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इतवार, 22 अक्टूबर, 2023 वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

 इतवार, 22 अक्टूबर, 2023

वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह



📒 पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ 45:1, 4-6

1) प्रभु ने अपने अभिषिक्त सीरुस का दाहिना हाथ सँभाला है। उसने राष्ट्रों को सीरुस के अधीन कर दिया और राजाओं के शस्त्र ले लिये। प्रभु ने उसके लिए फाटकों को तोड़ दिया। अब उसके सामने कोई भी द्वार बन्द नहीं रहा। प्रभु उसी सीरुस से यह कहता है-

4) मैंने अपने सेवक याकूब तथा अपने कृपापात्र इस्राएल के कारण तुम को नाम ले कर बुलाया और महान् बना दिया है, यद्यपि तुम मुझे नहीं जानते।

5) मैं ही प्रभु हूँ, कोई दूसरा नहीं है; मेरे सिवा कोई अन्य ईश्वर नहीं। यद्यपि तुम मुझे नहीं जानते, तो भी मैंने तुम्हें शस्त्र प्रदान किये,

6) जिससे पूर्व से पश्चिम तक सभी लोग यह जान जायें कि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं। मैं ही प्रभु हूँ, कोई दूसरा नहीं।


📕 दूसरा पाठ: थेसलनीकियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 1:1-5b

1) पिता-परमेश्वर और प्रभु ईसा मसीह पर आधारित थेसलनीकियों की कलीसिया के नाम पौलुस, सिल्वानुस और तिमथी का पत्र। आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति!

2 (2-3) जब-जब हम आप लोगों को अपनी प्रार्थनाओं में याद करते हैं, तो हम हमेशा आप सब के कारण ईश्वर को धन्यवाद देते है। आपका सक्रिय विश्वास, प्रेम से प्रेरित आपका परिश्रम तथा हमारे प्रभु ईसा मसीह पर आपका अटल भरोसा- यह सब हम अपने ईश्वर और पिता के सामने निरन्तर स्मरण करते हैं।

4) भाइयो! ईश्वर आप को प्यार करता है। हम जानते हैं कि ईश्वर ने आप को चुना है,

5) क्योंकि हमने निरे शब्दों द्वारा नहीं, बल्कि सामर्थ्य, पवित्र आत्मा तथा दृढ़ विश्वास के साथ आप लोगों के बीच सुसमाचार का प्रचार किया। आप लोग जानते हैं कि आपके कल्याण के लिए हमारा आचरण आपके यहाँ कैसा था।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:15-21

15) उस समय फरीसियों ने जा कर आपस में परामर्श किया कि हम किस प्रकार ईसा को उनकी अपनी बात के फन्दे में फँसायें।

16) इन्होंने ईसा के पास हेरोदियों के साथ अपने शिष्यों को यह प्रश्न पूछने भेजा, ’’गुरुवर! हम यह जानते हैं कि आप सत्य बोलते हैं और सच्चाई से ईश्वर के मार्ग कि शिक्षा देते हैं। आप को किसी की परवाह नहीं। आप मुँह-देखी बात नहीं करते।

17) इसलिए हमें बताइए, आपका क्या विचार है- कैसर को कर देना उचित है या नहीं’’

18) उनकी धूर्त्तता भाँप कर ईसा ने कहा, ’’ढ़ोगियों! मेरी परीक्षा क्यों लेते हो?

19) कर का सिक्का मुझे दिखलाओ।’’ जब उन्होंने एक दीनार प्रस्तुत किया,

20) तो ईसा ने उन से कहा, ’’यह किसका चेहरा और किसका लेख है?’’

21) उन्होंने उत्तर दिया, ’’कैसर का’’। इस पर ईसा ने उन से कहा, ’’तो, जो कैसर का है, उसे कैसर को दो और जो ईश्वर का है, उसे ईश्वर को’’।


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इतवार, 24 सितंबर, 2023 वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह


इतवार, 24 सितंबर, 2023

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह


📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 55:6-9

6) “जब तक प्रभु मिल सकता है, तब तक उसके पास चली जा। जब तक वह निकट है, तब तक उसकी दुहाई देती रह।

7) पापी अपना मार्ग छोड़ दे और दुष्ट अपने बुरे विचार त्याग दे। वह प्रभु के पास लौट आये और वह उस पर दया करेगा; क्योंकि हमारा ईश्वर दयासागर है।

8) प्रभु यह कहता है- तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं।

9) जिस तरह आकश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।

दूसरा पाठ : फ़िलिप्पियों के नाम पत्र 1:20c,24,27a

20) मसीह मुझ में महिमान्वित होंगे।

24) किन्तु शरीर में मेरा विद्यमान रहना आप लोगों के लिए अधिक हितकर है।

27) आप लोग एक बात का ध्यान रखें- आपका आचरण मसीह के सुसमाचार के योग्य हो।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 20: 1-16a

1) ’’स्वर्ग का राज्य उस भूमिधर के सदृश है, जो अपनी दाखबारी में मज़दूरों को लगाने के लिए बहुत सबेरे घर से निकला।

2) उसने मज़दूरों के साथ एक दीनार का रोज़ाना तय किया और उन्हें अपनी दाखबारी भेजा।

3) लगभग पहले पहर वह बाहर निकला और उसने दूसरों को चैक में बेकार खड़ा देख कर

4) कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ, मैं तुम्हें उचित मज़दूरी दे दूँगा’ और वे वहाँ गये।

5) लगभग दूसरे और तीसरे पहर भी उसने बाहर निकल कर ऐसा ही किया।

6) वह एक घण्टा दिन रहे फिर बाहर निकला और वहाँ दूसरों को खड़ा देख कर उन से बोला, ’तुम लोग यहाँ दिन भर क्यों बेकार खड़े हो’

7) उन्होंने उत्तर दिया, ’इसलिए कि किसी ने हमें मज़दूरी में नहीं लगाया’ उसने उन से कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ।

8) ’’सन्ध्या होने पर दाखबारी के मालिक ने अपने कारिन्दों से कहा, ’मज़दूरों को बुलाओ। बाद में आने वालों से ले कर पहले आने वालों तक, सब को मज़दूरी दे दो’।

