मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Duliajan, Assam, India
Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

मंगलवार, 07 सितम्बर, 2021

 

मंगलवार, 07 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : कलोसियों 2:6-15


6) आपने ईसा मसीह को प्रभु के रूप में स्वीकार किया है;

7) इसलिए उन्हीं से संयुक्त हो कर जीवन बितायें। उन्हीं से संयुक्त हो कर जीवन बितायें। उन्हीं में आपकी जड़ें गहरी हों और नींव सुदृढ़ हो। आप को जिस विश्वास की शिक्षा प्राप्त हुई है, उसी में दृढ़ बने रहें और आपके हृदयों में धन्यवाद की प्रार्थना उमड़ती रहे ।

8) सावधान रहें। कहीं ऐसा न हो कि कोई आप लोगों को ऐसे खोखले और भ्रामक दर्शन-शास्त्र द्वारा बहकाये, जो मनुष्यों की परम्परागत शिक्षा के अनुसार है और मसीह पर नहीं, बल्कि संसार के तत्वों पर आधारित हैं।

9) क्योंकि मसीह में ईश्वरीय तत्व की परिपूर्णता अवतरित हो कर निवास करती है

10) और उन में आप इस परिपूर्णता के सहभागी है। मसीह विश्व के सभी आधिपत्यों और अधिकारों के शीर्ष हैं- सभी मसीह के अधीन हैं।

11) उन्हीं में आप लोगों का ख़तना भी हुआ है। वह ख़तना हाथ से नहीं किया जाता, वह ख़तना मसीह का अर्थात् बपतिस्मा है, जिसके द्वारा पापमय शरीर को उतार कर फेंक दिया जाता है।

12) आप लोग बपतिस्मा के समय मसीह के साथ दफ़नाये गये और उन्हीं के साथ पुनर्जीवित भी किये गये हैं, क्योंकि आप लोगों ने ईश्वर के सामर्थ्य में विश्वास किया, जिसने उन्हें मृतकों में से पुनर्जीवित किया।

13) आप लोग पापों के कारण और अपने स्वभाव के ख़तने के अभाव के कारण मर गये थे। ईश्वर ने आप लोगों को मसीह के साथ पुनर्जीवित किया है और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया है।

14) उसने नियमों का वह बन्धपत्र, जो हमारे विरुद्ध था, रद्द कर दिया और उसे क्रूस पर ठोंक कर उठा दिया है।

15) उसने विश्व के प्रत्येक आधिपत्य और अधिकर को अपदस्थ किया, संसार की दृष्टि में उन को नीचा दिखाया और क्रूस के द्वारा उन्हें पराजित कर दिया है।



सुसमाचार : सन्त लूकस 6:12-19


12) उन दिनों ईसा प्रार्थना करने एक पहाड़ी पर चढ़े और वे रात भर ईश्वर की प्रार्थना में लीन रहे।

13) दिन होने पर उन्होंने अपने शिष्यों को पास बुलाया और उन में से बारह को चुन कर उनका नाम ’प्रेरित’ रखा-

14) सिमोन जिसे उन्होंने पेत्रुस नाम दिया और उसके भाई अन्द्रेयस को; याकूब और योहन को; फि़लिप और बरथोलोमी को,

15) मत्ती और थोमस को; अलफाई के पुत्र याकूब और सिमोन को, जो ’उत्साही’ कहलाता है;

16) याकूब के पुत्र यूदस और यूदस इसकारियोती को, जो विश्वासघाती निकला।

17) ईसा उनके साथ उतर कर एक मैदान में खड़े हो गये। वहाँ उनके बहुत-से शिष्य थे और समस्त यहूदिया तथा येरुसालेम का और समुद्र के किनारे तीरूस तथा सिदोन का एक विशाल जनसमूह भी था, जो उनका उपदेश सुनने और अपने रोगों से मुक्त होने के लिए आया था।

18) ईसा ने अपदूतग्रस्त लोगों को चंगा किया।

19) सभी लोग ईसा को स्पर्श करने का प्रयत्न कर रहे थे, क्योंकि उन से शक्ति निकलती थी और सब को चंगा करती थी।



📚 मनन-चिंतन


प्रार्थना प्रभु येसु के जीवन का एक अभिन्न अंग था जो उन्होने इस संसार में रहते हुए निरंतर किया। प्रार्थना से उन्हे बल और शक्ति मिलती थी जिससे वे पिता ईश्वर के कार्यो को पूरा कर सकें। प्रभु येसु ने हमेशा महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले देर रात तक या पूरी रात प्रार्थना किया करते थे। प्रार्थना के द्वारा वे पिता की ईच्छा को अच्छी तरह जान कर उन में आगे बढ़ने के लिए बल प्राप्त करते थे।

प्रभु येसु के लिए प्रार्थना सबसे महतवपूर्ण था, उन महान चिन्ह और चमत्कारों से भी महत्वपूर्ण जो उन्होंने किया। वे एक प्रार्थनामय इंसान थे और इस बात को उनके शिष्यों ने गहराई से जाना।

प्रार्थना एक ऐसा मधुर संवाद है जो मनुष्य और ईश्वर के बीच होता है। इस संवाद में दोनो तरफ से विचारों का आदान प्रदान होता है। हम भी प्रार्थना करते है परंतु अधिकतर लोगो की प्रार्थना केवल एक तरफा संवाद ही रहता है जहॉं पर हम केवल अपनी ही बाते करते जाते है परंतु प्रभु हम से क्या कहना चाहते है हम उनकी नहीं सुनतें। यही कारण है कि बहुत से लोग प्रार्थना में रुचि नहीं लेते क्योंकि उन्होने अभी तक प्रार्थना करना नहीं सीखा है। प्रार्थना वही सफल होती है जहॉं हम प्रभु के वचनो को भी सुनते है। हम प्रभु येसु के समान सच्चे प्रार्थनामय व्यक्ति बने।



📚 REFLECTION



Prayer was the integral part of Jesus’ life which he always did while living on this earth. He was receiving the strength and power from the prayer in order to accomplish the work of Father Almighty. Before taking any important decision Lord Jesus always used to spend late night or even whole night in prayer. Through prayer knowing the will of God he receives the strength to go forward.

