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इतवार, 22 अगस्त, 2021 वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 22 अगस्त, 2021

वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : योशुआ का ग्रन्थ 24:1-2a,15-17,18b


1) योशुआ ने सिखेम में सब इस्राएली वंशों को इकट्टा कर लिया। इसके बाद उसने इस्राएल के वयोवृद्ध नेताओ, न्यायकर्ताओं और शास्त्रियों को बुला भेजा और वे सब ईश्वर के सामने उपस्थित हो गये।

2) तब योशुआ ने समस्त लोगों से कहा, इस्राएल का प्रभु ईश्वर यह कहता है प्राचीन काल में तुम लोगों के पूर्वज, इब्राहीम और नाहोर का पिता तेरह, फरात नदी के उस पार निवास करते थे।

15) यदि तुम ईश्वर की उपासना नहीं करना चाहते, तो आज ही यह कर लो कि तुम किसकी उपासना करना चाहते हो- उन देवताओं की, जिनकी उपासना तुम्हारे पूर्वज नदी के उस पार करते थे अथवा अमोरियों के देवताओं की, जिनके देश में तुम रहते हो। मैं और मेरा परिवार, हम सब प्रभु की उपासना करना चाहते हैं।

16) लोगों ने उत्तर दिया, ’’प्रभु के छोड़ कर अन्य देवताओं की उपासना करने का विचार हम से कोसों दूर है।

17) हमारे प्रभु-ईश्वर ने हमें और हमारे पूर्वजों को दासता के घर से, मिस्र देश से निकाल लिया है। उसी ने हमारे सामने महान् चमत्कार दिखाये हैं। हम बहुत लम्बा रास्ता तय कर चुके हैं, बहुत से राष्ट्रों से हो कर यहाँ तक आये हैं और सर्वत्र उसी ने हमारी रक्षा की है।

18) हम भी प्रभु की उपासना करना चाहते हैं, क्योंकि वही हमारा ईश्वर है।



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 5:21-32



21) हम मसीह के प्रति श्रद्धा रखने के कारण एक दूसरे के अधीन रहें।

22) पत्नी प्रभु जैसे अपने पति के अधनी रहे।

23) पति उसी तरह पत्नी का शीर्ष है, जिस तरह मसीह कलीसिया के शीर्ष हैं और उसके शरीर के मुक्तिदाता।

24) जिस तरह कलीसिया मसीह के अधीन रहती है, उसी तरह पत्नी को भी सब बातों में अपने पति के अधीन रहना चाहिए।

25) पतियो! अपनी पत्नी को उसी तरह प्यार करो, जिस तरह मसीह ने कलीसिया को प्यार किया। उन्होंने उसके लिए अपने को अर्पित किया,

26) जिससे वह उसे पवित्र कर सकें और वचन तथा जल के स्नान द्वारा शुद्ध कर सकें;

27) क्योंकि वह एक ऐसी कलीसिया अपने सामने उपस्थित करना चाहते थे, जो महिमामय हो, जिस में न दाग हो, न झुर्री और न कोई दूसरा दोष, जो पवित्र और निष्कलंक हो।

28) पति अपनी पत्नी को इस तरह प्यार करे, मानो वह उसका अपना शरीर हो।

29) कोई अपने शरीर से बैर नहीं करता। उल्टे, वह उसका पालन-पोषण करता और उसकी देख-भाल करता रहता है। मसीह कलीसिया के साथ ऐसा करते हैं,

30) क्योंकि हम उनके शरीर के अंग हैं।

31) धर्मग्रन्थ में लिखा है- पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे।

32) यह एक महान रहस्य है। मैं समझता हूँ कि यह मसीह और कलीसिया के सम्बन्ध की ओर संकेत करता है।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 6:60-69



60) उनके बहुत-से शिष्यों ने सुना और कहा, ‘‘यह तो कठोर शिक्षा है। इसे कौन मान सकता है?’’

61) यह जान कर कि मेरे शिष्य इस पर भुनभुना रहे हैं, ईसा ने उन से कहा, ‘‘क्या तुम इसी से विचलित हो रहे हो?

62) जब तुम मानव पूत्र को वहाँ आरोहण करते देखोगे, जहाँ वह पहले था, तो क्या कहोगे?

63) आत्मा ही जीवन प्रदान करता है, मांस से कुछ लाभ नहीं होता। मैंने तुम्हे जो शिक्षा दी है, वह आत्मा और जीवन है।

64) फिर भी तुम लोगों में से अनेक विश्वास नहीं करते।’’ ईसा तो प्रारम्भ से ही यह जानते थे कि कौन विश्वास नहीं करते और कौन मेरे साथ विश्वासघात करेगा।

65) उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए मैंने तुम लोगों से यह कहा कि कोई मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक उसे पिता से यह बरदान न मिला हो’’।

66) इसके बाद बहुत-से शिष्य अलग हो गये और उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया।

67) इसलिए ईसा ने बारहों से कहा, ‘‘कया तुम लोग भी चले जाना चाहते हो?’’

68) सिमोन पेत्रुस ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘प्रभु! हम किसके पास जायें! आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का सन्देश है।

69) हम विश्वास करते और जानते हैं कि आप ईश्वर के भेजे हुए परमपावन पुरुष हैं।’’



📚 मनन-चिंतन



प्रभु येसु अपने अनुयायों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा देते हैं। वे लोगों के सामने खुद के जीवन व मकसद को लोगों के सामने उजागर कर देते हैं। वो यह है की वे इस संसार में स्वर्ग से उतरी हुई वह रोटी है जो मनुष्यों को अनंत जीवन देती है। अनंत जीवन में प्रवेश करने के लिए येसु के शरीर और रक्त का पान करना आवश्यक है। अपने इस शरीर और रक्त को कलवारी पर सबों के लिए अर्पित कर येसु ने संसार को जीवन दिया। यही उनके इस दुनिया में आने का उद्देश्य था।

येसु की इस महान घोषणा व महान रहस्य के प्रकटीकरण के बाद उम्मीद की जा रही थी होगी की लोग और भी अधिक संख्या में उनके पास आएंगे। क्योंकि उन्होंने अनंत जीवन का सन्देश सुनाया था। पर लोगों की प्रतिक्रिया इसके बिलकुल विपरीत थी। वे एक-एक करके वहां से जाने लगे। तब येसु ने जो सवाल पूछा वो बहुत ही मार्मिक है। ऐसा लगता है कि येसु बहुत अधिक निराश व हतोत्साहित हो गए थे। कितनी उम्मीद व उत्साह से भरकर उन्होंने लोगों को अनंत जीवन का सन्देश दिया पर लोग सिर्फ भौतिक भूख मिटाकर ही संतुष्ट थे। ऐसे में पेत्रुस का जवाब येसु को बहुत सुकून देता है। "हम कहाँ जाएँ, आपके ही शब्दों में अनंत जीवन का सन्देश है। "

हो सकता है पेत्रुस ने येसु से जो कहा उसका वे पूरा अर्थ नहीं समझ रहे होंगे लेकिन उन्हें इतना ज़रूर पता था कि इस जीवन में सबसे आवश्यक है अनंत जीवन का सन्देश: ईश्वर का वचन और वो सिर्फ येसु के पास ही है। मनुष्य सिर्फ रोटी से ही नहीं जीता वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है। पेत्रुस ने इस बात को समझ लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाये पर, 'अनन्त जीवन के वचन तो सिर्फ येसु के पास ही हैं और जीवन में अगर यह मिल गया तो फिर और किसी चीज़ की कमी न सताएगी।




📚 REFLECTION




Lord Jesus gives a very important teaching to his followers. He exposes his life and purpose to the people that He is the Bread that came down from heaven in this world that gives eternal life to humans. It is necessary to be nourished by His Body and Blood in order to enter into eternal life. Jesus gave life to the world by offering his body and blood for all on Calvary. This was the purpose of his coming into this world.

