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फरवरी 19, 2023 - सामान्य काल का सातवां रविवार

 

फरवरी 19, 2023 - सामान्य काल का सातवां रविवार





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📒 पहला पाठ : लेवी 19:1-2,17-18


1) प्रभु मूसा से बोला,

2) ''इस्राएलियों के सारे समुदाय से यह कहो - पवित्र बनो, क्योंकि मैं प्रभु, तुम्हारा ईश्वर, पवित्र हूँ।

17) अपने भाई के प्रति अपने हृदय में बैर मत रखो। यदि तुम्हारा पड़ोसी कोई अपराध करे, तो उसे डाँटो। नहीं तो तुम उसके पाप के भागी बनोगे।

18) तुम न तो बदला लो और न तो अपने देश-भाइयों से मनमुटाव रखो। तुम अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। मैं प्रभु हूँ।


📕 दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 3:16-23


16) क्या आप यह नहीं जानते कि आप ईश्वर के मन्दिर हैं और ईश्वर का आत्मा आप में निवास करता है?

17) यदि कोई ईश्वर का मन्दिर नष्ट करेगा, तो ईश्वर उसे नष्ट करेगा; क्योंकि ईश्वर का मन्दिर पवित्र है और वह मन्दिर आप लोग हैं।

18) कोई अपने को धोखा न दे। यदि आप लोगों में कोई अपने को संसार की दृष्टि से ज्ञानी समझता हो, तो वह सचमुच ज्ञानी बनने के लिए अपने को मूर्ख बना ले;

19) क्योंकि इस संसार का ज्ञान इ्रश्वर की दृष्टि में ’मूर्खता’ है। धर्मग्रन्थ में यह लिखा है- वह ज्ञानियों को उनकी चतुराई से ही फँसाता है

20) और प्रभु जानता है कि ज्ञानियों के तर्क-वितर्क निस्सार हैं।

21) इसलिए कोई मनुष्यों पर गर्व न करे सब कुछ आपका है।

22) चाहे वह पौलुस, अपोल्लोस अथवा कैफ़स हो, संसार हो, जीवन अथवा मरण हो, भूत अथवा भविष्य हो-वह सब आपका है।

23) परन्तु आप मसीह के और मसीह ईश्वर के हैं।


📙 सुसमाचार : मत्ती 5:38-48


(38) तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है- आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत।

(39) परन्तु मैं तुम से कहता हूँ - दुष्ट का सामना नहीं करो। यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड मारे, तो दूसरा भी उसके सामने कर दो।

(40) जो मुक़दमा लड़ कर तुम्हारा कुरता लेना चाहता है, उसे अपनी चादर भी ले लेने दो।

(41) और यदि कोई तुम्हें आधा कोस बेगार में ले जाये, तो उसके साथ कोस भर चले जाओ।

(42) जो तुम से माँगता है, उसे दे दो और जो तुम से उधार लेना चाहता है, उस से मुँह न मोड़ो।

(43) "तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है- अपने पड़ोसी से प्रेम करो और अपने बैरी से बैर।

(44) परन्तु मैं तुम से कहता हूँ - अपने शत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम पर अत्याचार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।

(45) इस से तुम अपने स्वर्गिक पिता की संतान बन जाओगे; क्योंकि वह भले और बुरे, दोनों पर अपना सूर्य उगाता तथा धर्मी और अधर्मी, दोनों पर पानी बरसाता है।

(46) यदि तुम उन्हीं से प्रेम करत हो, जो तुम से प्रेम करते हैं, तो पुरस्कार का दावा कैसे कर सकते हो? क्या नाकेदार भी ऐसा नहीं करते ?

(47) और यदि तुम अपने भाइयों को ही नमस्कार करते हो, तो क्या बडा काम करते हो? क्या गै़र -यहूदी भी ऐसा नहीं करते?

(48) इसलिए तुम पूर्ण बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।


📚 मनन-चिंतन


आज का सुसमाचार येसु के पहाड़ी उपदेश का एक हिस्सा है और इसमें धर्मी और पवित्र जीवन जीने की शिक्षा दी गई है। इस अंश में, येसु संहिता के शब्दों से परे जाने और इसे गहरे और अधिक सार्थक तरीके से पूरा करने के महत्व पर बल दे रहा है।

पदसंख्याएं 38-42 में, येसु ‘‘आंख के बदले आंख’’ और ’’दांत के बदले दांत’’ की अवधारणा पर चर्चा कर रहे हैं जो प्राचीन काल में सजा का सिद्धांत था। येसु सिखाते है कि बदला लेने के बजाय, हमें ’’दूसरा गाल आगे करना चाहिए’’ और ’’अपने शत्रुओं से प्रेम करना चाहिए।’’ वह क्षमा और करुणा के महत्व और बदला लेने की इच्छा से ऊपर उठने की आवश्यकता पर बल दे रहे है।

पदसंख्याएं 43-48 में, येसु अपने शत्रुओं से प्रेम करने के बारे में शिक्षा को जारी रखते है। वह उन लोगों के लिए प्यार करने और प्रार्थना करने के महत्व पर जोर देते है जो हमें चोट पहुँचाते हैं और हमें पूर्णता के लिए प्रयास करने के लिए कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ईश्वर पूर्ण है।

यह हमें बताता है कि येसु की शिक्षाओं का पालन करना हमेशा आसान नहीं होगा परंतु चुनौतियों के साथ होगा, लेकिन एक धर्मी और पवित्र जीवन जीने के लिए यह हमारे लिए आवश्यक है।



📚 REFLECTION


Today’s gospel is a part of Jesus' Sermon on the Mount and contains teachings on how to live a righteous and holy life. In this passage, Jesus is emphasizing the importance of going beyond the letter of the law and fulfilling it in a deeper and more meaningful way.

In verses 38-42, Jesus is discussing the concept of "an eye for an eye" and "a tooth for a tooth" which was a principle of punishment in ancient times. Jesus teaches that instead of taking revenge, we should "turn the other cheek" and "love our enemies." He is emphasizing the importance of forgiveness and compassion, and the need to rise above the desire for revenge.

In verses 43-48, Jesus continues to teach about loving one's enemies. He is emphasizing the importance of loving and praying for those who hurt us and striving for perfection, just as God is perfect.

It tells us that following Jesus’ teachings may not always be easy and may come with challenges, but it is necessary in order to live a righteous and holy life.


 -Br. Biniush Topno






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22 जनवरी - वर्ष का तीसरा सामान्य रविवार

 

22 जनवरी - वर्ष का तीसरा सामान्य रविवार



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📒 पहला पाठ : इसायाह 8:23-9:3


8:23) जहाँ पहले विषाद था, वहाँ अन्धकार नहीं होगा। प्रभु ने भूतकाल में ज़बुलोन तथा नफ़्ताली के प्रान्तों को अपमानित होने दिया है, किन्तु भविष्य में यह यर्दन के उस पार, समुद्र के मार्ग को, गैर-यहूदियों की गलीलिया को महिमा प्रदान करेगा।

9:1) अन्धकार में भटकने वाले लोगों ने एक महती ज्योति देखी है, अन्धकारमय प्रदेश में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ है।

2) तूने उन लोगों का आनन्द और उल्लास प्रदान किया है। जैसे फ़सल लुनते समय या लूट बाँटते समय उल्लास होता है, वे वैसे ही तेरे सामने आनन्द मना रहे हैं।

3) उन पर रखा हुआ भारी जूआ, उनके कन्धों पर लटकने वाली बहँगी, उन पर अत्याचार करने वाले का डण्डा- यह सब तूने तोड़ डाला है, जैसा कि मिदयान के दिन हुआ था।


📕 दूसरा पाठ : 1कुरिन्थियों 1:10-13,17


10) भाइयो! हमारे प्रभु ईसा मसीह के नाम पर मैं आप लोगों से यह अनुरोध करता हूँ - आप लोग एकमत होकर दलबन्दी से दूर रहें। आप एक दूसरे से मेल-मिलाप करें और हृदय तथा मन से पूर्ण रूप से एक हो जायें।

11) ख्लोए के घर वालों से मुझे पता चला कि आप लोगों में फूट पड़ गयी है।

12) मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आप लोगों में प्रत्येक अपना-अपना राग अलापता है: "मैं पौलुस का हूँ": "मैं अपोल्लोस का हूँ"; "मैं केफस का हूँ" और "मैं मसीह का हूँ";।

13) क्या मसीह खण्ड-खण्ड हो गये हैं? क्या पौलुस आप लोगों के लिए क्रूस मर गये हैं? क्या आप लोगों को पौलुस के नाम पर बपतिस्मा मिला है?

