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शुक्रवार, 19 नवंबर, 2021

 

शुक्रवार, 19 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: मक्काबियों का पहला ग्रन्थ 4:36-37,52-59



36) उस समय यूदाह और उसके भाइयों ने यह कहा, ’’हमारे शत्रु हार गये। हम जा कर मंदिर का शुद्धीकरण और प्रतिष्ठान करें।’’

37) समस्त सेना एकत्र हो गयी और सियोन के पर्वत की ओर चल पड़ी।

52) एक सौ अड़तालीसवें वर्ष के नौंवे महीने-अर्थात् किसलेव-के पच्चीसवें दिन, लोग पौ फटते ही उठे

53) और उन्होंने होम की जो नयी वेदी बनायी थी, उस पर विधिवत् बलि चढ़ायी।

54) जिस समय और जिस दिन गैर-यहूदियों ने वेदी को अपवत्रि कर दिया था, उसी समय और उसी दिन भजन गाते और सितार, वीणा तथा झाँझ बजाते हुए उन्होंने वेदी का प्रतिष्ठान किया।

55) सब लोगों ने दण्डवत् कर आराधना की और ईश्वर को धन्य कहा, जिसने उन्हें सफलता दी थी।

56) वे आनंद के साथ होम, शांति तथा धन्यवाद का यज्ञ चढा कर आठ दिन तक वेदी के प्रतिष्ठान का पर्व मनाते रहें।

57) उन्होंने मंदिर का अग्रभाग सोने की मालाओं तथा ढालों से विभूशित किया, फाटकों तथा याजकों की शालाओं को मरम्मत किया और उनमें दरवाजे लगाये।

58) लोगों में उल्लास था और उन पर लगा हुआ गैर-यहूदियों का कलंक मिट गया।

59) यूदाह ने अपने भाइयों तथा इस्राएल के समस्त समुदाय के साथ यह निर्णय किया कि प्रति वर्ष इसी समय, अर्थात् किसलेव के पच्चीसवें दिन से ले कर आठ दिन तक वेदी के पुनः प्रतिष्ठान का पर्व उल्लास तथा आन्नद के साथ मनाया जायेगा।



सुसमाचार : सन्त लूकस 19:45-48



45) ईसा मन्दिर में प्रवेश कर बिक्री करने वालों को यह कहते हुए बाहर निकालने लगे,

46) ‘‘लिखा है-मेरा घर प्रार्थना का घर होगा, परन्तु तुम लोगों ने उसे लुटेरों का अड्डा बनाया है’’।

47) वे प्रतिदिन मन्दिर में शिक्षा देते थे। महायाजक, शास्त्री और जनता के नेता उनके सर्वनाश का उपाय ढूँढ़ रहे थे,

48) परन्तु उन्हें नहीं सूझ रहा था कि क्या करें; क्योंकि सारी जनता बड़ी रुचि से उनकी शिक्षा सुनती थी।



मनन-चिंतन



जब प्रभु येसु ने पवित्र वचन की घोषणा की, तब गरीबों और आम लोगों ने उनकी प्रशंसा की और उनके संदेश को स्वीकार किया, लेकिन शक्तिशाली और प्रभावशाली लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया और उनका विरोध किया। जरूरतमंद लोग आसानी से ईश्वर को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन जिन लोगों की जरूरतें पहले से पूरी हो जाती हैं, उन्हें अपने जीवन में ईश्वर की भूमिका स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है। येसु स्वर्गिक पिता द्वारा उनके लिए निर्धारित किए गए मार्ग पर ही चलते थे। वे लोकप्रियता या विरोध के कारण पीछे नहीं हटते थे। वे ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के सीधे मार्ग पर चलते रहते थे। जब शैतान उन्हें अपने रास्ते से हटाने की कोशिश करता है, तब वे शैतान की चालों को समझ सकते हैं और उसे अपने सामने से निष्कासित करते हैं। स्वर्गराज्य के लिए सब कुछ नया करने के मकसद से, वे मंदिर की पवित्रता पर जोर देते हैं जिसे उनके समय के लोगों ने बाजार या लुटेरों के अड्डे में बदल दिया था। क्या हम येसु की तरफ हैं या फरीसियों और सदूकियों की तरफ?



REFLECTION



When Jesus preached the Word, the poor and ordinary people acclaimed him and accepted his message, but the powerful and the influential rejected and opposed him. The people in need easily accept God but the people whose needs are already met find it difficult to accept the role of God in their lives. Jesus simply keeps himself on the path marked out for him by the heavenly Father. He does not get diverted by popularity or by opposition. He keeps going straight in doing the will of God. When Satan tries to divert him from his path, he is quick to sense the tricks of Satan and expel him from his presence. In an exercise of renewing everything for the Kingdom, he insists on the sanctity of the temple which the people of his time had turned into a market or den of robbers. Are we on the side of Jesus or on the side of the Pharisees and the Scribes?


✍ -Br. Biniush topno


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गुरुवार, 18 नवंबर, 2021

 

गुरुवार, 18 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: मक्काबियों का पहला ग्रन्थ 2:15-29


15) राजा के पदाधिकारी, जो लोगों को स्वधर्मत्याग के लिए बाध्य करते थे, बलिदानों का प्रबंध करने मोदीन नामक नगर पहुँचे।

16) बहुत-से इस्राएली उन से मिल गये किंतु मत्तथ्या और उसके पुत्र अलग रहे।

17) राजा के पदाधिकारो ने मत्तथ्या को सम्बोधित करते हुए कहा, ’’आप इस नगर के प्रतिष्ठित और शक्तिशाली नेता हैं। आप को अपने पुत्रों और भाइयों का समर्थन प्राप्त हैं।

18) आप सर्वप्रथम आगे बढ़ कर राजाज्ञा का पालन कीजिए, जैसा कि सभी राष्ट्र, यूदा के लोग और येरुसालेम के निवासी कर चुके हैं। ऐसा करने पर आपके पुत्र राजा के मित्र बनेंगे और सोना चाँदी और बहुत-से उपहारों द्वारा आपका और आपके पुत्रों का सम्मान किया जायेगा।’’

19) मत्तथ्या ने पुकार कर यह उत्तर दिया, ’’साम्राज्य के सभी राष्ट्र भले ही राजा की बात मान जायें, सभी आपने पुरखों का धर्म छोड़ दें और राजा के आदेशों का पालन करें,

20) किंतु मैं, मेरे पुत्र और मेरे भाई-हम अपने पुरखों के विधान के अनुसार ही चलेंगे।

21) ईश्वर हमारी रक्षा करे, जिससे हम उसकी संहिता और उसके नियमों का परित्याग न करें।

22) हम राजा की आज्ञाओं का पालन नहीं करेंगे और अपने धर्म का किसी भी प्रकार से उल्लंघन नहीं करेंगे।

23) मत्तथ्या ने इन शब्दों के तुरंत बाद एक यहूदी राजा के आदेशानुसार मोदीन की वेदी पर बलि चढ़ाने के लिए सब के देखते आगे बढा।

24) इस पर मत्तथ्या का धर्मोत्साह भड़क उठा और वह आगबबूला हो गया। उसने क्रोध के आवेग में आगे झपट कर उस यहूदी को वेदी पर मार डाला।

25) उसने बलि के लिए लोगों को बाध्य करने वाले पदाधिकारी का वध किया और वेदी का विध्वंस किया।

26) इस प्रकार मत्तथ्या ने पीनहास के सदृश संहिता के प्रति अपना उत्साह प्रदर्शित किया- पीनहास ने इसी तरह सालू के पुत्र ज़िम्री का वध किया था।

27) इसके बाद मत्तथ्या ने नगर भर में घूमते हुए ऊँचे स्वर से पुकार कर यह कहा, ’’जो संहिता के प्रति उत्साही हैं। और विधान को बनाये रखने के पक्ष में हैं, वे मेरे पीछे चले आयें’’।

28) इसके बाद वह और उसके पुत्र नगर में अपनी सारी संपत्ति छोड़ कर पहाड़ों पर भाग गये।

29) उस समय बहुत-से लोग, जिन्हें धर्म और न्याय प्रिय था, उजाड़ प्रदेश जा कर वहाँ बस गये।



सुसमाचार : सन्त लूकस 19:41-44



41) निकट पहुँचने पर ईसा ने शहर को देखा। वे उस पर रो पड़े

42) और बोले, ‘‘हाय! कितना अच्छा होता यदि तू भी इस शुभ दिन यह समझ पाता कि किन बातों में तेरी शान्ति है! परन्तु अभी वे बातें तेरी आँखों से छिपी हुई हैं।

43) तुझ पर वे दिन आयेंगे, जब तेरे शत्रु तेरे चारों ओर मोरचा बाँध कर तुझे घेर लेंगे, तुझ पर चारों ओर से दबाव डालेंगे,