After this great announcement of Jesus and the revelation of the great secret, it was expected that people would come to him in greater numbers. For he preached the message of eternal life. But the reaction of the people was quite the opposite. They started leaving from there one by one. Then the question that Jesus asked is very touching. It seems that Jesus had become very discouraged disappointed. Filled with so much hope and enthusiasm, he gave the message of eternal life to the people, but people were satisfied only with material food. In such a situation, the answer of Peter gives great comfort to Jesus. "Where we go, in your own words is the message of eternal life." Peter may not have understood the full meaning of what he said to Jesus, but he did know that what is most important in this life is the message of eternal life: the word of God and that is only found in Jesus. Man does not live by bread alone; he lives by every word that comes the mouth of God. Peter had understood that no matter what happens, 'the word of eternal life is in Jesus only and if on finds it in life, that’s more than enough for the fulfilment of one’s earthly life



मनन-चिंतन - 2



येसु ने बहत्तर शिष्यों को नियुक्त कर उन्हें चंगाई, सुसमाचार सुनाने एवं विभिन्न शक्तियों से सम्पन्न कर भेजा। (देखिए लूकस 10:1-20) इन शिष्यों ने जगह-जगह जाकर महान कार्य किये। "बहत्तर शिष्य सानन्द लौटे और बोले, "प्रभु! आपके नाम के कारण अपदूत भी हमारे अधीन होते हैं"। (लूकस 10:17) इस प्रकार ये शिष्य प्रभु के साथ रहकर बहुत खुश थे। किन्तु संत योहन के सुसमाचार 6:60 में हम पाते हैं कि प्रभु येसु को सुनने वालों में से बहुत से लोग उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं। शायद उन बहत्तर शिष्यों में से बहुतों ने यह कहकर कि "ये तो कठोर शिक्षा है इसे कौन मान सकता है?" येसु के विरूद्ध लगभग विद्रोह किया। येसु की शिक्षा इतनी कठोर क्यों महसूस होती है? शिष्यों की ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया को हम सहज ही समझ सकते हंक क्योंकि येसु की शिक्षा का पालन करना इतना आसान नहीं है जितना की सुनना एवं सुनाना। हम उनकी शिक्षा को सुनकर आनन्द विभोर तो हो सकते हैं किन्तु जब उसे जीवन में लागू करने की बारी आती है तो हम कतराने लगते हैं। यहॉ तक कि हेरोद भी योहन बपतिस्ता के प्रवचनों को सुनकर आनन्दित होता था तथा उसकी सराहना करता था, "हेरोद योहन को धर्मात्मा और सन्त जान कर उस पर श्रद्धा रखता और उसकी रक्षा करता था। हेरोद उसके उपदेश सुन कर बड़े असमंजस में पड़ जाता था। फिर भी, वह उसकी बातें सुनना पसन्द करता था।" (मारकुस 6:20) योहन के प्रति इतनी प्रशंसा एवं श्रद्धा के बावजूद भी हेरोद योहन को जेल में डलवा देता है तथा अनिच्छा से ही सही मगर उसे मरवा डालता है। हेरोद सुसमाचार के प्रति आकर्षित तो हुये पर उसकी शिक्षानुसार नहीं चल पाये।

राज्यपाल फेलिक्स भी पौलुस को सुनना पंसद करता था तथा ईसा मसीह के बारे में सुनना चाहता था। किन्तु जब "पौलुस न्याय, आत्मसंयम तथा भावी विचार के विषय में बोलने लगा, तो फेलिक्स पर भय छा गया और उसने कहा, ’’तुम इस समय जा सकते हो। अवकाश मिलने पर मैं तुम को फिर बुलाऊँगा।’’ (प्रेरित चरित 24:25) इस प्रकार जब पौलुस ने फेलिक्स के जीवन के उन संदेहास्पद पहलुओं को इंगित किया तो उसने पौलुस को वापस भेज दिया।

पुराने विधान में हम पाते हैं कि योशुआ लोगों को ईश्वर को अपनाने या छोडने का विकल्प देते हुए कहते हैं, ’’यदि तुम ईश्वर की उपासना नहीं करना चाहते, तो आज ही तय कर लो कि तुम किसकी उपासना करना चाहते हो- .....मैं और मेरा परिवार, हम सब प्रभु की उपासना करना चाहते हैं।’’ इसके उत्तर में लोग तुरन्त ईश्वर को चुनते है, ’’लोगों ने उत्तर दिया, ’’प्रभु के छोड़ कर अन्य देवताओं की उपासना करने का विचार हम से कोसों दूर है।’’ (योशुआ 24:15-16) किन्तु हम जानते हैं कि पराजय एवं विषम परिस्थितियों में वे लोग शीघ्र ही प्रभु की शिक्षाओं त्याग कर कुढकुढाने लगते थे। इस प्रकार वे अपनी शपथ पर कायम नहीं रह सके तथा भटक गये। उनकी समस्या भी प्रभु की शिक्षाओं का पालन थी।

एक धनी युवक येसु का अनुसरण करना चाहता था किन्तु प्रभु की शिक्षा, ’’अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूंजी रखी रहेगी’’ (मत्ती 19:21) को सुनकर वह निराश होकर चला जाता है। उसके लिये येसु का अनुसरण करना एक अंशकालीन क्रिया मात्र थी किन्तु जब येसु उसे जीवनपर्यन्त प्रतिबद्धता के लिए बुलाते हैं तो वह इस बुलाहट को कठोर पाकर पीछे हट जाता है।

धर्मग्रंथ में हमें ऐसे अनेकों उदाहरण मिलेंगे जब लोगों ने ईश्वर की शिक्षा को कठोर मानकर त्याग दिया। हमें संत पेत्रुस के कथन एवं विश्वास ’’प्रभु हम किसके पास जाये! आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का संदेश है’’ से प्रेरणा एवं सीख ग्रहण करना चाहिए। पेत्रुस ने येसु को मुक्ति का एकमात्र स्रोत एवं उनकी शिक्षा को मुक्ति का एकमात्र साधन माना। दानिएल के ग्रंथ में शद्रक, मेशक और अबेदनगो ने मौत के मुँह में पहुँचकर भी ईश्वर की शिक्षा को नहीं त्यागा और कहा, ’’यदि कोई ईश्वर है, जो ऐसा कर सकता है, तो वह हमारा ही ईश्वर है, जिसकी हम सेवा करते हैं। वह हमें प्रज्वलित भट्टी से बचाने में समर्थ है और हमें आपके हाथों से छुडायेगा।’’ (दानिएल 3:17) उसके आगे के वचन उनके विश्वास की गहराई से हमारा परिचय कराते हैं। वे आगे कहते हैं, “यदि वह ऐसा नहीं करेगा, तो राजा! यह जान लें कि हम न तो आपके देवताओं की सेवा करेंगे और न आपके द्वारा संस्थापित स्वर्ण-मूर्ति की आराधना ही।’’

इब्राहिम ने भी अपनी सभी विपत्तियों में ईश्वर पर भरोसा रखा यहॉ तक कि अपने एकलौते पुत्र इसहाक को चढाने से पीछे नहीं हटे। (देखिस उत्पति 22:15-19) आइये हम भी अपने विश्वास में दृढ़ बने तथा स्तोत्रकार की तरह प्रभु से प्रार्थना करे, ’’प्रभु! मुझे अपना मार्ग दिखा, जिससे मैं तेरे सत्य के प्रति ईमानदार रहूँ। मेरे मन को प्रेरणा दे, जिससे मैं तेरे नाम पर श्रद्धा रखूँ।’’ (स्तोत्र 86:11)