17) क्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने नहीं; बल्कि सुसमाचार का प्रचार करने भेजा। मैंने इस कार्य के लिए अलंकृत भाषा का व्यवहार नहीं किया, जिससे मसीह के क्रूस के सन्देश का प्रभाव फीका न पड़े।


📙 सुसमाचार : मत्ती 14:12-23 (अथवा 12-17)


(12) ईसा ने जब यह सुना कि योहन गिरफ्तार हो गया है, तो वे गलीलिया चले गये।

(13) वे नाज़रेत नगर छोड कर, ज़बुलोन और नफ्ताली के प्रान्त में, समुद्र के किनारे बसे हुए कफ़रनाहूम नगर में रहने लगे।

(14) इस तरह नबी इसायस का यह कथन पूरा हुआ-

(15) ज़बुलोन प्रान्त! नफ्ताली प्रान्त! समुद्र के पथ पर, यर्दन के उस पार, ग़ैर-यहूदियों की गलीलिया! अंधकार में रहने

(16) वाले लोगों ने एक महती ज्योति देखी; मृत्यु के अन्धकारमय प्रदेश में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ।

(17) उस समय से ईसा उपदेश देने और यह कहने लगे, "पश्चात्ताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।"

(18) गलीलिया के समुद्र के किनारे टहलते हुए ईसा ने दो भाइयों को देखा-सिमोन, जो पेत्रुस कहलाता है, और उसके भाई अन्द्रेयस को। वे समुद्र में जाल डाल रहे थे, क्योंकि वे मछुए थे।

(19) ईसा ने उन से कहा, "मेरे पीछे चले आओ। मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुए बनाऊँगा।"

(20) वे तुरंत अपने जाल छोड़ कर उनके पीछे हो लिए।

(21) वहाँ से आगे बढ़ने पर ईसा ने और दो भाइयों को देखा- जे़बेदी के पुत्र याकूब और उसके भाई योहन को। वे अपने पिता जे़बेदी के साथ नाव में अपने जाल मरम्मत कर रहे थे।

(22) ईसा ने उन्हें बुलाया। वे तुरंत नाव और अपने पिता को छोड़ कर उनके पीछे हो लिये।

(23) ईसा उनके सभागृहों में शिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते और लोगों की हर तरह की बीमारी और निर्बलता दूर करते हुए, सारी गलीलिया में घूमते रहते थे।


📚 मनन-चिंतन


आज ईशवचन-इतवार है। संत पापा फ्रांसिस आज हम सभी को ईश्वर के वचन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए आमंत्रित करते हैं। उनके अनुसार, साधारण समय के तीसरे रविवार को हमें ईश्वर के वचन के इतवार के रूप में मनाना चाहिए। इस दिन हमें ईश्वर के वचन का उत्सव मनाना चाहिए, ईशवचन के अध्ययन और प्रसार के लिए अपने आप को समर्पित करना चाहिए। येसु अपने सभी शिष्यों की एकता चाहते थे और उन्होंने इस के लिए अपने पिता से प्रार्थना भी की थी। ईश्वर के वचन में सभी ख्रस्तीय संप्रदायों को एकजुट करने की शक्ति है। हम सब ईश्वर के वचन को मानते हैं और हम इसमें अपनी एकता पाते हैं। ईश्वर का वचन हमें यहूदियों तथा अन्य संप्रदायों के ख्रीस्तीय विश्वासियों के साथ एकजुट होने में मदद करता है। संयोग से इस वर्ष ईशवचन का उत्सव ख्रीस्तीय एकता सप्ताह के तुरन्त बाद आता है। द्वितीय वतिकान महासभा के बाद, कैथोलिक कलीसिया ईश्वर के वचन रूपी खजाने को फिर से खोज रही है। मत्ती 4: 4 में प्रभु येसु कहते हैं, "मनुष्य रोटी से ही नहीं, बल्कि ईश्वर के मुँह से निकलने वाले हरेक शब्द से जीता है"। ईश्वर का वचन हमारी रोज़ की रोटी है। संत पौलुस कहते हैं, "पूरा धर्मग्रन्थ ईश्वर की प्रेरणा से लिखा गया है। वह शिक्षा देने के लिए, भ्रान्त धारणाओं का खण्डन करने के लिए, जीवन के सुधार के लिए और सदाचरण का प्रशिक्षण देने के लिए उपयोगी है। जिससे ईश्वर-भक्त सुयोग्य और हर प्रकार के सत्कार्य के लिए उपयुक्त बन जाये।” (2तिमथी 3: 16-17)। आइए हम अपने दैनिक जीवन में प्रभु के वचन को उचित महत्व दें और उसके बारे में अपनी समझ को गहरा करने के लिए भी संकल्प करें और शब्द से बने मांस से प्यार करें।



📚 REFLECTION

Today is Word of God Sunday. Pope Francis invites all of us today to concentrate on and celebrate the Word of God. According to him, the Third Sunday of Ordinary time is to be celebrated as Word of God Sunday “to be devoted to the celebration, study and dissemination of the word of God”. Jesus wanted the unity of all his disciples. The Word of God has the power to unite all Christian denominations. The Word of God is common to us and we find our unity in it. The Word of God helps us to feel united with the Jewish people as well as with Christians of other denominations. Coincidently the celebration of the Word of God this year immediately follows the celebration of the Unity Octave. After the Second Vatican Council, the Catholic Church has been rediscovering the richness of the Word of God and the treasure we have in it. In Mt 4:4 Jesus says, “One does not live by bread alone, but by every word that comes from the mouth of God”. Word of God is our daily bread. St. Paul says, “All scripture is inspired by God and is useful for teaching, for reproof, for correction, and for training in righteousness, so that everyone who belongs to God may be proficient, equipped for every good work.” (2Tim 3:16-17) Let us give due importance to the Word of God in our daily lives. Let us also make a resolution to deepen our understanding of the Word of God and love the Word made flesh.


प्रवचन

प्रिय भाइयो-बहनों ईश्वर लोगों को विभिन्न प्रकार से बुलाते हैं। कभी अकेले में बुलाते हैं तो कभी समुदाय के रूप में बुलाते हैं। किसी को व्यक्ति विशिष्ट को बुलाने के उदाहरण बाइबिल में अनेक हैं। समुदाय के रूप में बुलाने का उदाहरण इस्राएली जनता है। ईश्वर विभिन्न मकसदों व उद्देश्यों के लिए बुलाते हैं। कभी किसी को किसी से स्वतंत्र होने के लिए बुलाते हैं तो कभी किसी के अधिनस्त रहने के लिए बुलाते हैं। कभी किसी वस्तु को त्यागने के लिए तो कभी किसी को अपनाने के लिए; कभी किसी के पास जाने के लिए तो कभी किसी से दूर जाने के लिए; कभी बोलने के लिए तो कभी एकांत में शांत बैठने के लिए; कभी किसी कार्य विशेष को करने के लिए तो कभी कुछ कार्यों से परहेज के लिए बुलाते हैं। ये सारी बातें हमें बाइबिल में मिलेगी। हर व्यक्ति ईश्वर के द्वारा बुलाया गया है। कोई व्यक्ति ईश्वर के बुलाहट से वंचित नहीं है। बस इतना है कि कोई ईश्वर की बुलाहट के अनुसार जीवन जीते हैं तो काई अपनी मर्जी का। जो बुलाहट का जीवन जीते हैं वे समाज के लिए मद्द एवं अनिवार्य सिद्ध होते हैं लेकिन जो अपनी मर्जी का जीवन जीते हैं वे समाज के लिए घतक व अनावश्यक सिद्ध हो सकते हैं। तो आवश्यकता है अपनी बुलाहट को सुनने व पहचानने की और उसके अनुसार जीवन जीने की।

आज के प्रथम पाठ में अंधकार में भटकने वालों से अहवान किया गया है कि वे ज्योंति को पहचाने और उसे स्वीकार करे। ‘अंधकार’ का अभिप्राय यहॉं पाप हो सकता है या दुःख-पीड़ा, संकट या किसी प्रकार की कठिनाई हैं जिससे लोग परेशान हो गये हो। यह ज्योति उनके लिए एक बहुत ही राहत देने वाली है। यह ज्योति एक तरह से उन्हें मुक्ति देने वाली है। अतः अंधकार में भटकने वाले लोग उस ज्योति को अपनाने के लिए बुलाये गये हैं।

दूसरे पाठ में हम देखते हैं कि कुरिंथ की कलीसिया विभाजन से ग्रसित है। वे प्रभु येसु को छोड़कर उनके प्राचारक को ही सब कुछ मान बैठें हैं। अतः संत पौलुस येसु को अपनाने व स्वीकार करने के लिए अहवान करते हैं। उनकी उस समय की बुलाहट है कि वे सुसमाचार-प्रचारकों या नेतृत्व करने वालों को नहीं बल्कि येसु मसीह को अपनायें।

