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सोमवार, 05 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्त

 

सोमवार, 05 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह




पहला पाठ : उत्पत्ति 28:10-22a



10) याकूब ने बएर-शेबा छोड़ कर हारान के लिए प्रस्थान किया।

11) वह किसी तीर्थ-स्थान जा पहुँचा और वहाँ रात भर ठहर गया, क्योंकि सूर्यास्त हो गया था। उसने वहाँ पड़े हुए पत्थरों में से एक को उठा लिया और उसे तकिया बना कर वहाँ सो गया।

12) उसने यह स्वप्न देखा : एक सीढ़ी धरती पर खड़ी थी; उसका सिरा स्वर्ग तक पहुँचता था और ईश्वर के दूत उस पर उतरते-चढ़ते थे।

13) ईश्वर याकूब के पास खड़ा हो गया और बोला, ''मैं प्रभु, तुम्हारे पिता इब्राहीम का ईश्वर तथा इसहाक का ईश्वर हूँ। मैं तुम्हें और तुम्हारे वंशजों को यह धरती दे दूँगा, जिस पर तुम लेट रहे हो।

14) तुम्हारे वंशज भूमि के रजकणों की तरह असंख्य हो जायेंगे और पश्चिम तथा पूर्व, उत्तर तथा दक्षिण में फैल जायेंगे। तुम्हारे और तुम्हारे वंश द्वारा पृथ्वी भर के राष्ट्र आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

15) मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। तुम जहाँ कहीं भी जाओगे, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा और तुम्हें इस प्रदेश वापस ले जाऊँगा, क्योंकि मैं तुम्हें तब तक नहीं छोडूँगा, जब तक तुम से जो कहा, उसे पूरा न कर दूँ।''

16) याकूब नींद से जाग उठा और बोला, ''निश्चय ही प्रभु इस स्थान पर विद्यमान है और यह मुझे मालूम नहीं था''।

17) वह भयभीत हो गया और बोला, ''यह स्थान कितना श्रद्धाजनक है! यह तो ईश्वर का निवास है, यह स्वर्ग का द्वार है!''

18) उसने बहुत सबेरे उठ कर सिरहाने का वह पत्थर उठाया, उसे स्मारक के रूप में खड़ा किया और उसके सिरे पर तेल उँड़ेल दिया।

19) उसने स्थान का नाम बेतेल रखा। वह नगर पहले लूज कहलाता था।

20) याकूब ने यह प्रतिज्ञा की, ''यदि ईश्वर मेरे साथ रहेगा और मेरी इस यात्रा में मेरी रक्षा करेगा, यदि वह मुझे खाने के लिए भोजन और पहनने के लिए कपड़े देगा और

21) यदि मैं सकुशल अपने पिता के घर लौटूँगा, तो प्रभु ही मेरा ईश्वर होगा और जो पत्थर मैंने स्मारक के रूप में खड़ा किया, वह ईश्वर का मन्दिर होगा।

22) जो कुछ तू मुझे प्रदान करेगा, मैं उसका दशमांश तुझे दिया करूँगा।''



सुसमाचार : मत्ती 9:18-23




18) ईसा उन से ये बातें कह ही रहे थे कि एक अधिकारी आया। उसने यह कहते हुए उन्हें दण्डवत् किया, ’’मेरी बेटी अभी-अभी मर गयी है। आइए, उस पर हाथ रखिए और वह जी जायेगी।’’

19) ईसा उठ कर अपने शिष्यों के साथ उसके पीछे हो लिये।

20) उस समय एक स्त्री ने, जो बारह बरस से रक्तस्राव से पीडि़त थी, पीछे से आ कर ईसा के कपडे़ का पल्ला छू लिया;

21) क्योंकि वह मन-ही-मन कहती थी- यदि मैं उनका कपड़ा भर छूने पाऊँ, तो चंगी हो जाऊॅंगी।

22) ईसा ने मुड़ कर उसे देख लिया और कहा ’’बेटी, ढारस रखो। तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें चंगा कर दिया है।’’ और वह स्त्री उसी क्षण चंगी हो गई।

23) ईसा ने अधिकारी के घर पहुँच कर बाँसुरी बजाने वालों और लोगों को रोते-पीटते देखा और

24) कहा, ’’हट जाओ। लड़की नहीं मरी है, सो रही है।’’ इस पर वे उनकी हॅंसी उड़ाते रहे।

25) भीड़ बाहर कर दी गयी। तब ईसा ने भीतर जा कर लड़की का हाथ पकड़ा और वह उठ खड़ी हुई।

26) इस बात की चरचा उस इलाक़े के कोने-कोने में फैल गयी।


📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में एक चमत्कार के अन्दर एक दूसरा चमत्कार बुना हुआ है. एक अधिकारी की 12 बरस की बेटी को जिलाने का चमत्कार और 12 बरस से रक्तस्राव से पीड़ित स्त्री को चंगाई का चमत्कार एक दूसरे में बुने हुए हैं. ये दोनों घटनाएँ पहले तीनों सुसमाचारों में पाई जाती हैं, और सन्त मरकुस और लूकस के सुसमाचार में तो अधिकारी का नाम भी दिया हुआ है - जैरुस. प्रभु येसु लोगों के जीवन में जो भी चमत्कार करते थे, उन सब में एक बहुत ही सामान्य और ज़रूरी एक बात होती थी, वह थी चमत्कार पाने वाले का विश्वास. प्रभु येसु किसी भी चमत्कार का श्रेय उस व्यक्ति के विश्वास को देते हैं, जैसा व्यक्ति का विश्वास वैसा ही प्रभु येसु का प्रत्युत्तर.