जब प्रभु ने कहा, "जीवन की रोटी मैं हूँ। ....स्वर्ग से उतरी हुई वह जीवन्त रोटी मैं हूँ। यदि कोई वह रोटी खायेगा, तो वह सदा जीवित रहेगा। जो रोटी में दूँगा, वह संसार के लिए अर्पित मेरा मांस है।" जो मेरा मांस खाता और मेरा रक्त पीता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है और मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा," (योहन 6०:48,51,54) तो शिष्य एवं अन्य उपस्थित लोग उनकी बातें समझ नहीं पाये। येसु का कथन यूखारिस्त की पूर्वसूचना थी जिसमें येसु लोगों के लिए जीवंत शरीर और रक्त बन जाते हैं। लोग इस महान रहस्य एवं सच्चाई को समझ नहीं पाये इसलिए वे ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया देते हैं। येसु ने इससे पहले भी अनेक बार कठोर शब्दों में शिक्षा दी थी जैसे उन्होंने फरीसियों और शास्त्रियों को ढोंगी कहा, शत्रुओं से प्रेम करना सिखलाया, विवाह को अटूट बंधन बताया, संकरे द्वार और विस्तृत द्वार के भेद को समझाया, वेश्याओं और नाकेदारों को बुलाया, शिष्यों के पैर धौये, नगरों को धिक्कारा, विश्राम के दिन चंगाई के कार्य किये, आत्मत्याग पर बल दिया, क्षमाशीलता का नया पाठ पढाया, स्वयं को संसार की ज्योति तथा भला चरवाहा बताया आदि। किन्तु उन्होंने कभी भी विद्रोह जैसी बातें नहीं की। लोगों के लिए यह समझना असंभव था कि कैसे ईश्वर मनुष्य बन सकता है तथा वहीं ईश्वर कैसे उनके लिए उनका भोजन बन जायेगा। वे ईश्वर के इस महान प्रेम को यूखारिस्त में परिणीत होता नहीं देख सके। उनके लिए ईश्वर की धारणा शायद दूसरी रही हो किन्तु वे येसु की रोटी और रक्त की शिक्षा को सिरे से नकार देते हैं। लोगों की इस प्रतिक्रिया को हम संत पौलुस के कथन से समझ सकते हैं, ’’प्राकृत मनुष्य ईष्वर के आत्मा की शिक्षा स्वीकार नहीं करता। वह उसे मूर्खता मानता और उसे समझने में असमर्थ है, क्योंकि आत्मा की सहायता से ही उस शिक्षा की परख हो सकती है।’’ (1 कुरि. 2:14) इस कारण बहुत से शिष्य अलग हो गये और उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया। यूखारिस्त एक महान रहस्य है और इसे हम ईश्वर की कृपा के बिना समझ नहीं पायेंगे, स्वीकार नहीं कर पायेंगे।

जब येसु ने बचे हुये अपने बारह शिष्यों से पूछा कि ’’क्या तुम लोग भी चले जाना चाहते हो? तो पेत्रुस ने भावपूर्वक एक प्रेरणादायक तथा अंतदृष्टि से परिपूर्ण उत्तर दिया, ’’प्रभु! हम किसके पास जाये! आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का संदेश है।’’ पेत्रुस भले ही यूखारिस्त के रहस्य एवं सच्चाई को नहीं समझा हो किन्तु वह अपने येसु को त्यागना नहीं चाहता था। ईश्वर की कृपा से वह अब जानने लगा था कि प्रभु येसु मसीह हैं और ईश्वर के पुत्र हैं और इसलिए उनके वचनों पर उसे विश्वास करना चाहिए। इसलिए वह येसु के साथ बना रहता है तथा समय आने पर कालांतर में वह इस सच्चाई एवं रहस्य को भलीभांति समझ जाता है।


✍-Br Biniush Topno


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शनिवार, 21 अगस्त, 2021

 

शनिवार, 21 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : रूत 2:1-3,8-11; 4:13-17



1) अपने पति की तरफ़ से नोमी के बोअज़ नामक एक सम्बन्धी था। वह एलीमेलेक के कुल का बहुत धनी मनुष्य था।

2) मोआबिन रूत ने नोमी से कहा, "मुझे खेतों में जाने दीजिए। जो मुझ पर कृपा करेगा, उसी के पीछे-पीछे सिल्ला बीनना चाहती हूँ।" उसने उत्तर दिया, "बेटी, जाओ।"

3) वह गयी और खेतों में फ़सल काटने वालों के पीछे-पीछे सिल्ला बीनने लगी। सौभाग्य से वह जिस खेत पर पहुँची, वह एलीमेलेक के कुल के बोअज़ का ही था।

8) बोअज़ ने रूत से कहा, "बेटी! सुनो। दूसरे खेत में सिल्ला बीनने मत जाओ। यहाँ रहो। मेरी नौकरानियों के साथ रहो।

9) इसका ध्यान रखा करो कि किस खेत में फ़सल कट रही है और उनके पीछे-पीछे चलो। मैं अपने नौकरों को आदेश दे चुका हूँ कि वे तुम को तंग न करें। यदि तुम्हें प्यास लगे, तो नौकरों द्वारा भरे हुए घड़ों में से पानी पीने जाओ।"

10) रूत ने साष्टांग प्रणाम किया और कहा, "मुझे आपकी कृपादृष्टि कैसे प्राप्त हुई? मैं तो परदेशिनी हूँ और आप मेरी सुधि लेते हैं।"

11) बोअज़ ने उत्तर दिया, "लोगों ने मुझे बताया कि तुमने अपने पति की मृत्यु के बाद अपनी सास के लिए क्या-क्या किया है। तुम अपने माता-पिता और अपनी जन्मभूमि को छोड़ कर, ऐसे लोगों के यहाँ चली आयी हो, जिन्हें तुम पहले नहीं जानती थी।

4:13) बोअज़ ने रूत को अपनी पत्नी के रूप में अपनाया। बोअज़ का उस से संसर्ग हुआ। प्रभु की कृपा से रूत गर्भवती हो गयी और उसने पुत्र प्रसव किया।

14) स्त्रियों ने नोमी से कहा, "धन्य हैं प्रभु! उसने अब आप को एक उत्तराधिकारी दिया है और उसका नाम इस्राएल में बना रहेगा।

15) वह आप को नया जीवन प्रदान करेगा और बुढ़ापे में आपका सहारा होगा, क्योंकि आपकी बहू ने उसे जन्म दिया है। वह आप को प्यार करती है और आपके लिए सात पुत्रों से भी बढ़ कर है।"

16) नोमी ने शिशु को अपनी छाती से लगा लिया और उसका पालन-पोषण किया।

17) पड़ोस की स्त्रियों ने यह कहते हुए शिशु का नाम रखा, "नोमी को पुत्र उत्पन्न हुआ है।" उन्होंने उसका नाम ओबेद रखा वही दाऊद के पिता यिषय का पिता है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 23:1-12



1) उस समय ईसा ने जनसमूह तथा अपने शिष्यों से कहा,

2) "शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं,

3) इसलिए वे तुम लोगों से जो कुछ कहें, वह करते और मानते रहो; परन्तु उनके कर्मों का अनुसरण न करो,

4) क्योंकि वे कहते तो हैं, पर करते नहीं। वे बहुत-से भारी बोझ बाँध कर लोगों के कन्धों पर लाद देते हैं, परन्तु स्वंय उँगली से भी उन्हें उठाना नहीं चाहते।

5) वे हर काम लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए करते हैं। वे अपने तावीज चैडे़ और अपने कपड़ों के झब्बे लम्बे कर देते हैं।

6) भोजों में प्रमुख स्थानों पर और सभागृहों में प्रथम आसनों पर विराजमान होना,

7) बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना और जनता द्वारा गुरुवर कहलाना- यह सब उन्हें बहुत पसन्द है।

8) "तुम लोग ’गुरुवर’ कहलाना स्वीकार न करो, क्योंकि एक ही गुरू है और तुम सब-के-सब भाई हो।

9) पृथ्वी पर किसी को अपना ’पिता’ न कहो, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।

10 ’आचार्य’ कहलाना भी स्वीकार न करो, क्योंकि तुम्हारा एक ही आचार्य है अर्थात् मसीह।

11) जो तुम लोगों में से सब से बड़ा है, वह तुम्हारा सेवक बने।

12) जो अपने को बडा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा। और जो अपने को छोटा मानता है, वह बडा बनाया जायेगा।



📚 मनन-चिंतन



फरीसियों को येसु से एक बड़ी चुनौती मिलती थी, क्योंकि वे उन्हें छोटी-छोटी बातों से परे एक गहरी आध्यात्मिकता की और ले जाने की कोशिश कर रहे थे जो की जीवित ईश्वर के साथ एक जीवंत संबंध में निहित थी। फरीसी ऊपरी तौर पर अपनी धार्मिकता के प्रदर्शन मात्र से संतुष्ट थे। क्या मुझ में फरीसी का कुछ अंश है? क्या मैं दिखावे के लिए जीता हूं,? हमेशा इस बात की चिंता करता हूं कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं? क्या मैं एक उथली अध्यत्मिता में जी रहा हूँ? एक चीज़ से दूसरी चीज़ की ओर भटक रहा हूँ? क्या मैं अपने हृदय की गहराई में ईश्वर की पुकारों को नज़रअंदाज़ कर रहा हूँ, जो कि अपने आप में अधिक समृद्ध और अधिक संतोषजनक है?

