मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Duliajan, Assam, India
Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

संत थॉमस, पर्व 03 जुलाई 2022 इतवार

 

03 जुलाई 2022, इतवार

संत थॉमस, भारत के प्रेरित - पर्व



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 10:24-35


24) दूसरे दिन वह उनके साथ चल दिया और योप्पे के कुछ भाई भी उनके साथ हो लिये। वह अगले दिन कैसरिया पहुँचा। करनेलियुुस अपने संबंधियों और घनिष्ठ मित्रों को बुला कर उन लोगों की प्रतीक्षा कर रहा था।

25) जब पेत्रुस उनके यहाँ आया, तो करनेलियुस उस से मिला और उसने पेत्रुस के चरणों पर गिर कर उसे प्रणाम किया।

26) किंतु पेत्रुस ने उसे यह कहते हुए उठाया, ’’खड़े हो जाइए, मैं भी तो मनुष्य हूँ’’

27) और उसके साथ बातचीत करते हुए घर में प्रवेश किया। वहाँ बहुत-से लोगों को एकत्र देखकर

28) पेत्रुस ने उन से यह कहा, ’’आप जानते है कि गैर-यहूदी से संपर्क रखना या उसके घर में प्रवेश करना यहूदी के लिए सख्त मना है; किंतु ईश्वर ने मुझ पर यह प्रकट किया हैं कि किसी भी मनुष्य को अशुद्ध अथवा अपवित्र नहीं कहना चाहिए।

29) इसलिए आपके बुलाने पर मैं बेखटके यहाँ आया हूँ। अब मैं पूछना चाहता हूँ कि आपने मुझे क्यों बुलाया?’’

30) करनेलियुस ने उत्तर दिया, ’’चार दिन पहले इसी समय मैं अपने घर में सन्ध्या की प्रार्थना कर रहा था कि उजले वस्त्र पहने एक पुरुष मेरे सामने आ खड़ा हुआ।

31) उसने यह कहा, ’करनेलियुस! आपकी प्रार्थनाएँ सुनी गयी हैं और ईश्वर ने आपके भिक्षा-दानों को याद किया।

32) आप आदमियों को योप्पे भेजिए और सिमोन को, जो पेत्रुस कहलाते हैं, बुलाइए। वह चर्मकार सिमोन के यहाँ, समुद्र के किनारे, ठहरे हुए हैं।

33) मैंने आप को तुरंत बुला भेजा और आपने पधारने की कृपा की हैं। ईश्वर ने आप को जो-जो आदेश दिये हैं, उन्हें सुनने के लिए हम सब यहाँ आपके सामने उपस्थित हैं।’’

34) पेत्रुस ने कहा, ’’मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

35) मनुष्य किसी भी राष्ट्र का क्यों न हो, यदि वह ईश्वर पर श्रद्धा रख कर धर्माचरण करता है, तो वह ईश्वर का कृपापात्र बन जाता हैं।



दूसरा पाठ: पेत्रुस का पहला पत्र 1:3-9



3) धन्य है ईश्वर, हमारे प्रभु ईसा मसीह का पिता! मृतकों में से ईसा मसीह के पुनरुत्थान द्वारा उसने अपनी महती दया से हमें जीवन्त आशा से परिपूर्ण नवजीवन प्रदान किया।

4) आप लोगों के लिए जो विरासत स्वर्ग में रखी हुई है, वह अक्षय, अदूषित तथा अविनाशी है।

5) आपके विश्वास के कारण ईश्वर का सामर्थ्य आप को उस मुक्ति के लिए सुरक्षित रखता है, जो अभी से प्रस्तुत है और समय के अन्त में प्रकट होने वाली है।

6) यह आप लोगों के लिए बड़े आनन्द का विषय है, हांलांकि अभी, थोड़े समय के लिए, आपको अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़ रहे हैं।

7) यह इसलिए होता है कि आपका विश्वास परिश्रमिक खरा निकले। सोना भी तो आग में तपाया जाता है और आपका विश्वास नश्वर सोने से कहीं अधिक मूल्यवान है। इस प्रकार ईसा मसीह के प्रकट होने के दिन आप लोगों को प्रशंसा, सम्मान तथा महिमा प्राप्त होगी।

8) (8-9) आपने उन्हें कभी नहीं देखा, फिर भी आप उन्हें प्यार करते हैं। आप अब भी उन्हें नहीं देखते, फिर भी उन में विश्वास करते हैं। जब आप अपने विश्वास का प्रतिफल अर्थात् अपनी आत्मा की मुक्ति प्राप्त करेंगे, तो एक अकथनीय तथा दिव्य उल्लास से आनन्दित हो उठेंगे!



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 20:24-29



24) ईसा के आने के समय बारहों में से एक थोमस जो यमल कहलाता था, उनके साथ नहीं था।

25) दूसरे शिष्यों ने उस से कहा, ’’हमने प्रभु को देखा है’’। उसने उत्तर दिया, ’’जब तक मैं उनके हाथों में कीलों का निशान न देख लूँ, कीलों की जगह पर अपनी उँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा।

26) आठ दिन बाद उनके शिष्य फिर घर के भीतर थे और थोमस उनके साथ था। द्वार बन्द होने पर भी ईसा उनके बीच आ कर खडे हो गये और बोले, ’’तुम्हें शांति मिले!’’

27) तब उन्होने थोमस से कहा, ’’अपनी उँगली यहाँ रखो। देखो- ये मेरे हाथ हैं। अपना हाथ बढ़ाकर मेरी बगल में डालो और अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो।’’

28 थोमस ने उत्तर दिया, ’’मेरे प्रभु! मेरे ईश्वर!’’

29) ईसा ने उस से कहा, ’’क्या तुम इसलिये विश्वास करते हो कि तुमने मुझे देखा है? धन्य हैं वे जो बिना देखे ही विश्वास करते हैं।’’




📚 मनन-चिंतन



शिष्यों का प्रेषण

येसु अपने शिष्यों को एक मिशन कार्य के लिए तैयार कर रहे थे। वह उन्हें भावी चुनौतियों, बाधाओं और खतरों के बारे में सचेत करते हैं। तदनुसार ‘‘सत्तर शिष्य आनंद के साथ वापस लौटते हैं।’’ हमारा आनंद येसु के साथ हमारी पहचान में हैं, इसमें नहीं कि, हम क्या करते हैं। हमारे नाम स्वर्ग में इसलिए लिखे गये हैं क्योंकि हम ईश्वर की संतान हैं। क्या मैं विश्वास कर सकता हूँ कि, मेरा नाम ईश्वर को प्रसन्न करता है? सदियों से कलीसिया को ईश्वर के राज्य का, शांति और न्याय, क्षमा और चंगाई का एक ही संदेश सौंपा गया हैं। अब इसके साक्षी बनने की बारी मेरी हैं। क्या आप उसके साक्षी बनने के लिए तैयार हैं?



📚 REFLECTION



The commissioning of the seventy and their joyous return

Jesus is preparing his disciples for a mission. He leaves them in no doubt about the challenges, obstacles and dangers which will await them. Accordingly, ‘the seventy return with joy’. Our joy is in our identity with Jesus, not in what we do. Our names are written in heaven because we are God’s beloved sons and daughters. Our names are never erased or crossed out. Can I believe that my name delights God? The same message of peace and justice, forgiveness and healing, and the Good News of God’s kingdom, has been entrusted to the Church down the centuries. Now it is my turn to witness to it. Are you ready to WITNESS the same?



