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मंगलवार, 27 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 27 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : निर्गमन 33:7-11, 34, 5-9, 28


7) मूसा ने तम्बू को उठवा कर शिविर के बाहर कुछ दूरी पर खड़ा कर दिया और उसका नाम दर्शन-कक्ष रखा। यदि कोई प्रभु से परामर्श लेना चाहता था, तो वह शिविर के बाहर उस दर्शन-कक्ष के पास चला जाता था।

8) जब मूसा उस तम्बू की ओर जाता था, तो सब लोग अपने-अपने तम्बू के द्वार पर खड़े हो जाते और मूसा को तब तक देखते रहते थे, जब तक वह तम्बू में प्रवेश न करे।

9) मूसा के प्रवेश करते ही बादल का खम्भा उतर कर तम्बू के द्वार पर खड़ा हो जाया करता था। तब प्रभु मूसा से बातें करता था।

10) तम्बू के द्वार पर बादल का खम्भा खड़ा देख कर सभी लोग तुरन्त अपने-अपने तम्बू के द्वार पर से उसे दण्डवत् किया करते थे।

11) जिस तरह एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से बात करता है, उसी तरह प्रभु मूसा के आमने-सामने प्रकट हो कर उस से बात करता था। जब मूसा शिविर में लौटता था, तो उसका सहायक नून का पुत्र, योशुआ नामक युवक तम्बू में रह जाता था।

5) प्रभु बादल के रूप में उतर कर उसके पास आया और अपना "प्रभु" नाम प्रकट किया।

6) प्रभु ने उसके सामने से निकल कर कहा, ''प्रभुः प्रभु एक करूणामय तथ कृपालु ईश्वर है। वह देर से क्रोध करता और अनुकम्पा तथा सत्यप्रतिज्ञता का धनी है।

7) वह हजार पीढ़ियों तक अपनी कृपा बनाये रखता और बुराई, अपराध और पाप क्षमा करता है।''

8) मूसा ने तुरन्त दण्डवत् कर उसकी आराधना की

9) और कहा, ''प्रभु; यदि मुझ पर तेरी कृपादृष्टि है, तो मेरा प्रभु हमारे साथ चले। ये लोग हठधर्मी तो हैं, किन्तु तू हमारे अपराध तथा पाप क्षमा कर दे और हमें अपनी निजी प्रजा बना ले।''

28) मूसा वहाँ चालीस दिन और चालीस रात प्रभु के साथ रहा। उसने न तो रोटी खायी और न पानी पिया। उसने विधान के शब्द, अर्थात दस नियम पाटियों पर अंकित किये।


सुसमाचार : मत्ती 13:36-43


36) ईसा लोगों को विदा कर घर लौटे। उनके शिष्यों ने उनके पास आ कर कहा, ’’खेत में जंगली बीज का दृष्टान्त हमें समझा दीजिए’’।

37) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’अच्छा बीज बोने बाला मानव पुत्र हैं;

38) खेत संसार है; अच्छा बीज राज्य की प्रजा है; जंगली बीज दृष्ट आत्मा की प्रजा है;

39) बोने बाला बैरी शैतान है; कटनी संसार का अंत है; लुनने वाले स्वर्गदूत हैं।

40) जिस तरह लोग जंगली बीज बटोर कर आग में जला देते हैं, वैसा ही संसार के अंत में होगा।

41) मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा और वे उसके राज्य क़़ी सब बाधाओं और कुकर्मियों को बटोर कर आग के कुण्ड में झोंक देंगें।

42) वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

43) तब धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की तरह चमकेंगे। जिसके कान हों, वह सुन ले।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में शिष्यों के आग्रह पर प्रभु येसु जंगली बीज के दृष्टान्त का अर्थ समझाते हैं. प्रभु येसु कहते हैं, कि बीज बोने वाला मानव पुत्र है, खेत संसार है, अच्छा बीज अच्छे लोग हैं, बैरी शैतान है और बुरे लोग जंगली बीज हैं, संसार का अन्त कटनी का समय है और काटने वाले मजदूर स्वर्गदूत हैं. अर्थात इस दुनिया में ईश्वर ने अच्छे लोगों को बनाया, ऐसे लोगों को जो ईश्वर के अपने प्रतिरूप में थे, जिनमें बिलकुल भी बुराई नहीं थी, लेकिन शैतान आकर इस दुनिया में बुराई के बीज बो देता है, लोगों के दिलों में जो दुर्गुण ईश्वर के विरुद्ध हैं, उन्हें बो देता है. शैतान मनुष्यों के दिलों में नफ़रत के बीज, ईर्ष्या, द्वेष, बदले भी भावना, लालच आदि के बीज बो देता है और फसल दो भागों में बंट जाती है - अच्छे लोग और बुरे लोग.

दृष्टान्त के अनुसार अच्छे और बुरे पौधों को कटनी के समय अलग किया जाता है यानि कि संसार के अन्त के समय पर. और हम जानते हैं कि अभी संसार का अन्त नहीं आया है और इसलिए अच्छे और बुरे, दोनों तरह के बीच साथ-साथ बढ़ते हैं. संसार रुपी खेत अभी भी वहीँ हैं, और वैरी शैतान अभी भी अपने काम में लगा है. जितनी बेचैनी से भले लोग भलाई करने में नहीं लगे उससे अधिक अधिक बेचैनी से शैतान अपने काम में लगा है. सन्त पेत्रुस हमें आगाह करते हैं, “आप संयम रखें और जागते रहें! आपका शत्रु शैतान दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचरता है और ढूंढता रहता है कि किसे फाड़ खाये.” (1 पेत्रुस 5:8). हमें शैतान और उसकी प्रजा से अधिक सक्रीय रहना है तभी अच्छे बीज अन्त तक डटे रह सकेंगे. आईये हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि अच्छे बीज बुरे बीजों से अधिक फलें-फूलें. आमेन.



📚 REFLECTION



Today we reflect on the meaning of the parable of the weeds. Jesus explains the meaning of the parable on the request of the disciples. He says, ‘sower of the seed is the Son of God, field is the world, good seeds are the people of God, weeds are the children of the evil one, end of the world is the harvesting time and labourers to who are to reap the crop are the angels. God created good people in the beginning of the world, the people who were created in His own image and likeness, who did not have any evil within themselves, but the evil one comes at night and sows the seeds of evil, all the works of dark that are against God. The devil sows the seeds of hatred, jealousy, revengefulness, and greed in the hearts of the people, and the people are divided into two, the good ones and the evil ones.

According to the miracle, the good and bad seeds are separated at the time of harvesting, that is, the end of the world. And we are aware that the end of the world has not yet reached, so good and bad, both types of plants grow together. The field is still there and the evil one is still at work. The devil is busy more zealously in sowing the seeds of evil then the people of God doing good. He is restless for his work. St. Peter warns us, “Discipline yourselves, keep alert. Like a roaring lion your adversary the devil prowls around, looking for someone to devour (1 Pet 5:8).” In order to stand till last, we have to be more active then the devil and his people. May God bless the good seeds to flourish more than the weeds. Amen.


