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Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

शनिवार, 15 मई, 2021 पास्का का छठवाँ सप्ताह

 

शनिवार, 15 मई, 2021

पास्का का छठवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 18:23-28



23) पौलुस कुछ समय वहाँ रहा। तब फिर विदा हो कर उसने गलातिया और इसके बाद फ्रुगिया का भ्रमण करते हुए सब शिष्यों को ढारस बँधाया।

24) उस समय अपोल्लोस नामक यहूदी एफेसुस पहुँचा। उसका जन्म सिकन्दरिया में हुआ था। वह शक्तिशाली वक्ता और धर्मग्रन्थ का पण्डित था।

25) उसे प्रभु के मार्ग की शिक्षा मिली थी। वह उत्साह के साथा बोलता और ईसा के विषय में सही बातें सिखलाता था, यद्यपि वह केवल योहन के बपतिस्मा से परिचित था।

26) वह सभागृह में निस्संकोच बोलने लगा। प्रिसिल्ला और आक्विला उसकी शिक्षा सुनने के बाद उसे अपने साथ ले गये और उन्होंने अधिक विस्तार के साथ उसे ईश्वर का मार्ग समझाया।

27) जब अपोल्लोस ने अखै़या जाना चाहा, तो भाइयों ने उसकी सहायता की और शिष्यों के नाम पत्र दे कर निवेदन किया कि वे उसका स्वागत करें। अपोल्लोस के वहाँ पहुंचने के बाद उस से विश्वासियों को ईश्वर की कृपा से बहुत लाभ हुआ;

28) क्योंकि वह अकाट्य तर्कों से यहूदियों का खण्ड़न करता और सब के सामने धर्मग्रन्थ के आधार पर यह प्रमाणित करता था ही ईसा ही मसीह हैं।



सुसमाचार : योहन 16:23ब-28



23) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुम पिता से जो कुछ माँगोगे वह तुम्हें मेरे नाम पर वही प्रदान करेगा।

24) अब तक तुमने मेरा नाम ले कर कुछ भी नहीं माँगा है। माँगो और तुम्हें मिल जायेगा, जिससे तुम्हारा आनन्द परिपूर्ण हो।

25) मैंने तुम लोगो से यह सब दृष्टांतो में कहा है। वह समय आ रहा है, जब मैं फिर तुम लेागों से दृष्टांतो में कुछ नहीं कहूँगा, बल्कि तुम्हें स्पष्ट शब्दों में पिता के विषय में बताऊँगा।

26) तुम उस दिन मेरा नाम लेकर प्रार्थना करोग। मैं नहीं कहता कि तुम्हारे लिये पिता से प्रार्थना करूँगा।

27) पिता तो स्वयं तुम्हें प्यार करता है, क्योंकि तुम मुझे प्यार करते और यह विश्वास करते हो कि मैं ईश्वर के यहाँ से आया हूँ।

28) मैं पिता के यहाँ से संसार में आया हूँ। अब मैं संसार को छोड कर पिता के पास जा रहा हूँ।’’


📚 मनन-चिंतन


बचपन से हमें ईश्वर से प्रार्थना करना सिखाया गया है, बाईबिल में भी येसु हम से कहते है मॉंगो और तुम्हे दिया जायेगा। प्रार्थना का कई प्रारूप होता है जैसे कि आराधना, स्तुति, मध्यस्थता, पश्चाताप इत्यादि। परंतु अक्सर हम अधिकतर प्रार्थना में ईश्वर से अपने लिए और अपने परिजनों के लिए कुछ न कुछ दुआ करते है प्रार्थना करते है।

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु कहते है कि तुम पिता से जो कुछ मॉंगोगे वह तुम्हें मेरे नाम पर वही प्रदान करेगा। प्रभु येसु अपने नाम का महत्व समझाते है और उस शक्तिशाली नाम को हमें एक हथियार के रूप में प्रदान करते है। पिता ईश्वर जो हम से प्रेम करता है और हमारे मॉंगने से पहले ही जानता है कि हमारे लिए क्या क्या की जरूरत है तो वह ईश्वर प्रभु येसु के नाम पर हमारी लिए अच्छी चिजों क्यों नहीं प्रदान करेगा।

प्रभु येसु हमें यह परामर्श देते है कि जब कभी हम प्रार्थना करें तो उनका नाम लेकर प्रार्थना करें। ईश्वर हमारे लिए सर्वोत्तम चाह रखता है। मत्ती 6ः8 इस बात को बहुत अच्छी तरह से हमारे सामने रखता है, ‘‘तुम्हारे मॉंगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन-किन चीज़ों की जरूरत है।’’ हम बहुत सारी चीज़ों की ख्वाहीश रखते हैं; उनमें से कुछ तो हमारे स्वार्थ के लिए होती है और कुछ हमारी जरूरतों के लिए। जब हम प्रार्थना करते है तब हमें यह ध्यान रखनें की जरूरत है कि वह हम अपने ईच्छा की पूर्ती के लिए करते है या हम उस में ईश्वर की ईच्छा खोजते है।

हमारी प्रार्थना ईश्वर की ईच्छा और योजना के अनुसार होनी चाहिए। आईये हम प्रार्थनाओं को ईश्वर के समक्ष लोगों के लिए मध्यस्थता के रूप में अर्पित करें। आमेन!



📚 REFLECTION



From childhood onwards we were being taught to pray, in the bible too Jesus tells us Ask and you will receive. Prayer has got different formats like adoration, praise and worship, intersessions, penitentiary etc. But most often in the prayers we pray and ask for ourselves and for our relatives.

In today’s gospel Jesus says that whatever you ask in my name to the Father you will receive it. Lord Jesus explains the importance of his name and gives us that name as a powerful weapon for us. Father Almighty who loves us and knows what we need before our asking then why will not He will provide all good things in the name of Jesus.

Lord Jesus gives us the advice that when ever we pray we must pray in the name of Jesus. God seeks the best for us. Mt 6:8 very well expresses this in front of us, “Father knows what you need before you ask him.” We desire for many things; among them some are for selfish motives and some for our genuine needs. Whenever we pray we must keep in mind that whether we are praying for our will to be fulfilled or do we seek the will of God.

Our prayer should be based on God’s will and His plan. Let’s put forward the prayers and petitions of people in the form of intercessions. Amen!


