय तुम गेहूँ भी उखाड़ डालो। कटनी तक दोनों को साथ-साथ बढ़ने दो।

30) कटनी के समय मैं लुनने वालों से कहूँगा- पहले जंगली बीज बटोर लो और जलाने के लिए उनके गटठे बाँधो। तब गेहूँ मेरे बखार में जमा करो।’’

31) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, ’’स्वर्ग का राज्य राई के दाने के सदृश है, जिसे ले कर किसी मनुष्य ने अपने खेत में बोया।

32) वह तो सब बीजों से छोटा है, परन्तु बढ़ कर सब पोधों से बड़ा हो जाता है और ऐसा पेड़ बनता है कि आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करते हैं।’’

33) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया,’’स्वर्ग का राज्य उस ख़मीर के सदृश है, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया’’।

34) ईसा दृष्टान्तों में ही ये सब बातें लोगों को समझाते थे। वह बिना दृष्टान्त के उन से कुछ नहीं कहते थे,

35) जिससे नबी का यह कथन पूरा हो जाये- मैं दृष्टान्तों में बोलूँगा। पृथ्वी के आरम्भ से जो गुप्त रहा, उसे मैं प्रकट करूँगा।

36) ईसा लोगों को विदा कर घर लौटे। उनके शिष्यों ने उनके पास आ कर कहा, ’’खेत में जंगली बीज का दृष्टान्त हमें समझा दीजिए’’।

37) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’अच्छा बीज बोने बाला मानव पुत्र हैं;

38) खेत संसार है; अच्छा बीज राज्य की प्रजा है; जंगली बीज दृष्ट आत्मा की प्रजा है;

39) बोने बाला बैरी शैतान है; कटनी संसार का अंत है; लुनने वाले स्वर्गदूत हैं।

40) जिस तरह लोग जंगली बीज बटोर कर आग में जला देते हैं, वैसा ही संसार के अंत में होगा।

41) मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा और वे उसके राज्य क़़ी सब बाधाओं और कुकर्मियों को बटोर कर आग के कुण्ड में झोंक देंगें।

42) वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

43) तब धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की तरह चमकेंगे। जिसके कान हों, वह सुन ले।

📚 मनन-चिंतन - 1

आज का सुसमाचार एक भले मनुष्य और उसके दुश्मन के बारे में एक दृष्टान्त प्रस्तुत करता है। भला मनुष्य अपने खेत में अच्छा बीज बोता है। लेकिन दुश्मन उस भले व्यक्ति के खेत में गेहूं के बीच जंगली बीज बो कर चला जाता है। दुश्मन यह गुप्त रूप से करता है जब हर कोई सोता है। खेत भले आदमी का है और इसलिए दुश्मन एक अतिचार है। यह साफ है कि उसकी नीयत बुरी है क्योंकि वह जंगली बीज बोता है। उसका मकसद उस भले आदमी को नुकसान पहुँचाना है। लेकिन वह भला आदमी तुरन्त मुँहतोड़ जवाब नही देता है और जल्दीबाजी में कुछ नहीं करता है, लेकिन फसल के तैयार होने के समय तक धैर्य रखता है। फसल के काटने के दौरान, वह स्पष्ट रूप से बुराई को नष्ट करने का दृढ़संकल्प करता है।

जब प्रभु येसु अपने चेलों को अकेले में समझाते हैं तो वे स्पष्ट करते हैं कि वे ही वह भला आदमी हैं और दुश्मन शैतान है। यह संसार ईश्वर का खेत है। जब हम सो रहे होते, यानि निष्क्रिय होते हैं तब शैतान दुनिया में बुराई बो देता है। यदि हम जागते, सतर्क रहेंगे तो शैतान ऐसा नहीं कर सकेगा।

स्वतंत्रता ईश्वर का एक महान उपहार है। यह गरिमा की निशानी है। हम किसी का गुलाम बनना पसंद नहीं करते। पाप की संभावना स्वतंत्रता का हिस्सा है। फिर भी पाप नहीं करना वास्तविक स्वतंत्रता का प्रमाण है। स्वतंत्रता की कीमत है जिम्मेदारी। अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार होने के बिना स्वतंत्रता का आनंद लेना एक खतरनाक प्रवृत्ति है। ऐसे मामले का अंत एक त्रासदी होगी। सच्ची स्वतंत्रता जागरूकता और सतर्कता लाने और बुराई के खिलाफ लड़ाई में तत्पर रहने की जिम्मेदारी लाती है।

संत पेत्रुस कहते हैं, "आप संयम रखें और जागते रहें! आपका शत्रु, शैतान, दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचरता है और ढूँढ़ता रहता है कि किसे फाड़ खाये। आप विश्वास में दृढ़ हो कर उसका सामना करें। आप जानते हैं कि संसार भर में आपके भाई भी इस प्रकार के दुःख भोग रहे हैं।” (1पेत्रुस 5: 8-9)



📚 REFLECTION

Today’s Gospel passage speaks about a man and his enemy. The man is evidently good as he sows good seed in his field. The enemy is evidently bad as he sows weeds among the wheat in the good man’s field. The enemy does this secretly when everybody is asleep. The field belongs to the good man and so the enemy is a trespasser. His evil intention is clear as he sows weeds which are intended to bring harm to the good man. The good man does not suddenly get worked up and react in a hurry, but is patient until the time of harvest. At the harvest, he is determined to destroy the evil.

When Jesus explains the parable privately to his disciples he clarifies that the Son of man is the good man and the enemy is the devil. This world is the field of God. When we are asleep the devil sows evil in the world. If we are awake and alert the devil cannot do it.

Freedom is a great gift of God. It is a sign of dignity. We do not like to be enslaved. Possibility of sin is part of freedom. Yet not sinning is the proof of real freedom in practice. Freedom comes with the price-tag of responsibility. Wanting to enjoy freedom without being responsible for our actions is a dangerous tendency. The end in such a case will be a disaster. True freedom brings responsibility to be aware and alert and to be prompt in fighting against evil.

St. Peter says, “Discipline yourselves, keep alert. Like a roaring lion your adversary the devil prowls around, looking for someone to devour. Resist him, steadfast in your faith, for you know that your brothers and sisters in all the world are undergoing the same kinds of suffering.” (1Pet 5:8-9)


मनन-चिंतन -2

स्तोत्र 130 में स्तोत्रकार प्रश्न करते हैं, “प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा?” कोई भी ईश्वर के सामने धर्मी होने का दावा नहीं कर सकता है। सूक्ति 30:12 कहता है, “कुछ लोग अपने को शुद्ध समझते, किन्तु उनका दूषण नहीं धुला है”। संत योहन कहते हैं, “यदि हम कहते हैं कि हम निष्पाप हैं, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं और हम में सत्य नहीं है। यदि हम अपने पाप स्वीकार करते हैं, तो वह हमारे पाप क्षमा करेगा और हमें हर अधर्म से शुद्ध करेगा; क्योंकि वह विश्वसनीय तथा सत्यप्रतिज्ञ है। यदि हम कहते हैं कि हमने पाप नहीं किया है, तो हम उसे झूठा सिद्ध करते हैं और उसका सत्य हम में नहीं है। (1 योहन 1:8-10) इसलिए संत पौलुस कहते हैं, “सबों ने पाप किया और सब ईश्वर की महिमा से वंचित किये गये” (रोमियों 3:23)। अगर प्रभु हमारे साथ न्याय करेंगे तो हम में से कोई नहीं बच सकता। ईश्वर की करुणा ही हमको बचाती है।

जंगली बीज के दृष्टान्त द्वारा प्रभु हम को यह सिखाना चाहते हैं कि ईश्वर अत्यधिक सहनशील है। वे तुरन्त ही कुकर्मियों का विनाश नहीं करते हैं, बल्कि उनको सहनशीलता दिखाते हैं। वे उनके मनपरिवर्तन के लिए समय देते हैं। मालिक गेहूँ और जंगली बीज – दोनों को कटनी के समय तक एक साथ बढ़ने देता है।

स्तोत्र 94:3-7 में स्तोत्रकार प्रभु से प्रश्न करते हैं, “प्रभु! दुर्जन कब तक, दुर्जन कब तक आनन्द मनायेंगे? वे धृष्टतापूर्ण बातें करते हैं। वे सब कुकर्मी डींग मारते हैं। प्रभु! वे तेरी प्रजा को पीसते और तेरी विरासत पर अत्याचार करते हैं। वे विधवाओं तथा परदेशियों की हत्या और अनाथों का वध करते हैं। वे कहते हैं: ‘‘प्रभु नहीं देखता, याकूब का ईश्वर उस पर ध्यान नहीं देता’’।” स्तोत्रकार प्रभु ईश्वर की सहनशीलता पर आश्चर्यचकित है। स्तोत्रकार को मालूम है कि प्रभु ईश्वर कुकर्मि को मनफिराव के लिए समय दे रहे हैं और एक दिन वह समय खत्म हो जायेगा और अगर उस समय से पहले वह पश्चात्ताप नहीं करेगा तो ईश्वर उसका विनाश करेगा। इसलिए वे कहते हैं, “मेरा ईश्वर मेरे आश्रय की चट्टान है। वह उन से उनके अधर्म का बदला चुकायेगा। वह उनकी दुष्टता द्वारा उनका विनाश करेगा। हमारा प्रभु-ईश्वर उनका विनाश करेगा।“ (स्त्तोत्र 94:22-24)

प्रभु येसु यह जानते थे कि उनका शिष्य यूदस उन्हें पकडवा देगा, फिर भी उन्होंने उसके पैर धोये और उसे मित्र कह कर संबोधित किया। यूदस के सुनने में यह कह कर कि आप में से एक मुझे पकडवा देगा येसु उसे फिर से अपने इरादे पर पुन: सोचने तथा निर्णय बदलने का अवसर दे रहे थे।

ईश्वर करुणामय है, इसलिए वे कुकर्मि को समय देते हैं। परन्तु जो कुकर्मी पश्चात्ताप नहीं करता उसे ईश्वर के न्याय का सामना करना पडेगा।

लूकस 13:6-9 में प्रभु दाखबारी में लगे हुए अंजीर के पेड का दृष्टान्त सुनाते हैं। मालिक तीन वर्षों से उस पेड में फल खोजने आया, परन्तु उसे एक भी नहीं मिला। इसलिए मालिक ने उसे काट डालना चाहा। परन्तु माली ने कहा, “मालिक! इस वर्ष भी इसे रहने दीजिए। मैं इसके चारों ओर खोद कर खाद दूँगा। यदि यह अगले वर्ष फल दे, तो अच्छा, नहीं तो इसे काट डालिएगा’।’’ प्रभु इश्वर हमें समय दे कर यह उम्मीद रखते हैं कि हम अपने जीवन में सुधार लायें।



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जून 25, 2023, इतवार बारहवाँ समान्य इतवार

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*जून 25, 2023, इतवार*

*बारहवाँ समान्य इतवार*



*पहला पाठ*
यिरमियाह 20:10-13

10) मैंने बहुतों को यह फुसफुसाते हुए सुना है- “चारों ओर आतंक फैला हुआ हैं। उस पर अभियोग लगाओ! हम उस पर अभियोग लगायें“। जो पहले मेरे मित्र थे, वे सब इस ताक में रहते हैं कि मैं कोई ग़लती कर बैठूँ और कहते हैं, “वह शायद भटक जायेगा और हम उस पर हावी हो कर उस से बदला लेंगे''।

11) परन्तु प्रभु एक पराक्रमी शूरवीर की तरह मेरे साथ हैं। मेरे विरोधी ठोकर खा कर गिर जायेंगे। वे मुझ पर हावी नहीं हो पायेंगे और अपनी हार का कटु अनुभव करेंगे। उनका अपयश सदा बना रहेगा।

12) विश्वमण्डल के प्रभु! तू धर्मी की परीक्षा करता और मन तथा हृदय की थाह लेता है। मैं अपने को तुझ पर छोड़ता हूँ। मैं दूखूँगा कि तू उन लोगों से क्या बदला लेता है।

13) प्रभु का गीत गाओ! प्रभु की स्तुति करो! क्योंकि वह दरिद्रों के प्राणों को दुष्टों के हाथ से छुडाता है।
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*दूसरा पाठ*
रोमियों 5:12-15

12) एक ही मनुष्य द्वारा संसार में पाप का प्रवेश हुआ और पाप द्वारा मृत्यु का। इस प्रकार मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गयी, क्योंकि सब पापी है।

13) मूसा की संहिता से पहले संसार में पाप था, किन्तु संहिता के अभाव में पाप का लेखा नहीं रखा जाता हैं।

14) फिर भी आदम से ले कर मूसा तक मृत्यु उन लोगों पर भी राज्य करती रही, जिन्होंने आदम की तरह किसी आज्ञा के उल्लंघन द्वारा पाप नहीं किया था। आदम आने वाले मुक्तिदाता का प्रतीक था।

