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शनिवार, 27 नवंबर, 2021

 

शनिवार, 27 नवंबर, 2021

वर्ष का चौंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: दानिएल का ग्रन्थ 7:15-27

15) मैं बहुत व्याकुल हो उठा और अपने मन के दृश्यों के कारण विस्मित हो गया।

16) मैंने वहाँ उपस्थित लोगों में से एक के पास जा कर पूछा कि इन सब बातों का अर्थ क्या है और उसने मुझे समझाते हुए कहा,

17) ’’ये चार विशालकय पशु चार राज्य हैं, जो पृथ्वी पर प्रकट होंगे,

18) किन्तु सर्वोच्य प्रभु के संतों को जो राजत्व दिया जायेगा, वह अनन्त काल तक बना रहेगा।’’

19) तब मैंने जानना चाहा कि उस चैथे पशु का अर्थ क्या है, जो सभी पहले पशुओं से भिन्न था, जो बहुत डरावना था, जो चबाता और खाता जाता था और जो कुछ रह जाता, उसे पैरों तले रौंदता था।

20) मैंने उसके सिर के दस सींगों के विषय में जानना चाहा और उस अन्य सींग के विषय में भी, जिसके निकलने पर तीन सींग उखड़ गये- उस सींग के विषय में, जिसकी आंखे थी, जिसका एक डींग मारने वाला मुँह था और जो दूसरे सींगों से अधिक बडा दिखता था।

21) मैं देख ही रहा था कि वह सींग संतों से युद्ध कर रहा था और वयोवृद्ध व्यक्ति के आने तक उन पर प्रबल हो रहा था।

22) उसने सर्वोच्य प्रभु के संतों को न्याय दिलाया और वह समय आया, जब संतों ने राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया।

23) उसने मुझे यह उत्तर दिया, ’’चैथा पशु पृथ्वी पर प्रकट होने वाला चैथा राज्य है। वह अन्य सब राज्यों से भिन्न होगा। वह समस्त पृृथ्वी को खा जायेगा और पैरों तले रौंद कर चूर-चूर कर देगा।

24) वे दस सींग इस राज्य के दस राजा हैं। उनके बाद एक ऐसे राजा का उदय होगा, जो पहले के राजाओं से भिन्न होगा और तीन राजाओं को परास्त कर देगा।

25) वह सर्वोच्य प्रभु के विरुद्ध बोलेगा, सर्वोच्य प्रभु के संतों पर अत्याचार करेगा और पर्वों और प्रथाओं में परिवर्तन लाने की योजना तैयार करेगा। संत साढे तीन वर्ष तक उसके हाथ में दिये जायेंगे।

26) इसके बाद न्याय की कार्यवाही प्रारंभ होगी। राजत्व उस से छीन लिया जायेगा और सदा के लिए उसका सर्वनाश किया जायेगा।

27) तब पृथ्वी भर के सब राज्यों का अधिकार, प्रभुत्व और वैभाव सर्वोच्च प्रभु के संतों की प्रजा को प्रदान किया जायेगा। उसका राज्य सदा बना रहेगा और सभी राष्ट्र उसकी सेवा करेंगे और उसके अधीन रहेंगे।’’

सुसमाचार : सन्त लूकस 21:34-36

34) ‘‘सावधान रहो। कहीं ऐसा न हो कि भोग-विलास, नशे और इस संसार की चिन्ताओं से तुम्हारा मन कुण्ठित हो जाये और वह दिन फन्दे की तरह अचानक तुम पर आ गिरे;

35) क्योंकि वह दिन समस्त पृथ्वी के सभी निवासियों पर आ पड़ेगा।

36) इसलिए जागते रहो और सब समय प्रार्थना करते रहो, जिससे तुम इन सब आने वाले संकटों से बचने और भरोसे के साथ मानव पुत्र के सामने खड़े होने योग्य बन जाओ।’’



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शुक्रवार, 26 नवंबर, 2021

 

शुक्रवार, 26 नवंबर, 2021

वर्ष का चौंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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📒 पहला पाठ: दानिएल का ग्रन्थ 7:2-14


2) मैंने रात्रि के समय यह दिव्य दृश्य देखाः आकाश की चारों दिशाओं की हवाएँ महासमुद्र को उद्वेलित कर रही थीं

3) और उस में से चार विशालकाय पशु निकलते थे, जो एक दूसरे से भिन्न थे।

4) पहला सिहं-जैसा था, किन्तु उसके गरूड़ के जैसे पख थे। मैं देख ही रहा था कि उसके पंख उखाड़ गये, उसे उठा कर दो पाँवों पर मनुय की तरह खड़ा कर दिया गया और उसे मनुय-जैसा हृदय दिया गया।

5) दूसरा भालू-जैसा था। वह आधा ही खड़ा था और वह अपने मुँह में दाँतों के बीच तीन पसलियाँ लिये था। उसे यह आदेश दिया गया, ’’उठो और बहुत-सा मांस खाओ’’।

6) इसके बाद मैंने चीते-जैसा एक और पशु देखा।

7) उसकी पीठ पर पक्षियों के चार डैने थे और उसके चार सिर थे। उसे राजाधिकार दिया गया। अंत में मैंने रात्रि के दृश्य में एक चैथा पशु देखा। वह विभीषण, डरावना और उत्यन्त बलवान् था। उसके दाँत लोहे के थे। वह चबाता और खाता जाता था और जो कुछ रह जाता, उसे पैरों तले रौंद देता था।

8) वह पहले के सभी पशुओं से भिन्न था और उसके दस सींग थे। मैं वे सींग देख ही रहा था कि उनके बीच में से एक और छोटा-सा सींग निकला और उसके लिए जगह बनाने के लिए पहले सींगों में से तीन उखाड़े गये। उस सींग की मनुय-जैसी आँखें थी और उसका एक डींग मारता हुआ मुँह भी था।

9) मैं देख ही रहा था कि सिंहासन रख दिये गये और एक वयोवृद्ध व्यक्ति बैठ गया। उसके वस्त्र हिम की तरह उज्जवल थे और उसके सिर के केश निर्मल ऊन की तरह।

10) उसका सिंहासन ज्वालाओं का समूह था और सिहंासन के पहिये धधकती अग्नि। उसके सामने से आग की धारा बह रही थी। सहस्रों उसकी सेवा कर रहे थे। लाखों उसके सामने खड़े थे। न्याय की कार्यवाही प्रारंभ हो रही थी। और पुस्तकें खोल दी गयीं।

11) मैंने देखा कि सींग के डींग मारने के कारण चैथा पशु मारा गया। उसकी लाश आग में डाली और जलायी गयी।

12) दूसरे पशुओं से भी उनके अधिकार छीन लिये गये, किन्तु उन्हें कुछ और समय तक जीवित ही छोड दिया गया।

13) तब मैंने रात्रि के दृश्य में देखा कि आकाश के बादलों पर मानवपुत्र-जैसा कोई आया। वह वयोवृद्ध के यहाँ पहुँचा और उसके सामने लाया गया।

14) उसे प्रभुत्व, सम्मान तथा राजत्व दिया गया। सभी देश, राष्ट्र और भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी उसकी सेवा करेंगे। उसका प्रभुत्व अनन्त है। वह सदा ही बना रहेगा। उसके राज्य का कभी विनाश नहीं होगा।


📒 सुसमाचार : सन्त लूकस 21:29-33


29) ईसा ने उन्हें यह दृष्टान्त सुनाया, ‘‘अंजीर और दूसरे पेड़ों को देखो।

30) जब उन में अंकुर फूटने लगते हैं, तो तुम सहज ही जान जाते हो कि गर्मी आ रही है।

31) इसी तरह जब तुम इन बातों को होते देखोगे, तो यह जान लो कि ईश्वर का राज्य निकट है।

32) ’’मैं तुम से यह कहता हूँ, इस पीढ़ी के अन्त हो जाने से पूर्व ही ये सब बातें घटित हो जायेंगी।

