मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Duliajan, Assam, India
Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

शुक्रवार, 23 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 23 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : निर्गमन 20:1-17

1) ईश्वर ने मूसा से यह सब कहा,

2) ''मैं प्रभु तुम्हारा ईश्वर हूँ। मैं तुमको मिस्र देश से गुलामी के घर से निकाल लाया।

3) मेरे सिवा तुम्हारा कोई ईश्वर नहीं होगा।

4) ''अपने लिये कोई देव मूर्ति मत बनाओ। ऊपर आकाश में या नीचे पृथ्वी तल पर या पृथ्वी के नीचे के जल में रहने वाले किसी भी प्राणी अथवा वस्तु का चित्र मत बनाओ।

5) उन मूर्तियों को दण्डवत कर उनकी पूजा मत करो; क्योंकि मैं प्रभु, तुम्हारा ईश्वर, ऐसी बातें सहन नहीं करता जो मुझ से बैर करते हैं, मैं तीसरी और चौथी पीढ़ी तक उनकी सन्तति को उनके अपराधों का दण्ड देता हूँ।

6) जो मुझे प्यार करते हैं और मेरी आज्ञाओं का पालन करते है मैं हजार पीढ़ियों तक उन पर दया करता हूँ।

7) प्रभु अपने ईश्वर का नाम व्यर्थ मत लो; क्योंकि जो व्यर्थ ही प्रभु का नाम लेता है, प्रभु उसे अवश्य दण्डित करेगा।

8) विश्राम-दिवस को पवित्र मानने का ध्यान रखो।

9) तुम छः दिनों तक परिश्रम करते रहो और अपना सब काम करो;

10) परन्तु सातवाँ दिन तुम्हारे प्रभु ईश्वर के आदर में विश्राम का दिन है। उस दिन न तो तुम कोई काम करो न तुम्हारा पुत्र, न तुम्हारी पुत्री, न तुम्हारा नौकर, न तुम्हारी नौकरानी, न तुम्हारे चौपाये और न तुम्हारे शहर में रहने वाला परदेशी।

11) छः दिनों में प्रभु ने आकाश, पृथ्वी, समुद्र और उन में से जो कुछ है वह सब बनाया है और उसने सातवें दिन विश्राम किया। इसलिए प्रभु ने विश्राम दिवस को आशिष दी है और उसे पवित्र ठहराया है।

12) अपने माता-पिता का आदर करों जिससे तुम बहुत दिनों तक उस भूमि पर जीते रहो, जिसे तुम्हारा प्रभु ईश्वर तुम्हें प्रदान करेगा।

13) हत्या मत करो।

14) व्यभिचार मत करो।

15) चोरी मत करो।

16) अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी गवाही मत दो। अपने पड़ोसी के घर-बार का लालच मत करो।

17) न तो अपने पड़ोसी की पत्नी का, न उसके नौकर अथवा नौकरानी का, न उसके बैल अथवा गधे का - उसकी किसी भी चीज का लालच मत करो।''


सुसमाचार : मत्ती 13:18-23


18) ’’अब तुम लोग बोने वाले का दृष्टान्त सुनो।

19) यदि कोई राज्य का वचन सुनता है, लेकिन समझता नहीं, तब उसके मन में जो बोया गया है, उसे शैतान आ कर ले जाता हैः यह वह है, जो रास्ते के किनारे बोया गया है।

20) जो पथरीली भूमि मे बोया गया है, यह वह है, जो वचन सुनते ही प्रसन्नता से ग्रहण करता है;

21) परन्तु उस में जड़ नहीं है, और वह थोड़े ही दिन दृढ़ रहता है। वचन के कारण संकट या अत्याचार आ पड़ने पर वह तुरन्त विचलित हो जाता है।

22) जो काँटों में बोया गया हैः यह वह है, जो वचन सुनता है; परन्तु संसार की चिन्ता और धन का मोह वचन को दबा देता है और वह फल नहीं लाता।

23) जो अच्छी भूमि में बोया गया हैः यह वह है, जो वचन सुनता और समझता है और फल लाता है, कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, और कोई तीस गुना।’’


📚 मनन-चिंतन


आमतौर पर दृष्टान्त का अर्थ होता है, दृष्टा-अन्त = देखने वाले के अनुसार अन्त. दृष्टान्त का मतलब हुआ कि कोई उदाहरण या कहानी जिसका सन्देश सुनाने वाले पर निर्भर करता है. वह उदाहरण जिसके जीवन में जैसे सटीक बैठता है, वैसा ही उसके लिए उसका सन्देश होगा. अक्सर ऐसी कहानी का कोई एक निष्कर्ष नहीं निकलता. प्रभु येसु द्वारा कही गई बातें सुनाने वाले की समझ के अनुसार फल उत्पन्न करती थी. आज के सुसमाचार में प्रभु येसु बीज बोने वाले का दृष्टान्त का अर्थ बताते हैं. यह शायद एकमात्र ऐसा दृष्टान्त है जिसकी व्याख्या स्वयं प्रभु येसु करते हैं, अन्यथा उनके दृष्टान्त उनके सुनने वालों को खुद समझने पड़ते हैं.

बीज बोने वाले के दृष्टान्त का वास्तविक विषय बीज से बढ़कर वह मिट्टी और वातावरण है जिसमें वे बीज गिरे. हम जानते हैं कि सबसे अच्छी मिट्टी वही थी जिसमें वह बीज गिरने पर कई गुना फल लाता है. इसकी व्याख्या करने का मकसद यही है कि हमारा हृदय भी उसी उपजाऊ मिट्टी के समान बने. आखिर हम उस उपजाऊ मिट्टी के समान कैसे बन सकते हैं? सबसे पहले हमें ईश्वर के वचन के प्रति अपना हृदय और जीवन खुला रखना है, उन सभी कमियों को दूर करना है जिनके कारण हमारे हृदय में ईश्वर का बीज पनप नहीं पाता है. हो सकता है ईश्वर के वचन से बहुत फल उत्पन्न करने के लिए हमारे हृदयरूपी मिट्टी को उचित रूप से तैयार करने के लिए बहुत परिश्रम करने की आवश्यकता है. आइये इसके लिए हम ईश्वर से कृपा माँगें.



📚 REFLECTION



One of the characteristics of a parable is that it is open-ended, which means the end or the conclusion is left to the audience. Very often its meaning is interpreted according to the audience and the intended message. A Parable will have the meaning as per the people to whom it is narrated. Usually it can be interpreted in multiple ways. The words spoken by Jesus, bore fruit according to the type of the listeners. Jesus explains the meaning of the parable of the sower. Jesus usually talks to people in parables and leaves the people to understand their meaning, off course he would explain them privately to his disciples.

The parable of the sower is more about the soil and the atmosphere in which the seeds fell, than the sower himself. We know the best soil is the one falling into which the seed yields maximum. Jesus explains this parable so that we also may prepare the soil of our hearts to bear much fruit. How do we prepare the ground of our hearts to be more productive? First of all we need to keep our hearts and lives open to the Word of God, and remove all the obstacles and hurdles that block the healthy growth of the seed. We may have to work a lot hard with the soil to make it more productive. Let us ask God’s grace for this endeavour. Amen.



Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

गुरुवार, 22 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 22 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : सुलेमान का सर्वश्रेष्ठ गीत 3:1-4


1) मैं सारी रात अपने पलंग पर अपने प्राणप्रिय को ढूँढ़ती हूँ। मैं उसे ढूँढ़ती हूँ, किन्तु नहीं पाती।

2) मैं उठ कर गलियों तथा चैकों से होते नगर का चक्कर लगाती हूँ। मैं अपने प्राणप्रिय को ढूँढ़ती हूँ मैं उसे ढूँढ़ती हूँ, किन्तु नहीं पाती।

3) नगर का फेरा लगाते हुए पहरेदार मुझे मिलते हैं: ‘‘क्या आप लोगों ने मेरे प्राणप्रिय को देखा?‘‘

4) मैं उनसे आगे बढ़ती ही हूँ कि मैं अपने प्राणप्रिय को पा लेती हूँ।


सुसमाचार : योहन 20:1-2,11-18


1) मरियम मगदलेना सप्ताह के प्रथम दिन, तडके मुँह अँधेरे ही कब्र के पास पहुँची। उसने देखा कि कब्र पर से पत्थर हटा दिया गया है।

2) उसने सिमोन पेत्रुस तथा उस दूसरे शिष्य के पास, जिसे ईसा प्यार करते थे, दौडती हुई आकर कहा, ’’वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।’’

11) मरियम कब्र के पास, बाहर रोती रही। उसने रोते रोते झुककर कब्र के भीतर दृष्टि डाली

12) और जहाँ ईसा का शव रखा हुआ था वहाँ उजले वस्त्र पहने दो स्वर्गदूतों को बैठा हुआ देखा- एक को सिरहाने और दूसरे को पैताने।

13) दूतों ने उस से कहा, ’’भद्रे! आप क्यों रोती हैं?’’ उसने उत्तर दिया, ’’वे मेरे प्रभु को उठा ले गये हैं और मैं नहीं जानती थी कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है’’।

14) वह यह कहकर मुड़ी और उसने ईसा को वहाँ खडा देखा, किन्तु उन्हें पहचान नहीं सकी।

15) ईसा ने उस से कहा, ’’भद्रे! आप क्यों रोती हैं। किसे ढूँढ़ती हैं? मरियम ने उन्हें माली समझकर कहा, ’’महोदय! यदि आप उन्हें उठा ले गये, तो मुझे बता दीजिये कि आपने उन्हें कहाँ रखा है और मैं उन्हें ले जाऊँगी’’।

16) इस पर ईसा ने उस से कहा, ’’मरियम!’’ उसने मुड कर इब्रानी में उन से कहा, ’’रब्बोनी’’ अर्थात गुरुवर।

17) ईसा ने उस से कहा, ’’चरणों से लिपटकर मुझे मत रोको। मैं अब तक पिता के पास ऊपर नहीं गया हूँ। मेरे भाइयेां के पास जाकर उन से यह कहो कि मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, अपने ईश्वर और तुम्हारे ईश्वर के पास ऊपर जा रहा हूँ।’’

18) मरियम मगदलेना ने जाकर शिष्यों से कहा कि मैंने प्रभु को देखा है और उन्होंने मुझे यह सन्देश दिया।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु की शिक्षाएँ अनमोल हैं और उतने ही अनमोल हैं उनके चिन्ह और चमत्कार. जो भी प्रभु येसु के उस ऐतिहासिक और पार्थिव जीवन का हिस्सा बना वह अत्यन्त सौभाग्यशाली रहा होगा. ईश्वर का पुत्र स्वर्ग से उतरकर इस पृथ्वी पर चला-फिरा, लोगों के बीच में रहा, उनके दुःख-दर्द में शामिल रहा. और अन्त में सारी मानव जाति के पापों को अपने ऊपर लेते हुए क्रूस की कष्ट भरी मौत को अपने गले लगा लिया. उनके द्वारा पृथ्वी पर बिताये एक-एक पल इस मानव जाति पर एक-एक अहसान भरे पल थे. इस मुक्ति इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी प्रभु येसु की म्रत्यु पर विजय, यानि कि प्रभु येसु का पुनरुत्थान. प्रभु येसु का पुनरुत्थान ही हमारे विश्वास का आधार है. दुनिया की सबसे महान घटना का पहला साक्षी बनने का सौभाग्य प्रभु येसु मरिया मगदलेना को देते हैं.

प्रभु येसु के एक से बढ़कर एक शिष्य थे, वे शिष्य जिनके पैर प्रभु येसु ने धोये थे, जिन्हें प्रभु येसु ने बड़े-बड़े वरदान दिये थे, अधिकार दिये थे, स्वर्गराज्य की कुंजियाँ देने का वादा किया था, एक शिष्य की तो पहचान ही वही थी - वह शिष्य जिसे प्रभु प्यार करते थे. लेकिन प्रभु येसु पुनरुत्थान के बाद सबसे पहले इनमें से किसी को भी दर्शन नहीं देते बल्कि वे मरिया मगदलीन को सबसे पहले दिखाई देते हैं. वह ख़ुशी जो सदियों से कलीसिया की सबसे बड़ी ख़ुशी बनी हुई है, उस खुशखबरी का सहभागी सबसे पहले प्रभु येसु आज के इस सन्त मरियम मगलीना को बनाते हैं. इसका कारण हैं कि ईश्वर हमारा ह्रदय देखते हैं, हमारे हृदय में ईश्वर के लिए कितना प्रेम है, जो अधिक प्रेम दिखाता है, ईश्वर उसे अधिक कृपाएं प्रदान करते हैं. आईये हम इस महान सन्त और प्रेरितों की प्रेरित मरियम मगद्लीना से प्रार्थना करें कि हम भी उनके समान ईश्वर के प्रेम से भर जाएँ. आमेन.



📚 REFLECTION



Words of Jesus are very precious and same are his miracles and signs. Whoever became the part of Jesus’s worldly life, must have very fortunate. The Son of God came down and walked on this earth, lived among the mortal humans, shared in their joys ad sorrows. Finally he took our iniquities upon himself and chose to die a painful death on the cross. Every moment that spent on this earth, was a favour on whole humanity. The greatest event in this salvific work of God was his victory over death, the resurrection of Jesus. The resurrection of Jesus is the basis of our Christian faith. Jesus gives the privilege of being the very first witness of such a great event to Mary Magdalene.

Jesus had many good disciples, the ones whose feet he washed, who he gave power and authority, promised to give the keys of the kingdom, one of them was even identified as ‘the one whom the Lord loved.’ But Jesus could not find anyone more suitable to give privilege of being first witness of his resurrection, than Mary Magdalene. The joy that has been the centre of the Universal Church for centuries, this Joy was first revealed and experienced by Mary Magdalene. The reason for this is the fact that God sees our hearts, God measures the love filled in our hearts for Him, the more we love God, the more He will bless us. Let us implore the intercessions of this great apostle of the apostles, that we may also be filled with great love for God. Amen.


