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मंगलवार, 14 सितम्बर, 2021 पवित्र क्रूस का विजयोत्सव : पर्व

 

मंगलवार, 14 सितम्बर, 2021

पवित्र क्रूस का विजयोत्सव : पर्व



पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 4b-9


4) यात्रा करते-करते लोगों का धैर्य टूट गया

5) और वे यह कहते हुए ईश्वर और मूसा के विरुद्ध भुनभुनाने लगे, ''आप हमें मिस्र देश से निकाल कर यहाँ मरुभूमि में मरने के लिए क्यों ले आये हैं? यहाँ न तो रोटी मिलती है और न पानी। हम इस रूखे-सूखे भोजन से ऊब गये हैं।''

6) प्रभु ने लोगों के बीच विषैले साँप भेजे और उनके दंष से बहुत-से इस्राएली मर गये।

7) तब लोग मूसा के पास आये और बोले, ''हमने पाप किया। हम प्रभु के विरुद्ध और आपके विरुद्ध भुनभुनाये। प्रभु से प्रार्थना कीजिए कि वह हमारे बीच से साँपों को हटा दे।'' मूसा ने जनता के लिए प्रभु से प्रार्थना की

8) और प्रभु ने मूसा से कहा, ''काँसे का साँप बनवाओ और उसे डण्डे पर लगाओ। जो साँप द्वारा काटा गया, वह उसकी ओर दृष्टि डाले और वह अच्छा हो जायेगा।''

9) मूसा ने काँसे का साँप बनवाया और उसे डण्डे पर लगा दिया। जब किसी को साँप काटता था, तो वह काँसे के साँप की ओर दृष्टि डाल कर अच्छा हो जाता था।



सुसमाचार : सन्त योहन 3:13-17


13) मानव पुत्र स्वर्ग से उतरा है। उसके सिवा कोई भी स्वर्ग नहीं पहुँचा।

14) जिस तरह मूसा ने मरुभूमि में साँप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है,

15) जिससे जो उस में विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन प्राप्त करे।’’

16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।

17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।



📚 मनन-चिंतन


आज माता कलीसिया पवित्र कू्रस के विजयोत्सव का पर्व मनाती है। संत पौलुस 1 कुरिंथ 1ः18 में कहते है, ‘‘जो विनाश के मार्ग पर चलते है, वे कू्रस की शिक्षा को मूर्खता समझते हैं। किन्तु हम लोगों के लिए, जो मुक्ति के मार्ग पर चलते हैं, वह ईश्वर का सामर्थ्य है।’’ क्रूस इस दुनिया की नजर में एक प्रकार का शर्म, अपमान, कमजोरी, बोझ, दण्ड या हार का प्रतीक हो सकता है परंतु यह कू्रस विश्वासियों के लिए एक वरदान है, सामर्थ्य है क्योंकि इसी कू्रस के द्वारा येसु ने मृत्यु को पराजित किया और हमारे लिए मुक्ति का द्वार खोल दिया था।

प्रभु येसु के बारे में संत योहन लिखते है, ‘‘जिस तरह मूसा ने मरुभूमि में सॉंप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है।’’ यह उस घटना को बतलाता है जब ईश्वर के प्रति भुनभुनाने के कारण इस्राएली जनता को सॉंप ने कॉंटा और वही लोग अच्छे होते थे जो वह कॉंसे के सॉंप की ओर दृष्टि डालते थे जिसे मूसा नें ईश्वर के कहने पर बनवाया था। यह एक प्रकार का प्रतीक है कि कौन जीवन में उद्धार पायेगा, वहीं जो अपनी दृष्टि अर्थात् अपना विश्वास कू्रसित प्रभु पर लगायेगा।

एक राज्य दूसरे राज्य पर या एक देश दूसरे देश पर विजय पाने के लिए तलवार, भाला, बन्दूक, मिसाईल, परमाणु बम या वायरस का उपयोग करते है; परंतु प्रभु येसु ने उसी कू्रस का उपयोग किया जो उन्हें मृत्यु दण्ड देने या उन्हे परास्त करने के लिए प्रयोग में लाया गया। येसु ने उसी क्रूस को विजय पाने के लिए अपनाया। यह हम सब के लिए एक उदाहरण बना कि किस प्रकार हम भी शैतान और उसके प्रपंचों पर विजय पा सकते है।

प्रभु येसु कहते है जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना कू्रस उठा कर मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा। इस जीवन का कू्रस हम सब केे लिए आने वाले जीवन के लिए एक प्रकार से सहायक है। प्रभु येसु का पवित्र कू्रस एक माध्यम बना हमारे और पिता ईश्वर के बीच के उस फासले को मिटाने के लिए जो हमारे पापों के कारण आया था। पवित्र कू्रस का विजयोत्सव हम सभी को उत्सह उमंग और जोश से भर दे जिससे हम भी प्रभु का अनुसरण करते हुए अपने पापमय स्वभाव, बुराईयों एवं कमजोरियों पर विजय पा सकें।



📚 REFLECTION



Today the Catholic Church celebrates the feast Exaltation of the Holy Cross. St Paul’s says in 1 Cor. 1:18, “For the message of the cross is foolishness to those who are perishing, but to us who are being saved it is the power of God.” In the world’s view the Cross may be a sign of shame, insult, weakness, burden, punishment or defeat but for the believers this is cross is a gift, a power because by this cross Jesus gained victory over death and opened for us the door of salvation.

St. John’s write about Lord Jesus, “Just as Moses lifted up the snake in the wilderness, so the Son of Man must be lifted up, that everyone who believes may have eternal life in him.” This tells about that incident when Israelites murmered against God and got bitten by the snakes and those who looked at the bronze snake made by the Moses as said by God were healed and lived. This is one kind of sign that who all will be saved, only those who put there eyes or faith upon the crucified Lord will be saved.