📚 मनन-चिंतन - 2


आज हम प्रेरित थॉमस का त्योहार मना रहे हैं जो अक्सर "संदेह करने वाले थॉमस" के रूप में जाने जाते हैं। संदेह करना अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन संदेह में रहना बुरा हो सकता है। संत थॉमस की महानता यह है कि वे संदेह में रहना नहीं चाहते थे, बल्कि स्पष्टीकरण चाहते थे, वह भी केवल प्रभु से। वे प्रभु की प्रतीक्षा करने के लिए तैयार थे। इससे पहले कि वे वांछित स्पष्टीकरण प्राप्त कर सके, उन्हें एक सप्ताह तक इंतजार करना पड़ा। एक सप्ताह के बाद ही प्रभु उन्हें स्पष्टीकरण देने के लिए दर्शन देते हैं। फिर भी उन्होंने धैर्यपूर्वक अपने संदेह मिटाने के लिए प्रभु की प्रतीक्षा की। उन्होंने अन्य लोगों से यह उम्मीद नहीं की कि वे उन्हें सांत्वना दें या उनका संदेह मिटा दें।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि संत थॉमस चाहते थे कि उन्हें प्रभु येसु के घावों का अनुभव प्राप्त हो। वास्तव में वे क्रूस पर चढ़ाये गये प्रभु के अनुभव के लिए तरस रहे थे। उन्होंने जोर देकर कहा, "जब तक मैं उनके हाथों में कीलों का निशान न देख लूँ, कीलों की जगह पर अपनी उँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा।" (योहन 20:25)। हम जानते हैं कि प्रभु येसु का दुखभोग तथा क्रूस मरण ईश्वर के देहधारण के केन्द्रीय रहस्यों का प्रभुख हिस्सा है। येसु की शिक्षाओं में क्रूस का एक विशेष स्थान है। 1कुरिन्थियों 1: 22-24 में, संत पौलुस कहते हैं, "यहूदी चमत्कार माँगते और यूनानी ज्ञान चाहते हैं, किन्तु हम क्रूस पर आरोपित मसीह का प्रचार करते हैं। यह यहूदियों के विश्वास में बाधा है और गै़र-यहूदियों के लिए ’मूर्खता’। किन्तु मसीह चुने हुए लोगों के लिए, चाहे वे यहूदी हों या यूनानी, ईश्वर का सामर्थ्य और ईश्वर की प्रज्ञा है”। संत थॉमस की आध्यात्मिकता भी घायल और क्रूसित प्रभु पर केंद्रित है। जबकि अधिकांश शिष्य क्रूस और कष्टों से भागना पसंद करते थे, संत थॉमस उस वास्तविकता का सामना करना चाहते थे।

इसलिए जब उन्हें लाजरुस की मृत्यु का संदेश मिला, तब वे येसु के साथ बेथानिया जाने का जोखिम उठाना चाहते थे। उन्होंने अपने साथियों से कहा, “हम भी चलें और इनके साथ मर जायें” (योहन 11:16)। आइए हम प्रभु से प्रार्थना करें कि हम क्रूस से भागने की कोशिश न करें, लेकिन इसे प्रेम के साथ स्वीकारें, क्योंकि क्रूस हमारे उद्धार का साधन है।



📚 REFLECTION


Today we celebrate the feast of Apostle Thomas who is often referred to as “The Doubting Thomas”. Doubting in itself is not bad, but remaining in doubt can be bad. The greatness of St. Thomas is that he wanted clarification, that too from the Lord and the Lord alone. He was ready to wait for the Lord. He had to wait for a week before he could get the clarification he desired. Yet he patiently waited for the Lord to clear his doubts. He did not seek other people to comfort or console him. Secondly St. Thomas wanted to have an experience of the wounds of Jesus. In fact he was longing for an experience of the crucified Lord. He insisted, “Unless I see the mark of the nails in his hands, and put my finger in the mark of the nails and my hand in his side, I will not believe” (Jn 20:25). We know that the sufferings and crucifixion of Jesus are realities, very central to the mystery of incarnation. In the teachings of Jesus the Cross has a special place. In 1Cor 1:22-24, St. Paul says, “For Jews demand signs and Greeks desire wisdom, but we proclaim Christ crucified, a stumbling block to Jews and foolishness to Gentiles, but to those who are the called, both Jews and Greeks, Christ the power of God and the wisdom of God”. The Spirituality of St. Thomas too is centred around the wounded and crucified Lord. While most of the disciples would have liked to run away from the cross and sufferings, St. Thomas wanted to confront that reality. That is why he wanted to take the risk of going with Jesus to Bethany when they received the message of the death of Lazarus. He said to his companions, “Let us also go, that we may die with him” (Jn 11:16). Let us pray to the Lord that we may not try to escape from the cross but carry it with love, because the cross is the instrument of our redemption.


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry21.blogspot.com
Praise the Lord!

26 जून 2022, इतवार

 

26 जून 2022, इतवार

वर्ष का तेरहवाँ समान्य इतवार



पहला पाठ : 1 राजाओं 19:16,19-21

16) और निमशी के पुत्र येहू को इस्राएल के राजा के रूप में अभिशेक करो। इसके बाद आबेल-महोला के निवासी, शफ़ाट के पुत्र एलीशा का अभिशेक करो, जिससे वह तुम्हारे स्थान में नबी हो।

19) एलियाह वहाँ से चला गया और उसने शाफ़ाट के पुत्र एलीशा के पास पहुँच कर उसे हल जोतते हुए पाया। उसने बारह जोड़ी बैल लगा रखे थे और वह स्वयं बारहवीं जोड़ी चला रहा था। एलियाह ने उसकी बग़ल से गुज़र कर उस पर अपनी चादर डाल दी।

20) एलीशा ने अपने बैल छोड़ कर एलियाह के पीछे दौड़ते हुए कहा, "मुझे पहले अपने माता-पिता का चुम्बन करने दीजिए। तब मैं आपके साथ चलूँगा।"

21) एलियाह ने उत्तर दिया, “जाओ, लौटो। तुम जानते ही हो कि मैंने तुम्होरे साथ क्या किया है।“

दूसरा पाठ : गलातियों 5:1, 13-18

1) मसीह ने स्वतन्त्र बने रहने के लिए ही हमें स्वतन्त्र बनाया, इसलिए आप लोग दृढ़ रहें और फिर दासता के जुए में नहीं जुतें।

13) भाइयो! आप जानते हैं कि आप लोग स्वतन्त्र होने के लिए बुलाये गये हैं। आप सावधान रहें, नहीं तो यह स्वतन्त्रता भोग-विलास का कारण बन जायेगी।

14) आप लोग प्रेम से एक दूसरे की सेवा करें, क्योंकि एक ही आज्ञा में समस्त संहिता निहित है, और वह यह है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

15) यदि आप लोग एक दूसरे को काटने और फाड़ डालने की चेष्टा करेंगे, तो सावधान रहें। कहीं ऐसा न हो कि आप एक दूसरे का सर्वनाश करें।

16) मैं यह कहना चाहता हूँ- आप लोग आत्मा की प्रेरणा के अनुसार चलेंगे, तो शरीर की वासनाओं को तृप्त नहीं करेंगे।

17) शरीर तो आत्मा शरीर के विरुद्ध। ये दोनों एक दूसरे के विररोधी हैं। इसलिए आप जो चाहते हैं, वही नहीं कर पाते हैं।

18) यदि आप आत्मा की प्रेरणा के अनुसार चलते है, तो संहिता के अधीन नहीं हैं।

सुसमाचार : लूकस 9:51-62

51) अपने स्वर्गारोहण का समय निकट आने पर ईसा ने येरूसालेम जाने का निश्चय किया

52) और सन्देश देने वालों को अपने आगे भेजा। वे चले गये और उन्होंने ईसा के रहने का प्रबन्ध करने समारियों के एक गाँव में प्रवेश किया।

53) लोगों ने ईसा का स्वागत करने से इनकार किया, क्योंकि वे येरूसालेम जा रहे थे।

54) उनके शिष्य याकूब और योहन यह सुन कर बोल उठे, "प्रभु! आप चाहें, तो हम यह कह दें कि आकाश से आग बरसे और उन्हें भस्म कर दे"।