44) तुझे और तेरे अन्दर रहने वाली तेरी प्रजा को मटियामेट कर देंगे और तुझ में एक पत्थर पर दूसरा पत्थर पड़ा नहीं रहने देंगे; क्योंकि तूने अपने प्रभु के आगमन की शुभ घड़ी को नहीं पहचाना।’’



मनन-चिंतन



आंसू हमारे अपने जीवन का हिस्सा है । हमारी ऑंखों में ऑंसू तब आते है जब कोई चीज हमारी ऑंखों में चली जाती है या दिलो में । आंसू भी सुसमाचार के वृतांतों का हिस्सा है । चारों सुसमाचार में, ऑंसू बहाने या विलाप के 26 संदर्भ है: पिता बीमार बेटी के लिए विलाप करता है, विधवा अपने इकलौते बेटे के लिए आंसू बहाती है, पापी स्त्री येसु के चरणों में रोती है, येसु का इनकार करने के कारण पेत्रुस फूट-फूट कर रोता है और इसी तरह अन्य संदर्भ है ।

येसु क्रूस को ढोते समय या क्रूस पर लटके हुए और कोड़ों की मार पर भी नही रोए, लेकिन उन्होंने समय-समय पर अपना दुख व्यक्त किया क्योंकि उन्हें उन लोगों के लिए सहानुभूति थी जिन्हें वे प्यार करते तथा जिनकी देखभाल करते थे । सहानुभूति सिर्फ दूसरों के लिए एक भावना नहीं है बल्कि खुद को दूसरे के स्थान पर रखना है । उन्होने अपने भाई लाजरूस को जीवित करके रोते हुए मार्था और मरियम को दिलासा दिया और मरियम मगदलेना के ऑसुओं को आनन्द में बदल दिया जब वे उनसे खाली कब्र पर मिलें । यीशु ने रोनेवालो को यह कहकर आशीष दी कि वे शान्ति प्राप्त करेंगे । संत पौलुस रोमियों को इसी समान मनोवृति रखने की सलाह देते है जब वे कहते है, “15) आनन्द मनाने वालों के साथ आनन्द मनायें, रोने वालों के साथ रोयें।“ (रोमियों 12ः15)

सुसमाचार दो अवसरों को दर्ज करते है जब येसु ने विलाप कियाः पहला अपने मित्र लाजरूस की मृत्यु पर (योहन 11ः35), दूसरा उस अवसर पर जब उन्होंने यंरूसालेम शहर के भविष्य के विनाश को देखा (लूकस 19ः41)।ष्

येसु येरूसालेम शहर के लिए उनके प्रेम के कारण रोते है । येरूसालेम दो प्रतिद्वंदी वंशजों बेनयामीन (साऊल का वंशज) और यूदा (दाऊद का वंशज) के बीच स्थित है। इसे शांति का शहर माना जाता था । लेकिन येसु को अस्वीकार करके वे पश्चाताप करने और उसे परमेश्वर के पुत्र के रूप में पहचानने में विफल रहे । उन्होंने शांति का एक मौका गंवा दिया और शहर के लिए तबाही लेकर आये ।

येसु ने लोगोें के अविश्वास पर विलाप किया । वे मसीह के प्रति उदासीन थे क्योंकि जीवन में सब चीजें ठीक चल रही थी । उन्होंने येसु को सार्वजनिक व्यवस्था या उनके आरामदायक जीवन के लिए एक खतरे के रूप में देखा । ईश्वर यह अपेक्षा करता है कि हम पूरे मन से उसकी पवित्र इच्छा के प्रति समर्पण करें

आइए हम लोगों के प्रति सहानुभूति रखें और ईश्वर के प्रति उदासीन होने से बचें ।



REFLECTION



Tears are part of our own lives. Tears form in our eyes when something gets into our eyes or when something gets into our hearts. Tears are part of the Gospel accounts as well. In four Gospels, there are 26 references to weeping: father weeping for ailing daughter, widow shedding tears for her only son, sinful woman weeping at the foot of Jesus, Peter weeping bitterly for denying Jesus and so on.

Jesus did not weep at the scourging, while carrying the cross or hanging on the cross, but he expressed his sorrow at times because he had an empathy for the people he loved and cared for. Empathy is not just a feeling for others but putting oneself in the place of another. St. Paul admonishes Romans to have the same attitude when he says, “Rejoice with those who are joyful; and weep with those who weep” (Rom 12:15)

The Gospels record two occasions when Jesus wept: the first at the death of his friend Lazarus (Jn.11:35), second on the occasion when he saw the future destruction of the City of Jerusalem (Lk.19:41).

Jesus weeps because of His love for the city of Jerusalem. Jerusalem is situated between two rivalry tribes Benjamin (tribe of Saul) and Judah (tribe of David). It was supposed to be the city of peace. But by rejecting Jesus they failed to repent and recognize him as son of God. They missed an opportunity for peace and brought destruction to the city.

Jesus lamented over the unbelief of the people. They were indifferent to Christ because things in life seemed to be going well. They saw Jesus as a threat to public order or their comfort zones. God expects that we surrender to His holy will with whole heart.

Let us be empathetic towards people and avoid being indifferent to God


✍ -Br. Biniush topno


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बुधवार, 17 नवंबर, 2021

 

बुधवार, 17 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: मक्काबियों का दूसरा ग्रन्थ 7:1,20-31

1) किसी अवसर पर सात भाई अपनी माता के साथ गिरफ्तार हो गये थे। राजा उन्हें कोड़े लगवा कर और यंत्रणा दिला कर बाध्य करना चाहता था कि वे सूअर का माँस खायें, जो संहिता में मना किया गया है।

20) माता विशेष रूप से प्रंशसनीय तथा प्रातः स्मरणीय है। एक ही दिन में अपने सात पुत्रों को अपनी आँखों के सामने मरते देखकर भी वह विचलित नहीं हुई; क्योंकि वह प्रभु पर भरोसा रखती थी।

21) वह अपने पूर्वजों की भाषा में हर एक का साहस बँधाती रही। उच्च संकल्प से प्रेरित हो कर तथा अपने नारी-हृदय में पुरुष का तेज भर कर, वह अपने पुत्रों से यह कहती थी,

22) ’’मुझे नहीं मालूम कि तुम कैसे मेरे गर्भ में आये। मैंने न तो तुम्हें प्राण तथा जीवन प्रदान किया और न तुम्हारे अंगों की रचना की।

23) संसार का सृष्टिकर्ता मानव जाति की रचना करता और सब कुछ उत्पन्न करता है। वह दया कर तुम्हें अवश्य ही फिर प्राण तथा जीवन प्रदान करेगा; क्योंकि तुम उसकी विधियों की रक्षा के लिए अपने जीवन का तिरस्कार कर रहे हो।’’

24) अंतियोख को लगा कि वह उसका तिरस्कार और निंदा कर रही है। अब केवल उसका सब से छोटा पुत्र जीवित रहा। अंतियोख ने उसे समझाया ही नहीं, बल्कि शपथ खा कर आश्वासन भी दिया कि ’’यदि तुम अपने पूर्वजों के रीति-रिवाजों का परित्याग करोगे, तो मैं तुम को धन और सुख प्रदान करूँगा, तुम्हें अपना मित्र बना कर उच्च पद पर नियुक्त करूँगा''।

25) जब नवयुवक ने उसकी बातों पर ध्यान ही नहीं दिया तो अंतियोख ने माता को बुला भेजा और उस से अनुरोध किया कि वह नवयुवक को समझाये, जिससे वह जीवित रह सके।

26) राजा के कई बार अनुरोध करने के बाद वह अपने पुत्र को समझाने को राजी हो गयी।

27) वह उस पर झुक गयी और क्रूर तानाशाह की अवज्ञा करते हुए उसके पूर्वजों की भाषा में उस से यह कहा, ’’बेटा! मुझ पर दया करो। मैंने तुम्हें नौ महीनों तक गर्भ में धारण किया और तीन वर्षों तक दूध पिलाया। मैंने तुम्हें खिलाया और तुम्हारी इस उमर तक तुम्हारा पालन-पोषण किया।

28) बेटा! मैं तुम से अनुरोध करती हूँ। तुम आकाश तथा पृथ्वी की ओर देखो- उन में जो कुछ है, उसका निरीक्षण करो और यह समझ लो कि ईश्वर ने शून्य से उसकी सृष्टि की है। मनुष्य भी इस प्रकार उत्पन्न हुआ है।

29) इस जल्लाद से मत डरो। अपने भाइयों के योग्य बनो और मृत्यु स्वीकार करो, जिससे मैं दया के दिन तुम्हें अपने भाइयों के साथ फिर पा सकूँ।’’

30) जब वह ऐसा कह चुकी थी, तो नवयुवक तुरंत बोल उठा ’’तुम देर क्यों करते हो? मैं राजा का आदेश नहीं मानूँगा। मैं अपने पुरखों को मूसा द्वारा प्रदत्त संहिता के नियमों का पालन करता हूँ।

