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22 मई 2022, इतवार
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21 मई 2022, शनिवार पास्का का पाँचवाँ सप्ताह*
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15 मई 2022, इतवार पास्का का पाँचवाँ इतवार
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08 मई 2022, इतवार पास्का का चौथा इतवार
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15 अप्रैल 2022, शुक्रवार पुण्य शुक्रवार
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03 अप्रैल 2022, इतवार
03 अप्रैल 2022, इतवार
चालीसे का पाँचवाँ इतवार

पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ 43:16-21
16) प्रभु ने समुद्र में मार्ग बनाया और उमड़ती हुई लहरों में पथ तैयार किया था।
17) उसने रथ, घोड़े और एक विशाल सेना बुलायी। वे सब-के-सब ढेर हो गये और फिर कभी नहीं उठ पाये। वे बत्ती की तरह जल कर बुझ गये। वही प्रभु कहता है:
18) “पिछली बातें भुला दो, पुरानी बातें जाने दो।
19) देखो, मैं एक नया कार्य करने जा रहा हूँ। वह प्रारम्भ हो चुका है। क्या तुम उसे नहीं देखते? मैं मरुभूमि में मार्ग बनाऊँगा और उजाड़ प्रदेश में पथ तैयार करूँगा।
20) जंगली जानवर, गीदड़ और शुतुरमुर्ग मुझे धन्य कहेंगे, क्योंकि मैं अपनी प्रजा की प्यास बुझाने के लिए मरुभूमि में जल का प्रबन्ध करूँगा और उजाड़ प्रदेश में नदियाँ बहाऊँगा।
21) मैंने यह प्रजा अपने लिए बनायी है। यह मेरा स्तुतिगान करेगी।
दूसरा पाठ : फ़िलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:8-14
8) इतना ही नहीं, मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ,
9) जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उनके साथ पूर्ण रूप से एक हो जाऊँ। मुझे अपनी धार्मिकता का नहीं, जो संहिता के पालन से मिलती है, बल्कि उस धार्मिकता का भरोसा है, जो मसीह में विश्वास करने से मिलती है, जो ईश्वर से आती है और विश्वास पर आधारित है।
10) मैं यह चाहता हूँ कि मसीह को जान लूँ, उनके पुनरूत्थान के सामर्थ्य का अनुभव करूँ और मृत्यु में उनके सदृश बन कर उनके दुःखभोग का सहभागी बन जाऊँ,
11) जिससे मैं किसी तरह मृतकों के पुनरूत्थान तक पहुँच सकूँ।
12) मैं यह नहीं जानता कि मैं अब तक यह सब कर चुका हूँ या मुझे पूर्णता प्राप्त हो गयी है! किन्तु मैं आगे बढ़ रहा हूँ ताकि वह लक्ष्य मेरी पकड़ में आये, जिसके लिए ईसा मसीह ने मुझे अपने अधिकार में ले लिया।
13) भाइयो! मैं यह नहीं समझता कि वह लक्ष्य अब तक मेरी पकड़ में आया है। मैं इतना ही कहता हूँ कि पीछे की बातें भुला कर और आगे की बातों पर दृष्टि लगा कर
14) मैं बड़ी उत्सुकता से अपने लक्ष्य की ओर दौड़ रहा हूँ, ताकि मैं स्वर्ग में वह पुरस्कार प्राप्त कर सकूँ, जिसके लिए ईश्वर ने हमें ईसा मसीह में बुलाया है।
सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 8:1-11
1) और ईसा जैतून पहाड़ गये।
2) वे बड़े सबेरे फिर मंदिर आये। सारी जनता उनके पास इकट्ठी हो गयी थी और वे बैठ कर लोगों को शिक्षा दे रहे थे।
3) उस समय शास्त्री और फरीसी व्यभिचार में पकड़ी गयी एक स्त्री को ले आये और उसे बीच में खड़ा कर,
4) उन्होंने ईसा से कहा, "गुरुवर! यह स्त्री व्यभिचार करते हुए पकड़ी गयी है।
5) संहिता में मूसा ने हमें ऐसी स्त्रियों को पत्थरों से मार डालने का आदेश दिया है। आप इसके विषय में क्या कहते हैं?"
