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बुधवार, 20 अक्टूबर, 2021

 

बुधवार, 20 अक्टूबर, 2021

वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 6:12- 18


12) अब आप लोग अपने मरणशील शरीर में पाप का राज्य स्वीकार नहीं करें और उनकी वासनाओं के अधीन नहीं रहें।

13) आप अपने अंगों को अधर्म के साधन बनने के लिए पाप को अर्पित नहीं करें। आप अपने को मृतकों में से पुनर्जीवित समझकर ईश्वर के प्रति अर्पित करें और अपने अंगों को धार्मिकता के साधन बनने के लिए ईश्वर को सौंपदें।

14) आप लोगों पर पाप का कोई अधिकार नहीं रहेगा। अब आप संहिता के नहीं, बल्कि अनुग्रह के अधीन हैं।

15) तो क्या, हम इसलिए पाप करें कि हम संहिता के नहीं, बल्कि अनुग्रह के अधीन है? कभी नहीं!

16) क्या आप यह नहीं समझते कि आप अपने को आज्ञाकारी दास के रूप में जिसके प्रति अर्पित करते हैं और जिसकी आज्ञा का पालन करते हैं, आप उसी के दास बन जाते हैं? यह दासता चाहे पाप की हो, जिसका परिणाम मृत्यु है; चाहे ईश्वर की हो, जिसके आज्ञापालन का परिणाम धार्मिकता है।

17) ईश्वर को धन्यवाद कि आप लोग, जो पहले पाप के दास थे, अब सारे हृदय से उस शिक्षा के मार्ग पर चलने लगे, जो आप को प्रदान की गयी हैं।

18) आप पाप से मुक्त हो कर धार्मिकता के दास बन गये हैं।


सुसमाचार : सन्त लूकस 12:39-48


39) यह अच्छी तरह समझ लो-यदि घर के स्वामी को मालूम होता कि चोर किस घड़ी आयेगा, तो वह अपने घर में सेंध लगने नहीं देता।

40) तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी तुम उसके आने की नहीं सोचते, उसी घड़ी मानव पुत्र आयेगा।’’

41) पेत्रुस ने उन से कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह दृष्टान्त हमारे लिए कहते हैं या सबों के लिए?’’

42) प्रभु ने कहा, ’’कौन ऐसा ईमानदार और बुद्धिमान् कारिन्दा है, जिसे उसका स्वामी अपने नौकर-चाकरों पर नियुक्त करेगा ताकि वह समय पर उन्हें रसद बाँटा करे?

43) धन्य हैं वह सेवक, जिसका स्वामी आने पर उसे ऐसा करता हुआ पायेगा!

44) मैं तुम से यह कहता हूँ, वह उसे अपनी सारी सम्पत्ति पर नियुक्त करेगा।

45) परन्तु यदि वह सेवक अपने मन में कहे, ’मेरा स्वामी आने में देर करता है’ और वह दासदासियों को पीटने, खाने-पीने और नशेबाजी करने लगे,

46) तो उस सेवक का स्वामी ऐसे दिन आयेगा, जब वह उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा होगा और ऐसी घड़ी जिसे वह जान नहीं पायेगा। तब स्वामी उसे कोड़े लगवायेगा और विश्वासघातियों का दण्ड देगा।

47) ’’अपने स्वामी की इच्छा जान कर भी जिस सेवक ने कुछ तैयार नहीं किया और न उसकी इच्छा के अनुसार काम किया, वह बहुत मार खायेगा।

48) जिसने अनजाने ही मार खाने का काम किया, वह थोड़ी मार खायेगा। जिसे बहुत दिया गया है, उस से बहुत माँगा जायेगा और जिसे बहुत सौंपा गया है, उस से अधिक माँगा जायेगा।


📚 मनन-चिंतन


दृष्टांत चीजों को हल्के में लेने और शक्ति और विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने की किसी भी प्रवृत्ति के खिलाफ एक कड़ी चेतावनी की ओर इशारा करता है। दृष्टांत तीन विशिष्ट चीजों, क्षमता, जिम्मेदारी और जवाबदेही को इंगित करता है। ख्रीस्तीय धर्म एक जिम्मेदारी है। यह एक स्थिति नहीं बल्कि एक जीवित वास्तविकता है। हमें सभी बुराईयों के खिलाफ विश्वास में निरंतर और चौकस रहने की जरूरत है। कुछ बुराइयां स्पष्ट हैं लेकिन कुछ छिपी हुई हैं। इसलिए, जिस तरह एक चोर अप्रत्याशित रूप से अंधेरे में आता है, उसी तरह कुछ बुराईयां भी होती हैं जो हमारे जीवन में बिना ध्यान-आकर्षण के घर बना लेती हैं। ईसाई धर्म और उसके मूल्यों के लिए सभी खतरों को दूर करना हमारा नैतिक दायित्व है। ईसाई मूल्यों का क्षरण और आस्था का कमजोर होना असंरक्षित कार्य का परिणाम है।

हम सभी के पास समान क्षमता और जिम्मेदारी नहीं होती है। ईश्वर प्रत्येक को उनकी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारियां देता है और उसी तरह जवाबदेही की मांग करता है। दृष्टांत में एक नौकर को घर की देखभाल करने का काम सौंपा जाता है। यह जिम्मेदारी सभी को नहीं बल्कि किसी खास व्यक्ति को दी जाती है। ईश्वर के घर में लोगों की अलग-अलग भूमिकाएं और जिम्मेदारियां होती हैं।

अंत में, दृष्टांत जवाबदेही के लिए जोर डालता है। यह स्वतंत्रता के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी है। नौकर के पास दूसरों के साथ दुर्व्यवहार करके अपनी भूमिका का दुरुपयोग करने की शक्ति होती है। हालांकि, एक बात तय है कि उसे उसके सभी कार्यों का हिसाब देना होगा। प्रभु हमें याद दिला रहे हैं कि समय, अवसर, प्रतिभा और जिम्मेदारी को हल्के में न लें, बल्कि सावधान रहें और वह करें जो हमसे अपेक्षित है।


📚 REFLECTION



The parable points out a stern warning against any tendency to take things for granted and misuse power and privileges. The parable points out three specific things, ability, responsibility, and accountability. Christian faith is a responsibility. It is not a status but a living reality. We need to constantly and watchfully guard the faith against all evil. Some evils are obvious but some are hidden. Therefore, just as a thief comes unexpectedly in the dark so are some evil that creeps into our lives unnoticed. It is our moral obligation to ward off all dangers to the Christian faith and its values. The erosion of the Christian values and dilution of the faith is the result of the unguarded task.

All of us do not have the same ability and responsibility. God gives responsibilities to each according to their ability and in the same measure demands accountability. In the parable a servant is entrusted with the work of taking care of the household. This responsibility is not given to everyone but to a particular person. Therefore, in the house of God people have different roles and responsibilities.

Finally, the parable comes down to accountability. It’s a huge responsibility coupled with freedom. The servant has the power to misuse his role by ill-treating others. However, one thing is certain that he will have to give an account of all our actions. The Lord is reminding us not to take time, opportunities, talents, and responsibility for granted but rather be on guard and do what is expected of us.