सुसमाचार में हम देखते हैं कि योहन गिरफ्तार हो चुका है। येसु अपने मिशन-कार्यों की शुरूआत करते हैं। वे अपने मिशन-कार्यों का आरम्भ इन शब्दों से करते हैं-‘‘पश्चाताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।’’ योहन ने पश्चाताप पर उपदेश दिया था। अतः योहन जहॉं से अन्त करते हैं येसु वहीं से शुरू करते हैं। अपने मिशन-कार्य के दौर में येसु ने दो भाइयों को-पेत्रुस और अन्द्रेयस को देखा। येसु ने उनसे कहा-‘‘मेरे पीछे चले आओ। मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुए बनाऊॅंगा।’’ बस ये चंद शब्द थे जिन्हे सुनते ही, बिना विलम्ब वे उनके पीछे हो लिए। कुछ दूर आगे बढ़ने पर येसु ने ज़ेबेदी के पुत्र याकूब और उसके भाई योहन को पाया। येसु ने उन्हे भी बुलाया। वे भी अपनी नाव व पिता को छोड़कर येसु के पीछे हो लिए। उनका नाव अपने और पिता को छोड़ना बहुत ही बडे त्याग को दर्शाता है। उन्हें हर प्रकार के रिश्तों को तोड़ना व छोड़ना पड़ा। इतना ही नहीं उन्हें अपना पेशा जिससे उनकी जीविका चलती थी भी छोड़ना पड़ा। उन्हें अपने आप को खाली करना पड़ा ताकि येसु उन्हें भर सके।

थोमस अलवा इडिसन एक बहुत ही सुप्रसिद्ध एवं बहुकृतिक अविष्कारक माने जाते हैं। इडिसन की शिक्षिका ने कहा था कि इडिसन कुछ सिखने के लायक नहीं है। वह इतना मूर्ख है कि कुछ नहीं सीख सकता है। बारह वर्ष की आयु में उसे विद्यायल से निकाला गया था क्योंकि लोग उसको गूंगा समझते थे। गणित तो उससे बनती नहीं थी। वह ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकता था। इतना ही नहीं उसे शब्दों और भाषाओं में भी कठिनाई थी। उसकी अनुत्पादकता के कारण उसे पेशों से भी भगा दिया गया था।

इडिसन ने अपने पेशे के दौर में लगभग 1,093 अविष्कार कर डाले। इडिसन के लिए हर असफलता सफलता के पत्थरों पर पैर रखने के भॉंति था। इलेकट्रिक बल्ब बनाने की कोशिश में वे सैकड़ो बार असफल रहे। फिर भी बड़ी मासुमियत कहते थे कि -‘‘मैंने यह सिखा कि मुझे 999 तरीकों से इलेकट्रिक बल्ब बनाना नही आता।

सन् 1914 ई. में थोमस इडिसन का कारोड़ों रूपये का नुकसान हो गया जब उसके प्रयोगशाला में आग लग गयी। उनके वर्षों की खोज, उपकरण, वर्षों की परिश्रम का बहुमूल्य अभिलेख सब जलकर राख बन गई। दूसरे दिन सुबह जब वे अपनी आशाओं, सपनों आकांक्षाओं, अभिलाषाओं की राखों के बीच चल रहे थे तो 67 वर्ष के सज्जन इडिसन ने कहा-‘‘महाविपदा में महामूल्य है क्योंकि हमारी हर गलती जल जाती है। ईश्वर को शुक्रिया। हम पुनः शुरूआत कर सकते हैं।’’ अत्याधिक निराशा में अविचलित रहने के हीरो थे थोमस इडिसन। थोमस इडिसन की काबिलयत को उसकी शिक्षिका नहीं देख सकी। थोमस इडिसन को उसकी शिक्षिका कुछ सिखने या करने के लायक नहीं समझती थी। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि थोमस इडिसन इतने महान अविष्कारक बनेंगे।

उसी प्रकार हम येसु के शिष्यों को देखते हैं। यह सच है कि वे एक साधारण मछुआरे थे। शायद ज्यादा कुछ पढ़े-लिखे भी नहीं रहे होगें। संभवताः मछली फंसाने के अलावा और कुछ ज्यादा ज्ञान उनमें नहीं रह होगा। दुनिया की नज़रों में साधारण मछुए येसु के इतने विशाल मिशन-कार्य के लायक भी नहीं रहे होंगे। पर उनमें कुछ गुण थे जिसे येसु जानते थे, जिसे सिर्फ येसु ने देखा था। इसलिए येसु ने उन साधारण मछुओं को बुलाया। वे जो दुनिया की नज़रों में जीरो थे येसु के मिशन-कार्यों में हीरो बन गये। ये नहीं कि उनमें कमजोरियॉं नहीं थी। मानव स्वभाव की कमजोरियॉं उनमें भी थी। लेकिन जब कोई बुलाहट को स्वीकार कर उसके अनुसार कार्य करते हैं तो मनुष्य की कमजोरियॉं भी ताकत बनकर उभर आती है। अवगुण सगुण में बदल जाते हैं। ईश्वर हर मनुष्य को सुसमाचार प्रसार के लिए ही नहीं बुलाते हैं। हर मनुष्य की बुलाहट अलग-अलग हो सकती है। अतः हरेक को अपनी-अपनी बुलाहट पहचानने और स्वीकार करने की आवश्यकता है। यदि कोई अपने बुलाहट को पहचानने और उसके अनुसार कार्य करता है तो वह उस क्षेत्र में हीरो बन जाता है।

तो आइये जब हम इस समारोह में भाग ले रहें हैं तो ईश्वर से प्रार्थना करें कि हम ईश्वर की बुलाहट को पहचान सकें और उसके अनुसार कार्य कर सकें।


 -Br. Biniush Topno


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15 जनवरी 2023,सामान्य काल का दूसरा इतवार

 

15 जनवरी 2023,सामान्य काल का दूसरा इतवार



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📒 पहला पाठ : इसायाह 49:3,5-6


3) उसने मुझे से कहा, “तुम मेरे सेवक हो, मैं तुम में अपनी महिमा प्रकट करूँगा“।

5) परन्तु जिसने मुझे माता के गर्भ से ही अपना सेवक बना लिया है, जिससे मैं याकूब को उसके पास ले चलूँ और उसके लिए इस्राएल को इकट्ठा कर लूँ, वही प्रभु बोला; उसने मेरा सम्मान किया, मेरा ईश्वर मेरा बल है।

6) उसने कहाः “याकूब के वंशों का उद्धार करने तथा इस्राएल के बचे हुए लोगों को वापस ले आने के लिए ही तुम मेरे सेवक नहीं बने। मैं तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बना दूँगा, जिससे मेरा मुक्ति-विधान पृथ्वी के सीमान्तों तक फैल जाये।“


📕 दूसरा पाठ : 1कुरिन्थियों 1:1-3


1) कुरिन्थ में ईश्वर की कलीसिया के नाम पौलुस, जो ईश्वर द्वारा ईसा मसीह का प्रेरित नियुक्त हुआ है, और भाई सोस्थेनेस का पत्र।

2) आप लोग ईसा मसीह द्वारा पवित्र किये गये हैं और उन सबों के साथ सन्त बनने के लिए बुलाये गये हैं, जो कहीं भी हमारे प्रभु ईसा मसीह अर्थात् अपने तथा हमारे प्रभु का नाम लेते हैं।

3) हमारा पिता ईश्वर और प्रभु ईसा मसीह आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति प्रदान करें।


📙 सुसमाचार : योहन 1:29-34


29) दूसरे दिन योहन ने ईसा को अपनी ओर आते देखा और कहा, "देखो-ईश्वर का मेमना, जो संसार का पाप हरता है।

30) यह वहीं हैं, जिनके विषय में मैंने कहा, मेरे बाद एक पुरुष आने वाले हैं। वह मुझ से बढ़ कर हैं, क्योंकि वह मुझ से पहले विद्यमान थे।

31) मैं भी उन्हें नहीं जानता था, परन्तु मैं इसलिए जल से बपतिस्मा देने आया हूँ कि वह इस्राएल पर प्रकट हो जायें।"

32) फिर योहन ने यह साक्ष्य दिया, "मैंने आत्मा को कपोत के रूप में स्वर्ग से उतरते और उन पर ठहरते देखा।

33) मैं भी उन्हें नहीं जानता था; परन्तु जिसने मुझे जल से बपतिस्मा देने भेजा, उसने मुझ से कहा था, ‘तुम जिन पर आत्मा को उतरते और ठहरते देखोगे, वही पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देते हैं’।

34) मैंने देखा और साक्ष्य दिया कि यह ईश्वर के पुत्र हैं।"


📚 मनन-चिंतन


संत योहन बपतिस्ता के जीवन में एक बात सामने आती है कि वे अपनी पहचान, भूमिका तथा लक्ष्य के बारे में बहुत स्पष्ट थे। वे उस मार्ग के बारे में स्पष्ट थे जो स्वर्गिक पिता ने उनके लिए अंकित किया था। वे उस भूमिका के प्रति वफादार थे। केवल ऐसे व्यक्ति ही जीवन में पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं। संत योहन बपतिस्ता ने प्रभु येसु के आने और ईश्वर के राज्य की आसन्न स्थापना की घोषणा करने वाले येसु के अग्रदूत के रूप में अपनी भूमिका पर अपना ध्यान केंद्रित किया। उच्च स्थिति और राजनीतिक ताक़त के लोगों के सामने भी निर्भय होकर ईश्वर के राज्य के मूल्यों की घोषणा कर अपनी नबीय भूमिका को निभाते हुए, उन्हें शक्तिशालीयों के रोष का सामना करना पड़ा। अंत में उनको सिर कटवा कर मार डाला गया था। वे जीवन और मृत्यु में बहादुर थे। उन्होंने ईश्वर की योजना के अनुसार अपना जीवन पूरा किया। एक साधारण व्यक्ति के लिए संत योहन बपतिस्ता की मृत्यु एक त्रासदी थी। लेकिन वह वास्तव में अंत तक प्रतिबद्धता के जीवन का पूर्तीकरण था।



