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7 मई, 2021 शुक्रवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

7 मई, 2021

शुक्रवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 15:22-31


22) तब सारी कलीसिया की सहमति से प्रेरितों तथा अध्यक्षों ने निश्चय किया कि हम में कुछ लोगों को चुन कर पौलुस तथा बरनाबस के साथ अन्ताखि़या भेजा जाये। उन्होंने दो व्यक्तियों को चुना, जो भाइयों में प्रमुख थे, अर्थात् यूदस को, जो बरसब्बास कहलाता था, तथा सीलस को,

23) और उनके हाथ यह पत्र भेजा: ’’प्रेरित तथा अध्यक्ष, आप लोगों के भाई, अन्ताखि़या, सीरिया तथा किलिकिया के ग़ैर-यहूदी भाइयों को नमस्कार करते हैं।

24) हमने सुना है कि हमारे यहाँ के कुछ लोगों ने, जिन्हें हमने कोई अधिकार नहीं दिया था, अपनी बातों से आप लोगों में घबराहट उत्पन्न की और आपके मन को उलझन में डाल दिया है।

25) इसलिए हमने सर्वसम्मति से निर्णय किया है कि प्रतिनिधियों का चुनाव करें और उन को अपने प्रिय भाई बरनाबस और पौलुस के साथ,

26) जिन्होंने हमारे प्रभु ईसा मसीह के नाम पर अपना जीवन अर्पित किया है, आप लोगों के पास भेजें।

27) इसलिए हम यूदस तथा सीलस को भेज रहे हैं। वे भी आप लोगों को यह सब मौखिक रूप से बता देंगे।

28) पवित्र आत्मा को और हमें यह उचित जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों के सिवा आप लोगों पर कोई और भार न डाला जाये।

29) आप लोग देवमूर्तियों पर चढ़ाये हुए मांस से, रक्त, गला घोंटे हुए पशुओं के मांस और व्यभिचार से परहेज़ करें। इन से अपने को बचाये रखने में आप लोगों का कल्याण है। अलविदा!’’

30) वे विदा हो कर अन्ताखि़या चल दिये और वहाँ पहुँच कर उन्होंने भाइयों को एकत्र कर वह पत्र दिया।

31) पत्र की सान्त्वनापूर्ण बातें पढ़ने के बाद लोगों को बड़ा आनन्द हुआ।


सुसमाचार : योहन 15:12-17


12) मेरी आज्ञा यह है जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।

13) इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।

14) यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।

15) अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है क्योंकि मैने अपने पिता से जो कुछ सुना वह सब तुम्हें बता दिया है।

16) तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो, तुम्हारा फल बना रहे और तुम मेरा नाम लेकर पिता से जो कुछ माँगो, वह तुम्हें वही प्रदान करे।

17) मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ एक दूसरे को प्यार करो।


📚 मनन-चिंतन


इस संसार में हम कई लोगो सें मिलते है और कई लोगों से जान पहचान बनाते है। कुछ हमें बहुुत पसंद आते है और हम उनसे अपनी दोस्ती के रिश्ते की शुरुआत करते है। इस संसार में कई दोस्त हमें मिल जाते है परंतु सच्चा दोस्त वही होता है जो बुरे वक्त में हमारी सहायता करें। ईश्वर की हम पूजा करते है, आराधना करते है, सेवा करते है उसे एक परम शक्तिशाली, परम पवित्र के रूप में देखते है। पर क्या वह परम पवित्र, परम शक्तिशाली ईश्वर के दोस्त बन सकते है? आज प्रभु येसु स्वामि और सेवक के रिश्ते से आगे बढ़कर हम सब के सामने दोस्ती का, मित्रता का हाथ बढ़ाते है।

मित्रता का रिश्ता प्रभु येसु ने अपना प्राण देकर निभाया क्योकि वह हम सबसे बहुत ही प्रेम करते है। हम किस प्रकार प्रभु येसु के मित्र बन सकते है? प्रभु कहते है, ‘‘यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।’’ प्रभु हमको सेवक नहीं परंतु अपना मित्र बनाना चाहते है। जब मित्रता का रिश्ता घनिष्ट होता है तो दो मित्र एक दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते है तथा अपने व्यक्तिगत जीवन को एक दूसरे से साझा करते हैं। जो मित्र एक दूसरे को प्यार करते है वह उनके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते है, इसलिए लोग मित्रता की मिसाल दिया करते हैं।

आज हम सबके पास एक अवसर है कि हम भी उस प्रभु येसु के मित्र कहलाये जो हम सब से मित्रता बनाये रखता है। हम उनकी आज्ञाओं का पालन करें और उनके मित्र बने रहें।



📚 REFLECTION



In this world we meet lots of people and become familiarize with many. With the people we like we start the relationship of friendship with them. In this world we get many friends but the true friend is one who helps us in bad times.We worship, adore, serve God and we see Him as an Almighty and All Holy God. But can the Holy, Almighty God become our friend? Today Lord Jesus rising above the relationship of Owner and servant extends the hand of friendship towards us.

Jesus kept the relationship of friendship by sacrificing his life because of his steadfast love towards us. How can we become the friend of God? Jesus says, “You are my friends if you do what I command you.” Jesus doesn’t call us servants but he wants us to be his friends. When the relationship of friendship is deep then the two friends know each other very well and even share the personal life to each other. The friends who love each other are ready to do anything for each other that is why people give the example of friendship.

Today we have an opportunity to be called Jesus’ friends who keeps friendship with us.Obeying his commandments let’s remain to be called his friends.


✍ -Br. Biniush Topno


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6 मई, 2021 गुरुवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

6 मई, 2021

गुरुवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 15:7-21


7) जब बहुत वाद-विवाद हो चुका था, तो पेत्रुस ने उठ कर यह कहा: ’’भाइयो! आप जानते हैं कि ईश्वर ने प्रारम्भ से ही आप लोगों में से मुझे चुन कर निश्चय किया कि गै़र-यहूदी मेरे मुख से सुसमाचार का वचन सुनें और विश्वास करें।

8) ईश्वर मनुष्य का हृदय जानता है। उसने उन लोगों को हमारे ही समान पवित्र आत्मा प्रदान किया।

9) इस प्रकार उसने उनके पक्ष में साक्ष्य दिया और विश्वास द्वारा उसका हृदय शुद्ध कर हम में और उन में कोई भेद नहीं किया।

10) जो जूआ न तो हमारे पूर्वज ढोने में समर्थ थे और न हम, उसे शिष्यों के कन्धों पर लाद कर आप लोग अब ईश्वर की परीक्षा क्यों लेते हैं?

11) हमारा विश्वास तो यह है कि हम, और वे भी, प्रभु ईसा की कृपा द्वारा ही मुक्ति प्राप्त करेंगे।’’

12) सब चुप हो गये और वे बरनाबास तथा पौलुस की बातें सुनते रहे, जो उन चिन्हों तथा चमत्कारों के विषय में बता रहे थे, जिन्हें ईश्वर ने उनके द्वारा ग़ैर-यहूदियों के बीच दिखाया था।

13) जब वे बोल चुके थे, तो याकूब ने कहा, ’’भाइयो! मेरी बात सुनिए।

14) सिमोन ने हमें बताया कि प्रारम्भ से ही ईश्वर ने किस प्रकार ग़ैर-यहूदियों में अपने लिए एक प्रजा चुनने की कृपा की।

15) यह नबियों की शिक्षा के अनुसार ही है; क्योंकि लिखा है:

16) इसके बाद में लौट कर दाऊद का गिरा हुआ घर फिर ऊपर उठाऊँगा। मैं उसके खँड़हरों का पुननिर्माण करूँगा और उसे फिर खडा़ करूँगा,

17) जिससे मानव जाति के अन्य लोग- अर्थात् सभी राष्ट्र, जिन्हें मैंने अपनाया है- प्रभु की खोज में लगे रहें। यह कथन उस प्रभु का है, जो ये कार्य सम्पन्न करता है।