15) फिर भी आदम के अपराध तथा ईश्वर के वरदान में कोई तुलना नहीं हैं। यह सच है कि एक ही मनुष्य के अपराध के कारण बहुत-से लोग मर गये; किंतु इस परिणाम से कहीं अधिक महान् है ईश्वर का अनुग्रह और वह वरदान, जो एक ही मनुष्य-ईसा मसीह-द्वारा सबों को मिला है।
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*सुसमाचार*
मत्ती 10:26-33

26) "इसलिए उन से नहीं डरो। ऐसा कुछ भी गुप्त नहीं है, जो प्रकाश में नहीं लाया जायेगा और ऐसा कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, जो प्रकट नहीं किया जायेगा।

27) मैं जो तुम से अंधेरे में कहता हूँ, उसे तुम उजाले में सुनाओ। जो तुम्हें फुस-फुसाहटों में कहा जाता है, उसे तुम पुकार-पुकार कर कह दो।

28) उन से नहीं डरो, जो शरीर को मार डालते हैं, किन्तु आत्मा को नहीं मार सकते, बल्कि उससे डरो, जो शरीर और आत्मा दोनों का नरक में सर्वनाश कर सकता है।

29) "क्या एक पैसे में दो गौरैयाँ नहीं बिकतीं? फिर भी तुम्हारे पिता के अनजाने में उन में से एक भी धरती पर नहीं गिरती।

30) हाँ, तुम्हारे सिर का बाल-बाल गिना हुआ है।

31) इसलिए नहीं डरो। तुम बहुतेरी गौरैयों से बढ़ कर हो।

32) "जो मुझे मनुष्यों के सामने स्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गिक पिता के सामने स्वीकार करूँगा।

33) जो मुझे मनुष्यों के सामने अस्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गिक पिता के सामने अस्वीकार करूँगा।
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🔴*मनन-चिंतन*
मनुष्य होने के नाते, हामारी कई भय और चिंताएँ हैं। वास्तव में, हमारे भय ईश्वर में हमारी आस्था के विपरीत अनुपात में हैं। मेरी चिंताओं की सूची की लंबाई से पता चलेगा कि मेरा विश्वास कितना गहरा है। आज का सुसमाचार इसी सन्देश पर जोर देता है जो पवित्र बाइबिल में बार-बार दिया जाता है - डरो मत। सुक्ति ग्रन्थ हमें प्रभु ईश्वर पर श्रध्दा के बारे में विस्तार से बताता है। सुक्ति ग्रन्थ 9:10 में प्रभु का वचन कहता है, "प्रज्ञा का मूल स्रोत प्रभु पर श्रद्धा है"। सुक्ति ग्रन्थ 8:13 में, प्रभु पर श्रध्दा को बुराई से घृणा करने के बराबर बताया गया है। सुक्ति ग्रन्थ 14:27 में वचन कहता है, "प्रभु पर श्रद्धा जीवन का स्रोत है और मृत्यु के फन्दों से बचाती है"। बाइबिल स्पष्ट रूप से हमें ईश्वर पर श्रद्धा रखने और उनके अधीन रहने को कहती है; जो ईश्वर पर श्रध्दा रखता है, उसे किसी और से डरने की जरूरत नहीं है। ईश्वर पर श्रध्दा एक श्रद्धेय भय है जो हमें ईश्वर की बात सुनने और उनकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए प्रेरित करता है। इसायाह 66:2 में, प्रभु कहते हैं, "मैं उन लोगों पर कृपादृष्टि करता हूँ, जो विनम्र और पश्चातापी हैं, जो श्रद्धा से मेरी वाणी सुनते हैं"। जब हम फ्रभु के साथ होते हैं, तो डरने कि कोई ज़रूरत नहीं होती। बाइबिल बार-बार लोगों से नहीं डरने का आह्वान करती है। इसायाह 41:9-10 में प्रभु कहते हैं, “मैं तुम को पृथ्वी के सीमान्तों से लाया, मैंने तुम को दूर-दूर के क्षेत्रों से बुलाया। मैंने कहा, ’तुम मेरे सेवक हो’। मैंने तुम को चुना और नहीं त्यागा। डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ। चिन्ता मत करो, मैं तुम्हारा ईश्वर हूँ। मैं तुम्हें शक्ति प्रदान कर तुम्हारी सहायता करूँगा, मैं अपने विजयी दाहिने हाथ से तुम्हें सँभालूँगा।”L


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मई 28, 2023, रविवार पेन्तेकोस्त रविवार

 मई 28, 2023, रविवार

पेन्तेकोस्त रविवार



📒 पहला पाठ : प्रेरित-चरित 2:1-11

1) जब पेंतेकोस्त का दिन आया और सब शिष्य एक स्थान पर इकट्ठे थे,

2) तो अचानक आँधी-जैसी आवाज आकाश से सुनाई पड़ी और सारा घर, जहाँ वे बैठे हुए थे, गूँज उठा।

3) उन्हें एक प्रकार की आग दिखाई पड़ी जो जीभों में विभाजित होकर उन में से हर एक के ऊपर आ कर ठहर गयी।

4) वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त वरदान के अनुसार भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलने लगे।

5) पृथ्वी भर के सब राष्ट्रों से आये हुए धर्मी यहूदी उस समय येरुसालेम में रहते थे।

6) बहुत-से लोग वह आवाज सुन कर एकत्र हो गये। वे विस्मित थे, क्योंकि हर एक अपनी-अपनी भाषा में शिष्यों को बोेलते सुन रहा था।

7) वे बड़े अचम्भे में पड़ गये और चकित हो कर बोल उठे, ’’क्या ये बोलने वाले सब-के-सब गलीली नहीं है?

8) तो फिर हम में हर एक अपनी-अपनी जन्मभूमि की भाषा कैसे सुन रहा है?

9) पारथी, मेदी और एलामीती; मेसोपोतामिया, यहूदिया और कम्पादुनिया, पोंतुस और एशिया,

10 फ्रुगिया और पप्फुलिया, मिश्र और कुरेने के निकवर्ती लिबिया के निवासी, रोम के यहूदी तथा दीक्षार्थी प्रवासी,

11) क्रेत और अरब के निवासी-हम सब अपनी-अपनी भाषा में इन्हें ईश्वर के महान् कार्यों का बख़ान करते सुन रहे हैं।’’


📕 दूसरा पाठ : 1कुरिन्थियों 12:3-7,12-13

4) कृपादान तो नाना प्रकार के होते हैं, किन्तु आत्मा एक ही है।

5) सेवाएँ तो नाना प्रकार की होती हैं, किन्तु प्रभु एक ही हैं।

6) प्रभावशाली कार्य तो नाना प्रकार के होते हैं, किन्तु एक ही ईश्वर द्वारा सबों में सब कार्य सम्पन्न होते हैं।

7) वह प्रत्येक को वरदान देता है, जिससे वह सबों के हित के लिए पवित्र आत्मा को प्रकट करे

12) मनुष्य का शरीर एक है, यद्यपि उसके बहुत-से अंग होते हैं और सभी अंग, अनेक होते हुए भी, एक ही शरीर बन जाते हैं। मसीह के विषय में भी यही बात है।

13) हम यहूदी हों या यूनानी, दास हों या स्वतन्त्र, हम सब-के-सब एक ही आत्मा का बपतिस्मा ग्रहण कर एक ही शरीर बन गये हैं। हम सबों को एक ही आत्मा का पान कराया गया है।


📙 सुसमाचार : सन्त योहन 20:19-23

19) उसी दिन, अर्थात सप्ताह के प्रथम दिन, संध्या समय जब शिष्य यहूदियों के भय से द्वार बंद किये एकत्र थे, ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, "तुम्हें शांति मिले!"

20) और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, "तुम्हें शांति मिले!

21) जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ।"

22) इन शब्दों के बाद ईसा ने उन पर फूँक कर कहा, "पवित्र आत्मा को ग्रहण करो!

23) तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे, वे अपने पापों से मुक्त हो जायेंगे और जिन लोगों के पाप क्षमा नहीं करोगे, वे अपने पापों से बँधे रहेंगे।

📚 मनन-चिंतन

आज माता कलिसिया पेंटेकॉस्ट का महापर्व मनाती है। यह कलिसिया के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। आज के दिन ही कलिसिया का जन्म हुआ, एक नये युग की शुरुआत हुई, पवित्र आत्मा के युग की शुरुआत। पेंटेकोस्ट का शाब्दिक अर्थ है पचासवाँ दिन या ईस्टर का सातवाँ रविवार। पेंटेकोस्ट के इस पर्व के साथ ही पास्का काल समाप्त होता है और हम सामान्य काल में प्रवेश करते हैं। इसे न केवल कैथोलिक कलिसिया में मनाया जाता है बल्कि अनेकों गैर-कैथोलिक कलिसियाओं में भी मनाया जाता है। पुराने व्यवस्थान में यह त्यौहार नई उपज या नई फसल के त्यौहार के रूप में मनाया जाता था। सभी लोग एक साथ इकट्ठे होकर ईश्वर की आशीष के लिए धन्यवाद देते हुए खुशी मानते थे। नये व्यवस्थान में यह त्यौहार ईश्वर की उस प्रतिज्ञा को पूरा होने का पर्व जब उन्होंने सारी मानवजाति पर अपना आत्मा उड़ेलने का वादा किया था (देखें योएल 3:1-2)। योहन बपतिस्ता ने भी लोगों को बताया था कि आने वाले मसीह लोगों को पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा प्रदान करेंगे (देखें मत्ती 3:11)। स्वयं प्रभु येसु ने अपने शिष्यों के लिए एक सहायक भेजने का वादा किया था। आज उसी पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा का दिन है। उसी सहायक पवित्र आत्मा के उतरने का दिन है। आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि जब शिष्य लोग एक साथ प्रार्थना में लीन थे तभी पवित्र आत्मा आग के रूप में उन पर उतर आया और वे भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलने लगे। पवित्र आत्मा के आगमन के साथ ही हमारे लिए एक नई जिम्मेदारी शुरू हो जाती है। हम सबने भी उसी पवित्र आत्मा में बपतिस्मा लिया है। वही आत्मा हमें ईश्वर से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करता है। हमें अपने जीवन के द्वारा ईश्वर के प्रेम और ईश्वरीय राज्य का साक्ष्य देना है। पवित्र आत्मा के वरदान और फल हमें ईश्वरीय राज्य के मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का साहस देते हैं बल्कि संसार के सामने ईश्वरीय राज्य का साक्ष्य देने की शक्ति भी प्रदान करते हैं। पवित्र आत्मा सदैव हमारे साथ है, हमें पवित्र जीवन जीने में मदद करने के लिए सदैव तैयार है लेकिन क्या हम अपने जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति की ओर ध्यान देते हैं?

📚 REFLECTION

Today, Mother Church celebrates the Solemnity of the Feast of Pentecost. This is one of the most important days in the history and beginning of the Church. It is on this day that the Church was born, a whole new era began, an era of the Spirit. The literal meaning of the word ‘Pentecost’ is fiftieth or Seventh Sunday of Easter. The Feast of Pentecost marks the completion of Easter season and we enter into the Ordinary season of the liturgy. This feast is celebrated all over the world by both Catholics and many other Protestant churches. In the Old Testament, this was a harvest feast where all people gathered and celebrated the prosperity with gratitude to God. In the New Testament, it is the Feast of fulfilment of God’s promise of pouring his Spirit upon whole humanity (Ref. Joel 3:1-2). Even John the Baptist indicated that the one who comes after me, will baptise you with Fire and the Holy spirit (Matthew 3:11). Jesus himself promised to send an Advocate. Today is the day of that baptism by fire and Spirit. The first reading of today tells us that when the apostles were gathered together and praying, the Spirit came upon them in the form of tongues of fire. The descent of the Holy Spirit upon the Church brings a new responsibility upon each member. We all have been baptised into the same Spirit. It is the same Spirit that motivates us to unite with God. We need to bear witness to God’s love and Kingdom of Heaven through our lives. The gifts and fruits of the Holy Spirit not only help us to live according to the values of God’s kingdom but, also give us strength and courage to bear witness before the world. The holy Spirit is always with us to strengthen us and inspire us, but are we ready to feel the presence of the Spirit within us?


