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Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

शनिवार, 04 दिसंबर, 2021

 

शनिवार, 04 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 30:19-21,23-26


19) येरूसालेम में रहने वाली सियोन की प्रजा! अब से तुम लोगों को रोना नहीं पड़ेगा। प्रभु तुम पर अवश्य दया करेगा, वह तुम्हारी दुहाई सुनते ही तुम्हारी सहायता करेगा।

20) प्रभु ने तुम्हें विपत्ति की रोटी खिलायी और दुःख का जल पिलाया है; किन्तु अब तुम्हें शिक्षा प्रदान करने वाला प्रभु अदृश्य नहीं रहेगा- तुम अपनी आँखों से उसके दर्शन करोगे।

21) यदि तुम सन्मार्ग से दायें या बायें भटक जाओगे, तो तुम पीछे से यह वाणी अपने कानों से सुनोगे-“सच्चा मार्ग यह है; इसी पर चलते रहो“।

22) तुम चाँदी से मढ़ी हुई अपने द्वारा गढ़ी गयी प्रतिमाओं को और सोने से मढ़ी हुई अपनी देवमूर्तियों को अपवित्र मानोगे। तुम उन्हें दूशित समझ कर फेंक दोगे और कहोगे “उन्हें यहाँ से निकाल दो“।

23) प्रभु तुम्हारे बोये हुये बीजों को वर्षा प्रदान करेगा और तुम अपने खेतों की भरपूर उपज से पुष्टिदायक रोटी खाओगे। उस दिन तुम्हारे चैपाये विशाल चारागाहों में चरेंगे।

24) खेत में काम करने वाले बैल और गधे, सूप और डलिया से फटकी हुई, नमक मिली हुई भूसी खयेंगे।

25) महावध के दिन, जब गढ़ तोड़ दिये जायेंगे, तो हर एक उत्तंुग पर्वत और हर एक ऊँची पहाड़ी से उमड़ती हुई जलधाराएँ फूट निकलेंगी।

26) जिस दिन प्रभु अपनी प्रजा के टूटे हुए अंगों पर पट्टी बाँधेगा और उसकी चोटों के घावों को चंगा करेगा, उस दिन चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य की तरह होगा और सूर्य का प्रकाश- सात दिनों के सम्मिलित प्रकाश के सदृश-सतगुना प्रचण्ड हो उठेगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 9:35-10:1,5a,6-8



35) ईसा सभागृहों में शिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते, हर तरह की बीमारी और दुबर्लता दूर करते हुए, सब नगरों और गाँवों में घूमते थे।

36) लोगों को देखकर ईसा को उन पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थके माँदे पड़े हुए थे।

37) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, "फसल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं।

38) इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।"

10:1) ईसा ने अपने बारह शिष्यों को अपने पास बुला कर उन्हें अशुद्ध आत्माओं को निकालने तथा हर तरह की बीमारी और दुर्बलता दूर करने का अधिकार प्रदान किया।

5) ईसा ने इन बारहों को यह अनुदेश दे कर भेजा, "अन्य राष्ट्रों के यहाँ मत जाओ और समारियों के नगरों में प्रवेश मत करो,

6) बल्कि इस्राएल के घराने की खोयी हुई भेड़ों के यहाँ जाओ।

7) राह चलते यह उपदेश दिया करो- स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8) रोगियों को चंगा करो, मुरदों को जिलाओ, कोढि़यों को शुद्ध करो, नरकदूतों को निकालो। तुम्हें मुफ़्त में मिला है, मुफ़्त में दे दो।



📚 मनन-चिंतन



पिता ईश्वर इस संसार का सृष्ष्टिकृता है। वह हमे जल, थल, सूर्य की रोशनी, साँस लेने के लिए शुद्ध वायु, भोजन, प्रदान करता है । साथ ही साथ उन्होंने हमे बहुमुल्य जीवन प्रदान किया । आज के सुसमाचार मे येसु हमे बताना चाहते हैं कि तुम्हे मुफ्त में मिला है, मुफ्त में दे दो (मत्ती १०:8)

येसु ने स्वयं बीमारी को चंगा किया ,अंधो को आँखे दी, अपदूतों को निकाला, भूखों को आध्यत्मक एवं शारिरिक भोजन दिया प्रदान किया, मृतको को जीवनदान दिया। जिस प्रकार ईश्वर ने हमारे जीवन में बहुत कुछ प्रदान किया है। वैसे ही हमें भी ईश्वर के प्रेम, शांति, तथा उनके वचनों को दूसरों में बाँटना है एवम जरूरत के समय एक दूसरे का साथ देना है।

पिता ईश्वर ने येसु को जो मिशन कार्य सौंपा था। येसु ने उसे आगे बढ़ाने के लिए बारह शिष्यों को चुना और अधिकार एव्म शक्ति प्रदान की। शिष्यों ने उस संदेश को लोगों के बीच बाँटा। हम भी ख्रीस्तीय होने के नाते ईश्वरीय वचन को आपस में बाँटे । अपने वचन और कर्म से ईश्वर का साथ दूसरों को दे |




📚 REFLECTION




God the father is the creator of this universe. He has given to us the water, land, sun, light, fresh air to breathe, food etc. and in other hand he has also given to us the precious life to live.

In today's gospel Jesus wants to tell us that, “you received without payment; give without payment” (Mt 10:8) .

Jesus himself healed the sick, gave vision to the blind, cast it out the devil, nourished the hungry with both spiritual and physical food, and raised the dead. As Jesus has given us so much so shall we too Share the love, peace, the word of God to the people. Along with this we should always help the people who are in need.

As God the father gave a mission to Jesus Christ, in order to persuade that mission Jesus chose the twelve disciples and gave them the authority and the power. The disciples spread the message of Jesus to the people willingly. In the same way we as Christians should also spread the word of Lord both by our words and deeds.




