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10 अगस्त का पवित्र वचन

 

10 अगस्त 2020
सन्त लोरेन्स

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📒 पहला पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 9:6-10

6) इस बात का ध्यान रखें कि जो कम बोता है, वह कम लुनता है और जो अधिक बोता है, वह अधिक लुनता है।

7) हर एक ने अपने मन में जिनता निश्चित किया है, उतना ही दे। वह अनिच्छा से अथवा लाचारी से ऐसा न करे, क्योंकि ‘‘ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है’’।

8) ईश्वर आप लोगों को प्रचुर मात्रा में हर प्रकार का वरदान देने में समर्थ है, जिससे आप को कभी किसी तरह की कोई कमी नहीं हो, बल्कि हर भले काम के लिए चन्दा देने के लिए भी बहुत कुछ बच जाये।

9) धर्मग्रन्थ में लिखा है- उसने उदारतापूर्वक दरिद्रों को दान दिया है, उसकी धार्मिकता सदा बनी रहती है।

10) जो बोने वाले को बीज और खाने वाले को भोजन देता है, वह आप को बोने के लिए बीज देगा, उसे बढ़ायेगा और आपकी उदारता की अच्छी फसल उत्पन्न करेगा।

📙 सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 12:24-26

24) मैं तुम लोगो से यह कहता हूँ- जब तक गेंहूँ का दाना मिटटी में गिर कर नहीं मर जाता, तब तक वह अकेला ही रहता है; परंतु यदि वह मर जाता है, तो बहुत फल देता है।

25) जो अपने जीवन को प्यार करता है, वह उसका सर्वनाश करता है और जो इस संसार में अपने जीवन से बैर करता है, वह उसे अनंत जीवन के लिये सुरक्षित रखता है।

26) यदि कोई मेरी सेवा करना चाहता है तो वह मेरा अनुसरण करे। जहाँ मैं हूँ वहीं मेरा सेवक भी होगा। जो मेरी सेवा करेगा, मेरा पिता उस को सम्मान प्रदान करेगा।

📚 मनन-चिंतन

आज हम आत्म समर्पण और त्याग के सदगुण पर मनन-चिंतन करते हैं। आज के पहले पाठ में सन्त पौलुस हमें बताते हैं कि ‘ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है,’ और सुसमाचार में प्रभु येसु उनकी प्रशंसा करते हैं जो ईश्वर के राज्य के लिए और लोगों की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। प्रभु येसु गेहूँ के दाने का उदाहरण देते हैं जो अकेला रहता है लेकिन जब वह मिट्टी में गिरकर मर जाता है, अपने आप को बलिदान कर देता है, तो बहुत फल देता है।

दुनिया में ऐसे बहुत से लोगों के उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने जीवन से बहुत प्यार किया और उसे सुरक्षित रखना चाहा लेकिन उन्हें उसे खो दिया, और वे भुला दिये गये। वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों के भी अनेक उदाहरण हैं, जिन्होंने ईश्वर और मानव सेवा में अपना जीवन क़ुर्बान कर दिया और दुनिया की नज़रों में “खो दिया” लेकिन ईश्वरीय दृष्टि में अपना सुरक्षित रखा जो आज भी यादों में जीवित हैं। उन्हीं में से एक हैं संत लॉरेन्स जिनका पर्व आज हम मनाते हैं।

वह सन 258 ईसवीं में सन्त पापा सिक्स्तुस द्वितीय के समय में उपयाजक थे और कलिसिया की सम्पत्ति के इंचार्ज थे, ख्रिस्तियों पर अत्याचार के समय जब रोम के शासक ने लॉरेन्स से कलिसिया की सारी सम्पत्ति को सौंपने के लिए कहा तो उन्होंने सारी सम्पत्ति ग़रीबों और जरूरतमंदो, लाचारों और अनाथों में बाँट दी और उन्हें शासक के सामने यह कहते हुए प्रस्तुत कर दिया कि यही है कलिसिया की असली सम्पत्ति। उन्होंने ईश्वर और लोगों की सेवा के लिए अपना जीवन क़ुर्बान कर दिया। ना केवल उन्होंने सांसारिक सम्पत्ति को दान कर दिया बल्कि अपना जीवन भी विश्वास की ख़ातिर दे दिया। इसी तरह के शहीद संतों के बलिदान द्वारा कलिसिया का विश्वास फल-फूलता और सौ गुना फल उत्पन्न करता है।


📚 REFLECTION

Today we are invited to reflect on the virtue of self-giving or self sacrifice. St.Paul, in the first reading, tells us that God loves a cheerful giver, and in the gospel, Jesus praises those who give their lives in the service of God and humanity. Jesus gives the example of the grain of wheat which remains single and of not much use, but If it is falls in the soil and sacrifices itself it bears much fruit.

There are so many people who loved themselves and tried to preserve their lives but lost it, and are forgotten. And on the other hand there are many examples of such people who gave their lives in the service of God and others and in worldly sense “lost their lives” but in reality they saved their lives and are still living with us in memory. One of them is St. Lawrence whose feast we celebrate today.

He was the in-charge of the church property and when asked by the prefect of Rome to surrender the property, he distributed it to the destitute and presented them before the prefect. He was martyred for God and people. He not only gave the worldly wealth away but also gave his life for faith. It is because of the sacrifice of the martyrs that Christian faith flourishes and their sacrifice bears much fruits.

