मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Duliajan, Assam, India
Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

09 जनवरी 2022, इतवा

 

09 जनवरी 2022, इतवार

प्रभु येसु का बपतिस्मा



📒 पहला पाठ : इसायाह 42:1-4, 6-7


1) “यह मेरा सेवक है। मैं इसे सँभालता हूँ। मैंने इसे चुना है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मैंने इसे अपना आत्मा प्रदान किया है, जिससे यह राष्ट्रों में धार्मिकता का प्रचार करे।

2) यह न तो चिल्लायेगा और न शोर मचायेगा, बाजारों में कोई भी इसकी आवाज नहीं सुनेगा।

3) यह न तो कुचला हुआ सरकण्डा ही तोड़ेगा और न धुआँती हुई बत्ती ही बुझायेगा। यह ईमानदारी से धार्मिकता का प्रचार करेगा।

4) यह न तो थकेगा और न हिम्मत हारेगा, जब तक यह पृथ्वी पर धार्मिकता की स्थापना न करे; क्योंकि समस्त द्वीप इसी शिक्षा की प्रतीक्षा करेंगे।“

6) “मैं प्रभु, ने तुम को न्याय के लिए बुलाया और तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम को सँभाला है। मैंने तुम्हारे द्वारा अपनी प्रजा को एक विधान दिया और तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बनाया है,

7) जिससे तुम अन्धों की दृष्टि दो, बन्दियों को मुक्त करो। और अन्धकार में रहने वालों को ज्योति प्रदान करो।



📕 अथवा - पहला पाठ : इसायाह 40:1-5, 9-11


1) तुम्हारा ईश्वर यह कहता है, “मेरी प्रजा को सान्त्वना दो, सान्त्वना दो।

2) यरुसालेम को ढारस बँधओ और पुकार कर उस से यह कहो कि उसकी विपत्ति के दिन समाप्त हो गये हैं और उसके पाप का प्रायश्चित हो चुका है। प्रभु-ईश्वर के हाथ से उसे सभी अपराधों का पूरा-पूरा दण्ड मिल चुका हैं।“

3) यह आवाज़ आ रही है, “निर्जन प्रदेश में प्रभु का मार्ग तैयार करो। हमारे ईश्वर के लिए मैदान में रास्ता सीधा कर दो।

4) हर एक घाटी भर दी जाये। हर एक पहाड़ और पहाड़ी समतल की जाये, खड़ी चट्ठान को मैदान और कगार को घाटी बना दिया जाये।

5) तब प्रभु-ईश्वर की महिमा प्रकट हो जायेगी और सब शरीरधारी उसे देखेंगे; क्योंकि प्रभु ने ऐसा ही कहा है।“

9) सियोन को शुभ सन्देश सुनाने वाले! ऊँचे पहाड़ पर चढ़ो। यरुसालेम को शुभ सन्देश सुनाने वाले! अपनी आवाज़ ऊँची कर दो। निडर हो कर यूदा के नगरों से पुकार कर यह कहोः “यही तुम्हारा ईश्वर है।“

10) देखो प्रभु-ईश्वर सामध्र्य के साथ आ रहा है। वह सब कुछ अपने अधीन कर लेगा। वह अपना पुरस्कार अपने साथ ला रहा है और उसका विजयोपहार भी उसके साथ है।

11) वह गड़ेरिये की तरह अपना रेवड़ चराता है। वह मेमने को उठा कर अपनी छाती से लगा लेता और दूध पिलाने वाली भेडें धीरे-धीरे ले चलता है।



📕 दूसरा पाठ : प्रेरित-चरित 10:34-38


34) पेत्रुस ने कहा, "मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

35) मनुष्य किसी भी राष्ट्र का क्यों न हो, यदि वह ईश्वर पर श्रद्धा रख कर धर्माचरण करता है, तो वह ईश्वर का कृपापात्र बन जाता हैं।

36) ईश्वर ने इस्राएलियों को अपना संदेश भेजा और हमें ईसा मसीह द्वारा, जो सबों के प्रभु हैं, शांति का सुसमाचार सुनाया।

37) नाज़रेत के ईसा के विषय में यहूदिया भर में जो हुआ हैं, उसे आप लोग जानते हैं। वह सब गलीलिया में प्रारंभ हुआ-उस बपतिस्मा के बाद, जिसका प्रचार योहन किया था।

38) ईश्वर ने ईसा को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से विभूषित किया और वह चारों ओर घूम-घूम कर भलाई करते रहें और शैतान के वश में आये हुए लोगों को चंगा करते रहें, क्योंकि ईश्वर उनके साथ था


📕 अथवा - दूसरा पाठ : तीतुस 2:11-14, 3:4-7


11) क्योंकि ईश्वर की कृपा सभी मनुष्यों की मुक्ति के लिए प्रकट हो गयी है।

12) वह हमें यह शिक्षा देती है कि अधार्मिकता तथा विषयवासना त्याग कर हम इस पृथ्वी पर संयम, न्याय तथा भक्ति का जीवन बितायें

13) और उस दिन की प्रतीक्षा करें, जब हमारी आशाएं पूरी हो जायेंगी और हमारे महान् ईश्वर एवं मुक्तिदाता ईसा मसीह की महिमा प्रकट होगी।

14) उन्होंने हमारे लिए अपने को बलि चढ़ाया, जिससे वह हमें हर प्रकार की बुराई से मुक्त करें और हमें एक ऐसी प्रजा बनायें जो शुद्ध हो, जो उनकी अपनी हो और जो भलाई करने के लिए उत्सुक हो।

3:4) किन्तु हमारे मुक्तिदाता ईश्वर की कृपालुता तथा मनुष्यों के प्रति उसका प्रेम पृथ्वी पर प्रकट हो गया।

5) उसने नवजीवन के जल और पवित्र आत्मा की संजीवन शक्ति द्वारा हमारा उद्धार किया। उसने हमारे किसी पुण्य कर्म के कारण ऐसा नहीं किया, बल्कि इसलिए कि वह दयालु है।

6) उसने हमारे मुक्तिदाता ईसा मसीह द्वारा हमें प्रचुर मात्रा में पवित्र आत्मा का वरदान दिया,

7) जिससे हम उसकी कृपा की सहायता से धर्मी बन कर अनन्त जीवन के उत्तराधिकारी बनने की आशा कर सकें।



📕 सुसमाचार : लूकस 3:15-16,21-22


15) जनता में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी और योहन के विषय में सब मन-ही-मन सोच रहे थे कि कहीं यही तो मसीह नहीं है।

16) इसलिए योहन ने सबों से कहा, "मैं तो तुम लोगों को जल से बपतिस्मा देता हूँ; परन्तु एक आने वाले हैं, जो मुझ से अधिक शक्तिशाली हैं। मैं उनके जूते का फ़ीता खोलने योग्य नहीं हूँ। वह तुम लोगों को पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देंगे।

21) सारी जनता को बपतिस्मा मिल जाने के बाद ईसा ने भी बपतिस्मा ग्रहण किया। इसे ग्रहण करने के अनन्तर वह प्रार्थना कर ही रहे थे कि स्वर्ग खुल गया।

22) पवित्र आत्मा कपोत-जैसे शरीर के रूप में उन पर उतरा और स्वर्ग से यह वाणी सुनाई दी, "तू मेरा प्रिय पुत्र है। मैं तुझ पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।"


📚 मनन-चिंतन


संत योहन बपतिस्ता ने स्वीकार किया कि येसु उनसे अधिक महान है। उन्होंने इस बात की गवाही भी दी कि प्रभु येसु लोगों को पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देंगे। फिर भी येसु संत योहन बपतिस्ता से बपतिस्मा प्राप्त करना चाहते थे। संत योहन बपतिस्ता का बपतिस्मा पश्चाताप और मसीह के स्वागत की तैयारी का प्रतीक था। फिर भी येसु पापी मानवता के प्रतिनिधि के रूप में बपतिस्मा लेने के लिए संत योहन के पास पहुंचे। जब वह पश्चाताप के बपतिस्मा को स्वीकार कर रहे थे तो वह हमारे पापी मानव-स्वभाव को धारण कर रहे थे। येसु ने यर्दन नदी में हर इंसान का प्रतिनिधित्व किया और ईश्वर की ओर मुड़ने के लिए मानवता की इच्छा व्यक्त की। त्रिएक ईश्वर यर्दन में उपस्थित थे। पिता की आवाज ने येसु को अपना प्रिय पुत्र घोषित किया। पवित्र आत्मा उन पर कबूतर के रूप में उतरे। हमारे बपतिस्मा में हमें पवित्र त्रिएक ईश्वर की संगति में शामिल होने के लिए बुलाया जाता है। आइए हम हमेशा उनमें बने रहें और उज्ज्वल रहें।



📚 REFLECTION

St. John the Baptist acknowledged Jesus to be much greater than himself. He testified to the fact that Jesus was the one who was to baptize people with Holy Spirit and fire. Yet Jesus wanted to receive baptism from St. John. The baptism of St. John the Baptist was one of repentance and preparation to receive the Messiah. Yet Jesus as a representative of sinful humanity approached St. John to receive baptism. He was carrying our sinful nature as he approached the baptism of repentance. Jesus represented every human being at the Jordan expressing the willingness of humanity to turn to God. The whole Holy Trinity was present at the Jordan. There was the Father’s voice acknowledging Jesus to be His beloved Son. The Holy Spirit descended on him in the form of a dove. At our baptism we are called into the communion of the Holy Trinity. Let us always remain in him and be radiant.