18) ये कार्य प्राचीन काल से ज्ञात हैं।

19) ’’इसलिए मेरा विचार यह है कि जो ग़ैर-यहूदी ईश्वर की ओर अभिमुख होते हैं, उन पर अनावश्यक भार न डाला जाये,

20) बल्कि पत्र लिख कर उन्हें आदेश दिया जाये कि वे देवमूर्तियों पर चढ़ाये हुए माँस से, व्यभिचार, गला घोंटे हुए पशुओं के माँस और रक्त से परहेज़ करें;

21) क्योंकि प्राचीनकाल से नगर-नगर में मूसा के प्रचारक विद्यमान हैं और उनकी संहिता प्रत्येक विश्राम-दिवस को सभागृहों में पढ़ कर सुनायी जाती है।


सुसमाचार : योहन 15:9-11


9) जिस प्रकार पिता ने मुझ को प्यार किया है, उसी प्रकार मैंने भी तुम लोगों को प्यार किया है। तुम मेरे प्रेम से दृढ बने रहो।

10) यदि तुम मेरी आज्ञओं का पालन करोगे तो मेरे प्रेम में दृढ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ बना रहता हूँ।

11) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि तुम मेरे आनंद के भागी बनो और तुम्हारा आनंद परिपूर्ण हो।


📚 मनन-चिंतन


संहिता की सबसे बड़ी आज्ञा है अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे ह्दय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो। प्यार दो लोगों के बीच में होता है। अगर प्रेम एक ही जन करें तो वह एकतरफा प्रेम हो जाता है। प्रभु ईश्वर ने अपना प्रेम अपने पुत्र को इस संसार के लिए अर्पित कर दर्शाया तथा प्रभु येसु ने अपने प्राण को हमारे लिए बलिदान देते हुए हमरे प्रति अपने प्रेम को प्रकट किया। ईश्वर निरंतर हमसे प्रेम करता आया है और निरंतर हम से प्रेम करता रहेगा क्योंकि वह सत्यप्रतिज्ञ ईश्वर है।

इस संसार में प्रभु ने हमारे लिए सबकुछ दे डाला और हमारे लिए अपने प्रेम को प्रदर्शित किया है। हमारा प्रेम प्रभु के प्रति किस प्रकार का है? क्या हम उनको उसी प्रकार प्यार करते है जैसे वह हम से करता है? शायद नहीं, इस संसार में रहते समय शायद हम इस संसार से इतने प्रभावित हो जाते है कि हम ईश्वर के प्रेम को नहीं पहचान पाते और हम ईश्वर को छोड़ संसारिक चिजों से प्यार करने लग जाते है।

आज प्रभु हम सबसे आहवान कर रहा है कि हम उसके प्रेम में दृढ़ बने रहे। जिस प्रकार प्रभु ने हमसे प्यार किया है हम भी उसी के समान दूसरों को प्यार कर सकें। आईये आज के वचनों के द्वारा हम ईश्वर से यहीं आशिष के लिए प्रार्थना करें। आमेन!



📚 REFLECTION



Greatest commandment of the law is to Love the Lord your God with all your heart, and with all your soul, and with all your mind. Love happens between the two persons. If only one person loves then it remains as one-sided love. Lord God has shown is love by giving his only Son to the world and Lord Jesus expressed his love by giving his life for us. God has been continually loving us and will continue to love us because he is the truthful God and his love is steadfast.

God has given everything for us and showed his love to us. What kind of love do we have towards God? Do we love Him as He loves us? May be not, living in this world we are so fascinated by the world that we are unable to recognize his love and we start loving the worldly things instead of God.

Today God is calling us to abide in his love. As God has loved us similarly we may be also able to love others. Let’s seek this blessing of God through today’s word. Amen!

✍ -Br. Biniush Topno 


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5 मई, 2021 बुधवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

5 मई, 2021

बुधवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 15:1-6


1) कुछ लोग यहूदिया से अन्ताखि़या आये और भाइयों को यह शिक्षा देते रहे कि यदि मूसा से चली आयी हुई प्रथा के अनुसार आप लोगों का ख़तना नहीं होगा, तो आप को मुक्ति नहीं मिलेगी।

2) इस विषय पर पौलुस और बरनाबस तथा उन लोगों के बीच तीव्र मतभेद और वाद-विवाद छिड़ गया, और यह निश्चय किया गया कि पौलुस तथा बरनाबस अन्ताखि़या के कुछ लोगों के साथ येरुसालेम जायेंगे और इस समस्या पर प्रेरितों तथा अध्यक्षों से परामर्श करेंगे।

3) अन्ताखि़या की कलीसिया ने उन्हें विदा किया। वे फ़ेनिसिया तथा समरिया हो कर यात्रा करते हुए वहाँ के सब भाइयों को ग़ैर-यहूदियों के धर्म-परिवर्तन के विषय में बता कर बड़ा आनन्द प्रदान करते थे।

4) जब वे येरुसालेम पहुँचे, तो कलीसिया, प्रेरितों तथा अध्यक्षों ने उनका स्वागत किया और उन्होंने बताया कि ईश्वर ने उनके द्वारा क्या-क्या कर दिखाया है।

5 फ़रीसी सम्प्रदाय के कुछ सदस्य, जो विश्वासी हो गये थे, यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि ऐसे लोगों का ख़तना करना चाहिए और उन्हें आदेश देना चाहिए कि वे मूसा-संहिता का पालन करें।

6) प्रेरित और अध्यक्ष इस समस्या पर विचार करने के लिए एकत्र हुए।


सुसमाचार : योहन 15:1-8


1) मैं सच्ची दाखलता हूँ और मेरा पिता बागवान है।

2) वह उस डाली को, जो मुझ में नहीं फलती, काट देता है और उस डाली को जो फलती है, छाँटता है। जिससे वह और भी अधिक फल उत्पन्न करें।

3) मैंने तुम लोगो को जो शिक्षा दी है, उसके कारण तुम शुद्ध हो गये हो।

4) तुम मुझ में रहो और मैं तुम में रहूँगा। जिस तरह दाखलता में रहे बिना डाली स्वयं नहीं फल सकती, उसी तरह मुझ में रहे बिना तुम भी नहीं फल सकते।

5) मैं दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

6) यदि कोई मुझ में नहीं रहता तो वह सूखी डाली की तरह फेंक दिया जाता है। लोग ऐसी डालियाँ बटोर लेते हैं और आग में झोंक कर जला देते हैं।

7) यदि तुम मुझ में रहो और तुम में मेरी शिक्षा बनी रहती है तो चाहे जो माँगो, वह तुम्हें दिया जायेगा।

8) मेरे पिता की महिमा इस से प्रकट होगी कि तुम लोग बहुत फल उत्पन्न करो और मेरे शिष्य बने रहो।


📚 मनन-चिंतन


आज हमारे समक्ष मनन चिंतन के लिए दाखलता और डालियॉं का विवरण है। जहॉं प्रभु हम सबको दाखलता और डालियॉं का संबंध बताते हुए उनमें बने रहनें के लिए आहवान कर रहे है। प्रभु में बने रहने से क्या फायदा है? प्रभु में बने रहने से हम कभी नहीं मुरझायेंगे, हम जो कुछ प्रभु से प्रार्थना में मॉंगेंगे वह हमें मिल जायेगी तथा हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा, जिस प्रकार संत पौलुस कहते है, ‘‘जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मै उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हॅूं’’ (फिल्लपि. 4:13)।