मनन-चिंतन - 2



अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में येसु ने इसायाह 61 की भविष्यवाणियों का हवाला देते हुए नाज़रेथ के सभागृह में अपनी कार्य-योजना की घोषणा की। फिर वे उस घोषणापत्र को साकार करने के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। वे ईश्वर के राज्य की खुशखबरी सुनाते हुए “सभी नगरों और गाँवों” में घूम रहे थे और “हर तरह की बीमारी और दुर्बलता” दूर कर रहे थे। उन्होंने किसी को अपने सेवाकार्य की सीमा के बाहर नहीं छोड़ा। उन्होंने लोगों की हर समस्या का समाधान किया। वे ईश्वर की प्रजा की 'संपूर्णता' में रुचि रखते थे। वे न केवल सभी को स्वर्गराज्य का संदेश सुनाना चाहते थे, बल्कि वे यह भी चाहते थे कि लोग स्वर्गराज्य के आगमन को अपने दैनिक जीवन में अनुभव करें। वे अपनी टीम में अधिक से अधिक सहकर्मियों को शामिल करना चाहते थे क्योंकि यह कार्य बहुत बड़ा था। उनके सहकर्मियों के चयन के लिए उनके पास केवल एक मानदंड था - उन्हें स्वर्गीय पिता द्वारा बुलाए जाने और भेजे जाने की आवश्यकता थी। इसलिए वे अपने शिष्यों को फसल के स्वामी से प्रार्थना करने को कहते हैं ताकि वे अपनी फसल काटने के लिए मजदूरों को भेजें। यह आज भी एक वास्तविकता है। एक बढ़िया फ़सल के कटने का इंतज़ार है। इस मिशन पर बुलाए जाने और भेजे जाने के लिए कई लोगों की आवश्यकता है, जिन्हें अपनी बुलाहट स्वीकार करने और उसकी पूर्ति के लिए कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है।




REFLECTION


At the beginning of his public ministry Jesus proclaimed his manifesto in the synagogue of Nazareth citing the prophecies in Isaiah 61. Then he was on his way to actualise that manifesto. He was going through “all the towns and villages” proclaiming the good news of the Kingdom of God and curing “all kinds of disease and all kinds of illness”. He did not leave anyone out. He addressed every problem of the people. He was interested in the ‘wholeness’ of the people of God. He not only wanted everyone to hear the message of the Kingdom, but he also wanted them experience the Kingdom in their own day to day lives. He wanted to induct into his team as many co-workers as possible because the task was huge. He had only one criterion for the selection of his co-workers – they needed to be called and sent out by the Heavenly Father. So he asks his disciples to pray to the Lord of the harvest to send out labourers into his harvest. This is a reality even today. A great crop is waiting to be harvested. We need many to be called and sent on this mission. Those called need to accept the call and work hard for its fulfilment.


 -Br. Biniush topno


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संत फ्रांसिस ज़ेवियर दिसंबर 03

 



संत फ्रांसिस ज़ेवियर

दिसंबर 03

फ्रांसिस ज़ेवियर का जन्म 7 अप्रैल 1506 को नवारे देश में हुआ। उनके बचपन में चारों तरफ़ युध्दों का माहौल था। जब युद्ध बंद हो गया तो उन्हें पेरिस विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए भेजा गया। वे अपने दोस्त पीटर फेवर के साथ कमरे में रहते थे। यह जोड़ी लोयोला के इग्नाटियस से बहुत प्रभावित हुई, जिसने फ्रांसिस को एक पुरोहित बनने के लिए प्रोत्साहित किया। 1530 में, फ्रांसिस ज़ेवियर ने अपनी मास्टर डिग्री हासिल की, और वे पेरिस विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाने लगे।

24 जून, 1537 को उनका पुरोहिताभिषेक हुआ। पोप पॉल III ने 1540 में येसु समाज धर्मसंघ की स्थापना के लिए मंजूरी दी। फ्रांसिस ज़ेवियर अपने पैंतीसवें जन्मदिन पर 1541 में भारत के लिए रवाना हुए। वे 6 मई, 1542 को गोवा पहुंचे। उन्होंने वहाँ सुसमाचार का प्रचार किया, गरीबों तथा जरूरतमंदों की सेवा की। वहाँ से वे जापान और चीन की भी यात्रा की।

3 दिसंबर 1552 को फ़्रांसिस ज़ेवियर की मृत्यु हुयी। 25 अक्टूबर, 1619 को संत पापा पौलुस तृतीय ने उन्हें धन्य घोषित किया। संत पापा ग्रेगोरी पन्द्रहवें ने द्वारा 12 मार्च, 1622 को लोयोला के इग्नाटियस के साथ फ्रांसिस ज़ेवियर को भी संत घोषित किया। वे काथलिक मिशनों के संरक्षक हैं और उनका पर्व 3 दिसंबर को है।


✍️-Br. Biniush topno



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शुक्रवार, 03 दिसंबर, 2021

 

शुक्रवार, 03 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

सन्त फ़्रासिस जेवियर

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 1:4-8


4) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई पड़ी-

5) “माता के गर्भ में तुम को रचने से पहले ही, मैंने तुम को जान लिया। तुम्हारे जन्म से पहले ही, मैंने तुम को पवत्रि किया। मैंने तुम को राष्ट्रों का नबी नियुक्त किया।“

6) मैंने कहा, “आह, प्रभु-ईश्वर! मुझे बोलना नहीं आता। मैं तो बच्चा हूँ।“

7) परन्तु प्रभु ने उत्तर दिया, “यह न कहो- मैं तो बच्चा हूँ। मैं जिन लोगों के पास तुम्हें भेजूँगा, तुम उनके पास जाओगे और जो कुछ तुम्हें बताऊगा, तुम वही कहोगे।

8) उन लोगों से मत डरो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। यह प्रभु वाणी है।“



दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 4:7-15



7) यह अमूल्य निधि हम में-मिट्टी के पात्रों में रखी रहती है, जिससे यह स्पष्ट हो जाये कि यह अलौकिक सामर्थ्य हमारा अपना नहीं, बल्कि ईश्वर का है।

8) हम कष्टों से घिरे रहते हैं, परन्तु कभी हार नहीं मानते, हम परेशान होते हैं, परन्तु कभी निराश नहीं होते।

9) हम पर अत्याचार किया जाता है, परन्तु हम अपने को परित्यक्त नहीं पाते। हम को पछाड़ दिया जाता है, परन्तु हम नष्ट नहीं होते।