📚 मनन-चिंतन -02


संत योहन बपतिस्ता द्वारा दिया गया बपतिस्मा पश्चाताप का बपतिस्मा था। योहन बपतिस्ता के उपदेश सुनने के बाद अपने पापों के लिए पश्चात्ताप महसूस करने वाले पापियों ने अपने जीवन की दिशा बदलने का निर्णय व्यक्त किया। उनके पश्चाताप के संकेत के रूप में उन्हें यर्दन नदी में बपतिस्मा दिया गया था। अब सवाल उठता है कि योहन द्वारा येसु को बपतिस्मा क्यों दिया गया था। क्या वे पापी थे कि उन्हें पश्चात्ताप करना तथा बपतिस्मा लेना पड़ा? धर्मग्रन्थ कहता है, "तुम जानते हो कि मसीह पाप हरने के लिए प्रकट हुए। उन में कोई पाप नहीं है।“ (1योहन 3: 5)। संत पेत्रुस कहते हैं, "उन्होंने कोई पाप नहीं किया और उनके मुख से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली" (1पेत्रुस 2:22)। वास्तव में, येसु ने यर्दन नदी में अपने आप को संत योहन बपतिस्ता के सामने प्रस्तुत कर पापी मानवजाति का प्रतिनिधित्व किया। संत पौलुस यह स्पष्ट करते हैं, "मसीह का कोई पाप नहीं था। फिर भी ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए उन्हें पाप का भागी बनाया, जिससे हम उनके द्वारा ईश्वर की पवित्रता के भागी बन सकें।" (2कुरिन्थियों 5:21)। नबी इसायाह ने इस बारे में भविष्यवाणी की थी, “वह हमारे ही रोगों को अपने ऊपर लेता था और हमारे ही दुःखों से लदा हुआ था और हम उसे दण्डित, ईश्वर का मारा हुआ और तिरस्कृत समझते थे। हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया है। हमारे कूकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शान्ति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं। हम सब अपना-अपना रास्ता पकड़ कर भेड़ों की तरह भटक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सब के पापों का भार डाला है।“ (इसायाह 53: 4-6) येसु ने संत योहन बपतिस्ता के सामने यर्दन नदी में खड़े होकर मेरा और आपका प्रतिनिधित्व किया। आइए हम उनके सामने सिर झुकायें और हमें शुध्द करने के लिए धन्यवाद दें।


📚 REFLECTION


The Baptism administered by St. John the Baptist was one of repentance. The sinners, who felt sorry for their sins after listening to the preaching of John, expressed their decision to change the course of their lives. As a sign of their repentance they were baptized in the river Jordan. Now the question arises as to why Jesus was baptized by John. Was he sinful that he had to repent and receive Baptism? The Scripture says, “You know that he was revealed to take away sins, and in him there is no sin” (1Jn 3:5). St. Peter says, “He committed no sin, and no deceit was found in his mouth” (1Pet 2:22). In fact, Jesus represented the sinful humanity at the river Jordan when he presented himself before John to be baptized by him. St. Paul makes this clear when he says, “For our sake he made him to be sin who knew no sin, so that in him we might become the righteousness of God” (2Cor 5:21). Isaiah had prophesied about this, “Surely he has borne our infirmities and carried our diseases; yet we accounted him stricken, struck down by God, and afflicted. But he was wounded for our transgressions, crushed for our iniquities; upon him was the punishment that made us whole, and by his bruises we are healed. All we like sheep have gone astray; we have all turned to our own way, and the Lord has laid on him the iniquity of us all.” (Is 53:4-6) Jesus stood in the river in front of St. John the Baptist representing me and you. Let us bow before him and thank him for cleansing us in himself.



प्रवचन

ख्रीस्त में प्यारे भाइयों-बहनों आज माता कलीसिया प्रभु के बपतिस्मा का त्यौहार मना रही है। आज के प्रथम पाठ में नबी इसायस प्रभु येसु के बारे भविष्यवाणी करते हैं। बाइबिल में नबी ईश्वर के प्रवक्ता थे। अतः ईश्वर नबियों के जरिये मनुष्यों तक अपना संदेश पहुचाते थे। जब नबी यह कहते हैं- ‘‘यह मेरा सेवक है। मैं इसे सॅंभालता हॅूं। मैंने इसे चुना है। मैं इस पर अत्यंत प्रसन्न हॅू। मैंने इसे अपना आत्मा प्रदान किया है ....’’ यह वचन स्वयं नबी का नहीं अपितु यह वचन ईश्वर का है जिसे आज के सुसमाचार में पुनः दुहराया जाता है। इस प्रकार नबी इसायस के जरिये ईश्वर ने जो येसु के संबंध में कहा था, पूर्ण होता है। योहन पाप क्षमा का उपदेश देकर लोगों को बपतिस्मा दे रहा था। येसु ने कोई पाप नहीं किया था। येसु निषपाप थे। अतः उन्हें बपतिस्मा लेने की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी येसु बपतिस्मा लेते हैं। क्यों? येसु बपतिस्मा ग्रहण कर हमारी मानवीयता में भाग लेते हैं। हमारे पापों को अपने ऊपर लेते हैं। सुसमाचार के अन्य जगहों में हम येसु को यह कहते हुए पाते हैं कि उन्हें एक और बपतिस्मा लेना है। वह बपतिस्मा उनका सूली पर मरना है। इस प्रकार येसु हमारे पापों के लिए पश्चाताप करते हैं, हमारे पापों के लिए दुःख सहते हैं। हमारे पापों के कारण उन्हें मृत्यु सहना पड़ता है। इस प्रकार वे हमें हमारे पापों से मुक्ति देते हैं।

येसु के बपतिस्मा के बाद स्वर्ग खुल गया और ईश्वर का आत्मा कपोत के रूप में उतरा और येसु के ऊपर ठहर गया। येसु ने पवित्र आत्मा को ग्रहण किया। उन पर पवित्र आत्मा की मोहर लग गयी।

कलीफोर्निया पुलिस एवं अदालत ने किशोरों में एक ऐसी गोदन (टैटू) पायी है जो कि कॉंस्मेटिक सजावट से बढ़कर है। कुछ वर्ष पहले किशोर अपराध न्यायालय के न्यायाधीश ने कलीफोर्निया में यह पाया कि किशोरों की बहुत बड़ी संख्या जो उनके समक्ष पेश की जा रही थी उनके हाथों, उंगलियों एवं चेहरों में गोदन थी। उन्हें बाद में पता चला कि यह गोदन उनके किसी विशेष गिरोह में होने की पहचान थी जो कि अधिकतम किसी ड्रग के उपभोगकर्ता थे। ऐसी बहुत सी गोदन युवाओं द्वारा ही की गयी थी जो कि इसके सदस्य होने को बेकरार थे। न्यायधीश ने बाद में यह भी पता किया कि जिन किशोरों में यह गोदन प्रत्यक्ष थे वे वास्तव में नौकरी से निकाले गये थे क्योंकि संभावित नियोक्ता गोदन को अपराध एंव अक्षमता समझते थे और इन्हे नौकरी देने से इन्कार कर देते थे। न्यायाधीश ने लोस एन्जेल्स प्रदेश के चिकित्सा संघ के सदस्यों से पूछा - यदि कोई प्लास्टिक सर्जन बिना पैसा लिए बाल-अपराधियों के गोदन को मिटा सकता है। डाक्टर कार्ल स्टेन एक लोस एन्जेल्स के बहुत मशहूर प्लास्टीक सर्जन स्वेच्छा से आगे आये। 1981 ई. से इन्होंने सैकड़ों युवा रोगियों के गोदन कोष्शल्यचिकित्सा द्वारा उच्छेदनकर, रगड़कर, लेज़र से और लगभग सभी जाने गये तरीकों से मिटाया था।