 -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन शुक्रवार, 14 मई, 2021 प्रेरित सन्त मथियस - पर्व

 

शुक्रवार, 14 मई, 2021

प्रेरित सन्त मथियस - पर्व

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:15-17,20-26


15) उन दिनों पेत्रुस भाइयों के बीच खड़े हो गये। वहाँ लगभग एक सौ बीस व्यक्ति एकत्र थे। पेत्रुस ने कहा,

16) ’’भाइयो! यह अनिवार्य था कि धर्मग्रन्थ की वह भविष्यवाणी पूरी हो जाये, जो पवित्र आत्मा ने दाऊद के मुख से यूदस के विषय में की थी। यूदस ईसा को गिरफ्तार करने वालों का अगुआ बन गया था।

17) वह हम लोगों में एक और धर्मसेवा में हमारा साथी था।

20) स्त्रोत-संहिता मे यह लिखा है-उसकी ज़मीन उजड़ जाये; उस पर कोई भी निवास नहीं करे और-कोई दूसरा उसका पद ग्रहण करे।

21) इसलिए उचित है कि जितने समय तक प्रभु ईसा हमारे बीच रहे,

22) अर्थात् योहन के बपतिस्मा से ले कर प्रभु के स्वर्गारोहण तक जो लोग बराबर हमारे साथ थे, उन में से एक हमारे साथ प्रभु के पुनरुत्थान का साक्षी बनें’’।

23) इस पर इन्होंने दो व्यक्तियों को प्रस्तुत किया-यूसुफ को, जो बरसब्बास कहलाता था और जिसका दूसरा नाम युस्तुस था, और मथियस को।

24) तब उन्होंने इस प्रकार प्रार्थना की, ’’प्रभु! तू सब का हृदय जानता है। यह प्रकट कर कि तूने इन दोनों में से किस को चुना है,

25) ताकि वह धर्मसेवा तथा प्रेरितत्व में वह पद ग्रहण करे, जिस से पतित हो कर यूदस अपने स्थान गया।

26) उन्होंने चिट्ठी डाली। चिट्ठी मथियस के नाम निकली और उसकी गिनती ग्यारह प्रेरितों में हो गयी।


सुसमाचार : सन्त योहन 15:9-17


9) जिस प्रकार पिता ने मुझ को प्यार किया है, उसी प्रकार मैंने भी तुम लोगों को प्यार किया है। तुम मेरे प्रेम से दृढ बने रहो।

10) यदि तुम मेरी आज्ञओं का पालन करोगे तो मेरे प्रेम में दृढ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ बना रहता हूँ।

11) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि तुम मेरे आनंद के भागी बनो और तुम्हारा आनंद परिपूर्ण हो।

12) मेरी आज्ञाा यह है जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।

13) इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।

14) यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।

15) अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है क्योंकि मैने अपने पिता से जो कुछ सुना वह सब तुम्हें बता दिया है।

16) तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो, तुम्हारा फल बना रहे और तुम मेरा नाम लेकर पिता से जो कुछ माँगो, वह तुम्हें वही प्रदान करे।

17) मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ एक दूसरे को प्यार करो।


📚 मनन-चिंतन


प्रेरित संत मथियस एक ऐसा प्रेरित संत जिसे प्रभु येसु के बारह शिष्यों में से एक कहलाने का सौभाग्य मिला। संत मथियस का चुनाव यूदस के स्थान पर बहुत सोच विचार कर के किया गया। बारह संख्या इस्राएली जनता में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस्राएल के बारह वंश थे और यदि नयें इस्राएल को प्रेरितों से आना था तो उनका बारह होना आवश्यक था।

उनमें से एक यूदस इस्कारियोती ने येसु के साथ विश्वासघात कर स्वयं को फांॅसी लगा लिया था। प्रभु येसु के स्वर्गारोहण के बाद शिष्यगण अटारी पर प्रार्थना कर रहे थे- वहॉं पर पैत्रुस खड़े होकर यह कहा कि कोई दूसरा यूदस का पद ग्रहण करें। इस हेतु वे उनमें से चुनेंगे जो योहन के बपतिस्मा से येसु के पुनरुत्थान तक येसु के साथ रहे हो; और उनके बीच दो व्यक्तियों का नाम आता है जिसमें से संत मथियस का नाम चिठ्ठी के द्वारा सामने आता है और संत मथियस को बारहों में से एक चुना जाता है।

प्रभु येसु संत योहन 15ः16 में कहते है, ‘‘तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो।’’ प्रभु येसु विभिन्न लोगों को विभिन्न कार्यों के लिए चुनते है। संत मथियस भी उसी चुनाव में से एक था। संत मथियस के बारे में बाईबिल में ज्यादा तो नहीं लिखा हुआ है परंतु यह बताया जाता है कि संत पूरे निष्ठा से प्रभु येसु के सुसमाचार प्रचार प्रसार में अपने जीवन को न्योछावर कर दिया।

प्रभु का कार्य को सम्पन्न करने के लिए आज भी प्रभु बहुतों को चुनते और नियुक्त करते है जिससे कि वे फल उत्पन्न कर सकें। आज हमें संत मथियस जैसे कई लोग चाहिए जो अपना जीवन प्रभु के लिए समर्पित कर देते है- प्रभु के सुसमाचार के लिए प्रभु के स्वर्गराज्य के लिए। हम प्रार्थना करें कि संत मथियस के पर्व के दिन एक सच्चा बुलाहट सभी को प्राप्त हों। आमेन!



📚 REFLECTION



Apostle St. Matthias is the St. who got the priviledge to be called among the twelve. The selection of St. Matthias instead of Judas was done with lot of thinking. The number twelve has a great significance in Israelites. There were twelve tribes of Israel and if the new Israel has to come from the disciples then they have to be twelve.

Among them Judas Iscariot betrayed Jesus and committed suicide. After the Ascension of the Lord the believers were praying in the upper room- there Peter stood up and told about taking the position of an overseer in the place of Judas. For this they will select the person who was with Jesus from the baptism of John till Jesus’ Resurrection; and the two names come in front of them among whom St. Matthias is being selected through the lot and St. Matthias is chosen among the twelve.

Jesus tells in John 15:16, “You did not choose me but I chose you. And I appointed you to go and bear fruit.” Lord Jesus chooses different people for different works. St. Matthias was among that chosen one. About St. Matthias not much is being found in the bible but it is being said that St. with full dedication has sacrificed his life for the proclamation and evangelization of Jesus Gospel.

To do God’s work Lord chooses and appoints many even now so that they may bear fruit. Today we need people like St. Matthias who offer their lives for the Lord- for the Gospel of the Lord, for the Kingdom of God. Let’s pray that on the feast of St. Matthias true vocation may be received by many. Amen!