55) पर ईसा ने मुड़ कर उन्हें डाँटा

56) और वे दूसरी बस्ती चले गये।

57) ईसा अपने शिष्यों के साथ यात्रा कर रहे थे कि रास्ते में ही किसी ने उन से कहा, "आप जहाँ कहीं भी जायेंगे, मैं आपके पीछे-पीछे चलूँगा"।

58) ईसा ने उसे उत्तर दिया, "लोमडि़यों की अपनी माँदें हैं और आकाश के पक्षियों के अपने घोंसले, परन्तु मानव पुत्र के लिए सिर रखने को भी अपनी जगह नहीं है"।

59) उन्होंने किसी दूसरे से कहा, "मेरे पीछे चले आओ"। परन्तु उसने उत्तर दिया, "प्रभु! मुझे पहले अपने पिता को दफ़नाने के लिए जाने दीजिए"।

60) ईसा ने उस से कहा, "मुरदों को अपने मुरदे दफनाने दो। तुम जा कर ईश्वर के राज्य का प्रचार करो।"

61) फिर कोई दूसरा बोला, "प्रभु! मैं आपका अनुसरण करूँगा, परन्तु मुझे अपने घर वालों से विदा लेने दीजिए"।

62) ईसा ने उस से कहा, "हल की मूठ पकड़ने के बाद जो मुड़ कर पीछे देखता है, वह ईश्वर के राज्य के योग्य नहीं"।



📚 मनन-चिंतन




प्रभु कहते है, जो मेरा अनुसरण करना चाहता है वह आत्मत्याग करें और अपना कू्रस उठा कर मेरे पीछे हो ले। प्रभु येसु ख्रीस्त की लोकप्रियता, चमत्कार, चंगाईयों को देखकर बहुत से लोग उनके पीछे हो लेते है। परंतु उनमें से कुछ ही उनका सच्चा अनुसरण कर पाते है। आज के सुसमाचार के द्वारा प्रभु येसु ख्रीस्त उनके पीछे आने से पूर्व कुछ बातों को सामने रखते है। सर्वप्रथम तो वह यह बताना चाहते है कि उनका जीवन फूल के समान आरामदायक ही नहीं परंतु उसमें काँटों के समान कष्ट और परेशानियों से भरा हुआ भी है। दूसरा प्रभु का अनुसरण करने के लिए हमें हमारे लगाव और असक्ताओं से दूर रहने की आवश्यकता है। तीसरा उनका सच्चा अनुसरण वही कर पाता है जो केवल आगे की ओर देखकर बढ़ता चला जाता है। प्रभु का अनुसरण करने के लिए क्या हम तैयार है? आइये हम अपने मन और ह्दय को आज के वचनों पर आधारित करते हुयें प्रभु के सच्चे अनुयायी बनें।



📚 REFLECTION


The Lord says, ‘whoever wants to follow me, must deny himself and take up his cross and follow me.’ Seeing the popularity, miracles, healings of Lord Jesus Christ, many people came to follow him. But only a few of them can truly follow him. Through today's gospel, the Lord Jesus Christ puts forward some things or criteria before following him.

First of all, he wants to tell that his life is not only as comfortable as a flower, but it is also full of troubles and difficulties like thorns. Secondly, to follow the Lord, we need to stay away from our attachments and dissipations. Thirdly, only those can truly follow him who moves forward by always looking ahead. Are we ready to follow the Lord? Let us become true followers of the Lord by basing our mind and heart on today's words.



मनन-चिंतन-2


आज के पाठों में हम बुलाहट के विषय में सुनते हैं। पहले पाठ में प्रभु ईश्वर एलीशा को नबी एलियाह के उत्तराधिकारी के रूप में बुलाते हैं। बुलाहट के चिन्ह स्वरूप नबी एलियाह उसके ऊपर अपनी चादर डाल देते हैं। उस समय एलीशा अपने खेती के काम में व्यस्त था। वह इस दुनिया की कमाई में मस्त था। पर जैसे ही उसे सांसारिक कमाई से भी बडकर आत्मिक कमाई का बुलावा मिलता है वह खत्म हो जाने वाली कमाई को छोडकर आत्मिक धन कमाने एलियाह के पीछे चल देता है जो कि कभी खत्म नहीं होगा। वह अपनी खेती, अपने बैल सब कुछ का त्याग कर देता है। अपने सांसारिक चीजों के त्याग के प्रतीक रूप में उसने अपने हल में जुते बैल को मारा और उसी हल की लकडी से उसे पकाया तब मजदूरों को भोजन कराकर सब कुछ का त्याग करते हुए वह ईश्वर भक्त का अनुयायी बन जाता है।

प्रभु की राहों पर चलने के लिए बहुत कुछ छोडना और बहुत कुछ का त्याग करना पडता है। सुसमाचार में प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘लोमडियों की अपनी माँदे है और आकाश के पक्षियों के अपने घौंसले, परन्तु मानव पुत्र के लिए सिर रखने को भी जगह नहीं है”। कोई व्यक्ति जो येसु का अनुयायी तो बनना चाहता था पर जिसे अपने परिवार व रिश्ते नातों से बहुत अधिक लगाव था प्रभु उससे कहते हैं – “मुरदों को अपने मुरदे दफनाने दो तुम जाकर ईश्वर के राज्य का प्रचार करो”। क्या इसका मतलब यह हुआ कि ईश्वर के राज्य में सांसारिक रिश्तों नातों का कोई औचित्य नहीं अथवा कोई महत्व नहीं? हरगिज़ नहीं।

संत मत्ती 10:37 में प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘जो अपने पिता या अपनी माता को मुझसे अधिक प्यार करता है वह मेरे योग्य नहीं”। यहाँ पर बात साँसारिक रिश्तों नातों की नहीं परन्तु बात उचित चुनाव की है। ईश्वर और संसार के बीच मैं सबसे पहले किसको चुनता हूँ। ईश्वर और संसार के बीच चयन में मेरी प्राथमिकता किस के लिए है। संसार के लिए या फिर ईश्वर के लिए? वचन कहता है जो मुझसे अधिक दुनिया को और दुनिया के रिश्तों को महत्व देता है वह उसके लायक नहीं है।

प्यारे विश्वासियों हमारा सारा जीवन ईश्वर और संसार के बीच के इसी चयन में बीतता है। हमें जिंदगी के हर पडाव पर, जीवन के हर कदम पर यह चुनाव करना होता है। और इस चुनाव अथवा चयन करने में ईश्वर हमारे साथ कोई जबरदस्ती नहीं करता। संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में हमें कहते हैं - ‘‘मसीह ने हमें स्वतंत्र बने रहने के लिए बुलाया है”। परन्तु वे आगे हमें आगाह करते हुए कहते हैं कि हमारी यह स्वतंत्रता हमारे लिए भोग विलास का कारण न बन जाये। याने ईश्वर द्वारा प्रदत इस स्वतंत्रता का दुरूपयोग कर हम अपने आप को सांसारिक भोग विलास के लिए न सौंप दें। संत पौलुस हमसे कहते हैं - ‘‘आप लोग आत्मा की प्रेरणा के अनुसार चलेंगे तो शरीर की वासनाओं को तृप्त नहीं करेंगे”। इस दुनिया के दूषण से मुक्त रहने के लिए आत्मा की प्रेरणा के अनुसार चलना अति आवश्यक है।

तो आईये आज हम ईश्वर से आशिष व कृपा मॉंगें कि हम उनकी कृपा से आत्मा से प्रेरित जीवन जीयें और येसु मसीह के नक्शे कदम पर चलने के लिए हर पग पर ईश्वर को सांसारिक चीजों व सुखों के ऊपर महत्व दें। और हमेशा उन्हें अपने जीवन में प्राथमिकता देते हुए अपने आत्मा द्वारा हमारा संचालन करने दें। आमेन।

✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

12 जून 2022, इतवार पवित्र त्रित्व का महापर्व

 *✞ CATHOLIC BIBLE MINISTRY ✞*

 

 12 जून 2022, इतवार

पवित्र त्रित्व का महापर्व




💦पहला पाठ : सूक्ति 8:22-31

22) "आदि में, प्रभु ने अन्य कार्यो से पहले मेरी सृष्टि की है।


23) प्रारम्भ में, पृथ्वी की उत्पत्ति से पहले, अनन्त काल पूर्व में मेरी सृष्टि हुई है।


24) जिस समय मेरा जन्म हुआ था, न तो महासागर था और न उमड़ते जलस्त्रोत थे।


25) मैं पर्वतों की स्थापना से पहले, पहाड़ियों से पहले उत्पन्न हुई थी।


26) जब उसने पृथ्वी, समतल भूमि तथा संसार के मूल-तत्व बनाये, तो मेरा जन्म हो चुका था।


27) जब उसने आकाशमण्डल का निर्माण किया और महासागर के चारों ओर वृत्त खींचा, तो मैं विद्यमान थी।


28) जब उसने बादलों का स्थान निर्धारित किया और समुद्र के स्रोत उमड़ने लगे,


29) जब उसने समुद्र की सीमा निश्चित की, जिससे जल तट का अतिक्रमण न करे- जब उसने पृथ्वी की नींव डाली,


30) उस समय मैं कुशल शिल्पकार की तरह उसके साथ थी। मैं नित्यप्रति उसका मनोरंजन करती और उसके सम्मुख क्रीड़ा करती रही।


31) मैं पृथ्वी पर सर्वत्र क्रीड़ा करती और मनुष्यों के साथ मनोरंजन करती रही।"


💦दूसरा पाठ : रोमियों 5:1-5

1) ईश्वर ने हमारे विश्वास के कारण हमें धार्मिक माना है। हम अपने प्रभु ईसा मसीह द्वारा ईश्वर से मेल बनाये रखें।


2) मसीह ने हमारे लिए उस अनुग्रह का द्वार खोला है, जो हमें प्राप्त हो गया है। हम इस बात पर गौरव करें कि हमें ईश्वर की महिमा के भागी बनने की आशा है।


3) इतना ही नहीं, हम दुःख-तकलीफ पर भी गौरव करें, क्योंकि हम जानते हैं कि दुःख-तकलीफ से धैर्य,


4) धैर्य से दृढ़ता, और दृढ़ता से आशा उत्पन्न होती है।


5) आशा व्यर्थ नहीं होती, क्योंकि ईश्वर ने हमें पवित्र आत्मा प्रदान किया है और उसके द्वारा ही ईश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उमड़ पड़ा है।



💦सुसमाचार : योहन 16:12-15

12) मुझे तुम लोगों से और बहुत कुछ कहना है परन्तु अभी तुम वह नहीं सह सकते।


13) जब वह सत्य का आत्मा आयेगा, तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य तक ले जायेगा; क्योंकि वह अपनी ओर से नहीं कहेगा, बल्कि वह जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा और तुम्हें आने वाली बातों के विषय में बतायेगा।


14) वह मुझे महिमान्वित करेगा, क्योंकि उसे मेरी ओर से जो मिला है, वह तुम्हें वही बतायेगा।


15) जो कुछ पिता का है, वह मेरा है। इसलिये मैंने कहा कि उसे मेरी ओर से जो मिला है, वह तुम्हें वही बतायेगा।


        


💦 *मनन-चिंतन* 

हम सब ख्रीस्तीय पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर सभी कार्य करते है, विशेष रूप से प्रार्थना की शुरुआत और अंत। पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा तीन व्यक्ति है परंतु एक ईश्वर है और इसी त्रियेक ईश्वर का पर्व हम आज मनाते है, जिसे पवित्र त्रित्व के महापर्व से जाना जाता है।


मनुष्यों ने हमेशा से ही ईश्वर के बारे में जानने की कोशिश की है। प्रभु येसु और पवित्र आत्मा के द्वारा हमने ईश्वर और उनकी योजनाओं के बारे में कई रहस्य या सिद्धांत को समझा और जाना है परंतु जरूरी नहीं कि हम ईश्वर के हर रहस्य को समझ पाये। उनमें से एक रहस्य पवित्र त्रित्व का है जो हमारे इस क्षणिक दिमाग में कभी भी नहीं समा सकता।


आज के तीनों पाठ आज के पर्व के संदर्भ के अनुसार है। पहला पाठ में हमे शक्तिशाली पिता ईश्वर के विषय में बताया गया है जिसने इस अद्भुत सृष्टि की रचना की और महान चमत्कारों द्वारा इस्राएल को बचाया; वह पिता एक शक्तिशाली ईश्वर है और उसके सिवा कोई और ईश्वर नहीं है।


दूसरे पाठ में पवित्र आत्मा के विषय में बताया गया है। पवित्र आत्मा ईश्वर बाहर नहीं परंतु हमारे भीतर बसने वाला ईश्वर है क्योकि हमारा शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है। जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित है उनमें ईश्वर के जीवन का संचार है और वह इस संसार से परे रहकर ईश्वर के पुत्र के मनोभाव के अनुसार जीवन बिताता है।


सुसमाचार में हम प्रभु येसु के अंतिम आदेश के बारे में जानते है जहॉं प्रभु येसु अपने शिष्यों से कहते है कि, ’’मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।’’ प्रभु येसु जाते जाते पवित्र त्रित्व के नाम को उजागर कर के जाते है।


पवित्र त्रित्व का पर्व हमारे लिए त्रियेक ईश्वर को जानने का और प्रार्थना करने का सुंदर अवसर है परंतु इस रहस्य या सिद्धांत को पूर्ण रूप से समझना हमारे दिमाग के बस की बात नहीं। एक ईश्वर में तीन जन- इस रहस्य को समझाने के लिए कई विद्वानों ने कई उदाहरण देकर समझना चाहा परंतु किसी ने भी एक ठोस रूप से इसकी गहराई को समझा नहीं पाया है।


पवित्र त्रित्व का पर्व एकता का पाठ पढ़ाती है। जिस प्रकार पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अलग अलग व्यक्ति है परंतु वे एक है। जिस प्रकार प्रभु येसु कहते है मै पिता में हुँ और पिता मुझमें है ठीक उसी प्रकार पवित्र आत्मा भी पिता और पुत्र में हैं और वे पवित्र आत्मा में अर्थात् वे तीनों एक है। आज के पर्व की आशीष द्वारा हम भी ईश्वर में एक बनें रहें जिस प्रकार प्रभु येसु हमारे लिए चाह रखते है, ’’सब के सब एक हो जायें। पिता! जिस तरह तू मुझ में है और मैं तुझ में, उसी तरह वे भी हम में एक हो जायें’’ (योहन 17:21)। आमेन!


✍Br. Biniush Topno

5 जून 2022, इतवार पेंतेकोस्त

 

*✞ CATHOLIC BIBLE MINISTRY ✞*



*05 जून 2022, इतवार*

*पेंतेकोस्त*

💦 *पहला पाठ*
प्रेरित-चरित 2:1-11

1) जब पेंतेकोस्त का दिन आया और सब शिष्य एक स्थान पर इकट्ठे थे,

2) तो अचानक आँधी-जैसी आवाज आकाश से सुनाई पड़ी और सारा घर, जहाँ वे बैठे हुए थे, गूँज उठा।

3) उन्हें एक प्रकार की आग दिखाई पड़ी जो जीभों में विभाजित होकर उन में से हर एक के ऊपर आ कर ठहर गयी।

4) वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त वरदान के अनुसार भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलने लगे।

5) पृथ्वी भर के सब राष्ट्रों से आये हुए धर्मी यहूदी उस समय येरुसालेम में रहते थे।

6) बहुत-से लोग वह आवाज सुन कर एकत्र हो गये। वे विस्मित थे, क्योंकि हर एक अपनी-अपनी भाषा में शिष्यों को बोेलते सुन रहा था।

7) वे बड़े अचम्भे में पड़ गये और चकित हो कर बोल उठे, ’’क्या ये बोलने वाले सब-के-सब गलीली नहीं है?

