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इतवार, 19 दिसंबर, 2021

 

इतवार, 19 दिसंबर, 2021

आगमन का चौथा इतवार

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पहला पाठ : मीकाह का ग्रन्थ 5:1-4a


1) बेथलेहेम एफ्राता! तू यूदा के वंशों में छोटा है। जो इस्राएल का शासन करेगा, वह मेरे लिए तुझ में उत्पन्न होग। उसकी उत्पत्ति सुदूर अतीत में, अत्यन्त प्राचीन काल में हुई है।

2) इसलिए प्रभु उन्हें तब तक त्याग देगा, जब तक उसकी माता प्रसव न करे। तब उसके बचे हुए भाई इस्राएल के लोगों से मिल जायेंगे।

3) वह उठ खडा हो जायेगा, वह प्रभु के सामर्थ्य से तथा अपने ईश्वर के नाम प्रताप से अपना झुण्ड चरायेगा। वे सुरक्षा में जीवन बितायेंगे, क्योंकि वह देश के सीमान्तों तक अपना शासन फैलायेगा

4) और शांति बनाये रखेगा।



दूसरा पाठ: इब्रानियों के नाम पत्र 10:5-10


5) इसलिए मसीह ने संसार में आ कर यह कहा: तूने न तो यज्ञ चाहा और न चढ़ावा, बल्कि तूने मेरे लिए एक शरीर तैयार किया है।

6) तू न तो होम से प्रसन्न हुआ और न प्रायश्चित्त के बलिदान से;

7) इसलिए मैंने कहा - ईश्वर! मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ, जैसा कि धर्मग्रन्थ में मेरे विषय में लिखा हुआ है।

8) मसीह ने पहले कहा, ’’तूने यज्ञ, चढ़ावा, होम या या प्रायचित्त का बलिदान नहीं चाहा। तू उन से प्रसन्न नहीं हुआ’’, यद्यपि ये सब संहिता के अनुसार ही चढ़ाये जाते हैं।

9) तब उन्होंने कहा, ’’देख, मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ’’। इस प्रकार वह पहली व्यवस्था को रद्द करते और दूसरी का प्रवर्तन करते हैं।

10) ईसा मसीह के शरीर के एक ही बार बलि चढ़ाये जाने के कारण हम ईश्वर की इच्छा के अनुसार पवित्र किये गये हैं।


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 1:39-45


39) उन दिनों मरियम पहाड़ी प्रदेश में यूदा के एक नगर के लिए शीघ्रता से चल पड़ी।

40) उसने ज़करियस के घर में प्रवेश कर एलीज़बेथ का अभिवादन किया।

41) ज्यों ही एलीज़बेथ ने मरियम का अभिवादन सुना, बच्चा उसके गर्भ में उछल पड़ा और एलीज़बेथ पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गयी।

42) वह ऊँचे स्वर से बोली उठी, ’’आप नारियों में धन्य हैं और धन्य है आपके गर्भ का फल!

43) मुझे यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आयीं?

44) क्योंकि देखिए, ज्यों ही आपका प्रणाम मेरे कानों में पड़ा, बच्चा मेरे गर्भ में आनन्द के मारे उछल पड़ा।

45) और धन्य हैं आप, जिन्होंने यह विश्वास किया कि प्रभु ने आप से जो कहा, वह पूरा हो जायेगा!’’



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में मरियम और ऐलिजाबेथ के मिलन को पाते हैं। मरियम ने ज्यों ही एलिजाबेथ का अभिवादन किया एलिजाबेथ उँचे स्वर से बोल उठीं, "आप नारीयों में धन्य है और धन्य है आपके गर्भ का फल"(लूकस 1:42) एलिजाबेथ ने माता मरियम के ईश्वर पर अटूट विश्वास के कारण उन्हें धन्य कहा। वह विश्वास के कारण ही ईश्वर की माता बनने के लिए चुनी गयी। उनके द्वारा इस संसार को मुक्तिदाता मिल गये | "धन्य हैं आप, जिन्होंने यह विश्वास किया कि प्रभु ने आपसे ने जो कहा वह पूरा हो जायेगा।" (लूकस 1:45)

हम भी धन्य बन सकते हैं अगर हम ईश्वर पर विश्वास तथा उनके वचनों का पालन करते हैं तो। धन्य है वे जो धार्मिकता के भूखे हैं और प्यासे है, वे तृप्त किये जायेंगे। (मत्ती: 5:6) "किन्तु वे कहीं अधिक धन्य है, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं" (लूकस 11:28) आइये हम भी ईश्वर की नज़रों में धन्य बनने की कोशिश करे।


📚 REFLECTION




In today's gospel we find that Mary is meeting Elizabeth. As soon as Mary greeted Elizabeth, Elizabeth exclaimed with a loud voice, "Blessed are you among women and blessed is the fruit of your womb." (Lk 1:42). Elizabeth said Mary as blessed Mother, because of Mary’s unwavering faith in God. She was chosen to become the Mother of God because of her faith and through her the world has found the saviour. "Blessed are you who have believed that what the Lord said will come true”. (Lk1:45) We too can be blessed, if we believe in God and obey his words. “Blessed are those who are hungry and thirsty for righteousness. They will be satisfied (Matthew: 5:6). “But far more blessed are those who hear and obey the word of God (Lk 11:28).

Let us try to be blessed in the eyes of God.


मनन-चिंतन - 2



जब बच्चों के लिए मिस्सा बलिदान हो रहा था, तब एक फटे पुराने कपडे पहने व्यक्ति ने गिरजा घर में प्रवेश किया। वह बैठ गया और जल्दी उसे नींद लगी। मिस्सा के बाद बच्चों ने माता मरियम का गीत गाये -

Mother of Christ, star of the sea,

Pray for the wanderer, pray for me.

गीत सुन कर वह आदमी जाग उठा और फूट फूट कर रोने लगा। बच्चो ने उसके पास आ कर संवेदना प्रकट की। उस आदमी ने बच्चों से कहा – “आप के उम्र में मैं भी एक अच्छा काथलिक बच्चा था, बराबर चर्च जाता था, प्रार्थना करता था। जल्दी मैं कुछ दोस्तों के प्रभाव में आकर हर प्रकार की बुराई के वश में आ गया। चर्च जाना और प्रार्थना करना तब से मैं ने छोड दिया। वह पदच्युत व्यक्ति (wanderer) मैं हूँ जिस के लिए आप बच्चों ने इस गीत में अभी प्रार्थना की। मैं वापस आ गया प्रभु येसु! माता मरियम मेरे लिए प्रार्थना करना; बच्चों, आप भी मेरे लिये प्रार्थना करना।”