6) उन्होंने ईसा की और परीक्षा लेते हुए यह कहा, जिससे उन्हें उन पर दोष लगाने का काई आधार मिले। ईसा झुक कर उँगली से भूमि पर लिखते रहे।
7) जब वे उन से उत्तर देने के लिए आग्रह करते रहे, तो ईसा ने सिर उठा कर उन से कहा, "तुम में जो निष्पाप हो, वह इसे सब से पहले पत्थर मारे"।
8) और वे फिर झुक कर भूमि पर लिखने लगे।
9) यह सुन कर बड़ों से ले कर छोटों तक, सब-के-सब , एक-एक कर खिसक ईसा अकेले रह गये और वह स्त्री सामने खड़ी रही।
10) तब ईसा ने सिर उठा कर उस से कहा, "नारी! वे लोग कहाँ हैं? क्या एक ने भी तुम्हें दण्ड नहीं दिया?"
11) उसने उत्तर दिया, "महोदय! एक ने भी नहीं"। इस पर ईसा ने उस से कहा, "मैं भी तुम्हें दण्ड नहीं दूँगा। जाओ और अब से फिर पाप नहीं करना।"
📚 मनन-चिंतन
व्यभिचार में फंसी महिला की घटना में समाज के सभी वर्गों के लिए गहरा संदेश है। हम समाज का हिस्सा होने के कारण इनसे बच भी नहीं सकते।
येसु हमें सिखाते हैं कि किसी और का न्याय करने से पहले हमें स्वय का न्याय करने की जरूरत है। इस महिला को न्याय के लिए लाने वाले पाखंडी धार्मिक नेताओं ने खुद का न्याय नहीं किया। उन्हें व्यभिचारी महिला बनाने में अपनी भागीदारी या योगदान की परवाह नहीं थी। येसु के शब्द 'वह पहला पत्थर फेंके, उन्हें उनके आरोपों की गंभीरता की याद दिलाने के लिए थे। उद्देश्य मायने रखते हैं। सिराच की पुस्तक कहती है, "एक चिंगारी से बहुत से अंगारे जलते हैं, और एक पापी लहू बहाने की प्रतीक्षा में रहता है।" (11:32) संक्षेप में, येसु कह रहे हैं, इससे पहले कि आप उस पत्थर को उठाएँ, एक अच्छी नज़रआईने में स्वयं पर भी डालें । सुनिश्चित करें कि आप इस महिला को मौत के घाट उतारने के लिए नैतिक रूप से योग्य हैं। सुनिश्चित करें कि कोई द्वेष नहीं है, कोई छल नहीं है, कोई कपट नहीं है, कोई बेईमानी नहीं है, और सुनिश्चित करें कि आप स्वयं उसी अपराध के दोषी नहीं हैं। वह उन्हें याद दिला रहे है कि यदि वे दुर्भावनापूर्ण या धोखे से गवाही देते हैं, तो वे स्वयं पर न्याय को आमंत्रित कर रहे हैं। येसु हमसे कहते हैं कि दूसरों पर फेंकने के लिए पत्थर मत उठाओ, जबकि हम स्वयं पत्थरवाह के पात्र हैं यदि हमारे सारे पाप सार्वजनिक हो जाए तो।
येसु ने उस स्त्री से कहा, 'मैं भी तुम्हे दोषी नहीं ठहराता।' स्त्री को गरिमा प्रदान करने के द्वारा येसु बताते हैं कि हमारा जीवन हमारे पाप से बढ़कर है। हम पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हो सकते हैं। हम इस पाप से हमेशा के लिए दूर हो सकते हैं। हम एक नया जीवन जी सकते हैं। हम अपने पिछले पाप के लिए दण्ड के बिना जी सकते हैं क्योंकि जैसा कि रोमियों 8:1 कहता है, "इसलिये अब जो मसीह येसु में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।"
येसु ने हमें दण्ड नहीं दिया परन्तु हमारे लिए दण्ड सहा है। येसु उस महिला को मरने दे सकते थे, लेकिन इसके बजाय, उन्होंने उसे माफ कर दिया और उसके पाप के लिए मरने के लिए क्रूस पर उसकी जगह ले ली। हमें सभी अपराध बोध से छुटकारा पाने और उस क्षमा और नए जीवन का अनुभव करने की आवश्यकता है जो येसु हमें देते है।
📚 REFLECTION
In the incident of the woman caught up in adultery has profoundly filled with messages to all the sections of the society. We being part of society can not escape them either.