प्रभु में बने रहने का तात्पर्य क्या है? प्रभु में बने रहने का तात्पर्य है कि उनकी शिक्षा में बने रहना यह हमें बताता है कि हम केवल उनके वचनों को पढ़े, सुने या याद ही नहीं करें परंतु उन वचनों को जिये, उन वचनों को हमारे जीवन में झलकने दे जिससे जो कोई हमें देंखे या सम्पर्क करें तो उन्हे जीता जागता, चलता फिरता सुसमाचार के दर्शन हो या अनुभव हो। जिस प्रकार संत याकूब अपने पत्र 1ः27-25 में कहते है, ‘‘वचन के श्रोता ही नहीं, बल्कि उसके पालनकर्ता भी बनें। जो व्यक्ति वचन सुनता है, किन्तु उसके अनुसार आचरण नही करता, उस मनुष्य के सदृश है, जो दर्पण में अपना चेहरा देखता है। वह अपने को देख कर चला जाता है और उसे याद नहीं रहता कि उसका अपना स्वरूप कैसा है। किन्तु जो व्यक्ति उस संहिता को, जो पूर्ण है और हमें स्वतन्त्रता प्रदान करती है, ध्यान से देखता और उसका पालन करता है। वह उस श्रोता के सदृश नहीं, जो तुरंत भूल जाता है, बल्कि वह कर्ता बन जाता और उस संहिता को अपने जीवन में चरितार्थ करता है।’’

इसलिए हम श्रोता ही नहीं परंतु वचन के पालनकर्ता के लिए बुलाये गये है। अगर येसु का वचन कहता है कि हमें अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करना चाहिए तो ‘‘हम वचन से नहीं, कर्म से, मुख से नहीं, ह्दय सेे एक दूसरे को प्यार करें’’ (1योहन 3:18)।

प्रभु में बने रहने से प्रभु का जीवन हमारे जीवन में संचार होने लग जाता है और हम प्रभु में एक हो जाते है और जो कार्य प्रभु इस संसार में करना चाहता है वह हमारे जीवन द्वारा पूर्ण होता है। प्रभु इस संसार में बहुत फल उत्पन्न करना चाहता है परंतु उसको पूर्ण होने के लिए हम सभी को उनसे जुड़े रहने की जरूरत है। आईये आज के दिन हम प्रार्थना करें कि हम निरंतर प्रभु से जुड़े जिस प्रकार संत पौलुस जुड़े हुए थे। वे रोमियों के नाम पत्र में कहते हैं, ‘‘कौन हम को मसीह के प्रेम से वंचित कर सकता है? मुझे दृढ़ विश्वास है कि न तो मरण या जीवन, न स्वर्गदूत या नरकदूत, न वर्तमान या भविष्य, न आकाश या पाताल की कोई शक्ति और न समस्त सृष्टि में कोई या कुछ हमें ईश्वर के उस प्रेम से वंचित कर सकता है, जो हमें हमारे प्रभु ईश्वर मसीह द्वारा मिला है’’ (रोमियो 8ः35,38-39)।



📚 REFLECTION



In the entire bible we find God trying to establish a relationship with the humans and for this time to time God makes a covenant with the peope so that He may be our Lord and we be his people. Today’s Gospel tells us about the connection about that relationship.

In today’s gospel Jesus with a beautiful parable sets before us the connection between God and human.

Today we have the description of vine and the branches for our reflection, where telling the connection between vine and the branches Lord invites us to remain or abide in him. Let’s see what are the benefits of remaining or abiding in him- By Remaining in the Lord we will never fade, what ever we ask Lord in prayer we will receive, all the more nothing will be impossible for us as St. Paul says, “I can do all things with the help of him who strengthens me.” (Philipp.4:13).

What is the meaning of abiding in the Lord? It means to remain/abide in his teachings which tells us that we not only have to read, listen and memorize his words but to live those words, those words should reflect in our lives so that whoever comes in contact with us they may experience the living gospel. As St. James says in his letter 1:22-25, “Be doers of the word, andnotmeely hearers who deceive themselves. For if any are hearers of the word and not doers, they are like those wholook at themselvesin a mirror; for they look at themselves and, on going away, immediately forget what they were like. But those who look into the perfect law, the law of liberty, and persevere, become not hearers who forget but doers who act.”

That’s why we are called not merely for hearers but to be the doers of the word. If the word of God says love your neibhours as yourself then “let us love, not in word or speech, but in truth and action.” (1Jn 3:18)

By abiding in God, the life of God start generating in us and we become one in the Lord; and the work that God wants in this world reaches to its fulfillment through our lives. God wants to bear much fruits in this world but for that to happen in its fulfillment we all need to remain in him. Let’s pray today that we may always remain united with him as St. Paul remained. St. Paul says in his letter, “Who will separate us from the love of Christ? Will hardship, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword? For I am convinced that neither death, nor life, nor angels, nor rulers, nor things present, nor things to come, nor powers, nor height, nor depth, nor anything else in all creation, will be able to separate us from the love of God in Christ Jesus our Lord. (Romans 8:35, 38-39).


✍ -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन 4 मई, 2021 मंगलवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

4 मई, 2021

मंगलवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह




पहला पाठ : प्रेरित-चरित 14:19-28


19) इसके बाद कुछ यहूदियों ने अन्ताखिया तथा इकोनियुम से आ कर लोगों को अपने पक्ष में मिला लिया। वे पौलुस को पत्थरों से मार कर और मरा समझ कर नगर के बाहर घसीट ले गये;

20) किन्तु जब शिष्य पौलुस के चारों ओर एकत्र हो गये, तो वह उठ खड़ा हुआ और नगर लौट आया। दूसरे दिन वह बरनाबस के साथ देरबे चल दिया।

21) उन्होंने उस नगर में सुसमाचार का प्रचार किया और बहुत शिष्य बनाये। इसके बाद वे लुस्त्रा और इकोनियुम हो कर अन्ताखिया लौटे।

22) वे शिष्यों को ढारस बँधाते और यह कहते हुए विश्वास में दृढ़ रहने के लिए अनुरोध करते कि हमें बहुत से कष्ट सह कर ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना है।

23) उन्होंने हर एक कलीसिया में अध्यक्षों को नियुक्त किया और प्रार्थना तथा उपवास करने के बाद उन लोगों को प्रभु के हाथों सौंप दिया, जिस में वे लोग विश्वास कर चुके थे।

24) वे पिसिदिया पार कर पम्फुलिया पहुँचे

25) और पेरगे में सुसमाचार का प्रचार करने के बाद अत्तालिया आये।

26) वहाँ से वे नाव पर सवार हो कर अन्ताखिया चल दिये, जहाँ से वे चले गये थे और जहाँ लोगों ने उस कार्य के लिए ईश्वर की कृपा माँगी थी, जिसे उन्होंने अब पूरा किया था।

27) वहाँ पहुँचकर और कलसिया की सभा बुला कर वे बताते रहे कि ईश्वर ने उनके द्वारा क्या-क्या किया और कैसे गै़र-यहूदियों के लिए विश्वास का द्वार खोला।

28) वे बहुत समय तक वहाँ शिष्यों के साथ रहे।


सुसमाचार : योहन 14:27-31


27) मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो।

28) तुमने मुझ को यह कहते सुना- मैं जा रहा हूँ और फिर तुम्हारे पास आऊँगा। यदि तुम मुझे प्यार करते, तो आनन्दित होते कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ, क्योंकि पिता मुझ से महान है।

29) मैंने पहले ही तुम लोगों को यह बताया, जिससे ऐसा हो जाने पर तुम विश्वास करो।

30) अब मैं तुम लोगों से अधिक बातें नहीं करूँगा क्योंकि इस संसार का नायक आ रहा है। वह मेरा कुछ नहीं बिगाड सकता,

31) किन्तु यह आवश्यक है कि संसार जान जाये कि मैं पिता को प्यार करता हूँ और पिता ने मुझे जैसा आदेश दिया है मैं वैसा ही करता हूँ। उठो! हम यहाँ से चलें।’’


📚 मनन-चिंतन


जब जीवन में सब अस्त वयस्त हो और ह्दय व्याकुल हो तो केवल शांति ही हमें उस अवस्था से उबार सकता है। प्रभु येसु शांति के राजा है, तथा पुनरुत्थान के बाद जब वे शिष्यों को बंद कमरे में दर्शन देते है तो सबसे पहले यही आशिष देते है कि तुम्हें शांति मिले।

