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सोमवार, 19 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 19 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : निर्गमन 14:5-18


5) जब मिस्र के राजा को यह सूचना मिली कि इस्राएली भाग गये है, तो फिराउन और उसके पदाधिकारी, अपना मन बदल कर बोल उठे, ''हम लोग यह क्या कर बैठे! हमने इस्राएलियों को, अपने दासों को भाग जाने दिया!''

6) फिराउन अपना रथ तैयार करा कर अपनी सेना साथ ले गया -

7) छह सौ श्रेष्ठ रथ और मिस्र के सब रथ, जिन पर योद्धा सवार थे।

8) प्रभु ने मिस्र के राजा फिराउन का हृदय कठोर कर दिया; इसलिए उसने इस्राएलियों का पीछा किया,

9) जो उसे चुनौती देते हुए भाग रहे थे। मिस्रियों ने सब घोड़ों, फिराउन के रथों, उसके घुड़सवारों और उसकी सेना के साथ इस्राएलियों का पीछा किया और बालसफोन के सामने, पी-हहीरोत के निकट समुद्र के तट पर, उनके पास पहुँच गये, जहाँ उन्होंने पड़ाव डाला था।

10) फिराउन निकट आया ही था कि इस्राएलियों ने आँखें उठा कर देखा कि मिस्री हमारा पीछा कर रहें हैं। उन पर आतंक छा गया और वे चिल्ला कर प्रभु की दुहाई देने लगे।

11) उन्होंने मूसा से कहा, ''क्या मिस्र में हम को क़बरें नहीं मिल सकती थीं, जो आप हम को मरूभूमि में मरने के लिए यहाँ ले आये है? हम को मिस्र से निकाल कर आपने हमारा कौन-सा उपकार किया?

12) क्या हमने मिस्र में रहते समय आप से नहीं कहा था कि हमें मिस्रियों की सेवा करते रहने दीजिए? मरूभूमि में मरने की अपेक्षा मिस्रियों की सेवा करना कहीं अधिक अच्छा है।''

13) मूसा ने लोगों से कहा, ''डरो मत! धीर बने रहो! और यह देखो कि किस प्रकार प्रभु आज तुम लोगों की रक्षा करेगा। जिन मिस्रियों को तुम आज देख रहे हो, तुम उन्हें फिर कभी नहीं देखोगे।

14) प्रभु ही तुम्हारी ओर से युद्ध करेगा और तुम लोगों को कुछ भी नहीं करना पड़ेगा।''

15) प्रभु ने मूसा से कहा, ''तुम मेरी दुहाई क्यों दे रहे हो? इस्राएलियों को आगे बढ़ने का आदेश दो।

16) तुम अपना डण्डा उठा कर अपना हाथ सागर के ऊपर बढ़ाओ और उसे दो भागों में बाँट दो, जिससे इस्राएली सूखे पाँव समुद्र की तह पर चल सकें।

17) मैं मिस्रियों का हृदय कठोर बनाऊँगा और वे इस्राएलियों का पीछा करेंगे। तब मैं फिराउन, उसकी सेना, उसके रथ और घुड़सवार, सब को हरा कर अपना सामर्थ्य प्रदर्शित करूँगा

18) और जब मैं फिराउन, उसकी सेना, उसके रथ और उसके घुड़सवार सब को हरा कर अपना सामर्थ्य प्रदर्शित कर चुका होऊँगा, तब मिस्री जान जायेंगे कि मैं प्रभु हूँ।''


सुसमाचार : मत्ती 12:38-42


38) उस समय कुछ शास्त्री और फ़रीसी ईसा से बोले, "गुरुवर! हम आपके द्वारा प्रस्तुत कोई चिह्न देखना चाहते हैं"।

39) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "यह दुष्ट और विधर्मी पीढ़ी एक चिह्न माँगती है, परन्तु नबी योनस के चिह्न को छोड़ कर कोई चिह्न नहीं दिया जायेगा।

40) जिस प्रकार योनस तीन दिन और तीन रात मच्छ के पेट में रहा, उसी प्रकार मानव पुत्र भी तीन दिन और तीन रात पृथ्वी के गर्भ में रहेगा।

41) न्याय के दिन निनिवे के लोग इस पीढ़ी के साथ जी उठेंगे और इसे दोषी ठहरायेंगे, क्योंकि उन्होंने योनस का उपदेश सुन कर पश्चात्ताप किया था, और देखो यहाँ वह है, जो योनस से भी महान् हैं।

42) न्याय के दिन दक्षिण की रानी इस पीढ़ी के साथ जी उठेगी और इसे दोषी ठहरायेगी; क्योंकि वह सुलेमान की प्रज्ञा सुनने के लिए पृथ्वी के सीमान्तों से आयी थी, और देखो-यहाँ वह है, जो सुलेमान से भी महान् है।


📚 मनन-चिंतन


आज के दोनों पाठों में हम एक जैसे लोगों को देखते हैं, जिनका ह्रदय ईश्वर के महान चिन्हों और चमत्कारों के प्रति बन्द है, और ईश्वर के महान कार्यों को अनदेखा कर देता है. पहले पाठ में हम देखते हैं कि जब इसरायली लोग नबी मूसा के नेतृत्व में मिस्र की दासता से बाहर निकल आये तो बाद में मिस्री राजा अपने सैनिकों और पलटन के साथ उनका पीछा करता है. जब वे उन्हें अपना पीछा करते हुए देखते हैं तो घबरा जाते हैं, और मूसा के विरुद्ध भुनभुनाने लगते हैं. अपनी दासता की ज़िन्दगी को बेहतर समझते हैं, और मूसा को कोसते हैं. वे भूल जाते हैं, बल्कि अनदेखा कर देते हैं ईश्वर के उन अनेक महान कार्यों को जिनके द्वारा ईश्वर ने उन्हें मुक्त किया था. मिस्रियों पर ऐसी विपत्तियाँ भेजी थीं कि वे भय से थर-थर कांपने लगे थे, लेकिन ये अविश्वासी लोग ईश्वर के उन महान चमत्कारों को अनदेखा कर देते हैं.

सुसमाचार में भी प्रभु येसु इस पीढ़ी के लोगों को धिक्कारते हैं जो उनसे चिन्ह माँगते हैं, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करना चाहते हैं. प्रभु येसु उन्हें नबी योनस का चिन्ह देते हैं, और उसकी प्रमाणिकता इससे साबित होती है कि जिस तरह से नबी योनस तीन दिन तक मछली के पेट में रहा था उसी तरह प्रभु येसु भी पृथ्वी के गर्भ में रहेंगे. नबी योनस पश्चाताप के सन्देश का प्रतीक थे. निनिवे के लोग पापी जीवन जी रहे थे, तब ईश्वर ने नबी योनस को उन्हें चेतवानी देने भेजा था कि यदि तुम लोग पश्चताप नहीं करोगे तो नष्ट हो जाओगे. प्रभु येसु ने भी सबसे पहले आकर पश्चाताप का सन्देश दिया (मारकुस 1:15). आइये हम अपने मन में झाँककर देखें, कहीं हम भी उस पापी पीढ़ी के समान तो नहीं?