Jesus teaches us that we need to judge ourselves before we judge anyone else. The hypocritical religious leaders who brought this woman to be judged did not judge themselves. They did not care about their own involvement or contribution in making her an adulterous woman. Jesus’ words ‘Let him throw the first stone, remind them of the seriousness of their charges. Motives do matter. Book of Sirach says, “From a spark, many coals are kindled, and a sinner lies in wait to shed blood.”(11:32) In essence, Jesus is saying, before you pick up that stone, take a good look in the mirror. Make sure you are morally qualified to put this woman to death. Make sure there is no malice, no deceit, no trickery, no dishonesty, and make sure you are not guilty of the same crime yourself. He is reminding them that if they testify maliciously or deceitfully, they are inviting judgment on themselves. Jesus tells us not to pick stones to throw at others while we ourselves deserve to be stoned if we our sins are to be made public.
Jesus tells the woman, ‘Neither do I condemn you.’ By restoring the woman to dignity Jesus explains that there is more to our life than our sin. We can be much more than we have been. We can turn from this sin once and for all. we can have a new life. We can live without condemnation for our past sin because as Romans 8:1 says, “There is therefore now no condemnation for those who are in Christ Jesus.”
Jesus does not punish us but was punished for us. Jesus could have put the woman to death, but instead, He forgave her and took her place on the cross to die for her sin. We need to get rid of all guilt and experience the forgiveness and new life that Jesus gives us.
मनन-चिंतन - 2
जब हम अपने ईश्वर की ओर देखते हैं, तब हमें एहसास होता है कि ईश्वर महान और सर्वगुणसंपन्न हैं। साथ-साथ हमें यह भी ज्ञात होता है कि हम कितने छोटे और अयोग्य हैं। हम सब पापी हैं। फिर भी मौके मिलने पर हम अपने पापों तथा कमियों को छिपा कर दूसरों के पापों तथा कमियों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत कर उन पर आरोप लगाने लगते हैं, उनकी आलोचना करने लगते हैं। यह हमारे आध्यात्मिक रीति से परिपक्व न होने का प्रमाण है। इसलिए मत्ती 7:3 में प्रभु येसु सवाल उठाते हैं, “जब तुम्हें अपनी ही आँख की धरन का पता नहीं, तो तुम अपने भाई की आँख का तिनका क्यों देखते हो?”
इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण हमें आज के सुसमाचार में मिलता है। सदूकी और फरीसी अपने पापों को छिपा कर व्यभिचार में पकडी गयी एक स्त्री के पापों को बढ़ा-चढ़ा कर बता कर उस पर आरोप लगाते हैं और मूसा की संहिता के अनुसार उसे दण्ड देने की बात करते हैं। येसु का ध्यान कानून पर नहीं, बल्कि मुक्ति पर है। येसु उस स्त्री पर अनुकम्पा तथा दया दिखाते हैं। साथ-साथ वे उसे पापों का कुमार्ग छोड़ कर मुक्ति का पावन मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। येसु का रवैया उस महिला के अन्दर पश्चात्ताप उत्पन्न कर सकता है। प्रभु ईश्वर यह नहीं चाहते हैं कि किसी का सर्वनाश हो।
योहन 3:16-17 में पवित्र वचन कहता है – “ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे। ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार में इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।” एज़ेकिएल 18:30-32 में प्रभु कहते हैं, “मैं हर एक का उसके कर्मों के अनुसार न्याय करूँगा। तुम मेरे पास लौट कर अपने सब पापों को त्याग दो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे अपराधों के कारण तुम्हारा विनाश हो जाये। अपने पुराने पापों का भार फेंक दो। एक नया हृदय और एक नया मनोभाव धारण करो। प्रभु-ईश्वर यह कहता है-इस्राएलियों! तुम क्यों मरना चाहते हो? मैं किसी भी मनुष्य की मृत्यु से प्रसन्न नहीं होता। इसलिए तुम मेरे पास लौट कर जीते रहो।”
प्रभु येसु ने साऊल नामक युवक को उसकी दमिश्क यात्रा में अपना कुमार्ग छोड़ कर सन्मार्ग अपनाने का अवसर दिया। आगे चल कर साऊल संत पौलुस बनता है और स्वर्गराज्य के लिए महान कार्य करता है। आज के दूसरे पाठ में संत पौलुस कहते हैं, “मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उनके साथ पूर्ण रूप से एक हो जाऊँ।” (फिलिप्पियों 3:8-9)
प्रभु येसु किसी पर भी दोष नहीं लगाते हैं – न व्यभिचारिणी पर और न हीं उस पर आरोप लगाने वाले सदूकियों तथा फरीसियों पर। वे सब के अन्तकरण को जगाते हैं ताकि वे स्वयं ईश्वर के समक्ष अपनी अयोग्यता को महसूस करें और अपने पापों तथा गुनाहों को कबूल कर अपने जीवन में परिवर्तन लायें। हमारे नज़रिये किसी भी प्रकार के क्यों न हों, हमारी प्रवृत्तियाँ किसी भी तरह की क्यों न हों, आज प्रभु हमारे अन्तकरण को जगाना चाहते हैं। साथ-साथ वे हमें आह्वान करते हैं कि हम फिर पाप न करें।
प्रभु येसु के व्यवहार से हमें यह प्रेरणा भी मिलती है कि सुसमाचार सुनने और सुनाने वालों को किसी को भी हतोत्साहित या निराश नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित कर सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए। प्रवक्ता 28:12 कहता है, “चिनगारी पर फूँक मारों और वह भड़केगी, उस पर थूक दो और वह बुझेगी: दोनों तुम्हारे मुँह से निकलते हैं”। आज हमें तय करना चाहिए कि किस मनोभाव का चयन करेंगे – प्रभु येसु के मनोभाव का या सदूकियों तथा फरीसियों के मनोभाव का?
हमें दूसरों पर दोष लगाने की अपनी प्रवणता पर काबू पाना चाहिए। प्रभु कहते हैं, “दोष नहीं लगाओ, जिससे तुम पर भी दोष न लगाया जाये” (मत्ती 7:1)। आदम ने पाप का आरोप हेवा पर लगाया और हेवा ने साँप पर (देखिए उत्पत्ति 3:12-13)। सोने का बछड़ा बनाने का अरोप हारून ने लोगों पर लगाया (देखिए निर्गमन 32:21-24)। राजा साऊल ने अवैध बलिदान चढ़ाने का कारण नबी समुएल के देर करना बताया (देखिए 1समुएल 13:11-12)। इस प्रकार हम अपनी कमियों और पापों के लिए भी दूसरों पर दोष लगाते हैं। राजा दाऊद की महानता इस में थी कि उन्होंने अपने पापों को स्वीकार किया और पश्चात्ताप किया। यह संत पेत्रुस और संत पौलुस की भी विशेषता थी। आईए हम भी विनम्रता से अपने पापों को स्वीकारें और पश्चात्ताप करें।
✍ -𝘽𝙧. 𝘽𝙞𝙣𝙞𝙪𝙨𝙝 𝙏𝙤𝙥𝙣𝙤
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27 मार्च 2022, इतवार चालीसे का चौथा इतवार
27 मार्च 2022, इतवार
चालीसे का चौथा इतवार

पहला पाठ : योशुआ 5:9-12