9) जब वे मज़दूर आये, जो एक घण्टा दिन रहे काम पर लगाये गये थे, तो उन्हें एक एक दीनार मिला।

10) जब पहले मज़दूर आये, तो वे समझ रहे थे कि हमें अधिक मिलेगा; लेकिन उन्हें भी एक-एक दीनार ही मिला।

11) उसे पाकर वे यह कहते हुए भूमिधर के विरुद्ध भुनभुनाते थे,

12) इन पिछले मज़दूरों ने केवल घण्टे भर काम किया। तब भी आपने इन्हें हमारे बराबर बना दिया, जो दिन भर कठोर परिश्रम करते और धूप सहते रहे।’

13) उसने उन में से एक को यह कहते हुए उत्तर दिया, ’भई! मैं तुम्हारे साथ अन्याय नहीं कर रहा हूँ। क्या तुमने मेरे साथ एक दीनार नहीं तय किया था?

14) अपनी मजदूरी लो और जाओ। मैं इस पिछले मजदूर को भी तुम्हारे जितना देना चाहता हूँ।

15) क्या मैं अपनी इच्छा के अनुसार अपनी सम्पत्ति का उपयोग नहीं कर सकता? तुम मेरी उदारता पर क्यों जलते हो?

16) इस प्रकार जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे।’’

📚 मनन-चिंतन

दाखबारी में मजदूरों का दृष्टान्त मुख्यतः ईश्वर की उदारता पर प्रकाश डालता है। ईश्वर न्यायी और दयालु है। ईश्वर का न्याय दयालु न्याय है। प्रभु ईश्वर किसी को उसके न्यायसंगत हक से वंचित नहीं करते हैं। यही उनके न्याय का प्रमाण है। परन्तु अपनी दया से, वे बहुतों को उनके वास्तविक योग्यता से कहीं अधिक देते हैं। दृष्टान्त में, हम देखते हैं कि स्वामी किसी के साथ अन्याय नहीं करता। पहले से काम करने वाले सामान्य दैनिक वेतन के लिए सहमत हो गए थे। यहाँ दो बातें स्पष्ट हैं। ज़मींदार ने किसी भी मज़दूर के साथ बहस कर उसे सामान्य दैनिक मज़दूरी से कम मज़दूरी पर काम करने के लिए मजबूर नहीं किया। दूसरी बात यह है कि जो सब से पहले आये थे, वे मजदूर सामान्य दिहाड़ी पर काम करने को राजी हो गए थे। उस समय उन्होंने अधिक वेतन की मांग नहीं की थी। जिस पर सहमति बनी थी और जो सामान्य था, उन्हें दे दिया गया है। इसलिए उनके साथ कोई अन्याय नहीं हुआ है। यह सच है कि अन्य मजदूरों पर स्वामी ने दया दिखाई। उस स्वामी की तरह प्रभु ईश्वर हमारे साथ ऐसे ही करते हैं। वे किसी के साथ अन्याय नहीं करते हैं; लेकिन किसी-किसी पर दया तो अवश्य दिखाते हैं। इब्रानियों के नाम पत्र में हम पढ़ते हैं, “ईश्वर अन्याय नहीं करता। आप लोगों ने उसके प्रेम से प्रेरित हो कर जो कष्ट उठाया, सन्तों की सेवा की और अब भी कर रहे हैं, ईश्वर वह सब नहीं भुला सकता।" (इब्रानियों 6:10)। विधि-विवरण 32:4 कहता है, "ईश्वर सत्यप्रतिज्ञ है, उसमें अन्याय नहीं, वह न्यायी और निष्कपट है।" शोकगीत 3:22-23 में हम पढ़ते हैं, “प्रभु की कृपा बनी हुई है, उसकी अनुकम्पा समाप्त नहीं हुई है - वह हर सबेरे नयी हो जाती है। उसकी सत्यप्रतिज्ञता अपूर्व है”। संत पेत्रुस कहते हैं, “धन्य है ईश्वर, हमारे प्रभु ईसा मसीह का पिता! मृतकों में से ईसा मसीह के पुनरुत्थान द्वारा उसने अपनी महती दया से हमें जीवन्त आशा से परिपूर्ण नवजीवन प्रदान किया।” (1 पेत्रुस 1:3) हम अपनी ईर्ष्या में, कभी-कभी उन लोगों से ईर्ष्या करते हैं जो हम से अधिक ईश्वर की दया का अनुभव करते हैं। आइए हम उन अवसरों के लिए प्रभु की क्षमा की याचना करें।

 - Br. Biniush Topno


📚 REFLECTION

The parable of the labourers in the vineyard is primarily about the generosity of God. God is just and merciful. God’s justice is merciful justice. God does not deny anyone what he deserves. That is the proof of his justice. But in his mercy, he gives to many much more than what they actually deserve. In the parable, we see that the master is not unjust to anyone. Those who worked from the first had agreed for the usual daily wage. Two things are clear. The landowner did not argue with the labourers to force them to work for a wage less than the usual daily wage. Secondly, when they were hired, the labourers who came first had agreed to work for the usual daily wage. They did not demand a higher wage. What was agree upon and what was usual is given to them. Hence, there is no injustice done to them. To all other labourers the landowner showed different degrees of mercy. In the Letter to the Hebrews we read, “For God is not unjust; he will not overlook your work and the love that you showed for his sake in serving the saints, as you still do” (Heb 6:10). Deut 32:4 says, “A faithful God, without deceit, just and upright is he”. In Lam 3:22-23 we read, “The steadfast love of the Lord never ceases, his mercies never come to an end; they are new every morning; great is your faithfulness”. St. Peter says, “Blessed be the God and Father of our Lord Jesus Christ! By his great mercy he has given us a new birth into a living hope through the resurrection of Jesus Christ from the dead” (1 Pet 1:3). We in our jealousy, are sometimes envious of those who experience greater mercy of God.

