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आज का पवित्र वचन बुधवार - 14 अप्रैल 2021

 

बुधवार - 14 अप्रैल 2021

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 5:17-26


17) यह सब देख कर प्रधानयाजक और उसके सब संगी-साथी, अर्थात् सदूकी सम्प्रदाय के सदस्य, ईर्ष्या से जलने लगे।

18) उन्होंने प्रेरितों को गिरफ्तार कर सरकारी बन्दीगृह में डाल दिया।

19) परन्तु ईश्वर के दूत ने रात को बन्दीगृह के द्वार खोल दिये और प्रेरितों को बाहर ले जा कर यह कहा,

20) "जाइए और निडर हो कर मन्दिर में जनता को इस नव-जीवन की पूरी-पूरी शिक्षा सुनाइए"। उन्होंने यह बात मान ली और भोर होते ही वे मन्दिर जा कर शिक्षा देने लगे।

21) जब प्रधानायाजक और उसके संगी-साथी आये, तो उन्होंने महासभा अर्थात् इस्राएली नेताओं की सर्वोच्च परिषद् बुलायी और प्रेरितों को ले आने के लिए प्यादों को बन्दी-गृह भेजा।

22) जब प्यादे वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने प्रेरितों को बन्दीगृह में नहीं पाया। उन्होंने लौट कर यह समाचार दिया,

23) "हमने देखा कि बन्दीगृह बड़ी सावधानी से बन्द किया हुआ है और पहरेदार फाटकों पर तैनात हैं, किन्तु खोलने पर हमें भीतर कोई नहीं मिला।

24) यह सुन कर मन्दिर-आरक्षी के नायक और महायाजक यह नहीं समझ पा रहे थे कि प्रेरितों का क्या हुआ है।

25) इतने में किसी ने आ कर उन्हें यह समाचार दिया, "देखिए, आप लोगों ने जिन व्यक्तियों को बन्दीगृह में डाल दिया, वे मन्दिर में जनता को शिक्षा दे रहे हैं"।

26) इस पर मन्दिर का नायक अपने प्यादों के साथ जा कर प्रेरितों को ले आया। वे प्रेरितो को बलपूर्वक नहीं लाये, क्योंकि वे लोगों से डरते थे कि कहीं हम पर पथराव न करें।


सुसमाचार : योहन 3:16-21


16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।

17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।

18) जो पुत्र में विश्वास करता है, वह दोषी नहीं ठहराया जाता है। जो विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहराया जा चुका है; क्योंकि वह ईश्वर के एकलौते पुत्र के नाम में विश्वास नहीं करता।

19) दण्डाज्ञा का कारण यह है कि ज्योति संसार में आयी है और मनुष्यों ने ज्योति की अपेक्षा अन्धकार को अधिक पसन्द किया, क्योंकि उनके कर्म बुरे थे।

20) जो बुराई करता है, वह ज्योंति से बैर करता है और ज्योति के पास इसलिए नहीं आता कि कहीं उसके कर्म प्रकट न हो जायें।

21) किन्तु जो सत्य पर चलता है, वह ज्योति के पास आता है, जिससे यह प्रकट हो कि उसके कर्म ईश्वर की प्रेरणा से हुए हैं।


📚 मनन-चिंतन


अधिकाश लोग चमत्कार एवं दिव्य उपहारों को खोजते हैं और ऐसा करने में कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन स्वयं से यह सवाल भी पूछना चाहिये कि हम इन्हें क्यों चाहते हैं। यदि इन अभिलाषाओं एवं उपहारों को व्यक्तिगत और सांसारिक लाभ के लिये की जा रही हो तो वे शायद ही हमें मिले। किन्तु यदि वे ईश्वर की महिमा के लिये हो तो ईश्वर लौकिक एवं अलौकिक रूप से अवश्य ही हस्तक्षेप कर सकते हैं। ईश्वर के उपहार समुदाय के कल्याण के लिये होते हैं। ये ईश्वर की शक्ति एवं सामर्थ्य के चिन्ह होते हैं। जब पावन आत्मा के वरदान प्रत्याक्ष रूप में विश्वासियों और गैर-विश्वासियों पर प्रकट होते हैं तो वह लोगों के विश्वास को बढाता तथा ढांढस देता है ईश्वर समीप ही है तथा वह हमारे कल्याण के लिये कार्यरत है। जब ईश्वर अपने प्रेम, शक्ति-सामर्थ्य और प्रज्ञा को विश्वाससियों के द्वारा प्रदर्शित करता है तो गैर-विश्वासी इस चमत्कारों के समक्ष ईश्वर की सत्यता से रूबरू होते हैं। जो लोग ईश्वर प्रद्त्त उपहारों या चमत्कारों को करते हैं, वे लोगों की सेवा एवं कल्याण के लिये, मात्र ईश्वर के उपकरण एवं माध्यम होते हैं। हमें इन चमत्कारों को तुच्छ मानवीय लाभ की दृष्टि या दायरे से नहीं देखना चाहिये।

जब ईर्ष्या की भावना से महायाजक तथा अन्यों ने प्रेरितों का गिरफतार कर जेल में डालवा दिया था तो ईश्वर ने उन्हें आश्चर्यजनक ढंग से मुक्त कर दिया। कारावास के द्वार अपने आप खुल जाते हैं और वे बाहर आ जाते हैं। पहरेदारों ने द्वारों को ताला बंद पाया किन्तु प्रेरित अंदर नहीं थे। ईश्वर ने प्रेरितों को इस अलौकिक रूप इसलिये मुक्त कराया ताकि वे जाकर उन्हीं लोगों के समक्ष गवाही दे सके जिन्होंने उन्हें गिरफतार किया था। इस मुक्तिकार्य से विरोधी अंचभित थे। वे उनके इस प्रकार कारावास से छुटने को लेकर विस्मित थे। वे आश्चर्यचकित तो थे किन्तु इस महान कार्य में ईश्वर का सामर्थ्य पहचानने से इंकार करते हैं। महायाजकों तथा अन्य पुनः उनके विरूद्ध षडयंत्र रचने लगते हैं।

हमें अपने जीवन में तथा योजनाओं में इतना अधिक नहीं डूबना चाहिये कि हम ईश्वर की उपस्थिति को ही न पहचान पाये।




📚 REFLECTION



We seek miracles and divine gifts and we are not wrong in seekingthem in our lives. Sometimes it is good to ask ourselves so as why do we need them. If the gifts or miracles are meant for individual gains or mundane reasons then they may be hard to come by, however, if they are for the glory of God and not for vain human self then God may intervene even in some supernatural and human ways. God’s gifts are meant for the welfare of a larger community. They merely reflect God’s power among men. When the Holy Spirit works in various ways that can be perceived by believers and unbelievers, this encourages people’s faith that God is near and active and that he is working to fulfil his purposes in us and to bring blessings to his people. The unbelievers come face to face with the reality of the living God as He displays His power, His love, and His wisdom through His people.Those who receive God’s gifts are merely instruments of God for others. We must never confuse the gifts with petty selfish motives or gains.

