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22 मई 2022, इतवार

*✞ GOD'S WORD ✞*
 *22 मई 2022, इतवार* *पास्का का छठवाँ इतवार*
*पहला पाठ* प्रेरित-चरित 15:1-2,22-30 1)

 कुछ लोग यहूदिया से अन्ताखि़या आये और भाइयों को यह शिक्षा देते रहे कि यदि मूसा से चली आयी हुई प्रथा के अनुसार आप लोगों का ख़तना नहीं होगा, तो आप को मुक्ति नहीं मिलेगी। 2) इस विषय पर पौलुस और बरनाबस तथा उन लोगों के बीच तीव्र मतभेद और वाद-विवाद छिड़ गया, और यह निश्चय किया गया कि पौलुस तथा बरनाबस अन्ताखि़या के कुछ लोगों के साथ येरूसालेम जायेंगे और इस समस्या पर प्रेरितों तथा अध्यक्षों से परामर्श करेंगे। 22) तब सारी कलीसिया की सहमति से प्रेरितों तथा अध्यक्षों ने निश्चय किया कि हम में कुछ लोगों को चुन कर पौलुस तथा बरनाबस के साथ अन्ताखि़या भेजा जाये। उन्होंने दो व्यक्तियों को चुना, जो भाइयों में प्रमुख थे, अर्थात् यूदस को, जो बरसब्बास कहलाता था, तथा सीलस को, 23) और उनके हाथ यह पत्र भेजा: "प्रेरित तथा अध्यक्ष, आप लोगों के भाई, अन्ताखि़या, सीरिया तथा किलिकिया के ग़ैर-यहूदी भाइयों को नमस्कार करते हैं। 24) हमने सुना है कि हमारे यहाँ के कुछ लोगों ने, जिन्हें हमने कोई अधिकार नहीं दिया था, अपनी बातों से आप लोगों में घबराहट उत्पन्न की और आपके मन को उलझन में डाल दिया है। 25) इसलिए हमने सर्वसम्मति से निर्णय किया है कि प्रतिनिधियों का चुनाव करें और उन को अपने प्रिय भाई बरनाबस और पौलुस के साथ, 26) जिन्होंने हमारे प्रभु ईसा मसीह के नाम पर अपना जीवन अर्पित किया है, आप लोगों के पास भेजें। 27) इसलिए हम यूदस तथा सीलस को भेज रहे हैं। वे भी आप लोगों को यह सब मौखिक रूप से बता देंगे। 28) पवित्र आत्मा को और हमें यह उचित जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों के सिवा आप लोगों पर कोई और भार न डाला जाये। 29) आप लोग देवमूर्तियों पर चढ़ाये हुए मांस से, रक्त, गला घोंटे हुए पशुओं के मांस और व्यभिचार से परहेज़ करें। इन से अपने को बचाये रखने में आप लोगों का कल्याण है। अलविदा!" 30) वे विदा हो कर अन्ताखि़या चल दिये और वहाँ पहुँच कर उन्होंने भाइयों को एकत्र कर वह पत्र दिया। _




 *दूसरा पाठ*   - प्रकाशना 21:10-14,22-23 10) 

मैं आत्मा से आविष्ट हो गया और स्वर्गदूत ने मुझे एक विशाल तथा ऊँचे पर्वत पर ले जा कर पवित्र नगर येरूसालेम दिखाया। वह ईश्वर के यहाँ से आकाश में उतर रहा था। 11) वह ईश्वर की महिमा से विभूषित था और बहुमूल्य रत्न तथा उज्ज्वल सूर्यकान्त की तरह चमकता था। 12) उसके चारों ओर एक बड़ी और उँची दीवार थी, जिस में बारह फाटक थे और हर एक फाटक के सामने एक स्वर्गदूत खड़ा था। फाटकों पर इस्राएल के बारह वंशों के नाम अंकित थे। 13) पूर्व की आरे तीन, उत्तर की और तीन, पश्चिम की आरे तीन और दक्षिण की ओर तीन फाटक थे। 14) नगर की दीवार नींव के बारह पत्थरों पर खड़ी थी और उन पर मेमने के बारह प्रेरितों के नाम अंकित थे। 15) जो मुझ से बातें कर रहा था, उसके पास नगर, उसके फाटक और उसकी दीवार नापने के लिए एक मापक-दण्ड, सोने का सरकण्डा था। 16) नगर वर्गाकार था। उसकी लम्बाई उसकी चौड़ाई के बराबर थी। उसने सरकण्डे से नगर नापा, तो बारह हजार ुफरलांग निकला। उसकी लम्बाई, चौड़ाई और उंचाई बराबर थी। 17) उसने उसकी दीवार नापी, तो- मनुष्यों में प्रचिलत माप के अनुसार, जिसका स्वर्गदूत ने उपयोग किया- एक सौ चौवालीस हाथ निकला। 18) नगर की दीवार सूर्यकान्त की बनी थी, लेकिन नगर विशुद्ध स्वर्ण का बना था, जो स्फटिक जैसा चमकता था। 19) दीवार की नींव नाना प्रकार के रत्नों की बनी थी। पहली परत सूर्यकान्त की थी, दूसरी नीलम की, तीसरी गोदन्ती की, चौथी मरकत की, 20) पांचवी गोमेदक की, छठी रूधिराख्य की, सातवीं स्वर्णमणि की, आठवीं फीरोजे की, नवीं पुखराज की, दसवीं रूद्राक्षक की, ग्यारहवीं धूम्रकान्त की और बाहरवीं चन्द्रकान्त की। 21) बारह फाटक बारह मोतियों के बने थे, प्रत्येक फाटक एक-एक मोती का बना था। नगर का चौक पारदर्शी स्फटिक-जैसे विशुद्ध सोने का बना था। 22) मैंने उस में कोई मन्दिर नहीं देखा, क्योंकि सर्वशक्तिमान् प्रभु-ईश्वर उसका मन्दिर है और मेमना भी। 23) नगर को सूर्य अथवा चन्द्रमा के प्रकाश की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ईश्वर की महिमा उसकी ज्योति और मेमना उसका प्रदीप है। _


_ *सुसमाचार*   योहन 14:23-29 23) 

ईसा ने उसे उत्तर दिया यदि कोई मुझे प्यार करेगा तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आकर उस में निवास करेंगे। 24) जो मुझे प्यार नहीं करता, वह मेरी शिक्षा पर नहीं चलता। जो शिक्षा तुम सुनते हो, वह मेरी नहीं बल्कि उस पिता की है, जिसने मुझे भेजा। 25) तुम्हारे साथ रहते समय मैंने तुम लोगों को इतना ही बताया है। 26) परन्तु वह सहायक, वह पवित्र आत्मा, जिसे पिता मेरे नाम पर भेजेगा तुम्हें सब कुछ समझा देगा। मैंने तुम्हें जो कुछ बताया, वह उसका स्मरण दिलायेगा। 27) मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो। 28) तुमने मुझ को यह कहते सुना- मैं जा रहा हूँ और फिर तुम्हारे पास आऊँगा। यदि तुम मुझे प्यार करते, तो आनन्दित होते कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ, क्योंकि पिता मुझ से महान है। 29) मैंने पहले ही तुम लोगों को यह बताया, जिससे ऐसा हो जाने पर तुम विश्वास करो।


 *मनन-चिंतन*


 मुझे आश्चर्य होता है कभी कभी कि यीशु के समय की महिलाओं की सोच क्या होगी । क्योंकि प्रेरित, परिषद के प्रतिनिधि और चर्च के कमिटी के सभी पुरुष थे। पुरुषों को आधिकारिक तौर पर बारह प्रेरितों के रूप में चुना गया और उन्हें सुसमाचार के राजदूत और प्रेरित के रूप में भेजा गया। और फिर भी, हम जानते हैं कि यीशु के जीवन में महिलाएं अहम् भूमिका निभयीं । उसकी माँ, मैरी; मरियम मगदलीनी, जो कब्र के पास जी उठे हुए मसीह का दर्शन की और प्रेरितों को बताई ; समारिया की ओ स्त्री जो कुएं के पास थी और वह स्त्री जिसे पथराव होने से बचाया गया था। स्त्रियाँ भी यीशु को जानती और प्रेम करती थीं और सुसमाचार की वाहक थीं। वे हमें याद दिलाते हैं कि महिलाओं और पुरुषों को दुनिया में यीशु के प्रेम के जीवित गवाह, आशा के राजदूत और दया के प्रेरित और प्रेरक होने के लिए बुलाया गया है। चाहे हमें धार्मिक, विवाहित, अविवाहित, या किसी भी स्थिति में हो, हम सभी को यरूशलेम की परिषद के उस 'पत्र' द्वारा सुसमाचार की घोषणा करने और हमारे पुनर्जीवित मसीह के आनंद में जीने के लिए अनिवार्य किया गया है। 

 ✍ -Br. Biniush Topno
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21 मई 2022, शनिवार पास्का का पाँचवाँ सप्ताह*

21 मई 2022, शनिवार पास्का का पाँचवाँ सप्ताह 🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥 पहला पाठ : प्रेरित-चरित 16:1-10 1) इसके बाद वह देरबे और लुस्त्रा पहुँचा। वहाँ तिमथी नामक एक शिष्य था, जो ईसाई यहूदी माता तथा यूनानी पिता का पुत्र था। 2) लुस्त्रा और इकोनियुम के भाइयों में उसका अच्छा नाम था। 3) पौलुस चाहता था कि वह यात्रा में उसका साथी बने। उस प्रदेश में रहने वाले यहूदियों के कारण उसने तिमथी का ख़तना कराया, क्योंकि सब जानते थे कि उसका पिता यूनानी है। 4) वे नगर-नगर जा कर येरुसालेम में प्रेरितों तथा उनके पालन का आदेश देते थे। 5) इस प्रकार कलीसियाओं का विश्वास दृढ़ होता जा रहा था और उनकी संख्या दिन-दिन बढ़ रही थी। 6) जब पवित्र आत्मा ने उन्हें एशिया में वचन का प्रचार करने से मना किया, तो उन्होंने फ्रुगिया तथा गलातिया का दौरा किया। 7) मुसिया के सीमान्तों पर पहुँच कर वे बिथुनिया जाने की तैयारी कर रहे थे कि ईसा के आत्मा ने उन्हें अनुमति नहीं दी। 8) इसलिए वे मुसिया पार कर त्रोआस आये। 9) वहाँ पौलुस ने रात को एक दिव्य दर्शन देखा। एक मकेदूनी उसके सामने खड़ा हो कर यह अनुरोध कर रहा था, ’’आप समुद्र पार कर मकेदूनिया आइए और हमारी सहायता कीजिए’’। 10) इस दर्शन के बाद हमने यह समझ कर तुरन्त मकेदूनिया जाने का प्रयत्न किया कि ईश्वर ने वहाँ सुसमाचार का प्रचार करने के लिए हमें बुलाया है। * सुसमाचार : योहन 15:18-21 18) यदि संसार तुम लोगों से बैर करे, तो याद रखो कि तुम से पहले उसने मुझ से बैर किया। 19) यदि तुम संसार के होते, तो संसार तुम्हें अपना समझ कर प्यार करता। परन्तु तुम संसार के नहीं हो, क्योंकि मैंने तुम्हें संसार में से चुन लिया हैं। इसीलिये संसार तुम से बैर करता है। 20) मैंनें तुम से जो बात कही, उसे याद रखो- सेवक अपने स्वामी से बडा नहीं होता। यदि उन्होंने मुझे सताया, तो वे तुम्हें भी सतायेंगे। यदि उन्होंने मेरी शिक्षा का पालन किया तो वे तुम्हारी शिक्षा का भी पालन करेंगे। 21) वे यह सब मेरे नाम के कारण तुम लोगो के साथ करेंगे क्योंकि जिसने मुझे भेजा, उसे वे नहीं जानते। 📚 मनन-चिंतन- 2 नफरत एक ऐसा शब्द है जिससे मैं आमतौर पर बचने की कोशिश करता हूं क्योंकि यह मेरे मुंह में एक बुरा स्वाद छोड़ देता है और मेरे दिल के सिकुड़ने और मेरी आत्मा पर काले बादल छाने की शारीरिक अनुभूति को भड़का सकता है। हालाँकि, जब मैं कहता हूँ या सोचता हूँ कि 'मैं किसी से घृणा नहीं करता' या 'मैं घृणा से प्रभावित नहीं हूँ', संत पापा फ्राँसिस मुझे याद दिलाते हैं कि प्रेम का विपरीत घृणा नहीं है, बल्कि उदासीनता है। यह 'मैं संतुष्ट हूं' का रवैया है। मुझे किसी चीज की कमी नहीं है। मेरे पास सब कुछ है। मैंने इस जीवन और अगले जीवन में अपना स्थान सुनिश्चित किया है, क्योंकि मैं हर रविवार को मिस्सा में जाता हूं। मैं एक अच्छा ईसाई हूं। लेकिन होटेल से निकलते हुए, मैं दूसरी तरफ देखता हूँ [भीख माँगने के लिए हाथ उठाने वाली बेघर महिला की उपेक्षा करते हुए]।' आज मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरे दिल में किसी भी नफरत या उदासीनता को दूर करने का साहस हो ताकि मैं सहानुभूति और सांत्वना देने दूसरों तक पहुँच सकूँ और करुणा दिखाता रहूं । 📚 REFLECTION Jesus in today’s gospel warns us when He said: “If the world hates you, realize that it hated me first…. If they persecuted me, they will also persecute you,” (vv. 18, 20). What does Jesus mean when he says “the world?” The “world” in Scripture refers to that society of people who are hostile towards God and opposed to His will. When Jesus talks of persecutions also, He was referring to the sufferings and persecutions His disciples would undergo at the hands of the Jews and the Romans in proclaiming His teachings. The “world” that rejects Jesus and His disciples can expect the same treatment. Jesus leaves no middle ground for his followers. We are either for Him or against Him, for His kingdom of light or for the kingdom of darkness. Why have been Christians persecuted in the course of the centuries? When Christians say that Jesus Christ is Lord, they are saying that nobody else and nothing else is lord, and that creates enemies. Suffering is part of human existence. It is because a life with Jesus is not a bed of roses. Thus, we should not pray for an easy life. Instead, we pray to become stronger persons in facing challenges of life and bring out the best that God has given us. But today except in hostile non-Christian countries, the persecutions referred to by the Lord are no longer felt. In day-to-day life these may take the form of being ostracized. 📚 मनन-चिंतन - 2 प्रभु येसु ने अपने कार्यों और विशेष करके स्वर्गराज्य के फैलाव के लिए शिष्यों को चुनते है। वे उनके कार्य, रंग, रूप या धन दौलत को देखकर नहीं अपितु उनका ह्दय और उनके सरल जीवन का देखकर उन्हें चुनते है। आज के सुसमाचार में प्रभु येसु कहते है कि ‘मैने तुम्हें संसार से चुन लिया है’। सभी शिष्यगण अपने अपने कार्यो और जीवन में जी रहें थे। जब येसु उन्हें बुलाते है तो वे अपने कार्यों को छोड़कर उनके पीछे हो लेते है, येसु उन्हे उनके संसारिक कार्यो से छुड़ाकर एक नयें आध्यात्मिक कार्य के लिए चुनता है। परंतु जब वे उन्हें चुनते है और स्वर्गराज्य के कार्यो में आगे लगाने की बात कहते है तो वे बताते है कि वे इस संसार के होते हुए भी इस संसार के नहीं होंगे अर्थात् उनका मन, विचार, बातचीत, रहन सहन इस संसार से परे हो जाएगा और इस कारण उन्हें संसार से घृणा और बैर सहना पड़ेगा। प्रभु का संसार से लोगों का चुनना आज भी जारी है, वे सरल ह्दय और अपना जीवन उनको समर्पित करने वाले व्यक्तियों को चुनते है जिससे वे ईश्वर के कार्य में अपना जीवन दे सकें। हम प्रार्थना करें कि अधिक से अधिक लोग ईश्वर के द्वारा चुने जायें जिससे संसार में ईश्वर राज्य निरंतर फैलता जाये। आमेन! ✍फ़ादर डेनिस तिग्गा 📚 REFLECTION In order to carry forward his work especially the spreading of God’s Kingdom Jesus chooses the disciples. He doesn’t choose them by seeing their work, colour, stature or wealth but he chose them by seeing their hearts and simple lives. In today’s gospel Jesus says, “I have chosen you out of the world.” All the disciples were living in their own world doing their own works. When Jesus calls them they leave their works and start following him. Jesus chooses them for the new spiritual work by making them to leave the worldly works. But when he chooses and leads them for the work of Kingdom of heaven, he tells them that they being of this world will not be of this world, in other words their mind, thoughts, conversation, livelihood will be different from the others and because of this they have to bear the hostility and enemity from this world. God continue to choose people even today, He chooses the people with simple hearts and lives so that they can surrender their lives for the work of God. Let’s pray that more and more people may be chosen by God so that God’s Kingdom may continue to spread in the world. Amen! ✍ -Br.Biniush Topno  Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com Praise the Lord!