प्रभु, मुझे आपका एक बेहतर अनुयायी बनने में मदद कर, और जो आप मुझे बताने की कोशिश कर रहे हैं उसे सुनने के लिए मुझे पवित्र आत्मा प्रदान कर। आपके साथ मेरी दैनिक व्यक्तिगत प्रार्थना चुपचाप मुझे बदल दें। शिचेस्टर के संत रिचर्ड की सुन्दर प्रार्थना को मैं आज दोहराना चाहता हूँ - प्रभु यह वर दे कि मैं आपको और अधिक स्पष्ट रूप से देख सकूँ, आपको और अधिक गहरे प्यार से प्रेम कर सकूँ, और आपका और अधिक करीबी से अनुसरण कर सकूँ। आमेन



📚 REFLECTION


The Pharisees get a hard time from Jesus, because he is trying to draw them away from trivialities to something deeper—a dynamic relationship with the living God. Is there anything of the Pharisee in me? Do I live for show, always worried about what others think of me? Am I superficial, flitting from one thing to the next, while ignoring the calls of God in the depth of my heart to something richer and more satisfying?

Lord, help me to be a better follower of yours, and to listen for what you are trying to tell me. May my daily meetings with you quietly transform me. In the words of the beautiful prayer, ‘may I see you more clearly, love you more dearly, and follow you more nearly’ (Saint Richard of Chichester).



✍ -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 20 अगस्त, 2021 वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 20 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : रूत 1:1.3-6.14b-16.22



1) न्यायकर्ताओं के समय देश में अकाल पड़ा, इसलिए यूदा के बेथलेहेम का एक व्यक्ति अपनी पत्नी और अपने दोनों पुत्रों के साथ मोआब के मैदान में बसने आया।

3) नोमी का पति एलीमेलेक मर गया और वह अपने दोनों पुत्रों के साथ रह गयी।

4) उन्होंने मोआबी स्त्रियों के साथ विवाह किया - एक ओर्पा कहलाती थी और दूसरी रूत। उन्होंने दस वर्ष तक वहाँ निवास किया।

5) इसके बाद महलोन और किल्योन भी मर गये और नोमी अपने दोनों पुत्रों और अपने पति से वंचित हो गयी।

6) तब उसने अपनी बहुओं के साथ मोआब के मैदान से चल देने का निश्चय किया; क्योंकि उसने सुना था कि प्रभु ने अपनी प्रजा की सुधि ली और उसे खाने के लिए रोटी दी थी।

14) दोनों बहुएँ फिर फूट-फूट कर रोने लगीं। ओर्पा अपनी सास को गले लगा कर अपने लोगों के यहाँ लौट गयी, किन्तु रूत अपनी सास से लिपट गयी।

15) नोमी ने उस से कहा, ‘‘देखो, तुम्हारी जेठानी अपने लोगों और अपने देवताओं के पास लौट गयी है। तुम भी अपनी जेठानी की तरह लौट जाओ।’’

16) किन्तु रूत ने उत्तर दिया, ‘‘इसके लिए अनुरोध न कीजिए कि मैं आप को छोड़ दूँ और लौट कर आप से दूर हो जाऊँ। आप जहाँ जायेंगी, वहाँ मैं भी जाऊँगी और आप जहाँ रहेंगी, वहाँ मैं भी रहूँगी। आपकी जाति मेरी भी जाति होगी और आपका ईश्वर मेरा भी ईश्वर होगा।

22) इस प्रकार नोमी अपनी मोआबी बहू रूत के साथ मोआब के मैदान से लौटी। वे जौ की कटनी के प्रारम्भ में बेथलेहेम पहॅुँची।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:34-40




34) जब फरीसियों ने यह सुना कि ईसा ने सदूकियों का मुँह बन्द कर दिया था, तो वे इकट्ठे हो गये।

35) और उन में से एक शास्त्री ने ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से पूछा,

36) गुरुवर! संहिता में सब से बड़ी आज्ञा कौन-सी है?’’

37) ईसा ने उस से कहा, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो।

38) यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है।

39) दूसरी आज्ञा इसी के सदृश है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

40) इन्हीं दो आज्ञायों पर समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलम्बित हैं।’’



📚 मनन-चिंतन



यद्यपि आज के सुसमाचार में येसु से पूछा गया प्रश्न उतने अच्छे उद्देष्य से नहीं पूछा गया था परन्तु वह प्र्श्न अपने आप में एक बहुत ही अच्छा प्रश्न है। येसु के समय यहूदी कानून में याने तोराह में 600 से अधिक आज्ञाएँ मानी जाती थीं। लोगों ने सवाल पूछा, 'क्या कोई एक आज्ञा थी जो अन्य सभी के ऊपर हो ?' फरीसियों के प्रश्न के उत्तर में यीशु ने जितना पूछा गया था उससे अधिक गहरा उत्तर दिया। उन्होंने न केवल सबसे महत्वपूर्ण आज्ञा दी, बल्कि जिसे वे स्वयं दो सबसे महत्वपूर्ण आज्ञा मानते थे।

दोनों आज्ञाओं में जो समान है वह है 'प्रेम' शब्द। ईश्वर के प्रति प्रेम हमारा प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए; केवल ईश्वर को ही हमारे पूरे अस्तित्व, हमें हमारे पूरे दिल, आत्मा और बुद्धि से प्यार करना है। येसु इस प्रथम आज्ञा को दूसरी महत्वपूर्ण आज्ञा से जोड़ते हैं और वो है, पड़ोसी के प्रति प्रेम। ऐसा लगता है कि येसु कह रहे हैं कि जो लोग पूरी तरह से ईश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, वे दूसरों के प्रति ईश्वर के प्रेम में बरबस ही बंध जाएंगे। वे दूसरों से उसी प्रकार प्रेम करेंगे जैसे ईश्वर उनसे प्रेम करता है। येसु अपने जीवन में प्रेम के इन दोनों पहलुओं को साकार करते हैं। इन दिनों में जब संसार में ईश्वर के नाम पर दूसरों को इतना कष्ट दिया जाता है, तो इन दो अविभाज्य आज्ञाओं को याद रखना अच्छा है। ये हमारे बपतिस्मा की बुलाहट का सार हैं तथा एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। हम ईश्वर और एक दूसरे के प्रति प्यार में निरंतर बढ़ते रहें।



📚 REFLECTION




The motivation underpinning the question that the Pharisees ask Jesus in today's gospel reading left a lot to be desired. Yet, even though the motive for asking the question was suspect, the question itself was a very good one. There were considered to be over 600 commandments in the Jewish Law at the time of Jesus. Devout people asked the question, ‘Was there any one commandment that should stand above all the others?’ In answer to the question of the Pharisees Jesus gave more than he was asked for. He not only gave the most important commandment but what he considered to be the two most important commandments.

What is common to both commandments is the word ‘love’. God is to be the primary object of our love; God alone is to be loved with all our being, all our heart, soul and mind. Jesus seems to have been unique in linking this primary commandment with another commandment which was found in a different place in the Scriptures to that first commandment, the love of the neighbour. Jesus seems to be saying that those who truly love God with all their being will be caught up into God’s love of others, will love others in the way God loves them. Jesus is the one human being who fully embodies the two-fold love. His love for God was so total, his loving communion with God was so complete, that he became the perfect expression of God’s love for others. In these days when so much suffering can be inflicted on others in the name of God, it is good to be reminded of these two inseparable commandments. They are the essence of our baptismal calling.