मनन-चिंतन - 2


आम तौर पर कुछ गलत करना अपराध या पाप है। लेकिन बाइबल के अनुसार कुछ अच्छा नहीं करना भी पाप है। संत याकूब कहते हैं, "जो मनुष्य यह जानता है कि उसे क्या करना चाहिए, किन्तु नहीं करता, उसे पाप लगता है।" (याकूब 4:17)। प्रभु येसु के बारे में संत पेत्रुस का कहना है कि वे गाँव-गाँव और शहर-शहर घूम कर भलाई करते रहे (देखें प्रेरित-चरित 10:38)। बुराई करना पाप है। लेकिन ईश्वर का वचन कहता है कि भलाई नहीं करना भी पाप है। लूकस 16: 19-31 में अमीर आदमी का पाप यह था कि उसने लाज़रूस का भला नहीं किया। ईश्वर के राज्य में हानिरहित होना पर्याप्त नहीं है। हम इसे कैसे सही ठहरा सकते हैं? ’अच्छा नहीं करने वाला’ पापी कैसे हो सकता है? प्रभु के वचन के अनुसार, एक ईसाई की पहचान एक सेवक की है। एक सेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह स्वामी की सेवा करता रहे। यदि वह स्वामी की सेवा नहीं करता है, तो उसे दंडित किया जा सकता है या नौकरी से निकाल दिया जा सकता है। इस संदर्भ में कुछ भी नहीं करना पापपूर्ण है। एक अच्छा सेवक स्वामी के लिए सेवा के कार्य करता रहता है। हम भी हर संभव तरीके से हमारे प्रभु और स्वामी की सेवा करें। एक अच्छा नौकर स्वामी की प्रतीक्षा करता है, यहां तक कि उसके इशारों का भी इंतजार करता है जो सेवा की अपेक्षा का संकेत देते हैं। जब स्वामी खुले तौर पर उसे सेवा करने के लिए नहीं कहता है, तब भी उसे स्वामी की सेवा करने और उसे प्रसन्न करने के अवसरों को गँवाना नहीं चाहिए। हमें भी हमेशा प्रभु की सेवा करने और उन्हें प्रसन्न करने के अवसरों की तलाश करते रहना चाहिए।



SHORT REFLECTION


Normally doing something wrong is a crime or a sin. But in the Bible not doing something good is a sin. St. James says, “Anyone, then, who knows the right thing to do and fails to do it, commits sin” (Jam 4:17). About Jesus St. Peter says that he went about doing good (cf. Acts 10:38). Going about doing evil is sinful. But the Word of God goes further to say that not doing good is a sin. In Lk 16:19-31 the sin of the rich man was that he did not do good to Lazarus. Being harmless is not enough in the Kingdom of God. How can we justify this? How can ‘not doing good’ be sinful? According to the Word of God, the identity of a Christian is that of a servant. A servant is expected to keep serving the master. If he does not serve the master, then he can be punished or removed from his job. It is in this context that doing nothing is sinful. A good servant keeps on doing acts of service for the master. We too are expected to serve the master in every possible way. A good servant awaits the master, awaits even his gestures indicating an expectation of service. Even when the master does not openly asks him to serve, he finds opportunities to serve and please him. We too need to look for opportunities to serve and please the Lord always.


 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 19 अक्टूबर, 2021

 

मंगलवार, 19 अक्टूबर, 2021

वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 5:12, 15b, 17-19, 20b-21


12) एक ही मनुष्य द्वारा संसार में पाप का प्रवेश हुआ और पाप द्वारा मृत्यु का। इस प्रकार मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गयी, क्योंकि सब पापी है।

15) यह सच है कि एक ही मनुष्य के अपराध के कारण बहुत-से लोग मर गये; किंतु इस परिणाम से कहीं अधिक महान् है ईश्वर का अनुग्रह और वह वरदान, जो एक ही मनुष्य-ईसा मसीह-द्वारा सबों को मिला है।

17) यह सच है कि मृत्यु का राज्य एक मनुष्य के अपराध के फलस्वरूप-एक ही के द्वारा- प्रारंभ हुआ, किंतु जिन्हें ईश्वर की कृपा तथा पापमुक्ति का वरदान प्रचुर मात्रा मे मिलेगा, वे एक ही मनुष्य-ईसा मसीह-के द्वारा जीवन का राज्य प्राप्त करेंगे।

18) इस प्रकार हम देखते हैं कि जिस तरह एक ही मनुष्य के अपराध के फलस्वरूप सबों को दण्डाज्ञा मिली, उसी तरह एक ही मनुष्य के प्रायश्चित्त के फलस्वरूप सबों को पापमुक्ति और जीवन मिला।

19) जिस तरह एक ही मनुष्य के आज्ञाभंग के कारण सब पापी ठहराये गये, उसी तरह एक ही मनुष्य के आज्ञापालन के कारण सब पापमुकत ठहराये जायेंगे।

20) किंतु जहाँ पाप की वृद्धि हुई, वहाँ अनुग्रह की उस से कहीं अधिक वृद्धि हुई।

21) इस प्रकार पाप मृत्यु के माध्यम से राज्य करता रहा, किंतु हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा अनुग्र्रह, धार्मिकता के माध्यम से, अपना राज्य स्थापित करेगा और हमें अनन्त जीवन तक ले जायेगा।



सुसमाचार : सन्त लूकस 12:35-38



35) ’’तुम्हारी कमर कसी रहे और तुम्हारे दीपक जलते रहें।

36) तुम उन लोगों के सदृश बन जाओ, जो अपने स्वामी की राह देखते रहते हैं कि वह बारात से कब लौटेगा, ताकि जब स्वामी आ कर द्वार खटखटाये, तो वे तुरन्त ही उसके लिए द्वार खोल दें।

37) धन्य हैं वे सेवक, जिन्हें स्वामी आने पर जागता हुआ पायेगा! मैं तुम से यह कहता हूँः वह अपनी कमर कसेगा, उन्हें भोजन के लिए बैठायेगा और एक-एक को खाना परोसेगा।

38) और धन्य हैं वे सेवक, जिन्हें स्वामी रात के दूसरे या तीसरे पहर आने पर उसी प्रकार जागता हुआ पायेगा!



📚 मनन-चिंतन



तैयारी एक गुण है। यह एक बार की कार्यवाही नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है। यह किसी भी घटना के लिए तैयार रहने के लिए लगातार प्रयास करने की बात है। तैयार होने का अर्थ है तैयार रहना। लेकिन तैयार रहने के पीछे गहरा और महत्वपूर्ण सन्देश है। शादी की दावत के बाद घर लौटने वाले स्वामी के दृष्टांत में आश्चर्य का तत्व है। क्या वह पहरा देने के बजाय अपने सेवक को सोते हुए पाएगा?

इस दृष्टान्त में विश्वसनीयता और आलस्य के बारे दोहरे पाठ है। वफादारी किसी भी स्थायी और सार्थक रिश्ते की नींव होती है। अटूट प्रेम और निष्ठा के बंधन में प्रभु हमारे प्रति वफादार हैं। वादे का मतलब है, अपनी बात, वादे और प्रतिबद्धता को निभाना, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो। विश्वसनीयता एक ऐसी चीज है जो ईश्वर के साथ मजबूत संबंध बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और यह ऐसी चीज है जिसकी ईश्वर हमसे अपेक्षा करते है। रहस्यमय रूप से ईश्वर विश्वसनीय बनने के लिए अनुग्रह और शक्ति देते है। वह वफादारी का पुरस्कार भी देते है।

प्रभु हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम उन उपहारों और अनुग्रहों का सदुपयोग करें जो वह हमें देते हैं। जब स्वामी दूर होता है तो कर्तव्य को कल के लिए टालना प्रलोभन होता है लेकिन हम जानते हैं कि स्वामी हमसे आज करने की अपेक्षा करता है। हमें ईश्वर के प्रति वफादार रहना चाहिए और उसे अपने भण्डारीपन का हिसाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए।



📚 REFLECTION




Preparedness is a virtue. It is not a one-time action but a process. It is a matter of consistent efforts to be prepared for any eventuality. Being prepared means being ready for action. There is something deeper and even more important behind it. There is an element of surprise in the parable of the master returning home after the marriage feast. Would he find his servant sleeping rather than keeping watchful guard?

The parable has a twofold lesson about faithfulness and against sloth. Faithfulness is the foundation for any lasting and meaningful relationship. The Lord is faithful to us in a bond of unbreakable love and fidelity. That is what a promise means, keeping one's word, promise, and commitment no matter how tough or difficult it gets. Faithfulness is something that plays a pivotal role in building up a strong relationship with God and something that he expects of us. Mystically God gives the grace and strength to be faithful. He also rewards faithfulness.

The Lord expects us to make good use of the gifts and graces he gives to us. The temptation while the Master is away is to postpone for tomorrow what we know the Master expects us to do today. We must be faithful to God and ready to give him an account of our stewardship.