10) हम हर समय अपने शरीर में ईसा के दुःखभोग तथा मृत्यु का अनुभव करते हैं, जिससे ईसा का जीवन भी हमारे शरीर में प्रत्यक्ष हो जाये।

11) हमें जीवित रहते हुए ईसा के कारण निरन्तर मृत्यु का सामना करना पड़ता है, जिससे ईसा का जीवन भी हमारे नश्वर शरीर में प्रत्यक्ष हो जाये।

12) इस प्रकार हम में मृत्यु क्रियाशील है और आप लोगों में जीवन।

13) धर्मग्रन्थ कहता है- मैंने विश्वास किया और इसलिए मैं बोला। हम विश्वास के उसी मनोभाव से प्रेरित हैं। हम विश्वास करते हैं और इसलिए हम बोलते हैं।

14) हम जानते हैं कि जिसने प्रभु ईसा को पुनर्जीवित किया, वही ईसा के साथ हम को भी पुनर्जीवित कर देगा और आप लागों के साथ हम को भी अपने पास रख लेगा।

15) सब कुछ आप लोगों के लिए हो रहा है, ताकि जिस प्रकार बहुतों में कृपा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार ईश्वर की महिमा के लिए धन्यवाद की प्रार्थना करने वालों की संख्या बढ़ती जाये।



सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 10:1-16



1) इसके बाद प्रभु ने अन्य बहत्तर शिष्य नियुक्त किये और जिस-जिस नगर और गाँव में वे स्वयं जाने वाले थे, वहाँ दो-दो करके उन्हें अपने आगे भेजा।

2) उन्होंने उन से कहा, ’’फ़सल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं; इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।

3) जाओ, मैं तुम्हें भेडि़यों के बीच भेड़ों की तरह भेजता हूँ।

4) तुम न थैली, न झोली और न जूते ले जाओ और रास्तें में किसी को नमस्कार मत करो।

5) जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ’इस घर को शान्ति!’

6) यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।

7) उसी घर में ठहरे रहो और उनके पास जो हो, वही खाओ-पियो; क्योंकि मज़दूर को मज़दूरी का अधिकार है। घर पर घर बदलते न रहो।

8) जिस नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो जो कुछ तुम्हें परोसा जाये, वही खा लो।

9) वहाँ के रोगियों को चंगा करो और उन से कहो, ’ईश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ गया है’।

10) परन्तु यदि किसी नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत नहीं करते, तो वहाँ के बाज़ारों में जा कर कहो,

11 ’अपने पैरों में लगी तुम्हारे नगर की धूल तक हम तुम्हारे सामने झाड़ देते हैं। तब भी यह जान लो कि ईश्वर का राज्य आ गया है।’

12) मैं तुम से यह कहता हूँ- न्याय के दिन उस नगर की दशा की अपेक्षा सोदोम की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।

13) ’’धिक्कार तुझे, खोराजि़न! धिक्कार तुझे, बेथसाइदा! जो चमत्कार तुम में किये गये हैं, यदि वे तीरुस और सीदोन में किये गये होते, तो उन्होंने न जाने कब से टाट ओढ़ कर और भस्म रमा कर पश्चात्ताप किया होता।

14) इसलिए न्याय के दिन तुम्हारी दशा की अपेक्षा तीरुस और सिदोन की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।

15) और तू, कफ़रनाहूम! क्या तू स्वर्ग तक ऊँचा उठाया जायेगा? नहीं, तू अधोलोक तक नीचे गिरा दिया जायेगा?

16) ’’जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है और जो तुम्हारा तिरस्कार करता है, वह मेरा तिरस्कार करता है। जो मेरा तिरस्कार करता है, वह उसका तिरस्कार करता है, जिसने मुझे भेजा है।’’


📚 मनन-चिंतन


आजा माता कलीसिया संत फ़्रान्सिस जेवियर का पर्व मनाती है। सन्त फ्रांसिस जेवियर प्रभु येसु ख्रीस्त के प्रेम और मुकट का संदेश सुनाने भारत आये। वह ईश्वर की महिमा के लिए दिन रात प्रार्थना करते रहे। उन्होंने अपना सबकुछ त्याग कर ईश्वर के राज्य के लिए अपने को समर्पित कर दिया।

मनुष्य को इससे क्या लाभ यदि वह सारा संसार तो प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन ही गंवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता? (मारकुस 8:36-37)

सुसमाचार में भी येसु अपने बहतर शिष्यों को नियुक्त कर ईश्वर के राज्य कि घोषणा करने के लिए लोगों के बीच भेजते हैं। येसु शिष्यों को अकेले नहीं बल्कि दो-दो कर उन्हें भेजते हैं। जिससे वह एक दुसरे का सहयोग करते हुए, येसु की उपस्थिती को अपने बीच में महसूस करे। "क्योंकि जहां दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वंहा मै उनके बीच उपस्थित रहता हूँ" (मती 18:20) येसु आज हमसे आह्वान करते हैं कि हम ईश्वर के राज्य के लिए एक दूसरे के साथ मिल कर आपस में सहयोग करे। ताकि सभी लोग ईश्वर के बारे में जान सके और उनपर विश्वास करे ।



📚 REFLECTION



Today, the mother church celebrates the feast of Saint Xavier. Saint Francis Xavier came to India to proclaim the message of love and salvation of Jesus Christ. He used to pray to God for the glory of God. He gave up everything whatever he had and surrendered his life to the will of God.

Mark 8:36–37 “For what will it profit them to gain the whole world and forfeit their life? Indeed, what can they give in return for their life?’’

In today's gospel we hear that Lord Jesus sends his twelve disciples to proclaim the good news. Jesus did not send his disciples alone instead he sent them two by two so that by helping each other they may not feel the absence of Jesus among them.

Matthew (18:20) “For where two or three are gathered in my name, there I am there among them.”

Today, Jesus invites us to come together and help each other to enter the Kingdom of heaven so that each and everyone will know about God and believe in God.