✍ Br. Biniush Topno




9 अगस्त का पवित्र वचन

 

09 अगस्त 2020
वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ :राजाओं का पहला ग्रन्थ 19:9a.11-13a

9) एलियाह होरेब पर्वत के पास पहुँचा और एक गुफा के अन्दर चल कर उसने वहाँ रात बितायी।

11) प्रभु ने उस से कहा, ‘‘निकल आओ, और पर्वत पर प्रभु के सामने उपस्थित हो जाओ“। तब प्रभु उसके सामने से हो कर आगे बढ़ा। प्रभु के आगे-आगे एक प्रचण्ड आँधी चली- पहाड़ फट गये और चट्टानें टूट गयीं, किन्तु प्रभु आँधी में नहीं था। आँधी के बाद भूकम्प हुआ, किन्तु प्रभु भूकम्प में नहीं था।

12) भूकम्प के बाद अग्नि दिखई पड़ी, किन्तु प्रभु अग्नि में नहीं था। अग्नि के बाद मन्द समीर की सरसराहट सुनाई पड़ी।

13) एलियाह ने यह सुनकर अपना मुँह चादर से ढक लिया और वह बाहर निकल कर गुफा के द्वार पर खड़ा हो गया।

📕 दूसरा पाठ : रोमियों 9: 1-5

1) मैं मसीह के नाम पर सच कहता हूँ और मेरा अन्तःकरण पवित्र आत्मा से प्रेरित हो कर मुझे विश्वास दिलाता है कि मैं झूठ नहीं बोलता-

2) मेरे हृदय में बड़ी उदासी तथा निरन्तर दुःख होता है।

3) मैं अपने रक्त-सम्बन्धी भाइयों के कल्याण के लिए मसीह से वंचित हो जाने के लिए तैयार हूँ।

4) वे इस्राएली हैं। ईश्वर ने उन्हें गोद लिया था। उन्हें ईश्वर के सान्निध्य की महिमा, विधान, संहिता, उपासना तथा प्रतिज्ञाएं मिली है।

5) कुलपति उन्हीं के हैं और मसीह उन्हीं में उत्पन्न हुए हैं। मसीह सर्वश्रेष्ठ हैं तथा युगयुगों तक परमधन्य ईश्वर हैं। आमेन।

📙 सुसमाचार :मत्ती 14:22-33

22) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा करदेंगे।

23) ईसा लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढे़। सन्ध्या होने पर वे वहाँ अकेले थे।

24) नाव उस समय तट से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।

25) रात के चैथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।

26) जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते हुए देखा, तो वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, ’’यह कोई प्रेत है‘‘, डर के मारे चिल्ला उठे।

27) ईसा ने तुरन्त उन से कहा, ’’ढारस रखो; मैं ही हूँ। डरो मत।‘‘

28) पेत्रुस ने उत्तर दिया, ’’प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की अज्ञा दीजिए‘‘।

29) ईसा ने कहा, ’’आ जाओ‘‘। पेत्रुस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा;

30) किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, ’’प्रभु! मुझे बचाइए’’।

31) ईसा ने तुरन्त हाथ बढ़ा कर उसे थाम लिया और कहा, ’’अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?’’

32) वे नाव पर चढे और वायु थम गयी।

33) जो नाव में थे, उन्होंने यह कहते हुए ईसा को दण्डवत् किया ’’आप सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं’’।

📚 मनन-चिंतन

आज के पाठ हमें ईश्वर के स्वभाव के दर्शन कराते हैं। पहले पाठ में हम नबी एलियस को देखते हैं जो आँधी-तूफ़ान या भूकम्प या अग्नि में ईश्वर के दर्शन नहीं करते बल्कि मंद समीर के झोंके में ईश्वर को पाते हैं। दूसरे पाठ में सन्त पौलुस अपने इस्राएली भाइयों के लिए दुःख व्यक्त करते हैं कि उनके पास सब कुछ था, वे चुनी हुई प्रजा थे लेकिन फिर भी उन्होंने प्रभु ख्रिस्त को नहीं स्वीकारा जो सदा सर्वदा सारी सृष्टि के प्रभु और उद्धारकर्ता हैं। आज का सुसमाचार हमें प्रभु येसु की झलक दिखलाता है, समुद्र और वायु भी जिनके वश में है, वह ना केवल सारी मानव जाति के बल्कि समस्त प्राकृतिक शक्तियों के भी प्रभु हैं।

प्रेरित संत थोमस जो सुसमाचार प्रचार के लिए हमारे देश भारत आए थे, उनके बारे में एक दिलचस्प घटना प्रचलित है। यह घटना उस समय घटी जब वह केरल प्रान्त के पालयुर नामक स्थान पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि तालिकुलम (तालाब) में कुछ पुजारी लोग सूर्य देवता को तर्पण कर रहे थे। उसने उनसे पूछा कि सूर्य देवता उनके तर्पण को स्वीकार क्यों नहीं कर रहे क्योंकि जल नीचे गिर जाता था। लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा सम्भव नहीं है कि जल नीचे ना आये, तब सन्त थोमस ने कुछ जल लिया और उसे ऊपर की ओर उछाला और जल की बूँदे चमकते मोतियों की तरह बीच हवा में ही ठहर गयीं। तब उन ब्राह्मण पुजारियों ने सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास किया, जो सारी सृष्टि का संचालन करता है, और जिसके वश में सब कुछ, सूर्य, चंद्रमा धरती आदि है। वह तालाब, वह स्थान और वह चर्च जिसकी स्थापना सन्त थोमस ने की, आज भी केरल में विध्यमान है।