बच्चों द्वारा गाये उस मरियम भक्ति-प्रार्थना गीत ने उस डावाडोल आदमी को विश्वास मंन पुनः आने की कृपा दी। इस प्रकार का अनुभव कुछ लोगों का नहीं बल्कि करोडों लोगों का है। अतः कलीसिया यह सिखाती आयी है– “मरियम के द्वारा येसु की ओर” (To Jesus through Mary)। प्रभु येसु को पहचानने एवं मुक्तिदाता के रूप में ग्रहण करने के लिए मरियम मध्यस्थता एक विशेष भूमिका निभाती है।

ईशपुत्र येसु को अपने गर्भ में धारण करती हुई मॉ मरियम अपनी परिजन एलीजबेथ से मिलने जाती है। इस मिलन में एलीज़बेथ और उसकी कोख में पले रहे योहन को अनोखा दैविक अनुभव प्राप्त होता जिसका वर्णन एलीज़बेथ के शब्दों में है – “ज्यों ही आपका प्रणाम मेरे कानों में पडा, बच्चा मेरे गर्भ में आनन्द के मारे उछल पडा।”

ख्रीस्तीय होने का मतलब येसु को धारण करना होता है (रोमियों 13:14)। जो येसु को अपने जीवन में धारण करते हैं, वे आनन्द और शॉति का स्रोत येसु के माध्यम बनकर अन्य लोगों के लिए मुक्ति और खुशी प्रदान कर सकेंगे।

मरियम येसु को अपने गर्भ में धारण करने के बाद अपनी परिजन एलीज़बेथ से मिलने जाती है और उनकी सेवा शुश्रूषा करती है। मरियम को येसु की माता होने के अलावा येसु की प्रथम ’प्रेरित’ भी कहा जा सकता है जो येसु को धारण करती हुई एलीजबेथ से मिलती है और मसीह के आगमन के शुभ संदेश दोनों बहने आपस मे बॉटती हैं। मरियम में जो मूलभूत गुण है वह सभी ख्रीस्तीयों में होना चाहिये ताकि हरेक ख्रीस्तीय प्रेरित बनकर येसु के मुक्ति कार्य को लोगों तक पहुँचा सकें। ये मूलभूत गुण हैं -

मरियम को ईश्वर में दृढ विश्वास था। स्वर्गदूत गब्रिएल से प्राप्त संदेश में मरियम ने विश्वास किया एवं ईशमाता बनने के लिए अपनी बिना शर्त सहमति दी जिसके दूरगामी परिणामों को वह नहीं समझ पाती थी।

मरियम ईश्वर की योजनाओं के प्रति समर्पित थी – “देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ, आपका वचन मुझमें पूरा हो जायें। (लूकस 1:38)

मरियम सेवाभाव और संवेदना से भरी थी। वह अपने परिजन एलीज़बेथ से मिलने जाती और सेवा करती है। काना के विवाह भोज में अंगूरी समाप्त होने पर मरियम उस परिवार की व्याकुलता के प्रति संवेदनशील होती है और जानती है कि इस समस्या का समाधान केवल अपने पु़त्र येसु से ही हो सकता है। अतः मरियम इस समस्या को येसु के समक्ष रखती है। यहॉ येसु अपना पहला चमत्कार करते है। (योहन 2:3-10)

मरियम का जीवन आनन्द एवं कृतज्ञता का है। मरियम का स्तुतिगान ईश्वर के प्रति अपना आनन्द एवं कृतज्ञता का मधुर गीत है। जिसमें आनन्द नहीं, वह दुसरों को आनन्द नहीं दे सकता; जो कृतज्ञ नहीं, वे आनन्दित रह नहीं सकता क्योंकि उनके सोच नकारात्मक होता है। जिसमें आनन्द नहीं, वे येसु के शुभ संदेश नहीं दे सकता।

माता मरियम के इन गुणों को हम अपने जीवन में अपनायें ताकि हम प्रभु येसु मसीह के साक्षी बन सकें। इस आगमन काल के अंतिम इतवार को हम माता मरियम जैसे अपने हृदय को आनन्द और कृतज्ञता से भरें ताकि ईशपुत्र येसु मसीह को हम अपने हृदय में स्वागत करें, धारण करें। हमारे विचार सकारात्मक बने और हम पाप मुक्ति पाकर येसु के बन जायें।


✍-Br. Biniush topno


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गुरुवार, 16 दिसंबर, 2021

 

गुरुवार, 16 दिसंबर, 2021

आगमन का तीसरा सप्ताह

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📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 54:1-10


1) “बन्ध्या! तुझे कभी पुत्र नहीं हुआ। अब आनन्द मना। तूने प्रसवपीड़ा का अनुभव नहीं किया। उल्लास के गीत गा, क्योंकि प्रभु यह कहता है, -’विवाहिता की अपेक्षा परित्यक्ता के अधिक पुत्र होंगे।’

2) “अपने शिविर का क्षेत्र बढ़ा। अपने तम्बू के कपड़े फैला। उसके रस्से और लम्बे कर। उसकी खूँटियाँ और दृढ़ कर;

3) क्योंकि तू दायें और बायें फैलेगी। तेरा वंश राष्ट्रों को अपने अधीन करेगा और तेरी सन्तति उजाड़ नगरों में बस जायेगी।

4) “डर मत- तुझे निराशा नही होगी। घबरा मत- तुझे लज्जित नहीं होना पड़ेगा। तू अपनी तरुणाई का कलंक भूल जायेगी, तुझे अपने विधवापन की निन्दा याद नहीं रहेगी।

5) “तेरा सृष्टिकर्ता ही तेरा पति है। उसका नाम है- विश्वमण्डल का प्रभु। इस्राएल का परमपावन ईश्वर तेरा उद्धार करता है। वह समस्त पृथ्वी का ईश्वर कहलाता है।

6) “परित्यक्ता स्त्री की तरह दुःख की मारी! प्रभु तुझे वापस बुलाता है। क्या कोई अपनी तरुणाई की पत्नी को भुला सकता है?“ यह तेरे ईश्वर का कथन है।

7) “मैंने थोड़ी ही देर के लिए तुझे छोड़ा था। अब मैं तरस खा कर, तुझे अपने यहाँ ले जाऊँगा।

8) मैंने क्रेाध के आवेश में क्षण भर तुझ से मुँह फेर लिया था। अब मैं अनन्त प्रेम से तुझ पर दया करता रहूँगा।“ यह तेरे उद्धारकर्ता ईश्वर का कथन है।

9) “नूह के समय मैंने शपथ खा कर कहा था कि प्रलय की बाढ़ फिर पृथ्वी पर नहीं आयेगी। उसी तरह मैं शपथ खा कर कहता हूँ कि मैं फिर तुझ पर क्रोध नहीं करूँगा और फिर तुझे धमकी नहीं दूँगा।

10) “चाहे पहाड़ टल जायें और पहाड़ियाँ डाँवाडोल हो जायें, किन्तु तेरे प्रति मेरा प्रेम नहीं टलेगा और तेरे लिए मेरा शान्ति-विधान नहीं डाँवाडोल होगा।“ यह तुझ पर तरस खाने वाले प्रभु का कथन है।


📙 सुसमाचार : लूकस 7:24-30


24) योहन द्वारा भेजे हुए शिष्यों के चले जाने के बाद ईसा लोगों से योहन के विषय में कहने लगे, "तुम निर्जन प्रदेश में क्या देखने गये थे? हवा से हिलते हुए सरकण्डे को? नहीं!