 -Fr. Johnson B. 


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

बुधवार, 21 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 21 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : निर्गमन 16:1-5,9-15


1) इस्राएली एलीम से आगे बढ़े। मिस्र देश से निकलने के बाद दूसरे महीने के पन्द्रहवें दिन इस्राएलियों का सारा समुदाय एलीम और सोनई के बीच सीन नामक मरूभूमि पहुँचा।

2) इस्राएलियों का सारा समुदाय मरूभूमि में मूसा और हारून के विरुद्ध भुनभुनाने लगा।

3) इस्राएलियों ने उन से कहा, ''हम जिस समय मिस्र देश में मांस की हड्डियों के सामने बैठते थे और इच्छा-भर रोटी खाते थे, यदि हम उस समय प्रभु के हाथ मर गये होते, तो कितना अच्छा होता! आप हम को इस मरूभूमि में इसलिए ले आये हैं कि हम सब-के-सब भूखों मर जायें।''

4) प्रभु ने मूसा से कहा, ''मैं तुम लोगों के लिए आकाश से रोटी बरसाऊँगा। लोग बाहर निकल कर प्रतिदिन एक-एक दिन का भोजन बटोर लिया करेंगे। मैं इस तरह उनकी परीक्षा लूँगा और देखूँगा कि वे मेरी संहिता का पालन करते हैं या नहीं।

5) छठे दिन उन्हें दूसरे दिनों की अपेक्षा दुगुनी रोटी बटोर कर तैयार करनी चाहिए।

9) मूसा ने हारून से कहा, ''इस्राएलियों के सारे समुदाय को यह आदेश दो प्रभु के सामने उपस्थित हो, क्योंकि वह तुम्हारा भुनभुनाना सुन चुका है।''

10) जब हारून इस्राएलियों को संबोधित कर रहा था, तो उन्होंने मुड़ कर मरुभूमि की ओर देखा और प्रभु की महिमा बादल के रूप में उन्हें दिखाई दी।

11) प्रभु ने मूसा से यह कहा,

12) ''मैं इस्राएलियों का भुनभुनाना सुन चुका हूँ। तुम उन से यह कहना शाम को तुम लोग मांस खा सकोगे और सुबह इच्छा भर रोटी। तब तुम जान जाओगे कि मैं प्रभु तुम लोगों का ईश्वर हूँ।''

13) उसी शाम को बटेरों का झुण्डा उड़ता हुआ आया और छावनी पर बैठ गया और सुबह छावनी के चारों और कुहरा छाया रहा।

14) कुहरा दूर हो जाने पर मरुभूमि की जमीन पर पाले की तरह एक पतली दानेदार तह दिखाई पड़ी।

15) इस्राएली यह देखकर आपस में कहने लगे, ''मानहू'' अर्थात् ''यह क्या है?'' क्योंकि उन्हें मालूम नहीं था कि यह क्या था। मूसा ने उस से कहा, ''यह वही रोटी है, जिसे प्रभु तुम लोगों को खाने के लिए देता है।


सुसमाचार : मत्ती 13:1-9


1) ईसा किसी दिन घर से निकल कर समुद्र के किनारे जा बैठे।

2) उनके पास इतनी बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी कि वे नाव पर चढ़ कर बैठ गये और सारी भीड़ तट पर बनी रही।

3) उन्होंने दृष्टान्तों द्वारा उन्हें बहुत-सी बातों की शिक्षा दी। उन्होंने कहा, ’’सुनो! कोई बोने वाला बीज बोने निकला।

4) बोते-बोते कुछ बीज रास्ते के किनारे गिरे और आकाश के पक्षियों ने आ कर उन्हें चुग लिया।

5) कुछ बीज पथरीली भूमि पर गिरे, जहाँ उन्हें अधिक मिट्टी नहीं मिली। वे जल्दी ही उग गये, क्योंकि उनकी मिट्टी गहरी नहीं थी।

6) सूरज चढने पर वे झुलस गये और जड़ न होने के कारण सूख गये।

7) कुछ बीज काँटों में गिरे और काँटों ने बढ़ कर उन्हें दबा दिया।

8) कुछ बीज अच्छी भूमि पर गिरे और फल लाये- कुछ सौ गुना, कुछ साठ गुना और कुछ तीस गुना।

9) जिसके कान हों, वह सुन ले।‘‘


📚 मनन-चिंतन


ईश्वर सबों के हृदयों के रहस्य जानता है. जो मनुष्य की नज़रों से छुपा है वह ईश्वर की नज़रों के सामने साफ-सपाट है. आज के सुसमाचार में हम बहुत सारे लोगों को प्रभु येसु के पास आते हुए देखते है. इतने सारे लोग आते हैं कि प्रभु येसु चैन से बैठकर उन्हें उपदेश भी नहीं सुना सकते, अतः वह नाव पर चढ़कर बैठ जाते हैं और वहाँ से प्रवचन देते हैं. प्रभु येसु की एक खासियत है कि वे लोगों को देखते हुए उनके अनुसार ही अपनी शिक्षा को चुनते हैं कि किस विषय पर शिक्षा देनी है. उन्होंने उस विशाल भीड़ को देखा, उनके हृदयों के मनोभावों को देखा, उनकी ज़िन्दगी के हर पहलु को देखा.

उनमें तरह-तरह के लोग थे, वे जो सच्चे दिल से प्रभु को अपना मुक्तिदाता स्वीकार करना चाहते थे, वे जो अपने कठिनाई भरे जीवन से कुछ पल निकालकर प्रभु की बातें सुनने आये थे और वापस जाकर उसी जीवन में लौटने वाले थे, वे जो शैतान के चंगुल में फंसे थे, लेकिन इस आशा के साथ आये थे, कि शायद उनका जीवन बदल जाये. इसलिए प्रभु येसु सब लोगों के हृदयों को जानते हुए उन्हें बीज बोने वाले का दृष्टान्त सुनाते हैं, ताकि लोग अपने हृदयरूपी मिटटी को समझें जिसमें ईश्वर के वचन का वह बीज उगने वाला है, वे अपने वातावरण को समझें जिसमें वह बीज फलीभूत होने वाला है. उन्हें एक विकल्प चुनना है, कि ईश्वर के वचन के लिए उचित मिट्टी और वातारण तैयार करना है, और बहुत फल लाना है, या फिर जीवन में कोई परिवर्तन नहीं लाना है, जैसी मिट्टी और वातारण है उसी में ईश्वर के वचन को अपने आप बढ़ने देना है. आईये हम अपने मनों की जाँच करें, मेरा ह्रदय ईश्वर के वचन के लिए किस तरह की भूमि है?