8) तो फिर हम में हर एक अपनी-अपनी जन्मभूमि की भाषा कैसे सुन रहा है?

9) पारथी, मेदी और एलामीती; मेसोपोतामिया, यहूदिया और कम्पादुनिया, पोंतुस और एशिया,

10 फ्रुगिया और पप्फुलिया, मिश्र और कुरेने के निकवर्ती लिबिया के निवासी, रोम के यहूदी तथा दीक्षार्थी प्रवासी,

11) क्रेत और अरब के निवासी-हम सब अपनी-अपनी भाषा में इन्हें ईश्वर के महान् कार्यों का बख़ान करते सुन रहे हैं।’’
_______________________________
💦 *दूसरा पाठ*
1 कुरिन्थियों 12:3-7,12-13

4) कृपादान तो नाना प्रकार के होते हैं, किन्तु आत्मा एक ही है।

5) सेवाएँ तो नाना प्रकार की होती हैं, किन्तु प्रभु एक ही हैं।

6) प्रभावशाली कार्य तो नाना प्रकार के होते हैं, किन्तु एक ही ईश्वर द्वारा सबों में सब कार्य सम्पन्न होते हैं।

7) वह प्रत्येक को वरदान देता है, जिससे वह सबों के हित के लिए पवित्र आत्मा को प्रकट करे।

12) मनुष्य का शरीर एक है, यद्यपि उसके बहुत-से अंग होते हैं और सभी अंग, अनेक होते हुए भी, एक ही शरीर बन जाते हैं। मसीह के विषय में भी यही बात है।

13) हम यहूदी हों या यूनानी, दास हों या स्वतन्त्र, हम सब-के-सब एक ही आत्मा का बपतिस्मा ग्रहण कर एक ही शरीर बन गये हैं। हम सबों को एक ही आत्मा का पान कराया गया है।

अथवा

💦 *दूसरा पाठ*
रोमियों 8:8-17

8) जो लोग शरीर की वासनाओं से संचालित हैं, उन पर ईश्वर प्रसन्न नहीं होता।

9) यदि ईश्वर का आत्मा सचमुच आप लोगों में निवास करता है, तो आप शरीर की वासनाओं से नहीं, बल्कि आत्मा से संचालित हैं। जिस मनुष्य में मसीह का आत्मा निवास नहीं करता, वह मसीह का नहीं।

10) यदि मसीह आप में निवास करते हैं, तो पाप के फलस्वरूप शरीर भले ही मर जाये, किन्तु पापमुक्ति के फलस्वरूप आत्मा को जीवन प्राप्त है।

11) जिसने ईसा को मृतकों में से जिलाया, यदि उनका आत्मा आप लोगों में निवास करता है, तो जिसने ईसा मसीह को मृतकों में से जिलाया वह अपने आत्मा द्वारा, जो आप में निवास करता है, आपके नश्वर शरीरों को भी जीवन प्रदान करेगा।

12) इसलिए, भाइयो! शरीर की वासनओं का हम पर कोई अधिकर नहीं। हम उनके अधीन रह कर जीवन नहीं बितायें।

13) यदि आप शरीर की वासनाओं के अधीन रह कर जीवन बितायेंगे, तो अवश्य मर जायेंगे।

14) लेकिन यदि आप आत्मा की प्रेरणा से शरीर की वासनाओें का दमन करेंगे, तो आप को जीवन प्राप्त होगा।

15) जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित हैं, वे सब ईश्वर के पुत्र हैं- आप लोगों को दासों का मनोभाव नहीं मिला, जिस से प्रेरित हो कर आप फिर डरने लगें। आप लोगों को गोद लिये पुत्रों का मनोभाव मिला, जिस से प्रेरित हो कर हम पुकार कर कहते हैं, "अब्बा, हे पिता!

16) आत्मा स्वयं हमें आश्वासन देता है कि हम सचमुच ईश्वर की सन्तान हैं।

17) यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो हम उसकी विरासत के भागी हैं-हम मसीह के साथ ईश्वर की विरासत के भागी हैं। यदि हम उनके साथ दुःख भोगते हैं, तो हम उनके साथ महिमान्वित होंगे।
_______________________________

💦*सुसमाचार*
सन्त योहन 20:19-23

19) उसी दिन, अर्थात सप्ताह के प्रथम दिन, संध्या समय जब शिष्य यहूदियों के भय से द्वार बंद किये एकत्र थे, ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, "तुम्हें शांति मिले!"

20) और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, "तुम्हें शांति मिले!

21) जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ।"

22) इन शब्दों के बाद ईसा ने उन पर फूँक कर कहा, "पवित्र आत्मा को ग्रहण करो!

23) तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे, वे अपने पापों से मुक्त हो जायेंगे और जिन लोगों के पाप क्षमा नहीं करोगे, वे अपने पापों से बँधे रहेंगे।

✍️ -Br. Biniush Topno

To receive Daily Gospel in whatsapp, Click the below link to join

God's Word (Hindi) Group
https://chat.whatsapp.com/Cgzn1sKLpadCPry3VvZJFu

        *Have a Blessed Day*

04 जून 2022, शनिवार* *पास्का का सातवाँ सप्ताह

 *✞ CATHOLIC BIBLE MINISTRY✞*

*04 जून 2022, शनिवार*

*पास्का का सातवाँ सप्ताह*

💦*पहला पाठ*
प्रेरित-चरित 28:16-20,30-31

16) जब हम रोम पहुँचे, तो पौलुस को यह अनुमति मिली की वह पहरा देने वाले सैनिक के साथ जहाँ चाहे, रह सकता है।

17) तीन दिन बाद पौलुस ने प्रमुख यहूदियों को अपने पास बुलाया और उनके एकत्र हो जाने पर उन से कहा, भाइयो! मैंने न तो राष्ट्र के विरुद्ध कोई अपराध किया और न पूर्वजों की प्रथाओं के विरुद्ध, फिर भी मुझे बन्दी बनाया और येरुसालेम में रोमियों के हवाले कर दिया गया है।

18) वे सुनवाई के बाद मुझे रिहा करना चाहते थे, क्योंकि मैंने प्राणदण्ड के योग्य कोई अपराध नहीं किया था।

19) किंतु जब यहूदी इसका विरोध करने लगे, तो मुझे कैसर से अपील करनी पड़ी, यद्यपि मुझे अपने राष्ट्र पर कोई अभियोग नहीं लगाना था।

20) इसलिए मैंने आप लोगों से मिलने और बातें करने का निवेदन किया, क्योंकि इस्राएल की आशा के कारण मैं जंजीर पहने हूँ।’’

30) पौलुस पूरे दो वर्षों तक अपने किराये के मकान में रहा। वह सभी मिलने वालों का स्वागत करता था।

31) और आत्मविश्वास के साथ निर्विघ्न रूप से ईश्वर के राज्य का सन्देश सुनाता और प्रभु ईसा मसीह के विषय में शिक्षा देता था।
_____________________________________


💦*सुसमाचार*
सन्त योहन 21:20-25

20) पेत्रुस ने मुड़ कर उस शिष्य को पीछे पीछे आते देखा जिसे ईसा प्यार करते थे और जिसने व्यारी के समय उनकी छाती पर झुक कर पूछा था, ’प्रभु! वह कौन है, जो आप को पकड़वायेगा?’