✍ -Br Biniush Topno



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गुरुवार, 19 अगस्त, 2021

 

गुरुवार, 19 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : न्यायकर्ताओं 11:29-39



29) उस समय प्रभु के आत्मा ने यिफ़्तह को प्रेरित किया। यिफ़्तह गिलआद और मनस्से को पार कर गिलआद के मिस्पा नामक स्थान पहुँचा और वहाँ से अम्मोनियों के यहाँ आया।

30) यिफ़्तह ने यह कहते हुए प्रभु के सामने यह मन्नत मानी, "यदि तू अम्मोनियों को मेरे हवाले कर देगा और मैं सकुशल लौटँूगा,

31) तो जो पहला व्यक्ति मेरी अगवानी करने मेरे घर से निकलेगा, वह प्रभु का होगा और मैं उसकी होम-बलि चढ़ाऊँगा।"

32) यिफ़्तह अम्मोनियों के विरुद्ध युद्ध करने निकला और प्रभु ने उन को उसके हवाले कर दिया।

33) यिफ़्तह ने अरोएर से मिन्नीत के आसपास तक बीस नगरों को जीता और आबेल-करामीम तक अम्मोनियों को बुरी तरह पराजित कर दिया। इस प्रकार अम्मोनी लोग इस्राएलियों के अधीन हो गये।

34) जब यिफ़्तह मिस्पा में अपने यहाँ लौटा, तो उसकी पुत्री द्वार से निकल कर डफली बजाते और नाचते हुए उसकी अगवानी करने आयी। वह उसकी अकेली सन्तान थी। उसके सिवा यिफ़्तह के न तो कोई पुत्र था और न कोई पुत्री।

35) यिफ़्तह ने उसे देखते ही अपने वस्त्र फाड़ कर कहा, "हाय! बेटी! तुमने मुझे मारा है! तुमने मुझे महान संकट में डाल दिया है। मैं प्रभु को वचन दे चुका हूँ। मैं उसे वापस नहीं ले सकता।"

36) उसने उत्तर दिया, "पिता जी! आप प्रभु को वचन दे चुके हैं। आप मेरे विषय में अपनी मन्नत पूरी कीजिए, क्योंकि प्रभु ने आप को अपने शत्रुओं से, अम्मोनियों से, बदला चुकाने का वरदान दिया है।"

37) इसके बाद उसने अपने पिता से कहा, "एक निवेदन है। मुझे दो महीने का समय दीजिए, जिससे मैं पहाड़ पर जा कर अपनी सखियों के साथ अपने कुँवारेपन का षोक मनाऊँ।"

38) उसने उत्तर दिया, "जाओ" और उसे दो महीनों के लिए जाने दिया। वह अपनी सखियों के साथ चली गयी और उसने पहाड़ पर अपने कुँवारेपन का षोक मनाया।

39) वह दो महीने के बाद अपने पिता के यहाँ लौटी और उसने उसके विषय में अपनी मन्नत पूरी कर दी। उसका कभी किसी पुरुष के साथ संसर्ग नहीं हुआ। इस प्रकार इस्राएल में इस प्रथा का प्रचलन हुआ



सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:1-14



1) ईसा उन्हें फिर दृष्टान्त सुनाने लगे। उन्होंने कहा,

2) "स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जिसने अपने पुत्र के विवाह में भोज दिया।

3) उसने आमन्त्रित लोगों को बुला लाने के लिए अपने सेवकों को भेजा, लेकिन वे आना नहीं चाहते थे।

4) राजा ने फिर दूसरे सेवकों को यह कहते हुए भेजा, ’अतिथियों से कह दो- देखिए! मैंने अपने भोज की तैयारी कर ली है। मेरे बैल और मोटे-मोटे जानवर मारे जा चुके हैं। सब कुछ तैयार है; विवाह-भोज में पधारिये।’

5) अतिथियों ने इस की परवाह नहीं की। कोई अपने खेत की ओर चला गया, तो कोई अपना व्यापार देखने।

6) दूसरे अतिथियों ने राजा के सेवकों को पकड़ कर उनका अपमान किया और उन्हें मार डाला।

7) राजा को बहुत क्रोध आया। उसने अपनी सेना भेज कर उन हत्यारों का सर्वनाश किया और उनका नगर जला दिया।

8) "तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’विवाह-भोज की तैयारी तो हो चुकी है, किन्तु अतिथि इसके योग्य नहीं ठहरे।

9) इसलिए चैराहों पर जाओ और जितने भी लोग मिल जायें, सब को विवाह-भोज में बुला लाओ।’

10) सेवक सड़कों पर गये और भले-बुरे जो भी मिले, सब को बटोर कर ले आये और विवाह-मण्डप अतिथियों से भर गया।

11) "राजा अतिथियों को देखने आया, तो वहाँ उसकी दृष्टि एक ऐसे मनुष्य पर पड़ी, जो विवाहोत्सव के वस्त्र नहीं पहने था।

12) उसने उस से कहा, ’भई, विवाहोत्सव के वस्त्र पहने बिना तुम यहाँ कैसे आ गये?’ वह मनुष्य चुप रहा।

13) तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’इसके हाथ-पैर बाँध कर इसे बाहर, अन्धकार में फेंक दो। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।’

14) क्योंकि बुलाये हुए तो बहुत हैं, लेकिन चुने हुए थोडे़ हैं।"



📚 मनन-चिंतन


निमंत्रण कोई आदेश नहीं है। हमें जीवन में कई निमंत्रण मिलते हैं, या तो मौखिक रूप से या लिखित रूप में और हम शायद उनमें से कईयों को अनदेखा या अस्वीकार कर देते हैं। हम निमंत्रण स्वीकार करने या न करने के लिए स्वतंत्र हैं। हमारे साथ संबंध बनाने का ईश्वर का तरीका आज्ञा के बजाय अधिकतर एक निमंत्रण का आकार लेता है। जिस दृष्टांत को येसु आज के सुसमाचार में बताते हैं, वह हम सभी के लिए जीवन के भोज के लिए ईश्वर के निमंत्रण के बारे में है। कहानी में, एक राजा है जो अपने बेटे की शादी के भोज में चुने हुए मेहमानों को आमंत्रित करता है।

जब आमंत्रित सभी मना कर देते हैं; वह भोजन रद्द नहीं करता है, इसके बजाय वह एक नए समूह को आमंत्रित करता है। कहानी का वह पहलू हमें ईश्वर की दृढ़तानिश्चियिता के बारे में बताता है। जब ईश्वर के निमंत्रण के प्रति मानवीय प्रतिक्रिया नहीं आ रही है, तो ईश्वर कुछ भी रद्द नहीं करता है; वह बस अपने निमंत्रण को तेज करता है। ईश्वर यह सुनिश्चित करने के लिए कार्य करना जारी रखता है कि अधिक से अधिक लोग जीवन के भोज में पहुंचें। यह भोज एक अर्थ में मसीह के व्यक्तित्व में सन्निहित है जो जीवन की रोटी है।

दृष्टांत का दूसरा भाग हमें याद दिलाता है कि ईश्वर के निमंत्रण के लिए 'हां' कहना कुछ ऐसा नहीं है जिसे हम एक बार करते हैं और फिर भूल जाते हैं। हमें अपने जीवन के हर दिन ईश्वर के निमंत्रण के लिए 'हां' कहना है। दृष्टान्त की भाषा में हमें विवाह का वस्त्र धारण करते रहना है। बपतिस्मा के समय मसीह को पहिनने के बाद, हमें उस बपतिस्मा के वस्त्र को सदैव धारण किये रहना है। याने हमारी वह प्रारम्भिक शुद्धता और पवित्रता को बनाये रखना है।




📚 REFLECTION



An invitation is not a command. We receive many invitations in life, either verbally or in writing and we probably ignore or decline a good number of them. We are free to accept an invitation or not. God’s way of relating to us is shaped more by invitation than by command. The parable Jesus speaks in the gospel reading this morning is about God’s invitation to all of us to the banquet of life. In the story, the king who invites chosen guests to his son’s wedding banquet does not cancel the meal when those who were invited all refuse; instead, he invites a whole new group. That aspect of the story speaks to us of God’s persistence.

When the human response to God’s invitation is not forthcoming, God does not cancel anything; he simply intensifies his invitation. God continues to work to ensure that as many as possible approach the banquet of life. This banquet is in a sense embodied in the person of Christ who is the bread of life.