To gain victory over the other kingdom or country, one kingdom or country uses the weapons like sword, spear, guns, missile, parmandu bomb or virus; but Lord Jesus used the same cross which was used to punish him or defeat him. He accepted the same cross to gain victory. This became an example for us that how we can too gain victory over Satan and its delusions.

Lord Jesus says whoever wants to be my disciples must deny themselves and take up their cross and follow me. For whoever wants to save their life will lose it, but whoever loses their life for me will find it. The cross of this life is one kind of help for us for the coming life. The holy cross of Jesus became a medium to remove that distance between Father Almighty and us which was created by our sins. May the feast of Exaltation of the Holy Cross fill us with zeal, joy and enthusiasm so that following Jesus we may also gain victory over our sinful nature, vices and weakness.


✍ -Br Biniush Topno


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सोमवार, 13 सितम्बर, 2021 वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 13 सितम्बर, 2021

वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : 1तिमथी 2:1-8


1 (1-2) मैं सब से पहले यह अनुरोध करता हूँ कि सभी मनुष्यों के लिए, विशेष रूप से राजाओं और अधिकारियों के लिए, अनुनय-विनय, प्रार्थना निवेदन तथा धन्यवाद अर्पित किया जाये, जिससे हम भक्ति तथा मर्यादा के साथ निर्विघ्न तथा शान्त जीवन बिता सकें।

3) यह उचित भी है और हमारे मुक्तिदाता ईश्वर को प्रिय भी,

4) क्योंकि वह चाहता है कि सभी मनुष्य मुक्ति प्राप्त करें और सत्य को जानें।

5) क्योंकि केवल एक ही ईश्वर है और ईश्वर तथा मनुष्यों के केवल एक ही मध्यस्थ हैं, अर्थात् ईसा मसीह,

6) जो स्वयं मनुष्य हैं और जिन्होंने सब के उद्धार के लिए अपने को अर्पित किया। उन्होंने उपयुक्त समय पर इसके सम्बन्ध में अपना साक्ष्य दिया।

7) मैं सच कहता हूँ, झूठ नहीं बोलता। मैं इसी का प्रचारक तथा प्रेरित, गैर-यहूदियों के लिए विश्वास तथा सत्य का उपदेशक नियुक्त हुआ हूँ।

8) मैं चाहता हूँ कि सब जगह पुरुष, बैर तथा विवाद छोड़ कर, श्रद्धापूर्वक हाथ ऊपर उठा कर प्रार्थना करें।



सुसमाचार : सन्त लूकस 7:1-10



1) जनता को अपने ये उपदेश सुनाने के बाद ईसा कफ़रनाहूम आये।

2) वहाँ एक शतपति का अत्यन्त प्रिय नौकर किसी रोग से मर रहा था।

3) शतपति ने ईसा की चर्चा सुनी थी; इसलिए उसने यहूदियों के कुछ प्रतिष्ठित नागरिकों को ईसा के पास यह निवेदन करने के लिए भेजा कि आप आ कर मेरे नौकर को बचायें।

4) वे ईसा के पास आ कर आग्रह के साथ यह कहते हुए उन से विनय करते रहे, ’’वह शतपति इस योग्य है कि आप उसके लिए ऐसा करें।

5) वह हमारे राष्ट्र से प्रेम करता है और उसी ने हमारे लिए सभागृह बनवाया।’’

6) ईसा उनके साथ चले। वे उसके घर के निकट पहुँचे ही थे कि शतपति ने मित्रों द्वारा ईसा के पास यह कहला भेजा, ’’प्रभु! आप कष्ट न करें, क्योंकि मैं इस योग्य नहीं हूँ कि आप मेरे यहाँ आयें।

7) इसलिए मैने अपने को इस योग्य नहीं समझा कि आपके पास आऊँ। आप एक ही शब्द कह दीजिए और मेरा नौकर चंगा हो जायेगा।

8) मैं एक छोटा-सा अधिकारी हूँ। मेरे अधीन सिपाही रहते हैं। जब मैं एक से कहता हूँ- ’जाओ’, तो वह जाता है और दूसरे से- ’आओ’, तो वह आता है और अपने नौकर से-’यह करो’, तो वह यह करता है।’’

9) ईसा यह सुन कर चकित हो गये और उन्होंने पीछे आते हुए लोगों की ओर मुड़ कर कहा, ’’मै तुम लोगों से कहता हूँ- इस्राएल में भी मैंने इतना दृढ़ विश्वास नहीं पाया’’।

10) और भेजे हुए लोगों ने घर लौट कर रोगी नौकर को भला-चंगा पाया।


📚 मनन-चिंतन



जीवन में यदि विश्वास है तो आशा है, और यदि जीवन में येसु के प्रति सच्चा विश्वास है तो हमारे लिए सबकुछ संभव है। विश्वास के बारे में प्रभु येसु कहते है, ‘‘यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो और तुम इस पहाड़ से यह कहो, यहॉं से वहॉं तक हट जा, तो यह हट जायेगा, और तुम्हारे लिए कुछ भी असम्भव नहीं होगा।’’ (मत्ती 17ः20) इस संुदर विश्वास का उदाहरण हम आज के सुसमाचार में पाते है जहॉं पर एक शतपति के दृढ़ विश्वास और नम्रता द्वारा उसके बिमार नौकर को प्रभु येसु द्वारा चंगाई मिलती है।

उस शतपति को प्रभु येसु के शब्द मात्र पर इतना विश्वास था कि येसु जो कहेंगे वह जायेगा। वे समझ गये थे कि प्रभु येसु के पास सम्पूर्ण अधिकार और शक्ति है। इस प्रकार का विश्वास होना वास्तव में एक सच्चे विश्वासी का निशानी है। जिस प्रकार ईश्वर ने शब्द मात्र से संसार की सृष्टि की, ठीक उसी प्रकार येसु के शब्द मात्र से विभिन्न चीजें़ संभव है। शतपति का यह विश्वास हमारे सामने एक प्रश्न रखता है कि हमारा विश्वास येसु के प्रति किस प्रकार का है? विश्वास के द्वारा जिंदगी में पहाड़ जैसे लगने वाली समस्याएॅं, परेशानियॉं येसु के शब्द मात्र से दूर हो सकती है। आईये हम अपने विश्वास में दृढ़ता लायें।



📚 REFLECTION



In life if there is faith than there is hope and in life if there is true faith in Jesus then there everything is possible for us. About faith Jesus tells, “If you have faith the size of a mustard seed, you will say to this mountain, Move from here to there, and it will move; and nothing will be impossible for you.” (Mt 17:20). We find the beautiful example of such faith in today’s gospel where the faith and humility of a Centurian towards Jesus lead to the healing of his servant.

