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07 जनवरी 2022, शुक्रवार

 

07 जनवरी 2022, शुक्रवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का शुक्रवार

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⭐ पहला पाठ : 1 योहन 5:5-13


5) संसार का विजयी कौन है? केवल वही, जो यह विश्वास करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं।

6) ईसा मसीह जल और रक्त से आये - न केवल जल से, बल्कि जल और रक्त से। आत्मा इसके विषय में साक्ष्य देता है, क्योंकि आत्मा सत्य है।

7) इस प्रकार ये तीन साक्ष्य देते हैं-

8) आत्मा, जल और रक्त और तीनों एक ही बात कहते हैं।

9) हम मनुष्यों का साक्ष्य स्वीकार करते हैं, किन्तु ईश्वर का साक्ष्य निश्चय ही कहीं अधिक प्रामाणिक है। ईश्वर ने अपने पुत्र के विषय में साक्ष्य दिया है।

10) जो ईश्वर के पुत्र में विश्वास करता है, उसके हृदय में ईश्वर का वह साक्ष्य विद्यमान है। जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, वह उसे झूठा समझता है; क्योंकि वह पुत्र के विषय में ईश्वर का साक्ष्य स्वीकार नहीं करता

11) और वह साक्ष्य यह है - ईश्वर ने अपने पुत्र द्वारा हमें अनन्त जीवन प्रदान किया है।

12) जिसे पुत्र प्राप्त है, उसे वह जीवन प्राप्त है और जिसे पुत्र प्राप्त नहीं है, उसे वह जीवन प्राप्त नहीं।

13) तुम सभी ईश्वर के पुत्र के नाम में विश्वास करते हो। मैं तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूँ, जिससे तुम यह जानो कि तुम्हें अनन्त जीवन प्राप्त है।


⭐ सुसमाचार : लूकस 5:12-16



12) किसी नगर में ईसा के पास एक मनुष्य आया, जिसका शरीर कोढ़ से भरा हुआ था। वह ईसा को देख कर मुँह के बल गिर पड़ा और विनय करते हुए यह बोला, "प्रभु! आप चाहें, तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।

13) ईसा ने हाथ बढ़ा कर यह कहते हुए उसका स्पर्श किया, "मैं यही चाहता हूँ-शुद्ध जो जाओ"। उसी क्षण उसका कोढ़ दूर हो गया।

14) ईसा ने उसे किसी से कुछ न कहने का आदेश दिया और कहा, "जा कर अपने को याजक को दिखाओ और अपने शुद्धीकरण के लिए मूसा द्वारा निर्धारित भेंट चढ़ाओं, जिससे तुम्हारा स्वास्थ्यलाभ प्रमाणित हो जाये"

15) ईसा की ख्याति बढ़ रहीं थी। भीड़-की-भीड़़ उनका उपदेश सुनने और अपने रोगों से छुटकारा पाने के लिए उनके पास आती थी,

16) और वे अलग जा कर एकान्त स्थानों में प्रार्थना किया करते थे।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार के कोढ़ी की प्रार्थना मानव इतिहास की सब से प्रभावशाली प्रार्थनाओं में से एक है। "आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं"। यद्यपि वह अत्यधिक आवश्यकता महसूस करता है, वह ईश्वरीय इच्छा के प्रति अपने आप को समर्पित करता है। ईश्वर की इच्छा की तलाश करना और उसे स्वीकार करना सबसे अच्छा कार्य है जो एक इंसान कर सकता है। हमारी इच्छाएँ और अभिलाषाएं अपूर्ण हैं, परन्तु ईश्वर की इच्छा परिपूर्ण है। प्रभु जानते हैं कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। इसलिए, हमारे लिए ईश्वर की इच्छा के सामने आत्मसमर्पण करना सबसे अच्छा है। गतसमनी की वाटिका में येसु ने प्रार्थना की, “मेरे पिता! यदि हो सके, तो यह प्याला मुझ से टल जाये। फिर भी मेरी नही, बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो।" (मत्ती 26:39)। कोढ़ी की प्रार्थना येसु की इस प्रार्थना के बहुत करीब आती है। आइए हम उनकी तरह प्रार्थना करना सीखें।



📚 REFLECTION



The leper who meets Jesus makes one of the best prayers a human being can utter. “If you wish, you can make me clean”. Although he is in utter need, he surrenders to the divine will. Seeking and accepting the will of God is the best a human being can do. Our desires and wishes are imperfect, but God’s will is perfect. The Lord knows what is best for us. Therefore, it is best for us to surrender to the will of God. In the garden of Gethsemane Jesus prayed, “My Father, if it is possible, let this cup pass from me; yet not what I want but what you want.” (Mt 26:39). The prayer of this leper comes very close to this prayer of Jesus. Let us learn to pray like him.



📚 मनन-चिंतन - 02



हमारे आज के मनन-चिंतन में प्रभु येसु आज एक कोढ़ी को चंगा करते हैं। पुराने ज़माने में कोढ़ एक भयंकर बीमारी के रूप में जाना जाता था। जिन लोगों को यह रोग हो जाता तो वे ना केवल शारीरिक रूप से कष्ट उठाते क्योंकि उनकी शरीर गलकर सड़ने लगता, बल्कि वे समाज और धर्म से बहिष्कृत किए जाने का दर्द भी सहते थे। उन्हें शापित मानकर समाज और लोगों से दूर निकाल दिया जाता था। वे एक मारे हुए इंसान से भी बदतर थे, ना उनके पास स्वास्थ्य था, ना समाज में कोई स्थान, ना इंसान जैसी गरिमा और ना ही आरामदायक या सम्माजनक मृत्यु ही उन्हें नसीब होती थी। वह कोढ़ी प्रभु येसु से आग्रह करता है, “यदि आप चाहें तो मुझे चंगा कर सकते हैं।” वह ईश्वर जो मानवजाति को बचाने के लिए धरती पर आए, वह इस कोढ़ी को बचना नहीं चाहेंगे? आप उनसे आग्रह करके देखिए, वह आपके लिए जो उत्तम है वही करेंगे।

उस कोढ़ी को चंगा कर प्रभु ना केवल उसे अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते हैं बल्कि उसके सामाजिक जीवन को चंगा करते हैं। वह उसके अंदर ईश्वर की संतान होने की गरिमा को पुनः स्थापित करते हैं। इस दुनिया में उनके आने का यही मक़सद है, संसार की मुरझायी हुई मानवता को पुनर्जीवित करने और प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर के प्रतिरूप को पुनर्स्थापित करने के लिए। आज भी वह अथक इसी काम में लगे रहते हैं। हे प्रभु इस दुनिया में आकर हमें पुनः चंगा करने और मानवीय गरिमा प्रदान करने के लिए आपको धन्यवाद। आमेन।



📚 REFLECTION



Jesus heals a leper in today’s reflection for us. Leprosy was a horrible disease in olden days. People who had this disease suffered not only physically as their skin got rotten and their wounds would not heal. They also suffered alienation from the society and religion. They were considered outcast and sent away from the people and society. They were worse than a dead person, they had no health, no place in the society, no dignity as human beings not even a peaceful death. This leper asks Jesus, “If you choose, you can make me clean.” How God, who came to save humanity wouldn’t choose to save this leper? You ask him and he will always choose what is best for you.

By healing the leper Jesus not only restores his health but restores his social status, making him acceptable in society again. He restores his human dignity as image of God and child of God. This is the very purpose of his coming to heal the broken humanity and restore the image of God in each and every child of his. He continues to work tirelessly. Thank you Jesus for coming into this world and giving us new life and restoring our dignity. Amen.