आज का सुसमाचार हमारे बीच में येसु और शिष्यों के बीच में उस वार्तालाप को रखता है जो प्रभु येसु ने पवित्र आत्मा के आने के विषय बताने के बाद कही थी। प्रभु येसु को ज्ञात था कि उनके मरण के बाद पेंतेकोस्त तक शिष्य व्याकुल हो जायेगंे, घबरा जायेंगे इसलिये प्रभु उन से कहते है, ‘‘मैं तुम्हारे लिये शांति छोड़ जाता हूॅं। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हॅूं। वह संसार की शांति जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मन बनों।’’

मैं तुम्हारे लिये शांति छोड़ जाता हॅूं। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हॅूं - प्रभु येसु जाते जाते यह आश्वसन देते जाते हैं वह जाते जाते अपनी शांति देकर जाऐंगे। प्रभु की शांति किस प्रकार की है? प्रभु की शांति इस संसार की शांति से परे है। जब शिष्यगण येसु के साथ झील पार कर रहे थे तब अचानक झंझावट उठा और नाव पानी से भरी जा रही थी। येसु दुम्बाल में तकिया लगाकर सो रहे थे तब शिष्यों ने उन्हे जगाया और प्रभु ने वायु को डॉंटा और पूर्ण शांति छा गई (मत्ती 8ः23-27)। शिष्य उस घटना के समय बहुत डर गये थे क्योकि झंझावट केवल बाहर ही नहीं परंतु उनके भीतर उनके ह्दय में भी था। प्रभु येसु उस झंझावट भरी घटना में जहॉं बहुत शोरगुल था, लहरो का नाव से टकराव था ऐसी स्थिति में भी वे शांत भाव से सो रहे थे क्योकि प्रभु के भीतर झंझावट नहीं परंतु शांति था। प्रभु की शांति का राज-पिता ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण तथा विश्वास होना। अर्थात् भले ही मेरे चारों ओर तबाही हो हाहाकार हो फिर भी विश्वास होना कि प्रभु मेरे साथ है, मेरे भीतर है वह मेरा कुछ भी अनिष्ठ नहीं होने देगा। यह विश्वास और शांति केवल येसु ही हमें प्रदान कर सकते है।

आइये हम प्रभु की शांति को ग्रहण करने उसको महसूस करने के लिए आज के वचन के द्वारा प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION



When there is turmoil in the life and heart is anxious then only peace can overcome that situation. Jesus is the Prince of Peace, and after the Resurrection when he meets the disciples in the closed room he first and foremost gives the blessing of peace.

Today’s Gospel keeps before us the conversation between Jesus and the disciples about the situation after telling about coming of Holy Spirit. Lord Jesus knew that after his death till the Pentecost disciples will be disturbed, frighten that’s why Lord says to them, “Peace I leave with you; my peace I give to you. I do not give to you as the world gives. Do not let your hearts be troubled, and do not let them be afraid.”

Peace I leave with you; my peace I give to you- Before leaving Jesus gives the assurance of his peace. What kind is the Peace of the Lord? Peace of God is different from the peace of the world. When disciples were crossing the sea along with Jesus, suddenly a windstorm arose on the sea, so great that the boat was being swamped by the waves. Jesus was sleeping and the disciples woke him and Jesus rebuked the winds and the sea; and there was a dead calm (Mt 8:23-27). Disciples were very frightened of that incident because the storm was not only outside but also inside of them, in their hearts. Jesus in that incident full of storm where there was lot of alarm and excursions, boat was being swamped by the waves; even in this situation Jesus was sleeping peacefully because the inside Jesus there was peace not the storm. The secret of Jesus’ peace is the full trust and surrender in the Abba Father. That means to say even if I am surrounded by the destruction or outcry then also having strong believe that God is with me, inside me and he will never allow anything to harm me. This kind of trust and peace only Jesus can give us.

Let’s pray through today’s word that we may receive and experience Lord’s peace.


✍ -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन 3 मई, 2021 प्रेरित फ़िलिप और याकूब का पर्व

 

3 मई, 2021

प्रेरित फ़िलिप और याकूब का पर्व

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पहला पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 15:1-8


1) भाइयो! मैं आप लोगेां को उस सुसमाचार का स्मरण दिलाना चाहता हूँ, जिसका प्रचार मैंने आपके बीच किया, जिसे आपने ग्रहण किया, जिस में आप दृढ बने हुये हैं,

2) और यदि आप उसे उसी रूप में बनाये रखेंगे, जिस रूप में मैंने उसे आप को सुनाया, तो उसके द्वारा आप को मुक्ति मिलेगी। नहीं तो आपका विश्वाश व्यर्थ होगा।

3) मैंने आप लोगों को मुख्य रूप से वही शिक्षा सुनायी, जो मुझे मिली थी और वह इस प्रकार है- मसीह हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए मरे, जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है।

4) वह कब्र में रखे गये और तीसरे दिन जी उठे, जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है।

5) वह कैफ़स को और बाद में बारहों में दिखाई दिये।

6) फिर वही एक ही समय पाँच सौ से अधिक भाइयों को दिखाई दिये। उन में से अधिकांश आज भी जीवित हैं, यद्यपि कुछ मर गये हैं।

7) बाद में वह याकूब को और फिर सब प्रेरितों को दिखाई दिये।

8) सब के बाद वह मुझे भी, मानों ठीक समय से पीछे जन्में को दिखाई दिये।


सुसमाचार : सन्त योहन 14:6-14


6) ईसा ने उस से कहा, ’’मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ। मुझ से हो कर गये बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता।’’

7) यदि तुम मुझे पहचानते हो, तो मेरे पिता को भी पहचानोगे। अब तो तुम लोगों ने उसे पहचाना भी है और देखा भी है।’’

8) फिलिप ने उन से कहा, ’’प्रभु! हमें पिता के दर्शन कराइये। हमारे लिये इतना ही बहुत है।’’

9) ईसा ने कहा, ’’फिलिप! मैं इतने समय तक तुम लोगों के साथ रहा, फिर भी तुमने मुझे नहीं पहचाना? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है। फिर तुम यह क्या कहते हो- हमें पिता के दर्शन कराइये?’’

10) क्या तुम विश्वास नहीं करते कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं? मैं जो शिक्षा देता हूँ वह मेरी अपनी शिक्षा नहीं है। मुझ में निवास करने वाला पिता मेरे द्वारा अपने महान कार्य संपन्न करता है।

11) मेरी इस बात पर विश्वास करो कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं, नहीं तो उन महान कार्यों के कारण ही इस बात पर विश्वास करो।

12) मैं तुम लोगो से यह कहता हूँ जो मुझ में सिवश्वास करता है, वह स्वयं वे कार्य करेगा, जिन्हें मैं करता हूँ। वह उन से भी महान कार्य करेगा। क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ।

13) तुम मेरा नाम ले कर जो कुछ माँगोगे, मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा, जिससे पुत्र के द्वारा पिता की महिमा प्रकट हो।

14) यदि तुम मेरा नाम लेकर मुझ से कुछ भी माँगोगें, तो मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ने इस संसार में अपने कार्य को आगे ले चलने के लिए बारहों शिष्यों को चंुना जो आगे चल कर प्रेरित कहलाये। आज माता कलीसिया उन बारहों में से दो प्रेरित -संत फिलिप और संत याकुब का स्मरण करते हुये उनका पर्व मनाती है। प्रेरित कलीसिया के मजबूत प्रचारक थे जिन्होने अपने जीवन द्वारा जीवित प्रभु का साक्ष्य दिया।

बाईबिल में याकुब के विषय में बहुत ही कम विवरण दिया गया है। परंतु फिलिप के विषय में याकुब से ज्यादा विवरण पाते है। आज के सुसमाचार में भी हम प्रभु येसु और फिलिप के बीच में वार्तालाप को पाते है जहॉं प्रभु येसु एक महान रहस्य फिलिप के प्रश्न का उत्तर देते समय प्रकट करते है- ‘‘जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है।’’