📚 REFLECTION



God knows the deepest secrets of the human hearts. What is hidden from the eyes of human beings, it is clear as daylight for God. We see great crowds coming to Jesus in the Gospel today. There was so great number of people that Jesus could not speak to them without being restless and disturbed so he gets into a boat and starts preaching. Jesus choses to speak according to the disposition of the people, he choses the subject of his teachings according to the need of the people. Jesus saw the great crowds, he looked into the hearts of each of them, he could look into their entire lives.

There were people from all walks of life, those who were eager to accept the saviour into their hearts, then there were those who with great difficulty stole few moments from their struggles of life, just to listen to the words of eternal life, there were those who were under the clutches of the evil one, and came with the expectation of changing their lives forever. Knowing the hearts of all, Jesus chooses to speak about the sower of the seeds, in fact it is more about soil. Jesus wants the people to reflect about the soil of their own hearts, to know its productivity when the seeds of the words of Jesus fall into that soil, so that they know the atmosphere that is required for the appropriate growth of those seeds. They are given a choice to work on the soil and atmosphere of their lives to make it suitable for the Word of God to bear much fruit, or to remain indifferent and let them fall on infertile soil. This also invites us to reflect about own lives and soil for the seeds. Amen.


 -Fr. Johnson B


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

मंगलवार, 20 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 20 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : निर्गमन 14:21-15:1


21) तब मूसा ने सागर के ऊपर हाथ बढ़ाया और प्रभु ने रात भर पूर्व की ओर जोरों की हवा भेज कर सागर को पीछे हटा दिया। सागर दो भागों में बँट कर बीच में सूख गया।

22) इस्राएली सागर के बीच में सूखी भूमि पर आगे बढ़ने लगे। पानी उनके दायें और बायें दीवार बन कर ठहर गया। मिस्री उसका पीछा करते थे।

23) फिराउन के सब घोड़े, उसके रथ और उसके घुड़सवार, सागर की तह पर उनके पीछे चलते थे।

24) रात के पिछले पहर, प्रभु ने आग और बादल के खम्भे में से मिस्रियों की सेना की ओर देखा और उसे तितर-बितर कर दिया।

25) रथों के पहिये निकल कर अलग हो जाते थे और वे कठिनाई से आगे बढ़ पाते थे। तब मिस्री कहने लगे, ''प्रभु उनकी ओर से मिस्रियों के विरुद्ध लड़ता है।''

26) उस समय प्रभु ने मूसा से कहा, ''सागर के ऊपर अपना हाथ बढ़ाओं, जिससे पानी लौट कर मिस्रियों, उनके रथों और उनके घुड़सवारों पर लहराये।''

27) मूसा ने सागर के ऊपर हाथ बढ़ा दिया और भोर होते ही सागर फिर भर गया। मिस्री भागते हुए पानी में जा घुसे और प्रभु ने उन्हें सागर के बीच में ढकेल दिया।

28) समुद्र की तह पर इस्राएलियों का पीछा करने वाली फिराउन की सारी सेना के रथ और घुड़सवार लौटने वाले पानी में डूब गये। उन में एक भी नहीं बचा।

29) इस्राएली तो समुद्र की सूखी तह पार कर गये। पानी उनके दायें और बायें दीवार बन कर ठहर गया था।

30) उस दिन प्रभु ने इस्राएलियों को मिस्रियों के हाथ से छुड़ा दिया। इस्राएलियों ने समुद्र के किनारे पर पड़े हुए मरे मिस्रियों को देखा।

31) इस्राएली मिस्रियों के विरुद्ध किया हुआ प्रभु का यह महान् कार्य देख कर प्रभु से डरने लगे। उन्होंने प्रभु में और उसके सेवक मूसा में विश्वास किया।



सुसमाचार : मत्ती 12:46-50



46) ईसा लोगों को उपदेश दे रहे थे कि उनकी माता और भाई आये। वे घर के बाहर थे और उन से मिलना चाहते थे।

47) किसी ने ईसा से कहा, "देखिए, आपकी माता और आपके भाई बाहर हैं। वे आप से मिलना चाहते हैं।"

48) ईसा ने उस से कहा, "कौन है मेरी माता? कौन है मेरे भाई?

49) और हाथ से अपने शिष्यों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा, "देखो, ये हैं मेरी माता और मेरे भाई!

50) क्योंकि जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, वही मेरा भाई है, मेरी बहन और मरी माता।"


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु पिता ईश्वर के परम प्रिय पुत्र हैं और उन्होंने क्रूस पर अपनी पुण्य मृत्यु द्वारा हम सबका पिता ईश्वर से मेल-मिलाप कर हमें भी ईश्वर की सन्तानें बनने का सौभाग्य प्रदान किया है (1योहन3:1). आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु के सच्चे सगे सम्बन्धियों के बारे में मनन-चिन्तन करते हैं. जब वे बड़े-बड़े और महान चमत्कार कर रहे थे, तो कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि वे पागल हो गये हैं, शायद इसीलिए उनके परिवार के लोग जिनमें उनकी माता और और उनके भाई थे, उनसे मिलने आते हैं. किसी के उनके आने की सूचना देने पर प्रभु येसु पूछते हैं, कौन है मेरी माता, कौन हैं मेरे भाई-बहन? हम जानते हैं कि यह प्रश्न कोई साधारण प्रश्न नहीं था. जब हम किसी के महत्त्व के नकार देते हैं, तब हम ऐसा प्रश्न करते हैं. प्रभु येसु के इस तरह के व्यवहार से ज़रूर उनके परिवार वालों को बुरा लगा होगा.

इस तरह से प्रश्न करके प्रभु येसु सांसारिक सम्बन्धों व अध्यात्मिक सम्बन्धों के अन्तर को समझाते हैं. हम इस संसार में तरह-तरह के पारिवारिक सम्बन्धों से बंधे रहते हैं. और कई बार इन सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए इतने मगन हो जाते हैं कि अपने ईश्वर से अनन्तकाल के सम्बन्ध को ही भुला देते हैं. इस संसार के सम्बन्ध हमारे जन्म के साथ शुरू होते हैं और हमारी मृत्यु के साथ ख़तम हो जाते हैं, लेकिन ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध माता के गर्भ में रचने से पहले से है (येरेमियाह 1:5) और इस दुनिया में रहता है, और हमारी मृत्यु के बाद भी रहता है. यह अनन्तकाल तक बने रहने वाला सम्बन्ध है (इब्रानियों 13:5, मत्ती 28:20). इसलिए हमें ईश्वर के साथ मजबूत सम्बन्ध बनाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए. खून के रिश्ते से बढ़कर आत्मा का रिश्ता है. आमेन.



📚 REFLECTION



Jesus is the loving son of the Heavenly Father who has reconciled us to God through his death on the cross and made us the sons and daughters of the Heavenly Father (cf 1John 3:1). Today we reflect about who are the true kiths and kins of Jesus. When Jesus was performing great miracles and challenging the Pharisees and scribes, some people said that he has lost his mind, perhaps that’s why his family members including his mother and brothers came to meet him. Someone told him about their arrival and Jesus asks who is my mother and my brothers? We know this was not a simple question as it may appear. When we don’t acknowledge someone’s authority or existence, we ask such question. This apparently rude behaviour of Jesus must have certainly hurt his mother and his brothers.