For Lord Jesus prayer was very important, even from the mighty signs and miracles which he performed. He was a prayerful person and this the disciples knew in depth.

Prayer is a sweet conversation between the human and God. In this conversation there is exchange of thoughts or words from both the sides. We too also pray but very often many people prayer remains one sided talking where we share only our thoughts but fail to listen what God wants us to tell. For this reason only many don’t take interest in prayer because till now they have not learned to pray properly. The prayer is only meaningful when we also listen to the words of God. We all should be a prayerful person like Jesus.


✍ -Br Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

सोमवार, 06 सितम्बर, 2021

 

सोमवार, 06 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : कलोसियों 1:24-2:3


24) इस समय मैं आप लोगों के लिए जो कष्ट पाता हूँ, उसके कारण प्रसन्न हूँ। मसीह ने अपने शरीर अर्थात् कलीसिया के लिए जो दुःख भोगा है, उस में जो कमी रह गयी है, मैं उसे अपने शरीर में पूरा करता हूँ।

25) मैं ईश्वर के विधान के अनुसार कलीसिया का सेवक बन गया हूँ, जिससे मैं आप लोगों को ईश्वर का वह सन्देश,

26) वह रहस्य सुनाऊँ, जो युगों तथा पीढि़यों तक गुप्त रहा और अब उसके सन्तों के लिए प्रकट किया गया है।

27) ईश्वर ने उन्हें दिखलाना चाहा कि गैर-यहूदियों में इस रहस्य की कितनी महिमामय समृद्धि है। वह रहस्य यह है कि मसीह आप लोगों के बीच हैं और उन में आप लोगों की महिमा की आशा है।

28) हम उन्हीं मसीह का प्रचार करते हैं, प्रत्येक मनुष्य को उपदेश देते और प्रत्येक मनुष्य को पूर्ण ज्ञान की शिक्षा देते हैं, जिससे हम प्रत्येक मनुष्य को मसीह में पूर्णता तक पहुँचा सकें।

29) इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मैं उनके सामर्थ्य से, जो मुझ में प्रबल रूप से क्रियाशील है, प्रेरित हो कर कठिन परिश्रम करते हुए संघर्ष में लगा रहता हूँ।

1) मैं चाहता हूँ कि आप यह जानें कि मैं आप लोगों के लिए, लौदीकिया के विश्वासियों और उन सबों के लिए, जिन्होंने मुझे कभी नहीं देखा, कितना कठोर परिश्रम करता रहता हूँ,

2) जिससे वे हिम्मत न हारें, पे्रेम की एकता में बंधे रहें, ज्ञान की परिपूर्णता प्राप्त करें और इस प्रकार ईश्वर के रहस्य के मर्म तक पहुँच जायें।

3) वह रहस्य है मसीह, जिन में प्रज्ञा तथा ज्ञान की सम्पूर्ण निधि निहित है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:6-11


6) किसी दूसरे विश्राम के दिन ईसा सभागृह जा कर शिक्षा दे रहे थे। वहाँ एक मनुष्य था, जिसका दायाँ हाथ सूख गया था।

7) शास्त्री और फ़रीसी इस बात की ताक में थे कि यदि ईसा विश्राम के दिन किसी को चंगा करें, तो हम उन पर दोष लगायें।

8) ईसा ने उनके विचार जान कर सूखे हाथ वाले से कहा, ’’उठो और बीच में खड़े हो जाओ’’। वह उठ खड़ा हो गया।

9) ईसा ने उन से कहा, ’’मैं तुम से पूछ़ता हूँ-विश्राम के दिन भलाई करना उचित है या बुराई, जान बचाना या नष्ट करना?’’

10) तब उन सबों पर दृष्टि दौड़ा कर उन्होंने उस मनुष्य से कहा, ’’अपना हाथ बढ़ाओ’’। उसने ऐसा किया और उसका हाथ अच्छा हो गया।

11) वे बहुत क्रुद्ध हो गये और आपस में परामर्श करते रहे कि हम ईसा के विरुद्ध क्या करें।


📚 मनन-चिंतन


शास्त्री और फरीसी येसु से इतना घृणा करने लग गये थें कि वे येसु के महान चमत्कारों को देखते हुए भी उनमें ईश्वरत्व को नहीं पहचान पा रहें थे और इसके विपरीत वे हर क्षण येसु को किसी न किसी बातों में फसाना चाहते थे।

