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सोमवार, 06 दिसंबर, 2021

 

सोमवार, 06 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 35:1-10



1) मरुस्थल और निर्जल प्रदेश आनन्द मनायें। उजाड़ भूमि हर्शित हो कर फले-फूले,

2) वह कुमुदिनी की तरह खिल उठे, वह उल्लास और आनन्द के गीत गाये। उसे लेबानोन का गौरब दिया गया है, करमेल तथा शारोन की शोभा। लोग प्रभु की महिमा तथा हमारे ईश्वर के प्रताप के दर्शन करेंगे।

3 थके-माँदे हाथों को शक्ति दो, निर्बल पैरों को सुदढ़ बना दो।

4) घबराये हुए लोगों से कहो- “ढारस रखों डरो मत! देखो, तुम्हारा ईश्वर आ रहा है। वह बदला चुकाने आता है, वह प्रतिशोध लेने आता है, वह स्वयं तुम्हें बचाने आ रहा है।“

5) तब अन्धों की आँखें देखने और बहरों के कान सुनने लगेंगे। लँगड़ा हरिण की तरह छलाँग भरेगा। और गूँगे की जीभ आनन्द का गीत गायेगी।

6) मरुस्थल में जल की धाराएँ फूट निकलेंगी, रेतीले मैदानों में नदियाँ बह जायेंगी,

7) सूखी धरती झील बन जायेगी और प्यासी धरती में झरने निकलेंगे। जहाँ पहले सियारों की माँद थी, वहाँ सरकण्डे और बेंत उपजेंगे।

8) वहाँ एक राजमार्ग बिछा दिया जायेगा, जो ‘पवत्रि मार्ग’ कहलायेगा। कोई भी पापी उस पर नहीं चलेगा। प्रभु स्वयं यह मार्ग तैयार करेगा- नास्तिक भूल कर भी उस पर पैर नहीं रखेंगे।

9) वहाँ न तो कोई सिंह विचरेगा और न कोई हिंसक पशु मिलेगा। प्रभु की प्रजा उस पर चलेगी।

10) प्रभु ने जिन्हें मुक्त कर दिया है, वे ही उस पर लौटेंगे। वे गाते-बजाते हुए सियोन लौटेंगे, उनके मुख पर अपार आनन्द खिल उठेगा। वे हर्ष और उल्लास के साथ लौटेंगे। दुःख और विलाप का अन्त हो जायेगा।



सुसमाचार : सन्त लूकस 5:17-26



17) ईसा किसी दिन शिक्षा दे रहे थे। फरीसी और शास्त्री ईसा किसी दिन शिक्षा दे रहे थे। फ़रीसी और शास्त्री पास ही बैठे हुए थे। वे गलीलिया तथा यहूदिया के हर एक गाँव से और येरुसालेम से भी आये थे। प्रभु के सामर्थ्य से प्रेरित हो कर ईसा लोगों को चंगा क

18) उसी समय कुछ लोग खाट पर पड़े हुए एक अद्र्धांगरोगी को ले आये। वे उसे अन्दर ले जा कर ईसा के सामने रख देना चाहते थे।

19) भीड़ के कारण अद्र्धागरोगी को भीतर ले जाने का कोई उपाय न देख कर वे छत पर चढ़ गये और उन्होंने खपड़े हटा कर खाट के साथ अद्र्धांगरोगी को लोगों के बीच में ईसा सामने उतार दिया।

20) उनका विश्वास देख कर ईसा ने कहा, ’’भाई! तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं’’।

21) इस पर शास्त्री और फ़रीसी सोचने लगे, ’’ईश-निन्दा करने वाला यह कौन है? ईश्वर के सिवा कौन पाप क्षमा कर सकता है?’’

22) उनके ये विचार जान कर ईसा ने उन से कहा, ’’मन-ही-मन क्या सोच रहे हो?

23) अधिक सहज क्या है-यह कहना, ’तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं; अथवा यह कहना उठो, और चलो फिरो’?;

24) परन्तु इसलिए कि तुम लोग यह जान लो कि मानव पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है, वह अद्र्धांगरोगी से बोले मैं तुम से कहता हूँ, उठो और अपनी खाट उठा कर घर जाओ।

25) उसी क्षण वह सब के सामने उठ खड़ा हुआ और अपनी खाट उठा कर ईश्वर की स्तुति करते हुए अपने घर चला गया।

26) सब-के-सब विस्मित हो कर ईश्वर की स्तुति करते रहे। उन पर भय छा गया और वे कहते थे, ’’आज हमने अद्भुत कार्य देखे हैं’’।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में कुछ लोग एक अद्धांगरोगी को येसु के पास पूर्ण विश्वास के साथ लाते है। वहाँ पहुँचकर भारी भीड़ देखकर उन्हें सब कुछ असंभव सा लग रहा था। उन्हें लगा कि शायद हम येसु के पास नहीं पहुँच पायेंगे। फिर भी वह लोग सारी बाधाओ को पार कर छत से उस अर्धान्गरोगी को खाट सहित येसु के सामने उतार देते हैं। उसके विश्वास को देखकर येसु उसके पाप क्षमा कर देते हैं। वास्तव में वह मनुष्य पापमय जीवन में डूबा था। इसीलिये जैसे ही उसके पाप क्षमा हो गये। वह अपने आप स्वस्थ हो गया।

उसी प्रकार कभी कभी हमारे जीवन में परेशानिया आती है। हमे भी सब कुछ असंभव सा लगने लगता है। ऐसे विपरित परिस्थतियों में हमें अपने आपको येसु के पास लाना है। साथ ही साथ अपने ख्रीस्तीय भाई-बहनों को पवित्र यूखरिस्त में भाग लेने एवम पाप स्वीकार ग्रहण करने के लिए प्रेरित करना होगा। आइये हम येसु पर विशवास करें और एक दूसरे को क्षमा करे।




📚 REFLECTION



In today's gospel we hear that some people bring a paralytic to Jesus with a bright faith. After reaching to that place they saw a huge crowd and they felt it won't be possible to reach Jesus. By crossing all the barriers they brought down the paralytic by bringing him on a cot from terrace to Jesus. Looking on to the faith of the paralytic Jesus healed him. The paralytic was fully laid in the life of sins that is why when his sins were forgiven he was immediately healed.