15 मई 2022, इतवार पास्का का पाँचवाँ इतवार

15 मई 2022, इतवार पास्का का पाँचवाँ इतवार
👉पहला पाठ : प्रेरित-चरित 14:21-27 21) उन्होंने उस नगर में सुसमाचार का प्रचार किया और बहुत शिष्य बनाये। इसके बाद वे लुस्त्रा और इकोनियुम हो कर अन्ताखिया लौटे। 22) वे शिष्यों को ढारस बँधाते और यह कहते हुए विश्वास में दृढ़ रहने के लिए अनुरोध करते कि हमें बहुत से कष्ट सह कर ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना है। 23) उन्होंने हर एक कलीसिया में अध्यक्षों को नियुक्त किया और प्रार्थना तथा उपवास करने के बाद उन लोगों को प्रभु के हाथों सौंप दिया, जिस में वे लोग विश्वास कर चुके थे। 24) वे पिसिदिया पार कर पम्फुलिया पहुँचे 25) और पेरगे में सुसमाचार का प्रचार करने के बाद अत्तालिया आये। 26) वहाँ से वे नाव पर सवार हो कर अन्ताखिया चल दिये, जहाँ से वे चले गये थे और जहाँ लोगों ने उस कार्य के लिए ईश्वर की कृपा माँगी थी, जिसे उन्होंने अब पूरा किया था। 27) वहाँ पहुँचकर और कलसिया की सभा बुला कर वे बताते रहे कि ईश्वर ने उनके द्वारा क्या-क्या किया और कैसे गै़र-यहूदियों के लिए विश्वास का द्वार खोला। 👉दूसरा पाठ : प्रकाशना 21:1-5 1) तब मैंने एक नया आकाश और एक नयी पृथ्वी देखी। पुराना आकाश तथा पुरानी पृथ्वी, दोनों लुप्त हो गये थे और समुद्र भी नहीं रह गया था। 2) मैंने पवित्र नगर, नवीन येरूसालेम को ईश्वर के यहाँ से आकाश में उतरते देखा। वह अपने दुल्हे के लिए सजायी हुई दुल्हन की तरह अलंकृत था। 3) तब मुझे सिंहासन से एक गम्भीर वाणी यह कहते सुनाई पड़ी, "देखो, यह है मनुष्यों के बीच ईश्वर का निवास! वह उनके बीच निवास करेगा। वे उसकी प्रजा होंगे और ईश्वर स्वयं उनके बीच रह कर उनका अपना ईश्वर होगा। 4) वह उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा। इसके बाद न मृत्यु रहेगी, न शोक, न विलाप और न दुःख, क्योंकि पुरानी बातें बीत चुकी हैं।" 5) तब सिंहासन पर विराजमान व्यक्ति ने कहा, "मैं सब कुछ नया बना देता हूँ"। 👉सुसमाचार : योहन 13:31-35 31) यूदस के चले जाने के बाद ईसा ने कहा, अब मानव पुत्र महिमान्वित हुआ और उसके द्वारा ईश्वर की महिमा प्रकट हुई। 32) यदि उसके द्वारा ईश्वर की महिमा प्रकट हुई, तो ईश्वर भी उसे अपने यहाँ महिमान्वित करेगा और वह शीघ्र ही उसे महिमान्वित करेगा। 33) बच्चों! मैं और थोडे ही समय तक तुम्हारे साथ हूँ। तुम मुझे ढूँढोगे और मैंने यहूदियों से जो कहा था, अब तुम से भी वही कहता हूँ - मैं जहाँ जा रहा हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते।" 34) "मैं तुम लोगों को एक नयी आज्ञा देता हूँ- तुम एक दूसरे को प्यार करो। जिस प्रकार मैंने तुम लोगों को प्यार किया, उसी प्रकार तुम एक दूसरे को प्यार करो। 35) यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे, तो उसी से सब लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो। 📚 मनन-चिंतन- 2 परमेश्वर के प्रेम से भरे हुए, पौलुस और बरनबास बहुतों के लिए 'विश्वाोस का द्वार खोल दिया' जिनसे उनका सामना उन नगरों में हुआ जहाँ वे गए थे। ईश्वर के प्रति उनके प्रेम, आनंद और उत्साह से बहुतों के आंख, कान और हृदय खुल गए। वे स्पष्ट रूप से यीशु की नई आज्ञा का पालन कर रहे हैं कि 'एक दूसरे से प्रेम करो जैसा मैं ने तुम से प्रेम किया है'। जैसे यीशु ने किया, उन्होंने भी लोगों के बीच परमेश्वर का सुसमाचार फैलाया। उन्होंने भी अपने कार्यों से अपने हृदय में परमेश्वर के प्रेम और उपस्थिति को देखा। यह दर्शाता है कि, परमेश्वर के प्रेम से मुझ पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा है? क्या दूसरे लोग जानते हैं कि मैं दूसरों के साथ जो प्रेम साझा करता हूं, उससे मैं यीशु का शिष्य हूं? क्या लोग मुझ में यीशु को पहचानते हैं? क्या मैं दूसरों में यीशु को पहचानता हूँ? मैं प्रार्थना करता हूं कि मैं आज दुनिया में परमेश्वर के प्रेम का एक जीवंत संकेत हो सकता हूं, कि मैं वह हो सकूँ जो आने वाले लोगों के लिए विश्वास और प्रेम का द्वार खोल दूँ। 📚 REFLECTION There was an article in Money Saver magazine many years ago entitled: “Loving another Is Loving Yourself.” In that article, the author said: “If you are asked what qualities you want in partners, what will they be? Actually, these qualities are the ones you desire for yourself. You want your partner to be an extension of yourself.” I don’t know if these words of this author can be applied to Jesus by which he said in today’s gospel: “Love one another, as I have loved you,” (v.34). What do you think; can these words of the author I mentioned be applied to Jesus? May be they can, since the command of Jesus to love others because he loved us first is for the good of us. First, it is a Command. It is not an invitation. It is not a request and it is not an option. First and foremost, it is a command or an order. Being a command, it calls for total obedience on our part. In other words, it is an obligation to love one another. Second, the Lord says to us: “Love one another.” “Love one another,” without any conditions or limitations. In other words, to love is forever. Third, the Lord says: “Love one another as I have loved you.” In this statement, once again, Jesus reminds us that love is the soul of our Christian life. Our Lord Jesus Christ gave us an example of a love without measure. He did not condemn Mary Magdalene. He called St. Matthew to be His apostle even though Matthew was a tax collector and a sinner. He even was not afraid to touch and heal the sick and stretched out his hands to the lepers who were considered as ‘untouchables’ during that time because nobody wanted to touch them and be near to them. This Christian principle of love is applied even to our enemies. Do you make love as the soul of your life? Do you love enough to give life to your Christian commitment? मनन-चिंतन -2 प्रभु येसु कहते हैं ‘‘पूर्ण बनो जैसे कि तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है’’ (मत्ती 5:48)। इस संसार में मनुष्य कितना ही कमजोर क्यों न हो वह ईश्वर के समान पूर्ण बनने के लिए बुलाया गया है। पूर्ण बनना अर्थात् प्रभु ईश्वर के समान बनना है। पिता ईश्वर और पुत्र येसु एक है- (देखिए योहन 10:30)। प्रभु येसु कहते हैं जिसने मुझको देखा है, उसने पिता को देखा है (योहन 14:9)। अर्थात् येसु के समान बनना, ईश्वर के समान बनना है। प्रभु येसु के कई सारे गुण हैं जैसे प्रेम, क्षमा, संवेदनशीलता, दया आदि। आज हम उनके उस गुण पर मनन चिंतन करेंगे जिसके कारण उन्होंने अपने प्राण दूसरों की खातिर कुर्बान कर दिया, जिसके कारण उन्होंने अपने जीवन में दर्दनाक, भयानक और असहनीय दुख उठाया, जिसके कारण उन्होंने अपने मिशन को कभी भी नष्ट नहीं होने दिया परन्तु उसे पूर्णता तक पहुँचाया। यह सब हुआ उनके एक गुण के कारण और वह है - उनकी आज्ञाकारिता, ‘‘उन्होंने मनुष्य का रूप धारण करने का बाद मरण तक, हाँ क्रूस पर मरण तक, आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन हीन बना लिया’’ (फिलिप्पियों 2:7-8)। येसु ने सदा अपने जीवन में प्रभु ईश्वर की इच्छाओं एव्मआज्ञाओं का पालन किया। उनका इस संसार में आने का मकसद ही पिता ईश्वर की इच्छा को पूरी करना था, ‘‘जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना, यही मेरा भोजन है।’’ (योहन 4:34) उनकी आज्ञाकारिता के कारण ही उन्होंने गेथसेमनी बारी में अपना आखिरी चुनाव प्रभु की इच्छा को पूरी करना महत्वपूर्ण समझा। ‘‘मेरी नहीं, बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो।’’ (मारकुस 14:36)। अंतिम ब्यारी में प्रभु ने विदा होने से पूर्व एक नयी आज्ञा दी। आज प्रभु हमें अपनी इच्छा नहीं अपितु एक नयी आज्ञा देते है, ‘‘मै तुम लोगों को एक नयी आज्ञा देता हूँ - तुम एक दूसरे को प्यार करो। जैसे मैंने तुम्हें प्यार किया, वैसे ही तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।’’ (योहन 13:34)। यह आज्ञा है प्रेम करने की आज्ञा, किसी और के प्रेम की तरह नहीं परन्तु जिस प्रकार प्रभु येसु ने प्रेम किया, ठीक उसी प्रकार प्रेम करने की आज्ञा। प्रभु येसु के प्रेम में पिता ईश्वर का प्रेम झलकता है। जिस प्रकार “ईश्वर ने संसार से इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया।’’ (योहन 3:16), ठीक उसी प्रकार प्रभु येसु ने हम सब से इतना प्यार किया कि उसने हम सब के लिए अपने प्राण दे दिया। ‘‘इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपने प्राण अर्पित कर दे।’’ (योहन 15:13)। ‘‘मैं भेड़ों के लिए अपना जीवन अर्पित करता हूँ।’’(योहन 10:15) प्रभु का प्रेम क्षमा से भरा प्रेम है। उन्होंने व्यभिचार में पकडी गयी स्त्री से कहा, ‘‘मैं भी तुम्हें दण्ड नहीं दूँगा। जाओ और अब से फिर पाप नहीं करना’’(योहन 8:11)। उनका प्रेम पापियों के मन फिराव के लिए क्षमा से परिपूर्ण प्रेम है। उन्होंने जकेयुस को क्षमा करते हुए उसके साथ भोजन किया – इस में उनका प्रेम पापियों नाकेदारों के प्रति प्रकट होता है। ‘‘नीरोगियों को नहीं परन्तु रोगियों की वैद्य की जरूरत होती है’’ (लूकस 5:32)। प्रभु का प्रेम असीमित और पूर्ण प्रेम है, ‘‘तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है- अपने पड़ोसी से प्रेम करो और अपने बैरी से बैर; परन्तु मैं तुम से कहता हूँ- अपने शत्रुओं से प्रेम करो ....यदि तुम उन्हीं से प्रेम करते हो, जो तुम से प्रेम करते हैं, तो पुरस्कार का दावा कैस कर सकते हो?’’(मत्ती 5:44,46)। उन्होंने अपना प्रेम सब के लिए प्रकट किया है चाहे वे बड़े हो या बच्चे या स्त्रियाँ; धर्मी हो या पापी; यहूदी हो या गैर-यहूदी, दोस्त हो या दुश्मन; अपना हो या पराया; उनका भला चाहने वाला हो या बुरा चाहने वाला। इस प्रकार उनका प्रेम असीमित और पूर्ण है। प्रभु का प्रेम संवेदनशील प्रेम है, ‘‘लोगों को देख कर ईसा को उन पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थके-माँदे पड़े हुए थे’’ (मत्ती 9:36)। ‘‘निकट पहुँचने पर ईसा ने शहर को देखा; वे उस पर रो पडे़’’(लूकस 19:41)। ‘‘ईसा, उसे और उसके साथ आये हुए यहूदियों को रोते देख कर, बहुत व्याकुल हो उठे....कब्र के पास पहुँचने पर ईसा फिर बहुत व्याकुल हो उठे’’(योहन 11:33,38)। प्रभु येसु का प्रेम सच्चा प्रेम है जिसकी व्याख्या संत पौलुस ने अपने पत्र में की है, ‘‘प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या करता है, न डींग मारता, न घमण्ड करता है। प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। प्रेम न तो झुँझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है। वह दूसरों के पाप से नहीं, बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है। वह सब कुछ ढाँक देता है, सब कुछ पर विश्वास करता है, सब कुछ की आशा करता और सब कुछ सह लेता है।’’(1कुरि0 13:4-7) इस प्रकार का प्रेम प्रभु येसु ने इस संसार से, हम प्रत्येक से किया है और उनकी आज्ञा है कि हम सब भी उनके समान एक दूसरे से प्यार करें - उनके समान क्षमा पूर्ण प्रेम, असीमित और पूर्ण प्रेम, संवेदनशील प्रेम और सच्चा प्रेम। इस प्रकार के प्रेम के बारे में सुनकर हमारे मन में शायद यह विचार आयेगा कि इस प्रकार का प्रेम असंभव है। परन्तु प्रभु येसु हमारे लिए उदाहरण छोड़ गये है और उन्होंने अपने जीवन में इसे पूर्ण कर हमें बताया है कि यह सम्भव है। ‘‘इसलिए तो आप बुलाये गये हैं, क्योंकि मसीह ने आप लोगों के लिए दुःख भोगा और आप को उदाहरण दिया, जिससे आप उनका अनुसरण करें (1 पेत्रुस 2:21)। आइए हम पूर्ण बनें जैसे कि हमारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है और उनके शिष्य सिद्ध हो जायें। ✍ -Biniush Topno  Copyright © www.catholicbibleministry1..blogspot.com Praise the Lord!