 -Br. Biniush Topno


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गुरुवार, 13 मई, 2021

 

गुरुवार, 13 मई, 2021

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पास्का का छठवाँ सप्ताह

पहला पाठ : प्रेरित-चरित 18:1-8


1) इसके बाद पौलुस आथेंस छोड़ कर कुरिन्थ आया,

2) जहाँ आक्विला नामक यहूदी से उसकी भेंट हुई। आक्विला का जन्म पोन्तुस में हुआ था। वह अपनी पत्नी प्रिसिल्ला के साथ इटली से आया था, क्योंकि क्लौदियुस ने यह आदेश निकला था कि सब यहूदी रोम से चले जायें। पौलुस उन से मिलने गया

3) और उनके यहाँ रहने तथा काम करने लगा; क्योंकि वह एक ही व्यवसाय करता था- वे तम्बू बनाने वाले थे।

4) पौलुस प्रत्येक विश्राम के दिन सभागृह में बोलता और यहूदियों तथा यूनानियों को समझाने का प्रयत्न करता था।

5) जब सीलस और तिमथी मकेदूनिया से पहुँचे, तो पौलुस वचन के प्रचार के लिए अपना पूरा समय देने लगा और यहूदियों को यह साक्ष्य देता रहा कि ईसा ही मसीह हैं।

6) किन्तु जब वे लोग पौलुस का विरोध और अपमान कर रहे थे, तो उसने अपने वस्त्र की धूल झाड़ कर उन से यह कहा, ’’तुम्हारा रक्त तुम्हारे सिर पड़े! मेरा अन्तःकरण शुद्ध है। मैं अब से ग़ैर-यहूदियों के पास जाऊँगा।’’

7) वह उन्हें छोड़ कर चला गया और तितियुस युस्तुस नामक ईश्वर-भक्त के यहाँ आया, जिसका घर सभागृह से लगा हुआ था।

8) सभागृह के अध्यक्ष क्रिस्पुस ने अपने सारे परिवार के साथ प्रभु में विश्वास किया। बहुत-से कुरिन्थी भी पौलुस की बातें सुन कर विश्वास करते और बपतिस्मा ग्रहण करते थे।



सुसमाचार : योहन 16:16-20



16 थोडे ही समय बाद तुम लोग मुझे नहीं देखोगे और फिर थोडे ही समय बाद मुझे देखोगे।

17) इस उनके कुछ शिष्यों ने आपस में यह कहा, ’’वह हम से यह क्या कहते हैं- थोडे ही समय बाद तुम मुझे नहीं देखोग और फिर थोडे ही समय बाद तुम मुझे देखोगे, और क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ?’’

18) इसलिये वे कहते थे, ’’वह जो ’थोडा समय’ कहते हैं इस का अर्थ क्या है? हम उनकी बात नहीं समझ पा रहे हैं।’’

19) ईसा ने यह जानकर कि वे मुझ से प्रश्न पूछना चाहते हैं, उन से कहा, ’’तुम आपस में मेरे इस कथन के अर्थ पर विचार विमर्श कर रहे हो कि ’थोडे ही समय बाद तुम मुझे नहीं देखोगे और फिर थोड़े ही समय बाद मुझे देखोगे।

20) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ ’’तुम रोओगे और विलाप करोगे, परंतु संसार आनंद मनायेगा। तुम शोक करोगे किन्तु तुम्हारा शोक आनन्द बन जायेगा।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ने अपने आर्शीवचन में हम सभी को कई सांत्वना भरे वचन दिये है उनमें से एक वचन है, ‘‘धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, उन्हें सान्त्वना मिलेगी’’ (मत्ती 5ः5)। प्रभु येसु का यह वचन हम सब के लिए एक आशावान वचन है जो हम सभी को सांत्वना प्रदान करता है। प्रभु हम सभी से कहना चाहते है कि जो प्रभु और प्रभु के राज्य के लिए शोक मनाता है उसे आगे चलकर सांत्वना प्राप्त होगी।

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु अपने विषय में बताते है कि वे किस प्रकार थोड़े समय के लिए शिष्यों को दिखाई नहीं देंगे और फिर थोड़े समय बाद वे दिखाई देंगे। आगे चल कर येसु कहते है कि तुम शोक करोगे किन्तु तुम्हारा शोक आनन्द बन जायेगा। हमारा प्रभु शोक को आनन्द में बदलने वाला प्रभु है।

हमारे जीवन में कई ऐसे क्षण आते है जो हमें शोक से भर देते है-जैसे जब हमारे किसी परिजन की मृत्यु होती है तो हम शोक से भर जाते है; जब हम प्रभु के मार्ग पर चलने की वजह से हम पर दुख, संकट, अत्याचार या अपमान किया जाता है तो हमारा ह्दय शोक से भर जाता है; जब हम दुष्टों को फलते फूलते देखते है तथा हमारे चारों ओर दुख, अंधेरे के बादल को घिरा हुआ पाते है तथा हमें कोई जवाब नहीं मिलता है तो हम शोक से भर जाते है। प्रभु येसु हम से कहते है कि तुम्हारा शोक आनन्द में बदल जायेगा, जिस प्रकार शिष्य प्रभु येसु के कू्रस मरण के बाद शोक में डूब गये थे परंतु पुनरुत्थान के बाद उनका शोक आनन्द में बदल गया; ठीक उसी प्रकार प्रभु हमारे शोक के बादल को आनन्द की किरणों से दूर कर देंगे। आईये हम प्रार्थना करें इस संसार में जो भी लोग शोक में डूबे हुए है वे सब प्रभु के पास आये जिससे उनका शोक आनन्द में बदल जाये। आमेन!



📚 REFLECTIONS



Lord Jesus has given many comforting words in his beatitudes, among them one is, “Blessed are those who mourn, for they will be comforted.” (Mt 5:4). These words of Lord Jesus are words of hope for us which gives comfort. Lord wants to tell us that those who mourn for the Lord and for the Lord’s Kingdom they will be comforted in future.

In today’s Gospel Jesus speaks about himself that for a little while the disciples will no longer see him and after a little while they will see him. He tells further that you will weep and mourn, but your pain will turn into joy. Our Lord is the Lord who turns mourning into joy.