बिना विश्वास के प्रभु येसु कोई चमत्कार नहीं करना चाहते थे. जब वे अपने गृह नगर आये तो लोगों के अविश्वास के कारण वहाँ उन्होंने बहुत कम चमत्कार दिखाए.(मत्ती 13:57-58). आज के सुसमाचार के दोनों चमत्कारों में उन दोनों व्यक्तियों, सभागृह का अधिकारी और रक्तस्राव पीडिता, का विश्वास अनुकरणीय है. वह एक अधिकारी होते हुए भी प्रभु येसु के सामने घुटने टेककर मिन्नत करता है. यह उसके विश्वास का प्रकटीकरण है. उसे मालूम है, प्रभु येसु ईश्वर हैं. हम जितना ईश्वर में विश्वास करेंगे उतना ही उनका सम्मान करेंगे, और जितना हम सम्मान करेंगे उतना ही ईश्वर हमको आशीष देंगे. यही प्रभु येसु का हमसे वादा है. आईये हम प्रभु से कृपा माँगें कि हमारा विश्वास प्रभु में और गहरा हो, कि हम अपने जीवन में ईश्वर के बहुत से चमत्कार देखें. आमेन.



📚 REFLECTION



In the gospel today, we see two miracles, one nested into the other. Both miracles, one of raising the 12 year old daughter of the ruler of synagogue and other the woman with discharge of blood for 12 years. These both miracles are found in all three synoptic gospels, out of which two gospels (Mark and Luke) give even the name of the ruler as Jairus. Whenever Jesus performed a miracle for the people, there was a very common factor in each miracle, and that was the faith of the person concerned. Jesus gave the credit of the miracle to the faith of the person, very often saying, ‘your faith has healed you.’ He always appreciated the deep faith of the person.

Jesus wouldn’t want to perform a miracle in the absence of faith. Where there is no faith, there is no miracle. When he came to his own place, people could not believe in him, hence it is written due to lack of faith among the people, he did not perform many miracles there. (cf Matthew 13:57-58). The faith of the ruler and the woman in need of healing is worth emulating. He was a ruler, an officer, yet he falls on his knees, pleading Jesus. This gesture was the expression of his faith in Jesus. He believed, Jesus was son of God. The more faith we have in God, the more we will honour Him, the more we will honour him, the more he will bless us, that is the assurance given by Jesus himself. Let us ask the Lord to strengthen and deepen our faith in Him, so that we may witness more and more miracles in our life.



 -Br Biniush Topno



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FOURTEENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME, Independence Day

FOURTEENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME, Independence Day




First Reading: Ezekiel 2: 2-5

2 And the spirit entered into me after that he spoke to me, and he set me upon my feet: and I heard him speaking to me,

3 And saying: Son of man, I send thee to the children of Israel, to a rebellious people, that hath revolted from me, they, and their fathers, have transgressed my covenant even unto this day.

4 And they to whom I send thee are children of a hard face, and of an obstinate heart: and thou shalt say to them: Thus saith the Lord God:

5 If so be they at least will hear, and if so be they will forbear, for they are a provoking house: and they shall know that there hath been a prophet in the midst of them.

Responsorial Psalm: Psalms 123: 1-2, 2, 3-4

R. (2cd) Our eyes are fixed on the Lord, pleading for his mercy.

1 To thee have I lifted up my eyes, who dwellest in heaven.

2 Behold as the eyes of the servants are on the hands of their masters.

R. Our eyes are fixed on the Lord, pleading for his mercy.

2 As the eyes of the handmaid are on the hands of her mistress: so are our eyes unto the Lord our God, until he have mercy on us.

R. Our eyes are fixed on the Lord, pleading for his mercy.

3 Have mercy on us, O Lord, have mercy on us: for we are greatly filled with contempt.

4 For our soul is greatly filled: we are a reproach to the rich, and contempt to the proud.

R. Our eyes are fixed on the Lord, pleading for his mercy.

Second Reading: Second Corinthians 12: 7-10

7 And lest the greatness of the revelations should exalt me, there was given me a sting of my flesh, an angel of Satan, to buffet me.

8 For which thing thrice I besought the Lord, that it might depart from me.

9 And he said to me: My grace is sufficient for thee; for power is made perfect in infirmity. Gladly therefore will I glory in my infirmities, that the power of Christ may dwell in me.

10 For which cause I please myself in my infirmities, in reproaches, in necessities, in persecutions, in distresses, for Christ. For when I am weak, then am I powerful.

Alleluia: Luke 4: 18

R. Alleluia, alleluia.

18 The Spirit of the Lord is upon me, for he sent me to bring glad tidings to the poor.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 6: 1-6

1 And going out from thence, he went into his own country; and his disciples followed him.

2 And when the sabbath was come, he began to teach in the synagogue: and many hearing him were in admiration at his doctrine, saying: How came this man by all these things? and what wisdom is this that is given to him, and such mighty works as are wrought by his hands?

3 Is not this the carpenter, the son of Mary, the brother of James, and Joseph, and Jude, and Simon? are not also his sisters here with us? And they were scandalized in regard of him.

4 And Jesus said to them: A prophet is not without honor, but in his own country, and in his own house, and among his own kindred.