25) तो, तुम क्या देखने गये थे? बढि़या कपड़े पहने मनुष्य को? नहीं! कीमती वस्त्र पहनने वाले और भोग-विलास में जीवन बिताने वाले महलों में रहते हैं।

26) आखि़र तुम क्या देखने निकले थे? किसी नबी को? निश्चय ही! मैं तुम से कहता हूँ, - नबी से भी महान् व्यक्ति को।

27) यह वही है, जिसके विषय में लिखा है-देखो, मैं अपने दूत को तुम्हारे आगे भेजता हूँ। वह तुम्हारा मार्ग तैयार करेगा।

28) मैं तुम से कहता हूँ, मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई नहीं। फिर भी, ईश्वर के राज्य में जो सब से छोटा है, वह योहन से बड़ा है।

29) "सारी जनता और नाकेदारों ने भी योहन की बात सुन कर और उसका बपतिस्मा ग्रहण कर ईश्वर की इच्छा पूरी की,

30) परन्तु फ़रीसियों और शास्त्रियों ने उसका बपतिस्मा ग्रहण नहीं कर अपने विषय में ईश्वर का आयोजन व्यर्थ कर दिया।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार मे येसु लोगों के निर्जन प्रदेश में जाने का कारण पूछते हैं, "तुम निर्जन प्रदेश में क्या देखने गये थे?" नाकेदार, पापी, फरीसी, शास्त्री, सभी प्रकार के लोग योहन को सुनने के लिए आये। कुछ ने विश्वास किया और बपतिस्मा ग्रहण किया और कुछ ने नहीं। हम भी अपने आप से प्रश्न पूछे कि हम भी मिस्सा बलिदान, प्रर्थाना सभा, तीर्थ यात्रा में क्या करने जाते हैं?

येसु दुबारा उनसे पूछते है। तुम क्या देखने गये थे? बढ़िया कपडे, कीमती वस्त्र पहनने वाले और भोग विलास में जीवन बिताने वाले महलों में रहते हैं। वास्तव में आज लोग इन्हीं चीजों के पीछे भाग रहे हैं। बढ़िया कपडे, धन दौलत आरामदायक जिदंगी! जबकि योहन ने इसके विपरीत उन सभी चीजो को त्याग दिया था जो उसे ईश्वर से दूर रखती थी। उसका पहनावा, भोजन, त्याग भरा जीवन, सब कुछ साधारण था। इसलीए उसने निडर होकर ईश्वर के संदेश को बोला | इसी कारण येसु योहन कि प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई नहीं है।



📚 REFLECTION




In today's gospel, Jesus asks the reason why people went to the wilderness, “what did you go to see in the wilderness?” There the tax collectors, sinners, Pharisees, scribes, and all kinds of people came to listen to John. Some believed and were baptized and some did not. Let us also ask ourselves the question, that why and what we also go to do in Eucharistic celebration, prayer meeting, and pilgrimage etc. Jesus asks them again. What did you go to see? The people those who wear fine clothes, precious clothes, and those who live luxurious life, live in palaces. In fact, today people are running after these worldly things: Good clothes, wealth and comfortable life. Whereas, John renounced all those things, which keeps him away from God. His clothes, food, living, everything was simple and he lived a sacrificial life. And therefore, he fearlessly spoke the message of God. That's why Jesus praises John; there is no one greater among men than John the Baptist.


 -Br. Biniush topno


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बुधवार, 15 दिसंबर, 2021

 

बुधवार, 15 दिसंबर, 2021

आगमन का तीसरा सप्ताह

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📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 45:6c-8,21c-25


6) मैं ही प्रभु हूँ, कोई दूसरा नहीं।

7) मैं प्रकाश और अन्धकार, दोनों की सृष्टि करता हूँ। मैं सुख भी देता और दुःख भी भेजता हूँ। मैं, प्रभु, यह सब करता हूँ।

8) आकाश! धार्मिकता बरसाओ- ओस की बूँदों की तरह, बादलों के जल की तरह। धरती खुल कर उसे ग्रहण करे- मुक्ति का अंकुर फूट निकले और धार्मिकता फले-फूले। मैं, प्रभु, ने इसकी सृष्टि की है।

21) मेरे सिवा कोई दूसरा ईश्वर नहीं। मेरे सिवा कोई न्यायी और उद्धारकरर्ता ईश्वर नहीं।

22) पृथ्वी के सीमान्तों से मेरे पास आओ और तुम मुक्ति प्राप्त करोगे, क्योंकि मेरे सिवा कोई ईश्वर नहीं।

23) “मेरे मुख से निकलने वाला शब्द सच्चा और अपरिवर्तनीय है। मैं शपथ खा कर यह कहता हूँ: हर घुटना मेरे सामने झुकेगा, हर कण्ठ मेरे नाम की शपथ लेगा।

24) सब लोग मेरे विषय में कहेंगे- “प्रभु में ही न्याय दिलाने का सामर्थ्य है।“ जो उस से बैर करते थे, वे सब लज्जित हो कर उसके पास आयेंगे।

25) प्रभु इस्राएल की समस्त प्रजा को न्याय दिलायेगा और वह प्रभु का गौरव करेगी।



📙 सुसमाचार : लूकस 7:19-23



19) योहन ने अपने दो शिष्यों को बुला कर ईसा के पास यह पूछने भेजा, "क्या आप वही हैं, जो आने वाले हैं या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?"

20) इन दो शिष्यों ने ईसा के पास आ कर कहा, "योहन बपतिस्मा ने हमें आपके पास यह पूछने भेजा है-क्या आप वहीं हैं, जो आने वाले हैं या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?"

21) उस समय ईसा बहुतों को बीमारियों, कष्टों और अपदूतों से मुक्त कर रहे थे और बहुत-से अन्धों को दृष्टि प्रदान कर रहे थे।

22) उन्होंने योहन के शिष्यों से कहा, "जाओ, तुमने जो सुना और देखा है, उसे योहन को बता दो-अन्धे देखते हैं, लंगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है

23) और धन्य है वह, जिसका, विश्वास मुझ पर से नहीं उठता!"



📚 मनन-चिंतन.