 -Br. Biniush Topno


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06 जनवरी 2022, गुरुवार

 

06 जनवरी 2022, गुरुवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का गुरुवार

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⭐ पहला पाठ : 1 योहन 4:19-5:4

19) हम प्यार करते हैं, क्योंकि उसने पहले हमें प्यार किया।

20) यदि कोई यह कहता कि मैं ईश्वर को प्यार कता हूँ और वह अपने भाई से बैर करता, तो वह झूठा है। यदि वह अपने भाई को जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता तो वह ईश्वर को, जिसे उसने कभी नहीं देखा, प्यार नहीं कर सकता।

21) इसलिए हमें मसीह से यह आदेश मिला है कि जो ईश्वर को प्यार करता है, उसे अपने भाई को भी प्यार करना चाहिए।

5:1) जो यह विश्वास करता है कि ईसा ही मसीह हैं, वह ईश्वर की सन्तान है और जो जन्मदाता को प्यार करता है, वह उसकी सन्तान को भी प्यार करता है।

2) इसलिए यदि हम ईश्वर को प्यार करते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हमें ईश्वर की सन्तान को भी प्यार करना चाहिए।

3) ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना- यही ईश्वर का प्रेम है। उसकी आज्ञाएं भारी नहीं,

4) क्योंकि ईश्वर की हर सन्तान संसार पर विजयी होती है। वह विजय, जो संसार को पराजित करती है, हमारा विश्वास ही है।


⭐ सुसमाचार : लूकस 4:14-22

14) आत्मा के सामर्थ्य से सम्पन्न हो कर ईसा गलीलिया लौटे और उनकी ख्याति सारे प्रदेश में फैल गयी।

15) वह उनके सभागृहों में शिक्षा दिया करते और सब उनकी प्रशंसा करते थे।

16) ईसा नाज़रेत आये, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ था। विश्राम के दिन वह अपनी आदत के अनुसार सभागृह गये। वह पढ़ने के लिए उठ खड़े हुए

17) और उन्हें नबी इसायस की पुस्तक़ दी गयी। पुस्तक खोल कर ईसा ने वह स्थान निकाला, जहाँ लिखा हैः

18) प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिशेक किया है। उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश दूँ, दलितों को स्वतन्त्र करूँ

19) और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करूँ।

20) ईसा ने पुस्तक बन्द कर दी और वह उसे सेवक को दे कर बैठ गये। सभागृह के सब लोगों की आँखें उन पर टिकी हुई थीं।

21) तब वह उन से कहने लगे, "धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है"।

22) सब उनकी प्रशंसा करते रहे। वे उनके मनोहर शब्द सुन कर अचम्भे में पड़ जाते और कहते थे, "क्या यह युसूफ़ का बेटा नहीं है?"

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु को अपनी परिकल्पना तथा मिशन वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए पाते हैं। वह स्वयं को ईश्वर का अभिषिक्त घोषित करते हैं जिसको उत्पीड़ितों की मुक्ति और सुसमाचार की घोषणा करने का कार्य सौंपा गया है। प्रभु येसु के लिए तो स्पष्ट था कि पिता उनसे क्या अपेक्षा करते हैं। उन्होंने कलवारी के क्रूस के माध्यम से मानवता के उद्धार के अपने लक्ष्य को हमेशा अपनी आंखों के सामने रखा और बड़े दृढ़ संकल्प के साथ वे उसकी ओर बढ़े। यह लक्ष्य उनका खुद का बनाया हुआ नहीं था, बल्कि पिता द्वारा दिया गया था। हम में से प्रत्येक के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने आप को ठीक से पहचानें और ईश्वर की इच्छा को समझें और दृढ़ संकल्प के साथ उसका पालन करें।



📚 REFLECTION

In today’s Gospel we find the vision and mission statement of Jesus. He declares himself as the anointed one of God who has the task of liberation of the oppressed and proclamation of the good news. Jesus was clear about what the Father expected from him. He kept his task of redemption of humanity through the cross of Calvary before his eyes always and moved towards it with great determination. This goal was not of his own making, but one given by the Father. It is important for each one of us to know our own identity and discern the will of God and follow it with determination.


📚 मनन-चिंतन -02

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु अपने गृह नगर नाज़रेथ जाते हैं और वहाँ के सभागृह में जाकर नबी इसायस के ग्रंथ में से पाठ पढ़ते हैं। वह अपने इस दुनिया में आने के मक़सद की घोषणा करते हैं। वह घोषणा करते हैं कि स्वर्गीय पिता ने उन्हें दरिद्रों को सुसमाचार सुनाने के लिए भेजा है। दरिद्रों के लिए शुभ संदेश क्या है? यही कि उनकी दरिद्रता अब समाप्त होने वाली है। उनका उद्देश्य बंदियों को मुक्ति का संदेश देने, अंधों को दृष्टिदान और पददलितों का उद्धार करने के लिए आए हैं। उनकी प्राथमिकता की सूची में यही लोग हैं - अंधे, दरिद्र, पद दलित और बंदी। वह ऐसे ही लोगों के लिए इस दुनिया में आए हैं, उनके लिए अपना जीवन क़ुर्बान करने के और अपना प्रेम और मुक्ति उन्हें प्रदान करने के लिए आए हैं। उनके सेवाकार्य और मिशन का केंद्रबिंदु यही लोग हैं।

आज जब हम अपने चारों ओर नज़रें दौड़ाते हैं, तो आज भी हम अनेकों अंधे लोगों को देख सकते हैं, ऐसे लोग जो अन्यायपूर्ण तरीक़े से सलाख़ों के पीछे हैं, और ऐसे कमजोर लोग जो बलवानों के अत्याचार का शिकार बन जाते हैं। आज की दुनिया में लोग ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के सिद्धांत का पालन करते हैं। जो शक्तिशाली है वह कुछ भी कर सकता है; कोई उनके विरुद्ध आवाज़ उठाने वाला नहीं है। कोई भी दरिद्रों, बंदियों या पद दलितों का साथ देने वाला नहीं है। ईश्वर का मुक्तिकार्य आज भी जारी है। आज ईश्वर हम में से प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए काम करने के लिए पुकारते हैं, उस मिशन कार्य को जारी रखने के लिए जिसके लिए वो इस दुनिया में आए। प्रभु का मिशन हमारे जीवन का मिशन बन जाये। आमेन।


📚 REFLECTION

Today we see Jesus goes to his hometown Nazareth and goes to the synagogue and reads from the scroll of prophet Isiah. He proclaims his purpose of coming into this world. He proclaims that God the father has sent him to bring good news to the poor. What is good news for the poor? That their poverty is to end. He is also called to proclaim release to the captives, sight to the blind and freedom for the oppressed. These are the people who are in his top priority list - the blind, the poor, the oppressed and the captives. He has come for such people, to give his life for them, his love and redemption for them. The focus of his ministry is these oppressed people.

Today as we look around us, we still can see lots of blind people, the people unjustly put behind that bars, weak people exploited by the powerful. Today we see a world where people follow the principal of might is right. Those who are powerful, they can do anything; nobody is there to question them. Nobody is there to take side of the captives, the poor and the downtrodden. God’s salvation work still continues. Today he wants each one of us to come forward and work for him and continue his work for which he came to the world. Let his mission be our mission. Amen.