 -Br. Biniush Topno



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सोमवार, 26 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 26 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : निर्गमन 32:15-24,30-34


15) मूसा विधान की दोनों पाटियाँ हाथ में लिये पर्वत से उतर कर लौटा। पाटियों पर सामने और पीछे, दोनों ओर लेख अंकित थे।

16) वे पाटियाँ ईश्वर की बनायी हुई थीं और उन पर जो लिपि अंकित थी, वह ईश्वर की अपनी लिपि थी।

17) योशुआ ने लोगों का कोलाहल सुन कर मूसा से कहा, शिविर में से लड़ाई जैसी आवाज़ आ रही है।

18) उसने उत्तर दिया, ''यह न तो विजेताओं का उल्लास है और न पराजितों का विलाप। मैं तो गाने की आवाज़ सुन रहा हूँ।''

19) शिविर के पास पहुँच कर मूसा ने बछड़े की प्रतिमा और लोगों का नृत्य देखा। उसका क्रोध भड़क उठा और उसने अपने हाथ की पाटियों को पहाड़ के निचले भाग पर पटक कर टुकड़े-टुकड़े कर दिये।

20) उसने लोगों का बनाया हुआ बछड़ा ले कर जला दिया। उसने उसकी राख पीस कर चूर-चूर कर डाली और उसे पानी में छिड़क कर इस्राएलियों को पिला दिया।

21) तब मूसा ने हारून से पूछा, ''इन लोगों ने तुम्हारे साथ कौन-सा अन्याय किया, जो तुमने इन्हें इतने घोर पाप में डाल दिया हैं?''

22) हारून ने उत्तर दिया, ''महोदय आप क्रोध न करें। आप जानते ही हैं कि इन लोगों का झुकाव पाप की ओर है।

23) इन्होंने मुझ से कहा, "हमारे लिए एक ऐसा देवता बनाइए, जो हमारे आगे-आगे चले, क्योंकि हम नहीं जानते कि जो मनुष्य हम को मिस्र से निकाल लाया, उस मूसा का क्या हुआ।÷

24) तब मैंने इन से कहा, ''जिसके पास सोने के आभूषण हों, वे उन्हें उतार कर ला दें उन्होंने मुझे सोना ला दिया। मैंने उसे आग में डाला और इस प्रकार यह बछड़ा बन गया।''

30) दूसरे दिन मूसा ने इस्राएलियों से कहा, ''तुम लोगों ने घोर पाप किया है। मैं अब पर्वत पर प्रभु के पास जा रहा हूँ। यदि हो सका, तो मैं तुम्हारे पाप का प्रायश्चित करूँगा।''

31) मूसा ने प्रभु के पास आ कर कहा, हाय; इन लोगों ने घोर पाप किया है। इन्होंने अपने लिए सोने का देवता बनाया है।

32) ओह; यदि तू इन्हें क्षमा कर दे; नहीं तो, मेरा नाम अपनी लिखी हुई पुस्तक से निकाल दे।

33) प्रभु ने उत्तर दिया, ''जिसने मेरे विरुद्ध पाप किया है, उसी को मैं अपनी पुस्तक से निकाल दूँगा।

34) अब तुम जा कर लोगों को उस स्थान ले चलो, जिसे मैंने तुम्हें बताया हैं। मेरा दूत तुम्हारे आग-आगे चलेगा। जब दण्ड देने का दिन आयेगा, तब मैं लोगों को उनके पाप का दण्ड दूँगा।''



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:31-35



31) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, "स्वर्ग का राज्य राई के दाने के सदृश है, जिसे ले कर किसी मनुष्य ने अपने खेत में बोया।

32) वह तो सब बीजों से छोटा है, परन्तु बढ़ कर सब पोधों से बड़ा हो जाता है और ऐसा पेड़ बनता है कि आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करते हैं।"

33) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया,"स्वर्ग का राज्य उस ख़मीर के सदृश है, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया"।

34) ईसा दृष्टान्तों में ही ये सब बातें लोगों को समझाते थे। वह बिना दृष्टान्त के उन से कुछ नहीं कहते थे,

35) जिससे नबी का यह कथन पूरा हो जाये- मैं दृष्टान्तों में बोलूँगा। पृथ्वी के आरम्भ से जो गुप्त रहा, उसे मैं प्रकट करूँगा।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ईश्वर के राज्य के रहस्यों को आसानी से हमें समझाने के लिए हमारे ही दिन-प्रतिदिन में उपयोग की जाने वाली वस्तुओं का उदाहरण देते हैं. आज के सुसमाचार में प्रभु येसु दो दृष्टान्तों द्वारा स्वर्ग के राज्य स्वाभाव को समझाते हैं. पहला उदाहरण है, राई का दाना. हम जानते हैं कि राई का दाना बहुत छोटा होता है, लेकिन जब वह धीरे-धीरे फूट कर पौधा बनता है तो अपने से कई गुना बड़ा बन जाता है, और अनेकों दाने पैदा कर देता है. उसी तरह से दूसरा उदाहरण खमीर का है, जब थोड़ा सा खमीर आटे में मिलाया जाता है तो वह सारे आटे को खमीरा बना देता है. इन दोनों उदाहरणों से हमें पता चलता है कि ईश्वर के राज्य की शुरुआत बहुत छोटी होती है, लेकिन जब वह बढ़ता है तो सब कुछ को अपने में समाहित कर लेता है.

यही बात हमारे ख्रीस्तीय जीवन में लागू होती है. ईश्वरीय राज्य के गुण जैसे कि सत्य, प्रेम, भाईचारा,एकता, सहनशीलता, क्षमाशीलता आदि एक छोटे से रूप में शुरू होते हैं, लेकिन जब बढ़ते हैं, तो सब कुछ पर जीत हासिल कर लेते हैं. हम ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ ख्रीस्तीय मूल्यों पर चलने वालों की संख्या बहुत कम है. 130 करोड़ लोगों की जनसँख्या वाले देश में प्रभु येसु के अनुयायी सिर्फ 2 प्रतिशत के आस-पास ही हैं, लेकिन यदि दो प्रतिशत लोग सच्चे दिल से पूरी ईमानदारी के साथ प्रभु येसु के बताये मार्ग पर चलें तो सारे देश को बदल सकते हैं. आईये हम प्रार्थना करें कि ईश्वर का राज्य हमारे जीवन में फलीभूत हो और हमारे द्वारा दूसरों के जीवन में. आमेन.



📚 REFLECTION



In order to explain about the kingdom of heaven, Jesus gives examples from the things used in our day-to-day life. In the gospel today, Jesus gives two examples t explain the nature of the kingdom of God. First example is of a mustard seed. We know that mustard seed is very tiny, but once it sprouts and becomes a plant, it becomes so large that it produces numerable other seeds. Similarly, second example given by Jesus is that of yeast. When a very small quantity is mixed in the flour, the whole flour becomes fermented. These both examples show us that the kingdom has a very humble beginning but when it starts growing, it overtakes everything.

This is also applicable in our christian life. The values of the kingdom of God, like Truth, justice, love, unity, tolerance, forgiveness etc, begin in a small manner and grow in such a way that they conquer everything. We live in a land where people who follow Christ and the kingdom values are very few. The followers of Jesus are hardly 2% out of about 130 corore people, but if these few people sincerely and whole heartedly bear witness with their lives to the teachings of Christ they can bring a dynamic change. Let us pray to God to enable us to live the values of the kingdom of God and take it others. Amen.