भलाई करना एक महान काम है, जिसके लिए न तो कोई सीमा है और न कोई बंदिशे। फरीसी और शास्त्री यह देखना चाहते थे येसु विश्राम के दिवस रोगियों को चंगा करते है कि नहंीं। येसु उनके मन की बातो को जानकर उस सूखे हाथ वाले व्यक्ति को चंगा करते हुए या बात को सिद्ध करते है कि भलाई के लिए कोई सीमा नहीं; न दिन की न जाति की। इसे हम प्रभु येसु द्वारा बताये गये भले समारी के दृष्टांत से भी समझ सकते है जहॉं पर एक समारी यह न देखते हुए कि एक व्यक्ति जो घायल है वह यहूदी है या कोई और वह उसकी सेवा सुश्रुषा करता है। प्रभु येसु हमें निरंतर भलाई करते रहने की शिक्षा देते है। हमारे साथ तो बुराई हर कोई कर सकता है परंतु हमें भलाई करने से कौन रोक सकता है, क्योंकि भलाई की न कोई सीमा है न बंदिशे।



📚 REFLECTION



The Pharisees and Scribes were envying Jesus to that extent that even after seeing the great miracles they were not able to recognize the divinity in him and on the contrary they wanted to trap him in every moment.

To good is a noble work, for which there is neither boundary nor limits. Pharisees and Scribes wanted to see whether Jesus heals the sick on the Sabbath or not. Understanding the mind of them Jesus heals the man with withered hand and hence affirming that there is no limit, neither of day nor of caste for doing any good. This we can also understand with the parable given by Jesus of the Good Samaritan, where one samaritan helps the wounded person withou seeing whether the person who is wounded is Jew or some one else. Lord Jesus always teaches us to do good. Any one can do wrong to us but no one can stop us from doing good because for goodness there is neither the boundary nor any limit.


✍ -Br Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

Mass Readings for Sunday, 5 September 2021

 Daily Mass Readings for Sunday, 5 September 2021

TWENTY-THIRD SUNDAY IN ORDINARY TIME

First Reading: Isaiah 35: 4-7a
Responsorial Psalm: Psalms 146: 7, 8-9, 9-10
Second Reading: James 2: 1-5
Alleluia: Matthew 4: 23
Gospel: Mark 7: 31-37

First Reading: Isaiah 35: 4-7a

4 Say to the fainthearted: Take courage, and fear not: behold your God will bring the revenge of recompense: God himself will come and will save you.

5 Then shall the eyes of the blind be opened, and the ears of the deaf shall be unstopped.

6 Then shall the lame man leap as a hart, and the tongue of the dumb shall be free: for waters are broken out in the desert, and streams in the wilderness.

7 And that which was dry land, shall become a pool, and the thirsty land springs of water.

Responsorial Psalm: Psalms 146: 7, 8-9, 9-10

R. (1b) Praise the Lord, my soul!

or

R. Alleluia.

7 Who keepeth truth for ever: who executeth judgment for them that suffer wrong: who giveth food to the hungry. The Lord looseth them that are fettered:

R. Praise the Lord, my soul!

or

R. Alleluia.

8 The Lord enlighteneth the blind. The Lord lifteth up them that are cast down: the Lord loveth the just.

9 The Lord keepeth the strangers.

R. Praise the Lord, my soul!

or

R. Alleluia.

9 He will support the fatherless and the widow: and the ways of sinners he will destroy.

10 The Lord shall reign for ever: thy God, O Sion, unto generation and generation.

R. Praise the Lord, my soul!

or

R. Alleluia.

Second Reading: James 2: 1-5

1 My brethren, have not the faith of our Lord Jesus Christ of glory with respect of persons.

2 For if there shall come into your assembly a man having a golden ring, in fine apparel, and there shall come in also a poor man in mean attire,

3 And you have respect to him that is clothed with the fine apparel, and shall say to him: Sit thou here well; but say to the poor man: Stand thou there, or sit under my footstool:

4 Do you not judge within yourselves, and are become judges of unjust thoughts?

5 Hearken, my dearest brethren: hath not God chosen the poor in this world, rich in faith, and heirs of the kingdom which God hath promised to them that love him?

Alleluia: Matthew 4: 23

R. Alleluia, alleluia.

23 Jesus proclaimed the Gospel of the kingdom and cured every disease among the people.

R. Alleluia, alleluia.


Gospel: Mark 7: 31-37

31 And again going out of the coasts of Tyre, he came by Sidon to the sea of Galilee, through the midst of the coasts of Decapolis.

32 And they bring to him one deaf and dumb; and they besought him that he would lay his hand upon him.

33 And taking him from the multitude apart, he put his fingers into his ears, and spitting, he touched his tongue:

34 And looking up to heaven, he groaned, and said to him: Ephpheta, which is, Be thou opened.

35 And immediately his ears were opened, and the string of his tongue was loosed, and he spoke right.

36 And he charged them that they should tell no man. But the more he charged them, so much the more a great deal did they publish it.

37 And so much the more did they wonder, saying: He hath done all things well; he hath made both the deaf to hear, and the dumb to speak.