The second part of the parable reminds us that saying ‘yes’ to the God’s invitation is not something we do once and then forget about. We have to say ‘yes’ to God’s invitation everyday day of our lives. In the language of the parable, we have to keep putting on the wedding garment. Having been clothed with Christ at baptism, we have to keep clothing ourselves with Christ and all he stands for, day by day.


✍ -Br. Biniush Topno


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बुधवार, 18 अगस्त, 2021

 

बुधवार, 18 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : न्यायकर्ताओं 9:6-15



6) इसके बाद सिखेम और बेत-मिल्लों के सब नागरिक सिखेम के बड़े पत्थर के निकट, बलूत वृक्ष के पास एकत्र हो गये और उन्होंने अबीमेलेक को राजा घोषित किया।

7) जब योताम को इसकी सूचना मिली, तो वह जा कर गरिज़्ज़ीम पर्वत के षिखर पर खड़ा हो गया। उसने ऊँचे स्वर से लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा, ’’सिखेम के नागरिको! मेरी बात सुनो, जिससे प्रभु तुम लोगों की बात सुने।

8) वृक्ष किसी दिन अपने राजा का अभिशेक करने निकले। वे जैतून के पेड़ से बोले, ‘आप हमारे राजा बन जाइए’।

9) किन्तु जैतून वृक्ष ने उन्हें यह उत्तर दिया, ’यह क्या! मैं वृक्षों पर राज्य करने के लिए अपना यह तेल क्यों छोड़ दूँ, जिसके द्वारा देवताओं और मनुष्यों का सम्मान किया जाता है?

10) तब वृक्ष अंजीर के पेड़ से बोले, ’आप हमारे राजा बन जाइए’।

11) किन्तु अंजीर वृक्ष ने उन्हें यह उत्तर दिया, ‘यह क्या! मैं वृक्षों पर राज्य करने के लिए अपना बढ़िया मधुर फल क्यों छोड़ दूँ?’

12) इसके बाद वृक्ष अंगूर के पेड़ से बोले, ’आप हमारे राजा बन जाइए’

13) और अंगूर के पेड़ ने उन्हें यह उत्तर दिया, ’यह क्या! मैं वृक्षों पर राज्य करने के लिए अपना यह रस क्यों छोड़ दूँ, जो देवताओं और मनुष्यों का आनन्दित करता है?-

14) ’’तब सब वृक्ष कँटीले झाड़ से बोले, ’आप हमारे राजा बन जाइए’।

15) कँटीले झाड़ ने वृक्षों को यह उत्तर दिया, ’यदि तुम लोग सचमुच अपने राजा के रूप में मेरा अभिशेक करना चाहते हो, तो मेरी छाया की षरण लेने आओ। नहीं तो, कँटीले झाड़ से आग निकलेगी और लेबानोन के देवदार वृक्षों को भी भस्म कर देगी।’



सुसमाचार : सन्त मत्ती 20:1-16



1) ’’स्वर्ग का राज्य उस भूमिधर के सदृश है, जो अपनी दाखबारी में मज़दूरों को लगाने के लिए बहुत सबेरे घर से निकला।

2) उसने मज़दूरों के साथ एक दीनार का रोज़ाना तय किया और उन्हें अपनी दाखबारी भेजा।

3) लगभग पहले पहर वह बाहर निकला और उसने दूसरों को चैक में बेकार खड़ा देख कर

4) कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ, मैं तुम्हें उचित मज़दूरी दे दूँगा’ और वे वहाँ गये।

5) लगभग दूसरे और तीसरे पहर भी उसने बाहर निकल कर ऐसा ही किया।

6) वह एक घण्टा दिन रहे फिर बाहर निकला और वहाँ दूसरों को खड़ा देख कर उन से बोला, ’तुम लोग यहाँ दिन भर क्यों बेकार खड़े हो’

7) उन्होंने उत्तर दिया, ’इसलिए कि किसी ने हमें मज़दूरी में नहीं लगाया’ उसने उन से कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ।

8) ’’सन्ध्या होने पर दाखबारी के मालिक ने अपने कारिन्दों से कहा, ’मज़दूरों को बुलाओ। बाद में आने वालों से ले कर पहले आने वालों तक, सब को मज़दूरी दे दो’।

9) जब वे मज़दूर आये, जो एक घण्टा दिन रहे काम पर लगाये गये थे, तो उन्हें एक एक दीनार मिला।

10) जब पहले मज़दूर आये, तो वे समझ रहे थे कि हमें अधिक मिलेगा; लेकिन उन्हें भी एक-एक दीनार ही मिला।

11) उसे पाकर वे यह कहते हुए भूमिधर के विरुद्ध भुनभुनाते थे,

12) इन पिछले मज़दूरों ने केवल घण्टे भर काम किया। तब भी आपने इन्हें हमारे बराबर बना दिया, जो दिन भर कठोर परिश्रम करते और धूप सहते रहे।’

13) उसने उन में से एक को यह कहते हुए उत्तर दिया, ’भई! मैं तुम्हारे साथ अन्याय नहीं कर रहा हूँ। क्या तुमने मेरे साथ एक दीनार नहीं तय किया था?

14) अपनी मजदूरी लो और जाओ। मैं इस पिछले मजदूर को भी तुम्हारे जितना देना चाहता हूँ।

15) क्या मैं अपनी इच्छा के अनुसार अपनी सम्पत्ति का उपयोग नहीं कर सकता? तुम मेरी उदारता पर क्यों जलते हो?

16) इस प्रकार जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे और जो अगले है, पिछले हो जायेंगे।’’



📚 मनन-चिंतन


आज का दृष्टान्त येसु के उन दृष्टान्तों में से एक है जिस पर लोग अक्सर नकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिन मजदूरों ने दिनभर मेहनत की उनके साथ जिन्होंने एक घंटे तक काम किया उनकी तुलना में अन्याय हुआ क्योंकि सबों को सामान वेतन दिया गया था। हालांकि, मालिक ने पूरे दिन काम करने वालों के साथ अन्याय नहीं किया; उसने उन्हें एक दिन के काम के लिए एक दिन की मजदूरी दी। कहानी में आश्चर्य की बात यह है कि नियोक्ता उन लोगों के साथ असाधारण रूप से उदार था जिन्होंने एक घंटे तक काम किया। साथ ही उन्हें एक दिन का वेतन भी देता है। उसने किसी के साथ कोई अन्याय नहीं किया गया, लेकिन कुछ मज़दूर आश्चर्यजनक और असाधारण उदारता के हितग्राही बने थे यह कुछ लोगों के लिए एक प्रकार से अचरज और जलन का कारण बन गया था।

इस दृष्टान्त की शुरूआत इस वाक्यांश के साथ होती है - 'स्वर्ग का राज्य ऐसा है...' कहानी की दुनिया में ईश्वर का संसार परिलक्षित होता है; नियोक्ता का चरित्र किसी न किसी रूप में ईश्वर को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि येसु कह रहे हैं कि ईश्वर की उदारता हमें हमेशा आश्चर्यचकित करेगी। हमारे साथ व्यवहार करने का ईश्वर का तरीका उस सीमा को तोड़ देता है जिसे मनुष्य न्यायसंगत और उचित समझेंगे। ईश्वर हमारे लिए जो कुछ करता है वह उससे कहीं अधिक है जो हम ईश्वर के लिए कर सकते हैं। हमने जो कमाया है या जिसके लायक है, उसके आधार पर ईश्वर हमसे सम्बन्ध या नाता रखता। ईश्वर का उदार प्रेम एक शुद्ध उपहार है; यह किये गए श्रम का पुरस्कार नहीं है। हम दिन के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रभु की सेवा करते हैं, न कि उसका प्यार हासिल करने या अर्जित करने के लिए, बल्कि उस प्यार के लिए आभारी प्रतिक्रिया के रूप में।



📚 REFLECTION



This is one of the parables of Jesus that people often react negatively to. There is a feeling that the workers who worked all done were hard done by because those who worked for the last hour were given the same wage. However, in the world of the story, the employer did not treat those who worked all day unjustly; he gave them a day’s wages for a day’s work. The surprise in the story is that the employer was exceptionally generous with those who worked for an hour, giving them a day’s wages as well. No injustice was done to anyone, but some of the workers were the recipients of a surprising and extravagant generosity.

