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आज का पवित्र वचन पास्का का चौथा इतवार- 25 अप्रैल 2021 बुलाहट इतवार

 

पास्का का चौथा इतवार- 25 अप्रैल 2021
बुलाहट इतवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 4:8-12

8) पेत्रुस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो कर उन से कहा, "जनता के शासकों और नेताओ"!

9) हमने एक लँगड़े मनुष्य का उपकार किया है और आज हम से पूछताछ की जा रही है कि यह किस तरह भला-चंगा हो गया है।

10) आप लोग और इस्राइल की सारी प्रजा यह जान ले कि ईसा मसीह नाज़री के नाम के सामर्थ्य से यह मनुष्य भला-चंगा हो कर आप लोगों के सामने खड़ा है। आप लोगों ने उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया, किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से पुनर्जीवित किया।

11) वह वही पत्थर है, जिसे आप, कारीगरों ने निकाल दिया था और जो कोने का पत्थर बन गया है।

12) किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती; क्योंकि समस्त संसार में ईसा नाम के सिवा मनुष्यों को कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हमें मुक्ति मिल सकती है।"

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दूसरा पाठ :1 योहन 3:1-2


1) पिता ने हमें कितना प्यार किया है! हम ईश्वर की सन्तान कहलाते हैं और हम वास्तव में वही हैं। संसार हमें नहीं पहचानता, क्योंकि उसने ईश्वर को नहीं पहचाना है।

2) प्यारे भाइयो! अब हम ईश्वर की सन्तान हैं, किन्तु यह अभी तक प्रकट नहीं हुआ है कि हम क्या बनेंगे। हम इतना ही जानते हैं कि जब ईश्वर का पुत्र प्रकट होगा, तो हम उसके सदृश बन जायेंगे; क्योंकि हम उसे वैसा ही देखेंगे, जैसा कि वह वास्तव में है।


सुसमाचार : योहन 10:11-18


11) "भला गड़ेरिया मैं हूँ। भला गड़ेरिया अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण दे देता है।

12) मज़दूर, जो न गड़ेरिया है और न भेड़ों का मालिक, भेडि़ये को आते देख भेड़ों को छोड़ कर भाग जाता है और भेडि़या उन्हें लूट ले जाता है और तितर-बितर कर देता है।

13) मज़दूर भाग जाता है, क्योंकि वह तो मजदूर है और उसे भेड़ों की कोई चिन्ता नहीं।

14) "भला गडेरिया मैं हूँ। जिस तरह पिता मुझे जानता है और मैं पिता को जानता हूँ, उसी तरह मैं अपनी भेड़ों को जानता हूँ और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं।

15) मैं भेड़ों के लिए अपना जीवन अर्पित करता हूँ।

16) मैरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं हैं। मुझे उन्हें भी ले आना है। वे भी मेरी आवाज सुनेंगी। तब एक ही झुण्ड होगा और एक ही गड़ेरिया।

17) पिता मुझे इसलिए प्यार करता है कि मैं अपना जीवन अर्पित करता हूँ; बाद में मैं उसे फिर ग्रहण करूँगा।

18) कोई मुझ से मेरा जीवन नहीं हर सकता; मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता की ओर से यह आदेश मिला है।"


📚 मनन-चिंतन


पुराने विधान में ईश्वर को चरवाहे के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चरवाहे के गुणों के द्वारा ईश्वर यह बताते हैं कि वे हमारा कितना प्रेम करते हैं। चरवाहा अपनी भेडों को सुरक्षित तथा हरे-भरे स्थानों पर ले जाता है। चरवाहे का मुख्य कार्य अपनी झुण्ड की रक्षा करना होता है। चरवाहे दो प्रकार के होते है। पहले जो दूसरों की झुण्ड की देखभाल का कार्य पैसे के लिये करते हैं तथा दूसरा जो स्वयं झुण्ड के स्वामी तथा चरवाहे दोनों होते हैं। जो चरवाहे पैसों के लिये झुण्ड की देखभाल करते हैं वे विपत्ति या संकट में झुण्ड को छोडकर भाग जाते थे। किन्तु झुण्ड का स्वामी यदि चरवाहा होता था तो वह झुण्ड को बचाने की खातिर जंगली जानवरों से भी भिड जाता था।

दाउद जब चरवाहे का कार्य किया करते थे तो वह अपनी झुण्ड की रक्षा के लिये जंगली जानवरों तक से भिड जाते थे। वे बताते हैं, ’’आपका यह दास जब अपने पिता की भेड़ें चराता था और कोई सिंह या भालू आ कर झुण्ड से कोई भेड़ पकड़ ले जाता, तो मैं उसके पीछे जा कर उसे मारता और उसके मुँह से उसे छीन लेता था और यदि वह मेरा सामना करता, तो मैं उसकी अयाल पकड़ कर उस पर प्रहार करता और उसे मार डालता था। आपके दास ने तो सिंहों और भालूओं को मारा है।’’ (1 समूएल 17:34-36) जब दाउद राजा बने तो उन में भी चरवाहे के अनेक गुण देखने को मिले।

येसु स्वयं को भला चरवाहा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं, ’’भला गड़ेरिया मैं हूँ। भला गड़ेरिया अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण दे देता है। मज़दूर, जो न गड़ेरिया है और न भेड़ों का मालिक, भेड़िये को आते देख भेड़ों को छोड़ कर भाग जाता है और भेड़िया उन्हें लूट ले जाता है और तितर-बितर कर देता है। मज़दूर भाग जाता है, क्योंकि वह तो मजदूर है और उसे भेड़ों की कोई चिन्ता नहीं। भला गडेरिया मैं हूँ।’’ (योहन 10:11-14) येसु अपनी रेवड जोकि हम है को बचाने की खातिर अपने प्राण तक त्याग देते हैं। येसु के प्राण त्यागने से अभिप्राय कू्रस पर अपने प्राण न्यौछावर करने से था।

येसु के प्राण त्यागने का उददेश्य पिता की इच्छा पूरी करना था। येसु की कू्रस पर मृत्यु के द्वारा पिता ने मानवजाति को यह बताया कि वे उन्हें कितना प्रेम करते हैं, ’’ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिये अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उसमें विश्वास करता है उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।’’ (योहन 3:16) येसु ने प्रेम की पराकाष्ठा को बताते हुये कहा, ’’इससे बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।’’ (योहन 15:13) इस प्रकार येसु ने अपने प्रेम का अपूर्व उदाहरण अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। अपने इस प्रेम से येसु ने पिता को महिमा प्रदान की। उन्होंने अपनी मृत्यु को पिता की इच्छा मानकर स्वीकार किया। जिससे पिता उन्हें पुनर्जीवित कर सकें। येसु की मृत्यु का फल पुनरूत्थान था।

आदम और हेवा ने अवज्ञा करके पाप किया। उन्होंने शैतान के सामने स्वयं को कमजोर तथा असहाय साबित किया। किन्तु येसु ने शैतान के प्रलोभन को नकार कर, जो उन्हें क्रूस को नकारने का था, शैतान के सभी प्रलोभनों पर विजय पाकर हमारे लिये मुक्ति का द्वार खोल दिया है। इस प्रकार येसु के नाम में विश्वास के द्वारा हमें पापों से मुक्ति प्राप्त होती है। येसु में विश्वास के द्वारा हम सारे प्रलोभनों पर विजयी प्राप्त होते हैं। आज के पहले पाठ में संत पेत्रुस एक लॅगडे को प्राप्त चंगाई के बारे में गवाही देते हुये कहते हैं, ’’आप लोग और इस्राएल की सारी प्रजा यह जान ले कि ईसा मसीह नाज़री के नाम के सामर्थ्य से यह मनुष्य भला-चंगा हो कर आप लोगों के सामने खड़ा है। ..... किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती; क्योंकि समस्त संसार में ईसा नाम के सिवा मनुष्यों को कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हमें मुक्ति मिल सकती है।’’