Br. Biniush Topno



Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

इतवार, 05 सितम्बर, 2021

 

इतवार, 05 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य इतवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : इसायाह 35:4-7अ


4) घबराये हुए लोगों से कहो- “ढारस रखों डरो मत! देखो, तुम्हारा ईश्वर आ रहा है। वह बदला चुकाने आता है, वह प्रतिशोध लेने आता है, वह स्वयं तुम्हें बचाने आ रहा है।“

5) तब अन्धों की आँखें देखने और बहरों के कान सुनने लगेंगे। लँगड़ा हरिण की तरह छलाँग भरेगा। और गूँगे की जीभ आनन्द का गीत गायेगी।

6) मरुस्थल में जल की धाराएँ फूट निकलेंगी, रेतीले मैदानों में नदियाँ बह जायेंगी,

7) सूखी धरती झील बन जायेगी और प्यासी धरती में झरने निकलेंगे। जहाँ पहले सियारों की माँद थी, वहाँ सरकण्डे और बेंत उपजेंगे।



दूसरा पाठ : याकूब 2:1-5


1) भाइयो! आप लोग हमारे महिमान्वित प्रभु ईसा मसीह में विश्वास करते हैं, इसलिए भेदभाव और चापलूसी से दूर रहें।

2) मान लें कि आप लोगों की सभा में सोने की अंगूठी और कीमती वस्त्र पहने कोई व्यक्ति प्रवेश करता है और साथ ही फटे-पुराने कपड़े पहने कोई कंगाल।

3) यदि आप कीमती वस्त्र पहने व्यक्ति का विशेष ध्यान रख कर उस से कहें- "आप यहाँ इस आसन पर विराजिए" और कंगाल से कहें- "तुम वहाँ खड़ रहो" या "मेरे पांवदान के पास बैठ जाओ"।

4) तो क्या आपने अपने मन में भेदभाव नहीं आने दिया और गलत विचार के अनुसार निर्णय नहीं दिया।

5) प्यारे भाइयो! सुन लें। क्या ईश्वर ने उन लोगों को नहीं चुना है, जो संसार की दृष्टि में दरिद्र हैं, जिससे वे विश्वास के धनी हो जायें और उस राज्य के उत्तराधिकारी बनें, जिसे असने अपने भक्तों को प्रदान करने की प्रतिज्ञा की है?



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 7:31-37



31) ईसा तीरूस प्रान्त से चले गये। वे सिदोन हो कर और देकापोलिस प्रान्त पार कर गलीलिया के समुद्र के पास पहुँचे।

32) लोग एक बहरे-गूँगे को उनके पास ले आये और उन्होंने यह प्रार्थना की कि आप उस पर हाथ रख दीजिए।

33) ईसा ने उसे भीड़ से अलग एकान्त में ले जा कर उसके कानों में अपनी उँगलियाँ डाल दीं और उसकी जीभ पर अपना थूक लगाया।

34) फिर आकाश की ओर आँखें उठा कर उन्होंने आह भरी और उससे कहा, "एफ़ेता", अर्थात् "खुल जा"।

35) उसी क्षण उसके कान खुल गये और उसकी जीभ का बन्धन छूट गया, जिससे वह अच्छी तरह बोला।

36) ईसा ने लोगों को आदेश दिया कि वे यह बात किसी से नहीं कहें, परन्तु वे जितना ही मना करते थे, लोग उतना ही इसका प्रचार करते थे।

37) लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही। वे कहते थे, "वे जो कुछ करते हैं, अच्छा ही करते है। वे बहरों को कान और गूँगों को वाणी देते हैं।"



📚 मनन-चिंतन


रोग ग्रस्त जीवन न केवल स्वयं के लिए परंतु पूरे परिवार के लिए एक बोझ सा बन जाता है। कोई उस बोझ को उठाता है तो कोई उस बोझ से दूरी बना लेता है। अक्सर हम देखते है परिवार के लोग जब उस रोग ग्रस्त व्यक्ति का बोझ नहीं उठा पाते तो उसे अपने हालात में छोड़ देते है। परंतु आज के सुसमाचार में मानवता का अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है जहॉं पर लोग एक बहरे-गूॅंगे को येसु के पास लाते है ताकि येसु उन्हे चंगाई प्रदान करें। लोगो ने उस बहरे-गूॅंगे व्यक्ति की बेबस हालत को देखकर उसके लिए कुछ अच्छा करने की सोची।

ईश्वर ने हम सब को पॉंच इंद्रियों से विभूषित किया है जिससे हमें ज्ञान प्राप्त होता है। इनमें से कोई भी इंद्रियॉं काम करना बंद करदे तो जीवन अधूरा अधूरा सा लगता है। प्रभु येसु इस संसार में जीवन नहीं परंतु परिपूर्ण जीवन देने आये। और इसलिए वे सर्वप्रथम उन लोगों का, जो गूॅंगे, बहरे है, बिमार है या किसी भी प्रकार की समस्या में है उनको चंगाई प्रदान करी जिससे वे समझ जाये कि येसु ही वह मसीह है जो उनके जीवन को पूरिपूर्णता तक ले जा सकता है। हम सब प्रभु येसु से अपने लिए परिपूर्ण जीवन प्राप्त करें।



📚 REFLECTION



Sickly life becomes a kind of burden not only for oneself but also for the whole family. Some carry the burden but some keep themselves away from the burden. Usually we see that the people of some family leave the person in his situation when they are unable to bear the burden. But in today’s gospel we come across the beautiful example of humanity where people bring the deaf man who had an impediment in his speech so that Jesus can heal him. Seeing the helpless condition of the deaf-dumb man people thought of doing good for him.

God has blessed us with the five senses with which we acquire the knowledge. Among them if any one senses stop working them life seems to be incomplete. Lord Jesus came in this world not only to give life but life in abundance and for this reason he first healed the persons who were dumb, deaf, sick or people with any infirmities he healed them so that they may understand He is the Christ who will take their life to the fulfillment. We all may receive the fullness of life from Lord Jesus.