 -Br. Biniush Topno


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इतवार, 25 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 25 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : राजाओं का दुसरा ग्रन्थ 4:42-44

42) एक मनुष्य बाल-शालिशा से आया और उसने ईश्वर -भक्त को प्रथम फल के रूप में जौ की बीस रोटियाँ और नये अनाज का बोरा दिया। तब एलीशा ने कहा ‘‘लोगों को खाने के लिए दे दो’’

43) किन्तु उसके नौकर ने कहा, ‘‘मैं इतने को ही एक सौ लोगों में कैसे बाँट सकता हूँ?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘लोगों को खाने के लिए दो, क्योंकि प्रभु ने यह कहा है- वे खायेंगे और उस में से कुछ बच भी जायेगा’’।

44) उसने लोगों को खिलाया। उन्होंने खा लिया और जैसा कि प्रभु ने कहा था, उस में से कुछ बच भी गया।


दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:1-6


1) ईश्वर ने आप लोगों को बुलाया है। आप अपने इस बुलावे के अनुसार आचरण करें - यह आप लोगों से मेरा अनुरोध है, जो प्रभु के कारण कै़दी हूँ।

2) आप पूर्ण रूप से विनम्र, सौम्य तथा सहनशील बनें, प्रेम से एक दूसरे को सहन करें

3) और शान्ति के सूत्र में बँध कर उस एकता को बनाये रखने का प्रयत्न करते रहें, जिसे पवित्र आत्मा प्रदान करता है।

4) एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए आप लोग बुलाये गये हैं।

5) एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास और एक ही बपतिस्मा।

6) एक ही ईश्वर है, जो सबों का पिता, सब के ऊपर, सब के साथ और सब में व्याप्त है।


सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 6:1-15


1) इसके बाद ईसा गलीलिया अर्थात् तिबेरियस के समुद्र के उस पर गये।

2) एक विशाल जनसमूह उनके पीछे हो लिया, क्योंकि लोगों ने वे चमत्कार देखे थे, जो ईसा बीमारों के लिए करते थे।

3) ईसा पहाड़ी पर चढ़े और वहाँ अपने शिष्यों के साथ बैठ गये।

4) यहूदियों का पास्का पर्व निकट था।

5) ईसा ने अपनी आँखें ऊपर उठायीं और देखा कि एक विशाल जनसमूह उनकी ओर आ रहा है। उन्होंने फिलिप से यह कहा, ‘‘हम इन्हें खिलाने के लिए कहाँ से रोटियाँ खरीदें?’’

6) उन्होंने फिलिप की परीक्षा लेने के लिए यह कहा। वे तो जानते ही थे कि वे क्या करेंगे।

7) फिलिप ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘दो सौ दीनार की रोटियाँ भी इतनी नहीं होंगी कि हर एक को थोड़ी-थोड़ी मिल सके’’।

8) उनके शिष्यों में एक, सिमोन पेत्रुस के भाई अन्द्रेयस ने कहा,

9) ‘‘यहाँ एक लड़के के पास जौ की पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं, पर यह अतने लोगों के लिए क्या है,’’

10) ईसा ने कहा, ‘‘लोगों को बैठा दो’’। उस जगह बहुत घास थी। लोग बैठ गये। पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार थी।

11) ईसा ने रोटियाँ ले लीं, धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और बैठे हुए लोगों में उन्हें उनकी इच्छा भर बँटवाया। उन्होंने मछलियाँ भी इसी तरह बँटवायीं।

12) जब लोग खा कर तृत्त हो गये, तो ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ‘‘बचे हुए टुकड़े बटोर लो, जिससे कुछ भी बरबाद न हो’’।

13) इस लिए शिष्यों ने उन्हें बटोर लिया और उन टुकड़ों से बारह टोकरे भरे, जो लोगों के खाने के बाद जौ की पाँच रोटियों से बच गये थे।

14) लोग ईसा का यह चमत्कार देख कर बोल उठे, ‘‘निश्चय ही यह वे नबी हैं, जो संसार में आने वाले हैं’’।

15) ईसा समझ गये कि वे आ कर मुझे राजा बनाने के लिए पकड़ ले जायेंगे, इसलिए वे फिर अकेले ही पहाड़ी पर चले गये।



📚 मनन-चिंतन


आज के पहले पाठ और सुसमाचार में हम भोजन का चमत्कार देखते हैं. पहले पाठ में नबी एलिशय जौ की बीस रोटियों और कुछ बालियों को ईश्वर के सामर्थ्य से सौ लोगों में बाँटते हैं, और सब लोग खाकर तृप्त हो जाते हैं, और कुछ टुकड़े बचते भी हैं. सुसमाचार में भी हम रोटियों का चमत्कार देखते हैं जिसमें प्रभु येसु जौ की पाँच रोटियों और दो मछलियों को पाँच हजार लोगों में बाँटते हैं. सब लोग खूब खाते हैं, और तृप्त हो जाते हैं और खाने के बात बचे हुए टुकड़ों से 12 टोकरे भर जाते हैं. और दूसरे पाठ में सन्त पौलुस आपसी एकता के बारे में बात करते हैं. आखिर इन दोनों चमत्कारों में हमारे लिए ईश्वर का क्या सन्देश है?

सुसमाचार में हम देखते हैं कि भीड़ की भीड़ प्रभु येसु के वचन सुनने के लिए आ जाती है. बहुत सारे लोग हो सकता है बहुत दूर से आये थे. हम जानते हैं कि पुराने जमाने में ज्यादातर लोग पैदल ही यात्रा करते थे, और अक्सर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने के लिए काफी समय लग जाता था, कभी-कभी कई दिन भी लग जाते थे. ऐसी परिस्थिति में यह स्वाभाविक ही था कि अपनी यात्रा शुरू करने से पहले लोग अक्सर पूरी व्यवस्था करके चलते थे, जैसे कि अतिरिक्त जोड़ी जूते, रास्ते के लिए भोजन, पैसे इत्यादि. लेकिन प्रभु येसु के पास जो भीड़ की भीड़ आई थी, वे वचनों में इतने खो गये कि भूल गये कि उन्हें वापस लौटना है, भूल गये कि उन्हें अपने लिए भोजन की व्यवस्था करनी है. जब हम ईश्वर में इतने मगन हो जाते हैं, तो ईश्वर हमारी हर ज़रूरत का ख्याल रखते हैं.

प्रभु कहते हैं, “तुम जो प्यासे हो, पानी के पास चले आओ. यदि तुम्हारे पास रुपया नहीं हो, तो भी आओ. मुफ्त में अन्न खरीद कर खाओ. दाम चुकाए बिना अंगूरी और दूध खरीद लो. जो भोजन नहीं है उसके लिए तुम लोग अपना रुपया क्यों खर्च करते हो? जो तृप्ति नहीं दे सकता है उसके लिए परिश्रम क्यों करते हो?” (इसायाह 55:1-2). जब हम अपना सर्वस्व भूलकर प्रभु पर न्यौछावर कर देते हैं, तो प्रभु हमारी ज़रूरत पूरी करता है. जब लोग सब कुछ भूलकर प्रभु येसु के पीछे आये तो प्रभु येसु क्यों न द्रवित होकर उनकी भोजन की आवश्यकता को पूरी नहीं करेंगे. लेकिन सन्त पौलुस हमें याद दिलाते हैं, अगर हम चाहते हैं कि ईश्वर हमारे जीवन में चमत्कार दिखाएँ तो हमें अपनी बुलाहट के अनुसार जीवन बिताना है. एक दूसरे के साथ मिलकर प्रेम से रहना है.

