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मंगलवार, 14 दिसंबर, 2021

 

मंगलवार, 14 दिसंबर, 2021

आगमन का तीसरा सप्ताह

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पहला पाठ : सफ़न्याह का ग्रन्थ 3:1-2,9-13


1) उस विद्रोही, दूषित और कठोर हृदय नगर को धिक्कार!

2) उसने न तो कभी प्रभु की वाणी पर ध्यान दिया और न कभी उसकी चेतावनी ही स्वीकारी। उसने कभी प्रभु पर भरोसा नहीं रखा। वह कभी उसकी शरण नहीं गया।

9) मैं लोगों के होंठ फिर शुद्ध करूँगा, जिससे वे सब-के-सब प्रभु का नाम लें और एक हृदय हो कर उसकी सेवा करें।

10) इथोपिया की नदियों के उस पार से मेरे बिखरे हुए उपासक चढ़ावा लिये मेरे पास आयेंगे।

11) उस दिन तुम्हें लज्जित नहीं होना पडे़गा- तुम्हारे बीच मेरे विरुद्ध कोई पाप नहीं किया जायेगा, क्योंकि मैं तुम लोगों में से डींग हाँकने वाले अहंकारियों को दूर करूँगा। उसके बाद मेरे पवित्र पर्वत पर कोई भी घमण्ड नहीं करेगा।

12) मैं तुम लोगों के देश में एक विनम्र एवं दीन प्रजा को छोड़ दूँगा। जो इस्राएल में रह जायेंगे, वे प्रभु के नाम की शरण लेंगे।

13) वे अधर्म नहीं करेंगे, झूठ नहीं बोलेंगे और छल-कपट की बातें नही करेंगे। वे खायेंगे-पियेंगे और विश्राम करेंगे और कोई भी उन्हें भयभीत नहीं करेगा।


सुसमाचार : मत्ती 21:28-32


28) "तुम लोगों का क्या विचार है? किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। उसने पहले के पास जाकर कहा, ’बेटा जाओ, आज दाखबारी में काम करो’।

29) उसने उत्तर दिया, ’मैं नहीं जाऊँगा’, किन्तु बाद में उसे पश्चात्ताप हुआ और वह गया।

30) पिता ने दूसरे पुत्र के पास जा कर यही कहा। उसने उत्तर दिया, ’जी हाँ पिताजी! किन्तु वह नहीं गया।

31) दोनों में से किसने अपने पिता की इच्छा पूरी की?" उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, "पहले ने"। इस पर ईसा ने उन से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - नाकेदार और वैश्याएँ तुम लोगों से पहले ईश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे।

32) योहन तुम्हें धार्मिकिता का मार्ग दिखाने आया और तुम लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया, परन्तु नाकेदारों और वेश्याओं ने उस पर विश्वास किया। यह देख कर तुम्हें बाद में भी पश्चात्ताप नहीं हुआ और तुम लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में दो पुत्रो के दृष्टांत को येसु बताते है। एक पुत्र ने ईश्वर-पिता की इच्छा पूरी की, दूसरे ने पिता कि इच्छा को अस्वीकार किया। इसी प्रकार ईश्वर सभी को स्वर्गराज्य में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हैं। यही ईश्वर की इच्छा थी। गैर-यहूदी, नाकेदार, पापियों ने ईश्वर की इच्छा को स्वीकार किया। लेकिन फरीसी, शास्त्री, सदूकी इन्होंने ईश्वर की इच्छा को अस्वीकार किया | हम भी कई बार ईश्वर को हाँ कहते हैं। लेकिन प्रभु कि इच्छा पूरा करने में विफल हो जाते हैं। येसु हम सभों के लिए उदाहरण है। जिन्होंने अंत तक ईश्वर कि इच्छा को पूरा किया। संत योहन 5:30 में येसु कहते हैं "मैं अपनी इच्छा नहीं, बल्कि जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ।" योहन 4:34 में येसु कहते हैं, "जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना यही मेर भोजन है | फ़िर भी मेरी नहीं बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो|" हम भी पिता की इच्छा को समझे और पूरा करे।



📚 REFLECTION



In today’s Gospel Jesus tells us about the parable of two sons. Father invites both of them for work. One of them obeyed and the other one disobeyed him. Likewise Jesus invites all of us to enter into the kingdom of heaven. This is the will of God; many accepted the will of God. Even tax collectors, gentiles, sinners accepted the will of God but the Pharisees and Sadducees failed to accept Jesus and his teachings. Many times we too say yes and accept the will of God but failed to practice. Jesus himself is the greatest example for all of us who obeyed his Abba until the end of his time even to the point of death.

Jesus says in (Jn 5:30) “I seek to do not my own will but the will of him who sent me”.

“My food is to do the will of him who sent me and to complete his work”. (Jn 4:34)

“I want to your will to be done, not mine”. (Mk 14:36)

Let us understand and accept the will of God and fulfill it.


 -Br. Biniush Topno


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सोमवार, 13 दिसंबर, 2021

 

सोमवार, 13 दिसंबर, 2021

आगमन का तीसरा सप्ताह

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पहला पाठ : गणना 24:2-7,15-17


2) अपनी आँखें ऊपर उठायीं और इस्राएलियों को देखा, जो अपने-अपने वंश के अनुसार शिविर डाल चुके थे। ईश्वर का आत्मा उस पर उतरा

3) और वह अपना यह काव्य सुनाने लगाः

4) यह उसकी भविष्यवाणी है, जो ईश्वर के वचन सुनता

5) याकूब! तुम्हारे तम्बू कितने सुन्दर है!

6) वे घाटियों की तरह फैले हुए हैं,

7) इस्राएलियों के पात्र जल से भरे रहेंगे,

15) इसके बाद बिलआम ने फिर कहा

16) यह उसकी भविष्यवाणी है, जो ईश्वर के वचन सुनता

17) मैं उसे देखता हूँ - किन्तु वर्तमान में नहीं,


सुसमाचार : मत्ती 21:23-27


23) जब ईसा मंदिर पहुँच गये थे और शिक्षा दे रहे थे, तो महायाजक और जनता के नेता उनके पास आ कर बोले, "आप किस अधिकार से यह सब कर रहें हैं? किसने आप को यह अधिकार दिया ?"

24) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "मैं भी आप लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। यदि आप मुझे इसका उत्तर देंगे, तो मैं भी आपको बता दूँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।

25) योहन का बपतिस्मा कहाँ का था? स्वर्ग का अथवा मनुष्यों का?" वे यह कहते हुए आपस में परामर्श करते थे - "यदि हम कहें: ’स्वर्ग का’, तो यह हम से कहेंगे, ’तब आप लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया?’

26) यदि हम कहें: ’मनुष्यों का’, तो जनता से डर है! क्योंकि सब योहन को नबी मानते हैं।"

27) इसलिए उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, "हम नहीं जानते"। इस पर ईसा ने उन से कहा, "तब मैं भी आप लोगों को नहीं बताऊँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।.


📚 मनन-चिंतन.


आज के सुसमाचार में महायाजक, येसु से उनके अधिकार को चुनौती देते हुए उनसे प्रश्न करते हैं। आप किस अधिकार से यह कर रहे हैं। येसु स्वयं ईश्वर के पुत्र थे। उन्हें अधिकार ईश्वर से प्राप्त था। "मैंने अपने पिता के यहां जो देखा है, वहीं कहता हूँ (योहन 8:38) "कोई मुझसे मेरा जीवन नहीं हर सकता, मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता कि ओर से यह आदेश मिला है। (योहन 10:18)

बाईबल में हम पढ़ते हैं की बहुत से लोगों ने विश्वास किया और येसु को मसीह के रूप में स्वीकार किया। मत्ती 14:33 में पढ़ते हैं, जब येसु पानी पर चलते हुए शिष्यों के पास आये। उन्होंने आँधी को शांत किया। शिष्यों ने दंडवत करते हुए कहा आप ईश्वर के पुत्र है। मत्ती 16:16 में येसु शिष्यों से पुछते हैं कि तुम क्या रहते हो, मैं कौन हूँ? पेत्रुस उत्तर देता है, "आप जीवन ईश्वर के पुत्र हैं" आप मसीह है ।"

योहन11:27 में मार्था येसु से कहती है "प्रभु मैं दृढ विश्वास करती हूँ, कि आप मसीह है, ईश्वर के पुत्र है जो संसार में आने वाले थे।" इस प्रकार जिन लोगों ने भी येसु के अधिकार को स्वीकार किया। उन्होंने येसु के अनुग्रह व आशीष को पाया।



📚 REFLECTION



In today’s gospel the chief priests and the elders of the people challenge Jesus of his authority. In fact Jesus was the son of God and had got the authority from his father. He says; “I am telling you what I saw when I was with my Father” (Jn 8:38).

No one can take my life from me. I sacrifice it voluntarily. For I have the authority to lay it down when I want to and also to take it up again. For this is what my Father has commanded”. (Jn10:18)

In the Holy Bible we see many people believed in Jesus and accepted His authority. In (Mth 14:33) we read, when Jesus came towards them, walking on the water. He calmed down the strong wind. Then the disciples worshipped Him. “You really are the Son of God”. In (Mth 16:16) Jesus asked them, “But who do you say I am?” Simon peter answered, “You are the Messiah, the Son of the living God.” In ( Jn 11:27) Martha says, yes Lord , “ I have always believed you are the Messiah, the Son of God, the one who has come into the world from God”.

In this way whoever accepted Jesus authority got the mercy and blessings of Jesus.


मनन-चिंतन - 2


येसु ने अपने कई कार्यों और संदेशों में महान ज्ञान का प्रदर्शन किया। मत्ती 22: 23-34 में, हम देखते हैं कि उन्होंने कैसे सदूकियों को चुप कराया जब उन्होंने मृतकों के पुनरुत्थान पर उनके साथ चर्चा की। जब लोगों ने उन्हें अपने सवालों के जाल में फंसाने की कोशिश की, तो उन्होंने उन्हें एक अप्रत्याशित और असाधारण जवाब दिया। योहन 8: 7 में, येसु ने व्यभिचार में पकड़ी गई महिला को पत्थर मारने पर अड़ी हुई हिंसक भीड़ को बताया, "तुम में जो निष्पाप हो, वह इसे सब से पहले पत्थर मारे"। इससे उन्हें खुद को आत्मनिरीक्षण करना पड़ा और अपनी कमियों का एहसास हुआ। ईश्वर का वचन हृदय के रूपांतरण के लिए है। यह तभी संभव है जब हर कोई जो ईश्वर का वचन सुनता है, वह इसे सबसे पहले स्वयं पर लागू करता है, किसी और पर लागू करने से पहले। संत याकूब अपने पत्र 1: 22-25 में ईश्वर के वचन की तुलना दर्पण से करते हैं जिसमें हम स्वयं को देखते हैं। आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रधान याजक और जनता के नेता येसु से पूछते हैं कि उनके पास क्या अधिकार है और किसने उन्हें यह अधिकार दिया है। उन्होंने शायद सोचा था कि वे इस सवाल से येसु पर अपना वर्चस्व स्थापित करेंगे। लेकिन येसु ने उनके सवाल का जवाब देने के बजाय, उनसे एक सवाल किया और नतीजतन वे चुप हो गए। ईश्वर के साथ हर मुलाकात आत्मनिरीक्षण, सुधार और आत्म-नवीनीकरण का समय है। हो सकता है कि क्रिसमस का पर्व हममें से प्रत्येक के लिए आत्म-नवीनीकरण का समय हो।


REFLECTION


Jesus exhibited great wisdom in many of his actions and messages. In Mt 22:23-34, we see how he silenced the Sadducees when they discussed with him on the resurrection of the dead. When people tried to trap him by their questions, oftentimes he gave them an unexpected and extraordinary answer. In Jn 8:7, Jesus told the violent crowd who were adamant on stoning the woman caught in adultery to death, “Let anyone among you who is without sin be the first to throw a stone at her”. This led them to introspect themselves and realize their own shortcomings. The Word of God is meant for conversion of the heart. This is possible only when everyone who hears the Word of God applies it first of all to the self, before applying it to anyone else. In the Letter of St. James 1:22-25 the Word of God is compared to a mirror in which we see ourselves. In today’s Gospel we find the chief priests and the elders of the people asking Jesus as to what authority he had and who gave him that authority. They probably thought that by this question they would establish their supremacy over Jesus. But instead of answering their question, Jesus put a counter-question to them and as a result they were silenced. Every encounter with God is a time for introspection, correction and self-renewal. May the coming feast of Nativity be a time of self-renewal for each one of us./p>