5 And he could not do any miracles there, only that he cured a few that were sick, laying his hands upon them.

6 And he wondered because of their unbelief, and he went through the villages round about teaching.

रविवार, 04 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य रविवार

 

रविवार, 04 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य रविवार

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पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 2:2-5



2) आत्मा ने मुझ में प्रवेश कर मुझे पैरों के पर खड़ा कर दिया और मैंने उसे मुझ से यह कहते सुना।

3) उसने मुझ से कहा, “मानवपुत्र! मैं तुम्हें इस्राएलियों के पास भेज रहा हूँ, उस विद्रेही राष्ट्र के पास, जो मेरे विरुद्ध में उठ खड़ा है। वे और उनके पुरखे आज तक मेरे विरुद्ध विद्रोह करते चले आ रहे हैं।

4) उनके पुत्र हठी हैं और उनका हृदय कठोर है। मैं तुम्हें उनके पास यह कहने भेज रहा हूँः ’प्रभु-ईश्वर यह कहता है’।

5) चाहे वे सुनें या सुनने से इनकार करें, क्योंकि वे विद्रोही प्रजा हैं- किन्तु वे जान जायेंगे कि उनके बीच एक नबी प्रकट हुआ है।



दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 12:7-10



7) मुझ पर बहुत-सी असाधारण बातों का रहस्य प्रकट किया गया है। मैं इस पर घमण्ड न करूँ, इसलिए मेरे शरीर में एक काँटा चुभा दिया गया है। मुझे शैतान का दूत मिला है, ताकि वह मुझे घूंसे मारता रहे और मैं घमण्ड न करूँ।

8) मैंने तीन बार प्रभु से निवेदन किया कि यह मुझ से दूर हो;

9) किन्तु प्रभु ने कहा-मेरी कृपा तुम्हारे लिए पर्याप्त है, क्योंकि हमारी दुर्बलता में मेरा सामर्थ्य पूर्ण रूप से प्रकट होता है।

10) इसलिए मैं बड़ी खुशी से अपनी दुर्बलताओं पर गौरव करूँगा, जिससे मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया रहे। मैं मसीह के कारण अपनी दुर्बलताओं पर, अपमानों, कष्टों, अत्याचारों और संकटों पर गर्व करता हूँ; क्योंकि मैं जब दुर्बल हूँ, तभी बलवान् हूँ।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 6:1-6



1) वहाँ से विदा हो कर ईसा अपने शिष्यों के साथ अपने नगर आये।

2) जब विश्राम-दिवस आया, तो वे सभागृह में शिक्षा देने लगे। बहुत-से लोग सुन रहे थे और अचम्भे में पड़ कर कहते थे, ’’यह सब इसे कहाँ से मिला? यह कौन-सा ज्ञान है, जो इसे दिया गया है? यह जो महान् चमत्कार दिखाता है, वे क्या हैं?

3) क्या यह वही बढ़ई नहीं है- मरियम का बेटा, याकूब, यूसुफ़, यूदस और सिमोन का भाई? क्या इसकी बहनें हमारे ही बीच नहीं रहती?’’ और वे ईसा में विश्वास नहीं कर सके।

4) ईसा ने उन से कहा, ’’अपने नगर, अपने कुटुम्ब और अपने घर में नबी का आदर नहीं होता’।

5) वे वहाँ कोई चमत्कार नहीं कर सके। उन्होंने केवल थोड़े-से रोगियों पर हाथ रख कर उन्हें अच्छा किया।

6) उन लोगों के अविश्वास पर ईसा को बड़ा आश्चर्य हुआ।




-Br. Biniush Topno


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प्रेरित संत थॉमस का पर्व जुलाई 3

 


जुलाई 03

प्रेरित संत थॉमस

कलीसिया 3 जुलाई को भारत के प्रेरित संत थॉमस का पर्व मनाती है। एक प्रेरित के रूप में, थॉमस प्रभु का अनुसरण करने के लिए समर्पित थे और यहां तक कि उनके साथ मरना भी चाहते थे। फिर भी इस दृढ़ संकल्प के बावजूद, जब येसु ने अपने क्रूसमरण का सामना किया तो थॉमस न केवल येसु के साथ खड़े होने के लिए कमजोर साबित हुए, बल्कि उन्होंने प्रभु के पुनरुत्थान पर भी संदेह किया जब उन्हें अन्य प्रेरितों द्वारा इसके बारे में बताया गया। पुनर्जीवित मसीह का सामना करने पर उनका संदेह विश्वास की सच्ची अभिव्यक्ति में बदल गया और उन्होंने कहा, ‘‘हे मेरे प्रभु, हे मेरे ईश्वर!‘‘। परंपरा कहती है कि पेंतेकोस्त के बाद प्रेरितों के फैलाव पर इस संत को पार्थियन, मेदेस और फारसियों को सुसमाचार प्रचार करने के लिए भेजा गया था। इसके अलावा यह भी कि एक व्यापारी द्वारा उन्हें गुलामी में ले लिया गया, मुक्त कर दिया गया, और उन्होंने एक विस्तृत क्षेत्र में नई कलीसिया को स्थापित किया। उन्होंने कई पल्लीयाँ बनाई और रास्ते में कई गिरजाघर बनाए। एक पुरानी परंपरा कहती है कि संत थॉमस ने येसु के जन्म पर भेन्ट करने आए तीन ज्योतिषियों को ईसाई धर्म में बपतिस्मा दिया। वे अंततः सन 52 में भारत पहुंचे, येसु के विश्वास को मलाबार तट पर ले गए, जो अभी भी एक बड़ी मूल आबादी का दावा करता है और स्वयं को ‘‘संत थॉमस के ईसाई‘‘ कहते हैं। उनका प्रतीक निर्माणकर्त्ता का वर्ग है; कई कहानियां हैं जो इसे समझाती हैं। उन्होंने भारत में राजा गुदुफारा के लिए एक महल बनवाया और भारत में पहला गिरजाघर भी अपने हाथों से बनवाया। उन्होंने एक भारतीय राजा के लिए एक महल बनाने की पेशकश की जो हमेशा के लिए रहेगा; राजा ने उन्हें धन दिया, जिसे थॉमस ने फौरन कंगालों को दे दिया; उन्होंने समझाया कि वह जो महल बना रहा था वह धरती पर नहीं, स्वर्ग में था। संत थॉमस शिल्पकार और निर्माणकर्त्ताओं के संरक्षक हैं। परंपरा के अनुसार, संत थॉमस की मृत्यु सन 72 में भारत के मायलापुर में एक पहाड़ी पर प्रार्थना के दौरान भाले से प्रहार होने के बाद हुई थी और उन्हें उनकी मृत्यु के स्थल के पास ही दफनाया गया था। उनकी मृत्यु के बाद, उनके कुछ अवशेषों को एडेसा ले जाया गया, जबकि बाकी को भारत में ही रखा गया। वे अभी भी चेन्नई, मायलापुर, भारत में सान थोम बेसिलिका के भीतर पाए जा सकते हैं। चित्रों में, संत थॉमस को आम तौर पर एक युवा व्यक्ति के रूप में एक कागज का मुट्ठा पकड़े हुए, या एक युवा वयस्क के रूप में पुनर्जीवित मसीह के घावों को छूने के रूप में चित्रित किया जाता है।