मनन-चिंतन - 2


प्रभु आज हमें जो संदेश देते हैं, वह यह है कि हमें उनसे मिलने के लिए हर समय तैयार रहना चाहिए। वास्तव में हम उनसे हर पल मिलते रहते हैं। वे केवल सर्वज्ञ नहीं है - हर जगह मौजूद है, वह हर समय भी मौजूद है। येसु कहते हैं, "याद रखो- मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ" (मत्ति 28:20)। वे लगातार हमारे साथ उपस्थित है। उनकी उपस्थिति निष्क्रिय नहीं है, लेकिन सक्रिय तथा गतिशील है। वे हम से हर समय उनको जवाब देने के लिए तैयार रहने की अपेक्षा करते हैं। य़ेसु चाहते हैं कि हम एक अच्छे सेवक की तरह हमेशा शुध्द अंतकरण तथा विनम्र हृदय से सतर्क और तैयार रहें।



SHORT REFLECTION

The message that the Lord gives us today is that we should be ready at all times to meet him. In fact we meet him at every moment. He is not only omniscient – present everywhere, he is also present at all times. Jesus says, “I am with you always, to the end of the age” (Mt 28:20). He is continually present with us. His presence is not a passive one, but a dynamic one demanding us to be ready to respond to him at all times. Jesus wants us to be ever alert and ready like a good servant with a humble heart and clean conscience.


 -Br Biniush Topno


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सोमवार, 18 अक्टूबर, 2021 वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह सन्त लूकस सुसमाचार लेखक : पर्व

 

सोमवार, 18 अक्टूबर, 2021

वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

सन्त लूकस सुसमाचार लेखक : पर्व

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पहला पाठ : तिमथी के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 4:10-17b


10) क्योंकि देमास इस संसार की ओर आकर्षित हो गया और वह मुझे छोड़ कर थेसलनीके चला गया है। क्रेसेन्स गलातिया चला गया और तीतुस, दलमातिया।

11) केवल लूकस मेरे साथ है। मारकुस को अपने साथ ले कर आओ, क्योंकि मुझे सेवाकार्य में उन से बहुत सहायता मिलती है।

12) मैंने तुखिकुस को एफ़ेसुस भेजा है।

13) आते समय लबादा, जिसे मैंने त्रोआस में कारपुस के यहाँ छोड़ दिया था, और पुस्तक, विशेष कर चर्मपत्र लेते आओ।

14) सिकन्दर सुनार ने मेरे साथ बहुत अन्याय किया। प्रभु उस को उसके कर्मों का फल देगा।

15) तुम भी उस से सावधान रहो, क्योंकि उसने हमारी शिक्षा का बहुत विरोध किया।

16) जब मुझे पहली बार कचहरी में अपनी सफाई देनी पड़ी, तो किसी ने मेरा साथ नहीं दिया -सब ने मुझे छोड़ दिया। आशा है, उन्हें इसका लेखा देना नहीं पड़ेगा।

17) परन्तु प्रभु ने मेरी सहायता की और मुझे बल प्रदान किया, जिससे मैं सुसमाचार का प्रचार कर सकूँ और सभी राष्ट्र उसे सुन सकें।



सुसमाचार : सन्त लूकस 10:1-9



1) इसके बाद प्रभु ने अन्य बहत्तर शिष्य नियुक्त किये और जिस-जिस नगर और गाँव में वे स्वयं जाने वाले थे, वहाँ दो-दो करके उन्हें अपने आगे भेजा।

2) उन्होंने उन से कहा, ’’फ़सल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं; इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।

3) जाओ, मैं तुम्हें भेडि़यों के बीच भेड़ों की तरह भेजता हूँ।

4) तुम न थैली, न झोली और न जूते ले जाओ और रास्तें में किसी को नमस्कार मत करो।

5) जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ’इस घर को शान्ति!’

6) यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।

7) उसी घर में ठहरे रहो और उनके पास जो हो, वही खाओ-पियो; क्योंकि मज़दूर को मज़दूरी का अधिकार है। घर पर घर बदलते न रहो।

8) जिस नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो जो कुछ तुम्हें परोसा जाये, वही खा लो।

9) वहाँ के रोगियों को चंगा करो और उन से कहो, ’ईश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ गया है’।


📚 मनन-चिंतन



लोगों की एक सामान्य प्रवृत्ति होती है कि वे यात्रा के दौरान होने वाली किसी भी घटना का सामना करने के लिए उन चीजों की एक सूची तैयार करते हैं जिन्हें उन्हें ले जाने की आवश्यकता होती है। जब येसु ने अपने शिष्यों को भेजा तो उन्होंने उन्हें निर्देश दिए कि उन्हें अपनी मिशन यात्रा में क्या करना चाहिए। उन्हें बीमारों को चंगा करके लोगों को प्रभु के लिए तैयार करना था, यह प्रचार करना था कि ईश्वर का राज्य निकट आ गया है, उन्हें शांति प्रदान करना, आदि। ऐसा करने से वे दुनिया के दुर्व्यवहार और हिंसा का सामना करेंगे। वे असुरक्षित हो जाएंगे लेकिन यह चिंता की बात नहीं है। प्रभु जिस बात को बताने की कोशिश कर रहे हैं वह यह है कि कार्य, संदेश और मिशन किसी भी अन्य तैयारी से अधिक महत्वपूर्ण हैं। उसके एकमात्र संसाधन येसु के द्रारा भेजा जाना है। ज्यादातर समय हम बड़ी चीजों की योजना बनाते हैं जिन्हे हम बहुत कम पूरा कर पाते हैं। हमें केवल येसु के प्रति एक स्पष्ट दृष्टि, ईश्वर द्रारा प्रद्त्त आंतरिक उपहार और विश्वास में खुले दिल के अलावा कोई संसाधन रखने की आवश्यकता नहीं है।



📚 REFLECTION



There is a general tendency for people to prepare a list of the things that they need to carry during the journey to cover any eventualities that may occur. However, the Lord Jesus sent out his disciples with the bare essential from that point of view. He gave them instructions so as to what they ought to be doing in their mission journeys. They were to prepare the people for the Lord by healing the sick, preaching that the kingdom of God has come near, giving them peace, etc. In doing so they would be exposed to abuse and violence of the world. They would be rendered vulnerable but it is not a thing to be worried about. The point the Lord is driving at home is that the work, the message, and the mission are more important than any other preparation. The only resource is being sent by him. Most of the time we plan big things which end up doing substantially very little. We need to carry no resources only a clear vision, unique interior gifts, and an open heart.



मनन-चिंतन - 2



प्रभु येसु ने अपने आगे उन गाँवों और शहरों में बहत्तर शिष्यों को दो-दो करके भेजा जहाँ वे स्वयं जाने वाले थे। भेजे जाने से पहले, उन्हें याद दिलाया जाता है कि फसल समृद्ध है, लेकिन मजदूर कम हैं। हम जानते हैं कि अगर समय पर फसल की कटाई नहीं की गई तो वह बर्बाद हो सकती है। प्रभु उम्मीद करते हैं कि वे बिना किसी समय या प्रयास को बर्बाद किए ईमानदारी से कठोर परिश्रम करें। इस प्रकार येसु ईश्वर के राज्य के संदेश को फैलाने के कार्य की तात्कालिकता पर जोर देते हैं। हमें ईमानदारी से कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है और बाकी येसु पर छोड़ दें जो उन लोगों से मिलने जाएंगे, जिनसे हम पहले ही मिल चुके हैं। हमारे प्रयासों में जो भी कमी है, वे उसे दूर करेंगे।

अनुदेशों में प्रभु येसु कहते हैं, “यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।”। ईश्वर के उपहार उन लोगों पर ठहरेंगे जो उनके योग्य हैं। बाइबल में हम ईश्वर के कई वादे पाते हैं लेकिन उन वादों से लाभ उठाने के लिए हमें उनके योग्य बनने की आवश्यकता है। एसाव ने पहलौठे के लिए प्रतिज्ञात कृपाओं के लिए खुद को योग्य साबित नहीं किया; लेकिन याकूब हर तरह से प्रभु की कृपा पाना चाहता था। वह प्रभु से कहता है, "जब तक तुम मुझे आशीर्वाद नहीं दोगे, तब तक मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा" (उत्पत्ति 32:27)। क्या मैं प्रभु के आशीर्वाद के योग्य बनने के लिए प्रयास करता हूँ?



SHORT REFLECTION



Jesus sent seventy-two disciples in pairs ahead of him to towns and villages he himself would be visiting. After their visit Jesus would visit those towns and villages. Before they are sent, they are reminded that the harvest is rich but the labourers are few. We are aware that if the harvest is not reaped in time, it can go waste. It follows that they are expected to work hard sincerely without wasting any time or effort. Thus Jesus insists on the urgency of the work of spreading the message of the Kingdom of God. We need to sincerely do our best and leave the rest to Jesus who would be visiting those whom we have already visited. We will supplement for whatever is lacking in our efforts.