9) प्रभु ने योशुआ से कहा आज मैंने तुम लोगों पर से मिस्र का कलंक दूर किया इसलिए उस स्थान का नाम आज तक गिलगाल है।
10) इस्राएलियों ने गिलगाल में पडाव डाला और वहाँ येरीखो के मैदान में, महीने के चैदहवें दिन शाम को पास्का पर्व मनाया।
11) पास्का के दूसरे दिन ही उन्होंने उस देश की उपज की बेख़मीर और अनाज की भुनी हुई बालें खायीं।
12) जिस दिन उन्होंने देश की उपज का अन्न पहले पहल खाया उसी दिन से मन्ना का गिरना बंद हो गया। मन्ना नहीं मिलने कारण इस्राएली उस समय से कनान देश की उपज का अन्न खाने लगे।
दूसरा पाठ : 2 कुरिन्थियों 5:17-21
17) इसका अर्थ यह है कि यदि कोई मसीह के साथ एक हो गया है, तो वह नयी सृष्टि बन गया है। पुरानी बातें समाप्त हो गयी हैं और सब कुछ नया हो गया है।
18) यह सब ईश्वर ने किया है- उसने मसीह के द्वारा अपने से हमारा मेल कराया और इस मेल-मिलाप का सेवा-कार्य हम प्रेरितों को सौंपा है।
19) इसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने मनुष्यों के अपराध उनके ख़र्चे में न लिख कर मसीह के द्वारा अपने साथ संसार का मेल कराया और हमें इस मेल-मिलाप के सन्देश का प्रचार सौंपा है।
20) इसलिए हम मसीह के राजदूत हैं, मानों ईश्वर हमारे द्वारा आप लोगों से अनुरोध कर रहा हो। हम मसीह के नाम पर आप से यह विनती करते हैं कि आप लोग ईश्वर से मेल कर लें।
21) मसीह का कोई पाप नहीं था। फिर भी ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए उन्हें पाप का भागी बनाया, जिससे हम उनके द्वारा ईश्वर की पवित्रता के भागी बन सकें।
सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 15:1-3,11-32
1) ईसा का उपदेश सुनने के लिए नाकेदार और पापी उनके पास आया करते थे।
2 फ़रीसी और शास्त्री यह कहते हुए भुनभुनाते थे, "यह मनुष्य पापियों का स्वागत करता है और उनके साथ खाता-पीता है"।
3) इस पर ईसा ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया,
11) ईसा ने कहा, "किसी मनुष्य के दो पुत्र थे।
12) छोटे ने अपने पिता से कहा, ’पिता जी! सम्पत्ति का जो भाग मेरा है, मुझे दे दीजिए’, और पिता ने उन में अपनी सम्पत्ति बाँट दी।
13 थोड़े ही दिनों बाद छोटा बेटा अपनी समस्त सम्पत्ति एकत्र कर किसी दूर देश चला गया और वहाँ उसने भोग-विलास में अपनी सम्पत्ति उड़ा दी।
14) जब वह सब कुछ ख़र्च कर चुका, तो उस देश में भारी अकाल पड़ा और उसकी हालत तंग हो गयी।
15) इसलिए वह उस देश के एक निवासी का नौकर बन गया, जिसने उसे अपने खेतों में सूअर चराने भेजा।
16) जो फलियाँ सूअर खाते थे, उन्हीं से वह अपना पेट भरना चाहता था, लेकिन कोई उसे उन में से कुछ नहीं देता था।
17) तब वह होश में आया और यह सोचता रहा-मेरे पिता के घर कितने ही मज़दूरों को ज़रूरत से ज़्यादा रोटी मिलती है और मैं यहाँ भूखों मर रहा हूँ।
18) मैं उठ कर अपने पिता के पास जाऊँगा और उन से कहूँगा, ’पिता जी! मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है।
19) मैं आपका पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा। मुझे अपने मज़दूरों में से एक जैसा रख लीजिए।’
20) तब वह उठ कर अपने पिता के घर की ओर चल पड़ा। वह दूर ही था कि उसके पिता ने उसे देख लिया और दया से द्रवित हो उठा। उसने दौड़ कर उसे गले लगा लिया और उसका चुम्बन किया।
21) तब पुत्र ने उस से कहा, ’पिता जी! मैने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है। मैं आपका पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा।’
22) परन्तु पिता ने अपने नौकरों से कहा, ’जल्दी अच्छे-से-अच्छे कपड़े ला कर इस को पहनाओ और इसकी उँगली में अँगूठी और इसके पैरों में जूते पहना दो।
23) मोटा बछड़ा भी ला कर मारो। हम खायें और आनन्द मनायें;
24) क्योंकि मेरा यह बेटा मर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और फिर मिल गया है।’ और वे आनन्द मनाने लगे।
25) "उसका जेठा लड़का खेत में था। जब वह लौट कर घर के निकट पहुँचा, तो उसे गाने-बजाने और नाचने की आवाज़ सुनाई पड़ी।