33) आकाश और पृथ्वी टल जायें, तो टल जायें, परन्तु मेरे शब्द नहीं टल सकते।

📚 मनन-चिंतन

येसु आज हमें समय और ऋतुओं के चिन्ह, लौकिक परिवर्तनों की संभावना, और अपने वचन की शाश्वत स्थिरता के प्रति जागरूक होने के लिए आमंत्रित करते हैं।

चिन्ह अंत नहीं है, लेकिन उनका उपयोग किसी वस्तु या किसी व्यक्ति को इंगित करने के लिए किया जाता है, या हमें आने वाली किसी चीज की याद दिलाता है। अंजीर के पेड़ के दृष्टांत के माध्यम से येसु ऋतुओं के चक्र और प्रत्येक मौसम के साथ होने वाले परिवर्तनों का वर्णन करने का प्रयास कर रहे हैं। हम परिवर्तन और अस्थिरता की दुनिया में रहते हैं। विज्ञान के विकास और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के आगमन के कारण जीवन में हर पल उतार-चढ़ाव हो रहा है। हमारे जीवन में आने वाले परिवर्तन सकारात्मक या नकारात्मक हो सकते हैं। कभी-कभी बीमारी और आर्थिक संकट जैसे बदलाव हमारे बीच में डर पैदा कर सकते हैं। यह हमारे जीवन को कई बार कठिन, दर्दनाक और भ्रमित करने वाला बना देता है।

आज येसु हमें ईश्वर के उन चिन्ह से अवगत होने के लिए आमंत्रित करते हैं जो कई तरह से हमारे पास आते हैं। ईश्वर की अधिकांश अभिव्यक्तियाँ भव्य तरीकों से नहीं बल्कि सरल और विनम्र सामान्य चीजों और घटनाओं में प्रकट होती हैं। हमें उनके चिन्ह से परिचित होने के लिए बुलाया गया है, जिससे हम उससे चूक न जायें। ईश्वर के साथ मौन रूप में तथा प्रार्थना और चिंतन में समय बिताने से हमें इस संदर्भ में मदद मिलेगी।

परिवर्तन हमेशा चुनौतीपूर्ण होते हैं इसलिए हमें किसी ऐसी चीज पर टिके रहने की जरूरत है जो अपरिवर्तनीय है। येसु अपने शिष्यों से कहते हैं कि सारी सृष्टि टल जाएगी, परन्तु उनके वचन कभी नहीं टलेंगे। जिस दुनिया में हम रहते हैं वह एक दिन लुप्त हो जाएगी, लेकिन येसु के वचन सत्य और जीवन हैं। ये हमेशा के लिए मान्य रहेंगे क्योंकि वे जीवन के दूरदर्शिता का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनमें कालनिरपेक्ष गुण हैं।

हम प्रार्थना करें कि पवित्र ग्रंथ के अपरिवर्तनीय वचन हमारे दिलों में शाश्वत स्थिरता प्रदान करें। यह वचन हमारी आध्यात्मिक यात्रा के लिए सांत्वना और मार्गदर्शन बनें।



📚 REFLECTION



Jesus invites us today to become aware of the signs of time and seasons, to the possibility of cosmic changes, and eternal stability of his word.

Signs are not the end but they are used to point out something or somebody, or remind us of something that is to come. Through the parable of fig tree Jesus is trying to describe the cycle of the seasons and the changes that occur with each season. We live in a world of change and instability. With the development of science and arrival of electronic gadgets the life is fluctuating every moment. Changes that come to our life may be positive or negative. Sometimes changes like illness and financial crisis may create fear among us. It makes our life difficult, painful and confusing at times.

Today Jesus invites us to become aware of God’s signs that come to us in many ways. Most of God‘s manifestations come not in spectacular ways but in the simple and humble ordinary things and events. We are called to become familiar with His signs, so that we don’t miss it. Spending time with Him in silence and in prayer and reflection would help us in this regard.

Changes are always challenging therefore we need to hold on to something that is unchanging. Jesus tells his disciples that all created things will pass away, but his words will never pass away. The world in which we live will one day disappear, but the words of Jesus are Truth and Life. It will be valid forever because they represent a vision of life and have timeless values.

We pray that unchanging words of the sacred scripture may give eternal stability in our hearts. Let these words be comfort and guide for our spiritual journey.


📚 मनन-चिंतन -2



सुसमाचार में प्रभु येसु यरूशलेम के विनाश और अपने दूसरे आगमन के विषय में रुक-रुक कर बातें करते हैं। 70 ईस्वी में रोमियों ने येरूसलम पर आक्रमण किया और पूरे शहर का विनाश किया। इस घटना से लगभग चालीस साल पहले ही, येसु इसके बारे में भविष्यवाणी करते हैं। येसु की ये बातें एक दिन जरूर सच होंगी। यही बात प्रभु के दूसरे आने के विषय में भी लागू है। ईश्वर का वचन जीवित और सक्रिय है। ईश्वर का वचन शाश्वत और शक्तिशाली है। कई दृष्टांतों के माध्यम से येसु अपने शिष्यों को अपने दूसरे आगमन के बारे में बताते हैं और अपने सभी लोगों को उस दिन के लिए तैयार रहने की चेतावनी भी देते हैं। जब हम केवल शुरुआत करते हैं तो अंतिम चीजों की याद क्यों दिलाई जाती है? क्योंकि, हमें अंत को मन में रखते हुए दौड़ शुरू करना होगा। हमें लक्ष्य को सामने रखते हुए दौड़ते रहना होगा। प्रभु येसु के शिष्यों को उस दिन का बेसब्री से इंतजार करना चाहिए। विदाई अभिवादन के पहले पवित्र बाइबल का अंतिम वचन प्रभु का निमंत्रण है - “प्रभु ईसा! आइए!” (प्रकाशना 22:20) 1थेसलनीकियों 4:18 में, संत पौलुस विश्वासियों को प्रभु के वचनों का सहारा ले कर एक दूसरे को प्रोत्साहित करने को कहते हैं। जैसा कि हम प्रभु के आगमन का इंतजार करते हैं, हमारे पास ईश्वर का वचन है कि हम उस पर मनन-चिंतन करें और उसके अनुसार कार्य करें। प्रभु का विश्वसनीय शब्द हमारा दैनिक भोजन है जो हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों के लिए ताकत देता है।



📚 REFLECTION



In the Gospel Jesus speaks intermittently about the destruction of Jerusalem and his own second coming. In AD 70 Jerusalem fell to the Romans. About forty years ahead of the event, Jesus foretold about it. The words that Jesus spoke will definitely come true one day. So also the words he spoke about his own second coming. The Word of God is living and active. The Word of God is eternal and powerful. Through many parables Jesus taught about his second coming and warned his disciples to be prepared for that day. Why are reminded of the final things when we are only beginning? Because, we need to start running with the end in mind. We have to keep running with the end in focus. Christians should eagerly wait for that day. The last verse of the Bible, before the farewell greeting, is an invitation to the Lord – “Come, Lord Jesus!” (Rev 22:20) In 1Thess 4:18, St. Paul asks the faithful to encourage one another with the Word of God. As we await the coming of the Lord, we have the Word of God to reflect upon and to act upon. The reliable Word of God is our daily food which gives strength for our everyday activities.