 -Br. Biniush Topno


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05 जनवरी 2022, बुधवार

05 जनवरी 2022, बुधवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का बुधवार

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⭐ पहला पाठ : 1 योहन 4:11-18

11) प्रयि भाइयो! यदि ईश्वर ने हम को इतना प्यार किया, तो हम को भी एक दूसरे को प्यार करना चाहिए।

12) ईश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा। यदि हम एक दूसरे को प्यार करते हैं, तो ईश्वर हम में निवास करता है और ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम पूर्णता प्राप्त करता है।

13) यदि वह इस प्रकार हमें अपना आत्मा प्रदान करता है, तो हम जान जाते हैं कि हम उस में और वह हम में निवास करता है।

14) पिता ने अपने पुत्र को संसार के मुक्तिदाता के रूप में भेजा। हमने यह देखा है और हम इसका साक्ष्य देते हैं।

15) जो यह स्वीकार करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं, ईश्वर उस में निवास करता है और वह ईश्वर में।

16) इस प्रकार हम अपने प्रति ईश्वर का प्रेम जान गये और इस में विश्वास करते हैं। ईश्वर प्रेम है और जो प्रेम में दृढ़ रहता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में।

17) यदि हम पूरे भरोसे के साथ न्याय के दिन की प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि हम इस संसार में मसीह के अनुरूप आचरण करते हैं, तो हमारा प्रेम पूर्णता प्राप्त कर चुका है।

18) प्रेम में भय नहीं होता। पूर्ण प्रेम भय दूर कर देता है, क्योंकि भय में दण्ड की आशंका रहती है और जो डरता है, उसका प्रेम पूर्णता तक नहीं पहुँचा है।


⭐ सुसमाचार : मारकुस 6:45-52

45) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार, बेथसाइदा चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा कर देंगे।

46) ईसा लोगों को विदा कर पहाड़ी पर प्रार्थना करने गये।

47) सन्ध्या हो गयी थी। नाव समुद्र के बीच में थी और ईसा अकेले स्थल पर थे।

48) ईसा ने देखा कि शिष्य बड़े परिश्रम से नाव खे रहे हैं, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी; इसलिए वे रात के लगभग चैथे पहर समुद्र पर चलते हुए उनकी ओर आये और उन से कतरा कर आगे बढ़ना चाहते थे।

49) शिष्यों ने उन्हें समुद्र पर चलते देखा। वे उन्हें प्रेत समझ कर चिल्ला उठे,

50) क्योंकि सब-के-सब उन्हें देख कर घबरा गये। ईसा ने तुरन्त उन से कहा, "ढ़ारस रखो, मैं ही हूँ। डरो मत।"

51) तब वे उनके पास आ कर नाव पर चढ़े और वायु थम गयी। शिष्य आश्चर्यचकित रह गये,

52) क्योंकि वे अपनी बुद्धि की जड़ता के कारण रोटियों के चमत्कार का अर्थ नहीं समझ पाये थे।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार के अंश को ध्यान से पढ़ने से हमें पता चलता है कि समुद्र को शांत करने की घटना के बाद भी शिष्य रोटियों के चमत्कार के बारे में सोच रहे थे। इसलिए सुसमाचार लेखक कहता है, "शिष्य आश्चर्यचकित रह गये क्योंकि वे अपनी बुद्धि की जड़ता के कारण रोटियों के चमत्कार का अर्थ नहीं समझ पाये थे।" यह एक साधारण चमत्कार से कहीं अधिक था। रोटियों के चमत्कार में कई रहस्य सामने आते हैं। यह घटना, ठीक से समझ में आ गई तो, हम सभी लोगों के लिए प्रेरणा और सशक्तिकरण का स्रोत बन सकती है। ईश्वर के हाथों में रखा गया हमारा छोटा-सा योगदान ज़रूरतमंद लोगों के लिए बहुत बड़ी सामग्री बन सकता है। जब हमारी क्षमताएं और प्रतिभाएं प्रभु को अर्पित की जाती हैं, तब वे महान मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए समृद्ध हो जाएंगी।



📚 REFLECTION

A careful reading of the Gospel passage of today tells us that the disciples were wondering about the miracle of the loaves even after the incident of the calming of the sea. That is why the evangelist says, “they were utterly astounded, for they did not understand about the loaves, but their hearts were hardened.” It was more than an ordinary miracle. In the multiplication of the bread many mysteries were being revealed. This incident, properly understood, can become a source of inspiration and empowerment for all of us. Our meagre possessions placed in the hands of God can become great provisions for multitudes in need. When our abilities and talents are offered to God, they will be enriched to meet great human needs.


📚 मनन-चिंतन - 02

ईश्वर हमारा सृष्टिकर्ता है; हम उसी के पास से आते हैं और एक दिन उसी के पास लौट जाना है। यदि ईश्वर ही हमारे जीवन का स्रोत है, तो हमें अपनी आत्मा के लिए पोषण के लिए उसी से हमेशा जुड़े रहना पड़ेगा। भले ही प्रभु येसु स्वयं ईश्वर थे, लेकिन वे भी अपने स्वर्गीय पिता निरंतर जुड़े रहने के लिए प्रार्थना में समय बिताते हैं, ताकि मनुष्य बनकर हमारे बीच आने के अपने उद्देश्य को वो सदा याद रखें। आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु बड़े सवेरे एकांत स्थान में जाते हैं और प्रार्थना में समय बिताते हैं। अगर स्वयं ईश-पुत्र प्रार्थना में समय बिताते हैं तो हम कमजोर स्वभाव मनुष्यों को प्रार्थना में समय बिताने की कितनी ज़रूरत है? अगर हमें निरंतर ईश्वर से अपनी आत्मा के लिए पोषण चाहिए तो हमें प्रार्थना के द्वारा सदा उनसे जुड़े रहना और अपने हृदयों को उसका निवास स्थान बनाना होगा।

जब ईश्वर के साथ सम्बन्ध मज़बूत होता है तो ईश्वर हम में निवास करता है, और जब ईश्वर का निवास हमारे हृदय में है तो हम स्वयं में और दूसरों में उसकी उपस्थिति को पहचान सकते हैं। इसलिए संत योहन हमें याद दिलाते हैं कि यदि हम ईश्वर की संताने हैं तो हमें एक दूसरे को प्यार करना चाहिए। यदि हम ईश्वर को प्यार करते हैं तो हमें दूसरों को भी प्यार करना चाहिए क्योंकि वही अदृश्य ईश्वर उनमें भी निवास करता है। यदि हमें ईश्वर के साथ अपना सम्बन्ध मज़बूत बनाना है तो उससे पहले हमें अपने पड़ौसी के साथ अपना सम्बन्ध मज़बूत बनाना होगा। उस अदृश्य ईश्वर को प्यार करने से पहले हमें अपने भाई-बहनों को प्यार करना है जो उसी अदृश्य ईश्वर का साक्षात रूप हैं।



📚 REFLECTION

God is our creator; we came from him and we have to go back to him. If God is the source of our life then we need to remain connected with him so that we continue to receive sustenance for our souls. Jesus himself was God, but he was to remain in constant union with the Father, so that he is always aware of the purpose of his coming down and taking our form. We see in the gospel today that he goes to a lonely place and spends time in prayer. If son of God himself spends time in prayer, then how much we need to pray as we are mere weak human beings. If we have to draw constant sustenance from God, then we need to remain in God, and make our hearts his dwelling place.

When we are strengthened in our relationship with God, then God dwells within us and when God dwells within us, we can recognise God within us as well as in others around us. That’s why St. John reminds us that if we are children of God then we must love one another. If we love God then we must also love others because same invisible God dwells within them. So if we have to strengthen our relationship with God then before that we have to strengthen our relationship with our neighbour. In order to love invisible God we must first love our brothers and sisters who are the visible image of same God our father.


 -Br. Biniush Topno



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04 जनवरी 2022, मंगलवार

 

04 जनवरी 2022, मंगलवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का मंगलवार

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⭐ पहला पाठ : 1 योहन 4:7-10


7) प्रिय भाइयो! हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईश्वर से उत्पन्न होता है।

8) जौ प्यार करता है, वह ईश्वर की सन्तान है और ईश्वर को जानता है। जो प्यार नहीं करता, वह ईश्वर को नहीं जानता; क्येोंकि ईश्वर प्रेम है।

9) ईश्वर हम को प्यार करता है। यह इस से प्रकट हुआ है कि ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेजा, जिससे हम उसके द्वारा जीवन प्राप्त करें।

10) ईश्वर के प्रेम की पहचान इस में है कि पहले हमने ईश्वर को नहीं, बल्कि ईश्वर ने हम को प्यार किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा।



⭐ सुसमाचार : मारकुस 6:34-44


34) ईसा ने नाव से उतर कर एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे और वह उन्हें बहुत-सी बातों की शिक्षा देने लगे।

35) जब दिन ढलने लगा, तो उनके शिष्यों ने उनके पास आ कर कहा, "यह स्थान निर्जन है और दिन ढल चुका है।

36) लोगों को विदा कीजिए, जिससे वे आसपास की बस्तियों और गाँवों में जा कर खाने के लिए कुछ खरीद लें।"

37) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "तुम लोग ही उन्हें खाना दे दो"। शिष्यों ने कहा, "क्या हम जा कर दो सौ दीनार की रोटियाँ ख़रीद लें और उन्हें लोगों को खिला दें?"