31) और तुम राजा, अंतियोख! जिसने इब्रानियों पर हर प्रकार का अत्याचार किया, तुम ईश्वर के हाथ से नहीं बच सकोगे।

सुसमाचार : सन्त लूकस 19:11-28

11) जब लोग ये बातें सुन रहे थे, तो ईसा ने एक दृष्टान्त भी सुनाया; क्योंकि ईसा को येरुसालेम के निकट पा कर वे यह समझ रहे थे कि ईश्वर का राज्य तुरन्त प्रकट होने वाला है।

12) उन्होंने कहा, ‘‘एक कुलीन मनुष्य राजपद प्राप्त कर लौटने के विचार से दूर देश चला गया।

13) उसने अपने दस सेवकों को बुलाया और उन्हें एक-एक अशर्फ़ी दे कर कहा, ‘मेरे लौटने तक व्यापार करो’।

14) ‘‘उसके नगर-निवासी उस से बैर करते थे और उन्होंने उसके पीछे एक प्रतिनिधि-मण्डल द्वारा कहला भेजा कि हम नहीं चाहते कि वह मनुष्य हम पर राज्य करे।

15) ‘‘वह राजपद पा कर लौटा और उसने जिन सेवकों को धन दिया था, उन्हें बुला भेजा और यह जानना चाहा कि प्रत्येक ने व्यापार से कितना कमाया है।

16) पहले ने आ कर कहा, ‘स्वामी! आपकी एक अशर्फ़ी ने दस अशर्फि़य़ाँ कमायी हैं’।

17) स्वामी ने उस से कहा, ‘शाबाश, भले सेवक! तुम छोटी-से-छोटी बातों में ईमानदार निकले, इसलिए तुम्हें दस नगरों पर अधिकार मिलेगा’।

18) दूसरे ने आ कर कहा, ‘स्वामी! आपकी एक अशर्फ़ी ने पाँच अशर्फि़याँ कमायी हैं’

19) और स्वामी ने उस से भी कहा, ‘तुम्हें पाँच नगरों पर अधिकार मिलेगा’।

20) अब तीसरे ने आ कर कहा, ’स्वामी! देखिए, यह है आपकी अशर्फ़ी। मैंने इसे अँगोछे में बाँध रखा था।

21) मैं आप से डरता था, क्योंकि आप कठोर हैं। आपने जो जमा नहीं किया, उसे आप निकालते हैं और जो नहीं बोया, उसे लुनते हैं।’

22) स्वामी ने उस से कहा, ‘दुष्ट सेवक! मैं तेरे ही शब्दों से तेरा न्याय करूँगा। तू जानता था कि मैं कठोर हूँ। मैंने जो जमा नहीं किया, मैं उसे निकालता हूँ और जो नहीं बोया, उसे लुनता हूँ।

23) तो, तूने मेरा धन महाजन के यहाँ क्यों नहीं रख दिया? तब मैं लौट कर उसे सूद के साथ वसूल कर लेता।’

24) और स्वामी ने वहाँ उपस्थित लोगों से कहा, ‘इस से वह अशर्फ़ी ले लो और जिसके पास दस अशर्फि़याँ हैं, उसी को दे दो’।

25) उन्होंने उस से कहा, ‘स्वामी! उसके पास तो दस अशर्फि़याँ हैं’।

26) "मैं तुम से कहता हूँ-जिसके पास कुछ है, उसी को और दिया जायेगा; लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उस से वह भी ले लिया जायेगा, जो उसके पास है।

27) और मेरे बैरियों को, जो यह नहीं चाहते थे कि मैं उन पर राज्य करूँ, इधर ला कर मेरे सामने मार डालो’।

28) इतना कह कर ईसा येरुसालेम की ओर आगे बढ़े।


मनन-चिंतन



प्रतिभा व्यक्ति की क्षमता के अनुसार दी जाती हैः प्रबंधकीय पद ईश्वर के मापदंडों को पूरा करने के बारे में है न कि दूसरों से अपनी तुलना करने के बारे में। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम क्या प्राप्त करते हैं बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि हम उसका उपयोग कैसे करते हैं। बोने वाले के दृष्टांत में अच्छी मिट्टी द्वारा साठ और तीस के कम उत्पादन के लिए कोई आपत्ति नहीं उठाई जाती है। (मत्ती 13ः8)। व्यक्ति जितना अधिक प्रतिभाशाली होता है, उसे उतनी ही अधिक जिम्मेदारियां दी जाती हैं। ‘‘जिसे बहुत दिया गया है, उस से बहुत माँगा जायेगा’’(लूकस 12ः48)।

प्रतिभाओं में वृद्धि की उम्मीदः एक बार प्रतिभाओं को दिए जाने के बाद प्राप्तकर्ता से प्रतिभाओं को बढ़ाने के लिए परिकलित जोखिम के साथ कड़ी मेहनत करने की अपेक्षा की जाती है। प्रतिभा जन्मजात होती है या अर्जित की जाती है। अकादमिक उत्कृष्टता, कला और संस्कृति, खेल और खेल आदि में जन्मजात प्रतिभाएँ होती हैं। प्रतिभाएँ भी वे गुण हैं जो ईश्वर हमें अलौकिक स्तर पर देते हैं, उदाहरण के लिए, प्रार्थना करने की कृपा, विभिन्न आवश्यकताओं के लिए हस्तक्षेप करना, लोगों को सलाह देना , ईश्वर के प्यार के लिए दान करना और इसी प्रकार से अन्य। प्रतिभाओं का दृष्टांत हमें चुनौती देता है कि हम अच्छे फल पैदा करने के लिए नियमित रूप से और दृढ़ता से हमारे ईश्वर द्वारा दी गई प्रतिभा, गुण और अनुग्रह को विकसित करें। एक बगीचे की तरह जिसे फूल पैदा करने के लिए नियमित रूप से देखभाल की जाती है, हमारी प्रतिभा को व्यक्तिगत या गुप्त रूप से नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें साझा करना चाहिए और जरूरतमंद भाइयों और बहनों के लाभ के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।

निष्क्रियता के कारण नुकसान और सजाः पुरानी कहावत है ‘‘यदि आप इसका उपयोग नहीं करते हैं, तो आप इसे खो देते हैं’’। जो कुछ उसे डर के मारे दिया गया था, उससे उसने कुछ नहीं किया। उपहारों और प्रतिभाओं के हमारे उपयोग में हम असफल हो सकते हैं और गलतियाँ कर सकते हैं, लेकिन दृष्टांत बताता है कि भयभीत निष्क्रियता से विफलता बेहतर है। यह इस बात की भी वकालत करता है कि भय कभी भी प्रभु के साथ हमारे संबंधों को नियंत्रित नहीं करना चाहिए। रिश्ते को प्यार से चलाना चाहिए। 1 योहन 4ः18 कहता है, ‘‘प्रेम में भय नहीं होता। पूर्ण प्रेम भय दूर कर देता है’’।

दृष्टान्त में व्यक्ति को जो कुछ उसे सौंपा गया है उसका कोई पहल या लाभ नहीं लेने के लिए दंडित किया जाता है। प्रकाश्ना 3ः16 में हम पढ़ते हैं, ‘‘लेकिन न तो तुम गर्म हो और न ठंडे, बल्कि कुनकुने हो, इसलिए मैं तुम को अपने मुख से उगल दूँगा’’।

आइए हम ईश्वर प्रदत्त प्रतिभाओं और अनुग्रहों के लिए आभारी हों और उन्हें दूसरों के लाभ के लिए उपयोग करने के लिए उनका गुणा करने का संकल्प लें, ऐसा न हो कि हम उन्हें खो न दें या हमारी निष्क्रियता के लिए दंडित न हों।



REFLECTION

Talents are given according to the capacity of the person: Stewardship is about meeting God’s standards and not about comparing ourselves to others. What is important is not what we receive but how we make use of it. In the parable of the sower no objection is raised for the under production of sixty and thirty by the good soil. (Mat. 13:8). The more talented the person the more responsibilities are given. “More will be asked of a man to whom more has been entrusted” (Lk 12:48).

Expectation to increase the talents: Once the talents are given the receiver is expected to work hard with calculated risk to increase the talents. Talents are inborn or acquired. There are inborn talents in academic excellence, art and culture, sports and games etc.. Talents are also the graces which God gives to us on the supernatural level, for example, the grace to pray, to intercede for various needs, to counsel people, to do charity for the love of God and so on. The parable of the talents challenges us to cultivate regularly and perseveringly our God given talents, qualities and graces to produce good fruits. Like a garden that is taken care of regularly in order to produce flowers our talents are not to be kept personally or secretly, but they must be shared and used for the benefit of brothers and sisters in need.