By putting forward this question, Jesus makes clear the difference between the relationships of this world and spiritual relationship. We are bound by many threads of the family relationships in this world. Many times in order to maintain and safeguard these temporary relations, we forget about our permanent relationship with our Heavenly Father. The relations of this world begin when we are born, and they come to an end with our death, but our relationship with God begins even before we are formed in mother’s womb (Jer 1:5) and continues when we live in this world and continues to exist even our death. This is everlasting relationship, God remains with us always (Heb 13:5, Matt 28:20). Therefore we need to focus on strengthening our this permanent relationship with our Creator. Spiritual relationship is above worldly relationships. Amen.


 -Fr. Johnson B. 



Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

सोमवार, 19 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 19 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : निर्गमन 14:5-18


5) जब मिस्र के राजा को यह सूचना मिली कि इस्राएली भाग गये है, तो फिराउन और उसके पदाधिकारी, अपना मन बदल कर बोल उठे, ''हम लोग यह क्या कर बैठे! हमने इस्राएलियों को, अपने दासों को भाग जाने दिया!''

6) फिराउन अपना रथ तैयार करा कर अपनी सेना साथ ले गया -

7) छह सौ श्रेष्ठ रथ और मिस्र के सब रथ, जिन पर योद्धा सवार थे।

8) प्रभु ने मिस्र के राजा फिराउन का हृदय कठोर कर दिया; इसलिए उसने इस्राएलियों का पीछा किया,

9) जो उसे चुनौती देते हुए भाग रहे थे। मिस्रियों ने सब घोड़ों, फिराउन के रथों, उसके घुड़सवारों और उसकी सेना के साथ इस्राएलियों का पीछा किया और बालसफोन के सामने, पी-हहीरोत के निकट समुद्र के तट पर, उनके पास पहुँच गये, जहाँ उन्होंने पड़ाव डाला था।

10) फिराउन निकट आया ही था कि इस्राएलियों ने आँखें उठा कर देखा कि मिस्री हमारा पीछा कर रहें हैं। उन पर आतंक छा गया और वे चिल्ला कर प्रभु की दुहाई देने लगे।

11) उन्होंने मूसा से कहा, ''क्या मिस्र में हम को क़बरें नहीं मिल सकती थीं, जो आप हम को मरूभूमि में मरने के लिए यहाँ ले आये है? हम को मिस्र से निकाल कर आपने हमारा कौन-सा उपकार किया?

12) क्या हमने मिस्र में रहते समय आप से नहीं कहा था कि हमें मिस्रियों की सेवा करते रहने दीजिए? मरूभूमि में मरने की अपेक्षा मिस्रियों की सेवा करना कहीं अधिक अच्छा है।''

13) मूसा ने लोगों से कहा, ''डरो मत! धीर बने रहो! और यह देखो कि किस प्रकार प्रभु आज तुम लोगों की रक्षा करेगा। जिन मिस्रियों को तुम आज देख रहे हो, तुम उन्हें फिर कभी नहीं देखोगे।

14) प्रभु ही तुम्हारी ओर से युद्ध करेगा और तुम लोगों को कुछ भी नहीं करना पड़ेगा।''

15) प्रभु ने मूसा से कहा, ''तुम मेरी दुहाई क्यों दे रहे हो? इस्राएलियों को आगे बढ़ने का आदेश दो।

16) तुम अपना डण्डा उठा कर अपना हाथ सागर के ऊपर बढ़ाओ और उसे दो भागों में बाँट दो, जिससे इस्राएली सूखे पाँव समुद्र की तह पर चल सकें।

17) मैं मिस्रियों का हृदय कठोर बनाऊँगा और वे इस्राएलियों का पीछा करेंगे। तब मैं फिराउन, उसकी सेना, उसके रथ और घुड़सवार, सब को हरा कर अपना सामर्थ्य प्रदर्शित करूँगा

18) और जब मैं फिराउन, उसकी सेना, उसके रथ और उसके घुड़सवार सब को हरा कर अपना सामर्थ्य प्रदर्शित कर चुका होऊँगा, तब मिस्री जान जायेंगे कि मैं प्रभु हूँ।''


सुसमाचार : मत्ती 12:38-42


38) उस समय कुछ शास्त्री और फ़रीसी ईसा से बोले, "गुरुवर! हम आपके द्वारा प्रस्तुत कोई चिह्न देखना चाहते हैं"।

39) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "यह दुष्ट और विधर्मी पीढ़ी एक चिह्न माँगती है, परन्तु नबी योनस के चिह्न को छोड़ कर कोई चिह्न नहीं दिया जायेगा।

40) जिस प्रकार योनस तीन दिन और तीन रात मच्छ के पेट में रहा, उसी प्रकार मानव पुत्र भी तीन दिन और तीन रात पृथ्वी के गर्भ में रहेगा।

41) न्याय के दिन निनिवे के लोग इस पीढ़ी के साथ जी उठेंगे और इसे दोषी ठहरायेंगे, क्योंकि उन्होंने योनस का उपदेश सुन कर पश्चात्ताप किया था, और देखो यहाँ वह है, जो योनस से भी महान् हैं।

42) न्याय के दिन दक्षिण की रानी इस पीढ़ी के साथ जी उठेगी और इसे दोषी ठहरायेगी; क्योंकि वह सुलेमान की प्रज्ञा सुनने के लिए पृथ्वी के सीमान्तों से आयी थी, और देखो-यहाँ वह है, जो सुलेमान से भी महान् है।


📚 मनन-चिंतन


आज के दोनों पाठों में हम एक जैसे लोगों को देखते हैं, जिनका ह्रदय ईश्वर के महान चिन्हों और चमत्कारों के प्रति बन्द है, और ईश्वर के महान कार्यों को अनदेखा कर देता है. पहले पाठ में हम देखते हैं कि जब इसरायली लोग नबी मूसा के नेतृत्व में मिस्र की दासता से बाहर निकल आये तो बाद में मिस्री राजा अपने सैनिकों और पलटन के साथ उनका पीछा करता है. जब वे उन्हें अपना पीछा करते हुए देखते हैं तो घबरा जाते हैं, और मूसा के विरुद्ध भुनभुनाने लगते हैं. अपनी दासता की ज़िन्दगी को बेहतर समझते हैं, और मूसा को कोसते हैं. वे भूल जाते हैं, बल्कि अनदेखा कर देते हैं ईश्वर के उन अनेक महान कार्यों को जिनके द्वारा ईश्वर ने उन्हें मुक्त किया था. मिस्रियों पर ऐसी विपत्तियाँ भेजी थीं कि वे भय से थर-थर कांपने लगे थे, लेकिन ये अविश्वासी लोग ईश्वर के उन महान चमत्कारों को अनदेखा कर देते हैं.