38) ईसा ने पूछा, "तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ है? जा कर देखो।" उन्होंने पता लगा कर कहा, "पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ"।

39) इस पर ईसा ने सब को अलग-अलग टोलियों में हरी घास पर बैठाने का आदेश दिया।

40) लोग सौ-सौ और पचास-पचास की टोलियों में बैठ गये।

41) ईसा ने वे पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ ले ली और स्वर्ग की ओर आँखें उठा कर आशिष की प्रार्थना पढ़ी। वे रोटियाँ तोड-तोड कर अपने शिष्यों को देते गये, ताकि वे लोगों को परोसते जायें। उन्होंने उन दो मछलियों को भी सब में बाँट दिया।

42) सबों ने खाया और खा कर तृप्त हो गये।

43) रोटियों और मछलियों के बचे हुए टुकड़ों से बारह टोकरे भर गये।

44) रोटी खाने वाले पुरुषों की संख्या पाँच हज़ार थी।

📚 मनन-चिंतन



रोटियों का चमत्कार प्रभु येसु के सबसे महत्वपूर्ण चमत्कारों में से एक है। सुसमाचार-लेखकों के अनुसार येसु ने कम से कम दो बार रोटियों का चमत्कार किया : एक बार उन्होंने पाँच रोटियों और दो मछलियों से पाँच हज़ार लोगों को खिलाया और दूसरी बार उन्होंने सात रोटियों तथा कुछ छोटी मछलियों से चार हज़ार लोगों को खिला कर तृप्त किया। दोनों ही समय बहुत अधिक रोटियाँ बच गयी थीं, इतना कि शिष्यों को बचे हुए टुकड़ों को कई टोकरियों में इकट्ठा करना पडा था। इस चमत्कार का अर्थ हम दो परतों में समझ सकते हैं। सबसे पहले, जो लोग शारीरिक रूप से भूखे थे, उन पर दया करते हुए प्रभु येसु ने उन्हें खाने के लिए भरपूर भोजन दिया। दूसरा, आध्यात्मिक रूप से भूखे लोगों के लिए करुणा महसूस करते हुए उसने उन्हें स्वर्ग से भोजन दिया - यूखरिस्त में अपना शरीर और रक्त। हम रोटियों के चमत्कारों में यूखरिस्त की छाया पा सकते हैं। आइए हम ईश्वरीय पूर्वप्रबंध के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते रहें।



📚 REFLECTION



The miracle of the multiplication of bread is one of the most important miracles of Jesus. According to the evangelists Jesus multiplied bread at least twice : once he multiplied five loaves and two fish to feed five thousand people and on another occasion he multiplied seven loaves and some small fish to feed four thousand people. Both the times there was a abundance of bread, so much so the disciples had to collect the pieces left over in many baskets. We can understand this miracle in two layers of meaning. First, feeling compassion for the people who were physically hungry he gave them plenty of food to eat. Second, feeling compassion for people who were spiritually hungry he gave them food from heaven – his own body and blood in the Eucharist. We can find a shadow of the Eucharist in the multiplication of the bread. Let us be thankful to God for the divine providence.


📚 मनन-चिंतन - 02



आज हम पाँच रोटियों और दो मछलियों से हज़ारों लोगों को भोजन कराने के चमत्कार को देखते हैं। ऐसा क्या था जिसके कारण प्रभु येसु ने यह चमत्कार किया? लोगों के प्रति करुण प्रेम ने उन्हें उनके लिए कुछ करने के लिए प्रेरित और मजबूर किया। जब प्रभु ने देखा कि एक बड़ी भीड़ उनके पीछे-पीछे आ रही है, बड़ी आशा लिए उन्हें खोज रही है, उन्हें उन पर तरस आया, उन्हें वे बिना चरवाहे की भेड़ों के समान लगे। प्रभु येसु अगर चाहते तो दो मछलियों और पाँच रोटियों के बिना भी यह चमत्कार कर सकते थे, लेकिन वे चाहते हैं कि उनके मुक्तिकार्य में हम मनुष्यों का भी कुछ योगदान होना चाहिए।

इन दिनों के पाठों में क़रीब हर दिन हम ईश्वर के प्रेम के नए-नए पहलुओं को देखते हैं। आज की पूजन विधि में अपने आप को एक प्रेमी पिता के रूप में प्रकट करते हैं जो अपने बच्चों के दुःख-दर्द को अनदेखा नहीं कर सकते। हमारे दर्द, हमारी परेशानियाँ और हमारे मन का अंधकार उन्हें हमारे लिए व्यथित कर देता है। अगर हम ईश्वर की संतानें हैं तो हम में भी हमारे स्वर्गीय पिता के गुण होना ज़रूरी है। क्या दूसरों के दुःख-दर्द देखकर मेरा मन भी दुखी होता है और उनके लिए कुछ करने के लिए मुझे मजबूर कर देता है?



📚 REFLECTION


Today we reflect about the miracle of Jesus feeding a large number of people from five loaves and two fish. What made Jesus to perform this miracle? It was his love for the people that moved him to act for them. When he saw crowds seeking him, coming after him with so much expectation, he felt pity for them, he found that they needed someone to lead them to the right path and help them to come God. He could have performed this miracle even without five loaves and two fish, but he wants that in his saving mission there should be some contribution from our side as well.

These days in the daily readings almost everyday we witness new aspects of God’s love towards us. In today’s liturgy he shows that he is our loving father who cannot see the pain and misery of his children. Our sufferings, our pain, our sicknesses and our being in darkness moves him with pity. If we are his children we also need to possess some of the qualities of our heavenly father. Does somebody’s pain or misery or sufferings move me to act, to do something for them?


 -Br. Biniush Topno


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03 जनवरी 2022, सोमवार

 

03 जनवरी 2022, सोमवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का सोमवार

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⭐ पहला पाठ: 1योहन 3:22-4:6


22) हम उस से जो कुछ माँगेंगे, वह हमें वहीं प्रदान करेगा; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को पालन करते हैं और वही करते हैं, जो उसे अच्छा लगता है।

23) और उसकी आाज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र ईसा मसीह के नाम में विश्वास करें और एक दूसरे को प्यार करें, जैसा कि मसीह ने हमें आदेश दिया।

24) जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में और हम जानते हैं कि वह हम में निवास करता है; क्योंकि उसने हम को आपना आत्मा प्रदान किया है।

4:1) प्रिय भाइयो! प्रत्येक आत्मा पर विश्वास मत करो। आत्माओं की परीक्षा कर देखो कि वे ईश्वर के हैं या नहीं; क्योंकि बहुत-से झूठे नबी संसार में आये हैं।

2) ईश्वर के आत्मा की पहचान इस में हैः प्रत्येक आत्मा जो यह स्वीकार करता है कि ईसा मसीह सचमुच मनुष्य बन गये हैं, ईश्वर का है

3) और प्रत्येक आत्मा, जो इस प्रकार ईसा को स्वीकार नहीं करता; ईश्वर का नहीं है और वह ईश्वर-विरोधी है। तुमने सुना है कि वह संसार में आने वाला है और अब तो वह संसार में आ चुका है।

4) बच्चो! तुम ईश्वर के हो और तुमने उन लोगों पर विजय पायी है; क्योंकि जो तुम में हैं, वह उस से महान् हैं, जो संसार में है।

5) वे संसार के हैं और इसलिए वे संसार की बातें करते हैं और संसार उनकी सुनता है।

6) किन्तु हम ईश्वर के हैं और जो ईश्वर को पहचानता है, वह हमारी सुनता है। जो ईश्वर का नहीं है, वह हमारी बात सुनना नहीं चाहता। हम इसके द्वारा सत्य के आत्मा और भ्रान्ति की आत्मा की पहचान कर सकते हैं।