हमारी बपतिस्मा एक गोदन है। पवित्र आत्मा द्वारा अमिट रूप से मुद्रित किया गया है जो हमारे येसु के शिष्य होने की पहचान है। कोई भी सर्जन इसे न मिटा सकता है और न ही हटा सकता है। यह मोहर या गोदन भले ही हमारे बुरे कर्मो, वचनों एंव सोचों से धूमिल हो सकता है, पाप रूप गन्दगी उसे भले ही दबा सकती है। परन्तु यह न कभी धुलेगा न मिटगा और न ही हटेगा।

सुसमाचार कहता है-‘‘स्वर्ग में यह वाणी सुनाई दी -यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हॅू।’’ येसु के बपतिस्मा के पशचात स्वर्ग से पवित्र आत्मा कपोत के रूप में उतरा। इसके बाद ही ‘‘यह मेरा प्रिय पुत्र है।’’ वाणी सुनाई दी। याने कि हमारे बपतिस्मा में जब हम पर पवित्र आत्मा की मोहर लगायी गयी है, हम येसु के शिष्य और ईश्वर के पुत्र-पुत्रियां बन गये। पर क्या हमारे पड़ोसी या लोग पवित्र आत्मा की मोहर जो हमारी येसु के शिष्य व ईश्वर के पुत्र होने का पहचान है देख पाते हैं? जब-जब हम लोगों को निःस्वार्थ भाव से प्रेम करते हैं यह मोहर या गोदन लोगों को नजर आता है। जब-जब लोग हमें दुःख पहुंचाते हैं और हम बदला लेने के बजाय क्षमा करते हैं तो पवित्र आत्मा की मोहर को लोग महसूस करते हैं। जब-जब हम अपने अत्याचारियों व दुश्मनों के लिए प्रार्थना करते हैं, हमारे दुश्मन व अत्याचारी हम पर पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं। जब-जब हम भूखों को खिलाते, प्यासें को पिलाते, नगों को कपड़ा पहनाते और बंदियों से मिलने जाते हैं तो ये लोग हम पर पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं। जब-जब हम दीन-दुखियों की सेवा करते हैं तब दीन-दुखी हम पर लगी पवित्र आत्मा की मोहर क अहसास कर सकते हैं। जब-जब हम अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करते है तो हमारे पड़ोसी हम पर लगी पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं। जब हम येसु के शिष्य व ईश्वर के पुत्र-पुत्री के भॉंति जीवन जीते हैं तो लोग हम पर पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं। संक्षिप्त में, जब हम ईश्वर की इच्छा व योजना या ईश्वर के वचन के अनुसार जीवन जीते हैं तो लोग हम पर लगे पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं।

तो ख्रीस्त में प्यारे भाइयो-बहनों आइये आज जब हम प्रभु येसु के बपतिस्मा का त्योहार मना रहें हैं तो हम ईश्वर से इस कृपा के लिए प्रार्थना करें कि हम ऐसा जीवन जीयें ताकि हमारे अड़ोस-पड़ोस के लोग, समाज व संसार हम पर लगी पवित्र आत्मा की मोहर को देख सके, महसूस कर सके।


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

08 जनवरी 2022, शनिवार

 

08 जनवरी 2022, शनिवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का शनिवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : 1 योहन 5:14-21

14) हमें ईश्वर पर यह भरोसा है कि यदि हम उसकी इच्छानुसार उस से कुछ भी मांगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।

15) यदि हम यह जानते हैं कि हम जो भी मांगे, वह हमारी सुनता है, तो हम यह भी जानते हैं कि हमने जो कुछ मांगा है, वह हमें मिल गया है।

16) यदि कोई अपने भाई को ऐसा पाप करते देखता है, जो प्राणघातक न हो, तो वह उसके लिए प्रार्थना करे और ईश्वर उसका जीवन सुरक्षित रखेगा। यह उन लोगों पर लागू है, जिनका पाप प्राणघातक नहीं है; क्योंकि एक पाप ऐसा भी होता है जो प्राणघातक है। उसके विषय में मैं नहीं कहता कि प्रार्थना करनी चाहिए।

17) हर अधर्म पाप है, किन्तु हर पाप प्राणघातक नहीं है।

18) हम जानते हैं कि ईश्वर की सन्तान पाप नहीं करती। ईश्वर का पुत्र उसकी रक्षा करता है और वह दुष्ट के वंश में नहीं आती।

19) हम जानते हैं कि हम ईश्वर के हैं, जबकि समस्त संसार दुष्ट के वश में है।

20) हम जानते हैं कि ईश्वर का पुत्र आया है और उसने हमें सच्चे ईश्वर को पहचानने का विवेक दिया है। हम सच्चे ईश्वर में निवास करते हैं; क्योंकि हम उसके पुत्र ईसा मसीह में निवास करते हैं। यही सच्चा ईश्वर और अनन्त जीवन है।

21) बच्चो! असत्य देवताओं से अपने को बचाये रखो।


सुसमाचार : योहन 3:22-30


22) इसके बाद ईसा अपने शिष्यों के साथ यहूदिया प्रदेश आये और वहाँ उनके साथ रहे। वे बपतिस्मा देते थे।

23) योहन भी सलीम के निकट एनोन में बपतिस्मा दे रहा था, क्योंकि वहाँ बहुत पानी था। लोग वहाँ आ कर बपतिस्मा ग्रहण करते थे।

24) योहन उस समय तक गिरफ़्तार नहीं हुआ था।

25) योहन के शिष्यों और यहूदियों में शुद्धीकरण के विषय में विवाद छिड़ गया।

26) उन्होंने योहन के पास जा कर कहा, "गुरुवर! देखिए, जो यर्दन के उस पार आपके साथ थे और जिनके विषय में आपने साक्ष्य दिया, वह बपतिस्मा देते हैं और सब लोग उनके पास जाते हैं"।

27) योहन ने उत्तर दिया, "मनुष्य को वही प्राप्त हो सकता हे, जो उसे स्वर्ग की ओर से दिया जाये।

28) तुम लोग स्वयं साक्षी हो कि मैंने यह कहा, ‘मैं मसीह नहीं हूँ’। मैं तो उनका अग्रदूत हूँ।

29) वधू वर की ही होती है; परन्तु वर का मित्र, जो साथ रह कर वर को सुनता है, उसकी वाणी पर आनन्दित हो उठता है। मेरा आनन्द ऐसा ही है और अब वह परिपूर्ण है।

30) यह उचित है कि वे बढ़ते जायें और मैं घटता जाऊँ।"


📚 मनन-चिंतन


जब संत योहन बपतिस्ता ने येसु की बढ़ती हुई प्रसिद्धि के बारे में सुना, तो उन्होंने कहा, "वह बढ़ता जाये और मैं घटता जाऊँ”। उनके इस बयान में उनकी विनम्रता झलकती है। विनम्रता महानों का गुण है। कोई आश्चर्य नहीं कि येसु ने योहन बपतिस्ता के बारे में कहा, "मैं तुम से कहता हूँ, मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई नहीं।" (लूकस 7:28)। हम मरियम, जोसेफ, मूसा, दाऊद और उन सभी में नम्रता का गुण देख सकते हैं जिन्होंने ईमानदारी से प्रभु की सेवा की। प्रवक्ता 3:17 में सभी लोगों के लिए एक सलाह है, "पुत्र! नम्रता से अपना व्यवसाय करो और लोग तुम्हें दानशील व्यक्ति से भी अधिक प्यार करेंगे।।” संत पौलुस कहते हैं, "आप दलबन्दी तथा मिथ्याभिमान से दूर रहें। हर व्यक्ति नम्रतापूर्वक दूसरों को अपने से श्रेष्ठ समझे।" (फिलिप्पियों 2:3)



📚 REFLECTION



When John the Baptist heard about the increasing fame of Jesus, he said, “He must increase, but I must decrease”. His humility becomes evident in this statement. Humility is a quality of the great. No wonder Jesus said about him, “I tell you, among those born of women no one is greater than John” (Lk 7:28). We can see the virtue of humility in Mary, Joseph, Moses, David and all who served the Lord faithfully. In Sir 3:17 we have an advice for everyone, “My child, perform your tasks with humility; then you will be loved by those whom God accepts.” St. Paul says, “Do nothing from selfish ambition or conceit, but in humility regard others as better than yourselves.” (Phil 2:3)