In the same way we also face numerous difficulties in our life and we see these difficulties as unsolving problems. We should bring these difficult situations to Lord Jesus. Along with this we should also inspire our Christian brothers and sisters to take part in holy Eucharist and in the sacrament of confession. Come, let us have faith in Jesus and forgive each other.


 -Br. Biniush topno


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इतवार, 05 दिसंबर, 2021 आगमन का दूसरा इतवार

 

इतवार, 05 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा इतवार



पहला पाठ : बारूक का ग्रन्थ 5:1-9


1) येरुसालेम! अपने शोक और सन्ताप के वस्त्र उतार और सदा के लिए ईश्वर की महिमा का सौंदर्य धारण कर।

2) तू ईश्वरीय न्यास का लबादा पहन कर अपने सिर पर प्रभु का दिया हुआ गौरव का मुकुट रख ले;

3) क्योंकि ईश्वर पृथ्वी भर के लोगों पर तेरी महिमा प्रकट करेगा

4) और सदा के लिए तेरा यह नाम रखेगा- न्याय की शान्ति और धार्मिकता की महिमा।

5) येरुसालेम! उठ खड़ा हो जा, पर्वत पर चढ़ कर पूर्व की ओर दृष्टि लगा। देख, प्रभु की आज्ञा से तरे पुत्र पश्चिम और पूर्व से एकत्र हो गये हैं। वे आनन्द मना रहे हैं, क्योंकि ईश्वर ने उनकी सुध ली है।

6) शत्रुओं ने उन्हें बाध्य किया था कि वे तुझ को छोड़़ कर पैदल ही चले जायें, परन्तु ईश्वर उन्हें राजसी पालकी में ेबैठा कर तेरे पास वापस ले आ रहा है।

7) ईश्वर का आदेश है कि हर एक ऊँचा पहाड़ और सभी चिरस्थायी पहाडियाँ समतल की जायें और हर एक घाटी पाट कर भर दी जाये, जिससे इस्राएली महिमामय प्रभु की रक्षा में सुरक्षित आगे बढ़ सके।

8) ईश्वर के आदेश पर सभी वन और सुगन्धित वृक्ष इस्राएल पर छाया करेंगे;

9) क्योंकि दयामय तथा न्यायी ईश्वर इस्राएल को आनद प्रदान करेगा और अपनी महिमा के प्रकाश से उसका पथप्रदर्शन करेगा।



दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:4-6.8-11



4) मैं हमेशा अपनी हर प्रार्थना में आनन्द के साथ आप सबों के लिए विनती करता हूँ;

5) क्योंकि आप प्रारम्भ से अब तक सुसमाचार के कार्य में सहयोग देते आ रहे हैं।

6) जिसने आप लोगों में यह शुभ कार्य आरम्भ किया, वह उसे ईसा मसीह के आगमन के दिन तक पूर्णता तक पहुँचा देगा। इसका मुझे पक्का विश्वास है।

8) ईश्वर जानता है कि मैं ईसा मसीह के प्रेम से प्रेरित हो कर आप लोगों को कितना चाहता हूँ।

9) ईश्वर से मेरी प्रार्थना यह है कि आपका प्रेम, ज्ञान तथा हर प्रकार की अन्तर्दृष्टि में, बराबर बढ़ता जाये,

10) जिससे जो श्रेय है, आप उसे पहचानें और प्यार करें। इस तरह आप लोग मसीह के आगमन के दिन पवित्र तथा निर्दोष होंगे।

11) और ईश्वर की महिमा तथा प्रशंसा के लिए ईसा मसीह के द्वारा परिपूर्ण धार्मिकता तक पहुँच जायेंगे।



सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 3:1-6



1) जब कैसर तिबेरियुस के शासनकाल के पन्द्रहवें वर्ष में पोंतियुस पिलातुस यहूदिया का राज्यपाल था; हेरोद गलीलिया का राजा, उसका भाई फि़लिप इतूरैया और त्रखोनितिस का राजा और लुसानियस अबिलेने का राजा था;

2) जब अन्नस तथा कैफ़स प्रधानयाजक थे, उन्हीं दिनों ज़करियस के पुत्र योहन को निर्जन प्रदेश में प्रभु की वाणी सुनाई पड़ी।

3) वह यर्दन के आसपास के समस्त प्रदेश में घूम-घूम कर पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप के बपतिस्मा का उपदेश देता था,

4) जैसा कि नबी इसायस की पुस्तक में लिखा है: निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज़- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो।

5) हर एक घाटी भर दी जायेगी, हर एक पहाड़ और पहाड़ी समतल की जायेगी, टेढ़े रास्ते सीधे और ऊबड़-खाबड़ रास्ते बराबर कर दिये जायेंगे

6) और सब शरीरधारी ईश्वर के मुक्ति-विधान के दर्शन करेंगे।



📚 मनन-चिंतन



आगमन काल, अपने आप को प्रभु के लिए तैयार करने का समय है। आज के सुसमाचार में योहन बपतिस्ता प्रभु का मार्ग तैयार करने आते है। वह लोगों को पापक्षमा के पश्चताप का उपदेश देते हैं। "सारी जनता और नाकेदारों ने भी योहन की बात सुनकर और उसका बपतिस्मा ग्रहण कर ईश्वर की इच्छा पूरी की है (लूकस 7:29) आगमन काल का समय भी पश्चताप और पापक्षमा का समय है। जिन्होंने भी योहन की बातों पर विश्वास किया और पापक्षमा का बपतिस्मा ग्रहण किया। वे ईश्वर की मुक्ति योजना के भागी बने। आइये हम भी इस आगमन काल में प्रभु येसु के आगमन के के लिए अपने आप को तैयार करे ।



📚 REFLECTION




The season of advent is the time to prepare ourselves for Jesus. In today's gospel we see that how John the Baptist came and prepared the way for Jesus. He taught the people about repentance and urged them you seek forgiveness for their sins.

“And all the people heard this, including the tax collectors, acknowledged the justice of God, because they had been baptized with John the Baptist”(Luke 7: 29).

The season of the advent is also the time of repentance and forgiveness. it invites us to prepare ourselves by asking forgiveness for our sins. Whoever believed in the word of John the Baptist they received the baptism of repentance and they became the part of salvation plan of God. Let us also prepare ourselves for the coming of our Lord Jesus Christ.