येसु के कार्यों व शिक्षा की चर्चा चारों ओर फैल गयी थी। जब योहन ने येसु के बारे में सुना तो उन्होंने अपने शिष्यों को येसु के पास पुछने भेजा कि क्या आप वही है, जो आने वाले हैं या हम किसी दूसरे की प्रतीक्षा करे। योहन को मालूम था कि येसु मसीह है। लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को येसु के पास भेजा जिससे वह येसु को सुने, समझे, उनका अनुसरण करते उनके अनुयायी बने। इस आगमन काल में हम भी उन्हीं प्रभु येसु का जो हमारे बीच में आने वाले है उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आइये हम प्रभु को पहचाने, और उनके अनुयायी बने इसलिए (योहन १:35-37) में पढ़ते है कि योहन ने स्वयं अपने शिष्यो को येसु कि ओर इंगित करते हुए कहा, "देखो ईश्वर का मेमना "और शिष्य येसु के पीछे हो लिये।



📚 REFLECTION



When John the Baptist heard the teachings of Jesus, he sent his disciples to ask him. “Are you the Messiah we have been expecting, or should we keep looking for someone else?” John knew He is the Messiah but he sent his disciples to Jesus to listen to him and follow him. In (Jn 1: 35-37) when John standing with his disciples. As he looked at Jesus and he declared, “Look there is the Lamb of God”

And the disciples followed Jesus. In this season of Advent we are also looking for the Lord who is to come. As we are preparing for His coming let us not forget to recognize him in our daily lives. Who comes to us in different form? Let Gods grace open our hearts and minds to recognize Him, accept him and to follow him wholeheartedly.


 -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, 14 दिसंबर, 2021

 

मंगलवार, 14 दिसंबर, 2021

आगमन का तीसरा सप्ताह

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पहला पाठ : सफ़न्याह का ग्रन्थ 3:1-2,9-13


1) उस विद्रोही, दूषित और कठोर हृदय नगर को धिक्कार!

2) उसने न तो कभी प्रभु की वाणी पर ध्यान दिया और न कभी उसकी चेतावनी ही स्वीकारी। उसने कभी प्रभु पर भरोसा नहीं रखा। वह कभी उसकी शरण नहीं गया।

9) मैं लोगों के होंठ फिर शुद्ध करूँगा, जिससे वे सब-के-सब प्रभु का नाम लें और एक हृदय हो कर उसकी सेवा करें।

10) इथोपिया की नदियों के उस पार से मेरे बिखरे हुए उपासक चढ़ावा लिये मेरे पास आयेंगे।

11) उस दिन तुम्हें लज्जित नहीं होना पडे़गा- तुम्हारे बीच मेरे विरुद्ध कोई पाप नहीं किया जायेगा, क्योंकि मैं तुम लोगों में से डींग हाँकने वाले अहंकारियों को दूर करूँगा। उसके बाद मेरे पवित्र पर्वत पर कोई भी घमण्ड नहीं करेगा।

12) मैं तुम लोगों के देश में एक विनम्र एवं दीन प्रजा को छोड़ दूँगा। जो इस्राएल में रह जायेंगे, वे प्रभु के नाम की शरण लेंगे।

13) वे अधर्म नहीं करेंगे, झूठ नहीं बोलेंगे और छल-कपट की बातें नही करेंगे। वे खायेंगे-पियेंगे और विश्राम करेंगे और कोई भी उन्हें भयभीत नहीं करेगा।


सुसमाचार : मत्ती 21:28-32


28) "तुम लोगों का क्या विचार है? किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। उसने पहले के पास जाकर कहा, ’बेटा जाओ, आज दाखबारी में काम करो’।

29) उसने उत्तर दिया, ’मैं नहीं जाऊँगा’, किन्तु बाद में उसे पश्चात्ताप हुआ और वह गया।

30) पिता ने दूसरे पुत्र के पास जा कर यही कहा। उसने उत्तर दिया, ’जी हाँ पिताजी! किन्तु वह नहीं गया।

31) दोनों में से किसने अपने पिता की इच्छा पूरी की?" उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, "पहले ने"। इस पर ईसा ने उन से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - नाकेदार और वैश्याएँ तुम लोगों से पहले ईश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे।

32) योहन तुम्हें धार्मिकिता का मार्ग दिखाने आया और तुम लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया, परन्तु नाकेदारों और वेश्याओं ने उस पर विश्वास किया। यह देख कर तुम्हें बाद में भी पश्चात्ताप नहीं हुआ और तुम लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में दो पुत्रो के दृष्टांत को येसु बताते है। एक पुत्र ने ईश्वर-पिता की इच्छा पूरी की, दूसरे ने पिता कि इच्छा को अस्वीकार किया। इसी प्रकार ईश्वर सभी को स्वर्गराज्य में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हैं। यही ईश्वर की इच्छा थी। गैर-यहूदी, नाकेदार, पापियों ने ईश्वर की इच्छा को स्वीकार किया। लेकिन फरीसी, शास्त्री, सदूकी इन्होंने ईश्वर की इच्छा को अस्वीकार किया | हम भी कई बार ईश्वर को हाँ कहते हैं। लेकिन प्रभु कि इच्छा पूरा करने में विफल हो जाते हैं। येसु हम सभों के लिए उदाहरण है। जिन्होंने अंत तक ईश्वर कि इच्छा को पूरा किया। संत योहन 5:30 में येसु कहते हैं "मैं अपनी इच्छा नहीं, बल्कि जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ।" योहन 4:34 में येसु कहते हैं, "जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना यही मेर भोजन है | फ़िर भी मेरी नहीं बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो|" हम भी पिता की इच्छा को समझे और पूरा करे।



📚 REFLECTION



In today’s Gospel Jesus tells us about the parable of two sons. Father invites both of them for work. One of them obeyed and the other one disobeyed him. Likewise Jesus invites all of us to enter into the kingdom of heaven. This is the will of God; many accepted the will of God. Even tax collectors, gentiles, sinners accepted the will of God but the Pharisees and Sadducees failed to accept Jesus and his teachings. Many times we too say yes and accept the will of God but failed to practice. Jesus himself is the greatest example for all of us who obeyed his Abba until the end of his time even to the point of death.

Jesus says in (Jn 5:30) “I seek to do not my own will but the will of him who sent me”.

“My food is to do the will of him who sent me and to complete his work”. (Jn 4:34)

“I want to your will to be done, not mine”. (Mk 14:36)

Let us understand and accept the will of God and fulfill it.


 -Br. Biniush Topno


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सोमवार, 13 दिसंबर, 2021

 

सोमवार, 13 दिसंबर, 2021

आगमन का तीसरा सप्ताह

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पहला पाठ : गणना 24:2-7,15-17


2) अपनी आँखें ऊपर उठायीं और इस्राएलियों को देखा, जो अपने-अपने वंश के अनुसार शिविर डाल चुके थे। ईश्वर का आत्मा उस पर उतरा

3) और वह अपना यह काव्य सुनाने लगाः

4) यह उसकी भविष्यवाणी है, जो ईश्वर के वचन सुनता

5) याकूब! तुम्हारे तम्बू कितने सुन्दर है!

