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इतवार, 14 नवंबर, 2021

 

इतवार, 14 नवंबर, 2021

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : दानिएल 12:1-3


1) "उस समय स्वर्गदूतों का प्रधान और तुम्हारी प्रजा की रक्षा करने वाला मिकाएल उठ खड़ा होगा। जैसा कि राष्ट्रों की उत्पत्ति से अब तक कभी नहीं हुआ है। किन्तु उस समय तुम्हारी प्रजा बच जायेगी- वे सब, जिनका नाम पुस्तक में लिखा रहेगा।

2) जो लोग पृथ्वी की मिट्टी में सोये हुए थे, वे बड़ी संख्या में जाग जायेंगे, कुछ अनन्त जीवन के लिए और कुछ अनन्त काल तक तिरस्कृत और।कलंकित होने के लिए। धर्मी आकाश की ज्योति की तरह प्रकाशमान होंगे

3) और जिन्होंने बहुतों को धार्मिकता की शिक्षा दी है, वे अनन्त काल तक तारों की तरह चमकते रहेंगे।


दूसरा पाठ : इब्रानियो 10:11-14,18



11) प्रत्येक दूसरा पुरोहित खड़ा हो कर प्रतिदिन धर्म-अनुष्ठान करता है और बार-बार एक ही प्रकार के बलिदान चढ़ाया करता है, जो पाप हरने में असमर्थ होते हैं।

12) किन्तु पापों के लिए एक ही बलिदान चढ़ाने के बाद, वह सदा के लिए ईश्वर के दाहिने विराजमान हो गये हैं,

13) जहाँ वह उस समय की राह देखते हैं, जब उनके शत्रुओं को उनका पावदान बना दिया जायेगा;

14) क्योंकि वह जिन लोगों को पवित्र करते हैं, उन्होंने उन को एक ही बलिदान द्वारा सदा के लिए पूर्णता तक पहुँचा दिया है।

18) जब पाप क्षमा कर दिये गये हैं, तो फिर आप के लिए बलिदान की आवश्यकता नहीं रही।



सुसमाचार : मारकुस 13:24-32



24) "उन दिनों के संकट के बाद सूर्य अन्धकारमय हो जायेगा, चन्द्रमा प्रकाश नहीं देगा,

25) तारे आकाश से गिर जायेंगे और आकाश की शक्तियाँ विचलित हो जायेंगी।

26) तब लोग मानव पुत्र को अपार सामर्थ्य और महिमा के साथ बादलों पर आते हुए देखेंगे।

27) वह अपने दूतों को भेजेगा और वे चारों दिशाओं से, आकाश के कोने-कोने से, उसके चुने हुए लोगों को एकत्र करेंगे।

28) "अंजीर के पेड़ से शिक्षा लो। जब उसकी टहनियाँ कोमल बन जाती हैं और उन में अंकुर फूटने लगते हैं, तो तुम जान जाते हो कि गरमी आ रही है।

29) इसी तरह, जब तुम लोग यह सब देखोगे, तो जान लो कि वह निकट है, द्वार पर ही है।

30) मैं तुम से यह कहता हूँ कि इस पीढ़ी का अन्त हो जाने के पूर्व ही ये सब बातें घटित हो जायेंगी।

31) आकाश और पृथ्वी टल जायें, तो टल जायें, परन्तु मेरे शब्द नहीं टल सकते।

32) "उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता- न तो स्वर्ग के दूत और न पुत्र। केवल पिता ही जानता है।



मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार प्रभु के दिन की घटनाओं की बात करता है। यहोवा का दिन एक अवधारणा थी जो इस्राएलियों के लिए बहुत परिचित थे। यह वर्तमान युग और आने वाले युग के बीच का दिन है। दानिएल की पुस्तक में आज के पहले पाठ में प्रभु के दिन के विषय में यह बताता हैः

दुनिया का अनजान और अचानक अंतः यह माना जाता था कि प्रभु के दिन का आगमन अचानक और कम से कम अपेक्षित समय होगा। संत पौलुस कहते हैं, ‘‘प्रभु का दिन, रात के चोर की तरह आएगा’’ (1 थेसल 5ः2)। येसुु ने स्वयं इसका संकेत दिया था जब उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए जागते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारे प्रभु किस दिन आयेंगे। यह अच्छी तरह समझ लो- यदि घर के स्वामी को मालूम होता कि चोर रात के किस पहर आयेगा, तो वह जागता रहता और अपने घर में सेंध लगने नहीं देता। इसलिए तुम लोग भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी तुम उसके आने की नहीं सोचते, उसी घड़ी मानव पुत्र आयेगा।’’ मत्ती 24ः42-44

प्रभु के दिन के आगमन पर विनाशः आकाशीय पिंड के विनाश की भविष्यवाणी भी प्रभु के दिन की गयी है। येसु इसायह की पुस्तक 13ः10,13 और योएल 2ः 10, 30-31 से उल्लेख करते है, जहां ब्रह्मांड में अस्तवयस्तता को दर्शाया गया है। उनके अनुसार प्रभु के दिन के आगमन पर प्रकृति में जो कुछ भी है सब में खलबली और उलझन पैदा हो जाएगी। भूकंप, आग और अकाल से प्रकृति में अव्यवस्था पैदा होती है। राष्ट्रों के बीच और परिवार के बीच में ही युद्ध छिड़ जाता है। यह विनाश दो बातों का अनुमान लगाता है अ) ईश्वर ने संसार को नहीं छोड़ा है ब) यह पुनर्निर्माण के लिए एक प्रस्तावना है। पुनर्निर्मित दुनिया में प्रत्येक ईसाई से ईश्वर के प्रति नवीन वफादारी दिखाने, जीवन के एक नए स्तर पर अमल करने के लिए बुलाया जाना तथा जीवन के नए उदाहरण के साथ लोगों का नेतृत्व करने की उम्मीद की जाती है।



REFLECTION



Today’s gospel speaks happenings on the Day of the Lord. Day of the Lord was a concept very familiar for Israelites. It is a day between present age and the age to come. Today’s first reading in the book of Daniel we hear about this.

Unknown and sudden end of the world: It was believed that the arrival of the day of the Lord will be sudden and at a least expected time. St. Paul says “The day of the Lord will come like a thief in the night” (1 Thess. 5:2). Jesus himself hinted at it when he said “Therefore keep watch, because you do not know on what day your Lord will come but understand this If the owner of the house had known at what time of night the thief was coming, he would have kept watch and would not have let his house be broken into, So you also must be ready, because the Son of Man will come at an hour when you do not expect him” (Mat. 24: 42- 44).

Destruction at its arrival: Destruction of the heavenly bodies is also foretold on the Day of the Lord. Jesus quotes from Is. 13:10, 13 and Joel 2: 10, 30-31, where the chaos in the universe is depicted. According to them at the arrival of the Day of the Lord everything in the nature falls to commotion and confusion. A disorder is created in the nature with earthquakes, fire and famine. War breaks out between nations and in the family itself. This destruction presupposes two things a) God has not abandoned the world b) it is a prelude for the recreation. In the recreated world every Christian is expected to show new loyalty to God, called to practice a new standard of living and to lead the people with new example of life.