 -Br. Biniush Topno



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रविवार, 27अगस्त, 2023 वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह

 *✞ CATHOLIC BIBLE MINISTRY ✞*

*रविवार, 27अगस्त, 2023*



*वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह*

*पहला पाठ*
इसायाह 22:19-23

19) मैं तुम को तुम्हारे पद से हटाऊँगा, मैं तुम को तुम्हारे स्थान से निकालूँगा।

20) “मैं उस दिन हिज़कीया के पुत्र एलियाकीम को बुलाऊँगा।

21) मैं उसे तुम्हारा परिधान और तुम्हारा कमरबन्द पहनाऊँगा। मैं उसे तुम्हारा अधिकार प्रदान करूँगा। वह येरुसालेम के निवासियों का तथा यूदा के घराने का पिता हो जायेगा।

22) मैं दाऊद के घराने की कुंजी उसके कन्धे पर रख दूँगा। यदि वह खोलेगा, तो कोई बन्द नहीं कर सकेगा। यदि वह बन्द करेगा, तो कोई नहीं खोल सकेगा।

23) मैं उसे खूँटे की तरह एक ठोस जगह पर गाड़ दूँगा। वह अपने पिता के घर के लिए एक महिमामय सिंहासन बन जायेगा।
_______________________________
*दूसरा पाठ*
रोमियों 11:33-36

33) कितना अगाध है ईश्वर का वैभव, प्रज्ञा और ज्ञान! कितने दुर्बोध हैं उसके निर्णय! कितने रहस्यमय हैं उसके मार्ग!

34) प्रभु का मन कौन जान सका? उसका परामर्शदाता कौन हुआ?

35) किसने ईश्वर को कभी कुछ दिया है जो वह बदले में कुछ पाने का दावा कर सके?

36) ईश्वर सब कुछ का मूल कारण, प्रेरणा-स्रोत तथा लक्ष्य है - उसी को अनन्त काल तक महिमा! आमेन!
_______________________________
*सुसमाचार*
सन्त मत्ती 16:13-20

13) ईसा ने कैसरिया फि़लिपी प्रदेश पहुँच कर अपने शिष्यों से पूछा, ’’मानव पुत्र कौन है, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?’’

14) उन्होंने उत्तर दिया, ’’कुछ लोग कहते हैं- योहन बपतिस्ता; कुछ कहते हैं- एलियस; और कुछ लोग कहते हैं- येरेमियस अथवा नबियों में से कोई’’।

15) ईस पर ईसा ने कहा, ’’और तुम क्सा कहते हो कि मैं कौन हूँ?

16) सिमोन पुत्रुस ने उत्तर दिया, ’’आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं’’।

17) इस पर ईसा ने उस से कहा, ’’सिमोन, योनस के पुत्र, तुम धन्य हो, क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गिक पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है।

18) मैं तुम से कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात् चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा और अधोलोक के फाटक इसके सामने टिक नहीं पायेंगे।

19) मैं तुम्हें स्वर्गराज्य की कुंजिया प्रदान करूँगा। तुम पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।’’

20) इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि तुम लोग किसी को भी यह नहीं बताओ कि मैं मसीह हूँ।
_______________________________
*मनन-चिंतन*
येसु हमारे लिए कौन है? यह प्रश्न हम सभी के लिए एक व्यक्तिगत प्रश्न है। येसु के बारे में हमने कई लोगों से सुना होगा- हमारे माता पिता से, पुरोहित-धर्मबहनों से, केटिकिसम शिक्षक से या किसी और से परंतु हमारे लिए वास्तव में येसु कौन है? इसका उत्तर केवल हमारा प्रभु के साथ व्यक्तिगत अनुभव ही दे पायेगा। और यह उत्तर और उस उत्तर की वास्तविकता ही हमें येसु के करीब आने और उसकी आराधना करने के लिए प्रेरित करेगी। आज हम सब के लिए विशेष रूप से सभी ख्रीस्तीयों के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि वास्तव में येसु मेरे लिए कौन है?
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*रविवार, 27अगस्त, 2023*

*वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह*

*पहला पाठ*
इसायाह 22:19-23

19) मैं तुम को तुम्हारे पद से हटाऊँगा, मैं तुम को तुम्हारे स्थान से निकालूँगा।

20) “मैं उस दिन हिज़कीया के पुत्र एलियाकीम को बुलाऊँगा।

21) मैं उसे तुम्हारा परिधान और तुम्हारा कमरबन्द पहनाऊँगा। मैं उसे तुम्हारा अधिकार प्रदान करूँगा। वह येरुसालेम के निवासियों का तथा यूदा के घराने का पिता हो जायेगा।

22) मैं दाऊद के घराने की कुंजी उसके कन्धे पर रख दूँगा। यदि वह खोलेगा, तो कोई बन्द नहीं कर सकेगा। यदि वह बन्द करेगा, तो कोई नहीं खोल सकेगा।

23) मैं उसे खूँटे की तरह एक ठोस जगह पर गाड़ दूँगा। वह अपने पिता के घर के लिए एक महिमामय सिंहासन बन जायेगा।
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*दूसरा पाठ*
रोमियों 11:33-36

33) कितना अगाध है ईश्वर का वैभव, प्रज्ञा और ज्ञान! कितने दुर्बोध हैं उसके निर्णय! कितने रहस्यमय हैं उसके मार्ग!

34) प्रभु का मन कौन जान सका? उसका परामर्शदाता कौन हुआ?

35) किसने ईश्वर को कभी कुछ दिया है जो वह बदले में कुछ पाने का दावा कर सके?

36) ईश्वर सब कुछ का मूल कारण, प्रेरणा-स्रोत तथा लक्ष्य है - उसी को अनन्त काल तक महिमा! आमेन!
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*सुसमाचार*
सन्त मत्ती 16:13-20

13) ईसा ने कैसरिया फि़लिपी प्रदेश पहुँच कर अपने शिष्यों से पूछा, ’’मानव पुत्र कौन है, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?’’