In the instructions Jesus says, “If a man of peace lives there, your peace will go and rest on him; if not, it will come back to you”. The gifts of God will rest on people who are worthy of them. In the Bible we find many promises of God but in order to benefit from those promises we need to become worthy of them. Esau did not prove himself worthy to receive the gifts promised to the first-born; but Jacob wanted to get the gifts of God by all means. He says to the Lord, “I will not let you go, unless you bless me” (Gen 32:26). Do I make efforts to become worthy of the blessings of the Lord?


 -Br Biniush Topno


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इतवार, 17 अक्टूबर, 2021

 

इतवार, 17 अक्टूबर, 2021

वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 53:10-11


10) प्रभु ने चाहा कि वह दुःख से रौंदा जाये। उसने प्रायश्चित के रूप में अपना जीवन अर्पित किया; इसलिए उसका वंश बहुत दिनों तक बना रहेगा और उसके द्वारा प्रभु की इच्छा पूरी होगी।

11) उसे दुःखभोग के कारण ज्योति और पूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा। उसने दुःख सह कर जिन लोगों का अधर्म अपने ऊपर लिया था, वह उन्हें उनके पापों से मुक्त करेगा।


दूसरा पाठ: इब्रानियों के नाम पत्र 4:14-16.


14) हमारे अपने एक महान् प्रधानयाजक हैं, अर्थात् ईश्वर के पुत्र ईसा, जो आकाश पार कर चुके हैं। इसलिए हम अपने विश्वास में सुदृढ़ रहें।

15) हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है।

16) इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 10:35-45



35) ज़ेबेदी के पुत्र याकूब और योहन ईसा के पास आ कर बोले, ’’गुरुवर ! हमारी एक प्रार्थना है। आप उसे पूरा करें।’’

36) ईसा ने उत्तर दिया, ’’क्या चाहते हो? मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?’’

37) उन्होंने कहा, ’’अपने राज्य की महिमा में हम दोनों को अपने साथ बैठने दीजिए- एक को अपने दायें और एक को अपने बायें’’।

38) ईसा ने उन से कहा, ’’तुम नहीं जानते कि क्या माँग रहे हो। जो प्याला मुझे पीना है, क्या तुम उसे पी सकते हो और जो बपतिस्मा मुझे लेना है, क्या तुम उसे ले सकते हो?’’

39) उन्होंने उत्तर दिया, ’’हम यह कर सकते हैं’’। इस पर ईसा ने कहा, ’’जो प्याला मुझे पीना है, उसे तुम पियोगे और जो बपतिस्मा मुझे लेना है, उसे तुम लोगे;

40) किन्तु तुम्हें अपने दायें या बायें बैठने देने का अधिकार मेरा नहीं हैं। वे स्थान उन लोगों के लिए हैं, जिनके लिए वे तैयार किये गये हैं।’’

41) जब दस प्रेरितों को यह मालूम हुआ, तो वे याकूब और योहन पर क्रुद्ध हो गये।

42) ईसा ने उन्हें अपने पास बुला कर कहा, ’’तुम जानते हो कि जो संसार के अधिपति माने जाते हैं, वे अपनी प्रजा पर निरंकुश शासन करते हैं और सत्ताधारी लोगों पर अधिकार जताते हैं।

43) तुम में ऐसी बात नहीं होगी। जो तुम लोगों में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने

44) और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह सब का दास बने;

45) क्योंकि मानव पुत्र भी अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने और बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है।’’



📚 मनन-चिंतन



सिकंदर महान ने पूरी ज्ञात दुनिया को जीत लिया था। उसे पराक्रम और साहस अविश्वसनीय रूप से नैसर्गिक तौर पर प्राप्त थे। अपनी महत्वाकांक्षा के साथ, उसने आने वाली पीढ़ियों के लिए महानता का एक नया मानदंड स्थापित किया। वास्तव में कई मामलों में सिकंदर एक महान राजा और योद्धा था। हालांकि किसी को आश्चर्य हो सकता है कि उसने लोगों के कल्याण के लिए क्या अच्छा किया । उनके सैन्य कारनामों में हजारों सैनिक मारे गए और लाखों घायल हुए। उसने अपने शत्रुओं को बेरहमी से नष्ट किया और उनके राज्य को नष्ट कर दिया। युद्ध, हत्या, घायल और विनाश के माध्यम से उसने अपनी महानता स्थापित की।

किन्तु येसु हमारे सामने महानता के मार्ग पर चलने के लिए एक अनूठा मॉडल प्रस्तुत करते हैं। उनके मॉडल में, महान वह नहीं है जो वश में करता है बल्कि वह है जो दूसरे की सेवा में खुद को विनम्र करता है। जीवन के सभी मुकामों में दूसरों की सेवा करना किसी की महानता को परिभाषित करता है। अधिकांश संत सेवा और विनम्र्ता का जीवन व्यतीत करते थे। वे विजेता नहीं बल्कि सेवक थे। येसु के राज्य में, जो आज्ञा देता है वह महान नहीं है, परन्तु महान है जो आज्ञा का पालन करता है।



📚 REFLECTION



Alexander the Great conquered the whole known world. He had been incredibly gifted with velour and grit. With his ambition, he set a new benchmark of greatness for the generations to follow. Truly on many accounts, Alexander was a great king and warrior. However, one may wonder what good it had done for the common good of the people. His military exploits lefts thousands of soldiers dead and millions wounded. He destroyed his enemies ruthlessly and destroyed their kingdom. Through the ravages of war, killing, wounding, and destruction he established his greatness.

However, Jesus presents before us a unique model to follow the path of greatness. In his model, the great is not the one who subjugates but one who humbles himself at the service of the other. It is serving others at all the points of life that defines someone’s greatness. Most of the saints lived a life of servitude. They were not conquerors but servants. In Jesus' kingdom, the one who commands is not great but one who obeys.



मनन-चिंतन - 2


प्रभु येसु के पुनुरूत्थान के तुरंत बाद जिस मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ, वह है संत पौलुस। पौलुस जो कि एक ख्रीस्तीयों का कट्टर विरोधी था, ख्रीस्त का सबसे उत्तम साक्षी बना। न केवल उसके जीवन में परिवर्तन हुआ परन्तु पवित्र आत्मा की प्रेरणा द्वारा उन्होंने बहुतों को ख्रीस्तीय विश्वास में लाया तथा ख्रीस्त की अद्भुत और गूढ़ से गूढ़ शिक्षाएं दी। उनमें से एक शिक्षा है, “मैं जब दुर्बल हूँ तब बलवान हूँ” (कुरिन्थियों 12:10)। यह शिक्षा पूर्ण रूप से प्रभु येसु द्वारा प्रेरित है, जो कि आज के सुसमाचार से ज्ञात होता है। जो तुम लोगो में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह सब का दास बने।“ ऐसा कौन सा व्यक्ति कह सकता है कि जब मै दुर्बल हूँ तब बलवान हूँ, क्योंकि ये एक दूसरे के विपरीत हैं। यह वाक्य किसी दुर्बल व्यक्ति जैसे कि किसी अंधे, लंगडे, या किसी भी कारण से शारीरिक या मानसिक दुर्बल व्यक्ति से पूछा जाये तो वह यह वाक्य कभी भी स्वीकार नही करेगा। एक अंधा कैसे कह पायेगा कि मैं किसी दूसरे व्यक्ति को राह दिखा सकता हूँ, एक लंगडा कैसे कह पायेगा कि मैं दूसरो को सहारा दे सकता हूँ, एक गूँगा कैसे कह पायेगा कि मैं दूसरो को गीत गाना सिखा सकता हूँ। ये व्यक्ति अपनी इन अवस्थाओं में अपने ही बल के कारण ये काम नही कर सकते, परंतु ईश्वर इनकी उन्हीं अवस्थाओं में इनके द्वारा सबकुछ कर सकता है, “क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है”(लूकस 1:37)।