मनन-चिंतन - 2



आज वर्ष का 33सवाँ इतवार है और पूजन विधि का दूसरा अंतिम इतवार है इस अंतिम सप्ताह में हमें अंतिम दिनों की घटनाओं के बारे में बताया गया है।

किसी गाँव में दो घनिष्ठ मित्र रहा करते थे, वे प्रतिदिन अपने-अपने अंतिम दिनों के जीवन के बारे में वाद-विवाद किया करते थे और यह जानना चाहते थे कि इस दुनिया में कौन ऐसा व्यक्ति है जो अपने जीवन के अंतिम क्षण को जान सके। उनमें से सबसे बुजर्ग ने कहा-’’मुझे पता नहीं, मैं अंतिम दिन तक अपने किताब रूपी जीवन को अच्छी तरह से लिख पाऊंगा या नहीं।’’

प्रिय विश्वासियों, आज के भौतिकवाद में हम भी कई बार अपनी मृत्यु और अंतिम दिन से भयभीत होकर जीवन जीते हैं। हम अपने आप में विश्वास नहीं कर पाते हैं और उस बुजर्ग के समान प्रश्न करते दिखाई देते हैं। लेकिन एक सच्चे ख्रीस्तीय जीवन बिताने वाले के लिए अंतिम दिन एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसे आज के तीनों पाठों में विस्तृत रूप में दर्शाया गया है।

हम सभी को ज्ञात है कि हम सब एक न एक दिन इस संसार से विदा ले लेगें और हमारे लिए इस संसार का अंत हो जाएगा। हम भयभीत होकर इस सच्चाई से अपने को दरकिनार कर देते हैं। क्योंकि हम अंतिम दिनों का स्मरण विश्वास के साथ नहीं लेकिन डर कर करते हैं। आज के पाठों में बताया गया है कि हमारी मृत्यु एक सच्चाई है।

जब हम समाचार पत्रों में पढते, रेडियो में समाचार सुनते या टेलीविजन में समाचार देखते हैं तब हमें ज्ञात होता है कि इस संसार में तरह-तरह की विषमताएँ हैं। आज का पहला पाठ जो नबी दानिएल ग्रंथ से लिया गया है, मे बताया गया है कि उस समय समस्त राष्ट्रों में घोर संकट आ जाएगा। यह समय पुनरूत्थान का सूचक है। जो लोग पृथ्वी पर सो रहे हैं वे जाग जाएगें और सदा के लिए जीवित हो जाएगें और जो शापित हैं वे अनंत पाप के सागर में लिप्त हो जाएगें। यह सब अंतिम दिन की भविष्यवाणी है जब धर्मी मानव पुत्र के आने की राह देखेगें।

यह कहने पर अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज मनुष्य अपने मन मस्तिष्क के पाप और उसके दुषप्रभाव से अपने को अलग कर चुका है। उसके लिये पाप और पुण्य कोई महत्व नहीं रखता । वह ईश्वर पर भरोसा नहीं रखता। उसे तो केवल अपने स्वार्थ पूर्ण जीवन ही मायने रखता है। जब हम कलीसिया के इतिहास के पन्नों को पलट कर देखते हैं तो हमें पता चलता है कि ऐसे कई संत और धर्मात्मा अपने अंतिम दिनों को जान गये थे और वे संपूर्ण रूप से ईश्वर में लिप्त थे। हम सभी जानते हैं ईश्वर सबका उध्दार और मुक्ति चाहता है। वह अपने विधान को किसी के ऊपर नहीं थोपता, परन्तु उन्हें पूरी स्वतंत्रता देता है कि मनुष्य ईश्वर में विश्वास करे और जीवन जीये या उनसे अलग रहे।

आज का दूसरा पाठ हमें प्रभु येसु ख्रीस्त के एक मात्र समर्थ बलिदान के बारे में बताता है। वे एक ही बार बलिदान चढ़ाने के बाद सदा के लिए ईश्वर के दाहिने विराजमान हो गये हैं। प्रभु येसु ख्रीस्त ने अपनी मृत्यु और पुनरूत्थान द्वारा हमें पाप मुक्त कर दिया है। आज हमारे लिये चुनौती है कि हम किस प्रकार ईश्वर और अपने पड़ोसी से संबध रखते हैं? क्योंकि मनुष्यों का स्वार्थ और उसके दुषप्रभाव उसे ईश्वर से अलग कर देता है।

आज का सुसमाचार अंतिम दिन को जागरूक और सचेत होकर जीवन जीने के लिए आमंत्रण देता है। क्या यह हमारे जीवने को प्रभावित करता है? क्या हमें दुरदर्शी व्यक्ति बनने के लिये प्रेरित करता है? इन सभी घटनाओं का जिक्र हम पुराने विधान में विशेष करके नबी दानिएल के ग्रंथ में पाते हैं। नये विधान में प्रभु येसु ख्रीस्त जैतून के पेड़ के दृष्टांत द्वारा इसका निरूपण करते हैं और अपने शिष्यों को अगाह करते हैं कि उन्हें सभी प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के लिए सदैव जागरूक और सर्तक रहना होगा।

तो आइए! आज के तीनों पाठों से यह शिक्षा लें कि जब भी हमें विपतियों या संकट का सामना करना पडे़, तो हम धीरज के साथ मानव पुत्र के साथ खडे़ होने के लिए अपने आप को तैयार कर सकें।


-Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 12 नवंबर, 2021

 

शुक्रवार, 12 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: प्रज्ञा-ग्रन्थ 13:1-9


1) वे मनुष्य कितने मूर्ख है, जिन में ईश्वर का ज्ञान नहीं है! जो दृष्य जगत् को देख कर ‘सत्‘ नामक ईश्वर को नहीं जान सके, जो सृष्टि को देख कर सृष्टिकर्ता को पहचानने में असमर्थ रहे!

2) किन्तु उन्होंने अग्नि, पवन, सूक्ष्म वायु, तारामण्डल, जल का तीव्र प्रवाह अथवा आकाश के ज्योति-पिण्डों को संसार का संचालन करने वाले देवता समझा है।

3) यदि उन्होंने इन वस्तुओं के सौन्दर्य से मोहित हो कर इन्हें देवता समझ लिया है, तो वे यह जान जायें कि इन सब का स्वामी इन से कितना श्रेष्ठ है; क्योंकि समस्त सौन्दर्य के मूलस्त्रोत द्वारा उनकी सृष्टि हुई है

4) और यदि वे इन वस्तुओं की शक्ति और क्रियाशीलता से प्रभावित हुए, तो वे इन वस्तुओं से अनुमान लगायें कि इनका निर्माता, कितना अधिक शक्तिशाली है;

5) क्योंकि सृष्ट वस्तुओं की महानता और सौन्दर्य के आधार पर इनके निर्माता का अनुमान लगाया जा सकता है।

6) किन्तु उन लोगों का दोष बड़ा नहीं है; क्योंकि वे ईश्वर को ढूँढ़ते और उसे पाने के इच्छुक थे, किन्तु वे भटक गये।

7) वे ईश्वर के कार्यों के बीच जीवन बिता कर उनकी छानबीन करते और दृष्य वस्तुओं के सौन्दर्य के कारण भ्रम में फँस जाते हैं।

8) फिर भी वे लोग क्षम्य नहीं है;

9) क्योंकि यदि वे ज्ञान में इतना आगे बढ़ गये थे कि विश्व के विषय में चिन्तन कर सके, तो वे शीघ्र ही इसके स्वामी को क्यों नहीं पहचान सके?