When out of jealously the high priest and others arrested and put the apostles in public prison the Lord rescued them in an astonishing manner. The prison gates were opened and they moved out of the prison. The gourds found the prison securely locked but the apostles had not been there. The Lord did this great thing only to send them back to bear witness to the very people they had been arrested by. This rescue work left the oppositions into in to perplexity. They wonder how could some people be out of the tightly secured prison. They wondered about the incident but refused to believe God’s hand in such an extra-ordinary way. The chief priests and others still refused to believe in the power working in and through the apostles. They again began to plot how to destroy them.

We should not so much engrossed in our thinking and understanding of the events of life that we may fail to see God and his ways.

✍ -Br. Biniush Topno


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मंगलवार - 13 अप्रैल 2021

 

मंगलवार - 13 अप्रैल 2021

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 4:32-37


32) विश्वासियों का समुदाय एक हृदय और एकप्राण था। कोई भी अपनी सम्पत्ति अपनी ही नहीं समझता था। जो कुछ उनके पास था, उस में सबों का साझा था।

33) प्रेरित बड़े सामर्थ्य से प्रभु ईसा के पुनरुत्थान का साक्ष्य देते रहते थे और उन सबों पर बड़ी कृपा बनी रहती थी।

34) उन में कोई कंगाल नहीं था; क्योंकि जिनके पास खेत या मकान थे, वे उन्हें बेच देते और कीमत ला कर

35) प्रेरितों के चरणों में अर्पित करते थे। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार बाँटा जाता था।

36) यूसुफ नामक लेवी-वंशी का जन्म कुप्रुस में हुआ था। प्रेरितों ने उसका उपनाम बरनाबस अर्थात् सान्त्वना-पुत्र रखा था।

37) उसकी एक जमीन थी। उसने उसे बेच दिया और उसकी कीमत ला कर प्रेरितों के चरणों मं अर्पित कर दी।


सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 3:7-15


7) आश्चर्य न कीजिए कि मैंने यह कहा- आप को दुबारा जन्म लेना है।

8) पवन जिधर चाहता, उधर बहता है। आप उसकी आवाज सुनते हैं, किन्तु यह नहीं जानते कि वह किधर से आता और किधर जाता है। जो आत्मा से जन्मा है, वह ऐसा ही है।’’

9) निकोदेमुस ने उन से पूछा, ‘‘यह कैसे हो सकता है?’’

10) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ‘‘आप इस्राएल के गुरु हैं और ये बातें भी नहीं समझते!

11) मैं आप से यह कहता हूँ- हम जो जानते हैं, वही कहते हैं और हमने जो देखा है, उसी का साक्ष्य देते हैं; किन्तु आप लोग हमारा साक्ष्य स्वीकार नहीं करते।

12) मैंने आप को पृथ्वी की बातें बतायीं और आप विश्वास नहीं करते। यदि मैं आप को स्वर्ग की बातें बताऊँ, तो आप कैसे विश्वास करेंगे?

13) मानव पुत्र स्वर्ग से उतरा है। उसके सिवा कोई भी स्वर्ग नहीं पहुँचा।

14) जिस तरह मूसा ने मरुभूमि में साँप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है,

15) जिससे जो उस में विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन प्राप्त करे।’’


📚 मनन-चिंतन


आदिम कलीसिया के चरित्र की मुख्य विशेषता उनका प्रभु के प्रति उत्साह एवं जोश था। उनका उत्साह इतना अधिक था कि वे येसु के लिये कोई भी खतरा उठाने को तैयार थे। हम सब अपने भविष्य के लिये आर्थिक रूप से कुछ न कुछ तैयारी करके रखते हैं ताकि किसी भी परिचित-अपरिचित घटनाक्रम से निपटा जा सके। लेकिन इन विश्वासियों ने प्रभु के प्रति अपने उत्साह के सामने इस पांरपरिक बुद्धिमता को नगण्य माना। एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वे अपनी व्यक्तिगत संपत्ति को भी बेचकर उसका धन प्रेरितों को सौंपा करते थे। उनमें किसी की जरूरत अधूरी नहीं रहती थी। यह कितनी अविस्मणीय तथा मनभावन स्थिति थी।

दुनिया में कई विचारधाराओं ने सामाजिक एवं आर्थिक समानता एवं बराबरी स्थापित करने का प्रयास किया। इनमें मार्क्सवाद, साम्यवाद, समाजवाद आदि प्रमुख है। इन विचारधाराओं ने कुछ समय के लिये सबको चकमित कर रखा था किन्तु समय के साथ-साथ इनकी अप्रसांगिकता एवं खोलखापन भी उजागर हो गया। इनका उददेश्य समानता हासिल करना था जिसमें वे विफल रहे किन्तु आदिम कलीसिया ने तो वह समानता पूर्णरूप तथा स्वेच्छा से कई सौ साल पूर्व प्राप्त कर ली थी। इन विचारधाराओं में ईश्वर की कमी थी। इनके सिद्धांत जल्द ही हाशिये पर पहुॅच गये। किन्तु आदिम कलीसिया के उत्साह की मूल प्रेरणा ईश्वर था जिसने उन्हें दूसरों के कल्याण के लिये बुलाया था।

जब हम अपने आधुनिक समाज या फिर अपने अंदर झांककर टटोले तो पायेंगे कि हम सभी स्वार्थी तथा ज्यादा दुनियावी समझदारी से भरे पडे है। अपनी सम्पति को बचाये रखने के लिये हमारे पास सैकडो कारण है। जबकि दूसरे के लिये हमारी सम्पत्ति का कुछ अंश भी उसकी आवश्यकताओं को पूरी कर सकता है। यदि हम दूसरों की जरूरतों के प्रति उत्साह या संवेदनशीलता नहीं दिखा पाते हैं तो इसकी मुख्य वजह यह है कि हमने येसु को अपनी शक्ति और बुद्धि से प्रेम नहीं किया है। येसु के प्रति हमारे प्रेम में उत्साह एवं जोश की कमी है। आइये हम इन विश्वासियों के समूह से प्रेरणा प्राप्त करे।




📚 REFLECTION



One of the most extra-ordinary characteristics of the early Christian community was their passion and zeal for the Lord. Their passion was so great that they were willing to take any risk in their life. We keep some savings for futureto be prepared to meet the demands of any eventuality. But the believers did not take into account any of those conventional wisdom. For need of the believers’ community they were even selling off their possessions and handing over money to the apostles to meet the needs of the community. There was not a needy person among them. What a marvellous situation it was. All were equal, all share common good and there was an exceptional unity and harmony among them.