संत थॉमस का कई ग्रंथों में उल्लेख किया गया था, जिनमें “द पासिंग ऑफ मैरी” नामक एक दस्तावेज भी शामिल है, जो दावा करता है कि तब-प्रेरित थॉमस मरियम के स्वर्ग में उठाए जाने की घटना को देखने वाले एकमात्र व्यक्ति थे, जबकि अन्य प्रेरितों को उनकी मृत्यु देखने के लिए यरूशलेम पहुँचाया गया था। अन्य प्रेरित जब मरियम के साथ थे, थॉमस को उनके पहले दफन होने तक भारत में ही छोड़ दिया गया था। फिर जब उन्हें मरियम की कब्र पर पहुँचाया गया तब उन्होंने उनके शरीर को स्वर्ग में उठाए जाते देखा था, जब उनका कमरबंद पीछे छूट गया था। कहानी के संस्करणों में, अन्य प्रेरितों ने थॉमस के शब्दों पर संदेह किया जब तक कि मरियम की कब्र को उनके छूटे गए कमरबंद के साथ खाली नहीं पाया गया। संत थॉमस और कमरबंद को अक्सर मध्ययुगीन और प्रारंभिक पुनर्जागरण कला में चित्रित किया गया था।




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शनिवार, 03 जुलाई, 2021 प्रेरित संत थॉमस

 

शनिवार, 03 जुलाई, 2021

प्रेरित संत थॉमस



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 10:24-35



24) दूसरे दिन वह उनके साथ चल दिया और योप्पे के कुछ भाई भी उनके साथ हो लिये। वह अगले दिन कैसरिया पहुँचा। करनेलियुुस अपने संबंधियों और घनिष्ठ मित्रों को बुला कर उन लोगों की प्रतीक्षा कर रहा था।

25) जब पेत्रुस उनके यहाँ आया, तो करनेलियुस उस से मिला और उसने पेत्रुस के चरणों पर गिर कर उसे प्रणाम किया।

26) किंतु पेत्रुस ने उसे यह कहते हुए उठाया, ’’खड़े हो जाइए, मैं भी तो मनुष्य हूँ’’

27) और उसके साथ बातचीत करते हुए घर में प्रवेश किया। वहाँ बहुत-से लोगों को एकत्र देखकर

28) पेत्रुस ने उन से यह कहा, ’’आप जानते है कि गैर-यहूदी से संपर्क रखना या उसके घर में प्रवेश करना यहूदी के लिए सख्त मना है; किंतु ईश्वर ने मुझ पर यह प्रकट किया हैं कि किसी भी मनुष्य को अशुद्ध अथवा अपवित्र नहीं कहना चाहिए।

29) इसलिए आपके बुलाने पर मैं बेखटके यहाँ आया हूँ। अब मैं पूछना चाहता हूँ कि आपने मुझे क्यों बुलाया?’’

30) करनेलियुस ने उत्तर दिया, ’’चार दिन पहले इसी समय मैं अपने घर में सन्ध्या की प्रार्थना कर रहा था कि उजले वस्त्र पहने एक पुरुष मेरे सामने आ खड़ा हुआ।

31) उसने यह कहा, ’करनेलियुस! आपकी प्रार्थनाएँ सुनी गयी हैं और ईश्वर ने आपके भिक्षा-दानों को याद किया।

32) आप आदमियों को योप्पे भेजिए और सिमोन को, जो पेत्रुस कहलाते हैं, बुलाइए। वह चर्मकार सिमोन के यहाँ, समुद्र के किनारे, ठहरे हुए हैं।

33) मैंने आप को तुरंत बुला भेजा और आपने पधारने की कृपा की हैं। ईश्वर ने आप को जो-जो आदेश दिये हैं, उन्हें सुनने के लिए हम सब यहाँ आपके सामने उपस्थित हैं।’’

34) पेत्रुस ने कहा, ’’मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

35) मनुष्य किसी भी राष्ट्र का क्यों न हो, यदि वह ईश्वर पर श्रद्धा रख कर धर्माचरण करता है, तो वह ईश्वर का कृपापात्र बन जाता हैं।



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 2:19-22



19) आप लोग अब परेदशी या प्रवासी नहीं रहे, बल्कि सन्तों के सहनागरिक तथा ईश्वर के घराने के सदस्य बन गये हैं।

20) आप लोगों का निर्माण भवन के रूप में हुआ है, जो प्रेरितों तथा नबियों की नींव पर खड़ा है और जिसका कोने का पत्थर स्वयं ईसा मसीह हैं।

21) उन्हीं के द्वारा समस्त भवन संघटित हो कर प्रभु के लिए पवित्र मन्दिर का रूप धारण कर रहा है।

22) उन्हीं के द्वारा आप लोग भी इस भवन में जोड़े जाते हैं, जिससे आप ईश्वर के लिए एक आध्यात्मिक निवास बनें।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 20:24-29



24) ईसा के आने के समय बारहों में से एक थोमस जो यमल कहलाता था, उनके साथ नहीं था।

25) दूसरे शिष्यों ने उस से कहा, ’’हमने प्रभु को देखा है’’। उसने उत्तर दिया, ’’जब तक मैं उनके हाथों में कीलों का निशान न देख लूँ, कीलों की जगह पर अपनी उँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा।

26) आठ दिन बाद उनके शिष्य फिर घर के भीतर थे और थोमस उनके साथ था। द्वार बन्द होने पर भी ईसा उनके बीच आ कर खडे हो गये और बोले, ’’तुम्हें शांति मिले!’’