📚 REFLECTION



We see similar people in both the readings of today, whose heart is closed to God’s mighty works and wonders, who closes their eyes from God’s presence amidst them. In the first reading of today we see the Israelites, when they were brought out of the slavery from Egypt, started to curse Moses when they saw they were chased by the Egyptians, they could not believe in the might of God and started to regret to follow Moses. They forget the miracles and mighty works that God performed when he released them from the clutches of the Egyptians. The Ten plagues that resulted in their freedom from slavery could not move their hearts, could not change them.

In the Gospel of the day also Jesus condemns the present generation of his time, who sought for a sign, who did not want to believe in Jesus. Jesus gives them the sign of prophet Jonah, and tells them that as Jonah was inside the belly of the fish for three day, similarly he will remain in the heart of the earth for three days and three nights. The people of Nineveh lived a sinful life so God sent prophet Jonah to turn them to repentance. So Jonah warned them, they will perish if they did not repent and change their way of life. Jesus also began his ministry with the message of repentance (cf Mark 1:15). Let us look within our hearts, are we like the perverse generation who did not believe in Jesus and asked for a sign?


✍ -Fr. Johnson B. 



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Praise the Lord!

Sunday 18 july 2021 SIXTEENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME

SIXTEENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME



First Reading: Jeremiah 23: 1-6

1 Woe to the pastors, that destroy and tear the sheep of my pasture, saith the Lord.

2 Therefore thus saith the Lord the God of Israel to the pastors that feed my people: You have scattered my flock, and driven them away, and have not visited them: behold I will visit upon you for the evil of your doings, saith the Lord.

3 And I will gather together the remnant of my flock, out of all the lands into which I have cast them out: and I will make them return to their own fields, and they shall increase and be multiplied.

4 And I will set up pastors over them, and they shall feed them: they shall fear no more, and they shall not be dismayed: and none shall be wanting of their number, saith the Lord.

5 Behold the days come, saith the Lord, and I will raise up to David a just branch: and a king shall reign, and shall be wise, and shall execute judgement and justice in the earth.

6 In those days shall Juda be saved, and Israel shall dwell confidently: and this is the name that they shall call him: the Lord our just one.

Responsorial Psalm: Psalms 23: 1-3, 3-4, 5, 6

R. (1) The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

1 A psalm for David. The Lord ruleth me: and I shall want nothing.

2 He hath set me in a place of pasture. He hath brought me up, on the water of refreshment:

3 He hath converted my soul.

R. The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

3 He hath led me on the paths of justice, for his own name’s sake.

4 For though I should walk in the midst of the shadow of death, I will fear no evils, for thou art with me. Thy rod and thy staff, they have comforted me.

R. The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

5 Thou hast prepared a table before me against them that afflict me. Thou hast anointed my head with oil; and my chalice which inebriateth me, how goodly is it!

R. The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

6 And thy mercy will follow me all the days of my life. And that I may dwell in the house of the Lord unto length of days.

R. The Lord is my shepherd; there is nothing I shall want.

Second Reading: Ephesians 2: 13-18

13 But now in Christ Jesus, you, who some time were afar off, are made nigh by the blood of Christ.

14 For he is our peace, who hath made both one, and breaking down the middle wall of partition, the enmities in his flesh:

15 Making void the law of commandments contained in decrees; that he might make the two in himself into one new man, making peace;

16 And might reconcile both to God in one body by the cross, killing the enmities in himself.

17 And coming, he preached peace to you that were afar off, and peace to them that were nigh.

18 For by him we have access both in one Spirit to the Father.

Alleluia: John 10: 27

R. Alleluia, alleluia.

27 My sheep hear my voice: and I know them, and they follow me.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 6: 30-34

30 And the apostles coming together unto Jesus, related to him all things that they had done and taught.

31 And he said to them: Come apart into a desert place, and rest a little. For there were many coming and going: and they had not so much as time to eat.

32 And going up into a ship, they went into a desert place apart.

33 And they saw them going away, and many knew: and they ran flocking thither on foot from all the cities, and were there before them.

34 And Jesus going out saw a great multitude: and he had compassion on them, because they were as sheep not having a shepherd, and he began to teach them many things.


Praise the lord

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इतवार, 18 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 18 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 23:1-6


1) “धिक्कार उन चरवाहों को जो मेरे चरागाह की भेड़ों को नष्ट और तितर-बितर हो जाने देते हैं!“ यह प्रभु की वाणी है।

2) इसलिए प्रभु, इस्राएल का ईश्वर अपनी प्रजा को चराने वालों से यह कहता है, “तुम लोगों ने मेरी भेड़ों को भटकने और तितर-बितर हो जाने दिया; तुमने उनकी देखरेख नहीं की। देखो! मैं तुम लोगों को तुम्हारे अपराधों का दण्ड दूँगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

3) “इसके बाद मैं स्वयं अपने झुण्ड की बची हुई भेड़ों को उन सभी देशों से एकत्र कर लूँगा, जहाँ मैंने उन्हें बिखेर दिया है; मैं उन्हें उनके अपने मैदान वापस ले चलूँगा और वे फलेंगी-फूलेंगी।

4) मैं उनके लिए ऐसे चरवाहों को नियुक्त करूँगा, जो उन्हें सचमुच चरायेंगे। तब उन्हें न तो भय रहेगा, न आतंक और न उन में से एक का भी सर्वनाश होगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

5) प्रभु यह कहता है: “वे दिन आ रहे हैं, जब मैं दाऊद के लिए एक न्यायी वंशज उत्पन्न करूँगा। वह राजा बन कर बुद्धिमानी से शासन करेगा और अपने देश में न्याय और धार्मिकता स्थापित करेगा।

6) उसके राज्यकाल में यूदा का उद्धार होगा और इस्राएल सुरक्षित रहेगा और उसका यह नाम रखा जायेगा- प्रभु ही हमारी धार्मिकता है।“



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 2:13-18



13) आप लोग पहले दूर थे, किन्तु ईसा मसीह से संयुक्त हो कर आप अब मसीह के रक्त द्वारा निकट आ गये है;

14) क्योंकि वही हमारी शान्ति हैं। उन्होंने यहूदियों और गैर-यहूदियों को एक कर दिया है। दोनों में शत्रुता की जो दीवार थी, उसे उन्होंने गिरा दिया है।

15) और अपनी मृत्यु द्वारा विधि-निषेधों की संहिता को रद्द कर दिया। इस प्रकार उन्होंने यहूदियों तथा गैर-यहूदियों को अपने से मिला कर एक नयी मानवता की सृष्टि की और शान्ति की स्थापित की है।