21) पेत्रुस ने उसे देखकर ईसा से पूछा, ’’प्रभ! इनका क्या होगा?’’

22) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’यदि मैं चाहता हूँ कि यह मेरे आने तक रह जाये तो इस से तुम्हें क्या? तुम मेरा अनुसरण करो।’’

23) इन शब्दों के कारण भाइयों में यह अफ़वाह फैल गयी कि वह शिष्य नहीं मरेगा। परन्तु ईसा ने यह नहीं कहा कि यह नहीं मरेगा; बल्कि यह कि ’यदि मैं चाहता हूँ कि यह मेरे आने तक रह जाये, तो इस से तुम्हें क्या?’

24) यह वही शिष्य है, जो इन बातों का साक्ष्य देता है और जिसने यह लिखा है। हम जानते हैं कि उसका साक्ष्य सत्य है।

25) ईसा ने और भी बहुत से कार्य किये। यदि एक-एक कर उनका वर्णन किया जाता तो मैं समझता हूँ कि जो पुस्तकें लिखी जाती, वे संसार भर में भी नहीं समा पातीं।


💦 *मनन-चिंतन*
आज के सुसमाचार के अंश में हम संत योहन के सुसमाचार के अंतिम पदों को पाते है जहॉं पर येसु संत योहन के विषय में पेत्रुस को बताते है तथा साथ ही साथ हमें यह पता चलता है कि संत योहन ने अपने सुसमाचार में प्रभु के कार्यो का विवरण तो दिया है परंतु सभी कार्यो का विवरण नहीं दिया क्योंकि वह इतने अधिक है कि इस पुस्तक में समा नहीं पाती।

संत योहन का सुसमाचार चारों सुसमाचार के बीच में अलग पहचान बना के रखता है। संत योहन अपने सुसमाचार में गहरी से गहरी रहस्यों को हमारे समक्ष प्रकट करते है।

प्रभु येसु संत योहन के विषय में कहते है, ‘‘यदि मैं चाहता हॅूं कि यह मेरे आने तक रह जाये तो इससे तुम्हें क्या?’’ आगे चलकर इतिहास हमें बताता है कि उन बारह शिष्यों में सभी को शहादत मिली सिवाय एक शिष्य के और वे शिष्य है संत योहन।

प्रभु के जीवन को और उनके कार्यो को हमारे समक्ष रखने में संत योहन का बहुत बड़ा योगदान रहा है। संत योहन प्रभु येसु के प्रिय शिष्य थे और उन्होने प्रभु येसु के अद्भुत कार्यों, चमत्कारों, घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शन किया है और वहीं चीज़ों को संत योहन साक्ष्य के रूप में हमारे सामने प्रकट करते है।

आईये हम प्रार्थना करें कि संत योहन के सुसमाचार द्वारा बहुतो का उद्धार हो और बहुत से लोग विश्वासी बनें। आमेन!

_____________________________________
💦*मनन-चिंतन - 2*
आज का सुसमचार संत योहन के अनुसार सुसमाचार का अंतिम भाग है। संत योहन लिखते हैं कि जो कार्य प्रभु येसु ने किए उन सबको लिखा जाए तो इतनी पुस्तकें लिख जातीं कि इस दुनिया में भी नहीं समातीं। संत योहन ने सुसमचार की रचना साक्ष्य के रूप में की है। जैसे उन्होंने प्रभु येसु को अनुभव किया अपने जीवन में और दूसरों के जीवन में, उस अनुभव को साक्ष्य के रूप में सुसमाचार में वर्णित किया है।

ईश्वर सदा हमारे जीवन में चमत्कार करते रहते हैं, वे सदा हमारे जीवन में सक्रिय हैं। वह अनेक तरह से हमारे प्रति अपने प्रेम को प्रकट करते हैं। वह अनेक तरह से दूसरों के जीवन को छू लेते हैं। हम अपने मन में झाँकें और खुद से पूछें, ‘क्या मैंने अपने जीवन में ईश्वर के चमत्कारों को अनुभव किया है? क्या मैं अपने जीवन द्वारा ईश्वर के प्रेम का साक्ष्य देता हूँ? क्या मैं अपने जीवन में और दूसरों के जीवन में ईश्वर के चमत्कारों के साक्ष्य को अपने सुसमाचार के रूप में लिख सकता हूँ? संत योहन के सुसमाचार का अंत एक अंत नहीं बल्कि एक नहीं शुरुआत है - हम सब के अपने-अपने सुसमाचार की शुरुआत। आमेन।

✍ - Br. Biniush Topno

To receive Daily Gospel in whatsapp, Click the below link to join

God's Word (Hindi) Group
https://chat.whatsapp.com/Cgzn1sKLpadCPry3VvZJFu

        *Have a Blessed Day*

29 मई 2022, इतवार* *स्वर्गारोहण का पर्व*

 *✞ CATHOLIC BIBLE MINISTRY ✞*


*29 मई 2022, इतवार*

*स्वर्गारोहण का पर्व*

*पहला पाठ*
प्रेरित-चरित 1:1-11



1 थेओफिलुस! मैंने अपनी पहली पुस्तक में उन सब बातों का वर्णन किया,

2) जिन्हें ईसा उस दिन तक करते और सिखाते रहे जिस दिन वह स्वर्ग में आरोहित कर लिये गये। उस से पहले ईसा ने अपने प्रेरितों को, जिन्हें उन्होंने स्वयं चुना था, पवित्र आत्मा द्वारा अपना कार्य सौंप दिया।

3) ईसा ने अपने दुःख भोग के बाद उन प्रेरितों को बहुत से प्रमाण दिये कि वह जीवित हैं। वह चालीस दिन तक उन्हें दिखाई देते रहे और उनके साथ ईश्वर के राज्य के विषय में बात करते रहे।

4) ईसा ने प्रेरितों के साथ भोजन करते समय उन्हें आदेश दिया कि वे येरुसालेम नहीं छोड़े, बल्कि पिता ने जो प्रतिज्ञा की, उसकी प्रतीक्षा करते रहें। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने तुम लोगों को उस प्रतिज्ञा के विषय में बता दिया है।

5) योहन जल का बपतिस्मा देता था, परन्तु थोड़े ही दिनों बाद तुम लोगों को पवित्र आत्मा का बपतिस्मा दिया जायेगा’’।

6) जब वे ईसा के साथ एकत्र थे, तो उन्होंने यह प्रश्न किया- ‘‘प्रभु! क्या आप इस समय इस्राएल का राज्य पुनः स्थापित करेंगे ?’’

7) ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘पिता ने जो काल और मुहूर्त अपने निजी अधिकार से निश्चित किये हैं, तुम लोगों को उन्हें जानने का अधिकार नहीं है।

8) किन्तु पवित्र आत्मा तुम लोगों पर उतरेगा और तुम्हें सामर्थ्य प्रदान करेगा और तुम लोग येरुसालेम, सारी यहूदिया और सामरिया में तथा पृथ्वी के अन्तिम छोर तक मेरे साक्षी होंगे।’’

9) इतना कहने के बाद ईसा उनके देखते-देखते आरोहित कर लिये गये और एक बादल ने उन्हें शिष्यों की आँखों से ओझल कर दिया।

10) ईसा के चले जाते समय प्रेरित आकाश की ओर एकटक देख ही रहे थे कि उज्ज्वल वस्त्र पहने दो पुरुष उनके पास अचानक आ खड़े हुए और

11) बोले, ‘‘गलीलियो! आप लोग आकाश की ओर क्यों देखते रहते हैं? वही ईसा, जो आप लोगों के बीच से स्वर्ग में आरोहित कर दिये गये हैं, उसी तरह लौटेंगे, जिस तरह आप लोगों ने उन्हें जाते देखा है।’’