📚 REFLECTION



One thing that stands out in the life of St. John the Baptist is that he was very clear about his identity, role and goal. He was clear about the path that the heavenly Father had marked out for him. He was faithful to that identity, role and goal. Only such persons can have a fulfillment in life. St. John the Baptist concentrated on his role as the precursor of Jesus announcing the coming of the Messiah and the imminent establishment of the Kingdom of God. While carrying out his prophetic role by fearlessly proclaiming the values of the Kingdom of God even in front of people of high status and political power, he had to face the fury of the powerful. At the end he was beheaded. He was brave in life and braver in death. He had accomplished a life according to the plan of God. To a person with a secular mind the death of St. John the Baptist may look like a tragedy. But it was in reality the fulfillment of a life of commitment to the end.



प्रवचन


जब ईश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, तब ईश्वर ने चाहा कि मनुष्य ईश्वर के इच्छानुसार जीवन बिताये। लेकिन मनुष्य ने ईश्वर की इच्छा को तोड़ा। उसने ईश्वर के आज्ञा का उलंघन किया। आज के स्तोत्र में स्तोत्रकार कहता है कि वह प्रभु की आज्ञाओं का पालन करेगा और उनकी इच्छा को पूरा करेगा।

ईश्वर ने इस्रायलियों को चुना ताकि वे ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन बितायें। इनके जरिये ईश्वर ने अपनी इच्छा एवं योजना के अनुसार जीने का एक आदर्श बनाना चाहा। अतः ईश्वर ने विभिन्न नबियों को भेजा जो इन्हे ईश्वर की योजना अथवा इच्छा के बारे में मार्गदर्शन देते रहे। पर इस्राएली जनता भी ईश्वर की इच्छा के विरूद्ध गयी। उन्होंने भी ईश्वर की आज्ञाओं को उलंघन किया। आज के प्रथम पाठ के जरिये नबी इसायाह के द्वारा पुनः ईश्वर उन्हें स्मरण दिलाते हैं कि वे उन्हें राष्ट्रों की ज्योति बना देगें जिसके द्वारा ईश्वर का मुक्ति-विधान पृथ्वी के सीमान्तों तक फैल जायेगा। लेकिन इस्राएली जनता विफल रही।

तब ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को भेजा जो पिता ईश्वर की इच्छा व योजना के अनुसार जीवन बितायें और समस्त संसार के लिए एक उदाहरण बनें और ईश्वर के मुक्ति-विधान को पृथ्वी के सीमान्तों तक फैलायें।

एक लड़का था जो हर दिन फुटबाल मैच अभ्यास के लिए जाता था। पर उसे कभी टीम में शामिल नहीं किया गया। जब वह अभ्यास के दौरान खेलता था तो उसका पिताजी खेल मैदान से कहीं दूर एक कोने में बैठकर उसका इन्तजार करता था। खेल आरम्भ हो चुका था और चार दिन से वह लड़का न तो अभ्यास के लिए आया, न ही क्वार्टर फाइनल और न ही सेमी-फाइनल के लिए। पर फाइनल मैच के लिए आ गया। उसने प्रशिक्षक से कहा-‘‘सर आपने मुझे हमेंशा रोक कर रखा है और कभी खेलने नहीं दिया है। लेकिन सर आज मुझे खेलने दीजिए।’’ प्रशिक्षक ने कहा-‘‘बेटा मुझे माफ करना, मैं आपको खेलने नहीं दे सकता हूँ। आप से कहीं बेहतर खेलाड़ी हैं इसके अतिरिक्त यह फाइनल है। विद्यालय का नाम व प्रतिष्ठा दॉंव पर है। मैं तुम पर भाग्य नहीं परख सकता।’’ लड़के ने पुनः निवेदन किया- ‘‘सर मैं आपसे वादा करता हूँ कि मैं आपको निराश नहीं करूँगा, मैं आप को अपमानित नहीं करूँगा। सर मैं आप से विनय करता हूँ मुझे खेलने दीजिए सर। प्रशिक्षक ने उसे पहले कभी ऐसा अनुनय-विनय करते हुए नहीं देखा था। उसने कहा-‘‘ठीक है बेटा, जाओ खेलो। पर याद रखना कि मैं अपने सही निर्णय के विरूद्ध जा रहा हॅूं और विद्यालय का नाम भी खतरे में है। आप मुझे निराश मत करना।

खेल आरम्भ हुआ और लड़के ने इस कदर खेला मानो घर में आग लगी हो। जब भी बॉंल उसे मिली उसने गोल किये बगैर नहीं छोड़ा। कहने की आवश्यकता नहीं कि वह मैच का हीरो रहा। उसकी टीम की भव्य जीत रही। उसकी टीम की यह शानदार विजय थी।

मैच समाप्ति के पश्चात् प्रशिक्षक उसके पास गया और उसे कहा- ‘‘बेटा कैसे मैं इतना गलत हो सकता था? मैंने आपको कभी इस तरह खेलते हुए नहीं देखा। आज क्या हो गया? कैसे आप ने इतने अच्छे से खेला?’’ तब लड़के ने जवाब दिया-‘‘सर मेरे पिताजी आज देख रहे हैं।’’ तब प्रशिक्षक ने घूमकर उस स्थान पर देखा जहॉं अकसर उसका पिताजी बैठा करता था। पर वहॉं कोई नहीं था। तब उसने लड़के से कहा-‘‘बेटा आपका पिताजी वहॉं बैठा करता था जब आप अभ्यास कर रहे होते थे। पर आज मुझे वहॉं कोई दिखाई नहीं दिया। लड़के ने जवाब दिया-‘‘कुछ है जो मैंने आपको कभी बताया नहीं। मेरे पिताजी अन्धे थे। चार दिन पहले मेरे पिताजी की मृत्यु हो गयी। आज पहला दिन है जब मेरे पिताजी ऊपर से देख रहे हैं।

लड़के के पिताजी की इच्छा थी कि उसका पुत्र अच्छा खेले। अतः लड़के ने आज अपने पिताजी की इच्छा पूरी की।

इसी प्रकार की स्थिति हम आज के सुसमाचार में पाते हैं। येसु एक साधारण व्यक्ति थे। वे भीड़ में एक नज़र आ रहे थे। किसी ने नहीं सोचा था कि येसु ईश्वर के द्वारा भेजे गये ईश्वर के पुत्र है। यहॉं तक कि योहन बपतिस्ता भी नहीं जानता था। परन्तु योहन बपतिस्ता को ईश्वर से प्रेरणा मिली थी और उसने येसु पर पवित्र आत्मा को उतरते और ठहरते देखा। अतः योहन ने येसु की ओर इंगित करते हुए कहा-‘‘देखो ईश्वर का मेमना जो संसार का पाप हर लेता है।’’

येसु के इस संसार में आने का यही उद्देश्य था कि वे संसार को पापों से मुक्त करें। ईश्वर की यही इच्छा व योजना थी।

ईश्वर ने इस्राएली जनता को मूसा के जरिये मिश्रियों की दासता से छुड़ाया। मिश्र देश छोड़ने के पूर्व अंतिम रात्रि को इस्राएलियों ने पास्का पर्व मनाया। तब हर परिवार में मेमना मारा गया था एवं मेंमने का रक्त घर के चौखट पर पोत दिया गया था ताकि ईश्वर उन्हें किसी प्रकार की हानि या क्षति नहीं पहुँचाये। उसी तरह येसु नये पास्का मेमना हैं जिसने स्वयं को क्रूस की बली-वेदी पर बलिदान कर हमें पापों से मुक्त किया है। मनुष्य ने अपने ईश्वर की आज्ञा का उलंघन कर ईश्वर ने जो प्रतिरूप दिया था उसे खो दिया था। पर येसु ने अपनी आज्ञाकारिता द्वारा मनुष्य की खोये हुए प्रतिरूप को पुनःप्रतिष्ठित किया। येसु ने ईश्वर की इच्छा एवं योजना को पूर्ण किया। येसु के द्वारा ही ईश्वर का मुक्ति-विधान पृथ्वी की सीमान्तों तक फैल गया।