मनन-चिंतन - 2


आज के सुसमाचार में हम एक बहरे और गूँगे व्यक्ति को देखते हैं जिसे प्रभु येसु चंगाई प्रदान करने का चमत्कार करते हैं। प्रभु येसु के हर चमत्कार के पीछे कुछ न कुछ कारण होता है। कभी प्रभु येसु पिता ईश्वर के सन्देश व इस दुनिया में स्वयं के आने के उद्देश्य को भली-भाँति समझाना चाहते हैं, इसलिये चमत्कार करते हैं (देखिये योहन 9:1-7)। तो कभी अपने मानव स्वभाव के भावुक पहलू को प्रकट करने के लिये (देखिये लूकस 7:11-17)। इसको हम यों भी समझ सकते हैं कि जिस परिस्थिति में चमत्कार किया जाता है, उस परिस्थिति को उत्पन्न करने में ईश्वर की कुछ न कुछ भूमिका भी हो सकती है। उदाहरण के लिए जैसे ईश्वर किसी व्यक्ति का ध्यान एक विशेष पहलू या आदत या जीवन के बारे में खींचना चाहते हैं तो हो सकता है उस व्यक्ति के साथ ऐसी घटना घटे कि उसे उसमें ईश्वर का वह प्रयोजन समझ में आये या उसके द्वारा दूसरों को कोई सन्देश मिले।

सन्त आइरेनियुस का कहना है, ’’ईश्वर की महिमा इसमें है कि इन्सान पूर्ण रूप से जीवित हो।’’ इसे और साधारण भाषा में समझे तो यों कहेंगे ’कोई इन्सान ज़िन्दादिल है, स्वस्थ है, पूर्ण है, वही ईश्वर की महिमा को प्रकट करता है, क्योंकि हम सब ईश्वर के प्रतिरूप हैं और ईश्वर में कुछ भी कमी नहीं है। आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि लोग उस बहरे व्यक्ति को लेकर आते हैं जो गूँगा भी था। हम ज़रा और गहराई से उस व्यक्ति के बारे में सोचें। अगर कोई व्यक्ति बहरा है तो स्वाभाविक तौर से इसकी बहुत अधिक सम्भावना है कि वह व्यक्ति गूँगा भी हो क्योंकि प्रारम्भ में जब हम भाषा सीखते हैं तो अक्सर उसे सुनकर सीखते हैं। बाद में पढना-लिखना सीखते हैं और उस भाषा को और गहराई से व अन्य भाषाओं को भी सीखते हैं। उसके अलावा बोल-चाल के लिये शब्दों में ताल-मेल, उच्चारण, आवाज़ की तीव्रता, पिच आदि भी मायने रखते हैं। बहरे व्यक्ति को यह सब सीखना कठिन है, अतः वे स्वभावतः कुछ बोलना भी नहीं सीख पाते।

एक बहरा व्यक्ति अगर सुन नहीं सकता तो उसके लिये आधी दुनिया तो यों ही कट जाती है। लोग अपने बारे में क्या व्यक्त कर रहे हैं, बहरा व्यक्ति ना तो उसे समझ पाता है और न स्वयं को व्यक्त कर पाता है। अपनी अवाज़, अपनी भावनायें, अपना सुख-दुःख वह दूसरों के साथ नहीं बाँट सकता और न दूसरों के सुख-दुःख को समझ सकता है। आधुनिक युग में तकनीक के आगमन से ऐसे व्यक्तियों का जीवन अत्यन्त सुगम हो गया है लेकिन पुराने ज़माने में हालात बहुत बदतर थे। प्रभु येसु अक्सर व्यक्ति की परेशानी को महसूस कर उसे दूर कर देते थे। गूँगों को वाणी देना, बहरों को कान देना, अन्धों को रोशनी देना, लँगडों को चंगा करना ये सब मसीह के आगमन के लक्षण हैं। क्योंकि ईश्वर किसी को भी कष्ट में नहीं देख सकता। मनुष्यों के दुःख दूर करने, उन्हें मुक्ति प्रदान करने ही प्रभु येसु को पिता ईश्वर ने इस दुनिया में भेजा है।

हम प्रभु येसु के अनुयायी हैं, हम मसीह के प्रतिनिधि हैं। आज की दुनिया में हम हर जगह देखते हैं, सत्य को दबाया जाता है, कमजोरों पर अत्याचार किया जाता है, निर्बलों को परेशान किया जाता है। समाचार पत्र, दूरदर्शन समाचार आदि इसी प्रकार की खबरों से भरे पड़े हैं। उनमें से बहुत से अपराध या बुरे कर्म ऐसे हैं जिनके लिये अगर किसी ने आवाज़ उठाई होती तो वे अपराध किये ही नहीं जाते। अगर आस-पास के लोग गूँगे-बहरे नहीं बन जाते तो शायद किसी निर्दोष की रक्षा हो सकती थी। क्या आज हमें अपनी अन्तरात्मा का बहरापन और गूँगापन प्रभु येसु से दूर कराने की ज़रूरत तो नहीं है? क्या हम दूसरों के कष्टों और दुःखों को सुनते और समझते हैं? क्या हम मानव जीवन को नई राह दिखाने के लिये पिता ईश्वर के प्रतिनिधि बनने के लिये तैयार हैं? ईश्वर हमारी अन्तरात्मा के कान और जीभ के बन्धन खोल दे।


✍Br. Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com
Praise the Lord!