सुसमाचार : सन्त लूकस 17:26-37



26) ‘‘जो नूह के दिनों में हुआ था, वही मानव पुत्र के दिनों में भी होगा।

27) नूह के जहाज़ पर चढ़ने के दिन तक लोग खाते-पीते और शादी-ब्याह करते रहे। तब जलप्रलय आया और उसने सब को नष्ट कर दिया।

28) लोट के दिनों में भी यही हुआ था। लोग खाते-पीते, लेन-देन करते, पेड़ लगाते और घर बनाते रहे;

29) परन्तु जिस दिन लोट ने सोदोम छोड़ा, ईश्वर ने आकाश से आग और गंधक बरसायी और सब-के-सब नष्ट हो गये।

30) मानव पुत्र के प्रकट होने के दिन वैसा ही होगा।

31) ‘‘उस दिन जो छत पर हो और उसका सामान घर में हो, वह उसे ले जाने नीचे न उतरे और जो खेत में हो, वह भी घर न लौटे।

32) लोट की पत्नी को याद करो।

33) जो अपना जीवन सुरक्षित रखने का प्रयत्न करेगा, वह उसे खो देगा, और जो उसे खो देगा, वह उसे सुरक्षित रखेगा।

34) ’’मैं तुम से कहता हूँ, उस रात दो एक खाट पर होंगे-एक उठा लिया जायेगा और दूसरा छोड़ दिया जायेगा।

35) दो स्त्रियाँ साथ-साथ चक्की पीसती होंगी-एक उठा ली जायेगी और दूसरी छोड़ दी जायेगी।’’

36) ’’मैं तुम से कहता हूँ, दो खेत में होंगे-एक उठा लिया जायेगा और दूसरा छोड़ दिया जायेगा।

37) इस पर उन्होंने ईसा से पूछा, ‘‘प्र्रभु! यह कहाँ होगा?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘जहाँ लाश होगी, वहाँ गीध भी इकट्ठे हो जायेंगे’’।



मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार दो महत्वपूर्ण पहलूओं की भविष्यवाणी करता है -

 राज्य का हिस्सा बनने के लिए आवश्यक तैयारी

 राज्य के आने का अज्ञात समय ।

जीवन की सामान्य दिनचर्या में हमें अपनी और संबंधित अन्य लोगो की भौतिक और अन्य जरूरतो की देखभाल करने की आवश्यकता होती है । यह हर इंसान की जिम्मेदारी है । येसु हमे अनंत जीवन के विषय में एक कदम आगे सोचने के लिए आमंत्रित करते है । अनन्त जीवन की तुलना में इस संसार की अवश्यकताओं की कोई कीमत नहीं है । नूह और लोट के दिनों में लोग भौतिक संसार में व्यस्त थे जबकि नूह और लोट एक कदम आगे बढ गए थे उन्होंने ईश्वर की बात मानी और उसी के अनुसार जलप्रलय और आग का सामना करने के लिए अपने आप को तैयार किया जिसने पृथ्वी पर सभी को और सदोम के लोगों को नष्ट कर दिया । परिवार के सदस्यों सहित उन्हें बचा लिया गया । हमें हमारे प्रियजनों, हमारे समाज और दुनिया की हर चींजो को त्यागने की जरूरत नहीं बल्कि उनका उपयोग। साथ जीवन के अर्थ और उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए करना है ।

बजाय इसके कि हम अपना जीवन खो दें। हालांकि आखिरी मिनट/समय में अच्छी तरह से तैयार होने के बावजूद लोट की पत्नी नमक के खम्भे में बदल गई । अर्थ और उद्देश्यको भूल जाना हमेशा विनाश को आमंत्रित करेगा ।

ईश्वर के राज्य के महिमामय आगमन पर भी घ्यान देने की आवश्यकता है । यह एक अप्रत्याशित समय है । इसलिए इसके आगमन के लिए सभी को सदैव तैयार रहने की जरूरत है । बाद के लिए स्थगित करने से हमे केवल और केवल खेद और निराशा हो सकती है । हमें दिया गया समय कम है और उस समय पर हमारा कोई नियंत्रण नही है । यही कारण है कि संत पौलुस कहते है, “और देखिए अभी उपयुक्त समय है, अभी कल्याण का दिन है ।“ (श्कुरि 6:2 बी).




REFLECTION



Today’s gospel foretells two important aspects: the preparation required to be the part of the kingdom and the unknown time of the coming of the kingdom.

In the normal routine of life we need to look after the physical and material needs of oneself and of others related to them. It is a responsibility of every human person. Jesus invites us to think a step further about the eternal life. As compared to eternal life the needs of this world are worth nothing.

In the days of Noah and Lot people were busy in the material world where as Noah and Lot went a step further. They listened to God and prepared themselves accordingly to face the flood and the fire which destroyed everyone on earth and people of Sodom. They were saved along with their family members. It is not to discard our loved ones, our society and everything in the world but to use them to achieve the meaning and purpose of life rather than losing our life to them. Though well prepared the last minute attachment turned Lot’s wife into a pillar of salt. Forgetting the meaning and purpose will always invite destruction.

Imminent arrival of the kingdom of God is also need to be looked into. It is an unexpected time. Therefore all need to be ready at its arrival. Postponing for later stage may cause regret and disappointment. The time given to us is short and we have no control over that time. That is why St. Paul says “See now is the acceptable time; see now is the day of salvation” 2Cor. 6:2b.




मनन-चिंतन - 2



प्रभु येसु बार-बार हमें बताते हैं कि अंत बिना किसी घोषणा या चेतावनी के अचानक आएगा। इसलिए हमें हमेशा तैयार रहना होगा। येसु चाहते हैं कि हम जागते रहें और हर समय तैयार रहें। अचानक पकड़ा जाना एक त्रासदी होगी। नूह के समय में लोग अपने जीवन की बहुत सी चीजों और चिंताओं में व्यस्त थे। वे इस पर ध्यान नहीं दे रहे थे कि अपने निर्माता और प्रभु हम से क्या अपेक्षा रखते हैं। नूह ईश्वर से जुड़े हुए थे। हम भी बहुत सारी चीजों में व्यस्त हो सकते हैं और प्रभु को भूल सकते हैं। हम अपने काम, आराम, कार्यक्रमों और परियोजनाओं में डूबे रह सकते हैं। येसु चाहते हैं कि हम अपने ईश्वर के प्रति प्रेम और अपने उद्धार के बारे में चिंतित हों। दुनिया के कार्यों में फंसे, हमें उस उद्धार को नहीं भूलना चाहिए जो प्रभु हमें प्रदान करते हैं। मार्था के प्रति उनकी प्रतिक्रिया हमारे मनन-चिंतन के योग्य है, "मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो; फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।”(लूकस 10: 41-42)



REFLECTION



Time and again Jesus tells us that the end will suddenly come without any announcement or warning. Therefore we have to be prepared always. Jesus wants us to keep awake and be ready at all times. It will be tragedy to get caught unaware. At the time of Noah people were busy with too many things and concerns of their lives. They hardly bothered about what their Creator and Lord expected from them. Noah was tuned to God. We too can be busy with too many things and can forget God. We can be immersed in our work, in our comfort, in our programmes and projects. Jesus wants us to be concerned about our love for God and about our salvation. Caught up in the chores of the world, we should not lose sight of the Salvation the Lord offers to us. His response to Martha is worth reflecting upon, “Martha, Martha, you are worried and distracted by many things; there is need of only one thing. Mary has chosen the better part, which will not be taken away from her.” (Lk 10:41-42)


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 11 नवंबर, 2021

 

गुरुवार, 11 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: प्रज्ञा-ग्रन्थ 7:22-8:1


22) प्रज्ञा में एक आत्मा विद्यमान है, जो विवेकशील, पवत्रि अद्वितीय, बहुविध, सूक्ष्म, गतिमय, प्रत्यक्ष, निष्कलंक, स्वच्छ, अपरिवर्तनीय, हितकारी, तत्पर,

23) अदम्य, उपकारी, जनहितैषी, सुदृढ़, आश्वस्त, प्रशान्त, सर्वशक्तिमान् और सर्वनिरीक्षक है। वह सभी विवेकशील, शुद्ध तथा सूक्ष्म जीवात्माओें में व्याप्त है;