Many ideologies have come to forefront to redefine and restructure the economy and social order of the world. The ideologies such as the Marxist, Communists, Socialist etc. had all envisioned what the first Christian community had already achieved. These ideologies mesmerised the world for a while and then eventually were damped into the oblivion. The ideologies tried to achieve it without the love of God. They were devoid of God. On the contrary the believers’ community had nothing but love. They were overflowing with love for the Lord and for one another. It was the love and passion for Jesus that people were happily and willingly parting away from their possessions to meet the needs of the other.

As we look around and even probe into our own hearts, we find ourselves guilty of being selfish and calculative. We often have a reason to hold on to what we have even while it means a world for poor and the needy. If we lack desire and motivation to part away from our possession it is because we have not loved Jesus enough. Our love for Jesus lacks passion and flare. Let us take the inspiration from them and do likewise.

✍ -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन 12 अप्रैल 2021

 

सोमवार - 12 अप्रैल 2021

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 4:23-31



23) रिहा होने के बाद पेत्रुस और योहन अपने लोगों के पास लौटे और महायाजकों तथा नेताओं ने उन से जो कुछ कहा था, वह सब बतलाया।

24) वे उनकी बातें सुन कर एक स्वर से ईश्वर को सम्बोधित करते हुए बोले, ’’प्रभु! तूने स्वर्ग और पृथ्वी बनायी, समुद्र भी, और जो कुछ उन में है।

25) तूने पवित्र आत्मा द्वारा हमारे पिता, अपने सेवक दाऊद के मुख से यह कहाः

26) राष्ट्रों में खलबली क्यों मची हुई? देश-देश के लोग व्यर्थ की बातें क्यों करते हैं? पृथ्वी के राजा विद्रोह करते हैं। वे प्रभु तथा उसके मसीह के विरुद्ध षड्यन्त्र रचते हैं।

27) वास्तव में हेरोद और पिलातुस, गैर-यहूदियों तथा इस्राएल के वंशों ने मिल कर इस शहर में तेरे परमपावन सेवक ईसा के विरुद्ध, जिनका तूने अभिशेक किया, षड्यन्त्र रचा था।

28) उन्होंने इस प्रकार वह सब पूरा किया, जिसे तू, शक्तिशाली विधाता, ने पहले से निर्धारित किया था।

29) प्रभु! तू उनकी धमकियों पर ध्यान दे और अपने सेवकों को यह कृपा प्रदान कर कि वे निर्भीकता से तेरा वचन सुनायें।

30) तू अपना हाथ बढ़ा कर अपने परमपावन सेवक ईसा के नाम पर स्वास्थ्यलाभ, चिन्ह तथा चमत्कार प्रकट होने दे।’’

31) उनकी प्रार्थना समाप्त होने पर वह भवन, जहाँ वे एकत्र थे, हिल गया। सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और निर्भीकता के साथ ईश्वर का वचन सुनाते रहे।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 3:1-8


1) निकोदेमुस नामक फरीसी यहूदियों की महासभा का सदस्य था।

2) वह रात को ईसा के पास आया और बोला, ‘‘रब्बी! हम जानते हैं कि आप ईश्वर की ओर से आये हुए गुरु हैं। आप जो चमत्कार दिखाते हैं, उन्हें कोई तब तक नहीं दिखा सकता, जब तक कि ईश्वर उसके साथ न हो।’’

3) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ‘‘मैं आप से यह कहता हूँ- जब तक कोई दुबारा जन्म न ले, तब तक वह स्वर्ग का राज्य नहीं देख सकता’’।

4) निकोदेमुस ने उन से पूछा, ‘‘मनुष्य कैसे बूढ़ा हो जाने पर दुबारा जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश कर जन्म ले सकता है?’’

5) ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘मैं आप से कहता हूँ- जब तक कोई जल और पवित्र आत्मा से जन्म न ले, तब तक वह ईश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।

6) जो देह से उत्पन्न होता है, वह देह है और जो आत्मा से उत्पन्न होता है, वह आत्मा है।

7) आश्चर्य न कीजिए कि मैंने यह कहा- आप को दुबारा जन्म लेना है।

8) पवन जिधर चाहता, उधर बहता है। आप उसकी आवाज सुनते हैं, किन्तु यह नहीं जानते कि वह किधर से आता और किधर जाता है। जो आत्मा से जन्मा है, वह ऐसा ही है।’’


📚 मनन-चिंतन


निकोदेमुस येसु के पास आता है। यह रोचक बात है क्योंकि निकोदेमुस जैसा प्रतिष्ठित व्यक्ति येसु के पास कुछ सिखने आता है। निकोदेमुस फरीसियों के अभिजात वर्ग से था तथा स्वयं भी अव्वल दर्जे का शिक्षक था। इतनी साख होने के बावजूद भी वह येसु के पास आता है। निकोदेमुस खुद शिक्षक होकर भी येसु को ईश्वर के पास के आये शिक्षक, गुरू कहता है। येसु के महान कार्यों को देखकर वह समझ जाता है कि येसु एक धार्मिक व्यक्ति थे। वह येसु के बारे में पूरी तरह से नहीं जानता था किन्तु वह उनके कार्यों के कारण उनकी ओर खींचा चला आता है।

निकोदेमुस का मनोभाव या रूख हमें उसके ईश्वर के प्रति खुलेपन तथा तत्परता को दर्शाता है। येसु स्वयं यहूदियों से कहते हैं वे उनके कार्यों को देखे और परखे कि वे ईश्वर की सहायता से है या मानवीय स्रोत से, ’’मुझ पर विश्वास नहीं करने पर भी तुम कार्यों पर ही विश्वास करो, जिससे यह जान जाओ और समझ लो कि पिता मुझ में है और मैं पिता में हूं।’’ (योहन 10:38) जब योहन बपतिस्ता यह जानता चाहता था कि क्या येसु ही मसीह है या फिर वे किसी और की प्रतीक्षा करे तब येसु केवल अपने कार्यों का उल्लेख करते हुये कहते हैं, ’’उन्होंने योहन के शिष्यों से कहा, ’जाओ, तुमने जो सुना और देखा है, उसे योहन को बता दो - अंधे देखते हैं, लंगडे चलते हैं, कोढी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है।’’ (लूकस 7:22)