सारी सृष्टि को बनाने के बाद ईश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की। ईश्वर ने मनुष्य को सृष्टि में उसकी देख-भाल करने के लिए बनाया, लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य शक्ति का भूखा, स्वार्थी और लालची बनता गया। उसने सृष्टि को अपने वश में करना प्रारम्भ कर दिया, प्रकृति और जीव-जंतुओं पर राज करना शुरू कर दिया। यह क्रम आज भी जारी है, और इसी कारण कभी-कभी प्रकृति मनुष्य के विरुद्ध उठ खड़ी होती है, और भारी विनाश करती है जो मनुष्य के सामर्थ्य से परे है। मनुष्य प्राकृतिक शक्तियों से डरना शुरू कर देता है और ईश्वर की बनायी हुई प्रकृति को ईश्वर की तरह मानने लगता है, यहाँ तक कि ईश्वर के स्थान पर प्रकृति की ही पूजा करने लगता है। जहाँ उसे ईश्वर से डरना चाहिए, वह ईश्वर द्वारा बनयी हुई चीज़ों से डरने लगता है। ईश्वर सब कुछ को अपने वश में करता और सब कुछ का संचालन करता है; मनुष्य नहीं, प्राकृतिक शक्तियाँ नहीं, बल्कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ही सब कुछ का स्वामी है।

प्रकृति के द्वारा हम उसके रचियेता के दर्शन कर सकते हैं, लेकिन हमें सृष्टि की नहीं सृष्टिकर्ता की पूजा-आराधना करनी है। हम सन्त पेत्रुस को देखते हैं जो हमेशा सबसे आगे रहता है, अपने विश्वास की घोषणा करने में, प्रभु येसु द्वारा कोई सवाल करने पर उसका जवाब देने में भी सबसे आगे रहता है। आज के सुसमाचार में वह प्रभु येसु की तरह पानी पर चलना चाहता है, लेकिन जब वह तूफ़ान और उमड़ती लहरों को देखता है तो उसका ध्यान प्रभु येसु से हटकर समुद्र और लहरों पर (सृष्टिकर्ता से हटकर सृष्टि की ओर) चला जाता है और वह डगमगा जाता है, और डूबने लगता है। आइए हम अपना विश्वास प्रभु में रखें और उसी से डरें। हमारा ध्यान सब कुछ के सृष्टिकर्ता और स्वामी पर हो ना कि उसकी बनायी हुई वस्तुओं पर। आइए हम प्रभु येसु को अपने जीवन का और हम जो कुछ भी करते हैं, उस सब का स्वामी बनायें और हमारे जीवन की सारी आँधी और तूफ़ान अपने आप थम जाएँगे। आमेन।



📚 REFLECTION

Today’s readings give a glimpse of the nature of God. In the first reading we see prophet Elijah encounters God not in strong heavy winds, or in earthquake or fire but in a tiny whispering sound. In the second reading St. Paul expresses his anguish for his brethren Israelites for having everything, being specially chosen people and yet they could not accept Christ, the master and God forever. The gospel gives us the glimpse of Jesus being the master of the sea and winds and Lord of not only humanity but even of the powerful natural forces.

There is very interesting story of St. Thomas, the apostle who was sent to India, when he reached a place called Palayur in Kerala. He saw some Brahmins doing Tarpanam (offering water to the sun god) in Talikulam. He asked them why their offering was not accepted by the sun god, because the water came down. But they said it is not possible, then St. Thomas took water and threw it up, and it remained up, like glittering drops. The Brahmins then believed in Almighty God, who controls whole creation, even sun, moon and earth. The place, the pond and church he established are still there in Kerala.

Man was created after the whole beautiful creation. He was placed amidst the creation to take care of the creation, but slowly he became ambitious and power crazy. He started to subdue the creation, control the nature and creatures. It continues even today, and because of that sometimes creation retorts and goes beyond man’s control. Man starts fearing the natural forces and even stars treating God’s creation like god, replacing the True God. Where he should fear God, he fears created things. It is God who controls everything; it is not man, it is not natural forces, it is God, the master of the universe.

Through the creation we can encounter the creator, but it is the creator whom we need to worship. We see Peter who was always forward and proclaiming his faith, and answering all questions before anybody else could. In the gospel today he happily wants to walk on water like Jesus, but when he looks at the fierce winds and waves, his focus changes from Jesus to the sea and waves (from creator to the creation), and he starts stumbling. Let us put our trust in God, fear Him alone. Let our focus be the creator and master of everything rather than his created things. Let us make Jesus as the master of our lives and everything that we do, and all storms and waves will be calmed down. Amen.