 -Br. Biniush topno


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इतवार, 12 दिसंबर, 2021

 

इतवार, 12 दिसंबर, 2021

आगमन का तीसरा इतवार

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पहला पाठ : सफ़न्याह का ग्रन्थ 3:14-18a


14) सियोन की पुत्री! आनन्द का गीत गा। इस्राएल! जयकार करो! येरुसालेम की पुत्री! सारे हृदय से आनन्द मना।

15) प्रभु ने तेरा दण्डादेश रद्द किया और तेरे शत्रुओं को भगा दिया है। प्रभु तेरे बीच इस्राएल का राजा है।

16) विपत्ति का डर तुझ से दूर हो गया है। उस दिन येरुसालेम से कहा जायेगा-’’सियोन! नहीं डरना, हिम्मत नहीं हारना। तेरा प्रभु-ईश्वर तेरे बीच है।

17) वह विजयी योद्धा है। वह तेरे कारण आनन्द मनायेगा, वह अपने प्रेम से तुझे नवजीवन प्रदान करेगा,

18) वह उत्सव के दिन की तरह तेरे कारण आनन्दविभोर हो जायेगा।’’।


दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:4-7.


4) आप लोग प्रभु में हर समय प्रसन्न रहें। मैं फिर कहता हूँ, प्रसन्न रहें।

5) सब लोग आपकी सौम्यता जान जायें। प्रभु निकट हैं।

6) किसी बात की चिन्ता न करें। हर जरू़रत में प्रार्थना करें और विनय तथा धन्यवाद के साथ ईश्वर के सामने अपने निवेदन प्रस्तुत करें

7) और ईश्वर की शान्ति, जो हमारी समझ से परे हैं, आपके हृदयों और विचारों को ईसा मसीह में सुरक्षित रखेगी।.


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 3:10-18


10) जनता उस से पूछती थी, ’’तो हमें क्या करना चाहिए?’’

11) वह उन्हें उत्तर देता था, ’’जिसके पास दो कुरते हों, वह एक उसे दे दे, जिसके पास नहीं है और जिसके पास भोजन है, वह भी ऐसा ही करे’’।

12) नाकेदार भी बपतिस्मा ग्रहण करते थे और उस से यह पूछते थे, ’’गुरुवर! हमें क्या करना चाहिए?’’

13) वह उन से कहता था, ’’जितना तुम्हारे लिये नियत है, उस से अधिक मत माँगों’’।

14) सैनिक भी उस से पूछते थे, ’’और हमें क्या करना चाहिए?’’ वह उन से कहता था, ’’किसी पर अत्याचार मत करो, किसी पर झूठा दोष मत लगाओ और अपने वेतन से सन्तुष्ट रहो’’।

15) जनता में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी और योहन के विषय में सब मन-ही-मन सोच रहे थे कि कहीं यही तो मसीह नहीं है।

16) इसलिए योहन ने सबों से कहा, ’’मैं तो तुम लोगों को जल से बपतिस्मा देता हूँ; परन्तु एक आने वाले हैं, जो मुझ से अधिक शक्तिशाली हैं। मैं उनके जूते का फ़ीता खोलने योग्य नहीं हूँ। वह तुम लोगों को पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देंगे।

17) वह हाथ में सूप ले चुके हैं, जिससे वह अपना खलिहान ओसा कर साफ़ करें और अपना गेहूँ अपने बखार में जमा करें। वह भूसी को न बुझने वाली आग में जला देंगें।’’

18) इस प्रकार के बहुत-से अन्य उपदेशों द्वारा योहन जनता को सुसमाचार सुनाता था।


📚 मनन-चिंतन


हम आगमन काल के तीसरे रविवार में प्रवेश करते हैं। इस आगमन काल में हम प्रभु येसु के जन्मोत्सव के लिए अपने आप को तैयार करते हैं। वही मनोभाव हम योहन बपतिस्ता में पाते हैं। वह लोगों को बपतिस्मा दे रहा था। उन्हें स्वर्गराज्य के लिए तैयार कर रहा था। लोगों ने सोचा कहीं यहीं तो मसीह नहीं है। उन्होंने उनसे पूछा कही वह आप तो नहीं? यहां हम योहन बपतिस्ता की विनम्रता को देखते हैं। वह कहते है मै मसीह नही हूँ परन्तु जो आने वाले है, मैं तो उनके जूते का फिता खोलने के योग्य भी नहीं हूँ। वह विनम्र भाव से येसु की प्रशंसा करता है। हम भी इस आगमन काल में योहन की तरह विनम्र बने। ईश्वर की स्तुति प्रशंसा विनम्रता के साथ करे। ईश्वर ने जो कुछ हमे प्रदान किया है उसी में संतुष्ट रहे।



📚 REFLECTION



We have entered into the third Sunday of Advent and with great enthusiasm we are preparing ourselves to welcome Jesus our savior. The same attitude we find in John the Baptist. He was baptizing people, preparing them for the kingdom of God. Seeing John people thought whether he might be the Messiah. We see the humility of John the Baptist. he says I am not the messiah but one who is coming after me, I am not worthy to untie the thong of his sandal. He praises Jesus with humility.

In this Advent season, Let us learn to be humble like John the Baptist and praise the Lord with humble heart.