येसु के कार्य स्वर्ग राज्य के आने के चिन्ह थे। हमें कार्यों की गंभीरता को गहराई से समझना तथा उन पर विश्वास करना चाहिये। हमें अपने दैनिक जीवन चर्या के छोट-बडे कार्यों में ईश्वर की उपस्थिती को देखना तथा महसूस कहते हुये विश्वास में गहरा बनाना चाहिये। ईश्वर हमारे जीवन में अपने मुक्ति के कार्यों के द्वारा हमें उनमें विश्वास करने के लिये आमंत्रित करते हैं।




📚 REFLECTION



Nicodemus comes to Jesus. It is quite interesting to know that a person of Nicodemus’s repute came to Jesus to learn something from him. Nicodemus belonged to the elite class of Pharisees,besides, ‘Sanhedrin’ and a high-quality teacher. Yet inspite of all these credentials he came to Jesus. Nicodemus being a teacher calls teacher a teacher but one who came from God. He knows that Jesus is a godly man because of the mighty works Jesus had been performing. He didn’t have the full identity of Jesus but he was drawn towards him by the great works of the Lord.

Nicodemus’ attitude tells us about his openness and willingness to see God in the works of Jesus. Jesus himself tells the Jews to look at his work and judge for themselves whether they are from God or from human source, “But if I do them, even though you do not believe me, believe the works, so that you may know and understand that the Father is in me and I am in the Father.’ (John 10:38) When John the Baptist inquired if Jesus was the Messiah, Jesus merely pointed out the works that he was doing for John to believe, “And he answered them, ‘Go and tell John what you have seen and heard: the blind receive their sight, the lame walk, the lepers are cleansed, the deaf hear, the dead are raised, the poor have good news brought to them.” (Luke 7:22)

Works of Jesus were the signs of the coming of the Kingdom. We need to understand the gravity of the works and believe. Even in our daily life we ought to realise the presence of God by the small and big happenings that take place and come to a greater faith. God through his saving and providential acts in our life invites us to come to faith in him.

✍ -Br. Biniush Topno


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पास्का का दूसरा रविवार - 11 अप्रैल 2021 दिव्य करुणा रविवार

 

पास्का का दूसरा रविवार - 11 अप्रैल 2021

दिव्य करुणा रविवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 4:32-35


32) विश्वासियों का समुदाय एक हृदय और एकप्राण था। कोई भी अपनी सम्पत्ति अपनी ही नहीं समझता था। जो कुछ उनके पास था, उस में सबों का साझा था।

33) प्रेरित बड़े सामर्थ्य से प्रभु ईसा के पुनरुत्थान का साक्ष्य देते रहते थे और उन सबों पर बड़ी कृपा बनी रहती थी।

34) उन में कोई कंगाल नहीं था; क्योंकि जिनके पास खेत या मकान थे, वे उन्हें बेच देते और कीमत ला कर

35) प्रेरितों के चरणों में अर्पित करते थे। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार बाँटा जाता था।


दूसरा पाठ : 1 Jn 5:1-6


1) जो यह विश्वास करता है कि ईसा ही मसीह हैं, वह ईश्वर की सन्तान है और जो जन्मदाता को प्यार करता है, वह उसकी सन्तान को भी प्यार करता है।

2) इसलिए यदि हम ईश्वर को प्यार करते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हमें ईश्वर की सन्तान को भी प्यार करना चाहिए।

3) ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना- यही ईश्वर का प्रेम है। उसकी आज्ञाएं भारी नहीं,

4) क्योंकि ईश्वर की हर सन्तान संसार पर विजयी होती है। वह विजय, जो संसार को पराजित करती है, हमारा विश्वास ही है।

5) संसार का विजयी कौन है? केवल वही, जो यह विश्वास करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं।

6) ईसा मसीह जल और रक्त से आये - न केवल जल से, बल्कि जल और रक्त से। आत्मा इसके विषय में साक्ष्य देता है, क्योंकि आत्मा सत्य है।


सुसमाचार : योहन 20:19-31.


19) उसी दिन, अर्थात सप्ताह के प्रथम दिन, संध्या समय जब शिष्य यहूदियों के भय से द्वार बंद किये एकत्र थे, ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, "तुम्हें शांति मिले!"

20) और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, "तुम्हें शांति मिले!

21) जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ।"

22) इन शब्दों के बाद ईसा ने उन पर फूँक कर कहा, "पवित्र आत्मा को ग्रहण करो!

23) तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे, वे अपने पापों से मुक्त हो जायेंगे और जिन लोगों के पाप क्षमा नहीं करोगे, वे अपने पापों से बँधे रहेंगे।

24) ईसा के आने के समय बारहों में से एक थोमस जो यमल कहलाता था, उनके साथ नहीं था।

25) दूसरे शिष्यों ने उस से कहा, "हमने प्रभु को देखा है"। उसने उत्तर दिया, "जब तक मैं उनके हाथों में कीलों का निशान न देख लूँ, कीलों की जगह पर अपनी उँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा।

26) आठ दिन बाद उनके शिष्य फिर घर के भीतर थे और थोमस उनके साथ था। द्वार बन्द होने पर भी ईसा उनके बीच आ कर खडे हो गये और बोले, "तुम्हें शांति मिले!"

27) तब उन्होने थोमस से कहा, "अपनी उँगली यहाँ रखो। देखो- ये मेरे हाथ हैं। अपना हाथ बढ़ाकर मेरी बगल में डालो और अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो।"

28 थोमस ने उत्तर दिया, "मेरे प्रभु! मेरे ईश्वर!"