 -Br. Biniush topno


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गुरुवार, 25 नवंबर, 2021

 

गुरुवार, 25 नवंबर, 2021

वर्ष का चौंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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⭐ पहला पाठ : दानिएल 6:12-28

12) कुछ लोगों ने दानिएल के यहाँ पहुँचने पर उसे अपने ईश्वर से प्रार्थना और अनुनय-विनय करते पाया।

13) वे राजा से मिलने गये और उसे राजकीय निषेधाज्ञा का स्मरण दिलाते हुए बोले, "राजा! क्या आपने यह निषेधाज्ञा नहीं निकाली कि तीस दिनों तक जो कोई आप को छोड़ कर किसी भी देवता अथवा मनुष्य से प्रार्थना करेगा, वह सिंहों के खड्ड में डाल दिया जायेगा?" राजा ने उत्तर दिया, "यह मेदियों और फारसियों के अपरिवर्तनीय कानून के अनुसार सुनिश्चित है।''

14) इस पर उन्होंने राजा से कहा, "दानिएल- यूदा के निर्वासितों में से एक- आपके द्वारा घोषित निषेधाज्ञा की परवाह नहीं करता। वह दिन में तीन बार अपने ईश्वर से प्रार्थना करता है।"

15) राजा को यह सुन कर बहुत दुःख हुआ। उसने दानिएल को बचाने को निश्चत किया और सूर्यास्त तक कोई रास्ता खोज निकालने का प्रयत्न किया।

16) किन्तु उन लोगों ने यह कहते हुए राजा से अनुरोध किया, "राजा! स्मरण रखिए कि मेदियों और फारसियों के कानून के अनुसार राजा द्वारा घोषित कोई भी निषेधाज्ञा अथवा आदेश अपरिवर्तनीय है"।।

17) इस पर राजा ने दानिएल को ले आने और सिंहों के खड्ड में डालने का आदेश दिया। उसने दानिएल से कहा, "तुम्हारा ईश्वर, जिसकी तुम निरन्तर सेवा करते हो, तुम्हारी रक्षा करे"।

18) एक पत्थर खड्ड के द्वार पर रखा गया और राजा ने उस पर अपनी अंगूठी और अपने सामन्तों की अंगूठी की मुहर लगायी, जिससे कोई भी दानिएल के पक्ष में हस्तक्षेप न कर सके।

19) इसके बाद राजा अपने महल चला गया; उसने उस रात को अनशन किया और अपनी उपपत्नियों को नहीं बुलाया। उसे नींद नहीं आयी और वह सबेरे,

20) पौ फटते ही उठा, और सिंहों के खड्ड की ओर जल्दी-जल्दी चल पड़ा।

21) खड्ड के निकट आ कर उसने दुःख भरी आवाज़ में दानिएल को पुकार कर कहा, "दानिएल! जीवन्त ईश्वर के सेवक! तुम जिस ईश्वर की निरन्तर सेवा करते हो, क्या वह तुम को सिंहों से बचा सका?"

22) दानिएल ने राजा को उत्तर दिया, "राजा! आप सदा जीते रहें!

23) मेरे ईश्वर ने अपना दूत भेज कर सिंहों के मुँह बन्द कर दिये। उन्होंने मेरी कोई हानि नहीं की, क्योंकि मैं ईश्वर की दृष्टि में निर्दोष था।

24) राजा! मैंने आपके विरुद्ध भी कोई अपराध नहीं किया।" राजा आनन्दित हो उठा और उसने दानिएल को खड्ड से बाहर निकालने का आदेश दिया। इस पर दानिएल को खड्ड से बाहर निकाला गया; उसके शरीर पर कोई घाव नहीं था क्योंकि उसने अपने ईश्वर पर भरोसा रखा था।

25) जिन लोगों ने दानिएल पर अभियोग लगाया था, राजा ने उन्हें बुला भेजा और उन को अपने पुत्रों तथा पत्नियों के साथ सिंहों के खड्ड में डाल देने का आदेश दिया। वे खड्ड के फर्श तक भी नहीं पहुँचे थे कि सिंहों न उन पर टूट कर उनकी सब हाड्डियाँ तोड़ डाली

26) इसके बाद राजा ने पृथ्वी भर के लोगों, राष्ट्रों और भाषा-भाशियों को लिखा,

27) "आप लोगों को शांति मिले! मेरी राजाज्ञा यह है कि मेरे राज्य क्षेत्र समस्त क्षेत्र के लोग दानिएल के ईश्वर पर श्रद्धा रखें और उससे डरेंः क्योंकि वह सदा बना रहने वाला जीवन्त ईश्वर है, उसका राज्य कभी नष्ट नहीं किया जायेगा और उसके प्रभुत्व का कभी अंत नहीं होगा।

28) वह रक्षा करता और बचाता है, वह स्वर्ग और पृथ्वी पर चिन्ह और चमत्कार दिखाता है, उसने दानिएल को सिंहों के पंजों से छुडाया है।"


⭐ सुसमाचार : लूकस 21:20-28


20) "जब तुम लोग देखोगे कि येरूसालेम सेनाओं से घिर रहा है, तो जान लो कि उसका सर्वनाश निकट है।

21) उस समय जो लोग यहूदिया में हों, वे पहाड़ों पर भाग जायें; जो येरूसालेम में हों, वे बाहर निकल जायें और जो देहात में हों, वे नगर में न जायें;

22) क्योंकि वे दण्ड के दिन होंगे, जब जो कुछ लिखा है, वह पूरा हो जायेगा।

23) उनके लिए शोक, जो उन दिनों गर्भवती या दूध पिलाती होंगी! क्योंकि देश में घोर संकट और इस प्रजा पर प्रकोप आ पड़ेगा।

24) लोग तलवार की धार से मृत्यु के घाट उतारे जायेंगे। उन को बन्दी बना कर सब राष्ट्रों में ले जाया जायेगा और येरूसालेम ग़ैर-यहूदी राष्ट्रों द्वारा तब तक रौंदा जायेगा, जब तक उन राष्ट्रों का समय पूरा न हो जाये।

25) "सूर्य, चन्द्रमा और तारों में चिन्ह प्रकट होंगे। समुद्र के गर्जन और बाढ़ से व्याकुल हो कर पृथ्वी के राष्ट्र व्यथित हो उठेंगे।

26) लोग विश्व पर आने वाले संकट की आशंका से आतंकित हो कर निष्प्राण हो जायेंगे, क्योंकि आकाश की शक्तियाँ विचलित हो जायेंगी।

27) तब लोग मानव पुत्र को अपार सामर्थ्य और महिमा के साथ बादल पर आते हुए देखेंगे।

28) "जब ये बातें होने लगेंगी, तो उठ कर खड़े हो जाओ और सिर ऊपर उठाओ, क्योंकि तुम्हारी मुक्ति निकट है।"


📚 मनन-चिंतन


आज का सुसमाचार येरूसालेम के विनाश और मनुष्य के पुत्र के आगमन की बात करता है।

येरूसालेम का विनाशः येसु लोगों को येरूसालेम के विनाश की प्रक्रिया समझाते हैं। 1. सेनाओं से घिरा होनाः येरूसालेम रोमियों द्वारा घिरा हुआ था और उन्हें पूरे शहर को घेरने में काफी समय लगा। एक बार जब शहर को घेर लिया गया तो उनके प्रावधानों को रोक दिया गया। 2. जेरूसलम से पलायनः खाद्य सामग्री की कमी के कारण एक आंदोलन/संचलन की आवश्यकता पड़ी। प्रावधानों के बिना लोगों का संघर्ष बढ़ता गया और उनके पास शहर से बाहर जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। यह आंदोलन/संचलन वास्तव में दुनिया भर में ईसाई धर्म के प्रसार के लिए एक आशीर्वाद था। 3. संघर्षः जिन लोगों ने शहर से बाहर जाने से इनकार कर दिया, उन्हें एक वास्तविक संघर्ष से गुजरना पड़ा, खासकर गर्भवती महिलाओं और शिशुओं वाली महिलाओं को। कई मारे गए और अन्य को बंदी बना लिया गया। 4. अन्यजातियों/अन्यराष्ट्रों का समयः बाइबल बताती है कि संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक अन्यजातियों का समय पूरा नहीं हो जाता। वह समय कब आएगा यह स्पष्ट नहीं है।

मनुष्य के पुत्र का आगमनः पाठ का दूसरा भाग येसु के आने की पूर्व सावधानी, उनके प्रकट होने का स्थान और उनके आने के उद्देश्य की बात करता है। आकाशीय पिंड और पार्थिव पिंड में अशांति को मनुष्य के पुत्र के आने से पूर्व एक चेतावनी के रूप में बताया गया है। कहा जाता है कि वह बादलों में शक्ति और महिमा के साथ प्रकट होगा। दानिएल 7ः13 में, हम पढ़ते हैं, ‘‘मैंने देखा कि आकाश के बादलों पर मानवपुत्र-जैसा कोई आया।’’ उसके आने का उद्देश्य मानवता की मुक्ति के रूप में घोषित किया गया है। ईश्वर के साथ प्रेम और आत्मीयता का आनंद लेने के लिए, उनके स्वतंत्रता, शांति और आनंद का अनुभव करने के लिए पाठ अंतिम मुक्ति की आशा के साथ समाप्त होता है

हमारे जीवन में जिन संघर्षों से हम गुजरते हैं, वे हमारे लिए ईश्वर की ओर लौटने के लिए एक सबक हों और हम मुक्ति के उपहार के लिए आभारी रहें, जो येसु हमारे लिए लेकर आयें हैं।



📚 REFLECTION

Gospel of today speaks of the destruction of Jerusalem and the coming of the son of man.