📚 मनन-चिंतन-2

आज हम पेन्तेकोस्त का महापर्व मनाते हैं। पेन्तेकोस्त का शाब्दिक अर्थ है - ५०वाँ दिन और दोनों नए व्यवस्थान और पुराने व्यवस्थान में इसके अलग- अलग मायने हैं। पुराने व्यवस्थान के समय में इस त्योहार को नई फसल के त्योहार के रूप में मनाया जाता था, नवजीवन और आनंद का प्रतीक था। नये व्यवस्थान के समय यह पवित्र आत्मा के प्रेरितों पर उतरने का त्योहार है जब प्रभु येसु की मृत्यु, पुनरुत्थान एवं स्वर्गारोहण के बाद जब शिष्य एक साथ प्रार्थना में एकत्र थे तो पवित्र आत्मा उन अग्निरूपी जीवों के रूप में उतरा था।(प्रेरित चरित २:१-४)। दरअसल यह कलिसिया के जन्मदिन का त्योहार है और इसलिए हम सभी के लिए अपर उल्लास और हर्ष का समय है।


मानवजाति के मुक्ति का इतिहास तीन कालों में बाँटा जा सकता है: पुराने व्यवस्थान का काल, नये व्यवस्थान का काल और नये व्यवस्थान के पश्चात का काल। हालाँकि मानव मुक्ति के कार्य में पवित्र त्रित्व के तीनों जन सब समय एक साथ सक्रिय हैं, लेकिन फिर भी ऐसा लगता है जैसे इन तीनों कालों में एक-एक व्यक्ति ही सक्रिय है। ऐसा लगता है जैसे पुराने व्यवस्थान में पिता ईश्वर ही सब कुछ करते नज़र आते हैं, इसरएलियों को सम्भालते हैं, उनकी रक्षा करते हैं और उनके जीवन में महान कार्य करते हैं। नया व्यवस्थान मुख्यतः पुत्र ईश्वर के क्रिया-कलापों से पूर्ण प्रतीत होता है, जहाँ हम देखते हैं प्रभु येसु गलिलिया से लेकर एरूसलेम तक घूम-घूम कर ईश्वर के राज्य का प्रचार करते, लोगों को शिक्षा देते और उनकी बीमारियाँ और कष्ट दूर करते हैं। जब पृथ्वी पर प्रभु येसु का निवास काल समाप्त हुआ, और अपनी मृत्यु, पुनरुत्थान एवं स्वर्गारोहण के बाद वह पिता ईश्वर के दाहिने विराजमान हो गए तो पवित्र आत्मा का काल प्रारम्भ हुआ।


हम पवित्र आत्मा के काल में हैं। पवित्र त्रित्व के तीनों जन सब समय, सब जग उपस्थित हैं, और कोई भी काल एकमात्र किसी एक ही व्यक्ति का मुख्य काल नहीं है। जब हम कहते हैं कि अब यह पवित्र आत्मा का काल है, तो इसका यह मतलब क़तई नहीं है कि पिता और पुत्र ईश्वर निष्क्रिय हैं, वे भी बराबर रूप से सक्रिय हैं। पवित्र आत्मा अपनी उपस्थिति से इस संसार को पवित्र करता है, वह कलिसिया को नई दिशा में प्रेरित करता है, वह प्रभु येसु द्वारा हमें दिए गए मिशन को पूरा करने में सहायता करता है। जब तक हम आत्मा में जन्म ना लें तब तक हम ईश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाएँगे। ही स्वर्गीय पिता, हमें अपने आत्मा से भर दे, हे पावन आत्मा आओ और हमें अपनी शक्ति से भर दो, हमें नया बना दो, ईश्वर की संतानें बना दो। आमेन।

📚 REFLECTION

Today we celebrate the solemnity of Pentecost. Pentecost literally means the 50th day and it has different connotations both in Old Testament and New Testament. In the Old Testament time this festival was known as the harvest feast and a feast which symbolised newness and joy. In the New Testament it is the feast of the descent of the Holy Spirit upon the apostles, where after the death, resurrection and ascension of the Lord, the apostles were in prayer in upper room and Holy Spirit descended on them in the form of tongues and wind. (Ref. 2:1-4). It is in fact the birthday of the church, therefore a very happy occasion for all of us to rejoice and thank and praise God.

The salvation history of mankind can be divided into three time periods: the period of the Old Testament, the period of the New Testament and the period after the New Testament. Although all three persons of the Holy Trinity are active together all the time in the work of human salvation yet we see apparent domination of one each in each of these period. It seems that Old Testament is the period of the Father, where He is very visibly active, taking care of the Israelites, the chosen people, and performing great wonders in their lives. The New Testament seems to be dominated by the presence of the Son where he goes all over from Galilee to Jerusalem, teaching, preaching and healing the people. When he finishes his earthly course, after his ascension the third person of the Trinity, the Holy Spirit comes in play and there begins the period of the Holy Spirit.

We are now in the era of the Holy Spirit. All the three persons of the Trinity are present at all times, always and it is not that only one person of the Trinity is exclusively active at a time. When we say it is the period of the Holy Spirit, it means that the Father and Son are also equally active. The Holy Spirit sanctifies the world with its presence, it guides the Church into new horizons, it leads us towards the mission entrusted to us by Jesus. Pentecost is the time to be re-born in the spirit. We cannot enter in the kingdom of heaven unless we are born with the Spirit. Heavenly Father ! fill us with your Spirit! O, Holy Spirt, come and take over us, recharge us and help us to be re-born in you as the children of God. Amen.




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Praise the Lord!

अप्रैल 23, 2023, इतवार पास्का का तीसरा इतवार

 *✞ CATHOLIC BIBLE MINISTRY ✞*


*अप्रैल 23, 2023, इतवार*

*पास्का का तीसरा इतवार*





*पहला पाठ*

प्रेरित-चरित 2:14,22-33


14) पेत्रुस ने ग्यारहो के साथ खड़े हो कर लोगों को सम्बोधित करते हुए ऊँचे स्वर से कहा, "यहूदी भाइयो और येरूसालेम के सब निवासियो! आप मेरी बात ध्यान से सुनें और यह जान लें कि

22) इस्राएली भाइयो! मेरी बातें ध्यान से सुनें! आप लोग स्वयं जानते हैं कि ईश्वर ने ईसा नाज़री के द्वारा आप लोगों के बीच कितने महान् कार्य, चमत्कार एवं चिन्ह दिखाये हैं। इस से यह प्रमाणित हुआ कि ईसा ईश्वर की ओर से आप लोगों के पास भेजे गये थे।

23) वह ईश्वर के विधान तथा पूर्वज्ञान के अनुसार पकड़वाये गये और आप लोगों ने विधर्मियों के हाथों उन्हें क्रूस पर चढ़वाया और मरवा डाला है।

24) किन्तु ईश्वर ने मृत्यु के बन्धन खोल कर उन्हें पुनर्जीवित किया। यह असम्भव था कि वह मृत्यु के वश में रह जायें,

25) क्योंकि उनके विषय में दाऊद यह कहते हैं - प्रभु सदा मेरी आँखों के सामने रहता है। वह मेरे दाहिने विराजमान है, इसलिए मैं दृढ़ बना रहता हूँ।

26) मेरा हृदय आनन्दित है, मेरी आत्मा प्रफुल्लित है और मेरा शरीर भी सुरक्षित रहेगा;

27) क्योंकि तू मेरी आत्मा को अधोलोक में नहीं छोड़ेगा, तू अपने भक्त को क़ब्र में गलने नहीं देगा।

28) तूने मुझे जीवन का मार्ग दिखाया है। तेरे पास रह कर मुझे परिपूर्ण आनन्द प्राप्त होगा।

29) भाइयो! मैं कुलपति दाऊद के विषय में। आप लोगों से निस्संकोच यह कह सकता हूँ कि वह मर गये और कब्र में रखे गये। उनकी कब्र आज तक हमारे बीच विद्यमान है।

30) दाऊद जानते थे कि ईश्वर ने शपथ खा कर उन से यह कहा था कि मैं तुम्हारे वंशजों में एक व्यक्ति को तुम्हारे सिंहासन पर बैठाऊँगा;

31) इसलिये नबी होने के नाते भविष्य में होने वाला मसीह का पुनरुत्थान देखा और इनके विषय में कहा कि वह अधोलोक में नहीं छोड़े गये और उनका शरीर गलने नहीं दिया गया।

32) ईश्वर ने इन्हीं ईसा नामक मनुष्य को पुनर्जीवित किया है-हम इस बात के साक्षी हैं।

33) अब वह ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं। उन्हें प्रतिज्ञात आत्मा पिता से प्राप्त हुआ और उन्होंने उसे हम लोगों को प्रदान किया, जैसा कि आप देख और सुन रहे हैं।

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 *दूसरा पाठ* 

1 पेत्रुस 1:17-21


17) यदि आप उसे ’पिता’ कह कर पुकारते हैं, जो पक्षपात किये बिना प्रत्येक मनुष्य का उसके कर्मों के अनुसार न्याय करता है, तो जब तक आप यहाँ परदेश में रहते हैं, तब तक उस पर श्रद्धा रखते हुए जीवन बितायें।

18) आप लोग जानते हैं कि आपके पूर्वजों से चली आयी हुई निरर्थक जीवन-चर्या से आपका उद्धार सोने-चांदी जैसी नश्वर चीजों की कीमत पर नहीं हुआ है,

19) बल्कि एक निर्दोष तथा निष्कलंक मेमने अर्थात् मसीह के मूल्यवान् रक्त की कीमत पर।

20) वह संसार की सृष्टि से पहले ही नियुक्त किये गये थे, किन्तु समय के अन्त में आपके लिए प्रकट हुए।

21) आप लोग अब उन्हीं के द्वारा ईश्वर में विश्वास करते हैं। ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया और महिमान्वित किया; इसलिए आपका विश्वास और आपका भरोसा ईश्वर पर आधारित है।

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 *सुसमाचार* 

लूकस 24:13-35


13) उसी दिन दो शिष्य इन सब घटनाओं पर बातें करते हुए एम्माउस नामक गाँव जा रहे थे। वह येरूसालेम से कोई चार कोस दूर है।

14) वे आपस में बातचीत और विचार-विमर्श कर ही रहे थे

15) कि ईसा स्वयं आ कर उनके साथ हो लिये,

16) परन्त शिष्यों की आँखें उन्हें पहचानने में असमर्थ रहीं।

17) ईसा ने उन से कहा, "आप लोग राह चलते किस विषय पर बातचीत कर रहे हैं?" वे रूक गये। उनके मुख मलिन थे।

18) उन में एक क्लेओपस-ने उत्तर दिया, "येरूसालेम में रहने वालों में आप ही एक ऐसे हैं, जो यह नहीं जानते कि वहाँ इन दिनों क्या-क्या हुआ है’।

19) ईसा ने उन से कहा, "क्या हुआ है?" उन्होंने उत्तर दिया, "बात ईसा नाज़री की है वे ईश्वर और समस्त जनता की दृष्टि में कर्म और वचन के शक्तिशाली नबी थे।

20) हमारे महायाजकों और शासकों ने उन्हें प्राणदण्ड दिलाया और क्रूस पर चढ़वाया।

21) हम तो आशा करते थे कि वही इस्राएल का उद्धार करने वाले थे। यह आज से तीन दिन पहले की बात है।

22) यह सच है कि हम में से कुछ स्त्रियों ने हमें बड़े अचम्भे में डाल दिया है। वे बड़े सबेरे क़ब्र के पास गयीं

23) और उन्हें ईसा का शव नहीं मिला। उन्होंने लौट कर कहा कि उन्हें स्वर्गदूत दिखाई दिये, जिन्होंने यह बताया कि ईसा जीवित हैं।

24) इस पर हमारे कुछ साथी क़ब्र के पास गये और उन्होंने सब कुछ वैसा ही पाया, जैसा स्त्रियों ने कहा था; परन्तु उन्होंने ईसा को नहीं देखा।"

25) तब ईसा ने उन से कहा, "निर्बुद्धियों! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मन्दमति हो !

26) क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?"

27) तब ईसा ने मूसा से ले कर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए, अपने विषय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया।

28) इतने में वे उस गाँव के पास पहुँच गये, जहाँ वे जा रहे थे। लग रहा था, जैसे ईसा आगे बढ़ना चाहते हैं।

29) शिष्यों ने यह कह कर उन से आग्रह किया, "हमारे साथ रह जाइए। साँझ हो रही है और अब दिन ढल चुका है" और वह उनके साथ रहने भीतर गये।

30) ईसा ने उनके साथ भोजन पर बैठ कर रोटी ली, आशिष की प्रार्थना पढ़ी और उसे तोड़ कर उन्हें दे दिया।

31) इस पर शिष्यों की आँखे खुल गयीं और उन्होंने ईसा को पहचान लिया ... किन्तु ईसा उनकी दृष्टि से ओझल हो गये।

32) तब शिष्यों ने एक दूसरे से कहा, हमारे हृदय कितने उद्दीप्त हो रहे थे, जब वे रास्ते में हम से बातें कर रहे थे और हमारे लिए धर्मग्रन्थ की व्याख्या कर रहे थे!"