08 मई 2022, इतवार पास्का का चौथा इतवार

08 मई 2022, इतवार पास्का का चौथा इतवार 🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥
पहला पाठ :प्रेरित-चरित . 13:14,43-52 14) पौलुस और बरनाबस पेरगे से आगे बढ़ कर पिसिदिया के अंताखिया पहुँचे। वे विश्राम के दिन सभागृह में जा कर बैठ गये। 43) सभा के विसर्जन के बाद बहुत-से यहूदी और भक्त नवदीक्षित पौलुस और बरनाबस के पीछे हो लिये। पौलुस और बरनाबस ने उन से बात की और आग्रह किया कि वे ईश्वर की कृपा में दृढ़ बने रहें। 44) अगले विश्राम-दिवस नगर के प्रायः सब लोग ईश्वर का वचन सुनने के लिए इकट्ठे हो गये। 45) यहूदी इतनी बड़ी भीड़ देख कर ईर्ष्या से जल रहे थे और पौलुस की निंदा करते हुए उसकी बातों का खण्डन करते रहे। 46) पौलुस और बरनाबस ने निडर हो कर कहा, "यह आवश्यक था कि पहले आप लोगों को ईश्वर का वचन सुनाया जाये, परन्तु आप लोग इसे अस्वीकार करते हैं और अपने को अनंत जीवन के योग्य नहीं समझते; इसलिए हम अब गैर-यहूदियों के पास जाते हैं। 47) प्रभु ने हमें यह आदेश दिया है, मैंने तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बना दिया हैं, जिससे तुम्हारे द्वारा मुक्ति का संदेश पृथ्वी के सीमांतों तक फैल जाये।" 48) गैर-यहूदी यह सुन कर आनन्दित हो गये और ईश्वर के वचन की स्तृति करते रहे। जितने लोग अनंत जीवन के लिए चुने गये थे, उन्होंने विश्वास किया 49) और सारे प्रदेश में प्रभु का वचन फैल गया। 50) किंतु यहूदियों ने प्रतिष्ठित भक्त महिलाओं तथा नगर के नेताओ को उभाड़ा, पौलुस तथा बरनाबस के विरुद्ध उपद्रव खड़ा कर दिया और उन्हें अपने इलाके से निकाल दिया। 51) पौलुस और बरनाबस उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ कर इकोनियुम चले गये। 52) शिष्य आनन्द और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण थे। दूसरा पाठ : प्रकाशना 7:9, 14-17 9) इसके बाद मैंने सभी राष्ट्रों, वंशों, प्रजातियों और भाषाओं का एक ऐसा विशाल जनसमूह देखा, जिसकी गिनती कोई भी नहीं कर सकता। वे उजले वस्त्र पहने तथा हाथ में खजूर की डालियाँ लिये सिंहासन तथा मेमने के सामने खड़े थे 10) और ऊँचे स्वर से पुकार-पुकार कर कह रहे थे, "सिंहासन पर विराजमान हमारे ईश्वर और मेमने की जय!" 11) तब सिंहासन के चारों ओर खड़े स्वर्गदूत, वयोवृद्ध और चार प्राणी, सब-के-सब सिंहासन के सामने मुँह के बल गिर पड़े और उन्होंने यह कहते हुए ईश्वर की आराधना की, 12) "आमेन! हमारे ईश्वर को अनन्त काल तक स्तुति, महिमा, प्रज्ञा, धन्यवाद, सम्मान, सामर्थ्य और शक्ति ! आमेन !" 13) वयोवृद्धों में एक ने मुझ से कहा, "ये उजले वस्त्र पहने कौन हैं और कहाँ से आये हैं? 14) मैंने उत्तर दिया, "महोदय! आप ही जानते हैं" और उसने मुझ से कहाँ, "ये वे लोग हैं, जो महासंकट से निकल कर आये हैं। इन्होंने मेमने के रक्त से अपने वस्त्र धो कर उजले कर लिये हैं। 15) इसलिए ये ईश्वर के सिंहासन के सामने ख़ड़े रहते और दिन-रात उसके मन्दिर में उसकी सेवा करते हैं । वह, जो सिंहासन पर विराजमान है, इनके साथ निवास करेगा। 16) इन्हें फिर कभी न तो भूख लगेगी और न प्यास, इन्हें न तो धूप से कष्ष्ट होगा और न किसी प्रकार के ताप से; 17) क्योंकि सिंहासन के सामने विद्यमान मेमना इनका चरवाहा होगा और इन्हें संजीवन जल के स्रोत के पास ले चलेगा और ईश्वर इनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा।" ***सुसमाचार : योहन 10:27-30 27) मेरी भेडें मेरी आवाज पहचानती है। मै उन्हें जानता हँ और वे मेरा अनुसरण करती हैं। 28) मै उन्हें अनंत जीवन प्रदान करता हूँँ। उनका कभी सर्वनाश नहीं होगा और उन्हें मुझ से कोई नहीं छीन सकेगा। 29) उन्हें मेरे पिता ने मुझे दिया है वह सब से महान है। उन्हें पिता से कोई नहीं छीन सकता। 30) मैं और पिता एक हैं। 📚 मनन-चिंतन- 2 ऐसी कई आवाजें हैं जो हर व्यक्ति हर दिन सुनता है। इतनी सारी आवाजों के बीच, लोग कैसे बता सकते हैं कि वे वास्तव में कौन सी आवाज सुन रहे हैं? वे आवाजें जो वास्तव में सुनी जाती हैं, उनका अनुसरण किया जाता है और हम भेद कर सकते हैं कि वे किस प्रकार की आवाजें हैं। क्या हम उन्हें पहचान सकते हैं? पास्का काल के दौरान चौथे रविवार को गुड शेफर्ड रविवार कहा जाता है क्योंकि सुसमाचार भला गड़ेरिया के बारे में प्रकाश डालता है जो यीशु है। आज हमारे सुसमाचार में, यीशु ने कहा: “मेरी भेड़ें मेरी आवाज़ पहचानती हैं, मैं उन्हें जानता हूं और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं। मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी" (पद 27-28)। यहाँ इस मार्ग में, इसका अर्थ है कि यीशु एक चरवाहे की तरह प्यार करता है और हमारी परवाह करता है और हमें उसे भेड़ों की तरह उस पर भरोसा करना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए। यीशु को अच्छे चरवाहे के रूप में दर्शाया गया है। संक्षेप में, यह रविवार किसी भी व्यक्ति के लिए है जो किसी भी समूह या उपक्रम का मुखिया या नेता है।हम सब अपने भला गड़ेरिया यीशु के समान बनें। आइए हम भी शिष्यों की तरह अच्छे अनुयायी बनें . 📚 REFLECTION The fourth Sunday during Easter Season is called the Good Shepherd Sunday because the gospel talks about good shepherd who is Jesus. In our gospel today, Jesus said: “My sheep hear my voice, I know them and they follow me. I give them eternal life and they shall never perish,” (vv. 27-28). But it does mean that we are dumb animals who blindly led by another. Just like what a lady had said: “I am a person not a sheep,” when she attended a Bible class. The Bible is filled with different forms of literary styles. Like for example: “I am the vine you are the branches” or “fishers of men”. Here in this passage, it means that Jesus loves and cares for us like a shepherd and must trust and follow Him like sheep. Jesus is depicted as the Good Shepherd. But the term ‘shepherd’ embraces all who have executive powers and have something to do with administration, direction, management or guidance of people. In short, this Sunday is for anyone who is the head or leader of any group or undertaking. Leaders, are to be pro-God, pro-people, pro-country, pro-environment; a person with integrity and transparency; a person of peace, justice and love and many more which are related to Christian principles. It is to become a leader after the heart of Jesus or Christ like. मनन-चिंतन 2 जब ईसा गलीलिया में घूम-घूमकर लोगों को उपदेश देते थे, विभिन्न चमत्कार करते थे, तो बहुत सारे लोग आश्चर्य में पड़ जाते थे और सब के मन में यही प्रश्न होता था कि यह कौन है? (मारकुस 4:41 लूकस 4:22) इस प्रकार का प्रश्न पिलातुस के मन में भी था इसलिए वह सत्य को जानना चाहता था (देखिए योहन18:38)। प्रभु येसु ने संत योहन के सुसमाचार के द्वारा अपने विषय में कई सारी बातें इस विषय में बताई है कि वे कौन हैं। वे कहते हैं, ’’जीवन की रोटी मैं हूँ’’, ‘‘संसार की ज्योति मैं हूँ’’, ‘‘पुनरूत्थान और जीवन मैं हूँ,’’ ’’मार्ग, सत्य और जीवन मैं हूँ,’’ ’’मैं दाखलता हूँ,’’ और ’’भला गडेरिया मैं हूँ,’’। आज का सुसमाचार हमें चरवाहा और भेड़ों के बीच के रिश्ते पर मनन चिंतन करने के लिए आह्वान करता है। प्रभु येसु संत योहन के सुसमाचार 10:11 में कहते हैं कि भला गडेरिया मैं हूँ। भले गडेरिये के कुछ गुण होते हैं जैसे- भला गडेरिया अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण दे देता है, अपने भेड़ों को जानता है, भेड़ों को हरे मैदानों में बैठाता और शांत जल के पास ले जा कर उनमें नवजीवन का संचार करता है। भला चरवाहा एक भेड़ के भटक जाने पर निन्यानवे भेडों को छोड़ उस भटकी हुई भेड़ को खोजने जाता है। ये सब गुण हम प्रभु येसु के जीवन में पाते हैं। प्रभु येसु सचमुच में भले गडेरिये है जो अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण अर्पित करते है। वे भटकी हुई भेड़ की खोज में जाते है। प्रभु ने अपने जीवन के द्वारा यह सिद्ध किया कि वे सचमुच में भले गडेरिया है। लेकिन आज का सुसमाचार भले गडेरिये के ऊपर नहीं परन्तु भली भेड़ के ऊपर है। आज हम सब के लिए बड़ा प्रश्न यह है कि प्रभु येसु तो सचमुच में भले गडेरिये हैं परंतु क्या हम उस भले गडेरिये की भली भेड़ें हैं। वे हम सभी भेड़ों को नाम से जानते हैं और सदा हमें अपने पास बुलाते हैं, पर क्या हम भली भेड़ के समान अपना जीवन व्यतीत करते हैं? भली भेड़ या सच्ची भेड़ का चिन्ह क्या है? आज का सुसमाचार के अनुसार सच्ची भेड़ भले चरवाहे की आवाज़ पहचानती है तथा उनका अनुसरण करती है। प्रभु येसु या ईश्वर की आवाज़ पहचानना एक सच्ची भेड़ की अहम निशानी है। बाइबिल में हम देखते हैं कि कौन-कौन ईश्वर की आवाज़ पहचानता एवं सुनता था। बाइबिल में हम नूह, इब्राहिम, इसहाक, याकूब, युसूफ, मूसा, योशुआ, कई न्यायकर्ताओं, कई नबियों को जानते हैं जो ईश्वर की आवाज़ सुनते और उनका अनुसरण करते थे। हम अपने जीवन में किसकी आवाज़ बहुत अच्छी से पहचानते है? जाहिर सी बात है कि हम अपने जीवन में अपने माता-पिता या परिवार वालों की आवाज़ अच्छे से पहचानते हैं। वह किस लिए? क्योंकि हम अपना ज्यादातार समय अपने परिवार के साथ बिताते हैं तथा उनकी आवाज़ को सुनते रहते हैं। इसी तरह हम किसी व्यक्ति को पंसद करते हैं तथा रोजाना उससे बात करते हैं - आमने सामने या मोबाईल पर - तब हम उसकी आवाज़ को पहचानने लगेंगे। अर्थात् जितना ज्यादा सम्पर्क हम किसी भी व्यक्ति से बनाते हैं - चाहे वह परिवार का हो या परिवार से दूर का हो - उतना ज्यादा हम उसकी आवाज़ को पहचानते हैं। इसलिए अगर वे किसी अन्जान नम्बर से फोन करेंगे तब भी हम उनकी आवाज़ पहचान जायेंगें। आज के इस आधुनिक युग में क्या हम येसु की आवाज़ पहचानते हैं? येसु की आवाज़ कौन पहचान पायेगा? वही जो येसु के साथ ज्यादा सम्पर्क में रहा है। येसु के साथ सम्पर्क में रहने का तात्पर्य है उसके साथ प्रार्थना में जुडे रहना, रोजाना प्रार्थना करना, बाइबिल पठन करना, वचनों पर मनन चिंतन करना, यूखारिस्त में भाग लेना। इन सबके द्वारा हम येसु के सम्पर्क में बने रहते हैं। और जितना ज्यादा हम उनसे जुड़े रहेंगे उतने स्पष्ट रूप से हम येसु की आवाज़ सुन पायेंगे और पहचान पायेंगे। येसु की आवाज़ सुनना ही काफी नहीं परन्तु उनका अनुसरण करना ही हमें स्च्ची भेड़ होने का दर्जा देता है। हम प्रभु की आवाज़ बाइबिल से, पवित्र आत्मा से, अभिषिक्त पुरोहितों से, प्रार्थनामय इंसान से सुन सकते हैं। परंतु उनका पालन करना या न करना हम पर निर्भर करता हैं। प्रभु कहते हैं कि जो मेरा अनुसरण करना चाहता है वह आत्मत्याग करे, अपना क्रूस उठायें और मेरे पीछे हो ले। प्रभु की वाणी के अनुसार चलने के लिए हमें सर्वप्रथम आत्मत्याग की जरूरत है। जब तक हम अपने शरीर की इच्छाओं का दमन नहीं करेंगे तब तक हम आत्मा के अनुसार नही चल पायेंगे क्योंकि ‘‘आत्मा और शरीर एक दूसरे के विरोधी है’’ (गलातियों 5:17)। इसलिए हमें हमेशा प्रार्थना करते रहना चाहिए क्योंकि आत्मा तो तत्पर है परन्तु शरीर दुर्बल है (देखिए मारकुस 14:38)। हम सब प्रभु की सच्ची भेड़ बनने के लिए बुलाये गये हैं। प्रभु कहते हैं, ‘‘मैं द्वार के सामने खड़ा हो कर खटखटाता हूँ। यदि कोई मेरी वाणी सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके यहाँ आ कर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ’’ (प्रकाशना 3:20)। आज हम सब को उनकी आवाज़ पहचानते हुए उनका अनुसरण करने की जरूरत हैं जिससे हम उनके सच्चे शिष्य, सच्ची भेड़ सिद्ध हो जाएँ। ’’यदि तुम मेरी शिक्षा पर दृढ़ रहोगे, तो सचमुच मेरे शिष्य सिद्ध होगे’’ (योहन 8:31) ✍ -Biniush Topno  Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com Praise the Lord!