29) ईसा ने उस से कहा, "क्या तुम इसलिये विश्वास करते हो कि तुमने मुझे देखा है? धन्य हैं वे जो बिना देखे ही विश्वास करते हैं।"

30) ईसा ने अपने शिष्यों के सामने और बहुत से चमत्कार दिखाये जिनका विवरण इस पुस्तक में नहीं दिया गया है।

31) इनका ही विवरण दिया गया है जिससे तुम विश्वास करो कि ईसा ही मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं और विश्वास करने से उनके नाम द्वारा जीवन प्राप्त करो।


📚 मनन-चिंतन


येसु ने अपने शिष्यों से कहा, ’’शांति तुम्हारे साथ हो; जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं तुम्हें भेजता हूं। येसु अपने पिता की इच्छा पूरी करने, पिता के द्वारा भेजे गये थे। (योहन 4:34; 6:38-39); वे पिता के वचन बताने (योहन 12:49) तथा पिता के कार्य करने भेजे गये थे। (योहन 4:34; 5:36) वे संसार की मुक्ति के लिये भेजे गये थे (योहन 3:37)। योहन 18:37 में वे पिलातुस से कहते हैं, ’’मैं इसलिये जन्मा और इसलिये संसार में आया हूं कि सत्य के विषय में साक्ष्य पेश कर सकूं।’’ वे लोगों को पिता के राज्य में प्रवेश दिलाने आये। जिस प्रकार वे भेजे गये थे उसी प्रकार वे हमें भी भेजते हैं। इसलिये उनका लक्ष्य अब हमारा लक्ष्य बन जाता है।

येसु पिता को प्रकट करने के लिये हमारे बीच आये। आज प्रभु जिन पर अपने को प्रकट करते हैं उनको भेजते भी है। इसलिये संत पौलुस बताते हैं ख्रीस्त विश्वासियों के बीच उपस्थित तथा जीवंत बने रहते हैं। इस प्रकार हम एक दूसरे के लिये ’लघु ख्रीस्त’ बन जाते हैं।

लेकिन अक्सर एवं अधिकांशः हम कलीसिया के रूप में, भले वह चाहे व्यक्तिगतरूप से हो या सामूहिक- अपने को ख्रीस्त भेजे गये लक्ष्य से भटक जाते हैं। हम वर्तमान के सामाजिक तथा राजनैतिक परिवेश जो ख्रीस्तीय के जीवन को मुश्किल बनाता है, की आड में छिपने की कोशिश करते हुये कहते है, अभी समय अनुकूल नहीं है। हम उन सभी सीमिताओं को, जो हम कलीसिया या व्यक्तिगत रूप से महसूस करते हैं को ढाल बनाते हें। कुछ वर्ष पूर्व इग्लैंड के सोहन सिंह जोकि वहॉ किराने की दुकाने चलते थे का रोचक तथा चर्चित किस्सा सामने आया। उन्होंने अपनी दुकान पर उन सारे उपभोक्ताओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी जो ध्रूमपान करते थे या फिर जो अश्लील भाषा बोलते थे या जो शिशुओं को घुमाने लाते थे या जो अभद्र व्यवहार करते थे आदि। इस प्रकार उन्होंने अपने बहुत सारे ग्राहकों को खो दिया था। एक अखबार को दिये साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ’’मेरे सिद्धांतों और निर्णयों के कारण मैंने बहुत ग्राहकों को खो दिया तथा व्यापार में हानि भी उठायी किन्तु मुझे इस पर कोई खेद नहीं हैं।’’ सोहन सिंह के निर्णय पर हम भी सवाल उठा सकते हैं कि यह व्यापार की दृष्टि से सही फैसला नहीं था। किन्तु समाज-सुधार का जो सपना वह संजोय हुये था वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता था।

ऐसा प्रतीत होता है कि सोहन सिंह का फैसला मूर्खतापूर्ण फैसला था। उसने अपनी व्यक्तिगत नैतिक धारणा को अपने व्यापार के साथ मिश्रित किया। किन्तु अपने सिद्धांतों के प्रति उसकी दृढ आस्था शिक्षाप्रद तथा प्रेरणादायक है। उसमें उसके सिद्धांतों के लिये खडे होने का साहस था। वह अपनी दुकान में ग्राहकों को अभद्र व्यवहार करते नहीं देख सकता था इसलिये उसने यह अजीबोगरीब कदम उठाया। उसनेस अपनी इस आप्रासंगिक तथा अलोकप्रिय प्रतीत होती शैली के बावजूद भी अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

कलीसिया भी अपने मूल उददेश्य को पूरा करने के लिये समय तथा परिस्थितियों के बदलने का इंतजार नहीं कर सकती । हमारा मिशन ’दूसरा ख्रीस्त’ बनने का है। हमारा मिशन यही है हम उन सब के पाप माफ करे जिन्होंने हमारे विरूद्ध काम किया हो। हमें ईश्वर के राज्य के लिये कार्य करते हुये ’चंगाई’ प्रदान करने वाले सैनिक बनना चाहिये। लेकिन वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हमारे उत्साह तथा दिलचस्पी में भारी कमी आई है।

हमें अपनी व्यक्तिगत सीमिताओं तथा चुनौतिपूर्ण परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर येसु द्वारा प्रदान मिशन को हर दिन एवं हर पल जीना चाहिये। प्रारंभिक कलीसिया ने बहुत विकट तथा हिंसक परिस्थितियों का सामना किया तथा इसके बावजूद भी वे ख्रीस्त के मिशन को जीने में सफल रहे। हमें भी अपने आईने में झांकना चाहिये तथा पूछना चाहिये कि ख्रीस्त के मिशन को जीने में विफलता के लिये वास्तविक कारण क्या है? हम जानते हैं परिस्थितियों को चुनौती देने से परेशानी तथा अत्याचार का माहौल बनेगा तथा हमारा दमन होगा किन्तु येसु ने हमें भेजते समय यह भी बताया है, ’’देखो, मैं तुम्हें भेडियों के बीच भेडों की तरह भेजता हूं। इसलिये सॉप की तरह चतुर और कपोत की तरह निष्कपट बनों’’ (मत्ती 10:16) हमें भी सॉप के तरह परिस्थितियों का सामना चतुरता के करना तथा कपोत की तरह निष्कपट अंतरतम रखकर अपना कार्य जारी रखना चाहिये।



📚 REFLECTION



Jesus said to his disciples, ‘Peace be with you; as the Father has sent Me, I also send you.” Jesus was sent by the Father to do his will (John 4:34; 6:38-39); to speak the Father’s words (John 12:49); and to perform the Father’s works (John 4:34; 5:36). He was sent to bring salvation to the world (John 3:17). In John 18:37, Jesus told Pilate, “For this I have been born, and for this I have come into the world, to testify to the truth.” He came to establish the Father’s kingdom by bringing people under His lordship to do His will. By sending us in the same way that He was sent, His purpose becomes our purpose.

Jesus came to reveal God to us. Today, those whom Jesus sends reveal Him. In this regard, Paul proclaimed that Christ lives in and through believers. Hence we become “little Christ’ to one another.