📚 मनन-चिंतन -02


आज का सुसमाचार हमारे समक्ष योहन बप्तिस्ता की विनम्रता का चित्र प्रस्तुत करता है। वह ऐसे स्थान पर बपतिस्मा दे रहे थे जहाँ बहुत सारे लोगों का आना-जाना लगा रहता था, इसलिए उनके पास बहुत सारे लोग बपतिस्मा ग्रहण करने के लिए आते थे। वह उनके ज्वलंत शब्दों को सुनकर बेचैन हो जाते थे। ना केवल सन्त योहन के वचनों से बल्कि उनके सादा जीवन से भी बहुत अधिक प्रभावित होते थे। वह जो प्रवचन देते थे उसका अपने जीवन में पालन भी करते थे, इसलिए बहुत सारे लोग उनके वचन सुनने के लिए उमड़ पड़ते थे। उनके भी अनेक शिष्य थे, और कुछ लोगों ने तो उन्हें गुरुवर कहकर पुकारना भी शुरू कर दिया था। किसी भी व्यक्ति को इतना सम्मान और उपलब्धि मिलने के बाद उसके मन में घमण्ड और अहंकार का जन्म लेना स्वाभाविक है, जो बाद में घृणा एवं ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं को जन्म देते हैं।

लेकिन हम देखते हैं कि योहन बप्तिस्ता इस तरह की नकारात्मक शक्तियों से अछूते रहते हैं, उन्हें अपनी वास्तविक पहचान मालूम है। लोग उन्हें चाहे जैसे भी बुलाएँ या कैसा भी सम्मान दें, उन्हें यह अच्छी तरह मालूम था कि वह केवल ईश्वर के मेमने की ओर इंगित करने वाला चिन्ह मात्र था। लोग चिन्ह अथवा संकेत को ही अपनी मंज़िल ना समझ लें। इसलिए वह उन्हें याद दिलाते हैं, “मैं मसीह नहीं हूँ लेकिन उनके आगे भेजा हुआ दूत हूँ,,,वह बढ़ते जाएँ और मैं घटता जाऊँ।” क्या मैं स्वयं के सम्मान के लिए कार्य करता हूँ या ईश्वर की महिमा के लिए? क्या मैं चाहता हूँ कि मुझमें और मेरे परिवार में ईश्वर बढ़ता जाए?



📚 REFLECTION


Today’s gospel witnesses before us about the humility of the John the Baptist. He was baptising in a place where lots of people could come, and so many people came to him and were baptised. They listened to his burning words that could stir their hearts. They were deeply impressed not only by his bold words but also by his life style. He practised what he preached and had always people around him to listen to him. He had a circle of disciples, some people even gave him the title of Rabbi. After getting such honour and achievement, pride and ego can creep in easily, which can give birth to other negative feelings like hatred and jealousy.

But we see John is untouched by these negative forces, he is well aware of his identity. Whatever people call him or in whichever way they treat him, he was well aware that he was only sign which indicated towards the lamb of God. People should not confuse the sign or indicator with the destination. So he reminds them “I am not messiah but I have been sent ahead of him…he must increase but I must decrease.” Do I seek self glory or glory of God? Do I want God to increase in me and my family?


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry.blogspot.com
Praise the Lord!

07 जनवरी 2022, शुक्रवार

 

07 जनवरी 2022, शुक्रवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का शुक्रवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

⭐ पहला पाठ : 1 योहन 5:5-13


5) संसार का विजयी कौन है? केवल वही, जो यह विश्वास करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं।

6) ईसा मसीह जल और रक्त से आये - न केवल जल से, बल्कि जल और रक्त से। आत्मा इसके विषय में साक्ष्य देता है, क्योंकि आत्मा सत्य है।

7) इस प्रकार ये तीन साक्ष्य देते हैं-

8) आत्मा, जल और रक्त और तीनों एक ही बात कहते हैं।

9) हम मनुष्यों का साक्ष्य स्वीकार करते हैं, किन्तु ईश्वर का साक्ष्य निश्चय ही कहीं अधिक प्रामाणिक है। ईश्वर ने अपने पुत्र के विषय में साक्ष्य दिया है।

10) जो ईश्वर के पुत्र में विश्वास करता है, उसके हृदय में ईश्वर का वह साक्ष्य विद्यमान है। जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, वह उसे झूठा समझता है; क्योंकि वह पुत्र के विषय में ईश्वर का साक्ष्य स्वीकार नहीं करता

11) और वह साक्ष्य यह है - ईश्वर ने अपने पुत्र द्वारा हमें अनन्त जीवन प्रदान किया है।

12) जिसे पुत्र प्राप्त है, उसे वह जीवन प्राप्त है और जिसे पुत्र प्राप्त नहीं है, उसे वह जीवन प्राप्त नहीं।

13) तुम सभी ईश्वर के पुत्र के नाम में विश्वास करते हो। मैं तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूँ, जिससे तुम यह जानो कि तुम्हें अनन्त जीवन प्राप्त है।


⭐ सुसमाचार : लूकस 5:12-16



12) किसी नगर में ईसा के पास एक मनुष्य आया, जिसका शरीर कोढ़ से भरा हुआ था। वह ईसा को देख कर मुँह के बल गिर पड़ा और विनय करते हुए यह बोला, "प्रभु! आप चाहें, तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।

13) ईसा ने हाथ बढ़ा कर यह कहते हुए उसका स्पर्श किया, "मैं यही चाहता हूँ-शुद्ध जो जाओ"। उसी क्षण उसका कोढ़ दूर हो गया।

14) ईसा ने उसे किसी से कुछ न कहने का आदेश दिया और कहा, "जा कर अपने को याजक को दिखाओ और अपने शुद्धीकरण के लिए मूसा द्वारा निर्धारित भेंट चढ़ाओं, जिससे तुम्हारा स्वास्थ्यलाभ प्रमाणित हो जाये"

15) ईसा की ख्याति बढ़ रहीं थी। भीड़-की-भीड़़ उनका उपदेश सुनने और अपने रोगों से छुटकारा पाने के लिए उनके पास आती थी,

16) और वे अलग जा कर एकान्त स्थानों में प्रार्थना किया करते थे।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार के कोढ़ी की प्रार्थना मानव इतिहास की सब से प्रभावशाली प्रार्थनाओं में से एक है। "आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं"। यद्यपि वह अत्यधिक आवश्यकता महसूस करता है, वह ईश्वरीय इच्छा के प्रति अपने आप को समर्पित करता है। ईश्वर की इच्छा की तलाश करना और उसे स्वीकार करना सबसे अच्छा कार्य है जो एक इंसान कर सकता है। हमारी इच्छाएँ और अभिलाषाएं अपूर्ण हैं, परन्तु ईश्वर की इच्छा परिपूर्ण है। प्रभु जानते हैं कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। इसलिए, हमारे लिए ईश्वर की इच्छा के सामने आत्मसमर्पण करना सबसे अच्छा है। गतसमनी की वाटिका में येसु ने प्रार्थना की, “मेरे पिता! यदि हो सके, तो यह प्याला मुझ से टल जाये। फिर भी मेरी नही, बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो।" (मत्ती 26:39)। कोढ़ी की प्रार्थना येसु की इस प्रार्थना के बहुत करीब आती है। आइए हम उनकी तरह प्रार्थना करना सीखें।



📚 REFLECTION



The leper who meets Jesus makes one of the best prayers a human being can utter. “If you wish, you can make me clean”. Although he is in utter need, he surrenders to the divine will. Seeking and accepting the will of God is the best a human being can do. Our desires and wishes are imperfect, but God’s will is perfect. The Lord knows what is best for us. Therefore, it is best for us to surrender to the will of God. In the garden of Gethsemane Jesus prayed, “My Father, if it is possible, let this cup pass from me; yet not what I want but what you want.” (Mt 26:39). The prayer of this leper comes very close to this prayer of Jesus. Let us learn to pray like him.