Destruction of Jerusalem: Jesus explains to the people the process of destruction of Jerusalem. 1. Surrounded by armies: Jerusalem was surrounded by the Romans and it took long time for them to encircle the entire city. Once the city was surrounded their provisions were stopped. 2. Escape from Jerusalem: A movement was necessitated due to lack of food materials. Without the provisions the struggle of people increased and they had no other option than to move out of the city. This movement was in fact a blessing for the spread of Christianity around the world. 3. The struggle: For those who refused to move out of the city had to undergo a real struggle, especially the pregnant women and the women with infants. Many were killed and others were taken as captives. 4. Time of Gentiles: The bible says that the struggles will continue until the times of gentiles are fulfilled. It is not clear when that time would arrive.

Coming of the Son of Man: The second part of the reading speaks of prior caution of Jesus’ coming, place of his appearance and purpose of his coming. Disturbance in the heavenly and earthly bodies are stated as a warning prior to the coming of Son of Man. He is said to appear in the clouds with power and glory. In Dan. 7:13 we read, “I saw one like human being coming with the clouds of heaven” The purpose of His coming is declared as redemption of humanity. The reading ends with a hope of final liberation.

May the process of struggles we undergo in our life be a lesson for us to return to god and Let us be grateful for the gift of redemption that Jesus has brought for us.


📚 मनन-चिंतन - 2

आज के सुसमाचार में, प्रभु अपने दूसरे आगमन के बारे कहते हैं, “जब ये बातें होने लगेंगी, तो उठ कर खड़े हो जाओ और सिर ऊपर उठाओ, क्योंकि तुम्हारी मुक्ति निकट है"। संत पौलुस कहते हैं, “हम जानते हैं कि समस्त सृष्टि अब तक मानो प्रसव-पीड़ा में कराहती रही है और सृष्टि ही नहीं, हम भी भीतर-ही-भीतर कराहते हैं। हमें तो पवित्र आत्मा के पहले कृपा-दान मिल चुके हैं, लेकिन इस ईश्वर की सन्तान बनने की और अपने शरीर की मुक्ति की राह देख रहे हैं।” (रोमियों 8:22-23) कलकत्ता की संत तेरेसा अपनी मौत को हमेशा “अपना घर जाने” से तुलना करती थीं। योहन 14 में प्रभु येसु ने अपने शिष्यों से कहा कि वे उनके लिए जगह तैयार करने जा रहे हैं और जगह तैयार होने पर वे वापस उन्हें लेने आयेंगे ख्रीस्तीय विश्वास के अनुसार, मृत्यु जीवन का अंत नहीं है बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत है। एक ख्रीस्तीय विश्वासी आशावादी और अंतहीन आशावाद का व्यक्ति है क्योंकि वह एक प्रेममय और दयालु ईश्वर में विश्वास करता है।



📚 REFLECTION


In today’s Gospel, when Jesus speaks about his second coming and says “when these things begin to take place, stand up and raise your heads, because your redemption is drawing near”. St. Paul says, “We know that the whole creation has been groaning in travail together until now; and not only the creation, but we ourselves, who have the first fruits of the Spirit, groan inwardly as we wait for adoption as sons, the redemption of our bodies.” (Rom 8:22-23) St. Theresa of Calcutta used to refer to her death as “going home”. In Jn 14 Jesus told his disciples that he was going to prepare a place for them and once it was ready he would come and take them. In the Christian understanding, death is not the end but beginning of a new life. A Christian is a person of undying hope and endless optimism because he believes in a loving and merciful God.


 -Br. Biniush topno


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बुधवार, 24 नवंबर 2021

 

बुधवार, 24 नवंबर, 2021

वर्ष का चौंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: दानिएल का ग्रन्थ 5:1-6,13-14,16-17,23-28


1) राजा बेलशस्सर ने अपने एक हज़ार सामन्तों को एक बड़ा भोज दिया।

2) वह उन हजार अतिथियों के साथ अंगूरी पी रहा था और उसकी अंगूरी के नशे में सोने और चांदी के वे पात्र ले आने का आदेश दिया, जिन्हें उसके पिता नबूकदनेज़र ने येरुसालेम के मंदिर से चुरा लिया था। वह अपने सामन्तों, आपनी पत्नियों और उपपत्नियों के साथ उन में पीना चाहता था।

3) इसलिए येरुसालेम के मंदिर से चुराये हुए सोने और चाँदी के पात्र लाये गये और राजा अपने सामन्तों, अपनी पत्नियों और उपपत्नियों के साथ उन में पीने लगा।

4) अंगूरी पीते समय वे सोने, चाँदी, पीतल, लोहे, लकड़ी और पत्थर के देवताओं की प्रशंसा करते जाते थे।

5) उस समय एक मनुय के हाथ की ऊँगलियाँ दिखाई पड़ी और वे दीपाधार के सामने, राजभवन की पुती हुई दीवार पर कुछ लिखने लगी। राजा ने लिखने वाला हाथ देखा।

6) उसका रंग उड़ गया, वह बहुत घबराया, उसके पैर काँपने और उसके घुटने एक दूसरे से टकराने लगे।

13) जब दानिएल राजा के सामने लाया गया, तो राजा ने उस से कहा, ’’क्या तुम दानिएल हो, यूदा के उस निर्वासितों में से एक, जिन्हें राजा, मेरे पिता, यूदा से ले आये थे?

14) मैंने तुम्हारे विषय में सुना है कि देवताओं का आत्मा तुम में विद्यमान है और यह कि तुम अंर्तज्योति, विवेक और असाधारण प्रज्ञा से सम्पन्न हो।

16) लोगों ने तुम्हारे विषय में मुझे बताया है कि तुम स्वप्नों की व्याख्या कर सकते और समस्याओं को सुलझा सकते हो। यदि तुम यह लेख पढ़ कर इसका अर्थ समझाा सकते हो, तो तुम बैंगनी वस्त्र पहनोगे, गले में सोने का हार धारण करोगे और राज्य के तीसरे स्थान पर विराजमान होगे।''

17) दानिएल ने राजा को यह उत्तर दिया, ’’आप अपने उपहार अपने ही पास रखें और दूसरों को अपने पुरस्कार प्रदान करें। फिर भी मैं राजा के लिए यह लेख पढूँगा और उन्हें इसका अर्थ समझाऊँगा।

23) बल्कि आपने स्वर्ग के प्रभु का विरोध किया। आपने उसके मंदिर के पात्र लाने का आदेश दिया; आपने अपने सामन्तों, अपनी पत्नियों और उपपत्नियों के साथ उन में अंगूरी का पान किया; आपने सोने, चांदी, पीतल, लोहे, लकड़ी और पत्थर के उन देवताओं की प्रशंसा की, जो न तो देखते हैं, न सुनते और न समझते हैं'। आपने इस ईश्वर की स्तुति नहीं की, जिसके हाथ में आपके प्राण और समस्त जीवन निहित हैं।

24) इसलिए उसने यह हाथ भेज कर यह लेख लिखवाया।

25) यह लेख इस प्रकार है- मने, मने, तकेल, और फरसीन।

26) इन शब्दों का अर्थ इस प्रकार है। मनेः ईश्वर ने आपके राज्य के दिनों की गिनती की और उसे सामप्त कर दिया।