रोटियों का चमत्कार मिल-बाँट कर खाने का चमत्कार है. अगर वह लड़का अपना भोजन दूसरों के साथ बाँटने के लिए तैयार नहीं होता तो शायद हमारे सामने दूसरा दृश्य होता. जब हम उदार होकर अपने भोजन, चीजों आदि को दूसरों के साथ बाँटते हैं, तो वे न केवल हमारे लिए बल्कि दूसरों के लिए भी खूब बढ़ जाते हैं, और इतने अधिक हो जाते हैं कि सब लोग ख़ुशी ख़ुशी उसे आपस में बाँट सकते हैं, और किसी को कोई कमी नहीं रहती. यही विशेषता प्रारंभिक कलीसिया में थी. विश्वासियों का समुदाय एक ह्रदय और एक प्राण था. वे अपनी सम्पत्ति अपनी नहीं समझते थे, जो कुछ उनके पास था उसमें सबों का साझा था. सब कुछ बेचकर प्रेरितों के चरणों पर रख देते थे, और वह ज़रूरतमंद लोगों में उनकी आवश्यकता अनुसार बांटा जाता था. (प्रेरित-चरित 4:32,34-35).



📚 REFLECTION



We see a miracle of multiplication of food in the first reading of today and also in the gospel. In the First reading we see Prophet Elisha who takes 20 loaves of barley and few ears of corn and it becomes sufficient for more than hundred people and there is also left over they collect. Similar incident we see in the Gospel of the day where Jesus multiplies the five loaves and two fish and distributes them among more than five thousand people. They eat and are filled and there remain crumbs which were collected into twelve big baskets. An in the second reading, St. Paul talks about unity and love for one another. What do these miracles of multiplication have for us?

In the gospel we see great crowds coming to listen to Jesus. Many of them perhaps had come from a long distance. We know that in those days most of the people travelled on foot, which took lot of time to reach from one place to another, it took even days. It is natural in such situation to make all arrangements before beginning the journey. These arrangements included an extra pair of footwear, food for the way, sufficient money etc. The people who came to listen to Jesus must have come with sufficient food, but they were lost so much that they forgot that they have to return, they have arrange food for themselves. When we are lost in the company of God, God will make sure that our every need in met.

The Lord says, “Everyone who thirsts, come to the waters; and you that have no money, come, buy and eat! Come buy wine and milk without money and without price. Why do you spend your money for that which is not bread, and your labour for that which does not satisfy? (Isa 55:1-2a).” When we surrender our life wholeheartedly to God, our every need is taken care of. When people came in great numbers to Jesus, forgetting everything, why wouldn’t Jesus have compassion on them and provide them with food? But St. Paul reminds us that if we want God to do miracles in our life, then we have to live our lives according to our calling. We need to live in unity with each other.

In fact the miracle of the multiplication of loaves is the miracle of sharing. If the boy were not willing to share what he had, then there would have a different picture all tother. When we are generous in sharing our things and gifts with others, they multiply not only for us but also for others. The blessings grow so much that they can be shared by everyone and nobody would lack anything. This was the characteristic of the early Church as well. The community was of one heart and soul, no one claimed private ownership of any possession, but everything they owned was held in common. There was not a needy person among them, for as many as owned lands or houses sold them and brought the proceeds of what was sold. They laid it at the apostles’ feet, and it was distributed to each as any had need (Acts 4:32, 34-35).



मनन-चिंतन - 2


एक बार एक चित्रकार वेदी पर चित्र बना रहे थे। चित्र पूरा होने पर लोग देखने आये। लोगों ने वेदी के चित्र पर एक टोकरी में चार रोटी और दो मच्छलियों का चित्र देखा। सब लोग उनसे पूछने लगे कि टोकरी में पॉंचवीं रोटी कहॉं गायब हो गयी। तब उसने कहा कि टोकरी की पॉंचवीं रोटी पवित्र यूखारिस्त है जो वेदी पर चढ़ायी जाती है।

आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु को पॉंच रोटियों और दो मच्छलियों से पॉंच हजार लोगों को खिलाते हुए पाते है। इस चमत्कार के एक प्रमुख बिन्दु पर आज हम मनन चिन्तन करेंगे।

उदारता से प्रचुरता की ओर और

आजकल फ्री या डिस्काउंट का नाम सुनते ही लोग इक्कट्ठा हो जाते हैं। प्रभु के पास इक्कट्ठा हुई भीड भी कुछ इस तरह की थी। वे प्रभु से कुछ पाना चाहते थे और प्रभु के चमत्कार देखना चाहते थे। येसु ने एक बहुत बडा चमत्कार उनके सामने किया। चमत्कार की शुरूआत एक छोटे लडके से होती है, जो अपने पास की पॉंच रोटियॉं और दो मच्छलियॉं दूसरों के साथ बाटने को तैयार हुआ। जब उस लडके ने अपनी पॉंच रोटियॉं और दो मच्छलियॉं बडी उदारता से दी तो वहॉं पर इक्कट्ठे पॉंच हजार से ज्यादा लोगों को इसका लाभ मिला।

बाईबिल में हम देखते हैं कि जितने लोगों ने उदारता का भाव अपनाया उन सब को प्रभु का आर्शीवाद मिला। उत्पत्ति ग्रंथ 13:9 में हम देखते है कि जब जमीन के बटवारे का समय आया तो इब्राहीम अपने भांजे लोट से कहते है कि ‘‘सारा प्रदेश तुम्हारे सामने है। हम एक दूसरे से अलग हो जायें यदि तुम बाएं जाओगे तो मैं दाहिने जाऊॅंगा और यदि दाहिने जाओगे तो मैं बाएं जाऊॅंगा’’। बडा होने के कारण इब्राहीम अच्छी जगह चुन सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। बडी उदारता से उन्होंने लोट को स्थान चुनने का अधिकार दिया। प्रभु ने इब्राहिम और उसके पूरे वंशजों को आर्शीवाद दिया। एक व्यक्ति की उदारता से उनके पूरे वंशजों को प्रचुरता की आशिष मिली।

राजाओं के पहले ग्रंथ 17:7 एवं आगे वाक्यांशों में एक और घटना हम पाते हैं। सरेप्ता की विधवा ने नबी एलियस को बहुत ही उदारता से अपनी आखरी रोटी खिलायी और प्रभु ने उसको प्रचुर मात्रा में आशिष दी। 16वें वाक्यांश में लिखा है कि ‘‘न तो बरतन में आटा समाप्त हुआ और न तेल की कुप्पी खाली हुई।

स्कूल के recess (अवकाश) के समय मैंने यह देखा है कि कुछ बच्चे टिफिन में जो खाने की चीज लाते हैं उसको कभी कभी सात या आठ दोस्तों को बांटते हैं और उनके लिए एक छोटा सा हिस्सा ही मिलता है या कभी-कभी तो वे स्वयं ही भूखे रह जाते हैं। लेकिन उनके चेहरे की मुस्कुराहट यह बताती है कि वे बहुत खुश हैं। आज की स्वार्थी दुनिया में ये बच्चे हमारे लिए एक नमूना है।

आज कल लोग इतने स्वार्थी हो गये हैं कि वे गरीब लाचार और भिखरियों से भी उनका सामान छीनने की कोशिश करते हैं। दूसरे लोगों को देने से हमें दो फायदे होते हैं। एक हमारे लिये खुशी की बात होती है कि हमने गरीबों के लिए कुछ दिया है और दूसरा यह है कि उनको हमारे द्वारा कुछ फायदा होता है। उनकी प्रार्थना और आर्शीवाद हमें मिलते रहते हैं। जब देने की बात होती है तो हमेशा हम पैसों के बारे में सोचते हैं। लेकिन हम पैसों के अलावा बहुत कुछ लोगों को दे सकते हैं। हमारा समय, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमता, हमारी मीठी बातें आदि हम दूसरे लोगों के साथ बाट सकते हैं। अगर प्रभु ने खुद अपना जीवन न्यौछावर करके हमारे लिए पवित्र यूखारिस्त की स्थापना की तो क्या हम प्रभु के लिए कुछ दे सकते है? आईए हम दूसरों से लेने से ज्यादा उनको देना सीखे और लोगों से और प्रभु से आर्शीवाद प्राप्त करे क्योंकि प्रभु ने कहा है कि ‘‘जो इन छोटों में से किसी को एक प्याला ठंडा पानी भी इसलिए पिलायेगा कि वह मेरा शिष्य है, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि वह अपने पुरस्कार से वंचित नहीं रहेगा।’’