16) उन्होंने क्रूस द्वारा दोनों का एक ही शरीर में ईश्वर के साथ मेल कराया और इस प्रकार शत्रुता को नष्ट कर दिया।

17) तब उन्होंने आ कर दोनों को शान्ति का सन्देश सुनाया - आप लोगों को, जो दूर थे और उन लोगों को, जो निकट थे;

18) क्योंकि उनके द्वारा हम दोनों एक ही आत्मा से प्रेरित हो कर पिता के पास पहुँच सकते हैं।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 6:30-34


30) प्रेरितो ने ईसा के पास लौट कर उन्हें बताया कि हम लोगों ने क्या-क्या किया और क्या-क्या सिखलाया है।

31) तब ईसा ने उन से कहा, ’’तुम लोग अकेले ही मेरे साथ निर्जन स्थान चले आओ और थोड़ा विश्राम कर लो’’; क्योंकि इतने लोग आया-जाया करते थे कि उन्हें भोजन करने की भी फुरसत नही रहती थी।

32) इस लिए वे नाव पर चढ़ कर अकेले ही निर्जन स्थान की ओर चल दिये।

33) उन्हें जाते देख कर बहुत-से लोग समझ गये कि वह कहाँ जा रहे हैं। वे नगर-नगर से निकल कर पैदल ही उधर दौड़ पड़े और उन से पहले ही वहाँ पहुँच गये।

34) ईसा ने नाव से उतर कर एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे और वह उन्हें बहुत-सी बातों की शिक्षा देने लगे।



📚 मनन-चिंतन


भीड़ की भीड़ प्रभु येसु के पीछे-पीछे क्यों चली आती थी? सुसमाचार में कई जगह हम पढ़ते हैं कि जहाँ भी प्रभु येसु जाते थे, लोग वहाँ उनसे भी पहले पहुँच जाते थे. चाहे प्रभु येसु अंजान जगह पर जाएँ, या सुनसान, निर्जन स्थान पर जाएँ, चाहे किसी दूर-दराज के गॉंव जाएँ, लोग उन्हें खोज ही लेते थे. कई बार तो उन्हें भीड़ से बचने के लिए नाव पर चढ़कर सुसमाचार सुनाना पड़ता था. ऐसा ही दृश्य हम आज के सुसमाचार में देखते हैं, जहाँ शिष्य लोग ख़ुशी-ख़ुशी सुसमाचार का प्रचार करने के बाद लौटे थे. प्रभु येसु चाहते थे कि वे थोड़ा सा आराम कर लें क्योंकि लोग आ रहे थे, उन्हें खाना खाने की भी फुर्सत नहीं मिल पा रही थी, इसलिए वे उन्हें एक निर्जन स्थान पर ले जाते हैं, लेकिन लोग उन्हें जाते हुए देख लेते हैं, उनसे पहले ही वहाँ पैदल पहुँच जाते हैं. प्रभु येसु को वे बिना चरवाहे की भेड़ों के समान प्रतीत होते हैं.

शुरू से ही ईश्वर और उसकी प्रजा के बीच के सम्बन्ध को अलग-अलग प्रतीकों द्वारा व्यक्त किया जाता रहा है, उन्हीं में से एक है - चरवाहा और भेड़ें. आज के पहले पाठ में हम पढ़ते हैं, कि ईश्वर ने जिन चरवाहों को अपनी भेड़ों के ऊपर नियुक्त किया उन्होंने ही भेड़ों को तितर-बितर कर दिया है, उनकी उचित देख-भाल नहीं की. कुछ ऐसा ही हम नबी एज़ेकिएल के ग्रन्थ के 34 वें अध्याय में देखते हैं. लोगों का जो सम्बन्ध ईश्वर के साथ प्रारम्भ से था वह वैसा का वैसा नहीं रहा, धीरे-धीरे लोग ईश्वर से दूर होते गये. वे सही रास्ते से भटकते चले गये, और इसके लिए कुछ हद तक वे लोग ज़िम्मेदार थे, जिन्हें ईश्वर ने लोगों को सम्भाले रखने की ज़िम्मेदारी दी. उन्होंने लोगों को ईश्वर के करीब लाने की अपेक्षा, अपने बुरे जीवन द्वारा व लोगों के शोषण द्वारा उन्हें ईश्वर से और दूर कर दिया.

प्रभु येसु के समय यह तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है, जब प्रभु येसु धर्म के उन ठेकेदारों और धार्मिक नेताओं को धिक्कारते हैं, उनकी कमियों और दोषों की ओर इंगित करते हैं. उनके जीवन के कुछ उदाहरण ऐसे हैं जिनके कारण लोग ईश्वर के पास नहीं बल्कि उनसे दूर हो चले थे, जैसे कि बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना, अपने आकर्षित करने वाले कपडे पहनना, लम्बी-लम्बी और खोखली प्रार्थनाएं करना, लोगों पर नियमों के अनावश्यक भार डालना, लोगों को गुमराह करना, नबियों की हत्या करना इत्यादि. प्रभु येसु उनकी तुलना चोर और डाकू तथा भाड़े के मजदूरों से करते हैं (योहन 10:8,12). इसीलिए प्रभु येसु स्वयं उनके लिए सच्चे और भले चरवाह बनकर आये ताकि उन्हें हरे-हरे चरागाहों में ले चलें, चोर, डाकुओं और भेडियों से उनकी रक्षा कर सकें. एक भला और सच्चा चरवाहा ही भेड़ों की सही स्थिति और उनके कष्ट जानता है.

ईश्वर ने हम सभी को अपनी ख़ुशी से अपने लिए बनाया है और हमारी आत्मा उसी ईश्वर के लिए सदा प्यासी रहती है (स्तोत्र 42:2). इसी प्यास के कारण हम जाने-अनजाने में भी ईश्वर को खोजते रहते हैं, क्योंकि ईश्वर को पाना और उसे मिलन ही हमारे जीवन का अंतिम उद्देश्य है. जो लोग इस उद्देश्य से भटक जाते हैं, इस उद्देश्य को भूल जाते हैं, वे अपने जीवन में खालीपन महसूस करते हैं. उस खालीपन को दूर करने के लिए बिना चरवाहे की भेड़ों के समान यहाँ-वहाँ भटकते हैं. खालीपन को दूर करने और शान्ति पाने के लिए नयी-नयी चीज़ें ट्राई करते हैं, संसारिकता, धन-दौलत और ऐशो-आराम में संतुष्टि पाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमारी वास्तविक और अनन्त संतुष्टि केवल ईश्वर में है, वही हमारा भला और सच्चा चरवाहा है. आइये हम पूरे ह्रदय से उसके पास जाएँ. आमेन.