 -Br. Biniush topno


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गुरुवार, 02 दिसंबर, 2021

 

गुरुवार, 02 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 26:1-6



1) उस दिन यूदा देश में यह गीत गाया जायेगाः हमारा नगर सुदृढ़ है। प्रभु ने हमारी रक्षा के लिए प्राचीर और चारदीवारी बनायी है।

2 फाटकों को खोल दो- सद्धर्धी और विश्वासी राष्ट्र प्रवेश करें।

3) तू दृढ़तापूर्वक शान्ति बनाये रखता हैं, क्योंकि इस राष्ट्र को तुझ पर भरोसा है।

4) प्रभु पर सदा भरोसा रखो, क्योंकि वही चिरस्थायी चट्टान है।

5) वह ऊँचाई पर निवास करने वालों को नीचा दिखाता है। वह उनका दुर्गम गढ़ तोड़ कर गिराता और धूल में मिला देता है।

6) अब दीन-हीन और दरिद्र उसे पैरों तले रौंदेंगे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 7:21.24-27



21) ’’जो लोग मुझे ’प्रभु ! प्रभु ! कह कर पुकारते हैं, उन में सब-के-सब स्वर्ग-राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, वही स्वर्गराज्य में प्रवेश करेगा।

24) ’’जो मेरी ये बातें सुनता और उन पर चलता है, वह उस समझदार मनुष्य के सदृश है, जिसने चट्टान पर अपना घर बनवाया था।

25) पानी बरसा, नदियों में बाढ आयी, आँधियाँ चलीं और उस घर से टकरायीं। तब भी वह घर नहीं ढहा; क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर डाली गयी थी।

26) ’’जो मेरी ये बातें सुनता है, किन्तु उन पर नहीं चलता, वह उस मूर्ख के सदृश है, जिसने बालू पर अपना घर बनवाया।

27) पानी बरसा, नदियों में बाढ आयी, आँधियाँ चलीं और उस घर से टकरायीं। वह घर ढह गया और उसका सर्वनाश हो गया।’’.


📚 मनन-चिंतन.



आज का सुसमाचार हमे बताता है, कि सिर्फ हे प्रभु! हे प्रभु! कहने भर से हम सवर्गराज्य में प्रवेश नहीं कर सकते। बल्कि प्रभु के वचनों के अनुसार जीवन व्यतीत करने से ही हम सवर्णराज्य के भागी बन सकते है। संत याकूब (1:18) मे कहते हैं। वचन के श्रोता ही नहीं बल्कि उसके पालनकर्त्ता भी बने ।

हमारा जीवन भी एक घर के समान है। हमारा जीवन अगर प्रभु के वचनों के अनुसार संचालित है, तो वह घर चटटान पर बना हुआ है। अगर नहीं तो हमारा जीवन बालू पर बने घर के समान है। जो प्रभु के वचन के अभाव में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाता है। 'प्रभु पर सदा भरोसा रखो, क्योंकि वही चिरस्थायी चटटान है। (इसा-26:4)

प्रभु हमारा चिरस्थायी चट्टान है। हमे उस चयन पर अपनी जीवन की नींव रखती है। आइये हम सदैव प्रभु से जुड़े रहे। जिससे वह भी हमेशा चटटान के समान मजबुती से हमसे जुड़े रहे।




📚 REFLECTION




Today's gospel tells us, that only by acclaiming oh Lord, oh Lord will not help us to enter the Kingdom of heaven but by living the word of the Lord literally and meaningfully will surely help us to enter the Kingdom of heaven.

In James 1:22–25 we read: “But be doers of the word, and not merely hearers only”.

Our life too, is similar to like a house. If our lives are guided by the word of the Lord then it is similar to the house which is established on the foundation of a strong rock. If not, then the house is similar to like a house whose foundation is laid on sand which will not be able to sustain is stability for more days.

Isaiah 26:4 Trust in the LORD forever, for the LORD, the LORD himself, is the Rock eternal.

Lord is our never moving Rock. What we need to do is to surrender our lives on this strong Rock. Come, let us always be together with the Lord so that we too remain as strong as Rock in our faith.




मनन-चिंतन - 2



प्रभु येसु एक बुध्दिमान व्यक्ति और एक बेवकूफ व्यक्ति की बात करते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति अपना घर चट्टान पर बनाता है और बेवकूफ व्यक्ति रेत पर अपना घर बनाता है। प्रभु एक उदार व्यक्ति और एक कंजूस की चर्चा नहीं करते; न ही एक सावधान आदमी और एक लापरवाह आदमी की बात। उनका विषयवस्तु ज्ञान है। चट्टान पर निर्माण करने वाले के पास ज्ञान होता है जबकि रेत पर निर्माण करने वाले के पास इसका अभाव होता है। समझदार व्यक्ति ईश्वर का वचन सुनता है और उस पर कार्य करता है। कुछ भी उसे विचलित, परेशान या नष्ट नहीं कर सकता। उसकी नींव पक्की है। ईश्वर का वचन सर्वज्ञ ईश्वर का ज्ञान है। जो वास्तव में, ईश्वरीय शब्द को प्राप्त करता है, वह ईश्वर का ज्ञान ही प्राप्त करता है। वह ईश्वर के ज्ञान को अपना कर्म बनाता है। स्वाभाविक रूप से वह असफल नहीं हो सकता। आइए हम ईश्वर से इस ज्ञान की कृपा मांगें।



REFLECTION



Jesus distinguishes between a wise man who builds his house on rock and a stupid man who builds his house on sand. Jesus does not distinguish between a spendthrift and a miser; nor between a careful man and a careless man. What is in question is the wisdom of the person. The person who builds on the rock has wisdom while the person who builds on sand lacks it. The sensible man listens to the Word of God and acts on it. Nothing can shake, disturb or destroy him. He has an unshakeable foundation. The Word of God is the wisdom of the omniscient God. One who receives the Word, in fact, receives the wisdom of God. He makes the wisdom of God his own in action. Naturally he cannot fail. Let us ask the Lord for the grace of this wisdom.