Loss and Punishment for inactivity: The old saying goes “If you don’t use it, you lose it”. He did nothing with what was given to him out of fear. In our use of gifts and talents we may fail and make mistakes, but the parable suggests that failure is preferable to fearful inactivity. It also advocates that fear should never govern our relationship with the Lord. The relationship should be governed by love. 1Jn. 4:18 says, “There is no fear in love but perfect love casts out fear”.

The person in the parable is punished for not taking any initiative or advantage of what has been entrusted to him. In Rev. 3:16 we read “So because you are lukewarm, and neither cold nor hot, I am about to spit you out of my mouth”.

Let us thankful for God-given talents and graces and vow to multiply them using them for benefit of others, lest we may not lose them or be punished for our inactivity.



मनन-चिंतन - 2


आज के सुसमाचार में हम अशर्फ़ियों का दृष्टांत पाते हैं। प्रथम सेवक ने उसे प्राप्त एक अशर्फ़ी ले कर व्यापार किया और दस अशर्फ़ियाँ कमा लीं और दूसरे ने व्यापार करके पाँच अशर्फ़ियाँ कमा ली। दोनों की सराहना करते हुए उनको उनके स्वामी ने पुरस्कृत किया। लेकिन तीसरे सेवक ने न केवल अपनी अशर्फ़ियों को छिपा कर रखा, बल्कि उसने यह कहते हुए स्वामी को दोषी ठहराया, “आप कठोर हैं। आपने जो जमा नहीं किया, उसे आप निकालते हैं और जो नहीं बोया, उसे लुनते हैं”। इस नौकर को फल उत्पन्न न करने के कारण स्वामी द्वारा दंडित किया गया। येसु के कई दृष्टांतों में हम पा सकते हैं कि वे हमें उत्पादक और फलदायी बनने की माँग करते हैं। उत्पादकता और फलदायकता अच्छे जीवन और विकास के संकेत हैं। प्रभु हममें अनुग्रह और सद्भाव के बीज बोते हैं। यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम उन बीजों को फलने-फूलने और उत्पादक बनने के लिए सक्षम करें।



REFLECTION



In today’s Gospel we find the parable of the talents. The first servant traded with the talent he received and made ten talents and the second made five talents by trading. Both of them were appreciated and rewarded by the master. But the third servant not only did not multiply the talents, but he also blamed the master saying, “you are a harsh man; you take what you did not deposit, and reap what you did not sow”. This servant was punished by the master for not being productive. In many of the parables of Jesus we can find Jesus demanding us to be productive and fruitful. Productivity and fruitfulness are signs of good life and growth. God sows seeds of graciousness and goodness in us. It is for us to enable those seeds to sprout, flourish and become productive.

✍ -Br. Biniush topno


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सोमवार, 15 नवंबर, 2021

 

सोमवार, 15 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: मक्काबियों का पहला ग्रन्थ 1:10-15,41-43,54-57,62-63



10) उन में राजा अंतियोख का पुत्र अंतियोख एपीफानेस बड़ा दुष्ट था वह रोम में बंधक के रूप में रहा चुका था। वह यूनानी साम्राज्य के एक सौ सैंतीसवें वर्ष राजा बना।

11) उन दिनों इस्राएल में ऐसे लोग थे, जो संहिता ही परवाह नहीं करते थे और यह कहते हुए बहुतों को बहकाते थे, ’’आओं! हम अपने चारों ओर के राष्ट्रों के साथ संधि करें, क्योंकि जब से हम उन से अलग हुए, हमें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा’’।

12) यह बात उन्हें अच्छी लगी।

13) उन में से कई लोग तुरंत राजा से मिलने गये और राजा ने उन्हें गैर-यहूदी जीवन-चर्या के अनुसार चलने की अनुमति दी।

14) इसलिए उन्होंने गैर-यहूदियों के रिवाज के अनुसार येरुसालेम में एक व्यायामशाला बनवायी।

15) उन्होंने अपने को बेख़तना कर लिया और पवत्रि विधान को त्याग दिया। वे गैर-यहूदियों से मेल-जोल रखने लगे और पाप के दास बन गये।

41) राजा ने अपने समस्त राज्य के लिए यह लिखित आदेश निकाला कि सब लोग एक ही राष्ट्र बन जायें

42) और सब अपने विशेष विराजों का परित्याग कर दे। सब लोगों ने राजा के आदेश का पालन किया।

43) इस्राएलियों में भी बहुतों ने, देवमूर्तियों को बलि चढ़ा कर और विश्राम दिवस को अपवत्रि कर, राजा का धर्म सहर्ष स्वीकार कर लिया।

54) एक सौ पैतालीसवें वर्ष के किसलेव महीने के पन्द्रहवें दिन राजा ने होम-बलि की वेदी पर उजाड़ का वीभत्स दृश्य (अर्थात् देव-मूर्ति को) स्थापित किया। यूदा के नगरों में चारों ओर देवमूर्तियों की वेदियाँ बनायी गयीं

55) और लोग के घरों के द्वार के सामने तथा चैंको में धूप चढाने लगे।

56) जब उन्हें सहिता की पोथियाँ मिलती थीं, तो वे उन्हें फाड़ कर आग में डाल देते थे।

57) जिसके यहाँ विधान का ग्रन्थ पाया जाता अथवा जो संहिता का पालन करता, उसे राजा के आदेशानुसार प्राणदण्ड दिया जाता था।

62) फिर भी बहुत-से इस्राएली दृढ़ बने रहे और उन्होंने दृढ़ संकल्प किया कि वे अशुद्ध भोजन नहीं खायेगे।

63) वे मृत्यु को स्वीकार करते थे, जिससे वे अवैध भोजन खा कर दूशित न हो जायें और पवत्रि विधान भंग न करें। इस प्रकार बहुत-से इस्राएली मर गये।



सुसमाचार : सन्त लूकस 18:35-43



35) जब ईसा येरीख़ो के निकट आ रहे थे, तो एक अन्धा सड़क के किनारे बैठा भीख माँग रहा था।

36) उसने भीड़ को गुज़रते सुन कर पूछा कि क्या हो रहा है।

37) लोगों ने उसे बताया कि ईसा नाज़री इधर से आ रहे हैं।

38) इस पर वह यह कहते हुए पुकार उठा, ‘‘ईसा! दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए’’।

39) आगे चलने वाले उसे चुप करने के लिए डाँटते थे, किन्तु वह और भी ज़ोर से पुकारता रहा, ‘‘दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए’’।

40) ईसा ने रुक कर उसे पास ले आने को कहा। जब वह पास आया, तो ईसा ने उस से पूछा,

41) ‘‘क्या चाहते हो? मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘प्रभु! मैं फिर देख सकूँ’’।

42) ईसा ने उस से कहा, ‘‘जाओ, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है’’।

43) उसी क्षण उसकी दृष्टि लौट आयी और वह ईश्वर की स्तुति करते हुए ईसा के पीछे हो लिया। सारी जनता ने यह देख कर ईश्वर की स्तुति की।



मनन-चिंतन



उस अंधे व्यक्ति ने आजमानी एक कोशिश की । हालाकि उसे डाटा गया और वह निराश भी हुआ अपितु उसने हार नहीं मानी । बड़ी भीड येसु को चारों तरफ से घेरे हुई थी, उस अंधे व्यक्ति का येसु के पास जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था । आस-पास के लोगो के शोर के साथ उसकी वाणी भी येसु के पास नही पहॅंुच सकती थी । इस तथ्य को महसूस करते हुए उसने अपनी पूरी शक्ति से जोर से चिल्लाने का निर्णय किया । येसु ने उसकी वाणी सुनी और उसे अपने पास आने का आदेश दिया । हमने अपने जीवन में कितनी बार येसु के करीब आने का प्रयत्न किया है ? अथवा कितनी गंभीरता से कोशिश की है ?येसु ने उसे अपना निवेदन बोलने के लिए कहा। येसु के साथ उपस्थित सभी लोग जानते थे कि वह व्यक्ति दृष्टिदान चाहता है । अर्थात् अपनी दृष्टि को पुनः वापस पाना चाहता है ।

लेकिन येसु ने उससे यह सुनिश्चित करने के लिए पूछा की जीवन में उसकी प्राथमिकता क्या है ?कभी -कभी हम अपने जीवन में प्राथमिकताएॅं निर्धारित करते समय आवश्यक चीजों को नजर अंदाज कर देते है । इसके फलस्वरूप प्रभु के सामने आने पर हमारा ध्यान विचलित हो जाता है । हम सुसमाचार में इस प्रकार के चरित्र का सटीक उदाहरण पेत्रुस में पाते है । येसु के रूपान्तरण के समय, पेत्रुस महिमा का आनंद लेने के बजाय मूसा, एलिय्याह और येसु के लिए तम्बू बनाने की बात करता है । उस अंधे वयक्ति ने येसु का अनुसरण किया और ईश्वर की महिमा की । उस क्षण जब उस व्यक्ति ने महसूस किया की वो चंगा हो गया है तो उसके जीवन का एकमात्र उद्धेश्य था येसु का अनुसरण करना और प्रभु की महिमा करना । उसने येसु से वो वरदान प्राप्त किया जो उसके जीवन की सर्वाधिक बहुमूल्य वस्तु थी । वह अपना आभार येसु का अनुसरण करके व्यक्त करता है । हम ईश्वर से प्राप्त सभी आशीषो और कृपादानों के लिए कितनी बार कृतज्ञता और आभार प्रकट करते है ?