मनन-चिंतन - 2

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि जब शिष्य समुद्र में नाव से उस पार जा रहे थे, तब अचानक समुद्र में तूफ़ान आ जाता है। शिष्य उन तूफ़ानी लहरों और प्रचण्ड वायु का सामना करते हैं और पूरी कोशिश करते हैं कि किसी तरह उस पार पहुँच सकें लेकिन वे अपने इस प्रयास में असफल रहते हैं क्योंकि वायु प्रतिकूल थी और शिष्य भयभीत थे कि कहीं वह डूब न जाये, उनकी मृत्यु न हो जाये। साथ ही साथ इस विकट परिस्थिति में नाव में येसु उनके साथ उपस्थित नहीं थे। शिष्यों के सामने खतरा मंडराने लगा था, परन्तु प्रभु येसु समुद्र पर चल कर उन्हें बचाने आते हैं और उन्हें इस विपरीत परिस्थिति से बाहर निकालते हैं।

हमारी जिन्दगी भी चारों तरफ़ तूफ़ानों व अनेक प्रकार की समस्याओं से घिरी हुयी है। हम भी बार-बार इससे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं, घंटों इसी बारे में सोचते रहते हैं, चिंता में डूबे रहते तथा कई बार अपनी समस्याओं का हल खोजने के लिए दूसरों के पास जाते हैं, एवं जब समस्या का समाधान नहीं हो पाता, तब हम हमेशा चिंता व तनाव अपने जीवन में महसूस करते हैं कि आगे भविष्य में क्या होगा। हम भी समस्या, संकट आने पर शिष्यों की तरह घबरा जाते हैं।

शिष्यों का अविश्वास पेत्रुस में प्रकट होता है। वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, ’’प्रभु! मुझे बचाइए’’ (मत्ती 14:30)। प्रभु का सवाल - “अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?” (मत्ती 14:31)– यह दर्शाता है कि विश्वास और सन्देह एक दूसरे के विपरीत है। जहाँ विश्वास है, वहाँ सन्देह नहीं हो सकता। सन्देह विश्वास की कमी को दर्शाता है। यह ईश्वर पर विश्वास, दूसरों पर विश्वास और आत्मविश्वास के बारे में सच है। जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं वे ईश्वर पर सन्देह नहीं करते हैं; जो दूसरों पर विश्वास करते हैं, वे दूसरों पर शक नहीं करते हैं और जो अपनी क्षमता पर विश्वास करते हैं, वे अपनी क्षमता पर सन्देह नहीं करते हैं। वास्तव दूसरों एवं स्वयं पर विश्वास भी हमारे ईश्वरीय विश्वास पर निर्भर करता है। जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं, वे जानते और मानते हैं कि सब कुछ ईश्वर पर निर्भर है, ईश्वर मेरी भलाई चाहते हैं और ईश्वर की अनुमति के बिना मुझ पर कुछ नहीं बीतेगा।

निर्गमन ग्रन्थ 14:30-31 में हम पढ़ते हैं, “ उस दिन प्रभु ने इस्राएलियों को मिस्रियों के हाथ से छुड़ा दिया। इस्राएलियों ने समुद्र के किनारे पर पड़े हुए मरे मिस्रियों को देखा। इस्राएली मिस्रियों के विरुद्ध किया हुआ प्रभु का यह महान् कार्य देख कर प्रभु से डरने लगे। उन्होंने प्रभु में और उसके सेवक मूसा में विश्वास किया।” इस्राएली लोग ईश्वर पर विश्वास करने के साथ-साथ मूसा पर भी विश्वास करने लगते हैं।

जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं, उनका आत्मविश्वास भी मज़बूत होता है। उन्हें मालूम होता है कि ईश्वर उन्हें प्यार करते हैं और उनकी सहायता करते हैं। रोमियों 8:28 में संत पौलुस कहते हैं, “हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है”।

एक दूसरे पर शक करने के कारण कितने रिश्ते टूटते हैं, कितने परिवारों में अशांति फैल जाती है। स्वयं पर सन्देह करने के कारण कितने लोग परीक्षा में अनुत्तीर्ण होते हैं, इन्टर्व्यू ठीक से नहीं दे पाते हैं, प्रतियोगिताओं में पीछे रह जाते हैं।

ईश्वर का अनुभव हमारे ईश्वर पर, दूसरों पर और स्वयं पर विश्वास को बढ़ाता है। प्रभु ने अपना अनुभव देकर संत थॉमस के विश्वास को बढ़ाया। अकसर हम संत थॉमस को अविश्वासी शिष्य कहते हैं। वास्तव में सभी शिष्य अविश्वासी थे। मारकुस 16:9-13 में हम पढ़ते हैं, “ईसा सप्ताह के प्रथम दिन प्रातः जी उठे। वे पहले मरियम मगदलेना को, जिस से उन्होंने सात अपदूतों को निकाला था, दिखाई दिये। उसने जा कर उनके शोक मनाते और विलाप करते हुए अनुयायियों को यह समाचार सुनाया। किन्तु जब उन्होंने यह सुना कि ईसा जीवित हैं और उसने उन्हें देखा है, तो उन्हें इस पर विश्वास नहीं हुआ। इसके बाद ईसा दूसरे वेश में उन में दो को दिखाई दिये, जो पैदल देहात जा रहे थे। उन्होंने लौट कर शेष शिष्यों को यह समाचार सुनाया, किन्तु शिष्यों को उन दोनों पर भी विश्वास नहीं हुआ।”

प्रभु हमें बताते हैं कि विश्वास में कितनी ताकत है – “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम्हें विश्वास हो और तुम संदेह न करो, तो तुम न केवल वह करोगे, जो मैं अंजीर के पेड़ के साथ कर चुका हूँ, बल्कि यदि तुम इस पहाड़ से यह कहो - ’उठ, समुद्र में गिर जा’, तो वैसा ही हो जायेगा। और जो कुछ तुम विश्वास के साथ प्रार्थना में माँगोगे, वह तुम्हें मिल जायेगा।’’ (मत्ती 21:21-22)