ईश्वर एक गूँगे के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को गीत लिखने या मनोबल खोए हुए व्यक्ति को गीत गाने की प्रेरणा दे सकता है, किसी अंधे व्यक्ति के द्वारा दूसरे को आध्यात्मिक रास्ता दिखा सकता है। जो व्यक्ति जितना ज्यादा लाचार होता है ईश्वर की महिमा उतने ही ज्यादा रूप में प्रकट होती है। उदाहरण के तौर पर लाजरुस का जिलाया जाना। प्रभु कहते हैं, “यह बीमारी मृत्यु के लिये नहीं, बल्कि ईश्वर की महिमा के लिये आयी है” (योहन 11:4)। बड़ी भीड़ को कुछ रोटी और मछलियों द्वारा तृप्त किया जाना, असंभव लगता है। जो असंभव लगता है उसे सर्वशक्तिमान ईश्वर संभव बनाता है।

इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है माँ मरियम। मरियम ने अद्भुत कार्य कर महानता हासिल नही की, परंतु ईश्वर ने मरियम के जीवन में अद्भुत कार्य कर मरियम को महान बनाया। “अब से सब पीढ़ियाँ मुझे धन्य कहेंगी; क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मेरे लिए महान् कार्य किये हैं” (लूकस 1:48-49)। हम कितना ही प्रयास एवं महान बनने के लिए बड़े से बड़े कार्य क्यों न कर लें, हम ईश्वर बिना कुछ नहीं कर सकते (योहन 15:5)। प्रभु निर्धन और धनी बना देता है, वह नीचा दिखाता और ऊँचा उठाता है” (1 समूएल 2:7)।

आज के सुसमाचार में हम याकूब और योहन को प्रभु से कुछ माँगते हुए पाते हैं। वे येसु के राज्य की महिमा में उनके दायें और उनके बायें बैठना चाहते थे। किसी भी राज्य में राजा के दायें और बायें कौन बैठता है? वही जो राजा के खास होते हैं जो उनके दायें और बायें बैठने के लायक होते हैं। राजा के दायें और बायें बैठना एक गर्व और महानता की बात होती है। अक्सर लोग उस गौरवमय स्थान को ही देखते हैं परन्तु उस स्थान में बैठने लायक बनने के लिए उन सभी जरूरी गुणों को भूल जाते हैं।

प्रभु येसु शिष्यों की इस बात को जानकर उन्हें महानता के विषय में एक महत्वपूर्ण शिक्षा देते हैं “जो तुम लोगों में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह सब का दास बने” (मारकुस 10:43-44)। अर्थात् हम सब बड़ा और प्रधान बनना चाहते हैं परंतु ईश्वर की दृष्टि में बड़ा और प्रधान हम इस संसार में सेवक और दास बनकर ही बन सकते हैं। एक सेवक और दास में ऐसी कौन सी विशेषतायें होती हैं जो उन्हें महान बनाती हैं? एक दास या सेवक खुद की मर्जी का मालिक नहीं होता, दूसरों के सामने नजर नहीं उठा सकता, बिना कुछ कहें सबके कार्य करता है, दर्द होने पर भी सबके जुल्म सहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरों का सेवक या सबका दास बनना अर्थात् दूसरों के मुकाबले सबसे दुर्बल व्यक्ति बनना है। इसे प्रभु येसु ने अपने जीवन में कर के दिखाया “वह वास्तव में ईश्वर थे और उन को पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें, फिर भी उन्होनें दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया और उन्होंने मनुष्य का रूप धारण करने के बाद मरण तक, हाँ क्रूस पर मरण तक, आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन बना लिया। इसलिए ईश्वर ने उन्हें महान् बनाया और उन को वह नाम प्रदान किया, जो सब नामो में श्रेष्ठ है।” (फिलि 2:6-9)

संत मत्ती के सुसमाचार द्वारा प्रभु येसु इस बात को स्पष्ट कर देते है कि, “वे स्थान उन लोगों के लिए हैं, जिनके लिए मेरे पिता ने उन्हें तैयार किया है” (मत्ती 20:23)। अर्थात् दीन हीन बनना हमारा कार्य है और ईश्वर के राज्य में दाये और बाये बिठाना ईश्वर का कार्य है क्योंकि “वह दीन-हीन को धूल से निकालता और कूड़े पर बैठे कंगाल को ऊपर उठा कर उसे रईसों की संगति में पहँचाता और सम्पन्न के आसन पर बैठाता है; क्योंकि पृथ्वी के खम्भे प्रभु के हैं, उसने उन पर जगत् को रखा है।” (1 समूएल 2:8)

एक सेवक की सबसे बडी निशानी या चिन्ह अन्यायपूर्ण दुखों को सहना है अर्थात् गलती न करने पर भी उसे गलती की सजा अगर मिलती है तो उसे धैर्यतापूर्वक सहना है या दूसरों की गलतियों की सजा बिना कुड़कुड़ाए भोगना चाहिए। जो इस प्रकार का दुख सहता है और अपना कर्तव्य पूरा करता है, वह आकाश के तारे की तरह चमकता हैं, “आप लोग भुनभुनाये और बहस किये बिना अपने सब कर्तव्य पूरा करें, जिससे आप निष्कपट और निर्दोष बने रहें और इस कुटिल एवं पथभ्रष्ट पीढ़ी में ईश्वर की सच्ची सन्तान बन कर आकश के तारों की तरह चमकें”(फिलि. 2:14-15) जिस प्रकार प्रभु येसु ने हमारे पापों की सजा को अपने ऊपर लेकर चुपचाप वो अत्याचार सहे। इसायह नबी अपने ग्रंथ में इसका वर्णन करते है, “हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया है। हमारे कुकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शांति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं ........ वह अपने पर किया हुआ अत्याचार धैर्य से सहता गया और चुप रहा। वध के लिए ले जाये जाने वाले मेमने की तरह और ऊन कतरने वाले के सामने चुप रहने वाली भेड़ की तरह उसने अपना मुँह नही खोला..... उसने कोई अन्याय नहीं किया था और उसके मुँह से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली थी,.....प्रभु ने चाहा कि वह दुख से रौंदा जाये। उसने प्रायश्चित के रूप में अपना जीवन अर्पित किया, इसलिए उसका वंश बहुत दिनों तक बना रहेगा और उसके द्वारा प्रभु की इच्छा पूरी होगी।” (इसायह 53:5,7,9,10)

प्रभु येसु एक सच्चा सेवक बनकर हमारे लिए मुक्ति का श्रोत बन गये हैं। हम भी प्रभु के समान सेवक बनें जो सेवा कराने नहीं परंतु सेवा करने आये थे। हम दुर्बल बनें जिससे हम ईश्वर के बल को हमारे जीवन में अनुभव कर सकें।


-Br Biniush Topno


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शनिवार, 16 अक्टूबर, 2021

 

शनिवार, 16 अक्टूबर, 2021

वर्ष का अट्ठाईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ :रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:13,16-18


13) ईश्वर ने इब्राहीम और उनके वंश से प्रतिज्ञा की कि वे पृथ्वी के उत्तराधिकारी होंगे। यह इसलिए नहीं हुआ कि इब्राहीम ने संहिता का पालन किया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने विश्वास किया और ईश्वर ने उन्हें धार्मिक माना है।

16) सब कुछ विश्वास पर और इसलिए कृपा पर भी, निर्भर रहता है। वह प्रतिज्ञा न केवल उन लोगों पर, जो संहिता का पालन करते हैं, बल्कि समस्त वंश पर लागू होती है- उन सबों पर, जो इब्राहीम की तरह विश्वास करते हैं।

17) इब्राहीम हम सबों के पिता हैं। जैसा कि लिखा है-मैंने तुम को बहुत-से राष्ट्रों का पिता नियुक्त किया है। ईश्वर की दृष्टि में इब्राहीम हमारे पिता हैं। उन्होंने उस ईश्वर में विश्वास किया, जो मृतकों को पुनर्जीवित करता है और जो नहीं है, उसे भी अस्तित्व में लाता है।

18) इब्राहीम ने निराशाजनक परिस्थिति में भी आशा रख कर विश्वास किया और वह बहुत-से राष्ट्रों के पिता बन गये, जैसा कि उन से कहा गया था- तुम्हारे असंख्य वंशज होंगे।


सुसमाचार : सन्त लूकस 12:8-12


8) ’’मैं तुम से कहता हूँ, जो मुझे मनुष्यों के सामने स्वीकार करेगा, उसे मानव पुत्र भी ईश्वर के दूतों के सामने स्वीकार करेगा।