ईसा के नाम पर प्रेरित अनेक चमत्कारों को करते तथा स्वर्गराज्य का सुसमाचार देते थे। उनके नाम पर विश्वास के कारण अनेकों ने चंगाई तथा नवजीवन प्राप्त किया। प्रेरितों ने येसु के नाम की शिक्षा का अपने जीवन में भी अनुपालन किया। उन्होंने अपने जीवन में अनेक कष्टों तथा अत्याचारों का सामना किया तथा अधिकांश ने तो शहादत ग्रहण की। जब हम अपने जीवन में वास्तविक रूप से येसु को चरवाहा मानते तथा व्यवहारिक जीवन में जीते हो तो हमारा जीवन भी बदल जाता है। हम येसु के नाम की शक्ति और सामर्थ्य का अनुभव करते हैं। हम से अधिकांश विश्वासी येसु के नाम तथा उनकी शिक्षाओं को स्वीकारते तो है किन्तु दैनिक जीवन में उन्हें लागू नहीं कर पाते हैं। जब-जब प्रलोभन आता है हम येसु को भूल कर प्रलोभन में पड जाते हैं। प्रलोभन में गिर कर हम अपने स्वार्थ की बातों में लग जाते हैं। यह ठीक उसी प्रकार है जब किराये के चरवाहें रेवडों को छोडकर अपनी जान बचाने के लिये भाग जाते थे। हमें भागना नहीं बल्कि येसु के नाम से उन सारी बुराईयों, कमजोरियों तथा प्रलोभनों का सामना करना हैं।


📚 REFLECTION



In the old Testament God is projected as a Good Shepherd. Through the characteristics of Good Shepherd God shows us his love towards us. shepherd takes his sheep to safer and a greener pastures. The primary duty of a shepherd is to protect its fold. There are two types of shepherds; the hired shepherds and those who owned the sheep and shepherd them. The hired shepherds used to dessert the sheep whenever a danger arose. However, the owner of the sheepfold cum shepherd used to fight the wild animals and ward off the dangers.

When David was the shepherd of his flock, he used to protect them even at the risk of his own life. He says, “But David said to Saul, ‘Your servant used to keep sheep for his father; and whenever a lion or a bear came, and took a lamb from the flock, I went after it and struck it down, rescuing the lamb from its mouth; and if it turned against me, I would catch it by the jaw, strike it down, and kill it. Your servant has killed both lions and bears; and this uncircumcised Philistine shall be like one of them, since he has defied the armies of the living God.’ (1 Samuel 17:34-36) When he became the king he visibly displayed the qualities of the shepherd.

Jesus presents himself as the good shepherd. He says, “I am the good shepherd. The good shepherd lays down his life for the sheep. 12The hired hand, who is not the shepherd and does not own the sheep, sees the wolf coming and leaves the sheep and runs away—and the wolf snatches them and scatters them. 13The hired hand runs away because a hired hand does not care for the sheep. 14I am the good shepherd. I know my own and my own know me.” (John 10:11-14) Jesus for the safety and security of his sheepfold was ready even to give up his own life. Lord’s sacrifice on the cross was exactly an offering for the redemption of the humanity.

Jesus’ purpose to offer himself as a sacrifice was in obedience to God’s will. Father manifested his love for the humanity by letting his own son die on the cross, “For God so loved the world that he gave his only Son, so that everyone who believes in him may not perish but may have eternal life.” (John 3:16) Jesus defined love saying, “No one has greater love than this, to lay down one’s life for one’s friends.” (John 15:13) Jesus by giving up his life redefined love and set an example before us all. Jesus by his love glorified the Father. He accepted death as the will of the father so that Father raised him up on the third day.

Adam and Eve disobeyed God and sinned. In the wake of the temptation and before devil they proved themselves weak and vulnerable. But Jesus rejected the temptation of denying the Cross and thereby snubbed the devil. By overcoming all the temptations, he proved victorious and opened the door of salvation for all. Therefore, all those who believe in the name of Jesus all become partakers in his salvific work. By believing in his name we can overcome all temptations. In today’s first reading gives testimony of the healed man, “Rulers of the people and elders,….let it be known to all of you, and to all the people of Israel, that this man is standing before you in good health by the name of Jesus Christ of Nazareth, whom you crucified, whom God raised from the dead. ….There is salvation in no one else, for there is no other name under heaven given among mortals by which we must be saved.”

In the name of Jesus apostles were preaching the kingdom of God and performing many miracles. Those who believed in him name found a new meaning and purpose in their life and many of them received healing. Apostles lived a radical life by following the teachings of Jesus. Most of them endured suffering and even martyrdom in many cases. When we in our life live the teaching of Jesus then our life also changes. We would also experience the power of the name of Jesus. Most of us today believe in the name of Jesus yet are far away from translating the teaching into action. Whenever we are faced with temptations we feel entrapped because Jesus seems to be a remote reality. By falling into temptations we become selfish and get lost into the petty affairs of life. This is what the hired shepherds do. Whenever the difficult arise they abandon the flock. We do not need to run away or abandon the name of Jesus but rather stay strong and fight the situation with brevity.



मनन-चिंतन-2


गडेरिया भेडों को चराने ले जाता है। वह भेडों को न सिर्फ अच्छे चारागाहों में ले जाता है बल्कि उनकी जंगली जानवरों तथा हर प्रकार के खतरे से रक्षा भी करता है। यदि कोई जानवर उन पर हमला करता है तो वह उस खतरे से स्वयं निपटता है। कभी-कभी इन झुण्डों को चराने की जिम्मेदारी मजदूरों को भी दी जाती थी। खतरे की स्थिति में ये मजदूर भेडों को अकेला छोडकर भाग जाते थे। मजदूर को केवल अपनी मजदूरी से मतलब होता था। वह अपनी जान पर खेलकर भेडों की देखभाल नहीं कर सकता। प्रभु येसु ऐसे मजदूरों की तुलना इस्राएल के धार्मिक नेताओं जिन पर ईश्वर की प्रजा की देखरेख की जिम्मेदारी थी, से करते हैं जो लोगों की चिंता नहीं करते थे। वे अपने ही स्वार्थ एवं आडम्बर की बातों में लगे रहते थे।

नबी एजेकिएल ने भी तत्कालीन इस्राएली नेतृत्व की स्वार्थी एवं शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठायी थी तथा उनके पतन की चेतावनी दी थी। वे कहते हैं, “वे बिखर गयी, ....और वे बनैले पशुओं का शिकार बन गयीं। मेरी भेड़ें सब पर्वतों और ऊँची पहाडियों पर भटकती फिरती हैं वे समस्त देश में बिखर गयी हैं, और उनकी परवाह कोई नहीं करता, उनकी खोज में कोई नहीं निकलता। “इसलिए चरवाहो! प्रभु की वाणी सुनो। प्रभु-ईश्वर यह कहता है -अपने अस्तित्व की शपथ! मेरी भेड़ें, चराने वालों के अभाव में, बनैले पशुओं का शिकार और भक्ष्य बन गयी हैं, मेरे चरवाहों ने भेडो की परवाह नहीं की - उन्होंने भेडों की नहीं, बल्कि अपनी देखभाल की है इसलिए चरवाहो! प्रभु की वाणी सुनो। प्रभु यह कहता हैं, मैं उन चरवाहों का विरोधी बन गया हूँ। मैं उन से अपनी भेड़ें वापस माँगूंगा। मैं उनकी चरवाही बन्द करूँगा। वे फिर अपनी ही देखभाल नहीं कर पायेंगे।’’ (एजेकिएल 34:5-10)

प्रभु येसु अपने समय के शोषणकारी धार्मिक नेताओं, फरीसियों एवं शास्त्रियों, को उनकी अकर्मण्यता एवं कर्तव्य निष्ठा में विफलता के लिए धिक्कारते हैं। वे उनके पाखण्ड पर प्रहार कर कहते हैं, “फरीसियो! धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुम पुदीने, रास्ने और हर प्रकार के साग का दशमांश तो देते हो, लेकिन न्याय और ईश्वर के प्रति प्रेम की उपेक्षा करते हो। इन्हें करते रहना और उनकी भी उपेक्षा नहीं करना, तुम्हारे लिए उचित था। फरीसियो! धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुम सभागृहों में प्रथम आसन और बाजारों में प्रणाम चाहते हो। धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुम उन कब्रों के समान हो, जो दीख नहीं पड़तीं और जिन पर लोग अनजाने ही चलते-फिरते हैं।’’ ’’शास्त्रियों! धिक्कार तुम लोगों को भी! क्योंकि तुम मनुष्यों पर बहुत-से भारी बोझ लादते हो और स्वयं उन्हें उठाने के लिए अपनी तक उँगली भी नहीं लगाते। “शास्त्रियों, धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुमने ज्ञान की कुंजी ले ली। तुमने स्वयं प्रवेश नहीं किया और जो प्रवेश करना चाहते थे, उन्हें रोका।’’(लूकस 11: 42-46,52)