33) वे उसी घड़ी उठ कर येरूसालेम लौट गये। वहाँ उन्होंने ग्यारहों और उनके साथियों को एकत्र पाया,

34) जो यह कह रहे थे, "प्रभु सचमुच जी उठे हैं और सिमोन को दिखाई दिये हैं"।

35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।

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 *मनन-चिंतन* 

प्रभु येसु की मृत्यु के बाद सब सहमे एवं ड़रे हुए थे। सब कोई यहां-वहां तितर-बितर हो गये। धिरे-धिरे वे अपने दैनिक जीवन की दिनचर्या में शामिल होने लगे। लेकिन मां मरियम ने उन्हें फिर से नयी उमींद दी। पेंतेकोस्त के दिन पवित्र आत्मा का उतरना उनके लिए एक नये मिशन की शुरूवात थी। पवित्र आत्मा से परिपूण होकर साहस के साथ पुनजीवित प्रभु का प्रचार करना उनका मिशन बन गया। पेत्रुस अन्य शिष्यों के साथ सुसमाचार का प्रचार करने लगे। पेत्रुस अपने पत्र में कहते हैं, “ईश्वर ने mUgsa मृतकों में से जिलाया और महिमान्वित किया इसलिए vkidk विश्वास और vkidk भरोसा ईश्वर पर आधारित हैं।” हमारा भरोसा एवं विश्वास प्रभु येसु पर हो जो हमें हमारे पापों से बचाने मे सक्षम हैं। एम्माउस जाने वाले शिष्य तो येरूसालेम में हुई घटना को लेकर बात करते हुए आगे बढ़ते हैं। येसु का उनके साथ चलना उनके लिए एक अद्भुत अनुभव था। प्रभु उनके साथ चलते हैं लेकिन वे उन्हें पहचान नहीं पाते हैं। जब वे उनके साथ समय बिताते है तो भोजन के समय वे येसु को पहचान जाते हैं। क्या हम प्रभु के साथ चलते हैं? आइये, हम प्रभु के साथ चलें एवं उन्हें पहचानें।

✍ -Br. BiniushTopno



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अप्रैल 09, 2023, इतवार पास्का इतवार

 अप्रैल 09, 2023, इतवार


पास्का इतवार


जागरण का मिस्सा बलिदान

पाठ 1 – उत्पत्ति 1:1-2:2

1) प्रारंभ में ईश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी की सृष्टि की।

2) पृथ्वी उजाड़ और सुनसान थी। अर्थाह गर्त पर अन्धकार छाया हुआ था और ईश्वर का आत्मा सागर पर विचरता था।

3) ईश्वर ने कहा, ''प्रकाश हो जाये'', और प्रकाश हो गया।

4) ईश्वर को प्रकाश अच्छा लगा और उसने प्रकाश और अन्धकार को अलग कर दिया।

5) ईश्वर ने प्रकाश का नाम 'दिन' रखा और अन्धकार का नाम 'रात'। सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ यह पहला दिन था।

6) ईश्वर ने कहा, ''पानी के बीच एक छत बन जाये, जो पानी को पानी से अलग कर दे'', और ऐसा ही हुआ।

7) ईश्वर ने एक छत बनायी और नीचे का पानी और ऊपर का पानी अलग कर दिया।

8) ईश्वर ने छत का नाम 'आकाश' रखा। सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ यह दूसरा दिन था।

9) ईश्वर ने कहा, ''आकाश के नीचे का पानी एक ही जगह इक्कट्ठा हो जाये और थल दिखाई पड़े'', और ऐसा ही हुआ।

10) ईश्वर ने थल का नाम 'पृथ्वी' रखा और जलसमूह का नाम 'समुद्र'। और वह ईश्वर को अच्छा लगा।

11) ईश्वर ने कहा ''पृथ्वी पर हरियाली लहलहाये, बीजदार पौधे और फलदार पेड़ उत्पन्न हो जायें, जो अपनीअपनी जाति के अनुसार बीजदार फल लाये'', और ऐसा ही हुआ।

12) पृथ्वी पर हरियाली उगने लगी : अपनीअपनी जाति के अनुसार बीज पैदा करने वाले पौधे और बीजदार फल देने वाले पेड़। और यह ईश्वर को अच्छा लगाा।

13) सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ यह तीसरा दिन था।

14) ईश्वर ने कहा, ''दिन और रात को अलग कर देने के लिए आकाश में नक्षत्र हों। उनके सहारे पर्व निर्धारित किये जायें और दिनों तथा वर्षों की गिनती हो।

15) वे पृथ्वी को प्रकाश देने के लिए आकाश में जगमगाते रहें'' और ऐसा ही हुआ।

16) ईश्वर ने दो प्रधान नक्षत्र बनाये, दिन के लिए एक बड़ा और रात के लिए एक छोटा; साथसाथ तारे भी।

17) ईश्वर ने उन को आकाश में रख दिया, जिससे वे पृथ्वी को प्रकाश दें,

18) दिन और रात का नियंत्रण करें और प्रकाश तथा अन्धकार को अलग कर दें और यह ईश्वर को अच्छा लगा।

19) सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ यह चौथा दिन था।

20) ईश्वर ने कहा, ''पानी जीवजन्तुओं से भर जाये और आकाश के नीचे पृथ्वी के पक्षी उड़ने लगें''।

21) ईश्वर ने मकर और नाना प्रकार के जीवजन्तुओं की सृष्टि की, जो पानी में भरे हुए हैं और उसने नाना प्रकार के पक्षियों की भी सृष्टि की, और यह ईश्वर को अच्छा लगा।

22) ईश्वर ने उन्हें यह आशीर्वाद दिया, ''फलोफूलो। समुद्र के पानी में भर जाओ और पृथ्वी पर पक्षियों की संख्या बढ़ती जाये''।

23) सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ यह पाँचवा दिन था।

24) ईश्वर ने कहा, ''पृथ्वी नाना प्रकार के घरेलू और जमीन पर रेंगने वाले जीवजन्तुओं को पैदा करें'', और ऐसा ही हुआ।

25) ईश्वर ने नाना प्रकार के जंगली, घरेलू और जमीन पर रेंगने वाले जीवजन्तुओं को बनाया और यह ईश्वर को अच्छा लगा।

26) ईश्वर ने कहा, ''हम मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनायें, यह हमारे सदृश हो। वह समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों घरेलू और जंगली जानवरों और जमीन पर रेंगने वाले सब जीवजन्तुओं पर शासन करें।''

27) ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया; उसने उसे ईश्वर का प्रतिरूप बनाया; उसने नर और नारी के रूप में उनकी सृष्टि की।

28) ईश्वर ने यह कह कर उन्हें आशीर्वाद दिया, ''फलोफूलो। पृथ्वी पर फैल जाओ और उसे अपने अधीन कर लो। समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों और पृथ्वी पर विचरने वाले सब जीवजन्तुओं पर शासन करो।''

29) ईश्वर ने कहा, मैं तुम को पृथ्वी भर के बीज पैदा करने वाले सब पौधे और बीजदार फल देने वाले सब पेड़ देता हूँ। वह तुम्हारा भोजन होगा। मैं सब जंगली जानवरों को, आकाश के सब पक्षियों को,

30) पृथ्वी पर विचरने वाले जीवजन्तुओं को उनके भोजन के लिए पौधों की हरियाली देता हूँ'' और ऐसा ही हुआ।

31) ईश्वर ने अपने द्वारा बनाया हुआ सब कुछ देखा और यह उसको अच्छा लगा। सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ यह छठा दिन था।

2:1) इस प्रकार आकाश तथा पृथ्वी और, जो कुछ उन में है, सब की सृष्टि पूरी हुई।

2) सातवें दिन ईश्वर का किया हुआ कार्य समाप्त हुआ। उसने अपना समस्त कार्य समाप्त कर, सातवें दिन विश्राम किया।

पाठ 2 – उत्पत्ति 22:1-18

1) ईश्वर ने इब्राहीम की परीक्षा ली। उसने उस से कहा, ''इब्राहीम! इब्राहीम!'' इब्राहीम ने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।''

2) ईश्वर ने कहा, ''अपने पुत्र को, अपने एकलौते को परमप्रिय इसहाक को साथ ले जा कर मोरिया देश जाओ। वहाँ, जिस पहाड़ पर मैं तुम्हें बताऊँगा, उसे बलि चढ़ा देना।''

3) इब्राहीम बड़े सबेरे उठा। उसने अपने गधे पर जीन बाँध कर दो नौकरों और अपने पुत्र इसहाक को बुला भेजा। उसने होम-बली के लिए लकड़ी तैयार कर ली और उस जगह के लिए प्रस्थान किया, जिसे ईश्वर ने बताया था।

4) तीसरे दिन, इब्राहीम ने आँखें ऊपर उठायीं और उस जगह को दूर से देखा।

5) इब्राहीम ने अपने नौकरों से कहा, ''तुम लोग गधे के साथ यहाँ ठहरो। मैं लड़के के साथ वहाँ जाऊँगा। आराधना करने के बाद हम तुम्हारे पास लौट आयेंगे।

6) इब्राहीम ने होम-बली की लकड़ी अपने पुत्र इसहाक पर लाद दी। उसने स्वयं आग और छुरा हाथ में ले लिया और दोनों साथ-साथ चल दिये।

7) इसहाक ने अपने पिता इब्राहीम से कहा, ''पिताजी!'' उसने उत्तर दिया, ''बेटा! क्या बात है?'' उसने उत्तर दिया, ''देखिए, आग और लकड़ी तो हमारे पास है; किन्तु होम को मेमना कहाँ है?''

8) इब्राहीम ने उत्तर दिया, ''बेटा! ईश्वर होम के मेमने का प्रबन्ध कर देगा'', और वे दोनों साथ-साथ आगे बढ़े।

9) जब वे उस जगह पहुँच गये, जिसे ईश्वर ने बताया था, तो इब्राहीम ने वहाँ एक वेदी बना ली और उस पर लकड़ी सजायी। इसके बाद उसने अपने पुत्र इसहाक को बाँधा और उसे वेदी के ऊपर रख दिया।

10) तब इब्राहीम ने अपने पुत्र को बलि चढ़ाने के लिए हाथ बढ़ा कर छुरा उठा लिया।

11) किन्तु प्रभु का दूत स्वर्ग से उसे पुकार कर बोला, ''इब्राहीम! ''इब्राहीम! उसने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।''

12) दूत ने कहा, ''बालक पर हाथ नहीं उठाना; उसे कोई हानि नहीं पहुँचाना। अब मैं जान गया कि तुम ईश्वर पर श्रद्धा रखते हो - तुमने मुझे अपने पुत्र, अपने एकलौते पुत्र को भी देने से इनकार नहीं किया।

13) इब्राहीम ने आँखें ऊपर उठायीं और सींगों से झाड़ी में फँसे हुए एक मेढ़े को देखा। इब्राहीम ने जाकर मेढ़े को पकड़ लिया और उसे अपने पुत्र के बदले बलि चढ़ा दिया।

14) इब्राहीम ने उस जगह का नाम ''प्रभु का प्रबन्ध'' रखा; इसलिए लोग आजकल कहते हैं, ''प्रभु पर्वत पर प्रबन्ध करता है।''

15) ईश्वर का दूत इब्राहीम को दूसरी बार पुकार कर

16) बोला, ''यह प्रभु की वाणी है। मैं शपथ खा कर कहता हूँ - तुमने यह काम किया : तुमने मुझे अपने पुत्र, अपने एकलौते पुत्र को भी देने से इनकार नहीं किया;

17) इसलिए मैं तुम पर आशिष बरसाता रहूँगा। मैं आकाश के तारों और समुद्र के बालू की तरह तुम्हारे वंशजों को असंख्य बना दूँगा और वे अपने शत्रुओं के नगरों पर अधिकार कर लेंगे।

18) तुमने मेरी आज्ञा का पालन किया है; इसलिए तुम्हारे वंश के द्वारा पृथ्वी के सभी राष्ट्रों का कल्याण होगा।''

पाठ 3 – निर्गमन 14:15-15, 1.