REFLECTION


The blind man took a chance. Though he was discouraged and rebuked he never gave up. Big crowd moving around Jesus it was very difficult for the blind man to get closer to Jesus. With the noise of the people around, it was also impossible for him to be heard by Jesus. Realising this fact he took a chance of shouting at the top of his voice. Behold he was rewarded by Jesus bringing him closer. How often have we taken the chance of coming closer to Jesus or how much effort have we made for the same.

Jesus made him to speak out his request. Everyone gathered there including Jesus knew the need of the man that he wanted his vision back. But Jesus asks him the question to make sure the priority he has in life, Sometimes we leave out the essentials when we set priorities in our life. We can be distracted as we come before the Lord. In the gospel we see such a character in Peter. At the time of transfiguration instead of enjoying the moment of glory Peter was speaking about making a tent for Moses, Elijah and Jesus.

He followed Jesus and glorified God. Once the man realized that he was healed his sole intention was to follow Jesus and glorifying God. He received something from Jesus, which was the most wanted thing in his life. He expresses his gratitude by following Jesus. How often have we been thankful to God for the blessings we receive from Him?



मनन-चिंतन - 2


प्रभु येसु वहाँ से गुजर रहे थे। सड़क के किनारे बैठे अंधे भिखारी ने यह महसूस किया कि येसु वहाँ से गुजर रहे हैं। वह येसु से मिलने के लिए उत्सुक था। वह चुप रहने को तैयार नहीं था, हालांकि लोगों ने उसे चुप रहने को कहा। प्रभु ने उसकी पुकार सुनी और उसे अपने पास बुला कर चंगा किया। येसु के साथ हुई मुलाकात से उसका जीवन बदल गया। येसु आज भी जीवित हैं और हर दिन हमारे पास से गुजर रहे हैं। शायद हम उनसे मिलने के लिए उस अंधे भिखारी के समान उत्सुक नहीं हैं। हममें से कुछ लोग जीवन में आशा खो चुके होंगे और इसलिए येसु भी हमारी आशा को नहीं जगा पा रहे हैं। एक बात पक्की है, समय निकल जाएगा। वे जो हमारे जीवन में हस्तक्षेप कर सकते हैं जल्द ही चले जायेंगे और फिर कोई भी हमारी मदद करने में सक्षम नहीं होगा। हमारे लिए आवंटित समय भी समाप्त हो जायेगा। मैं क्या तय करूं?



REFLECTION


Jesus was passing by. The blind beggar sitting by the roadside realising that Jesus was passing by cried out to him for healing. He was desperate. He was not willing to keep quiet although people told him to keep quiet. Jesus heard his cry and called for him and healed him. His life changed with that encounter with Jesus. Jesus is living and is passing by us every day. We have a tendency to postpone our encounter with him. Some of us are not very keen on meeting him. Some of us may have lost hope in life and so even Jesus is not able to awaken our hope. One thing is sure, the time will run out. He who can intervene in our life will have gone soon and then no one will be able to help. What do I decide?


✍ -Br. Biniush topno


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सोमवार, 15 नवंबर, 2021

 

सोमवार, 15 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ: मक्काबियों का पहला ग्रन्थ 1:10-15,41-43,54-57,62-63



10) उन में राजा अंतियोख का पुत्र अंतियोख एपीफानेस बड़ा दुष्ट था वह रोम में बंधक के रूप में रहा चुका था। वह यूनानी साम्राज्य के एक सौ सैंतीसवें वर्ष राजा बना।

11) उन दिनों इस्राएल में ऐसे लोग थे, जो संहिता ही परवाह नहीं करते थे और यह कहते हुए बहुतों को बहकाते थे, ’’आओं! हम अपने चारों ओर के राष्ट्रों के साथ संधि करें, क्योंकि जब से हम उन से अलग हुए, हमें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा’’।

12) यह बात उन्हें अच्छी लगी।

13) उन में से कई लोग तुरंत राजा से मिलने गये और राजा ने उन्हें गैर-यहूदी जीवन-चर्या के अनुसार चलने की अनुमति दी।

14) इसलिए उन्होंने गैर-यहूदियों के रिवाज के अनुसार येरुसालेम में एक व्यायामशाला बनवायी।

15) उन्होंने अपने को बेख़तना कर लिया और पवत्रि विधान को त्याग दिया। वे गैर-यहूदियों से मेल-जोल रखने लगे और पाप के दास बन गये।

41) राजा ने अपने समस्त राज्य के लिए यह लिखित आदेश निकाला कि सब लोग एक ही राष्ट्र बन जायें

42) और सब अपने विशेष विराजों का परित्याग कर दे। सब लोगों ने राजा के आदेश का पालन किया।

43) इस्राएलियों में भी बहुतों ने, देवमूर्तियों को बलि चढ़ा कर और विश्राम दिवस को अपवत्रि कर, राजा का धर्म सहर्ष स्वीकार कर लिया।

54) एक सौ पैतालीसवें वर्ष के किसलेव महीने के पन्द्रहवें दिन राजा ने होम-बलि की वेदी पर उजाड़ का वीभत्स दृश्य (अर्थात् देव-मूर्ति को) स्थापित किया। यूदा के नगरों में चारों ओर देवमूर्तियों की वेदियाँ बनायी गयीं

55) और लोग के घरों के द्वार के सामने तथा चैंको में धूप चढाने लगे।

56) जब उन्हें सहिता की पोथियाँ मिलती थीं, तो वे उन्हें फाड़ कर आग में डाल देते थे।

57) जिसके यहाँ विधान का ग्रन्थ पाया जाता अथवा जो संहिता का पालन करता, उसे राजा के आदेशानुसार प्राणदण्ड दिया जाता था।

62) फिर भी बहुत-से इस्राएली दृढ़ बने रहे और उन्होंने दृढ़ संकल्प किया कि वे अशुद्ध भोजन नहीं खायेगे।

63) वे मृत्यु को स्वीकार करते थे, जिससे वे अवैध भोजन खा कर दूशित न हो जायें और पवत्रि विधान भंग न करें। इस प्रकार बहुत-से इस्राएली मर गये।



सुसमाचार : सन्त लूकस 18:35-43



35) जब ईसा येरीख़ो के निकट आ रहे थे, तो एक अन्धा सड़क के किनारे बैठा भीख माँग रहा था।

36) उसने भीड़ को गुज़रते सुन कर पूछा कि क्या हो रहा है।

37) लोगों ने उसे बताया कि ईसा नाज़री इधर से आ रहे हैं।

38) इस पर वह यह कहते हुए पुकार उठा, ‘‘ईसा! दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए’’।

39) आगे चलने वाले उसे चुप करने के लिए डाँटते थे, किन्तु वह और भी ज़ोर से पुकारता रहा, ‘‘दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए’’।

40) ईसा ने रुक कर उसे पास ले आने को कहा। जब वह पास आया, तो ईसा ने उस से पूछा,

41) ‘‘क्या चाहते हो? मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘प्रभु! मैं फिर देख सकूँ’’।

42) ईसा ने उस से कहा, ‘‘जाओ, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है’’।

43) उसी क्षण उसकी दृष्टि लौट आयी और वह ईश्वर की स्तुति करते हुए ईसा के पीछे हो लिया। सारी जनता ने यह देख कर ईश्वर की स्तुति की।



मनन-चिंतन



उस अंधे व्यक्ति ने आजमानी एक कोशिश की । हालाकि उसे डाटा गया और वह निराश भी हुआ अपितु उसने हार नहीं मानी । बड़ी भीड येसु को चारों तरफ से घेरे हुई थी, उस अंधे व्यक्ति का येसु के पास जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था । आस-पास के लोगो के शोर के साथ उसकी वाणी भी येसु के पास नही पहॅंुच सकती थी । इस तथ्य को महसूस करते हुए उसने अपनी पूरी शक्ति से जोर से चिल्लाने का निर्णय किया । येसु ने उसकी वाणी सुनी और उसे अपने पास आने का आदेश दिया । हमने अपने जीवन में कितनी बार येसु के करीब आने का प्रयत्न किया है ? अथवा कितनी गंभीरता से कोशिश की है ?येसु ने उसे अपना निवेदन बोलने के लिए कहा। येसु के साथ उपस्थित सभी लोग जानते थे कि वह व्यक्ति दृष्टिदान चाहता है । अर्थात् अपनी दृष्टि को पुनः वापस पाना चाहता है ।