26) उसने एक नौकर को बुलाया और इसके विषय में पूछा।
27) इसने कहा, ’आपका भाई आया है और आपके पिता ने मोटा बछड़ा मारा है, क्योंकि उन्होंने उसे भला-चंगा वापस पाया है’।
28) इस पर वह क्रुद्ध हो गया और उसने घर के अन्दर जाना नहीं चाहा। तब उसका पिता उसे मनाने के लिए बाहर आया।
29) परन्तु उसने अपने पिता को उत्तर दिया, ’देखिए, मैं इतने बरसों से आपकी सेवा करता आया हूँ। मैंने कभी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। फिर भी आपने कभी मुझे बकरी का बच्चा तक नहीं दिया, ताकि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द मनाऊँ।
30) पर जैसे ही आपका यह बेटा आया, जिसने वेश्याओं के पीछे आपकी सम्पत्ति उड़ा दी है, आपने उसके लिए मोटा बछड़ा मार डाला है।’
31) इस पर पिता ने उस से कहा, ’बेटा, तुम तो सदा मेरे साथ रहते हो और जो कुछ मेरा है, वह तुम्हारा है।
32) परन्तु आनन्द मनाना और उल्लसित होना उचित ही था; क्योंकि तुम्हारा यह भाई मर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और मिल गया है’।"
📚 मनन-चिंतन
आज हमें उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त पर चिंतन करने का आह्वान किया गया है। प्रभु येसु ने यह दृष्टान्त दो प्रकार के लोगों के सामने सुनाया था। एक तरफ नाकेदार और पापी हैं जिन्होंने अपने पिछले जीवन में की गई बुराईयों के लिए खेद महसूस किया और पश्चाताप के साथ प्रभु की ओर अभिमुख होते हैं। दूसरी ओर शास्त्री और फरीसी हैं जो न केवल खुद को धर्मी मानते थे, बल्कि दूसरों में दोष ही दोष ही पाते थे। यह आत्म-धार्मिक रवैया अपने आप में बुरा था। उड़ाऊ पुत्र और उसका बड़ा भाई लोगों के इन दो समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उड़ाऊ पुत्र, यद्यपि वह पिता के घर से बहुत दूर चला गया और कुछ समय के लिए पाप में भटकता रहा, उसे पिता की कृपा और दयालु प्रेम का एहसास होता है और वह पिता के घर वापस आ जाता है। बड़ा भाई यद्यपि शारीरिक रूप से पिता के घर के क्षेत्र में रह रहा था, वह मानसिक रूप से पिता से बहुत दूर था। ख्रीस्तीय विश्वासियों की बुलाहट केवल हानिरहित बनने की ही नहीं, बल्कि अपने स्वर्गीय पिता के प्रेम का आनंद लेने और उस प्रेम को दूसरों के साथ साझा करने की भी है। एक सच्चा पवित्र व्यक्ति दूसरों में दोष खोजने के बजाय स्वयं के दोषों को खोजता है और उन्हें सुधारता है। एक सच्चा पवित्र व्यक्ति, निराशावादी और उदास होने से दूर, प्रेम, आनंद और शांति फैलाता है।
📚 REFLECTION
Today we are called upon to reflect over the parable of the prodigal son. Jesus told this parable before two types of people. On the one side we have the tax collectors and sinners who felt sorry about the evil they committed in their past life and turned to God with repentance. On the other hand we have the scribes and Pharisees who not only considered themselves as righteous, but also found fault with others. This self-righteous attitude itself was evil. The prodigal son and his elder brother represent these two groups of people. The prodigal son, although he went far away from the father’s house and wandered about in sin for some time, he comes to realize the father’s graciousness and merciful love and is drawn back to the father’s house. The heart of the elder brother, although he was staying geographically within the area of the house of the father, was far away from the father. As Christians we are called not only to be harmless people, but also to relish the love of our heavenly father and share that love with others with ever-grateful hearts. A truly holy person would find one’s own faults and correct them instead of finding fault with others. A truly holy person, far from being pessimistic and melancholic, radiates love, joy and peace.