मनन-चिंतन - 2


आज के पवित्र वचनों में आनन्द मनाने के लिए हमें आह्वान किया गया है क्योंकि प्रभु येसु ही हमारा उद्धारकर्ता है। प्रभु येसु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकारने वाले प्रसन्न रहेंगे और सौम्यता दर्शायेंगे। आनन्द और सौम्यता येसु में मुक्ति प्राप्त किये लोगों का स्वभाव होता है और इस कारण संत पौलुस कहते हैं, “आप लोग प्रभु में हर समय प्रसन्न रहें। ... सब लोग आपकी सौम्यता जान जायें।“ (फिलिप्पियों 4,4-5)

सुसमाचार में मुक्तिदाता येसु के लिए लोगों के ह्रदय को तैयार करने एवं लोगों को प्श्चताप के बपतिस्मा द्वारा मन परिवर्तन कराने यर्दन नदी के किनारे पहुँचे योहन से नाकेदार, सैनिक और अन्य लोगों ने पूछा – “हमें क्या करना चाहिए?” (लूकस 3,12)। नाकेदारों एवं सैनिकों को यहूदी लोग पापी और देशद्रोही मानते थे क्योंकि वे लोग यहूदियों पर अधिपत्य जमाये विदेशी शासकों के लिए नौकरी करते थे। फिर भी योहन ने उनसे नौकरी छोडने को नहीं बल्कि ईमानदारी से नौकरी करने को कहा। योहन नाकेदारों को कहता था, “जितने तुम्हारे लिए नियत है, उससे अधिक मत मॉगो।“ (लूकस 3,13) योहन सैनिकों से कहता था, “किसी पर अत्याचार मत करो, किसी पर छूटा दोष मत लगाओ और अपने वेतन से संतुष्ट रहो” (लूकस 3,14)। येसु की मुक्ति पाने के लिए मन परिवर्तन की जरूरत है जो लालच और स्वार्थ से दूर रहना है; दूसरों की भलाई चाहना है और स्वयं संतुष्ट रहना है। येसु को अपने मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार करने वालों के जीवन ही आनन्द, प्रेम और सेवा कार्य से भर जाता है।

मुक्ति किसी के लिए भी अप्राप्य नहीं है। मुक्ति अनर्जित, शर्तरहित और मुफ्त है। सबसे कठोर व्यक्ति भी मुक्ति पा सकता है। ख्रीस्तीय इतिहास ऐसे हजारों लोगों का है जो विपरीत दिशा में होकर पाप के वश में चलते रहे लेकिन येसु ने उनका उद्धार किया और वे येसु के वचन के साक्षी बन गये। 19वॉ शताब्दी में जीवित एवं अमेरिकी सैन्य में उॅचे पद तक पहॅचे मेजर डानिएल वेबस्टर वाइटली एक बडे सुसमाचार प्रचारक थे। उन्होंने प्रभु येसु मसीह को अपने मुक्तिदाता के रूप में कैसे स्वीकार किया जिसका वर्णन वेबस्टर स्वयं इस प्रकार करता है -

“मेरी मॉ एक ख्रीस्तीय भक्त स्त्री थी। मैं इंग्लेंड में युद्ध के लिए जा रहा था और मेरी माताजी ने मुझे रोती हुई विदा किया और उसकी बहुत सी प्रार्थनाएं मेरे साथ थी। उन्होंने मेरी थैली में बाइबल का नया विधान रखा थ जिसको मैं ने कभी नहीं पढा। युद्ध बहुत भयानक था और मैं ने उस युद्ध में बहुत दुख भरी घटनाओं को देखा और उसी दिन मैं भर घायल होकर गिर पडा। उस रात को मेरे एक हाथ को शल्यक्रिया से काट दिया गया। मेरा घाव जैसे ही ठीक हो रहा था, मुझे कुछ पढने की इच्छा हुई और पहली बार मैं थैली से नए विधान को निकालकर पढने लगा। मत्ती, मार्कुस... प्रकाशन ग्रन्थ। सब कुछ मुझे अच्छा लगा और मैं उनको पुनः पढा और मैं समझ रहा था कि येसु ही सच्चा मुक्तिदाता है। किंतु मुझको क्रिश्चियन बनने का कोई इरादा नहीं था।

“मैं अपने पापों पर पश्चताने या येसु को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने की मनोदशा में नहीं था और मैं सोने गया और मध्य रात्रि में मुझे एक नर्स ने गहरी नींद से जगाकर कहा, “वार्ड में आपका एक आदमी ;भौजी पडा है, वह मर रहा है। वह बीते एक घण्डे से उस पर प्रार्थना करने के लिए मुझे तंग कर रहा है। उसकी पीडा को मैं देख नहीं सकता। लेकिन मैं पापी हूँ और मैं प्रार्थना नहीं कर सकता। मैं आपको बुलाने आया हूँ, आप आकर उस पर प्रार्थना करें।“

“मईं ने कहा, “मैं प्रार्थना नहीं कर सकता। मैं ने कभी प्रार्थना नहीं किया हूँ और मैं भी पापी मनुष्य हूँ। मैं प्रार्थना नहीं कर सकता।” नर्स ने कहा, “आपको देखकर मैं ने सोचा कि आप प्रार्थना करने वाला व्यक्ति है। इस रात को मैं कहॉ जाउॅ ! मैं अकेले उसके पास नहीं जा सकता। आप आकर उसे जरा मिल लीजिए।” नर्स के कहने पर मैं उस लडके के पास गया। 17-18 वर्ष उम्र का वह भौजी मरने को था। वह बहुत दुखी था और वह मेरी ओर देखकर कहा, “मैंरे लिए प्रार्थना कीजिए, मैं मरने को हूँ। मेरे माता पिता और मैं गिरजा जाते थे और मैं एक अच्छा लडका था किंतु फौज में आने के बाद मैं बुरा बन गया - शराब, बुरी संगति, जुआ और हर प्रकार का पाप के वश में मैं आ गया। मैं मरने को हूँ। ईश्वर से मेरे लिए प्रार्थना कीजिए; प्रभु येसु से प्रार्थना कीजिए कि वे मेरा उद्धार करें।”

“जैसे ही मैं खडा था, पवित्र आत्मा की आवाज मुझे साफ शब्दों में कहते हुए सुनाई दी - तुम मुक्ति के रास्ते को पहचान चुके हो; तुरन्त घुटने टेको, येसु को अपने हृदय में स्वीकार करो और इस लडके केलिए प्रार्थना करो। मैं ने घुटने टेका, लडके के हाथ को अपने हाथों में थाम लिया और अपने पापों के लिए माफी मॉगा। मैं ने विश्वास किया कि प्रभु ने मुझे क्षमा की और मैं ने उस लडके के लिए प्रार्थना की। वह शॉत हो गया। जैसे ही मैं उठा वह इस संसार से अल्विदा कह चुके थे। प्रभु ने मरते हुए एस लडको को मुझे येसु के पास आने और मुक्ति दिलाने के लिए इस्तेमाल किया।”

इस आगमन काल में, हम प्रभु येसु को अपने जीवन में स्वीकार करें। येसु ही मेरा उद्धारकर्ता है। इस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए अपने पापों पर पश्चताप करना अनिवार्य है। येसु को अपने जीवन में स्वीकार करने वाले आनन्दित होते और सौम्यता का बर्ताव करते है।


-Br. Biniush topno


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शनिवार, 11 दिसंबर, 2021

 

शनिवार, 11 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

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पहला पाठ: प्रवक्ता-ग्रन्थ 48:1-4.9-11


1) तब एलियाह अग्नि की तरह प्रकट हुए। उनकी वाणी धधकती मशाल के सदृश थी।

2) उन्होंने उनके देश में अकाल भेजा और अपने धर्मोत्साह में उनकी संख्या घटायी।

3) उन्होंने प्रभु के वचन से आकाश के द्वार बन्द किये और तीन बार आकाश से अग्नि गिरायी।

4) एलियाह! आप अपने चमत्कारों के कारण कितने महान् है! आपके सदृश होने का दावा कौन कर सकता है!