6) वे घाटियों की तरह फैले हुए हैं,

7) इस्राएलियों के पात्र जल से भरे रहेंगे,

15) इसके बाद बिलआम ने फिर कहा

16) यह उसकी भविष्यवाणी है, जो ईश्वर के वचन सुनता

17) मैं उसे देखता हूँ - किन्तु वर्तमान में नहीं,


सुसमाचार : मत्ती 21:23-27


23) जब ईसा मंदिर पहुँच गये थे और शिक्षा दे रहे थे, तो महायाजक और जनता के नेता उनके पास आ कर बोले, "आप किस अधिकार से यह सब कर रहें हैं? किसने आप को यह अधिकार दिया ?"

24) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "मैं भी आप लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। यदि आप मुझे इसका उत्तर देंगे, तो मैं भी आपको बता दूँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।

25) योहन का बपतिस्मा कहाँ का था? स्वर्ग का अथवा मनुष्यों का?" वे यह कहते हुए आपस में परामर्श करते थे - "यदि हम कहें: ’स्वर्ग का’, तो यह हम से कहेंगे, ’तब आप लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया?’

26) यदि हम कहें: ’मनुष्यों का’, तो जनता से डर है! क्योंकि सब योहन को नबी मानते हैं।"

27) इसलिए उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, "हम नहीं जानते"। इस पर ईसा ने उन से कहा, "तब मैं भी आप लोगों को नहीं बताऊँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।.


📚 मनन-चिंतन.


आज के सुसमाचार में महायाजक, येसु से उनके अधिकार को चुनौती देते हुए उनसे प्रश्न करते हैं। आप किस अधिकार से यह कर रहे हैं। येसु स्वयं ईश्वर के पुत्र थे। उन्हें अधिकार ईश्वर से प्राप्त था। "मैंने अपने पिता के यहां जो देखा है, वहीं कहता हूँ (योहन 8:38) "कोई मुझसे मेरा जीवन नहीं हर सकता, मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता कि ओर से यह आदेश मिला है। (योहन 10:18)

बाईबल में हम पढ़ते हैं की बहुत से लोगों ने विश्वास किया और येसु को मसीह के रूप में स्वीकार किया। मत्ती 14:33 में पढ़ते हैं, जब येसु पानी पर चलते हुए शिष्यों के पास आये। उन्होंने आँधी को शांत किया। शिष्यों ने दंडवत करते हुए कहा आप ईश्वर के पुत्र है। मत्ती 16:16 में येसु शिष्यों से पुछते हैं कि तुम क्या रहते हो, मैं कौन हूँ? पेत्रुस उत्तर देता है, "आप जीवन ईश्वर के पुत्र हैं" आप मसीह है ।"

योहन11:27 में मार्था येसु से कहती है "प्रभु मैं दृढ विश्वास करती हूँ, कि आप मसीह है, ईश्वर के पुत्र है जो संसार में आने वाले थे।" इस प्रकार जिन लोगों ने भी येसु के अधिकार को स्वीकार किया। उन्होंने येसु के अनुग्रह व आशीष को पाया।



📚 REFLECTION



In today’s gospel the chief priests and the elders of the people challenge Jesus of his authority. In fact Jesus was the son of God and had got the authority from his father. He says; “I am telling you what I saw when I was with my Father” (Jn 8:38).

No one can take my life from me. I sacrifice it voluntarily. For I have the authority to lay it down when I want to and also to take it up again. For this is what my Father has commanded”. (Jn10:18)

In the Holy Bible we see many people believed in Jesus and accepted His authority. In (Mth 14:33) we read, when Jesus came towards them, walking on the water. He calmed down the strong wind. Then the disciples worshipped Him. “You really are the Son of God”. In (Mth 16:16) Jesus asked them, “But who do you say I am?” Simon peter answered, “You are the Messiah, the Son of the living God.” In ( Jn 11:27) Martha says, yes Lord , “ I have always believed you are the Messiah, the Son of God, the one who has come into the world from God”.

In this way whoever accepted Jesus authority got the mercy and blessings of Jesus.


मनन-चिंतन - 2


येसु ने अपने कई कार्यों और संदेशों में महान ज्ञान का प्रदर्शन किया। मत्ती 22: 23-34 में, हम देखते हैं कि उन्होंने कैसे सदूकियों को चुप कराया जब उन्होंने मृतकों के पुनरुत्थान पर उनके साथ चर्चा की। जब लोगों ने उन्हें अपने सवालों के जाल में फंसाने की कोशिश की, तो उन्होंने उन्हें एक अप्रत्याशित और असाधारण जवाब दिया। योहन 8: 7 में, येसु ने व्यभिचार में पकड़ी गई महिला को पत्थर मारने पर अड़ी हुई हिंसक भीड़ को बताया, "तुम में जो निष्पाप हो, वह इसे सब से पहले पत्थर मारे"। इससे उन्हें खुद को आत्मनिरीक्षण करना पड़ा और अपनी कमियों का एहसास हुआ। ईश्वर का वचन हृदय के रूपांतरण के लिए है। यह तभी संभव है जब हर कोई जो ईश्वर का वचन सुनता है, वह इसे सबसे पहले स्वयं पर लागू करता है, किसी और पर लागू करने से पहले। संत याकूब अपने पत्र 1: 22-25 में ईश्वर के वचन की तुलना दर्पण से करते हैं जिसमें हम स्वयं को देखते हैं। आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रधान याजक और जनता के नेता येसु से पूछते हैं कि उनके पास क्या अधिकार है और किसने उन्हें यह अधिकार दिया है। उन्होंने शायद सोचा था कि वे इस सवाल से येसु पर अपना वर्चस्व स्थापित करेंगे। लेकिन येसु ने उनके सवाल का जवाब देने के बजाय, उनसे एक सवाल किया और नतीजतन वे चुप हो गए। ईश्वर के साथ हर मुलाकात आत्मनिरीक्षण, सुधार और आत्म-नवीनीकरण का समय है। हो सकता है कि क्रिसमस का पर्व हममें से प्रत्येक के लिए आत्म-नवीनीकरण का समय हो।


REFLECTION


Jesus exhibited great wisdom in many of his actions and messages. In Mt 22:23-34, we see how he silenced the Sadducees when they discussed with him on the resurrection of the dead. When people tried to trap him by their questions, oftentimes he gave them an unexpected and extraordinary answer. In Jn 8:7, Jesus told the violent crowd who were adamant on stoning the woman caught in adultery to death, “Let anyone among you who is without sin be the first to throw a stone at her”. This led them to introspect themselves and realize their own shortcomings. The Word of God is meant for conversion of the heart. This is possible only when everyone who hears the Word of God applies it first of all to the self, before applying it to anyone else. In the Letter of St. James 1:22-25 the Word of God is compared to a mirror in which we see ourselves. In today’s Gospel we find the chief priests and the elders of the people asking Jesus as to what authority he had and who gave him that authority. They probably thought that by this question they would establish their supremacy over Jesus. But instead of answering their question, Jesus put a counter-question to them and as a result they were silenced. Every encounter with God is a time for introspection, correction and self-renewal. May the coming feast of Nativity be a time of self-renewal for each one of us./p>


 -Br. Biniush topno


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Praise the Lord!