💦 *दूसरा पाठ*
एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:17-23

17) महिमामय पिता, हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर, आप लोगों को प्रज्ञा तथा आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करे, जिससे आप उसे सचमुच जान जायें।

18) वह आप लोगों के मन की आँखों को ज्योति प्रदान करे, जिससे आप यह देख सकें कि उसके द्वारा बुलाये जाने के कारण आप लोगों की आशा कितनी महान् है और सन्तों के साथ आप लोगों को जो विरासत मिली है, वह कितनी वैभवपूर्ण तथा महिमामय है,

19) और हम विश्वासियों के कल्याण के लिए सक्रिय रहने वाले ईश्वर का वही सामर्थ्य कितना अपार है।

20) ईश्वर ने मसीह वही सामर्थ्य प्रदर्शित किया, जब उसने मृतकों में से उन्हें पुनर्जीवित किया और स्वर्ग में अपने दाहिने बैठाया।

21) स्वर्ग में कितने ही प्राणी क्यों न हों और उनका नाम कितना ही महान् क्यों न हो, उन सब के ऊपर ईश्वर ने इस युग के लिए और आने वाले युग के लिए मसीह को स्थान दिया।

22) उसने सब कुछ मसीह के पैरों तले डाल दिया और उन को सब कुछ पर अधिकर दे कर कलीसिया का शीर्ष नियुक्त किया।

23) कलीसिया मसीह का शरीर और उनकी परिपूर्णता है। मसीह सब कुछ, सब तरह से, पूर्णता तक पहुँचाते हैं।

अथवा

💦*दूसरा पाठ*
इब्रानियों 9:24-28, 10:19-23

24) क्योंकि ईसा ने हाथ के बने हुए उस मन्दिर में प्रवेश नहीं किया, जो वास्तविक मन्दिर का प्रतीक मात्र है। उन्होंने स्वर्ग में प्रवेश किया है, जिससे वह हमारी ओर से ईश्वर के सामने उपस्थित हो सकें।

25) प्रधानयाजक किसी दूसरे का रक्त ले कर प्रतिवर्ष परमपावन मन्दिर-गर्भ में प्रवेश करता है। ईसा के लिए इस तरह अपने को बार-बार अर्पित करने की आवश्यकता नहीं है।

26) यदि ऐसा होता तो संसार के प्रारम्भ से उन्हें बार-बार दुःख भोगना पड़ता, किन्तु अब युग के अन्त में वह एक ही बार प्रकट हुए, जिससे वह आत्मबलिदान द्वारा पाप को मिटा दें।

27) जिस तरह मनुष्यों के लिए एक ही बार मरना और इसके बाद उनका न्याय होना निर्धारित है,

28) उसी तरह मसीह बहुतों के पाप हरने के लिए एक ही बार अर्पित हुए। वह दूसरी बार प्रकट हो जायेंगे- पाप के कारण नहीं, बल्कि उन लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए, जो उनकी प्रतीक्षा करते हैं।

19) भाइयो! ईसा का रक्त हमें निर्भय हो कर परमपावन मन्दिर-गर्भ में प्रवेश करने का आश्वासन देता है।

20) उन्होंने हमारे लिए एक नवीन तथा जीवन्त मार्ग खोल दिया, जो उनके शरीर-रूपी परदे से हो कर जाता है।

21) अब हमें एक महान् पुरोहित प्राप्त हैं, जो ईश्वर के घराने पर नियुक्त किये गये हैं।

22) इसलिए हम अपने हृदय को पाप के दोष से मुक्त कर और अपने शरीर को स्वच्छ जल से धो कर निष्कपट हृदय से तथा परिपूर्ण विश्वास के साथ ईश्वर के पास चलें।

23) हम अपने भरोसे का साक्ष्य देने में अटल एवं दृढ़ बने रहें, क्योंकि जिसने हमें वचन दिया है, वह सत्यप्रतिज्ञ है

💦 *सुसमाचार*
लूकस 24:46-53

46) और उन से कहा, "ऐसा ही लिखा है कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे

47) और उनके नाम पर येरूसालेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप का उपदेश दिया जायेगा।

48) तुम इन बातों के साक्षी हो।

49) देखों, मेरे पिता ने जिस वरदान की प्रतिज्ञा की है, उसे मैं तुम्हारे पास भेजूँगा। इसलिए तुम लोग शहर में तब तक बने रहो, जब तक ऊपर की शक्ति से सम्पन्न न हो जाओ।"

50) इसके बाद ईसा उन्हें बेथानिया तक ले गये और उन्होंने अपने हाथ उठा कर उन्हें आशिष दी।

51) आशिष देते-देते वह उनकी आँखों से ओझल हो गये और स्वर्ग में आरोहित कर लिये गये।

52) वे उन्हें दण्डवत् कर बड़े आनन्द के साथ येरूसालेम लौटे

53) और ईश्वर की स्तुति करते हुए सारा समय मन्दिर में बिताते थे।

💦 *मनन-चिंतन*
जब जीवन उल्टा और कठिन हो जाता है तो आप क्या करते हैं? आज के पहले पाठ में हम पाते हैं कि स्टीफ़न अँधेरे में फँस के उनका जीवन उलट गया था । लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। आप यह भी कह सकते हैं कि स्टीफन का अंत हो गया ; स्टीफन का दिन खराब चल रहा है, लेकिन यह सच नहीं है। स्टीफन सबसे अच्छे दिन बिता रहे हैं। स्टीफन जीने के लिए मर रहा है। जब वह मरता है तो उसे स्वर्ग की ओर देखने और उस महिमा को देखने का सौभाग्य प्राप्त होता है जो विश्वासियों की प्रतीक्षा में है। सुसमाचार में, यीशु आपके और मेरे लिए प्रार्थना करते हैं। यीशु उन सभी के लिए प्रार्थना करते हैं जो सदियों से उन पर विश्वास करेंगे। वह एकता के लिए प्रार्थना करता है, एकरूपता के लिए नहीं। अगर यीशु हमारी एकता के लिए प्रार्थना कर रहे हैं तो वह उन सीमाओं और मतभेदों को भी पहचान और अस्वीकार कर रहे हैं जो हमें विभाजित करते हैं। एकता हमारे मतभेदों को दूर करने में है; यह प्यार के बारे में है। ईश्वर से, अपने पड़ोसी से, स्वयं से और अपने शत्रु से हमें प्रेम करना है ।

✍ - Br. Biniush Topno

To receive Daily Gospel in whatsapp, Click the below link to join

God's Word (Hindi) Group
https://chat.whatsapp.com/Cgzn1sKLpadCPry3VvZJFu

        *Have a Blessed Day*
*********************************

22 मई 2022, इतवार

*✞ GOD'S WORD ✞*
 *22 मई 2022, इतवार* *पास्का का छठवाँ इतवार*
*पहला पाठ* प्रेरित-चरित 15:1-2,22-30 1)