27) तब उन्होने थोमस से कहा, ’’अपनी उँगली यहाँ रखो। देखो- ये मेरे हाथ हैं। अपना हाथ बढ़ाकर मेरी बगल में डालो और अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो।’’

28 थोमस ने उत्तर दिया, ’’मेरे प्रभु! मेरे ईश्वर!’’

29) ईसा ने उस से कहा, ’’क्या तुम इसलिये विश्वास करते हो कि तुमने मुझे देखा है? धन्य हैं वे जो बिना देखे ही विश्वास करते हैं।’’



📚 मनन-चिंतन



आज माता कलीसिया प्रेरित सन्त थॉमस का पर्व मनाती है, लेकिन हमारे देश की कलीसिया के लिए यह बहुत ही खास पर्व है, क्योंकि भारत में प्रभु येसु का सुसमाचार सबसे पहले सन्त थॉमस ही पहली सदी में लेकर आये थे. केरल राज्य में इस बात के प्रमाण हैं. लेकिन जब हम आज के सुसमाचार को पढ़ते हैं तो हमें सन्त थॉमस की अलग ही छवि मिलती है. कुछ लोग सन्त थॉमस को ठीक से समझ नहीं पाते और उन्हें शंकी थॉमस (शक करने वाला सन्त) कहते हैं, क्योंकि जब प्रभु येसु अपने पुनुरुत्थान के बाद सन्त थॉमस की अनुपस्थिति में दूसरे शिष्यों को दिखाई दिये तो सन्त थॉमस को यकीन नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि "जब तक मैं हाथों में कीलों का निशान न देख लूँ, कीलों की जगह पर अपनी ऊँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा" (योहन 20:25). उनका इस तरह से कहना स्वाभाविक ही था.

यहूदी लोग पुनुरुत्थान में विश्वास तो करते थे, लेकिन प्रभु येसु से पहले किसी का भी पुनुरुत्थान नहीं हुआ था, अर्थात् प्रभु येसु के पुनुरुत्थान की यह घटना विस्मयकारी और बहुत अजीब थी. शुरू में दूसरे शिष्यों को भी विश्वास नहीं हुआ था. सन्त थॉमस अपने विश्वास को समझना चाहते थे. विश्वास को समझना और समझकर विश्वास करना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. विश्वास के बिना समझदारी व्यर्थ है और बिना समझे विश्वास करना अन्धविश्वास है.

जब उन्होंने अपने विश्वास को जाँचा-परखा तब उनका विश्वास इतना मजबूत हो गया कि उन्होंने अपने विश्वास का सबसे बड़ा साक्ष्य दिया. सबसे पहले उन्होंने प्रभु येसु को प्रभु और ईश्वर कहकर पुकारा. उनके विश्वास की वह घोषणा हमारे लिए आदर्श घोषणा बन गई और हमारी मुक्ति का कारण भी. तभी तो सन्त पौलुस कहते हैं, “क्योंकि यदि आप लोग मुख से स्वीकार करते हैं कि ईसा प्रभु हैं और ह्रदय से विश्वास करते हैं कि ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया है, तो आपको मुक्ति प्राप्त होगी.” (रोमियों 10:9). सन्त थॉमस हमारे लिए इसी का प्रमाण और देते हैं. उनका यह कहना "मेरे प्रभु और मेरे ईश्वर" प्रभु येसु के ईश्वर और प्रभु होने की घोषणा है और प्रभु येसु के पुनुरुत्थान में विश्वास का साक्ष्य है. क्या हमारा विश्वास मजबूत है, क्या हम निडर होकर प्रभु येसु को कह सकते हैं, “मेरे प्रभु मेरे ईश्वर?” आमेन.



📚 REFLECTION




Today mother Church celebrates the feast of St. Thomas, the apostle to India, therefore this feast is more important to the Church of India then elsewhere. It was St. Thomas who first brought the Gospel to our country in the 1st century, it was he who first introduced Jesus to our land. There are historical evidences to this in Kerala and other southern states. But today’s Gospel passage gives us a different picture of this great apostle. Some people misunderstood St. Thomas and called him ‘doubting’ Thomas, because when Jesus appeared to his disciples and Thomas was not there, so when other disciples told him about the appearance of the Lord, he could not believe it, and he said, “Unless I see the mark of the nails in his hands, and put my finger in the mark of the nails and my hand in his side, I will not believe.” (John 20:25b). This was his natural response as would be for any normal person.

Jews though believed in the resurrection, the generation of Jesus’ time had not seen anybody’s resurrection like Jesus. This was perhaps the most unique and extraordinary event. Even other disciples could not believe initially. St. Thomas wanted to understand his faith. Reasoning and faith are complimentary to each other. Reasoning without faith is meaningless and faith without reasoning becomes superstition.

When he understood hi faith, he became a great disciple that gave greatest witness about the divinity of Jesus. He was the first one to call Jesus as God, though others had called him Lord and Master. This is one of the greatest confession of faith after the death of Jesus. The confession of St. Thomas became ideal confession worth emulating. That's why St. Paul says, “because if you confess with your lips that Jesus is Lord and believe in your heart that God raised him from the dead, you will be saved.” (Rom 10:9). St. Thomas testifies to this statement. His confession of saying “My Lord and my God” is proclamation of Jesus being Lord and God and this also is expression of his faith in the resurrection of Jesus. Is our faith strong enough? Can we also make a bold confession of our faith with St. Thomas, saying “My Lord and my God.?” Amen.