9) परन्तु जो मुझे मनुष्यों के सामने अस्वीकार करेगा, वह ईश्वर के दूतों के सामने अस्वीकार किया जायेगा।

10) ’’जो मानव पुत्र के विरुद्ध कुछ कहेगा, उसे क्षमा मिल जायेगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा करने वाले को क्षमा नहीं मिलेगी।

11) ’’जब वे तुम्हें सभागृहों, न्यायाधीशों और शासकों के सामने खींच ले जायेंगे, तो यह चिन्ता न करो कि हम कैसे बोलेंगे और अपनी ओर से क्या कहेंगे;

12) क्योंकि उस घड़ी पवित्र आत्मा तुम्हें सिखायेगा कि तुम्हें क्या-क्या कहना चाहिए।’’


📚 मनन-चिंतन


इब्राहीम का ईश्वर में विश्वास और वह सब कुछ जो उसने अपनी विश्वास की यात्रा में किया था, ने दूसरों के ईश्वर के अनुसरण के लिए एक मील का पत्थर स्थापित किया। इब्राहीम के विश्वास की विशिष्टता ईश्वर की प्रतिज्ञाओं में उसका पूरा भरोसा है। वे विपरीत परिस्थितियों में भी वे डटे रहे। इब्राहीम ने सभी प्रतिज्ञाओं को अपनी शक्ति से नहीं बल्कि इस दृढ़ता से पूरा होते देखा कि जिसने उसे बुलाया है वह विश्वासयोग्य है और अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सक्षम है। यह एक सरल रुख था जिसने उन्हें विश्वास के गुण का चैंपियन बना दिया।

यह मायने नहीं रखता कि हम कितना करते हैं बल्कि यह मायने रखता है कि हम किस विश्वास में करते हैं। इब्राहीम के लिए, उसके सभी कार्य विश्वास से प्रेरित थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, लेकिन उन्हें राष्ट्रों का पिता कहा गया। वह निःसंतान था और उसकी पत्नी बांझ थी। लेकिन उसने अपनी परिस्थितियों से परे परमेश्वर की शक्ति की ओर देखा। उनके विश्वास ने उन्हें विषम परिस्थितियों में इसहाक नाम के एक बच्चे को जन्म दिया और उनकी संतान ने वास्तव में पृथ्वी को भर दिया।

हमें अपनी वर्तमान परिस्थितियों को देखने के बजाय अब्राहम के विश्वास का अनुकरण करने और ईश्वर की शक्ति पर भरोसा करने के लिए बुलाया गया है।


📚 REFLECTION


Abraham’s faith in God and all that he underwent in his journey of faith set a landmark for others to follow. The uniqueness of Abraham’s faith is his utter trust in God’s promises. Even in the wake of adverse situations, he remained firm. Abraham saw the fulfillment of all the promises not on his own powers but on the firmness that one who has called him is faithful and able to keep his promises. It was the simple stance that made him champion the virtue of faith. It is not how much we do but in what faith we do matters. For Abraham, all his actions were in the faith. He had no children but he was called to be the father of the nations. He was childless and his wife barren. But he looked beyond his circumstances to the might of God. His faith carried him to have a child named Isaac in the oddest circumstances and his progeny truly filled the earth. We are called to emulate the faith of Abraham and put our trust in God’s power rather than looking at our present circumstances.


मनन-चिंतन - 2


ईश्वर ने हमारी सृष्टि की। वे ही हमें बचाते हैं। फिर भी वे हमें हमारे उद्धार की प्रक्रिया में भागीदार बनाते हैं। प्रभु येसु ने अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान द्वारा हमारा उद्धार संभव बनाया। मोक्ष हमारे पास है। मुक्ति सुलभ है। इसे व्यक्तिगत रूप से प्राप्त करना हमारे लिए शेष है। हम इसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। चुनाव हमारा है - जीवन और मृत्यु, आशीर्वाद और अभिशाप, संकीर्ण द्वार और विस्तृत द्वार, स्वर्ग और नरक के बीच चयन करना। यदि हम येसु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं, तो हमें उनका उद्धार प्राप्त होगा। लेकिन अगर हम उन्हें अस्वीकार करते हैं, तो हम उनका उद्धार कैसे प्राप्त कर सकते हैं? लूकस 19: 1-10 में हम पढ़ते हैं कि ज़करियस ने कितनी उत्सुकता से उनसे मुक्ति पाई। मारकुस 10: 46-52 में हम देखते हैं कि कैसे येरीखो के रास्ते पर बैठे अंधे भिखारी बरतिमयुस ने बड़ी खुशी के साथ येसु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार किया, जिससे उसका उद्धार हुआ। जब पापीनी महिला (लूकस 7: 36-50) ने येसु को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार किया, तब उसके सभी पापों को माफ कर दिया गया और उसे मुक्ति प्राप्त हुयी। विश्वासियों के उत्पीड़नकर्ता साऊल (एलके 1: 1-19) ने मसीह की ओर अभिमुख हो कर उनका उद्धार प्राप्त किया। येसु के दोनों ओर दो ड़ाकुओं को क्रूस पर चढ़ाया गया था; उनमें से एक ने येसु और उनके उद्धार को स्वीकार किया और दूसरे ने उन्हें और उनके उद्धार को अस्वीकार किया।

अगर हम येसु, जो उद्धार के स्रोत है, को अस्वीकार करते हैं तो हम मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। येसु को स्वीकार करने में हमारी परिपक्वता हमारे विश्वास की खुली घोषणा में व्यक्त किया जाता है। शहीदों ने जीवन के लिए खतरे के सामने भी येसु पर अपना विश्वास घोषित किया। कई शुरुआती ईसाई भी कोलोसियम में येसु पर अपना विश्वास घोषित करने से नहीं चूके, जब उन्हें भूखे जंगली जानवरों के सामने फेंक दिया गया। अब चयन करने की हमारी बारी है!



SHORT REFLECTION


JIt is God who created us. It is he who saves us. Yet he makes us partners in the process of our salvation. Jesus by his death and resurrection opened for us the possibility of salvation. The salvation is brought near, at hand, accessible to us. It is left to us to receive it. We can accept it or reject it. The choice is ours – to choose between life and death, blessing and curse, the narrow gate and wide door, heaven and hell. If we accept Jesus as our Saviour, then we shall receive his salvation. But if we reject him, then how can we have his salvation? In Luke 19:1-10 we read about how eagerly Zacchaeus received salvation from him. In Mk 10:46-52 we see how the blind beggar Bartimeus sitting on the wayside in Jericho with great joy accepted Jesus as his Saviour and thereby received his salvation. The sinful woman (Lk 7:36-50) who accepted Jesus as Saviour was forgiven all her sins and she received salvation. We have Saul, the persecutor of the Churches, (Lk 1:1-19) who turned to Christ and received his salvation. We have two thieves crucified on either side of Jesus; one of them accepted Jesus and his salvation and the other rejected him and thereby rejected his salvation. But if we reject Jesus the source of salvation we cannot receive salvation. The maturity of our acceptance of Jesus is expressed in our courageous and open declaration of the same. Martyrs declared their faith in Jesus even in the face of danger to life. Many early Christians did not cease to declare their faith in Jesus even in Colosseum when they were thrown in front of hungry wild animals. The choice is now ours!


 -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 15 अक्टूबर, 2021

 

शुक्रवार, 15 अक्टूबर, 2021

वर्ष का अट्ठाईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ :रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:1-8


1) अब हम अपने कुलपति इब्राहीम के विषय में क्या कहें?

2) यदि इब्राहीम अपने कर्मों के कारण धार्मिक माने गये, तो वह अपने कर्मों के कारण धार्मिक माने गये, तो वह अपने पर गर्व कर सकते हैं। किन्तु वह ईश्वर के सामने ऐसा नहीं कर सकते;

3) क्योंकि धर्मग्रन्थ क्या कहता है? इब्राहीम ने ईश्वर में विश्वास किया और इसी से वह धार्मिक माने गये।

4) जो कर्म करता है, उसे मज़दूरी अनुग्रह के रूप में नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में मिलती है।

5) जो कर्म नहीं करता, किन्तु उस में विश्वास करता है, जो अधर्मी को धार्मिक बनाता है, तो वह अपने विश्वास के कारण धार्मिक माना जाता है।

6) इसी तरह दाऊद उस मनुष्य को धन्य कहते हैं, जिसे ईश्वर कर्मों के अभाव में भी धार्मिक मानता है-

7) धन्य हैं वे, जिनके अपराध क्षमा हुए हैं, जिनके पाप ढक दिये गये हैं!