The Centurian had deep faith in Jesus that whatever Jesus will say it will happen. He understood that Jesus has all the authority and power. Having such a faith is a sign of true believer. Just as God created the universe with mere words so also with Jesus’ words everything is possible. The faith of Centurian places a question in front of us that how is our faith towards Jesus? Through faith all the troubles and problems which seem like mountains can be removed just by the words of Jesus. Let’s bring firmness in our faith.


✍ -Br Biniush Topno


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Bible reading for Sunday, 12 September 2021

 Daily Mass Readings for Sunday, 12 September 2021


First Reading: Isaiah 50: 5-9a

5 The Lord God hath opened my ear, and I do not resist: I have not gone back.

6 I have given my body to the strikers, and my cheeks to them that plucked them: I have not turned away my face from them that rebuked me, and spit upon me.

7 The Lord God is my helper, therefore am I not confounded: therefore have I set my face as a most hard rock, and I know that I shall not be confounded.

8 He is near that justifieth me, who will contend with me? let us stand together, who is my adversary? let him come near to me.

9 Behold the Lord God is my helper: who is he that shall condemn me?

Responsorial Psalm: Psalms 116: 1-2, 3-4, 5-6, 8-9

R. (9) I will walk before the Lord, in the land of the living.

or

R. Alleluia.

1 I have loved, because the Lord will hear the voice of my prayer.

2 Because he hath inclined his ear unto me: and in my days I will call upon him.

R. I will walk before the Lord, in the land of the living.

or

R. Alleluia.

3 The sorrows of death have encompassed me: and the perils of hell have found me. I met with trouble and sorrow:

4 And I called upon the name of the Lord. O Lord, deliver my soul.

R. I will walk before the Lord, in the land of the living.

or

R. Alleluia.

5 The Lord is merciful and just, and our God sheweth mercy.

6 The Lord is the keeper of little ones: I was little and he delivered me.

R. I will walk before the Lord, in the land of the living.

or

R. Alleluia.

8 For he hath delivered my soul from death: my eyes from tears, my feet from falling.

9 I will please the Lord in the land of the living.

R. I will walk before the Lord, in the land of the living.

or

R. Alleluia.

Second Reading: James 2: 14-18

14 What shall it profit, my brethren, if a man say he hath faith, but hath not works? Shall faith be able to save him?

15 And if a brother or sister be naked, and want daily food:

16 And one of you say to them: Go in peace, be ye warmed and filled; yet give them not those things that are necessary for the body, what shall it profit?

17 So faith also, if it have not works, is dead in itself.

18 But some man will say: Thou hast faith, and I have works: shew me thy faith without works; and I will shew thee, by works, my faith.

Alleluia: Galatians 6: 14

R. Alleluia, alleluia.

14 May I never boast except in the cross of our Lord through which the world has been crucified to me and I to the world.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 8: 27-35

27 And Jesus went out, and his disciples, into the towns of Caesarea Philippi. And in the way, he asked his disciples, saying to them: Whom do men say that I am?

28 Who answered him, saying: John the Baptist; but some Elias, and others as one of the prophets.

29 Then he saith to them: But whom do you say that I am? Peter answering said to him: Thou art the Christ.

30 And he strictly charged them that they should not tell any man of him.

31 And he began to teach them, that the Son of man must suffer many things, and be rejected by the ancients and by the high priests, and the scribes, and be killed: and after three days rise again.

32 And he spoke the word openly. And Peter taking him, began to rebuke him.

33 Who turning about and seeing his disciples, threatened Peter, saying: Go behind me, Satan, because thou savorest not the things that are of God, but that are of men.

34 And calling the multitude together with his disciples, he said to them: If any man will follow me, let him deny himself, and take up his cross, and follow me.

35 For whosoever will save his life, shall lose it: and whosoever shall lose his life for my sake and the gospel, shall save it.

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इतवार, 12 सितम्बर, 2021 वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 12 सितम्बर, 2021

वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : इसायाह 50:5-9अ


5) प्रभु ने मेरे कान खोल दिये हैं; मैंने न तो उसका विरोध किया और न पीछे हटा।

6) मैंने मारने वालों के सामने अपनी पीठ कर दी और दाढ़ी नोचने वालों के सामने अपना गाल। मैंने अपमान करने और थूकने वालों से अपना मुख नहीं छिप़ाया।

7) प्रभु मेरी सहायता करता है; इसलिए मैं अपमान से विचलित नहीं हुआ। मैंने पत्थर की तरह अपना मुँह कड़ा कर लिया। मैं जानता हूँ कि अन्त में मुझे निराश नही होना पड़ेगा।

8) मेरा रक्षक निकट है, तो मेरा विरोधी कौन? हम एक दूसरे का सामना करें। मुझ पर अभियोग लगाने वाला कौन? वह आगे बढ़ने का साहस करे।

9) प्रभु-ईश्वर मेरी सहायता करता है, तो कौन मुझे दोषी ठहराने का साहस करेगा? मेरे सभी विरोधी वस्त्र की तरह जीर्ण हो जायेंगे, उन्हें कीड़े खा जायेंगे।



दूसरा पाठ : याकूब 2:14-18


14) भाइयो! यदि कोई यह कहता है कि मैं विश्वास करता हूँ, किन्तु उसके अनुसार आचरण नहीं करता, तो इस से क्या लाभ? क्या विश्वास ही उसका उद्धार कर सकता है?