इस्राएली इतिहास में एक योग्य राजा की तुलना चरवाहे से की जाती रही है। जिस प्रकार भला चरवाहा अपनी रेवड की देखभाल करता है, उनका मार्गदर्शन करता तथा हर संभावित खतरों से उनकी रक्षा करता है उसी प्रकार की आशा एक राजा या नेता से की जाती रही है। दाऊद प्रभु द्वारा राजा चुने जाने के पूर्व चरवाहे थे। वे अपनी रेवड की देखरेख एवं रक्षा भली-भांति किया करते थे। जंगली जानवरों के आक्रमण करने पर वे उनका बहादुरी से सामना कर अपनी रेवड को बचाया करते थे। ‘‘आपका यह दास जब अपने पिता की भेड़ें चराता था और कोई सिंह या भालू आ कर झुण्ड से कोई भेड़ पकड़ ले जाता, तो मैं उसके पीछे जा कर उसे मारता और उसके मुँह से उसे छीन लेता था और यदि वह मेरा सामना करता, तो मैं उसकी अयाल पकड़ कर उस पर प्रहार करता और उसे मार डालता था। आपके दास ने तो सिंहों और भालूओं को मारा है।’’ (1 समूएल 17:34-36) राजा दाऊद पहले एक भले चरवाहा बने शायद इसी कारण से एक अच्छे राजा भी बन सके। अपने स्तोत्र 23 में राजा दाऊद ईश्वर की परिकल्पना भी एक ऐसे चरवाहे के रूप में करते हैं जो उसे जीवन की सम्पूणर्ता प्रदान करते हैं; अपनी लाठी और डण्डे से उन्हें सांत्वना देते तथा उसे अपने मंदिर में चिस्थायी स्थान प्रदान करते हैं।

ऐसी पृष्ठभूमि में येसु स्वयं को भले गडेरिये के रूप में प्रस्तुत करते हुए नबी एजेकिएल की भविष्यवाण पूरी करते हैं जिन्होंने इस्राएल को एक भावी भले गडेरिये के आगमन के बारे में सूचित किया था। ’’मैं उनके लिए एक चरवाहे, अपने सेवक दाऊद को नियुक्त करूँगा और वह उन को चरायेगा और उनका चरवाहा होगा। मैं, प्रभु, उनका ईश्वर होऊँगा और मेरा सेवक दाऊद उनका शासक होगा।’’ (एजेकिएल 34:23-24) येसु ही ईश्वर के प्रतिज्ञात भले चरवाहा है जो ईश्वर की इच्छानुसार उनकी देखभाल करते हैं।

येसु का भेडों के प्रति प्रेम उनके पिता के प्रति प्रेम से उपजता है। उसी प्रेम से प्रेरणा पाकर वे अपनी भेडों की देखभाल करते हैं। किसी मनुष्य के लिए अपने प्राणों से बढकर कोई चीज नहीं हैं किन्तु येसु अपने जीवन को भी भेडों की सेवा में अर्पित कर देते हैं। अपने प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाते हुए वे कहते हैं, ’’इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपने प्राण अर्पित कर दे।’’ (योहन 15:13) क्रूस पर अपने प्राणों को अर्पित कर येसु ने अपने वचनों को सत्यता प्रदान की। येसु अपने चरवाहे के आदर्श प्रेम, सेवा एवं आत्म-त्याग के कार्य से न सिर्फ चुने हुये लोगों को बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति को स्वर्गिक पिता की रेवड बना देगे। इस प्रकार प्रभु भविष्य का वह अकल्पनीय दृष्य प्रस्तुत करते हैं जब सारी मानवजाति का एक ही चरवाहा होगा तथा मानवजाति विभिन्न वर्णों एवं विचारधाराओं में बंटी हुयी न होकर एक ही चरवाहे की भेडे बन जायेगी।

✍ Biniush Topno

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आज का पवित्र वचन शनिवार, - 24 अप्रैल 2021

 

शनिवार, - 24 अप्रैल 2021

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित . 9:31-42


31) उस समय समस्त यहूदिया, गलीलिया तथा समारिया में कलीसिया को शान्ति मिली। उसका विकास होता जा रहा था और वह, प्रभु पर श्रद्धा रखती हुई और पवित्र आत्मा की सान्त्वना द्वारा बल प्राप्त करती हुई, बराबर बढ़ती जाती थी।

32) पेत्रुस, चारों ओर दौरा करते हुए, किसी दिन लुद्दा में रहने वाली ईश्वर की प्रजा के यहाँ भी पहुँचा।

33) वहाँ उसे ऐनेयस नामक अद्र्धांगरोगी मिला, जो आठ वर्षों से बिस्तर पर पड़ा हुआ था।

34) पेत्रुस ने उस से कहा, "ऐनेयस! ईसा मसीह तुम को स्वस्थ करते हैं। उठो और अपना बिस्तर स्वयं ठीक करो।" और वह उसी क्षण उठ खड़ा हुआ।

35) लुद्दा और सरोन के सब निवासियों ने उसे देखा और वे प्रभु की ओर अभिमुख हो गये।

36) योप्पे में तबिया नामक शिष्या रहती थी। तबिथा का यूनानी अनुवाद दोरकास (अर्थात् हरिणी) है। वह बहुत अधिक परोपकारी और दानी थी।

37) उन्हीं दिनों वह बीमार पड़ी और चल बसी। लोगों ने उसे नहला कर अटारी पर लिटा दिया।

38) लुद्दा योप्पे से दूर नहीं है और शिष्यों ने सुना था कि पेत्रुस वहाँ है। इसलिए उन्होंने दो आदमियों को भेज कर उस से यह अनुरोध किया कि आप तुरन्त हमारे यहाँ आइए।

39) पेत्रुस उसी समय उनके साथ चल दिया। जब वह योप्पे पहुँचा, तो लोग उसे उस अटारी पर ले गये। वहाँ सब विधवाएं रोती हुई उसके चारों ओर आ खड़ी हुई और वे कुरते और कपड़े दिखाने लगीं, जिन्हें दोरकास ने उनके साथ रहते समय बनाया था।

40) पेत्रुस ने सबों को बाहर किया और घुटने टेक कर प्रार्थना की। इसके बाद वह शव की ओर मुड़ कर बोला, "तबिथा, उठो! उसने आँखे खोल दीं और पेत्रुस को देख कर वह उठ बैठी।

41) पेत्रुस ने हाथ बढ़ा कर उसे उठाया और विश्वासियों तथा विधवाओं को बुला कर उसे जीता-जागता उनके सामने उपस्थित कर दिया।

42) यह बात योप्पे में फैल गयी और बहुत-से लोगों ने प्रभु में विश्वास किया।


सुसमाचार : योहन 6:60-69


60) उनके बहुत-से शिष्यों ने सुना और कहा, "यह तो कठोर शिक्षा है। इसे कौन मान सकता है?"

61) यह जान कर कि मेरे शिष्य इस पर भुनभुना रहे हैं, ईसा ने उन से कहा, "क्या तुम इसी से विचलित हो रहे हो?

62) जब तुम मानव पूत्र को वहाँ आरोहण करते देखोगे, जहाँ वह पहले था, तो क्या कहोगे?

63) आत्मा ही जीवन प्रदान करता है, मांस से कुछ लाभ नहीं होता। मैंने तुम्हे जो शिक्षा दी है, वह आत्मा और जीवन है।

64) फिर भी तुम लोगों में से अनेक विश्वास नहीं करते।" ईसा तो प्रारम्भ से ही यह जानते थे कि कौन विश्वास नहीं करते और कौन मेरे साथ विश्वासघात करेगा।

65) उन्होंने कहा, "इसलिए मैंने तुम लोगों से यह कहा कि कोई मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक उसे पिता से यह बरदान न मिला हो"।

66) इसके बाद बहुत-से शिष्य अलग हो गये और उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया।

67) इसलिए ईसा ने बारहों से कहा, "कया तुम लोग भी चले जाना चाहते हो?"