In our lives many moments come when we are filled with mourning- for instances when some relatives die in the family we are filled of mourning; when pain, problems, persecution and insults are executed on us for being walking in the way of the Lord then our hearts are filled with mourning; when we see the wicked prospering and finding oneself surrounded by clouds of sorrow and darkness and when we doesn’t receive any answer then we are filled with grief or mourning. Lord Jesus tells us that your mourning will turn into joy, as the disciples were in grief when Jesus died on the cross but after the resurrection their mourning turned into joy; similarly Lord will remove the cloud of mourning through the rays of Joy. Let’s pray that those who are in grief in this world may come to Jesus so that their grief may turn to Joy. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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बुधवार, 12 मई, 2021 पास्का का छठवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 12 मई, 2021

पास्का का छठवाँ सप्ताह


पहला पाठ : प्रेरित-चरित 17:15, 22-18:1

15) पौलुस के साथी उसे आथेंस ले चले और उसका यह सन्देश ले कर लौटे कि जितनी जल्दी हो सके, सीलस और तिमथी मेरे पास चले आयें।

22) परिषद् के सामने खड़ा हो कर पौलुस ने यह कहा, ’’आथेंस के सज्जनों! मैं देख रहा हूँ कि आप लोग देवताओं पर बहुत अधिक श्रद्धा रखते हैं।

23) आपके मन्दिरों का परिभ्रमण करते समय मुझे एक वेदी पर यह अभिलेख मिला- ’अज्ञात देवता को’। आप लोग अनजाने जिसकी पूजा करते हैं, मैं उसी के विषय में आप को बताने आया हूँ।

24) जिस ईश्वर ने विश्व तथा उस में जो कुछ है, वह सब बनाया है, और जो स्वर्ग और पृथ्वी का प्रभु है, वह हाथ से बनाये हुए मन्दिरों में निवास नहीं करता।

25) वह इसलिए मनुष्यों की पूजा स्वीकार नहीं करता कि उसे किसी वस्तु का अभाव है। वह तो सभी को जीवन, प्राण और सब कुछ प्रदान करता है।

26) उसने एक ही मूलपुरुष से मानव जाति के सब राष्ट्रों की सृष्टि की और उन्हें सारी पृथ्वी पर बसाया। उसने उनके इतिहास के युग और उनके क्षेत्रों के सीमान्त निर्धारित किये।

27) यह इसलिए हुआ कि मनुष्य ईश्वर का अनुसन्धान सकें और उसे खोजते हुए सम्भवतः उसे प्राप्त सकें, यद्यपि वास्तव में वह हम में से किसी से भी दूर नहीं है;

28) क्योंकि उसी में हमारा जीवन, हमारी गति तथा हमारा अस्तित्व निहित है। जैसा कि आपके कुछ कवियों ने कहा है, हम भी उसके वंशज हैं।

29) यदि हम ईश्वर के वंशज हैं, तो हमें यह नहीं समझना चाहिए कि परमात्मा सोने, चाँदी या पत्थर की मूर्ति के सादृश्य रखता है, जो मनुष्य की कला तथा कल्पना की उपज है।

30) ईश्वर ने अज्ञान के युगों का लेखा लेना नहीं चाहा, परन्तु अब उसकी आज्ञा यह है कि सर्वत्र सभी मनुष्य पश्चात्ताप करें;

31) क्योंकि उसने वह दिन निश्चित किया है, जिस में वह एक पूर्व निर्धारित व्यक्ति द्वारा समस्त संसार का न्यायपूर्वक विचार करेगा। ईश्वर ने उस व्यक्ति को मृतकों में से पुनर्जीवित कर सबों को अपने इस निश्चय का प्रमाण दिया है।’’

32) मृतकों के पुनरुत्थान की चर्चा सुनते ही कुछ लोगों ने उपहास किया और कुछ लोगों ने यह कहा, ’’इस विषय पर हम फिर कभी आपकी बात सुनेंगे’’।

33) इसलिए पौलुस उन्हें छोड़ कर चला गया।

34) फिर भी कई व्यक्ति उसके साथ हो लिये और विश्वासी बन गये: जैसे परिषद् का सदस्य दियोनिसियुस, दामरिस नामक महिला और अन्य लोग भी।

18:1) इसके बाद पौलुस आथेंस छोड़ कर कुरिन्थ आया।



सुसमाचार : योहन 16:12-15



12) मुझे तुम लोगों से और बहुत कुछ कहना है परन्तु अभी तुम वह नहीं सह सकते।

13) जब वह सत्य का आत्मा आयेगा, तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य तक ले जायेगा; क्योंकि वह अपनी ओर से नहीं कहेगा, बल्कि वह जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा और तुम्हें आने वाली बातों के विषय में बतायेगा।

14) वह मुझे महिमान्वित करेगा, क्योंकि उसे मेरी ओर से जो मिला है, वह तुम्हें वही बतायेगा।

15) जो कुछ पिता का है, वह मेरा है। इसलिये मैंने कहा कि उसे मेरी ओर से जो मिला है, वह तुम्हें वही बतायेगा।


📚 मनन-चिंतन


पवित्र आत्मा ख्रीस्तीय जीवन का एक अभिन्न अंग है। कलीसिया में 2000 वर्षों से पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। पवित्र आत्मा कलीसिया में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है लेकिन कई बार हम पवित्र आत्मा को नजर अंदाज कर देेते है शायद इसलिए क्योंकि पवित्र आत्मा अपने को न दिखाकर येसु को हमेशा प्रकाश में लाते है। आज के सुसमाचार में पवित्र आत्मा को सत्य का आत्मा के रूप में बताया गया है जो पूर्ण सत्य तक ले जायेगा। वह येसु को महिमान्वित करेगा, क्यांेकि उसे येसु की ओर से जो मिला है, वह हमें वहीं बतायेगा।

पवित्र आत्मा के बिना हम इस संसार में शैतान का सामना नहीं कर सकतें। यह पवित्र आत्मा ही है जो हमारे जीवन के हर क्षण में हमारी मदद करता है और अपने आप को कभी सामने प्रकट नहीं होने देता। बिना पवित्र आत्मा के हम अपने दैनिक और आध्यात्मिक जीवन में कभी भी आगे नहीं बढ़ पायेंगे। पवित्र आत्मा के बिना हम सांसरिक जीवन में ही सिमट कर रह जाएंगे, पवित्र आत्मा में दुबारा जन्म पाकर हमें एक नवीन जीवन प्राप्त होता है़। यह जीवन हमें प्रभु येसु से जुड़े रहने और प्रभु येसु से जुड़े महान रहस्य को समझने में मदद करता है। आइये हम सब आज के पाठों के द्वारा पवित्र आत्मा में दुबारा जन्म लेते हुए एक नवीन जीवन की शुरूआत करें। आमेन!