14) उन्होंने उत्तर दिया, ’’कुछ लोग कहते हैं- योहन बपतिस्ता; कुछ कहते हैं- एलियस; और कुछ लोग कहते हैं- येरेमियस अथवा नबियों में से कोई’’।

15) ईस पर ईसा ने कहा, ’’और तुम क्सा कहते हो कि मैं कौन हूँ?

16) सिमोन पुत्रुस ने उत्तर दिया, ’’आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं’’।

17) इस पर ईसा ने उस से कहा, ’’सिमोन, योनस के पुत्र, तुम धन्य हो, क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गिक पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है।

18) मैं तुम से कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात् चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा और अधोलोक के फाटक इसके सामने टिक नहीं पायेंगे।

19) मैं तुम्हें स्वर्गराज्य की कुंजिया प्रदान करूँगा। तुम पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।’’

20) इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि तुम लोग किसी को भी यह नहीं बताओ कि मैं मसीह हूँ।
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रविवार, 20 अगस्त, 2023 वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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*रविवार, 20 अगस्त, 2023*

*वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह*

*पहला पाठ*
इसायाह 56:1. 6-7

1) प्रभु यह कहता है- “न्याय बनाये रखो- और धर्म का पालन करो; क्योंकि मेरी मुक्ति निकट है और मेरी न्यायप्रियता शीघ्र ही प्रकट हो जायेगी।

6) “जो विदेशी प्रभु के अनुयायी बन गये हैं, जिससे वे उसकी सेवा करें, वे उसका नाम लेते रहें और उसके भक्त बन जायें और वे सब, जो विश्राम-दिवस मनाते हैं और उसे अपवत्रि नहीं करते-

7) मैं उन लोगों को अपने पवत्रि पर्वत तक ले जाऊँगा। मैं उन्हें अपने प्रार्थनागृह में आनन्द प्रदान करूँगा। मैं अपनी बेदी पर उनके होम और बलिदान स्वीकार करूँगा; क्योंकि मेरा घर सब राष्ट्रों का प्रार्थनागृह कहलायेगा।“
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*दूसरा पाठ*
रोमियों 11:13-15.29-32

13) मैं आप गैर-यहूदियों से यह कहता हूँ- ’मैं तो गैर-यहूदियों में प्रचार करने भेजा गया और इस धर्मसेवा पर गर्व भी करता हूँ।

14) किन्तु मैं अपने रक्त-भाइयों में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करने की और इस प्रकार उन में कुछ लोगों का उद्धार करने की आशा भी रखता हूँ;

15) क्योंकि यदि उनके परित्याग के फलस्वरूप ईश्वर के साथ संसार का मेल हो गया है, तो उनके अंगीकार का परिणाम मृतकों में से पुनरूत्थान होगा।

29) क्योंकि ईश्वर न तो अपने वरदान वापस लेता और न अपना बुलावा रद्द करता है।

30) जिस तरह आप लोग पहले ईश्वर की अवज्ञा करते थे और अब, जब कि वे अवज्ञा करते हैं, आप ईश्वर के कृपापात्र बन गये हैं,

31) उसी तरह अब, जब कि आप ईश्वर के कृपापात्र बन गये हैं, वे ईश्वर की अवज्ञा करते हैं, किन्तु बाद में वे भी दया प्राप्त करेंगे।

32) ईश्वर ने सबों को अवज्ञा के पाप में फंसने दिया, क्योंकि वह सबों पर दया दिखाना चाहता था।
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*सुसमाचार*
सन्त मत्ती 15:21-28

21) ईसा ने वहाँ से बिदा होकर तीरूस और सिदोन प्रान्तों के लिए प्रस्थान किया।

22) उस प्रदेश की एक कनानी स्त्री आयी और पुकार-पुकार कर कहती रही, ’’प्रभु दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए। मेरी बेटी एक अपदूत द्वारा बुरी तरह सतायी जा रही है।’’

23) ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया। उनके शिष्यों ने पास आ कर उनसे यह निवेदन किया, ’’उसकी बात मानकर उसे विदा कर दीजिए, क्योंकि वह हमारे पीछे-पीछे चिल्लाती आ रही है’’।

24) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं केवल इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास भेजा गया हूँ।

25) इतने में उस स्त्री ने आ कर ईसा को दण्डवत् किया और कहा, ’’प्रभु! मेरी सहायता कीजिए’’।

26) ईसा ने उत्तर दिया, ’’बच्चों की रोटी ले कर पिल्लों के सामने डालना ठीक नहीं है’’।

27) उसने कहा, ’’जी हाँ, प्रभु! फिर भी स्वामी की मेज़ से गिरा हुआ चूर पिल्ले खाते ही हैं’’।

28) इस पर ईसा ने उत्तर दिया ’’नारी! तुम्हारा विश्वास महान् है। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।’’ और उसी क्षण उसकी बेटी अच्छी हो गयी।
_______________________________

*मनन-चिंतन*
विश्वास हमारे सारी बाधाओं और बंधनों को तोड़ देता है। विश्वास के सामने न तो कोई सीमा है, न जाति है न रंग-रूप न धर्म। चाहे हम ख्रीस्तीय हो या अख्रीस्तीय, चाहे हम इस्राएली हो या गैर इस्राएली, चाहे हम गरीब हो या अमीर, चाहे हम किसी भी देश या जाति के हो, यदि हममें ईश्वर के प्रति विश्वास है तो वह विश्वास हमारे जीवन में परिवर्तन और चमत्कार लायेगा। जिंदगी भले ही हमारे विश्वास का इम्तेहान ले परंतु येसु कभी भी हमारा पक्षपात नहीं करेंगे क्योंकि ईश्वर रंग रूप नहीं परंतु सच्चे विश्वासियों का ह्दय देखता है।



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रविवार, 13 अगस्त, 2023 वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

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*रविवार, 13 अगस्त, 2023*

*वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह*



*पहला पाठ*
राजाओं का पहला ग्रन्थ 19:9a.11-13a

9) एलियाह होरेब पर्वत के पास पहुँचा और एक गुफा के अन्दर चल कर उसने वहाँ रात बितायी।