But so often the church collectively and we as individuals lose sight of our purpose. We get distracted with other things. We try to hide behind the prevailing social and political circumstances which are making the life of the Christians harder and harder. We try to excuse ourselves by enumerating the limitations we experience as individuals and the as collectively Church. A few years ago, Mr. Sohan Singh, grocery store owner hit the headline in England. He had banned customers from his grocery store in England. He told a London newspaper that he was forced to take such drastic action because of people’s bad manners. First, he banned smoking, then crude language, baby strollers, pets and finally customers themselves. Shoppers now must look through the window to spot items they want and then ring a bell to be served through a small hatch in the door. “I have lost business, but I cannot say how much,” Singh said. “I am a man of principles, and I stand by my decision.” (In Flagstaff Live, June 4-10, 1998.)

It seems that a grocer who bans customers from his store has lost sight of his purpose! If your aim is to sell groceries, then you must put up with some people whom you may dislike in order to achieve your purpose.

Sohan Singh made a foolish decision to mix up his personal moral-ethical principles with public behaviour of the people. However, his audacity and conviction to his principles are overwhelmingly edifying. He had the courage to stand for his principle. He could not sit in his store and let people behave in it as it pleases them. He decided to live by this conviction and principles and of course, paid the price. He lost considerable of it. That’s fine! He was true to his conviction although it appears irrelevant and outdated in the modern world.

Church too cannot wait for the situation to become conducive and tolerable. The mission of every individual is to be another Christ to his fellow man. Mission is to forgive the sins of those who have sinned against you. Mission is to be healing soldier working for ‘His kingdom to come’. Somewhere the zeal and zest for the mission has been smothered under theprevailing unconducive situation.

We got to live day in and day out the mission of Jesus, overcoming the personal barriers and limitation and challenging the circumstances. The early Christians had one of the most hostile situations but nothing prevented them to accept Christ and proclaim it. we ought to look into the mirror and challenge our settled disposition to flow with the current. We know by reversing the trend there will be ripples and disturbance but the Lord had already warned us, “Behold, I am sending you out sheep among the wolves. be wise as serpents and innocent as doves." (Matthew 10:16) We ought to gauge the situation and deal with prudence like serpent and maintain our inner self innocent like that of the dove and march forward to complete for which we have been sent.



मनन- चिं तन


“अविश्वासी नहीं बल्कि विश्वासी बनों।”

प्रभु येसु थॉमस को अपने घावों का स्पर्श करने को कहते हैं तथा इन शब्दों “अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो”, के साथ उससे विश्वासी बनने का आव्हान करते हैं। इस बात का यह तात्पर्य नहीं है कि इससे पहले थॉमस येसु में विश्वास नहीं करता था। वह पहले से विश्वासी था किन्तु उसका विश्वास अपरिपक्व था तथा उसे येसु में संदेह हो गया था। जैसा कि संत याकूब कहते हैं, “क्योंकि जो संदेह करता है, वह समुद्र की लहरों के सदृश है, जो हवा से इधर-उधर उछाली जाती हैं।” (याकूब 1:6) थॉमस का विश्वास येसु के दुःखभोग एवं मृत्यु के कारण विचलित हो गया था। थॉमस जानता था कि येसु एक महान व्यक्ति थे। उसने येसु के साथ रहकर विस्मयकारी चमत्कारों को देखा था। ऐसे महान एवं चमत्कारी पुरूष के इस प्रकार दीन-हीन दशा में मर जाने ने थॉमस के विश्वास के स्तंभों को हिला दिया था। अब फिर से विश्वास करना उन्हें मुश्किल लग रहा था।

विश्वास एक अदभुत वस्तु है। विश्वास के सहारे हम महान एवं अविश्वनीय कार्य पूरे कर सकते हैं। किन्तु यदि हमारे विश्वास में संदेह, दृढ़ता एवं निरंतरता की कमी होती है तो हम ज्यादा आगे नहीं जा सकते। येसु स्वयं कहते हैं, “यदि तुम्हें विश्वास हो और तुम संदेह न करो, ....तुम इस पहाड से यह कहो- उठ, समुद्र में गिर जा’ तो वैसा ही हो जायेगा।” (मत्ती 21:21) अगर विश्वास की कमी को पूरा करना है तो हमें संदेह से ऊपर उठना होगा। संदेह विश्वास के लिए दीमक समान है। संदेह के कारण विश्वास पनप नहीं पाता है इसलिए संदेह पर विजय प्राप्त कर हमें विश्वास की परिपूर्णता तक पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए। येसु थॉमस के संदेह को कैसे दूर करते हैं? थॉमस के संदेह का कारण येसु की मृत्यु थी। क्रूस पर उनकी मृत्यु ने शायद उसके लिए विश्वास के सारे मार्ग अविरूद्ध कर दिये थे। ऐसी मनस्थिति में केवल पुनरूत्थित, पुनर्जीवित येसु ही उसके विश्वास को पुनः स्थापित कर सकते थे। थॉमस के संदेह को दूर करने पुनरूत्थित येसु स्वयं उसके पास आते हैं तथा उसे अपने घावों को स्पर्श करने का निमंत्रण देते हैं। यदि हमारे विश्वास में भी संदेह है तो हमें भी येसु से उस संदेह को दूर करने की प्रार्थना करनी चाहिए।

येसु संत योहन बपतिस्ता को मानवों में सबसे महान कहते हैं, “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई पैदा नहीं हुआ।” (मत्ती 11:11) किन्तु योहन भी येसु को लेकर संशय में पड़ जाते है। इसलिए वे बंदीगृह से अपने शिष्यों को येसु के पास यह पूछने भेजते हैं, “क्या आप वही हैं, जो आने वाले हैं या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?”(मत्ती 11:3) येसु योहन के शिष्यों से अपने कार्यों की चर्चा करते हुए कहते हैं, “जाओ, तुम जो सुनते और देखते हो, उसे योहन को बता दो - अंधे देखते हैं, लँगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुरदे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है,”। येसु वास्तव में नबी इसायाह की प्रतिज्ञात मसीहा के बारे में की गयी भविष्यवाणी (देखिये इसायाह 35:5-6) को योहन के लिए दोहराते है। येसु जानते थे कि धर्मग्रंथ की बात को पूरा होते देख योहन का विश्वास कि येसु ही मसीह है, दृढ़ता प्राप्त करेगा। इसके अंत में येसु जोड देते हैं, “और धन्य है वह, जिसका विश्वास मुझ पर से नहीं उठता!” योहन की मनस्थिति यही बताती है कि किसी को भी संदेह हो सकता है। येसु भी मनुष्य की इस कमी को समझते हैं तथा योहन के शिष्यों के जाने के बाद योहन बपतिस्ता के विश्वास को महान बताते हुये कहते हैं, “योहन वही एलियस है जो आने वाला था।” (मत्ती 11:14) इस प्रकार विश्वास के अभाव को यदि ईश्वर के सामने व्यक्त किया जाये तो ईश्वर इस संशय को दूर कर विश्वास के अभाव को पूर्णता तक पहुँचा देते हैं।