📚 REFLECTION



Holy Spirit is the intergral part of Christian life. Holy Spirit is being working in the Church since 2000 years ago. Holy Spirit has a very important place in the Church but manier times we neglect the Holy Spirit, it may be because Holy Spirit doesn’t hightlight himself but always focuses on Jesus. In today’s gospel Holy Spirit is being called as the Spirit of Truth who will guide into all the truth. He will glorify Jesus because he will take what is Jesus and declare it to us.

Without Holy Spirit we cannot face the Satan in this world. It is the Holy Spirit only who helps us each and every moment of our lives and doesn’t allow himself to be known to us. Without Holy Spirit we will never be able to go forward in our daily and spiritual lives. Without the Holy Spirit we will be limited to the worldly lives, we receivie the new live after being Reborn in the Holy Spirit. This new life helps to remain united with Jesus and to understand the mysteries related to Jesus. Through today’s readings let’s be reborn in the Holy Spirit and start a new life. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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मंगलवार, 11 मई, 2021 पास्का का छठवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 11 मई, 2021

पास्का का छठवाँ सप्ताह



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 16:22-34


22) उनके विरोध में भीड़ भी एकत्र हो गयी। तब न्यायकर्ताओं ने कपड़े उतरवा कर उन्हें कोड़े लगाने का आदेश दिया।

23) उन्होंने पौलुस और सीलस को खूब पिटवाया और कारापाल को बड़ी सावधानी से उनकी रखवाली करने का आदेश दे कर उन्हें बन्दीगृह में डलवा दिया।

24) कारापाल ने ऐसा आदेश पा कर उन्हें भीतरी बन्दीगृह में रखा और उनके पैर काठ में जकड़ दिये।

25) आधी रात के समय जब पौलुस तथा सीलस प्रार्थना करते हुए ईश्वर की स्तुति गा रहे थे और कैदी उन्हें सुन रहे थे,

26) तो एकाएक इतना भारी भूकम्प हुआ कि बन्दीगृह की नींव हिल गयी। उसी क्षण सब द्वार खुल गये और सब कैदियों की बेडि़याँ ढ़ीली पड़ गयीं।

27) कारापाल जाग उठा और बन्दीगृह के द्वार खुले देख कर समझ गया कि क़ैदी भाग गये हैं। इसलिए उसने तलवार खींच कर आत्महत्या करनी चाही,

28) किन्तु पौलुस ने ऊँचे स्वर से पुकार कर कहा, ’’अपनी हानि मत कीजिए। हम सब यहीं हैं।’’

29) तब कारापाल चिराग मँगा कर भीतर दौड़ा और काँपते हुए पौलुस तथा सीलस के चरणों पर गिर पड़ा।

30) उसने उन्हें बाहर ले जा कर कहा, ’’सज्जनों, मुक्ति प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?’’

31) उन्होंने उत्तर दिया, ’’आप प्रभु ईसा में विश्वास कीजिए, तो आप को और आपके परिवार को मुक्ति प्राप्त होगी’’।

32) इसके बाद उन्होंने करापाल और उसके सब घरवालों को ईश्वर का वचन सुनाया।

33) उसने रात को उसी घड़ी उन्हें ले जा कर उनके घाव धोये। इसके तुरन्त बाद उसने और उसके सारे परिवार ने बपतिस्मा ग्रहण किया।

34) तब उसने पौलुस और सीलस को अपने यहाँ ले जा कर भोजन कराया और अपने सारे परिवार के साथ आनन्द मनाया; क्योंकि उन्होंने ईश्वर में विश्वास किया था।



सुसमाचार : योहन 16:5-11


5) अब मैं उसके पास जा रहा हूँ, जिसने मुझे भेजा और तुम लोगो में कोई मुझ से यह नहीं पूछता कि आप कहाँ जा रहे हैं।

6) मैंने तुम से यह कहा है, इसलिये तुम्हारे हृदय शोक से भर गये हैं।

7) फिर भी मैं तुम लोगों से सच कहता हूँ तुम्हारा कल्याण इस में है कि मै चला जाऊँ। यदि मैं नहीं जाऊँगा, तो सहायक तुम्हारे पास नहीं आयेगा। यदि मैं जाऊँगा, तो मैं उसे तुम्हारे पास भेजूँगा।

8) जब वह आयेगा, तो पाप, धार्मिकता और दंण्डाज्ञा के विषय में संसार का भ्रम प्रमाणित कर देगा-

9) पाप के विषय में, क्योंकि वे मुझ में विश्वास नहीं करते

10) घार्मिकता के विषय में, क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ और तुम मुझे और नहीं देखोगे;

11) दण्डाज्ञा के विषय में, क्योंकि इस संसार का नायक दोषी ठहराया जा चुका है।


📚 मनन-चिंतन


भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है जिसके जरियें़ जान और माल दोनो का नुकसान होता है। इतिहास में कई ऐसे भूकम्प आयें है जिसने बहुत भारी नुकसान देश और लोगों को पहुॅंचाया है। आज के पहले पाठ में भी हम भारी भूकम्प की घटना को सुनते है परंतु इसमें किसी का नुकसान नहीं होता अपितु यह घटना के जरियें एक कारापाल और उसका परिवार ईसा मसीह में विश्वास करने लगते है। कारावास एक दण्डनीय जगह है जहॉं पर लोगों को सजा दी जाती है। प्रभु ने उस कारावास में भी अपनी महिमा प्रकट की जहॉं पर पौलुस और सीलस ने अत्याचार में भी प्रभु का गुणगान किया।

सुसमाचार में प्रभु येसु ख्रीस्त पुनः सहायक के विषय में बताते हैं कि जब वह आयेगा, तो पाप, धार्मिकता और दण्डाज्ञा के विषय में संसार का भ्रम प्रमाणित कर देगा। प्रभु का आत्मा केवल सत्य के प्रति नहीं परंतु पाप और अधार्मिकता के प्रति भी खुलासा करेगा और सत्य के पथ को आलोकित करेगा।

येसु ने हमें ख्रीस्तीय बुलाहट लोगो के समक्ष येसु का साक्ष्य बनने एवं पवित्र आत्मा की मदद द्वारा सही राह चुनने के लिए बुलाया है। हम आज के पाठों द्वारा ईश्वर के कर्तव्यों को अपने जीवन में पालन करें। आमेन!



📚 REFLECTION



Earthquake is a natural disasater which leads to the loss of both lives and things. In the past many earthquakes have come which have brought heavy destruction to the country and the people. In today’s first reading too we hear about the incident of heavy earthquake but in this nobody is being harmed but through this incident the jailer and his family start believing in Jesus Christ. Prison is a place of punishment where people are being punished. Lord has demonstrated his glory even in that prison where Paul and Silas were praising God even after being persecuted.