इसी बात को संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में याद दिलाते हुए कहते हैं कि हम येसु के द्वारा पवित्र किये गये हैं और संत बनने के लिए बुलाये गये हैं। इसके लिए हमें आवश्यकता है कि हम भी येसु की भॉंति आज्ञाकारी बने। हमारे लिए ईश्वर की योजना व इच्छा सुसमाचार में निहित है। अतः जरूरत है कि हम सुसमाचार के प्रति आज्ञाकारी बने। हम सुसमाचार के मुल्यों को आत्मसात कर जीवन बितायें। यदि हम सुसमाचार पर आधारित जीवन जीते हैं तो हम पवित्र और संत बनेंगे।


 -Br. Biniush Topno


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08 जनवरी 2023, इतवार प्रभु प्रकाश पर्व

 

08 जनवरी 2023, इतवार

प्रभु प्रकाश पर्व





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📒 पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 60:1-6

1) “उठ कर प्रकाशमान हो जा! क्योंकि तेरी ज्योति आ रही है और प्रभु-ईश्वर की महिमा तुझ पर उदित हो रही है।

2) पृथ्वी पर अँधेरा छाया हुआ है और राष्ट्रों पर घोर अन्धकार; किन्तु तुझ पर प्रभु उदित हो रहा है, तेरे ऊपर उसकी महिमा प्रकट हो रही है।

3) राष्ट्र तेरी ज्योति की ओर आ रहे हैं और राजा तेरे उदीयमान प्रकाश की ओर।

4) “चारों ओर दृष्टि दौड़ा कर देख! सब मिल कर तेरे पास आ रहे हैं। तेरे पुत्र दूर से चले आ रहे हैं; लोग तेरी पुत्रियों को गोद में उठा कर लाते हैं।

5) यह देख कर तू प्रफुल्लित हो उठेगी; तेरा हृदय आनन्द से उछलने लगेगा; क्योंकि समुद्र की सम्पत्ति और राष्ट्रों का धन तेरे पास आ जायेगा।

6) ऊँटों के झुण्ड और मिदयान तथा एफ़ा की साँड़नियाँ तुझ में उमड़ पड़ेंगी; शबा के सब लोग, प्रभु की स्तुति करते हुए, सोने और लोबान की भेंट ले आयेंगे।

📙 दूसरा पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:2-3a,5-6

2) आप लोगों ने अवश्य सुना होगा कि ईश्वर ने आप लोगों की भलाई के लिए मुझे अपनी कृपा का सेवा-कार्य सौंपा है।

3) उसने मुझ पर वह रहस्य प्रकट किया है,

5) वह रहस्य पिछली पीढि़यों में मनुष्य को नहीं बताया गया था और अब आत्मा के द्वारा उसके पवित्र प्रेरितों और नबियों का प्रकट किया गया है।

6) वह रहस्य यह है कि सुसमाचार के द्वारा यहूदियों के साथ गैर-यहूदी एक ही विरासत के अधिकारी हैं, एक ही शरीर के अंग हैं और ईसा मसीह-विषयक प्रतिज्ञा के सहभागी हैं।

📚 सुसमाचार : सन्त मत्ती 2:1-12

(1) ईसा का जन्म यहूदिया के बेथलेहेम में राजा हेरोद के समय हुआ था। इसके बाद ज्योतिषी पूर्व से येरुसालेम आये।

(2) और यह बोले, ’’ यहूदियों के नवजात राजा कहाँ हैं? हमने उनका तारा उदित होते देखा। हम उन्हें दण्डवत् करने आये हैं।’’

(3) यह सुन कर राजा हेरोद और सारा येरुसालेम घबरा गया।

(4) राजा ने सब महायाजकों और यहूदी जाति के शास्त्रियों की सभा बुला कर उन से पूछा, ’’ मसीह कहाँ जन्म लेंगें?’’

(5) उन्होंने उत्तर दिया, ’’यहूदिया के बेथलेहेम में, क्योंकि नबी ने इसके विषय में लिखा है-

(6) ’’बेथलेहेम यूदा की भूमि! तू यूदा के प्रमुख नगरों में किसी से कम नहीं है; क्योंकि तुझ में एक नेता उत्पन्न होगा, जो मेरी प्रजा इस्राइल का चरवाहा बनेगा।’’

(7) हेरोद ने बाद में ज्योतिषियों को चुपके से बुलाया और उन से पूछताछ कर यह पता कर लिया कि वह तारा ठीक किस समय उन्हें दिखाई दिया था।

(8) फिर उसने उन्हें बेथलेहेम भेजते हुए कहा, जाइए, बालक का ठीक-ठीक पता लगाइए और उसे पाने पर मुझे खबर दीजिए, जिससे मैं भी जा कर दण्डवत् करूँ।

(9) वे राजा की बात मानकर चल दिए। उन्होंने जिस तारे को उदित होते देखा था, वह उनके आगे आगे चलता रहा, और जहाँ बालक था उस जगह के ऊपर पहुँचने पर ठहर गया।

(10) वे तारा देख कर बहहुत आनन्दित हुए।

(11) घर में प्रवेश कर उन्होंने बालक को उसकी माता मरियम के साथ देखा और उसे साष्टांग प्रणाम किया। फिर अपना-अपना सन्दूक खोलकर उन्होंने उसे सोना, लोबान और गंधरस की भेट चढ़ायी।

(12) उन्हें स्वप्न में यह चेतावनी मिली के वे हेरोद के पास नहीं लौटें, इसलिए वे दूसरे रास्ते से अपने देश चले गये।

✍ -Br. Biniush Topno




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01 जनवरी 2023 ईशमाता कुँवारी मरियाम का पर्व

 

01 जनवरी 2023

ईशमाता कुँवारी मरियाम का पर्व



📒 पहला पाठ: गणना 6:22-27


22) प्रभु ने मूसा से कहा,

23) ''हारून और उसके पुत्रों से कहो - इस्राएलियों को आशीर्वाद देते समय यह कहोगे :

24) 'प्रभु तुम लोगों को आशीर्वाद प्रदान करे और सुरक्षित रखे।

25) प्रभु तुम लोगों पर प्रसन्न हो और तुम पर दया करे।

26) प्रभु तुम लोगों पर दयादृष्टि करे और तुम्हें शान्ति प्रदान करे।'

27) वे इस प्रकार इस्राएलियों के लिए मुझ से प्रार्थना करें और मैं उन्हें आशीर्वाद प्रदान करूँगा।


📕 दूसरा पाठ :गलातियों 4:4-7


4) किन्तु समय पूरा हो जाने पर ईश्वर ने अपने पुत्र को भेजा। वह एक नारी से उत्पन्न हुए और संहिता के अधीन रहे,

5) जिससे वह संहिता क अधीन रहने वालों को छुड़ा सकें और हम ईश्वर के दत्तक पुत्र बन जायें।

6) आप लोग पुत्र ही हैं। इसका प्रमाण यह है कि ईश्वर ने हमारे हृदयों में अपने पुत्र का आत्मा भेजा है, जो यह पुकार कर कहता है -’’अब्बा! पिता!’’ इसलिए अब आप दास नहीं, पुत्र हैं और पुत्र होने के नाते आप ईश्वर की कृपा से विरासत के अधिकारी भी हैं।

7) इसलिए अब आप दास नहीं, पुत्र हैं और पुत्र होने के नाते आप ईश्वर की कृपा से विरासत के अधिकारी भी हैं।


📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 2:16-21


16) वे शीघ्र ही चल पड़े और उन्होंने मरियम, यूसुफ़, तथा चरनी में लेटे हुए बालक को पाया।

17) उसे देखने के बाद उन्होंने बताया कि इस बालक के विषय में उन से क्या-क्या कहा गया है।

18) सभी सुनने वाले चरवाहों की बातों पर चकित हो जाते थे।

19) मरियम ने इन सब बातों को अपने हृदय में संचित रखा और वह इन पर विचार किया करती थी।

20) जैसा चरवाहों से कहा गया था, वैसा ही उन्होंने सब कुछ देखा और सुना; इसलिए वे ईश्वर का गुणगान और स्तुति करते हुए लौट गये।

21) आठ दिन बाद बालक के ख़तने का समय आया और उन्होंने उसका नाम ईसा रखा। स्वर्गदूत ने गर्भाधान के पहले ही उसे यही नाम दिया था।


📚 मनन-चिंतन


आज सभी ख्रीस्तीय विश्वासी ख्रीस्त के देहधारण के अद्भुत रहस्य पर विचार करने तथा उसे हृदय में संजोये रखने के लिए बुलाये जाते हैं। चरवाहों ने अपनी प्रतिक्रिया ईश्वर के आगमन की उस महान घटना के लिए ईश्वर की महिमा और प्रशंसा करते हुए व्यक्त किया। आज कलीसिया उस विनम्र महिला पर विशेष ध्यान देती है जिसने अपने हृदय और गर्भ में असीम आनन्द के साथ ईश्वर को ग्रहण किया। उनका आनंद इतना महान था कि वह आत्मा से प्रभु की महिमा करने वाले एक गीत में परिणित हुआ। वह अपने भीतर ईश्वर के आनंदमय रहस्य का उत्सव मनाने से पीछे नही हट सकती थी। वह वास्तव में ईश्वर की माता है क्योंकि जिनको उन्होंने गर्भ में धारण किया, वह सच्चा ईश्वर ही है। इसलिए वह स्त्रियों में सबसे अधिक धन्य हैं। हम भाग्यशाली हैं कि हम नए साल की शुरुआत उनके साथ चरनी में लेटे दिव्य बालक पर नजर डालते हुए करते हैं। वह हम में से प्रत्येक के लिए आने वाले वर्ष में अपने प्यारे बेटे से प्रार्थना करती रहे।



📚 REFLECTION

Today, all believers are called upon to ponder over and treasure in the heart the amazing mystery of the Incarnation of Christ. The instant response of the shepherds was to glorify and praise God for the great event of God coming down to be with human beings. Today the Church pays a special attention to the humble woman who received God in her heart and in her womb with immeasurable Joy. Her joy was so great that it broke into a song emerging from the soul glorifying God. She could not but celebrate the joyful mystery of God in her. She is truly the Mother of God because the son she conceived is true God. That is why she is the most blessed among women. We are fortunate to begin the New Year gazing at the divine child in the manger with her. May she intercede with her Son throughout the coming year for each one of us.