इतवार, 12 दिसंबर, 2021

 

इतवार, 12 दिसंबर, 2021

आगमन का तीसरा इतवार

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पहला पाठ : सफ़न्याह का ग्रन्थ 3:14-18a


14) सियोन की पुत्री! आनन्द का गीत गा। इस्राएल! जयकार करो! येरुसालेम की पुत्री! सारे हृदय से आनन्द मना।

15) प्रभु ने तेरा दण्डादेश रद्द किया और तेरे शत्रुओं को भगा दिया है। प्रभु तेरे बीच इस्राएल का राजा है।

16) विपत्ति का डर तुझ से दूर हो गया है। उस दिन येरुसालेम से कहा जायेगा-’’सियोन! नहीं डरना, हिम्मत नहीं हारना। तेरा प्रभु-ईश्वर तेरे बीच है।

17) वह विजयी योद्धा है। वह तेरे कारण आनन्द मनायेगा, वह अपने प्रेम से तुझे नवजीवन प्रदान करेगा,

18) वह उत्सव के दिन की तरह तेरे कारण आनन्दविभोर हो जायेगा।’’।


दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:4-7.


4) आप लोग प्रभु में हर समय प्रसन्न रहें। मैं फिर कहता हूँ, प्रसन्न रहें।

5) सब लोग आपकी सौम्यता जान जायें। प्रभु निकट हैं।

6) किसी बात की चिन्ता न करें। हर जरू़रत में प्रार्थना करें और विनय तथा धन्यवाद के साथ ईश्वर के सामने अपने निवेदन प्रस्तुत करें

7) और ईश्वर की शान्ति, जो हमारी समझ से परे हैं, आपके हृदयों और विचारों को ईसा मसीह में सुरक्षित रखेगी।.


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 3:10-18


10) जनता उस से पूछती थी, ’’तो हमें क्या करना चाहिए?’’

11) वह उन्हें उत्तर देता था, ’’जिसके पास दो कुरते हों, वह एक उसे दे दे, जिसके पास नहीं है और जिसके पास भोजन है, वह भी ऐसा ही करे’’।

12) नाकेदार भी बपतिस्मा ग्रहण करते थे और उस से यह पूछते थे, ’’गुरुवर! हमें क्या करना चाहिए?’’

13) वह उन से कहता था, ’’जितना तुम्हारे लिये नियत है, उस से अधिक मत माँगों’’।

14) सैनिक भी उस से पूछते थे, ’’और हमें क्या करना चाहिए?’’ वह उन से कहता था, ’’किसी पर अत्याचार मत करो, किसी पर झूठा दोष मत लगाओ और अपने वेतन से सन्तुष्ट रहो’’।

15) जनता में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी और योहन के विषय में सब मन-ही-मन सोच रहे थे कि कहीं यही तो मसीह नहीं है।

16) इसलिए योहन ने सबों से कहा, ’’मैं तो तुम लोगों को जल से बपतिस्मा देता हूँ; परन्तु एक आने वाले हैं, जो मुझ से अधिक शक्तिशाली हैं। मैं उनके जूते का फ़ीता खोलने योग्य नहीं हूँ। वह तुम लोगों को पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देंगे।

17) वह हाथ में सूप ले चुके हैं, जिससे वह अपना खलिहान ओसा कर साफ़ करें और अपना गेहूँ अपने बखार में जमा करें। वह भूसी को न बुझने वाली आग में जला देंगें।’’

18) इस प्रकार के बहुत-से अन्य उपदेशों द्वारा योहन जनता को सुसमाचार सुनाता था।


📚 मनन-चिंतन


हम आगमन काल के तीसरे रविवार में प्रवेश करते हैं। इस आगमन काल में हम प्रभु येसु के जन्मोत्सव के लिए अपने आप को तैयार करते हैं। वही मनोभाव हम योहन बपतिस्ता में पाते हैं। वह लोगों को बपतिस्मा दे रहा था। उन्हें स्वर्गराज्य के लिए तैयार कर रहा था। लोगों ने सोचा कहीं यहीं तो मसीह नहीं है। उन्होंने उनसे पूछा कही वह आप तो नहीं? यहां हम योहन बपतिस्ता की विनम्रता को देखते हैं। वह कहते है मै मसीह नही हूँ परन्तु जो आने वाले है, मैं तो उनके जूते का फिता खोलने के योग्य भी नहीं हूँ। वह विनम्र भाव से येसु की प्रशंसा करता है। हम भी इस आगमन काल में योहन की तरह विनम्र बने। ईश्वर की स्तुति प्रशंसा विनम्रता के साथ करे। ईश्वर ने जो कुछ हमे प्रदान किया है उसी में संतुष्ट रहे।



📚 REFLECTION



We have entered into the third Sunday of Advent and with great enthusiasm we are preparing ourselves to welcome Jesus our savior. The same attitude we find in John the Baptist. He was baptizing people, preparing them for the kingdom of God. Seeing John people thought whether he might be the Messiah. We see the humility of John the Baptist. he says I am not the messiah but one who is coming after me, I am not worthy to untie the thong of his sandal. He praises Jesus with humility.

In this Advent season, Let us learn to be humble like John the Baptist and praise the Lord with humble heart.



मनन-चिंतन - 2


आज के पवित्र वचनों में आनन्द मनाने के लिए हमें आह्वान किया गया है क्योंकि प्रभु येसु ही हमारा उद्धारकर्ता है। प्रभु येसु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकारने वाले प्रसन्न रहेंगे और सौम्यता दर्शायेंगे। आनन्द और सौम्यता येसु में मुक्ति प्राप्त किये लोगों का स्वभाव होता है और इस कारण संत पौलुस कहते हैं, “आप लोग प्रभु में हर समय प्रसन्न रहें। ... सब लोग आपकी सौम्यता जान जायें।“ (फिलिप्पियों 4,4-5)

सुसमाचार में मुक्तिदाता येसु के लिए लोगों के ह्रदय को तैयार करने एवं लोगों को प्श्चताप के बपतिस्मा द्वारा मन परिवर्तन कराने यर्दन नदी के किनारे पहुँचे योहन से नाकेदार, सैनिक और अन्य लोगों ने पूछा – “हमें क्या करना चाहिए?” (लूकस 3,12)। नाकेदारों एवं सैनिकों को यहूदी लोग पापी और देशद्रोही मानते थे क्योंकि वे लोग यहूदियों पर अधिपत्य जमाये विदेशी शासकों के लिए नौकरी करते थे। फिर भी योहन ने उनसे नौकरी छोडने को नहीं बल्कि ईमानदारी से नौकरी करने को कहा। योहन नाकेदारों को कहता था, “जितने तुम्हारे लिए नियत है, उससे अधिक मत मॉगो।“ (लूकस 3,13) योहन सैनिकों से कहता था, “किसी पर अत्याचार मत करो, किसी पर छूटा दोष मत लगाओ और अपने वेतन से संतुष्ट रहो” (लूकस 3,14)। येसु की मुक्ति पाने के लिए मन परिवर्तन की जरूरत है जो लालच और स्वार्थ से दूर रहना है; दूसरों की भलाई चाहना है और स्वयं संतुष्ट रहना है। येसु को अपने मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार करने वालों के जीवन ही आनन्द, प्रेम और सेवा कार्य से भर जाता है।