शनिवार, 04 सितम्बर, 2021

 

शनिवार, 04 सितम्बर, 2021

वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : कलोसियों 1:21-23


21) आप लोग भी अपने कुकर्मों के कारण ईश्वर से दूर हो गये थे और आपके मन में ईश्वर की शत्रुता भर गयी थी।

22) किन्तु अब मसीह ने अपने मरणशील शरीर की मृत्यु द्वारा ईश्वर से आपका मेल कराया है, जिससे वह आप को पवित्र, निर्दोष और अनिन्द्य बना कर ईश्वर के सामने प्रस्तुत कर सकें।

23) किन्तु आप को विश्वास में दृढ़ और अटल बना रहना चाहिए, जो आप को सुसमाचार द्वारा दिलायी गयी। वह सुसमाचार द्वारा दिलायी गयी। वह सुसमाचार आकाश के नीचे की समस्त सृष्टि को सुनाया गया है और मैं, पौलुुस, उसका सेवक हूँ।


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:1-5


1) ईसा किसी विश्राम के दिन गेंहूँ के खेतों से हो कर जा रहे थे। उनके शिष्य बालें तोड़ कर और हाथ से मसल कर खाते थे।

2) कुछ फ़रीसियों ने कहा, ’’जो काम विश्राम के दिन मना है, तुम क्यों वही कर रहे हो?’’

3) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’क्या तुम लोगों ने यह नहीं पढ़ा कि जब दाऊद और उनके साथियो ंको भूख लगी, तो दाऊद ने क्या क्या किया था?

4) उन्होंने ईश-मन्दिर में जा कर भेंट की रोटियाँ उठा लीं, उन्हें स्वयं खाया तथा अपने साथियों को भी खिलाया। याजकों को छोड़ किसी और को उन्हें खाने की आज्ञा तो नहीं है।’’

5) और ईसा ने उन से कहा, ’’मानव पुत्र विश्राम के दिन का स्वामी’’।


📚 मनन-चिंतन


नियम और कानून अक्सर लोगो की भलाई के लिए बनाई जाती है। परंतु वही नियम कानून का प्रयोग तर्क वितर्क करते हुए कई बुद्धिजीवि अपनी बात मनवाने के लिए भी प्रयोग करते है। विश्राम दिवस को पवित्र रखना एक नियम था जो सभी यहूदी इसका पालन करते है। यह दिवस अपवित्र न हो इसलिए उस दिन कोई कार्य नहीं किया जाता था। परंतु इसका मतलब यह नहीं कि लोग भोजन नहीं करते थे।

इस नियम को आधार मानकर कुछ फरीसियों ने येसु और उनके शिष्यों पर इस नियम को भंग करने का आरोप लगाया। परंतु यहॉं पर शिष्य कार्य नहीं परंतु भुख लगने पर गेहूॅ के बाले तोड़कर और उसे मसल कर खा रहे थे। उनका उद्देश्य केवल भूख मिटाना था न कि पूरे गेहॅूं की खेत को कटाई कर के अनाज इकट्ठा करना। फरीसियों के गलत तर्क को भाप कर येसु उन्हे दूसरा उदाहरण देते है जहॉं पर दाऊद और उनके साथियों ने किया जो करना वर्जित था। नियम का उपयोग केवल लोगों की भलाई के लिए किया जाना चाहिए न कि तर्क वितर्क कर दूसरो पर आरोप लगाने के लिए। नियम की सार्थकता लोगो की भलाई में ही पूर्ण होती है।



📚 REFLECTION



Rules and Laws are usually made for the good of the people. But the same rules and laws are being used logically by some intellect inorder to make their point true. To keep holy the Sabbath is one law which was followed by all Jews. To avoid this day to be profane they were not doing and work, but this does not mean that they were not eating food and all.

Basing their point in this law some Pharisees accused Jesus and the disciples for breaking the law. But it is known that the disciples here were not doing the labour work but they ate the grains after plucking and rubbing them in their hands. Their intension was to satiate their hunger not to reap for harvesting. Sensing the wrong logic of Pharisees Jesus gave them another example where David and his companions did which was not allowed for them. The usage of law has to be done for the good of the people and not for accusing some one by applying logic. The significance of law is accomplished only in the good of the people.


✍ -Br Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.com
Praise the Lord!

शुक्रवार, 03 सितम्बर, 2021

 

शुक्रवार, 03 सितम्बर, 2021

वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : कलोसियों 1:15-20


15) ईसा मसीह अदृश्य ईश्वर के प्रतिरूप तथा समस्त सृष्टि के पहलौठे हैं;

16) क्योंकि उन्हीं के द्वारा सब कुछ की सृष्टि हुई है। सब कुछ - चाहे वह स्वर्ग में हो या पृथ्वी पर, चाहे दृश्य हो या अदृश्य, और स्वर्गदूतों की श्रेणियां भी - सब कुछ उनके द्वारा और उनके लिए सृष्ट किया गया है।

17) वह समस्त सृष्टि के पहले से विद्यमान हैं और समस्त सृष्टि उन में ही टिकी हुई है।

18) वही शरीर अर्थात् कलीसिया के शीर्ष हैं। वही मूल कारण हैं और मृतकों में से प्रथम जी उठने वाले भी, इसलिए वह सभी बातों में सर्वश्रेष्ठ हैं।