📚 मनन-चिंतन - 02


आज जब हम नए साल के पहले दिन की शुरुआत करते हैं तो हम पहले पाठ के शब्दों के साथ ईश्वर से पूरे साल पर आशीष माँगें। आज माता कलीसिया ईश माता मरियम का पर्व मनाती है. यह उचित है कि हम इस नए साल को माता मरियम की ममता की छांव तले शुरू करें। कलीसिया की शिक्षाओं द्वारा हमें माता मरियम के ईश माता होने का ज्ञान मिलता है। लेकिन सवाल उठ सकता है कि माता मरियम जो कि हमारी ही तरह नश्वर मनुष्य होते हुए, उस ईश्वर की जो अनश्वर है, जिसका आदि और अंत नहीं है, उस सृजनहार की माता कैसे कहला सकती है? एक मनुष्य जिसकी रचना स्वयं ईश्वर ने की हो वही अपने सृष्टिकर्ता और सर्वशक्तिमान ईश्वर की माता कैसे हो सकती है? इस सवाल का जवाब दूसरे सवाल के जवाब में छिपा है और वह सवाल है कि प्रभु येसु मनुष्य हैं, या ईश्वर हैं, या दोनों हैं?

ये सवाल और इसी तरह के अनेक सवाल कलिसिया के प्रारम्भ में उठे और उनका अध्ययन किया और कलिसिया के धर्मपिताओं एवं बड़े-बड़े विद्वानों ने यह घोषित किया कि प्रभु येसु पूर्ण मनुष्य और पूर्ण ईश्वर थे। (एफ़ेसुस की समिति ४३१ ईसवी)। वह अंशतः ईश्वर और अंशतः मनुष्य नहीं, अथवा कुछ समय के लिए ईश्वर और कुछ समय के लिए मनुष्य नहीं थे, बल्कि पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य थे। प्रभु येसु का मनुष्य स्वभाव और ईश्वरीय स्वभाव दोनों अभिन्न थे, क्योंकि उन्होंने हमें पूर्ण ईश्वर और पूर्ण मनुष्य होते हुए मुक्ति दिलाई। अगर वह केवल इंसान थे तो उनकी मृत्यु से मानवजाति को कोई लाभ नहीं, अगर वह सिर्फ़ ईश्वर थे, तो ईश्वर हमारे लिए मर नहीं सकता। चूँकि प्रभु येसु पूर्ण मनुष्य और पूर्ण ईश्वर थे, तभी वे हमारे मुक्तिदाता हो सकते हैं। यदि माता मरियम प्रभु येसु के मनुष्य रूप की माँ है तो वह उनके ईश्वरीय रूप की भी माँ है, क्योंकि ये दोनों अविभाजित और अभिन्न हैं। यदि प्रभु येसु ईश्वर हैं, और मरियम प्रभु येसु की माता है तो वह ईश्वर की माता भी कही जा सकती हैं।

आइए हम इस नव वर्ष को माता मरियम के द्वारा ईश्वर को चढ़ाएँ, वही माता जिसका पुत्र उसकी आज्ञा को कभी नहीं नकार सकता। ईश माता मरियम हमारे लिए प्रार्थना करती रहे, हमारी देख-भाल करती रहे और हमें अपने पुत्र, हमारे मुक्तिदाता की ओर आने की राह दिखाती रहे। आमेन।



📚 REFLECTION


Today as we begin the very first day of this new year, we ask the Lord to bless us through the words of blessing from the first reading. Today mother church celebrates the Feast of Mary - mother of God. It is most appropriate that we start this fresh new year in the motherly care of our beloved mother. We learn from the teachings of the church about Mary being mother of God. But question may arise, how Mary who is a mortal human being like you and me and God who is creator of all and who has no beginning or end, be God’s mother? How a human being created by God be the mother of creator and all powerful God? The answer to this question is hidden in the answer about whether Jesus is God or man or both?

These and many similar questions were raised and discussed during the early beginnings of the Church, where the church fathers and great scholars established that Jesus Christ was fully human and fully God, (Council of Ephesus 431 AD). He was not partially God and partially man or sometimes God and sometimes human. These both natures of God are inseparable because Jesus saved us being truly God and truly human. If he had only been fully human, his death would do nothing to help us, had he been entirely God, he could not have died for us. It is the very fact that Jesus was fully human and fully God that makes Jesus our saviour. So if mother Mary is the mother of human Jesus, then she is also mother of divine Jesus, because both are same and cannot be separated. And if Jesus is God and Mary is mother of Jesus then Mary is mother of God.

Let us offer this new year to God through Mother Mary, to whom he can never deny a favour. May mother of God continue to intercede for us and take care of us and continue to show the way to her Son Jesus our Saviour. Amen.



मनन-चिंतन 03


अगर आप साधारण विश्वासियों से पूछेंगे कि आप माँ मरियम को ईश्वर की माता क्यों मानते हैं, तो शिक्षित विश्वासी लोग शायद आप को जवाब देंगे कि माँ मरियम ने येसु को जन्म दिया; येसु ईश्वर हैं और इसलिए माँ मरियम ईश्वर की माँ हैं। लेकिन अगर हम प्रभु येसु से ही पूछते हैं कि आप माँ मरियम को अपनी माँ क्यों मानते हैं तो येसु हम से कहेंगे कि उन्होंने ईश्वर के वचन को विनम्रता से स्वीकार किया, उसे अपने हृदय में संचित रखा और उसका अपने जीवन में पालन किया। प्रभु कहते हैं, “मेरी माता और मेरे भाई वही है, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं (लूकस 8:21)।

दरअसल जब कभी कोई अपनी माता के बारे में सोचता है, शायद ही वह इस बात को याद करता है कि उसने मुझे जन्म दिया है, बल्कि माँ के प्यार, बलिदान की भावना, ममता तथा कुर्बानियों को ही याद करता है।

आज हम ईशमाता कुँवारी मरियम का त्योहार मना रहे हैं। यह त्योहार हमें यह बताता है कि ईश्वर कितने उदार है, कि ईश्वर की आज्ञाओं का विनम्रता के साथ पालन करने वालों को ईश्वर कितना ऊपर उठाते हैं। अपनी सृष्टि में से ही किसी को वे माँ कहते हैं और उन्हें आदर और सम्मान से विभूषित करते हैं। वे उन्हीं से सीखने और अन्य मानवों की तरह उनके गर्भ में नौ महीनों तक रहते हैं।

कई बार हम प्रार्थना करते हैं, “हे परमेशवर की पवित्र माँ हमारे लिए प्रार्थना कर, कि हम ख्रीस्त की प्रतिज्ञाओं के योग्य बन जायें”। माता मरियम अपने आप को प्रभु की दासी मानती हैं। यह उनकी विनम्रता का प्रमाण है। इस विनम्रता के कारण वे ईश्वर की प्रतिज्ञाओं के योग्य बन गयी। इसी कारण ईश्वर ने माँ मरियम को सभी मानवों में धन्य बनाया। माँ मरियम स्वयं यह घोषित करती हैं कि सर्वशक्तिमान ने ही उन्हें महान बना दिया है।

संत लूकस हमें बताते हैं कि प्रभु येसु के प्रवचन सुन कर, उससे प्रभावित हो कर “भीड़ में से कोई स्त्री उन्हें सम्बोधित करते हुए ऊँचे स्वर में बोल उठी, ’’धन्य है वह गर्भ, जिसने आप को धारण किया और धन्य हैं वे स्तन, जिनका आपने पान किया है!” (लूकस 11:27) लेकिन प्रभु की प्रतिक्रिया पर ध्यान दीजिए। उन्होंने उत्तर दिया, “ठीक है; किन्तु वे कहीं अधिक धन्य हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं” (लूकस 11:28)।