📚 मनन-चिंतन - 02



हमारे आज के मनन-चिंतन में प्रभु येसु आज एक कोढ़ी को चंगा करते हैं। पुराने ज़माने में कोढ़ एक भयंकर बीमारी के रूप में जाना जाता था। जिन लोगों को यह रोग हो जाता तो वे ना केवल शारीरिक रूप से कष्ट उठाते क्योंकि उनकी शरीर गलकर सड़ने लगता, बल्कि वे समाज और धर्म से बहिष्कृत किए जाने का दर्द भी सहते थे। उन्हें शापित मानकर समाज और लोगों से दूर निकाल दिया जाता था। वे एक मारे हुए इंसान से भी बदतर थे, ना उनके पास स्वास्थ्य था, ना समाज में कोई स्थान, ना इंसान जैसी गरिमा और ना ही आरामदायक या सम्माजनक मृत्यु ही उन्हें नसीब होती थी। वह कोढ़ी प्रभु येसु से आग्रह करता है, “यदि आप चाहें तो मुझे चंगा कर सकते हैं।” वह ईश्वर जो मानवजाति को बचाने के लिए धरती पर आए, वह इस कोढ़ी को बचना नहीं चाहेंगे? आप उनसे आग्रह करके देखिए, वह आपके लिए जो उत्तम है वही करेंगे।

उस कोढ़ी को चंगा कर प्रभु ना केवल उसे अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते हैं बल्कि उसके सामाजिक जीवन को चंगा करते हैं। वह उसके अंदर ईश्वर की संतान होने की गरिमा को पुनः स्थापित करते हैं। इस दुनिया में उनके आने का यही मक़सद है, संसार की मुरझायी हुई मानवता को पुनर्जीवित करने और प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर के प्रतिरूप को पुनर्स्थापित करने के लिए। आज भी वह अथक इसी काम में लगे रहते हैं। हे प्रभु इस दुनिया में आकर हमें पुनः चंगा करने और मानवीय गरिमा प्रदान करने के लिए आपको धन्यवाद। आमेन।



📚 REFLECTION



Jesus heals a leper in today’s reflection for us. Leprosy was a horrible disease in olden days. People who had this disease suffered not only physically as their skin got rotten and their wounds would not heal. They also suffered alienation from the society and religion. They were considered outcast and sent away from the people and society. They were worse than a dead person, they had no health, no place in the society, no dignity as human beings not even a peaceful death. This leper asks Jesus, “If you choose, you can make me clean.” How God, who came to save humanity wouldn’t choose to save this leper? You ask him and he will always choose what is best for you.

By healing the leper Jesus not only restores his health but restores his social status, making him acceptable in society again. He restores his human dignity as image of God and child of God. This is the very purpose of his coming to heal the broken humanity and restore the image of God in each and every child of his. He continues to work tirelessly. Thank you Jesus for coming into this world and giving us new life and restoring our dignity. Amen.


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

06 जनवरी 2022, गुरुवार

 

06 जनवरी 2022, गुरुवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का गुरुवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

⭐ पहला पाठ : 1 योहन 4:19-5:4

19) हम प्यार करते हैं, क्योंकि उसने पहले हमें प्यार किया।

20) यदि कोई यह कहता कि मैं ईश्वर को प्यार कता हूँ और वह अपने भाई से बैर करता, तो वह झूठा है। यदि वह अपने भाई को जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता तो वह ईश्वर को, जिसे उसने कभी नहीं देखा, प्यार नहीं कर सकता।

21) इसलिए हमें मसीह से यह आदेश मिला है कि जो ईश्वर को प्यार करता है, उसे अपने भाई को भी प्यार करना चाहिए।

5:1) जो यह विश्वास करता है कि ईसा ही मसीह हैं, वह ईश्वर की सन्तान है और जो जन्मदाता को प्यार करता है, वह उसकी सन्तान को भी प्यार करता है।

2) इसलिए यदि हम ईश्वर को प्यार करते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हमें ईश्वर की सन्तान को भी प्यार करना चाहिए।

3) ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना- यही ईश्वर का प्रेम है। उसकी आज्ञाएं भारी नहीं,

4) क्योंकि ईश्वर की हर सन्तान संसार पर विजयी होती है। वह विजय, जो संसार को पराजित करती है, हमारा विश्वास ही है।


⭐ सुसमाचार : लूकस 4:14-22

14) आत्मा के सामर्थ्य से सम्पन्न हो कर ईसा गलीलिया लौटे और उनकी ख्याति सारे प्रदेश में फैल गयी।

15) वह उनके सभागृहों में शिक्षा दिया करते और सब उनकी प्रशंसा करते थे।

16) ईसा नाज़रेत आये, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ था। विश्राम के दिन वह अपनी आदत के अनुसार सभागृह गये। वह पढ़ने के लिए उठ खड़े हुए

17) और उन्हें नबी इसायस की पुस्तक़ दी गयी। पुस्तक खोल कर ईसा ने वह स्थान निकाला, जहाँ लिखा हैः

18) प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिशेक किया है। उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश दूँ, दलितों को स्वतन्त्र करूँ

19) और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करूँ।

20) ईसा ने पुस्तक बन्द कर दी और वह उसे सेवक को दे कर बैठ गये। सभागृह के सब लोगों की आँखें उन पर टिकी हुई थीं।

21) तब वह उन से कहने लगे, "धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है"।

22) सब उनकी प्रशंसा करते रहे। वे उनके मनोहर शब्द सुन कर अचम्भे में पड़ जाते और कहते थे, "क्या यह युसूफ़ का बेटा नहीं है?"

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु को अपनी परिकल्पना तथा मिशन वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए पाते हैं। वह स्वयं को ईश्वर का अभिषिक्त घोषित करते हैं जिसको उत्पीड़ितों की मुक्ति और सुसमाचार की घोषणा करने का कार्य सौंपा गया है। प्रभु येसु के लिए तो स्पष्ट था कि पिता उनसे क्या अपेक्षा करते हैं। उन्होंने कलवारी के क्रूस के माध्यम से मानवता के उद्धार के अपने लक्ष्य को हमेशा अपनी आंखों के सामने रखा और बड़े दृढ़ संकल्प के साथ वे उसकी ओर बढ़े। यह लक्ष्य उनका खुद का बनाया हुआ नहीं था, बल्कि पिता द्वारा दिया गया था। हम में से प्रत्येक के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने आप को ठीक से पहचानें और ईश्वर की इच्छा को समझें और दृढ़ संकल्प के साथ उसका पालन करें।



📚 REFLECTION

In today’s Gospel we find the vision and mission statement of Jesus. He declares himself as the anointed one of God who has the task of liberation of the oppressed and proclamation of the good news. Jesus was clear about what the Father expected from him. He kept his task of redemption of humanity through the cross of Calvary before his eyes always and moved towards it with great determination. This goal was not of his own making, but one given by the Father. It is important for each one of us to know our own identity and discern the will of God and follow it with determination.


📚 मनन-चिंतन -02

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु अपने गृह नगर नाज़रेथ जाते हैं और वहाँ के सभागृह में जाकर नबी इसायस के ग्रंथ में से पाठ पढ़ते हैं। वह अपने इस दुनिया में आने के मक़सद की घोषणा करते हैं। वह घोषणा करते हैं कि स्वर्गीय पिता ने उन्हें दरिद्रों को सुसमाचार सुनाने के लिए भेजा है। दरिद्रों के लिए शुभ संदेश क्या है? यही कि उनकी दरिद्रता अब समाप्त होने वाली है। उनका उद्देश्य बंदियों को मुक्ति का संदेश देने, अंधों को दृष्टिदान और पददलितों का उद्धार करने के लिए आए हैं। उनकी प्राथमिकता की सूची में यही लोग हैं - अंधे, दरिद्र, पद दलित और बंदी। वह ऐसे ही लोगों के लिए इस दुनिया में आए हैं, उनके लिए अपना जीवन क़ुर्बान करने के और अपना प्रेम और मुक्ति उन्हें प्रदान करने के लिए आए हैं। उनके सेवाकार्य और मिशन का केंद्रबिंदु यही लोग हैं।

आज जब हम अपने चारों ओर नज़रें दौड़ाते हैं, तो आज भी हम अनेकों अंधे लोगों को देख सकते हैं, ऐसे लोग जो अन्यायपूर्ण तरीक़े से सलाख़ों के पीछे हैं, और ऐसे कमजोर लोग जो बलवानों के अत्याचार का शिकार बन जाते हैं। आज की दुनिया में लोग ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के सिद्धांत का पालन करते हैं। जो शक्तिशाली है वह कुछ भी कर सकता है; कोई उनके विरुद्ध आवाज़ उठाने वाला नहीं है। कोई भी दरिद्रों, बंदियों या पद दलितों का साथ देने वाला नहीं है। ईश्वर का मुक्तिकार्य आज भी जारी है। आज ईश्वर हम में से प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए काम करने के लिए पुकारते हैं, उस मिशन कार्य को जारी रखने के लिए जिसके लिए वो इस दुनिया में आए। प्रभु का मिशन हमारे जीवन का मिशन बन जाये। आमेन।


📚 REFLECTION

Today we see Jesus goes to his hometown Nazareth and goes to the synagogue and reads from the scroll of prophet Isiah. He proclaims his purpose of coming into this world. He proclaims that God the father has sent him to bring good news to the poor. What is good news for the poor? That their poverty is to end. He is also called to proclaim release to the captives, sight to the blind and freedom for the oppressed. These are the people who are in his top priority list - the blind, the poor, the oppressed and the captives. He has come for such people, to give his life for them, his love and redemption for them. The focus of his ministry is these oppressed people.