11) प्रभु ने उस से कहा, ‘‘निकल आओ, और पर्वत पर प्रभु के सामने उपस्थित हो जाओ“। तब प्रभु उसके सामने से हो कर आगे बढ़ा। प्रभु के आगे-आगे एक प्रचण्ड आँधी चली- पहाड़ फट गये और चट्टानें टूट गयीं, किन्तु प्रभु आँधी में नहीं था। आँधी के बाद भूकम्प हुआ, किन्तु प्रभु भूकम्प में नहीं था।

12) भूकम्प के बाद अग्नि दिखई पड़ी, किन्तु प्रभु अग्नि में नहीं था। अग्नि के बाद मन्द समीर की सरसराहट सुनाई पड़ी।

13) एलियाह ने यह सुनकर अपना मुँह चादर से ढक लिया और वह बाहर निकल कर गुफा के द्वार पर खड़ा हो गया।

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*दूसरा पाठ*
रोमियों 9: 1-5

1) मैं मसीह के नाम पर सच कहता हूँ और मेरा अन्तःकरण पवित्र आत्मा से प्रेरित हो कर मुझे विश्वास दिलाता है कि मैं झूठ नहीं बोलता-

2) मेरे हृदय में बड़ी उदासी तथा निरन्तर दुःख होता है।

3) मैं अपने रक्त-सम्बन्धी भाइयों के कल्याण के लिए मसीह से वंचित हो जाने के लिए तैयार हूँ।

4) वे इस्राएली हैं। ईश्वर ने उन्हें गोद लिया था। उन्हें ईश्वर के सान्निध्य की महिमा, विधान, संहिता, उपासना तथा प्रतिज्ञाएं मिली है।

5) कुलपति उन्हीं के हैं और मसीह उन्हीं में उत्पन्न हुए हैं। मसीह सर्वश्रेष्ठ हैं तथा युगयुगों तक परमधन्य ईश्वर हैं। आमेन।

___________________________________
*सुसमाचार*
मत्ती 14:22-33

22) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा करदेंगे।

23) ईसा लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढे़। सन्ध्या होने पर वे वहाँ अकेले थे।

24) नाव उस समय तट से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।

25) रात के चैथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।

26) जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते हुए देखा, तो वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, ’’यह कोई प्रेत है‘‘, डर के मारे चिल्ला उठे।

27) ईसा ने तुरन्त उन से कहा, ’’ढारस रखो; मैं ही हूँ। डरो मत।‘‘

28) पेत्रुस ने उत्तर दिया, ’’प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की अज्ञा दीजिए‘‘।

29) ईसा ने कहा, ’’आ जाओ‘‘। पेत्रुस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा;

30) किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, ’’प्रभु! मुझे बचाइए’’।

31) ईसा ने तुरन्त हाथ बढ़ा कर उसे थाम लिया और कहा, ’’अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?’’

32) वे नाव पर चढे और वायु थम गयी।

33) जो नाव में थे, उन्होंने यह कहते हुए ईसा को दण्डवत् किया ’’आप सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं’’।


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*मनन-चिंतन*
प्रभु येसु का जीवन एक प्रार्थनामय जीवन था। भले ही वे दिन भर में कितने ही व्यस्त क्यो न थे वे प्रार्थना करने के लिए समय निकाल ही लेते थे। अक्सर प्रभु येसु देर रात तक या बहुत सवेरे पिता ईश्वर से एकांत में प्रार्थना करते थे। प्रार्थना करना अर्थात् पिता ईश्वर से वार्तालाप के जरिये सम्बन्ध स्थापित करना है। प्रभु येसु को ईश्वर की ईच्छाओं को जानने और उसको पूर्ण करने का सामर्थ्य प्रार्थना के समय प्राप्त होता था। प्रभु येसु का यह पहलू हम सभी को एक प्रार्थनामय इंसान बनने और ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करने में मदद करें।


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Praise the Lord!

जुलाई 23, 2023, रविवार वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

 जुलाई 23, 2023, रविवार


वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार




📒 पहला पाठ : प्रज्ञा-ग्रन्थ 12:13,16-19

13) तुझे छोड़ कर और कोई ईश्वर नहीं। तू ही समस्त सृष्टि की रक्षा करता है। यह आवश्यक नहीं कि तू किसी को इसका प्रमाण दे कि तेरे निर्णय सही है।

16) तेरा न्याय तेरे सामर्थ्य पर आधारित है। तू सब का स्वामी है और इसलिए सब पर दया करता है।

17) तू तभी अपना सामर्थ्य प्रकट करता है, जब तेरी सर्वशक्तिमत्ता पर सन्देह किया जाता है। तू उसी को दण्ड देता है, जो तेरी प्रभुता जान कर तुझे चुनौती देता है।

18) तू शक्तिशाली होते हुए भी उदारतापूर्वक न्याय करता और बड़ी कृपालुता से हम पर शासन करता है, क्योंकि तू इच्छानुसार अपना सामर्थ्य दिखा सकता है।

19) इस प्रकार तूने अपनी प्रजा को यह शिक्षा दी कि धर्मी को अपने भाइयों के प्रति सहृदय होना चाहिए और तूने अपने पुत्रों को यह भरोसा दिलाया कि पाप के बाद तू उन्हें पश्चात्ताप का अवसर देगा।

📒 दूसरा पाठ : रोमियों 8:26-27

26) आत्मा भी हमारी दुर्बलता में हमारी सहायता करता है। हम यह नहीं जानते कि हमें कैसे प्रार्थना करनी चाहिए, किन्तु हमारी अस्पष्ट आहों द्वारा आत्मा स्वयं हमारे लिए विनती करता है।

27) ईश्वर हमारे हृदय का रहस्य जानता है। वह समझाता है कि आत्मा क्या कहता है, क्योंकि आत्मा ईश्वर के इच्छानुसार सन्तों के लिए विनती करता है।

📒 सुसमाचार : मत्ती 13:24-43

24) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के सदृश है, जिसने अपने खेत में अच्छा बीज बोया था।

25) परन्तु जब लोग सो रहे थे, तो उसका बैरी आया और गेहूँ में जंगली बीज बो कर चला गया।

26) जब अंकुर फूटा और बालें लगीं, तब जंगली बीज भी दिखाई पड़ा।

27) इस पर नौकरों ने आकर स्वामी से कहा, ’मालिक, क्या आपने अपने खेत में अच्छा बीज नहीं बोया था? उस में जंगली बीज कहाँ से आ पड़ा?