हमें भी मातृत्व को गर्भधारण तथा स्तनपान कराने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। मातृत्व एक काम नहीं है बल्कि एक संबंध है। हाँलाकि नाभिरज्जु (umbilical cord) बच्चे के जन्म के समय काट दिया जाता है, विश्वासी लोग ईशवचन के द्वारा जो संबंध स्थापित करते हैं, वह बना रहता तथा दिन प्रतिदिन मजबूत होता जाता है। माँ को केवल बच्चों तथा पति के लिए काम करते रहने वाली एक महिला के रूप में देखना एक बहुत ही संकुचित दृष्टिकोण है। आज के समाज की यह वास्त्तविकता है कि माताओं को वह स्थान नहीं दिया जाता है जो असल में उनका है।

माँ मरियम उन सब महिलाओं का प्रतीक है जो माँ होने के कारण बलिदान, उदारता, ममता तथा समर्पण का जीवन बिताती हैं। जब ईश्वर ने स्त्री की सृष्टि की थी, तब उन्होंने उसे एक ’उपयुक्त सहयोगी’ (उत्पत्ति 2:18) के रूप में सृष्ट किया था। हम भी दृढ़संकल्प करें कि हम भी माँ मरियम के समान विनम्र और उदार बनें ताकि उन्हीं के समान ईश्वर के कृपापात्र बन सकें।



मनन-चिंतन 03



आज हम ईशमाता मरियम के साथ नए साल की शुरुआत कर रहे हैं। हम उन्हें ईश्वर के पवित्र वचन पर मनन करते हुए पाते हैं। यह किसी भी ख्रीस्तीय विश्वासी के लिए एक आदर्श है। यह केवल एक पल का कार्य नहीं है, बल्कि एक निरंतर स्वभाव है। स्तोत्रकार कहता है, “जो प्रभु का नियम हृदय से चाहता और दिन-रात उसका मनन करता है, वह उस वृक्ष के सदृश है, जो जलस्रोत के पास लगाया गया, जो समय पर फल देता है, जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। वह मनुष्य जो भी करता है, सफल होता है।” (स्तोत्र 1:2-3) विधि-विवरण 4:4 में प्रभु का वचन कहता है,"जो अपने प्रभु-ईश्वर के प्रति ईमानदार बने रहे, तुम सब-के-सब आज तक जीवित हो।"। वास्तव में जीवित रहने के लिए हमें जीवन के स्रोत ईश्वर से जुडे रहने की आवश्यकता है। यह वही है जो कुँवारी मरियम ने ईश्वर के वचन को अपने दिल में रखकर किया था। शारीरिक रूप से प्रभु येसु नौ महीने तक मरियम के कोख में थे, लेकिन आध्यात्मिक रूप से वे माता मरियम में हमेशा थे। जैसा कि हम नए साल की शुरुआत कर रहे हैं, आइए हम भी इस वर्ष के दौरान येसु से हमेशा जुड़े रहने का दृढ़संकल्प करें।




📚 REFLECTION

Today we begin the New Year with Mary, the Mother of God. We find her pondering over the Word of God. This is a great disposition for any Christian. It is not just a one time action, but a continual disposition. The Psalmist says, “their delight is in the law of the Lord, and on his law they meditate day and night. They are like trees planted by streams of water, which yield their fruit in its season, and their leaves do not wither. In all that they do, they prosper.” (Ps 1:2-3) In Deut 4:4 the Word of God says, “those of you who held fast to the Lord your God are all alive today”. To be truly alive we need to be glued to God, the source of life. This is what our Lady did by treasuring the Word of God in her heart. Physically Jesus was in her for nine months, but spiritually He was in her all through her life. As we begin the New Year, let us resolve to be glued to Jesus during the course of this year.


 -Br. Biniush Topno


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18 दिसंबर 2022 चक्र – अ, आगमन का चौथा इतवार

 

18 दिसंबर 2022

चक्र – अ, आगमन का चौथा इतवार




पहला पाठ : इसायाह 7:10-14

10) प्रभु ने फिर आहाज़ से यह कहा,

11) “चाहे अधोलोक की गहराई से हो, चाहे आकाश की ऊँचाई से, अपने प्रभु-ईश्वर से अपने लिए एक चिन्ह माँगो“।

12) आहाज़ ने उत्तर दिया, “जी नहीं! मैं प्रभु की परीक्षा नहीं लूँगा।“

13) इस पर उसने कहा, “दाऊद के वंश! मेरी बात सुनो। क्या मनुष्यों को तंग करना तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं है, जो तुम ईश्वर के धैर्य की भी परीक्षा लेना चाहते हो?

14) प्रभु स्वयं तुम्हें एक चिन्ह देगा और वह यह है - एक कुँवारी गर्भवती है। वह एक पुत्र को प्रसव करेगी और वह उसका नाम इम्मानूएल रखेगी।



दूसरा पाठ : रोमियों 1:1-7

1) यह पत्र ईसा मसीह के सेवक पौलुस की ओर से है, जो ईश्वर द्वारा प्रेरित चुना गया और उसके सुसमाचार के प्रचार के लिए नियुक्त किया गया है।

2) जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है, ईश्वर ने बहुत पहले अपने नबियों द्वारा इस सुसमाचार की प्रतिज्ञा की थी।

3) यह सुसमाचार ईश्वर के पुत्र, हमारे प्रभु ईसा मसीह के विषय में है।

4) वह मनुष्य के रूप में दाऊद के वंश में उत्पन्न हुए और मृतकों में से जी उठने के कारण पवित्र आत्मा द्वारा सामर्थ्य के साथ ईश्वर के पुत्र प्रमाणित हुए।

5) उन से मुझे प्रेरित बनने का वरदान मिला है, जिससे मैं उनके नाम पर ग़ैर-यहूदियों में प्रचार करूँ और वे लोग विश्वास की अधीनता स्वीकार करें।

6) उन में आप लोग भी हैं, जो ईसा मसीह के समुदाय के लिए चुने गये हैं।

7) मैं उन सबों के नाम यह पत्र लिख रहा हूँ, जो रोम में ईश्वर के कृपापात्र और उसकी प्रजा के सदस्य हैं। हमारा पिता ईश्वर और प्रभु मसीह आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति प्रदान करें!



सुसमाचार : मत्ती 1:18-24

(18) ईसा मसीह का जन्म इस प्रकार हुआ। उनकी माता मरियम की मँगनी यूसुफ़ से हुई थी, परन्तु ऐसा हुआ कि उनके एक साथ रहने से पहले ही मरियम पवित्र आत्मा से गर्भवती हो गयी।

(19) उसका पति यूसुफ़ चुपके से उसका परित्याग करने की सोच रहा था, क्योंकि वह धर्मी था और मरियम को बदनाम नहीं करना चाहता था।

(20) वह इस पर विचार कर ही रहा था कि उसे स्वप्न में प्रभु का दूत यह कहते दिखाई दिया, "यूसुफ! दाऊद की संतान! अपनी पत्नी मरियम को अपने यहाँ लाने में नहीं डरे,क्योंकि उनके जो गर्भ है, वह पवित्र आत्मा से है।

(21) वे पुत्र प्रसव करेंगी और आप उसका नाम ईसा रखेंगे, क्योंकि वे अपने लोगों को उनके पापों से मुक्त करेगा।"

(22) यह सब इसलिए हुआ कि नबी के मुख से प्रभु ने जो कहा था, वह पूरा हो जाये -

(23) देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और पुत्र प्रसव करेगी, और उसका नाम एम्मानुएल रखा जायेगा, जिसका अर्थ हैः ईश्वर हमारे साथ है।

(24) यूसुफ़ नींद से उठ कर प्रभु के दूत की आज्ञानुसार अपनी पत्नी को अपने यहाँ ले आया।

📚 मनन-चिंतन

आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि ईश्वर यूदा के राजा आहाज़ को एक चिन्ह देना चाहते हैं, जिसके द्वारा ईश्वर यह प्रकट करना चाहते हैं कि वह सदा उनके साथ हैं और उन्हें उनके राज्य को सदा सुरक्षित रखेंगे और आशीष प्रदान करेंगे। वह चिन्ह यह था कि एक बालक उत्पन्न होगा और जिसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा जिसका अर्थ है ईश्वर हमारे साथ है। आज का सुसमाचार यह दर्शाता है कि नबी इसायाह की वह भविष्यवाणी किस तरह से प्रभु येसु में पूर्ण हुई। माता मरियम वह पवित्र कुँवारी थी जो पवित्र आत्मा की शक्ति से गर्भवती हुईं जिन्होंने उस बच्चे को जन्म दिया जो इम्मानुएल कहलाता है। सन्त योसेफ़ जब ईश्वर की योजना को नहीं समझ पाते हैं तो ईश्वर का दूत उनके सपने में आकर उन्हें ईश्वर की योजना समझाता है।