मनन-चिंतन - 2



नबी बारूक और नबी यिरमियाह का नबूबत कार्यकाल छठवें शताब्दी ई.पू. था। नबी बारूक, नबी यिरमियाह के सचिव थे। सन् 612 ई. पू. खलदैयियों के राजा नबूकदनेजर ने यूदा देश को अपने अधीन कर दिया। नबियों ने यहूदी लोगों को समझाया कि वे अपने पापों पर पश्चाताप करें और तभी उन्हें मुक्ति होगी। यहूदी नेताओं ने नबियों की बात न मानी और नबूकदनेजर के विरूद्ध विद्रोह किया और नबूकदनेजर ने 587 ई. पू. में येरूसलेम को तथा येरूसलेम मन्दिर को नष्ट कर दिया और यहूदि लोगों को निर्वासित कर बाबूल ले जाया गया। नबी बारूक और नबी यिरमियाह को भी निर्वासन में ले जाया गया।

नबी बारूक उन व्यथित, उदास, निर्वासित लोगों को बता रहे है, आज का पहला पाठ के द्वारा कि उनकी मुक्ति का दिन आ गया है और विलाप न करें। “येरूसलेम, अपने शोक और सन्ताप के वस्त्र उतार, और सदा के लिए ईश्वर की महिमा धारण कर। ... येरूसलेम, उठ खडे हो जा, पर्वत पर चढ कर पूर्व की ओर दृष्टि लगा। देख, प्रभु की आज्ञा से तेरे पुत्र पश्चिम और पूर्व से एकत्र हो गये है। वे आनन्द मना रहे है क्योंकि ईश्वर ने उन की सुध ली है (बारूक 5:1,5)। यह यहूदियों के लिए बहुत बडी खूशखबरी थी। नबी बारूक की यह भविष्यवाणी की पूर्ति सन् 538 ई. पू. में होती है जब पेसिया के राजा सैरा ने बाबूल पर कब्जा कर यहूदी लोगों को आजादी दी। उन लोगों ने यरूसलेम नगर की पुन:स्थापना और मन्दिर का पुनःनिर्माण किए। उस प्रकार यहूदी लोग यहोवा के नाम पर पुनः एकत्रित हो गए।

योहन बपतिस्ता आज के सुसमाचार में उद्घोषणा करते हैं कि न केवल यहूदी लोग बल्कि सब राष्ट्र के लोग मासीह की ओर आ जायेंगे। पाप की गुलामी में जीवन बिताने वाले लोगों को मसीह की ओर आना और मसीह को स्वीकार कर मसीह में जीना ही सच्ची आजादी है, सच्ची मुक्ति है। अतः पश्चाताप के जरिए ह्रदय को शुद्व करने के लिए योहन बपतिस्ता आह्वान करते है।

येरूसलेम शहर कलीसिया का प्रतीक है। कलीसिया में सब राष्ट्र के लोग एकत्रित हो जायेंगे और सब इश्वर के मुक्तिविधान का दर्शन करेंगे। मुक्ति केवल प्रभु येसु मसीह के द्वारा ही संभव है। “किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती; क्योंकि समस्त संसार में ईसा नाम के सिवा मनुष्यों को दूसरा नाम नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हमें मुक्ति मिल सकती है” (प्रेरित 4:12)।

विनम्र लोग ही ईश्वर द्वारा प्रदत्त मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। योहन बपतिस्ता येसु समक्ष विनम्र होकर दीनता से येसु से मुक्ति हाजि़ल करने की इच्छा जाहिर करते हुए कहते हैं – “मुझे तो आपसे बपतिस्मा पाने की जरूरत है...” (मत्ति 3:14)। ऐसे विनम्र योहन बपतिस्ता को ईश्वर ने यर्दन नदी के आसपास के लोगों को तथा अन्य जगहों सें आये लोगों को पश्चाताप का सन्देश सुनाने और मसीह के लिए रास्ता तैयार करने के हेतु भेजा है।

पौलुस तथा फिलीप्पि की छोटी सी कलीयिसा विनम्रता एवं सुसमाचर प्रचार का अनूठा उदाहरण है। पौलुस आज के दूसरे पाठ में फिलिप्पि के ख्रीस्तीय लोगों को बताते है कि -

☞ येसु ख्रीस्त तथा उनके मुक्ति कार्य की ज्ञान उनमें गहरा होता जायें;

☞उनके बीच का आपसी प्रेम दिनों दिन बढता जायें;

☞ वे कलंक रहित जीवन बिताने के लिए हरगिज प्रयास करते रहें ताकि येसु मसीह अपना मुक्ति कार्य उन लोगों में पूरा करें।

यह आगमन काल का समय हम लोगों में येसु की ज्ञान गहरा कर दें; हम लोगों में आपसी प्यार बढता जायें तथा निष्कलंक जीवन बिताते हुए येसु की मुक्ति हम लोंगों में सम्पन्न हो जायें एवं येसु के मुक्ति कार्य को हर दिलों तक पहुँचा सकें।



Br. Biniush topno


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शनिवार, 04 दिसंबर, 2021

 

शनिवार, 04 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 30:19-21,23-26


19) येरूसालेम में रहने वाली सियोन की प्रजा! अब से तुम लोगों को रोना नहीं पड़ेगा। प्रभु तुम पर अवश्य दया करेगा, वह तुम्हारी दुहाई सुनते ही तुम्हारी सहायता करेगा।

20) प्रभु ने तुम्हें विपत्ति की रोटी खिलायी और दुःख का जल पिलाया है; किन्तु अब तुम्हें शिक्षा प्रदान करने वाला प्रभु अदृश्य नहीं रहेगा- तुम अपनी आँखों से उसके दर्शन करोगे।

21) यदि तुम सन्मार्ग से दायें या बायें भटक जाओगे, तो तुम पीछे से यह वाणी अपने कानों से सुनोगे-“सच्चा मार्ग यह है; इसी पर चलते रहो“।

22) तुम चाँदी से मढ़ी हुई अपने द्वारा गढ़ी गयी प्रतिमाओं को और सोने से मढ़ी हुई अपनी देवमूर्तियों को अपवित्र मानोगे। तुम उन्हें दूशित समझ कर फेंक दोगे और कहोगे “उन्हें यहाँ से निकाल दो“।