⭐ सुसमाचार : सन्त मत्ती 4:12-17, 23-25


(12) ईसा ने जब यह सुना कि योहन गिरफ्तार हो गया है, तो वे गलीलिया चले गये।

(13) वे नाज़रेत नगर छोड कर, ज़बुलोन और नफ्ताली के प्रान्त में, समुद्र के किनारे बसे हुए कफ़रनाहूम नगर में रहने लगे।

(14) इस तरह नबी इसायस का यह कथन पूरा हुआ-

(15) ज़बुलोन प्रान्त! नफ्ताली प्रान्त! समुद्र के पथ पर, यर्दन के उस पार, ग़ैर-यहूदियों की गलीलिया! अंधकार में रहने

(16) वाले लोगों ने एक महती ज्योति देखी; मृत्यु के अन्धकारमय प्रदेश में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ।

(17) उस समय से ईसा उपदेश देने और यह कहने लगे, "पश्चात्ताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।"

(23) ईसा उनके सभागृहों में शिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते और लोगों की हर तरह की बीमारी और निर्बलता दूर करते हुए, सारी गलीलिया में घूमते रहते थे।

(24) उनका नाम सारी सीरिया में फैल गया। लोग मिर्गी, लक़वा आदि नाना प्रकार की बीमारियों और कष्टों से पीड़ित सब रोगियों को और अपदूतग्रस्तों को ईसा के पास ले आते और वे उन्हें चंगा करते थे।

(25) गलीलिया, देकापोलिस, येरूसालेम, यहूदिया और यर्दन के उस पार से आया हुआ एक विशाल जनसमूह उनके पीछे-पीछे चलता था।


📚 मनन-चिंतन


सुसमाचार लेखकों के अनुसार, योहन बपतिस्ता के रंगभूमि से ओझल होने के बाद ही प्रभु येसु ने सुसमाचार प्रचार करने का अपना कार्य शुरू किया। येसु ने ईश्वर के राज्य का उद्घाटन किया जिसके बारे में योहन बपतिस्ता ने घोषणा की थी। सुसमाचार में हम योहन बपतिस्ता तथा येसु द्वारा बड़ी पारस्परिक समझ के साथ ईश्वर की अनोखी योजना को आगे बढ़ाते हुए देख सकते हैं। येसु के प्रचार का विषय ईश्वर का राज्य था। ईश्वर का राज्य एक स्थिर वास्तविकता नहीं है बल्कि वह गतिशील है। वह प्रभु का शासन है जिसके अन्तर्गत प्रभु की इच्छा सर्वोच्च मानी जाती है और प्रभु का नाम पवित्र माना जाता है। आइए हम अपने जीवन में ईश्वर की इच्छा को बनाए रखते हुए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना सीखें।


📚 REFLECTION



According to the Evangelists, Jesus began his ministry of preaching the Gospel after John the Baptist disappeared from the scene. Jesus inaugurated the Kingdom of God which John the Baptist spoke about. We can see the perfect plan of God being carried by John the Baptist and Jesus with great mutual understanding. The theme of the preaching of Jesus was the Kingdom of God. The kingdom of God is not a static reality but a dynamic one. It is the reign of God where the will of God is supreme and the name of God is held holy. Let us learn to usher in the kingdom of God by upholding the will of God in our own lives.



📚 मनन-चिंतन - 02



हेरोद के द्वारा संत योहन बप्तिस्ता को गिरफ़्तार किए जाने के बाद प्रभु येसु अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं। नफ़ताली और ज़ेबुलोन के इस क्षेत्र को जहां से प्रभु येसु अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं, सन्त मत्ती इसे ग़ैर-यहूदियों की गलिली कहते हैं। पुराने व्यवस्थान में गलिली को राष्ट्रों की गलिली कहकर पुकारा जाता था (इसायस ९:१-३) क्योंकि यही प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करने का द्वार था। इस स्थान का सम्पर्क निरंतर नए लोगों और नयी-नयी संस्कृतियों से होता रहता था। यह प्रतिज्ञात देश का भाग होते हुए भी भ्रष्ट एवं अंधकारमय प्रदेश के रूप में जाना जाता था। यहाँ के लोग चुनी हुई प्रजा में नहीं गिने जाते थे, और उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता था। वे प्रभु के प्रेम की अज्ञानता के अंधकार में भटकते थे। शायद वही ऐसे लोग थे जिन्हें मुक्तिदाता की सबसे अधिक ज़रूरत थी।

इसलिए हम देखते हैं कि प्रभु येसु इसी स्थान पर अपना निवास बनाते और अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं। जो स्थान नगण्य और तुच्छ समझा जाता था वही महान और ईश्वर के मिशन कार्य को प्रारम्भ करने का स्थान बन जाता है। प्रभु उनका अंधकार दूर करने आए हैं, और ईश्वरीय प्रेम की ज्योति जलाने आए हैं। गलिली से अपना मुक्तिकार्य प्रारम्भ करते हुए ईश्वर यह दर्शाते हैं कि धर्मियों से अधिक वह अधर्मियों को बुलाने आए हैं, क्योंकि धर्मियों से अधिक पापियों को ईश्वर की ईश्वर की आवश्यकता है (मत्ती ९:१३)। आज प्रत्येक वह स्थान जहाँ ईश्वर का प्रेम नहीं पहुँचा है, वह गलिली है। आइए हम ईश्वर के उस अनंत प्रेम को सब जनों तक पहुँचाएँ।आज भी अनेक लोग हैं जो अंधकार में और जो जीवन की ज्योति की खोज में हैं। प्रभु ही वह जीवन की ज्योति हैं। (योहन ८:१२)।



📚 REFLECTION



Today we see Jesus beginning his public ministry after the arrest of John the Baptist by Herod. St. Matthew calls this area Naphtali and Zebulon where Jesus begins his ministry, as new Galilee of the Gentiles. In Old Testament times Galilee was called the Galilee of the nations (Is 9:1-3) because it was the entry point in the geographical territory of Israel, the promised land. This place constantly came in contact with different nations and cultures. Even it was part of the promised land but it was considered as corrupt and place of darkness. People here were not considered as especially chosen, but like they were treated with low esteem and like outsiders. They lived in the darkness of the ignorance of the Lord. In fact they were the people who needed a saviour more than anybody else.

Therefore we see Jesus making his dwelling and beginning his saving ministry from this place. The place which was discarded as the most insignificant place becomes very prominent place and starting point of God’s saving mission. He has come to dispel the darkness of sin and ignorance of God’s love for them. By starting his ministry from Galilee, God shows that more than righteous, he has come for sinners, because sinners need God more than the righteous (Mt. 9:13). Today every place where this good news of God’s love has not reached, is a Galilee. Let us make known God’s love to all, the love he has shown in his son Jesus our saviour. There are great number of people who still remain in dark, who still need to see the light of the world (John 8:12).


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

02 जनवरी 2022, इतवार

 

02 जनवरी 2022, इतवार

प्रभु प्रकाश पर्व

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⭐ पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 60:1-6


1) “उठ कर प्रकाशमान हो जा! क्योंकि तेरी ज्योति आ रही है और प्रभु-ईश्वर की महिमा तुझ पर उदित हो रही है।

2) पृथ्वी पर अँधेरा छाया हुआ है और राष्ट्रों पर घोर अन्धकार; किन्तु तुझ पर प्रभु उदित हो रहा है, तेरे ऊपर उसकी महिमा प्रकट हो रही है।

3) राष्ट्र तेरी ज्योति की ओर आ रहे हैं और राजा तेरे उदीयमान प्रकाश की ओर।

4) “चारों ओर दृष्टि दौड़ा कर देख! सब मिल कर तेरे पास आ रहे हैं। तेरे पुत्र दूर से चले आ रहे हैं; लोग तेरी पुत्रियों को गोद में उठा कर लाते हैं।

5) यह देख कर तू प्रफुल्लित हो उठेगी; तेरा हृदय आनन्द से उछलने लगेगा; क्योंकि समुद्र की सम्पत्ति और राष्ट्रों का धन तेरे पास आ जायेगा।