📚 REFLECTION



Why is it that so many people came searching Jesus? We read in the gospels that wherever Jesus went, people reached there even before him. Whether Jesus went to known places or unknown places, deserted or secluded places or remote unknown villages, people always found their way to reach him. Many times he had to use boat to preach because of the crowd that was pressing on him. Something similar we see in the gospel today when the disciples happily returned after their mission work and they were filled with joy and excitement. Jesus wanted them to rest for a while because so many people were coming and going that they did not even have time to eat peacefully, so he takes them to a deserted place where nobody could disturb them, but people see them leaving and they reach the place even before them, walking on foot. Jesus felt pity for them and they seemed to him like sheep without shepherd.

The relationship between God and His people has been expressed through various imageries and symbols, one of such express is that of Shepherd and sheep. God is the Shepherd and the people are sheep. We see in the first reading of today, the shepherds whom God had appointed for caring His sheep, they scattered them, they did not care for them. Similar words we see in the 34th chapter of prophet Ezekiel. This relationship of people with God could not remain the same, they offended God and went away from God gradually. They went astray from the right path, and people and leaders who were given the responsibility to care for the sheep, they responsible for the downfall of the people to some extent. Instead of leading people towards God, their scandalous life became a means sending people away from God and cause for their exploitation.

This became all the more clear at the time of Jesus, when he condemns these leaders and false teachers of the religion. He points out their wrongful conduct and exploitative ways. There were many examples of their wrongful conduct that kept people away from them as well as from God. Some such examples are – they liked to be greeted in the markets, wear very royal and attractive clothes, make empty and long prayers, burn the people with unnecessary laws, misleading the people in the matters of religion and killing the prophets etc. Jesus compares them with theives and decoits who want to steal and kill, they were like hired servants who didn’t care for the sheep (John10:8,12). Therefore Jesus came down as the Good Shepherd who would take his sheep to green pastures and give them rest, protect and safeguard them from thieves and robbers. A good shepherd knows his sheep and their needs and can take care of them well.

God has created us out of His free will and for His own happiness and put a thirst in souls, so that they always thirst for God (Psalm 42:2). It is because of this thirst within us that we search and long for God, it becomes our only goal and destiny. Those who forget their destiny and goal, they feel emptiness and dryness within. They want to fill that emptiness and hence go around restlessly like sheep without shepherd. They try new things, they try to attain happiness and fulfilment through wealth, money, pleasure and luxuries, but all in vain because our true happiness lies in finding God. Only God ca become our True and Good Shepherd. Let us turn towards our Good Shepherd. Amen.



मनन-चिंतन -2


Have a break have a kit-kat. अंतराल लो kit-kat खाओ. Break हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आज के सुसमाचार में हम देखते है कि प्रेषित कार्य के बाद वापस लौटे शिष्यों को प्रभु आराम करने का निमत्रंण देते है।

फादर जैरी ओरबोस अपनी श्रमततल व्तइवे एक किताब में येसु द्वारा दिये गये इस आराम के तीन कारण बताते है। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक।

शारीरिक: शिष्यों ने अपना प्रेषित कार्य इतने जोशखरोश के साथ किया कि उनके पास आराम के बारे में सोचने तक का समय नहीं था। उन्होंने उनकी शारीरिक क्षमता की परवाह न रखते हुए काम किया। यदि इस गति के साथ वे काम करना जारी रखते तो वे शायद बीमार भी हो सकते थे। इस बात को मन में रखते हुए प्रभु उन्हें आराम करने के लिए कहते है।

मानसिक: बाइबिल में हम देखते है कि जब कुछ महिलाऐं बच्चों को आर्शीवाद के लिए प्रभु के पास लाती है तो शिष्यगण नाराज हो कर उनको दूर कर देते है। भीड बढ़ने पर उनकी आशंका होती थी। यहॉं पर हम देखते है कि वे पहले से ही थक चुके थे और ऊपर से भीड उमड पड रही थी। उनके अच्छे कार्यों को प्रभु गुस्से में डुबाना नहीं चाहते थे। भीड में शिष्य चिडचिडेपन के कारण लोगों से गुस्सा कर सकते थे। यह सब देखते हुए येसु ने उनको आराम करने भेजा।

आध्यात्मिक: आष्टा सेमिनारी में हमारा ARA (Action Reflection Action) नामक कार्यक्रम हुआ करते थे। इसका उद्देश्य यह था कि लोगों के बीच सामाजिक जागरूकता के कार्य करने के बाद मनन चिंतन करके और भी अच्छी तरीके से उसको करना। यही योजना प्रभु के मन में थी। उन्होंने अपने शिष्यों को आराम करने के लिए इसीलिए कहा कि वे अपने कार्यों पर मनन-चिन्तन करें और यह समझे की प्रभु की कृपा कितनी बडी मात्रा में उनके कार्यों पर बनी रही। यह आराम उनके आगे के मिशन कार्यों के लिए जोश और ऊर्जा प्रदान कर सकता था।

हम सब अपनी गाडियों की सर्विसिंग कराते है इस तरह हम गाडी को break या विश्राम देते है। इंजन का तेल (Engine oil) बदलने से तथा पहियों को तेल से रमाने से गाडी की क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रकार गाडी के समान हमें भी विश्राम की जरूरत है लेकिन ज्यादातर लोग यह विश्राम लेना नहीं चाहते हैं।

पुराने जमाने में कपडे धोने और बर्तन मांझने में बहुत समय लगता था। कुॅए और हैंडपंप से पानी निकालते थे, चूल्हा लकडी से जलाते थे। यह सब करने के लिए भी बहुत समय लगता था लेकिन फिर भी लोगों के पास आराम करने के लिए, break लेने के लिए पर्याप्त समय था। आजकल कपडे और बर्तन धोने के लिए मशीन है, पानी नल खोलने पर उपलब्ध है, गैस और बिजली से चूल्हे जलते है। इस मशीनों के कारण समय की काफी बचत होती है। फिर भी आज break लेने के लिए किसी के पास समय नहीं है। सब व्यस्त रहते है।

वैसे तो प्राकृतिक तौर पर तो हम सब break लेते है। सुबह से tea break, lunch break शाम को लंबे आराम के लिए सोने का break लेते है। break लेना भूल जाते है या लेना नहीं चाहते है उनके लिए भी प्रकृति का नियम है - बीमारी। किसी के बीमार होने से उनको तीन-चार दिन लगातार break मिलता है।

हम सबको break लेने की आदत अपनाना चाहिए। Break लेने से हम अपने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता बडा सकते है। साथ साथ और भी ऊर्जा के साथ प्रभु के लिए काम कर सकते है।


✍फादर मेलविन चुल्लिकल



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शनिवार, 17 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शनिवार, 17 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :निर्गमन 12:37-42



37) इस्राएलियों ने रामसेस से सुक्कोत की ओर प्रस्थान किया। बच्चों और स्त्रियों के अतिरिक्त पैदल चलने वाले पुरुषों की संख्या लगभग छः लाख थी।