23) प्रभु तुम्हारे बोये हुये बीजों को वर्षा प्रदान करेगा और तुम अपने खेतों की भरपूर उपज से पुष्टिदायक रोटी खाओगे। उस दिन तुम्हारे चैपाये विशाल चारागाहों में चरेंगे।

24) खेत में काम करने वाले बैल और गधे, सूप और डलिया से फटकी हुई, नमक मिली हुई भूसी खयेंगे।

25) महावध के दिन, जब गढ़ तोड़ दिये जायेंगे, तो हर एक उत्तंुग पर्वत और हर एक ऊँची पहाड़ी से उमड़ती हुई जलधाराएँ फूट निकलेंगी।

26) जिस दिन प्रभु अपनी प्रजा के टूटे हुए अंगों पर पट्टी बाँधेगा और उसकी चोटों के घावों को चंगा करेगा, उस दिन चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य की तरह होगा और सूर्य का प्रकाश- सात दिनों के सम्मिलित प्रकाश के सदृश-सतगुना प्रचण्ड हो उठेगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 9:35-10:1,5a,6-8



35) ईसा सभागृहों में शिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते, हर तरह की बीमारी और दुबर्लता दूर करते हुए, सब नगरों और गाँवों में घूमते थे।

36) लोगों को देखकर ईसा को उन पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थके माँदे पड़े हुए थे।

37) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, "फसल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं।

38) इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।"

10:1) ईसा ने अपने बारह शिष्यों को अपने पास बुला कर उन्हें अशुद्ध आत्माओं को निकालने तथा हर तरह की बीमारी और दुर्बलता दूर करने का अधिकार प्रदान किया।

5) ईसा ने इन बारहों को यह अनुदेश दे कर भेजा, "अन्य राष्ट्रों के यहाँ मत जाओ और समारियों के नगरों में प्रवेश मत करो,

6) बल्कि इस्राएल के घराने की खोयी हुई भेड़ों के यहाँ जाओ।

7) राह चलते यह उपदेश दिया करो- स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8) रोगियों को चंगा करो, मुरदों को जिलाओ, कोढि़यों को शुद्ध करो, नरकदूतों को निकालो। तुम्हें मुफ़्त में मिला है, मुफ़्त में दे दो।



📚 मनन-चिंतन



पिता ईश्वर इस संसार का सृष्ष्टिकृता है। वह हमे जल, थल, सूर्य की रोशनी, साँस लेने के लिए शुद्ध वायु, भोजन, प्रदान करता है । साथ ही साथ उन्होंने हमे बहुमुल्य जीवन प्रदान किया । आज के सुसमाचार मे येसु हमे बताना चाहते हैं कि तुम्हे मुफ्त में मिला है, मुफ्त में दे दो (मत्ती १०:8)

येसु ने स्वयं बीमारी को चंगा किया ,अंधो को आँखे दी, अपदूतों को निकाला, भूखों को आध्यत्मक एवं शारिरिक भोजन दिया प्रदान किया, मृतको को जीवनदान दिया। जिस प्रकार ईश्वर ने हमारे जीवन में बहुत कुछ प्रदान किया है। वैसे ही हमें भी ईश्वर के प्रेम, शांति, तथा उनके वचनों को दूसरों में बाँटना है एवम जरूरत के समय एक दूसरे का साथ देना है।

पिता ईश्वर ने येसु को जो मिशन कार्य सौंपा था। येसु ने उसे आगे बढ़ाने के लिए बारह शिष्यों को चुना और अधिकार एव्म शक्ति प्रदान की। शिष्यों ने उस संदेश को लोगों के बीच बाँटा। हम भी ख्रीस्तीय होने के नाते ईश्वरीय वचन को आपस में बाँटे । अपने वचन और कर्म से ईश्वर का साथ दूसरों को दे |




📚 REFLECTION




God the father is the creator of this universe. He has given to us the water, land, sun, light, fresh air to breathe, food etc. and in other hand he has also given to us the precious life to live.

In today's gospel Jesus wants to tell us that, “you received without payment; give without payment” (Mt 10:8) .

Jesus himself healed the sick, gave vision to the blind, cast it out the devil, nourished the hungry with both spiritual and physical food, and raised the dead. As Jesus has given us so much so shall we too Share the love, peace, the word of God to the people. Along with this we should always help the people who are in need.

As God the father gave a mission to Jesus Christ, in order to persuade that mission Jesus chose the twelve disciples and gave them the authority and the power. The disciples spread the message of Jesus to the people willingly. In the same way we as Christians should also spread the word of Lord both by our words and deeds.




मनन-चिंतन - 2



अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में येसु ने इसायाह 61 की भविष्यवाणियों का हवाला देते हुए नाज़रेथ के सभागृह में अपनी कार्य-योजना की घोषणा की। फिर वे उस घोषणापत्र को साकार करने के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। वे ईश्वर के राज्य की खुशखबरी सुनाते हुए “सभी नगरों और गाँवों” में घूम रहे थे और “हर तरह की बीमारी और दुर्बलता” दूर कर रहे थे। उन्होंने किसी को अपने सेवाकार्य की सीमा के बाहर नहीं छोड़ा। उन्होंने लोगों की हर समस्या का समाधान किया। वे ईश्वर की प्रजा की 'संपूर्णता' में रुचि रखते थे। वे न केवल सभी को स्वर्गराज्य का संदेश सुनाना चाहते थे, बल्कि वे यह भी चाहते थे कि लोग स्वर्गराज्य के आगमन को अपने दैनिक जीवन में अनुभव करें। वे अपनी टीम में अधिक से अधिक सहकर्मियों को शामिल करना चाहते थे क्योंकि यह कार्य बहुत बड़ा था। उनके सहकर्मियों के चयन के लिए उनके पास केवल एक मानदंड था - उन्हें स्वर्गीय पिता द्वारा बुलाए जाने और भेजे जाने की आवश्यकता थी। इसलिए वे अपने शिष्यों को फसल के स्वामी से प्रार्थना करने को कहते हैं ताकि वे अपनी फसल काटने के लिए मजदूरों को भेजें। यह आज भी एक वास्तविकता है। एक बढ़िया फ़सल के कटने का इंतज़ार है। इस मिशन पर बुलाए जाने और भेजे जाने के लिए कई लोगों की आवश्यकता है, जिन्हें अपनी बुलाहट स्वीकार करने और उसकी पूर्ति के लिए कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है।