28) स्वामी ने उस से कहा, ’यह किसी बैरी का काम है’। तब नौकरों ने उससे पूछा, ’क्या आप चाहते हैं कि हम जाकर जंगली बीज बटोर लें’?

29) स्वामी ने उत्तर दिया, ’नहीं, कहीं ऐसा न हो कि जंगली बीज बटोरते समय तुम गेहूँ भी उखाड़ डालो। कटनी तक दोनों को साथ-साथ बढ़ने दो।

30) कटनी के समय मैं लुनने वालों से कहूँगा- पहले जंगली बीज बटोर लो और जलाने के लिए उनके गटठे बाँधो। तब गेहूँ मेरे बखार में जमा करो।’’

31) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, ’’स्वर्ग का राज्य राई के दाने के सदृश है, जिसे ले कर किसी मनुष्य ने अपने खेत में बोया।

32) वह तो सब बीजों से छोटा है, परन्तु बढ़ कर सब पोधों से बड़ा हो जाता है और ऐसा पेड़ बनता है कि आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करते हैं।’’

33) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया,’’स्वर्ग का राज्य उस ख़मीर के सदृश है, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया’’।

34) ईसा दृष्टान्तों में ही ये सब बातें लोगों को समझाते थे। वह बिना दृष्टान्त के उन से कुछ नहीं कहते थे,

35) जिससे नबी का यह कथन पूरा हो जाये- मैं दृष्टान्तों में बोलूँगा। पृथ्वी के आरम्भ से जो गुप्त रहा, उसे मैं प्रकट करूँगा।

36) ईसा लोगों को विदा कर घर लौटे। उनके शिष्यों ने उनके पास आ कर कहा, ’’खेत में जंगली बीज का दृष्टान्त हमें समझा दीजिए’’।

37) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’अच्छा बीज बोने बाला मानव पुत्र हैं;

38) खेत संसार है; अच्छा बीज राज्य की प्रजा है; जंगली बीज दृष्ट आत्मा की प्रजा है;

39) बोने बाला बैरी शैतान है; कटनी संसार का अंत है; लुनने वाले स्वर्गदूत हैं।

40) जिस तरह लोग जंगली बीज बटोर कर आग में जला देते हैं, वैसा ही संसार के अंत में होगा।

41) मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा और वे उसके राज्य क़़ी सब बाधाओं और कुकर्मियों को बटोर कर आग के कुण्ड में झोंक देंगें।

42) वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

43) तब धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की तरह चमकेंगे। जिसके कान हों, वह सुन ले।

📚 मनन-चिंतन - 1

आज का सुसमाचार एक भले मनुष्य और उसके दुश्मन के बारे में एक दृष्टान्त प्रस्तुत करता है। भला मनुष्य अपने खेत में अच्छा बीज बोता है। लेकिन दुश्मन उस भले व्यक्ति के खेत में गेहूं के बीच जंगली बीज बो कर चला जाता है। दुश्मन यह गुप्त रूप से करता है जब हर कोई सोता है। खेत भले आदमी का है और इसलिए दुश्मन एक अतिचार है। यह साफ है कि उसकी नीयत बुरी है क्योंकि वह जंगली बीज बोता है। उसका मकसद उस भले आदमी को नुकसान पहुँचाना है। लेकिन वह भला आदमी तुरन्त मुँहतोड़ जवाब नही देता है और जल्दीबाजी में कुछ नहीं करता है, लेकिन फसल के तैयार होने के समय तक धैर्य रखता है। फसल के काटने के दौरान, वह स्पष्ट रूप से बुराई को नष्ट करने का दृढ़संकल्प करता है।

जब प्रभु येसु अपने चेलों को अकेले में समझाते हैं तो वे स्पष्ट करते हैं कि वे ही वह भला आदमी हैं और दुश्मन शैतान है। यह संसार ईश्वर का खेत है। जब हम सो रहे होते, यानि निष्क्रिय होते हैं तब शैतान दुनिया में बुराई बो देता है। यदि हम जागते, सतर्क रहेंगे तो शैतान ऐसा नहीं कर सकेगा।

स्वतंत्रता ईश्वर का एक महान उपहार है। यह गरिमा की निशानी है। हम किसी का गुलाम बनना पसंद नहीं करते। पाप की संभावना स्वतंत्रता का हिस्सा है। फिर भी पाप नहीं करना वास्तविक स्वतंत्रता का प्रमाण है। स्वतंत्रता की कीमत है जिम्मेदारी। अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार होने के बिना स्वतंत्रता का आनंद लेना एक खतरनाक प्रवृत्ति है। ऐसे मामले का अंत एक त्रासदी होगी। सच्ची स्वतंत्रता जागरूकता और सतर्कता लाने और बुराई के खिलाफ लड़ाई में तत्पर रहने की जिम्मेदारी लाती है।

संत पेत्रुस कहते हैं, "आप संयम रखें और जागते रहें! आपका शत्रु, शैतान, दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचरता है और ढूँढ़ता रहता है कि किसे फाड़ खाये। आप विश्वास में दृढ़ हो कर उसका सामना करें। आप जानते हैं कि संसार भर में आपके भाई भी इस प्रकार के दुःख भोग रहे हैं।” (1पेत्रुस 5: 8-9)



📚 REFLECTION

Today’s Gospel passage speaks about a man and his enemy. The man is evidently good as he sows good seed in his field. The enemy is evidently bad as he sows weeds among the wheat in the good man’s field. The enemy does this secretly when everybody is asleep. The field belongs to the good man and so the enemy is a trespasser. His evil intention is clear as he sows weeds which are intended to bring harm to the good man. The good man does not suddenly get worked up and react in a hurry, but is patient until the time of harvest. At the harvest, he is determined to destroy the evil.