मुक्ति किसी के लिए भी अप्राप्य नहीं है। मुक्ति अनर्जित, शर्तरहित और मुफ्त है। सबसे कठोर व्यक्ति भी मुक्ति पा सकता है। ख्रीस्तीय इतिहास ऐसे हजारों लोगों का है जो विपरीत दिशा में होकर पाप के वश में चलते रहे लेकिन येसु ने उनका उद्धार किया और वे येसु के वचन के साक्षी बन गये। 19वॉ शताब्दी में जीवित एवं अमेरिकी सैन्य में उॅचे पद तक पहॅचे मेजर डानिएल वेबस्टर वाइटली एक बडे सुसमाचार प्रचारक थे। उन्होंने प्रभु येसु मसीह को अपने मुक्तिदाता के रूप में कैसे स्वीकार किया जिसका वर्णन वेबस्टर स्वयं इस प्रकार करता है -

“मेरी मॉ एक ख्रीस्तीय भक्त स्त्री थी। मैं इंग्लेंड में युद्ध के लिए जा रहा था और मेरी माताजी ने मुझे रोती हुई विदा किया और उसकी बहुत सी प्रार्थनाएं मेरे साथ थी। उन्होंने मेरी थैली में बाइबल का नया विधान रखा थ जिसको मैं ने कभी नहीं पढा। युद्ध बहुत भयानक था और मैं ने उस युद्ध में बहुत दुख भरी घटनाओं को देखा और उसी दिन मैं भर घायल होकर गिर पडा। उस रात को मेरे एक हाथ को शल्यक्रिया से काट दिया गया। मेरा घाव जैसे ही ठीक हो रहा था, मुझे कुछ पढने की इच्छा हुई और पहली बार मैं थैली से नए विधान को निकालकर पढने लगा। मत्ती, मार्कुस... प्रकाशन ग्रन्थ। सब कुछ मुझे अच्छा लगा और मैं उनको पुनः पढा और मैं समझ रहा था कि येसु ही सच्चा मुक्तिदाता है। किंतु मुझको क्रिश्चियन बनने का कोई इरादा नहीं था।

“मैं अपने पापों पर पश्चताने या येसु को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने की मनोदशा में नहीं था और मैं सोने गया और मध्य रात्रि में मुझे एक नर्स ने गहरी नींद से जगाकर कहा, “वार्ड में आपका एक आदमी ;भौजी पडा है, वह मर रहा है। वह बीते एक घण्डे से उस पर प्रार्थना करने के लिए मुझे तंग कर रहा है। उसकी पीडा को मैं देख नहीं सकता। लेकिन मैं पापी हूँ और मैं प्रार्थना नहीं कर सकता। मैं आपको बुलाने आया हूँ, आप आकर उस पर प्रार्थना करें।“

“मईं ने कहा, “मैं प्रार्थना नहीं कर सकता। मैं ने कभी प्रार्थना नहीं किया हूँ और मैं भी पापी मनुष्य हूँ। मैं प्रार्थना नहीं कर सकता।” नर्स ने कहा, “आपको देखकर मैं ने सोचा कि आप प्रार्थना करने वाला व्यक्ति है। इस रात को मैं कहॉ जाउॅ ! मैं अकेले उसके पास नहीं जा सकता। आप आकर उसे जरा मिल लीजिए।” नर्स के कहने पर मैं उस लडके के पास गया। 17-18 वर्ष उम्र का वह भौजी मरने को था। वह बहुत दुखी था और वह मेरी ओर देखकर कहा, “मैंरे लिए प्रार्थना कीजिए, मैं मरने को हूँ। मेरे माता पिता और मैं गिरजा जाते थे और मैं एक अच्छा लडका था किंतु फौज में आने के बाद मैं बुरा बन गया - शराब, बुरी संगति, जुआ और हर प्रकार का पाप के वश में मैं आ गया। मैं मरने को हूँ। ईश्वर से मेरे लिए प्रार्थना कीजिए; प्रभु येसु से प्रार्थना कीजिए कि वे मेरा उद्धार करें।”

“जैसे ही मैं खडा था, पवित्र आत्मा की आवाज मुझे साफ शब्दों में कहते हुए सुनाई दी - तुम मुक्ति के रास्ते को पहचान चुके हो; तुरन्त घुटने टेको, येसु को अपने हृदय में स्वीकार करो और इस लडके केलिए प्रार्थना करो। मैं ने घुटने टेका, लडके के हाथ को अपने हाथों में थाम लिया और अपने पापों के लिए माफी मॉगा। मैं ने विश्वास किया कि प्रभु ने मुझे क्षमा की और मैं ने उस लडके के लिए प्रार्थना की। वह शॉत हो गया। जैसे ही मैं उठा वह इस संसार से अल्विदा कह चुके थे। प्रभु ने मरते हुए एस लडको को मुझे येसु के पास आने और मुक्ति दिलाने के लिए इस्तेमाल किया।”

इस आगमन काल में, हम प्रभु येसु को अपने जीवन में स्वीकार करें। येसु ही मेरा उद्धारकर्ता है। इस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए अपने पापों पर पश्चताप करना अनिवार्य है। येसु को अपने जीवन में स्वीकार करने वाले आनन्दित होते और सौम्यता का बर्ताव करते है।


-Br. Biniush topno


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शनिवार, 11 दिसंबर, 2021

 

शनिवार, 11 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

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पहला पाठ: प्रवक्ता-ग्रन्थ 48:1-4.9-11


1) तब एलियाह अग्नि की तरह प्रकट हुए। उनकी वाणी धधकती मशाल के सदृश थी।

2) उन्होंने उनके देश में अकाल भेजा और अपने धर्मोत्साह में उनकी संख्या घटायी।

3) उन्होंने प्रभु के वचन से आकाश के द्वार बन्द किये और तीन बार आकाश से अग्नि गिरायी।

4) एलियाह! आप अपने चमत्कारों के कारण कितने महान् है! आपके सदृश होने का दावा कौन कर सकता है!

9) आप अग्नि की आँधी में अग्निमय अश्वों के रथ में आरोहित कर लिये गये।

10) आपके विषय में लिखा है, कि आप निर्धारित समय पर चेतावनी देने आयेंगे, जिससे ईश्वरीय प्रकोप भड़कने से पहले ही आप उसे शान्त करें, पिता और पुत्र का मेल करायें और इस्राएल के वंशों का पुनरुद्धार करें।

11) धन्य हैं वे, जिन्होंने आपके दर्शन किये, जो आपके प्रेम से सम्मानित हुए!