 -Br. Biniush topno


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बुधवार, 01 दिसंबर, 2021

 

बुधवार, 01 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 25:6-10a


6) विश्वमण्डल का प्रभु इस प्रर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी।

7) वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा,

8) श्वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है।

9) उस दिन लोग कहेंगे - “देखो! यही हमारा ईश्वर है। इसका भरोसा था। यह हमारा उद्धार करता है। यही प्रभु है, इसी पर भरोसा था। हम उल्लसित हो कर आनन्द मनायें, क्योंकि यह हमें मुक्ति प्रदान करता है।“

10) इस पर्वत पर प्रभु का हाथ बना रहेगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 15:29-37



29) ईसा वहाँ से चले गये और गलीलिया के समुद्र के तट पर पहुँच कर एक पहाड़ी पर चढे़ और वहाँ बैठ गये।

30) भीड़-की-भीड़ उनके पास आने लगी। वे लँगडे़, लूले, अन्धे, गूँगे और बहुत से दूसरे रोगियों को भी अपने पास ला कर ईसा के चरणों में रख देते और ईसा उन्हें चंगा करते थे।

31) गूँगे बोलते हैं, लूले भले-चंगे हो रहे हैं, लँगड़े चलते और अन्धे देखते हैं- लोग यह देखकर बड़े अचम्भे में पड़ गये और उन्होंने इस्राएल के ईश्वर की स्तुति की।

32) ईसा ने अपने शिष्यों को अपने पास बुला कर कहा, ’’मुझे इन लोगों पर तरस आता है। ये तीन दिनों से मेरे साथ रह रहें हैं और इनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है मैं इन्हें भूखा ही विदा करना नहीं चाहता। कहीं ऐसा न हो कि ये रास्ते में मूच्र्छित हो जायें।''

33) शिष्यों ने उन से कहा, ’’इस निर्जन स्थान में हमें इतनी रोटियाँ कहाँ से मिलेंगी कि इतनी बड़ी भीड़ को खिला सकें?’’

34) ईसा ने उन से पूछा, ’’तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं? उन्होंने कहा, ’’सात और थोड़ी-सी छोटी मछलियाँ’’।

35) ईसा ने लोगों को भूमि पर बैठ जाने का आदेश दिया

36) और वे सात रोटियाँ और मछलियाँ ले कर उन्होंने धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी, और वे रोटियाँ तोड़-तोड़ कर शिष्यों को देते गये और शिष्य लोगों को।

37) सबों ने खाया और खा कर तृप्त हो गये और बचे हुए टुकड़ों से सात टोकरे भर गये।


📚 मनन-चिंतन



जब हम ईश्वर के प्रति ईमानदार रहेंगे, प्रभु येस कभी भी हमे अकेला नहीं छोड़ेंगे।

आज के सुसमाचार में एक विशाल जनसमूह आशा एवं विश्वास के साथ येसु के वचने को सुनने आते हैं। येसु उनके विश्वास को देखकर उनपर अपनी दया व करुणा प्रकट करते हैं। उन्हें सभी प्रकार के रोगों से चंगाई प्रदान करते हैं। हमे भी अपने सुख, दुख, चिंताओ को लेकर येसु के पास आना चाहिये। थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगों! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हे विश्राम दूँगा | (मत्ती ११: २१)

यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हमें भी विश्वास के साथ येसु के पास आना है। प्रतिदिन कुछ क्षण प्रभु के साथ व्यतीत करना है। प्रतिदिन उनके वचनों को सुनना है, पढना है। ईमानदारी से प्रभु का साथ देना है। तब प्रभु हम पर भी अपनी दया व करुणा बरसायेगा । प्रभु कभी भी हमे अकेला नहीं छोड़ेगे। "तुम प्रभु पर अपना भार छोड़ दो, वह तुम को संभालेगा (स्त्रोत 55:२३)

हम एक विशवासी के रूप में जो भी हमारी जिम्मेदारी है। उसे ईमानदारी से निभायें और बाकी ईश्वर पर छोड़ दे। वह हमे कभी निराश नहीं करेगा |




📚 REFLECTION




If we are sincere towards God, Lord Jesus will never abandon us.

In today's gospel we see that a huge crowd of people comes to Jesus with a lot of hope and faith to hear Jesus words. Looking to the faith of these people Jesus expresses his mercy and compassion and heals the people who were suffering with sickness.

In the same way we should also bring all our joy, sorrow, stress and tension to Jesus.

“Come to me, all you who are weary and burdened, and I will give you rest. Take my yoke upon you and learn from me, for I am gentle and humble in heart, and you will find rest for your souls.” (Mt 11:28)

The most important thing is that, we should always come with faith to Jesus by spending some time with Jesus, by reading scriptures, by being sincere companion to Jesus. Then surely, Jesus will shower his mercy and compassion to us and he will never ever abandon us.

“But you, O God, will cast them down into the pit of destruction; men of blood and treachery shall not live out half their days. But I will trust in you.’’ (Psalm 55:23) v

We should always fulfill the responsibility that we are carrying as a faithfully and surrender the rest of the things in the hand of God who will never disappoint us.



मनन-चिंतन - 2



आज के सुसमाचार में हम रोटियों का दूसरा चमत्कार देखते हैं। येसु सात रोटियों और कुछ छोटी मछलियों से चार हज़ार से ज़्यादा लोगों को खिला कर तृप्त करते हैं। यह मुख्य रूप से करुणा का कार्य था। येसु भीड़ के लिए अनुकम्पा महसूस कर रहे थे। एज़ेकिएल 34 में प्रभु ने इस्राएल के चरवाहों के गैर-जिम्मेदार व्यवहार के बारे में चिन्तित थे। उन्होंने कहा, “धिक्कार इस्राएल के चरवाहों को! वे केवल अपनी देखभाल करते हैं। क्या चरवाहों को झुण्ड की देखवाल नहीं करनी चाहिए। तुम भेड़ों का दूध पीते हो, उनका ऊन पहनते और मोटे पशुओं का वध करते हो, किन्तु तुम भेड़ों को नहीं चराते।”(एज़ेकिएल 34: 2-3)। बाद में उनके लिए स्वयं चरवाहा बनने का वादा करते हुए, उन्होंने कहा, “मैं उन्हें इस्राएल के पहाड़ों पर, घाटियों में और देश भर के बसे हुए स्थानों पर चाराऊँगा। मैं उन्हें अच्छे चरागाहों में ले चलूँगा। वे इस्राएल के पर्वतों पर चरेंगी। वहाँ वे अच्छे चरागाहों में विश्राम करेंगी और इस्राएल के पर्वतों की हरी-भरी भूमि में चरेगी।” (एज़ेकिएल 34:13-14)। प्रभु येसु प्रभु ईश्वर का का वादा पूरा हुआ। प्यार और करुणा के साथ यीशु ने लोगों को खिलाया जो बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे। सभी ख्रीस्तीय नेताओं को प्रभु येसु के इस आदर्श को अपनाना चाहिए और उनकी प्रेममयी और दयालु सेवा का अनुकरण करना चाहिए।