Jesus began this parable, with the phrase, ‘the kingdom of heaven is like…’ The world of God is reflected in the world of the story; the character of the employer reflects God in some way. Jesus appears to be saying that God’s generosity will always take us by surprise. God’s way of dealing with us breaks the bounds of what humans would consider just and fair. What God does for us far exceeds what we might do for God. God does not relate to us on the basis of what we have earned or deserved. God’s generous love is pure gift; it is not a reward for labour rendered. We serve the Lord from one end of the day to the other not to gain or earn his love but in grateful response for the love already given to us long before we could do anything.



✍ -Br Biniush topno


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मंगलवार, 17 अगस्त, 2021 वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 17 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : न्यायकर्ताओं 6:11-24



11) प्रभु का दूत आया और ओफ्ऱा के बलूत वृक्ष के नीचे बैठ गया। यह वृक्ष अबीएजे़र-वंशी योआश का था। योआश का पुत्र गिदओन इसलिए अंगूर पेरने के कोल्हू में गेहूँ दाँव रहा था कि वह उसे मिदयानियों से छिपा कर रखे।

12) प्रभु का दूत उसे दिखाई दिया और बोला, "वीर योद्धा! प्रभु तुम्हारे साथ है"।

13) गिदओन ने उत्तर दिया, "क्षमा करें, महोदय! यदि प्रभु हमारे साथ हैं, तो यह सब हम पर क्यों बीती? वे सब चमत्कार कहाँ गये, जिनका वर्णन हमारे पूर्वज यह कहते हुए करते थे- ‘प्रभु ने हमें मिस्र से निकाल लसश्स’? अब तो प्रभु ने हमें छोड़ कर मिदयानियों के हवाले कर दिया।

14) प्रभु ने उसे सम्बोधित करते हुए कहा, "तुम मिदयानियों से युद्ध करने जाओ। तुम अपनी शक्ति के बल पर इस्राएल को उनके हाथ से बचा सकते हो। मैं ही तुम को भेज रहा हूँ।"

15) गिदओन ने उत्तर दिया, "क्षमा करें, महोदय! मैं इस्राएल को कैसे बचा सकता हूँ? मेरा कुल मनस्से में सब से दरिद्र है और मैं अपने पिता के घराने में सब से छोटा हूँ।"

16) किन्तु प्रभु ने कहा, "मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। तुम मिदयानियों को पराजित करोगे, मानो वे एक ही आदमी हों।"

17) गिदओन ने निवेदन किया, "यदि मुझ पर आपकी कृपादृष्टि हो, तो मुझे एक ऐसा चिन्ह दीजिए, जिससे मैं जान सकूँ कि

18) आप ही मुझ से बोल रहे हैं। आप कृपया यहाँ से तब तक न जायें, जब तक मैं आपके पास न लौट आऊँ। मैं अपना चढ़ावा ले कर आऊँगा और आपके सामने रखूँगा।" उसने उत्तर दिया, "मैं तुम्हारे लौटने तक यहाँ रहूँगा"।

19) गिदओन ने जा कर बकरी का एक बच्चा पकाया और आधा मन मैदे की बे-ख़मीर रोटियाँ बनायी। उसने एक टोकरी में मांस रखा और एक पात्र में षोरबा उँड़ेला। फिर उसने इन्हें ले जा कर बलूत के नीचे स्वर्गदूत के सामने रख दिया।

20) प्रभु के दूत ने उस से कहा, "मांस और रोटियाँ वहाँ चट्टान पर रखो और उन पर षोरबा उँड़ेल दो"। उसने यही किया।

21) तब प्रभु के दूत ने अपने हाथ का डण्डा बढ़ा कर उसके सिरे से मांस और बेख़मीर रोटियों को स्पर्श किया। इस पर चट्टान से आग निकली, जिसने मांस और बेख़मीर रोटियों को भस्म कर दिया और प्रभु का दूत गिदओन की आँख से ओझल हो गया।

22) तब गिदओन समझ गया कि वह प्रभु का दूत था और उसने कहा, "हाय! प्रभु-ईश्वर! मैंने प्रभु के दूत को आमने-सामने देखा है।"

23) किन्तु प्रभु ने उसे आश्वासन दिया, "तुम्हें शान्ति मिले! मत डरो। तुम नहीं मरोगे।"

24) गिदओन ने वहाँ प्रभु के लिए एक वेदी बनायी और उसका नाम ‘प्रभु-शांति’ रखा। वह अबीएज़ेर के वंशजों के ओफ्ऱा में आज तक विद्यमान है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 19:23-30



23) तब ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - धनी के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन होगा।

24) मैं यह भी कहता हूँ कि सूई के नाके से हो कर ऊँट का निकलना अधिक सहज है, किन्तु धनी का ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना कठिन है।"

25) यह सुनकर शिष्य बहुत अधिक विस्मित हो गये और बोले, "तो फिर कौन बच सकता है।"

26) उन्हें स्थिर दृष्टि से देखते हुए ईसा ने कहा, "मनुष्यों के लिए तो यह असम्भव है। ईश्वर के लिए सब कुछ सम्भव है।"

27) तब पेत्रुस ने ईसा से कहा, "देखिए, हम लोग अपना सब कुछ छोड़ कर आपके अनुयायी बन गये हैं। तो, हमें क्या मिलेगा?"

28) ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं तुम, अपने अनुयायियों से यह कहता हूँ - मानव पुत्र जब पुनरुत्थान में अपने महिमामय सिहांसन पर विराजमान होगा, तब तुम लोग भी बारह सिंहासनों पर बैठ कर इस्राएल के बारह वंशों का न्याय करोगे।

29) और जिसने मेरे लिए घर, भाई-बहनों, माता-पिता, पत्नी, बाल-बच्चों अथवा खेतों को छोड दिया है, वह सौ गुना पायेगा और अनन्त जीवन का अधिकारी होगा।

30) बहुत-से लोग, जो अगले हैं, पिछले हो जायेंगे और जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे।



📚 मनन-चिंतन



कल के सुसमाचार में अमीर युवक ने अपनी संपत्ति के प्रति लगाव के कारण, अनन्त जीवन प्राप्त करने की अपनी महान इच्छा के बावजूद, येसु का अनुसरण करना असंभव पाया। यही कारण है कि आज के सुसमाचार में येसु आगे कहते हैं, 'स्वर्ग के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है। येसु के इस कठोर कथन ने शिष्यों को चकित कर दिया और उन्हें लगभग निराशाजनक प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया, 'फिर कौन बच सकता है?' वे ये कहते प्रतीत होते हैं, कि न केवल उस अमीर, युवक के लिए जो आपके पास आया था परन्तु किसी के लिए भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना लगभग असंभव होगा। यीशु ने उनकी नकारात्मक सोच को एक बहुत ही आशावादी कथन के साथ काट दिया, 'मनुष्यों के लिए यह असंभव है; ईश्वर के लिए सब कुछ संभव है'।

येसु कह रहे हैं कि हमारे अंतिम मुकाम पर पहुंचना हमारे कर्मों से ज्यादा ईश्वर का काम है; यह हमारे प्रयासों से अधिक ईश्वर की कृपा के कारण संभव है। एफीसियों को लिखे पत्र की भाषा में- इस प्रकार आप लोग, ईश्वर की पूर्णता तक पहुँच कर, स्वयं परिपूर्ण हो जायेंगे। जिसका सामर्थ्य हम में क्रियाशील है और जो वे सब कार्य सम्पन्न कर सकता है, जो हमारी प्रार्थना और कल्पना से अत्यधिक परे है,। (एफेसियों 3:20)

जब हम अपने आप में कमज़ोर होते हैं और महसूस करते हैं कि यात्रा हमारी यह दुनयाई यात्रा बहुत भारी है, तब हमें खुद को इस महान सत्य की याद दिलाना होगा। संत पौलुस ने जेल से एक पत्र में घोषणा की,जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मैं उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हूँ।(फिलिपियों 4:13) हमें उन संसाधनों पर अपना भरोसा बनाए रखने की आवश्यकता है जो प्रभु हमें हमेशा हमें प्रदान करते हैं और जिनकी हमें बहुत आवश्यकता है।




📚 REFLECTION




In yesterday’s gospel reading the rich young man found it impossible to follow Jesus because of his attachment to his possessions, in spite of his great desire to inherit eternal life. That is why Jesus goes on to say in this morning’s gospel reading, ‘it is easier for a camel to pass through the eye of an needle than for a rich man to enter the kingdom of kingdom of heaven. This stark statement of Jesus left the disciples astonished and led them to ask the almost despairing question, ‘Who then can be saved?’ They seem to be saying, ‘it must be nearly impossible for anyone to enter the kingdom o heaven, not just that rich, good man who approached you’. Jesus cuts across their negative thinking with a very hopeful statement, ‘for men this is impossible; for God everything is possible’.