15) मान लीजिए कि किसी भाई या बहन के पास न पहनने के लिए कपड़े हों और न रोज-रोज खाने की चीजे़ं।

16) यदि आप लोगों में केाई उन से कहे, "खुशी से जाइए, गरम-गरम कपड़े पहनिए और भर पेट खाइए", किन्तु वह उन्हें शरीर के लिए ज़रूरी चीजें नहीं दे, तो इस से क्या लाभ?

17) इसी तरह कर्मों के अभाव में विश्वास पूर्ण रूप से निर्जीव होता है।

18) और ऐसे मनुष्य से कोई कह सकता है, "तुम विश्वास करते हो, किन्तु मैं उसके अनुसार आचरण करता हूँ। मुझे अपना विश्वास दिखाओ, जिस पर तुम नहीं चलते और मैं अपने आचरण द्वारा तुम्हें अपने विश्वास का प्रमाण दूँगा।"



सुसमाचार : मारकुस 8:27-35


27) ईसा अपने शिष्यों के साथ कैसरिया फि़लिपी के गाँवों की ओर गये। रास्ते में उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा, "मैं कौन हूँ, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?"

28) उन्होंने उत्तर दिया, "योहन बपतिस्ता; कुछ लोग कहते हैं- एलियस, और कुछ लोग कहते हैं- नबियों में से कोई"।

29) इस पर ईसा ने पूछा, "और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?" पेत्रुस ने उत्तर दिया, "आप मसीह हैं"।

30) इस पर उन्होंने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि तुम लोग मेरे विषय में किसी को भी नहीं बताना।

31) उस समय से ईसा अपने शिष्यों को स्पष्ट शब्दों में यह समझाने लगे कि मानव पुत्र को बहुत दुःख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीन दिन के बाद जी उठना होगा।

32) पेत्रुस ईसा को अलग ले जा कर फटकारने लगा,

33) किन्तु ईसा ने मुड़ कर अपने शिष्यों की ओर देखा, और पेत्रुस को डाँटते हुए कहा, "हट जाओ, शैतान! तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो"।

34) ईसा ने अपने शिष्यों के अतिरिक्त अन्य लोगों को भी अपने पास बुला कर कहा, "जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले।

35) क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे तथा सुसमाचार के कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा।


📚 मनन-चिंतन


येसु एक ऐसा नाम जो इस संसार में सबसे ज्यादा मशहूर है, सबसे ज्यादा खोजा या पढ़ा जाता है, एक ऐसा नाम जिसके जीवन द्वारा जीवन को एक नया रूप मिला। वह येसु है कौन? इस संसार में रहने वाले लोगों में से अधिकतर लोगो ने येसु के बारे में सुना है या जाना है। लेकिन हर एक के मन में येसु के लिए अलग अलग राय है। हम दूसरो के राय में न जाते हुए अपने से व्यक्तिगत रूप से पूॅंछे कि येसु मेरे लिए कौन है? जिस प्रकार येसु ने पैत्रुस से व्यक्तिगत रूप में पूॅछा ‘और तुम क्या कहते हो कि मै कौन हॅंू?‘

हम अपने अंतरआत्मा से पूॅछे कि येसु कौन है? बचपन से लेकर अब तक कई लोगो ने येसु के बारे में हमें बताया होगा, विभिन्न तरिकों से या तो पढ़कर या सुन कर हमने प्रभु येसु के बारे में जाना होगा। परंतु सवाल यह है कि मै उन दूसरों की बाते सुनकर येसु को प्रभु मानता हूॅं या मै अपने अनुभव से या अपने स्वयं के मत से येसु को प्रभु मानता हॅू। वही व्यक्ति येसु को सच्चे रूप में प्रभु मान सकता है जो दृढ़ विश्वासी है, जिसने प्रभु का अनुभव किया है और जिसके जीवन में पवित्र आत्मा से प्रेरित है। यदि हमारा दृढ़ विश्वास कि येसु हमारे प्रभु है तो हम उनके पीछे चलते रहेंगे चाहे जीवन में कितने भी कू्रस हमको उठाना पड़ें, हम कभी पीछे मुड़ कर नहीं देंखेंगे।



📚 REFLECTION



Jesus, the name which is very famous in this world, the name which is being searched after or read about more than anything, the name of a person because of whom life got new meaning or direction. Who is that Jesus? In this world most of the people might have heard about or known about Jesus but they may be having different opinion about Jesus. Not going upon what others think about Jesus we must ask oneself in personal way who is Jesus for me? As Jesus asked Peter personally, ‘Who do you think that I am?’

Let’s ask from within who is Jesus for me? From the childhood till now many might have told about Jesus, by different means may be by hearing or reading we might have come to know about Jesus. But the question is Do I profess Jesus as God based on listening to others or do I profess Jesus as God based on my own experience or by my own conviction. Only that person can accept Jesus as truly God who is a true believer, he had an experience or his life is moved by the Holy Spirit. If we are convinced that Jesus is God then we will we walking in his path whether how much cross we have to bear for that we will never turn back.