9) आप अग्नि की आँधी में अग्निमय अश्वों के रथ में आरोहित कर लिये गये।

10) आपके विषय में लिखा है, कि आप निर्धारित समय पर चेतावनी देने आयेंगे, जिससे ईश्वरीय प्रकोप भड़कने से पहले ही आप उसे शान्त करें, पिता और पुत्र का मेल करायें और इस्राएल के वंशों का पुनरुद्धार करें।

11) धन्य हैं वे, जिन्होंने आपके दर्शन किये, जो आपके प्रेम से सम्मानित हुए!


सुसमाचार : सन्त मत्ती 17:9a.10-13


9) पहाड़ से उतरते समय उनके शिष्यों ने उन से पूछा, ’’शास्त्री यह क्यों कहते हैं कि पहले एलियस को आना है?’’

11) ईसा ने उत्तर दिया, ’’एलियस अवश्य सब कुछ ठीक करने आयेगा।

12) परन्तु मैं तुम लोगों से कहता हूँ- एलियस आ चुका है। उन्होंने उसे नहीं पहचाना और उसके साथ मनमाना व्यवहार किया। उसी तरह मानव पुत्र भी उनके हाथों दुःख उठायेगा।’’

13) तब वे समझ गये कि ईसा योहन बपतिस्ता के विषय में कह रहे हैं।


📚 मनन-चिंतन


आज के दोनों ही पाठों में हमें नबी एलीयस के बारे में बताया गया है कि नबी एलीयस अपने चमत्कारों के कारण कितने महान थे। वह अग्नि की आँधी में, अग्निमय अशवों के रथ में आरोहित कर लिये गये । सुसमाचार में शिष्य येसु से पूछते है कि क्या भविष्य में एलीयस दुबारा इस धरती पर आयेंगे। येसु उन्हें उत्तर देते है की एलीयस आ चुका है। लोगों ने उसे नहीं पहचाना। उसके साथ मनमाना व्यवहार किया। साथ ही साथ येसु अपने मरण की भविष्यवाणी करते हुए कहते हैं। ठीक उसी तरह मानव पुत्र भी दुख उठायेगा। शिष्य येसु की बातों को समझ नहीं सके। उन्होंने सोचा येसु योहन बपतिस्ता के बारे में कह रहे है। कई बार हम भी येसु कि बातों को नहीं समझ पाते है कि वह हमसे क्या कहना चाहते है। अपनी वयस्त जिंदगी में हम येसु की आवाज को सुन नहीं पाते हैं। आइये हम अपने मन हृदय और कानों को खुला रखे। ईश्वरीय वचन को सुनने और समझने के लिए तत्पर रहे और उसका पालन करे ।


📚 REFLECTION



In both the readings of todays, we hear about Prophet Elijah .who was known for his miracles. In the Gsopel disciples ask Jesus will Elijah come again on this earth. Jesus answered them Elijah had already come and the people failed to recognize him and they misbehaved with him. Also Jesus foretells of his death and says, the son of man has to undergo suffering and death. The disciples could not understand and they thought Jesus is talking about John the Baptist.

Very often we too fail to understand the word of the Lord. In our busy life, often we fail to hear His voice, which He wants to convey to us. Let us open our hearts and mind to listen and understand the word of the Lord and apply his words in our lives.



मनन-चिंतन - 2



आज के सुसमाचार में प्रभु येसु नबी एलियाह के दूसरे आगमन के बारे में बात करते हैं। कई यहूदी लोगों का मानना था कि एलिय्याह मसीह के आने से पहले फिर से आयेंगे। एलियाह यहूदी नबियों की प्रतिनिधि है। उन्होंने इस्राएल के नेताओं और लोगों को अपने पापमय जीवन छोड़ने और प्रभु के पास वापस जाने के लिए प्रेरित किया। राजाओं के पहले ग्रन्थ के अध्याय अठारह में हम पढ़ते हैं कि नबी एलियाह ने बाल देव के चार सौ पचास नबियों की उपस्थिति में कार्मेल पहाड़ पर इकट्ठे हुए लोगों से प्रभु ईश्वर के बारे में एक निश्चित रुख अपनाने के लिए कहा। उन्होंने कहा, “तुम लोग कब तक आगा-पीछा करते रहोगे? यदि प्रभु ही ईश्वर है, तो उसी के अनुयायी बनो और यदि बाल ईश्वर है, तो उसी के अनुयायी बनो।”(1राजाओं 18:21)। हम आगे पढ़ते हैं कि लोगों ने अंत में प्रभु ईश्वर पर अपने विश्वास को प्रकट करते हुए कहा, “प्रभु ही ईश्वर है! प्रभु ही ईश्वर है!”(1राजाओं 18:39)। राजाओं के दूसरे ग्रन्थ अध्याय 2 वाक्य 11 में हम नबी एलियाह के स्वर्ग चढ़ने की शानदार घटना देखते हैं। हम पढ़ते हैं, "वे बातें करते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि अचानक अग्निमय अश्वों-सहित एक अग्निमय रथ ने आ कर दोनों को अलग कर दिया और एलियाह एक बवण्डर द्वारा स्वर्ग में आरोहित कर लिया गया।"। मलाकी के ग्रन्थ 4: 5 में, एक भविष्यवाणी है जो कहती है, "देखो, उस महान् एवं भयानक दिन के पहले, प्रभु के दिन के पहले, मैं नबी एलियाह को तुम्हारे पास भेजूँगा।"। इसलिए यहूदियों का विश्वास था कि नबी एलियाह फिर से आयेंगे। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि प्रभु ईश्वर, एक नबी के माध्यम से एक बार फिर से, जो उन्होंने एलियाह के द्वारा किया, उसी को दोबारा करेंगे; वे लोगों को प्रभु के पास लौटने और प्रभु ईश्वर के लिए एक निश्चित रुख अपनाने की चुनौती देंगे। संत योहन बपतिस्ता ने यही किया। आज हमें प्रभु के पास लौटने और प्रभु ईश्वर के लिए एक निश्चित रुख अपनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है।