27) तकेलः आप तराजू प तौले गये और आपका वजन कम पाया गया।

28) फरसीनः आपका राज्य विभाजित हो कर मेदियों और फारसियों को दे दिया गया है।’’


सुसमाचार : सन्त लूकस 21:12-19


12) ‘‘यह सब घटित होने के पूर्व लोग मेरे नाम के कारण तुम पर हाथ डालेंगे, तुम पर अत्याचार करेंगे, तुम्हें सभागृहों तथा बन्दीगृहों के हवाले कर देंगे और राजाओं तथा शासकों के सामने खींच ले जायेंगे।

13) यह तुम्हारे लिए साक्ष्य देने का अवसर होगा।

14) अपने मन में निश्चय कर लो कि हम पहले से अपनी सफ़ाई की तैयारी नहीं करेंगे,

15) क्योंकि मैं तुम्हें ऐसी वाणी और बुद्धि प्रदान करूँगा, जिसका सामना अथवा खण्डन तुम्हारा कोई विरोधी नहीं कर सकेगा।

16) तुम्हारे माता-पिता, भाई, कुटुम्बी और मित्र भी तुम्हें पकड़वायेंगे। तुम में से कितनों को मार डाला जायेगा

17) और मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे।

18) फिर भी तुम्हारे सिर का एक बाल भी बाँका नहीं होगा।

19) अपने धैर्य से तुम अपनी आत्माओं को बचा लोगे।


मनन-चिंतन


आज का सुसमाचार शिष्यत्व के सच्चे चिन्ह के रूप में धैर्य और साक्ष्य की बात करता है।

धैर्य रखनाः येसु कहते हैं, ‘‘अपने धैर्य से तुम अपनी आत्माओं को बचा लोगे’’ लूकस 21ः19। धैर्य पवित्र आत्मा का एक उपहार है। संघर्ष, दर्द और पीड़ा मानव जीवन का हिस्सा हैं लेकिन अत्याचार एक ऐसी चीज है जिसे येसु चाहते हैं कि उनके शिष्य सहे। संत अगस्तीन ने लिखाः ‘‘शहीदों को बांधा गया, जेल में डाला गया, कोड़े मारे गए, लूटे गए, जलाए गए, किराए पर बेचे गए, मार दिए गए और वे कई गुना बढ़ गए’’। धैर्य हमारी आध्यात्मिक यात्रा का एक हिस्सा है। रोमियो 5ः3-4 में, संत पौलुस लिखते हैं, ‘‘दुःख-तकलीफ से धैर्य, धैर्य से दृढ़ता, और दृढ़ता से आशा उत्पन्न होती है, आशा व्यर्थ नहीं होती।’’ संत याकूब कहते हैं कि यह परिपक्व विश्वास की परीक्षा है। याकूब 1ः3-4 में हम पढ़ते हैं ‘‘आपके विश्वास का इस प्रकार का परीक्षण धैर्य उत्पन्न करता है। धैर्य को पूर्णता तक पहुँचने दीजिए, जिससे आप लोग स्वयं पूर्ण तथा परिपक्व बन जायें और आप में किसी बात की कमी नहीं रहे।’’

साक्ष्य देनाः प्रारंभिक ईसाइयों के लिए शहादत मसीह का साक्ष्य देनेे का तरीका था। ग्रीक में ‘‘शहीद’’ शब्द का अर्थ है ‘‘गवाह’’। तर्र्तुुलियन ने कहाः ‘‘शहीदों का रक्त बीज है।’’ हम सभी शहीद और गवाह बनने के लिए बुलाये गये है। अब सवाल यह है कि कहाँ और कैसे साक्षी दे। हमें अपने जीवन में, अपने काम में, अपने रिश्तों में, अपने दृष्टिकोणों में, अपने कष्टों में और यहाँ तक कि अपनी मृत्यु में भी मसीह को साक्षी देने की आवश्यकता है। संत पापा फ्राँसिस दैनिक चुनौतियों, विरोधों, प्रलोभनों और प्रतिकूलताओं के बीच सुसमाचार के आनंद की बात करते हैं। जब हम प्रभु का अनुसरण करते हैं तो हमें अपने जीवन में अपने शत्रुओं से प्रेम करने, दुखों में आनन्दित होने, कठिनाइयों में धैर्य रखने, आहत भावनाओं को क्षमा करने और निराश और असहायों के प्रति करुणा दिखाने के द्वारा अपने जीवन में सुसमाचार के आनंद और स्वतंत्रता को देखने की आवश्यकता है।

हमारा विश्वास हमारी आध्यात्मिक यात्रा में धैर्य के द्वारा परिपक्व हो। आइए हम अपने व्यक्तिगत अनुभव के साथ ईश्वर में अपना विश्वास और शक्ति बढ़ाकर मसीह का साक्ष्य देने के लिए स्वयं को तैयार करें।



REFLECTION

Today’s gospel speaks of endurance and witnessing as the true marks of discipleship.

Endurance: Jesus says, “By your endurance you will gain your lives” Lk: 21:19. Endurance is a gift of the Holy Spirit. Struggles, pain and agony are part of human life but persecution is something that Jesus wants his disciples to endure. St. Augustine wrote: “The martyrs were bound, jailed, scourged, racked, burned, rent, butchered and they multiplied”. Endurance is a part of our spiritual journey. In Rom. 5:3-4 St. Paul writes “suffering produces endurance and endurance produces character and character produces hope, and hope does not disappoint us”. St. James says it is a test of matured faith. Jas. 1:3-4 we read “testing of your faith produces endurance; and let endurance have its full effect, so that you may be mature and compete, lacking in nothing”.

Witnessing: For early Christians martyrdom was the way of witnessing Christ. The word ‘martyr’ in Greek means ‘witness.’ Tertullian said: “The blood of the martyrs is seed.” All of us are called to be martyrs and witnesses. Now the question is where and how to witness. We need to witness Christ in our lives, our work, our relationships, our attitudes, our suffering and even our death. Pope Francis speaks of the joy of the gospel in the midst of daily challenges, oppositions, temptations and adversities. As we follow the Lord we need to witness the joy and freedom of the gospel in our life by loving our enemies, being joyful in suffering, patient in difficulties, forgiving hurt feelings and showing compassion to hopeless and helpless.

May our faith be matured in our spiritual journey through endurance. Let us prepare ourselves to witness Christ by increasing our confidence and power in God with a personal experience of him.


मनन-चिंतन - 2

प्रभु येसु शिष्यत्व की माँगों के बारे में बहुत स्पष्ट हैं। अपने शिष्यों को जिन कठिनाइयों तथा सतावट का सामना करना पडेगा, उनके बारे में येसु लोगों को समझाते हैं। प्रभु येसु के शिष्यों को अपने प्रिय और निकट के लोगों के भी विरोध का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। फिर भी येसु के शिष्य इस दुनिया में अकेले लड़ाई नहीं लड़ते। वे सर्वशक्तिमान ईश्वर की सहायता प्राप्त करेंगे जो अपने मुंह के लिए शब्द और हाथों के लिए ताकत देंगे। यह एक रास्ता है जिस पर प्रभु येसु पहले से ही चला गया था और इसलिए हम सिर्फ उसका अनुसरण करते हैं।



REFLECTION

Jesus is very straightforward about the demands of discipleship. He is plain while talking about the kind of difficulties and persecutions his disciples will face. A disciple of Jesus should be prepared to face opposition from his dear and near ones. Yet he does not fight the battle alone in this world. He will receive the assistance of the Almighty God who will give words for his mouth and strength for his hands. This is a path which Jesus already walked and so we just follow him.