8) धन्य है वह मनुष्य, जिसके पाप का लेखा प्रभु नहीं रखता!



सुसमाचार : सन्त लूकस 12:1-7



1) उस समय भीड़़ इतनी बढ़ गयी थी कि लोग एक दूसरे को कुचल रहे थे। ईसा मुख्य रूप से अपने शिष्यों से यह कहने लगे, ’’फ़रीसियों के कपटरूपी ख़मीर से सावधान रहो।

2) ऐसा कुछ भी गुप्त नहीं है, जो प्रकाश में नहीं लाया जायेगा और ऐसा कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, जो प्रकट नहीं किया जायेगा।

3) तुमने जो अँधेरे में कहा है, वह उजाले में सुना जायेगा और तुमने जो एकान्त में फुसफुसा कर कहा है, वह पुकार-पुकार कर दुहराया जायेगा।

4) ’’मैं तुम, अपने मित्रों से कहता हूँ-जो लोग शरीर को मार डालते हैं, परन्तु उसके बाद और कुछ नहीं कर सकते, उन से नहीं डरो।

5) मैं तुम्हें बताता हूँ कि किस से डरना चाहिए। उस से डरो, जिसका मारने के बाद नरक में डालने का अधिकार है। हाँ, मैं तुम से कहता हूँ, उसी से डरो।

6) ’’क्या दो पैसे में पाँच गोरैया नहीं बिकतीं? फिर भी ईश्वर उन में एक को भी नहीं भुलाता है।

7) हाँ, तुम्हारे सिर का बाल-बाल गिना हुआ है। इसलिए नहीं डरो। तुम बहुतेरी गौरैयों से बढ़ कर हो।



📚 मनन-चिंतन



लोगों द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक सामान्य नारा है 'जियो जैसे आप बात करते हो', जिसका अर्थ है कि हम जो उपदेश देते हैं उसका अभ्यास करते हैं, और जो हम मानते हैं उसे जीते हैं। पाखंड किसी के आध्यात्मिक जीवन के लिए कैंसर है। पूरे आटे को प्रभावित करने के लिए केवल थोड़ा सा खमीर लगता है। अच्छे इरादों को कमजोर करने के लिए केवल थोड़ा पाखंड लगता है।

हम जिस ढोंग में रहते हैं, उसके कारण ईश्वर के साथ हमारा पवित्र संबंध खराब हो गया है। लोगों के सामने हम अच्छे, पवित्र और प्रस्तुत करने योग्य बनने की कोशिश करते हैं लेकिन ईश्वर के सामने हम नंगे हैं। ईश्वर हमें हमेशा देखते है। वह हमारे सभी कार्यों पर नजर रखते है। हम कुछ समय के लिए अपने दोहरे स्वाभाव को छुपाने में सक्षम हो सकते हैं लेकिन लंबे समय में यह उजागर हो जाता है।

येसु पाखंड पर सख्त हैं, अक्सर उन लोगों पर कठोर होते हैं जो धर्म का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। वह इसकी तुलना उस खमीर से करते है, जो कम मात्रा में होते हुए भी स्वंय और दूसरों के जीवन को बहुत नुकसान पहुंचा सकता है। ईश्वर के सामने, सभी ढोंग अंततः उजागर हो जाते हैं। ईश्वर के लिये कुछ भी अनदेखा नहीं हैं। ईश्वर उनके साथ हमारे संबंधों की प्रामाणिकता की हमारी खोज में हमारा समर्थन करते है। येसु हमें ईमानदारी और अखंडता के लिए आमंत्रित करते हैं, हमें यह महसूस करने में मदद करते हैं कि उनकी उपस्थिति में ढोंग करने की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन पूरी तरह से हम जो हैं वह हो सकते हैं। बहुत बार हम अपने स्वयं के पाखंड से अवगत नहीं होते हैं, इसलिए हम प्रकाश और शुद्ध हृदय की कृपा मांगते हैं। धन्य हैं वे जो हृदय के शुद्ध हैं क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।



📚 REFLECTION




Walk it as you talk it' is a common slogan people use, with the meaning that we practice what we preach, and live what we believe. Hypocrisy is cancer to one’s spiritual life. It only takes a little yeast to affect an entire batch of dough. It only takes a little hypocrisy to undermine the best intentions.

Our sacred relationship with God is vandalized due to the pretense we live. Before people, we try to be good, pious, and presentable but before God, we are bare naked. God sees us always. He watches over all our actions. We may be able to hide our dual self for some time but in the long run, it is exposed.

Jesus is tough on hypocrisy, often hard on people who use religion for their own ends. He compares it to the yeast which, though small in quantity can wreak great damage to my life and that of others. Before God, all pretense is eventually uncovered. God misses nothing. Our relationship with God supports us in our search for authenticity. Jesus invites us to honesty and integrity, helping us to realize that there is no need to pretend in his presence but can be fully who we are. Very often we are not aware of our own hypocrisy, so we ask for the grace of light, and of a pure heart. Blessed are the pure of heart for they will see God.


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 14 अक्टूबर, 2021

 

गुरुवार, 14 अक्टूबर, 2021

वर्ष का अट्ठाईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ :रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:21-30a


21) ईश्वर का मुक्ति-विधान, जिसके विषय में मूसा की संहिता और नबियों ने साक्ष्य दिया था, अब संहिता के स्वतन्त्र रूप में प्रकट किया गया है।

22) यह मुक्ति ईसा मसीह में विश्वास करने से प्राप्त होती है। अब भेदभाव नहीं रहा। यह मुक्ति उन सबों के लिए है, जो विश्वास करते है;

23) क्योंकि सबों ने पाप किया और सब ईश्वर की महिमा से वंचित किये गये।

24) ईश्वर की कृपा से सबों को मुफ्त में पापमुक्ति का वरदान मिला है; क्योंकि ईसा मसीह ने सबों का उद्धार किया है।

25) ईश्वर ने चाहा कि ईसा अपना रक्त बहा कर पाप का प्रायश्चित्त करें और हम विश्वास द्वारा उसका फल प्राप्त करें। ईश्वर ने इस प्रकार अपनी न्यायप्रियता का प्रमाण दिया; क्योंकि उसने अपनी सहनशीलता के अनुरूप पिछले युगों के पापों को अनदेखा कर दिया था।

26) उसने युग में अपनी न्यायप्रियता का प्रमाण देना चाहा, जिससे यह स्पष्ट हो जाये कि वह स्वयं पवित्र है और उन सबों को पापमुक्त करता है, जो ईसा में विश्वास करते हैं।

27) इसलिए किसी को अपने पर गर्व करने का अधिकार नहीं रहा। किस विधान के कारण यह अधिकार जाता रहा? यह कर्मकाण्ड के विधान के कारण नहीं, बल्कि विश्वास के विधान के कारण हुआ।

28) क्योंकि हम मानते हैं कि मनुष्य संहिता के कर्मकाण्ड द्वारा नहीं, बल्कि विश्वास द्वारा पापमुक्त होता है।

29) क्या ईश्वर केवल यहूदियों का ईश्वर है? क्या वह गैर-यहूदियों का ईश्वर नहीं? वह निश्चय ही गैर-यहूदियों का भी ईश्वर है।

30) क्योंकि केवल एक ही ईश्वर है, जो खतने वालों को विश्वास द्वारा पापमुक्त करेगा और उसी विश्वास द्वारा बेखतने लोगों को भी।



सुसमाचार : सन्त लूकस 11:47-54



47) धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुम नबियों के लिए मक़बरे बनवाते हो, जब कि तुम्हारे पूर्वजों ने उनकी हत्या की।

48) इस प्रकार तुम अपने पूर्वजों के कर्मों की गवाही देते हो और उन से सहमत भी हो, क्योंकि उन्होंने तो उनकी हत्या की और तुम उनके मक़बरे बनवाते हो।

49) ’’इसलिए ईश्वर की प्रज्ञा ने यह कहा-मैं उनके पास नबियों और प्रेरितों को भेजूँगा; वे उन में कितनों की हत्या करेंगे और कितनो पर अत्याचार करेंगे।