24) क्योंकि प्रज्ञा किसी भी गति से अधिक गतिशील है। वह इतनी परिशुद्ध है कि वह सब कुछ में प्रवेश करती और व्याप्त रहती है।

25) वह ईश्वर की शक्ति का प्रसव है, सर्वशक्तिमान् की महिमा की परिशुद्ध प्रदीप्ति है, इसलिए कोई अशुद्धता उस में प्रवेश नहीं कर पाती।

26) वह शाश्वत ज्योति का प्रतिबिम्ब है, ईश्वर की सक्रियता का परिशुद्ध दर्पण और उसकी भलाई का प्रतिरूप है।

27) वह अकेली होते हुए भी सब कुछ कर सकती है। वह अपरिवर्तनीय होते हुए भी सब कुछ को नवीन बनाती रहती है। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी पवत्रि जीवात्माओं में प्रवेश कर उन्हें ईश्वर के मित्र और नबी बनाती है;

28) क्योंकि ईश्वर केवल उसी को प्यार करता है, जो प्रज्ञा के साथ निवास करता है।

29) प्रज्ञा सूर्य से भी रमणीय है, सभी नक्षत्रों से श्रेष्ठ है और प्रकाश से भी बढ़ कर है;

30) क्योंकि प्रकाश रात्रि के सामने दूर हो जाता है, किन्तु प्रज्ञा पर दुष्टता का वष नहीं चलता।

1) प्रज्ञा की शक्ति पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक सक्रिय है और वह सुचारू रूप से विश्वका संचालन करती है।



सुसमाचार : सन्त लूकस 17:20-25



20) जब फ़रीसियों ने उन से पूछा कि ईश्वर का राज्य कब आयेगा, तो ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘ईश्वर का राज्य प्रकट रूप से नहीं आता।

21) लोग नहीं कह सकेंगे, ‘देखो-वह यहाँ है’ अथवा, ‘देखो-वह वहाँ है’; क्योंकि ईश्वर का राज्य तुम्हारे ही बीच है।’’

22) ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ‘‘ऐसा समय आयेगा, जब तुम मानव पुत्र का एक दिन भी देखना चाहोगे, किन्तु उसे नहीं देख पाओगे।

23) लोग तुम से कहेंगे, ’देखो-वह यहाँ है’, अथवा, ‘देखो-वह वहाँ है’, तो तुम उधर नहीं जाओगे, उनके पीछे नहीं दौड़ोगे;

24) क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से निकल कर दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मानव पुत्र अपने दिन प्रकट होगा।

25) परन्तु पहले उसे बहुत दुःख सहना और इस पीढ़ी द्वारा ठुकराया जाना है।



मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार दो प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास करता है -

1. ईश्वर का राज्य कहॉं है ?

2. ईश्वर का राज्य कब स्थापित होगा ?


1. ईश्वर का राज्य कहॉं है ?

ईश्वर का राज्य लूकस के सुसमाचार में आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली अभिव्यक्ति है । ईश्वर का राज्य क्या है, यह स्वयं येसु ने सुसमाचार में कई स्थानों पर व्यक्त किया है । इन सभी अभिव्यक्तियों से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह कोई विशेष स्थान या क्षेत्र नहीं है जैसा कि हम आमतौर पर सोचते है ।

संत पौलुस लिखते है, “क्योंकि ईश्वर का राज्य खाने-पीने का नही, बल्कि वह न्याय शांति और पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त आनन्द का विषय है।रोम 14ः17

ईश्वर का राज्य भीतर से शुरू होता है और हमारे हृदयों को ईश्वर के हृदय में बदल देता है । इसलिए ईश्वर का राज्य पहले मानव हृदय में और फिर समाज में स्थापित होता है ।


2. ईश्वर का राज्य कब स्थापित होगा ?

दुनिया के अंत के विषय में केवल ईश्वर जानता है यह एक वर्तमान घटना और वासतविकता है और इसकी समाप्ति समय के अंत में होगी । इसलिए हम ईश्वर के राज्य की प्रकृति के विषय में पहले से ही और अभी तक नहीं के संदर्भ में बात करते है ।

धर्म शिक्षा स्पष्ट रूप से ईसा मसीह के अवतार में सुसमाचार मंे पवित्र यूख्रीस्त में और कलीसिया में ईश्वर के राज्य की पहले से मौजूद प्रकृति को स्पष्ट रूप से बताती है ।

लेकिन साथ ही इसके अप्रत्याशित आगमन की प्रतीक्षा कर रहे एक उम्मीदवार की भी भविष्यवाणी की जाती है । येसु ने चेतावनी दी है कि झूठे भविष्य वक्ताओं का अनुसरण न करें जो हमें । भटकाते है । आइए हम अपने दिल में राज्य की अच्छाई का अनुभव करें और इसके मूल्यों को अपने और अपनंे आसपास फैलाएॅ ।



REFLECTION



Today’s gospel tries to answer two questions

1. Where is the Kingdom of God?

2. When will the Kingdom of God be established?

Where is the Kingdom of God?

Kingdom of God is a commonly used expression in the gospel of Luke. From all these expressions we can conclude that it is not a particular place or a region as we normally tend to think. St. Paul writes “Kingdom of God is not eating and drinking but righteousness, peace and joy in the heart” Rom. 4:17. The Kingdom of God begins from within and transforms our hearts to be like God. Therefore Kingdom of God is established first in the human heart and then in the society

When will Kingdom of God be established?

Only God knows about the end of the world. It is a present event and reality and its completion will take place at the end of time. That is why we speak of the nature of kingdom of God as Already and Not yet.

The teaching of the Catechism of the Catholic Church clearly spells out the Already Present nature of the Kingdom of God in the person of Jesus Christ the incarnate word, in the Gospel, in the Eucharist and in the Church. But at the same time an expectant waiting for its unexpected arrival is also foreseen. Jesus warns not to follow the false prophets who can mislead us.

Let us experience the goodness of the kingdom in our heart and spread its values in and around us.



मनन-चिंतन - 2


फरीसियों के सवाल के जवाब में, प्रभु येसु ने उन्हें बताया कि ईश्वर का राज्य पहले ही आ चुका था और यह उनके बीच था। येसु ने ईश्वर के राज्य का उद्घाटन किया। प्रभु ने अपने देहधारण, दुखभोग और मृत्यु के माध्यम से ईश्वर के राज्य का उद्घाटन किया। उन्होंने हम में स्वर्गराज्य का उद्घाटन किया। हमें उसके पूर्ण एहसास करने के लिए उनका साथ देना होगा। हममें से हरेक को अपने जीवन में स्वर्गराज्य के फल पैदा करना चाहिए। संत पौलुस फिलिप्पियों से कहते हैं, "जिसने आप लोगों में यह शुभ कार्य आरम्भ किया, वह उसे ईसा मसीह के आगमन के दिन तक पूर्णता तक पहुँचा देगा।" (फिलिप्पियों 1:6) ईश्वर का राज्य जीवन, प्रकाश, विकास और फलदायकता के बारे में है। हमारे भीतर बोया गया शब्द अंकुरित होकर, विकसित होकर प्रेम और सेवा के फल पैदा करने के लिए सक्षम बने। यह हम केवल येसु से जुड़े हो कर ही हासिल कर सकते हैं। प्रभु कहते हैं, "जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते"। (योहन 15: 5)