जब कभी हम किसी प्रेरित संत का पर्व मनाते है तब हमारे सामने उनके जीवन के तीन भागों पर मनन करना चाहिए-

पहला-प्रेरितों का प्रभु येसु से मिलने से पहले का जीवन

दूसरा-प्ररितों का प्रभु येसु के साथ बिताया हुआ जीवन

तीसना-प्रेरितों का प्रभु येसु के पुनरुत्थान के बाद का जीवन

पहले जीवन भाग अर्थात् प्रभु येसु से मिलने से पहले वे अज्ञानता में जीवन व्यतीत कर रहें थे, एक संसारिक जीवन जी रहें थे।

दूसरे भाग में जहॉं वे प्रभु येसु के साथ समय बिताते है- जहॉं पर वे प्रभु येसु के चमत्कारों को देखते है, उनके प्रवचन और दृष्टांतों को सुनते है, येसु के द्वारा प्रकट किये गये महान रहस्यों को सुनते है लेकिन वे उन सब को उस समय नहीं समझ पाते है।

तीसरे भाग में प्रभु येसु के पुनरुत्थान और पवित्र आत्मा से भरने के बाद उनको प्रभु येसु द्वारा कहीं गई सभी बातों और रहस्यों को अर्थ पता चलता है, उन्हे पता चलता है कि येसु कौन है? और उस से भी अधिक वे संासारिक जीवन से उपर उठ कर उन्हें अपने जीवन का अर्थ और जीवन का मकसद पता चलता है।

ये तीनों भाग प्रेरितों के जीवन में प्रमुख भुमिका निभाती है जहॉं पर वे साधारण जीवन से महान संत के रूप में उभर कर सामने आते है। प्रेरितो का जीवन हम सभी को प्रेरणा देता है कि हम भी येसु और अपने जीवन के मकसद को पहचाने और यह तभी हो सकता है जब हम यह तीनों जीवन के भाग को पूर्णता तक इस संसार में जीयंे। हममें से अधिकतर लोग पहले या दूसरे जीवन के भाग में ही सिमट कर रह जाते है। आईये हम प्रेरित फिलिप और याकुब से प्रार्थना करें कि जिस प्रकार उन्होंने प्रभु और उनके इस संसार में आने के मकसद को पहचान कर उनके कार्यों के लिए अपने जीवन तक को न्योछावर कर दिया, हम भी उसी प्रकार येसु को सच्चे रूप में पहचान सकें।



📚 REFLECTION



Jesus chose the twelve disciples who were later called Apostles to carry forward his mission in this world. Among the twelve, today the Catholic Church remembers the two Apostles- St.Philip and St. James and celebrates their feasts. Apostles were the strong preacher who witnessed the Lord through their lives

There is very less information about St.James in the Bible, but there is somewhat more description of Philip than James in the Bible. In today’s Gospel passage we see the conversation between Jesus and Philip where Lord Jesus reveals the great mystery while answering to the question of Philip- “Whoever has seen me has seen the Father.”

Wheneve we celebrate the feasts of any Apostles then we have to reflect the three phases of their lives-

First-The life of Apostles before encountering Jesus

Second- The life of Apostles spend with Jesus

Third- The life of Apostles after the Resurrection of Jesus

In the first phase of their lives i.e., before meeting Jesus there were living an ignorant life, a worldly life.

In Second phase where they spend their lives with Jesus- They witness the miracles of Jesus, they hear the sermons and parables of Jesus, they listen the great mysteries revealed by Jesus but at that moment they were not able to understand it fully.

In the Third phase- After the Resurrection of Jesus and filling of the Holy Spirit they understand the meaning of the words and mystery spoken by Jesus, they come to know who the Jesus really is? And all the more they rise above the worldlylives and come to know the meaning and purpose of their lives.

These three phases plays an important role in the lives of Apostles where they come forward as the great Saint from their simple lives. Life of Apostles gives us an inspiration that we must also recognize Jesus and the purpose of our lives and this is only possible when we live all these three phases of lives in this world. Most of us remain in the first or second phase only. Let’s pray to St. Philip and St. James as they recognized Jesus and the purpose of his coming surrendered their lives for it, we too may be able to recognize Jesus in true way.


✍ -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

आज का पवित्र वचन 2 मई, 2021 पास्का का पाँचवाँ इतवार

 

2 मई, 2021

पास्का का पाँचवाँ इतवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित . 9:26-31


26) जब साऊल येरुसालेम पहुँचा, तो वह शिष्यों के समुदाय में सम्मिलित हो जाने की कोशिश करता रहा, किन्तु वे सब उसे से डरते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि वह सचमुच ईसा का शिष्य बन गया है।

27) तब बरनाबस ने उसे प्रेरितों के पास ले जा कर उन्हें बताया कि साऊल ने मार्ग में प्रभु के दर्शन किये थे और प्रभु ने उस से बात की थी और यह भी बताया कि साऊल ने दमिश्क में निर्भीकता से ईसा के नाम का प्रचार किया था।

28) इसके बाद साऊल येरुसालेम में प्रेरितों के साथ आता-जाता रहा

29) और निर्भीकता से ईसा के नाम का प्रचार करता रहा। वह यूनानी-भाषी यहूदियों से बातचीत और बहस किया करता था, किन्तु वे लोग उसे मार डालना चाहते थे।

30) जब भाइयों को इसका पता चला, तो उन्होंने साऊल को कैसरिया ले जा कर तरसुस भेजा।

31) उस समय समस्त यहूदिया, गलीलिया तथा समारिया में कलीसिया को शान्ति मिली। उसका विकास होता जा रहा था और वह, प्रभु पर श्रद्धा रखती हुई और पवित्र आत्मा की सान्त्वना द्वारा बल प्राप्त करती हुई, बराबर बढ़ती जाती थी।


दूसरा पाठ :1 योहन 3:18-2


18) बच्चो! हम वचन से नहीं, कर्म से, मुख से नहीं, हृदय के एक दूसरे को प्प्यार करें।

19) इसी से हम जान जायेंगे कि हम सत्य की सन्तान हैं और जब कभी हमारा अन्तः करण हम पर दोष लगायेगा, तो हम ईश्वर के सामने अपने को आश्वासन दे सकेंगे;

20) क्योंकि ईश्वर हमारे अन्तःकरण से बड़ा हौ और वह सब कुछ जानता है।

21) प्यारे भाइयो! यदि हमारा अन्तः करण हम पर दोष नहीं लगाता है, तो हम ईश्वर पर पूरा भरोसा रख सकते हैं।

22) हम उस से जो कुछ माँगेंगे, वह हमें वहीं प्रदान करेगा; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को पालन करते हंa और वही करते हैं, जो उसे अच्छा लगता है।

23) और उसकी आाज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र ईसा मसीह के नाम में विश्वास करें और एक दूसरे को प्यार करें, जैसा कि मसीह ने हमें आदेश दिया।

24) जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में और हम जानते हैं कि वह हम में निवास करता है; क्योंकि उसने हम को आपना आत्मा प्रदान किया है।


सुसमाचार : योहन 15:1-8.