REFLECTION



In today’s Gospel, Jesus speaks about the second coming of Elijah. Many Jewish people believed that Elijah would come again before the arrival of the Messiah. Elijah stands for the Jewish Prophecy. He eloquently called the leaders and people of Israel to leave their sinful ways and return to the Lord. In 1Kings 18 we read that Elijah asked the people who gathered at Mount Carmel, in the presence of four hundred and fifty prophets of Baal, to take a definitive stand for God. He said, “How long will you go limping with two different opinions? If the Lord is God, follow him; but if Baal, then follow him” (1Kings 18:21). We read further that the people finally acclaimed “The Lord indeed is God; the Lord indeed is God” (1Kings 18:39). In 2Kings 2:11 we read about Prophet Elijah’s spectacular ascent into heaven in a fiery chariot. We read, “As they continued walking and talking, a chariot of fire and horses of fire separated the two of them, and Elijah ascended in a whirlwind into heaven”. In Malachi 4:5, we have a prophecy which says, “Lo, I will send you the prophet Elijah before the great and terrible day of the Lord comes”. Hence there was a belief among the Jewish people that Elijah would come again. What does it mean? It means that God, through a prophet once again will accomplish what Elijah accomplished; that he would challenge people to return to the Lord and take a definitive stand for God. This is what St. John the Baptist did. Today we are invited to return to the Lord and take a definitive stand for God.


 -Br. Biniush topno


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शुक्रवार, 10 दिसंबर, 2021

 

शुक्रवार, 10 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 48:17-19


17) प्रभु, इस्राएल का परमपावन ईश्वर, तुम्हारा उद्धारक यह कहता हैः “मैं प्रभु, तुम्हारा ईश्वर हूँ। मैं तुम्हें कल्याण की बातें बतलाता हूँ और मार्ग में तुम्हारा पथप्रदर्शन करता हूँ।

18) “यदि तुमने मेरी आज्ञाओं का पालन किया होता, तो तुम्हारी सुख-शान्ति नदी की तरह उमड़ती रहती और तुम्हारी धार्मिकता समुद्र की लहरों की तरह।

19) “तुम्हारे वंशज बालू की तरह हो गये होते, तुम्हारी सन्तति उसके कणों की तरह असंख्य हो जाती। उसका नाम कभी नहीं मिटता और मैं उसे कभी अपनी दृष्टि से दूर नहीं करता।“

सुसमाचार : सन्त मत्ती 11:16-19

16) ’’मैं इस पीढ़ी की तुलना किस से करूँ? वे बाजार में बैठे हुए छोकरों के सदृश हैं, जो अपने साथियों को पुकार कर कहते हैं-

17) हमने तुम्हारे लिए बाँसुरी बजायी और तुम नहीं नाचे, हमने विलाप किया और तुमने छाती नहीं पीटी;

18) क्योंकि योहन बपतिस्ता आया, जो न खाता और न पीता है और वे कहते हैं- उसे अपदूत लगा है।

19) मानव पुत्र आया, जो खाता-पीता है और वे कहते हैं- देखो, यह आदमी पेटू और पियक्कड़ है, नाकेदारों और पापियों का मित्र है। किन्तु ईश्वर की प्रज्ञा परिणामों द्वारा सही प्रमाणित हुई है।’’


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में फरीसी येसु व योहन बपतिस्ता को समझने में असफ़ल रहे। उनका दृष्टिकोण येसु व योहन के प्रति नकारात्मक था। उन्होंने येसु की शिक्षाओं को सुना उनके कार्यों को देखा। फिर भी वह येसु और योहन की आलोचना करते हैं। उन्हें पूर्णता अस्वीकार कर देते है। येसु उन्हें आनंद, शान्ति, प्रेम का संदेश देना चाहते थे। योहन उन्हें पश्चाताप का संदेश देना चाहते थे। फिर भी फरीसी संतुष्ट नहीं हुए। इस प्रकार वह येसु को नहीं पहचान सके । सत्य को नहीं जान सके पाये। *संत पौलुस कहते हैं। आप इस संसार के अनुकूल न बने, बल्कि सब कुछ नयी दृष्टि से देखे और अपना स्वाभाव बदल ले।" ( रोमियों 12:2)

आइये हम भी अपनी नकारत्मक दृष्टिकोण को बदले और येसु की इच्छाओं को स्वीकार करे।




📚 REFLECTION




In today’s Gospel the Pharisees failed to understand Jesus and John the Baptist. Their perception about Jesus and John was totally negative. They heard the teachings of Jesus and saw the miracle of Jesus yet failed to accept Him because of their negative perception about Jesus and John. John the Baptist preached the message of repentance but the Pharisees were not satisfied with the preaching of John the Baptist. Whereas Jesus brought the message of love Joy and peace but they criticized both of them and refused to accept Jesus and John. As a result they failed to recognize Jesus.

St. Paul says in (Rom 12:2) “Do not be conformed to this world but be transformed by the renewing of your minds, so that you may discern what is the will of God – what is good and acceptable and perfect.”

Let us not be like Pharisees rather strive to change our negative perception about others and accept the will of God in our lives.