Today as we look around us, we still can see lots of blind people, the people unjustly put behind that bars, weak people exploited by the powerful. Today we see a world where people follow the principal of might is right. Those who are powerful, they can do anything; nobody is there to question them. Nobody is there to take side of the captives, the poor and the downtrodden. God’s salvation work still continues. Today he wants each one of us to come forward and work for him and continue his work for which he came to the world. Let his mission be our mission. Amen.


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

05 जनवरी 2022, बुधवार

05 जनवरी 2022, बुधवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का बुधवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

⭐ पहला पाठ : 1 योहन 4:11-18

11) प्रयि भाइयो! यदि ईश्वर ने हम को इतना प्यार किया, तो हम को भी एक दूसरे को प्यार करना चाहिए।

12) ईश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा। यदि हम एक दूसरे को प्यार करते हैं, तो ईश्वर हम में निवास करता है और ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम पूर्णता प्राप्त करता है।

13) यदि वह इस प्रकार हमें अपना आत्मा प्रदान करता है, तो हम जान जाते हैं कि हम उस में और वह हम में निवास करता है।

14) पिता ने अपने पुत्र को संसार के मुक्तिदाता के रूप में भेजा। हमने यह देखा है और हम इसका साक्ष्य देते हैं।

15) जो यह स्वीकार करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं, ईश्वर उस में निवास करता है और वह ईश्वर में।

16) इस प्रकार हम अपने प्रति ईश्वर का प्रेम जान गये और इस में विश्वास करते हैं। ईश्वर प्रेम है और जो प्रेम में दृढ़ रहता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में।

17) यदि हम पूरे भरोसे के साथ न्याय के दिन की प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि हम इस संसार में मसीह के अनुरूप आचरण करते हैं, तो हमारा प्रेम पूर्णता प्राप्त कर चुका है।

18) प्रेम में भय नहीं होता। पूर्ण प्रेम भय दूर कर देता है, क्योंकि भय में दण्ड की आशंका रहती है और जो डरता है, उसका प्रेम पूर्णता तक नहीं पहुँचा है।


⭐ सुसमाचार : मारकुस 6:45-52

45) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार, बेथसाइदा चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा कर देंगे।

46) ईसा लोगों को विदा कर पहाड़ी पर प्रार्थना करने गये।

47) सन्ध्या हो गयी थी। नाव समुद्र के बीच में थी और ईसा अकेले स्थल पर थे।

48) ईसा ने देखा कि शिष्य बड़े परिश्रम से नाव खे रहे हैं, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी; इसलिए वे रात के लगभग चैथे पहर समुद्र पर चलते हुए उनकी ओर आये और उन से कतरा कर आगे बढ़ना चाहते थे।

49) शिष्यों ने उन्हें समुद्र पर चलते देखा। वे उन्हें प्रेत समझ कर चिल्ला उठे,

50) क्योंकि सब-के-सब उन्हें देख कर घबरा गये। ईसा ने तुरन्त उन से कहा, "ढ़ारस रखो, मैं ही हूँ। डरो मत।"

51) तब वे उनके पास आ कर नाव पर चढ़े और वायु थम गयी। शिष्य आश्चर्यचकित रह गये,

52) क्योंकि वे अपनी बुद्धि की जड़ता के कारण रोटियों के चमत्कार का अर्थ नहीं समझ पाये थे।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार के अंश को ध्यान से पढ़ने से हमें पता चलता है कि समुद्र को शांत करने की घटना के बाद भी शिष्य रोटियों के चमत्कार के बारे में सोच रहे थे। इसलिए सुसमाचार लेखक कहता है, "शिष्य आश्चर्यचकित रह गये क्योंकि वे अपनी बुद्धि की जड़ता के कारण रोटियों के चमत्कार का अर्थ नहीं समझ पाये थे।" यह एक साधारण चमत्कार से कहीं अधिक था। रोटियों के चमत्कार में कई रहस्य सामने आते हैं। यह घटना, ठीक से समझ में आ गई तो, हम सभी लोगों के लिए प्रेरणा और सशक्तिकरण का स्रोत बन सकती है। ईश्वर के हाथों में रखा गया हमारा छोटा-सा योगदान ज़रूरतमंद लोगों के लिए बहुत बड़ी सामग्री बन सकता है। जब हमारी क्षमताएं और प्रतिभाएं प्रभु को अर्पित की जाती हैं, तब वे महान मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए समृद्ध हो जाएंगी।



📚 REFLECTION

A careful reading of the Gospel passage of today tells us that the disciples were wondering about the miracle of the loaves even after the incident of the calming of the sea. That is why the evangelist says, “they were utterly astounded, for they did not understand about the loaves, but their hearts were hardened.” It was more than an ordinary miracle. In the multiplication of the bread many mysteries were being revealed. This incident, properly understood, can become a source of inspiration and empowerment for all of us. Our meagre possessions placed in the hands of God can become great provisions for multitudes in need. When our abilities and talents are offered to God, they will be enriched to meet great human needs.


📚 मनन-चिंतन - 02

ईश्वर हमारा सृष्टिकर्ता है; हम उसी के पास से आते हैं और एक दिन उसी के पास लौट जाना है। यदि ईश्वर ही हमारे जीवन का स्रोत है, तो हमें अपनी आत्मा के लिए पोषण के लिए उसी से हमेशा जुड़े रहना पड़ेगा। भले ही प्रभु येसु स्वयं ईश्वर थे, लेकिन वे भी अपने स्वर्गीय पिता निरंतर जुड़े रहने के लिए प्रार्थना में समय बिताते हैं, ताकि मनुष्य बनकर हमारे बीच आने के अपने उद्देश्य को वो सदा याद रखें। आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु बड़े सवेरे एकांत स्थान में जाते हैं और प्रार्थना में समय बिताते हैं। अगर स्वयं ईश-पुत्र प्रार्थना में समय बिताते हैं तो हम कमजोर स्वभाव मनुष्यों को प्रार्थना में समय बिताने की कितनी ज़रूरत है? अगर हमें निरंतर ईश्वर से अपनी आत्मा के लिए पोषण चाहिए तो हमें प्रार्थना के द्वारा सदा उनसे जुड़े रहना और अपने हृदयों को उसका निवास स्थान बनाना होगा।

जब ईश्वर के साथ सम्बन्ध मज़बूत होता है तो ईश्वर हम में निवास करता है, और जब ईश्वर का निवास हमारे हृदय में है तो हम स्वयं में और दूसरों में उसकी उपस्थिति को पहचान सकते हैं। इसलिए संत योहन हमें याद दिलाते हैं कि यदि हम ईश्वर की संताने हैं तो हमें एक दूसरे को प्यार करना चाहिए। यदि हम ईश्वर को प्यार करते हैं तो हमें दूसरों को भी प्यार करना चाहिए क्योंकि वही अदृश्य ईश्वर उनमें भी निवास करता है। यदि हमें ईश्वर के साथ अपना सम्बन्ध मज़बूत बनाना है तो उससे पहले हमें अपने पड़ौसी के साथ अपना सम्बन्ध मज़बूत बनाना होगा। उस अदृश्य ईश्वर को प्यार करने से पहले हमें अपने भाई-बहनों को प्यार करना है जो उसी अदृश्य ईश्वर का साक्षात रूप हैं।



📚 REFLECTION

God is our creator; we came from him and we have to go back to him. If God is the source of our life then we need to remain connected with him so that we continue to receive sustenance for our souls. Jesus himself was God, but he was to remain in constant union with the Father, so that he is always aware of the purpose of his coming down and taking our form. We see in the gospel today that he goes to a lonely place and spends time in prayer. If son of God himself spends time in prayer, then how much we need to pray as we are mere weak human beings. If we have to draw constant sustenance from God, then we need to remain in God, and make our hearts his dwelling place.