 -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 02 जुलाई, 2021 वर्ष का तेरहवाँ सप्ताह

 

शुक्रवार, 02 जुलाई, 2021

वर्ष का तेरहवाँ सप्ताह



पहला पाठ : उत्पत्ति 23:1-4, 19; 24:1-8, 62-67



1) सारा एक सौ सत्ताईस वर्ष की उमर तक जीती रही

2) और कानान के किर्यत-अरबा, अर्थात् हेब्रोन में उसका देहान्त हो गया। इब्राहीम ने उसके लिए मातम मनाया और विलाप किया।

3) इसके बाद वह उठ खड़ा हुआ और मृतक को छोड़ कर हित्तियों से बोला,

4) ''मैं आपके यहाँ परदेशी और प्रवासी हूँ। मुझे मक़बरे के लिए थोड़ी-सी जमीन दीजिए, जिससे मैं उचित रीति से अपनी मृत पत्नी को दफ़ना सकूँ।''

19) इसके बाद इब्राहीम ने कनान देश के मामरे, अर्थात् हेब्रोन के पूर्व में, मकपेला के खेत की उस गुफा में अपनी पत्नी सारा को दफ़नाया।

1) उस समय तक इब्राहीम बहुत बूढ़ा हो गया था और प्रभु ने उसे उसके सब कार्यों में आशीर्वाद दिया था।

2) इब्राहीम ने अपने सब से पुराने नौकर से, जो उसकी समस्त सम्पत्ति का प्रबन्ध करता था, कहा, ''अपना हाथ मेरी जाँघ के नीचे रखो

3) और आकाश तथा पृथ्वी के ईश्वर की शपथ ले कर मुझे वचन दो कि जिन कनानियों के बीच मैं रहता हूँ, उनकी कन्याओं में से किसी को भी मेरे पुत्र की पत्नी नहीं बनाओगे,

4) बल्कि मेरे देश और मेरे सम्बन्धियों के पास जाओगे और वहाँ मेरे पुत्र इसहाक के लिए पत्नी चुनोगे।''

5) नौकर ने कहा, ''हो सकता है कि वहाँ कोई ऐसी स्त्री नहीं मिले, जो मेरे साथ यह देश आना चाहती हो। तो, क्या मैं आपके पुत्र को उस देश ले चलूँ, जिसे आपने छोड़ दिया है?''

6) इब्राहीम ने उत्तर दिया, ''तुम मेरे पुत्र को वहाँ कदापि नहीं ले जाना।

7) प्रभु, आकाश और पृथ्वी के ईश्वर ने मुझे मेरे पिता के घर और मेरे कुटुम्ब के देश से निकाला और शपथ ले कर मुझ से कहा कि वह यह देश मेरे वंशजों को प्रदान करेगा। वही प्रभु तुम्हारे साथ अपना दूत भेजेगा, जिससे तुम वहाँ से मेरे पुत्र के लिए पत्नी ला सको।

8) यदि कोई स्त्री तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार न हो तो तुम अपनी इस शपथ से मुक्त होगे, किन्तु मेरे पुत्र को वहाँ कदापि नहीं ले जाना।''

62) इसहाक लहय-रोई नामक कुएँ से लौटा था, क्योंकि उस समय वह नेगेब प्रदेश में रहता था।

63) इसहाक, सन्ध्या समय, खेत में टहलने गया और उसने आँखें उठा कर ऊँटों को आते देखा।

64) रिबेका ने भी आँखें उठा कर इसहाक को देखा।

65) उसने ऊँट से उतरकर सेवक से कहा, ''जो मनुष्य खेत में हमारी और आ रहा है, वह कौन है?'' सेवक ने उत्तर दिया, ''यह मेरे स्वामी है।'' इस पर उसने पल्ले से अपना सिर ढक लिया।

66) सेवक ने इसहाक को बताया कि उसने क्या-क्या किया है।

67) इसहाक रिबेका को अपनी माता सारा के तम्बू ले आया। उसने उसके साथ विवाह किया और वह उसकी पत्नी बन गयी। इसहाक रिबेका को प्यार करता था और उसे अपनी माता सारा के देहान्त के बाद सान्त्वना मिली।



सुसमाचार : मत्ती 9:9-13



9) ईसा वहाँ से आगे बढ़े। उन्होंने मत्ती नामक व्यक्ति को चुंगी-घर में बैठा हुआ देखा और उस से कहा, ’’मेरे पीछे चले आओ’’, और वह उठकर उनके पीछे हो लिया।

10) एक दिन ईसा अपने शिष्यों के साथ मत्ती के घर भोजन पर बैठे और बहुत-से नाकेदार और पापी आ कर उनके साथ भोजन करने लगे।

11) यह देखकर फरीसियों ने उनके शिष्यों से कहा, ’’तुम्हारे गुरु नाकेदारों और पापियों के साथ क्यों भोजन करते हैं?’’

12) ईसा ने यह सुन कर उन से कहा, ’’नीरोगों को नहीं, रोगियों को वैद्य की ज़रूरत होती है।

13) जा कर सीख लो कि इसका क्या अर्थ है- मैं बलिदान नहीं, बल्कि दया चाहता हूँ। मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को बुलाने आया हूँ।’’



📚 मनन-चिंतन



आज के वचनों में प्रभु हमको आश्वासन देते हैं कि वे धर्मियों को नहीं पापियों बुलाने आये हैं. इसका उदाहरण भी हम आज के सुसमाचार के मुख्य पात्र मत्ती अर्थात् लेवी के जीवन में देखते हैं. अगर इस दुनिया में पाप नहीं होता और पापी नहीं होते तो शायद प्रभु येसु को स्वर्ग से उतरकर आने की ज़रूरत नहीं पड़ती, उन्हें क्रूस पर कष्टकारी मृत्यु की पीड़ा से नहीं गुजरना पड़ता. आखिर ऐसा क्यों है कि प्रभु धर्मियों की अपेक्षा पापियों को अधिक प्यार करते हैं? इसे समझने के लिए हमें प्रभु के स्वाभाव को समझना होगा, उनके स्वभाव को समझना होगा. प्रभु दयासागर हैं, अनुकम्पा से परिपूर्ण हैं.