मनन-चिंतन - 2



आज के सुसमाचार में प्रभु येसु अपने समय के लोगों के दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने उन्हें हर चीज से असंतुष्ट पाया। उस समय के लोगों ने संत योहन बपतिस्ता को ’अपदूतग्रस्त’ कह कर उनका अस्वीकार किया। उन्होंने संत योहन के तपस्या के जीवन और पश्चाताप के सन्देश को स्वीकार नहीं किया। और न ही वे प्रभु येसु की जीवन-शैली और उनके सुसमाचार को स्वीकार करने के लिए तैयार थे। समस्या न तो योहन बपतिस्ता की थी और न ही येसु की। समस्या उन लोगों के दृष्टिकोण में थी। वे अपने दृष्टिकोण में निराशावादी थे और हर किसी और हर चीज से असंतुष्ट थे। येसु ने उनकी तुलना बाजार के अपरिपक्व बच्चों से की। विश्वासियों को हर जगह अच्छाई की सराहना करने और स्वीकार करने के लिए विकसित होना है। रचनात्मक और निर्माणकारी आलोचना व्यक्तियों और उद्यमों की वृद्धि के लिए अच्छी है। विनाशकारी और निराशावादी आलोचना किसी की मदद नहीं करेगी। यह उस शैतान का काम है जो हर जगह असंतोष और विभाजन पैदा करता है। ईश्वर आनन्द और एकता लाते हैं।



REFLECTION


In today’s Gospel Jesus questions the attitudes of the people of his time. He found them dissatisfied with everything. They did not accept John the Baptist labelling him as ‘possessed’. They did not accept his life of austerity and his teaching of repentance. Nor were they ready to accept Jesus with his sociable life-style and his good tidings. The problem was neither with John the Baptist nor with Jesus. The problem was in their outlook. They were pessimistic in their approach and dissatisfied with everyone and everything. Jesus compared them with immature children in the market place. Believers have to grow to appreciate and accept goodness everywhere. Constructive and creative criticism is good for the growth of persons and enterprises. Destructive and pessimistic criticism will not help anyone. It is the devil who sows seeds of dissatisfaction and divisiveness. God brings contentment and unity.


 -Br. Biniush topno


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गुरुवार, 09 दिसंबर, 2021

 

गुरुवार, 09 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 41:13-20


13) क्योंकि मैं तुम्हारा प्रभु-ईश्वर हूँ। मैं तुम्हारा दाहिना हाथ पकड़ कर तुम से कहता हूँ- मत डरो, देखो, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा।

14) याकूब! तुम कीड़े-जैसे हो गये हो। इस्राएल! तुम शव-जैसे हो गये हो। प्रभु कहता है- मैं तुम्हारी सहायता करूँगा, इस्राएल का परमपावन प्रभु तुम्हारा उद्धारक है।

15) मैं तुम, को दँवरी का यन्त्र बनाता हूँ- नया, दुधारा और पैना। तुम पहाड़ों को दाँव कर चूर-चूर करोगे और पहाड़ियों को भूसी बना दोगे।

16) तुम उन्हें ओसाओगे- हवा उन्हें उड़ा ले जायेगी और आँधी उन्हें छितरा देगी। तुम प्रभु में आनन्द मनाओगे और इस्राएल के परमपावन ईश्वर पर गौरव करोगे।

17) “दरिद्र पानी ढूँढते हैं और पाते नहीं, उनकी जीभ प्यास के मारे सूख गयी है। मैं, प्रभु, उनकी दुहाई पर ध्यान दूँगा; मैं, इस्राएल का ईश्वर, उन्हें नहीं त्यागूँगा।

18) मैं उजाड़ पहाड़ियों पर से नदियाँ और घाटियों में जलधाराएँ बहा दूँगा। मैं मरुभूमि को झील बनाऊँगा और सूखी भूमि को जलस्रोतों से भर दूँगा।

19) मैं मरुभूमि में देवदार, बबूल, मेंहदी और जैतून लगा दूँगा। मैं उजाड़खण्ड में खजूर, चीड़ और चनार के वृक्ष लगाऊँगा।

20) इस प्रकार सब देख कर जानेंगे, सब उस पर विचार कर स्वीकार करेंगे कि प्रभु ने यह सब किया है, इस्राएल के परमपावन ईश्वर ने इसकी सृष्टि की है।“


सुसमाचार : सन्त मत्ती 11:11-15


11) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई पैदा नहीं हुआ। फिर भी, स्वर्ग राज्य में जो सबसे छोटा है, वह योहन से बड़ा है।

12) ’’योहन बपतिस्ता के समय से आज तक लोग स्वर्गराज्य के लिए बहुत प्रयत्न कर रहे हैं और जिन में उत्साह है, वे उस पर अधिकार प्राप्त करते हैं।

13) ’’योहन तक के नबी, और संहिता भी, सब-के-सब राज्य के विषय में केवल भविष्य वाणी कर सके।

14) तुम चाहो, तो मेरी बात मान लो कि योहन वही एलियस है, जो आने वाला था।

15) जिसके कान हों, वह सुन ले।


📚 मनन-चिंतन


आज के पहले पाठ में ईश्वर का वचन कहता है। मत डरो, देखो, मै तुम्हारी साहयता करूंगा। जब तक प्रभु हमारे साथ है। हमें डरने की जरूरत नहीं है। जो प्रभु में विश्वास करते है। प्रभु उनको संभालता है। आज हर कोई कोविड महामारी से डरा हुआ है। हमे भी ईश्वर पर विश्वास रखते हुए एक निडर होकर जीवन जीने का बुलावा है। आज के सुसमाचार मे येसु योहन बपतिस्ता कि प्रशंसा करते है। योहन ने ईश्वर के राज्य कि स्थापना के लिए एक अहम भूमिका निभायी थी। "बालक! तू सर्वोच्च ईश्वर का नबी कहलायेगा, क्योंकि प्रभु का मार्ग तैयार करने और उसकी प्रजा को उस मुक्ति का ज्ञान कराने के लिए, जो पापों की क्ष्मा द्वारा उसे मिलने वाली है, तू प्रभु का अग्रदुत बनेगा।" (लूकस 1:76-77) योहन बपतिस्ता की तरह हम भी प्रभु येसु का अनुसरण करे। और प्रभु के लिए मार्ग तैयार करे।



📚 REFLECTION



In today’s first reading the word of the Lord says “Do not Fear” I will help you. We need not fear until God is with us. Whoever believes in him God takes care of them. In today’s frightful situation of covid 19 pandemic situation people are living a fearful life. In this fearful situation God invites us to trust in him and to live a life without any fear.

In the Gospel Jesus praises John the Baptist .who has been played a vital role in the foundation of the kingdom of God. “And you, child, will be called the prophet of the most High; for you will go before the Lord to prepare his ways, to give knowledge of salvation to his people by the forgiveness of their sins.’’( Lk 1: 76-77) .