 कुछ लोग यहूदिया से अन्ताखि़या आये और भाइयों को यह शिक्षा देते रहे कि यदि मूसा से चली आयी हुई प्रथा के अनुसार आप लोगों का ख़तना नहीं होगा, तो आप को मुक्ति नहीं मिलेगी। 2) इस विषय पर पौलुस और बरनाबस तथा उन लोगों के बीच तीव्र मतभेद और वाद-विवाद छिड़ गया, और यह निश्चय किया गया कि पौलुस तथा बरनाबस अन्ताखि़या के कुछ लोगों के साथ येरूसालेम जायेंगे और इस समस्या पर प्रेरितों तथा अध्यक्षों से परामर्श करेंगे। 22) तब सारी कलीसिया की सहमति से प्रेरितों तथा अध्यक्षों ने निश्चय किया कि हम में कुछ लोगों को चुन कर पौलुस तथा बरनाबस के साथ अन्ताखि़या भेजा जाये। उन्होंने दो व्यक्तियों को चुना, जो भाइयों में प्रमुख थे, अर्थात् यूदस को, जो बरसब्बास कहलाता था, तथा सीलस को, 23) और उनके हाथ यह पत्र भेजा: "प्रेरित तथा अध्यक्ष, आप लोगों के भाई, अन्ताखि़या, सीरिया तथा किलिकिया के ग़ैर-यहूदी भाइयों को नमस्कार करते हैं। 24) हमने सुना है कि हमारे यहाँ के कुछ लोगों ने, जिन्हें हमने कोई अधिकार नहीं दिया था, अपनी बातों से आप लोगों में घबराहट उत्पन्न की और आपके मन को उलझन में डाल दिया है। 25) इसलिए हमने सर्वसम्मति से निर्णय किया है कि प्रतिनिधियों का चुनाव करें और उन को अपने प्रिय भाई बरनाबस और पौलुस के साथ, 26) जिन्होंने हमारे प्रभु ईसा मसीह के नाम पर अपना जीवन अर्पित किया है, आप लोगों के पास भेजें। 27) इसलिए हम यूदस तथा सीलस को भेज रहे हैं। वे भी आप लोगों को यह सब मौखिक रूप से बता देंगे। 28) पवित्र आत्मा को और हमें यह उचित जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों के सिवा आप लोगों पर कोई और भार न डाला जाये। 29) आप लोग देवमूर्तियों पर चढ़ाये हुए मांस से, रक्त, गला घोंटे हुए पशुओं के मांस और व्यभिचार से परहेज़ करें। इन से अपने को बचाये रखने में आप लोगों का कल्याण है। अलविदा!" 30) वे विदा हो कर अन्ताखि़या चल दिये और वहाँ पहुँच कर उन्होंने भाइयों को एकत्र कर वह पत्र दिया। _




 *दूसरा पाठ*   - प्रकाशना 21:10-14,22-23 10) 

मैं आत्मा से आविष्ट हो गया और स्वर्गदूत ने मुझे एक विशाल तथा ऊँचे पर्वत पर ले जा कर पवित्र नगर येरूसालेम दिखाया। वह ईश्वर के यहाँ से आकाश में उतर रहा था। 11) वह ईश्वर की महिमा से विभूषित था और बहुमूल्य रत्न तथा उज्ज्वल सूर्यकान्त की तरह चमकता था। 12) उसके चारों ओर एक बड़ी और उँची दीवार थी, जिस में बारह फाटक थे और हर एक फाटक के सामने एक स्वर्गदूत खड़ा था। फाटकों पर इस्राएल के बारह वंशों के नाम अंकित थे। 13) पूर्व की आरे तीन, उत्तर की और तीन, पश्चिम की आरे तीन और दक्षिण की ओर तीन फाटक थे। 14) नगर की दीवार नींव के बारह पत्थरों पर खड़ी थी और उन पर मेमने के बारह प्रेरितों के नाम अंकित थे। 15) जो मुझ से बातें कर रहा था, उसके पास नगर, उसके फाटक और उसकी दीवार नापने के लिए एक मापक-दण्ड, सोने का सरकण्डा था। 16) नगर वर्गाकार था। उसकी लम्बाई उसकी चौड़ाई के बराबर थी। उसने सरकण्डे से नगर नापा, तो बारह हजार ुफरलांग निकला। उसकी लम्बाई, चौड़ाई और उंचाई बराबर थी। 17) उसने उसकी दीवार नापी, तो- मनुष्यों में प्रचिलत माप के अनुसार, जिसका स्वर्गदूत ने उपयोग किया- एक सौ चौवालीस हाथ निकला। 18) नगर की दीवार सूर्यकान्त की बनी थी, लेकिन नगर विशुद्ध स्वर्ण का बना था, जो स्फटिक जैसा चमकता था। 19) दीवार की नींव नाना प्रकार के रत्नों की बनी थी। पहली परत सूर्यकान्त की थी, दूसरी नीलम की, तीसरी गोदन्ती की, चौथी मरकत की, 20) पांचवी गोमेदक की, छठी रूधिराख्य की, सातवीं स्वर्णमणि की, आठवीं फीरोजे की, नवीं पुखराज की, दसवीं रूद्राक्षक की, ग्यारहवीं धूम्रकान्त की और बाहरवीं चन्द्रकान्त की। 21) बारह फाटक बारह मोतियों के बने थे, प्रत्येक फाटक एक-एक मोती का बना था। नगर का चौक पारदर्शी स्फटिक-जैसे विशुद्ध सोने का बना था। 22) मैंने उस में कोई मन्दिर नहीं देखा, क्योंकि सर्वशक्तिमान् प्रभु-ईश्वर उसका मन्दिर है और मेमना भी। 23) नगर को सूर्य अथवा चन्द्रमा के प्रकाश की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ईश्वर की महिमा उसकी ज्योति और मेमना उसका प्रदीप है। _


_ *सुसमाचार*   योहन 14:23-29 23) 

ईसा ने उसे उत्तर दिया यदि कोई मुझे प्यार करेगा तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आकर उस में निवास करेंगे। 24) जो मुझे प्यार नहीं करता, वह मेरी शिक्षा पर नहीं चलता। जो शिक्षा तुम सुनते हो, वह मेरी नहीं बल्कि उस पिता की है, जिसने मुझे भेजा। 25) तुम्हारे साथ रहते समय मैंने तुम लोगों को इतना ही बताया है। 26) परन्तु वह सहायक, वह पवित्र आत्मा, जिसे पिता मेरे नाम पर भेजेगा तुम्हें सब कुछ समझा देगा। मैंने तुम्हें जो कुछ बताया, वह उसका स्मरण दिलायेगा। 27) मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो। 28) तुमने मुझ को यह कहते सुना- मैं जा रहा हूँ और फिर तुम्हारे पास आऊँगा। यदि तुम मुझे प्यार करते, तो आनन्दित होते कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ, क्योंकि पिता मुझ से महान है। 29) मैंने पहले ही तुम लोगों को यह बताया, जिससे ऐसा हो जाने पर तुम विश्वास करो।


 *मनन-चिंतन*


 मुझे आश्चर्य होता है कभी कभी कि यीशु के समय की महिलाओं की सोच क्या होगी । क्योंकि प्रेरित, परिषद के प्रतिनिधि और चर्च के कमिटी के सभी पुरुष थे। पुरुषों को आधिकारिक तौर पर बारह प्रेरितों के रूप में चुना गया और उन्हें सुसमाचार के राजदूत और प्रेरित के रूप में भेजा गया। और फिर भी, हम जानते हैं कि यीशु के जीवन में महिलाएं अहम् भूमिका निभयीं । उसकी माँ, मैरी; मरियम मगदलीनी, जो कब्र के पास जी उठे हुए मसीह का दर्शन की और प्रेरितों को बताई ; समारिया की ओ स्त्री जो कुएं के पास थी और वह स्त्री जिसे पथराव होने से बचाया गया था। स्त्रियाँ भी यीशु को जानती और प्रेम करती थीं और सुसमाचार की वाहक थीं। वे हमें याद दिलाते हैं कि महिलाओं और पुरुषों को दुनिया में यीशु के प्रेम के जीवित गवाह, आशा के राजदूत और दया के प्रेरित और प्रेरक होने के लिए बुलाया गया है। चाहे हमें धार्मिक, विवाहित, अविवाहित, या किसी भी स्थिति में हो, हम सभी को यरूशलेम की परिषद के उस 'पत्र' द्वारा सुसमाचार की घोषणा करने और हमारे पुनर्जीवित मसीह के आनंद में जीने के लिए अनिवार्य किया गया है। 

 ✍ -Br. Biniush Topno
All copyright received ©
www.catholicbibleministey1.blogspot.com