68) सिमोन पेत्रुस ने उन्हें उत्तर दिया, "प्रभु! हम किसके पास जायें! आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का सन्देश है।

69) हम विश्वास करते और जानते हैं कि आप ईश्वर के भेजे हुए परमपावन पुरुष हैं।"


📚 मनन-चिंतन


आज के पहले पाठ में हमें उन दो घटनाओं का विवरण दिया गया है जिनमें ईश्वर ने पेत्रुस से सामर्थ्य के महान कार्य करवाये। पहले पेत्रुस एक ऐसे अर्द्धांग रोगी को चंगा करता है जो पिछले आठ साल से ऐसी अवस्था में तथा एक मृत ख्राीस्तीय महिला को पुनर्जीवित करना। हम समझ सकते हैं कि मृत स्त्री को पुनर्जीवित करना अत्यंत अतिसाधारण बात थी।

हमें यह पूछना चाहिये कि क्यों इन घटनाओं विवरण दिया गया है। यह साधारण सी बात है उन नगरों में कई अन्य लोग भी बीमार थे किन्तु उन्हें चंगाई नहीं गयी तथा कई मर गये लेकिन उन्हें पेत्रुस ने पुनर्जीवित नहीं किया। हम इन दो चमत्कारों की घटनाओं की सत्यता पर संदेश नहीं करते हैं किन्तु यह निष्कर्ष भी गलत नहीं है कि अनेक बहुतों के लिये कोई चमत्कार नहीं हुआ।

इन चमत्कारों का प्रमुख उददेश्य लोगों का येसु में विश्वास जगाना था। वाक्य 9:35 कहता हैं, ’’लुद्दा और सरोन के सब निवासियों ने उसे देखा और वे प्रभु की ओर अभिमुख हो गये।’’ ऐनेयस की चंगाई का परिणाम यह हुआ की वहां के निवासियों ने येसु पर विश्वास किया। इस प्रकार 9:42 में तबिथा को जीवन-दान के बाद हम पढते हैं, ’’यह बात योप्पें में फैल गयी और बहुत से लोगों ने प्रभु में विश्वास किया।’’ फिर से इन अभूतपूर्व चमत्कार के कारण लोगों ने प्रभु में विश्वास किया। ईश्वर का चमत्कारी शक्ति प्रदर्शित करती है कि किस प्रकार ईश्वर दयापूर्वक मजबूर तथा कमजोर लोगों को चंगाई तथा जीवनदान प्रदान करता है। ईश्वर का सामर्थ्य गैर-विश्वासियों को उसकी ओर आकर्षित करता तथा हमें उनके सुसमाचार के प्रचार के लिये प्रोत्साहित करता है।



📚 REFLECTION



In today’s first reading we come across two incidents where God used Peter mightily, first to heal a man who had been paralyzed for eight years and second, to raise a Christian woman from the dead. Raising to life the woman was an extraordinary event.

We need to ask why these incidents are mentioned. It is easy to assume that there were many in these towns who remained sick or who died and were not raised. While we definitely believe the authenticity of these incidents and say that God willed for these two miracles to take place, and still know that there were many for whom no miracle occurred.

The greater and far-reaching purpose of these happenings are to bring people to faith in Jesus. In verse 9:35, it says, that “all who lived at Lydda and Sharon turned to the Lord” as a result of Aeneas’ healing. Then again in 9:42, it concludes the miracle stating that the result of the raising of Dorcas was that many believed in the Lord. The miraculous powers of God show us how God mercifully gives healing and new life to those who are helpless and dead because of sin.God’s mighty power causes unbelievers to turn to Him in saving faith and should encourage us to proclaim the Good news.


✍ -Br. Biniush Topno



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आज का पवित्र वचन शुक्रवार 23 अप्रैल 2021

 

शुक्रवार, - 23 अप्रैल 2021

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 9:1-20


1) साऊल पर अब भी प्रभु के शिष्यों को धमकाने तथा मार डालने की धुन सवार थी।

2) उसने प्रधानयाजक के पास जा कर दमिश्क के सभागृहों के नाम पत्र माँगे, जिन में उसे यह अधिकार दिया गया कि यदि वह वहाँ नवीन पन्थ के अनुयायियों का पता लगाये, तो वह उन्हें-चाहे वे पुरुष हों या स्त्रियाँ-बाँध कर येरुसालेम ले आये।

3) जब वह यात्रा करते-करते दमिश्क के पास पहुँचा, तो एकाएक आकाश से एक ज्येाति उसके चारों और चमक उठी।

4) वह भूमि पर गिर पड़ा और उसे एक वाणी यह कहती हुई सुनाई दी, "साऊल! साऊल! तुम मुझ पर क्यों अत्याचार करते हो?"

5) उसने कहा, "प्रभु! आप कौन हैं?" उत्तर मिला, "मैं ईसा हूँ, जिस पर तुम अत्याचार करते हो।

6) उठो और शहर जाओ। तुम्हें जो करना है, वह तुम्हें बताया जायेगा।

7) उसके साथ यात्रा करने वाले दंग रह गये। वे वाणी तो सुन रहे थे, किन्तु किसी को नहीं देख पा रहे थे।

8) साऊल भूमि से उठा, किन्तु आँखें खोलने पर वह कुछ नहीं देख सका। इसलिए वे हाथ पकड़ कर उसे दमिश्क ले चले।

9) वह तीन दिनों तक अन्धा बना रहा और वह न तो खाता था न पीता था।

10) दमिश्क में अनानीयस नामक शिष्य रहता था। प्रभु ने उसे दर्शन दे कर कहा, "अनानीयस!" उसने उत्तर दिया, "प्रभु! प्रस्तुत हूँ"।

11) प्रभु ने उस से कहा, "तुरन्त ’सीधी’ नामक गली जाओ और यूदस के घर में साऊल तारसी का पता लगाओ। वह प्रार्थना कर रहा है।

12) उसने दर्शन में देखा कि अनानीयस नामक मनुष्य उसके पास आ कर उस पर हाथ रख रहा है, जिससे उसे दृष्टि प्राप्त हो जाये।"

13) अनानीयस ने आपत्ति करते हुए कहा, "प्रभु! मैंने अनेक लोगों से सुना है कि इस व्यक्ति ने येरुसालेम में आपके सन्तों पर कितना अत्याचार किया है।

14) उसे महायाजकों से यह अधिकार मिला है कि वह यहाँ उन सबों को गिरफ्तार कर ले, जो आपके नाम की दुहाई देते हैं।"

15) प्रभु ने अनानीयस से कहा, "जाओ। वह मेरा कृपापात्र है। वह गैर-यहूदियों, राजाओं तथा इस्राएलियों के बीच मेरे नाम का प्रचार करेगा।

16) मैं स्वयं उसे बताऊँगा कि उसे मेरे नाम के कारण कितना कष्ट भोगना होगा।"

17) तब अनानीयास चला गया और उस घर के अन्दर आया। उसने साऊल पर हाथ रख दिये और कहा, "भाई साऊल! प्रभु ईसा आप को आते समय रास्ते में दिखाई दिये थे। उन्होंने मुझे भेजा है, जिससे आपको दृष्टि प्राप्त हो और आप पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो जायें।"

18) उस क्षण ऐसा लग रहा था कि उसकी आँखों से छिलके गिर रहे हैं। उसे दृष्टि प्राप्त हो गयी और उसने तुरन्त बपतिस्मा ग्रहण किया।

19) उसने भोजन किया और उसके शरीर में बल आ गया। साऊल कुछ समय तक दमिश्क के शिष्यों के साथ रहा।

20) वह शीघ्र ही सभागृहों में ईसा के विषय में प्रचार करने लगा कि वह ईश्वर के पुत्र हैं।


सुसमाचार : योहन 6:52-59


52) यहूदी आपस में यह कहते हुए वाद विवाद कर रहे थे, "यह हमें खाने के लिए अपना मांस कैसे दे सकता है?"

53) इस लिए ईसा ने उन से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम मानव पुत्र का मांस नहीं खाओगे और उसका रक्त नहीं पियोगे, तो तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं होगा।

54) जो मेरा मांस खाता और मेरा रक्त पीता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है और मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा;

55) क्योंकि मेरा मांस सच्चा भोजन है और मेरा रक्त सच्चा पेय।

56) जो मेरा मांस खाता और मेरा रक्त पीता है, वह मुझ में निवास करता है और मैं उस में।

57) जिस तरह जीवन्त पिता ने मुझे भेजा है और मुझे पिता से जीवन मिलता है, उसी तरह जो मुझे खाता है, उसको मुझ से जीवन मिलेगा। यही वह रोटी है, जो स्वर्ग से उतरी है।

58) यह उस रोटी के सदृश नहीं है, जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने खायी थी। वे तो मर गये, किन्तु जो यह रोटी खायेगा, वह अनन्त काल तक जीवित रहेगा।"

59) ईसा ने कफरनाहूम के सभागृह में शिक्षा देते समय यह सब कहा।


📚 मनन-चिंतन


पौलुस के हृदय परिवर्तन की घटना पेंतेकोस्त के बाद कलीसिया में सबसे बडी घटना मानी जा सकती है। येसु से एक भेंट के बाद ख्राीस्तीय धर्म का घोर विरोधी उनका सबसे बडा समर्थक एवं प्रचारक बन गया था।