ईश्वर का अनुभव हमारे विश्वास को बढ़ाता है। हम प्रभु से विनती करें कि वे अपना अनुभव हमें प्रदान कर हमारे विश्वास को बढ़ायें।

✍️-Br.  Biniush Topno





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8 अगस्त का पवित्र वचन

 

08 अगस्त 2020
वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : हबक्कूक 1:12-2:4

12) प्रभु! क्या तू प्राचीन काल से मेरा परमपावन अमत्र्य ईश्वर नहीं है? प्रभु! तूने अपनी दण्डाज्ञा को पूरा करने के लिए उस खल्दैयी जाति को नियुक्त किया है। हमारी चटटान! तूने हमें दण्डित करने के लिए उसे खडा किया है।

13) बुराई तेरी पवित्र आँखों में गडती हैं, अन्याय तुझ से नहीं देखा जाता। तो, तू दुष्टों का विश्वासघात क्यों सहता है? जब वे धमियों को निगल जाते हैं, तो तू यह देख कर क्यों चुप रहता है?

14) तू मनुष्यों के साथ ऐसा व्यवहार करता है, मानों वे समुद्र की मछलियाँ हों अथवा रेंगेने वाले जीव-जन्तु, जिनका कोई स्वामी नहीं।

15) खल्दैयी उन्हें कँटिया से निकलता, जाल से खींच लेता और अपने टोकरे में जमा करता है।

16) तब वह उल्लसित हो कर आनन्द मनाता है, अपने जाल की पूजा करता और अपने टोकरे को धूप चढाता है; क्योंकि इनके सहारे वह श्किार फँसाता और अपनी जीविका चलाता है।

17) क्या वह सदा अपनी तलवार खींच कर निर्दयतापूर्वक राष्ट्रों का वध करता रहेगा?

2:1) मैं अपनी चैकी पर खड़ा हो जाऊँगा, मैं चारदीवारी पर चढ कर प्रतीक्षा करता रहूँगा कि प्रभु मुझ से क्या कहेगा और मेरी शिकायतों का क्या उत्तर देगा।

2) प्रभु ने उत्तर में मुझ से यह कहा, "जो दृश्य तुम देखने वाले हो, उसे स्पष्ट रूप से पाटियों पर लिखो, जिससे सब उसे सुगमता से पढ सकें;

3) क्योंकि वह भविय का दृश्य है, जो निश्चित समय पर पूरा होने वाला है। यदि उस में देर हो जाये, तो उसकी प्रतीक्षा करते रहो, क्योंकि वह अवश्य ही पूरा हो जायेगा। जो दृष्ट है, वह नष्ट हो जायेगा।

4) जो धर्मी है, वह अपनी धार्मिकता के कारण सुरक्षित रहेगा।

📙 सुसमाचार :मत्ती 17:14-20

14) जब वे जनसमूह के पास पहुँचे, तो एक मनुष्य आया और ईसा के सामने घुटने टेक कर बोला,

15) प्रभु! मेरे बेटे पर दया कीजिए। उसे मिरगी का दौरा पड़ा करता है। उसकी हालत बहुत ख़राब है और वह अक्सर आग या पानी में गिर जाता है।

16) मैं उसे आपके शिष्यों के पास लाया, किन्तु वे उसे चंगा नहीं कर सके।’’

17) ईसा ने कहा, ’’अविश्वासी और दुष्ट पीढ़ी! मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूँ? कब तक तुम्हें सहता रहूँ? उस लड़के को यहाँ ले आओ।’’

18) ईसा ने अपदूत को डांटा और वह लड़के से निकल गया। वह लड़का उसी घड़ी चंगा हो गया।

19) बाद में शिष्यों ने एकान्त में ईसा के पास आ कर पूछा, ’’हम लोग उसे क्यों नहीं निकाल सके?

20) ईसा ने उन से कहा, ’’अपने विश्वास की कमी के कारण। मैं तुम से यह कहता हूँ- यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो और तुम इस पहाड़ से यह कहो, ’यहाँ से वहाँ तक हट जा, तो यह हट जायेगा; और तुम्हारे लिए कुछ भी असम्भव नहीं होगा।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम एक अपदूतग्रस्त लड़के को, जो खुद को कभी में झोंक देता था तो कभी पानी में डूबना चाहता था, उसको चंगा ना कर पाने की शिष्यों की असमर्थता को देखते हैं। प्रभु येसु उनकी इस असमर्थता को उन्हें समझाते हैं और उसका कारण बताते हैं। उसका कारण था- उनमें विश्वास की कमी। विश्वास की कई परिभाषाएँ और मायने हो सकते हैं । ईश शास्त्र में विश्वास की परिभाषा है कि ‘यह ईश्वर के प्रकटिकरण के प्रति हमारा प्रत्युत्तर है” कुछ लोगों के अनुसार विश्वास का मतलब ईश्वर पर भरोसा रखने से है, और कुछ लोगों के अनुसार ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध ही हमारा विश्वास कहलाता है। विश्वास के चाहे जो भी मायने हों, लेकिन एक बात साफ़ है कि विश्वास ‘व्यक्तिगत’ है, अर्थात् अलग-अलग लोगों का विश्वास अलग-अलग है।