In the Gospel Lord Jesus again speaks about the helper that when he comes, he will prove the world wrong about sin and righteousness and judgment. Lord’s Spirit not only will reveal about the truth but also about sin, righteousness and judgement and will enlighten the path of truth.

Christian call has been given by Jesus to become witnesses of Jesus infront of others and to choose the right path with the help of the Holy Spirit. Through today’s readings let’s obey the commandments of God in our lives. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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सोमवार, 10 मई, 2021 पास्का का छठवाँ सप्ताह

 

सोमवार, 10 मई, 2021

पास्का का छठवाँ ससप्ताह



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 16:11-15


11) त्रोआस से चल कर हम नाव पर सीधे समाथ्राके, दूसरे दिन नेआपोलिस

12) और वहाँ से फिलिप्पी पहुँचे। फिलिप्पी मकेदूनिया प्रान्त का मुख्य नगर और रोमन उपनिवेश है। हम कुछ दिन वहाँ रहे।

13) विश्राम के दिन हम यह समझ कर शहर के बाहर नदी के तट आये कि वहाँ कोई प्रार्थनागृह होगा। हम बैठ गये और वहाँ एकत्र स्त्रियों से बातचीत करते रहे।

14) सुनने वाली महिलाओं में एक का नाम लुदिया था और वह थुआतिरा नगर की रहने वाली थी। वह बैंगनी कपड़ों का व्यापार करती और ईश्वर पर श्रद्धा रखती थी। प्रभु ने उसके हृदय का द्वार खोल दिया और उसने पौलुस की शिक्षा स्वीकार कर ली।

15) सपरिवार बपतिस्मा ग्रहण करने के बाद लुदिया ने हम से यह अनुरोध किया, ’’आप लोगों ने माना है कि मैं सचमुच प्रभु में विश्वास करती हूँ, तो आइए, मेरे यहाँ ठहरिए’’। और उसने इसके लिए बहुत आग्रह किया।


सुसमाचार : योहन 15:26-16:4


15:26) जब वह सहायक, पिता के यहाँ से आने वाला वह सत्य का आत्मा आयेगा, जिसे मैं पिता के यहाँ से तुम लोगो के पास भेजूगाँ तो वह मेरे विषय में साक्ष्य देगा।

27) और तुम लोग भी साक्ष्य दोगे, क्योंकि तुम प्रारंभ से मेरे साथ रहे हो।

16:1) मैंने तुम लोगो से यह इसीलिये कहा है कि तुम विचलित नहीं हो।

2) वे तुम्हें सभागृहों से निकाल देंगे। इतना ही नहीं, वह समय आ रहा है, जब तुम्हारी हत्या करने वाला यह समझेगा कि वह ईश्वर की सेवा कर रहा है।

3) वे यह सब इसीलिये करेंगे कि उन्होंने न तो पिता को पहचाना है और न मुझ को।

4) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि समय आने पर तुम्हें यह स्मरण रहे कि मैंने तुम्हें पहले ही सचेत किया था।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ने इस संसार से जाने से पूर्व अपने शिष्यों को एक सहायक भेजने की प्रतीज्ञा की थी। वह सहायक कोई ओर नहीं परंतु पवित्र आत्मा है, सत्य का आत्मा जो प्रभु येसु के विषय में साक्ष्य देता है।

पवित्र आत्मा हम सभी के लिए एक सहायक के रूप में दिया गया है परंतु हममें से अधिकतर लोग उस सहायक को अपने जीवन में कार्य करने नहीं देते इस कारण हम येसु को पहचान नहीं पाते और उनको अपने जीवन में साक्ष्य नहीं दे पाते। पवित्र आत्मा उतरने से पूर्व शिष्य डरें हुए थे, प्रभु के वचनों को सहीं तरह से नहीं समझ पाते थे, पवित्र आत्मा के आगमन के बाद हीं शिष्यों ने प्रभु की कहीं हुई हर बात को समझा तथा निडरता पूर्वक येसु का साक्ष्य लोंगों के सामने प्रकट किया।

आज के युग में कलीसिया हर प्रकार से सम्पन्न है परंतु कमी है तो सिर्फ पवित्र आत्मा को कार्यांवित करने की। आईये हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि जो पवित्र आत्मा का वरदान हमने दृढकरण संस्कार द्वारा ग्रहण किया है हम उनको पूर्ण रीति से समझें और पवित्र आत्मा को अपने जीवन में कार्य करने दें। आमेन!



📚 REFLECTION



Before leaving, Jesus assured the disciples of sending the helper to them. That helper is none other but Holy Spirit himself, the Spirit of truth who witnesses Lord Jesus.

We have received the Holy Spirit as a helper but many of us do not allow the Holy Spirit to work in our lives that is the reason we do not recognize Jesus and couldn’t be able to give his witness through our lives. Before descending of the Holy Spirit the disciples were afraid, were not able to understand Jesus’ words fully; it is after the coming of the Holy Spirit the disciples understood the meaning of every word spoken by Jesus and gave the witness of Jesus with boldness.

In present time the Church is affluent with many things but only thing which she lacks is allowing the Holy Spirit to work. Let’s pray to the Lord the gift of Holy Spirit which we received during the time of Sacrament of Confirmation, we may understand the mystery of it in fuller sense and allow the Holy Spirit to work in our lives. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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आज का पवित्र वचनइतवार, 9 मई, 2021 पास्का का छठवाँ इतवार

 

इतवार, 9 मई, 2021

पास्का का छठवाँ इतवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 10:25-26,34-35,44-48


25) जब पेत्रुस उनके यहाँ आया, तो करनेलियुस उस से मिला और उसने पेत्रुस के चरणों पर गिर कर उसे प्रणाम किया।

26) किंतु पेत्रुस ने उसे यह कहते हुए उठाया, ’’खड़े हो जाइए, मैं भी तो मनुष्य हूँ’’

34) पेत्रुस ने कहा, ’’मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

35) मनुष्य किसी भी राष्ट्र का क्यों न हो, यदि वह ईश्वर पर श्रद्धा रख कर धर्माचरण करता है, तो वह ईश्वर का कृपापात्र बन जाता हैं।

44) पेत्रुस बोल ही रहा था कि पवित्र आत्मा सब सुनने वालों पर उतरा।

45) पेत्रुस के साथ आये हुए यहूदी विश्वासी यह देख कर चकित रह गये कि गैर-यहूदियों को भी पवित्र आत्मा का वरदान मिला है;

46) क्योंकि वे गैर-यहूदियों को भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलते और ईश्वर की स्तुति करते सुन रहे थे। तब पेत्रुस ने कहा,

47) ’’इन लोगों को हमारे ही समान पवित्र आत्मा का वरदान मिला है, तो क्या कोई इन्हें बपतिस्मा का जल देने से इंकार कर सकता है?