 -Br. Biniush topno


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मंगलवार, 23 नवंबर, 202

 

मंगलवार, 23 नवंबर, 2021

वर्ष का चौंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह


पहला पाठ: दानिएल का ग्रन्थ 2:31-45


31) राजा! आपने यह दिव्य दृश्य देखा। एक विशाल, देदीप्यमान और भीषण मूर्ति आपके सामने खड़ी थी।

32) उस मूर्ति का सिर सोने का था, उसकी छाती और भुजाएँ चाँदी की थी, उसका पेट और कमर पीतल की,

33) उसकी जाँघें लोहे की और उसके पैर अंशतः लोहे के और अंशतः मिट्टी के थे।

34) आप उसे देख ही रहे थे कि एक पत्थर अचानक अपने आप गिरा, उस मूर्ति के लोहे और मिट्टी के पैरों पर लगा गया और उसने उनके टूकडे-टुकड़े कर डाले।

35) उसी समय लोहा, मिट्टी, पीतल, चाँदी और सोना सब चूर-चूर हो क्रर हो कर ग्रीष्म-ऋतु की भूसी की तरह पवन द्वारा उड़ा लिया गया और उसका कुछ भी शेष नहीं रहा। जो पत्थर मूर्ति पर लग गया था, वह समस्त पृथ्वी को ढकने वाला विशाल पर्वत बन गया।

36) यह था आपका स्वप्न। अब मैं आप को उसका अर्थ बताऊँगा।

37) राजा! आप राजाओं को राजा हैं।

38) स्वर्ग के ईश्वर ने आप को राजत्व, अधिकार, सामर्थ्य और सम्मान प्रदान किया। उसने मनुयों, मैदान के पशुओं और आकाश के पक्षियों को- वे चाहें कहीं भी निवास करें- आपके हाथों सौंपा और आप को सब का अधिपति बना दिया। मूर्ति के सोने का सिर आप ही हैं।

39) आपके बाद का दूसरा राज्य आयेगा। वह आपके राज्य से कम वैभवशाली होगा और इसके बाद एक तीसरा राज्य, जो पीतल का होगा और समस्त पृथ्वी पर शासन करेगा।

40) चैथा राज्य लोहे की तरह मजबूत होगा। जिस प्रकार लोहा सब कुछ पीस कर चूर कर सकता है, उसी प्रकार वह राज्य पहले के राज्यों को चूर-चूर कर नष्ट कर देगा।

41) आपने देखा है कि वे पैर अंशतः मिट्टी के और अशंतः लोहे के थे- इसका अर्थ है कि उस राज्य में फूट होगी।

42) उस में लोहे की शक्ति होगी, क्योंकि आपने देखा है कि मिट्टी में लोहा मिला हुआ था।

43) उसके पैर अशंतः लाहेे और अशंत: मिट्टी के थे- इसका अर्थ यह है कि उस राज्य का एक भाग शक्तिशाली और एक भाग दुर्बल होगा। आपने देखा है कि लोहा मिट्टी से मिला हुआ था- इसका अर्थ है कि विवाह-सम्बन्ध द्वारा राज्य के भागों को मिलाने का प्रयत्न किया जायेगा, किन्तु वे एक नहीं हो जायेंगे जिस तरह लोहा मिट्टी से एक नहीं हो सकता है।

44) ’’इन राज्यों के समय स्वर्ग का ईश्वर एक ऐसे राज्य की स्थापना करेगा, जो अनंत काल तक नष्ट नहीं होगा और जो दूसरे राष्ट्र के हाथ नहीं जायेगा। वह इन राज्यों को चूर-चूर कर नष्ट कर देगा और सदा बना रहेगा।

45) आपने देखा है कि अपने आप पर्वत पर से एक पत्थर गिर गया और उसने लोहा, पीतल, मिट्टी चाँदी और सोने को चूर-चूर कर दिया है, महान् ईश्वर ने राजा को सूचित किया कि भविय में क्या होने वाला है। यह स्वप्न सच्चा है और इसकी व्याख्या विश्वसनीय है।’’



सुसमाचार : सन्त लूकस 21:5-11



5) कुछ लोग मन्दिर के विषय में कह रहे थे कि वह सुन्दर पत्थरों और मनौती के उपहारों से सजा है। इस पर ईसा ने कहा,

6) ‘‘वे दिन आ रहे हैं, जब जो कुछ तुम देख रहे हो, उसका एक पत्थर भी दूसरे पत्थर पर नहीं पड़ा रहेगा-सब ढा दिया जायेगा’’।

7) उन्होंने ईसा से पूछा, ‘‘गुरूवर! यह कब होगा और किस चिन्ह से पता चलेगा कि यह पूरा होने को है?’’

8) उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘सावधान रहो तुम्हें कोई नहीं बहकाये; क्योंकि बहुत-से लोग मेरा नाम ले कर आयेंगे और कहेंगे, ‘मैं वही हूँ’ और ‘वह समय आ गया है’। उसके अनुयायी नहीं बनोगे।

9) जब तुम युद्धों और क्रांतियों की चर्चा सुनोगे, तो मत घबराना। पहले ऐसा हो जाना अनिवार्य है। परन्तु यही अन्त नहीं है।’’

10) तब ईसा ने उन से कहा, ‘‘राष्ट्र के विरुद्ध राष्ट्र उठ खड़ा होगा और राज्य के विरुद्ध राज्य।

11) भारी भूकम्प होंगे; जहाँ-तहाँ महामारी तथा अकाल पड़ेगा। आतंकित करने वाले दृश्य दिखाई देंगे और आकाश में महान् चिन्ह प्रकट होंगे।



मनन-चिंतन



आज के पाठ हमें तीन चेतावनियाँ देते हैंः 1) बीतने वाली दुनिया, 2) झूठे भविष्यवक्ताओं के बहकावे में नहीं पड़ना और 3) इस दुनिया में घटित होने वाले चीज़ों से डरना नहीं।

बीतने वाली दुनियाः आज के पाठ हमें याद दिलाती है कि इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। आज का पहला पाठ सबसे शक्तिशाली राज्य के टुकड़े-टुकड़े होने और सुसमाचार में मंदिर के विनाश के बारे में बात करता है। इस धरती पर सब कुछ नष्ट हो रहा है। हमारी दुनिया और हमारा जीवन समाप्त हो जाएगा। बालक येसु की संत तेरेसा कहती हैं, ‘‘कुछ भी आपको परेशान न करें, कुछ भी आपको डराएं नहीं, सभी चीजें नष्ट हो जाती हैंः ईश्वर कभी नहीं बदलते’’।

धोखे में न आएंः येसु ने अपने अनुयायियों को दुनिया के अंत के बारे में सटीक विवरण जानने का दावा करने वाले झूठे भविष्यवक्ता पर विश्वास नहीं करने के लिए कहा क्योंकि यह उनकी अज्ञानता, अविश्वास और छलयोजना को उजागर करता है। मत्ती 24ः36 में लिखा है, ‘‘उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता- न तो स्वर्ग के दूत और न पुत्र। केवल पिता ही जानता है।’’ वे स्वयं येसु से बेहतर जानने का दावा करते हैं। वे अंत समय के बारे में बोलकर लोगों को डरातेे हैं और दावा करते हैं कि उन्हें ईश्वर से रहस्योद्घाटन प्राप्त हुआ है। यह ईश्वर में उनके अविश्वास का खुलासा करता है। वे यह कहते हुए लोगों से छल़ करते हैं कि समय के अंत में उनके समूह से संबंधित सभी लोगों को बख्शा जाएगा या सभी परीक्षणों से सुरक्षित कर लिया जाएगा। इन झूठे भविष्यवक्ताओं पर विश्वास करने से हममें भय और घबराहट उत्पन्न होगा। इतनी सारी आवाजों और विकल्पों से लोग भ्रमित होंगे। हमें केवल मसीह और उसके वचनों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जो हमें सत्य की ओर ले जाएंगे।

भयभीत न होंः सुसमाचार में प्राकृतिक आपदाओं, व्यापक बीमारियों और स्वर्गीय निकायों की अप्राकृतिक गतिविधियों का उल्लेख करने का उद्देश्य हमें डराना नहीं है, बल्कि हमें यह आशा देना है कि येसु किसी भी विनाश और तबाही से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। अगर दुनिया की सोच हमें डराती है, तो इसका मतलब है कि हमारा जीवन अभी तक येसु के जीवन से नहीं मिला है। येसु में आशा और विश्वास रखते हुए, हमें डरने की कोई बात नहीं है। वह हमें संसार में आशा लाने और परीक्षाओं के बीच विश्वास को जीवित रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।

आइए हम इस दुनिया की गुजरती वास्तविकताओं से अवगत हों, झूठी शिक्षाओं के बहकावें में न आएं बल्कि येसु पर अपना विश्वास और आशा रखना सीखें।



REFLECTION



Today’s readings give us three warnings: 1) Passing world, 2) not to be deceived by false prophets and 3) not to be afraid of happening in this world.