येसु मरथा के विश्वास को भी पूर्णता तक ले जाते हैं। लाजरूस के मरने के बाद भी मरथा ईसा में विश्वास बनाये रखती है तथा कहती है, “प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नही मरता और मैं जानती हूँ कि आप अब भी ईश्वर से जो माँगेंगे, ईश्वर आप को वही प्रदान करेगा। (योहन 11:21-22) येसु मरथा की इस मांग को यह कहकर “क्या मैंने तुम से यह नहीं कहा कि यद तुम विश्वास करोगी, तो ईश्वर की महिमा देखोगी? (योहन 11:40) पूरा करते हैं तथा उनके भाई लाजरूस को पुनर्जीवित करते है। मरथा का विश्वास संसार के अंत में होने वाले पुनरूत्थान में था लेकिन येसु उसे मरथा के लिए यथार्थ की बात बना देते हैं।

हमारा ख्रीस्तीय विश्वास भी संदेह के घेरे में आता जाता रहता है। ऐसी स्थिति में क्या हम निराश होकर प्रार्थना करना छोड देते हैं या फिर थॉमस, योहन बपतिस्ता या फिर मरथा के समान येसु के पास अपने संदेह को लेकर जाते हैं? नबी हबक्कूक कहते हैं, “मैं अपनी चौकी पर खड़ा हो जाऊँगा, मैं चारदीवारी पर चढ कर प्रतीक्षा करता रहूँगा कि प्रभु मुझ से क्या कहेगा और मेरी शिकायतों का क्या उत्तर देगा। प्रभु ने उत्तर में मुझ से यह कहा, “जो दृश्य तुम देखने वाले हो, उसे स्पष्ट रूप से पाटियों पर लिखो, जिससे सब उसे सुगमता से पढ सकें”। ईश्वर हबक्कूक से लिखने को कहते हैं जिससे लोग उसे पढ कर विश्वास कर सके। संत योहन भी सुसमाचार के लिखने का उद्देश्य बताते कि लोग विश्वास में बने रहें, “इनका विवरण दिया गया है, जिससे तुम विश्वास करो...।” आइये हम भी अपने विश्वास को संदेह से दूर रखे तथा संदेह की स्थिति में येसु को जीवन में आमंत्रित करे तथा वचन की सहायता से विश्वास की परिपक्वता तक पहुँच सके।


✍ Br. Biniush Topno

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Praise the Lord!

Daily Mass Readings for Saturday, 10 April 2021

 Daily Mass Readings for Saturday, 10 April 2021




First Reading: Acts 4: 13-21

13 Now seeing the constancy of Peter and of John, understanding that they were illiterate and ignorant men, they wondered; and they knew them that they had been with Jesus.

14 Seeing the man also who had been healed standing with them, they could say nothing against it.

15 But they commanded them to go aside out of the council; and they conferred among themselves,

16 Saying: What shall we do to these men? for indeed a known miracle hath been done by them, to all the inhabitants of Jerusalem: it is manifest, and we cannot deny it.

17 But that it may be no farther spread among the people, let us threaten them that they speak no more in this name to any man.

18 And calling them, they charged them not to speak at all, nor teach in the name of Jesus.

19 But Peter and John answering, said to them: If it be just in the sight of God, to hear you rather than God, judge ye.

20 For we cannot but speak the things which we have seen and heard.

21 But they threatening, sent them away, not finding how they might punish them, because of the people; for all men glorified what had been done, in that which had come to pass.

Responsorial Psalm: Psalms 118: 1 and 14-15ab, 16-18, 19-21

R. (21a) I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

1 Give praise to Lord, for he is good: for his mercy endureth for ever.

14 The Lord is my strength and my praise: and he is become my salvation.

15 The voice of rejoicing and of salvation is in the tabernacles of the just.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

16 The right hand of the Lord hath wrought strength: the right hand of the Lord hath exulted me: the right hand of the Lord hath wrought strength.

17 I shall not die, but live: and shall declare the works of the Lord.

18 The Lord chastising hath chastised me: but he hath not delivered me over to death.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

19 Open ye to me the gates of justice: I will go into them, and give praise to the Lord.

20 This is the gate of the Lord, the just shall enter into it.

21 I will give glory to thee because thou hast heard me: and art become my salvation.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

Alleluia: Psalms 118: 24

R. Alleluia, alleluia.

24 This is the day which the Lord hath made: let us be glad and rejoice therein.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 16: 9-15

9 But he rising early the first day of the week, appeared first to Mary Magdalen, out of whom he had cast seven devils.

10 She went and told them that had been with him, who were mourning and weeping.

11 And they hearing that he was alive, and had been seen by her, did not believe.

12 And after that he appeared in another shape to two of them walking, as they were going into the country.

13 And they going told it to the rest: neither did they believe them.

14 At length he appeared to the eleven as they were at table: and he upbraided them with their incredulity and hardness of heart, because they did not believe them who had seen him after he was risen again.

15 And he said to them: Go ye into the whole world, and preach the gospel to every creature.


10 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - शनिवार

 

10 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - शनिवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 4:13-21


13) पेत्रुस और योहन का आत्मविश्वास देखकर और इन्हें अशिक्षित तथा अज्ञानी जान कर, महासभा के सदस्य अचम्भे में पड़ गये। फिर, वे पहचान गये कि ये ईसा के साथ रह चुके हैं,

14) किन्तु स्वस्थ किये गये मनुष्य को इनके साथ खड़ा देखकर, वे उत्तर में कुछ नहीं बोल सके।

15) उन्होंने पेत्रुस और योहन को सभा से बाहर जाने का आदेश दिया और यह कहते हुए आपस में परामर्श किया,

16) ’’हम इन लोगों के साथ क्या करें? येरुसालेम में रहने वाले सभी लोगों को यह मालूम हो गया कि इन्होंने एक अपूर्व चमत्कार दिखाया है। हम यह अस्वीकार नहीं कर सकते।

17) फिर भी जनता में इसका और अधिक प्रचार न हो, इसलिए हम इन्हें कड़ी चेतावनी दें कि अब से ईसा के नाम पर किसी से कुछ नहीं कहोगे।’’

18) उन्होंने पेत्रुस तथा योहन को फिर बुला भेजा और उन्हें आदेश दिया कि वे न तो जनता को सम्बोधित करें और न ईसा का नाम ले कर शिक्षा दें।

19) इस पर पेत्रुस और योहन ने उन्हें यह उत्तर दिया, ’’आप लोग स्वयं निर्णय करें-क्या ईश्वर की दृष्टि में यह उचित होगा कि हम ईश्वर की नहीं, बल्कि आप लोगों की बात मानें?