Like John the Baptist we too are called to follow Christ and to prepare the way for the Lord.


 -Br. Biniush topno


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बुधवार, 08 दिसंबर, 2021

 

बुधवार, 08 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

माता मरियम का निष्कलन्क गर्भागमन; आगमन काल का पहला सप्ताह

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पहला पाठ : उत्पत्ति ग्रन्थ 3:9-15.20


9) प्रभु-ईश्वर ने आदम से पुकार कर कहा, ''तुम कहाँ हो?''

10) उसने उत्तर दिया, ''मैं बगीचे में तेरी आवाज सुन कर डर गया, क्योंकि में नंगा हूँ और मैं छिप गया''।

11) प्रभु ने कहा, ''किसने तुम्हें बताया कि तुम नंगे हो? क्या तुमने उस वृक्ष का फल खाया, जिस को खाने से मैंने तुम्हें मना किया था?''

12) मनुष्य ने उत्तर दिया, ''मेरे साथ रहने कि लिए जिस स्त्री को तूने दिया, उसी ने मुझे फल दिया और मैंने खा लिया''।

13) प्रभु-ईश्वर ने स्त्री से कहा, ''तुमने क्या किया है?'' और उसने उत्तर दिया, ''साँप ने मुझे बहका दिया और मैंने खा लिया''।

14) तब ईश्वर ने साँप से कहा, ''चूँकि तूने यह किया है, तू सब घरेलू तथा जंगली जानवरों में शापित होगा। तू पेट के बल चलेगा और जीवन भर मिट्टी खायेगा।

15) मैं तेरे और स्त्री के बीच, तेरे वंश और उसके वंश में शत्रुता उत्पन्न करूँगा। वह तेरा सिर कुचल देगा और तू उसकी एड़ी काटेगा''।

20) पुरुष ने अपनी पत्नी का नाम 'हेवा' रखा, क्योंकि वह सभी मानव प्राणियों की माता है।


दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:3-6,11-12


3) धन्य है हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर और पिता! उसने मसीह द्वारा हम लोगों को स्वर्ग के हर प्रकार के आध्यात्मिक वरदान प्रदान किये हैं।

4) उसने संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हम को चुना, जिससे हम मसीह से संयुक्त हो कर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बनें।

5) उसने प्रेम से प्रेरित हो कर आदि में ही निर्धारित किया कि हम ईसा मसीह द्वारा उसके दत्तक पुत्र बनेंगे। इस प्रकार उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार

6) अपने अनुग्रह की महिमा प्रकट की है। वह अनुग्रह हमें उसके प्रिय पुत्र द्वारा मिला है,

11 (11-12) ईश्वर सब बातों में अपने मन की योजना पूरी करता है। उसके अनुसार उसने निर्धारित किया है कि हम (यहूदी) मसीह द्वारा बुलाये जायें और हम लोगों के कारण उसकी महिमा की स्तुति हो। हम लोगों ने तो सब से पहले मसीह पर भरोसा रखा था।


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 1:26-38


26) छठे महीने स्वर्गदूत गब्रिएल, ईश्वर की ओर से, गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया,

27) जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी, और उस कुँवारी का नाम था मरियम।

29) वह इन शब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है।

30) तब स्वर्गदूत ने उस से कहा, ’’मरियम! डरिए नहीं। आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है।

31) देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी।

32) वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा,

33) वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’

34) पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, ’’यह कैसे हो सकता है? मेरा तो पुरुष से संसर्ग नहीं है।’’

35) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ’’पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

36) देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीज़बेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है;

37) क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।’’

38) मरियम ने कहा, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।’’ और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।


📚 मनन-चिंतन


माता मरियम का निष्कलंक गर्भागमन का पर्व के द्वारा कलीसिया इस सच्चाई को घोषित करती है कि पिता ईश्वर ने अपने मुक्ति विधान की योजना में धन्य कुँवारी मरियम को अपने पुत्र की माँ होने के लिए चुना और उन पर आदि पाप का कलंक लगने नहीं दिया। इसलिये धन्य कुँवारी मरियम निष्कलंक गर्भागमन कहलाती है। ईश्वर ने माता मरियम को येसु के जन्म के लिए पहले ही से रचा था तथा आदि पाप से बचाये रखा था। "माता के गर्भ में रचने से पहले ही मैंने तुमको जान लिया। तुम्हारे जन्म से पहले ही मैंने तुम को पवित्र किया । (यिरमियाह 1:5 ) माता मरियम ने ईश्वर द्वारा प्रेषित स्वर्गदूत गब्रिएल के संदेश को विश्वासकर सहृदय ग्रहण किया। अपने विश्वास और स्वीकृती द्वारा हमारे मुक्तिदाता प्रभु की माँ होने का गौरव प्राप्त किया। हमारे लिए ईश्वरीय कृपाओं को प्रदान करने में माध्यम बनी। ईश्वर ने हमे भी बपतिस्मा मे कृपाओ से भरा है। हमें उन कृपाओ को बचाये रखना है। संत पौलुस (1 कुरि. 6:19) में कहते है, "आपका शरिर पवित्र आत्मा का मन्दिर है। वह आपने निवास करता है। और आपको ईश्वर से प्राप्त है।"

आइये हम प्रार्थना करे की ईश्वर से प्राप्त कृपाओं को संभाल कर रखे। और पवित्र जीवन जिये।



📚 REFLECTION




Today the Church celebrates the feast of the Immaculate Conception. Through this feast Mother Church declares the truth that God was preparing Mary to be the mother of his son. He chose Mary to be the part of his salvation plan and kept her holy. She was not affected by the original sin. That’s why she is called Immaculate Conception. God chose her to be the mother of God.

“Before I formed you in the womb I knew you and before you were born I consecrated you”(Jer 1:5)

In the Gospel, Mother Mary believed and accepted the message of Angel Gabriel. Through her faith and acceptance got the privilege to be the Mother of God. In this way she became the mediator between God and us. Through the baptism God has given us the ample blessings. St. Paul tells us in (I cor 6:19)

“Or do you not know that your body is a temple of the Holy Spirit within you, which you have from God” let us acknowledge blessings and graces which God has given us and be grateful to him. Let us make every effort to live a holy life.


 -Br. Biniush topno


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