आइए हम आज के सुसमाचार की घटना को गहराई से समझें। वह लड़का बड़ी हिंसक बीमारी से पीड़ित था। उसको नियंत्रित करना मुश्किल था, वह आग में कूदकर और पानी में डूबकर अपने आप को नष्ट करना चाहता था। ऐसा काफ़ी लम्बे समय से उसके साथ चल रहा था और उस लड़के के परिवार वालों के लिए यह बहुत ही दुःखद परिस्थिति थी। यह अन्य दूसरी समान्य बीमारियों जैसे कोढ़, बुख़ार, और अपंगता आदि बीमारियों से अलग थी। यह शिष्यों के लिए कठिन परीक्षा थी। ऐसी विकट परिस्थिति को देखकर शिष्य यह भूल गए कि वे प्रभु येसु के शिष्य थे, जो सारी सृष्टि का स्वामी है, उसने उन्हें हर प्रकार की बीमारी को चंगा करने का सामर्थ्य दिया है, फिर भी उन्हें खुद पर पर्याप्त भरोसा नहीं था। अपने जीवन में हम बड़ी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करेंगे और हो सकता है ऐसी परिस्थितियों का भी जो हमारे नियंत्रण से भी बाहर हों, लेकिन प्रभु येसु हमें याद दिलाते हैं कि हमें ईश्वर में विश्वास करना है, वही सब कुछ को वश में कर सकता है। आमेन।


📚 REFLECTION

In the gospel today we see the inability of the disciples to heal an epileptic boy, who threw himself in fire, and water, and was terribly troubled. Jesus answers about their inability do the miracle, and that reason was the lack of their faith. Faith has got many definitions and understandings. Theological definition of faith would say, ‘faith is our response to God’s revelation,’ some would say it is trusting God, and some others would say it is our relationship with God. Whatever may be the understanding, but one thing is clear that faith is something ‘personal.’

Let us evaluate today’s incident. The boy was suffering with very violent sickness. He was difficult to control, he was ready to destroy himself by throwing himself into fire or trying to get drowned in the water. This was going on for long time, and it was terrible. It was different from routine sicknesses like fever, or leprosy or handicap. It was a test for the disciples. Seeing this terrible situation, the disciples forgot that they were the disciples of Jesus, the master of everything, they were given the power to heal anything, yet they had no sufficient confidence. We may face very challenging situations in our lives, and very often impossible ones, but Jesus reminds us that we need to have faith in God, He can control and take care of everything. Amen.

✍ -Br.Biniush Topno










7 अगस्त का पवित्र वचन

  
🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : नहूम 2:1,3; 3:1-3,6-7

1) देखो! सन्देशवाहक पर्वतों पर आ रहा है, वह शांति घोषित करने आ रहा है। यूदा! अपने पर्व मनाओ और अपनी मन्नतें पूरी करो। कुकर्मी फिर कभी तुझ पर आक्रमण नहीं करेगा- उसका सर्वनाश हो गया है।

3) लुटेरों ने याकूब और इस्राएल को उजाडा और उनकी दाखबारियों को नष्ट किया है, किन्तु प्रभु याकूब और इस्राएल को उनका प्राचीन वैभव लौटा देगा।

3:1) धिक्कार है रक्तपिपासु निनीवे को! वह झूठ और लूट से कुट-कूट कर भरा हुआ है और लूटपाट से बाज नहीं आता।

2) सुनो-चाबुक की फटकार, पहियों की खडखडाहट, घोड़ों की टाप और रथों की घरघराहट।

3) देखो-घोड़ों का सरपट, तलवारों की दमक और भालों की चमक। कितने ही घायल और कितने ही मारे हुए! असंख्य शव पडे हुए हैं- लोग उन पर ठोकर खा कर गिर रहे हैं।

6) मैं तझ पर कीचड उछालूँगा, तुझे अपमानित करूँगा और काठ में तरे पांव जकड दूँगा।

7) जो तुझ पर दृष्टि डालेगा, वह मुँह फेर कर कहेगा- ''निनीवे का सर्वनाश हो गया है। कौन उस पर दया करेगा? तुझे सान्त्वना देने वालों को में कहाँ से ले आऊँ?''

📙 सुसमाचार : मत्ती 16:24-28

24) इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले;

25) क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा।

26) मनुष्य को इस से क्या लाभ यदि वह सारा संसार प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन गँवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता है?

27) क्योंकि मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों के साथ अपने पिता की महिमा-सहित आयेगा और वह प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्म का फल देगा।

28) मैं तुम से कहता हूँ - यहाँ कुछ ऐसे लोग विद्यमान हैं, जो तब तक नहीं मरेंगे, जब तक वे मानव पुत्र को राजकीय प्रताप के साथ आता हुआ न देख लें।"

📚 मनन-चिंतन

आज हम प्रभु येसु का आह्वान सुनते हैं जिसमें वह वह हमसे आत्मत्याग करने और अपना क्रूस लेकर उनका अनुसरण करने के लिए कहते हैं। आगे वह हमें भरोसा दिलाते हैं कि यदि हमें अपना जीवन सुरक्षित रखना है तो उसे प्रभु के लिए समर्पित करना होगा। इसमें कोई फ़ायदा नहीं कि हम सब कुछ प्राप्त कर लें लेकिन अपनी आत्मा के लिए कुछ भी ना पाएँ। प्रभु येसु का अनुसरण करने के लिए यह कुछ बहुत कड़वी शिक्षा और चुनौती है।