अगर किसी को दया या अनुकम्पा की ज़रूरत है तो वह है पापी मनुष्य. अगर कोई डॉक्टर है तो उसका डॉक्टर होना तभी सार्थक है जब वह बीमारों को ठीक करे. हमारी पाप की स्थिति सदा के लिये स्थायी नहीं है. लेकिन अगर हम पश्चाताप न करें और ईश्वर हम पर दया न करे तो यह स्थिति स्थायी हो सकती है. वास्तव में हम ईश्वर की सन्तानें हैं, और वही हमारी वास्तविक और स्थायी स्थिति है, प्रभु येसु हमारी उसी स्थायी स्थिति को लौटाने के लिए आये हैं. वह हमारा ईश्वर के साथ मेल कराकर वापस हमें उसके पुत्र-पुत्रियाँ बनने के लिए बुलाने के लिए आये हैं. हम अपने मन में झाँककर देखें कि क्या मैं पापी हूँ? अगर हाँ तो प्रभु निश्चय ही मुझे ही बुलाने आये हैं. मुझे उनकी आवाज़ सुननी है और उनके पास जाना है.



📚 REFLECTION




Today Jesus assures each one of us that He has come to call the sinners not the righteous. This is substantiated with the example of the call of Matthew or Levi the tax collector. If there was no sin and sinners in the world, then Jesus wouldn’t need to come down from heaven, He wouldn’t have to undergo sufferings and painful death on the cross. Why is it that God loves sinners more than the righteous ones? In order to understand this, we first, need to understand the nature of God. God is full of mercy and compassion.

If there is anyone who needs mercy and compassion most, is the sinner. If there is a doctor, his being doctor is of use only if he uses his ability and knowledge in treating the sick. Our sinfulness is not permanent state. But if we do not repent and God is not merciful and compassionate towards us, than this state can become a permanent state. Our permanent status is that of children of God. Jesus came to restore that original identity of whole humanity. He has come to call us to repent and reconcile and thus again become the true children of our Heavenly Father. Let us look within ourselves, am I a sinner? If yes then I am eligible to be saved, Jesus has come to call me. I just need to listen to his voice and come to him. Amen.



 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 01 जुलाई, 2021 वर्ष का तेरहवाँ सप्ताह

 

गुरुवार, 01 जुलाई, 2021

वर्ष का तेरहवाँ सप्ताह



पहला पाठ : उत्पत्ति 22:1-19



1) ईश्वर ने इब्राहीम की परीक्षा ली। उसने उस से कहा, ''इब्राहीम! इब्राहीम!'' इब्राहीम ने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।''

2) ईश्वर ने कहा, ''अपने पुत्र को, अपने एकलौते को परमप्रिय इसहाक को साथ ले जा कर मोरिया देश जाओ। वहाँ, जिस पहाड़ पर मैं तुम्हें बताऊँगा, उसे बलि चढ़ा देना।''

3) इब्राहीम बड़े सबेरे उठा। उसने अपने गधे पर जीन बाँध कर दो नौकरों और अपने पुत्र इसहाक को बुला भेजा। उसने होम-बली के लिए लकड़ी तैयार कर ली और उस जगह के लिए प्रस्थान किया, जिसे ईश्वर ने बताया था।

4) तीसरे दिन, इब्राहीम ने आँखें ऊपर उठायीं और उस जगह को दूर से देखा।

5) इब्राहीम ने अपने नौकरों से कहा, ''तुम लोग गधे के साथ यहाँ ठहरो। मैं लड़के के साथ वहाँ जाऊँगा। आराधना करने के बाद हम तुम्हारे पास लौट आयेंगे।

6) इब्राहीम ने होम-बली की लकड़ी अपने पुत्र इसहाक पर लाद दी। उसने स्वयं आग और छुरा हाथ में ले लिया और दोनों साथ-साथ चल दिये।

7) इसहाक ने अपने पिता इब्राहीम से कहा, ''पिताजी!'' उसने उत्तर दिया, ''बेटा! क्या बात है?'' उसने उत्तर दिया, ''देखिए, आग और लकड़ी तो हमारे पास है; किन्तु होम को मेमना कहाँ है?''

8) इब्राहीम ने उत्तर दिया, ''बेटा! ईश्वर होम के मेमने का प्रबन्ध कर देगा'', और वे दोनों साथ-साथ आगे बढ़े।

9) जब वे उस जगह पहुँच गये, जिसे ईश्वर ने बताया था, तो इब्राहीम ने वहाँ एक वेदी बना ली और उस पर लकड़ी सजायी। इसके बाद उसने अपने पुत्र इसहाक को बाँधा और उसे वेदी के ऊपर रख दिया।

10) तब इब्राहीम ने अपने पुत्र को बलि चढ़ाने के लिए हाथ बढ़ा कर छुरा उठा लिया।

11) किन्तु प्रभु का दूत स्वर्ग से उसे पुकार कर बोला, ''इब्राहीम! ''इब्राहीम! उसने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।''

12) दूत ने कहा, ''बालक पर हाथ नहीं उठाना; उसे कोई हानि नहीं पहुँचाना। अब मैं जान गया कि तुम ईश्वर पर श्रद्धा रखते हो - तुमने मुझे अपने पुत्र, अपने एकलौते पुत्र को भी देने से इनकार नहीं किया।

13) इब्राहीम ने आँखें ऊपर उठायीं और सींगों से झाड़ी में फँसे हुए एक मेढ़े को देखा। इब्राहीम ने जाकर मेढ़े को पकड़ लिया और उसे अपने पुत्र के बदले बलि चढ़ा दिया।