REFLECTION



In the Gospel we have second story of the multiplication of the bread. Jesus multiplies seven loaves and some small fish to feed over four thousand people. This was primarily an act of compassion. Jesus was feeling sorry for the crowd. In Ezekiel 34 Yahweh lamented about the irresponsible behavior of the shepherds of Israel. He said, “Ah, you shepherds of Israel who have been feeding yourselves! Should not shepherds feed the sheep? You eat the fat, you clothe yourselves with the wool, you slaughter the fatlings; but you do not feed the sheep.” (Ezek 34:2-3). Later promising to become their Shepherd, he says, “I will feed them with good pasture, and the mountain heights of Israel shall be their pasture; there they shall lie down in good grazing land, and they shall feed on rich pasture on the mountains of Israel” (Ezek 34:14). In Jesus the promise of Yahweh is fulfilled. With love and compassion Jesus fed people who were like sheep without a shepherd. All Christian leaders are to imitate Jesus and follow his loving and compassionate service.


 -Br. Biniush topno


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मंगलवार, 30 नवंबर, 2021

 

मंगलवार, 30 नवंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

प्रेरित सन्त अन्द्रेयस - पर्व

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पहला पाठ: रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 10:9-18


9) क्योंकि यदि आप लोग मुख से स्वीकार करते हैं कि ईसा प्रभु हैं और हृदय से विश्वास करते हैं कि ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया, तो आप को मुक्ति प्राप्त होगी।

10) हृदय से विश्वास करने पर मनुष्य धर्मी बनता है और मुख से स्वीकार करने पर उसे मुक्ति प्राप्त होती है।

11) धर्मग्रन्थ कहता है, ‘‘जो उस पर विश्वास करता है, उसे लज्जित नहीं होना पड़ेगा’’।

12) इसलिए यहूदी और यूनानी और यूनानी में कोई भेद नहीं है- सबों का प्रभु एक ही है। वह उन सबों के प्रति उदार है, जो उसकी दुहाई देते है;

13) क्योंकि जो प्रभु के नाम की दुहाई देगा, उसे मुक्ति प्राप्त होगी।

14) परन्तु यदि लोगों को उस में विश्वास नहीं, तो वे उसकी दुहाई कैसे दे सकते हैं? यदि उन्होंने उसके विषय में कभी सुना नहीं, तो उस में विश्वास कैसे कर सकते हैं? यदि कोई प्रचारक न हो, तो वे उसके विषय में कैसे सुन सकते है?

15) और यदि वह भेजा नहीं जाये, तो कोई प्रचारक कैसे बन सकता है? धर्मग्रन्थ में लिखा है - शुभ सन्देश सुनाने वालों के चरण कितने सुन्दर लगते हैं !

16) किन्तु सबों ने सुसमाचार का स्वागत नहीं किया। इसायस कहते हैं- प्रभु! किसने हमारे सन्देश पर विश्वास किया है?

17) इस प्रकार हम देखते हैं कि सुनने से विश्वास उत्पन्न होता है और जो सुना जाता है, वह मसीह का वचन है।

18) अब मैं यह पूछता हूँ - ‘‘क्या उन्होंने सुना नहीं?’’ उन्होंने सुना है, क्योंकि उनकी वाणी समस्त संसार में फैल गयी है और उनके शब्द पृथ्वी के सीमान्तों तक।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 4:18-22.


(18) गलीलिया के समुद्र के किनारे टहलते हुए ईसा ने दो भाइयों को देखा-सिमोन, जो पेत्रुस कहलाता है, और उसके भाई अन्द्रेयस को। वे समुद्र में जाल डाल रहे थे, क्योंकि वे मछुए थे।

(19) ईसा ने उन से कहा, ’’मेरे पीछे चले आओ। मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुए बनाऊँगा।’’

(20) वे तुरंत अपने जाल छोड़ कर उनके पीछे हो लिए।

(21) वहाँ से आगे बढ़ने पर ईसा ने और दो भाइयों को देखा- जे़बेदी के पुत्र याकूब और उसके भाई योहन को। वे अपने पिता जे़बेदी के साथ नाव में अपने जाल मरम्मत कर रहे थे।

(22) ईसा ने उन्हें बुलाया। वे तुरंत नाव और अपने पिता को छोड़ कर उनके पीछे हो लिये।



📚 मनन-चिंतन



आज हम संत अंद्रेयस का पर्व मनाते हैं। आज सुसमाचार में हमारे पास प्रथम शिष्यों की बुलाहट का वृतांत है। इस बुलाहट में दो चीजें जो हम देखने को मिलती हैं, वे हैं उनकी सक्रियता और तुरंत प्रतिक्रिया।

सक्रियताः ईश्वर को अपने कार्य के लिए सक्रिय लोगों की आवश्यकता होती है। शिष्य मेहनती लोग थे। येसु ने शिष्यों को बुलाया जब वे काम पर थे। उन्होंने मत्ती को बुलाया जब वह चुंगीघर में था। मूसा को उस समय बुलावा मिला जब वह अपने ससुर यित्रो के झुंड की रखवाली कर रहा था। एलियाह ने एलीशा को बुलाया जब वह खेत में हल जोत रहा था, समूएल ने दाऊद को बुलवा भेजा, जब वह अपने पिता यिशय की भेड चरा रहा था। पुराने विधान के सभी भविष्यवक्ता सक्रिय लोग थे। ईश्वर हमेशा सक्रिय लोगों की तलाश करता है। इसलिए हमें अपनी सेवकाई में सक्रिय होने की आवश्यकता है। यदि हम कमजोर भी है ईश्वर हमें बल प्रदान करेगा। उनके राज्य के लिए कार्य करने की इच्छा सबसे महत्वपूर्ण है। हमें संत पौलुस के शब्दों में विश्वास करना चाहिए ‘‘जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मैं उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हूँ’’। (फिल. 4ः13)