REFLECTION


At the beginning of his public ministry Jesus proclaimed his manifesto in the synagogue of Nazareth citing the prophecies in Isaiah 61. Then he was on his way to actualise that manifesto. He was going through “all the towns and villages” proclaiming the good news of the Kingdom of God and curing “all kinds of disease and all kinds of illness”. He did not leave anyone out. He addressed every problem of the people. He was interested in the ‘wholeness’ of the people of God. He not only wanted everyone to hear the message of the Kingdom, but he also wanted them experience the Kingdom in their own day to day lives. He wanted to induct into his team as many co-workers as possible because the task was huge. He had only one criterion for the selection of his co-workers – they needed to be called and sent out by the Heavenly Father. So he asks his disciples to pray to the Lord of the harvest to send out labourers into his harvest. This is a reality even today. A great crop is waiting to be harvested. We need many to be called and sent on this mission. Those called need to accept the call and work hard for its fulfilment.


 -Br. Biniush topno


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संत फ्रांसिस ज़ेवियर दिसंबर 03

 



संत फ्रांसिस ज़ेवियर

दिसंबर 03

फ्रांसिस ज़ेवियर का जन्म 7 अप्रैल 1506 को नवारे देश में हुआ। उनके बचपन में चारों तरफ़ युध्दों का माहौल था। जब युद्ध बंद हो गया तो उन्हें पेरिस विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए भेजा गया। वे अपने दोस्त पीटर फेवर के साथ कमरे में रहते थे। यह जोड़ी लोयोला के इग्नाटियस से बहुत प्रभावित हुई, जिसने फ्रांसिस को एक पुरोहित बनने के लिए प्रोत्साहित किया। 1530 में, फ्रांसिस ज़ेवियर ने अपनी मास्टर डिग्री हासिल की, और वे पेरिस विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाने लगे।

24 जून, 1537 को उनका पुरोहिताभिषेक हुआ। पोप पॉल III ने 1540 में येसु समाज धर्मसंघ की स्थापना के लिए मंजूरी दी। फ्रांसिस ज़ेवियर अपने पैंतीसवें जन्मदिन पर 1541 में भारत के लिए रवाना हुए। वे 6 मई, 1542 को गोवा पहुंचे। उन्होंने वहाँ सुसमाचार का प्रचार किया, गरीबों तथा जरूरतमंदों की सेवा की। वहाँ से वे जापान और चीन की भी यात्रा की।

3 दिसंबर 1552 को फ़्रांसिस ज़ेवियर की मृत्यु हुयी। 25 अक्टूबर, 1619 को संत पापा पौलुस तृतीय ने उन्हें धन्य घोषित किया। संत पापा ग्रेगोरी पन्द्रहवें ने द्वारा 12 मार्च, 1622 को लोयोला के इग्नाटियस के साथ फ्रांसिस ज़ेवियर को भी संत घोषित किया। वे काथलिक मिशनों के संरक्षक हैं और उनका पर्व 3 दिसंबर को है।


✍️-Br. Biniush topno



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शुक्रवार, 03 दिसंबर, 2021

 

शुक्रवार, 03 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

सन्त फ़्रासिस जेवियर

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 1:4-8


4) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई पड़ी-

5) “माता के गर्भ में तुम को रचने से पहले ही, मैंने तुम को जान लिया। तुम्हारे जन्म से पहले ही, मैंने तुम को पवत्रि किया। मैंने तुम को राष्ट्रों का नबी नियुक्त किया।“

6) मैंने कहा, “आह, प्रभु-ईश्वर! मुझे बोलना नहीं आता। मैं तो बच्चा हूँ।“

7) परन्तु प्रभु ने उत्तर दिया, “यह न कहो- मैं तो बच्चा हूँ। मैं जिन लोगों के पास तुम्हें भेजूँगा, तुम उनके पास जाओगे और जो कुछ तुम्हें बताऊगा, तुम वही कहोगे।

8) उन लोगों से मत डरो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। यह प्रभु वाणी है।“



दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 4:7-15



7) यह अमूल्य निधि हम में-मिट्टी के पात्रों में रखी रहती है, जिससे यह स्पष्ट हो जाये कि यह अलौकिक सामर्थ्य हमारा अपना नहीं, बल्कि ईश्वर का है।

8) हम कष्टों से घिरे रहते हैं, परन्तु कभी हार नहीं मानते, हम परेशान होते हैं, परन्तु कभी निराश नहीं होते।

9) हम पर अत्याचार किया जाता है, परन्तु हम अपने को परित्यक्त नहीं पाते। हम को पछाड़ दिया जाता है, परन्तु हम नष्ट नहीं होते।

10) हम हर समय अपने शरीर में ईसा के दुःखभोग तथा मृत्यु का अनुभव करते हैं, जिससे ईसा का जीवन भी हमारे शरीर में प्रत्यक्ष हो जाये।

11) हमें जीवित रहते हुए ईसा के कारण निरन्तर मृत्यु का सामना करना पड़ता है, जिससे ईसा का जीवन भी हमारे नश्वर शरीर में प्रत्यक्ष हो जाये।

12) इस प्रकार हम में मृत्यु क्रियाशील है और आप लोगों में जीवन।

13) धर्मग्रन्थ कहता है- मैंने विश्वास किया और इसलिए मैं बोला। हम विश्वास के उसी मनोभाव से प्रेरित हैं। हम विश्वास करते हैं और इसलिए हम बोलते हैं।

14) हम जानते हैं कि जिसने प्रभु ईसा को पुनर्जीवित किया, वही ईसा के साथ हम को भी पुनर्जीवित कर देगा और आप लागों के साथ हम को भी अपने पास रख लेगा।

15) सब कुछ आप लोगों के लिए हो रहा है, ताकि जिस प्रकार बहुतों में कृपा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार ईश्वर की महिमा के लिए धन्यवाद की प्रार्थना करने वालों की संख्या बढ़ती जाये।



सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 10:1-16



1) इसके बाद प्रभु ने अन्य बहत्तर शिष्य नियुक्त किये और जिस-जिस नगर और गाँव में वे स्वयं जाने वाले थे, वहाँ दो-दो करके उन्हें अपने आगे भेजा।

2) उन्होंने उन से कहा, ’’फ़सल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं; इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।

3) जाओ, मैं तुम्हें भेडि़यों के बीच भेड़ों की तरह भेजता हूँ।

4) तुम न थैली, न झोली और न जूते ले जाओ और रास्तें में किसी को नमस्कार मत करो।

5) जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ’इस घर को शान्ति!’

6) यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।

7) उसी घर में ठहरे रहो और उनके पास जो हो, वही खाओ-पियो; क्योंकि मज़दूर को मज़दूरी का अधिकार है। घर पर घर बदलते न रहो।

8) जिस नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो जो कुछ तुम्हें परोसा जाये, वही खा लो।

9) वहाँ के रोगियों को चंगा करो और उन से कहो, ’ईश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ गया है’।

10) परन्तु यदि किसी नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत नहीं करते, तो वहाँ के बाज़ारों में जा कर कहो,

11 ’अपने पैरों में लगी तुम्हारे नगर की धूल तक हम तुम्हारे सामने झाड़ देते हैं। तब भी यह जान लो कि ईश्वर का राज्य आ गया है।’

12) मैं तुम से यह कहता हूँ- न्याय के दिन उस नगर की दशा की अपेक्षा सोदोम की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।

13) ’’धिक्कार तुझे, खोराजि़न! धिक्कार तुझे, बेथसाइदा! जो चमत्कार तुम में किये गये हैं, यदि वे तीरुस और सीदोन में किये गये होते, तो उन्होंने न जाने कब से टाट ओढ़ कर और भस्म रमा कर पश्चात्ताप किया होता।

14) इसलिए न्याय के दिन तुम्हारी दशा की अपेक्षा तीरुस और सिदोन की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।

15) और तू, कफ़रनाहूम! क्या तू स्वर्ग तक ऊँचा उठाया जायेगा? नहीं, तू अधोलोक तक नीचे गिरा दिया जायेगा?

16) ’’जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है और जो तुम्हारा तिरस्कार करता है, वह मेरा तिरस्कार करता है। जो मेरा तिरस्कार करता है, वह उसका तिरस्कार करता है, जिसने मुझे भेजा है।’’


📚 मनन-चिंतन


आजा माता कलीसिया संत फ़्रान्सिस जेवियर का पर्व मनाती है। सन्त फ्रांसिस जेवियर प्रभु येसु ख्रीस्त के प्रेम और मुकट का संदेश सुनाने भारत आये। वह ईश्वर की महिमा के लिए दिन रात प्रार्थना करते रहे। उन्होंने अपना सबकुछ त्याग कर ईश्वर के राज्य के लिए अपने को समर्पित कर दिया।

मनुष्य को इससे क्या लाभ यदि वह सारा संसार तो प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन ही गंवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता? (मारकुस 8:36-37)

सुसमाचार में भी येसु अपने बहतर शिष्यों को नियुक्त कर ईश्वर के राज्य कि घोषणा करने के लिए लोगों के बीच भेजते हैं। येसु शिष्यों को अकेले नहीं बल्कि दो-दो कर उन्हें भेजते हैं। जिससे वह एक दुसरे का सहयोग करते हुए, येसु की उपस्थिती को अपने बीच में महसूस करे। "क्योंकि जहां दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वंहा मै उनके बीच उपस्थित रहता हूँ" (मती 18:20) येसु आज हमसे आह्वान करते हैं कि हम ईश्वर के राज्य के लिए एक दूसरे के साथ मिल कर आपस में सहयोग करे। ताकि सभी लोग ईश्वर के बारे में जान सके और उनपर विश्वास करे ।



📚 REFLECTION



Today, the mother church celebrates the feast of Saint Xavier. Saint Francis Xavier came to India to proclaim the message of love and salvation of Jesus Christ. He used to pray to God for the glory of God. He gave up everything whatever he had and surrendered his life to the will of God.

Mark 8:36–37 “For what will it profit them to gain the whole world and forfeit their life? Indeed, what can they give in return for their life?’’

In today's gospel we hear that Lord Jesus sends his twelve disciples to proclaim the good news. Jesus did not send his disciples alone instead he sent them two by two so that by helping each other they may not feel the absence of Jesus among them.

Matthew (18:20) “For where two or three are gathered in my name, there I am there among them.”

Today, Jesus invites us to come together and help each other to enter the Kingdom of heaven so that each and everyone will know about God and believe in God.


 -Br. Biniush topno


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गुरुवार, 02 दिसंबर, 2021

 

गुरुवार, 02 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 26:1-6



1) उस दिन यूदा देश में यह गीत गाया जायेगाः हमारा नगर सुदृढ़ है। प्रभु ने हमारी रक्षा के लिए प्राचीर और चारदीवारी बनायी है।

2 फाटकों को खोल दो- सद्धर्धी और विश्वासी राष्ट्र प्रवेश करें।

3) तू दृढ़तापूर्वक शान्ति बनाये रखता हैं, क्योंकि इस राष्ट्र को तुझ पर भरोसा है।

4) प्रभु पर सदा भरोसा रखो, क्योंकि वही चिरस्थायी चट्टान है।

5) वह ऊँचाई पर निवास करने वालों को नीचा दिखाता है। वह उनका दुर्गम गढ़ तोड़ कर गिराता और धूल में मिला देता है।

6) अब दीन-हीन और दरिद्र उसे पैरों तले रौंदेंगे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 7:21.24-27



21) ’’जो लोग मुझे ’प्रभु ! प्रभु ! कह कर पुकारते हैं, उन में सब-के-सब स्वर्ग-राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, वही स्वर्गराज्य में प्रवेश करेगा।

24) ’’जो मेरी ये बातें सुनता और उन पर चलता है, वह उस समझदार मनुष्य के सदृश है, जिसने चट्टान पर अपना घर बनवाया था।

25) पानी बरसा, नदियों में बाढ आयी, आँधियाँ चलीं और उस घर से टकरायीं। तब भी वह घर नहीं ढहा; क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर डाली गयी थी।

26) ’’जो मेरी ये बातें सुनता है, किन्तु उन पर नहीं चलता, वह उस मूर्ख के सदृश है, जिसने बालू पर अपना घर बनवाया।

27) पानी बरसा, नदियों में बाढ आयी, आँधियाँ चलीं और उस घर से टकरायीं। वह घर ढह गया और उसका सर्वनाश हो गया।’’.