सुसमाचार : सन्त मत्ती 17:9a.10-13


9) पहाड़ से उतरते समय उनके शिष्यों ने उन से पूछा, ’’शास्त्री यह क्यों कहते हैं कि पहले एलियस को आना है?’’

11) ईसा ने उत्तर दिया, ’’एलियस अवश्य सब कुछ ठीक करने आयेगा।

12) परन्तु मैं तुम लोगों से कहता हूँ- एलियस आ चुका है। उन्होंने उसे नहीं पहचाना और उसके साथ मनमाना व्यवहार किया। उसी तरह मानव पुत्र भी उनके हाथों दुःख उठायेगा।’’

13) तब वे समझ गये कि ईसा योहन बपतिस्ता के विषय में कह रहे हैं।


📚 मनन-चिंतन


आज के दोनों ही पाठों में हमें नबी एलीयस के बारे में बताया गया है कि नबी एलीयस अपने चमत्कारों के कारण कितने महान थे। वह अग्नि की आँधी में, अग्निमय अशवों के रथ में आरोहित कर लिये गये । सुसमाचार में शिष्य येसु से पूछते है कि क्या भविष्य में एलीयस दुबारा इस धरती पर आयेंगे। येसु उन्हें उत्तर देते है की एलीयस आ चुका है। लोगों ने उसे नहीं पहचाना। उसके साथ मनमाना व्यवहार किया। साथ ही साथ येसु अपने मरण की भविष्यवाणी करते हुए कहते हैं। ठीक उसी तरह मानव पुत्र भी दुख उठायेगा। शिष्य येसु की बातों को समझ नहीं सके। उन्होंने सोचा येसु योहन बपतिस्ता के बारे में कह रहे है। कई बार हम भी येसु कि बातों को नहीं समझ पाते है कि वह हमसे क्या कहना चाहते है। अपनी वयस्त जिंदगी में हम येसु की आवाज को सुन नहीं पाते हैं। आइये हम अपने मन हृदय और कानों को खुला रखे। ईश्वरीय वचन को सुनने और समझने के लिए तत्पर रहे और उसका पालन करे ।


📚 REFLECTION



In both the readings of todays, we hear about Prophet Elijah .who was known for his miracles. In the Gsopel disciples ask Jesus will Elijah come again on this earth. Jesus answered them Elijah had already come and the people failed to recognize him and they misbehaved with him. Also Jesus foretells of his death and says, the son of man has to undergo suffering and death. The disciples could not understand and they thought Jesus is talking about John the Baptist.

Very often we too fail to understand the word of the Lord. In our busy life, often we fail to hear His voice, which He wants to convey to us. Let us open our hearts and mind to listen and understand the word of the Lord and apply his words in our lives.



मनन-चिंतन - 2



आज के सुसमाचार में प्रभु येसु नबी एलियाह के दूसरे आगमन के बारे में बात करते हैं। कई यहूदी लोगों का मानना था कि एलिय्याह मसीह के आने से पहले फिर से आयेंगे। एलियाह यहूदी नबियों की प्रतिनिधि है। उन्होंने इस्राएल के नेताओं और लोगों को अपने पापमय जीवन छोड़ने और प्रभु के पास वापस जाने के लिए प्रेरित किया। राजाओं के पहले ग्रन्थ के अध्याय अठारह में हम पढ़ते हैं कि नबी एलियाह ने बाल देव के चार सौ पचास नबियों की उपस्थिति में कार्मेल पहाड़ पर इकट्ठे हुए लोगों से प्रभु ईश्वर के बारे में एक निश्चित रुख अपनाने के लिए कहा। उन्होंने कहा, “तुम लोग कब तक आगा-पीछा करते रहोगे? यदि प्रभु ही ईश्वर है, तो उसी के अनुयायी बनो और यदि बाल ईश्वर है, तो उसी के अनुयायी बनो।”(1राजाओं 18:21)। हम आगे पढ़ते हैं कि लोगों ने अंत में प्रभु ईश्वर पर अपने विश्वास को प्रकट करते हुए कहा, “प्रभु ही ईश्वर है! प्रभु ही ईश्वर है!”(1राजाओं 18:39)। राजाओं के दूसरे ग्रन्थ अध्याय 2 वाक्य 11 में हम नबी एलियाह के स्वर्ग चढ़ने की शानदार घटना देखते हैं। हम पढ़ते हैं, "वे बातें करते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि अचानक अग्निमय अश्वों-सहित एक अग्निमय रथ ने आ कर दोनों को अलग कर दिया और एलियाह एक बवण्डर द्वारा स्वर्ग में आरोहित कर लिया गया।"। मलाकी के ग्रन्थ 4: 5 में, एक भविष्यवाणी है जो कहती है, "देखो, उस महान् एवं भयानक दिन के पहले, प्रभु के दिन के पहले, मैं नबी एलियाह को तुम्हारे पास भेजूँगा।"। इसलिए यहूदियों का विश्वास था कि नबी एलियाह फिर से आयेंगे। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि प्रभु ईश्वर, एक नबी के माध्यम से एक बार फिर से, जो उन्होंने एलियाह के द्वारा किया, उसी को दोबारा करेंगे; वे लोगों को प्रभु के पास लौटने और प्रभु ईश्वर के लिए एक निश्चित रुख अपनाने की चुनौती देंगे। संत योहन बपतिस्ता ने यही किया। आज हमें प्रभु के पास लौटने और प्रभु ईश्वर के लिए एक निश्चित रुख अपनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है।



REFLECTION



In today’s Gospel, Jesus speaks about the second coming of Elijah. Many Jewish people believed that Elijah would come again before the arrival of the Messiah. Elijah stands for the Jewish Prophecy. He eloquently called the leaders and people of Israel to leave their sinful ways and return to the Lord. In 1Kings 18 we read that Elijah asked the people who gathered at Mount Carmel, in the presence of four hundred and fifty prophets of Baal, to take a definitive stand for God. He said, “How long will you go limping with two different opinions? If the Lord is God, follow him; but if Baal, then follow him” (1Kings 18:21). We read further that the people finally acclaimed “The Lord indeed is God; the Lord indeed is God” (1Kings 18:39). In 2Kings 2:11 we read about Prophet Elijah’s spectacular ascent into heaven in a fiery chariot. We read, “As they continued walking and talking, a chariot of fire and horses of fire separated the two of them, and Elijah ascended in a whirlwind into heaven”. In Malachi 4:5, we have a prophecy which says, “Lo, I will send you the prophet Elijah before the great and terrible day of the Lord comes”. Hence there was a belief among the Jewish people that Elijah would come again. What does it mean? It means that God, through a prophet once again will accomplish what Elijah accomplished; that he would challenge people to return to the Lord and take a definitive stand for God. This is what St. John the Baptist did. Today we are invited to return to the Lord and take a definitive stand for God.


 -Br. Biniush topno


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