प्रभु येसु का अनुसरण करने से पहले शिष्य बनने की तीन शर्तें हैं, जो हमें जाननी हैं। पहली शर्त या प्रभु येसु का शिष्य बनने का पहला चरण है आत्मत्याग। इसका मतलब है कि हम नगण्य हैं, कुछ भी नहीं हैं। अगर हमारा अस्तित्व नहीं है, तो किसका अस्तित्व है? हममें प्रभु येसु का अस्तित्व होना है, संत पौलुस के शब्दों को याद कीजिए- “…अब मैं जीवित नहीं रहा बल्कि मसीह मुझमें जीवित हैं…”( गलातियों 2:20)। पहले कदम के बाद शिष्य बनने के लिए दूसरा कदम आता है और वह है, अपना क्रूस उठाना। हमारा क्रूस हमारे दिन-प्रतिदिन की कठिनाइयाँ, दुःख-तकलीफ़ें और कष्ट हो सकते हैं, ऐसे लोग हो सकते हैं जो हमारी समझ से बाहर हैं, ऐसी परिस्थितियों का हमें आत्मत्याग की भावना के साथ त्याग करना है। यदि आत्मत्याग का पहला कदम सही से नहीं रखा तो दूसरा कदम उससे भी अधिक कठिन होगा और तीसरा कदम जो प्रभु येसु का अनुसरण करना है वह पहले और दूसरे कदम के बिना असम्भव होगा। यानी कि आत्मत्याग और क्रूस उठाए बिना हम प्रभु येसु का अनुसरण नहीं कर सकते। प्रभु येसु का अनुसरण करने का मतलब है, सब कुछ में उन्हीं के जैसे बनना, उनका मनोभाव, उनका करुण स्वभाव, उनका समर्पण, लोगों के प्रति उनका प्रेम और उनकी त्याग की भावना को अपनाना होगा।आइए हम ईश्वर से प्रभु येसु के सच्चे शिष्य बनने की कृपा माँगें और अपने जीवन को प्रभु के लिए सुरक्षित रखें। आमेन।



📚 REFLECTION

Today we hear Jesus inviting us to deny ourselves, take up the cross and follow him. Further, he assures us that if we have to preserve our life we must lose it for him, and there is no use in gaining whole world and losing our life without any spiritual gain. These are some of the very bitter and challenging conditions to be the true disciple of Jesus or to follow him.

There are three steps to discipleship before we start following him. First step is to deny oneself. This means that you are nothing. You don’t exist in you, then who exists? Christ must exist in you, remember the words of St. Paul, “…it is no longer I who live, but Christ who lives in me…” (Gal.2:20). After the first step comes second one which is to take up the cross. The cross could be our daily challenges, difficulties, situations and people that we don’t understand, we need to face them with same attitude of self-denial. If the first step of self-denial is not taken efficiently, second will be much difficult, third step which is following Jesus, will be almost impossible without the other two steps. Following Jesus would mean being like him in everything, his attitude, his compassion, his dedication, his love for people, his spirit of sacrifice. Let us pray to God to bless us with the grace to be his true disciple and find meaning for our lives. Amen.

✍ Br. Biniush Topno




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6 अगस्त का पवित्र वचन

06 अगस्त 2020

येसु के रूपान्तरण का पर्व

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : दानिएल 7:9-10, 13-14

9) मैं देख ही रहा था कि सिंहासन रख दिये गये और एक वयोवृद्ध व्यक्ति बैठ गया। उसके वस्त्र हिम की तरह उज्जवल थे और उसके सिर के केश निर्मल ऊन की तरह।

10) उसका सिंहासन ज्वालाओं का समूह था और सिहंासन के पहिये धधकती अग्नि। उसके सामने से आग की धारा बह रही थी। सहस्रों उसकी सेवा कर रहे थे। लाखों उसके सामने खड़े थे। न्याय की कार्यवाही प्रारंभ हो रही थी। और पुस्तकें खोल दी गयीं।

13) तब मैंने रात्रि के दृश्य में देखा कि आकाश के बादलों पर मानवपुत्र-जैसा कोई आया। वह वयोवृद्ध के यहाँ पहुँचा और उसके सामने लाया गया।

14) उसे प्रभुत्व, सम्मान तथा राजत्व दिया गया। सभी देश, राष्ट्र और भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी उसकी सेवा करेंगे। उसका प्रभुत्व अनन्त है। वह सदा ही बना रहेगा। उसके राज्य का कभी विनाश नहीं होगा।

📕 दूसरा पाठ :1पेत्रुस 1: 16-19

16) जब हमने आप लोगों को अपने प्रभु ईसा मसीह के सामर्थ्य तथा पुनरागमन के विषय में बताया, तो हमने कपट-कल्पित कथाओं का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपनी ही आंखों से उनका प्रताप उस समय देखा,

17) जब उन्हें पिता-परमेश्वर के सम्मान तथा महिमा प्राप्त हुई और भव्य ऐश्वर्य में से उनके प्रति एक वाणी यह कहती हुई सुनाई पड़ी, ’’यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।’’

18) जब हम पवित्र पर्वत पर उनके साथ थे, तो हमने स्वयं स्वर्ग से आती हुई यह वाणी सुनी।