यूदा राज्य पर सदा से ही ईश्वर की विशेष कृपा थी। जब भी ईश्वर के चुने हुए लोगों पर कोई विपत्ति या संकट आया तो ईश्वर ने सदा उनकी रक्षा की लेकिन लोगों ने ईश्वर पर भरोसा नहीं किया। ईश्वर नहीं चाहते कि ईश्वर पर भरोसा न करने की जो गलती राजा आहाज़ ने की थी वही गलती सन्त योसेफ न दुहराए। अगर हम पूरे मुक्ति इतिहास को एक शब्द में समझने की कोशिश करें तो वह एक शब्द होगा - इम्मानुएल। जब लोगों ने ईश्वर पर भरोसा नहीं किया, ईश्वर की आज्ञाओं का पालन नहीं किया, पाप के रास्ते पर गए तो ईश्वर ने उन्हें निर्वासित किया, लेकिन उस निर्वासन के समय भी ईश्वर ने उन्हे त्यागा नहीं।

उनके प्रति ईश्वर का प्रेम इन शब्दों से व्यक्त किया जा सकता है - “क्या स्त्री अपना दुधमुँहा बच्चा भुला सकती है? क्या वह अपनी गोद के पुत्र पर तरस नहीं खाएगी? यदि वह भुला भी दे, तो भी मैं तुम्हें कभी नहीं भुलाऊँगा।” (इसायाह 49:15)। जब हम ईश्वर से दूर चले जाते हैं, उनकी आज्ञाओं पर नहीं चलते, उन पर भरोसा नहीं करते तो हम भी उन निर्वासित लोगों की तरह हो जाते हैं। ईश्वर की आज्ञाओं को नहीं मानना मृत्यु को चुनने के समान है। लेकिन ईश्वर कहते हैं - मैं पापी की मृत्यु से प्रसन्न नहीं होता। (देखें एजेकिएल 18:23)।

इसलिए प्रभु आज हमसे वादा करते हैं कि वह सदा हमारे साथ हैं, लेकिन यदि हम प्रभु को प्यार करते हैं तो हमें उनकी आज्ञाओं को मानना पड़ेगा। ईश्वर ने अपने से मेल कराने के लिए ही अपने पुत्र प्रभु येसु को भेजा है। हम अपने जीवन में ईश्वर की उपस्थिति को तभी महसूस कर सकते हैं जब हम अपने पापों को त्याग देंगे और अपना जीवन प्रभु को समर्पित कर देंगे। प्रभु येसु हम सबों के दिलों में जन्म लें।



📚 REFLECTION

In the first reading of today we see that God wants to give a sign to king Ahaz of Judah. Through the sign God wants to show him that God is with him to bless and protect him and his kingdom. The sign was of the child who was to be born and the name of the child would be Emmanuel, meaning God is with us. The Gospel of the day describes how that prophecy was to be fulfilled in Jesus Christ. Mother Mary was that virgin who was conceived by the power of the Holy Spirit, and was to give birth to a son who was to be named Emmanuel. God’s plan is revealed to St. Joseph in a dream, because he could not understand what was going on.

The Tribe of Judah and later the kingdom of Judah were the specially chosen people of God. Whenever there was any crisis on these people, God assured them of his protection, but they would not trust in the Lord. God does not want Joseph to repeat the same mistake of not trusting which was made by king Ahaz. If you want to summarize the whole human history and salvation history in one word, that one word would be Emmanuel. When people were not faithful to God, when they went behind other gods, when they did not keep up the statutes and commandments of God, they were punished with exile. But even in exile they were not left without God.

God’s assurance to them can be expressed in these words - “Can a mother forget her nursing child or show no compassion for the child of her womb? Even these may forget yet I will not forget you.”(Isa 49:15). Today we are also in exile in the valley of tears. When we go against God, by not following his statutes and commandments, we also become like people in exile. By choosing to disobey God, we choose death. But God is never happy to see us being destroyed by our sinfulness (cf Ezek 18:23).

Therefore today, he assures us that he is there always with us, but the condition is that we obey his commandments and we trust him. God sent his son, our Lord Jesus to forgive our sins and reconcile us to God. We can have true experience of Emmanuel only when we confess our sins and surrender our life to God. May Jesus be born in the hearts of us all this Christmas. Amen.


मनन-चिंतन - 2

एक बार मैं एक महिला से मिलने गया। वह बहुत कम आवाज़ में बोल रही थी। उसने कहा कि उसका बच्चा अंदर सो रहा था और अगर वह जोर से बोलती तो बच्चे की नींद खुल जाती। हम उन लोगों की जरूरतों, पसंद और नापसंद के बारे में चिंतित हैं जिन्हें हम प्यार करते हैं। अगर हम प्रभु ईश्वर की पसंद और नापसंद के बारे में चिंतित होना सीखेंगे, तो हम पवित्रता में बढ़ेंगे।

जब ईश्वर का वचन हमारे दिलों में बसना शुरू होता है, तब पवित्रता का बीज हमारे जीवन में बोया जाता है। स्तोत्रकार कहता है, “मैंने तेरे वचन को अपने हृदय में सुरिक्षत रखा, जिससे मैं तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।” (स्तोत्र 119: 11)। ईश्वर का यह वचन यूसुफ और मरियम के जीवन में जीवित पाया जाता है। जिसके हृदय में ईश्वर का वचन है, वह व्यक्ति अवश्य ही ईमानदार और धर्मी बनता है। यह यूसुफ के जीवन में सच है जिसके कारण संत मत्ती के सुसमाचार में वे एक ईमानदार और न्यायपूर्ण व्यक्ति के रूप में वर्णित है। ऐसे व्यक्ति से परिवार और समाज में ईश्वर की मौजूदगी की लहरें निकलती हैं। ऐसा व्यक्ति ईश्वर की तलाश करता रहता है और भलाई करता चला जाता है। एक ईमानदार व्यक्ति दूसरों के लिए मुसीबतें नहीं लाता बल्कि केवल आराम और सांत्वना देता है। यह संत यूसुफ के जीवन से प्रमाणित है। वे मरियाम के अच्छे नाम को कलंकित नहीं करना चाहते थे और उन्हें चुपके से अनौपचारिक रूप से तलाक देने का फैसला किया। यहाँ तक उनकी मानवीय भावना उन्हें ले जा सकती है। लेकिन ईशवचन उन्हें एक अतिरिक्त मील जाने की मांग की, मरियम को अपनी पत्नी के रूप में घर ले जाने के लिए। इसी तरह से यूसुफ ने अपने साधारण घर में ईश्वर के लिए जगह बनाई। यूसुफ का साधारण घर दुनिया के सबसे सजी हुए गिरिजाघरों और मंदिरों से अधिक महत्वपूर्ण जगह बन गया। उनका दिल सर्वशक्तिमान के लिए एक मंदिर बन गया था। जब मरियम ने ईश्वर को अपने गर्भ में प्राप्त किया, तब यूसुफ ने उसे अपने हृदय में स्वीकार किया। उन्होंने ईश्वर की वाणी का पालन किया और ईश्वर की इच्छा को पूरा किया। येसु ने बाद में कहा, "जो ईश्वर की इच्छा पूरी करता है, वही है मेरा भाई, मेरी बहन और मेरी माता।" (मारकुस 3:35)। लूकस का संस्करण थोड़ा अलग है - "मेरी माता और मेरे भाई वहीं हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं" (लूकस 8:21)। ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन बिता कर हम भी यूसुफ की तरह पवित्र बन सकते हैं। आइए हम प्रभु से प्रार्थना करें कि वे हमें ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करने के लिए अनुग्रह प्रदान करें।



REFLECTION

Once I went to visit a lady. She was speaking in a very low voice. She said that her child was sleeping inside and if she spoke loudly, the child’s sleep would be disturbed. We are concerned about the needs, likes and dislikes of people whom we love. If we are concerned about the likes and dislikes of God, we shall grow in holiness.

When the Word of God begins to dwell in our hearts, the seed of holiness is sown in our lives. The Psalmist says, “I treasure your word in my heart, so that I may not sin against you” (Ps 119:11). This Word of God is found alive in the lives of Joseph and Mary. A person with the Word of God in the heart has to be an upright and righteous person. This is true of Joseph who is described in the Gospel of Matthew as an upright and just man. Such a person can and does vibrate the presence of God in the family and in the society. Greater holiness results in greater uprightness. Such a person keeps seeking God and goes about doing good. An upright person does not bring troubles to others but only comfort and consolation. This is testified by the life St. Joseph. He did not want to tarnish the good name of Mary and decided to divorce her informally. This is where his human sense could take him. But the Word in him demanded to go an extra mile, to take her home as his wife. This is how Joseph made space for God in his simple house. Joseph’s simple house became greater than the most adorned cathedrals and basilicas of the world. His heart had become even greater a temple for the Almighty. While Mary received God into her womb, Joseph received him into his heart. He obeyed the voice of God and did God’s will. Jesus would later say, “Whoever does the will of God is my brother and sister and mother” (Mk 3:35). The Lucan version is slightly different – “My mother and my brothers are those who hear the word of God and do it” Lk 8:21). By confirming to God’s will, we too can become holy like Joseph. Let us ask the Lord to give us the grace to confirm to God’s will.


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!