48) और उसने उन्हें ईसा मसीह के नाम पर बपतिस्मा देने का आदेश दिया। तब उन्होंने पेत्रुस से यह कहते अनुरोध किया, ’’आप कुछ दिन हमारे यहाँ रहिए’’।


दूसरा पाठ : योहन का पहला पत्र 4:7-10


7) प्रिय भाइयो! हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईश्वर से उत्पन्न होता है।

8) जौ प्यार करता है, वह ईश्वर की सन्तान है और ईश्वर को जानता है। जो प्यार नहीं करता, वह ईश्वर को नहीं जानता; क्येोंकि ईश्वर प्रेम है।

9) ईश्वर हम को प्यार करता है। यह इस से प्रकट हुआ है कि ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेजा, जिससे हम उसके द्वारा जीवन प्राप्त करें।

10) ईश्वर के प्रेम की पहचान इस में है कि पहले हमने ईश्वर को नहीं, बल्कि ईश्वर ने हम को प्यार किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा।


सुसमाचार : सन्त योहन 15:9-17


9) जिस प्रकार पिता ने मुझ को प्यार किया है, उसी प्रकार मैंने भी तुम लोगों को प्यार किया है। तुम मेरे प्रेम से दृढ बने रहो।

10) यदि तुम मेरी आज्ञओं का पालन करोगे तो मेरे प्रेम में दृढ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ बना रहता हूँ।

11) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि तुम मेरे आनंद के भागी बनो और तुम्हारा आनंद परिपूर्ण हो।

12) मेरी आज्ञाा यह है जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।

13) इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।

14) यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।

15) अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है क्योंकि मैने अपने पिता से जो कुछ सुना वह सब तुम्हें बता दिया है।

16) तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो, तुम्हारा फल बना रहे और तुम मेरा नाम लेकर पिता से जो कुछ माँगो, वह तुम्हें वही प्रदान करे।

17) मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ एक दूसरे को प्यार करो।


📚 मनन-चिंतन


प्रेम या प्यार एक ऐसा शब्द है जिसे हम कई बार सुनते और पढ़ते आये है परंतु यह शब्द पढ़ने या सुनने से समझ में नहीं आता परंतु यह शब्द अनुभव करने से ही समझ में आता है। इस प्रेम का कुछ अंश हम अपने परिवारों में अनुभव करते है, रिश्तेदारों में अनुभव करते है या दोस्ती में अनुभव करते है। उस सम्पूर्ण प्रेम का अनुभव हम तब कर पाते है जब हम प्रभु को पूर्ण रूप से जान जाते है। क्योंकि ईश्वर कोई और नहीं परंतु प्रेम है। ईश्वर ने इस संसार को प्रेम से बनाया, मनुष्यों को प्रेम से बनाया। उसी प्रेम से मनुष्य को आगे बढ़ाया और उसी प्रेम के कारण अपने इकलौते पुत्र को इस संसार के लिए अर्पित कर दिया।

अब तक हमने माता-पिता, भाई-बहन, दोस्तों के ही प्यार को अनुभव किया है परंतु इस सबसे ऊपर ईश्वर का प्रेम है जिसमें न तो कोई भेदभाव है न ईर्ष्या, न जलन। यह एक शुद्ध प्रेम है। जो प्रभु के प्रेम का अनुभव करता है वह अपने आप दूसरो को प्रेम करने लगता है। क्योकि प्रभु का प्रेम एक जल स्रोत की तरह है जो बहता रहता है।

प्रभु के प्रेम का अनुभव करने के लिए हमंे प्रभु को जानना होगा, प्रभु के वचनों को समझना होगा और उनकी आज्ञाआंे पर चलना होगा।

इस संसार में हम पाते है कि कुछ लोग अपने माता-पिता के बुजुर्ग हो जाने पर उनका ध्यान नहीं रखते या उन्हें वृद्धाआश्रम में छोड़ देते है। ये वे लोग होते है जिन्हांेने अपने माता-पिता के प्यार, उनके त्याग, बलिदान को कभी नहीं समझा। अगर हम भी प्रभु के त्याग, बलिदान और प्यार को नहीं समझेंगे तो हम भी प्रभु और दूसरों से केवल मतलबी या दिखावटी प्रेम ही करेंगे।

प्रभु के प्रेम ने बहुतों को बदल दिया। प्रभु के प्रेम ने समाज में तिरस्कृत लेवी और जकेयुस को नया जीवन दिया, प्रभु के प्रेम ने समारी स्त्री और पाप में पकड़ी गई स्त्री को बदल कर रख दिया, प्रभु के प्रेम ने पेत्रुस को पश्चाताप से भर कर उसके ह्दय को प्रेम से भर दिया। प्रभु के प्रेम ने शिष्यों और कई संतो को चुना और नियुक्त किया कि वे जा कर फल उत्पन्न करें।

हम प्रभु से अपने जरूरतों के लिए बहुत से चीजें मॉंगते है आज हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि प्रभु हमें अपना प्रेम का अनुभव देे। यह प्रेम हमारे जीवन में एक नया बदलाव और परिवर्तन लायें। आमेन


📚 REFLECTION



Love is the word which we might have heard and read about many times but we may not understand it by merely reading and hearing but it can be understood only by experiencing. We experience some fraction of love in our families, in relationships or in friendship. We experience the fullness of love when we recognize the Lord in fullness because God is none other than love itself. God has created this world, the humans with love; with that same love lead the human and with that same love gave his only begotten Son to the world.

Till now we have experienced only the love of our parents, brothers-sisters, friends and relatives but the love of God is above all this in which there is no partiality, no envy and jealousy. This is the real love. One who experience the love of God, he/she himelf/herself start loving others, because the love of God is like the water souce which keeps on flowing.

To experience the love of God we have to recognize the Lord, understand his words and have to live according to his commandments.

We see in this world that many do not take care of their parents when they become old or they leave them to oldage home. These are the people who have never understood the love, pain and sacrifices of their parents. If we too also do not understand the sacrifice, pain and love of the Lord then we will love God and others only superficially or for the benefits.