सुसमाचार में भी प्रभु येसु इस पीढ़ी के लोगों को धिक्कारते हैं जो उनसे चिन्ह माँगते हैं, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करना चाहते हैं. प्रभु येसु उन्हें नबी योनस का चिन्ह देते हैं, और उसकी प्रमाणिकता इससे साबित होती है कि जिस तरह से नबी योनस तीन दिन तक मछली के पेट में रहा था उसी तरह प्रभु येसु भी पृथ्वी के गर्भ में रहेंगे. नबी योनस पश्चाताप के सन्देश का प्रतीक थे. निनिवे के लोग पापी जीवन जी रहे थे, तब ईश्वर ने नबी योनस को उन्हें चेतवानी देने भेजा था कि यदि तुम लोग पश्चताप नहीं करोगे तो नष्ट हो जाओगे. प्रभु येसु ने भी सबसे पहले आकर पश्चाताप का सन्देश दिया (मारकुस 1:15). आइये हम अपने मन में झाँककर देखें, कहीं हम भी उस पापी पीढ़ी के समान तो नहीं?



📚 REFLECTION



We see similar people in both the readings of today, whose heart is closed to God’s mighty works and wonders, who closes their eyes from God’s presence amidst them. In the first reading of today we see the Israelites, when they were brought out of the slavery from Egypt, started to curse Moses when they saw they were chased by the Egyptians, they could not believe in the might of God and started to regret to follow Moses. They forget the miracles and mighty works that God performed when he released them from the clutches of the Egyptians. The Ten plagues that resulted in their freedom from slavery could not move their hearts, could not change them.

In the Gospel of the day also Jesus condemns the present generation of his time, who sought for a sign, who did not want to believe in Jesus. Jesus gives them the sign of prophet Jonah, and tells them that as Jonah was inside the belly of the fish for three day, similarly he will remain in the heart of the earth for three days and three nights. The people of Nineveh lived a sinful life so God sent prophet Jonah to turn them to repentance. So Jonah warned them, they will perish if they did not repent and change their way of life. Jesus also began his ministry with the message of repentance (cf Mark 1:15). Let us look within our hearts, are we like the perverse generation who did not believe in Jesus and asked for a sign?


 -Fr. Johnson B. 



Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

Sunday 18 july 2021 SIXTEENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME

SIXTEENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME



First Reading: Jeremiah 23: 1-6

1 Woe to the pastors, that destroy and tear the sheep of my pasture, saith the Lord.

2 Therefore thus saith the Lord the God of Israel to the pastors that feed my people: You have scattered my flock, and driven them away, and have not visited them: behold I will visit upon you for the evil of your doings, saith the Lord.

3 And I will gather together the remnant of my flock, out of all the lands into which I have cast them out: and I will make them return to their own fields, and they shall increase and be multiplied.

4 And I will set up pastors over them, and they shall feed them: they shall fear no more, and they shall not be dismayed: and none shall be wanting of their number, saith the Lord.

5 Behold the days come, saith the Lord, and I will raise up to David a just branch: and a king shall reign, and shall be wise, and shall execute judgement and justice in the earth.

6 In those days shall Juda be saved, and Israel shall dwell confidently: and this is the name that they shall call him: the Lord our just one.

Responsorial Psalm: Psalms 23: 1-3, 3-4, 5, 6

R. (1) The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

1 A psalm for David. The Lord ruleth me: and I shall want nothing.

2 He hath set me in a place of pasture. He hath brought me up, on the water of refreshment:

3 He hath converted my soul.

R. The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

3 He hath led me on the paths of justice, for his own name’s sake.

4 For though I should walk in the midst of the shadow of death, I will fear no evils, for thou art with me. Thy rod and thy staff, they have comforted me.

R. The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

5 Thou hast prepared a table before me against them that afflict me. Thou hast anointed my head with oil; and my chalice which inebriateth me, how goodly is it!

R. The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

6 And thy mercy will follow me all the days of my life. And that I may dwell in the house of the Lord unto length of days.

R. The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

Second Reading: Ephesians 2: 13-18

13 But now in Christ Jesus, you, who some time were afar off, are made nigh by the blood of Christ.

14 For he is our peace, who hath made both one, and breaking down the middle wall of partition, the enmities in his flesh:

15 Making void the law of commandments contained in decrees; that he might make the two in himself into one new man, making peace;

16 And might reconcile both to God in one body by the cross, killing the enmities in himself.

17 And coming, he preached peace to you that were afar off, and peace to them that were nigh.

18 For by him we have access both in one Spirit to the Father.

Alleluia: John 10: 27

R. Alleluia, alleluia.

27 My sheep hear my voice: and I know them, and they follow me.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 6: 30-34

30 And the apostles coming together unto Jesus, related to him all things that they had done and taught.

31 And he said to them: Come apart into a desert place, and rest a little. For there were many coming and going: and they had not so much as time to eat.

32 And going up into a ship, they went into a desert place apart.

33 And they saw them going away, and many knew: and they ran flocking thither on foot from all the cities, and were there before them.

34 And Jesus going out saw a great multitude: and he had compassion on them, because they were as sheep not having a shepherd, and he began to teach them many things.


Praise the lord

www.atpresenofficial.blogspot.com

इतवार, 18 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 18 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य इतवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 23:1-6


1) “धिक्कार उन चरवाहों को जो मेरे चरागाह की भेड़ों को नष्ट और तितर-बितर हो जाने देते हैं!“ यह प्रभु की वाणी है।

2) इसलिए प्रभु, इस्राएल का ईश्वर अपनी प्रजा को चराने वालों से यह कहता है, “तुम लोगों ने मेरी भेड़ों को भटकने और तितर-बितर हो जाने दिया; तुमने उनकी देखरेख नहीं की। देखो! मैं तुम लोगों को तुम्हारे अपराधों का दण्ड दूँगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

3) “इसके बाद मैं स्वयं अपने झुण्ड की बची हुई भेड़ों को उन सभी देशों से एकत्र कर लूँगा, जहाँ मैंने उन्हें बिखेर दिया है; मैं उन्हें उनके अपने मैदान वापस ले चलूँगा और वे फलेंगी-फूलेंगी।

4) मैं उनके लिए ऐसे चरवाहों को नियुक्त करूँगा, जो उन्हें सचमुच चरायेंगे। तब उन्हें न तो भय रहेगा, न आतंक और न उन में से एक का भी सर्वनाश होगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

5) प्रभु यह कहता है: “वे दिन आ रहे हैं, जब मैं दाऊद के लिए एक न्यायी वंशज उत्पन्न करूँगा। वह राजा बन कर बुद्धिमानी से शासन करेगा और अपने देश में न्याय और धार्मिकता स्थापित करेगा।

6) उसके राज्यकाल में यूदा का उद्धार होगा और इस्राएल सुरक्षित रहेगा और उसका यह नाम रखा जायेगा- प्रभु ही हमारी धार्मिकता है।“



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 2:13-18



13) आप लोग पहले दूर थे, किन्तु ईसा मसीह से संयुक्त हो कर आप अब मसीह के रक्त द्वारा निकट आ गये है;