📚 मनन-चिंतन.



आज का सुसमाचार हमे बताता है, कि सिर्फ हे प्रभु! हे प्रभु! कहने भर से हम सवर्गराज्य में प्रवेश नहीं कर सकते। बल्कि प्रभु के वचनों के अनुसार जीवन व्यतीत करने से ही हम सवर्णराज्य के भागी बन सकते है। संत याकूब (1:18) मे कहते हैं। वचन के श्रोता ही नहीं बल्कि उसके पालनकर्त्ता भी बने ।

हमारा जीवन भी एक घर के समान है। हमारा जीवन अगर प्रभु के वचनों के अनुसार संचालित है, तो वह घर चटटान पर बना हुआ है। अगर नहीं तो हमारा जीवन बालू पर बने घर के समान है। जो प्रभु के वचन के अभाव में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाता है। 'प्रभु पर सदा भरोसा रखो, क्योंकि वही चिरस्थायी चटटान है। (इसा-26:4)

प्रभु हमारा चिरस्थायी चट्टान है। हमे उस चयन पर अपनी जीवन की नींव रखती है। आइये हम सदैव प्रभु से जुड़े रहे। जिससे वह भी हमेशा चटटान के समान मजबुती से हमसे जुड़े रहे।




📚 REFLECTION




Today's gospel tells us, that only by acclaiming oh Lord, oh Lord will not help us to enter the Kingdom of heaven but by living the word of the Lord literally and meaningfully will surely help us to enter the Kingdom of heaven.

In James 1:22–25 we read: “But be doers of the word, and not merely hearers only”.

Our life too, is similar to like a house. If our lives are guided by the word of the Lord then it is similar to the house which is established on the foundation of a strong rock. If not, then the house is similar to like a house whose foundation is laid on sand which will not be able to sustain is stability for more days.

Isaiah 26:4 Trust in the LORD forever, for the LORD, the LORD himself, is the Rock eternal.

Lord is our never moving Rock. What we need to do is to surrender our lives on this strong Rock. Come, let us always be together with the Lord so that we too remain as strong as Rock in our faith.




मनन-चिंतन - 2



प्रभु येसु एक बुध्दिमान व्यक्ति और एक बेवकूफ व्यक्ति की बात करते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति अपना घर चट्टान पर बनाता है और बेवकूफ व्यक्ति रेत पर अपना घर बनाता है। प्रभु एक उदार व्यक्ति और एक कंजूस की चर्चा नहीं करते; न ही एक सावधान आदमी और एक लापरवाह आदमी की बात। उनका विषयवस्तु ज्ञान है। चट्टान पर निर्माण करने वाले के पास ज्ञान होता है जबकि रेत पर निर्माण करने वाले के पास इसका अभाव होता है। समझदार व्यक्ति ईश्वर का वचन सुनता है और उस पर कार्य करता है। कुछ भी उसे विचलित, परेशान या नष्ट नहीं कर सकता। उसकी नींव पक्की है। ईश्वर का वचन सर्वज्ञ ईश्वर का ज्ञान है। जो वास्तव में, ईश्वरीय शब्द को प्राप्त करता है, वह ईश्वर का ज्ञान ही प्राप्त करता है। वह ईश्वर के ज्ञान को अपना कर्म बनाता है। स्वाभाविक रूप से वह असफल नहीं हो सकता। आइए हम ईश्वर से इस ज्ञान की कृपा मांगें।



REFLECTION



Jesus distinguishes between a wise man who builds his house on rock and a stupid man who builds his house on sand. Jesus does not distinguish between a spendthrift and a miser; nor between a careful man and a careless man. What is in question is the wisdom of the person. The person who builds on the rock has wisdom while the person who builds on sand lacks it. The sensible man listens to the Word of God and acts on it. Nothing can shake, disturb or destroy him. He has an unshakeable foundation. The Word of God is the wisdom of the omniscient God. One who receives the Word, in fact, receives the wisdom of God. He makes the wisdom of God his own in action. Naturally he cannot fail. Let us ask the Lord for the grace of this wisdom.


 -Br. Biniush topno


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बुधवार, 01 दिसंबर, 2021

 

बुधवार, 01 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 25:6-10a


6) विश्वमण्डल का प्रभु इस प्रर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी।

7) वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा,

8) श्वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है।

9) उस दिन लोग कहेंगे - “देखो! यही हमारा ईश्वर है। इसका भरोसा था। यह हमारा उद्धार करता है। यही प्रभु है, इसी पर भरोसा था। हम उल्लसित हो कर आनन्द मनायें, क्योंकि यह हमें मुक्ति प्रदान करता है।“

10) इस पर्वत पर प्रभु का हाथ बना रहेगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 15:29-37



29) ईसा वहाँ से चले गये और गलीलिया के समुद्र के तट पर पहुँच कर एक पहाड़ी पर चढे़ और वहाँ बैठ गये।

30) भीड़-की-भीड़ उनके पास आने लगी। वे लँगडे़, लूले, अन्धे, गूँगे और बहुत से दूसरे रोगियों को भी अपने पास ला कर ईसा के चरणों में रख देते और ईसा उन्हें चंगा करते थे।

31) गूँगे बोलते हैं, लूले भले-चंगे हो रहे हैं, लँगड़े चलते और अन्धे देखते हैं- लोग यह देखकर बड़े अचम्भे में पड़ गये और उन्होंने इस्राएल के ईश्वर की स्तुति की।

32) ईसा ने अपने शिष्यों को अपने पास बुला कर कहा, ’’मुझे इन लोगों पर तरस आता है। ये तीन दिनों से मेरे साथ रह रहें हैं और इनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है मैं इन्हें भूखा ही विदा करना नहीं चाहता। कहीं ऐसा न हो कि ये रास्ते में मूच्र्छित हो जायें।''

33) शिष्यों ने उन से कहा, ’’इस निर्जन स्थान में हमें इतनी रोटियाँ कहाँ से मिलेंगी कि इतनी बड़ी भीड़ को खिला सकें?’’