REFLECTION



In reply to the question of the Pharisees, Jesus tells them the Kingdom of God had already come and that it was among them. Jesus inaugurated the Kingdom of God. It is through his incarnation, suffering and death that Jesus inaugurated the Kingdom of God. He inaugurated the Kingdom in us, we have to co-operate with him in bringing it to its full realisation. Each one of us is expected to produce the fruits of Kingdom in our own lives. St. Paul tells the Philippians, “I am confident of this, that the one who began a good work among you will bring it to completion by the day of Jesus Christ” (Phil 1:6). The Kingdom of God is about life, light, growth and fruitfulness. The Word that is sown in us needs to take root, grow and become capable of producing fruits of love and service. This we can facilitate only by clinging on to Jesus. Jesus says, “Those who abide in me and I in them bear much fruit, because apart from me you can do nothing” (Jn 15:5)



 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 10 नवंबर, 2021

 

बुधवार, 10 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: प्रज्ञा-ग्रन्थ 6:1-11


1) राजाओें! सुनो और समझो। पृथ्वी भर के शासको! शिक्षा ग्रहण करो।

2) तुम, जो बहुसंख्यक लोगों पर अधिकार जताते हो और बहुत-से राष्ट्रों का शासन करने पर गर्व करते हो, मेरी बातों पर कान दो ;

3) क्योंकि प्रभु ने तुम्हें प्रभुत्व प्रदान किया, सर्वोच्च ईश्वर ने तुम्हे अधिकार दिया। वही तुम्हारे कार्यों का लेखा लेगा और तुम्हारे विचारों की जाँच करेगा।

4) तुम उसके राज्य के सेवक मात्र हो। इसलिए यदि तुमने सच्चा न्याय नहीं किया, विधि का पालन नहीं किया और ईश्वर की इच्छा पूरी नहीं की,

5) तो वह भीषण रूप में अचानक तुम्हारे सामने प्रकट होगा; क्योंकि उच्च अधिकारियों का कठोर न्याय किया जायेगा।

6) जो दीन-हीन है, वह क्षमा और दया का पात्र है; किन्तु जो शक्तिशाली है, उनकी कड़ी परीक्षा ली जायेगी।

7) सर्वेश्वर पक्षपात नहीं करता और बड़ों के सामने नहीं झुकता; क्योंकि उसी ने छोटे और बड़े, दोनों को बनाया और वह सब का समान ध्यान रखता है,

8) किन्तु शक्तिशालियों की कठोर परीक्षा ली जायेगी।

9) इसलिए शासको! मैं तुम्हे शिक्षा देता हूँ, जिससे तुम प्रज्ञा प्राप्त करो और विनाश से बचे रहो;

10) क्योंकि जो पवत्रि नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वे पवत्रि माने जायेंगे और जो उन नियमों से शिक्षा ग्रहण करेंगे, वे उनके आधार पर अपनी सफाई दे सकेंगे।

11) इसलिए मेरी इन बातों को अपनाओ और इनका मनन करो, जिससे तुम्हें शिक्षा प्राप्त हो।



सुसमाचार : सन्त लूकस 17:11-19



11) ईसा येरुसालेम की यात्रा करते हुए समारिया और गलीलिया के सीमा-क्षेत्रों से हो कर जा रहे थे।

12) किसी गाँव में प्रवेश करने पर उन्हें दस कोढ़ी मिले,

13) जो दूर खड़े हो गये और ऊँचे स्वर से बोले, ’’ईसा! गुरूवर! हम पर दया कीजिए’’।

14) ईसा ने उन्हें देख कर कहा, ‘‘जाओ और अपने को याजकों को दिखलाओ’’, और ऐसा हुआ कि वे रास्ते में ही नीरोग हो गये।

15) तब उन में से एक यह देख कर कि वह नीरोग हो गया है, ऊँचे स्वर से ईश्वर की स्तुति करते हुए लौटा।

16) वह ईसा को धन्यवाद देते हुए उनके चरणों पर मुँह के बल गिर पड़ा, और वह समारी था।

17) ईसा ने कहा, ‘‘क्या दसों नीरोग नहीं हुए? तो बाक़ी नौ कहाँ हैं?

18) क्या इस परदेशी को छोड़ और कोई नहीं मिला, जो लौट कर ईश्वर की स्तुति करे?’’

19) तब उन्होंने उस से कहा, ‘‘उठो, जाओ। तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है।’’



मनन-चिंतन


प्रभु येसु के आज की चंगाई मिशन कार्य में तीन चरण हैं जिन्हें हमें प्रतिबिंबित करने की आवश्यकता है

1. बीमारी के समय में एकता

2. काढ़ियों का विश्वास

3. कोढ़ी की वफादारी

हालाँकि फिलिस्तीन के यहूदी समारी लोगों से घृणा करते थे, लेकिन आज के सुसमाचार में हम उन सभी को एक साथ देखते हैं। बीमारी से पीड़ित होने पर वे सभी एक साथ दूर खड़े रहते हैं और प्रभु को पुकारते हैं। उनके बीच अब कोई अलगाव नहीं रहा। दस कोढ़ियों के विश्वास की भी प्रशंसा करने की जरूरत है। येसु हर बार की तरह उन्हें उसी समय ठीक नहीं करते। वह उन्हें तुरंत जगह छोड़ने और चंगाई को प्रमाणित करने के लिए पुरोहित के सामने पेश करने के लिए कहते है। कोढ़ियों ने येसु के शब्दों में विश्वास किया और हालांकि उन्हें चंगाई नहीं मिला वे बिना एक भी शब्द बोले वहां से चले गए। उन्होंने येसु के शब्दों पर भरोसा किया और मंदिर में पुरोहित के पास प्रमाणित करने के लिए वे इस प्रकार आगे बढते हैं कि जैसे वे पहले से ही चंगे हो गये हो। येसु यह कहते हुए इसका साक्ष्य देते हैं कि आपके विश्वास ने आपको चंगा किया है।

वे सभी एक साथ आगे बढ़े और स्वयं को स्वच्छ साबित किया। हालाँकि उन्होंने महसूस किया कि वे शुद्ध हो गये थे, उनमें से केवल एक ही वापस आकर येसु को धन्यवाद देना चाहता था। सामरी के मन में कृतज्ञता का भाव देखा गया, जबकि दूसरों ने इसे हल्के में लिया। कृतज्ञ हृदय से उस को़ढ़ी की वापसी उसकी वफादारी को व्यक्त करती है। उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करना याजक के प्रमाण से बढ़कर था। जिस क्षण उसने चंगाई का अनुभव किया, उसका हृदय ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से भर गया। वह येसु के पास लौट आता है। हमें दैनिक जीवन में कई वरदान मिलते हैं लेकिन हम इसे हल्के में लेते हैं और उसका धन्यवाद करना भूल जाते हैं। प्राप्त उपकारों के लिए कृतज्ञता की अभिव्यक्ति हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण चीज है।


REFLECTION



There are three phases that we need to reflect in today’s healing miracle of Jesus

1. Unity in sickness

2. Faith of the leapers

3. Faithfulness of the leaper

Though the Jews in Palestine hated the Samaritans, in the gospel today we see all of them united. When affected with the sickness all of them stand together in a distance and call on the Lord. There was no separation anymore among them.

The faith of the ten leapers also needs to be admired. Jesus as usual does not heal them on the spot. He asks them to leave the place immediately and present themselves to the priest to certify the healing. The leapers believed in the words of Jesus and moved away from the place without uttering a word. They trusted the words of Jesus and proceeds to the priest in the temple to certify as if they are healed already. Jesus testifies it by saying that your faith has healed you.

All of them advanced together to prove themselves clean. Though they realized that they were clean only one of them wanted to come back and thank Jesus. An attitude of gratitude was seen in the mind of Samaritan where as others took it for granted. The return of the leaper with a grateful heart expresses his faithfulness. For him to render thanks to God was more than the certification from the priest. The moment he experienced healing he was filled with gratitude to God. He returned to Jesus.