19) ईश्वर ने चाहा कि उन में सब प्रकार की परिपूर्णता हो।

20) मसीह ने क्रूस पर जो रक्त बहाया, उसके द्वारा ईश्वर ने शान्ति की स्थापना की। इस तरह ईश्वर ने उन्हीं के द्वारा सब कुछ का, चाहे वह पृथ्वी पर हो या स्वर्ग में, अपने से मेल कराया।


सुसमाचार : सन्त लूकस 5:33-39


33) उन्होंने ईसा से कहा "योहन के शिष्य बारम्बार उपवास करते हैं और प्रार्थना में लगे रहते हैं और फरीसियों के शिष्य भी ऐसा ही करते हैं, किन्तु आपके शिष्य खाते-पीते हैं"।

34) ईसा ने उन से कहा, "जब तक दुलहा उनके साथ हैं, क्या तुम बारातियों से उपवास करा सकते हो?

35) किन्तु वे दिन आयोंगे, जब दुलहा उनके स बिछुड़ जायेगा। उन दिनों वे उपवास करेंगे।"

36) ईसा ने उन्हें यह दृष्टान्त भी सुनाया, "कोई नया कपड़ा फाड़ कर पुराने कपड़े में पैबंद नहीं लगाता। नहीं तो वह नया कपड़ा फाड़ेगा और नये कपड़े का पैबंद पुराने कपड़े के साथ मेल भी नहीं खायेगा।

37) और कोई पुरानी मशकों में नयी अंगूरी नहीं भरता। नहीं तो नयी अंगूरी पुरानी मशकों को फाड़ देगी, अंगूरी बह जायेगी और मशकें बरबाद हो जायेंगी।

38) नयी अंगूरी को नयी मशकों में ही भरना चाहिए।

39) "कोई पुरानी अंगूरी पी कर नयी नहीं चाहता। वह तो कहता है, ’पुरानी ही अच्छी है।"


📚 मनन-चिंतन


येसु की शिक्षा फरीसी और शास्त्री के लिए यहुदी परंपरा से अलग और नई लगती थी तथा वे समझते थे कि येसु शिक्षा यहुदियों के नियम के विरूद्ध है, इस हेतु वे येसु से कई बार वाद विवाद और उनसे ईर्ष्या करते थे। येसु की शिक्षा यहुदी नियम के विरूद्ध नहीं परंतु उनकी पूर्णता है और इस बात को वे संत मत्ती के सुसमाचार में बताते है, ‘‘यह न समझो कि मैं संहिता अथवा नबियों के लेखों को रद्द करने आया हूॅं। उन्हे रद्द करने नहीं, बल्कि पूरा करने आया हॅंू।’’

येसु की शिक्षा दिखने में नवीन और अलग प्रतीत होती है परंतु वे संहिता के विरूद्ध नहीं है। प्रभु येसु की शिक्षा को गहराई पूर्वक वहीं समझ पाते है जो येसु ख्रीस्त में नये प्राणी बन गये है, जिस प्रकार संत पौलुस 2कुरि 5ः17 में कहते है, ‘‘यदि कोई मसीह के साथ एक हो गया है, तो वह नयी सृष्टि बन गया है’’। मसीह में नया व्यक्ति पुराने रीति रिवाजों से नहीं परंतु नियम के अथपूर्ण जीवन बिताता है और इसी चीज पर येसु जोर देते है कि लोगो द्वारा शुरू की गई परंपरा नहीं परंतु अर्थपूर्ण जीवन बिताना ज्यादा जरूरी है।



📚 REFLECTION



The teachings of Jesus for Pharisees and Scribes seem to be new and different from the Jewish tradition all the more they find the teachings of Jesus to be against the law, due to this they use to keep envy and keep on debating with Jesus. The teaching of Jesus is not against the law but it is the accomplishment of them and this thing Jesus tells in the Gospel of Matthew, “Do not think that I have come to abolish the law or the prophets; I have come not to abolish but to fulfil.”

The teachings of Jesus seem to be new and different but it is not against the law. The depth of Jesus’ teachings is understood only by them, who are new creation in Christ Jesus, as St. Paul tells in 2Cor. 5:17, “If anyone is in Christ, there is a new creation: everything old has passed away.” In Christ the new creation does not live the life based on merely following tradition without knowing but living the life meaningful to the law and to this only Lord Jesus gives stress that living life meaningfully is much more important than the man made traditions.


✍ -Br Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.com
Praise the Lord!

गुरुवार, 02 सितम्बर, 2021

 

गुरुवार, 02 सितम्बर, 2021

वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : कलोसियों 1:9-14


9) जिस दिन से हमने यह सुना, हम निरंतर आप लोगों के लिए प्रार्थना करते रहे हैं। हम ईश्वर से यह निवेदन करते हैं कि वह आप को समस्त प्रज्ञा तथा आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि प्रदान करे, जिससे आप उसकी इच्छा पूर्ण रूप से समझ सकें।

10) इस प्रकार आप प्रभु के योग्य जीवन बिता कर सब बातों में उसे प्रसन्न करेंगे, हर प्रकार के भले कार्य करते रहेंगे और ईश्वर के ज्ञान में बढ़ते जायेंगे।

11) आप ईश्वर की महिमामय शक्ति से बल पा कर सदा दृढ़ बने रहेंगे,

12) सब कुछ आनन्द के साथ सह सकेंगे और पिता को धन्यवाद देंगे, जिसने आप को इस योग्य बनाया है कि आप ज्योति के राज्य में रहने वाले सन्तों के सहभागी बनें।