लेकिन येसु ने उससे यह सुनिश्चित करने के लिए पूछा की जीवन में उसकी प्राथमिकता क्या है ?कभी -कभी हम अपने जीवन में प्राथमिकताएॅं निर्धारित करते समय आवश्यक चीजों को नजर अंदाज कर देते है । इसके फलस्वरूप प्रभु के सामने आने पर हमारा ध्यान विचलित हो जाता है । हम सुसमाचार में इस प्रकार के चरित्र का सटीक उदाहरण पेत्रुस में पाते है । येसु के रूपान्तरण के समय, पेत्रुस महिमा का आनंद लेने के बजाय मूसा, एलिय्याह और येसु के लिए तम्बू बनाने की बात करता है । उस अंधे वयक्ति ने येसु का अनुसरण किया और ईश्वर की महिमा की । उस क्षण जब उस व्यक्ति ने महसूस किया की वो चंगा हो गया है तो उसके जीवन का एकमात्र उद्धेश्य था येसु का अनुसरण करना और प्रभु की महिमा करना । उसने येसु से वो वरदान प्राप्त किया जो उसके जीवन की सर्वाधिक बहुमूल्य वस्तु थी । वह अपना आभार येसु का अनुसरण करके व्यक्त करता है । हम ईश्वर से प्राप्त सभी आशीषो और कृपादानों के लिए कितनी बार कृतज्ञता और आभार प्रकट करते है ?



REFLECTION



The blind man took a chance. Though he was discouraged and rebuked he never gave up. Big crowd moving around Jesus it was very difficult for the blind man to get closer to Jesus. With the noise of the people around, it was also impossible for him to be heard by Jesus. Realising this fact he took a chance of shouting at the top of his voice. Behold he was rewarded by Jesus bringing him closer. How often have we taken the chance of coming closer to Jesus or how much effort have we made for the same.

Jesus made him to speak out his request. Everyone gathered there including Jesus knew the need of the man that he wanted his vision back. But Jesus asks him the question to make sure the priority he has in life, Sometimes we leave out the essentials when we set priorities in our life. We can be distracted as we come before the Lord. In the gospel we see such a character in Peter. At the time of transfiguration instead of enjoying the moment of glory Peter was speaking about making a tent for Moses, Elijah and Jesus.

He followed Jesus and glorified God. Once the man realized that he was healed his sole intention was to follow Jesus and glorifying God. He received something from Jesus, which was the most wanted thing in his life. He expresses his gratitude by following Jesus. How often have we been thankful to God for the blessings we receive from Him?



मनन-चिंतन - 2



प्रभु येसु वहाँ से गुजर रहे थे। सड़क के किनारे बैठे अंधे भिखारी ने यह महसूस किया कि येसु वहाँ से गुजर रहे हैं। वह येसु से मिलने के लिए उत्सुक था। वह चुप रहने को तैयार नहीं था, हालांकि लोगों ने उसे चुप रहने को कहा। प्रभु ने उसकी पुकार सुनी और उसे अपने पास बुला कर चंगा किया। येसु के साथ हुई मुलाकात से उसका जीवन बदल गया। येसु आज भी जीवित हैं और हर दिन हमारे पास से गुजर रहे हैं। शायद हम उनसे मिलने के लिए उस अंधे भिखारी के समान उत्सुक नहीं हैं। हममें से कुछ लोग जीवन में आशा खो चुके होंगे और इसलिए येसु भी हमारी आशा को नहीं जगा पा रहे हैं। एक बात पक्की है, समय निकल जाएगा। वे जो हमारे जीवन में हस्तक्षेप कर सकते हैं जल्द ही चले जायेंगे और फिर कोई भी हमारी मदद करने में सक्षम नहीं होगा। हमारे लिए आवंटित समय भी समाप्त हो जायेगा। मैं क्या तय करूं?



REFLECTION


Jesus was passing by. The blind beggar sitting by the roadside realising that Jesus was passing by cried out to him for healing. He was desperate. He was not willing to keep quiet although people told him to keep quiet. Jesus heard his cry and called for him and healed him. His life changed with that encounter with Jesus. Jesus is living and is passing by us every day. We have a tendency to postpone our encounter with him. Some of us are not very keen on meeting him. Some of us may have lost hope in life and so even Jesus is not able to awaken our hope. One thing is sure, the time will run out. He who can intervene in our life will have gone soon and then no one will be able to help. What do I decide?


✍ -Br Biniush Topno


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इतवार, 14 नवंबर, 2021

 

इतवार, 14 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य इतवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : दानिएल 12:1-3


1) "उस समय स्वर्गदूतों का प्रधान और तुम्हारी प्रजा की रक्षा करने वाला मिकाएल उठ खड़ा होगा। जैसा कि राष्ट्रों की उत्पत्ति से अब तक कभी नहीं हुआ है। किन्तु उस समय तुम्हारी प्रजा बच जायेगी- वे सब, जिनका नाम पुस्तक में लिखा रहेगा।

2) जो लोग पृथ्वी की मिट्टी में सोये हुए थे, वे बड़ी संख्या में जाग जायेंगे, कुछ अनन्त जीवन के लिए और कुछ अनन्त काल तक तिरस्कृत और।कलंकित होने के लिए। धर्मी आकाश की ज्योति की तरह प्रकाशमान होंगे

3) और जिन्होंने बहुतों को धार्मिकता की शिक्षा दी है, वे अनन्त काल तक तारों की तरह चमकते रहेंगे।


दूसरा पाठ : इब्रानियो 10:11-14,18



11) प्रत्येक दूसरा पुरोहित खड़ा हो कर प्रतिदिन धर्म-अनुष्ठान करता है और बार-बार एक ही प्रकार के बलिदान चढ़ाया करता है, जो पाप हरने में असमर्थ होते हैं।

12) किन्तु पापों के लिए एक ही बलिदान चढ़ाने के बाद, वह सदा के लिए ईश्वर के दाहिने विराजमान हो गये हैं,

13) जहाँ वह उस समय की राह देखते हैं, जब उनके शत्रुओं को उनका पावदान बना दिया जायेगा;

14) क्योंकि वह जिन लोगों को पवित्र करते हैं, उन्होंने उन को एक ही बलिदान द्वारा सदा के लिए पूर्णता तक पहुँचा दिया है।

18) जब पाप क्षमा कर दिये गये हैं, तो फिर आप के लिए बलिदान की आवश्यकता नहीं रही।



सुसमाचार : मारकुस 13:24-32



24) "उन दिनों के संकट के बाद सूर्य अन्धकारमय हो जायेगा, चन्द्रमा प्रकाश नहीं देगा,

25) तारे आकाश से गिर जायेंगे और आकाश की शक्तियाँ विचलित हो जायेंगी।

26) तब लोग मानव पुत्र को अपार सामर्थ्य और महिमा के साथ बादलों पर आते हुए देखेंगे।

27) वह अपने दूतों को भेजेगा और वे चारों दिशाओं से, आकाश के कोने-कोने से, उसके चुने हुए लोगों को एकत्र करेंगे।

28) "अंजीर के पेड़ से शिक्षा लो। जब उसकी टहनियाँ कोमल बन जाती हैं और उन में अंकुर फूटने लगते हैं, तो तुम जान जाते हो कि गरमी आ रही है।

29) इसी तरह, जब तुम लोग यह सब देखोगे, तो जान लो कि वह निकट है, द्वार पर ही है।

30) मैं तुम से यह कहता हूँ कि इस पीढ़ी का अन्त हो जाने के पूर्व ही ये सब बातें घटित हो जायेंगी।

31) आकाश और पृथ्वी टल जायें, तो टल जायें, परन्तु मेरे शब्द नहीं टल सकते।

32) "उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता- न तो स्वर्ग के दूत और न पुत्र। केवल पिता ही जानता है।



मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार प्रभु के दिन की घटनाओं की बात करता है। यहोवा का दिन एक अवधारणा थी जो इस्राएलियों के लिए बहुत परिचित थे। यह वर्तमान युग और आने वाले युग के बीच का दिन है। दानिएल की पुस्तक में आज के पहले पाठ में प्रभु के दिन के विषय में यह बताता हैः

दुनिया का अनजान और अचानक अंतः यह माना जाता था कि प्रभु के दिन का आगमन अचानक और कम से कम अपेक्षित समय होगा। संत पौलुस कहते हैं, ‘‘प्रभु का दिन, रात के चोर की तरह आएगा’’ (1 थेसल 5ः2)। येसुु ने स्वयं इसका संकेत दिया था जब उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए जागते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारे प्रभु किस दिन आयेंगे। यह अच्छी तरह समझ लो- यदि घर के स्वामी को मालूम होता कि चोर रात के किस पहर आयेगा, तो वह जागता रहता और अपने घर में सेंध लगने नहीं देता। इसलिए तुम लोग भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी तुम उसके आने की नहीं सोचते, उसी घड़ी मानव पुत्र आयेगा।’’ मत्ती 24ः42-44