15) प्रभु ने मूसा से कहा, ''तुम मेरी दुहाई क्यों दे रहे हो? इस्राएलियों को आगे बढ़ने का आदेश दो।

16) तुम अपना डण्डा उठा कर अपना हाथ सागर के ऊपर बढ़ाओ और उसे दो भागों में बाँट दो, जिससे इस्राएली सूखे पाँव समुद्र की तह पर चल सकें।

17) मैं मिस्रियों का हृदय कठोर बनाऊँगा और वे इस्राएलियों का पीछा करेंगे। तब मैं फिराउन, उसकी सेना, उसके रथ और घुड़सवार, सब को हरा कर अपना सामर्थ्य प्रदर्शित करूँगा

18) और जब मैं फिराउन, उसकी सेना, उसके रथ और उसके घुड़सवार सब को हरा कर अपना सामर्थ्य प्रदर्शित कर चुका होऊँगा, तब मिस्री जान जायेंगे कि मैं प्रभु हूँ।''

19) प्रभु का दूत, जो इस्राएली सेना के आगे-आगे चल रहा था, अपना स्थान बदल कर सेना के पीछे-पीछे चलने लगा। बादल का खम्भा, जो सामने था, लोगों के पीछे आ गया

20) और मिस्रियों तथा इस्राएलियों, दोनों सेनाओं के बीच खड़ा रहा। बादल एक तरफ अँधेरा था और दूसरी तरफ रात में प्रकाश दे रहा था। इसलिए उस रात को दोनों सेनाएँ एक दूसरे के पास नहीं आ सकी।

21) तब मूसा ने सागर के ऊपर हाथ बढ़ाया और प्रभु ने रात भर पूर्व की ओर जोरों की हवा भेज कर सागर को पीछे हटा दिया। सागर दो भागों में बँट कर बीच में सूख गया।

22) इस्राएली सागर के बीच में सूखी भूमि पर आगे बढ़ने लगे। पानी उनके दायें और बायें दीवार बन कर ठहर गया। मिस्री उसका पीछा करते थे।

23) फिराउन के सब घोड़े, उसके रथ और उसके घुड़सवार, सागर की तह पर उनके पीछे चलते थे।

24) रात के पिछले पहर, प्रभु ने आग और बादल के खम्भे में से मिस्रियों की सेना की ओर देखा और उसे तितर-बितर कर दिया।

25) रथों के पहिये निकल कर अलग हो जाते थे और वे कठिनाई से आगे बढ़ पाते थे। तब मिस्री कहने लगे, ''प्रभु उनकी ओर से मिस्रियों के विरुद्ध लड़ता है।''

26) उस समय प्रभु ने मूसा से कहा, ''सागर के ऊपर अपना हाथ बढ़ाओं, जिससे पानी लौट कर मिस्रियों, उनके रथों और उनके घुड़सवारों पर लहराये।''

27) मूसा ने सागर के ऊपर हाथ बढ़ा दिया और भोर होते ही सागर फिर भर गया। मिस्री भागते हुए पानी में जा घुसे और प्रभु ने उन्हें सागर के बीच में ढकेल दिया।

28) समुद्र की तह पर इस्राएलियों का पीछा करने वाली फिराउन की सारी सेना के रथ और घुड़सवार लौटने वाले पानी में डूब गये। उन में एक भी नहीं बचा।

29) इस्राएली तो समुद्र की सूखी तह पार कर गये। पानी उनके दायें और बायें दीवार बन कर ठहर गया था।

30) उस दिन प्रभु ने इस्राएलियों को मिस्रियों के हाथ से छुड़ा दिया। इस्राएलियों ने समुद्र के किनारे पर पड़े हुए मरे मिस्रियों को देखा।

31) इस्राएली मिस्रियों के विरुद्ध किया हुआ प्रभु का यह महान् कार्य देख कर प्रभु से डरने लगे। उन्होंने प्रभु में और उसके सेवक मूसा में विश्वास किया।

15: 1) तब मूसा और इस्राएली प्रभु के आदर में यह भजन गाने लगे : मैं प्रभु का गुणगान करना चाहता हूँ। उसने अपनी महिमा प्रकट की है उसने घोड़े के साथ घुड़सवार को समुद्र में फेंक दिया है।

पाठ 4 – इसायाह 54:5-14.

5) “तेरा सृष्टिकर्ता ही तेरा पति है। उसका नाम है- विश्वमण्डल का प्रभु। इस्राएल का परमपावन ईश्वर तेरा उद्धार करता है। वह समस्त पृथ्वी का ईश्वर कहलाता है।

6) “परित्यक्ता स्त्री की तरह दुःख की मारी! प्रभु तुझे वापस बुलाता है। क्या कोई अपनी तरुणाई की पत्नी को भुला सकता है?“ यह तेरे ईश्वर का कथन है।

7) “मैंने थोड़ी ही देर के लिए तुझे छोड़ा था। अब मैं तरस खा कर, तुझे अपने यहाँ ले जाऊँगा।

8) मैंने क्रेाध के आवेश में क्षण भर तुझ से मुँह फेर लिया था। अब मैं अनन्त प्रेम से तुझ पर दया करता रहूँगा।“ यह तेरे उद्धारकर्ता ईश्वर का कथन है।

9) “नूह के समय मैंने शपथ खा कर कहा था कि प्रलय की बाढ़ फिर पृथ्वी पर नहीं आयेगी। उसी तरह मैं शपथ खा कर कहता हूँ कि मैं फिर तुझ पर क्रोध नहीं करूँगा और फिर तुझे धमकी नहीं दूँगा।

10) “चाहे पहाड़ टल जायें और पहाड़ियाँ डाँवाडोल हो जायें, किन्तु तेरे प्रति मेरा प्रेम नहीं टलेगा और तेरे लिए मेरा शान्ति-विधान नहीं डाँवाडोल होगा।“ यह तुझ पर तरस खाने वाले प्रभु का कथन है।

11) “दुर्भाग्यशालिनी! आँधी और दुःख की मारी! मैं तेरे पत्थर चुन-चुन कर लगवा दूँगा और तेरी नींव नीलमणियों पर डालूँगा।

12) मैं तेरे कंगूरे लालमणियों से, तेरे फाटक स्फटिक से और तेरे परकोटे रत्नों से बनाऊँगा।

13) तेरी प्रजा प्रभु से शिक्षा ग्रहण करेगी और उसकी सुख-शान्ति की सीमा नहीं रहेगी।

14) तेरी नींव न्याय पर डाली जायेगी। तुझे कोई नहीं सतायेगा, तू कभी भयभीत नहीं होगी। आतंक तुझ से कोसों दूर रहेगा।

पाठ 5 – इसायाह 55:1-11.

1) “तुम सब, जो प्यासे हो, पानी के पास चले आओ। यदि तुम्हारे पास रुपया नहीं हो, तो भी आओ। मुफ़्त में अन्न ख़रीद कर खाओ, दाम चुकाये बिना अंगूरी और दूध ख़रीद लो।

2) जो भोजन नहीं है, उसके लिए तुम लोग अपना रुपया क्यों ख़र्च करते हो? जो तृप्ति नहीं दे सकता है, उसके लिए परिश्रम क्यों करते हो? मेरी बात मानो। तब खाने के लिए तुम्हें अच्छी चीज़ें मिलेंगी और तुम लोग पकवान खा कर प्रसन्न रहोगे।

3) कान लगा कर सुनो और मेरे पास आओ। मेरी बात पर ध्यान दो और तुम्हारी आत्मा को जीवन प्राप्त होगा। मैंने दाऊद से दया करते रहने की प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार मैं तुम लोगों के लिए, एक चिरस्थायी विधान ठहराऊँगा।

4) मैंने राष्ट्रों के साक्य देने के लिए दाऊद को चुना और उसे राष्ट्रों का पथप्रदर्शक तथा अधिपति बना दिया है।

5) “तू उन राष्ट्रों को बुलायेगी, जिन्हें तू नहीं जानती थी और जो तुझे नहीं जानते थे, वे दौड़ते हुए तेरे पास जायेंगे। यह इसलिए होगा कि प्रभु, तेरा ईश्वर, इस्राएल का परमपावन ईश्वर, तुझे महिमान्वित करेगा।

6) “जब तक प्रभु मिल सकता है, तब तक उसके पास चली जा। जब तक वह निकट है, तब तक उसकी दुहाई देती रह।

7) पापी अपना मार्ग छोड़ दे और दुष्ट अपने बुरे विचार त्याग दे। वह प्रभु के पास लौट आये और वह उस पर दया करेगा; क्योंकि हमारा ईश्वर दयासागर है।

8) प्रभु यह कहता है- तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं।

9) जिस तरह आकश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।

10) जिस तरह पानी और बर्फ़ आकाश से उतर कर भूमि सींचे बिना, उसे उपजाऊ बनाये और हरियाली से ढके बिना वहाँ नहीं लौटते, जिससे भूमि बीज बोने वाले को बीज और खाने वाले को अनाज दे सके,

11) उसी तरह मेरी वाणी मेरे मुख से निकल कर व्यर्थ ही मेरे पास नहीं लौटती। मैं जो चाहता था, वह उसे कर देती है और मेरा उद्देश्य पूरा करने के बाद ही वह मेरे पास लौट आती है।

पाठ 6 - बारूक Bar 3:9-15, 32-4,4.

15) कौन प्रज्ञा के निवासस्थान तक पहुँचा है? किसने उसके खजाने में प्रवेश किया है?

32) सर्वज्ञ ही उसका मार्ग जानता है, उसने अपनी बुद्धि से उसका पता लगाया है। उसने सदा के लिए पृथ्वी की नींव डाली है और उसे जीव-जन्तुओं से भर दिया है।

33) वह प्रकाश भेज देता है और वह फैल जाता है। वह उसे वापस बुलाता है और वह काँपते हुए उसकी आज्ञा मानता है।

34) तारे अपने-अपने स्थान पर आनन्दपूर्वक जगमगाते रहते हैं;

35) जब वह उन्हें बुलाता है, तो वे उत्तर देते, “हम प्रस्तुत हैं“; और वे अपने निर्माता के लिए आनन्द पूर्वक चमकते हैं।

36) वही हमारा ईश्वर है। उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।

37) उसने ज्ञान के सभी मार्गों का पता लगाया है और उसे अपने सेवक याकूब को, अपने परमप्रिय इस्राएल को बता दिया है।

38) इस पर प्रज्ञा पृथ्वी पर प्रकट हुई और उसने मनुष्यों के बीच निवास किया।

1) प्रज्ञा यह है- ईश्वर की आज्ञाओं का ग्रन्थ, वह संहिता, जो सदा बनी रहेगी। जो उसका पालन करेगा, वह जीता रहेगा; जो उसे छोड़ देगा, वह मर जायेगा।

2) याकूब! लौट कर उसे ग्रहण करो, उसके प्रकाश में महिमा की ओर आगे बढ़ो।

3) न तो दूसरों को अपना गौरव दो और न विदेशियों को अपना विशेष अधिकार।

4) इस्राएल! हम कितने सौभाग्यशाली है! ईश्वर की इच्छा हम पर प्रकट की गयी है।

पाठ 7 - एज़ेकिएल 36:16-17अ, 18-28.

16) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई पड़ी,

17) "मानवपुत्र! इस्राएल के लोगों ने, अपनी निजी देश में रहते समय, उसे अपने आचरण और व्यवहार से अशुद्ध कर दिया।

18) उन्होंने देश में रक्त बहा कर और देवमूर्तियों को स्थापित कर उसे अपवित्र कर दिया, इसलिए मैंने उन पर अपना क्रोध प्रदार्शित किया।

19) मैंने उन्हें राष्ट्रों में तितर-बितर कर दिया और वे विदेशों में बिखर गये। मैंने उनके आचरण और व्यवहार के अनुसार उनका न्याय किया है।

20) उन्होंने दूसरे राष्ट्रों में पहुँच कर मेरे पवित्र नाम का अनादर कराया। लोग उनके विषय में कहते थे, ’यह प्रभु की प्रजा है, फिर भी इन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा।’

21) परंतु मुझे अपने पवित्र नाम का ध्यान है, जिसका अनादर इस्राएलियों ने देश-विदेश में, जहाँ वे गये थे, कराया है।

22) "इसलिए इस्राएल की प्रजा से कहना- प्रभु-ईश्वर यह कहता हैः इस्राएल की प्रजा! मैं जो करने जा रहा हूँ वह तुम्हारे कारण नहीं करूँगा, बल्कि अपने पवित्र नाम के कारण, जिसका अनादर तुम लोगों ने देश-विदेश में कराया।

23) मैं अपने महान् नाम की पवित्रता प्रमाणित करूँगा, जिस पर देश-विदेश में कलंक लग गया है और जिसका अनादर तुम लोगों ने वहाँ जा कर कराया है। जब मैं तुम लोगों के द्वारा राष्ट्रों के सामने अपने पवित्र नाम की महिमा प्रदर्शित करूँगा, तब वे जान जायेंगे कि मैं ही प्रभु हूँ।

24) "मैं तुम लोगों को राष्ट्रों में से निकाल कर और देश-विदेश से एकत्र कर तुम्हारे अपने देश वापस ले जाऊँगा।

25) मैं तुम लोगों पर पवित्र जल छिडकूँगा और तुम पवित्र हो जाओगे। मैं तुम लोगों को तुम्हारी सारी अपवित्रता से और तुम्हारी सब देवमूर्तियों के दूषण से शुद्ध कर दूँगा।

26) मैं तुम लोगों को एक नया हृदय दूँगा और तुम में एक नया आत्मा रख दूँगा। मैं तुम्हारे शरीर से पत्थर का हृदय निाकल कर तुम लोगों को रक्त-मांस का हृदय प्रदान करूँगा।

27) मैं तुम लोगों में अपना आत्मा रख दूँगा, जिससे तुम मेरी संहिता पर चलोगे और ईमानदारी से मेरी आज्ञाओं का पालन करोग।

28) तुम लोग उस देश में निवास करोगे, जिसे मैंने तुम्हारे पूर्वजों को दिया है। तुम मेरी प्रजा होगे और मैं तुम्हारा ईश्वर होऊँगा।

पाठ 8 – रोमियों 6:3-11.

3) क्या आप लोग यह नहीं जानते कि ईसा मसीह का तो बपतिस्मा हम सबों को मिला है, वह उनकी मृत्यु का बपतिस्मा हैं?