15 अप्रैल 2022, शुक्रवार पुण्य शुक्रवार

15 अप्रैल 2022, शुक्रवार पुण्य शुक्रवार
पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 52:13-53:12 13) देखो! मेरा सेवक फलेगा-फूलेगा। वह महिमान्वित किया जायेगा और अत्यन्त महान् होगा। 14) उसकी आकृति इतनी विरूपित की गयी थी कि वह मनुय नही जान पड़ता था; लोग देख कर दंग रह गये थे। 15) उसकी ओर बहुत-से राष्ट्र आश्चर्यचकित हो कर देखेंगे और उसके सामने राजा मौन रहेंगे; क्योंकि उनके सामने एक अपूर्व दृश्य प्रकट होगा और जो बात कभी सुनने में नहीं आयी, वे उसे अपनी आँखों से देखेंगे। 1) किसने हमारे सन्देश पर विश्वास किया? प्रभु का सामर्थ्य किस पर प्रकट हुआ है? 2) वह हमारे सामने एक छोटे-से पौधे की तरह, सूखी भूमि की जड़ की तरह बढ़ा। हमने उसे देखा था; उसमें न तो सुन्दरता थी, न तेज और न कोई आकर्षण ही। 3) वह मनुयों द्वारा निन्दित और तिरस्कृत था, शोक का मारा और अत्यन्त दुःखी था। लोग जिन्हें देख कर मुँह फेर लेते हैं, उनकी तरह ही वह तिरस्कृत और तुच्छ समझा जाता था। 4) परन्तु वह हमारे ही रोगों का अपने ऊपर लेता था और हमारे ही दुःखों से लदा हुआ था और हम उसे दण्डित, ईश्वर का मारा हुआ और तिरस्कृत समझते थे। 5) हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया है। हमारे कूकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शान्ति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं। 6) हम सब अपना-अपना रास्ता पकड़ कर भेड़ों की तरह भटक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सब के पापों का भार डाला है। 7) वह अपने पर किया हुआ अत्याचार धैर्य से सहता गया और चुप रहा। वध के लिए ले जाये जाने वाले मेमने की तरह और ऊन कतरने वाले के सामने चुप रहने वाली भेड़ की तरह उसने अपना मुँह नहीं खोला। 8) वे उसे बन्दीगृह और अदालत ले गये; कोई उसकी परवाह नहीं करता था। वह जीवितों के बीच में से उठा लिया गया है और वह अपने लोगों के पापों के कारण मारा गया है। 9) यद्यपि उसने कोई अन्याय नहीं किया था और उसके मुँह से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली थी, फिर भी उसकी कब्र विधर्मियों के बीच बनायी गयी और वह धनियों के साथ दफ़नाया गया है। 10) प्रभु ने चाहा कि वह दुःख से रौंदा जाये। उसने प्रायश्चित के रूप में अपना जीवन अर्पित किया; इसलिए उसका वंश बहुत दिनों तक बना रहेगा और उसके द्वारा प्रभु की इच्छा पूरी होगी। 11) उसे दुःखभोग के कारण ज्योति और पूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा। उसने दुःख सह कर जिन लोगों का अधर्म अपने ऊपर लिया था, वह उन्हें उनके पापों से मुक्त करेगा। 12) इसलिए मैं उसका भाग महान् लोगों के बीच बाँटूँगा और वह शक्तिशाली राजाओं के साथ लूट का माल बाँटेगा; क्योंकि उसने बहुतों के अपराध अपने ऊपर लेते हुए और पापियों के लिए प्रार्थना करते हुए अपने को बलि चढ़ा दिया और उसकी गिनती कुकर्मियों में हुई। दूसरा पाठ : इब्रानियों के नाम पत्र 4:14-16;5:7-9 14) हमारे अपने एक महान् प्रधानयाजक हैं, अर्थात् ईश्वर के पुत्र ईसा, जो आकाश पार कर चुके हैं। इसलिए हम अपने विश्वास में सुदृढ़ रहें। 15) हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है। 16) इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी। 7) मसीह ने इस पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार कर और आँसू बहा कर ईश्वर से, जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थना और अनुनय-विनय की। श्रद्धालुता के कारण उनकी प्रार्थना सुनी गयी। 8) ईश्वर का पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख सह कर आज्ञापालन सीखा। 9 (9-10) वह पूर्ण रूप से सिद्ध बन कर और ईश्वर से मेलखि़सेदेक की तरह प्रधानयाजक की उपाधि प्राप्त कर उन सबों के लिए मुक्ति के स्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं। सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 18:1-19:42 1) यह सब कहने के बाद ईसा अपने शिष्यों के साथ केद्रेान नाले के उस पार गये। वहाँ एक बारी थी। उन्होंने अपने शिष्यों के साथ उस में प्रवेश किया। 2) उनके विश्वासघाती यूदस को भी वह जगह मालूम थी, क्योंकि ईसा अक्सर अपने शिष्यों के साथ वहाँ गये थे। 3) इसलिये यूदस पलटन और महायाजकों तथा फ़रीसियों के भेजे हुये प्यादों के साथ वहाँ आ पहुँचा। वे लोग लालटेनें मशालें और हथियार लिये थे। 4) ईसा, यह जान कर कि मुझ पर क्या-क्या बीतेगी आगे बढे और उन से बोले, ’’किसे ढूढतें हो?’’ 5) उन्होंने उत्तर दिया, ’’ईसा नाज़री को’’। ईसा ने उन से कहा, ’’मैं वही हूँ’’। वहाँ उनका विश्वासघाती यूदस भी उन लोगों के साथ खडा था। 6) जब ईसा ने उन से कहा, ’मैं वही हूँ’ तो वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पडे। 7) ईसा ने उन से फि़र पूछा, ’’किसे ढूढते हो?’’ वे बोले, ’’ईसा नाजरी को’’। 8) इस पर ईसा ने कहा, ’’मैं तुम लोगों से कह चुका हूँ कि मैं वही हूँ। यदि तुम मुझे ढूँढ़ते हो तो इन्हें जाने दो।’’ 9) यह इसलिये हुआ कि उनका यह कथन पूरा हो जाये- तूने मुझ को जिन्हें सौंपा, मैंने उन में से एक का भी सर्वनाश नहीं होने दिया। 10) उस समय सिमोन पेत्रुस ने अपनी तलवार खींच ली और प्रधानयाजक के नौकर पर चलाकर उसका दाहिना कान उडा दिया। उस नौकर का नाम मलखुस था। 11) ईसा ने पेत्रुस से कहा, ’’तलवार म्यान में कर लो। जो प्याला पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे नहीं पिऊँ?’’ 12) तब पलटन, कप्तान और यहूदियों के प्यादों ने ईसा को पकड कर बाँध लिया। 13) वे उन्हें पहले अन्नस के यहाँ ले गये; क्योंकि वह उस वर्ष के प्रधानयाजक कैफस का ससुर था। 14) यह वही कैफस था जिसने यहूदियों को यह परामर्श दिया था- अच्छा यही है कि राष्ट्र के लिये एक ही मनुष्य मरे। 15) सिमोन पेत्रुस और एक दूसरा शिष्य ईसा के पीछे-पीछे चले। यह शिष्य प्रधानयाजक का परिचित था और ईसा के साथ प्रधानयाजक के प्रांगण में गया, 16) किन्तु पेत्रुस फाटक के पास बाहर खडा रहा। इसलिये वह दूसरा शिष्य जो प्रधानयाजक का परिचित था, फि़र बाहर गया और द्वारपाली से कहकर पेत्रुस को भीतर ले आया। 17) द्वारपाली ने पेत्रुस से कहा, ’’कहीं तुम भी तो उस मनुष्य के शिष्य नहीं हो?’’ उसने उत्तर दिया, ’’नहीं हूँ’’। 18) जाड़े के कारण नौकर और प्यादे आग सुलगा कर ताप रहे थे। पेत्रुस भी उनके साथ आग तापता रहा। 19) प्रधानयाजक ने ईसा से उनके शिष्यों और उनकी शिक्षा के विषय में पूछा। 20) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं संसार के सामने प्रकट रूप से बोला हूँ। मैंने सदा सभागृह और मन्दिर में जहाँ सब यहूदी एकत्र हुआ करते हैं, शिक्षा दी है। मैंने गुप्त रूप से कुछ नहीं कहा। 21) यह आप मुझ से क्यों पूछते हैं? उन से पूछिये जिन्होंने मेरी शिक्षा सुनी है। वे जानते हैं कि मैंने क्या-क्या कहा।’’ 22) इस पर पास खडे प्यादों में से एक ने ईसा को थप्पड मार कर कहा, “तुम प्रधानयाजक को इस तरह जवाब देते हो?“ 23) ईसा ने उस से कहा, ’’यदि मैंने गलत कहा, तो गलती बता दो और यदि ठीक कहा तो, मुझे क्यों मारते हो?’’ 24) इसके बाद अन्नस ने बाँधें हुये ईसा को प्रधानयाजक कैफस के पास भेजा। 25) सिमोन पेत्रुस उस समय आग ताप रहा था। कुछ लोगों ने उस से कहा, ’’कहीं तुम भी तो उसके शिष्य नहीं हो?’’ उसने अस्वीकार करते हुये कहा, ’’नहीं हूँ’’। 26) प्रधानयाजक का एक नौकर उस व्यक्ति का सम्बन्धी था जिसका कान पेत्रुस ने उडा दिया था। उसने कहा, ’’क्या मैंने तुम को उसके साथ बारी में नहीं देखा था? 27) पेत्रुस ने फिर अस्वीकार किया और उसी क्षण मुर्गे ने बाँग दी। 28) तब वे ईसा को कैफस के यहाँ से राज्य पाल के भवन ले गये। अब भोर हो गया था। वे भवन के अन्दर इसलिये नहीं गये कि अशुद्व न हो जायें, बल्कि पास्का का मेमना खा सकें। 29) पिलातुस बाहर आकर उन से मिला और बोला, ’’आप लोग इस मनुष्य पर कौन सा अभियोग लगाते हैं?’’ 30) उन्होने उत्तर दिया, ’’यदि यह कुकर्मी नहीं होता, तो हमने इसे आपके हवाले नहीं किया होता’’। 31) पिलातुस ने उन से कहा, ’’आप लोग इसे ले जाइए और अपनी संहिता के अनुसार इसका न्याय कीजिये।’’ यहूदियों ने उत्तर दिया, ’’हमें किसी को प्राणदंण्ड देने का अधिकार नहीं है’’। 32) यह इसलिये हुआ कि ईसा का वह कथन पूरा हो जाये, जिसके द्वारा उन्होने संकेत किया था कि उनकी मृत्यु किस प्रकार की होगी। 33) तब पिलातुस ने फिर भवन में जा कर ईसा को बुला भेजा और उन से कहा, ’’क्या तुम यहूदियों के राजा हो?’’ 34) ईसा ने उत्तर दिया, ’’क्या आप यह अपनी ओर से कहते हैं या दूसरों ने आप से मेरे विषय में यह कहा है?’’ 35) पिलातुस ने कहा, ’’क्या मैं यहूदी हूँ? तुम्हारे ही लोगों और महायाजकों ने तुम्हें मेरे हवाले किया। तुमने क्या किया है।’’ 36) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता तो मेरे अनुयायी लडते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं है।’’ 37) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, ’’तो तुम राजा हो?’’ ईसा ने उत्तर दिया, ’’आप ठीक ही कहते हैं। मैं राजा हूँ। मैं इसलिये जन्मा और इसलिये संसार में आया हूँ कि सत्य के विषय में साक्ष्य पेश कर सकूँ। जो सत्य के पक्ष में है, वह मेरी सुनता है।’’ 38) पिलातुस ने उन से कहा, ’’सत्य क्या है?’’ वह यह कहकर फिर बाहर गया और यहूदियों के पास आ कर बोला, ’’मैं तो उस में कोई दोष नहीं पाता हूँ, 39) लेकिन तुम्हारे लिये पास्का के अवसर पर एक बन्दी को रिहा करने का रिवाज है। क्या तुम लोग चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये यहूदियों के राजा को रिहा कर दूँ?’’ 40) इस पर वे चिल्ला उठे, ’’इसे नहीं, बराब्बस को’’। बराब्बस डाकू था। 1) तब पिलातुस ने ईसा को ले जा कर कोडे लगाने का आदेश दिया। 2) सैनिकेां ने काँटों का मुकुट गूँथ कर उनके सिर पर रख दिया और उन्हें बैंगनी कपडा पहनाया। 3) फिर वे उनके पास आ-आ कर कहते थे, ’’यहूदियों के राजा प्रणाम!’’ और वे उन्हें थप्पड मारते जाते थे। 4) पिलातुस ने फिर बाहर जा कर लोगों से कहा, ’’देखो मैं उसे तुम लोगों के सामने बाहर ले आता हूँ, जिससे तुम यह जान लो कि मैं उस में कोई दोष नहीं पाता’’। 5) तब ईसा काँटों का मुकुट और बैगनी कपडा पहने बाहर आये। पिलातुस ने लोगों से कहा, ’’यही है वह मनुष्य!’’ 6) महायाजक और प्यादे उन्हें देखते ही चिल्ला उठे, ’’इसे क्रूस दीजिये! इसे क्रूस दीजिये!’’ पिलातुस ने उन से कहा, ’’इसे तुम्हीं ले जाओ और क्रूस पर चढाओ। मैं तो इस में कोई दोष नहीं पाता।’’ 7) यहूदियों ने उत्तर दिया, ’’हमारी एक संहिता है और उस संहिता के अनुसार यह प्राणदंण्ड के योग्य है, क्योंकि इसने ईश्वर का पुत्र होने का दावा किया है।’’ 8) पिलातुस यह सुनकर और भी डर गया। 9) उसने फिर भवन के अन्दर जा कर ईसा से पूछा, ’’तुम कहाँ के हो?’’ किन्तु ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया। 10) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, ’’तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा करने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी? 11) ईसा ने उत्तर दिया, ’’यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता। इसलिये जिसने मुझे आपके हवाले किया, वह अधिक दोषी है।’’ 12) इसके बाद पिलातुस ईसा को मुक्त करने का उपाय ढूँढ़ता रहा, परन्तु यहूदी यह कहते हुये चिल्लाते रहे, ’’यदि आप इसे रिहा करते हैं, तो आप कैसर के हितेषी नहीं हैं। जो अपने को राजा कहता है वह कैसर का विरोध करता है।’’ 13) यह सुनकर पिलातुस ने ईसा को बाहर ले आने का आदेश दिया। वह अपने न्यायासन पर उस जगह, जो लिथोस-त्रोतोस, और इब्रानी में गबूबथा, कहलाती है, बैठ गया। 14) पास्का की तैयारी का दिन था। लगभग दोपहर का समय था। पिलातुस ने यहूदियों से कहा, ’’यही ही तुम्हारा राजा!’’ 15) इस पर वे चिल्ला उठे, ’’ले जाइये! ले जाइए! इसे क्रूस दीजिये!’’ पिलातुस ने उन से कहा क्या, ’’मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चढवा दूँ?’’ महायाजकों ने उत्तर दिया, ’’कैसर के सिवा हमारा कोई राजा नहीं’’। 16) तब पिलातुस ने ईसा को कू्रस पर चढाने के लिये उनके हवाले कर दिया। 17) वे ईसा को ले गये और वह अपना कू्रस ढोते हुये खोपडी की जगह नामक स्थान गये। इब्रानी में उसका नाम गोलगोथा है। 18) वहाँ उन्होंने ईसा को और उनके साथ और दो व्यक्तियों को कू्रस पर चढाया- एक को इस ओर, दूसरे को उस ओर और बीच में ईसा को। 19) पिलातुस ने एक दोषपत्र भी लिखवा कर क्रूस पर लगवा दिया। वह इस प्रकार था- ’’ईसा नाज़री यहूदियों का राजा।’’ 20) बहुत-से यहूदियों ने यह दोषपत्र पढा क्योंकि वह स्थान जहाँ ईसा कू्स पर चढाये गय थे, शहर के पास ही था और दोष पत्र इब्रानी, लातीनी और यूनानी भाषा में लिखा हुआ था। 21) इसलिये यहूदियों के महायाजकों ने पिलातुस से कहा, ’’आप यह नहीं लिखिये- यहूदियों का राजा; बल्कि- इसने कहा कि मैं यहूदियों का राजा हूँ’’। 22) पिलातुस ने उत्तर दिया, ’’मैंने जो लिख दिया, सो लिख दिया।’’ 23) ईसा को कू्रस पर चढाने के बाद सैनिकों ने उनके कपडे ले लिये और कुरते के सिवा उन कपडों के चार भाग कर दिये- हर सैनिक के लिये एक-एक भाग। उस कुरते में सीवन नहीं था, वह ऊपर से नीचे तक पूरा-का-पूरा बुना हुआ था। 24) उन्होंने आपस में कहा, ’’हम इसे नहीं फाडें। चिट्ठी डालकर देख लें कि यह किसे मिलता है। यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उन्होंने मेरे कपडे आपस में बाँट लिये और मेरे वस्त्र पर चिट्ठी डाली। सैनिकेां ने ऐसा ही किया। 25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं। 26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, ’’भद्रे! यह आपका पुत्र है’’। 27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, ’’यह तुम्हारी माता है’’। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया। 28) तब ईसा ने यह जान कर कि अब सब कुछ पूरा हो चुका है, धर्मग्रन्थ का लेख पूरा करने के उद्देश्य से कहा, ’’मैं प्यासा हूँ’’। 29) वहाँ खट्ठी अंगूरी से भरा एक पात्र रखा हुआ था। लेागों ने उस में एक पनसोख्ता डुबाया और उसे जूफ़े की डण्डी पर रख कर ईसा के मुख से लगा दिया। 30) ईसा ने खट्ठी अंगूरी चखकर कहा, ’’सब पूरा हो चुका है’’। और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिये। 31) वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन कू्रस पर रह जाये क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्यौहार पडता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड दी जाये और शव हटा दिये जायें। 32) इसलिये सैनिकेां ने आकर ईसा के साथ क्रूस पर चढाये हुये पहले व्यक्ति की टाँगें तोड दी, फिर दूसरे की। 33) जब उन्होंने ईसा के पास आकर देखा कि वह मर चुके हैं तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोडी; 34) लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला। 