मनन-चिंतन - 2


सुसमाचार में हम बार-बार येसु को रास्ता चलते, गाँव-गाँव घूमते देखते हैं। चलते-चलते वे अपने शिष्यों को स्वर्गराज्य के विषय में उपदेश दिया करते थे। जब हम किसी व्यक्ति से बार-बार बातें करते रहते हैं और उस व्यक्ति की बातें सुनते रहते हैं, तब हम धीरे-धीरे न केवल जो कुछ हम सुनते हैं, उसे समझते और सीखते हैं, बल्कि हम उस व्यक्ति को भी समझने और उसके करीब आने लगते हैं। बोलने वाले और सुनने वाले के बीच में एक संबंध अंकुरित होता है जो धीरे-धीरे गहरा बनता जाता है।

येसु करीब तीन साल से शिष्यों के साथ रहते आ रहे थे, वे उनके साथ उठते बैठते थे, खाते पीते थे तथा उनको उपदेश देते थे। अब वे यह जानना चाह रहे थे कि शिष्य उनके बारे में क्या सोच रहे हैं, क्या समझ रहे हैं। इसलिए एक दिन रास्ते में उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा, "मैं कौन हूँ, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?" शिष्यों ने जो भी कुछ लोगों के मुख से विभिन्न अवसरों में सुना था, उन्होंने वह सब येसु को बताया। येसु को किसी ने यिरमियाह कहा, किसी ने योहन बपतिस्ता, किसी ने एलियस और किसी ने नबियों में से कोई। जो प्रश्न पूछा गया उसके द्वारा येसु उन्हें एक व्यक्तिगत सवाल का सामना करने के लिए तैयार कर रहे थे। उनका जवाब सुनने के बाद येसु ने अपने शिष्यों से एक व्यक्तिगत प्रश्न पूछा, “और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?" शिष्यों की ओर से पेत्रुस ने उत्तर दिया, "आप मसीह हैं"।

प्रभु ने पेत्रुस की सराहना करने के बाद यह स्पष्ट किया कि यह जानकारी किसी मनुष्य ने नहीं, बल्कि पिता ईश्वर ने ही उन्हें प्रदान की है। तत्पश्चात वे शिष्यों को यह सिखाना चाहते हैं कि मसीह के जीवन का एक अनिवार्य पहलू पीडा या क्लेश है, दुख-तकलीफ़ है। इसलिए येसु ने उनसे कहा कि मसीह को “बहुत दुःख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीन दिन के बाद जी उठना होगा” (मारकुस 8:31)। परन्तु इस दुनिया के कई अन्य लोगों के समान पेत्रुस उस पहलू को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। इस विषय में पवित्र वचन कहता है, “पेत्रुस ईसा को अलग ले गया और उन्हें यह कहते हुए फटकारने लगा, "ईश्वर ऐसा न करे। प्रभु यह आप पर कभी नहीं बीतेगी" (मत्ती 16:22) येसु पेत्रुस को और अन्य शिष्यों को यह समझाना चाहते हैं कि अगर वे मसीह को क्रूस से अलग करेंगे तो वे सच्चे मसीह को पहचानने और उन्हें स्वीकार करने में असमर्थ होंगे। इसलिए “ईसा ने मुड़ कर अपने शिष्यों की ओर देखा, और पेत्रुस को डाँटते हुए कहा, "हट जाओ, शैतान! तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो" (मारकुस 8:33)।

आगे चल कर प्रभु येसु यह बताना चाहते हैं कि दुख-तकलीफ़ न केवल मसीह के जीवन का अभिन्न अंग हैं, बल्कि मसीह के सभी शिष्यों के जीवन का भी अभिन्न अंग है। इसलिए पवित्र वचन कहता है, “ईसा ने अपने शिष्यों के अतिरिक्त अन्य लोगों को भी अपने पास बुला कर कहा, "जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे तथा सुसमाचार के कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा।“ (मारकुस 8:34-35) क्रूस के बिन कोई मसीह नहीं। क्रूस के बिना कोई मसीही शिष्य भी नहीं हो सकता। कलीसियाई इतिहास तथा परम्पराओं के मुताबिक सभी बारह शिष्यों को अपने जीवन में कठोर पीडा का अनुभव हुआ। योहन को छोड सभी शिष्य शहीद बने। बुढापे में योहन की साधारण मृत्यु हुयी। अन्य ग्यारह प्रेरितों को असह्य दुख-दर्द झेल कर मृत्यु को अपनाना पडा। (1) पेत्रुस को रोम में क्रूस पर उलटा टाँग कर मार डाला गया। (2) अन्द्रेयस को यूनान में क्रूस पर चढाया गया। (3) इथियोपिया में मत्ती का सिर काट कर मार डाला गया। (4) बरथोलोमी को अरमीनिया में कोडों से पीट-पीट कर मार डाला गया। (5) थोमस को भारत में भाले से मार डाला गया। (6) फिलिप को अंकुशों से टाँग दिया गया और उन्हें बहुत ही दर्दनाक मृत्यु का शिकार बनाया गया। (7) हेरोद ने ज़ेबदी के पुत्र याकूब का गला कटवा कर उनकी हत्या की। (8) यूदस को पेर्शिया में क्रूसमरण स्वीकार करना पडा। (9) मथियस को पत्थरों से मारा गया; तत्‍पश्चात गला काट के मार डाला गया। (10) अलफ़ाई के पुत्र याकूब को मंदिर की चोटी से नीचे फेंक दिया गया और उसके बाद पीट कर मार डाला गया। (11) उत्साही सिमोन को भी क्रूस पर चढाया गया। इनके अलावा संत पौलुस का भी गला काट कर वध किया गया। कलीसिया का इतिहास हमें यह बताता है कि विश्वासियों का जीवन क्रूस का जीवन है। क्रूस लेते बिना कोई भी येसु का शिष्य नहीं बन सकता है। येसु शिष्यों के जीवन में आनेवाली कठिनाइयों को देखते हुए कहते हैं, "देखो, मैं तुम्हें भेडि़यों के बीच भेड़ों क़ी तरह भेजता हूँ। इसलिए साँप की तरह चतुर और कपोत की तरह निष्कपट बनो। "मनुष्यों से सावधान रहो। वे तुम्हें अदालतों के हवाले करदेंगे और अपने सभागृहों में तुम्हें कोडे़ लगायेंगे। तुम मेरे कारण शासकों और राजाओं के सामने पेश किये जाओगे, जिससे मेरे विषय में तुम उन्हें और गै़र-यहूदियों को साक्ष्य दे सको। ..... मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे, किन्तु जो अन्त तक धीर बना रहेगा, उसे मुक्ति मिलेगी।“(मत्ती 10:16-18,22-)