1) मैं सच्ची दाखलता हूँ और मेरा पिता बागवान है।

2) वह उस डाली को, जो मुझ में नहीं फलती, काट देता है और उस डाली को जो फलती है, छाँटता है। जिससे वह और भी अधिक फल उत्पन्न करें।

3) मैंने तुम लोगो को जो शिक्षा दी है, उसके कारण तुम शुद्ध हो गये हो।

4) तुम मुझ में रहो और मैं तुम में रहूँगा। जिस तरह दाखलता में रहे बिना डाली स्वयं नहीं फल सकती, उसी तरह मुझ में रहे बिना तुम भी नहीं फल सकते।

5) मैं दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

6) यदि कोई मुझ में नहीं रहता तो वह सूखी डाली की तरह फेंक दिया जाता है। लोग ऐसी डालियाँ बटोर लेते हैं और आग में झोंक कर जला देते हैं।

7) यदि तुम मुझ में रहो और तुम में मेरी शिक्षा बनी रहती है तो चाहे जो माँगो, वह तुम्हें दिया जायेगा।

8) मेरे पिता की महिमा इस से प्रकट होगी कि तुम लोग बहुत फल उत्पन्न करो और मेरे शिष्य बने रहो।


📚 मनन-चिंतन


बाईबिल में सर्वत्र प्रभु ईश्वर ने मनुष्य से एक रिश्ता जोड़ने की कोशिश की है और इस हेतु ईश्वर ने मनुष्य के साथ समय समय पर विधान रचा जिससे वे हमारे ईश्वर हो और हम उनकी प्रजा। आज का सुसमाचार हमें उस रिश्ते के संबंध के विषय में बताता है

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु बहुत ही सुंदर दृष्टांत के जरिये हमारे और ईश्वर के बीच में रिश्ते को प्रकट करते है।

आज हमारे समक्ष मनन चिंतन के लिए दाखलता और डालियॉं का विवरण है। जहॉं प्रभु हम सबको दाखलता और डालियॉं का संबंध बताते हुए उनमें बने रहनें के लिए आहवान कर रहे है। प्रभु में बने रहने से क्या फायदा है? प्रभु में बने रहने से हम कभी नहीं मुरझायेंगे, हम जो कुछ प्रभु से प्रार्थना में मॉंगेंगे वह हमें मिल जायेगी तथा हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा, जिस प्रकार संत पौलुस कहते है, ‘‘जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मै उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हॅूं’’ (फिल्लपि. 4:13)।

प्रभु में बने रहने का तात्पर्य क्या है? प्रभु में बने रहने का तात्पर्य है कि उनकी शिक्षा में बने रहना यह हमें बताता है कि हम केवल उनके वचनों को पढ़े, सुने या याद ही नहीं करें परंतु उन वचनों को जिये, उन वचनों को हमारे जीवन में झलकने दे जिससे जो कोई हमें देंखे या सम्पर्क करें तो उन्हे जीता जागता, चलता फिरता सुसमाचार के दर्शन हो या अनुभव हो। जिस प्रकार संत याकूब अपने पत्र 1ः22-25 में कहते है, ‘‘वचन के श्रोता ही नहीं, बल्कि उसके पालनकर्ता भी बनें। जो व्यक्ति वचन सुनता है, किन्तु उसके अनुसार आचरण नही करता, उस मनुष्य के सदृश है, जो दर्पण में अपना चेहरा देखता है। वह अपने को देख कर चला जाता है और उसे याद नहीं रहता कि उसका अपना स्वरूप कैसा है। किन्तु जो व्यक्ति उस संहिता को, जो पूर्ण है और हमें स्वतन्त्रता प्रदान करती है, ध्यान से देखता और उसका पालन करता है। वह उस श्रोता के सदृश नहीं, जो तुरंत भूल जाता है, बल्कि वह कर्ता बन जाता और उस संहिता को अपने जीवन में चरितार्थ करता है।’’

इसलिए हम श्रोता ही नहीं परंतु वचन के पालनकर्ता के लिए बुलाये गये है। अगर येसु का वचन कहता है कि हमें अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करना चाहिए तो ‘‘हम वचन से नहीं, कर्म से, मुख से नहीं, ह्दय से एक दूसरे को प्यार करें’’ (1योहन 3:18)।

प्रभु में बने रहने से प्रभु का जीवन हमारे जीवन में संचार होने लग जाता है और हम प्रभु में एक हो जाते है और जो कार्य प्रभु इस संसार में करना चाहता है वह हमारे जीवन द्वारा पूर्ण होता है। प्रभु इस संसार में बहुत फल उत्पन्न करना चाहते है परंतु उसको पूर्ण होने के लिए हम सभी को उनसे जुड़े रहने की जरूरत है। आईये आज के दिन हम प्रार्थना करें कि हम निरंतर प्रभु से जुड़े रहे जिस प्रकार संत पौलुस जुड़े हुए थे। वे रोमियों के नाम पत्र में कहते हैं, ‘‘कौन हम को मसीह के प्रेम से वंचित कर सकता है? मुझे दृढ़ विश्वास है कि न तो मरण या जीवन, न स्वर्गदूत या नरकदूत, न वर्तमान या भविष्य, न आकाश या पाताल की कोई शक्ति और न समस्त सृष्टि में कोई या कुछ हमें ईश्वर के उस प्रेम से वंचित कर सकता है, जो हमें हमारे प्रभु ईश्वर मसीह द्वारा मिला है’’ (रोमियो 8:35,38-39)।


📚 REFLECTION



In the entire bible we find God trying to establish a relationship with the humans and for this time to time God makes a covenant with the peope so that He may be our Lord and we be his people. Today’s Gospel tells us about the connection about that relationship.

In today’s gospel Jesus with a beautiful parable sets before us the connection between God and human.

Today we have the description of vine and the branches for our reflection, where telling the connection between vine and the branches Lord invites us to remain or abide in him. Let’s see what are the benefits of remaining or abiding in him- By Remaining in the Lord we will never fade, what ever we ask Lord in prayer we will receive, all the more nothing will be impossible for us as St. Paul says, “I can do all things with the help of him who strengthens me.” (Philipp.4:13).

What is the meaning of abiding in the Lord? It means to remain/abide in his teachings which tells us that we not only have to read, listen and memorize his words but to live those words, those words should reflect in our lives so that whoever comes in contact with us they may experience the living gospel. As St. James says in his letter 1:22-25, “Be doers of the word, andnotmeely hearers who deceive themselves. For if any are hearers of the word and not doers, they are like those wholook at themselvesin a mirror; for they look at themselves and, on going away, immediately forget what they were like. But those who look into the perfect law, the law of liberty, and persevere, become not hearers who forget but doers who act.”

That’s why we are called not merely for hearers but to be the doers of the word. If the word of God says love your neibhours as yourself then “let us love, not in word or speech, but in truth and action.” (1Jn 3:18)

By abiding in God, the life of God start generating in us and we become one in the Lord; and the work that God wants in this world reaches to its fulfillment through our lives. God wants to bear much fruits in this world but for that to happen in its fulfillment we all need to remain in him. Let’s pray today that we may always remain united with him as St. Paul remained. St. Paul says in his letter, “Who will separate us from the love of Christ? Will hardship, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword? For I am convinced that neither death, nor life, nor angels, nor rulers, nor things present, nor things to come, nor powers, nor height, nor depth, nor anything else in all creation, will be able to separate us from the love of God in Christ Jesus our Lord. (Romans 8:35, 38-39).



मनन-चिंतन-2


येसु ने सुसमाचार के द्वारा इस बात पर जोर डाला कि विश्वासगण विश्वास के फल उत्पन्न करे। जो विश्वास के फल उत्पन्न करता है वह पिता को प्रिय होता है तथा ऐसे विश्वासियों को पिता और अधिक कृपा प्रदान करता है। ’’वह उस डाली को जो फलती है, छाँटता है। जिससे वह और भी अधिक फल उत्पन्न करें।’’(योहन 15:02) इस प्रकार पिता उन डालियों या लोगों को विभिन्न घटनाओं और परिस्थितियों के द्वारा और अधिक सक्षम एवं योग्य बनाता है। सेवक और आर्शिफियों के दृष्टांत (देखिए मत्ती 25:14-30) द्वारा येसु इस बात को पुनः दर्शाते है कि फल उत्पन्न करना विश्वासी का मूलभूत कर्तव्य है तथा ऐसे फलदायी विश्वासियों को और अधिक दिया जाता है। ’’क्योंकि जिसके पास कुछ है, उसी को और दिया जायेगा और उसके पास बहुत हो जायेगा, लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उस से वह भी ले लिया जायेगा, जो उसके पास है।’’(मत्ती 25:29) इसी परिपेक्ष्य में ईसा फलहीन अंजीर के पेड़ को सूखा देते हैं क्योंकि उसमें पत्तियॉ तो थी लेकिन फल नहीं थे। (देखिए मारकुस 11:12-14) ईसा की ये बात यही दर्शाती है कि ईश्वर हम से सदैव फल की आशा करते हैं। इसके विपरीत यदि हम किसी भी कारणवश फल पैदा नहीं करते हैं तो यह बात ईश्वर को अप्रसन्न करती है तथा हमारे विनाश का कारण बनती है। तुम अधिक फल उत्पन्न करो और तुम्हारा फल बना रहे।