38) बहुत से परदेशी उनके साथ हो लिये और भेड़-बकरियों तथा बैल-गायों के बहुत भारी झुण्ड भी।

39) वे मिस्र से जो गूँधा हुआ आटा अपने साथ ले गये थे, उन्होंने उसकी बेखमीर रोटियाँ पकायी। उनके पास खमीर नहीं था, क्योंकि वे इतनी जल्दी में मिस्र से निकाल दिये गये थे कि उन्हें रास्ते के लिए भोजन तैयार करने का समय तक नहीं मिला था।

40) इस्राएली चार सौ तीस वर्ष तक मिस्र में रहे थे।

41) जिस दिन ये चार सौ तीस वर्ष समाप्त हुए, उसी दिन प्रभु की समस्त प्रजा मिस्र से निकल गयी।

42) प्रभु उस रात जागरण करता रहा, जिससे वह इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले जाये। इसलिए समस्त इस्राएली पीढ़ी दर पीढ़ी उसी रात को प्रभु के आदर में जागरण करते है।



सुसमाचार : मत्ती 12:14-21



14) इस पर फ़रीसियों ने बाहर निकल कर ईसा के विरुद्ध यह परामर्श किया कि हम किस तरह उनका सर्वनाश करें।

15) ईसा यह जान कर वहाँ से चले गये।

बहुत-से लोग ईसा के पीछे हो लिये। वे सबों को चंगा करते थे,

16) किन्तु साथ-साथ यह चेतावनी देते थे कि तुम लोग मेरा नाम नहीं फैलाओ।

17) इस प्रकार नबी इसायस का यह कथन पूरा हुआ-

18) यह मेरा सेवक है, इसे मैने चुना है; मेरा परमप्रिय है, मैं इस पर अति प्रसन्न हूँ। मैं इसे अपना आत्मा प्रदान करूँगा और यह गैर-यहूदियों में सच्चे धर्म का प्रचार करेगा।

19) यह न तो विवाद करेगा और न चिल्लायेगा, और न बाज़ारों में कोई इसकी आवाज सुनेगा।

20) यह न तो कुचला हुआ सरकण्डा ही तोडे़गा, और न धुँआती हुई बत्ती ही बुझायेगा, जब तक वह सच्चे धर्म को विजय तक न ले जाये।

21) इसके नाम पर गैर-यहूदी भरोसा रखेंगे।



📚 मनन-चिंतन



आज का युग संचार का युग है, सूचनाएं दुनिया के एक कौने से दूसरे कौने में चंद सेकेंड्स में पहुँच जाती हैं. इन्टरनेट पर इतने सारे प्लेटफॉर्म्स हैं, जिनके द्वारा आप अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकते हैं, जैसे कि फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम आदि. कभी-कभी तो कन्फ्युसन होता है कि अपने विचार दूसरों तक पहुँचाने के लिए कौन सा प्लेटफार्म सबसे अच्छा है. बहुत से लोगों को लत होती है कि वे कुछ भी करते हैं, उसे तुरन्त मीडिया या सोशल मीडिया के द्वारा दूसरों को बताते हैं, कभी- कभी तो उसे बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं. यही आदत जीवन के हर पहलु में समा जाती है. ऐसा ही एक पहलु है, किसी की कुछ मदद करना या भलाई करना. पहले कहावत होती थी, नेकी कर दरिया में डाल, यानि कि किसी के साथ कुछ भलाई की तो उसे भूल जाओ, उसका ढिंढोरा मत पीटो, लेकिन आज उसके उल्टा हो रहा है.

प्रभु येसु जगह-जगह घूम-घूम कर लोगों को चंगाई प्रदान करते थे, उन्हें जीवन की अनमोल शिक्षा देते थे, लोगों का जीवन बदल देते थे और उनसे कहते थे कि किसी को बताना मत. लेकिन फिर भी लोग जोर-शोर से उसका प्रचार कर देते थे. आज का सुसमाचार हमें याद दिलाता है कि यदि हम किसी के लिए कुछ भला करते हैं, तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटना है. चौराहे पर चिल्लाकर उसका प्रचार नहीं करना है. लोग हमारे भले कार्यों को देखकर हमारी नहीं बल्कि स्वर्गीय पिता की महिमा करें, क्योंकि हम तो पिता ईश्वर के हाथों में कठपुतली मात्र हैं. पिता ईश्वर हमसे तभी प्रसन्न होंगे जब हम इस सिद्धांत का पालन करेंगे - नेकी कर और दरिया में डाल. आमेन.



📚 REFLECTION



Today we live in a world of communication revolution, here information travels from one corner to another corner of the world just within seconds. There are so many platforms on the internet where you can reach across the vast number of people, such as Facebook, Twitter Instagram etc. Sometimes even we get confused in choosing the best means of communication. Many people have got a kind of addiction to share with others on social media, whatever they do, and very often they share in an exaggerated manner. This attitude pervaded all aspects of our life, including the aspect of spiritual or moral life. Earlier it was said ‘do good and forget it’ meaning whenever you do any good to others, do not let it be known to others, keep it a secret, but today, it is the other way.

Jesus went around, from place to place doing good to others, healing them of their sicknesses and infirmities, preaching them the great mysteries and changing their lives. He always told people not to tell about it to anybody. But still many went around proclaiming it, what God had done for them. Today’s gospel reminds us that when we do good, help someone, we should not proclaim it to the world, on the crossroads. People should not praise us by seeing our good works rather they should give praise to the Heavenly Father because it is through the grace and blessings of the Heavenly Father that we do whatever we do. God will love us and be happy only when we follow this principle of keeping it secret when we do something good for others.


✍ -Fr. Johnson B.


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शुक्रवार, 16 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह माउन्ट कार्मल की माता मरियम

 

शुक्रवार, 16 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

माउन्ट कार्मल की माता मरियम



पहला पाठ :निर्गमन 11:10-12:14


10) मूसा और हारून ने फिराउन के सामने ये सब चमत्कार दिखाये। परन्तु प्रभु ने फिराउन का हृदय कठोर कर दिया था। उसने इस्राएलियों को अपने देश से जाने की आज्ञा नहीं दी।

1) प्रभु ने मिस्र देश में मूसा और हारून से कहा,

2) ''यह तुम्हारे लिए आदिमास होगा; तुम इसे वर्ष का पहला महीना मान लो।

3) इस्राएल के सारे समुदाय को यह आदेश दो - इस महीने के दसवें दिन हर एक परिवार एक एक मेमना तैयार रखेगा।

4) यदि मेमना खाने के लिए किसी परिवार में कम लोग हों, तो जरूरत के अनुसार पास वाले घर से लोगों को बुलाओ। खाने वालों की संख्या निश्चित करने में हर एक की खाने की रुचि का ध्यान रखो।