ईश्वर की कृपा या मुक्ति किसी मनुष्य की योग्यता या गुणों पर निर्भर नहीं करती है। यह तो ईश्वर की और से दिया गया एक मुफ्त उपहार है। आरंभ में पौलुस ख्राीस्तीयों के विरूद्ध घोर अत्याचार कर रहा था। किन्तु प्रभु येसु ने इस घोर अत्याचारी को उनके शक्तिशाली समर्थक में परिवर्तित कर दिया था। जिस धर्म को मिटाना उसके जीवन का उददेश्य था अब उसी को फैलाने में वह ईश्वर का साधन बन गया था। ईश्वर ने पौलुस को इसलिये नहीं चुना कि वह उपयोगी था। पौलुस ने ईश्वर की इस असीम कृपा को पाने के लिये कुछ भी नहीं किया था। पौलुस का हृदय परिवर्तन केवल ईश्वर की पहल थी। येसु से उस दिव्य आकस्मिक भेंट के दौरान वह भूमि पर गिर पडा था तथा ईश्वर ने उसे अभिभूत कर दिया था। वह अंधा हो गया था। पौलुस के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे। उसे आगे क्या करना है इस बारे में स्पष्ट आदेश दिये गये थे। वह ईश्वर का विशेष उददेश्य, ’’...गैर-यहूदियों, राजाओं तथा इस्राएलियों के बीच मेरे नाम का प्रचार’’ (प्रेरित चरित 9:15)करना था।ईश्वर ने यह भी तय कर लिया था पौलुस को उसके नाम के कारण दुख उठाना होगा। (प्रेरित चरित 9:16)

ईश्वर ने पौलुस के इस नये जीवन के बारे में पूरी रूपरेखा तय कर रखी थी। इस बात को संत पौलुस रोमियों के नाम अपने पत्र में लिखते हैं, ’’इसलिए यह मनुष्य की इच्छा या उसके परिश्रम पर नहीं, बल्कि दया करने वाले ईश्वर पर निर्भर रहता है। इसलिए ईश्वर जिस पर चाहे, दया करता है और जिसे चाहे, हठधर्मी बना देता है।’’ (प्रेरित-चरित 9:16,18)

संत पौलस का मन परिवर्तन हम सब के लिये एक उदाहरण एवं आदर्श है। यह इस बात का उदाहरण है कि ईश्वर के मुक्तिदायी हाथ से कोई भी दूर नहीं है। यह इस बात का उदाहरण है कि जब ईश्वर हमारे जीवन का संचालन करते हैं तो हमारे जीवन को अद्वितीय रूप से महान कर सकते हैं। इस बात का उदाहरण है कि हमें भी ईश्वर के हाथों अपने जीवन को संचालित करते हेतु निरतंर प्रार्थना करनी चाहिये।




📚 REFLECTION



The conversion of Saul is considered to be the most important event in the history of the church since Pentecost. With just one encounter, he was converted from the stringiest opponent of Jesus Christ into Christianity’s most ardent advocate.

Salvation does not depend on the merits or good points of man’s nature, but rather on god’s free grace. Initially Soul was breathing threats and murder against the Christians. However, the Lord turns him into his powerful instrument for spreading the faith which he had vowed to annihilate. God did not choose Saul because He saw something of value in his nature. Saul had not done anything to make him worthy of God’s grace. Everything about Saul’s conversion came from God. Saul was not searching for the Lord or for salvation. Rather, the Lord knocked him to the ground and completely overpowered him. He was left him blind. Saul was not given much choice about he is to do. Jesus gave him very direct orders about what he had to do next.Saul was God’s chosen instrument to fulfil a very definite task, “to bear My name before the Gentiles and kings and the sons of Israel” (9:15). God already had ordained that Saul would suffer much for His name’s sake (9:16).

God had it all planned from start to finish! As Paul puts it in Romans 9:16, “So it depends not on human will or exertion, but on God who shows mercy. So then he has mercy on whomsoever he chooses, and he hardens the heart of whomsoever he chooses.” (Romans 9:16,18)

Paul’s conversion is an example for us all. It is an example of the fact that none of us are too far gone for God’s mighty power to save. It is an example of what God can do when He takes hold of a life. It is an example to encourage us to pray for his mercy to be converted to his will.


✍ -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन गुरुवार, - 22 अप्रैल 2021

 

गुरुवार, - 22 अप्रैल 2021

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 8:26-40


26) ईश्वर के दूत ने फि़लिप से कहा, "उठिए, येरुसालेम से गाज़ा जाने वाले मार्ग पर दक्षिण की ओर जाइए"। यह मार्ग निर्जन है।

27) वह उठ कर चल पड़ा। उस समय एक इथोपियाई ख़ोजा, येरुसालेम की तीर्थयात्रा से लौट रहा था। वह इथोपिया की महारानी कन्दाके का उच्चाधिकारी तथा प्रधान कोषाध्यक्ष था।

28) वह अपने रथ पर बैठा हुआ नबी इसायस का ग्रन्थ पढ़ रहा था।

29) आत्मा ने फि़लिप से कहा, "आगे बढि़ए और रथ के साथ चलिए"।

30) फि़लिप दौड़ कर उसके पास पहुँचा और उसे नबी इसायस का ग्रन्थ पढ़ते सुन कर पूछा, "आप जो पढ़ रहे हैं, क्या उसे समझते हैं?"

31) उसने उत्तर दिया, "जब तक कोई मुझे न समझाये, तो मैं कैसे समझूँगा?" उसने फि़लिप से निवेदन किया कि वह चढ़ कर उसके पास बैठ जाये।

32) वह धर्मग्रन्थ का यह प्रसंग पढ़ रहा था-

33) वह मेमने की तरह वध के लिए ले जाया गया। ऊन करतने वाले के सामने चुप रहने वाली भेड़ की तरह उसने अपना मुख नहीं खोला। उसे अपमान सहना पड़ा, उसके साथ न्याय नहीं किया गया। उसकी वंशावली की चर्चा कौन कर सकेगा? उसका जीवन पृथ्वी पर से उठा लिया गया है।

34) खोजे ने फि़लिप से कहा, "आप कृपया मुझे बताइए, नबी किसके विषय में यह कह रहे हैं? अपने विषय में या किसी दूसरे के विषय में?"

35) आत्मा ने फि़लिप से कहा, "आगे बढि़ए और रथ के साथ चलिए"।

36) (36-37) यात्रा करते-करते वे एक जलाशय के पास पहुँँचे। खोजे ने कहा, “यहाँ पानी है। मेरे बपतिस्मा में क्या बाधा है?“

38) उसने रथ रोकने का आदेश दिया। तब फिलिप और खोज़ा, दोनों जल में उतरे और फि़लिप ने उसे बपतिस्मा दिया।

39) जब वे जल से बाहर आये, तो ईश्वर का आत्मा फि़लिप को उठा ले गया। खोज़े ने उसे फिर नहीं देखा; फिर भी वह आनन्द के साथ अपने रास्ते चल पड़ा।

40) फि़लिप ने अपने को आज़ोतस में पाया और वह कैसरिया पहुँचने तक सब नगरों में सुसमाचार का प्रचार करता रहा।


सुसमाचार : योहन 6:44-51


44) कोई मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक कि पिता, जिसने मुझे भेजा, उसे आकर्षित नहीं करता। मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूंगा।

45) नबियों ने लिखा है, वे सब-के-सब ईश्वर के शिक्षा पायेंगे। जो ईश्वर की शिक्षा सुनता और ग्रहण करता है, वह मेरे पास आता है।

46) "यह न समझो कि किसी ने पिता को देखा है; जो ईश्वर की ओर से आया है, उसी ने पिता को देखा है

47) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- जो विश्वास करता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है।

48) जीवन की रोटी मैं हूँ।

49) तुम्हारे पूर्वजों ने मरुभूमि में मन्ना खाया, फिर भी वे मर गये।

50) मैं जिस रोटी के विषय में कहता हूँ, वह स्वर्ग से उतरती है और जो उसे खाता है, वह नहीं मरता।

51) स्वर्ग से उतरी हुई वह जीवन्त रोटी मैं हूँ। यदि कोई वह रोटी खायेगा, तो वह सदा जीवित रहेगा। जो रोटी में दूँगा, वह संसार के लिए अर्पित मेरा मांस है।"


📚 मनन-चिंतन


इथोपियाई खोजे के मन परिवर्तन की घटना आरंभिक कलीसिया में ईश्वर की उपस्थिति का ज्वलंत उदाहरण है।