35) जिसने यह देखा है, वही इसका साक्ष्य देता है, और उसका साक्ष्य सच्चा है। वह जानता है कि वह सच बोलता है, जिससे आप लोग भी विश्वास करें। 36) यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उसकी एक भी हड्डी नहीं तोडी जायेगी; 37) फिर धर्मग्रन्थ का एक दूसरा कथन इस प्रकार है- उन्होंने जिसे छेदा, वे उसी की ओर देखेगें। 38) इसके बाद अरिमथिया के यूसुफ ने जो यहूदियों के भय के कारण ईसा का गुप्त शिष्य था, पिलातुस से ईसा का शब ले जाने की अनुमति माँगी। पिलातुस ने अनुमति दे दी। इसलिये यूसुफ आ कर ईसा का शव ले गया। 39) निकोदेमुस भी पहुँचा, जो पहले रात को ईसा से मिलने आया था। वह लगभग पचास सेर का गंधरस और अगरू का सम्मिश्रण लाया। 40) उन्होंने ईसा का शव लिया और यहूदियों की दफन की प्रथा के अनुसार उसे सुगंधित द्रव्यों के साथ छालटी की पट्टियों में लपेटा। 41) जहाँ ईसा कू्रस पर चढाये गये थे, वहाँ एक बारी थी और उस बारी में एक नयी कब्र, जिस में अब तक कोई नहीं रखा गया था। 42) उन्होंने ईसा को वहीं रख दिया, क्योंकि वह यहूदियों के लिये तेयारी का दिन था और वह कब्र निकट ही थी। 📚 मनन-चिंतन दुख-तकलीफ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा है। किन्तु फिर भी मनुष्य मुख्यतः यही प्रयास करता है कि वह दुख से बचकर सुख और आराम पाता रहें। ट्रेन, होटलों आदि में यात्रा करने या ठहरने की श्रेणीयॉ या वर्ग होते है। उच्च श्रेणीयों में यात्रा करने से हमें अधिक सुविधा और आराम मिलता है जिसके एवज में हमें ज्यादा पैसा खर्च करना पडता है। हांलाकि साधारण श्रेणी के टिकट से भी हम उसी जगह पहुंचते जहॉ उच्च श्रेणी के लोग लेकिन हम अधिकांशः सुविधाजनक एवं आरामदेह यात्रा को ही प्राथमिकता देते हैं। लेकिन प्रभु येसु दुख से बचने के लिये हमें कोई शिक्षा या मार्ग नहीं दिखाते है। उन्होंने दुखभोग एवं क्रूस-मरण को ही जीवन की प्राथमिकता तथा उददेश्य बताया। उन्होंने अपने दुखःभोग एवं मरण के द्वारा ही मानव-जाति की मुक्ति का द्वार खोला। गेथसेमनी की बारी में येसु ने पिता से प्रार्थना की वे इस भावी प्राणा पीडा का प्याला उनसे हटा ले किन्तु उन्होंने पिता की इच्छा को पूरी करने में ही अपना सुख समझा फिर चाहे वह भले ही दुखभोग एवं मरण ही क्यों न हो। जीवन में स्थायी बने रहने वाले सुख और शांति तब आती है जब हम सही काम करे। ऐसा करने से भले ही कष्ट क्यों न हो किन्तु भलाई और सत्य के काम ही सच्ची और स्थायी शांति प्रदान करते हैं। जीवन में सांसारिक सुख के लिये हमें कई बार समझौते करने पडते हैं। हम चारों ओर से खतरे तथा असुरक्षा की भावना से घेरे रहते हैं। इसलिये हमारी कोशिश सुख सुनिश्चित करने की होती है तथा इसे हासिल करने के लिये हम अनेक बार नैतिक मूल्यों के साथ समझौता करते हैं। किन्तु अपनी नासमझी में हम यह भूल जाते ही सच्चा एवं स्थायी सुख तो ईश्वर का जीवन जी कर आता है उसके लिये चाहे हमें कष्ट ही क्यों न झेलना पडे। येसु निर्दोष थे। उन्होंने कोई पाप नहीं किया था। उन्होंने सदैव वहीं किया जो सही था तथा अपने भलाई के कार्यों के द्वारा लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को पुनः लौटाया। उन्होंने खुले तौर पर सच्ची शिक्षा दी किन्तु फिर भी उन पर साजिश, ईशनिंदा आदि जैसे मनगणंत आरोप मढे गये। किन्तु येसु जानते थे कि उनका दुखभोग और मरण पिता की योजना का हिस्सा है। कोई भी उनका जीवन उनसे नहीं ले सकता था। जब पिलासुन ने उनसे कहा, ’’तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा करने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी? ईसा ने उत्तर दिया, ’’यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता।’’ (योहन 19:10-11) और यहूदियों को उन्होंने और भी स्पष्ट रूप से कहा, ’’मैं अपना जीवन अर्पित करता हूँ, बाद में मैं उसे फिर ग्रहण करूँगा। कोई मुझ से मेरा जीवन नहीं हर सकता, मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता की ओर से यह आदेश मिला है।’’ (योहन 10:17-18) इस प्रकार येसु के दुखभोग में कुडवाहट एवं खेद की भावना नहीं। उनका दुखभोग कठिन है किन्तु वह उन्हें स्वीकार्य है क्योंकि यह पिता को प्रिय है। पुण्य शुक्रवार जीवन के दुख से भागने या बचने का कोई झूठा एवं छदम् सब्जबाग नहीं दिखाता है। वह जो सही और सच्चा है उसे अपनाकर, सबकुछ पिता की इच्छा पर छोडकर, बहादुरी के साथ आगे बढने का प्रस्ताव रखता है। हम हमारे दुख को किसी पुरस्कार से जोडकर देखते हैं। लोग दुख उठाने को तैयार हो जाते हैं किन्तु किसके एवज में। वह जानना चाहते है कि इससे क्या लाभ होगा। किन्तु धर्मग्रंथ हमें बताता है कि धर्मी के दुखभोग का पुरस्कार स्वयं ईश्वर होता है। योब के दुख का कारण उसकी धार्मिकता थी। शैतान उसे दुख पहुंचाता है ताकि वह अपनी धार्मिकता त्याग दे। योब ने अत्याधिक दुख और हानि उठायी किन्तु उसने ईश्वर को और उसकी धार्मिकता को नहीं त्यागा। ईश्वर स्वयं उसका पुरस्कार था। कई नबियों ने भी धार्मिकता के कारण दुख उठाये वह पुरस्कार जो स्वयं ईश्वर होगा उस पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इसी प्रकार हमारे जीवन में भी दुखभोग आता है। हमें इससे घबरा कर भागना नहीं चाहिये और झूठी सुरक्षा के पीछे नहीं भागना चाहिये। इसके विपरीत जो भी हम अपनी मानवीय क्षमता के अनुसार कर सकते वही करना चाहिये बाकि जो भी हो उसे ईश्वर की इच्छा मानकर सहना चाहिये। हमें नहीं भूलना चाहिये कि पिता की इच्छा के बिना हमारे सिर का बाल भी नहीं गिरता तो फिर पिता के लिये हमारा जीवन कहीं अधिक मूल्यवान है। हमारे कष्ट और पीडा उससे छिपे हुये नहीं है। वह हमें न सिर्फ सहनशक्ति प्रदान करता है बल्कि जो ख्राीस्तीय साहस के साथ अपने दुःखों को वहन करते हैं उन्हें पुरस्कार भी उन्हें प्रदान करता है। 📚 REFLECTION Suffering is the integral part of human life. Yet most common attempts of human beings have been to avoid suffering and gain comfort. In the trains, hotels etc. we have classes and categories to be availed while travelling and If we want more comfort then we must pay more. The general class will serve the same purpose and take you to same destination as the first-class but it won’t be comfortable. To avoid any inconvenience, we must take a premium class ticket or reservation. This has been the tendency in all ages. But Jesus does not offer a way out of suffering but a way to go through it. It was Cross that brought the salvation and eternal comfort. In the Garden of Gethsemane Jesus prayed to have the cup of suffering be taken away yet he found comfort in doing the will of God. Lasting peace and happiness come when we do what is right even if it causes up pain and loss. To gain the worldly comfort and to prolong it we make a lot of compromises in life. We are surrounded by the threat of danger and insecurity. So, we try to ensure our safety and comfort by the worldly means even if they are unethical and corrupt. But when we stand for the right and even suffer for it we experience and gain God’s favour and lasting peace and happiness. Jesus was innocent. He committed no sin. He did what was right and brought restoration of health and life to the people. He taught them the right things in the open, yet he was unjustly condemned of crimes which were far-fetched and flimsy. But Jesus already knew that no one can take away his life or do any harm to him. In response to Pilot’s exclamation, “Do you not know that I have power to release you, and power to crucify you?’ Jesus answered, “You would have no power over me unless it had been given you from above;” (John 19:10-11) and to the Jews he said even more clearly, “I lay down my life in order to take it up again. No one takes it from me, but I lay it down of my own accord. I have power to lay it down, and I have power to take it up again. I have received this command from my Father.’ (John 10:17-18) So in Jesus’ suffering there are no grudges and force. It is difficult but it is acceptable because this is what pleases God. Good Friday offers no short cuts and false promises but a stark truth to accept life and its suffering and pain with a brave heart. Often suffering is related with a reward. People are ready to undergo suffering but for what. They would like to know the package. God himself is the reward of the suffering of the righteous. The reason of Job’s suffering was his righteousness. Devil wanted to trouble him so that he may forfeit his righteousness. He underwent extreme suffering but remained righteous. God was his reward. So therefore, in our life too there difficult and painful moments. We do not have get panicked and take all safety measure to avoid pain. But rather do all that in normal human capacity and rest accept it as the will of the father, without his knowledge not even the hair of your heads falls. Our pain and difficulties are not hidden from him. He provides endurance as well the reward to those who bravely take it upon himself. मनन-चिंतन - 2 एक गैरख्रीस्तीय व्यक्ति अपनी पत्नी को लेकर ख्रीस्तीय मिशनरियों द्वारा संचालित एक अस्पताल गया। उसकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार थी। इसलिए वह बहुत चिंतित और बेचैन था। उसने वहाँ एक प्रार्थनालय देखा। उसने सोचा कि मन को शान्त करने के लिए थोडी देर प्रार्थनालय में बैठ जाता हूँ। उसने प्रार्थनालय में प्रवेश किया। उसने क्रूसित प्रभु की मूर्ति की ओर देखा और सोचने लगा कि यह तो मुझ से भी ज़्यादा परेशान दिख रहा है, यह मेरी मदद कैसे कर सकता है? परन्तु, कुछ ही क्षण में उसकी सोच बदल गयी। उसे लगा कि यह मुझ से भी ज़्यादा परेशान है, इसने मुझ से भी ज़्यादा दुख-दर्द का अनुभव किया। इसलिए यह मेरी परेशानी को आसानी से समझेगा, यह मेरे दुख-दर्द को ठीक से जानता है। फिर वह जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर अपनी समस्याओं को क्रूसित प्रभु के सामने रखने लगा। उसे एक प्रकार की शांति महसूस हुयी। उसे लगा कि उसका बोझ हलका हो गया। पवित्र वचन कहता है, “हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है। इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी।” (इब्रानियों 4:15-16) यह सच है कि इतिहास में प्रभु येसु के समान किसी ने इतना दुख-दर्द नहीं सहा। कई धर्मों के देवी-देवताएं शारीरिक रीति से ही बहुत शक्तिशाली दिखते हैं। किसी के कई हाथ होते हैं, किसी के कई सिर और कई देवताओं के हाथों में भाले या तलवार जैसे हथियार भी होते हैं। अगर कोई वर्तमान युग में देवी-देवताओं की कल्पना करता है तो वे शायद ए.के-47 राइफल लेकर खडे होते नजर आयेंगे। यह सच नहीं है कि हमारे प्रभु ईश्वर के पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं। उनके पास एक अन्य प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं। हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त के अस्त्र-शस्त्र आध्यात्मिक जीवन के अस्त्र-शस्त्र होते हैं। वे हमारे पास प्यार, दया और अनुकम्पा लेकर आते हैं। संत पौलुस हमें बताते हैं कि प्रभु येसु के अनुयायियों को किस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करना चाहिए। “आप ईश्वर के अस्त्र-शस्त्र धारण करें, जिससे आप दुर्दिन में शत्रु का सामना करने में समर्थ हों और अन्त तक अपना कर्तव्य पूरा कर विजय प्राप्त करें। आप सत्य का कमरबन्द कस कर, धार्मिकता का कवच धारण कर और शान्ति-सुसमाचार के उत्साह के जूते पहन कर खड़े हों। साथ ही विश्वास की ढाल धारण किये रहें। उस से आप दुष्ट के सब अग्निमय बाण बुझा सकेंगे। इसके अतिरिक्त मुक्ति का टोप पहन लें और आत्मा की तलवार - अर्थात् ईश्वर का वचन - ग्रहण करें।” (एफेसियों 6:13-17) क्रूस पर टंगे प्रभु येसु हमारे लिए केवल एक आदर्श नहीं हैं। वह हमारे ईश्वर है जो हमारे सामने हमारे अपने जीवन के रहस्यों को प्रकट करते हैं। जो जीवन हमने उनसे पाया है, उस जीवन को हमें किस प्रकार निभाना चाहिए – यह भी प्रभु हमें बताते हैं। क्रूस विश्वासियों के दैनिक जीवन का अभिन्न अंग है। इसी कारण प्रभु ने अपने शिष्यों से अपने प्रतिदिन के क्रूस उठा कर उनके पीछे चलने को कहा है (देखिए लूकस 9:23)। क्रूस हमारी मुक्ति का मार्ग है। प्रवक्ता ग्रन्थ, अध्याय 4 इस बात पर प्रकाश डालता है कि ईश्वर की प्रज्ञा की खोज में निकलने वालों के साथ क्या होता है। ईश्वर उन्हें प्यार करते हैं, उन्हें आशीर्वाद और सुरक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन यह सब प्रदान करने की प्रक्रिया उतनी सरल नहीं है। पवित्र वचन कहता है, “प्रारम्भ में प्रज्ञा उसे टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर ले चलेगी और उसकी परीक्षा लेगी। वह उस में भय तथा आतंक उत्पन्न करेगी। वह अपने अनुशासन से उसे उत्पीड़ित करेगी और तब तक अपने नियमों से उसकी परीक्षा करती रहेगी, जब तक वह उस पूर्णतया विश्वास नहीं करती। इसके बाद वह उसे सीधे मार्ग पर ले जा कर आनन्दित कर देगी और उस पर अपने रहस्य प्रकट करेगी। वह उसे ज्ञान और न्याय का विवेक प्रदान करेगी।” (प्रवक्ता 4:18-21) अगर हम इन वचनों पर ध्यान देंगे तो हमें पता चलेगा कि मुक्ति का मार्ग क्रूस का मार्ग है और क्रूस के बिना हमें मुक्ति नहीं मिल सकती। जो ईश्वर की प्रज्ञा की इस प्रक्रिया में सकारात्मक रवैया नहीं अपनायेगा, वह मुक्ति से वंचित रह जायेगा। इसलिए पवित्र वचन आगे कहता है, “किन्तु यदि वह भटक जायेगा, तो वह उसका त्याग करेगी और उसे विनाश के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए छोड़ देगी” (प्रवक्ता 4:22)। यही प्रभु येसु की शिक्षा का सारांश भी है। प्रभु येसु कहते हैं, “सॅकरे द्वार से प्रवेश करो। चौड़ा है वह फाटक और विस्तृत है वह मार्ग, जो विनाश की ओर ले जाता है। उस पर चलने वालों की संख्या बड़ी है। किन्तु सॅकरा है वह द्वार और संकीर्ण है वह मार्ग, जो जीवन की ओर ले जाता है। जो उसे पाते हैं, उनकी संख्या थोड़ी है।” (मत्ती 7:13-14) आईए, आज के दिन हम अपने क्रूस के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें, क्योंकि वह हमारी मुक्ति का मार्ग है। हम पिता ईश्वर से निवेदन करें कि वे हमें अपने क्रूस को ढोने की शक्ति प्रदान करें। ✍ -Br.Biniush Topno  Copyright © www.catholicbibleministry1.blogspot.com Praise the Lord!