फादर मेलविन चुल्लिकल


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शनिवार, 31 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्

 

शनिवार, 31 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : लेवी 25:1, 8-17


1) प्रभु ने सीनई पर्वत पर मूसा से कहा,

8) वर्षों के सात सप्ताह, अर्थात् सात बार सात वर्ष, तदनुसार उनचास वर्ष बीत जाने पर

9) तुम सातवें महीने के दसवें दिन, प्रायश्चित के दिन, देश भर में तुरही बजवाओगे।

10) यह पचासवाँ वर्ष तुम दोनों के लिए एक पुष्प-वर्ष होगा और तुम देश में यह घोषित करोगे कि सभी निवासी अपने दासों को मुक्त कर दें। यह तुम्हारे लिए जयन्ती-वर्ष होगा - प्रत्येक अपनी पैतृक सम्पत्ति फिर प्राप्त करेगा और प्रत्येक अपने कुटुम्ब में लौटेगा।

11) पचासवाँ वर्ष तुम्हारे लिए जयन्ती-वर्ष होगा। इसमें तुम न तो बीच बोओगे, न पिछली फ़सल काटोगे और न अनछँटी दाखलताओं के अंगूर तोड़ोगे,

12) क्योंकि यह जयन्ती-वर्ष हैं तुम इसे पवित्र मानोगे और खेत में अपने आप उगी हुई उपज खाओगे।

13) इस जयन्ती-वर्ष में प्रत्येक अपनी पैतृक सम्पत्ति फ़िर प्राप्त करेगा।

14) जब तुम किसी देश-भाई के हाथ कोई जमीन बेचते हो अथवा उस से ख़रीद लेते हो, तो तुम एक दूसरे के साथ बेईमानी मत करो।

15) जब तुम किसी देश-भाई से कोई ज़मीन ख़रीदते हो, तो इसका ध्यान रखो कि पिछले जयन्ती-वर्ष के बाद कितने वर्ष बीत गये हैं और बाकी फ़सलों की संख्या के अनुसार बेचने वाले को विक्रय-मूल्य निर्धारित करना चाहिए।

16) जब अधिक वर्ष बाकी हों, तो मूल्य अधिक होगा और यदि कम वर्ष बाकी हों, तो मूल्य कम होगा; क्योंकि वह तुम्हें फसलों की एक निश्चित संख्या बेचता है।

17) तुम अपने देश-भाई के साथ बेईमानी मत करो, बल्कि अपने ईश्वर पर श्रद्वा रखो; क्योंकि मैं तुम्हारा प्रभु, ईश्वर हूँ।


सुसमाचार : मत्ती 14:1-12


1) उस समय राजा हेरोद ने ईसा की चर्चा सुनी।

2) और अपने दरबारियों से कहा, ’’यह योहन बपतिस्ता है। वह जी उठा है, इसलिए वह महान् चमत्कार दिखा रहा है।’’

3) हेरोद ने अपने भाई फि़लिप की पत्नी हेरोदियस के कारण योहन को गिरफ़्तार किया और बाँध कर बंदीगृह में डाल दिया था;

4) क्योंकि योहन ने उस से कहा था, ’’उसे रखना आपके लिए उचित नहीं है’’।

5) हेरोद योहन को मार डालना चाहता था; किन्तु वह जनता से डरता था, जो योहन को नबी मानती थी।

6) हेरोद के जन्मदिवस के अवसर पर हेरोदियस की बेटी ने अतिथियों के सामने नृत्य किया और हेरोद को मुग्ध कर दिया।

7) इसलिए उसने शपथ खा कर वचन दिया कि वह जो भी माँगेगी, उसे दे देगा।

8) उसकी माँ ने उसे पहले से सिखा दिया था। इसलिए वह बोली, ’’मुझे इसी समय थाली में योहन बपतिस्ता का सिर दीजिए’’।

9) हेरोद को धक्का लगा, परन्तु अपनी शपथ और अतिथियों के कारण उसने आदेश दिया कि उसे सिर दे दिया जाये।

10) और प्यादों को भेज कर उसने बंदीगृह में योहन का सिर कटवा दिया।

11) उसका सिर थाली में लाया गया और लड़की को दिया गया और वह उसे अपनी माँ के पास ले गयी।

12) योहन के शिष्य आ कर उसका शव ले गये। उन्होंने उसे दफ़नाया और जा कर ईसा को इसकी सूचना दी।


📚 मनन-चिंतन


जब हमारे मन में बुराई घर बना लेती है तो वह और दूसरी ऐसी चीज़ों को जन्म देती है जो हमें और अधिक गहरे पापों में धकेल देती हैं, दूसरी ओर जब हम निडरता से सत्य के साथ खड़े होते हैं, तो बुराई भी हमसे डरने लगती है. इसका जीता-जागता उदाहरण हम आज के सुसमाचार में देखते हैं. सन्त योहन बप्तिस्ता सत्य का जीवन जीते थे, अपने वचनों द्वारा निडर होकर ईश्वर का साक्ष्य देते थे, अपने जीवन द्वारा अपनी शिक्षाओं को प्रमाणित भी करते थे. वहीँ दूसरी ओर राजा हेरोद जिसके मन में बुराई ने घर कर लिया था, पाप ने उसे अपने चंगुल में फँसा लिया था, वह राजा होते हुए भी एक साधारण से दिखने वाले मामूली से इन्सान से डरता था.

सत्य के निडर सिपाही योहन बपतिस्ता का डर राजा हेरोद के मन में इस कदर समाया था, कि उसको अन्याय पूर्ण तरीके से मार डालने के बावजूद उसकी याद उसके मन में बनी हुई थी, इसलिए जब वह उसी सत्य के निडर सिपाही के दर्शन प्रभु येसु में करता है तो एक बार फिर डर जाता है. उसका डर उसके इन्ही शब्दों से बाहर आता है - कहीं यह योहन तो नहीं जिसे मैंने मरवा डाला था! हम जब भी कुछ गलत करते हैं, पाप करते हैं, अपनी अन्तरात्मा के विरुद्ध जाते हैं तो हम चैन से नहीं जी सकते. हमारा अपराध किसी न किसी रूप में हमें परेशान करता ही रहता है. मन की शान्ति पाने का एकमात्र उपाय है, अपनी गलती मानते हुए पश्चातापी करुणामय पिता के पास अपने पाप स्वीकार कर क्षमा माँगनी है.



📚 REFLECTION



When evil makes it dwelling place within us, then it gives birth to many other things that push us deeper into sin, whereas when we boldly stand with truth, the evil cannot withstand us. We see a living example of this in the gospel today. St. John the Baptist lived a life of Truth, he boldly bore witness to God through his life, and lived what he taught. On the other hand Herod being a king, whose heart was filled with darkness and evil, who was fully under the clutches of sin, was afraid of an ordinary homeless man.