मनन-चिंतन - 2
उडाऊँ पुत्र का दृष्टांत पुत्र की दुष्टता से अधिक पिता की सहद्यता एवं दयालुता पर केंद्रित दृष्टांत हैं। पुत्र का अपने पिता से संपत्ति का हिस्सा मांगना न सिर्फ परंपरा के प्रतिकूल था बल्कि एक प्रकार की उद्दण्डता भी थी। किन्तु पिता पुत्र की अयोग्यता को जानते हुये भी उसे सम्पति का हिस्सा दे देता है। पुत्र जल्द ही अपनी सम्पत्ति का हिस्सा भोग-विलास में उडा देता है तथा अत्यंत दयनीय तथा दरिद्रता का जीवन जीने लगता है। उसे पराये देश में सेवक की नौकरी करनी पडती हैं। वहॉ उसे सूअरों की देखभाल करने का कार्य दिया जाता है। उस देश में अकाल पडा था इसलिये वह सूअर का खाना खाकर “अपना पेट भरना चाहता था, लेकिन कोई उसे उन में से कुछ नहीं देता था” (लूकस 15:16)। तब जाकर वह सोचता है कि उसके पिता के सेवकों के साथ कितना अच्छा व्यवहार किया जाता है। अतः वह सेवक के रूप में ही पिता के घर लौटना चाहता है। हैरानी की बात है कि वह अपने पिता को उसका इंतजार करते हुये पाता है। पिता बिना किसी हिचकिचाहट से उसका स्वागत करता है तथा उसे पुत्र का दर्जा पुनः प्रदान करता है। पिता और पुत्र का व्यवहार निम्नलिखित बातें प्रदर्शित करता है।
1. उडाऊँ पुत्र का रवैया हमे सिखलाता है कि जब हम अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग करते हैं तो पाप करते हैं तथा इस परिणामस्वरूप सदैव कष्ट उठाते हैं। संत पौलुस कहते हैं, “पाप का वेतन मृत्यु है” (रोमियों 6:23)। आदम और हेवा को ईश्वर ने सबकुछ के साथ उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी प्रदान की थी। किन्तु जब उन्होंने अपनी स्वतंत्रता का मनमाना इस्तेमाल किया तो उन्होंने पाप किया तथा वे ईश्वर से दूर हो गये। धर्मग्रंथ हमें इस विषय में चेतावनी देता है, “भाइयो! आप जानते हैं कि आप लोग स्वतंत्र होने के लिए बुलाये गये हैं। आप सावधान रहें, नहीं तो यह स्वतन्त्रता भोग-विलास का कारण बन जायेगी।” (गलातियों 5:13) तथा “आप लोग स्वतन्त्र व्यक्तियों की तरह आचरण करें, किन्तु स्वतन्त्रता की आड् में बुराई न करें।” (1 पेत्रुस 2:16) उडाऊँ पुत्र के पिता ने जो स्वतंत्रता उसे प्रदान की थी उसका दुरूपयोग कर वह पिता से सम्पत्ति का बंटवारा करने को कहता है।
2. पुत्र का व्यवहार बताता है कि जब उसने अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया तो वह प्रारंभिक दौर में तो भोग-विलास का आनन्द उठाता है किन्तु बाद में उसे घोर यंत्रणा उठानी पडती हैं। ईश्वर से दूर जाकर, उनकी आज्ञाओं का उल्लंघन कर शुरूआत में तो हमें स्वतंत्रता का अहसास होता है किन्तु जल्द ही हम अनेक बातों, वस्तुओं, परिस्थितियों या व्यक्तियों के गुलाम बन जाते हैं जो हमारे तिरसकार एवं पतन का कारण बन जाता है।