प्रभु के दिन के आगमन पर विनाशः आकाशीय पिंड के विनाश की भविष्यवाणी भी प्रभु के दिन की गयी है। येसु इसायह की पुस्तक 13ः10,13 और योएल 2ः 10, 30-31 से उल्लेख करते है, जहां ब्रह्मांड में अस्तवयस्तता को दर्शाया गया है। उनके अनुसार प्रभु के दिन के आगमन पर प्रकृति में जो कुछ भी है सब में खलबली और उलझन पैदा हो जाएगी। भूकंप, आग और अकाल से प्रकृति में अव्यवस्था पैदा होती है। राष्ट्रों के बीच और परिवार के बीच में ही युद्ध छिड़ जाता है। यह विनाश दो बातों का अनुमान लगाता है अ) ईश्वर ने संसार को नहीं छोड़ा है ब) यह पुनर्निर्माण के लिए एक प्रस्तावना है। पुनर्निर्मित दुनिया में प्रत्येक ईसाई से ईश्वर के प्रति नवीन वफादारी दिखाने, जीवन के एक नए स्तर पर अमल करने के लिए बुलाया जाना तथा जीवन के नए उदाहरण के साथ लोगों का नेतृत्व करने की उम्मीद की जाती है।



REFLECTION



Today’s gospel speaks happenings on the Day of the Lord. Day of the Lord was a concept very familiar for Israelites. It is a day between present age and the age to come. Today’s first reading in the book of Daniel we hear about this.

Unknown and sudden end of the world: It was believed that the arrival of the day of the Lord will be sudden and at a least expected time. St. Paul says “The day of the Lord will come like a thief in the night” (1 Thess. 5:2). Jesus himself hinted at it when he said “Therefore keep watch, because you do not know on what day your Lord will come but understand this If the owner of the house had known at what time of night the thief was coming, he would have kept watch and would not have let his house be broken into, So you also must be ready, because the Son of Man will come at an hour when you do not expect him” (Mat. 24: 42- 44).

Destruction at its arrival: Destruction of the heavenly bodies is also foretold on the Day of the Lord. Jesus quotes from Is. 13:10, 13 and Joel 2: 10, 30-31, where the chaos in the universe is depicted. According to them at the arrival of the Day of the Lord everything in the nature falls to commotion and confusion. A disorder is created in the nature with earthquakes, fire and famine. War breaks out between nations and in the family itself. This destruction presupposes two things a) God has not abandoned the world b) it is a prelude for the recreation. In the recreated world every Christian is expected to show new loyalty to God, called to practice a new standard of living and to lead the people with new example of life.




मनन-चिंतन - 2



आज वर्ष का 33सवाँ इतवार है और पूजन विधि का दूसरा अंतिम इतवार है इस अंतिम सप्ताह में हमें अंतिम दिनों की घटनाओं के बारे में बताया गया है।

किसी गाँव में दो घनिष्ठ मित्र रहा करते थे, वे प्रतिदिन अपने-अपने अंतिम दिनों के जीवन के बारे में वाद-विवाद किया करते थे और यह जानना चाहते थे कि इस दुनिया में कौन ऐसा व्यक्ति है जो अपने जीवन के अंतिम क्षण को जान सके। उनमें से सबसे बुजर्ग ने कहा-’’मुझे पता नहीं, मैं अंतिम दिन तक अपने किताब रूपी जीवन को अच्छी तरह से लिख पाऊंगा या नहीं।’’

प्रिय विश्वासियों, आज के भौतिकवाद में हम भी कई बार अपनी मृत्यु और अंतिम दिन से भयभीत होकर जीवन जीते हैं। हम अपने आप में विश्वास नहीं कर पाते हैं और उस बुजर्ग के समान प्रश्न करते दिखाई देते हैं। लेकिन एक सच्चे ख्रीस्तीय जीवन बिताने वाले के लिए अंतिम दिन एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसे आज के तीनों पाठों में विस्तृत रूप में दर्शाया गया है।

हम सभी को ज्ञात है कि हम सब एक न एक दिन इस संसार से विदा ले लेगें और हमारे लिए इस संसार का अंत हो जाएगा। हम भयभीत होकर इस सच्चाई से अपने को दरकिनार कर देते हैं। क्योंकि हम अंतिम दिनों का स्मरण विश्वास के साथ नहीं लेकिन डर कर करते हैं। आज के पाठों में बताया गया है कि हमारी मृत्यु एक सच्चाई है।

जब हम समाचार पत्रों में पढते, रेडियो में समाचार सुनते या टेलीविजन में समाचार देखते हैं तब हमें ज्ञात होता है कि इस संसार में तरह-तरह की विषमताएँ हैं। आज का पहला पाठ जो नबी दानिएल ग्रंथ से लिया गया है, मे बताया गया है कि उस समय समस्त राष्ट्रों में घोर संकट आ जाएगा। यह समय पुनरूत्थान का सूचक है। जो लोग पृथ्वी पर सो रहे हैं वे जाग जाएगें और सदा के लिए जीवित हो जाएगें और जो शापित हैं वे अनंत पाप के सागर में लिप्त हो जाएगें। यह सब अंतिम दिन की भविष्यवाणी है जब धर्मी मानव पुत्र के आने की राह देखेगें।

यह कहने पर अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज मनुष्य अपने मन मस्तिष्क के पाप और उसके दुषप्रभाव से अपने को अलग कर चुका है। उसके लिये पाप और पुण्य कोई महत्व नहीं रखता । वह ईश्वर पर भरोसा नहीं रखता। उसे तो केवल अपने स्वार्थ पूर्ण जीवन ही मायने रखता है। जब हम कलीसिया के इतिहास के पन्नों को पलट कर देखते हैं तो हमें पता चलता है कि ऐसे कई संत और धर्मात्मा अपने अंतिम दिनों को जान गये थे और वे संपूर्ण रूप से ईश्वर में लिप्त थे। हम सभी जानते हैं ईश्वर सबका उध्दार और मुक्ति चाहता है। वह अपने विधान को किसी के ऊपर नहीं थोपता, परन्तु उन्हें पूरी स्वतंत्रता देता है कि मनुष्य ईश्वर में विश्वास करे और जीवन जीये या उनसे अलग रहे।

आज का दूसरा पाठ हमें प्रभु येसु ख्रीस्त के एक मात्र समर्थ बलिदान के बारे में बताता है। वे एक ही बार बलिदान चढ़ाने के बाद सदा के लिए ईश्वर के दाहिने विराजमान हो गये हैं। प्रभु येसु ख्रीस्त ने अपनी मृत्यु और पुनरूत्थान द्वारा हमें पाप मुक्त कर दिया है। आज हमारे लिये चुनौती है कि हम किस प्रकार ईश्वर और अपने पड़ोसी से संबध रखते हैं? क्योंकि मनुष्यों का स्वार्थ और उसके दुषप्रभाव उसे ईश्वर से अलग कर देता है।

आज का सुसमाचार अंतिम दिन को जागरूक और सचेत होकर जीवन जीने के लिए आमंत्रण देता है। क्या यह हमारे जीवने को प्रभावित करता है? क्या हमें दुरदर्शी व्यक्ति बनने के लिये प्रेरित करता है? इन सभी घटनाओं का जिक्र हम पुराने विधान में विशेष करके नबी दानिएल के ग्रंथ में पाते हैं। नये विधान में प्रभु येसु ख्रीस्त जैतून के पेड़ के दृष्टांत द्वारा इसका निरूपण करते हैं और अपने शिष्यों को अगाह करते हैं कि उन्हें सभी प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के लिए सदैव जागरूक और सर्तक रहना होगा।

तो आइए! आज के तीनों पाठों से यह शिक्षा लें कि जब भी हमें विपतियों या संकट का सामना करना पडे़, तो हम धीरज के साथ मानव पुत्र के साथ खडे़ होने के लिए अपने आप को तैयार कर सकें।


✍-Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 12 नवंबर, 2021

 

शुक्रवार, 12 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ: प्रज्ञा-ग्रन्थ 13:1-9


1) वे मनुष्य कितने मूर्ख है, जिन में ईश्वर का ज्ञान नहीं है! जो दृष्य जगत् को देख कर ‘सत्‘ नामक ईश्वर को नहीं जान सके, जो सृष्टि को देख कर सृष्टिकर्ता को पहचानने में असमर्थ रहे!