तुरंत प्रतिक्रियाः हर बार जब ईश्वर ने लोगों को बुलाया, तो उन्होंने तुरंत प्रतिउत्तर दिया। जब ईश्वर ने मूसा को बुलाया तो वे तैयार और इच्छुक थे, जब समूएल ने दाऊद को बुलाया, तो वह तुरंत घर पहुंचा। जब एलियाह ने एलीशा को बुलाया, तब वह उनके साथ हो लिया। मत्ती ने चुंगी-घर को तुरंत छोड़ दिया। येसु के द्वारा चंगाई प्राप्त करने वाले वह अंधा और वह कोढ़ी उनकेे पीछे हो लिए। येसु की बातें सुनकर बहुत से लोग उनके पीछे हो लिए। ईश्वर के लिए तुरंत या शीघ्र प्रतिक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है। वह व्यक्ति जो येसु का अनुसरण बाद में करना चाहता था, उससे येसु ने कहा, ‘‘मेरे पीछे चले आओ; मुरदों को अपने मुरदे दफनाने दो’’।(मत्ती 8ः22) आइए हम अपने दैनिक जीवन में अपने प्रभु के बुलावे की आवाज सुनें और तुरंत उसका प्रतिउत्तर देना सीखें।



📚 REFLECTION



Today we celebrate the feast of Andrew. In the gospel we have today the call of first disciples. Two things we notice in this calling are their activeness and the immediate response.

Activeness: God requires active people for his work. The disciples were hardworking people. Jesus called the disciples when they were at work. He called Mathew when he was in the tax collector’s office. Moses was called while he was keeping the flock of his father-in-law Jethro. Elijah called Elisha when he was plowing the field, Samuel sent for David when he was shepherding the flock of his father Jesse. All the prophets of Old Testament were active people. God always looked for active people. Therefore we need to become active in our ministry. Even if we are weak God will strengthen us. The willingness to work for his kingdom is very important. We should believe in the words of St. Paul “I can do all things through him who strengthens me”. (Phil. 4:13)

Immediate response: Every time when God called people, they responded immediately. When God called Mosses he was ready and willing, When Samuel called David he reached home immediately. When Elijah called Elisha, he joined him. Mathew left the tax collector’s office at once. The blind man and the leaper who were healed by Jesus followed him. Hearing the words of Jesus many followed him. Immediate or quick response to God is very important. To the one who wanted to follow Jesus later he said, “Follow me and let the dead burry their own dead”. (Lk. 8:22) Let us listen to the voice of our Lord’s calling in our daily lives and learn to respond to him immediately.



मनन-चिंतन - 2



संत अन्द्रयस उन प्रेरितों में से एक है जो अपनी उपस्थिति को सुसमाचार में प्रकट करते हैं। पूर्वी परंपरा में अन्द्रयस को 'सब से पहले बुलाये जाने वाले' के रूप में जाना जाता है। योहन 1: 35-42 के अनुसार, अन्द्रयस पहले योहन बपतिस्ता के शिष्य थे। योहन बपतिस्ता ने येसु को 'ईश्वर के मेमने' के रूप में उनसे परिचित कराया। फिर अन्द्रयस ने येसु का अनुसरण किया और येसु को मसीह के रूप में पहचानने के बाद, वे अपने भाई पेत्रुस को येसु के पास ले आये। वास्तव में, अन्द्रयस को लोगों को येसु के पास लाने का करिश्मा है। वे उस बालक को येसु के पास ले आये जिसके पास पाँच रोटियों और दो मछलियाँ थीं (देखें योहन 6: 8-9)। इसी अन्द्रयस की मदद से ही त्योहार पर येरूसालेम आने वाले यूनानी लोग येसु से मिल पाते हैं। परंपरा के अनुसार अन्द्रयस ने ग्रीस और तुर्की में सुसमाचार का प्रचार किया और पैट्रास में क्रूस पर चढ़ाया गया।



REFLECTION



Andrew is one of those apostles who makes his presence felt in the Gospel. In the Orthodox tradition Andrew is known as ‘the First-Called’. According to Jn 1:35-42, Andrew was originally a disciple of John, the Baptist. John the Baptist indicated Jesus as ‘lamb of God’ to him. He then followed Jesus and after having recognized Jesus as the Messiah, he brought Peter, his brother, also to Jesus. In fact, Andrew has a charism of bringing people to Jesus. He brought the boy with five loaves and two fish to Jesus (cf. Jn 6:8-9). It was with the help of Andrew that the Greeks who had come the festival could meet Jesus. According to tradition Andrew preached in Greece and Turkey and was crucified in Patras.


 -Br. Biniush topno


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सोमवार, 29 नवंबर, 2021

 

सोमवार, 29 नवंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

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📒 पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 2:1-5


1) येरुसालेम तथा यूदा के विषय में आमोस के पुत्र इसायाह का देखा हुआ दिव्य दृश्य।

2) अन्तिम दिनों में - ईश्वर के मन्दिर का पर्वत पहाड़ों से ऊपर उठेगा और पहाड़ियों से ऊँचा होगा। सभी राष्ट्र वहाँ इकट्ठे होंगे;

3) असंख्य लोग यह कहते हुए वहाँ जायेंगे, “आओ! हम प्रभु के पर्वत पर चढ़ें, याकूब के ईश्वर के मन्दिर चलें, जिससे वह हमें अपने मार्ग दिखाये और हम उसके पथ पर चलते रहें“; क्योंकि सियोन से सन्मार्ग की शिक्षा प्रकट होगी और येरुसालेम से प्रभु की वाणी।