The fear of the brave soldier of Truth, St. John the Baptist, was so much in his heart that, even after killing him unjustly, was afraid even of his memory. When saw same boldness and life of Truth in Jesus, he recalled John the Baptist. His fear is expressed in his own words from his mouth – “This is John the Baptist; he has been raised from the dead.” Whenever we commit sin or do wrong or go against our conscience, our heart cannot remain at peace. The guilt of sin keeps on bothering us, making us restless. There is only one way to attain the peace of mind, and that is, to accept the sinfulness, repent and turn to God and implore forgiveness, perhaps He may forgive us and accept us. Amen.


 -Fr. Johnson B. 



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शुक्रवार, 23 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 23 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : निर्गमन 20:1-17

1) ईश्वर ने मूसा से यह सब कहा,

2) ''मैं प्रभु तुम्हारा ईश्वर हूँ। मैं तुमको मिस्र देश से गुलामी के घर से निकाल लाया।

3) मेरे सिवा तुम्हारा कोई ईश्वर नहीं होगा।

4) ''अपने लिये कोई देव मूर्ति मत बनाओ। ऊपर आकाश में या नीचे पृथ्वी तल पर या पृथ्वी के नीचे के जल में रहने वाले किसी भी प्राणी अथवा वस्तु का चित्र मत बनाओ।

5) उन मूर्तियों को दण्डवत कर उनकी पूजा मत करो; क्योंकि मैं प्रभु, तुम्हारा ईश्वर, ऐसी बातें सहन नहीं करता जो मुझ से बैर करते हैं, मैं तीसरी और चौथी पीढ़ी तक उनकी सन्तति को उनके अपराधों का दण्ड देता हूँ।

6) जो मुझे प्यार करते हैं और मेरी आज्ञाओं का पालन करते है मैं हजार पीढ़ियों तक उन पर दया करता हूँ।

7) प्रभु अपने ईश्वर का नाम व्यर्थ मत लो; क्योंकि जो व्यर्थ ही प्रभु का नाम लेता है, प्रभु उसे अवश्य दण्डित करेगा।

8) विश्राम-दिवस को पवित्र मानने का ध्यान रखो।

9) तुम छः दिनों तक परिश्रम करते रहो और अपना सब काम करो;

10) परन्तु सातवाँ दिन तुम्हारे प्रभु ईश्वर के आदर में विश्राम का दिन है। उस दिन न तो तुम कोई काम करो न तुम्हारा पुत्र, न तुम्हारी पुत्री, न तुम्हारा नौकर, न तुम्हारी नौकरानी, न तुम्हारे चौपाये और न तुम्हारे शहर में रहने वाला परदेशी।

11) छः दिनों में प्रभु ने आकाश, पृथ्वी, समुद्र और उन में से जो कुछ है वह सब बनाया है और उसने सातवें दिन विश्राम किया। इसलिए प्रभु ने विश्राम दिवस को आशिष दी है और उसे पवित्र ठहराया है।

12) अपने माता-पिता का आदर करों जिससे तुम बहुत दिनों तक उस भूमि पर जीते रहो, जिसे तुम्हारा प्रभु ईश्वर तुम्हें प्रदान करेगा।

13) हत्या मत करो।

14) व्यभिचार मत करो।

15) चोरी मत करो।

16) अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी गवाही मत दो। अपने पड़ोसी के घर-बार का लालच मत करो।

17) न तो अपने पड़ोसी की पत्नी का, न उसके नौकर अथवा नौकरानी का, न उसके बैल अथवा गधे का - उसकी किसी भी चीज का लालच मत करो।''


सुसमाचार : मत्ती 13:18-23


18) ’’अब तुम लोग बोने वाले का दृष्टान्त सुनो।

19) यदि कोई राज्य का वचन सुनता है, लेकिन समझता नहीं, तब उसके मन में जो बोया गया है, उसे शैतान आ कर ले जाता हैः यह वह है, जो रास्ते के किनारे बोया गया है।

20) जो पथरीली भूमि मे बोया गया है, यह वह है, जो वचन सुनते ही प्रसन्नता से ग्रहण करता है;

21) परन्तु उस में जड़ नहीं है, और वह थोड़े ही दिन दृढ़ रहता है। वचन के कारण संकट या अत्याचार आ पड़ने पर वह तुरन्त विचलित हो जाता है।

22) जो काँटों में बोया गया हैः यह वह है, जो वचन सुनता है; परन्तु संसार की चिन्ता और धन का मोह वचन को दबा देता है और वह फल नहीं लाता।

23) जो अच्छी भूमि में बोया गया हैः यह वह है, जो वचन सुनता और समझता है और फल लाता है, कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, और कोई तीस गुना।’’


📚 मनन-चिंतन


आमतौर पर दृष्टान्त का अर्थ होता है, दृष्टा-अन्त = देखने वाले के अनुसार अन्त. दृष्टान्त का मतलब हुआ कि कोई उदाहरण या कहानी जिसका सन्देश सुनाने वाले पर निर्भर करता है. वह उदाहरण जिसके जीवन में जैसे सटीक बैठता है, वैसा ही उसके लिए उसका सन्देश होगा. अक्सर ऐसी कहानी का कोई एक निष्कर्ष नहीं निकलता. प्रभु येसु द्वारा कही गई बातें सुनाने वाले की समझ के अनुसार फल उत्पन्न करती थी. आज के सुसमाचार में प्रभु येसु बीज बोने वाले का दृष्टान्त का अर्थ बताते हैं. यह शायद एकमात्र ऐसा दृष्टान्त है जिसकी व्याख्या स्वयं प्रभु येसु करते हैं, अन्यथा उनके दृष्टान्त उनके सुनने वालों को खुद समझने पड़ते हैं.

बीज बोने वाले के दृष्टान्त का वास्तविक विषय बीज से बढ़कर वह मिट्टी और वातावरण है जिसमें वे बीज गिरे. हम जानते हैं कि सबसे अच्छी मिट्टी वही थी जिसमें वह बीज गिरने पर कई गुना फल लाता है. इसकी व्याख्या करने का मकसद यही है कि हमारा हृदय भी उसी उपजाऊ मिट्टी के समान बने. आखिर हम उस उपजाऊ मिट्टी के समान कैसे बन सकते हैं? सबसे पहले हमें ईश्वर के वचन के प्रति अपना हृदय और जीवन खुला रखना है, उन सभी कमियों को दूर करना है जिनके कारण हमारे हृदय में ईश्वर का बीज पनप नहीं पाता है. हो सकता है ईश्वर के वचन से बहुत फल उत्पन्न करने के लिए हमारे हृदयरूपी मिट्टी को उचित रूप से तैयार करने के लिए बहुत परिश्रम करने की आवश्यकता है. आइये इसके लिए हम ईश्वर से कृपा माँगें.



📚 REFLECTION



One of the characteristics of a parable is that it is open-ended, which means the end or the conclusion is left to the audience. Very often its meaning is interpreted according to the audience and the intended message. A Parable will have the meaning as per the people to whom it is narrated. Usually it can be interpreted in multiple ways. The words spoken by Jesus, bore fruit according to the type of the listeners. Jesus explains the meaning of the parable of the sower. Jesus usually talks to people in parables and leaves the people to understand their meaning, off course he would explain them privately to his disciples.

The parable of the sower is more about the soil and the atmosphere in which the seeds fell, than the sower himself. We know the best soil is the one falling into which the seed yields maximum. Jesus explains this parable so that we also may prepare the soil of our hearts to bear much fruit. How do we prepare the ground of our hearts to be more productive? First of all we need to keep our hearts and lives open to the Word of God, and remove all the obstacles and hurdles that block the healthy growth of the seed. We may have to work a lot hard with the soil to make it more productive. Let us ask God’s grace for this endeavour. Amen.