5) उस मेमने में कोई दोश न हो। वह नर हो और एक साल का। वह भेड़ा हो अथवा बकरा।

6) महीने के दसवें दिन तक उसे रख लो। शाम को सब इस्राएली उसका वध करेंगे।

7) जिन घरों में मेमना खाया जायेगा, दरवाजों की चौखट पर उसका लोहू पोत दिया जाये।

8) उसी रात बेखमीर रोटी और कड़वे साग के साथ मेमने का भूना हुआ मांस खाया जायेगा।

9) इस में से कच्चा या उबला हुआ कुछ मत खाओं, बल्कि सिर, पैरों और अँतड़ियों के साथ पूरे को आग में भून कर खाओं।

10) अगले दिन के लिए कुछ भी नहीं रखा जायेगा। जो कुछ बच गया हो, उसे भोर के पहले ही जला दोगे।

11) तुम लोग चप्पल पहन कर, कमर कस कर तथा हाथ में डण्डा लिये खाओगे। तुम जल्दी-जल्दी खाओगे, क्योंकि यह प्रभु का पास्का है।

12) उसी रात मैं, प्रभु मिस्र देश का परिभ्रमण करूँगा, मिस्र देश में मनुष्यों और पशुओं के सभी पहलौठे बच्चों को मार डालूँगा और मिस्र के सभी देवताओं को भी दण्ड दूँगा।

13) तुम लोहू पोत कर दिखा दोगे कि तुम किन घरों में रहते हो। वह लोहू देख कर मैं तुम लोगों को छोड़ दूँगा, इस तरह जब मैं मिस्र देश को दण्ड दूँगा, तुम विपत्ति से बच जाओगे।

14) तुम उस दिन का स्मरण रखोगे और उसे प्रभु के आदर में पर्व के रूप में मनाओगे। तुम उसे सभी पीढ़ियों के लिए अनन्त काल तक पर्व घोषित करोगे।


सुसमाचार : मत्ती 12:1-8


1) ईसा किसी विश्राम के दिन गेहूँ के खेतों से हो कर जा रहे थे। उनके शिष्यों को भूख लगी और वे बालें तोड़-तोड़ कर खाने लगे।

2) यह देख कर फ़रीसियों ने ईसा से कहा, ’’देखिए, जो काम विश्राम के दिन मना है, आपके शिष्य वही कर रहे हैं’’।

3) ईसा ने उन से कहा, ’’क्या तुम लोगों ने यह नहीं पढ़ा कि जब दाऊद और उनके साथियों को भूख लगी, तो दाऊद ने क्या किया था?

4) उन्होंने ईश-मन्दिर में जा कर भेंट की रोटियाँ खायीं। याजकों को छोड़ न तो उन को उन्हें खाने की आज्ञा थी और न उनके साथियों को।

5) अथवा क्या तुम लोगों ने संहिता में यह नहीं पढ़ा कि याजक विश्राम के दिन का नियम तोड़ते तो हैं, पर दोषी नहीं होते?

6) मैं तुम से कहता हूँ- यहाँ वह है, जो मन्दिर से भी महान् है।

7) मैं बलिदान नहीं, बल्कि दया चाहता हूँ- यदि तुम लोगों ने इसका अर्थ समझ लिया होता, तो निर्दोषों को दोषी नहीं ठहराया होता;

8) क्योंकि मानव पुत्र विश्राम के दिन का स्वामी है।’’


📚 मनन-चिंतन


आज माता कलीसिया कारमेल पर्वत की माता मरियम का पर्व मनाती है. यह त्यौहार कारमेल धर्मसमाजों के लिए प्रमुख पर्व है, इसलिए आज हम विशेष रूप से उन्हें याद करें. इस त्यौहार की स्थापना पहले कारमेल की धर्मसमाजों के लिए सन 1332 में हुई थी, बाद में सन्त पापा बेनेडिक्ट 13वें ने 1726 में इसे पूरी कलीसिया के लिए पर्व घोषित किया. कहा जाता है कि माता मरियम ने 16 जुलाई 1251 में सन्त साइमन स्टॉक को दर्शन दिया और उसे एक स्कैपुलर (जिसे गले में पहनते हैं) दिया और वादा किया कि जो भी व्यक्ति इसे पहने हुए मृत्यु को प्राप्त करेगा वह नरक की आग में दण्ड से बच जायेगा. आज के दिन कारमेल की धर्म बहनें और पुरोहित इन स्कैपुलर को लोगों में बाँटते हैं. आखिर माता मरियम को यह आत्मविश्वास और अधिकार कहाँ से मिला कि वो इस तरह का वादा करती हैं? हम माता मरियम की प्रार्थना में भी उनसे 'अब और हमारे मरने के समय' प्रार्थना करने के लिए कहते हैं.

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु की माता और उनके भाई उनसे मिलने आते हैं, लेकिन प्रभु येसु उनके सगे-सम्बन्धी बनने के लिए एक नया मापदण्ड देते हैं, एक नयी परिभाषा देते हैं, और वह यह है, कि जो कोई स्वर्गीय पिता की इच्छा पूरी करता है, वही है मेरी माता, मेरी बहन और मेरे भाई. माता मरियम का प्रभु येसु के साथ खून का रिश्ता था, लेकिन उससे भी बढ़कर ईश्वर के मुक्ति कार्य में सबसे बड़े मानवीय सहयोग का रिश्ता भी था. माता मरियम ने अपने जीवन में स्वर्गीय पिता की इच्छा पूरी की इसलिए वह उनकी सदा-सदा के लिए माँ बनीं. ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, कभी-कभी सारी दुनिया से भिड़ जाना पड़ता है. माता मरियम के ये शब्द "देखिये मैं प्रभु की दासी हूँ, आपका कथन मुझमें पूरा हो" हमारे लिए सदैव प्रेरणा स्रोत बने रहें. आमेन.



📚 REFLECTION



Today Mother Church celebrates the feast of Our Lady of Mount Carmel. This is the principal feast the Carmelite Order so let us bring them before the Lord in a special way. This Feast was first instituted for the Carmelites in 1332 and later on it was extended to the whole Church by Pope Benedict XIII in 1726. It is said that on 16th July 1251 Mother Mary appeared to St. Simon Stock and gave him the scapular and promised him that he who dies in this will not suffer eternal fire. On this day Carmel sisters and fathers distribute these scapulars among the people. What gives Mother Mary the confidence and authority to make such a promise? Even in the Hail Mary prayer we implore her prayers ‘now and at the hour of our death.’

In the Gospel today we see that mother and brothers of Jesus come to meet him. But Jesus gives us a new definition and criteria of being his kiths and kins. That criteria of being in the family is to do the will of the Heavenly Father. Whoever does so is the mother, brothers or sisters of Jesus. Mother Mary and Jesus had a bond of blood relationship, but more than there was relationship of greatest contribution in the salvific plan of God. Mother Mary was ready and always willing to do the will of God in her life, that’s why she became the mother of Jesus. We have to be ready to pay heavy price if we desire to do the will of God, we may have to face the whole world sometimes. May the words of Our Heavenly Mother “Behold the handmaid of the Lord, let it be with me according to your word” be our own words. Amen.