20) क्योंकि हमने जो देखा और सुना है, उसके विषय में नहीं बोलना हमारे लिए सम्भव नहीं।’’

21) इस पर उन्होंने पेत्रुस और योहन को फिर धमकाने के बाद जाने दिया। वे नहीं समझ पा रहे थे कि उन्हें किस प्रकार दण्ड दिया जाये, क्योंकि उस घटना के कारण सारी जनता ईश्वर की स्तुति करती थी।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 16:9-15


9) ईसा सप्ताह के प्रथम दिन प्रातः जी उठे। वे पहले मरियम मगदलेना को, जिस से उन्होंने सात अपदूतों को निकाला था, दिखाई दिये।

10) उसने जा कर उनके शोक मनाते और विलाप करते हुए अनुयायियों को यह समाचार सुनाया।

11) किन्तु जब उन्होंने यह सुना कि ईसा जीवित हैं और उसने उन्हें देखा है, तो उन्हें इस पर विश्वास नहीं हुआ।

12) इसके बाद ईसा दूसरे वेश में उन में दो को दिखाई दिये, जो पैदल देहात जा रहे थे।

13) उन्होंने लौट कर शेष शिष्यों को यह समाचार सुनाया, किन्तु शिष्यों को उन दोनों पर भी विश्वास नहीं हुआ।

14) बाद में ईसा ग्यारहों को उनके भोजन करते समय दिखाई दिये और उन्होंने उनके अविश्वास और उनकी हठधर्मी की निन्दा की; क्योंकि उन्होंने उन लागों पर विश्वास नहीं किया था, जिन्होंने ईसा को पुनर्जीवित देखा था।

15) इसके बाद ईसा ने उन से कहा, ’’संसार के कोने-कोने में जाकर सारी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओ।


📚 मनन-चिंतन


साहस प्रेरितों तथा आदिम कलीसिया की पहचान थी। वे पुनरूत्थित येसु और उनके द्वारा मुक्ति में पूर्णत विश्वास करते थे। उनका यह नवीन विश्वास उनमें उत्साह का संचार करता था तथा वे विश्वास में बने रहने के लिये अपना सबकुछ दांव पर लगा देते थे। वे जानते थे येसु में लाभ जीवन की सारी हानियों से श्रेष्ठ था। उनका साहस इतना विस्मय था कि ये अपने आप में उनके विश्वास की गवाही बन गया था। अत्याचार के दौरान उनके साहस ने अनेकों को विश्वास ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया।

अशिक्षित प्रेरित पेत्रुस और योहन का साहस एवं दृढता देखकर शासक एवं शास्त्री भी अंचभित थे। वे महसूस करते तथा जानते थे कि उनके साहस का कारण येसु के साथ उनकी मित्रता थी। शासकों तथा धर्माधिकारियों के पास ताकत तथा अधिकार था कि वे पेत्रुस और योहन को कोई भी यंत्रणा दे सकते थे किन्तु वे उनकी दृढता तथा विश्वास उनसे दूर नहीं कर सकते थे। योहन और पेत्रुस का साहस ईश्वर का वरदान था। शासकों को निराश होकर उन्हें छोड देना पडा।

जब हम दबाव एवं डर की परिस्थितियों से गुजरते हैं तो हम क्या करते हैं? क्या हम मौन होकर समर्पण कर देते हैं? या तनाव एवं दबाव हमें तोड देता? यदि ऐसा है तो हमें पेत्रुस और योहन तथा प्रेरित-चरित में उल्लेखित विश्वास के नायकों की ओर देखना चाहिये कि किस प्रकार इस विषम परिस्थितियों में और अधिक साहस एवं दृढता के लिये प्रार्थना करते हैं, ’’प्रभु! तू उनकी धमकियों पर ध्यान दे और अपने सेवकों को यह कृपा प्रदान कर कि वे निर्भीकता से तेरा वचन सुनाये।.......उनकी प्रार्थना समाप्त होने पर वह भवज जहॉ वे एकत्र थे, हिल गया। सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और निर्भीकता के साथ ईश्वर का वचन सुनाते रहे।’’ (प्रेरित-चरित 4:29, 31) इस प्रकार की प्रार्थनाओं द्वारा उन्होंने विरोधियों तथा दबाव का सामना किया। ईश्वर ने साहस, सामर्थ्य का आत्मा प्रदान किया जिससे प्रभु का मिशन निरंतर आगे बढता गया। तिमथी को लिखते समय संत पौलुस हमें स्मरण दिलाते हैं, ’’ईश्वर ने हमें भीरुता का नहीं, बल्कि सामर्थ्य, प्रेम तथा आत्मसंयम का मनोभाव प्रदान किया।’’ (2 तिमथी 1:7) आइये हम भी प्रार्थना करे कि ईश्वर हमें साहस का आत्मा प्रदान करे।




📚 REFLECTION



Boldness had been the earmark of the apostles and early Christian community. They had been deeply convinced of the risen Lord and salvation in him. their enthusiasm led them to risk anything for the sake of their newly imbibed faith. For they knew that no loss is a real loss in the comparison with the gain in Jesus. Their boldness was so astonishing that it itself became an edifying witness. In the face of persecution their boldness brought many people to faith.

Seeing the boldness of the uneducated Peter and John the rulers, elders and the scribes were clueless. They also realized that their boldness was the result of their association with Jesus. They had the power to inflict anything on them but they couldn’t take away their boldness and conviction in Jesus. For the boldness of Peter and John was the gift from God. In their frustration they had to let them go.

Whenever we are faced with fear and pressure what we do? Do we go silent and become submissive? Or the pressure and tension break us down? If this is the case with us then look at Peter and John and heroes of Acts of the apostles how they even prayer for boldness and courage to overcome fear, “When they had prayed, the place in which they were gathered together was shaken; and they were all filled with the Holy Spirit and spoke the word of God with boldness. (Acts 4:29-31) that is how they handled the opposition and their own fear. God granted them the spirit of power so that they may carry out His mission without inhibition. St. Paul reminds us through Timothy that, “For God did not give us a spirit of cowardice, but rather a spirit of power and of love and of self-discipline.” (2 Timothy 1:7)

Let pray to the Father to send the Spirit of boldness.


✍ -Br. Biniush Topno


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