6) ऊँटों के झुण्ड और मिदयान तथा एफ़ा की साँड़नियाँ तुझ में उमड़ पड़ेंगी; शबा के सब लोग, प्रभु की स्तुति करते हुए, सोने और लोबान की भेंट ले आयेंगे।


दूसरा पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:2-3a,5-6


2) आप लोगों ने अवश्य सुना होगा कि ईश्वर ने आप लोगों की भलाई के लिए मुझे अपनी कृपा का सेवा-कार्य सौंपा है।

3) उसने मुझ पर वह रहस्य प्रकट किया है,

5) वह रहस्य पिछली पीढि़यों में मनुष्य को नहीं बताया गया था और अब आत्मा के द्वारा उसके पवित्र प्रेरितों और नबियों का प्रकट किया गया है।

6) वह रहस्य यह है कि सुसमाचार के द्वारा यहूदियों के साथ गैर-यहूदी एक ही विरासत के अधिकारी हैं, एक ही शरीर के अंग हैं और ईसा मसीह-विषयक प्रतिज्ञा के सहभागी हैं।



⭐ सुसमाचार : सन्त मत्ती 2:1-12



(1) ईसा का जन्म यहूदिया के बेथलेहेम में राजा हेरोद के समय हुआ था। इसके बाद ज्योतिषी पूर्व से येरुसालेम आये।

(2) और यह बोले, ’’ यहूदियों के नवजात राजा कहाँ हैं? हमने उनका तारा उदित होते देखा। हम उन्हें दण्डवत् करने आये हैं।’’

(3) यह सुन कर राजा हेरोद और सारा येरुसालेम घबरा गया।

(4) राजा ने सब महायाजकों और यहूदी जाति के शास्त्रियों की सभा बुला कर उन से पूछा, ’’ मसीह कहाँ जन्म लेंगें?’’

(5) उन्होंने उत्तर दिया, ’’यहूदिया के बेथलेहेम में, क्योंकि नबी ने इसके विषय में लिखा है-

(6) ’’बेथलेहेम यूदा की भूमि! तू यूदा के प्रमुख नगरों में किसी से कम नहीं है; क्योंकि तुझ में एक नेता उत्पन्न होगा, जो मेरी प्रजा इस्राइल का चरवाहा बनेगा।’’

(7) हेरोद ने बाद में ज्योतिषियों को चुपके से बुलाया और उन से पूछताछ कर यह पता कर लिया कि वह तारा ठीक किस समय उन्हें दिखाई दिया था।

(8) फिर उसने उन्हें बेथलेहेम भेजते हुए कहा, जाइए, बालक का ठीक-ठीक पता लगाइए और उसे पाने पर मुझे खबर दीजिए, जिससे मैं भी जा कर दण्डवत् करूँ।

(9) वे राजा की बात मानकर चल दिए। उन्होंने जिस तारे को उदित होते देखा था, वह उनके आगे आगे चलता रहा, और जहाँ बालक था उस जगह के ऊपर पहुँचने पर ठहर गया।

(10) वे तारा देख कर बहहुत आनन्दित हुए।

(11) घर में प्रवेश कर उन्होंने बालक को उसकी माता मरियम के साथ देखा और उसे साष्टांग प्रणाम किया। फिर अपना-अपना सन्दूक खोलकर उन्होंने उसे सोना, लोबान और गंधरस की भेट चढ़ायी।

(12) उन्हें स्वप्न में यह चेतावनी मिली के वे हेरोद के पास नहीं लौटें, इसलिए वे दूसरे रास्ते से अपने देश चले गये।



📚 मनन-चिंतन


पूर्व से आये ज्ञानी ज्योतिषी ईश्वर के साधक थे। स्तोत्र 14:2 में, हम पढ़ते हैं, " ईश्वर यह जानने के लिए स्वर्ग से मनुष्यों पर दृष्टि दौड़ाता है कि उन में कोई बुद्धिमान हो, जो ईश्वर की खोज में लगा रहता हो।" ईश्वर को खोजने का यही गुण उन्हें बुद्धिमान बनाता है। सभी मनुष्य कुछ न कुछ खोजते रहते हैं। वे तब बुद्धिमान हो जाते हैं जब वे ईश्वर की तलाश शुरू करते हैं। मत्ती 6:33 में प्रभु येसु कहते हैं, "तुम सब से पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें तुम्हें यों ही मिल जायेंगी।" योहन 1:35-39 में येसु उनका पीछा करने वाले संत योहन बपतिस्ता के दो शिष्यों से पूछते हैं, "क्या चाहते हो?" उनका जवाब एक सवाल था - "रब्बी! " (अर्थात गुरुवर) आप कहाँ रहते हैं?" वे येसु की निरंतर उपस्थिति चाह रहे थे। ऐसी खोज से शिष्यत्व का प्रारंभ होता है। प्रभु हमें जीवन की हर परिस्थिति में उन्हें खोजने में मदद करें।



📚 REFLECTION



The wise men from the east are seekers of God. In Ps 14:2, we read, “The LORD looks down from heaven on humankind to see if there are any who are wise, who seek after God.” It is this quality of seeking God that makes them wise. All human beings keep seeking something or other. They become wise when they begin to seek God. Jesus says in Mt 6:33, “Strive first for the kingdom of God and his righteousness, and all these things will be given to you as well”. In Jn 1:35-39 we find Jesus asking the two disciples of John who were following him, “What do you seek?” Their reply was a question : “Rabbi, where do you live?” They were seeking the constant presence of Jesus. Discipleship begins with such seeking. May the Lord help us to seek him in every circumstance of life.



📚 मनन-चिंतन - 02



आज नव वर्ष २०२१ का पहला रविवार है और आज माता कलिसिया प्रभु प्रकाश का पर्व मनाती है। आज सभी राष्ट्रों के लिए प्रभु की महिमा के प्रकटीकरण का पर्व है। यह एक महान पर्व जो ईश्वर के द्वारा सभी हदों को मिटाने को दर्शाता है जो हदें हमें ईश्वर से और एक दूसरे से अलग करती हैं। ईश्वर मानवजाति के प्रति अपने प्रेम और करना को अपने पुत्र प्रभु येसु में दर्शाते हैं जिनकी प्रतिज्ञा उन्होंने सदियों पूर्व की थी। लोग मुक्तिदाता की राह देख रहे थे जो उन्हें ईश्वर की ओर ले जाए, जो ईश्वर के साथ पुनः उनका मेल-मिलाप करा दे, क्योंकि उनके पापों के कारण ईश्वर के साथ उनका सम्बन्ध टूट गया था। प्रभु येसु में पिता ईश्वर यह प्रकट करते हैं कि वही सच्चे ईश्वर हैं, एक महाप्रतापी राजा जिनके राज्य का कभी अन्त नहीं होगा। वही प्रभु हमें बचाने के लिए हमारे जैसे मनुष्य बन गए हैं, जो हमारे दुःख-दर्द, हमारे ख़ुशी और ग़मों को महसूस कर सकते हैं।

जब सारी मानवजाति ईश्वर से विमुख हो गयी थी, तो ईश्वर ने उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ दिया। वह उन्हें वापस लाना चाहता था, एक सच्चे ईश्वर की शरण में। इसराएल ईश्वर के चुने हुए लोग और उसकी अपनी प्रजा थी। पुराने व्यवस्थान में हम देखते हैं कि ईश्वर का सारा ध्यान इन्हीं लोगों की ओर था और ईश्वर चाहते थे कि ये लोग उसकी महिमा और सामर्थ्य का साक्ष्य सब राष्ट्रों के समक्ष दें। जब वे उसके प्रति वफ़ादार नहीं रहे और उससे दूर चले गए तो ईश्वर उन्हें वापस लाना चाहता था। उसने अनेक चिन्ह और चमत्कारों द्वारा उन्हें दिखाया कि ईश्वर उन्हें भूला नहीं है, बल्कि वह सदा उनके साथ था। वह नबियों के द्वारा उनसे बोला और एक मसीह की प्रतिज्ञा की जो ईश्वर के साथ उनका मेल कराने और उनके पापों के लिए अपने आप को क्रूस पर बलिदान कर देगा।