अगर हम प्रभु में विश्वास करते हैं, तो हमारे जीवन में भी दुख-तकलिफ़ें अवश्य आयेंगी। प्रवक्ता ग्रन्थ कहता है, पुत्र! यदि तुम प्रभु की सेवा करना चाहते हो, तो विपत्ति का सामना करने को तैयार हो जाओ। तुम्हारा हृदय निष्कपट हो, तुम दृढ़संकल्प बने रहो, विपत्ति के समय तुम्हारा जी नही घबराये। ईश्वर से लिपटे रहो, उसे मत त्यागो, जिससे अन्त में तुम्हारा कल्याण हो। जो कुछ तुम पर बीतेगा, उसे स्वीकार करो तथा दुःख और विपत्ति में धीर बने रहो; क्योंकि अग्नि में स्वर्ण की परख होती है और दीन-हीनता की घरिया में ईश्वर के कृपापात्रों की। ईश्वर पर निर्भर रहो और वह तुम्हारी सहायता करेगा। प्रभु के भरोसे सन्मार्ग पर आगे बढ़ते जाओ।” प्रवक्ता 2:1-6) संत पौलुस संक्षेप में कहते हैं, “हमें बहुत से कष्ट सह कर ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना है” (प्रेरित-चरित 14:22)। रोमियों को लिखते हुए वे कहते हैं, “इतना ही नहीं, हम दुःख-तकलीफ पर भी गौरव करें, क्योंकि हम जानते हैं कि दुःख-तकलीफ से धैर्य, धैर्य से दृढ़ता, और दृढ़ता से आशा उत्पन्न होती है” (रोमियों 5:3-4)। अगर संत पौलुस दुख-तकलीफ़ पर गौरव करने को कहते हैं, तो संत पेत्रुस और आगे बढ़ कर आनन्द मनाने को। “यदि आप लोगों पर अत्याचार किया जाये, तो मसीह के दुःख-भोग के सहभागी बन जाने के नाते प्रसन्न हों। जिस दिन मसीह की महिमा प्रकट होगी, आप लोग अत्यधिक आनन्दित हो उठेंगे। यदि मसीह के नाम के कारण आप लोगों का अपमान किया जाये, तो अपने को धन्य समझें, क्योंकि यह इसका प्रमाण है कि ईश्वर का महिमामय आत्मा आप पर छाया रहता है।“ (1 पेत्रुस 4:13-14) परमपिता ईश्वर हमें इन रहस्त्यों को हृदय से ग्रहण करने की कृपा प्रदान करें।


✍Br. Biniush Topno


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शनिवार, 11 सितम्बर, 2021

 

शनिवार, 11 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : 1 तिमथि 1:15-17


15) यह कथन सुनिश्चित और नितान्त विश्वसनीय है कि ईसा मसीह पापियों को बचाने के लिए संसार में आये, और उन में सर्वप्रथम मैं हूँ।

16) मुझ पर इसीलिए दया की गयी है कि ईसा मसीह सब से पहले मुझ में अपनी सम्पूर्ण सहनशीलता प्रदर्शित करें और उन लोगों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करें, जो अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए विश्वास करेंगे।

17) युगों के अधिपति, अविनाशी, अदृश्य और अतुल्य ईश्वर को युगानुयुग सम्मान तथा महिमा! आमेन!


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:43-49


43) "कोई अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं देता और न कोई बुरा पेड़ अच्छा फल देता है।

44) हर पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है। लोग न तो कँटीली झाडि़यों से अंजीर तोड़ते हैं और न ऊँटकटारों से अंगूर।

45) अच्छा मनुष्य अपने हृदय के अच्छे भण्डार से अच्छी चीजे़ं निकालता है और जो बुरा है, वह अपने बुरे भण्डार से बुरी चीज़ें निकालता है; क्योंकि जो हृदय में भरा है, वहीं तो मुँह से बाहर आता है।

46) "जब तुम मेरा कहना नहीं मानते, तो ’प्रभु! प्रभु! कह कर मुझे क्यों पुकारते हो?

47) जो मेरे पास आ कर मेरी बातें सुनता और उन पर चलता है-जानते हो, वह किसके सदृश है?

48) वह उस मनुष्य के सदृश है, जो घर बनाते समय गहरा खोदता और उसकी नींव चट्टान पर डालता है। बाढ़ आती है, और जलप्रवाह उस मकान से टकराता है, किन्तु वह उसे ढा नहीं पाता; क्योंकि वह घर बहुत मज़बूत बना है।

49) परन्तु जो मेरी बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता, वह उस मनुष्य के सदृश है, जो बिना नींव डाले भूमितल पर अपना घर बनाता है। जल-प्रवाह की टक्कर लगते ही वह घर ढह जाता है और उसका सर्वनाश हो जाता है।"


📚 मनन-चिंतन


इस संसार में हर इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला जाता है। परंतु इस दौरान वह बहुत सारी चीजें इस संसार में रहते हुए ग्रहण करता है जैसे कि नाम, ज्ञान, कला, अच्छाईयॉं, बुराईयॉं, धन दौलत, प्रेम, घृणा, दान, स्वार्थ, अच्छे अनुभव, बुरे अनुभव इत्यादि। और जो चीज़ वह ग्रहण करता है वही इस संसार में दूसरों को देता है।