4) हम उनकी मृत्यु का बपतिस्मा ग्रहण कर उनके साथ इसलिए दफनाये गये हैं कि जिस तरह मसीह पिता के सामर्थ्य से मृतकों में से जी उठे हैं, उसी तरह हम भी एक नया जीवन जीयें।

5) यदि हम इस प्रकार उनके साथ मर कर उनके साथ एक हो गये हैं, तो हमें भी उन्हीं की तरह जी उठना चाहिए।

6) हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा पुराना स्वभाव उन्हीं के साथ क्रूस पर चढ़ाया जा चुका हैं, जिससे पाप का शरीर मर जाये और हम फिर पाप के दास न बने;

7) क्योंकि जो मर चुका है, वह पाप की गुलामी से मुक्त हो गया हैं।

8) हमें विश्वास है कि यदि हम मसीह के साथ मर गये हैं, तो हम उन्ही के जीवन के भी भागी होंगे;

9) क्योंकि हम जानते हैं कि मसीह मृतको में से जी उठने के बाद फिर कभी नहीं मरेंगे। अब मृत्यु का उन पर कोई वश नहीं।

10) वह पाप का हिसाब चुकाने के लिए एक बार मर गये और अब वह ईश्वर के लिए ही जीते हैं।

11) आप लोग भी अपने को ऐसा ही समझें-पाप के लिए मरा हुआ और ईसा मसीह में ईश्वर के लिए जीवित।

पाठ 9 - मत्ती 28:1-10.

पाठ 9 - मत्ती 28:1-10.

1) विश्राम-दिवस के बाद, सप्ताह के प्रथम दिन, पौ फटते ही, मरियम मगदलेना और दूसरी मरियम कब्र देखने आयीं।

2) एकाएक भारी भुकम्प हुआ। प्रभु का एक दूत स्वर्ग से उतरा, कब्र के पास आया और पत्थर अलग लुढ़का कर उस पर बैठ गया।

3) उसका मुखमण्डल बिजली की तरह चमक रहा था और उसके वस्त्र हिम के सामान उज्ज्वल थे।

4) दूत को देख कर पहरेदार थर-थर काँपने लगे और मृतक -जैसे हो गये।

5) स्वर्गदूत ने स्त्रियों से कहा, "डरिए नहीं। मैं जानता हूँ कि आप लोग ईसा को ढूँढ़ रही हैं, जो कू्रस पर चढ़ाये गये थे।

6) वे यहाँ नहीं हैं। वे जी उठे हैं, जैसा कि उन्होंने कहा था। आइए और वह जगह देख लीजिए, जहाँ वे रखे गये थे।

7) अब सीधे उनके शिष्यों के पास जा कर कहिए, ’वे मृतकों में से जी उठे हैं। वह आप लोगों से पहले गलीलिया जायेंगे, वहाँ आप लोग उनके दर्शन करेंगे’। यही आप लोगों के लिए मेरा सन्देश है।"

8) स्त्रियाँ शीघ्र ही कब्र के पास से चली गयीं और विस्मय तथा आनन्द के साथ उनके शिष्यों को यह समाचार सुनाने दौड़ीं।

9) ईसा एकाएक मार्ग में स्त्रियों के सामने आ कर खड़े हो गये और उन्हें नमस्कार किया। वे आगे बढ़ आयीं और उन्हें दण्डवत् कर उनके चरणों से लिपट़ गयीं।

10) ईसा ने उनसे कहा, "डरो नहीं। जाओ और मेरे भाइयों को यह सन्देश दो कि वे गलीलिया जायें। वहाँ वे मेरे दर्शन करेंगे।"

📚 मनन-चिंतन

प्रभु येसु का पुनर्जीवित होना सबों के लिए एक अविश्वनीय घटना थी। शिष्यों एवं अन्य लोगों को विश्वास करना असंभव था। जब तक प्रभु येसु ने उन्हें प्रर्याप्त प्रमाण नहीं दिये, तब तक वे उन्हें पहचान नहीं पा रहे थे। प्रभ येसु का जी उठना धर्मग्रन्थ की भविष्यवाणी के अनुसार अनिवार्य था। प्रभुयेसु को जीवित देखकर शिष्यों का विश्वास और भी अधिक गहरा हुआ, और वे इस घटना के साक्षी बने।

शिष्य लोग दृढ़ता के साथ कहते हैं कि इस घटना को जिसकों हमने हमारी आखों से देखा है, उसके साक्षी हम हैं। उन्हें लोगों ने क्रुस पर चढ़ा कर मार डाला, परन्तु ईश्वर ने उन्हें तीसरे दिन जिलाया और प्रकट होने दिया, उनके सामने जिन्हें ईश्वर ने चुन लिया था।

संत पौलूस हमसे कहते हैं, “मसीह ही आपका जीवन हैं”।मसीह ही जीवन हैं, जैसे कि उन्होंने कहा, “मार्ग, सत्य और जीवन में ही हूँ”।हमें जीवन देने हेतु वे क्रूस धारण कर मर गये, पुर्नजीवित होकर हमें नव जीवन दिया है। हम भी प्रभु के दुःखभोग, मरण एवं पुनरूथान की इस घटना के साक्षी बनें। शिष्यों की भांति हम इस संदेश को सारी मानव जाति के साथ बाटें।

क्या हम पुर्नजीवित प्रभु के साक्षी बनते हैं? आइये, हम अपने जीवन के द्वारा पुनर्जीवित प्रभु के साक्षी बनें।



📚 REFLECTION

The resurrection of the Lord Jesus was an unbelievable event for all. It was impossible for the disciples and others to believe. They were not able to recognize Him until the Lord Jesus gave them sufficient proofs. The resurrection of the Lord Jesus was certain according to the prophecies of the scriptures. Seeing the Lord Jesus alive, the faith of the disciples deepened even more, and they became witnesses of this event.

The disciples assert that we are the witnesses of the event which we have seen with our own eyes. He was killed by the people by crucifixion, but God resurrected him on the third day and allowed him to appear before those whom God had chosen.

Saint Paul tells us, "Christ is your life". Christ is the life, as he said, "I am the way, the truth and the life". He died on the cross to give us life, being resurrected has given us new life. Let us also be witnesses to this event of the Lord's suffering, death and resurrection. Like disciples, let us share this message with all mankind.

Do we become witnesses of the risen Lord? Let us bear witness to the risen Lord through our lives.

📚 मनन-चिंतन -2

येसु सचमुच जी उठे। अल्लेलूया!

प्रिय दोस्तों, आज वही मध्य रात्रि है जब मृत्यु परास्त हो गयी, जब शैतान हार गया और आज वही मध्य रात्रि है जब ज्योति ने अंधकार को हरा कर हमें मुक्ति का रास्ता दिखाया।

येसु मसीह का पुनरुत्थान मुक्ति इतिहास का वो अद्भुत घटना है जो 2000 वर्ष पूर्व घटी और जिसे हम आज पास्का जागरण के रूप में मना रहें हैं। पुनरुत्थान और उसके बाद की घटनों ने पूरे संसार को बदल कर रख दिया। प्रभु येसु का पुनरुत्थान का क्या महत्व है? यह इसलिए महत्व है क्योकि अगर पुनरुत्थान नहीं हुआ होता तो येसु मसीह के अनुयायी आज तक की तारीख में इतना कभी भी नहीं फैल पाते। यहॉं पर अनुयायियों को मतलब केवल ख्रीस्तीय ही नहीं परन्तु वे लोग भी हैं जिन्होंने बपतिस्मा तो नहीं लिया परन्तु येसु के पक्के विश्वासी और पक्के अनुयायी है। पुनरुत्थान के बिना यह नया रास्ता येसु के मृत्यु समय ही समाप्त हो जाता।

पुनरुत्थान वह घटना है जो येसु के कू्रस मरण के तीन दिन बाद घटित हुई। किसी ने भी येसु को पुनर्जिवित होते हुए नहीं देखा, यहॉं तक कि उनके शिष्यों ने भी नहीं। कोई भी पुनरुत्थान प्रक्रिया का साक्षी नहीं है। परंतु बहुतों ने पुनरुत्थान के दो महत्वपूर्ण प्रमाण को देखा और बताया हैं, जिसे हम आज के सुसमाचार में भी पढ़ते हैं; वह है येसु की खाली कब्र और पुनर्जिवित प्रभु।

उस खाली कब्र और पुनर्जीवित प्रभु की सबसे प्रथम साक्षी मरियम मगदलेना है। संत मत्ती के सुसमाचार में हम पढ़ते है कि मरियम मगदलेना और दूसरी मरियम कब्र के नजदीक गये और एक दूत ने उन्हे यह संदेश दिया कि येसु जी उठे हैं, आओ और वह जगह देखों जहॉं उन्हें रखा गया था। वह यहॉं नहीं है। इसके बाद जब वे यह बात शिष्यों को बताने जा रहें थे, पुनर्जीवित प्रभु उनके सामने प्रकट हुए।

येसु का खाली कब्र यह बताता है कि येसु शरीर के साथ पुनर्जीवित हो गये क्योंकि उनका पार्थिव शरीर वहॉं पर नहीं था। आज तक किसी ने भी येसु के शरीर को खोज निकालने या उसको पाने का दावा नहीं कर पाया हैं। बस महायाजको एवं नेताओं द्वारा झूठी कहानी फैलायी गयी कि येसु के शिष्योें ने येसु का शरीर चुरा लिया। अगर ऐसा होता तो रोमी सैनिकों ने बाद में इसका पता लगा के उसे अपने गिरफ्त में कर लिया होता। इससे परे येसु का शरीर ले जाने का कोई मतलब भी नहीं था। येसु का शरीर ले जाकर भी कोई क्या करता। शिष्यगण उस समय स्वयं इतने भयभीत थे कि उन्होनें येसु के कब्र के नजदीक जाने की भी नहीं सोची होगी।

प्रभु येसु का दर्शन बताता है कि येसु पुनर्जीवित शरीर के साथ प्रकट हुए, सबसे पहले मरियम मगदलेना के सामने और बाद में शिषयों के सामने।

प्रभु येसु का पुनरुत्थान हमें कई चीज़ बताता हैः

1. प्रभु येसु ने मृत्यु पर विजय पायी है; अभी तक येसु के सिवाय किसी ने मृत्यु को नहीं हराया।

2. येसु जीवित है। वे पवित्र त्रित्व के दूसरे व्यक्ति है और वे एक जिंदा ईश्वर है।

3. पुनरुत्थान सभी विश्वासियों की आशा है कि अगर हम मसीह के साथ मर जाएंगे, तो हम उन्हीं के जीवन के भी भागी होंगे। (रोम. 6ः8)

येसु मसीह एक जिंदा ईश्वर है, वह ईश्वर जिसने मृत्यु को हराकर हमारे लिए अनंत जीवन का द्वार खोल दिया हैं।

आज के पाठों द्वारा हमें मालूम होता है कि किस प्रकार ईश्वर ने सबकुछ को सृष्ट किया और मनुष्य को अपने ही प्रति रूप बनाया तथा समय समय पर अपने लोगों को विभिन्न प्रकार की विपत्तियों से बचाया और अंत में येसु के पुनरुत्थान द्वारा सारी मानवजाति की आत्माओं को जो जीवित है और जो मर चुके हैं दोनो को बचाने की एक योजना बनाई।

येसु का पुनरुत्थान ने मृत्यु के बाद के जीवन का उत्तर दे दिया। अभी तक किसी को अच्छी तरह से मालूम नहीं था कि मृत्यु के बाद क्या होता है, परन्तु येसु के पुनरुत्थान के बाद हमें अनंत जीवन की वास्तविकता पता चली। येसु ने हमारे लिए द्वार खोल दिये है अब हमें प्रभु येसु द्वारा प्रतिज्ञा की गई उस अनंत जीवन में प्रवेश करने के लिए अपने आप को तैयार करना होगा। सारी मानव जाति के लिए येसु ही वह रास्ता जो हमें अनंत जीवन तक ले जाती हैं। उन पर विश्वास ही हमें उनके पद्चिन्हों पर चलने के लिए मदद देगा। पुनरुत्थान का सामार्थ हमें पुनर्जीवित प्रभु में विश्वास करने में सहायता करें तथा पुनर्जीवित प्रभु उनके द्वारा की गई प्रतिज्ञा को पाने में हमारी मदद करें। आमेन


📚 REFLECTION

Jesus is risen indeed. Alleluia!

Dear friends, tonight is that night when the death has been conquered, when Satan has been defeated and tonight is the time where light has overcome the darkness and showed us the way for salvation.

Resurrection of Jesus Christ is the remarkable event in the Salvation History which happened 2000 years back and tonight we are celebrating that day as Easter vigil. Resurrection and post resurrection experience has changed the whole world. Why resurrection of Jesus is very important? Because if there would have been no resurrection the followers of Jesus Christ would have never increased till date. Followers what I mean here is not only Christians but also those who might have not taken baptism but are strong believer and follower of Jesus. Without Resurrection this way of living would have diminished then and there itself with the death of Jesus.

Resurrection was the event which took place three days after the death of Jesus on the cross. No one has witnessed Resurrection of Jesus in itself, not even the disciples. It means to say that nobody saw how Jesus was raised. But many have seen and given the two important proofs of Resurrection, which we read in today’s gospel also; i.e. the empty tomb and the Risen Lord.