ईश्वर के मनुष्य बनकर हमारे बीच आने और हमें बचाने की यह घटना इतनी महान और विशेष थी, उसका प्रतिफल सिर्फ़ कुछ चुने हुए लोगों के लिए सीमित नहीं किया जा सकता था। इस महान बलिदान का पुण्यफल सभी राष्ट्रों के लिए था। इसलिए ईश्वर की दिव्य करुणा के द्वार ना केवल कुछ चुने हुए लोगों के लिए बल्कि पूरी मानवजाति के लिए खुल गए। लेकिन आज भी दुनिया में ऐसे स्थान हैं जहाँ लोग अभी भी अंधकार में हैं, वे ईश्वर के असीम प्रेम से अनजान हैं। ईश्वर अपने प्रेम को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए हमें बुलाते हैं। वह सारी मानवजाति पर अपनी करुणा और दया बरसाना चाहते हैं।



📚 REFLECTION



Today is the first Sunday of the year 2021 and mother church celebrates the great feast of epiphany of our Lord. Today is feast of God revealing his glory to the nations. It is the feast of God breaking the boundaries that separate us from God and from each other. He reveals his love and compassion towards humanity in his son Jesus who was promised for long ages. People waited for a saviour who could lead them to God, who could befriend them to God once again, because their relationship with God had broken because of their many sins. God reveals in Jesus that he is true God, a king whose kingdom will have no end. That same God has become man like us, who experiences our pain, our sufferings and our joys and happiness.

When whole humanity had gone astray from God, he did not sit quiet. He wanted to bring them back, he wanted them to be led to the true God. Israel was God’s specially chosen and favoured people. In Old Testament we see God’s main focus was towards these people and God expected these people to make known his power and might to other nations as well. When they were not faithful to him and went astray, he tried to bring them back. He showed them through signs and symbols and extraordinary works that he had not forgotten them, he was with them always. He spoke to them through his prophets and promised them that he would send a saviour who would sacrifice himself in order to reconcile them to God again.

This event of God coming down to us and dying for us was so great, that it’s fruit could not be limited to only few chosen ones. All people should benefit from this great sacrifice. So the gates of divine mercy opened not only to the few chosen ones, but to whole humanity. But still there are many parts of the world where people are in dark, they are not aware of God’s great love towards them. He wants me and you to take his great love to the ends of the world. He is ready to lavish his grace and mercy on whole humanity.


मनन-चिंतन - 03



आज कलीसिया प्रभु प्रकाश का त्योहार मना रही है। यूनानी मूल भाषा में एपीफ़निया (ἐπιφάνεια, epiphaneia) का अर्थ है प्रकटीकरण। बालक येसु दुनिया के सामने प्रकट किये जाते हैं। वे न केवल नाज़रेत के यूसुफ और मरियम के परिवार के लिए आये, बल्कि सारी दुनिया और सारी मानव जाति के लिए। सारी दुनिया के प्रतिनिधि बन कर पूर्व से तीन ज्योतिषी प्रभु की खोज में आते हैं। वे कई लोगों से पूछ-ताछ कर बेथलेहेम पहुँच जाते हैं। वे चरनी में लेटे हुए बालक को उनकी माता मरियम के साथ देखते हैं और उन्हें साष्टांग प्रणाम करते हैं। फिर वे अपना-अपना सन्दूक खोल कर उन्हें सोना, लोबान और गन्धरस चढ़ाते हैं।

ज्योतिषियों ने एक तारा उदित होते देखा था। तारे आसमान में उदित होते हैं। बहुत-से लोगों ने उस तारे को देखा होगा, लेकिन मनुष्यों में समय के चिह्नों पर ध्यान देने तथा उन्हें पहचानने वाले बिरले हैं। पवित्र बाइबिल में प्रभु हमेशा विश्वासियों को सतर्क तथा जागरूक रहने का अनुदेश देते हैं। इन गुणों के सिवा कोई भी प्रभु के आगमन को पहचान नहीं पाता। इसी कारण दूसरे लोगों ने शायद इस तारे पर ध्यान नहीं दिया। संत योहन ख्रिसोस्तोम का कहना है कि यह मानना गलत है कि ज्योतिषियों ने तारे को उदित होते देख कर अपनी यात्रा शुरू की। वास्तव में जब उन्होंने यात्रा शुरू की, तब उन्हें एक तारा दिखायी देने लगा। संत का संदेश यह है कि जब हम ईश्वर की खोज में निकलते हैं, तब हमें ईश्वर स्वयं मार्ग दिखाते हैं। संत ख्रिसोस्तोम यह भी कहते हैं, “तारा कुछ समय के लिए उन्हें दिखायी नहीं देता, उनके पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था और उन्हें यहूदियों से पूछ-ताछ करना पडता है। इस प्रकार प्रभु येसु के जन्म की घोषणा यहूदियों के बीच में होती है।“ (संत मत्ती पर प्रवचन 7)

संत मत्ती यह नही बताते हैं कि कितने ज्योतिषी आये थे। न ही वे यह बताते हैं कि उनके नाम क्या थे। मत्ती यह बताते हैं कि ज्योतिषियों ने आकर बालक येसु को सोना, लोबान और गंधरस की भेंट चढ़ायी। स्पेन की एक परम्परा के अनुसार मेलखियोर, गास्पर तथा बलथासर नाम के तीन राजा अरब देशों, पूर्वी देशों तथा अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधियों के रूप में बालक येसु से मिलने घोडे, ऊँट तथा हाथी पर आये थे। कुछ परम्पराओं के अनुसार तीन ज्ञानी येसु से मिलने आये थे। ज्योतिषी, ज्ञानी, राजा – ये सब हमें यह बताते हैं बेथलेहेम के गोशाला के सामने दुनिया की संस्कृतियों, परम्पराओं, शास्त्रों तथा ताकतों का संगम था।

दानिएल के ग्रन्थ के अध्याय 2 में हम पढ़ते हैं कि राजा नबुकदनेज़र ने स्वप्न देखे। दानिएल ने उस स्वप्न का अर्थ बताते हुए कहा कि दुनिया के राज्य नष्ट हो जायेंगे। फिर, “स्वर्ग का ईश्वर एक ऐसे राज्य की स्थापना करेगा, जो अनंत काल तक नष्ट नहीं होगा और जो दूसरे राष्ट्र के हाथ नहीं जायेगा। वह इन राज्यों को चूर-चूर कर नष्ट कर देगा और सदा बना रहेगा।“ (दानिएल 2:44) मसीह राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है (प्रकाशना 19:16)।

तारा देखने के बाद ज्योतिषियों को कई दिनों तक यात्रा करना पडती है, रास्ते में कई लोगों से पूछ-ताछ करना पडती है। तभी वे बालक येसु का दर्शन कर पाते हैं। वे बालक को साष्टांग प्रणाम करते हैं। दूसरी तरफ़ हम हेरोद को पाते हैं जो न केवल राजाओं के राजा के आधिपत्य को स्वीकार नहीं करता बल्कि उन्हें मरवा डालने की हर संभव कोशिश करता है। इस दुनिया में रहते समय कई चीज़ें, कई घटनाएं तथा कई व्यक्ति हमें ईश्वर का संकेत प्रदान करते हैं। उन संकेतों तथा चिह्नों को पहचानने के लिए हमें सतर्क और जागरूक रहना पडता है। कभी-कभी हमें दूसरों से सलाह-मशवरा लेना पडता है। मेहनत और इंतज़ार ईश्वरीय अनुभव के लिए जरूरी है।

हम भी ज्योतिषियों की तरह सतर्क और जागरूक रहें ताकि हम समय के चिह्नों को पहचान सकें, प्रभु की खोज में निकलने की हिम्मत करें। हम बेथलेहेम के तारे के समान दूसरों के लिए ईश्वरीय अनुभव प्राप्त करने के साधन या माध्यम बन सकें।