Jesus is saying that arriving at our ultimate destiny is more God’s doing than our doing; it is due more to God’s grace than to our efforts. In the language of the letter to the Ephesians, God’s ‘power at work within us is able to accomplish abundantly far more than all we can ask or imagine’. It is above all when we are low in ourselves and feel the journey is too much for us that we need to remind ourselves of this great truth. Saint Paul declared in a letter from prison, ‘I can do all things in him who gives me strength’. We need to keep putting our trust in the resources the Lord is always giving us and which we need so much.


✍ -Br Biniush topno


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सोमवार, 16 अगस्त, 2021

 

सोमवार, 16 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : न्यायकर्ताओं 2:11-19



11) तब इस्राएलियों ने वही किया, जो प्रभु की दृष्टि में बुरा है और वे बाल-देवताओं की पूजा करने लगे।

12) उन्होंने प्रभु को, अपने पूर्वजों के ईश्वर को, जो उन्हें मिस्र से निकाल लाया था, त्याग दिया। वे अपने आसपास रहने वाले लोगों के देवताओं के अनुयायी बन कर उनकी पूजा करने लगे। उन्होंने प्रभु को अप्रसन्न कर दिया।

13) वे प्रभु को त्याग कर बाल और अष्तारता-देवियों की पूजा करने लगे।

14) तब प्रभु का कोप इस्राएलियों के विरुद्ध भड़क उठा। उसने उन्हें छापामारों के हवाले कर दिया, जो उन्हें लूटने लगे। उसने उन्हें उनके षत्रुओं के हाथ बेच दिया और वे उनका सामना करने में असमर्थ रहे।

15) जब वे युद्ध करने निकलते, तो पराजित हो जाते थे; क्योंकि प्रभु उनके विरुद्ध था, जैसी कि उसने षपथ खा कर उन्हें चेतावनी दी थी।

16) जब इस्राएलियों की दुर्गति बहुत अधिक बढ़ जाती थी, तो प्रभु न्यायकर्ताओं को नियुक्त किया करता था, जो उन्हें लूटने वालों के हाथ से बचाया करते थे।

17) किन्तु वे न्यायकर्ताओं की बात नहीं मानते और पथभ्रष्ट हो कर पराये देवताओं की पूजा और उपासना करते थे। वे प्रभु की आज्ञा पर चलने वाले अपने पूर्वजों का मार्ग षीघ्र ही छोड़ देते थे। वे अपने पूर्वजों का अनुकरण नहीं करते थे।

18) जब प्रभु उनके लिए कोई न्यायकर्ता नियुक्त करता था, तो प्रभु उसका साथ देता और जब तक न्यायकर्ता जीता रहता था, तब तक प्रभु इस्राएलियों को उनके षत्रुओं के हाथ से बचाया करता था; क्योंकि जब वे अपने अत्याचारियों के दुव्र्यवहार से पीड़ित हो कर कराहते थे, तो प्रभु को उन पर तरस आता था।

19) परन्तु जब वह न्यायकर्ता मर जाता था, तो वे षीघ्र ही अपने पूर्वजों से भी अधिक घोर पाप करते थे। वे पराये देवताओं के अनुयायी बन कर उनकी पूजा और उपासना करते थे। उन्होंने अपनी पुरानी आदतें और हठीला व्यवहार कभी नहीं छोड़ा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 19:16-22



16) एक व्यक्ति ईसा के पास आ कर बोला, ’’गुरुवर! अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए मैं कौन-सा भला कार्य करूँ?’’

17) ईसा ने उत्तर दिया, ’’भले के विषय में मुझ से क्यों पूछते हो? एक ही तो भला है। यदि तुम जीवन में प्रवेश करना चाहते हो, तो आज्ञाओं का पालन करो।’’

18) उसने पूछा, ’’कौन-सी आज्ञाएं?’’ ईसा ने कहा, ’’हत्या मत करो; व्यभिचार मत करो; चोरी मत करो; झूठी गवाही मत दो;

19) अपने माता पिता का आदर करो; और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो’’।

20) नवयुवक ने उन से कहा, ’’मैने इन सब का पालन किया है। मुझ में किस बात की कमी है?’’

21) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी, तब आकर मेरा अनुसरण करो।’’

22) यह सुन कर वह नव-युवक बहुत उदास हो कर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।




📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार वर्णित युवक स्पष्ट रूप से एक बहुत ही नेक इरादे वाला व्यक्ति है। वह उन आज्ञाओं के प्रति वफादार रहा है जिन्हें येसु उद्धृत करते हैं। फिर भी, वह महसूस करता है कि उसे किसी और चीज़ के लिए बुलाया जा रहा है, और, इसलिए वह अपने प्रश्न के साथ येसु की जाँच करता है, 'मुझे और क्या करने की आवश्यकता है?' जब व्यक्तिगत बुलाहट की बात आती है जिसके बारे में येसु ने उसे बताया, तो वह इसका उत्तर नहीं दे सका। इस युवक को, येसु का अनुसरण करने के आह्वान के लिए अपने महान धन को छोड़ने की आवश्यकता थी। यीशु उससे कह रहे थे कि वह अपनी बड़ी दौलत के बजाय ईश्वर पर भरोसा रखे। वह ऐसा करने के लिए खुद को राजी नहीं कर सका, और इसलिए, वह उदास होकर चला गया।

यीशु हम में से प्रत्येक को एक व्यक्तिगत बुलाहट प्रदान करते हैं। यह बुलाहट हम में से प्रत्येक के लिए एक अलग रूप लेगी और हम में से प्रत्येक के लिए अलग-अलग निहितार्थ होंगे। हालाँकि,येसु की बुलाहट हमारे लिए जो भी रूप लेती है, उसमें हमेशा ईश्वर में हमारी सुरक्षा को खोजने के लिए एक आह्वान शामिल होगा। हमारा परम खजाना हमें स्वर्ग में मिलना है, धरती पर नहीं। जैसा कि येसु अन्यत्र कहते हैं, हमें ईश्वर को अपने पूरे दिल, दिमाग, आत्मा और शक्ति से प्यार करना है। और सबसे पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करना है, तभी हमें बाकी सब चीज़ें यूँ ही मिल जाएगी।




📚 REFLECTION





There is something appealing about the young man in today’s Gospel reading. He was an earnest young man who was serious about finding the path that led to eternal life. His question is a serious question, ‘What good deed must I do to possess eternal life?’ In his reply Jesus named a number of commandments, all of which have to do with how we are to relate to other people. Jesus indicates that the way to life for ourselves entails relating in a life-giving way to others. This young man was not satisfied with Jesus’ answer because he felt he was already doing what Jesus was asking for, and, yet, he knew there was more he could be doing.

When Jesus revealed what this ‘more’ would involve for this particular young man, it again had to do with his relationship to others, in particular the poor, the needy; Jesus called on him to sell what he had and give the money to the poor. This was a step too far for him. Jesus did not make this particular demand of everybody he encountered. Yet, for all of us, the path to life, the path of life, will always be the path of love, of loving relationships with others. By his teaching, by his life and his death, Jesus shows us what relating in a loving way to others looks like.


✍ -Br Biniush topno


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Praise the Lord!