34) ईसा ने उन से पूछा, ’’तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं? उन्होंने कहा, ’’सात और थोड़ी-सी छोटी मछलियाँ’’।

35) ईसा ने लोगों को भूमि पर बैठ जाने का आदेश दिया

36) और वे सात रोटियाँ और मछलियाँ ले कर उन्होंने धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी, और वे रोटियाँ तोड़-तोड़ कर शिष्यों को देते गये और शिष्य लोगों को।

37) सबों ने खाया और खा कर तृप्त हो गये और बचे हुए टुकड़ों से सात टोकरे भर गये।


📚 मनन-चिंतन



जब हम ईश्वर के प्रति ईमानदार रहेंगे, प्रभु येस कभी भी हमे अकेला नहीं छोड़ेंगे।

आज के सुसमाचार में एक विशाल जनसमूह आशा एवं विश्वास के साथ येसु के वचने को सुनने आते हैं। येसु उनके विश्वास को देखकर उनपर अपनी दया व करुणा प्रकट करते हैं। उन्हें सभी प्रकार के रोगों से चंगाई प्रदान करते हैं। हमे भी अपने सुख, दुख, चिंताओ को लेकर येसु के पास आना चाहिये। थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगों! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हे विश्राम दूँगा | (मत्ती ११: २१)

यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हमें भी विश्वास के साथ येसु के पास आना है। प्रतिदिन कुछ क्षण प्रभु के साथ व्यतीत करना है। प्रतिदिन उनके वचनों को सुनना है, पढना है। ईमानदारी से प्रभु का साथ देना है। तब प्रभु हम पर भी अपनी दया व करुणा बरसायेगा । प्रभु कभी भी हमे अकेला नहीं छोड़ेगे। "तुम प्रभु पर अपना भार छोड़ दो, वह तुम को संभालेगा (स्त्रोत 55:२३)

हम एक विशवासी के रूप में जो भी हमारी जिम्मेदारी है। उसे ईमानदारी से निभायें और बाकी ईश्वर पर छोड़ दे। वह हमे कभी निराश नहीं करेगा |




📚 REFLECTION




If we are sincere towards God, Lord Jesus will never abandon us.

In today's gospel we see that a huge crowd of people comes to Jesus with a lot of hope and faith to hear Jesus words. Looking to the faith of these people Jesus expresses his mercy and compassion and heals the people who were suffering with sickness.

In the same way we should also bring all our joy, sorrow, stress and tension to Jesus.

“Come to me, all you who are weary and burdened, and I will give you rest. Take my yoke upon you and learn from me, for I am gentle and humble in heart, and you will find rest for your souls.” (Mt 11:28)

The most important thing is that, we should always come with faith to Jesus by spending some time with Jesus, by reading scriptures, by being sincere companion to Jesus. Then surely, Jesus will shower his mercy and compassion to us and he will never ever abandon us.

“But you, O God, will cast them down into the pit of destruction; men of blood and treachery shall not live out half their days. But I will trust in you.’’ (Psalm 55:23) v

We should always fulfill the responsibility that we are carrying as a faithfully and surrender the rest of the things in the hand of God who will never disappoint us.



मनन-चिंतन - 2



आज के सुसमाचार में हम रोटियों का दूसरा चमत्कार देखते हैं। येसु सात रोटियों और कुछ छोटी मछलियों से चार हज़ार से ज़्यादा लोगों को खिला कर तृप्त करते हैं। यह मुख्य रूप से करुणा का कार्य था। येसु भीड़ के लिए अनुकम्पा महसूस कर रहे थे। एज़ेकिएल 34 में प्रभु ने इस्राएल के चरवाहों के गैर-जिम्मेदार व्यवहार के बारे में चिन्तित थे। उन्होंने कहा, “धिक्कार इस्राएल के चरवाहों को! वे केवल अपनी देखभाल करते हैं। क्या चरवाहों को झुण्ड की देखवाल नहीं करनी चाहिए। तुम भेड़ों का दूध पीते हो, उनका ऊन पहनते और मोटे पशुओं का वध करते हो, किन्तु तुम भेड़ों को नहीं चराते।”(एज़ेकिएल 34: 2-3)। बाद में उनके लिए स्वयं चरवाहा बनने का वादा करते हुए, उन्होंने कहा, “मैं उन्हें इस्राएल के पहाड़ों पर, घाटियों में और देश भर के बसे हुए स्थानों पर चाराऊँगा। मैं उन्हें अच्छे चरागाहों में ले चलूँगा। वे इस्राएल के पर्वतों पर चरेंगी। वहाँ वे अच्छे चरागाहों में विश्राम करेंगी और इस्राएल के पर्वतों की हरी-भरी भूमि में चरेगी।” (एज़ेकिएल 34:13-14)। प्रभु येसु प्रभु ईश्वर का का वादा पूरा हुआ। प्यार और करुणा के साथ यीशु ने लोगों को खिलाया जो बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे। सभी ख्रीस्तीय नेताओं को प्रभु येसु के इस आदर्श को अपनाना चाहिए और उनकी प्रेममयी और दयालु सेवा का अनुकरण करना चाहिए।



REFLECTION



In the Gospel we have second story of the multiplication of the bread. Jesus multiplies seven loaves and some small fish to feed over four thousand people. This was primarily an act of compassion. Jesus was feeling sorry for the crowd. In Ezekiel 34 Yahweh lamented about the irresponsible behavior of the shepherds of Israel. He said, “Ah, you shepherds of Israel who have been feeding yourselves! Should not shepherds feed the sheep? You eat the fat, you clothe yourselves with the wool, you slaughter the fatlings; but you do not feed the sheep.” (Ezek 34:2-3). Later promising to become their Shepherd, he says, “I will feed them with good pasture, and the mountain heights of Israel shall be their pasture; there they shall lie down in good grazing land, and they shall feed on rich pasture on the mountains of Israel” (Ezek 34:14). In Jesus the promise of Yahweh is fulfilled. With love and compassion Jesus fed people who were like sheep without a shepherd. All Christian leaders are to imitate Jesus and follow his loving and compassionate service.


 -Br. Biniush topno


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