Mary Magdalene was the first person who witnessed empty tomb and the Risen Lord. In the Gospel of St. Matthew we read Mary Magdalene with other Mary came to the tomb and then an angel gave them the message that Jesus is risen, come and see where he has been laid. He is not here. After this when they were going to tell the disciples, the Risen Lord appeared to them.

Jesus empty tomb tells that Jesus was risen with the body as the body of Jesus was not there. Till date nobody can say that anybody has found the body of Jesus. Only the false allegation was put by the chief priest and elders to say that the disciples have stolen the body. But it would have been so the Roman soldier would have caught the body later too. All the more there was no reason to take Jesus’ body. What anyone would have done by taking Jesus body. Disciples they themselves were very frighten at that moment that they might have not even thought to go near to Jesus’ tomb.

The appearances of the Risen Lord tell that Jesus appeared in the resurrected body, first and foremost to Mary Magdalene and later to the disciples.

Resurrection of Jesus tells us many things:

1. Jesus has conquered the death: Till now no one has conquered death except Jesus.

2. Jesus is alive. He is the second person of the Holy Trinity and He is a living God.

3. Resurrection is the hope for all the believers that if we die with Christ we will also live with Christ. (Rom. 6:8)

Jesus Christ is living God, a God who has conquered death and has opened the door of life for us, that is eternal life.

From today’s readings we can find how God created everything and He created Human being in his own image and time to time God saved his people from various adversaries and at last He has the plan to save the soul of whole humanity who are dead and who are alive by the Resurrection of Jesus.

The Resurrection of Jesus gave the answer for life after death. Till now many did not know what will happen after death but after the Resurrection of Jesus we are sure of the eternal life. Jesus has opened the door to us and now we have to prepare ourselves to enter that eternal life promised by Jesus. Jesus is the way for the whole humanity which leads to eternal life. Believing in him will help us to follow his footsteps. May the power of Resurrection help us to believe in the Risen Lord and may the Risen Lord help us to strive for the promise which he has promise us. Amen


प्रभात का मिस्सा बलिदान
पहला पाठ : प्रेरित-चरित 10:34a. 37-43

34) पेत्रुस ने कहा, "मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

37) नाज़रेत के ईसा के विषय में यहूदिया भर में जो हुआ हैं, उसे आप लोग जानते हैं। वह सब गलीलिया में प्रारंभ हुआ-उस बपतिस्मा के बाद, जिसका प्रचार योहन किया था।

38) ईश्वर ने ईसा को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से विभूषित किया और वह चारों ओर घूम-घूम कर भलाई करते रहें और शैतान के वश में आये हुए लोगों को चंगा करते रहें, क्योंकि ईश्वर उनके साथ था

39) उन्होंने जो कुछ यहूदिया देश और येरुसालेम में किया, उसके साक्षी हम हैं। उन को लोगों ने क्रूस के काठ पर चढ़ा कर मार डाला;

40) परंतु ईश्वर ने उन्हें तीसरे दिन जिलाया और प्रकट होने दिया-

41) सारी जनता के सामने नहीं, बल्कि उन साक्षियों के सामने, जिन्हें ईश्वर ने पहले ही से चुन लिया था। वे साक्षी हम हैं। मृतकों में से उनके जी उठने के बाद हम लोगों ने उनके साथ खाया-पिया

42) और उन्होंने हमें आदेश दिया कि हम जनता को उपदेश दे कर घोषित करें कि ईश्वर ने उन्हें जीवितों और मृतकों का न्यायकर्ता नियुक्त किया हैं।

43) उन्हीं के विषय में सब नबी घोषित करते है कि जो उन में विश्वास करेगा, उसे उनके नाम द्वारा पापों की क्षमा मिलेगी।"

📙 दूसरा पाठ : कलोसियों 3:1-4

1) यदि आप लोग मसीह के साथ ही जी उठे हैं- जो ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं- तो ऊपर की चीजें खोजते रहें।

2) आप पृथ्वी पर की नहीं, ऊपर की चीजों की चिन्ता किया करें।

3) आप तो मर चुके हैं, आपका जीवन मसीह के साथ ईश्वर में छिपा हुआ है।

4) मसीह ही आपका जीवन हैं। जब मसीह प्रकट होंगे, तब आप भी उनके साथ महिमान्वित हो कर प्रकट हो जायेंगे।

अथवा दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 5: 6b-8.

6) आप लोगों का आत्मसन्तोष आप को शोभा नहीं देता। क्या आप यह नहीं जानते कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे सने हुए आटे को ख़मीर बना देता है?

7) आप पुराना ख़मीर निकाल कर शुद्ध हो जायें, जिससे आप नया सना हुआ आटा बन जायें। आप को बेख़मीर रोटी-जैसा बनना चाहिए क्योंकि हमारा पास्का का मेमना अर्थात् मसीह बलि चढ़ाये जा चुके हैं।

8) इसलिए हमें न तो पुराने खमीर से और न बुराई और दुष्टता के खमीर से बल्कि शुद्धता और सच्चाई की बेख़मीर रोटी से पर्व मनाना चाहिए।

📚 सुसमाचार योहन 20:1-9

1) मरियम मगदलेना सप्ताह के प्रथम दिन, तडके मुँह अँधेरे ही कब्र के पास पहुँची। उसने देखा कि कब्र पर से पत्थर हटा दिया गया है।

2) उसने सिमोन पेत्रुस तथा उस दूसरे शिष्य के पास, जिसे ईसा प्यार करते थे, दौडती हुई आकर कहा, "वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।"

3) पेत्रुस और वह दूसरा शिष्य कब्र की ओर चल पडे।

4) वे दोनों साथ-साथ दौडे। दूसरा शिष्य पेत्रुस को पिछेल कर पहले कब्र पर पहुँचा।

5) उसने झुककर यह देखा कि छालटी की पट्टियाँ पडी हुई हैं, किन्तु वह भीतर नहीं गया।

6) सिमोन पेत्रुस उसके पीछे-पीछे चलकर आया और कब्र के अन्दर गया। उसने देखा कि पट्टियाँ पडी हुई हैं।

7) और ईसा के सिर पर जो अँगोछा बँधा था वह पट्टियों के साथ नहीं बल्कि दूसरी जगह तह किया हुआ अलग पडा हुआ है।

8) तब वह दूसरा शिष्य भी जो कब्र के पास पहले आया था भीतर गया। उसने देखा और विश्वास किया,

9) क्योंकि वे अब तक धर्मग्रन्थ का वह लेख नहीं समझ पाये थे कि जिसके अनुसार उनका जी उठना अनिवार्य था।

अथवा - सुसमाचार लूकस 24:1-12

1) सप्ताह के प्रथम दिन, पौ फटते ही, वे तैयार किये हुए सुगन्धित द्रव्य ले कर क़ब्र के पास गयीं।

2) उन्होंने पत्थर को क़ब्र से अलग लुढ़काया हुआ पाया,

3) किन्तु भीतर जाने पर उन्हें प्रभु ईसा का शव नहीं मिला।

4) वे इस पर आश्चर्य कर ही रही थीं कि उजले वस्त्र पहने दो पुरुष उनके पास आ कर खड़े हो गये।

5) स्त्रियों ने भयभीत हो कर धरती की ओर सिर झुका लिया। उन पुरुषों ने उन से कहा, "आप लोग जीवित को मृतकों में क्यों ढूँढ़ती हैं?

6) वे यहाँ नहीं हैं- वे जी उठे हैं। गलीलिया में रहते समय उन्होंने आप लोगों से जो कहा था, वह याद कीजिए।

7) उन्होंने यह कहा था कि मानव पुत्र को पापियों के हवाले कर दिया जाना होगा, क्रूस पर चढ़ाया जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा।"

8) तब स्त्रियों को ईसा का यह कथन याद आया।

9) कब्र से लौट कर मरियम मगदलेना, योहन्ना, और याकूब की माता मरियम ने यह सब ग्यारहों और दूसरे शिष्यों को भी बताया।

10) जो अन्य नारियाँ उनके साथ थीं, उन्होंने भी प्रेरितों से यही कहा;

11) परन्तु उन्होंने इन सब बातों को प्रलाप ही समझा और स्त्रियों पर विश्वास नहीं किया।

12) फिर भी पेत्रुस उठ क़र दौड़ते हुए क़ब्र के पास पहुँचा। उसने झुक कर देखा कि पट्टियों के अतिरिक्त वहाँ कुछ भी नहीं है और वह इस पर आश्चर्यचकित हो कर चला गया।

📚 मनन-चिंतन

बिल विलसन एक अमेरिकन सैनिक था जिसने यूरोप में अपनी नियुक्ति के दौरान शराब पीने की आदत डाल ली थी। अमेरिका वापस आने पर भी उसकी शराब की लत बनी रही। वह लगभग 2 दशकों तक वह निरंतर शराब पीता रहा। इस दौरान इस वजह से उसकी आर्थिक स्थिति बर्बाद हो गयी। उसका पारिवारिक जीवन तथा स्वास्थ्य भी टूटने की कगार पर था। इस बीच उसकी मुलाकात उसके पुराने पियक्कड दोस्त से होती है जो उसे बताता की येसु ने उसे चंगा कर दिया है तथा उसने शराब पीना छोड दिया है। बिल का उसकी बात हास्यास्पद लगी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई शराब पीना छोड सकता है। इस घटना के कुछ ही महीने बाद दिसंबर 1934 में बिल को एक दिव्य अनुभव हुआ। वह मेनहटन के पुर्नवास क्रेन्द में अपना इलाज करवा रहा था। वह अत्यत पीडा में था। ’’वह कई दिनों तक अपने होशोहवास में नहीं था। शराब न मिलने के कारण उसे ऐसा लग रहा था मानो कीडे उसके खून में दौड रहे हो। दर्द के कारण वह अपने हाथ-पैर भी नहीं चला पा रहा था। अपनी इस पीडा में वह कहता है, ’’अगर ईश्वर है तो वह आये। मैं सबकुछ करने को तैयार हूं।’’ उसी समय उसका कमरा एक सफेद रोशनी से भर गया, उसका दर्द खत्म हो गया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो वह किसी पहाड की उचाई पर हो जहॉ आत्मा हवा में बह रहा हो। वह एकदम से मुक्त हो गया।

इसके बाद बिल विलसन ने कभी शराब नहीं पी। अगले छत्तीस साल बिल लोगों की शराब-मुक्ति के पुर्नावास के कार्यों में लगा रहा। उसने अल्कोहल अनोनिमस की स्थापना की जिससे लगभग एक करोड लोगों की शराब मुक्ति में सहायता की।

येसु से एक भेंट या उनके इस अनुभव ने एक शराबी को शराब के विरूद्ध चलाने वाला आंदोलनकारी बना दिया। यह उस परिवर्तन का अद्वितीय उदाहरण है जो पुनरूत्थित येसु के बाद होता है। येसु का पुनरूत्थान हमारे विश्वास की धूरी है। संत पौलुस कुरिंथियों के नाम अपने पहले पत्र में इस सत्य के बारे में लिखते हैं, ’’यदि मसीह नहीं जी उठे, तो हमारा धर्मप्रचार व्यर्थ है और आप लोगों का विश्वास भी व्यर्थ है। (1 कुरि.15:14) पुनरूत्थान सारी मानवजाति के लिये एक मोड है। यह मोड है क्योंकि हमारा विश्वास मात्र मृत्यु उपरांत जीवन में नहीं बल्कि उस जीवन में हैं जो हमें मसीह में विश्वास, उनकी मृत्यु तथा पुन जी उठने से प्राप्त होता है। पुनरूत्थान के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है जो मनुष्य इसमें विश्वास एवं अनुभव करता है उसका जीवन मूल रूप से बदल जाता है।

संत पौलुस के लिये पुनर्जीवित येसु से भेंट एक परिवर्तनकारी घटना थी। वे कलीसिया तथा ख्राीस्तीयों पर अत्याचार करते थे। किन्तु जब वे दमिश्क जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें, येसु नाजरी, जिन पर वे अब तक अत्याचार कर रहे थे, के दर्शन होते हैं। इस घटना के बाद पौलुस का जीवन तथा उसका लक्ष्य एकदम से बदल गया। अब वह जिस येसु पर अत्याचार किया करता था का सबसे निष्ठावान अनुयायी बन गया था। वह उसके जीवन की सभी उपलब्धियों को तुच्छ तथा मसीह के ज्ञान को ही श्रेष्ठ समझने लगा। ’’इतना ही नहीं, मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ,....मैं यह चाहता हूँ कि मसीह को जान लूँ, उनके पुनरूत्थान के सामर्थ्य का अनुभव करूँ और मृत्यु में उनके सदृश बन कर उनके दुःखभोग का सहभागी बन जाऊँ, जिससे मैं किसी तरह मृतकों के पुनरूत्थान तक पहुँच सकूँ।’’ (फिल्लिपियों 3:8,10-11)