The love of God has changed many. Love of God has given new life to socially-rejected Levi and Zaccheaus, love of God has changed the Samaritan woman and the woman caught in adultery, love of God made Peter to realize his mistake and filled his heart with love, love of God has chosen the disciples and many saints and appointed them so that they can go and bear fruit.

We ask the Lord many things according to our needs; let’s ask today that we may experience His unconditional love. May the love of God bring new changes in our lives. Amen!



मनन-चिंतन-2


आज के पाठों का सार और न केवल आज के पाठों का बल्कि ईश्वर के पूरे मुक्तिविधान का सार है ईश्वर का प्रेम। प्रेम, ईश्वर के हर कार्य एवं प्रत्येक व्यक्ति के लिए ईश्वर द्वारा निर्धारित जीवन की हर योजना का आधार है। सारी सृष्टि का ही आधार प्रेम है। लेकिन प्रभु येसु ने ईश्वर के इस प्रेम की नई व्याख्या की है। एक नया रूप दिया है, नया चेहरा दिया है

पुराने व्यवस्थान की पहली पुस्तक के प्रारम्भ में हम पूरी दुनिया के सृजन का विवरण पढ़ते हैं। इसमें हम पढ़ते हैं कि कैसे ईश्वर ने मनुष्य को पूरी सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान किया। सम्पूर्ण पुराने व्यवस्थान में हम मनुष्यों के प्रति ईश्वर के प्रेम का वर्णन सुनते हैं। मनुष्य बार-बार गलती करता जाता है, और ईश्वर बार-बार उसे अपने पास लाने की कोशिश करते हैं। चूँकि मनुष्य ईश्वर से दूर भागता है अतः वह ईश्वर को जान नहीं पाता है। अगर हमें ईश्वर को जानना और समझना है तो हमें उससे दूर भागना बंद करना और चैन से ईश्वर को खोजना चाहिये क्योंकि ईश्वर कहते हैं, “शान्त हो और जान लो कि मैं ही ईश्वर हूँ...” (स्तोत्र 46:10) ईश्वर को न जानना और उससे दूर भागना न केवल प्राचीनकाल के लोगों के अन्दर विद्यमान था बल्कि आधुनिक लोगों में भी विद्यमान है। बल्कि वर्तमान में ईश्वर से दूर भागने की प्रवृत्ति आज के युग में और भी अधिक तेज है।

जब हम किसी व्यक्ति के सीधे संपर्क में नहीं रहते और उससे दूर भागते हैं, तो कई बार इस बात की सम्भावना होती है कि हम उस व्यक्ति के बारे में गलतफमियां भी पाल लेते हैं। यही बात ईश्वर के बारे में भी शत-प्रतिशत सच है। पुराने व्यवस्थान में और साथ ही नए व्यवस्थान में भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो ईश्वर को अच्छी तरह से नहीं जानते थे, ईश्वर के प्रेम को भलीभांति नहीं जानते थे और इसलिए न केवल अंधकार में रहते थे बल्कि उसके विरुद्ध भी कार्य करते थे। (उदा. सन्त पौलुस जो पहले साउल थे) बाद में जब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता था तो वे पूरी तरह बदल जाते थे।

उदाहरण के लिए हम अपने आदि माता-पिता आदम और हेवा को देखते हैं। जब उन्होंने शैतान के बहकावे में आकर ईश्वर के विरुद्ध कार्य किया तो वे छुप गए। वे ईश्वर से डर गए (देखें उत्पत्ति ग्रन्थ 3:9-10)। जब हम ईश्वर के वास्तविक स्वभाव को नहीं जानते तो उन से डर जाते हैं और उनसे छुपने की कोशिश करते हैं। हालाँकि इससे हमारे प्रति ईश्वर के प्रेम में कोई कमी नहीं आती।

ईश्वर को गहराई से न जानने के कारण मनुष्यों के डरने की पुराने व्यवस्थान में अनेक घटनाएँ हैं। निर्गमन ग्रन्थ के २०वें अध्याय में हम पढ़ते हैं कि जब ईश्वर लोगों से बात करना चाहते थे तो लोग डर रहे थे। वे मूसा से कहने लगे “...आप हमसे बोलिए और हम आपकी बात सुनेंगे, किन्तु ईश्वर हमसे नहीं बोले, नहीं तो हम मर जायेंगे।” (निर्गमन 20:19) आगे राजाओं के पहले ग्रन्थ के 19 वें अध्याय में हम पढ़ते हैं की नबी एलियाह ने सोचा कि प्रभु प्रचण्ड आंधी में, या भूकम्प में, या अग्नि में था लेकिन प्रभु मन्द समीर में था (देखें 1 राजाओं 19:11-13)। कई बार हमारे मन में प्रभु की तस्वीर कुछ और होती है और वास्तविकता में कुछ और। यह एक प्रकार की गलतफहमी है और प्रभु के बारे में हमारी अज्ञानता है।

पिता ईश्वर के बारे में मानव जाति के मन में जो गलत छवि बनी हुई है, उसी को प्रभु येसु सुधारने आये हैं। प्रभु येसु ने अपने वचनों, अपने कार्यों एवं अपने चमत्कारों द्वारा हमें यही बताया कि पिता ईश्वर क्रोधी नहीं दयालु हैं, पिता ईश्वर भयाभय नहीं प्यारे पिता हैं। वे आज के सुसमाचार में हमे बताते हैं कि पिता ईश्वर उन्हें प्यार करते हैं, और जिस तरह पिता ईश्वर प्रभु येसु को प्यार करते हैं उसी तरह प्रभु येसु हमें प्यार करते हैं। जितनी गहराई से प्रभु येसु पिता ईश्वर को जानते हैं, उतनी गहराई से और कोई पिता ईश्वर को नहीं जानता। “...इसी तरह पिता को कोई भी नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है, और वही जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे।” (मत्ती11:27) “यह न समझो कि किसी ने पिता को देखा है, जो ईश्वर की ओर से आया है, उसी ने पिता को देखा है।” (योहन 6:46)। जिस तरह पिता ईश्वर प्रभु येसु को प्यार करते हैं उसी तरह प्रभु येसु हमें प्यार करते हैं और वे चाहते हैं कि हम भी उसी तरह एक दूसरे को प्यार करें, तभी हम प्रभु येसु को भली भांति जानेंगे और प्रभु येसु के द्वारा पिता ईश्वर की वास्तविक छवि के दर्शन कर पाएंगे। पवित्र आत्मा इसके लिए हमारा मार्गदर्शन करे। आमेन|


 Br. Biniush Topno


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