14) क्योंकि वही हमारी शान्ति हैं। उन्होंने यहूदियों और गैर-यहूदियों को एक कर दिया है। दोनों में शत्रुता की जो दीवार थी, उसे उन्होंने गिरा दिया है।

15) और अपनी मृत्यु द्वारा विधि-निषेधों की संहिता को रद्द कर दिया। इस प्रकार उन्होंने यहूदियों तथा गैर-यहूदियों को अपने से मिला कर एक नयी मानवता की सृष्टि की और शान्ति की स्थापित की है।

16) उन्होंने क्रूस द्वारा दोनों का एक ही शरीर में ईश्वर के साथ मेल कराया और इस प्रकार शत्रुता को नष्ट कर दिया।

17) तब उन्होंने आ कर दोनों को शान्ति का सन्देश सुनाया - आप लोगों को, जो दूर थे और उन लोगों को, जो निकट थे;

18) क्योंकि उनके द्वारा हम दोनों एक ही आत्मा से प्रेरित हो कर पिता के पास पहुँच सकते हैं।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 6:30-34


30) प्रेरितो ने ईसा के पास लौट कर उन्हें बताया कि हम लोगों ने क्या-क्या किया और क्या-क्या सिखलाया है।

31) तब ईसा ने उन से कहा, ’’तुम लोग अकेले ही मेरे साथ निर्जन स्थान चले आओ और थोड़ा विश्राम कर लो’’; क्योंकि इतने लोग आया-जाया करते थे कि उन्हें भोजन करने की भी फुरसत नही रहती थी।

32) इस लिए वे नाव पर चढ़ कर अकेले ही निर्जन स्थान की ओर चल दिये।

33) उन्हें जाते देख कर बहुत-से लोग समझ गये कि वह कहाँ जा रहे हैं। वे नगर-नगर से निकल कर पैदल ही उधर दौड़ पड़े और उन से पहले ही वहाँ पहुँच गये।

34) ईसा ने नाव से उतर कर एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे और वह उन्हें बहुत-सी बातों की शिक्षा देने लगे।



📚 मनन-चिंतन


भीड़ की भीड़ प्रभु येसु के पीछे-पीछे क्यों चली आती थी? सुसमाचार में कई जगह हम पढ़ते हैं कि जहाँ भी प्रभु येसु जाते थे, लोग वहाँ उनसे भी पहले पहुँच जाते थे. चाहे प्रभु येसु अंजान जगह पर जाएँ, या सुनसान, निर्जन स्थान पर जाएँ, चाहे किसी दूर-दराज के गॉंव जाएँ, लोग उन्हें खोज ही लेते थे. कई बार तो उन्हें भीड़ से बचने के लिए नाव पर चढ़कर सुसमाचार सुनाना पड़ता था. ऐसा ही दृश्य हम आज के सुसमाचार में देखते हैं, जहाँ शिष्य लोग ख़ुशी-ख़ुशी सुसमाचार का प्रचार करने के बाद लौटे थे. प्रभु येसु चाहते थे कि वे थोड़ा सा आराम कर लें क्योंकि लोग आ रहे थे, उन्हें खाना खाने की भी फुर्सत नहीं मिल पा रही थी, इसलिए वे उन्हें एक निर्जन स्थान पर ले जाते हैं, लेकिन लोग उन्हें जाते हुए देख लेते हैं, उनसे पहले ही वहाँ पैदल पहुँच जाते हैं. प्रभु येसु को वे बिना चरवाहे की भेड़ों के समान प्रतीत होते हैं.

शुरू से ही ईश्वर और उसकी प्रजा के बीच के सम्बन्ध को अलग-अलग प्रतीकों द्वारा व्यक्त किया जाता रहा है, उन्हीं में से एक है - चरवाहा और भेड़ें. आज के पहले पाठ में हम पढ़ते हैं, कि ईश्वर ने जिन चरवाहों को अपनी भेड़ों के ऊपर नियुक्त किया उन्होंने ही भेड़ों को तितर-बितर कर दिया है, उनकी उचित देख-भाल नहीं की. कुछ ऐसा ही हम नबी एज़ेकिएल के ग्रन्थ के 34 वें अध्याय में देखते हैं. लोगों का जो सम्बन्ध ईश्वर के साथ प्रारम्भ से था वह वैसा का वैसा नहीं रहा, धीरे-धीरे लोग ईश्वर से दूर होते गये. वे सही रास्ते से भटकते चले गये, और इसके लिए कुछ हद तक वे लोग ज़िम्मेदार थे, जिन्हें ईश्वर ने लोगों को सम्भाले रखने की ज़िम्मेदारी दी. उन्होंने लोगों को ईश्वर के करीब लाने की अपेक्षा, अपने बुरे जीवन द्वारा व लोगों के शोषण द्वारा उन्हें ईश्वर से और दूर कर दिया.

प्रभु येसु के समय यह तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है, जब प्रभु येसु धर्म के उन ठेकेदारों और धार्मिक नेताओं को धिक्कारते हैं, उनकी कमियों और दोषों की ओर इंगित करते हैं. उनके जीवन के कुछ उदाहरण ऐसे हैं जिनके कारण लोग ईश्वर के पास नहीं बल्कि उनसे दूर हो चले थे, जैसे कि बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना, अपने आकर्षित करने वाले कपडे पहनना, लम्बी-लम्बी और खोखली प्रार्थनाएं करना, लोगों पर नियमों के अनावश्यक भार डालना, लोगों को गुमराह करना, नबियों की हत्या करना इत्यादि. प्रभु येसु उनकी तुलना चोर और डाकू तथा भाड़े के मजदूरों से करते हैं (योहन 10:8,12). इसीलिए प्रभु येसु स्वयं उनके लिए सच्चे और भले चरवाह बनकर आये ताकि उन्हें हरे-हरे चरागाहों में ले चलें, चोर, डाकुओं और भेडियों से उनकी रक्षा कर सकें. एक भला और सच्चा चरवाहा ही भेड़ों की सही स्थिति और उनके कष्ट जानता है.

ईश्वर ने हम सभी को अपनी ख़ुशी से अपने लिए बनाया है और हमारी आत्मा उसी ईश्वर के लिए सदा प्यासी रहती है (स्तोत्र 42:2). इसी प्यास के कारण हम जाने-अनजाने में भी ईश्वर को खोजते रहते हैं, क्योंकि ईश्वर को पाना और उसे मिलन ही हमारे जीवन का अंतिम उद्देश्य है. जो लोग इस उद्देश्य से भटक जाते हैं, इस उद्देश्य को भूल जाते हैं, वे अपने जीवन में खालीपन महसूस करते हैं. उस खालीपन को दूर करने के लिए बिना चरवाहे की भेड़ों के समान यहाँ-वहाँ भटकते हैं. खालीपन को दूर करने और शान्ति पाने के लिए नयी-नयी चीज़ें ट्राई करते हैं, संसारिकता, धन-दौलत और ऐशो-आराम में संतुष्टि पाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमारी वास्तविक और अनन्त संतुष्टि केवल ईश्वर में है, वही हमारा भला और सच्चा चरवाहा है. आइये हम पूरे ह्रदय से उसके पास जाएँ. आमेन.