Passing world: The readings of today remind us that nothing is lasting in this world. First reading of today speaks of most powerful kingdom crumbling into pieces and the gospel about the destruction of the temple. All things on this earth are passing. Our world and our life will come to an end. St. Teresa of Jesus says, “Let nothing disturb you, let nothing frighten you, all things pass away: God never changes”.

Not be deceived: Jesus tells His followers not to believe false prophet’s claim of knowing exact details about the end of the world because it exposes their ignorance, distrust and manipulation. Mat. 13:32 reads “No one knows about the day or hour, not even the angels in heaven, nor the Son, but only the Father”. They claim to know better than Jesus himself. They panic the people speaking about end times and claim to have revelations from God. It discloses their distrust in God. They manipulate people saying that everyone belonging to their group will be spared or secured of all trails at the end of time. Believing in these false prophets will bring fear and panic in us. People will be confused with so many voices and choices. We need to focus only on Christ and His words which will lead us to the truth.

Not be terrified: The purpose of mentioning natural disasters, widespread diseases and unnatural movements of the heavenly bodies in the gospel is not to frighten us but to instill in us hope that Jesus is far more powerful than any destruction and devastation. If the thought of the world frightens us, it means that our life is not yet attuned with the life of Jesus. Having hope and faith in Jesus, we have nothing to fear. He encourages us to bring hope into the world and to keep the faith alive in midst of trials.

Let us become aware of the passing realities of this world, not to be carried away with the false teaching but learn to place our faith and hope in Jesus.



मनन-चिंतन - 2



जब लोग यरूसालेम के मंदिर की बाहरी सुंदरता की सराहना कर रहे थे, तब प्रभु येसु शायद उस से अधिक महत्वपूर्ण बातों के बारे में सोच रहे थे। 1राजाओं 9 में हम पढ़ते हैं कि जब राजा सुलैमान ने यरूसालेम के खूबसूरत मंदिर को ईश्वर को समर्पित किया और ईश्वर से वहाँ लोगों को आशीर्वाद लेने के लिए उपस्थित होने की प्रार्थना की, तो प्रभु ने अपनी उपस्थिति के लिए कुछ शर्तें रखीं। उन्होंने राजा से कहा कि अगर वह और इस्राएल के लोग उन्हें प्यार करने और उनकी आज्ञाओं का पालन करने में विश्वसनीय बने रहेंगे, तो उनकी आँखें और दिल हर समय उस मंदिर में रहेगा। लेकिन अगर वे उनकी अवज्ञा करते हैं और उनकी आज्ञाओं और विधियों को नहीं रखते हैं, तो वे इस्राएलियों को उस देश से निकाल देंगे, जिसे उन्होंने उन्हें दिया था और उस मन्दिर को त्याग देंगे, जिसका उन्होंने अपने नाम के लिए प्रतिष्ठान किया था और सब राष्ट्र इस्राएल की निन्दा और उपहास करेंगे। (देखें 1राजाओं 9: 7) मंदिर की पूजा का समुदाय के लोगों के जीवन से संबंध है। अगर हम ईमानदारी से उनसे प्यार करते हैं और उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो ईश्वर मंदिर में हमारे बलिदानों से प्रसन्न होंगे। दूसरी ओर, यदि हम अच्छे कार्यों द्वारा प्रभु के नाम की महिमा से पीछे हटते हैं, तो मंदिर में हमारे बलिदान सार्थक या स्वीकार्य नहीं होंगे।



REFLECTION



When people were appreciating the external beauty of the Temple of Jerusalem, Jesus was thinking about greater things. In 1Kgs 9 we read that when King Solomon dedicated the beautiful temple of Jerusalem and prayed to God to be present there to bless the people, God in reply put certain conditions for his presence. He told the king that if he and the people of Israel were faithful in loving Him and following His commandments, his eyes and heart will be there all the time. But if they disobey him and do not keep his commandments and statutes, then he would cut Israel off from the land that he had given them; and the house that he had consecrated for his name He would cast out of His sight; and Israel will become a proverb and a taunt among all peoples (cf. 1Kgs 9:7). The temple worship and the life should go hand in hand. If we sincerely love him and follow His commandments, the Lord will be pleased with our worship in the temple. On the other hand, if we do not glorify the name of the Lord by good deeds, our temple worship will not be meaningful or acceptable.


 -Br. Biniush topno


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सोमवार, 22 नवंबर, 2021 वर्ष का चौंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

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पहला पाठ: दानिएल का ग्रन्थ 1:1-6,8-20


1) यूदा के राजा यहोयाकीम के राज्यकाल के तीसरे वर्ष बाबुल के राजा नबूकदनेज़र ने येरुसालेम आ कर उसके चारों ओर घेरा डाला।

2) प्रभु ने यूदा के राजा यहोयाकीम को और ईश्वर के मन्दिर के कुछ पात्रों को नबूकदनेज़र के हाथ जाने दिया। उसने उन्हें शिनआर देश भिजवाया और पात्रों को अपने देवताओं के कोष में रखवा दिया।

3) राजा ने खोजों के अध्यक्ष अशपनज को कुछ ऐसे इस्राएली नवयुवकों को ले आने का आदेश दिया, जो राजवंशी अथवा कुलीन हों,

4) शारीरिक दोषरहित, सुन्दर, समझदार, सुशिक्षित, प्रतिभाशाली और राज-दरबार में रहने योग्य हों। अशपनज ने उन्हें खल्दैयियों का साहित्य और भाषा पढायी।

5) राजा ने राजकीय भोजन और अंगूरी में से उनके लिए खाने-पीने का दैनिक प्रबंध किया। उन्हें तीन वर्ष का प्रशिक्षण दिया जाने वाला था और उसके बाद वे राजा की सेवा में नियुक्त किये जाने वाले थे।

6) उन में यूदावंशी दानिएल, हनन्या, मीशाएल और अज़र्या थे।

8) दनिएल ने निश्चय किया कि वह राजकीय भोजन और अंगूरी खा-पी कर अपने को अशुद्ध नहीं करेगा और उसने खोजों के अध्यक्ष से निवेदन किया कि वह उसे उस दूषण से बचाये रखें।

9) ईश्वर की कृपा से खोजों का अध्यक्ष दानिएल के साथ अच्छा और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करता था।

10) उसने दानिएल से कहा, ’’मैं राजा, अपने स्वामी से डरता हूँ। उन्होंने तुम्हारा खानपान निश्चित किया है। यदि वह देखेंगे कि समवयस्क नवयुवकों की तुलना में तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ है, तो मेरा जीवन जोखिम में पड़ जायेगा।’’

11) उसके बाद दानिएल ने भोजन के प्रबन्धक से, जिसे खोजों के अध्यक्ष ने दानिएल, हनन्या, मीशाएल और अजर्या पर नियुक्त किया था, कहा,

12) ’’आप कृपया दस दिन तक अपने सेवकों की परीक्षा ले- हमें खाने के लिए तरकारी और पीने के लिए पानी दिलायें।

13) इसके बाद आप हमारा और राजकीय भोजन का सेवन करने वाले युवकों का चेहरा देख लें और जो आप को उचित जान पड़े, वही हमारे साथ करें।’’