13) ईश्वर हमें अन्धकार की अधीनता से निकाल कर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में ले आया।

14) उस पुत्र के द्वारा हमारा उद्धार हुआ है, अर्थात् हमें पापों की क्षमा मिली है।



सुसमाचार : सन्त लूकस 5:1-11



1) एक दिन ईसा गेनेसरेत की झील के पास थे। लोग ईश्वर का वचन सुनने के लिए उन पर गिरे पड़ते थे।

2) उस समय उन्होंने झील के किनारे लगी दो नावों को देखा। मछुए उन पर से उतर कर जाल धो रहे थे।

3) ईसा ने सिमोन की नाव पर सवार हो कर उसे किनारे से कुछ दूर ले चलने के लिये कहा। इसके बाद वे नाव पर बैठे हुए जनता को शिक्षा देते रहे।

4) उपदेश समाप्त करने के बाद उन्होंने सिमोन से कहा, ’’नाव गहरे पानी में ले चलो और मछलियाँ पकड़ने के लिए अपने जाल डालो’’।

5) सिमोन ने उत्तर दिया, ’’गुरूवर! रात भर मेहनत करने पर भी हम कुछ नहीं पकड़ सके, परन्तु आपके कहने पर मैं जाल डालूँगा’’।

6) ऐसा करने पर बहुत अधिक मछलियाँ फँस गयीं और उनका जाल फटने को हो गया।

7) उन्होंने दूसरी नाव के अपने साथियों को इशारा किया कि आ कर हमारी मदद करो। वे आये और उन्होंने दोनों नावों को मछलियों से इतना भर लिया कि नावें डूबने को हो गयीं।

8) यह देख कर सिमोन ने ईसा के चरणों पर गिर कर कहा, ’’प्रभु! मेरे पास से चले जाइए। मैं तो पापी मनुष्य हूँ।’’

9) जाल में मछलियों के फँसने के कारण वह और उसके साथी विस्मित हो गये।

10) यही दशा याकूब और योहन की भी हुई; ये जेबेदी के पुत्र और सिमोन के साझेदार थे। ईसा ने सिमोन से कहा, ’’डरो मत। अब से तुम मनुष्यों को पकड़ा करोगे।’’

11) वे नावों को किनारे लगा कर और सब कुछ छोड़ कर ईसा के पीछे हो लिये।



📚 मनन-चिंतन


ईश्वर का बुलाहट इस संसार में एक वरदान है क्योकि वह हमें बताता है हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? हम इस संसार में किस लिये आये है? अक्सर इस संसार में अधिकतर लोग बिना मकसद के जीते है और कुछ इस संसार के चीजों को प्राप्त करना अपना मकसद समझते है परंतु इस सबसे भी गहरा और विशेष मकसद है जिसके लिए ईश्वर ने हमें बनाया और इस संसार में भेजा है। उस मकसद को जानना हम सभी के लिए बेहद जरूरी है। उस उद्देश्य को जानने के लिए हमें अपना ज्ञान, बुद्धि, सोच क्षमता को परे रखकर येसु की बाते सुनकर अपने जीवन को गहराई की ओर ले जाना है।

जिस प्रकार पेत्रुस ने अपनी क्षमता ज्ञान एवं तर्जुबा को परे रखकर येसु की बातों का पालन किया तब उसे येसु में ईश्वरता और अपने में पाप नजर आया तब जाकर येसु ने उनको उनके जीवन का उद्देश्य बताया जो कि मनुष्यें के मछुआ बनने का बुलाहट है। जब कभी हम अपने ज्ञान, क्षमता, तर्जुबा पर अवश्यकता से ज्यादा निर्भर रहते है तो हम ईश्वर की आवाज़ और उसके कार्य को समझने से वंचित रह जाते है। हमारा जीवन अपने पर नहीं परंतु प्रभु निर्भर होना चाहिए जो व्यक्ति प्रभु के वचन पर निर्भर होकर जीवन बिताता है उसका जीवन चट्टान रूपी नीव में बना रहता है वह अपने जीवन के मकसद में हर दुख तकलीफ, मुसीबत से उबर कर आगे बढ़ता जाता है। हम सब अपने जीवन के मकसद को पहचानें।



📚 REFLECTION


The Call of God is a gift to the world as it tells us what is the purpose of our lives? Why we came on this earth? Oftentimes in this world may people live the lives without any purpose and some think their goal is to collect the things of this world, but there is a deeper and special purpose for which we are being created and and being send in this world. To know that purpose is very important for us. To know that purpose we need to keep aside our knowledge, intellect, thoughts, capabilities and listening to Jesus we need to take our lives to the deep.

As Peter keeping aside his knowledge and experience obeyed the words of Jesus, he realized the divinity in Jesus and sinfulness in himself and then only Jesus told his purpose of life that is the Call to be the fisher of men. Whenever we rely on our knowledge, capabilities, experience more than the necessary then we restrict ourselves to listen to God’s voice and His works. Our lives should not depend on oneself but on God. One who lives in accordance with God’s word, his/her lives stand in the foundation of stone and he/she moves forward in the purpose of his/her lives overcoming all the sorrows, difficulties and obstacles. We all may find the purpose of our lives.



✍ -Br Biniush Topno


Copyright © www.catholicbibleministry1.com
Praise the Lord!