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गुरुवार, 22 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 22 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : सुलेमान का सर्वश्रेष्ठ गीत 3:1-4


1) मैं सारी रात अपने पलंग पर अपने प्राणप्रिय को ढूँढ़ती हूँ। मैं उसे ढूँढ़ती हूँ, किन्तु नहीं पाती।

2) मैं उठ कर गलियों तथा चैकों से होते नगर का चक्कर लगाती हूँ। मैं अपने प्राणप्रिय को ढूँढ़ती हूँ मैं उसे ढूँढ़ती हूँ, किन्तु नहीं पाती।

3) नगर का फेरा लगाते हुए पहरेदार मुझे मिलते हैं: ‘‘क्या आप लोगों ने मेरे प्राणप्रिय को देखा?‘‘

4) मैं उनसे आगे बढ़ती ही हूँ कि मैं अपने प्राणप्रिय को पा लेती हूँ।


सुसमाचार : योहन 20:1-2,11-18


1) मरियम मगदलेना सप्ताह के प्रथम दिन, तडके मुँह अँधेरे ही कब्र के पास पहुँची। उसने देखा कि कब्र पर से पत्थर हटा दिया गया है।

2) उसने सिमोन पेत्रुस तथा उस दूसरे शिष्य के पास, जिसे ईसा प्यार करते थे, दौडती हुई आकर कहा, ’’वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।’’

11) मरियम कब्र के पास, बाहर रोती रही। उसने रोते रोते झुककर कब्र के भीतर दृष्टि डाली

12) और जहाँ ईसा का शव रखा हुआ था वहाँ उजले वस्त्र पहने दो स्वर्गदूतों को बैठा हुआ देखा- एक को सिरहाने और दूसरे को पैताने।

13) दूतों ने उस से कहा, ’’भद्रे! आप क्यों रोती हैं?’’ उसने उत्तर दिया, ’’वे मेरे प्रभु को उठा ले गये हैं और मैं नहीं जानती थी कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है’’।

14) वह यह कहकर मुड़ी और उसने ईसा को वहाँ खडा देखा, किन्तु उन्हें पहचान नहीं सकी।

15) ईसा ने उस से कहा, ’’भद्रे! आप क्यों रोती हैं। किसे ढूँढ़ती हैं? मरियम ने उन्हें माली समझकर कहा, ’’महोदय! यदि आप उन्हें उठा ले गये, तो मुझे बता दीजिये कि आपने उन्हें कहाँ रखा है और मैं उन्हें ले जाऊँगी’’।

16) इस पर ईसा ने उस से कहा, ’’मरियम!’’ उसने मुड कर इब्रानी में उन से कहा, ’’रब्बोनी’’ अर्थात गुरुवर।

17) ईसा ने उस से कहा, ’’चरणों से लिपटकर मुझे मत रोको। मैं अब तक पिता के पास ऊपर नहीं गया हूँ। मेरे भाइयेां के पास जाकर उन से यह कहो कि मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, अपने ईश्वर और तुम्हारे ईश्वर के पास ऊपर जा रहा हूँ।’’

18) मरियम मगदलेना ने जाकर शिष्यों से कहा कि मैंने प्रभु को देखा है और उन्होंने मुझे यह सन्देश दिया।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु की शिक्षाएँ अनमोल हैं और उतने ही अनमोल हैं उनके चिन्ह और चमत्कार. जो भी प्रभु येसु के उस ऐतिहासिक और पार्थिव जीवन का हिस्सा बना वह अत्यन्त सौभाग्यशाली रहा होगा. ईश्वर का पुत्र स्वर्ग से उतरकर इस पृथ्वी पर चला-फिरा, लोगों के बीच में रहा, उनके दुःख-दर्द में शामिल रहा. और अन्त में सारी मानव जाति के पापों को अपने ऊपर लेते हुए क्रूस की कष्ट भरी मौत को अपने गले लगा लिया. उनके द्वारा पृथ्वी पर बिताये एक-एक पल इस मानव जाति पर एक-एक अहसान भरे पल थे. इस मुक्ति इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी प्रभु येसु की म्रत्यु पर विजय, यानि कि प्रभु येसु का पुनरुत्थान. प्रभु येसु का पुनरुत्थान ही हमारे विश्वास का आधार है. दुनिया की सबसे महान घटना का पहला साक्षी बनने का सौभाग्य प्रभु येसु मरिया मगदलेना को देते हैं.

प्रभु येसु के एक से बढ़कर एक शिष्य थे, वे शिष्य जिनके पैर प्रभु येसु ने धोये थे, जिन्हें प्रभु येसु ने बड़े-बड़े वरदान दिये थे, अधिकार दिये थे, स्वर्गराज्य की कुंजियाँ देने का वादा किया था, एक शिष्य की तो पहचान ही वही थी - वह शिष्य जिसे प्रभु प्यार करते थे. लेकिन प्रभु येसु पुनरुत्थान के बाद सबसे पहले इनमें से किसी को भी दर्शन नहीं देते बल्कि वे मरिया मगदलीन को सबसे पहले दिखाई देते हैं. वह ख़ुशी जो सदियों से कलीसिया की सबसे बड़ी ख़ुशी बनी हुई है, उस खुशखबरी का सहभागी सबसे पहले प्रभु येसु आज के इस सन्त मरियम मगलीना को बनाते हैं. इसका कारण हैं कि ईश्वर हमारा ह्रदय देखते हैं, हमारे हृदय में ईश्वर के लिए कितना प्रेम है, जो अधिक प्रेम दिखाता है, ईश्वर उसे अधिक कृपाएं प्रदान करते हैं. आईये हम इस महान सन्त और प्रेरितों की प्रेरित मरियम मगद्लीना से प्रार्थना करें कि हम भी उनके समान ईश्वर के प्रेम से भर जाएँ. आमेन.



📚 REFLECTION



Words of Jesus are very precious and same are his miracles and signs. Whoever became the part of Jesus’s worldly life, must have very fortunate. The Son of God came down and walked on this earth, lived among the mortal humans, shared in their joys ad sorrows. Finally he took our iniquities upon himself and chose to die a painful death on the cross. Every moment that spent on this earth, was a favour on whole humanity. The greatest event in this salvific work of God was his victory over death, the resurrection of Jesus. The resurrection of Jesus is the basis of our Christian faith. Jesus gives the privilege of being the very first witness of such a great event to Mary Magdalene.

Jesus had many good disciples, the ones whose feet he washed, who he gave power and authority, promised to give the keys of the kingdom, one of them was even identified as ‘the one whom the Lord loved.’ But Jesus could not find anyone more suitable to give privilege of being first witness of his resurrection, than Mary Magdalene. The joy that has been the centre of the Universal Church for centuries, this Joy was first revealed and experienced by Mary Magdalene. The reason for this is the fact that God sees our hearts, God measures the love filled in our hearts for Him, the more we love God, the more He will bless us. Let us implore the intercessions of this great apostle of the apostles, that we may also be filled with great love for God. Amen.


 -Fr. Johnson B. 