14) इब्राहीम ने उस जगह का नाम ''प्रभु का प्रबन्ध'' रखा; इसलिए लोग आजकल कहते हैं, ''प्रभु पर्वत पर प्रबन्ध करता है।''

15) ईश्वर का दूत इब्राहीम को दूसरी बार पुकार कर

16) बोला, ''यह प्रभु की वाणी है। मैं शपथ खा कर कहता हूँ - तुमने यह काम किया : तुमने मुझे अपने पुत्र, अपने एकलौते पुत्र को भी देने से इनकार नहीं किया;

17) इसलिए मैं तुम पर आशिष बरसाता रहूँगा। मैं आकाश के तारों और समुद्र के बालू की तरह तुम्हारे वंशजों को असंख्य बना दूँगा और वे अपने शत्रुओं के नगरों पर अधिकार कर लेंगे।

18) तुमने मेरी आज्ञा का पालन किया है; इसलिए तुम्हारे वंश के द्वारा पृथ्वी के सभी राष्ट्रों का कल्याण होगा।''

19) इब्राहीम अपने नौकरों के पास लौटा। वे सब बएर-शेबा चले गये और इब्राहीम वहाँ रहने लगा।



सुसमाचार : मत्ती 9:1-8



1) ईसा नाव पर बैठ गये और समुद्र पार कर अपने नगर आये।

2) उस समय कुछ लोग खाट पर पडे़ हुए एक अद्र्धांगरोगी को उनके पास ले आये। उनका विश्वास देखकर ईसा ने अद्र्धांगरोगी से कहा, ’’बेटा ढारस रखो! तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं।’’

3) कुछ शास्त्रियों ने मन में सोचा- यह ईश-निन्दा करता है।

4) उनके ये विचार जान कर ईसा ने कहा, ’’तुम लोग मन में बुरे विचार क्यों लाते हो ?

5) अधिक सहज क्या है यह कहना, ’तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं अथवा यह कहना, ’उठो और चलो-फिरो’?

6) किन्तु इसलिए कि तुम लोग यह जान लो कि मानव पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार मिला है’’ तब वे अद्र्धांगरोगी से बोले ’’उठो और अपनी खाट उठा कर घर जाओ’’।

7) और वह उठ कर अपने घर चला गया।

8) यह देखकर लोगों पर भय छा गया और उन्होंने ईश्वर की स्तुति की, जिसने मनुष्यों को ऐसा अधिकार प्रदान किया था।



📚 मनन-चिंतन

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पाप और हमारी बीमारी-विपत्तियों का क्या सम्बन्ध है? हमारी परेशानियों और हमारे पापों में कोई सम्बन्ध है भी या नहीं? इस प्रश्न को हम सीधे शब्दों में इस तरह भी पूछ सकते हैं- ‘धर्म का और विज्ञान आपस में क्या सम्बन्ध है?’ क्योंकि कुछ लोगों के अनुसार पाप, धर्म का विषय है, और बीमारियाँ विज्ञान का विषय. लेकिन इस बात को नाकारा नहीं जा सकता कि इन दोनों का इश्वर से गहरा सम्बन्ध है. आदिकाल से न तो धर्म था और न विज्ञान था, था तो सिर्फ सनातन ईश्वर. सब कुछ उसी के द्वारा सृष्ट किया गया है, इसलिये सब कुछ का सम्बन्ध ईश्वर से है, हम मनुष्यों का और हमारे जीवन के हर पहलु का.

सन्त योहन के सुसमाचार 15:1-8 में प्रभु येसु हमें समझाते हैं कि प्रभु दाखलता हैं और हम उसकी डलियाँ हैं और प्रभु से जुड़ा रहता है वही खूब फलता है, और जो ईश्वर से नहीं जुड़ा रहता वह सूख जाता है. यानि कि यदि हम ईश्वर के साथ जुड़े हैं, हमारा सम्बन्ध ईश्वर के साथ मजबूत है तो हमें आशीष और कृपायें मिलेंगी, वहीँ अगर हम ईश्वर से नहीं जुड़े हैं तो हमारे दुःख-संकटों और विपत्तियों में ईश्वर हमारे साथ नहीं रहेगा. ईश्वर से हमारा सम्बन्ध हमारे पापों के कारण ख़राब हो जाता है. अगर हमारा सम्बन्ध ईश्वर से और एक-दूसरे से फिर से स्थापित होना है तो हमारे पापों की क्षमा ज़रूरी है. क्योंकि ईश्वर 'हमारे सभी अपराध क्षमा करता और हमारी सारी बीमारियाँ दूर करता है. (स्तोत्र 103:3).



📚 REFLECTION



What is the connection between sin and our sicknesses? Is there any connection between sin and our problems at all? In other words, one could ask – What is the relation between religion and science? Because some people think that our sins relate to religion and sicknesses are the subject of science. We cannot ignore the fact these both are deeply related with God. God is from eternity even before religion or science were born. Everything came into being through Him and nothing came into being without Him. (cf. John 1:3). Hence everything has its origin from God and exists in relation with God, even every aspect of our human life.

Jesus, in the Gospel of John (15:1-8) tells us that he is vine and we are the branches and those who remain in him, bear much fruit and those who do not abide in Him, they wither away. So, if we remain in God, then we shall flourish in all that we do, and if we break our relationship with God then we are bound to wither, we will not find God in our sorrows and difficulties of life. Our sins are the cause for putting our relationship with God in danger. If we have to establish and build our relationship with God, our sins should be forgiven. God is ready to forgive us as the psalmist says, “Bless the LORD, O my soul, and forget not all his benefits, who forgives all your iniquity, who heals all your diseases...” (Ps 103:2-3).



 -Br Biniush Topno


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