When we are strengthened in our relationship with God, then God dwells within us and when God dwells within us, we can recognise God within us as well as in others around us. That’s why St. John reminds us that if we are children of God then we must love one another. If we love God then we must also love others because same invisible God dwells within them. So if we have to strengthen our relationship with God then before that we have to strengthen our relationship with our neighbour. In order to love invisible God we must first love our brothers and sisters who are the visible image of same God our father.


✍ -Br. Biniush Topno



Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

04 जनवरी 2022, मंगलवार

 

04 जनवरी 2022, मंगलवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का मंगलवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

⭐ पहला पाठ : 1 योहन 4:7-10


7) प्रिय भाइयो! हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईश्वर से उत्पन्न होता है।

8) जौ प्यार करता है, वह ईश्वर की सन्तान है और ईश्वर को जानता है। जो प्यार नहीं करता, वह ईश्वर को नहीं जानता; क्येोंकि ईश्वर प्रेम है।

9) ईश्वर हम को प्यार करता है। यह इस से प्रकट हुआ है कि ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेजा, जिससे हम उसके द्वारा जीवन प्राप्त करें।

10) ईश्वर के प्रेम की पहचान इस में है कि पहले हमने ईश्वर को नहीं, बल्कि ईश्वर ने हम को प्यार किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा।



⭐ सुसमाचार : मारकुस 6:34-44


34) ईसा ने नाव से उतर कर एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे और वह उन्हें बहुत-सी बातों की शिक्षा देने लगे।

35) जब दिन ढलने लगा, तो उनके शिष्यों ने उनके पास आ कर कहा, "यह स्थान निर्जन है और दिन ढल चुका है।

36) लोगों को विदा कीजिए, जिससे वे आसपास की बस्तियों और गाँवों में जा कर खाने के लिए कुछ खरीद लें।"

37) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "तुम लोग ही उन्हें खाना दे दो"। शिष्यों ने कहा, "क्या हम जा कर दो सौ दीनार की रोटियाँ ख़रीद लें और उन्हें लोगों को खिला दें?"

38) ईसा ने पूछा, "तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ है? जा कर देखो।" उन्होंने पता लगा कर कहा, "पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ"।

39) इस पर ईसा ने सब को अलग-अलग टोलियों में हरी घास पर बैठाने का आदेश दिया।

40) लोग सौ-सौ और पचास-पचास की टोलियों में बैठ गये।

41) ईसा ने वे पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ ले ली और स्वर्ग की ओर आँखें उठा कर आशिष की प्रार्थना पढ़ी। वे रोटियाँ तोड-तोड कर अपने शिष्यों को देते गये, ताकि वे लोगों को परोसते जायें। उन्होंने उन दो मछलियों को भी सब में बाँट दिया।

42) सबों ने खाया और खा कर तृप्त हो गये।

43) रोटियों और मछलियों के बचे हुए टुकड़ों से बारह टोकरे भर गये।

44) रोटी खाने वाले पुरुषों की संख्या पाँच हज़ार थी।

📚 मनन-चिंतन



रोटियों का चमत्कार प्रभु येसु के सबसे महत्वपूर्ण चमत्कारों में से एक है। सुसमाचार-लेखकों के अनुसार येसु ने कम से कम दो बार रोटियों का चमत्कार किया : एक बार उन्होंने पाँच रोटियों और दो मछलियों से पाँच हज़ार लोगों को खिलाया और दूसरी बार उन्होंने सात रोटियों तथा कुछ छोटी मछलियों से चार हज़ार लोगों को खिला कर तृप्त किया। दोनों ही समय बहुत अधिक रोटियाँ बच गयी थीं, इतना कि शिष्यों को बचे हुए टुकड़ों को कई टोकरियों में इकट्ठा करना पडा था। इस चमत्कार का अर्थ हम दो परतों में समझ सकते हैं। सबसे पहले, जो लोग शारीरिक रूप से भूखे थे, उन पर दया करते हुए प्रभु येसु ने उन्हें खाने के लिए भरपूर भोजन दिया। दूसरा, आध्यात्मिक रूप से भूखे लोगों के लिए करुणा महसूस करते हुए उसने उन्हें स्वर्ग से भोजन दिया - यूखरिस्त में अपना शरीर और रक्त। हम रोटियों के चमत्कारों में यूखरिस्त की छाया पा सकते हैं। आइए हम ईश्वरीय पूर्वप्रबंध के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते रहें।



📚 REFLECTION



The miracle of the multiplication of bread is one of the most important miracles of Jesus. According to the evangelists Jesus multiplied bread at least twice : once he multiplied five loaves and two fish to feed five thousand people and on another occasion he multiplied seven loaves and some small fish to feed four thousand people. Both the times there was a abundance of bread, so much so the disciples had to collect the pieces left over in many baskets. We can understand this miracle in two layers of meaning. First, feeling compassion for the people who were physically hungry he gave them plenty of food to eat. Second, feeling compassion for people who were spiritually hungry he gave them food from heaven – his own body and blood in the Eucharist. We can find a shadow of the Eucharist in the multiplication of the bread. Let us be thankful to God for the divine providence.


📚 मनन-चिंतन - 02



आज हम पाँच रोटियों और दो मछलियों से हज़ारों लोगों को भोजन कराने के चमत्कार को देखते हैं। ऐसा क्या था जिसके कारण प्रभु येसु ने यह चमत्कार किया? लोगों के प्रति करुण प्रेम ने उन्हें उनके लिए कुछ करने के लिए प्रेरित और मजबूर किया। जब प्रभु ने देखा कि एक बड़ी भीड़ उनके पीछे-पीछे आ रही है, बड़ी आशा लिए उन्हें खोज रही है, उन्हें उन पर तरस आया, उन्हें वे बिना चरवाहे की भेड़ों के समान लगे। प्रभु येसु अगर चाहते तो दो मछलियों और पाँच रोटियों के बिना भी यह चमत्कार कर सकते थे, लेकिन वे चाहते हैं कि उनके मुक्तिकार्य में हम मनुष्यों का भी कुछ योगदान होना चाहिए।

इन दिनों के पाठों में क़रीब हर दिन हम ईश्वर के प्रेम के नए-नए पहलुओं को देखते हैं। आज की पूजन विधि में अपने आप को एक प्रेमी पिता के रूप में प्रकट करते हैं जो अपने बच्चों के दुःख-दर्द को अनदेखा नहीं कर सकते। हमारे दर्द, हमारी परेशानियाँ और हमारे मन का अंधकार उन्हें हमारे लिए व्यथित कर देता है। अगर हम ईश्वर की संतानें हैं तो हम में भी हमारे स्वर्गीय पिता के गुण होना ज़रूरी है। क्या दूसरों के दुःख-दर्द देखकर मेरा मन भी दुखी होता है और उनके लिए कुछ करने के लिए मुझे मजबूर कर देता है?



📚 REFLECTION


Today we reflect about the miracle of Jesus feeding a large number of people from five loaves and two fish. What made Jesus to perform this miracle? It was his love for the people that moved him to act for them. When he saw crowds seeking him, coming after him with so much expectation, he felt pity for them, he found that they needed someone to lead them to the right path and help them to come God. He could have performed this miracle even without five loaves and two fish, but he wants that in his saving mission there should be some contribution from our side as well.

These days in the daily readings almost everyday we witness new aspects of God’s love towards us. In today’s liturgy he shows that he is our loving father who cannot see the pain and misery of his children. Our sufferings, our pain, our sicknesses and our being in darkness moves him with pity. If we are his children we also need to possess some of the qualities of our heavenly father. Does somebody’s pain or misery or sufferings move me to act, to do something for them?