✍ -Fr. Johnson B.



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गुरुवार, 15 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 15 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :निर्गमन 3:13-20


13) मूसा ने झाड़ी में से प्रभु की वाणी सुन कर उस से कहा, ''जब मैं इस्राएलियों के पास पहुँच कर उन से यह कहॅूँगा - तुम्हारें पूर्वजों के ईश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, और वे मुझ से पूछेंगे कि उसका नाम क्या है, तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?''

14) ईश्वर ने मूसा से कहा, ''मेरा नाम सत् है। उसने फिर कहा, ''तुम इस्राएलियों को यह उत्तर दोगे जिसका नाम "सत्" है, उसी ने मुझे भेजा है।''

15) इसके बाद ईश्वर मूसा से कहा, ''तुम इस्राएलियों से यह कहोगे - प्रभु तुम्हारे पूर्वजों के ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब के ईश्वर ने मुझे तुम लोगों के पास भेजा है। यह सदा के लिए मेरा नाम रहेगा और यही नाम ले कर सब पीढ़ियॉँ मुझ से प्रार्थना करेंगी।

16) अब जा कर इस्राएल के नेताओं को एकत्र करो और उन से यह कहो, "प्रभु तुम्हारे पूर्वजों का ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक और याकूब का ईश्वर, मुझे दिखाई दिया और उसने मुझ से कहा - मैंने तुम लोगों की सुध ली है और मैं जानता हॅूँ कि मिस्र देश में तुम पर क्या बीत रही है।

17) मैंने यह निर्णय किया है : मैं तुम्हें मिस्र की दीनता से निकाल कर कनानियों, हित्तियों, अमोरियों, परिज्जियों, हिव्वियों और यबूसियों के देश ले जाऊँगा। जहाँ दूध और मधु की नदियाँ बहती हैं।

18) ''वे तुम्हारी बात मानेंगे और तुम इस्राएल के नेताओं के साथ मिस्र के राजा के पास जाओगे और उस से यह कहोगे, "प्रभु इब्रानियों का ईश्वर, हमें दिखाई दिया। हमें मरुभूमि में तीन दिन की यात्रा करने दीजिए, जिससे हम अपने प्रभु-ईश्वर को बलि चढ़ायें।"

19) मैं जानता हॅूँ कि जब तक मिस्र के राजा को विवश नहीं किया जायेगा, वह तुम लोगों को नहीं जाने देगा।

20) इसलिए मैं अपना भुजबल प्रदर्शित करूँगा और विविध चमत्कार दिखाकर मिस्रियों को सन्तप्त करूँगा। इसके बाद वह तुम लोगों को जाने देगा।


सुसमाचार : मत्ती 11:28-30


28) ’’थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगो! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।

29) मेरा जूआ अपने ऊपर ले लो और मुझ से सीखो। मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूँ। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शान्ति पाओगे,

30) क्योंकि मेरा जूआ सहज है और मेरा बोझ हल्का।’’


📚 मनन-चिंतन


निर्गमन ग्रन्थ के आरम्भ में हम देखते हैं कि इस्राएलियों की दासता के समय मिस्री लोग उन पर बहुत अत्याचार करते थे, वे युसूफ द्वारा किये गये उपकारों को भूल गये थे. लोगों की आह भरी पुकार ईश्वर तक पहुँची और ईश्वर ने उनकी सुधि ली. उसके बाद भी हम देखते हैं कि जब-जब लोगों पर विपत्ति या संकट आया, तब-तब ईश्वर द्रवित हुआ और उनके दुःख-दर्द मिटाए. यही है ईश्वर का वास्तविक रूप, वह करुणामय ईश्वर है. और इसीलिए प्रभु येसु आज के सुसमाचार में पूरी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सान्त्वना भरे शब्द कहते है, “ थके-मांदे और बोझ से दबे हुए लोगों, तुम सब के सब मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूंगा.” शायद ये शब्द पूरे नए व्यवस्थान में सबसे अधिक बार दुहराए जाने वाले शब्द हैं. प्रभु येसु का यह निमंत्रण बिना किसी भेद-भाव के सभी के लिए खुला निमंत्रण है.

इस दुनिया की भाग-दौड़ में हम इतने थककर चकना-चूर हो जाते हैं कि हमें खुद नहीं पता चलता. इतनी सारी चिंताएं हमें घेर लेती हैं कि चरों तरफ कोई आशा की किरण दिखाई नहीं देती. प्रभु येसु हमें सान्त्वना देते हैं और विश्राम देने का वादा करते हैं. वे कहते हैं कि तुम मेरा जुआ अपने ऊपर ले लो. शायद अगर आपने जुआ देखा होगा तो आप जानते होंगे कि उसमें दो बैल एक साथ जोते जाते हैं. दोनों बैलों को एक साथ चलना पड़ता है, कोई टेड़ा-सीधा नहीं चल सकता, कोई तेज़ या अधिक धीमे नहीं चल सकता है, कोई अकेला नहीं चल सकता, दोनों को एक जैसी चाल में, एक साथ चलना पड़ता है. उसी तरह से हमारी जीवन रुपी गाड़ी के जुए में एक तरफ प्रभु येसु को लेना है, और दूसरी तरफ हमें चलना है. हम अकेले इस जुए को नहीं ढो सकते, ईश्वर के बिना जीवन रुपी यह गाड़ी सफलता पूर्वक आगे नहीं बढ़ेगी, पहिये फँस जायेंगे और हम खींचते-खींचते थक जायेंगे. आईये हम अपने जीवन का नियंत्रण ईश्वर को दे दें और उसकी शरण में आकर विश्राम कर लें. आमेन.



📚 REFLECTION



In the very beginning of the book of Exodus we see the misery of the Israelites, the unjust exploitation by the Egyptian who had forgotten the good works done by Joseph. The painful cry of the Israelites reaches to the ears of God and He remembers them. Even later on we see in their lives, that whenever they faced difficulties and persecutions, God felt compassionate towards them and came to their aid. This is the real nature of God, He is compassionate God. Perhaps it is this compassion of God that makes Jesus to utter the most consoling words in the human history, “Come to me all you that are weary and carrying heavy burdens, and I will give you rest.” These are perhaps most quoted words of Jesus in the New Testament. This is an open invitation of Jesus to whole humanity, without any reservations.

We are so busy in rat race of daily life that we forget that we are heavily laden with so many burdens. So many worries surround us that sometimes no hope is seen anywhere. Jesus gives us consolation and assures us to give rest to our weary souls. He calls us to take His yoke. If you have seen a yoke, it has two sides and we need one each ox for each side. Both oxen have to move together with same momentum, one cannot go faster than the other or slower than the other. Yoke cannot be carried by a single ox alone. Same is the case of the yoke of our life. We alone cannot carry it, we need God the other side. We may not be able to pull this life alone without God, we may get tired and exhausted. Let us allow God to take control of our life and rest under the shade of His wings. Amen.