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बुधवार, 21 जुलाई, 2021 वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 21 जुलाई, 2021

वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : निर्गमन 16:1-5,9-15


1) इस्राएली एलीम से आगे बढ़े। मिस्र देश से निकलने के बाद दूसरे महीने के पन्द्रहवें दिन इस्राएलियों का सारा समुदाय एलीम और सोनई के बीच सीन नामक मरूभूमि पहुँचा।

2) इस्राएलियों का सारा समुदाय मरूभूमि में मूसा और हारून के विरुद्ध भुनभुनाने लगा।

3) इस्राएलियों ने उन से कहा, ''हम जिस समय मिस्र देश में मांस की हड्डियों के सामने बैठते थे और इच्छा-भर रोटी खाते थे, यदि हम उस समय प्रभु के हाथ मर गये होते, तो कितना अच्छा होता! आप हम को इस मरूभूमि में इसलिए ले आये हैं कि हम सब-के-सब भूखों मर जायें।''

4) प्रभु ने मूसा से कहा, ''मैं तुम लोगों के लिए आकाश से रोटी बरसाऊँगा। लोग बाहर निकल कर प्रतिदिन एक-एक दिन का भोजन बटोर लिया करेंगे। मैं इस तरह उनकी परीक्षा लूँगा और देखूँगा कि वे मेरी संहिता का पालन करते हैं या नहीं।

5) छठे दिन उन्हें दूसरे दिनों की अपेक्षा दुगुनी रोटी बटोर कर तैयार करनी चाहिए।

9) मूसा ने हारून से कहा, ''इस्राएलियों के सारे समुदाय को यह आदेश दो प्रभु के सामने उपस्थित हो, क्योंकि वह तुम्हारा भुनभुनाना सुन चुका है।''

10) जब हारून इस्राएलियों को संबोधित कर रहा था, तो उन्होंने मुड़ कर मरुभूमि की ओर देखा और प्रभु की महिमा बादल के रूप में उन्हें दिखाई दी।

11) प्रभु ने मूसा से यह कहा,

12) ''मैं इस्राएलियों का भुनभुनाना सुन चुका हूँ। तुम उन से यह कहना शाम को तुम लोग मांस खा सकोगे और सुबह इच्छा भर रोटी। तब तुम जान जाओगे कि मैं प्रभु तुम लोगों का ईश्वर हूँ।''

13) उसी शाम को बटेरों का झुण्डा उड़ता हुआ आया और छावनी पर बैठ गया और सुबह छावनी के चारों और कुहरा छाया रहा।

14) कुहरा दूर हो जाने पर मरुभूमि की जमीन पर पाले की तरह एक पतली दानेदार तह दिखाई पड़ी।

15) इस्राएली यह देखकर आपस में कहने लगे, ''मानहू'' अर्थात् ''यह क्या है?'' क्योंकि उन्हें मालूम नहीं था कि यह क्या था। मूसा ने उस से कहा, ''यह वही रोटी है, जिसे प्रभु तुम लोगों को खाने के लिए देता है।


सुसमाचार : मत्ती 13:1-9


1) ईसा किसी दिन घर से निकल कर समुद्र के किनारे जा बैठे।

2) उनके पास इतनी बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी कि वे नाव पर चढ़ कर बैठ गये और सारी भीड़ तट पर बनी रही।

3) उन्होंने दृष्टान्तों द्वारा उन्हें बहुत-सी बातों की शिक्षा दी। उन्होंने कहा, ’’सुनो! कोई बोने वाला बीज बोने निकला।

4) बोते-बोते कुछ बीज रास्ते के किनारे गिरे और आकाश के पक्षियों ने आ कर उन्हें चुग लिया।

5) कुछ बीज पथरीली भूमि पर गिरे, जहाँ उन्हें अधिक मिट्टी नहीं मिली। वे जल्दी ही उग गये, क्योंकि उनकी मिट्टी गहरी नहीं थी।

6) सूरज चढने पर वे झुलस गये और जड़ न होने के कारण सूख गये।

7) कुछ बीज काँटों में गिरे और काँटों ने बढ़ कर उन्हें दबा दिया।

8) कुछ बीज अच्छी भूमि पर गिरे और फल लाये- कुछ सौ गुना, कुछ साठ गुना और कुछ तीस गुना।

9) जिसके कान हों, वह सुन ले।‘‘


📚 मनन-चिंतन


ईश्वर सबों के हृदयों के रहस्य जानता है. जो मनुष्य की नज़रों से छुपा है वह ईश्वर की नज़रों के सामने साफ-सपाट है. आज के सुसमाचार में हम बहुत सारे लोगों को प्रभु येसु के पास आते हुए देखते है. इतने सारे लोग आते हैं कि प्रभु येसु चैन से बैठकर उन्हें उपदेश भी नहीं सुना सकते, अतः वह नाव पर चढ़कर बैठ जाते हैं और वहाँ से प्रवचन देते हैं. प्रभु येसु की एक खासियत है कि वे लोगों को देखते हुए उनके अनुसार ही अपनी शिक्षा को चुनते हैं कि किस विषय पर शिक्षा देनी है. उन्होंने उस विशाल भीड़ को देखा, उनके हृदयों के मनोभावों को देखा, उनकी ज़िन्दगी के हर पहलु को देखा.

उनमें तरह-तरह के लोग थे, वे जो सच्चे दिल से प्रभु को अपना मुक्तिदाता स्वीकार करना चाहते थे, वे जो अपने कठिनाई भरे जीवन से कुछ पल निकालकर प्रभु की बातें सुनने आये थे और वापस जाकर उसी जीवन में लौटने वाले थे, वे जो शैतान के चंगुल में फंसे थे, लेकिन इस आशा के साथ आये थे, कि शायद उनका जीवन बदल जाये. इसलिए प्रभु येसु सब लोगों के हृदयों को जानते हुए उन्हें बीज बोने वाले का दृष्टान्त सुनाते हैं, ताकि लोग अपने हृदयरूपी मिटटी को समझें जिसमें ईश्वर के वचन का वह बीज उगने वाला है, वे अपने वातावरण को समझें जिसमें वह बीज फलीभूत होने वाला है. उन्हें एक विकल्प चुनना है, कि ईश्वर के वचन के लिए उचित मिट्टी और वातारण तैयार करना है, और बहुत फल लाना है, या फिर जीवन में कोई परिवर्तन नहीं लाना है, जैसी मिट्टी और वातारण है उसी में ईश्वर के वचन को अपने आप बढ़ने देना है. आईये हम अपने मनों की जाँच करें, मेरा ह्रदय ईश्वर के वचन के लिए किस तरह की भूमि है?



📚 REFLECTION



God knows the deepest secrets of the human hearts. What is hidden from the eyes of human beings, it is clear as daylight for God. We see great crowds coming to Jesus in the Gospel today. There was so great number of people that Jesus could not speak to them without being restless and disturbed so he gets into a boat and starts preaching. Jesus choses to speak according to the disposition of the people, he choses the subject of his teachings according to the need of the people. Jesus saw the great crowds, he looked into the hearts of each of them, he could look into their entire lives.

There were people from all walks of life, those who were eager to accept the saviour into their hearts, then there were those who with great difficulty stole few moments from their struggles of life, just to listen to the words of eternal life, there were those who were under the clutches of the evil one, and came with the expectation of changing their lives forever. Knowing the hearts of all, Jesus chooses to speak about the sower of the seeds, in fact it is more about soil. Jesus wants the people to reflect about the soil of their own hearts, to know its productivity when the seeds of the words of Jesus fall into that soil, so that they know the atmosphere that is required for the appropriate growth of those seeds. They are given a choice to work on the soil and atmosphere of their lives to make it suitable for the Word of God to bear much fruit, or to remain indifferent and let them fall on infertile soil. This also invites us to reflect about own lives and soil for the seeds. Amen.


 -Fr. Johnson B


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