इस संसार में बहुत सारी चीजे़ हैं और अक्सर हमारे पास चुनाव रहता है कि हम किस को ग्रहण करें और अपने पास रखें। यदि हमने अपने अंदर अच्छाईयों को संजोय कर रखा है तो हमारे अंदर से अच्छाईयॉं ही बाहर आयेंगी। इसलिये येसु कहते है जो हृदय में भरा है, वही तो मुॅंह से बाहर आता है।

अक्सर हम अपनी बाहरी व्यवहार से अच्छा होने की कोशिश करते है या बाहरी तौर तरिकों से अपने को बदलने की कोशिश करते है। परंतु बाहरी बदलाव तभी होगा जब अंदर से बदला जाये। प्रभु येसु मत्ती 23ः26 में कहते है, ‘‘पहले भीतर से प्याले को साफ कर लो, जिससे वह बाहर से भी साफ हो जाये।’’ हम सब अपने जीवन में अच्छाईयों को रखें।



📚 REFLECTION



In this world every person comes empty handed and goes empty handed. But within this he receives many things living in this world like name, knowledge, goodness, badness, wealth, money, love, envy, charity, selfishness, good experience, bad experience and so on. And the things which he receives that only he gives to others in this world.

There are many things in this world and every time we have the choice which one to take and keep for ourselves. If we have gathered goodness in ourselves then goodness will reflect from our lives. That’s why Jesus says that it is out of the abundance of the heart that the mouth speaks.

Usually we try to be good from the external behavior or we try to become good by trying to change ourselves externally. But external change will come only when there will be internal change. Lord Jesus says in Mt 23:26, “First clean the inside of the cup, so that the outside also may become clean.” Let’s store goodness in our lives.


✍ -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 10 सितम्बर, 2021 वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ता

 

शुक्रवार, 10 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : 1 तिमथि 1:1-2, 12-14


1) विश्वास में सच्चे पुत्र तिमथी के नाम पौलुस का पत्र, जो हमारे मुक्तिदाता ईश्वर और हमारी आशा ईसा मसीह के आदेशानुसार ईसा मसीह का प्रेरित है।

2) पिता-परमेश्वर और हमारे प्रभु ईसा मसीह तुम्हें अनुग्रह, दया और शान्ति प्रदान करें!

12) मैं हमारे प्रभु ईसा मसीह को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने मुझे बल दिया और मुझे विश्वास के योग्य समझ कर अपनी सेवा में नियुक्त किया है।

13) मैं पहले ईश-निन्दक, अत्याचारी और अन्यायी था; किन्तु मुझ पर दया की गयी है, क्योंकि अविश्वास के कारण मैं यह नहीं जानता था कि मैं क्या कर रहा हूँ।

14) मुझे हमारे प्रभु का अनुग्रह प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुआ और साथ ही वह विश्वास और प्रेम भी, जो हमें ईसा मसीह द्वारा मिलता है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:39-42



39) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया, "क्या अन्धा अन्धे को राह दिखा सकता है? क्या दोनों ही गड्ढे में नहीं गिर पडेंगे?

40) शिष्य गुरू से बड़ा नहीं होता। पूरी-पूरी शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने गुरू-जैसा बन सकता है।

41) "जब तुम्हें अपनी ही आँख की धरन का पता नहीं, तो तुम अपने भाई की आँख का तिनका क्यों देखते हो?

42) जब तुम अपनी ही आँख की धरन नहीं देखते हो, तो अपने भाई से कैसे कह सकते हो, ’भाई! मैं तुम्हारी आँख का तिनका निकाल दूँ?’ ढोंगी! पहले अपनी ही आँख की धरन निकालो। तभी तुम अपने भाई की आँख का तिनका निकालने के लिए अच्छी तरह देख सकोगे।



📚 मनन-चिंतन


भूले भटके को राह दिखाना एक अच्छी बात है परंतु वह व्यक्ति जिसे स्वयं को रास्ता मालूम न हो तो वह दूसरो को सही रास्ता दिखाने के बदले उनको और गलत रास्ता में फसा देगा। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हमे किसी से सलाह लेना हो या किसी रास्ते में आगे बढ़ना हो तो हमें उन लोगों से ही सलाह लेना चाहिए जो उन रास्तों में यह उन कार्यो में निपुण है।

इसके साथ साथ यदि हम किसी को सलाह दे रहे तो हमें यह ध्यान में रखना चाहिये कि हम उस क्षेत्र में निपुण हों। अक्सर हम हमारे देश में देखते है कि लोगो द्वारा सलाह देने की कोई कमी नहीं है। कही कुछ हुआ कि नहीं लोग अपनी अपनी सलाह देना शुरू हो जाते है परंतु वह स्वयं उस क्षेत्र में इतना दुविधा में है वह यह नहीं देखते। उदारण के तौर पर जो व्यक्ति शराब पीता है वह अपने बच्चे को कहता है कि शराब नहीं पीना, गलत काम न करना। हम दूसरों के लिए आशीष का श्रोत तभी बन पायेंगे जब हमारे अंदर अच्छाईयॉं होगी। हम सर्वप्रथम अपने जीवन में पवित्रता लाये तभी हम जाकर दूसरों को उस राह में चलने के लिए एक आशीष बन सकते है।



📚 REFLECTION



To show the way to the lost is a good thing but if the person himself doesn’t know the way then he will mislead another person to the wrong way instead of showing the correct way. It means to say that if we want to take the advise from some one or to move forward in particular direction then we have to take the advise from those people who are experts in that way or in that work.

Along with this if we give an advice to some one then we should take care that we are well versed in that. Often we see in our country that there is no lack of people for giving advice. Somewhere something happened or not people start giving their advices but they do not see that they themselves are in deep mess in that field. For example one who drinks alcohol tells his child not to drink alcohol or not to do anything bad. We can be the sourse of blessings for others only when their will be goodness in ourselves. Let’s bring the purity in our lives then only we can become a blessing for others to move in that way.