03 अप्रैल 2022, इतवार

 

03 अप्रैल 2022, इतवार

चालीसे का पाँचवाँ इतवार

पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ 43:16-21


16) प्रभु ने समुद्र में मार्ग बनाया और उमड़ती हुई लहरों में पथ तैयार किया था।

17) उसने रथ, घोड़े और एक विशाल सेना बुलायी। वे सब-के-सब ढेर हो गये और फिर कभी नहीं उठ पाये। वे बत्ती की तरह जल कर बुझ गये। वही प्रभु कहता है:

18) “पिछली बातें भुला दो, पुरानी बातें जाने दो।

19) देखो, मैं एक नया कार्य करने जा रहा हूँ। वह प्रारम्भ हो चुका है। क्या तुम उसे नहीं देखते? मैं मरुभूमि में मार्ग बनाऊँगा और उजाड़ प्रदेश में पथ तैयार करूँगा।

20) जंगली जानवर, गीदड़ और शुतुरमुर्ग मुझे धन्य कहेंगे, क्योंकि मैं अपनी प्रजा की प्यास बुझाने के लिए मरुभूमि में जल का प्रबन्ध करूँगा और उजाड़ प्रदेश में नदियाँ बहाऊँगा।

21) मैंने यह प्रजा अपने लिए बनायी है। यह मेरा स्तुतिगान करेगी।



दूसरा पाठ : फ़िलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:8-14



8) इतना ही नहीं, मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ,

9) जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उनके साथ पूर्ण रूप से एक हो जाऊँ। मुझे अपनी धार्मिकता का नहीं, जो संहिता के पालन से मिलती है, बल्कि उस धार्मिकता का भरोसा है, जो मसीह में विश्वास करने से मिलती है, जो ईश्वर से आती है और विश्वास पर आधारित है।

10) मैं यह चाहता हूँ कि मसीह को जान लूँ, उनके पुनरूत्थान के सामर्थ्य का अनुभव करूँ और मृत्यु में उनके सदृश बन कर उनके दुःखभोग का सहभागी बन जाऊँ,

11) जिससे मैं किसी तरह मृतकों के पुनरूत्थान तक पहुँच सकूँ।

12) मैं यह नहीं जानता कि मैं अब तक यह सब कर चुका हूँ या मुझे पूर्णता प्राप्त हो गयी है! किन्तु मैं आगे बढ़ रहा हूँ ताकि वह लक्ष्य मेरी पकड़ में आये, जिसके लिए ईसा मसीह ने मुझे अपने अधिकार में ले लिया।

13) भाइयो! मैं यह नहीं समझता कि वह लक्ष्य अब तक मेरी पकड़ में आया है। मैं इतना ही कहता हूँ कि पीछे की बातें भुला कर और आगे की बातों पर दृष्टि लगा कर

14) मैं बड़ी उत्सुकता से अपने लक्ष्य की ओर दौड़ रहा हूँ, ताकि मैं स्वर्ग में वह पुरस्कार प्राप्त कर सकूँ, जिसके लिए ईश्वर ने हमें ईसा मसीह में बुलाया है।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 8:1-11



1) और ईसा जैतून पहाड़ गये।

2) वे बड़े सबेरे फिर मंदिर आये। सारी जनता उनके पास इकट्ठी हो गयी थी और वे बैठ कर लोगों को शिक्षा दे रहे थे।

3) उस समय शास्त्री और फरीसी व्यभिचार में पकड़ी गयी एक स्त्री को ले आये और उसे बीच में खड़ा कर,

4) उन्होंने ईसा से कहा, "गुरुवर! यह स्त्री व्यभिचार करते हुए पकड़ी गयी है।

5) संहिता में मूसा ने हमें ऐसी स्त्रियों को पत्थरों से मार डालने का आदेश दिया है। आप इसके विषय में क्या कहते हैं?"