19) इस घटना द्वारा नबियों की वाणी हमारे लिए और भी विश्वसनीय सिद्ध हुई। इस पर ध्यान देने में आप लोगों का कल्याण है, क्योंकि जब तक पौ नहीं फटती और आपके हृदयों में प्रभात का तारा उदित नहीं होता, तब तक नबियों की वाणी अंधेरे में चमकते हुए दीपक के सदृश है।

📙 सुसमाचार : लूकस 9:28-36

28) इन बातों के करीब आठ दिन बाद ईसा पेत्रुस, योहन और याकूब को अपने साथ ले गये और प्रार्थना करने के लिए एक पहाड़ पर चढ़े।

29) प्रार्थना करते समय ईसा के मुखमण्डल का रूपान्तरण हो गया और उनके वस्त्र उज्जवल हो कर जगमगा उठे।

30) दो पुरुष उनके साथ बातचीत कर रहे थे। वे मूसा और एलियस थे,

31) जो महिमा-सहित प्रकट हो कर येरूसालेम में होने वाली उनकी मृत्यु के विषय में बातें कर रहे थे।

32) पेत्रुस और उसके साथी, जो ऊँघ रहे थे, अब पूरी तरह जाग गये। उन्होंने ईसा की महिमा को और उनके साथ उन दो पुरुषों को देखा।

33) वे विदा हो ही रहे थे कि पेत्रुस ने ईसा से कहा, "गुरूवर! यहाँ होना हमारे लिए कितना अच्छा है! हम तीन तम्बू खड़ा कर दें- एक आपके लिए, एक मूसा और एक एलियस के लिए।" उसे पता नहीं था कि वह क्या कह रहा है।

34) वह बोल ही रहा था कि बादल आ कर उन पर छा गया और वे बादल से घिर जाने के कारण भयभीत हो गये।

35) बादल में से यह वाणी सुनाई पड़ी, "यह मेरा परमप्रिय पुत्र है। इसकी सुनो।"

36) वाणी समाप्त होने पर ईसा अकेले ही रह गये। शिष्य इस सम्बन्ध में चुप रहे और उन्होंने जो देखा था, उस विषय पर वे उन दिनों किसी से कुछ नहीं बोले।

📚 मनन-चिंतन

आज माता कलिसिया प्रभु येसु के रूपांतरण का पर्व मनाती है। प्रभु येसु अपने तीन सबसे प्रिय शिष्यों को अपने साथ एक ऊँचे पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहाँ उनकी उपस्थिति में उनका रूपांतरण हो जाता है। नबी मूसा और एलियस आकर उनसे चर्चा करते हैं और अंत में पिता ईश्वर की वाणी यह कहते हुए सुनाई देती है, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ, इसकी सुनो।”

यह घटना प्रभु येसु के मानव जीवन की बहुत महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। हालाँकि प्रभु येसु के जीवन की सारी घटनायें महत्वपूर्ण थी क्योंकि सब कुछ पिता ईश्वर की इच्छा और योजना के अनुसार ही था, लेकिन कुछ घटनाएँ जैसे प्रभु येसु का बपतिस्मा, चालीस दिन और चालीस रात का उपवास, रूपांतरण, येरूसलेम में प्रवेश, गेथसेमनी बारी में प्रभु येसु की प्राण-पीड़ा आदि बहुत महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं जो क्रूस के बलिदान की ओर इंगित करती हैं।

प्रभु येसु का इस दुनिया में आने का उद्देश्य क्रूस पर अपने आप को बलिदान करना और संसार को मुक्ति प्रदान करना था। यह बहुत पीड़ादायी होने वाला था, और यहाँ हम देखते हैं कि पिता ईश्वर अपने पुत्र के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करते हैं, जो प्रभु येसु को शक्ति और साहस प्रदान करता है। ईश्वर हममें से सभी को प्यार करते हैं। जब हम मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करते हैं, तो हमें अपने आंतरिक पर्वत पर चढ़ना है, और अपने स्वर्गीय पिता की वाणी को सुनना है, “तू मेरा प्रिय पुत्र है, तू मेरी प्रिय पुत्री है, मैं तुझसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” पिता ईश्वर की वह वाणी हमें भी प्रभु येसु की तरह रूपांतरित कर देगी। आमेन।


📚 REFLECTION

Today we celebrate the Feast of the Transfiguration of the Lord. Jesus took his three very close disciples to a high mountain and there he was transfigured. Prophets Moses and Elijah come to discuss with Jesus and at the end voice of God the Father is heard saying, “this is my beloved son, with whom I am well pleased, Listen to him.”

This is among most important events of Jesus’ human life. Although all the events in Jesus’ life were important because everything was planned and according to God’s will, but some events like Baptism of Jesus, Fasting for forty days and forty nights, Transfiguration, Triumphal Entry into Jerusalem, Agony in the garden etc are very important events leading to the ultimate sacrifice on the Cross.

The purpose of Jesus’ coming was to sacrifice himself on the cross and make salvation available to all. This process was going to be painful, perhaps most painful of all the events in Jesus’ life and here Father acknowledges his love for his Son, that certainly gives strength to Jesus. God loves each one of us. When we are faced with difficulties and challenges, we need to go to our inner mountain and hear the voice of the Father. That would certainly transfigure us. Amen.-


✍️-Br Biniush Topno



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