3. पुत्र अपना सबकुछ लुटाने के बाद भी अपने पिता के घर लौटने में देर करता है। पहले उसे किसी बैगाने देश में सेवक बनना पडता है। फिर उसे सूअरों की देखभाल करने का कार्य दिया जाता है। इसके बाद भी उसे पिता के घर लौटने की याद नहीं आती। फिर उसे सूअरों का खाना खाकर अपना जीवन गुजारना पडता है। इतनी दयनीय स्थिति से गुजरने के बाद वह अपने पिता के घर लौटने की सोचता है। एक पापी के रूप में जब हम ईश्वर से दूर हो जाते हैं तो हमारा जीवन भी विभिन्न दुखमयी परिस्थितियों से गुजरता है। हम सांसारिक ’जुगाड’ लगाकर टाल मटोल का रवैया अपनाते हैं। ईश्वर की ओर लौटने के बजाय जब तक हम मजबूर नहीं होते या टूट नहीं जाते हैं तब तक शायद हम ईश्वर की ओर न लौटे। उडाऊँ पुत्र का व्यवहार हमें शिक्षा देता है कि जब हम जीवन में ईश्वर से दूर हो जायें तो यह कहने में “मैं उठकर अपने पिता के पास जाऊँगा...” देर न करें।
4. उडाऊँ पुत्र का अपने जीवन को सही मार्ग पर लाने का एकमात्र रास्ता पश्चातापी हृदय से अपने पिता के घर लौटने का था। इस बात को समझने में उसे बहुत कष्ट उठाना पडता है तथा समय लगता है। यदि हम ईश्वर से दूर है तो हमें भी पश्चाताप कर ईश्वर की ओर लौटना चाहिये क्योंकि बचने का यही एकमात्र उपाय है।
5. पिता का व्यवहार ईश्वर का मानव के प्रति दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है। जब पुत्र ने पिता से अलग हो जाना चाहा तो पिता ने यह जानते हुये भी कि पुत्र की मांग मर्यादा के अनुरूप नहीं है उसकी स्वतंत्रता के अनुसार निर्णय करने देता है।
6. जब पुत्र लौटता है तब वह पिता को उसका इंतजार करते हुये पाता है। पिता का उसे इस प्रकार दूर से ही देख लेना एक संयोग मात्र नहीं था बल्कि पिता रोजाना ही अपने पुत्र की राह देखता रहता था। ईश्वर भी हमारे लौटने के प्रति आशावादी है तथा हमारे सही मार्ग पर लौटने की प्रतीक्षा करते हैं।
7. पिता अपने पुत्र का बिना शर्त स्वागत करता है। वह उसे न तो डांटता है और न ही उसमें ग्लानि का भाव उत्पन्न कराने के लिए कुछ कहता है। बल्कि वह उसे पुत्र के रूप में स्वीकार कर उसका स्वागत करता है। वह उसे पुत्र के वस्त्र एवं अॅगूठी पुनः प्रदान कर उसे पहली जैसी गरिमा प्रदान करता है।
8. जब बडा लडका पिता के इस व्यवहार पर कडी आपत्ति उठाता है तथा घर में आने से इंकार कर देता है तो पिता अपनी उदारता न्यायोचित बताता है। वह बडे बेटे को मनाने के लिए बहाना नहीं बनाता बल्कि प्रदर्शित करता है कि पिता की उदारता पश्चातापी पुत्र के लिए सदैव बनी रहती है।
✍ -Br. Biniush Topno
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