शिष्यों के जीवन में भी पुनरूत्थान के बाद आमूलचूल परिवर्तन आये। वे अनपढ मछुआरे थे। उन्हें येसु के दुखभोग, मृत्यु तथा पुनरूत्थान को समझने के लिये साहस तथा व्यापक समझ की कमी थी। येसु के गिरफ्तार होते ही वे उन्हें छोडकर तितर-बितर हो गये। पेत्रुस ने तो उन्हें पहचानने से भी इंकार कर दिया था। वे इतने डर गये थे कि उन्हें कुछ पर भी विश्वास करना मुश्किल लग रहा था। लेकिन येसु ने पुनरूत्थान का साक्ष्य कई बार अपने दर्शनों के द्वारा दिये। जिससे शिष्यों का येसु के पुनरूत्थान में विश्वास पक्का हो गया था। अब वे साहस के साथ उसका साक्ष्य दे रहे थे। उनका विश्वास एवं साहस देखकर सभी विस्मित हो गये थे, ’’पेत्रुस और योहन का आत्मविश्वास देखकर और इन्हें अशिक्षित तथा अज्ञानी जान कर, महासभा के सदस्य अचम्भे में पड़ गये। फिर, वे पहचान गये कि ये ईसा के साथ रह चुके हैं,’’ (प्रेरित चरित 4:13) अब वे येसु के नाम के कारण दुख भोगने को भी तैयार थे, ’’इस पर पेत्रुस और अन्य प्रेरितों ने यह उत्तर दिया, ष्मनुष्यों की अपेक्षा ईश्वर की आज्ञा का पालन करना कहीं अधिक उचित है। इन बातों के साक्षी हम हैं और पवित्र आत्मा भी, जिसे ईश्वर ने उन लोगों को प्रदान किया है, जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। प्रेरित इसलिए आनन्दित हो कर महासभा के भवन से निकले कि वे {ईसा के} नाम के कारण अपमानित होने योग्य समझे गये।’’ (प्रेरित चरित 5:29-32,41)

प्रेरितगण प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी हर जगह बडे साहस और निडरता के साथ सुसमाचार का प्रचार करने लगे थे। इनमें से कईयों ने तो मरने से पूर्व घोर यातनायें सही किन्तु हार नहीं मानी। उनका विश्वास तथा आस्था बहुत गहरा था। यह सब उनका प्रभु के जीवित होने में विश्वास के कारण था। हम भी प्रभु के पुनरूत्थान में विश्वास करते हैं किन्तु शायद उसका रूपांतरित करने वाला अनुभव हम से दूर है। हम प्रार्थना करे कि प्रभु की दया से हम भी उनके पुनरूत्थान का अनुभव कर सकें।

📚 REFLECTION

Bill Wilson was an American soldier who picked up drinking habit during his days on duty to Europe. After returning from the military, he continued drinking and with the passage of time became completely observed in it. His drinking continued for almost two decades. During this period, he was financially completely ruined. His family life tattered and health on the cusp collapse. He was told by his alcoholic friend that God had healed him and consequently completely given up drinking. Bill Wilson laughed at the thought of being sobriety. But a few months later, in December 1934, Wilson had a revelatory experience while in a Manhattan rehab centre. The only thing, he found, that would relieve his pain from the detox drug was prayer.

“For days he hallucinated. The withdrawal pains made it feel as if insects were crawling across his skin. He was so nauseous he could hardly move, but the pain was too intense to stay still. “If there is a God, let Him show Himself!” I am ready to do anything. Anything!” At that moment a white light filled his room, the pain ceased and he felt as if he were on a mountaintop and that a wind not of air but of spirit was blowing. I was free man.

Bill Wilson would never have another drink. For next thirty-six years he would devote himself to founding, building and spreading Alcoholics Anonymous until it became the largest, most well-known and successful habit changing organization in the world. Since then, Alcoholics Anonymous has helped an estimated 10 million people get sober.

An encounter with Jesus turned an alcoholic into in to a crusader against the alcohol. It is just an example of the transformation one has when encounter the risen Lord. The resurrection of Jesus has been the axis of our faith. St. Paul’s points out, “In vain is our faith if Christ has not been risen.” (1 Cor.15:14)

Resurrection has been the turning point for the whole humanity. Our faith not merely in life after death but a life with God which we gain through the death and resurrection of the Christ. A life in risen-Christ is eternal which we gain through our faith in Christ and his death and resurrection.

One of the most significant things about resurrection is the transformation it brings about in the life of people who accept this truth and live in their life.

For St. Paul encountering the Lord Jesus was a transforming reality. He was a persecutor of the Church and he could go on to any extend to persecute the Christians. However, on the way to Damascus he encountered Jesus of Nazareth whom he was persecuting. This encounter completely turned about the life and its purposes for him. Now Paul becomes one of the staunchest supporters of Jesus. He would count everything as a thrash in comparing with the knowing the Christ, “I regard everything as loss because of the surpassing value of knowing Christ Jesus my Lord… I want to know Christ and the power of his resurrection and the sharing of his sufferings by becoming like him in his death, if somehow I may attain the resurrection from the dead.” (Philippians 3:8,10-11) So far the only ambition of Paul was to persecute any attempt of proclaiming Jesus as risen but now is the champion of this cause.

The change in the life of the apostles too had been exceptionally great. They were illiterate fishermen. They lacked courage and understanding of the Jesus’ passion, death and resurrection. They run away as soon as Jesus was arrested. Peter even refused to recognise him. they were freight to the point of disbelieve. However, after meeting the risen Jesus they became bold and irresistible. They were no longer in hiding but rather in open preaching and performing miracles. Their new found courage and wisdom baffled the authorities, “Now when they saw the boldness of Peter and John and realized that they were uneducated and ordinary men, they were amazed and recognized them as companions of Jesus. (Acts 3:13) They were willing to suffer and to die. They responded, “We must obey God rather than any human authority. The God of our ancestors raised up Jesus, whom you had killed by hanging him on a tree… And we are witnesses to these things, and so is the Holy Spirit whom God has given to those who obey him.’…As they left the council, they rejoiced that they were considered worthy to suffer dishonour for the sake of the name. (Acts 5:29-32,41)

The Apostles went about everywhere daring the inclement and hostile conditions preaching the risen Lord. Most of them before being martyred suffered a great pain and torture. Their conviction and faith were of astronomical heights. It was due to the experience of the risen Lord. We too perhaps believe in the resurrection but lack the transforming experience of risen Lord. Let us Pray and earnestly seek the risen Lord for God would not hold back anything good from us.

मनन-चिंतन -2

अगर आप मुझ से पूछते हैं कि येसु के बारह शिष्यों में से किस शिष्य का पास्का-अनुभव सबसे अनोखा था, मैं निसन्देह यह कहूँगा कि प्रेरित योहन का पास्का अनुभव ही सब से अनोखा था।

योहन अपने को ’येसु का प्यारा’ शिष्य कहते हैं। बारहों में से तीन शिष्यों का एक विशेष स्थान था। वे थे पेत्रुस, योहन और याकूब। वे येसु के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के समय उनके साथ थे और वे उन घटनाओं के साक्षी थे। इन में येसु का रूपान्तरण, सभागृह के अधिकारी की बेटी को जीवनदान और बारी में प्राणपीड़ा आदि शामिल हैं। इन शिष्यों को दूसरे शिष्यों की अपेक्षा ज़्यादा अनुभव और शिक्षा मिलती थी। फ़िर भी इस में से सिर्फ़ योहन कलवारी पहाड़ी की ओर येसु की यात्रा में शामिल होते हैं और येसु के क्रूसमरण के साक्षी बनते हैं। क्रूस के नीचे योहन इस दुनिया के इतिहास की सबसे दुखद घटना के साक्षी थे। येसु के साथ होने तथा येसु का समर्थन करने का आरोप लगने की संभावना और उसके फलस्वरूप आने वाली कठिनाईयों को नज़रअंदाज करते हुए वे येसु के क्रूस-रास्ते के समय भी उनका अनुसरण करते हैं।

गलीलिया के समुद्र के किनारे से हो कर जाते हुए येसु ने उन्हें बुलाते हुए कहा था: “मेरे पीछे चले आओ”। शायद उन्हें लगातार वह आवाज सुनायी दे रही थी। उन्हें मालूम था कि मुझे हमेशा येसु के पीछे चलना है – न केवल ताबोर पर्वत चढ़ते समय या येरूसालेम में प्रवेश करते समय, बल्कि कलवारी पहाड़ी की चोटी तक येसु का अनुसरण करना है। उन्हीं के सामने येसु को पकडा गया, कोडों से मारा गया, काँटों का मुकुट पहनाया गया उनके कंधे पर एक भारी क्रूस रखा गया, उनके कपडे उतारे गये और उनके हाथों में कीले ठोंके गये। जीवन और मृत्यु के बीच के येसु के संघर्ष को उन्होंने अपनी आँखों से देखा। टूटे दिल और टूटी आशा के साथ क्रूस के नीचे खडे उस शिष्य को दिलासा देने के लिए कोई नहीं था। पीड़ा की तीव्रता में उन्हें लग रहा था कि मेरा कलेजा टूट रहा है। अचानक क्रूस पर टंगे येसु के मुँह से एक आवाज निकल आती है। येसु आँसु और रक्त के सम्मिश्रण से भरी आँखें खोल कर अपनी माँ से कहते हैं, “भद्रे, यह तेरा पुत्र है”। योहन को आश्चर्य हुआ कि गुरुजी अपने अकथनीय और असीम दुख को भी भूल कर मेरे प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं। योहन दंग रह गये। येसु की आवाज़ मेघों को चीर कर फिर आती है। अब योहन ने देखा कि येसु मुझ से कुछ कह रहे हैं, “यह तुम्हारी माता है”।

जिन्होंने उन से कहा था “मेरा अनुसरण करो”, अब वह उन से उसी आवाज में मरियम को अपनी माँ बनाने को कहते हैं। मरियम का दिल भी टूट गया था, पर उनकी आशा नहीं टूटी थी। वह नहीं टूटेगी क्योंकि ईश्वर उन्हें आशाहीनों का आसरा बना चुका था। मरियम की संगति में योहन की आशा टूटते-टूटते बच गयी।

मरियम और योहन येसु की मृत्यु के साक्षी बनते हैं। अरिमथिया के यूसुफ़ और निकोदेमुस की सहायता से वे येसु की लाश को कब्र में रख कर दोनों शोकाकुल हो घर जाते हैं। समय बीत नहीं रहा था। आँखें सूख गयी थी। क्रूस-रास्ते की दर्दनाक घटनाएं अब भी उन्हें दिखायी दे रही थी। घंटें बीत गये। जो शिष्य भाग गये थे, वे एक-एक कर के वापस आने लगे। उनमें सामने के दरवाजे से अंदर घुसने का मनोबल नहीं था। पीछे के दरवाजे से अन्दर घुसते समय वे माता मरियम और योहन की ओर देखने में संकोच महसूस करते थे। वे शर्मिन्दा थे। पेत्रुस तो फूट-फूट कर रो रहे थे। परन्तु माता-मरियम ने स्वयं के दर्द को अपने विशाल हृदय में छिपाकर उन्हें सान्त्वना दी होगी। विनाश के पुत्र को छोड, पूरे ग्यारह शिष्य आ गये। माता मरियम और योहन के साथ सब घटनाओं के साक्षी बन कर पहले से ही कुछ महिलाएं सम्मिलित थी। योहन ने अन्य प्रेरितों को सब कुछ बताया; वे सब अपने व्यवहार के लिए शर्मिन्दा थे। लेकिन माता मरियम ने सबों को ढ़ाढ़स बँधाया और आशा दिलायी।

रविवार की सुबह की रोशनी ने वातावरण को पूरी तरह बदल दिया। ईश्वर के पुत्र के मनुष्य बन कर इस दुनिया में आने का अनुभव सब से पहले माता मरियम को ही प्राप्त हुआ था। पुनर्जीवित प्रभु का अनुभव भी, मैं समझता हूँ, उन्हें हीं प्राप्त हुआ होगा। परन्तु मरियम पहले से ही सब कुछ अपने हृदय में संचित रखती थी और हृदय भर जाने पर शब्द नहीं निकल पाते। खबर मिलते ही योहन पेत्रुस के साथ कब्र की ओर दौड़ लगाते हैं। योहन पेत्रुस को पीछे धकेल कर पहले कब्र पहुँचते हैं। वास्तविकता ने उनकी आशाओं को भी पार किया था। उन्हें विश्वास हुआ कि येसु जीवित हैं और येसु मृत्यु को भी पराजित कर चुके थे। “मृत्यु कहाँ है तेरी विजय? मृत्यु, कहाँ है तेरा दंश?” (1 कुरिन्थियों 15:55) कई सालों के बाद योहन ने अपने अनुभव को संक्षेप में लिखा, “जो तुम में हैं, वह उस से भी महान हैं, जो संसार में हैं” (1 योहन 4:4)।

हमारे जीवन को भी पास्का त्योहार एक नई दिशा और नई चेतना प्रदान कर सकता है। हो सकता है कि हम भी दस प्रेरितों के समान देर से आने वाले होंगे। परन्तु कभी नहीं से देर भली।

✍ -Br. BiniushTopno



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Praise the Lord!