14) उसने उनका निवेदन स्वीकार कर लिया और दस दिन तक उनकी परीक्षा ली।

15) दस दिन बाद के राजकीय भोजन खाने वाले युवकों की तुलना में अधिक स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट दीख पड़े।

16) उस समय से प्रबन्धक उनके लिए निर्धारित किया हुआ खान-पान हटा कर उन्हें तरकारी देता रहा।

17) ईश्वर ने उन चार नवयुवकों को ज्ञान, समस्त साहित्य की जानकारी और प्रज्ञा प्रदान की। दानिएल को दिव्य दृश्यों और हर प्रकार के स्वप्नों की व्याख्या करने का वरदान प्र्राप्त था।

18) राजा द्वारा निर्धारित अवधि की समाप्ति पर खाजों के अध्यक्ष ने नवयुवकों को नबूकदनेज़र के सामने प्रस्तुत किया।

19) राजा ने उनके साथ वार्तालाप किया और उन में कोई भी दानिएल, हनन्य, मीशाएल और अजर्या की बराबरी नहीं कर सका। वे राजा की सेवा में नियुक्त हो गये।

20) जब जब राजा ने किसी समस्या पर उन से परामर्श लिया, तो उसने पाया कि समस्त राज्य के किसी भी ज्योतिषी अथवा ओझा से उनकी प्रज्ञा और विवेक दसगुना श्रेष्ठ था।



सुसमाचार : सन्त लूकस 21:1-4



1) ईसा ने आँखें ऊपर उठा कर देखा कि धनी लोग ख़ज़ाने में अपना दान डाल रहे हैं।

2) उन्होंने एक कंगाल विधवा को भी दो अधेले डालते हुए देखा

3) और कहा, ‘‘मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ-इस कंगाल विधवा ने उन सबों से अधिक डाला है।

4) उन्होंने तो अपनी समृद्धि से दान दिया, परन्तु इसने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला।’’



मनन-चिंतन



पूर्ण चढ़ावाः सुसमाचार में विधवा ने अपना सब कुछ ईश्वर को अर्पित किया। उसने अपने लिए कुछ भी पीछे नहीं रखा। यह एक पूर्ण चढ़ावा था। प्रेरित चरित 5ः1-11 में, हम अनानीयस और सफीरा के बारे में सुनते हैं, जिन्होंने खेत की कीमत का एक अंश वापस रखा और पेत्रुस से झूठ बोलकर अपनी जान गंवा दी। संत अगस्तीन कहते हैं, ‘‘जहाँ तुम्हारा आनंद है, वहाँ तुम्हारा खजाना है; जहाँ तुम्हारा खजाना है, वहाँ तुम्हारा दिल है; जहाँ तुम्हारा दिल है, वहाँ तुम्हारी खुशी है’’। हमें उस खजाने का आनंद लेने के लिए खुद को पूरी तरह से देने की जरूरत है। विलियम बार्कले लिखते हैं, ‘‘क्या प्रकृति का पूरा क्षेत्र मेरा था, वह एक भेंट थी जो बहुत छोटी थी। प्रेम इतना अद्भुत, इतना दिव्य जो मेरी आत्मा, मेरा जीवन, मेरा सब कुछ मांगता है।’’

ईश्वर बलिदान को महत्व देता हैः ईश्वर देने वाले के बलिदान को महत्व देता है। दी गई राशि से अधिक वह उस हृदय या प्रेम को देखता है जिसके साथ कोई उसे देता है, मदर तेेरेसा कहती है ‘‘यदि आप वह देते हैं जिसकी आपको आवश्यकता नहीं है, तो वह देना नहीं होता,’’ ईश्वर को इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं है कि हम कितना देते हैं, लेकिन हम कैसे देते हैं। ईश्वर उपहार की मात्रा को नहीं बल्कि देने वाले के मनोभाव को देखता है।

सुसमाचार में विधवा को हमारे लिए अपने जीवन को ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और हमारे दैनिक जीवन में किए जाने वाले बलिदानों के लिए एक आदर्श बनने दें।



REFLECTION


Complete offering: The widow in the gospel offered to God all that she had. She did not hold back anything for her. It was a complete offering. In Acts. 5:1-11 we hear about Ananias and Sapphira, who kept back part of the proceeds of the land and lying to Peter losing their life. St. Augustine says “Where your pleasure is, there is your treasure; where your treasure is, there is your heart; where your heart is, there is your happiness”. We need to give ourselves completely to enjoy that that treasure. William Barclay writes “Were the whole realm of nature mine, that were an offering far too small. Love so amazing, so divine demands my soul, my life, my all”.

God values the Sacrifice: God values the sacrifice of the giver. More than the amount given he sees the heart or the love with which one gives Mother Theresa says “If you give what you do not need, it isn’t giving,” God is not interested in how much we give, but in how we give. God does not look at the amount of the gift but at the spirit of the giver.

Let the widow in the gospel become a model for us in total surrendering of our life to God and the sacrifices that we need to make in our daily life.


मनन-चिंतन - 2



प्रभु ईश्वर के सामने जो बात मायने रखती है वह भेंट की मात्रा नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता है। उत्पत्ति 4:3-4 में कहा गया है, " काइन ने भूमि उपज का कुछ अंश प्रभु को अर्पित किया। हाबिल ने भी अपनी सर्वोत्तम भेड़ों के पहलौठे मेमनों को प्रभु को अर्पित किया।" यह स्पष्ट है कि काइन ने अपनी भेंट की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया। उसने “कुछ अंश” अर्पित किया, जैसे वह एक औपचारिकता पूरी कर रहा हो। लेकिन हाबिल ने चुने हुए उपहारों की भेंट चढ़ायी; उसने प्रभु को सर्वश्रेष्ठ वस्तुएं अर्पित की। बलिदान की भावना चढ़ावे की गुणवत्ता को बढ़ाती है। 2समुएल 24:24 में दाऊद ने जोर देकर कहा, "मैं प्रभु, अपने ईश्वर को मुफ़्त में प्राप्त होम-बलियाँ नहीं चढ़ाना चाहता"। जब हमारे पास ज़रूरत से ज़्यादा सम्पत्ति होती है और उसका एक अंश प्रभु को चढ़ाते हैं, तो वह कोई महान कार्य नहीं होता है, लेकिन अगर हमारे पास अपनी ज़रूरत की पूर्ती के लिए पर्याप्त संपत्ति है या उससे भी कम है, तो उनमें से कुछ ईश्वर को अर्पित करना एक महान हो जाता है। अगर ईश्वर की या दूसरों की सेवा में हमें अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ती है, तो वह सबसे बड़ा कार्य बनता है। संत लूकस 21:1-4 में बताया गया है कि उस गरीब विधवा ने “तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला”। वह सब कुछ देती है। ऐसा करने को सक्षम होने के लिए, वह एक ऐसी महिला होनी चाहिए, जो पूरी तरह ईश्वर के लिए समर्पित हो, जो ईश्वर की उदारता में विश्वास करती हो और यह मानती हो कि ईश्वर को कुछ चढ़ाते समय हिस्साब नहीं लगाना चाहिए।



REFLECTION


What matters before God is not quantity of the offering, but the quality of it. Gen 4:3-4 says, “Cain brought to the Lord an offering of the fruit of the ground, and Abel for his part brought of the firstlings of his flock, their fat portions”. It is evident that Cain did not bother about the quality of his offering to God. He offered something, as if he was fulfilling a formality. But Abel offered chosen gifts; he offered the best to God. One of the things that adds to the quality greatly is the sacrifice involved in the offerings. In 2Sam 24:24 David insists, “I will not offer burnt offerings to the Lord my God that cost me nothing”. When we offer from what we have in excess, there is nothing great about, but if we offer to the point of being hurt, it becomes great. If it means dying, that is the greatest offering. The poor widow at the temple, mentioned by Lk in 21:1-4, put in “all she had to live on”. She gives everything. To be able to do that, she should be a woman who has single-minded devotion in her heart for God, believes in the generosity of God and does not count when it is a matter of offering something to God.


 -Br. Biniush topno


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