When Jesus explains the parable privately to his disciples he clarifies that the Son of man is the good man and the enemy is the devil. This world is the field of God. When we are asleep the devil sows evil in the world. If we are awake and alert the devil cannot do it.

Freedom is a great gift of God. It is a sign of dignity. We do not like to be enslaved. Possibility of sin is part of freedom. Yet not sinning is the proof of real freedom in practice. Freedom comes with the price-tag of responsibility. Wanting to enjoy freedom without being responsible for our actions is a dangerous tendency. The end in such a case will be a disaster. True freedom brings responsibility to be aware and alert and to be prompt in fighting against evil.

St. Peter says, “Discipline yourselves, keep alert. Like a roaring lion your adversary the devil prowls around, looking for someone to devour. Resist him, steadfast in your faith, for you know that your brothers and sisters in all the world are undergoing the same kinds of suffering.” (1Pet 5:8-9)


मनन-चिंतन -2

स्तोत्र 130 में स्तोत्रकार प्रश्न करते हैं, “प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा?” कोई भी ईश्वर के सामने धर्मी होने का दावा नहीं कर सकता है। सूक्ति 30:12 कहता है, “कुछ लोग अपने को शुद्ध समझते, किन्तु उनका दूषण नहीं धुला है”। संत योहन कहते हैं, “यदि हम कहते हैं कि हम निष्पाप हैं, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं और हम में सत्य नहीं है। यदि हम अपने पाप स्वीकार करते हैं, तो वह हमारे पाप क्षमा करेगा और हमें हर अधर्म से शुद्ध करेगा; क्योंकि वह विश्वसनीय तथा सत्यप्रतिज्ञ है। यदि हम कहते हैं कि हमने पाप नहीं किया है, तो हम उसे झूठा सिद्ध करते हैं और उसका सत्य हम में नहीं है। (1 योहन 1:8-10) इसलिए संत पौलुस कहते हैं, “सबों ने पाप किया और सब ईश्वर की महिमा से वंचित किये गये” (रोमियों 3:23)। अगर प्रभु हमारे साथ न्याय करेंगे तो हम में से कोई नहीं बच सकता। ईश्वर की करुणा ही हमको बचाती है।

जंगली बीज के दृष्टान्त द्वारा प्रभु हम को यह सिखाना चाहते हैं कि ईश्वर अत्यधिक सहनशील है। वे तुरन्त ही कुकर्मियों का विनाश नहीं करते हैं, बल्कि उनको सहनशीलता दिखाते हैं। वे उनके मनपरिवर्तन के लिए समय देते हैं। मालिक गेहूँ और जंगली बीज – दोनों को कटनी के समय तक एक साथ बढ़ने देता है।

स्तोत्र 94:3-7 में स्तोत्रकार प्रभु से प्रश्न करते हैं, “प्रभु! दुर्जन कब तक, दुर्जन कब तक आनन्द मनायेंगे? वे धृष्टतापूर्ण बातें करते हैं। वे सब कुकर्मी डींग मारते हैं। प्रभु! वे तेरी प्रजा को पीसते और तेरी विरासत पर अत्याचार करते हैं। वे विधवाओं तथा परदेशियों की हत्या और अनाथों का वध करते हैं। वे कहते हैं: ‘‘प्रभु नहीं देखता, याकूब का ईश्वर उस पर ध्यान नहीं देता’’।” स्तोत्रकार प्रभु ईश्वर की सहनशीलता पर आश्चर्यचकित है। स्तोत्रकार को मालूम है कि प्रभु ईश्वर कुकर्मि को मनफिराव के लिए समय दे रहे हैं और एक दिन वह समय खत्म हो जायेगा और अगर उस समय से पहले वह पश्चात्ताप नहीं करेगा तो ईश्वर उसका विनाश करेगा। इसलिए वे कहते हैं, “मेरा ईश्वर मेरे आश्रय की चट्टान है। वह उन से उनके अधर्म का बदला चुकायेगा। वह उनकी दुष्टता द्वारा उनका विनाश करेगा। हमारा प्रभु-ईश्वर उनका विनाश करेगा।“ (स्त्तोत्र 94:22-24)

प्रभु येसु यह जानते थे कि उनका शिष्य यूदस उन्हें पकडवा देगा, फिर भी उन्होंने उसके पैर धोये और उसे मित्र कह कर संबोधित किया। यूदस के सुनने में यह कह कर कि आप में से एक मुझे पकडवा देगा येसु उसे फिर से अपने इरादे पर पुन: सोचने तथा निर्णय बदलने का अवसर दे रहे थे।

ईश्वर करुणामय है, इसलिए वे कुकर्मि को समय देते हैं। परन्तु जो कुकर्मी पश्चात्ताप नहीं करता उसे ईश्वर के न्याय का सामना करना पडेगा।

लूकस 13:6-9 में प्रभु दाखबारी में लगे हुए अंजीर के पेड का दृष्टान्त सुनाते हैं। मालिक तीन वर्षों से उस पेड में फल खोजने आया, परन्तु उसे एक भी नहीं मिला। इसलिए मालिक ने उसे काट डालना चाहा। परन्तु माली ने कहा, “मालिक! इस वर्ष भी इसे रहने दीजिए। मैं इसके चारों ओर खोद कर खाद दूँगा। यदि यह अगले वर्ष फल दे, तो अच्छा, नहीं तो इसे काट डालिएगा’।’’ प्रभु इश्वर हमें समय दे कर यह उम्मीद रखते हैं कि हम अपने जीवन में सुधार लायें।



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जून 25, 2023, इतवार बारहवाँ समान्य इतवार

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*जून 25, 2023, इतवार*

*बारहवाँ समान्य इतवार*



*पहला पाठ*
यिरमियाह 20:10-13

10) मैंने बहुतों को यह फुसफुसाते हुए सुना है- “चारों ओर आतंक फैला हुआ हैं। उस पर अभियोग लगाओ! हम उस पर अभियोग लगायें“। जो पहले मेरे मित्र थे, वे सब इस ताक में रहते हैं कि मैं कोई ग़लती कर बैठूँ और कहते हैं, “वह शायद भटक जायेगा और हम उस पर हावी हो कर उस से बदला लेंगे''।