We receive many gifts from God on daily basis but we take it for granted and forget to thank him. An expression of gratitude for the favours received is an important thing in our life



मनन-चिंतन - 2


आज के सुसमाचार में हम दस कोढ़ियों की चंगाई की घटना पाते हैं। वे प्रभु येसु से उनके भयानक रोग से निजात दिलाने का अनुरोध करते हैं। उनमें से केवल एक जब उसने पाया कि उसे चंगाई प्राप्त हुयी है, प्रभु येसु को धन्यवाद देने के लिए वापस आया। उन्होंने प्रभु को हृदय से धन्यवाद दिया। बाइबिल कहती है, "वह ईसा को धन्यवाद देते हुए उनके चरणों पर मुँह के बल गिर पड़ा"। इस सामरी कोढ़ी को पता चला कि येसु न केवल उसकी शारीरिक बीमारी को दूर कर सकते हैं, बल्कि वे उसे मुक्ति दिलाने में भी सक्षम हैं। उसने येसु के व्यक्तित्व को मात्र उपचार से अधिक महत्व दिया। कभी-कभी हम येसु को कुछ चंगाई, एक नौकरी, एक बच्चे, कुछ आर्थिक लाभ आदि के लिए संपर्क करते हैं। हमारी सूची में पाप-क्षमा, पवित्रता, अनन्त मुक्ति आदि नहीं है। आज पाठ से दो शिक्षा हम पा सकते हैं - पहला, हमें हर एक अनुग्रह के लिए ईश्वर का आभारी होना चाहिए; दूसरा, हमें सांसारिक लाभ की तुलना में श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपहार प्राप्त करने की आकांक्षा करनी होगी। तभी हम प्रभु से सुनने के लिए भाग्यशाली होंगे - "आपके विश्वास ने आपका उध्दार किया है"। सभी उपहारों में सबसे बड़ा स्वयं येसु ही है।



REFLECTION



In today’s gospel we have the incident of ten lepers requesting Jesus for cleansing from their dreaded disease. Only one among them finding that he received what he requested Jesus for, and came back to thank him. He profusely thanked the Lord. The Bible says, “He prostrated himself at Jesus’ feet and thanked him”. This Samaritan leper who came back realised that Jesus offered not only mere healing from his physical illness, but was able to give him eternal salvation. He valued the person of Jesus more than mere healing. Sometimes we approach Jesus for a healing, a job, a child, some economic gain etc. We do not have forgiveness of sin, holiness, eternal salvation etc. in our list. Two things we can take home from today’s readings – first, we have to be grateful to God for every single grace we receive; second, we have to aspire to receive superior spiritual gifts than earthly gains. Only then shall we be fortunate to hear from the Lord – “your faith has made you well”. The greatest of all gifts is Jesus himself.


 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 09 नवंबर, 2021

 

मंगलवार, 09 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

लातरेन महामन्दिर का प्रतिष्ठान - पर्व

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पहला पाठ: एज़ेकिएल का ग्रन्थ 47:1-2,8-9,12


1) वह मुझे मंदिर के द्वार पर वापस ले आया। वहाँ मैंने देखा कि मन्दिर की देहली के नीचे से पूर्व की ओर जल निकल कर बह रहा है, क्योंकि मन्दिर का मुख पूर्व की ओर था। जल वेदी के दक्षिण में मन्दिर के दक्षिण पाश्र्व के नीचे से बह रहा था।

2) वह मुझे उत्तरी फाटक से बाहर-बाहर घुमा कर पूर्व के बाह्य फाटक तक ले गया। वहाँ मैंने देखा कि जल दक्षिण पाश्र्व से टपक रहा है।

8) उसने मुझ से कहा, ’’यह जल पूर्व की ओर बह कर अराबा घाटी तक पहुँचता और समुद्र में गिरता है। यह उस समुद्र के खारे पानी को मीठा बना देता है।

9) यह नदी जहाँ कहीं गुज़रती है, वहाँ पृथ्वी पर विचरने वाले प्राणियों को जीवन प्रदान करती है। वहाँ बहुत-सी मछलिया पाय जायेंगी, क्योंकि वह धारा समुद्र का पानी मीठा कर देती है। और जहाँ कहीं भी पहुचती है, जीवन प्रदान करती है।

12) नदी के दोनों तटों पर हर प्रकार के फलदार पेड़े उगेंगे- उनके पत्ते नहीं मुरझायेंगें और उन पर कभी फलों की कमी नहीं होगी। वे हर महीने नये फल उत्पन्न करेंगे; क्योंकि उनका जल मंदिर से आता है। उनके फल भोजन और उनके पत्ते दवा के काम आयेंगे।



सुसमाचार : सन्त योहन 2:13-22



13) यहूदियों का पास्का पर्व निकट आने पर ईसा येरुसालेम गये।

14) उन्होंने मन्दिर में बैल, भेड़ें और कबूतर बेचने वालों को तथा अपनी मेंज़ों के सामने बैठे हुए सराफों को देखा।

15) उन्होंने रस्सियों का कोड़ा बना कर भेड़ों और बेलों-सहित सब को मन्दिर से बाहर निकाल दिया, सराफों के सिक्के छितरा दिये, उनकी मेजे़ं उलट दीं

16) और कबूतर बेचने वालों से कहा, ‘‘यह सब यहाँ से हटा ले जाओ। मेरे पिता के घर को बाजार मत बनाओ।’’

17) उनके शिष्यों को धर्मग्रन्थ का यह कथन याद आया- तेरे घर का उत्साह मुझे खा जायेगा।

18) यहूदियों ने ईसा से कहा, ‘‘आप हमें कौन-सा चमत्कार दिखा सकते हैं, जिससे हम यह जानें कि आप को ऐसा करने का अधिकार है?’’

19) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘इस मन्दिर को ढा दो और मैं इसे तीन दिनों के अन्दर फिर खड़ा कर दूँगा’’।

20) इस पर यहूदियों ने कहा, ‘‘इस मंदिर के निर्माण में छियालीस वर्ष लगे, और आप इसे तीन दिनों के अन्दर खड़ा कर देंगे?’’

21) ईसा तो अपने शरीर के मन्दिर के विषय में कह रहे थे।

22) जब वह मृतकों में से जी उठे, तो उनके शिष्यों को याद आया कि उन्होंने यह कहा था; इसलिए उन्होंने धर्मग्रन्ध और ईसा के इस कथन पर विश्वास किया।



मनन-चिंतन


आज हम संत योहन लातरेन महामन्दिर केे बेसिलिका का प्रतिष्ठांन का पर्व मनाते हैं। लातरेन बेसिलिका सभी ईसाई गिरजाघरों मातृ-गिरजाघर है, जिसे रोमन सम्राट कॉन्सटेंटाइन द्वारा चौथी शताब्दी में बनाया गया था। मूल इमारत भूकंप से नष्ट हो गई थी और इसके दो निम्नलिखित प्रतिस्थापन आग से नष्ट हो गए थे। वर्तमान इमारत 14वीं शताब्दी की है।

ऊँचा खड़ा लातरेन बेसिलिका हमें आशा का एक पाठ सिखाता है कि जो कुछ भी ईश्वर बचाना या रखना चाहता है वह उसकी योजना के अनुसार बचा रहेगा।

आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि एजिकिएल ने मंदिर को ईश्वर की आत्मा के स्रोत के रूप में देखा, जो एक शक्तिशाली नदी की तरह बह रहा था ताकि सभी को जीवन मिल सके। द्वितीय वेटिकन परिषद के अनुसार, येसु हमारे ईसाई धर्म का स्रोत और शिखर है। ईश्वर के वचन और येसु के अनमोल शरीर और रक्त से पोषित होने के बाद, ईश्वर का आत्मा हमारे द्वारा इस घायल संसार में प्रवाहित होना चाहिए।