इथोपियाई खोजा पवित्र नगर येरुसालेम से लौट रहा था और शायद ईश्वर के प्रति उसकी प्यास बुझी नहीं थी। उसके पास धर्मग्रंथ था जिसे वह पढ रहा था। ईश्वर जो मनुष्य के हृदय की थाह लेता है उनके लिये पहाड रूपी बाधा भी हटा सकता है। ईश्वर का दूत फिलिप को निर्जन मार्ग की ओर जाने के लिये कहता है। फिर पवित्र आत्मा फिलिप को रथ के साथ चलने के लिये कहता है। वहॉ फिलिप खोजे को येसु का सुसमाचार सुनाता है। इस भेंट का अंत खोजे के बपतिस्मा ग्रहण करने से होता है।

यह घटना मनुष्य की मुक्ति के लिये ईश्वर के रहस्यमय किन्तु प्रत्यक्ष तथा शक्तिशाली मार्गों के बारे में बताती है। येरूसालेम की यात्रा के बाद भी खोजे की ईश्वर के प्रति तृष्णा शांत नहीं हुयी थी किन्तु उसे मुक्ति एक निर्जन स्थान में प्राप्त हुयी थी जो ईश्वर की इच्छानुसार था। ईश्वर ने इस अप्रत्याशित कार्य के लिये किसी प्रेरित को नहीं वरन् फिलिप को चुना, जो उन सात धर्मसेवकों में था जिन्हें प्रेरितों ने चुना था। (प्रेरित चरित 6:1-7)

यह घटना यह भी बताती है कि ईश्वर हमारी इच्छाओं तथा मुक्ति का कितना ख्याल रखते हैं। इस बात को पूरा करने में ईश्वर अपने कल्याणकारी समय तथा अनूठे मार्गों का उपयोग करते हैं। ईश्वर के लिये छोटे-बडे, अमीर-गरीब में कोई अंतर नहीं होता। ईश्वर ने इस गैर-यहूदी, खोजे की मुक्ति के लिये अति-साधारण तरीके से नियोजन किया। येसु इस सच्चाई को इंगित करते हुए कहते हैं, ’’इसलिए मैंने तुम लोगों से यह कहा कि कोई मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक उसे पिता से यह वरदान न मिला हो।’’ (योहन 6:65)




📚 REFLECTION



Conversion of the Ethiopian eunuch is the example of God’s extraordinary intervention to provide salvation to the eunuch.

Ethiopian Eunuch was returning from the holy city of Jerusalem andperhaps his thirst for God had not been quenched. He had the Word of God with him and was reading it. God who looks at the heart of men can move mountains for the sake of those who sincerely seek him. Philip was directed by the angel of God to go to a deserted place where he was told by the Holy Spirit to join the chariot of the eunuch. There Philip explained to him the good news about Jesus. This encounter culminated in the baptism of the Eunuch.

It shows the mysterious,yet the direct and powerful ways God works for the salvation of men. It is noteworthy to observe that the eunuch did not find salvation in Jerusalem but in the deserted place where God had planned. For this reason alone, Philip was led by the divine intervention to the place for the conversion of the Eunuch. God did not choose any apostle for this special act but Philip was not the apostle but one of those seven deacons chosen by the apostle earlier. (Acts 6:1-7)

It shows God cares about our desires to know him and worship him. it may take time and it may not come in conventional way but it would be definitely on the way through the means and at the appointed time God has destined. It does not matter to God how big or small, rich and poor we are. God provided his salvation even for a gentile eunuch with such extra-ordinary preparations. Jesus points this truth that it is finally through God’s will that we receive grace, “No one can come to me unless the Father who sent me draws him.” (John 6:65)


✍ -Br. Biniush Topno



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आज का पवित्र वचन बुधवार, - 21 अप्रैल 2021

 

बुधवार, - 21 अप्रैल 2021

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 8:1ब-8


1) साऊल इस हत्या का समर्थन करता था। उसी दिन येरुसालेम में कलीसिया पर घोर अत्याचार प्रारम्भ हुआ। प्रेरितों को छोड़ सब-के-सब यहूदिया तथा समारिया के देहातों में बिखर गये।

2) भक्तों ने, स्तेफ़नुस पर करुण विलाप करते हुए, उसे कब्र में रख दिया।

3) साऊल उस समय कलीसिया को सता रहा था। वह घर-घर घुस जाया करता और स्त्री-पुरुषों को घसीट कर बन्दीगृह में डाल दिया करता था।

4) जो लोग बिखर गये थे, वे घूम-घूम कर सुसमाचार का प्रचार करते रहे।

5) फि़लिप समारिया के एक नगर जा कर वहाँ मसीह का प्रचार करता था।

6) लोग उसकी शिक्षा पर अच्छी तरह ध्यान देते थे, क्योंकि सब उसके द्वारा दिखाये हुए चमत्कारों की चर्चा सुनते या उन्हें स्वयं देखते थे।

7) दुष्ट आत्मा ऊँचे स्वर से चिल्लाते हुए बहुत-से अपदूतग्रस्त लोगों से निकलते थे और अनेक अद्र्धांगरोगी तथा लंगड़े भी चंगे किये जाते थे;

8) इसलिए उस नगर में आनन्द छा गया।


सुसमाचार : योहन 6:35-40


35) उन्होंने उत्तर दिया, "जीवन की रोटी मैं हूँ। जो मेरे पास आता है, उसे कभी भूख नहीं लगेगी और जो मुझ में विश्वास करता है, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।

36) फिर भी, जैसा कि मैंने तुम लोगों से कहा, तुम मुझे देख कर भी विश्वास नहीं करते।

37) पिता जिन्हें मुझ को सौंप देता है, वे सब मेरे पास आयेंगे और जो मेरे पास आता है, मैं उसे कभी नहीं ठुकराऊँगा ;

38) क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, बल्कि जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पूरी करने के लिए स्वर्ग से उतरा हूँ।

39) जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा यह है कि जिन्हें उसने मुझे सौंपा है, मैं उन में से एक का भी सर्वनाश न होने दूँ, बल्कि उन सब को अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँ।

40) मेरे पिता की इच्छा यह है कि जो पुत्र को पहचान कर उस में विश्वास करता है, उसे अनन्द जीवन प्राप्त हो। मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा।"


📚 मनन-चिंतन


स्तेफनुस की पत्थर मार कर हत्या करने की घटना का सामाज के सामाजिक तथा धार्मिक ढांचे पर बडा असर हुआ। येरूसालेम की कलीसिया पर व्यापक तौर पर अत्याचार होने लगा जिसका परिणाम यह हुआ कि ख्रीस्त विश्वास आसपास के इलाकों में बिखर गये। साउल उन लोगों में प्रमुख था जो कलीसिया या ख्राीस्तीय पर अत्याचार कर रहा था। यह वही साउल था जो उन लोगों के कपडें देख रहा था जो स्तेफनुस को पत्थर मार रही थी। ऐसा प्रतीत होता है कि जो उच्चस्तरीय तर्क, प्रज्ञा तथा चमत्कार एवं चिन्ह जो स्तेफनुस ने प्रदर्शित किये उनसे लोगों के हृदयों पर कोई खास असर नहीं पडा। साउल तो इस घटना के बाद और भी अधिक जोश से ख्राीस्तीयों पर अत्याचार कर रहा था।

साउल के हृदय परिवर्तन की घटना बाद में होती है जब वह दमिश्क जा रहा था। यह इस बात को साबित करता है कि मनुष्य या पापी का मन परिवर्तन तर्क, ज्ञान या चमत्कारों से नहीं बल्कि प्रभु की इच्छा से होता है।

इससे यह तात्पर्य नहीं है कि स्तेफनुस का जीवन एवं त्याग व्यर्थ या नाकाफी थे। उनका अपना असर तथा उददेश्य था किन्तु किसी का हृदय केवल ईश्वर के प्रभुत्व में आता है। ऐसा बताया जाता है कि संत मोनिका ने अपने पुत्र अगस्टीन के हृदय परिवर्तन के लिये लगभग 25 साल तक प्रार्थना की किन्तु इसका उस पर कोई प्रभाव पडता नहीं दिख रहा था। किन्तु एक दिन अचानक ईश्वर की दया से अगस्टीन का जीवन प्रभु की ओर अभिमुख हुआ। उनके मन परिवर्तन में उनकी मां मोनिका की प्रार्थनाओं का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण किन्तु अन्त में ईश्वर की इच्छा पर ही परिणाम निर्भर करता हैं।

स्तेफनुस की मृत्यु के उपरांत भीषण अत्याचार के कारण कलीसिया आसपास के इलाकों में बिखर गयी जिससे प्रभु में विश्वास की गवाह चारों ओर फैल गये थे। ईश्वर अपने कार्य करने के लिये रहस्यमय साधनों से चमत्कार करता है। चाहे धर्मी युवा ही मर जाये या विधर्मी दीर्घ आयु प्राप्त करे यह ईश्वर के प्रभुत्व के दायरे में आता है। हमारा मिशन तो यही है कि हम पूरी तंमयता के साथ प्रभु द्वारा सौंपे गये दायित्व को निभा सके तथा परिणााम का जिम्मा ईश्वर पर छोड दे। हम चाहे स्तेफनुस के समान शहादत प्राप्त करे या प्रभु के संक्षरण में जीते रहे पर हम स्तेफनुस के समाने विजेता का मुकुट अवश्य पहने।




📚 REFLECTION


The stoning of Stephen had an immediate andenormousbearing on the social and religious setting of the society. Church in Jerusalem experienced a massive persecution which resulted in the Christians getting scattered in and around the area. Saul was one of prominent names among those who persecuted the church. It was same Saul who was looking after the clothes of those who were stoning Stephen. It appears that superiour logic and wisdom which Stephen displayed, the great wonders and signs he performed did not break through the hardness of their hearts and of Saul in particular. For Saul continued to vigorously persecute the Church.