11) परन्तु प्रभु एक पराक्रमी शूरवीर की तरह मेरे साथ हैं। मेरे विरोधी ठोकर खा कर गिर जायेंगे। वे मुझ पर हावी नहीं हो पायेंगे और अपनी हार का कटु अनुभव करेंगे। उनका अपयश सदा बना रहेगा।

12) विश्वमण्डल के प्रभु! तू धर्मी की परीक्षा करता और मन तथा हृदय की थाह लेता है। मैं अपने को तुझ पर छोड़ता हूँ। मैं दूखूँगा कि तू उन लोगों से क्या बदला लेता है।

13) प्रभु का गीत गाओ! प्रभु की स्तुति करो! क्योंकि वह दरिद्रों के प्राणों को दुष्टों के हाथ से छुडाता है।
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*दूसरा पाठ*
रोमियों 5:12-15

12) एक ही मनुष्य द्वारा संसार में पाप का प्रवेश हुआ और पाप द्वारा मृत्यु का। इस प्रकार मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गयी, क्योंकि सब पापी है।

13) मूसा की संहिता से पहले संसार में पाप था, किन्तु संहिता के अभाव में पाप का लेखा नहीं रखा जाता हैं।

14) फिर भी आदम से ले कर मूसा तक मृत्यु उन लोगों पर भी राज्य करती रही, जिन्होंने आदम की तरह किसी आज्ञा के उल्लंघन द्वारा पाप नहीं किया था। आदम आने वाले मुक्तिदाता का प्रतीक था।

15) फिर भी आदम के अपराध तथा ईश्वर के वरदान में कोई तुलना नहीं हैं। यह सच है कि एक ही मनुष्य के अपराध के कारण बहुत-से लोग मर गये; किंतु इस परिणाम से कहीं अधिक महान् है ईश्वर का अनुग्रह और वह वरदान, जो एक ही मनुष्य-ईसा मसीह-द्वारा सबों को मिला है।
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*सुसमाचार*
मत्ती 10:26-33

26) "इसलिए उन से नहीं डरो। ऐसा कुछ भी गुप्त नहीं है, जो प्रकाश में नहीं लाया जायेगा और ऐसा कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, जो प्रकट नहीं किया जायेगा।

27) मैं जो तुम से अंधेरे में कहता हूँ, उसे तुम उजाले में सुनाओ। जो तुम्हें फुस-फुसाहटों में कहा जाता है, उसे तुम पुकार-पुकार कर कह दो।

28) उन से नहीं डरो, जो शरीर को मार डालते हैं, किन्तु आत्मा को नहीं मार सकते, बल्कि उससे डरो, जो शरीर और आत्मा दोनों का नरक में सर्वनाश कर सकता है।

29) "क्या एक पैसे में दो गौरैयाँ नहीं बिकतीं? फिर भी तुम्हारे पिता के अनजाने में उन में से एक भी धरती पर नहीं गिरती।

30) हाँ, तुम्हारे सिर का बाल-बाल गिना हुआ है।

31) इसलिए नहीं डरो। तुम बहुतेरी गौरैयों से बढ़ कर हो।

32) "जो मुझे मनुष्यों के सामने स्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गिक पिता के सामने स्वीकार करूँगा।

33) जो मुझे मनुष्यों के सामने अस्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गिक पिता के सामने अस्वीकार करूँगा।
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🔴*मनन-चिंतन*
मनुष्य होने के नाते, हामारी कई भय और चिंताएँ हैं। वास्तव में, हमारे भय ईश्वर में हमारी आस्था के विपरीत अनुपात में हैं। मेरी चिंताओं की सूची की लंबाई से पता चलेगा कि मेरा विश्वास कितना गहरा है। आज का सुसमाचार इसी सन्देश पर जोर देता है जो पवित्र बाइबिल में बार-बार दिया जाता है - डरो मत। सुक्ति ग्रन्थ हमें प्रभु ईश्वर पर श्रध्दा के बारे में विस्तार से बताता है। सुक्ति ग्रन्थ 9:10 में प्रभु का वचन कहता है, "प्रज्ञा का मूल स्रोत प्रभु पर श्रद्धा है"। सुक्ति ग्रन्थ 8:13 में, प्रभु पर श्रध्दा को बुराई से घृणा करने के बराबर बताया गया है। सुक्ति ग्रन्थ 14:27 में वचन कहता है, "प्रभु पर श्रद्धा जीवन का स्रोत है और मृत्यु के फन्दों से बचाती है"। बाइबिल स्पष्ट रूप से हमें ईश्वर पर श्रद्धा रखने और उनके अधीन रहने को कहती है; जो ईश्वर पर श्रध्दा रखता है, उसे किसी और से डरने की जरूरत नहीं है। ईश्वर पर श्रध्दा एक श्रद्धेय भय है जो हमें ईश्वर की बात सुनने और उनकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए प्रेरित करता है। इसायाह 66:2 में, प्रभु कहते हैं, "मैं उन लोगों पर कृपादृष्टि करता हूँ, जो विनम्र और पश्चातापी हैं, जो श्रद्धा से मेरी वाणी सुनते हैं"। जब हम फ्रभु के साथ होते हैं, तो डरने कि कोई ज़रूरत नहीं होती। बाइबिल बार-बार लोगों से नहीं डरने का आह्वान करती है। इसायाह 41:9-10 में प्रभु कहते हैं, “मैं तुम को पृथ्वी के सीमान्तों से लाया, मैंने तुम को दूर-दूर के क्षेत्रों से बुलाया। मैंने कहा, ’तुम मेरे सेवक हो’। मैंने तुम को चुना और नहीं त्यागा। डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ। चिन्ता मत करो, मैं तुम्हारा ईश्वर हूँ। मैं तुम्हें शक्ति प्रदान कर तुम्हारी सहायता करूँगा, मैं अपने विजयी दाहिने हाथ से तुम्हें सँभालूँगा।”L


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