बेथलेहेम की ओर जाते समय ज्योतिषी तारा देख कर उसके मार्गदर्शन के अनुसार चल रहे थे। अपनी वापसी में पवित्र वचन कहता है कि “वे दूसरे रास्ते से अपने देश चले गये” (मत्ती 2:12)। येसु से मिलने के बाद हमारा मार्ग ही बदल जाता है, हमारे जीवन में परिवर्तन आता है। पवित्र बाइबिल में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिन में येसु से मुलाकात करने के बाद लोगों का मार्ग बदल जाता है। प्रभु प्रकाश का त्योहार हमें अपने पापमय पुराने मार्गों को बदल कर ईश्वर के इशारे पर चलने का आह्वान करता है। यही कृपा हम परम पिता ईश्वर से माँगे।


- Br. Biniush Topno

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शुक्रवार, 31 दिसंबर, 2021

 

शुक्रवार, 31 दिसंबर, 2021

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पहला पाठ : योहन का पहला पत्र 2:18-21



18) बच्चो! यह अन्तिम समय है। तुम लोगों ने सुना होगा कि एक मसीह-विरोधी का आना अनिवार्य है। अब तक अनेक मसीह-विरोधी प्रकट हुए हैं। इस से हम जानते हैं कि अन्तिम समय आ गया है।

19) वे मसीह-विरोधी हमारा साथ छोड़कर चले गये, किन्तु वे हमारे अपने नहीं थे। यदि वे हमारे अपने होते, तो वे हमारे ही साथ रहते। वे चले गये, जिससे यह स्पष्ट हो जाये कि उन में कोई भी हमारा अपना नहीं था।

20) तुम लोगों को तो मसीह की ओर से पवित्र आत्मा मिला है और तुम सभी लोग सत्य जानते हो।

21) मैं तुम लोगों को इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि तुम सत्य नहीं जानते, बल्कि इसलिए कि तुम सत्य जानते हो और यह भी जानते हो कि हर झूठ सत्य का विरोधी है।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 1:1-18


1) आदि में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था और शब्द ईश्वर था।

2) वह आदि में ईश्वर के साथ था।

3) उसके द्वारा सब कुछ उत्पन्न हुआ। और उसके बिना कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ।

4) उस में जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था।

5) वह ज्योति अन्धकार में चमकती रहती है- अन्धकार ने उसे नहीं बुझाया।

6) ईश्वर को भेजा हुआ योहन नामक मनुष्य प्रकट हुआ।

7) वह साक्षी के रूप में आया, जिससे वह ज्योति के विषय में साक्ष्य दे और सब लोग उसके द्वारा विश्वास करें।

8) वह स्वयं ज्यांति नहीं था; उसे ज्योति के विषय में साक्ष्य देना था।

9) शब्द वह सच्च ज्योति था, जो प्रत्येक मनुष्य का अन्धकार दूर करती है। वह संसार में आ रहा था।

10) वह संसार में था, संसार उसके द्वारा उत्पन्न हुआ; किन्तु संसार ने उसे नहीं पहचाना।

11) वह अपने यहाँ आया और उसके अपने लोगों ने उसे नहीं अपनाया।

12) जितनों ने उसे अपनाया, और जो उसके नाम में विश्वास करते हैं, उन सब को उसने ईश्वर की सन्तति बनने का अधिकार दिया।

13) वे न तो रक्त से, न शरीर की वासना से, और न मनुष्य की इच्छा से, बल्कि ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

14) शब्द ने शरीर धारण कर हमारे बीच निवास किया। हमने उसकी महिमा देखी। वह पिता के एकलौते की महिमा-जैसी है- अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण।

15) योहन ने पुकार-पुकार कर उनके विषय में यह साक्ष्य दिया, ‘‘यह वहीं हैं, जिनके विषय में मैंने कहा- जो मेरे बाद आने वाले हैं, वह मुझ से बढ़ कर हैं; क्योंकि वह मुझ से पहले विद्यमान थे।’’

16) उनकी परिपूर्णता से हम सब को अनुग्रह पर अनुग्रह मिला है।

17) संहिता तो मूसा द्वारा दी गयी है, किन्तु अनुग्रह और सत्य ईसा मसीह द्वारा मिला है।

18) किसी ने कभी ईश्वर को नहीं देखा; पिता की गोद में रहने वाले एकलौते, ईश्वर, ने उसे प्रकट किया है।


📚 मनन-चिंतन


आज वर्ष 2021 का अंतिम दिन है। माता कलीसिया आज शब्द पर मनन-चिंतन करने के लिए आमंत्रित करती है। प्रारंभ में ईश्वर ने संसार कि सृष्टी अपने शब्द मात्र से की थी। आज वही शब्द मानव बनकर संसार मे प्रवेश करता है। वह देहधारण कर लेता है। यह शब्द पृथ्वी पर मनुष्य बनकर जीवन में प्रकाश और सत्य के रूप में लोगों के बीच रहने लगा। वह स्वयं जीवन है और दूसरों को अनंत जीवन प्रदान करने आया। "मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ ? (योहन 14:6)

ईश्वर ने शब्द को हमारे बीच इसलीए भेजा क्योंकि वह हमसे प्यार करता है। "ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उसमे विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे " (योहन 3:16)

आज वर्ष का अंतिम दिन है। अपने अन्तकरण की जाँच करें और स्वंय से पुछे, ईश्वर ने अपने पुत्र को हमारे लिए भेजा। उसे हम अपने जीवन में कितना महत्व देते है।



📚 REFLECTION




Today is the last day of the year 2021. Today the mother church invites us to meditate on word. In the beginning of the world, God created the whole universe with a word. Today the same Word has become flesh and entered the world. Word takes the form of flesh. After coming to the world and becoming a human this word has lived in form of life. It is life in itself and it provides the eternal life to others.

“I am the way, truth and life” (John 14:6)

God has sent the word among us so that He could love us continuously.

“For God so loved the world that he gave his one and only Son, that whoever believes in him shall not perish but have eternal life.” (John 3:16)

Today is the last day of the year. Let us examine our conscience and ask ourselves that, God sent his only begotten son and how much importance we give to this gift.


मनन-चिंतन - 2


आज सुसमाचार लेखक संत योहन हमें ईश्वर के पुत्र के अवतार के रहस्य में गहराई से उतरने के लिए आमंत्रित करते हैं। येसु के जन्म को बेतलेहेम के गोशाले में पेश करने के बजाय, वे उनके पूर्व-अस्तित्व और शाश्वत जन्म के बारे में हमें बताते है। वे उन्हें 'लोगोस' - शब्द के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह शाश्वत शब्द येसु मसीह में मांस बन जाता है। उन्हें एक प्राणी के रूप में प्रस्तुत करने से हट कर, वे उन्हें उस सृष्टिकर्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिनमें सब कुछ बनाया गया था। येसु को प्रकाश के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है जो अंधेरे को दूर करता है। सुसमाचार के लेखक प्रकाश और अंधेरे के बीच निरंतर लड़ाई को भी हमारे सामने रखते हैं और दावा करते हैं कि अंतिम जीत प्रकाश की ही होती है। आज हमें बालक येसु की चरनी के आगे घुटने टेकने और ईश्वर के रहस्य पर ध्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता है जो स्वर्ग से पृथ्वी पर आकर हम में से हर एक के साथ रहे। येसु को स्वीकार करने वाले सभी लोगों को परमेश्वर की संतान बनने की शक्ति प्रदान की जाती है।



REFLECTION


Today St. John the evangelist invites us to delve deep into the mystery of the Incarnation of the Son of God. Instead of presenting the birth of Jesus in the manger of Bethlehem, he speaks about his pre-existence and eternal birth. He presents him as ‘logos’ – the Word. This eternal Word becomes flesh in Jesus Christ. Far from presenting him as a creature, he presents him as the creator in whom everything was created. Jesus is also presented as the light that dispels the darkness. The evangelist also acknowledges the constant battle between the light and the darkness but asserts that the ultimate victory is of the light. Today we are invited to kneel before the crib and meditate upon the mystery of God who has come down from heaven to the earth to be with each one of us. All those who accept Jesus are given the power to become the children of God.


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!