It was later on when Saul was on the way to Damascus that he encountered the Lord and got converted. It proves that the logic, wisdom and even miracles are not enough to convert sinners. Only God’s might power can do that as happened with Paul.

This does mean that the life and sacrifice of Stephen were inefficient. It had its own impact and purpose but to move the hearts of someone it is only in the mighty domain of God.It is said the St. Monica prayed for more than 25 years for the conversion of her son Augustine but it seemed to have no effect on him. However, one day the Lord in his mercy moved the heart of Augustin he was converted to Jesus and his work.

After Stephen’s death, first the church was scattered through persecution, resulting in a more widespread witness. God works in mysterious ways to perform His wonders! Whether the godly die young by violent deaths, and the wicked live long and prosper, is God’s sovereign business. Our mission is to be faithful to His Great Commission and leave the results to Him. Let us pray and ask God to give us the godly character of Stephen so that we will be courageous witnesses for Jesus Christ. Leave the results to Him. Whether we lose our life as a martyr or whether God protects us, we will, like Stephen, wear the victor’s crown.


✍ -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, - 20 अप्रैल 2021

 

मंगलवार, - 20 अप्रैल 2021

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित . 7:51-8,1a


51) "हठधर्मियो! आप लोग न तो सुनना चाहते हैं और न समझना। आप सदा ही पवित्र आत्मा का विरोध करते हैं, जैसा कि आपके पूर्वज किया करते थे।

52) आपके पूर्वजों ने किस नबी पर अत्याचार नहीं किया? उन्होंने उन लोगों का वध किया, जो धर्मात्मा के आगमन की भविष्यवाणी करते थे।

53) आप लोगों को स्वर्गदूतों के माध्यम से संहिता प्राप्त हुई, किन्तु आपने इसका पालन नहीं किया और अब आप उस धर्मात्मा के विश्वासघाती तथा हत्यारे बन गये हैं।"

54) वे स्तेफ़नुस की बातें सुन कर आगबबूला हो गये और दाँत पीसते रहे।

55) स्तेफ़नुस ने, पवित्र आत्मा से पूर्ण हो कर, स्वर्ग की ओर दृष्टि की और ईश्वर की महिमा को तथा ईश्वर के दाहिने विराजमान ईसा को देखा।

56) वह बोल उठा, "मैं स्वर्ग को खुला और ईश्वर के दाहिने विराजमान मानव पुत्र को देख रहा हूँ"।

57) इस पर उन्होंने ऊँचे स्वर से चिल्ला कर अपने कान बन्द कर लिये। वे सब मिल कर उस पर टूट पड़े

58) और उसे शहर के बाहर निकाल कर उस पर पत्थर मारते रहे। गवाहों ने अपने कपड़े साऊल नामक नवयुवक के पैरों पर रख दिये।

59) जब लोग स्तेफ़नुस पर पत्थर मार रहे थे, तो उसने यह प्रार्थना की, "प्रभु ईसा! मेरी आत्मा को ग्रहण कर!"

60) तब वह घुटने टेक कर ऊँचे स्वर से बोला, "प्रभु! यह पाप इन पर मत लगा!" और यह कह कर उसने प्राण त्याग दिये।

1) साऊल इस हत्या का समर्थन करता था। उसी दिन येरुसालेम में कलीसिया पर घोर अत्याचार प्रारम्भ हुआ।


सुसमाचार : योहन 6:30-35


30) लोगों ने उन से कहा, "आप हमें कौन सा चमत्कार दिखा सकते हैं, जिसे देख कर हम आप में विश्वास करें? आप क्या कर सकते हैं?

31) हमारे पुरखों ने मरुभूमि में मन्ना खाया था, जैसा कि लिखा है- उसने खाने के लिए उन्हें स्वर्ग से रोटी दी।"

32) ईसा ने उत्तर दिया, "मै तुम लोगों से यह कहता हूँ- मूसा ने तुम्हें जो दिया था, वह स्वर्ग की रोटी नहीं थी। मेरा पिता तुम्हें स्वर्ग की सच्ची रोटी देता है।

33) ईश्वर की रोटी तो वह है, जो स्वर्ग से उतर कर संसार को जीवन प्रदान करती है।"

34) लोगों ने ईसा से कहा, "प्रभु! आप हमें सदा वही रोटी दिया करें"।

35) उन्होंने उत्तर दिया, "जीवन की रोटी मैं हूँ। जो मेरे पास आता है, उसे कभी भूख नहीं लगेगी और जो मुझ में विश्वास करता है, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।


📚 मनन-चिंतन


ईश्वर का प्रचार करना निर्दयी तथा कठोर हृदय वाले लोगों के बीच कभी भी आसान काम नहीं रहा। विरोध तथा अत्याचार सुसमाचार की घोषणा का अभिन्न अंग है। प्रवक्ता ग्रंथ चेताते हुये कहता है, ’’पुत्र! यदि तुम प्रभु की सेवा करना चाहते हो, तो विपत्ति का सामना करने को तैयार हो जाओ। तुम्हारा हृदय निष्कपट हो, तुम दृढ़संकल्प बने रहो, विपत्ति के समय तुम्हारा जी नही घबराये। जो कुछ तुम पर बीतेगा, उसे स्वीकार करो तथा दुःख और विपत्ति में धीर बने रहो; क्योंकि अग्नि में स्वर्ण की परख होती है और दीन-हीनता की घरिया में ईश्वर के कृपापात्रों की।’’(प्रवक्ता 2:1,4-5)

स्तेफनुस को यहूदियों के घोर विरोध का सामना करना पडा। उन्होंने न तो स्तेफनुस की बात माना और न ही उन्हें कार्य करने दिया। स्तेफनुस उन्हें ’हठधर्मी कहता है जो पवित्र आत्मा का विरोध करते हैं।’ स्तेफनुस की प्रज्ञा, अनुग्रह, विश्वास, चमत्कारों एवं चिन्हों के बावजूद भी वे उनका निंरतर विरोध करते रहे। यह एक वास्तविकता है जब हम धर्मान्ध एवं कटट्र पंथी लोग से बात करते हैं तो हमारा दमन किया जाता है। स्तेफनुस जो सत्य तथा पश्चाताप का प्रचार कर रहा था उससे विरोधियों में खलबली मच गयी। स्तेफनुस के प्रचार ने उन्हें सच्ची धार्मिकता तथा उनके पापों की पहचान करवायी किन्तु अपने अंहकार के कारण वे केवल विरोध ही करते रहे। जब वह इसमें विफल रहे तो उन्होंने स्तेफनुस पर ही आक्रामण कर दिया। यह विरोधियों का सामान्य तरीका होता है। जब वे किसी को हरा नहीं सकते तो चाहे धुरर्ता से या फिर हिंसा से वे व्यक्ति को दबाने का प्रयत्न करते हैं। स्तेफनुस के विरूद्ध इन्होंने इन दोनों का प्रयोग किया।

स्तेफनुस के मेधावी तथा यशस्वी गवाही का अंत उनकी पत्थरों से मार कर हत्या के रूप में होता है। उन्होंने स्तेफनुस को मार तो दिया किन्तु उनके पवित्र एवं साहसी जीवन का संदेश आज भी हमारे बीच जीवित है।




📚 REFLECTION



Proclaiming God in the midst of hard-hearted people has never been an easy task. Opposition and persecution are the integral parts of the proclamation. Book of Sirach forewarns us, “My child, if you aspire to serve the Lord, prepare yourself for an ordeal… Whatever happens to you, accept it, and in the uncertainties of your humble state, be patient, since gold is tested in the fire, and the chosen in the furnace of humiliation.” (Sirach 2:1,4-5)

Stephen faced rigid resistance from the Jews. They neither accepted his arguments nor his allowed him to have his ways. Stephen called the Jews ‘Stiff-necked people who resisted the Holy Spirit.’ Inspite of the Stephen’s wisdom, grace, faith, miracles and power people remained opposed to him. It is a fact that when we talk to religious blinded and hardened sinners we need to be prepared for opposition. The truth that Stephen preached convicted these men of their sins and threatened their pride so they tried to refute it. when that failed, they attacked the messenger. This is a common ploy of the adversaries.When you can’t defeat the message, go after the messenger, either by deceit or by violence. These men used both against Stephen.