✍ -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 09 सितम्बर, 2021

 

गुरुवार, 09 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : कलोसियों 3:12-17


12) आप लोग ईश्वर की पवित्र एवं परमप्रिय चुनी हुई प्रजा है। इसलिए आप लोगों को अनुकम्पा, सहानुभूति, विनम्रता, कोमलता और सहनशीलता धारण करनी चाहिए।

13) आप एक दूसरे को सहन करें और यदि किसी को किसी से कोई शिकायत हो तो एक दूसरे को क्षमा करें। प्रभु ने आप लोगों को क्षमा कर दिया। आप लोग भी ऐसा ही करें।

14) इसके अतिरिक्त, आपस में प्रेम-भाव बनाये रखें। वह सब कुछ एकता में बाँध कर पूर्णता तक पहुँचा देता है।

15) मसीह की शान्ति आपके हृदय में राज्य करे। इसी शान्ति के लिए आप लोग, एक शरीर के अंग बन कर, बुलाये गये हैं। आप लोग कृतज्ञ बने रहें।

16) मसीह की शिक्षा अपनी परिपूर्णता में आप लोगों में निवास करें। आप बड़ी समझदारी से एक दूसरे को शिक्षा और उपदेश दिया करें। आप कृतज्ञ हृदय से ईश्वर के आदर में भजन, स्तोत्र और आध्यात्मिक गीत गाया करें।

17) आप जो भी कहें या करें, वह सब प्रभु ईसा के नाम पर किया करें। आप लोग उन्हीं के द्वारा पिता-परमेश्वर को धन्यवाद देते रहें।


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:27-38


27) "मैं तुम लोगों से, जो मेरी बात सुनते हो, कहता हूँ - अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करो।

28) जो तुम्हें शाप देते है, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।

29) जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारता है, दूसरा भी उसके सामने कर दो। जो तुम्हारी चादर छीनता है, उसे अपना कुरता भी ले लेने दो।

30) जो तुम से माँगता है, उसे दे दो और जो तुम से तुम्हारा अपना छीनता है, उसे वापस मत माँगो।

31) दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो।

32) यदि तुम उन्हीं को प्यार करते हो, जो तुम्हें प्यार करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी अपने प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं।

33) यदि तुम उन्हीं की भलाई करते हो, जो तुम्हारी भलाई करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी ऐसा करते हैं।

34) यदि तुम उन्हीं को उधार देते हो, जिन से वापस पाने की आशा करते हो, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पूरा-पूरा वापस पाने की आशा में पापी भी पापियों को उधार देते हैं।

35) परन्तु अपने शत्रुओं से प्रेम करो, उनकी भलाई करो और वापस पाने की आशा न रख कर उधार दो। तभी तुम्हारा पुरस्कार महान् होगा और तुम सर्वोच्च प्रभु के पुत्र बन जाओगे, क्योंकि वह भी कृतघ्नों और दुष्टों पर दया करता है।

36) "अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो। दोष न लगाओ और तुम पर भी दोष नहीं लगाया जायेगा।

37) किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा। क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जायेगी।

38) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा। दबा-दबा कर, हिला-हिला कर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी-की-पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जायेगी; क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जायेगा।"



📚 मनन-चिंतन


माता पिता अपने बच्चों से प्रेम करते है और कुछ हद तक प्रेम करना हम अपने माता पिता या परिावार से ही सीखते है। लेकिन संसार या परिवार का प्यार सीमित रहता है। प्रभु येसु हमें असीमित प्यार करना सीखाते है क्योंकि वे स्वयं असीमित प्यार करते है। अक्सर देखा जाता है कि लोग अपनो से या जो उन से अच्छा व्यवहार रखते है उन्ही से प्रेम या अच्छा बर्ताव करते है। परंतु प्रभु येसु सिखाते है कि न केवल अपनों से परंतु ‘‘अपने शत्रुओं से भी प्रेम करों। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करों। जो तुम्हें शाप देते है, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।‘‘

इस प्रकार का प्रेम करना शायद असंभव सा लगता है क्योंकि इस प्रकार केवल ईश्वर ही कर सकते है। परंतु प्रभु येसु ने इसे इस संसार में एक मानव के रूप में कर के दिखाया और बतलाया कि यह असंभव नहीं है। असंभव उनके लिए है जो अपने को बड़ा समझते है, जो अपने को छोटा नहीं मानना चाहते जो केवल अपन अहम् पर भरोसा रखते है, इसलिए प्रभु येसु ने कहा है कि ‘‘जो अपने को बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह तुम्हारा दास बने।’’(मत्ती 20ः26-27)।

जो प्रभु की शिक्षा के अनुसार प्रेम करता है, उसमें ईश्वरत्व झलकता है और वह ईश्वरता की ओर अग्रसर होता है। येसु ने भी यही कहा है, ’पूर्ण बनों जैसे कि तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।’



📚 REFLECTION



Parents love their children and to the some extent we learn to love from parents or family. But the love of the world or family is limited. Lord Jesus teaches us to love limitless or unconditionally because he himself loves unconditionally. Usually we find people love and behave good with the known persons or whose behavior is good towards them. but Jesus teaches us that not only with our loved ones but “love your enemies, do good to those who hate you, bless those who curse you, pray for those who abuse you.”

This type of love seems to be impossible because this can be done by God only, but Lord Jesus did this on this earth in the form of human and showed us that it is not impossible. It becomes impossible for those who think themselves big or great, who never wants them to be little, who trusts only in his ego, therefore Lord Jesus says, “Whoever wishes to be great among you must be your servant, and whoever wishes to be first among you must be your slave” (Mt 20:26-27).

One who loves according to the teaching of Jesus reflects the divinity in himself/herself and he moves towards the divinity. Jesus also told, ‘Be perfect as your Heavenly Father is perfect.’


✍ -Br Biniush Topno


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