4) वह राष्ट्रों के बीच न्याय करेगा और देशों के आपसी झगड़े मिटायेगा। वे अपनी तलवार को पीट-पीट कर फाल और अपने भाले को हँसिया बनायेंगे। राष्ट्र एक दूसरे पर तलवार नहीं चालायेंगे और युद्ध-विद्या की शिक्षा समाप्त हो जायेगी।

5) याकूब के वंश! आओ, हम प्रभु की ज्योति में चलते रहें।



📒 सुसमाचार : सन्त मत्ती 8:5-11



5) ईसा कफरनाहूम में प्रवेश कर ही रहे थे कि एक शतपति उनके पास आया और उसने उन से यह निवेदन किया,

6) ’’प्रभु! मेरा नौकर घर में पड़ा हुआ है। उसे लक़वा हो गया है और वह घोर पीड़ा सह रहा है।’’

7) ईसा ने उस से कहा, ’’मैं आ कर उसे चंगा कर दूँगा’’।

8) शतपति नें उत्तर दिया, ’’प्रभु! मैं इस योग्य नहीं हूँ कि आप मेरे यहाँ आयें। आप एक ही शब्द कह दीजिए और मेरा नौकर चंगा हो जायेगा।

9) मैं एक छोटा-सा अधिकारी हूँ। मेरे अधीन सिपाही रहते हैं। जब मैं एक से कहता हूँ- ’जाओ’, तो वह जाता है और दूसरे से- ’आओ’, तो वह आता है और अपने नौकर से-’यह करो’, तो वह यह करता है।’’

10) ईसा यह सुन कर चकित हो गये और उन्होंने अपने पीछे आने वालों से कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ-इस्राएल में भी मैंने किसी में इतना दृढ़ विश्वास नहीं पाया’’।

11) ’’मैं तुम से कहता हूँ- बहुत से लोग पूर्व और पश्चिम से आ कर इब्राहीम, इसहाक और याकूब के साथ स्वर्गराज्य के भोज में सम्मिलित होंगे,



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में शतपति हमारे अनुसरण के लिए एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह शतपति के आध्यात्मिक यात्रा की प्रक्रिया को दर्शाता है।

विश्वासः वृत्तांत की शुरुआत शतपति का येसु में भरोसा और विश्वास के साथ होती है। वह येसु के चंगााई-शक्ति में दृढ़ता से विश्वास करता था। इसलिए वह येसु से अपने सेवक की चंगाई के लिए अनुरोध करने आता है। हमें भी इस बात की बहुत चिंता होती है कि क्या ईश्वर हमारी प्रार्थना सुनेगा और हमारे अनुरोध को पूरा करेगा। इसके साथ ही हम ईश्वर की शक्ति और उसके प्रेम और प्रावधान पर भरोसा करने में भी असफल होते हैं। एक गैरइस्राएली होने के बावजूद भी शतपति को येसु में विश्वास था। विश्वास बढ़ाने की हमारी इच्छा केवल हमारी मौखिक प्रार्थनाओं तक समाप्त नहीं होनी चाहिए, बल्कि हमें कार्य करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। हमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए और बाकी सब चीज़ ईश्वर के हाथों में छोड़ देना चाहिए।

नौकर के लिए सम्मान और गरीमाः आम तौर पर नौकरों को मालिक की संपत्ति माना जाता था। वह नौकर के साथ जो चाहे कर सकता था। उससे सवाल करने वाला कोई नहीं था। लेकिन फिर भी शतपति ने अपने सेवक के लिए अपनी चिंता और परवाह दिखाई। शतपति के मन में अपने सेवक के प्रति बहुत सम्मान था। वह नहीं चाहता था कि उसका नौकर कष्ट भुगतेे। शतपति हमें सिखाता है कि अपने साथियों की भले ही समाज में उनकी स्थिति कुछ भी हो, उनकी देखभाल और चिंता कैसे की जाए।

येसु के अधिकार को स्वीकारनाः शतपति कोई साधारण सैनिक नहीं था। वह एक अधिकारी था। अधिकार की शक्ति होने के कारण वह येसु को अपने घर पहुँचने और अपने सेवक को चंगा करने का आदेश दे सकता था। लेकिन उसने कृपापूर्वक उस अधिकार और विशेष रूप से उस चंगाई-शक्ति को स्वीकार किया जो येसु के पास थी। इसलिए उसने येसु के पास आने और अपने सेवक की चंगाई के लिए प्रार्थना करने का कष्ट उठाया। हमें शतपति से सभी लोगों के वरदानों और प्रतिभाओं का सम्मान करना और उन्हें स्वीकार करना सीखना होगा।

यह शतपति हमारे विश्वास, मानवीय गरिमा के सम्मान और अधिकार को स्वीकार करने जैसे मामलों में हमारी आध्यात्मिक यात्रा में एक मार्गदर्शक बने।




📚 REFLECTION



In today’s gospel centurion presents a good example for us to follow. It shows the process of centurion’s spiritual journey.

Faith: The episode begins with Centurion’s faith and trust in Jesus. He believed strongly in the healing power of Jesus. Therefore he comes to request Jesus for the healing of his servant. We too have lot of worries as to whether God would hear our prayer and grand our request. At the same time we also fail to trust in God’s power and in His love and providence. The centurion in spite of being a gentile had faith in Jesus. Our desire to increase the faith should not end with our vocal prayers alone but should lead us to action. We should do make our best effort and leave everything into the hands of God to do the rest.

Dignity and respect for the servant: Normally the servants were considered as the property of the master. He could do to the servant whatever he wanted. There was no one to question him. But still the centurion showed his concern and care for his servant. The centurion had good respect for his servant. He didn’t want his servant to suffer. The centurion teaches us how to show care and concern for our fellowmen regardless of their standing in our society.

Acceptance of the authority of Jesus: Centurion was not an ordinary soldier. He was an officer. Having power of authority he could order Jesus to reach his house and heal his servant. But he gracefully accepted the authority and especially the healing power that Jesus had. Therefore he took the trouble to come to Jesus and request for the healing of his servant. We need to learn from centurion to respect and accept the gifts and talents of everyone.

May this centurion be a guide in our spiritual journey in the matters of our faith, respect for human dignity and in the acceptance of authority.


 -Br. Biniush topno


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