The glorious and sagacious witnessing of Stephen finally culminated in stoning of Stephen. Although he died but not before he had the beatic vision of Jesus sitting at the right hand of the Father. They succeeding in killing Stephen but his life and message lives on even today.


✍ -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन सोमवार, - 19 अप्रैल 2021

 

सोमवार, - 19 अप्रैल 2021

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित . 6:8-15


8) स्तेफनुस अनुग्रह तथा सामर्थ्य से परिपूर्ण हो कर जनता के सामने बहुत-से चमत्मकार तथा चिन्ह दिखाता था।

9) उस समय "दास्यमुक्त" नामक सभागृह के कुछ सदस्य और कुरेने, सिकन्दरिया, किलिकया तथा एशिया के कुछ लोग स्तेफनुस से विवाद करने आये।

10) किन्तु वे स्तेफ़नुस के ज्ञान का सामना करने में असमर्थ थे, क्योंकि वह आत्मा से प्रेरित हो कर बोलता था।

11) तब उन्होंने घूस दे कर कुछ व्यक्तियों से यह झूठी गवाही दिलवायी कि हमने स्तेफनुस को मूसा तथा ईश्वर की निन्दा करते सुना।

12) इस प्रकार जनता, नेताओं तथा शास्त्रियों को भड़काने के बाद वे अचानक स्तेफनुस के पास आ धमके और उसे पकड़ कर महासभा के सामने ले गये।

13) वहाँ उन्होंने झूठे गवाहों को खड़ा किया, जो बोले, "यह व्यक्ति निरन्तर मन्दिर तथा मूसा की निन्दा करता है।

14) हमने इसे यह कहते सुना कि ईसा नाज़री यह स्थान नष्ट करेगा और मूसा के समय से चले आ रहे हमारे रिवाजों को बदल देगा।"

15) महासभा के सब सदस्य स्थिर दृष्टि से स्तेफ़नुस की ओर देख रहे थे। उसका मुखमण्डल उन्हें स्वर्गदूत के जैसा दीख पड़ा।


सुसमाचार : योहन 6:22-29


22) जो लोग समुद्र के उस पास रह गये थे, उन्होंने देखा था कि वहाँ केवल एक ही नाव थी और ईसा अपने शिष्यों के साथ उस नाव पर सवार नहीं हुए थे- उनके शिष्य अकेले ही चले गये थे।

23) दूसरे दिन तिबेरियस से कुछ नावें उस स्थान के समीप आ गयीं, जहाँ ईसा की धन्यवाद की प्रार्थना के बाद लोगों ने रोटी खायी थी।

24) जब उन्होंने देखा कि वहाँ न तो ईसा हैं और न उनके शिष्य ही, तो वे नावों पर सवार हुए और ईसा की खोज में कफरनाहूम चले गये।

25) उन्होंने समुद्र पार किया और ईसा को वहाँ पा कर उन से कहा, "गुरुवर! आप यहाँ कब आये?"

26) ईसा ने उत्तर दिया, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुम चमत्कार देखने के कारण मुझे नहीं खोजते, बल्कि इसलिए कि तुम रोटियाँ खा कर तृप्त हो गये हो।

27) नश्वर भोजन के लिए नहीं, बल्कि उस भोजन के लिए परिश्रम करो, जो अनन्त जीवन तक बना रहता है और जिसे मानव पुत्र तुन्हें देगा ; क्योंकि पिता परमेश्वर ने मानव पुत्र को यह अधिकार दिया है।"

28) लोगों ने उन से कहा, "ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?"

29) ईसा ने उत्तर दिया, "ईश्वर की इच्छा यह है- उसने जिसे भेजा है, उस में विश्वास करो"।


📚 मनन-चिंतन


आज का पहला पाठ स्तेफनुस के धार्मिक व्यक्त्वि के बारे बताता है। स्तेफनुस उन सात धर्म सेवकों में सम्मल्लित था जिन्हें प्रेरितों पर भोजन के वितरण की जिम्मेदारी सौंपी थी। स्तेफनुस एक साहसी विश्वासी थे जिन्होंने येसु के लिये शहादत स्वीकारी तथा आने वाली पीढीयों के लिये इसका एक आदर्श रखा। वे पवित्र आत्मा से पूर्ण थे। उनमें पवित्र आत्मा की प्रज्ञा समायी थी। इनके विरोधी यहूदी लोग संहिता एवं पुरर्खों की पंरपरा में परांगत थे किन्तु स्तेफनुस की प्रज्ञा के सामने वे निरूत्तर रह गये थे। स्तेफनुस प्रभु ईश्वर के बारे में अकाट्य विश्वास के साथ बोल रहे थे। उनका विश्वास इतना दृढ था वे उनके विरोधियों के झूठे आरोपों के सामने भी अविचलित रहे। वे कृपा से पूर्ण थे। इससे यह तात्पर्य है कि उन्हें येसु का व्यक्तिगत अनुभव एवं समझ रही होगी। ईश्वर ने उन्हें असीम कृपा प्रदान की थी।

स्तेफनुस शक्ति और सामर्थ्य से भी पूर्ण थे। ईश्वर ने उन्हें जनता के सामने बहुत चमत्कार और चिन्ह दिखाने का सामर्थ्य प्रदान किया था। लोग उनके व्यक्त्वि एवं कार्यों से विस्मित थे। उनकी इस महानता तथा चमत्कारों के कारण यहूदी भीषण ईर्ष्या से भर गये थे।

इस प्रकार स्तेफनुस के ईश्वरीय गुण जैसे पवित्र आत्मा से परिपूर्णता, प्रज्ञा, विश्वास, अनुग्रह, साहस, शक्ति एवं सामर्थ्य इस बात की निशानी थे कि वे ईश्वर से बडी गहरायी से जुडे थे। स्तेफनुस ने इन सभी ईश्वर वरदानों को प्रभु येसु का साक्ष्य देने में लगाया।

हम में से हरेक बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति पर पवित्र आत्मा की मुहर अंकित है। हमने पवित्र आत्मा के उपहारों को ग्रहण किया है। हमें विवेचना करना चाहिये कि क्या हम इन वरदानों के बारे में जागरूक है या फिर ये वरदान हम में सुप्त अवस्था में है। हमें संत स्तेफनुस के सामन प्रार्थना और विश्वास के जीवन के द्वारा इस बात की खोज करना चाहिये तथा उनके समान इन वरदानों का उपयोग प्रभु के कार्यों में करना चाहिये।




📚 REFLECTION



Today’s first reading presents us the godly personality of Stephen who was one of seven deacons selected by the apostles to oversee the distribution of the food. Stephen was a courageous man who set a trend of martyrdom for the generations to follow. He was the man of full of Holy Spirit. He had the wisdom that the Holy Spirit provides. Those traditional Jews were well versed in their tradition however could not match the wisdom with which Stephen spoke. Stephen spoke with audacious conviction in the sovereign God. His faith was so strong that he remained undeterred by the false and manipulated accusations of the crowd. Stephen was also full of grace. It would mean that he had a personal understanding and experience of Jesus. And God had blessed him with his grace in great measure.

Stephen was also full of power. God gave Stephen the ability to perform “great wonders and signs among the people” (6:8). People were amazed and overwhelmed by Stephen. These works of power had definitely provoked great envy in the traditional Jews who were opposing him.

Thus, Stephen’s inner qualities, being full of the Holy Spirit, wisdom, faith, grace, and power, show his deep-rootedness in God. Stephen made use of these gifts to give powerful witnessing of Jesus whom he had trusted.

Every baptised person has been sealed with the Holy Spirit. We all have received the gifts of the Holy Spirit. Either we are not aware or they are in dormant state we need to discover it with a life of prayer and faith like Stephen and use them for the glory of God.


✍ -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!