बहुत अधिक गतिविधि और कम प्रार्थना के साथ लोगों ने मंदिर को सार्वजनिक बाजार में बदल दिया। प्रभु इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने मेजों को उलट दिया, और सराफों के उन सभी सिक्कों को छितरा दिये जो उन पर थे। उन्होनें उन्हें बाहर फेंक दिया और उनसे कहा, ‘‘मेरा घर प्रार्थना का घर कहलायेगा, परन्तु तुम लोग उसे लुटेंरों का अड्डा बनाते हो।’’ (मत्ती 21ः13;)

हम कैथोलिक विश्वासियों के लिए गिरजाघर को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है। यह सिर्फ एक इमारत नहीं है । यह एक ऐसा स्थान है जहां हम अपने सुख-दुख को पवित्र यूख्र्र्रीस्त के सामने प्रस्तुत करते हैं, यूख्र्र्रीस्त में प्रभु से मिलते हैं, क्षमा और दया प्राप्त करते हैं और संस्कारों के माध्यम से अपने विश्वास को मजबूत करते हैं। गिरजाधर में ही हमारे ईसाई जीवन के सभी सबसे महत्वपूर्ण चरण सम्पन्न होते हैं; हमारे बपतिस्मा से शुरू होकर हमारे जीवन के अंत में हमारे अंतिम संस्कार के साथ समाप्त होते हैं। आइए हम अपने गिरजाघरों का सम्मान करना और उनकी देखभाल करना सीखें।




REFLECTION



Today we celebrate the dedication of the Basilica of Saint John Lateran. Lateran Basilica is the mother church of all Christian churches, built in the fourth century by the Roman Emperor Constantine. The original building was destroyed by an earthquake and its two following replacements were destroyed by fire. The present building dates back to 14th century. The tall standing Lateran Basilica teaches us a lesson of hope that whatever God wants to endure will endure according to His plan.

Today’s first reading we see that Ezekiel perceived the temple as the source of God’s Spirit flowing like a mighty river to bring life to all that it touched. According to second Vatican Council, Jesus is the source and the summit of our Christian faith. Having nourished by God’s Word and the precious Body and Blood of Jesus, the Spirit of God should flow out from us into this wounded world.

With much activity and little prayer people turned temple into a public market. The Lord was so furious that he overturned the tables, spilling all of the moneychangers’ coins that were on them. He threw them out and said to them, “my house is a house of prayer but you have made it into a den of thieves.” (Mt 21:13)

For us Catholics the church has an important role to play. It is not just a building; it is a place where we present our joys and sorrows before the Blessed Sacrament, encounter the Lord in the Eucharist, receive pardon and mercy and strengthen our faith through the sacraments. It is in the church all the most important stages in our Christian life take place, beginning with our Baptism and ending with our funeral at the end of our lives. Let us learn to respect and take care of our churches.



मनन-चिंतन - 2



आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु येरूसालेम के मन्दिर में बैल, भेड़ें और कबूतर बेचने वालों को तथा अपनी मेंज़ों के सामने बैठे हुए सराफों को देखा। उन्होंने रस्सियों का कोड़ा बना कर भेड़ों और बेलों-सहित सब को मन्दिर से बाहर निकाल दिया, सराफों के सिक्के छितरा दिये, उनकी मेजे़ं उलट दीं और कबूतर बेचने वालों से कहा, “यह सब यहाँ से हटा ले जाओ। मेरे पिता के घर को बाजार मत बनाओ।” पवित्र बाइबिल में मन्दिर के चार अर्थ हैं।

1. येरूसालेम का मन्दिर

2. येसु ख्रीस्त का मानवीय शरीर

3. कलीसिया यानि विश्वासियों का समुदाय

4. मनुष्य का शरीर

आज का सुसमाचार येरूसालेम के मंदिर की पवित्रता के बारे में प्रभु येसु की चिंता को दर्शाता है। प्रभु येसु पापविहीन और पवित्र हैं। वे इस्राएल के परमपावन हैं। वे पवित्रता का स्रोत हैं। कलीसिया जो शिष्यों का समुदाय है - उसे सभी पापों और बुरी प्रथाओं से बचकर अपनी पवित्रता बनाए रखना चाहिए। हमें अपने शरीर को शुद्ध और पवित्र रखने की भी आवश्यकता है। संत पौलुस कहते हैं, “क्या आप लोग यह नहीं जानते कि आपका शरीर पवित्र आत्मा का मन्दिर है? वह आप में निवास करता है और आप को ईश्वर से प्राप्त हुआ है। आपका अपने पर अधिकार नहीं है; क्योंकि आप लोग कीमत पर खरीदे गये हैं। इसलिए आप लोग अपने शरीर में ईश्वर की महिमा प्रकट करें।” (1कुरिन्थियों 6: 19-20) लेवि 20:26 में हम पढ़ते हैं,“ मेरे लिये पवित्र बनो, क्योंकि मैं प्रभु पवित्र हूँ। मैंने तुम लोगों को अन्य राष्ट्रों से अपने लिये अलग कर लिया है”।



REFLECTION



In today’s Gospel we find Jesus entering the temple of Jerusalem, making a whip and chasing away those who were doing various types of business. He warned them, “Stop making my Father’s house a marketplace!” In the Bible we find the word ‘temple’ being used with four meanings.

1. Jerusalem Temple

2. The human body of Jesus

3. Church, the community of disciples

4. Our Human body

The Gospel passage shows the concern of Jesus about the sanctity of the Temple of Jerusalem. Jesus was sinless and impeccable. He is the Holy One of Israel. He is the source of holiness. The church which is the community of disciples needs to keep its sanctity by avoiding all sins and evil practices. We also need to keep our body pure and holy. St. Paul says, “do you not know that your body is a temple of the Holy Spirit within you, which you have from God, and that you are not your own? For you were bought with a price; therefore glorify God in your body.” (1Cor 6:19-20) In Lev 20:26, we read, “You shall be holy to me; for I the Lord am holy, and I have separated you from the other peoples to be mine”.


 -Br Biniush Topno


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सोमवार, 08 नवंबर, 2021

 

सोमवार, 08 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: प्रज्ञा-ग्रन्थ 1:1-7


1) पृथ्वी के शासको! न्याय से प्रेम रखो। प्रभु के विषय में ऊँचे विचार रखो और निष्कपट हृदय से उसे खोजते रहो;

2) क्योंकि जो उसकी परीक्षा नहीं लेते, वे उसे प्राप्त करते हैं। प्रभु अपने को उन लोगों पर प्रकट करता है, जो उस पर अविश्वास नहीं करते।

3) कुटिल विचार मनुष्य को ईश्वर से दूर करते हैं। सर्वशक्तिमत्ता उन मूर्खों को पराजित करती है, तो उसकी परीक्षा लेते हैं।

4) प्रज्ञा उस आत्मा में प्रवेश नहीं करती, जो बुराई की बातें सोचती है और उस शरीर में निवास नहीं करती, जो पाप के अधीन है;

5) क्योंकि शिक्षा प्रदान करने वाला पवत्रि आत्मा छल-कपट से घृणा करता है। वह मूर्खतापूर्ण विचारों को तुच्छ समझता और अन्याय से अलग रहता है।

6) प्रज्ञा मनुष्य का हित तो चाहती है, किन्तु वह ईषनिन्दक को उसके शब्दों का दण्ड दिये बिना नहीं छोड़ेगी; क्योंकि ईश्वर मनुष्य के अन्तरतम का साक्षी है। वह उसके हृदय की थाह लेता और उसके मुख के सभी शब्द सुनता है।

7) प्रभु का आत्मा संसार में व्याप्त है। वह सब कुछ को एकता में बाँधे रखता है और मनुष्य जो कुछ कहते हैं, वह सब जानता है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 17:1-6


1) ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ‘‘प्रलोभन अनिवार्य है, किन्तु धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है!