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

03 जनवरी 2022, सोमवार

 

03 जनवरी 2022, सोमवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का सोमवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

⭐ पहला पाठ: 1योहन 3:22-4:6


22) हम उस से जो कुछ माँगेंगे, वह हमें वहीं प्रदान करेगा; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को पालन करते हैं और वही करते हैं, जो उसे अच्छा लगता है।

23) और उसकी आाज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र ईसा मसीह के नाम में विश्वास करें और एक दूसरे को प्यार करें, जैसा कि मसीह ने हमें आदेश दिया।

24) जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में और हम जानते हैं कि वह हम में निवास करता है; क्योंकि उसने हम को आपना आत्मा प्रदान किया है।

4:1) प्रिय भाइयो! प्रत्येक आत्मा पर विश्वास मत करो। आत्माओं की परीक्षा कर देखो कि वे ईश्वर के हैं या नहीं; क्योंकि बहुत-से झूठे नबी संसार में आये हैं।

2) ईश्वर के आत्मा की पहचान इस में हैः प्रत्येक आत्मा जो यह स्वीकार करता है कि ईसा मसीह सचमुच मनुष्य बन गये हैं, ईश्वर का है

3) और प्रत्येक आत्मा, जो इस प्रकार ईसा को स्वीकार नहीं करता; ईश्वर का नहीं है और वह ईश्वर-विरोधी है। तुमने सुना है कि वह संसार में आने वाला है और अब तो वह संसार में आ चुका है।

4) बच्चो! तुम ईश्वर के हो और तुमने उन लोगों पर विजय पायी है; क्योंकि जो तुम में हैं, वह उस से महान् हैं, जो संसार में है।

5) वे संसार के हैं और इसलिए वे संसार की बातें करते हैं और संसार उनकी सुनता है।

6) किन्तु हम ईश्वर के हैं और जो ईश्वर को पहचानता है, वह हमारी सुनता है। जो ईश्वर का नहीं है, वह हमारी बात सुनना नहीं चाहता। हम इसके द्वारा सत्य के आत्मा और भ्रान्ति की आत्मा की पहचान कर सकते हैं।


⭐ सुसमाचार : सन्त मत्ती 4:12-17, 23-25


(12) ईसा ने जब यह सुना कि योहन गिरफ्तार हो गया है, तो वे गलीलिया चले गये।

(13) वे नाज़रेत नगर छोड कर, ज़बुलोन और नफ्ताली के प्रान्त में, समुद्र के किनारे बसे हुए कफ़रनाहूम नगर में रहने लगे।

(14) इस तरह नबी इसायस का यह कथन पूरा हुआ-

(15) ज़बुलोन प्रान्त! नफ्ताली प्रान्त! समुद्र के पथ पर, यर्दन के उस पार, ग़ैर-यहूदियों की गलीलिया! अंधकार में रहने

(16) वाले लोगों ने एक महती ज्योति देखी; मृत्यु के अन्धकारमय प्रदेश में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ।

(17) उस समय से ईसा उपदेश देने और यह कहने लगे, "पश्चात्ताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।"

(23) ईसा उनके सभागृहों में शिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते और लोगों की हर तरह की बीमारी और निर्बलता दूर करते हुए, सारी गलीलिया में घूमते रहते थे।

(24) उनका नाम सारी सीरिया में फैल गया। लोग मिर्गी, लक़वा आदि नाना प्रकार की बीमारियों और कष्टों से पीड़ित सब रोगियों को और अपदूतग्रस्तों को ईसा के पास ले आते और वे उन्हें चंगा करते थे।

(25) गलीलिया, देकापोलिस, येरूसालेम, यहूदिया और यर्दन के उस पार से आया हुआ एक विशाल जनसमूह उनके पीछे-पीछे चलता था।


📚 मनन-चिंतन


सुसमाचार लेखकों के अनुसार, योहन बपतिस्ता के रंगभूमि से ओझल होने के बाद ही प्रभु येसु ने सुसमाचार प्रचार करने का अपना कार्य शुरू किया। येसु ने ईश्वर के राज्य का उद्घाटन किया जिसके बारे में योहन बपतिस्ता ने घोषणा की थी। सुसमाचार में हम योहन बपतिस्ता तथा येसु द्वारा बड़ी पारस्परिक समझ के साथ ईश्वर की अनोखी योजना को आगे बढ़ाते हुए देख सकते हैं। येसु के प्रचार का विषय ईश्वर का राज्य था। ईश्वर का राज्य एक स्थिर वास्तविकता नहीं है बल्कि वह गतिशील है। वह प्रभु का शासन है जिसके अन्तर्गत प्रभु की इच्छा सर्वोच्च मानी जाती है और प्रभु का नाम पवित्र माना जाता है। आइए हम अपने जीवन में ईश्वर की इच्छा को बनाए रखते हुए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना सीखें।


📚 REFLECTION



According to the Evangelists, Jesus began his ministry of preaching the Gospel after John the Baptist disappeared from the scene. Jesus inaugurated the Kingdom of God which John the Baptist spoke about. We can see the perfect plan of God being carried by John the Baptist and Jesus with great mutual understanding. The theme of the preaching of Jesus was the Kingdom of God. The kingdom of God is not a static reality but a dynamic one. It is the reign of God where the will of God is supreme and the name of God is held holy. Let us learn to usher in the kingdom of God by upholding the will of God in our own lives.



📚 मनन-चिंतन - 02



हेरोद के द्वारा संत योहन बप्तिस्ता को गिरफ़्तार किए जाने के बाद प्रभु येसु अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं। नफ़ताली और ज़ेबुलोन के इस क्षेत्र को जहां से प्रभु येसु अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं, सन्त मत्ती इसे ग़ैर-यहूदियों की गलिली कहते हैं। पुराने व्यवस्थान में गलिली को राष्ट्रों की गलिली कहकर पुकारा जाता था (इसायस ९:१-३) क्योंकि यही प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करने का द्वार था। इस स्थान का सम्पर्क निरंतर नए लोगों और नयी-नयी संस्कृतियों से होता रहता था। यह प्रतिज्ञात देश का भाग होते हुए भी भ्रष्ट एवं अंधकारमय प्रदेश के रूप में जाना जाता था। यहाँ के लोग चुनी हुई प्रजा में नहीं गिने जाते थे, और उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता था। वे प्रभु के प्रेम की अज्ञानता के अंधकार में भटकते थे। शायद वही ऐसे लोग थे जिन्हें मुक्तिदाता की सबसे अधिक ज़रूरत थी।

इसलिए हम देखते हैं कि प्रभु येसु इसी स्थान पर अपना निवास बनाते और अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं। जो स्थान नगण्य और तुच्छ समझा जाता था वही महान और ईश्वर के मिशन कार्य को प्रारम्भ करने का स्थान बन जाता है। प्रभु उनका अंधकार दूर करने आए हैं, और ईश्वरीय प्रेम की ज्योति जलाने आए हैं। गलिली से अपना मुक्तिकार्य प्रारम्भ करते हुए ईश्वर यह दर्शाते हैं कि धर्मियों से अधिक वह अधर्मियों को बुलाने आए हैं, क्योंकि धर्मियों से अधिक पापियों को ईश्वर की ईश्वर की आवश्यकता है (मत्ती ९:१३)। आज प्रत्येक वह स्थान जहाँ ईश्वर का प्रेम नहीं पहुँचा है, वह गलिली है। आइए हम ईश्वर के उस अनंत प्रेम को सब जनों तक पहुँचाएँ।आज भी अनेक लोग हैं जो अंधकार में और जो जीवन की ज्योति की खोज में हैं। प्रभु ही वह जीवन की ज्योति हैं। (योहन ८:१२)।



📚 REFLECTION



Today we see Jesus beginning his public ministry after the arrest of John the Baptist by Herod. St. Matthew calls this area Naphtali and Zebulon where Jesus begins his ministry, as new Galilee of the Gentiles. In Old Testament times Galilee was called the Galilee of the nations (Is 9:1-3) because it was the entry point in the geographical territory of Israel, the promised land. This place constantly came in contact with different nations and cultures. Even it was part of the promised land but it was considered as corrupt and place of darkness. People here were not considered as especially chosen, but like they were treated with low esteem and like outsiders. They lived in the darkness of the ignorance of the Lord. In fact they were the people who needed a saviour more than anybody else.

Therefore we see Jesus making his dwelling and beginning his saving ministry from this place. The place which was discarded as the most insignificant place becomes very prominent place and starting point of God’s saving mission. He has come to dispel the darkness of sin and ignorance of God’s love for them. By starting his ministry from Galilee, God shows that more than righteous, he has come for sinners, because sinners need God more than the righteous (Mt. 9:13). Today every place where this good news of God’s love has not reached, is a Galilee. Let us make known God’s love to all, the love he has shown in his son Jesus our saviour. There are great number of people who still remain in dark, who still need to see the light of the world (John 8:12).


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!