हमारे फलदायी होने का रहस्य इस बात में छिपा है कि हम पिता से संयुक्त रहे। पिता से संुयक्त रहकर ही हम जीवन में विश्वास के फल उत्पन्न कर सकते हैं। जब एक छः साल के बच्चे ने पहली बार समुद्र की लहरों को देखा तो वह बहुत रोमांचित हो गया। वह उन लहरों के साथ हमेशा के लिए रहना चाहता था किन्तु यह उसके लिए संभव नहीं था। इसलिए वह उन लहरों को एक बाल्टी में भर कर अपने साथ घर पर ले आया। किन्तु बाल्टी में लहरे नहीं थी। जिस प्रकार समुद्र का पानी समुद्र से अलग होकर लहरें पैदा नहीं कर सकता उसी प्रकार हरेक विश्वासी पिता परमेश्वर से दूर रहकर कुछ भी नहीं कर सकता है। ईश्वर की आशिष ही हमारे जीवन एवं कार्यों को सफलता प्रदान करती है। इसी सच्चाई को इंगित करते हुए स्तोत्रकार कहता है, ’’यदि प्रभु ही घर नहीं बनाये, तो राजमन्त्रियों का श्रम व्यर्थ है। यदि प्रभु ही नगर की रक्षा नहीं करे, तो पहरेदार व्यर्थ जागते हैं। 2) कठोर परिश्रम की रोटी खानेवालो! तुम व्यर्थ ही सबेरे जागते और देर से सोने जाते हो....’’ (स्तोत्र 127:1-2) प्रभु भी कहते हैं, ’’....जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।’’ (योहन 15:5)

हम प्रभु के साथ किस प्रकार जुडे रहना चाहिए जिससे हम भी फलदायी बने तथा और अधिक फल पैदा करे। प्रभु से संयुक्त रहने के लिए हमें उनकी शिक्षाओं को आत्मसात कर उसके अनुसार अपने जीवन को ढालना चाहिए। बीज के दृष्टांत के द्वारा येसु इसी सच्चाई को प्रतिपादित करते हुए बताते हैं कि वही बीज फल उत्पन्न करता है जो अच्छी भूमि में गिरा हो। इसका तात्पर्य है कि बीज को फलदायी बनने के लिए उसका अच्छी भूमि में अकुरित होकर बढना अत्यंत आवश्यक है। ’’जो अच्छी भूमि में बोये गये हैं, ये वे लोग हैं, जो वचन सुनते हैं- उसे ग्रहण करते हैं और फल लाते हैं -कोई तीस गुना, कोई साठ गुना, कोई सौ गुना।’’(मारकुस 4:20)

जब हम अपनी इच्छाओं एवं सांसारिक बातों को केन्द्र में रखकर नहीं बल्कि ईश्वर की शिक्षा के अनुसार अपने जीवन का कार्यान्वन करते हैं तथा वचन से मार्गदर्शन पाकर जीवन के छोटे-बडे निर्णय लेते हैं। तब हमारे जीवन में अनेक बदलाव आते हैं। हमारा जीवन अधिक प्रज्ञावान तथा सच्चा बन जाता है। जिस जीवन का चित्रण स्तोत्रकार करते हैं वह हमारे जीवन की सच्चाई बन जाता है, ’’मैं तेरी शिक्षा का मनन किया करता हूँ, इसलिए मैं अपने शिक्षकों से अधिक बुद्धिमान् हूँ। मैंने तेरी आज्ञाओं का पालन किया है, इसलिए मैं वयोवृद्धों से अधिक विवेकशील हूँ। तेरे नियमों का पालन करने के लिए मैं कुमार्ग से दूर रहा हूँ। मैं तेरी आज्ञाओं के मार्ग से नहीं भटका हूँ, क्योंकि तूने स्वयं मुझे शिक्षा दी है। मुँह में टपकने वाले मधु की अपेक्षा तेरी शिक्षा मेरे लिए अधिक मधुर है। तेरी आज्ञाओं से मुझे विवेक मिला, इसलिए मैं असत्य के मार्ग से घृणा करता हूँ। तेरी शिक्षा मुझे ज्योति प्रदान करती और मेरा पथ आलोकित करती है।’’ (स्तोत्र 119:99-105)

हमें भी अपने जीवन में ख्रीस्तीय विश्वास एवं सुसमाचारिय शिक्षा को जीना चाहिए जिससे हमारे स्वर्गिक पिता को माहिमा प्राप्त हो।


✍ Br. Biniush Topno

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1 मई, 2021 - शनिवार – पास्का का चौथा सप्ताह सन्त योसेफ श्रमिक - ऐच्छिक स्मृति

 

1 मई, 2021 - शनिवार – पास्का का चौथा सप्ताह

सन्त योसेफ श्रमिक - ऐच्छिक स्मृति

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 13:44-52

44) अगले विश्राम-दिवस नगर के प्रायः सब लोग ईश्वर का वचन सुनने के लिए इकट्ठे हो गये।

45) यहूदी इतनी बड़ी भीड़ देख कर ईर्ष्या से जल रहे थे और पौलुस की निंदा करते हुए उसकी बातों का खण्डन करते रहे।

46) पौलुस और बरनाबस ने निडर हो कर कहा, ’’यह आवश्यक था कि पहले आप लोगों को ईश्वर का वचन सुनाया जाये, परंतु आप लोग इसे अस्वीकार करते हैं और अपने को अनंत जीवन के योग्य नहीं समझते; इसलिए हम अब गैर-यहूदियों के पास जाते हैं।

47) प्रभु ने हमें यह आदेश दिया है, मैंने तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बना दिया हैं, जिससे तुम्हारे द्वारा मुक्ति का संदेश पृथ्वी के सीमांतों तक फैल जाये।’’

48) गैर-यहूदी यह सुन कर आनन्दित हो गये और ईश्वर के वचन की स्तृति करते रहे। जितने लोग अनंत जीवन के लिए चुने गये थे, उन्होंने विश्वास किया

49) और सारे प्रदेश में प्रभु का वचन फैल गया।

50) किंतु यहूदियों ने प्रतिष्ठित भक्त महिलाओं तथा नगर के नेताओ को उभाड़ा, पौलुस तथा बरनाबस के विरुद्ध उपद्रव खड़ा कर दिया और उन्हें अपने इलाके से निकाल दिया।

51) पौलुस और बरनाबस उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ कर इकोनियुम चले गये।

52) शिष्य आनन्द और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण थे।

सुसमाचार : योहन 14:7-14


7) यदि तुम मुझे पहचानते हो, तो मेरे पिता को भी पहचानोगे। अब तो तुम लोगों ने उसे पहचाना भी है और देखा भी है।’’

8) फिलिप ने उन से कहा, ’’प्रभु! हमें पिता के दर्शन कराइये। हमारे लिये इतना ही बहुत है।’’

9) ईसा ने कहा, ’’फिलिप! मैं इतने समय तक तुम लोगों के साथ रहा, फिर भी तुमने मुझे नहीं पहचाना? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है। फिर तुम यह क्या कहते हो- हमें पिता के दर्शन कराइये?’’