2) उन नन्हों में एक के लिए भी पाप का कारण बनने की अपेक्षा उस मनुष्य के लिए अच्छा यही होता कि उसके गले में चक्की का पाटा बाँधा जाता और वह समुद्र में फेंक दिया जाता।

3) इसलिए सावधान रहो। ‘‘यदि तुम्हारा भाई कोई अपराध करता है, तो उसे डाँटो और यदि वह पश्चात्ताप करता है, तो उसे क्षमा कर दो।

4) यदि वह दिन में सात बार तुम्हारे विरुद्ध अपराध करता और सात बार आ कर कहता है कि मुझे खेद है, तो तुम उसे क्षमा करते जाओ।’’

5) प्रेरितों ने प्रभु से कहा, ‘‘हमारा विश्वास बढ़ाइए’’।

6) प्रभु ने उत्तर दिया, ‘‘यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी होता और तुम शहतूत के इस पेड़ से कहते, ‘उखड़ कर समुद्र में लग जा’, तो वह तुम्हारी बात मान लेता।


मनन-चिंतन


आज का सुसमाचार कमजोर विश्वास वाले लोगों के प्रति दो दृष्टिकोणों की बात करता है।

1. प्रभाव द्वारा गुमराह करना।

2. अनुकंपा भरा रवैया।

प्रभाव द्वारा गुमराह करनाः समाज में एक नेता होना हमेशा एक सम्मान और साथ ही एक व्यक्ति के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। नेता को हमेशा अपने सभी शब्दों और कार्यों में एक आदर्श के रूप में देखा जाता है। 2 मक्कबियों के किताब 6ः24-28 में हम एलीआजर में एक महान नेता को देखते हैं। अपने कुछ साथियों द्वारा सूअर का मांस न खाने के विकल्प को देखते हुए और यह महसूस करते हुए कि यह युवाओं को गुमराह कर सकता है, उन्होंने यह कहते हुए उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया कि ‘‘मेरे ढोंग के माध्यम से एक संक्षिप्त क्षण जीने के लिए, वे (युवा) भटक जाएंगे और उस दौरान मैं अपने बुढ़ापे को अपवित्र और अपमानित करता हूं।’’ उन्हें डर था कि हालांकि उनका कार्य सही था, यह युवा पीढ़ी को गुमराह कर सकता है। वह वास्तव में एक महान नेता थे।

कमजोर विश्वास के लोग अपने नेताओं और समाज के सम्मानित लोगों के प्रभाव में बहुत आसानी से पड़ सकते हैं। येसु कहते हैं कि वह प्रभाव मत बनो जो दूसरों को पाप करने के लिए प्रेरित करता है।

छोटों के प्रति करूणामयी मनोवृत्तिः कमजोर विश्वास वाले लोगों के प्रति असीम करुणा का भाव होना चाहिए। कठोरता तो लोगों को ईश्वर से दूर ही करेगी। इस पृथ्वी पर अपने मिशन कार्य के दौरान येसु ने स्वयं इसके लिए एक उदाहरण रखा। उसने व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री पर, जकेयुस पर, कर लेने वाले मत्ती इत्यादि पर दया दिखाई। येसु कहते हैं कि पापी के पश्चाताप को बिना अभिलेख रखे महत्व दिया जाना चाहिए। करुणा और क्षमा को सच्चे शिष्य की पहचान के रूप में दिखाया गया है।

हम जो मसीह के अनुयायी हैं, हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम कमजोरों को अपने शब्दों और कार्यों के माध्यम से गुमराह न करें और साथ ही साथ यह जिम्मेदारी भी बनती है हि हम करुणा और क्षमा के माध्यम से उन्हें मसीह के लिए वापस जीते।



REFLECTION


Today’s gospel speaks of two attitudes towards people of feeble faith.

1. Misleading through influence.

2. Compassionate attitude.

Misleading through influence: To be a leader in the society is always an honour and at the same time a great responsibility for a person. The leader is always looked up as an ideal in all his words and deeds. In the book of 2Macc. 6: 24-28 we see a great leader in Eleazar. Given the option of not eating the pork by some of his companions and sensing that it could mislead the young he rejected their offer saying “through my pretense for the sake of living a brief moment longer, they (young) would be led astray because of me while I defile and disgrace my old age” He was afraid that though his action was right, it could mislead the younger generation. He was truly a great leader.

People of shallow faith can very easily fall into the influence of their leaders and respectable people of the society. Jesus says not to become that influence that force which tempts others to sin.

Compassionate attitude to the little ones: Limitless compassion should be the attitude towards the people of shallow faith. Rigidity will only distance the people from God. Jesus himself set an example for this during his ministry on this earth. He showed compassion to the woman caught in adultery, to Zacchaeus, to Mathew the tax collector, so on and so forth. He showed that the repentance of the sinner should be valued without keeping a record. Compassion and forgiveness are shown as the identity of a true disciple.

We who are the followers of Christ have the responsibility not to mislead the weaker ones through our words and actions and at the same time a responsibility to win them back for Christ through compassion and forgiveness



मनन-चिंतन - 2


पाप संक्रामक है। पाप करने के बाद, हेवा ने अपने पति को भी पाप करने के लिए प्रेरित किया। राजा सुलेमान की गैरयहूदी पत्नियों ने उसे अन्य देवी-देवताओं की वेदियों पर बलिदान चढ़ाने के लिए प्रभावित किया। प्रभु येसु हमें दूसरों को प्रलोभन न देने की चेतावनी देता है। वे बहुत ही कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, “प्रलोभन अनिवार्य है, किन्तु धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है! उन नन्हों में एक के लिए भी पाप का कारण बनने की अपेक्षा उस मनुष्य के लिए अच्छा यही होता कि उसके गले में चक्की का पाटा बाँधा जाता और वह समुद्र में फेंक दिया जाता।” (लूकस 17:1-2) हम सभी से प्रभु उम्मीद रखते हैं कि हम न केवल पवित्र जीवन जीयें बल्कि दूसरों को भी पवित्रता की राह में अग्रसर होने के लिए प्रभावित करें। प्रभु चाहते हैं कि हम एक-दूसरे को सुधारें और एक-दूसरे को क्षमा करें। संक्षेप में, ख्रीस्तीय विश्वासियों को समाज पर अच्छा प्रभाव डालने के लिए कहा जाता है। हमें अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए काम करते रहना है। 'संसार की ज्योति’, 'आटा में खमीर' और 'पृथ्वी का नमक' इन सभी के द्वारा भी यही मांग की जाती है। समाज पर हम सकारात्मक प्रभाव डालें।



REFLECTION



Sin is contagious. After coming sin, Eve shared sin with her husband. King Solomon’s pagan wives influenced him to offer sacrifices at pagan altars. Jesus warns us about tempting others. He uses very strong words, “Occasions for stumbling are bound to come, but woe to anyone by whom they come! It would be better for you if a millstone were hung around your neck and you were thrown into the sea than for you to cause one of these little ones to stumble.” (Lk 17:1-2) All of us are expected not only to live a holy life but also influence others to live a holy life. The Lord wants us to correct each other and forgive each other. In short, Christians are called to be good influence on the society. We are to work to make our society better. This is what is demanded by the images of ‘the light of the world’, ‘leaven in the dough’ and ‘salt of the earth’. Be a positive influence on the society


 -Br Biniush Topno


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