📚 REFLECTION



Why is it that so many people came searching Jesus? We read in the gospels that wherever Jesus went, people reached there even before him. Whether Jesus went to known places or unknown places, deserted or secluded places or remote unknown villages, people always found their way to reach him. Many times he had to use boat to preach because of the crowd that was pressing on him. Something similar we see in the gospel today when the disciples happily returned after their mission work and they were filled with joy and excitement. Jesus wanted them to rest for a while because so many people were coming and going that they did not even have time to eat peacefully, so he takes them to a deserted place where nobody could disturb them, but people see them leaving and they reach the place even before them, walking on foot. Jesus felt pity for them and they seemed to him like sheep without shepherd.

The relationship between God and His people has been expressed through various imageries and symbols, one of such express is that of Shepherd and sheep. God is the Shepherd and the people are sheep. We see in the first reading of today, the shepherds whom God had appointed for caring His sheep, they scattered them, they did not care for them. Similar words we see in the 34th chapter of prophet Ezekiel. This relationship of people with God could not remain the same, they offended God and went away from God gradually. They went astray from the right path, and people and leaders who were given the responsibility to care for the sheep, they responsible for the downfall of the people to some extent. Instead of leading people towards God, their scandalous life became a means sending people away from God and cause for their exploitation.

This became all the more clear at the time of Jesus, when he condemns these leaders and false teachers of the religion. He points out their wrongful conduct and exploitative ways. There were many examples of their wrongful conduct that kept people away from them as well as from God. Some such examples are – they liked to be greeted in the markets, wear very royal and attractive clothes, make empty and long prayers, burn the people with unnecessary laws, misleading the people in the matters of religion and killing the prophets etc. Jesus compares them with theives and decoits who want to steal and kill, they were like hired servants who didn’t care for the sheep (John10:8,12). Therefore Jesus came down as the Good Shepherd who would take his sheep to green pastures and give them rest, protect and safeguard them from thieves and robbers. A good shepherd knows his sheep and their needs and can take care of them well.

God has created us out of His free will and for His own happiness and put a thirst in souls, so that they always thirst for God (Psalm 42:2). It is because of this thirst within us that we search and long for God, it becomes our only goal and destiny. Those who forget their destiny and goal, they feel emptiness and dryness within. They want to fill that emptiness and hence go around restlessly like sheep without shepherd. They try new things, they try to attain happiness and fulfilment through wealth, money, pleasure and luxuries, but all in vain because our true happiness lies in finding God. Only God ca become our True and Good Shepherd. Let us turn towards our Good Shepherd. Amen.



मनन-चिंतन -2


Have a break have a kit-kat. अंतराल लो kit-kat खाओ. Break हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आज के सुसमाचार में हम देखते है कि प्रेषित कार्य के बाद वापस लौटे शिष्यों को प्रभु आराम करने का निमत्रंण देते है।

फादर जैरी ओरबोस अपनी श्रमततल व्तइवे एक किताब में येसु द्वारा दिये गये इस आराम के तीन कारण बताते है। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक।

शारीरिक: शिष्यों ने अपना प्रेषित कार्य इतने जोशखरोश के साथ किया कि उनके पास आराम के बारे में सोचने तक का समय नहीं था। उन्होंने उनकी शारीरिक क्षमता की परवाह न रखते हुए काम किया। यदि इस गति के साथ वे काम करना जारी रखते तो वे शायद बीमार भी हो सकते थे। इस बात को मन में रखते हुए प्रभु उन्हें आराम करने के लिए कहते है।

मानसिक: बाइबिल में हम देखते है कि जब कुछ महिलाऐं बच्चों को आर्शीवाद के लिए प्रभु के पास लाती है तो शिष्यगण नाराज हो कर उनको दूर कर देते है। भीड बढ़ने पर उनकी आशंका होती थी। यहॉं पर हम देखते है कि वे पहले से ही थक चुके थे और ऊपर से भीड उमड पड रही थी। उनके अच्छे कार्यों को प्रभु गुस्से में डुबाना नहीं चाहते थे। भीड में शिष्य चिडचिडेपन के कारण लोगों से गुस्सा कर सकते थे। यह सब देखते हुए येसु ने उनको आराम करने भेजा।

आध्यात्मिक: आष्टा सेमिनारी में हमारा ARA (Action Reflection Action) नामक कार्यक्रम हुआ करते थे। इसका उद्देश्य यह था कि लोगों के बीच सामाजिक जागरूकता के कार्य करने के बाद मनन चिंतन करके और भी अच्छी तरीके से उसको करना। यही योजना प्रभु के मन में थी। उन्होंने अपने शिष्यों को आराम करने के लिए इसीलिए कहा कि वे अपने कार्यों पर मनन-चिन्तन करें और यह समझे की प्रभु की कृपा कितनी बडी मात्रा में उनके कार्यों पर बनी रही। यह आराम उनके आगे के मिशन कार्यों के लिए जोश और ऊर्जा प्रदान कर सकता था।

हम सब अपनी गाडियों की सर्विसिंग कराते है इस तरह हम गाडी को break या विश्राम देते है। इंजन का तेल (Engine oil) बदलने से तथा पहियों को तेल से रमाने से गाडी की क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रकार गाडी के समान हमें भी विश्राम की जरूरत है लेकिन ज्यादातर लोग यह विश्राम लेना नहीं चाहते हैं।

पुराने जमाने में कपडे धोने और बर्तन मांझने में बहुत समय लगता था। कुॅए और हैंडपंप से पानी निकालते थे, चूल्हा लकडी से जलाते थे। यह सब करने के लिए भी बहुत समय लगता था लेकिन फिर भी लोगों के पास आराम करने के लिए, break लेने के लिए पर्याप्त समय था। आजकल कपडे और बर्तन धोने के लिए मशीन है, पानी नल खोलने पर उपलब्ध है, गैस और बिजली से चूल्हे जलते है। इस मशीनों के कारण समय की काफी बचत होती है। फिर भी आज break लेने के लिए किसी के पास समय नहीं है। सब व्यस्त रहते है।

वैसे तो प्राकृतिक तौर पर तो हम सब break लेते है। सुबह से tea break, lunch break शाम को लंबे आराम के लिए सोने का break लेते है। break लेना भूल जाते है या लेना नहीं चाहते है उनके लिए भी प्रकृति का नियम है - बीमारी। किसी के बीमार होने से उनको तीन-चार दिन लगातार break मिलता है।

हम सबको break लेने की आदत अपनाना चाहिए। Break लेने से हम अपने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता बडा सकते है। साथ साथ और भी ऊर्जा के साथ प्रभु के लिए काम कर सकते है।


फादर मेलविन चुल्लिकल



Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!