10) क्या तुम विश्वास नहीं करते कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं? मैं जो शिक्षा देता हूँ वह मेरी अपनी शिक्षा नहीं है। मुझ में निवास करने वाला पिता मेरे द्वारा अपने महान कार्य संपन्न करता है।

11) मेरी इस बात पर विश्वास करो कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं, नहीं तो उन महान कार्यों के कारण ही इस बात पर विश्वास करो।

12) मैं तुम लोगो से यह कहता हूँ जो मुझ में सिवश्वास करता है, वह स्वयं वे कार्य करेगा, जिन्हें मैं करता हूँ। वह उन से भी महान कार्य करेगा। क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ।

13) तुम मेरा नाम ले कर जो कुछ माँगोगे, मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा, जिससे पुत्र के द्वारा पिता की महिमा प्रकट हो।

14) यदि तुम मेरा नाम लेकर मुझ से कुछ भी माँगोगें, तो मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा।


श्रमिक संत यूसुफ़

पहला पाठ: उत्पत्ति 1:26-2:3


26) ईश्वर ने कहा, ''हम मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनायें, यह हमारे सदृश हो। वह समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों घरेलू और जंगली जानवरों और जमीन पर रेंगने वाले सब जीवजन्तुओं पर शासन करें।''

27) ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया; उसने उसे ईश्वर का प्रतिरूप बनाया; उसने नर और नारी के रूप में उनकी सृष्टि की।

28) ईश्वर ने यह कह कर उन्हें आशीर्वाद दिया, ''फलोफूलो। पृथ्वी पर फैल जाओ और उसे अपने अधीन कर लो। समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों और पृथ्वी पर विचरने वाले सब जीवजन्तुओं पर शासन करो।''

29) ईश्वर ने कहा, मैं तुम को पृथ्वी भर के बीज पैदा करने वाले सब पौधे और बीजदार फल देने वाले सब पेड़ देता हूँ। वह तुम्हारा भोजन होगा। मैं सब जंगली जानवरों को, आकाश के सब पक्षियों को,

30) पृथ्वी पर विचरने वाले जीवजन्तुओं को उनके भोजन के लिए पौधों की हरियाली देता हूँ'' और ऐसा ही हुआ।

31) ईश्वर ने अपने द्वारा बनाया हुआ सब कुछ देखा और यह उसको अच्छा लगा। सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ यह छठा दिन था।

1) ईश्वर ने जिन जंगली जीव-जन्तुओं को बनाया था, उन में साँप सब से धूर्त था। उसने स्त्री से कहा, ''क्या ईश्वर ने सचमुच तुम को मना किया कि वाटिका के किसी वृक्ष का फल मत खाना''?

2) स्त्री ने साँप को उत्तर दिया, ''हम वाटिका के वृक्षों के फल खा सकते हैं।

3) परन्तु वाटिका के बीचोंबीच वाले वृक्ष के फलों के विषय में ईश्वर ने यह कहा - तुम उन्हें नहीं खाना। उनका स्पर्श तक नहीं करना, नहीं तो मर जाओगे।''


अथवा - पहला पाठ: कलोसियों 3:14-15, 17, 23-24


14) इसके अतिरिक्त, आपस में प्रेम-भाव बनाये रखें। वह सब कुछ एकता में बाँध कर पूर्णता तक पहुँचा देता है।

15) मसीह की शान्ति आपके हृदय में राज्य करे। इसी शान्ति के लिए आप लोग, एक शरीर के अंग बन कर, बुलाये गये हैं। आप लोग कृतज्ञ बने रहें।

17) आप जो भी कहें या करें, वह सब प्रभु ईसा के नाम पर किया करें। आप लोग उन्हीं के द्वारा पिता-परमेश्वर को धन्यवाद देते रहें।

23) आप लोग जो भी काम करें, मन लगा कर करें, मानों मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि प्रभु के लिए काम कर रहे हों;

24) क्योंकि आप जानते हैं कि प्रभु पुरस्कार के रूप में आप को विरासत प्रदान करेगा। आप लोग प्रभु के दास हैं।


सुसमाचार : मत्ती 13:54-58


54) वे अपने नगर आये, जहाँ वे लोगों को उनके सभागृह में शिक्षा देते थे। वे अचम्भे में पड़ कर कहते थे, "इसे यह ज्ञान और यह सामर्थ्य कहाँ से मिला?

55) क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है? क्या मरियम इसकी माँ नहीं? क्या याकूब, यूसुफ़, सिमोन और यूदस इसके भाई नहीं?

56) क्या इसकी सब बहनें हमारे बीच नहीं रहतीं? तो यह सब इसे कहाँ से मिला?"

57) पर वे ईसा में विश्वास नहीं कर सके। ईसा ने उन से कहा, "अपने नगर और अपने घर में नबी का आदर नहीं होता।"

58) लोगों के अविश्वास के कारण उन्होंने वहाँ बहुत कम चमत्कार दिखाये।


📚 मनन-चिंतन


संत युसूफ- जिन्होने मरियम, येसु और ईश्वर की योजना के लिए अपना सुख और जीवन को न्योछावर कर दिया उनका आज हम सम्पूर्ण कलिसिया के साथ मिलकर श्रमिक संत के रूप में पर्व मनाते है। यह पर्व हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संत पिता फ्रांसिस ने यह वर्ष संत युसूफ के वर्ष के रूप मंे घोषित किया है।

संत युसूफ न केवल पवित्र परिवार के रक्षक रहे है अपितु वे विश्वव्यापि कलीसिया के संरक्षक भी है। आज सम्पूर्ण कलीसिया श्रमिक संत युसूफ का पर्व मनाती है। यह पर्व हमारे समक्ष संत युसूफ के सभी गुणों में से एक- कर्मठता के गुण को विशेष रूप से प्रकट करता है।

संत युसूफ एक मेहनती संत है जिन्होनें अपने परिवार को आगे बढ़ाने के लिए न केवल आध्यात्मिक रूप से परंतु शारीरिक रूप से मेहनत और कार्य किया। वे एक बढ़ाई थे और उन्होने अपना कार्य बहुत श्रद्धापूर्वक और ईमानदारी से किया। उनका जीवन उनके परिवार के प्रति समर्पित जीवन था।

संत युसूफ हम सभी के लिए एक प्रेरणा है जो हमें बताते है कि किस प्रकार हम धर्मी होने के साथ साथ कर्मठ व्यक्ति भी हो सकते है। संत युसूफ के बचपन के विषय में हम ज्यादा नहीं जानते परंतु हम उनको येसु के जन्म के घटनाओं के बीच में एक धर्मी और रक्षक पिता के रूप में जानते है। संत युसूफ पवित्र परिवार के आदर्श पिता है। मेहनत और परिश्रम करने वाले व्यक्तियों के लिए भी संत युसूफ एक आदर्श है।

आज के इस पर्व के दिन हमे अपने परिवारों के लिए प्रार्थना करें विशेष करके परिवार के मुखिया के लिए जो अपने श्रम और बलिदान द्वारा परिवार का पालन पोषण एवं हर खतरों से बचाने के लिए अपना जीवन अर्पित करते है। संत युसूफ उन सभी पिताओं को आदर्श पिता के रूप में आशीष दें। आमेन!



📚 REFLECTION



Today we are celebratin the feast of St. Joseph-the worker, who surrendered his life and happiness for the sake of Mary, Jesus and for the plan of God. This feast is all the more important for us as this year is being declared as the year of St. Joseph by Pope Francis.

St. Joseph was not only the protector of the Holy family but He is also the Patron of the Universal Church. Today that Universal Catholic Church celebrates the feast of St. Joseph-the worker. This feast highlights the value of hard work or diligence of St. Joseph among the many other values.

St. Joseph is a hard working Saint who worked hard not only in spiritual level but also in physical level to bring forth his family. He was a carpenter and he did his work with full dedication and honesty. His life was the life surrendered for his family.

St. Joseph is an inspiration for all of us who teaches us that a person can be hard working along with the righteousness quality in him/her. We do not know much about his childhood life but we come to know him as a righteous man and the protector of his family in the midst of the event of Jesus’ birth. St. Joseph is an ideal Father of the Holy Family. St. Joseph is an ideal for the people who do hard work in their lives.

In today’s feast let us pray for our family especially for the leader of the family, who through the hard work and sacrifices upbrings the family and offers his life for the protection of his family. May St. Joseph bless all those fathers as the ideal fathers.

✍ -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!