6) उन्होंने ईसा की और परीक्षा लेते हुए यह कहा, जिससे उन्हें उन पर दोष लगाने का काई आधार मिले। ईसा झुक कर उँगली से भूमि पर लिखते रहे।

7) जब वे उन से उत्तर देने के लिए आग्रह करते रहे, तो ईसा ने सिर उठा कर उन से कहा, "तुम में जो निष्पाप हो, वह इसे सब से पहले पत्थर मारे"।

8) और वे फिर झुक कर भूमि पर लिखने लगे।

9) यह सुन कर बड़ों से ले कर छोटों तक, सब-के-सब , एक-एक कर खिसक ईसा अकेले रह गये और वह स्त्री सामने खड़ी रही।

10) तब ईसा ने सिर उठा कर उस से कहा, "नारी! वे लोग कहाँ हैं? क्या एक ने भी तुम्हें दण्ड नहीं दिया?"

11) उसने उत्तर दिया, "महोदय! एक ने भी नहीं"। इस पर ईसा ने उस से कहा, "मैं भी तुम्हें दण्ड नहीं दूँगा। जाओ और अब से फिर पाप नहीं करना।"



📚 मनन-चिंतन



व्यभिचार में फंसी महिला की घटना में समाज के सभी वर्गों के लिए गहरा संदेश है। हम समाज का हिस्सा होने के कारण इनसे बच भी नहीं सकते।

येसु हमें सिखाते हैं कि किसी और का न्याय करने से पहले हमें स्वय का न्याय करने की जरूरत है। इस महिला को न्याय के लिए लाने वाले पाखंडी धार्मिक नेताओं ने खुद का न्याय नहीं किया। उन्हें व्यभिचारी महिला बनाने में अपनी भागीदारी या योगदान की परवाह नहीं थी। येसु के शब्द 'वह पहला पत्थर फेंके, उन्हें उनके आरोपों की गंभीरता की याद दिलाने के लिए थे। उद्देश्य मायने रखते हैं। सिराच की पुस्तक कहती है, "एक चिंगारी से बहुत से अंगारे जलते हैं, और एक पापी लहू बहाने की प्रतीक्षा में रहता है।" (11:32) संक्षेप में, येसु कह रहे हैं, इससे पहले कि आप उस पत्थर को उठाएँ, एक अच्छी नज़रआईने में स्वयं पर भी डालें । सुनिश्चित करें कि आप इस महिला को मौत के घाट उतारने के लिए नैतिक रूप से योग्य हैं। सुनिश्चित करें कि कोई द्वेष नहीं है, कोई छल नहीं है, कोई कपट नहीं है, कोई बेईमानी नहीं है, और सुनिश्चित करें कि आप स्वयं उसी अपराध के दोषी नहीं हैं। वह उन्हें याद दिला रहे है कि यदि वे दुर्भावनापूर्ण या धोखे से गवाही देते हैं, तो वे स्वयं पर न्याय को आमंत्रित कर रहे हैं। येसु हमसे कहते हैं कि दूसरों पर फेंकने के लिए पत्थर मत उठाओ, जबकि हम स्वयं पत्थरवाह के पात्र हैं यदि हमारे सारे पाप सार्वजनिक हो जाए तो।

येसु ने उस स्त्री से कहा, 'मैं भी तुम्हे दोषी नहीं ठहराता।' स्त्री को गरिमा प्रदान करने के द्वारा येसु बताते हैं कि हमारा जीवन हमारे पाप से बढ़कर है। हम पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हो सकते हैं। हम इस पाप से हमेशा के लिए दूर हो सकते हैं। हम एक नया जीवन जी सकते हैं। हम अपने पिछले पाप के लिए दण्ड के बिना जी सकते हैं क्योंकि जैसा कि रोमियों 8:1 कहता है, "इसलिये अब जो मसीह येसु में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।"

येसु ने हमें दण्ड नहीं दिया परन्तु हमारे लिए दण्ड सहा है। येसु उस महिला को मरने दे सकते थे, लेकिन इसके बजाय, उन्होंने उसे माफ कर दिया और उसके पाप के लिए मरने के लिए क्रूस पर उसकी जगह ले ली। हमें सभी अपराध बोध से छुटकारा पाने और उस क्षमा और नए जीवन का अनुभव करने की आवश्यकता है जो येसु हमें देते है।



📚 REFLECTION



In the incident of the woman caught up in adultery has profoundly filled with messages to all the sections of the society. We being part of society can not escape them either.

Jesus teaches us that we need to judge ourselves before we judge anyone else. The hypocritical religious leaders who brought this woman to be judged did not judge themselves. They did not care about their own involvement or contribution in making her an adulterous woman. Jesus’ words ‘Let him throw the first stone, remind them of the seriousness of their charges. Motives do matter. Book of Sirach says, “From a spark, many coals are kindled, and a sinner lies in wait to shed blood.”(11:32) In essence, Jesus is saying, before you pick up that stone, take a good look in the mirror. Make sure you are morally qualified to put this woman to death. Make sure there is no malice, no deceit, no trickery, no dishonesty, and make sure you are not guilty of the same crime yourself. He is reminding them that if they testify maliciously or deceitfully, they are inviting judgment on themselves. Jesus tells us not to pick stones to throw at others while we ourselves deserve to be stoned if we our sins are to be made public.

Jesus tells the woman, ‘Neither do I condemn you.’ By restoring the woman to dignity Jesus explains that there is more to our life than our sin. We can be much more than we have been. We can turn from this sin once and for all. we can have a new life. We can live without condemnation for our past sin because as Romans 8:1 says, “There is therefore now no condemnation for those who are in Christ Jesus.”

Jesus does not punish us but was punished for us. Jesus could have put the woman to death, but instead, He forgave her and took her place on the cross to die for her sin. We need to get rid of all guilt and experience the forgiveness and new life that Jesus gives us.



मनन-चिंतन - 2


जब हम अपने ईश्वर की ओर देखते हैं, तब हमें एहसास होता है कि ईश्वर महान और सर्वगुणसंपन्न हैं। साथ-साथ हमें यह भी ज्ञात होता है कि हम कितने छोटे और अयोग्य हैं। हम सब पापी हैं। फिर भी मौके मिलने पर हम अपने पापों तथा कमियों को छिपा कर दूसरों के पापों तथा कमियों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत कर उन पर आरोप लगाने लगते हैं, उनकी आलोचना करने लगते हैं। यह हमारे आध्यात्मिक रीति से परिपक्व न होने का प्रमाण है। इसलिए मत्ती 7:3 में प्रभु येसु सवाल उठाते हैं, “जब तुम्हें अपनी ही आँख की धरन का पता नहीं, तो तुम अपने भाई की आँख का तिनका क्यों देखते हो?”

इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण हमें आज के सुसमाचार में मिलता है। सदूकी और फरीसी अपने पापों को छिपा कर व्यभिचार में पकडी गयी एक स्त्री के पापों को बढ़ा-चढ़ा कर बता कर उस पर आरोप लगाते हैं और मूसा की संहिता के अनुसार उसे दण्ड देने की बात करते हैं। येसु का ध्यान कानून पर नहीं, बल्कि मुक्ति पर है। येसु उस स्त्री पर अनुकम्पा तथा दया दिखाते हैं। साथ-साथ वे उसे पापों का कुमार्ग छोड़ कर मुक्ति का पावन मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। येसु का रवैया उस महिला के अन्दर पश्चात्ताप उत्पन्न कर सकता है। प्रभु ईश्वर यह नहीं चाहते हैं कि किसी का सर्वनाश हो।

योहन 3:16-17 में पवित्र वचन कहता है – “ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे। ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार में इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।” एज़ेकिएल 18:30-32 में प्रभु कहते हैं, “मैं हर एक का उसके कर्मों के अनुसार न्याय करूँगा। तुम मेरे पास लौट कर अपने सब पापों को त्याग दो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे अपराधों के कारण तुम्हारा विनाश हो जाये। अपने पुराने पापों का भार फेंक दो। एक नया हृदय और एक नया मनोभाव धारण करो। प्रभु-ईश्वर यह कहता है-इस्राएलियों! तुम क्यों मरना चाहते हो? मैं किसी भी मनुष्य की मृत्यु से प्रसन्न नहीं होता। इसलिए तुम मेरे पास लौट कर जीते रहो।”

प्रभु येसु ने साऊल नामक युवक को उसकी दमिश्क यात्रा में अपना कुमार्ग छोड़ कर सन्मार्ग अपनाने का अवसर दिया। आगे चल कर साऊल संत पौलुस बनता है और स्वर्गराज्य के लिए महान कार्य करता है। आज के दूसरे पाठ में संत पौलुस कहते हैं, “मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उनके साथ पूर्ण रूप से एक हो जाऊँ।” (फिलिप्पियों 3:8-9)

प्रभु येसु किसी पर भी दोष नहीं लगाते हैं – न व्यभिचारिणी पर और न हीं उस पर आरोप लगाने वाले सदूकियों तथा फरीसियों पर। वे सब के अन्तकरण को जगाते हैं ताकि वे स्वयं ईश्वर के समक्ष अपनी अयोग्यता को महसूस करें और अपने पापों तथा गुनाहों को कबूल कर अपने जीवन में परिवर्तन लायें। हमारे नज़रिये किसी भी प्रकार के क्यों न हों, हमारी प्रवृत्तियाँ किसी भी तरह की क्यों न हों, आज प्रभु हमारे अन्तकरण को जगाना चाहते हैं। साथ-साथ वे हमें आह्वान करते हैं कि हम फिर पाप न करें।

प्रभु येसु के व्यवहार से हमें यह प्रेरणा भी मिलती है कि सुसमाचार सुनने और सुनाने वालों को किसी को भी हतोत्साहित या निराश नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित कर सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए। प्रवक्ता 28:12 कहता है, “चिनगारी पर फूँक मारों और वह भड़केगी, उस पर थूक दो और वह बुझेगी: दोनों तुम्हारे मुँह से निकलते हैं”। आज हमें तय करना चाहिए कि किस मनोभाव का चयन करेंगे – प्रभु येसु के मनोभाव का या सदूकियों तथा फरीसियों के मनोभाव का?

हमें दूसरों पर दोष लगाने की अपनी प्रवणता पर काबू पाना चाहिए। प्रभु कहते हैं, “दोष नहीं लगाओ, जिससे तुम पर भी दोष न लगाया जाये” (मत्ती 7:1)। आदम ने पाप का आरोप हेवा पर लगाया और हेवा ने साँप पर (देखिए उत्पत्ति 3:12-13)। सोने का बछड़ा बनाने का अरोप हारून ने लोगों पर लगाया (देखिए निर्गमन 32:21-24)। राजा साऊल ने अवैध बलिदान चढ़ाने का कारण नबी समुएल के देर करना बताया (देखिए 1समुएल 13:11-12)। इस प्रकार हम अपनी कमियों और पापों के लिए भी दूसरों पर दोष लगाते हैं। राजा दाऊद की महानता इस में थी कि उन्होंने अपने पापों को स्वीकार किया और पश्चात्ताप किया। यह संत पेत्रुस और संत पौलुस की भी विशेषता थी। आईए हम भी विनम्रता से अपने पापों को स्वीकारें और पश्चात्ताप करें।

✍ -𝘽𝙧. 𝘽𝙞𝙣𝙞𝙪𝙨𝙝 𝙏𝙤𝙥𝙣𝙤




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27 मार्च 2022, इतवार चालीसे का चौथा इतवार

 

27 मार्च 2022, इतवार

चालीसे का चौथा इतवार

पहला पाठ : योशुआ 5:9-12


9) प्रभु ने योशुआ से कहा आज मैंने तुम लोगों पर से मिस्र का कलंक दूर किया इसलिए उस स्थान का नाम आज तक गिलगाल है।

10) इस्राएलियों ने गिलगाल में पडाव डाला और वहाँ येरीखो के मैदान में, महीने के चैदहवें दिन शाम को पास्का पर्व मनाया।

11) पास्का के दूसरे दिन ही उन्होंने उस देश की उपज की बेख़मीर और अनाज की भुनी हुई बालें खायीं।

12) जिस दिन उन्होंने देश की उपज का अन्न पहले पहल खाया उसी दिन से मन्ना का गिरना बंद हो गया। मन्ना नहीं मिलने कारण इस्राएली उस समय से कनान देश की उपज का अन्न खाने लगे।



दूसरा पाठ : 2 कुरिन्थियों 5:17-21


17) इसका अर्थ यह है कि यदि कोई मसीह के साथ एक हो गया है, तो वह नयी सृष्टि बन गया है। पुरानी बातें समाप्त हो गयी हैं और सब कुछ नया हो गया है।

18) यह सब ईश्वर ने किया है- उसने मसीह के द्वारा अपने से हमारा मेल कराया और इस मेल-मिलाप का सेवा-कार्य हम प्रेरितों को सौंपा है।

19) इसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने मनुष्यों के अपराध उनके ख़र्चे में न लिख कर मसीह के द्वारा अपने साथ संसार का मेल कराया और हमें इस मेल-मिलाप के सन्देश का प्रचार सौंपा है।

20) इसलिए हम मसीह के राजदूत हैं, मानों ईश्वर हमारे द्वारा आप लोगों से अनुरोध कर रहा हो। हम मसीह के नाम पर आप से यह विनती करते हैं कि आप लोग ईश्वर से मेल कर लें।