50) इसलिए संसार के आरम्भ से जितने नबियों का रक्त बहाया गया है-हाबिल के रक्त से ले कर ज़करियस के रक्त तक, जो वेदी और मन्दिरगर्भ के बीच मारा गया था-

51) उसका हिसाब इस पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा। मैं तुम से कहता हूँ, उसका हिसाब इसी पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा।

52) ’’शास्त्रियों, धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुमने ज्ञान की कुंजी ले ली। तुमने स्वयं प्रवेश नहीं किया और जो प्रवेश करना चाहते थे, उन्हें रोका।’’

53) जब ईसा उस घर से निकले, तो शास्त्री, और फ़रीसी बुरी तरह उनके पीछे पड़ गये और बहुत-सी बातों के सम्बन्ध में उन को छेड़ने लगे।

54) वे इस ताक में थे कि ईसा के किसी-न-किसी कथन में दोष निकाल लें।



📚 मनन-चिंतन



नबी ईश्वर के मुखपत्र थे। उन्होंने वही बोला जो ईश्वर ने उन्हें दिखाया और उन्हें बोलने के लिए नियुक्त किया। उनकी भूमिका लोगों को उनके लिए ईश्वर की इच्छा के बारे में बताने की थी। उनके संदेश अक्सर लोगों को विशेष रूप से इस्राएल के शासक वर्ग को पसंद नहीं आते थे। भविष्यवक्ताओं ने लोगों के जीने के तरीके का खंडन किया और वे ईश्वर की वाणी बोलने में निडर और अजेय थे।

लोगों ने उन्हें चुप कराने का आसान तरीका ढूंढ निकाला। उन्हें मार डालना उनसे छुट्कारा पाने का सबसे आसान उपाय था । नबीओं को मारना इस्राएल के सबसे बड़े पापों में से एक था। नबियों को मारने या चुप कराने की उनकी कार्रवाई का इस्राएल के जीवन और इतिहास पर दूरगामी परिणाम हुआ। लोगों ने सच्चाई के अनुसार बदलने से इनकार कर दिया, इसलिए वे कभी नहीं सुधरे। वे अपने ही पापों और छल के जाल की ओर और अधिक गहराई में गिरते रहते हैं।

यह पतन की शुरुआत है जब हम सुनने और बदलने से इनकार करते हैं जिसे ईश्वर हमसे चाहते हैं। परिवर्तन कठिन है। यह साहस और पुष्टि की मांग करता है। और विश्वास हमें ये दोनों प्रदान करता है। यदि हम ईश्वर की वाणी पर ध्यान दें जो हमारे पास आती है तो हम स्वतः ही उसका अनुसरण करने और उसे पूरा करने का साहस पाएंगे। हम जितना अधिक साहस दिखाते हैं, उतनी ही अधिक पुष्टि हमारे पास आती है। इस तरह के परिवर्तन का परिणाम शक्तिशाली आशीर्वाद और व्यक्तित्व में पूर्ण परिवर्तन है।

इस्राएल ने नबीओं द्वारा बोले गए सत्य के प्रकाश में परिवर्तित होने के इस अवसर को गंवा दिया। ईश्वर की चुनी प्रजा ने ईश्वर के नबियों को मार डाला था, और येसु के समकालीनों ने उन पर उग्र हमला करके इसकी पुष्टि की और अंत में उन्हें भी मार डाला। हमारी पीढ़ी भी निर्दोष व्यक्तियों और लोगों के खिलाफ क्रूरता और उत्पीड़न के अकथनीय कृत्य करती है। हमें अपने चारों ओर अच्छाई और बुराई के बीच इस महान लड़ाई को देखने के लिए और अपने दिल में अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए कार्य करना चाहिए। हमें हमेशा अच्छाई, सच्चाई और न्याय के पक्ष में रहने का चुनाव करने में सक्षम होना चाहिए।




📚 REFLECTION




Prophets were the mouthpiece of God. They spoke what God showed them and commissioned them to speak. Their role was to let the people know God’s will for them. Their messages were very often not pleasing to people especially the ruling class of Israel. The prophets disprove the way people had been living and they were fearless and unstoppable in speaking God’s voice.

The people found an easy way to silence them. It was to kill them. It was one of Israel’s biggest sins to kill the prophets. Their action of killing or silencing the prophets had far-reaching consequences on the life and history of Israel. People refused to change in accordance with the truth therefore they never improved. They continue to fall into greater depth of their own web of sins and guile.

It is the beginning of fall when we refuse to listen and change that God demands from us. the change is difficult. It demands courage and confirmation. And faith provides us both. If we heed to the voice of God that comes to us we will automatically find the courage to follow it and fulfill it. the more courage we show the more confirmation comes to us. the result of such change is the mighty blessing and a complete transformation in the personality.

Israel missed this opportunity to be transformed in the light of the truth spoken by the prophets. The chosen people had killed God’s prophets, and the contemporaries of Jesus ratify this by attacking him furiously and finally kill him too. Our generation too commits unspeakable acts of cruelty and oppression against innocent persons and peoples. We must act to see this great battle between good and evil around us and in our own hearts to reach its logical conclusion. We should be able to choose to be always on the side of good, truth, and justice.


मनन-चिंतन - 2



प्रभु येसु शास्त्रियों से नाराज़ थे क्योंकि वे चरनी में कुत्ते की तरह थे। कुत्ता घास नहीं खाएगा; न ही वह अन्य जानवरों को उसे खाने देता। थॉमस के अप्रमाणिक सुसमाचार (Apocryphal Gospel of Thomas) के 102 वें कथन में हम इस तरह पढ़ते हैं - "येसु ने कहा, 'धिक्कार, फरीसियों को, वे बैलों की चरनी में सोने वाले कुत्ते की तरह हैं, न तो वह स्वयं खाता है और न ही बैलों को खाने देता है।" शास्त्रियों से येसु कहते हैं, “शास्त्रियों, धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुमने ज्ञान की कुंजी ले ली। तुमने स्वयं प्रवेश नहीं किया और जो प्रवेश करना चाहते थे, उन्हें रोका।’’। संत मत्ती का थोड़ा अलग संस्करण है। “ढोंगी शास्त्रियों और फरीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग का राज्य बन्द कर देते हो। तुम स्वयं प्रवेश नहीं करते और जो प्रवेश करना चाहते हैं, उन्हें रोक देते हो।" (मत्ती 23:13-14)। अगर जो अधिकार रखता है, वह भ्रष्ट है, वह न केवल खुद का विनाश करता है, बल्कि उसको देखभाल के लिए सौंपे गए लोगों के भविष्य को नष्ट करता है। ईश्वर नबियों को समाज को शुद्ध करने के लिए भेजते हैं, लेकिन फरीसियों ने ऐसे नबियों को सताया और उन्हें सुधारों को आगे बढ़ाने से रोका। फरीसियों का कर्तव्य था कि वे प्रभु ईश्वर के सुधार के सूत्रधार के रूप में कार्य करें, लेकिन वे उस कार्य को बिगाड़ने में लगे थे। हम अपने दैनिक जीवन में प्रभु ईश्वर के साथ सहयोग कैसे करते हैं?



SHORT REFLECTION



Jesus was angry with the lawyers because they were like dog in the manger. The dog would not eat grass; neither would he allow other animals to eat it. Saying 102 of the Apocryphal Gospel of Thomas reads like this - "Jesus said, 'Woe to the Pharisees, for they are like a dog sleeping in the manger of oxen, for neither does he eat nor does he let the oxen eat”. About the lawyers Jesus says, “Alas for you lawyers who have taken away the key of knowledge! You have not gone in yourselves and have prevented others from going in who wanted to.” St. Matthew has a slightly different version. “But woe to you, scribes and Pharisees, hypocrites! For you lock people out of the kingdom of heaven. For you do not go in yourselves, and when others are going in, you stop them” (Mt 23:13-14). If people sitting in places of authority are corrupt, they not only destroy themselves, but destroy also the future of people entrusted to their care. The prophets were sent by God to purify the society, but the Pharisees persecuted such prophets and prevented them from carrying out the reforms. The Pharisees were to act as facilitators of God’s reforms, but they turned out to be spoilers. How do we respond to God in our daily lives?


 -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!