2) किन्तु उन्होंने अग्नि, पवन, सूक्ष्म वायु, तारामण्डल, जल का तीव्र प्रवाह अथवा आकाश के ज्योति-पिण्डों को संसार का संचालन करने वाले देवता समझा है।

3) यदि उन्होंने इन वस्तुओं के सौन्दर्य से मोहित हो कर इन्हें देवता समझ लिया है, तो वे यह जान जायें कि इन सब का स्वामी इन से कितना श्रेष्ठ है; क्योंकि समस्त सौन्दर्य के मूलस्त्रोत द्वारा उनकी सृष्टि हुई है

4) और यदि वे इन वस्तुओं की शक्ति और क्रियाशीलता से प्रभावित हुए, तो वे इन वस्तुओं से अनुमान लगायें कि इनका निर्माता, कितना अधिक शक्तिशाली है;

5) क्योंकि सृष्ट वस्तुओं की महानता और सौन्दर्य के आधार पर इनके निर्माता का अनुमान लगाया जा सकता है।

6) किन्तु उन लोगों का दोष बड़ा नहीं है; क्योंकि वे ईश्वर को ढूँढ़ते और उसे पाने के इच्छुक थे, किन्तु वे भटक गये।

7) वे ईश्वर के कार्यों के बीच जीवन बिता कर उनकी छानबीन करते और दृष्य वस्तुओं के सौन्दर्य के कारण भ्रम में फँस जाते हैं।

8) फिर भी वे लोग क्षम्य नहीं है;

9) क्योंकि यदि वे ज्ञान में इतना आगे बढ़ गये थे कि विश्व के विषय में चिन्तन कर सके, तो वे शीघ्र ही इसके स्वामी को क्यों नहीं पहचान सके?



सुसमाचार : सन्त लूकस 17:26-37



26) ‘‘जो नूह के दिनों में हुआ था, वही मानव पुत्र के दिनों में भी होगा।

27) नूह के जहाज़ पर चढ़ने के दिन तक लोग खाते-पीते और शादी-ब्याह करते रहे। तब जलप्रलय आया और उसने सब को नष्ट कर दिया।

28) लोट के दिनों में भी यही हुआ था। लोग खाते-पीते, लेन-देन करते, पेड़ लगाते और घर बनाते रहे;

29) परन्तु जिस दिन लोट ने सोदोम छोड़ा, ईश्वर ने आकाश से आग और गंधक बरसायी और सब-के-सब नष्ट हो गये।

30) मानव पुत्र के प्रकट होने के दिन वैसा ही होगा।

31) ‘‘उस दिन जो छत पर हो और उसका सामान घर में हो, वह उसे ले जाने नीचे न उतरे और जो खेत में हो, वह भी घर न लौटे।

32) लोट की पत्नी को याद करो।

33) जो अपना जीवन सुरक्षित रखने का प्रयत्न करेगा, वह उसे खो देगा, और जो उसे खो देगा, वह उसे सुरक्षित रखेगा।

34) ’’मैं तुम से कहता हूँ, उस रात दो एक खाट पर होंगे-एक उठा लिया जायेगा और दूसरा छोड़ दिया जायेगा।

35) दो स्त्रियाँ साथ-साथ चक्की पीसती होंगी-एक उठा ली जायेगी और दूसरी छोड़ दी जायेगी।’’

36) ’’मैं तुम से कहता हूँ, दो खेत में होंगे-एक उठा लिया जायेगा और दूसरा छोड़ दिया जायेगा।

37) इस पर उन्होंने ईसा से पूछा, ‘‘प्र्रभु! यह कहाँ होगा?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘जहाँ लाश होगी, वहाँ गीध भी इकट्ठे हो जायेंगे’’।



मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार दो महत्वपूर्ण पहलूओं की भविष्यवाणी करता है -

 राज्य का हिस्सा बनने के लिए आवश्यक तैयारी

 राज्य के आने का अज्ञात समय ।

जीवन की सामान्य दिनचर्या में हमें अपनी और संबंधित अन्य लोगो की भौतिक और अन्य जरूरतो की देखभाल करने की आवश्यकता होती है । यह हर इंसान की जिम्मेदारी है । येसु हमे अनंत जीवन के विषय में एक कदम आगे सोचने के लिए आमंत्रित करते है । अनन्त जीवन की तुलना में इस संसार की अवश्यकताओं की कोई कीमत नहीं है । नूह और लोट के दिनों में लोग भौतिक संसार में व्यस्त थे जबकि नूह और लोट एक कदम आगे बढ गए थे उन्होंने ईश्वर की बात मानी और उसी के अनुसार जलप्रलय और आग का सामना करने के लिए अपने आप को तैयार किया जिसने पृथ्वी पर सभी को और सदोम के लोगों को नष्ट कर दिया । परिवार के सदस्यों सहित उन्हें बचा लिया गया । हमें हमारे प्रियजनों, हमारे समाज और दुनिया की हर चींजो को त्यागने की जरूरत नहीं बल्कि उनका उपयोग। साथ जीवन के अर्थ और उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए करना है ।

बजाय इसके कि हम अपना जीवन खो दें। हालांकि आखिरी मिनट/समय में अच्छी तरह से तैयार होने के बावजूद लोट की पत्नी नमक के खम्भे में बदल गई । अर्थ और उद्देश्यको भूल जाना हमेशा विनाश को आमंत्रित करेगा ।

ईश्वर के राज्य के महिमामय आगमन पर भी घ्यान देने की आवश्यकता है । यह एक अप्रत्याशित समय है । इसलिए इसके आगमन के लिए सभी को सदैव तैयार रहने की जरूरत है । बाद के लिए स्थगित करने से हमे केवल और केवल खेद और निराशा हो सकती है । हमें दिया गया समय कम है और उस समय पर हमारा कोई नियंत्रण नही है । यही कारण है कि संत पौलुस कहते है, “और देखिए अभी उपयुक्त समय है, अभी कल्याण का दिन है ।“ (श्कुरि 6:2 बी).




REFLECTION



Today’s gospel foretells two important aspects: the preparation required to be the part of the kingdom and the unknown time of the coming of the kingdom.

In the normal routine of life we need to look after the physical and material needs of oneself and of others related to them. It is a responsibility of every human person. Jesus invites us to think a step further about the eternal life. As compared to eternal life the needs of this world are worth nothing.

In the days of Noah and Lot people were busy in the material world where as Noah and Lot went a step further. They listened to God and prepared themselves accordingly to face the flood and the fire which destroyed everyone on earth and people of Sodom. They were saved along with their family members. It is not to discard our loved ones, our society and everything in the world but to use them to achieve the meaning and purpose of life rather than losing our life to them. Though well prepared the last minute attachment turned Lot’s wife into a pillar of salt. Forgetting the meaning and purpose will always invite destruction.

Imminent arrival of the kingdom of God is also need to be looked into. It is an unexpected time. Therefore all need to be ready at its arrival. Postponing for later stage may cause regret and disappointment. The time given to us is short and we have no control over that time. That is why St. Paul says “See now is the acceptable time; see now is the day of salvation” 2Cor. 6:2b.




मनन-चिंतन - 2



प्रभु येसु बार-बार हमें बताते हैं कि अंत बिना किसी घोषणा या चेतावनी के अचानक आएगा। इसलिए हमें हमेशा तैयार रहना होगा। येसु चाहते हैं कि हम जागते रहें और हर समय तैयार रहें। अचानक पकड़ा जाना एक त्रासदी होगी। नूह के समय में लोग अपने जीवन की बहुत सी चीजों और चिंताओं में व्यस्त थे। वे इस पर ध्यान नहीं दे रहे थे कि अपने निर्माता और प्रभु हम से क्या अपेक्षा रखते हैं। नूह ईश्वर से जुड़े हुए थे। हम भी बहुत सारी चीजों में व्यस्त हो सकते हैं और प्रभु को भूल सकते हैं। हम अपने काम, आराम, कार्यक्रमों और परियोजनाओं में डूबे रह सकते हैं। येसु चाहते हैं कि हम अपने ईश्वर के प्रति प्रेम और अपने उद्धार के बारे में चिंतित हों। दुनिया के कार्यों में फंसे, हमें उस उद्धार को नहीं भूलना चाहिए जो प्रभु हमें प्रदान करते हैं। मार्था के प्रति उनकी प्रतिक्रिया हमारे मनन-चिंतन के योग्य है, "मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो; फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।”(लूकस 10: 41-42)



REFLECTION



Time and again Jesus tells us that the end will suddenly come without any announcement or warning. Therefore we have to be prepared always. Jesus wants us to keep awake and be ready at all times. It will be tragedy to get caught unaware. At the time of Noah people were busy with too many things and concerns of their lives. They hardly bothered about what their Creator and Lord expected from them. Noah was tuned to God. We too can be busy with too many things and can forget God. We can be immersed in our work, in our comfort, in our programmes and projects. Jesus wants us to be concerned about our love for God and about our salvation. Caught up in the chores of the world, we should not lose sight of the Salvation the Lord offers to us. His response to Martha is worth reflecting upon, “Martha, Martha, you are worried and distracted by many things; there is need of only one thing. Mary has chosen the better part, which will not be taken away from her.” (Lk 10:41-42)


✍ -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!