21) मसीह का कोई पाप नहीं था। फिर भी ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए उन्हें पाप का भागी बनाया, जिससे हम उनके द्वारा ईश्वर की पवित्रता के भागी बन सकें।



सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 15:1-3,11-32



1) ईसा का उपदेश सुनने के लिए नाकेदार और पापी उनके पास आया करते थे।

2 फ़रीसी और शास्त्री यह कहते हुए भुनभुनाते थे, "यह मनुष्य पापियों का स्वागत करता है और उनके साथ खाता-पीता है"।

3) इस पर ईसा ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया,

11) ईसा ने कहा, "किसी मनुष्य के दो पुत्र थे।

12) छोटे ने अपने पिता से कहा, ’पिता जी! सम्पत्ति का जो भाग मेरा है, मुझे दे दीजिए’, और पिता ने उन में अपनी सम्पत्ति बाँट दी।

13 थोड़े ही दिनों बाद छोटा बेटा अपनी समस्त सम्पत्ति एकत्र कर किसी दूर देश चला गया और वहाँ उसने भोग-विलास में अपनी सम्पत्ति उड़ा दी।

14) जब वह सब कुछ ख़र्च कर चुका, तो उस देश में भारी अकाल पड़ा और उसकी हालत तंग हो गयी।

15) इसलिए वह उस देश के एक निवासी का नौकर बन गया, जिसने उसे अपने खेतों में सूअर चराने भेजा।

16) जो फलियाँ सूअर खाते थे, उन्हीं से वह अपना पेट भरना चाहता था, लेकिन कोई उसे उन में से कुछ नहीं देता था।

17) तब वह होश में आया और यह सोचता रहा-मेरे पिता के घर कितने ही मज़दूरों को ज़रूरत से ज़्यादा रोटी मिलती है और मैं यहाँ भूखों मर रहा हूँ।

18) मैं उठ कर अपने पिता के पास जाऊँगा और उन से कहूँगा, ’पिता जी! मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है।

19) मैं आपका पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा। मुझे अपने मज़दूरों में से एक जैसा रख लीजिए।’

20) तब वह उठ कर अपने पिता के घर की ओर चल पड़ा। वह दूर ही था कि उसके पिता ने उसे देख लिया और दया से द्रवित हो उठा। उसने दौड़ कर उसे गले लगा लिया और उसका चुम्बन किया।

21) तब पुत्र ने उस से कहा, ’पिता जी! मैने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है। मैं आपका पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा।’

22) परन्तु पिता ने अपने नौकरों से कहा, ’जल्दी अच्छे-से-अच्छे कपड़े ला कर इस को पहनाओ और इसकी उँगली में अँगूठी और इसके पैरों में जूते पहना दो।

23) मोटा बछड़ा भी ला कर मारो। हम खायें और आनन्द मनायें;

24) क्योंकि मेरा यह बेटा मर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और फिर मिल गया है।’ और वे आनन्द मनाने लगे।

25) "उसका जेठा लड़का खेत में था। जब वह लौट कर घर के निकट पहुँचा, तो उसे गाने-बजाने और नाचने की आवाज़ सुनाई पड़ी।

26) उसने एक नौकर को बुलाया और इसके विषय में पूछा।

27) इसने कहा, ’आपका भाई आया है और आपके पिता ने मोटा बछड़ा मारा है, क्योंकि उन्होंने उसे भला-चंगा वापस पाया है’।

28) इस पर वह क्रुद्ध हो गया और उसने घर के अन्दर जाना नहीं चाहा। तब उसका पिता उसे मनाने के लिए बाहर आया।

29) परन्तु उसने अपने पिता को उत्तर दिया, ’देखिए, मैं इतने बरसों से आपकी सेवा करता आया हूँ। मैंने कभी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। फिर भी आपने कभी मुझे बकरी का बच्चा तक नहीं दिया, ताकि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द मनाऊँ।

30) पर जैसे ही आपका यह बेटा आया, जिसने वेश्याओं के पीछे आपकी सम्पत्ति उड़ा दी है, आपने उसके लिए मोटा बछड़ा मार डाला है।’

31) इस पर पिता ने उस से कहा, ’बेटा, तुम तो सदा मेरे साथ रहते हो और जो कुछ मेरा है, वह तुम्हारा है।

32) परन्तु आनन्द मनाना और उल्लसित होना उचित ही था; क्योंकि तुम्हारा यह भाई मर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और मिल गया है’।"



📚 मनन-चिंतन



आज हमें उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त पर चिंतन करने का आह्वान किया गया है। प्रभु येसु ने यह दृष्टान्त दो प्रकार के लोगों के सामने सुनाया था। एक तरफ नाकेदार और पापी हैं जिन्होंने अपने पिछले जीवन में की गई बुराईयों के लिए खेद महसूस किया और पश्चाताप के साथ प्रभु की ओर अभिमुख होते हैं। दूसरी ओर शास्त्री और फरीसी हैं जो न केवल खुद को धर्मी मानते थे, बल्कि दूसरों में दोष ही दोष ही पाते थे। यह आत्म-धार्मिक रवैया अपने आप में बुरा था। उड़ाऊ पुत्र और उसका बड़ा भाई लोगों के इन दो समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उड़ाऊ पुत्र, यद्यपि वह पिता के घर से बहुत दूर चला गया और कुछ समय के लिए पाप में भटकता रहा, उसे पिता की कृपा और दयालु प्रेम का एहसास होता है और वह पिता के घर वापस आ जाता है। बड़ा भाई यद्यपि शारीरिक रूप से पिता के घर के क्षेत्र में रह रहा था, वह मानसिक रूप से पिता से बहुत दूर था। ख्रीस्तीय विश्वासियों की बुलाहट केवल हानिरहित बनने की ही नहीं, बल्कि अपने स्वर्गीय पिता के प्रेम का आनंद लेने और उस प्रेम को दूसरों के साथ साझा करने की भी है। एक सच्चा पवित्र व्यक्ति दूसरों में दोष खोजने के बजाय स्वयं के दोषों को खोजता है और उन्हें सुधारता है। एक सच्चा पवित्र व्यक्ति, निराशावादी और उदास होने से दूर, प्रेम, आनंद और शांति फैलाता है।




📚 REFLECTION


Today we are called upon to reflect over the parable of the prodigal son. Jesus told this parable before two types of people. On the one side we have the tax collectors and sinners who felt sorry about the evil they committed in their past life and turned to God with repentance. On the other hand we have the scribes and Pharisees who not only considered themselves as righteous, but also found fault with others. This self-righteous attitude itself was evil. The prodigal son and his elder brother represent these two groups of people. The prodigal son, although he went far away from the father’s house and wandered about in sin for some time, he comes to realize the father’s graciousness and merciful love and is drawn back to the father’s house. The heart of the elder brother, although he was staying geographically within the area of the house of the father, was far away from the father. As Christians we are called not only to be harmless people, but also to relish the love of our heavenly father and share that love with others with ever-grateful hearts. A truly holy person would find one’s own faults and correct them instead of finding fault with others. A truly holy person, far from being pessimistic and melancholic, radiates love, joy and peace.



मनन-चिंतन - 2



उडाऊँ पुत्र का दृष्टांत पुत्र की दुष्टता से अधिक पिता की सहद्यता एवं दयालुता पर केंद्रित दृष्टांत हैं। पुत्र का अपने पिता से संपत्ति का हिस्सा मांगना न सिर्फ परंपरा के प्रतिकूल था बल्कि एक प्रकार की उद्दण्डता भी थी। किन्तु पिता पुत्र की अयोग्यता को जानते हुये भी उसे सम्पति का हिस्सा दे देता है। पुत्र जल्द ही अपनी सम्पत्ति का हिस्सा भोग-विलास में उडा देता है तथा अत्यंत दयनीय तथा दरिद्रता का जीवन जीने लगता है। उसे पराये देश में सेवक की नौकरी करनी पडती हैं। वहॉ उसे सूअरों की देखभाल करने का कार्य दिया जाता है। उस देश में अकाल पडा था इसलिये वह सूअर का खाना खाकर “अपना पेट भरना चाहता था, लेकिन कोई उसे उन में से कुछ नहीं देता था” (लूकस 15:16)। तब जाकर वह सोचता है कि उसके पिता के सेवकों के साथ कितना अच्छा व्यवहार किया जाता है। अतः वह सेवक के रूप में ही पिता के घर लौटना चाहता है। हैरानी की बात है कि वह अपने पिता को उसका इंतजार करते हुये पाता है। पिता बिना किसी हिचकिचाहट से उसका स्वागत करता है तथा उसे पुत्र का दर्जा पुनः प्रदान करता है। पिता और पुत्र का व्यवहार निम्नलिखित बातें प्रदर्शित करता है।

1. उडाऊँ पुत्र का रवैया हमे सिखलाता है कि जब हम अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग करते हैं तो पाप करते हैं तथा इस परिणामस्वरूप सदैव कष्ट उठाते हैं। संत पौलुस कहते हैं, “पाप का वेतन मृत्यु है” (रोमियों 6:23)। आदम और हेवा को ईश्वर ने सबकुछ के साथ उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी प्रदान की थी। किन्तु जब उन्होंने अपनी स्वतंत्रता का मनमाना इस्तेमाल किया तो उन्होंने पाप किया तथा वे ईश्वर से दूर हो गये। धर्मग्रंथ हमें इस विषय में चेतावनी देता है, “भाइयो! आप जानते हैं कि आप लोग स्वतंत्र होने के लिए बुलाये गये हैं। आप सावधान रहें, नहीं तो यह स्वतन्त्रता भोग-विलास का कारण बन जायेगी।” (गलातियों 5:13) तथा “आप लोग स्वतन्त्र व्यक्तियों की तरह आचरण करें, किन्तु स्वतन्त्रता की आड् में बुराई न करें।” (1 पेत्रुस 2:16) उडाऊँ पुत्र के पिता ने जो स्वतंत्रता उसे प्रदान की थी उसका दुरूपयोग कर वह पिता से सम्पत्ति का बंटवारा करने को कहता है।

2. पुत्र का व्यवहार बताता है कि जब उसने अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया तो वह प्रारंभिक दौर में तो भोग-विलास का आनन्द उठाता है किन्तु बाद में उसे घोर यंत्रणा उठानी पडती हैं। ईश्वर से दूर जाकर, उनकी आज्ञाओं का उल्लंघन कर शुरूआत में तो हमें स्वतंत्रता का अहसास होता है किन्तु जल्द ही हम अनेक बातों, वस्तुओं, परिस्थितियों या व्यक्तियों के गुलाम बन जाते हैं जो हमारे तिरसकार एवं पतन का कारण बन जाता है।

3. पुत्र अपना सबकुछ लुटाने के बाद भी अपने पिता के घर लौटने में देर करता है। पहले उसे किसी बैगाने देश में सेवक बनना पडता है। फिर उसे सूअरों की देखभाल करने का कार्य दिया जाता है। इसके बाद भी उसे पिता के घर लौटने की याद नहीं आती। फिर उसे सूअरों का खाना खाकर अपना जीवन गुजारना पडता है। इतनी दयनीय स्थिति से गुजरने के बाद वह अपने पिता के घर लौटने की सोचता है। एक पापी के रूप में जब हम ईश्वर से दूर हो जाते हैं तो हमारा जीवन भी विभिन्न दुखमयी परिस्थितियों से गुजरता है। हम सांसारिक ’जुगाड’ लगाकर टाल मटोल का रवैया अपनाते हैं। ईश्वर की ओर लौटने के बजाय जब तक हम मजबूर नहीं होते या टूट नहीं जाते हैं तब तक शायद हम ईश्वर की ओर न लौटे। उडाऊँ पुत्र का व्यवहार हमें शिक्षा देता है कि जब हम जीवन में ईश्वर से दूर हो जायें तो यह कहने में “मैं उठकर अपने पिता के पास जाऊँगा...” देर न करें।

4. उडाऊँ पुत्र का अपने जीवन को सही मार्ग पर लाने का एकमात्र रास्ता पश्चातापी हृदय से अपने पिता के घर लौटने का था। इस बात को समझने में उसे बहुत कष्ट उठाना पडता है तथा समय लगता है। यदि हम ईश्वर से दूर है तो हमें भी पश्चाताप कर ईश्वर की ओर लौटना चाहिये क्योंकि बचने का यही एकमात्र उपाय है।

5. पिता का व्यवहार ईश्वर का मानव के प्रति दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है। जब पुत्र ने पिता से अलग हो जाना चाहा तो पिता ने यह जानते हुये भी कि पुत्र की मांग मर्यादा के अनुरूप नहीं है उसकी स्वतंत्रता के अनुसार निर्णय करने देता है।

6. जब पुत्र लौटता है तब वह पिता को उसका इंतजार करते हुये पाता है। पिता का उसे इस प्रकार दूर से ही देख लेना एक संयोग मात्र नहीं था बल्कि पिता रोजाना ही अपने पुत्र की राह देखता रहता था। ईश्वर भी हमारे लौटने के प्रति आशावादी है तथा हमारे सही मार्ग पर लौटने की प्रतीक्षा करते हैं।

7. पिता अपने पुत्र का बिना शर्त स्वागत करता है। वह उसे न तो डांटता है और न ही उसमें ग्लानि का भाव उत्पन्न कराने के लिए कुछ कहता है। बल्कि वह उसे पुत्र के रूप में स्वीकार कर उसका स्वागत करता है। वह उसे पुत्र के वस्त्र एवं अॅगूठी पुनः प्रदान कर उसे पहली जैसी गरिमा प्रदान करता है।

8. जब बडा लडका पिता के इस व्यवहार पर कडी आपत्ति उठाता है तथा घर में आने से इंकार कर देता है तो पिता अपनी उदारता न्यायोचित बताता है। वह बडे बेटे को मनाने के लिए बहाना नहीं बनाता बल्कि प्रदर्शित करता है कि पिता की उदारता पश्चातापी पुत्र के लिए सदैव बनी रहती है।


✍ -Br. Biniush Topno



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