✍ -Fr. Johnson B


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बुधवार, 14 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 14 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ :निर्गमन 3:1-6, 9-12


1) मूसा अपने ससुर, मिदयान के याजक, यित्रों की भेडें चराया करता था। वह उन्हें बहुत दूर तक उजाड़ प्रदेश में ले जा कर ईश्वर के पर्वत होरेब के पास पहुँचा।

2) वहाँ उसे झाड़ी के बीच में से निकलती हुई आग की लपट के रूप में प्रभु का दूत दिखाई दिया। उसने देखा कि झाड़ी में तो आग लगी है, किन्तु वह भस्म नहीं हो रही है।

3) मूसा ने मन में कहा कि यह अनोखी बात निकट से देखने जाऊँगा और यह पता लगाऊँगा कि झाड़ी भस्म क्यों नहीं हो रही है।

4) निरीक्षण करने के लिए उसे निकट आते देख कर ईश्वर ने झाड़ी के बीच में से पुकार कर उससे कहा, ''मूसा! मूसा!'' उसने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।''

5) ईश्वर ने कहा, ''पास मत आओ। पैरों से जूते उतार दो, क्योंकि तुम जहाँ खड़े हो, वह पवित्र भूमि है।''

6) ईश्वर ने फिर उस से कहा, ''मैं तुम्हारे पिता का ईश्वर हूँ, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब का ईश्वर।'' इस पर मूसा ने अपना मुख ढक लिया; कहीं ऐसा न हो कि वह ईश्वर को देख ले।

9) मैंने इस्राएलियों की पुकार सुनी और उन पर मिस्रियों का अत्याचार देखा, इसलिए मैं तुम्हें फिराउन के पास भेजता हूँ।

10) तुम मेरी प्रजा इस्राएल को मिस्र देश से बाहर निकाल लाओ।

11) मूसा ने ईश्वर से कहा, ''मैं कौन हूँ जो फिराउन के पास जाऊॅँ और इस्राएलियों को मिस्र देश से बाहर निकाल ले जाऊॅँ?

12) ईश्वर ने उत्तर दिया, ''मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। मैंने तुम को भेजा है, तुम्हारे लिए इसका प्रमाण यह होगा कि जब तुम इस्राएल को मिस्र से निकाल लाओगें, तो तुम लोग इस पर्वत पर प्रभु की आराधना करोगें।''


सुसमाचार : मत्ती 11:25-27


25) उस समय ईसा ने कहा, ’’पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ; क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है।

26) हाँ, पिता! यही तुझे अच्छा लगा।

27) मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर कोई भी पुत्र को नहीं जानता। इसी तरह पिता को कोई भी नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है और वही, जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे।



📚 मनन-चिंतन


ईश्वर हमारा ह्रदय देखते हैं और खुद को हम पर प्रकट करते हैं. आज के पहले पाठ में हम नबी मूसा को देखते हैं, जिन पर ईश्वर खुद को प्रकट करते हैं एक जलती हुई झाड़ी के रूप में. नबी मूसा ईश्वर द्वारा चुने जाने से पूर्व एक साधारण मनुष्य थे, वह ठीक से बोल भी नहीं पाते थे, लेकिन ईश्वर उनको चुनते हैं और खुद को प्रकट करते हैं, अपना सामर्थ्य प्रकट करते हैं. कई बार हम मामूली इन्सान होने के बावज़ूद, हमारी बिना किसी योग्यता के ईश्वर हम पर स्वयं अपनी कृपा प्रकट करते हैं. और इसलिए प्रभु येसु आज के सुसमाचार में पिता ईश्वर की आराधना करते और उन्हें धन्यवाद देते हैं, क्योंकि वे अपने महान रहस्य हम निरे बच्चों पर प्रकट करते हैं. हम जानते हैं कि प्राचीन काल से ही ईश्वर ने विभिन्न नबियों द्वारा और महान कार्यों द्वारा अपने आप को हम पर प्रकट किया, लेकिन अब उसने अपने पुत्र के द्वारा स्वयं को प्रकट किया है (इब्रानियों 1:1-2).

किसी ने पिता ईश्वर को नहीं देखा है सिवाय उसके पुत्र हमारे प्रभु येसु ने. प्रभु येसु हमें बताते हैं कि पुत्र को छोड़कर कोई भी पिता को नहीं जानता. हम जानते हैं कि पुराने व्यवस्थान में जिस तरह से ईश्वर अपने आप को प्रकट किया उसी तरह से लोगों ने उनकी छवि बनाई. और कई बार वह छवि सटीक नहीं थी, उसमें कुछ खामियाँ थीं. लेकिन नये व्यवस्थान में प्रभु येसु पिता ईश्वर का वास्तविक चेहरा बनते हैं, और स्वर्ग और पिता ईश्वर के रहस्यों को हम पर प्रकट करते हैं. जितना हम प्रभु येसु को जानेंगे और समझेंगे उतना ही हम पिता ईश्वर को जानेंगे, क्योकि स्वयं प्रभु येसु ने कहा है, “जिसने मुझे देखा है, उसने पिता को भी देखा है" (योहन 14:9). और हम प्रभु येसु से होकर गये बिना पिता ईश्वर के पास नहीं आ सकते (योहन 14:6). आईये हम अपने जीवन में प्रभु येसु को और अधिक गहराई से जानने का प्रयास करें. आमेन.



📚 REFLECTION


God looks the disposition of our heart and accordingly reveals himself to us. The first reading today, describes about Moses to whom He revealed himself in the form of a burning bush which could consume itself. Moses was a very simple man before being chosen by God, in fact he could not even speak properly, but God chose him and revealed Himself and His glory to him. Very in spite of our nothingness and nothingness, God chooses to reveal Himself to us. That is why Jesus praises and adores the Heavenly Father for revealing Himself and the great mysteries to such simple children. We know that from very old times God spoke to us through various prophets and messengers, but now He has spoken to us through His son (cf Heb 1:1-2), He revealed Himself to us through His only son.

No one has seen the Father except the Son, our Lord Jesus Christ. Jesus tells us that no one knows the Father, except the Son. We know about the ways in which God revealed Himself to the people in the Old Testament Times, and people formed an image of God according to their understanding of that revelation. This image could not be fully correct, it was limited. But in the New Testament times, Jesus becomes the real face of God, He reveals the real image and the mysteries of the Father. The more we will try to understand and know Jesus, the more we will know the Father, because anyone who has seen Jesus, also has seen the Father (cf John 14:9). We cannot go to the Father except through Jesus (cf John 14:6). Let us ask the Lord for the grace to know Him more and more deeply. Amen.


✍ -Br. Biniush Topno


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