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शुक्रवार, 10 सितम्बर, 2021 वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ता

 

शुक्रवार, 10 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : 1 तिमथि 1:1-2, 12-14


1) विश्वास में सच्चे पुत्र तिमथी के नाम पौलुस का पत्र, जो हमारे मुक्तिदाता ईश्वर और हमारी आशा ईसा मसीह के आदेशानुसार ईसा मसीह का प्रेरित है।

2) पिता-परमेश्वर और हमारे प्रभु ईसा मसीह तुम्हें अनुग्रह, दया और शान्ति प्रदान करें!

12) मैं हमारे प्रभु ईसा मसीह को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने मुझे बल दिया और मुझे विश्वास के योग्य समझ कर अपनी सेवा में नियुक्त किया है।

13) मैं पहले ईश-निन्दक, अत्याचारी और अन्यायी था; किन्तु मुझ पर दया की गयी है, क्योंकि अविश्वास के कारण मैं यह नहीं जानता था कि मैं क्या कर रहा हूँ।

14) मुझे हमारे प्रभु का अनुग्रह प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुआ और साथ ही वह विश्वास और प्रेम भी, जो हमें ईसा मसीह द्वारा मिलता है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:39-42



39) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया, "क्या अन्धा अन्धे को राह दिखा सकता है? क्या दोनों ही गड्ढे में नहीं गिर पडेंगे?

40) शिष्य गुरू से बड़ा नहीं होता। पूरी-पूरी शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने गुरू-जैसा बन सकता है।

41) "जब तुम्हें अपनी ही आँख की धरन का पता नहीं, तो तुम अपने भाई की आँख का तिनका क्यों देखते हो?

42) जब तुम अपनी ही आँख की धरन नहीं देखते हो, तो अपने भाई से कैसे कह सकते हो, ’भाई! मैं तुम्हारी आँख का तिनका निकाल दूँ?’ ढोंगी! पहले अपनी ही आँख की धरन निकालो। तभी तुम अपने भाई की आँख का तिनका निकालने के लिए अच्छी तरह देख सकोगे।



📚 मनन-चिंतन


भूले भटके को राह दिखाना एक अच्छी बात है परंतु वह व्यक्ति जिसे स्वयं को रास्ता मालूम न हो तो वह दूसरो को सही रास्ता दिखाने के बदले उनको और गलत रास्ता में फसा देगा। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हमे किसी से सलाह लेना हो या किसी रास्ते में आगे बढ़ना हो तो हमें उन लोगों से ही सलाह लेना चाहिए जो उन रास्तों में यह उन कार्यो में निपुण है।

इसके साथ साथ यदि हम किसी को सलाह दे रहे तो हमें यह ध्यान में रखना चाहिये कि हम उस क्षेत्र में निपुण हों। अक्सर हम हमारे देश में देखते है कि लोगो द्वारा सलाह देने की कोई कमी नहीं है। कही कुछ हुआ कि नहीं लोग अपनी अपनी सलाह देना शुरू हो जाते है परंतु वह स्वयं उस क्षेत्र में इतना दुविधा में है वह यह नहीं देखते। उदारण के तौर पर जो व्यक्ति शराब पीता है वह अपने बच्चे को कहता है कि शराब नहीं पीना, गलत काम न करना। हम दूसरों के लिए आशीष का श्रोत तभी बन पायेंगे जब हमारे अंदर अच्छाईयॉं होगी। हम सर्वप्रथम अपने जीवन में पवित्रता लाये तभी हम जाकर दूसरों को उस राह में चलने के लिए एक आशीष बन सकते है।



📚 REFLECTION



To show the way to the lost is a good thing but if the person himself doesn’t know the way then he will mislead another person to the wrong way instead of showing the correct way. It means to say that if we want to take the advise from some one or to move forward in particular direction then we have to take the advise from those people who are experts in that way or in that work.

Along with this if we give an advice to some one then we should take care that we are well versed in that. Often we see in our country that there is no lack of people for giving advice. Somewhere something happened or not people start giving their advices but they do not see that they themselves are in deep mess in that field. For example one who drinks alcohol tells his child not to drink alcohol or not to do anything bad. We can be the sourse of blessings for others only when their will be goodness in ourselves. Let’s bring the purity in our lives then only we can become a blessing for others to move in that way.


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 09 सितम्बर, 2021

 

गुरुवार, 09 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : कलोसियों 3:12-17


12) आप लोग ईश्वर की पवित्र एवं परमप्रिय चुनी हुई प्रजा है। इसलिए आप लोगों को अनुकम्पा, सहानुभूति, विनम्रता, कोमलता और सहनशीलता धारण करनी चाहिए।

13) आप एक दूसरे को सहन करें और यदि किसी को किसी से कोई शिकायत हो तो एक दूसरे को क्षमा करें। प्रभु ने आप लोगों को क्षमा कर दिया। आप लोग भी ऐसा ही करें।

14) इसके अतिरिक्त, आपस में प्रेम-भाव बनाये रखें। वह सब कुछ एकता में बाँध कर पूर्णता तक पहुँचा देता है।

15) मसीह की शान्ति आपके हृदय में राज्य करे। इसी शान्ति के लिए आप लोग, एक शरीर के अंग बन कर, बुलाये गये हैं। आप लोग कृतज्ञ बने रहें।

16) मसीह की शिक्षा अपनी परिपूर्णता में आप लोगों में निवास करें। आप बड़ी समझदारी से एक दूसरे को शिक्षा और उपदेश दिया करें। आप कृतज्ञ हृदय से ईश्वर के आदर में भजन, स्तोत्र और आध्यात्मिक गीत गाया करें।

17) आप जो भी कहें या करें, वह सब प्रभु ईसा के नाम पर किया करें। आप लोग उन्हीं के द्वारा पिता-परमेश्वर को धन्यवाद देते रहें।


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:27-38


27) "मैं तुम लोगों से, जो मेरी बात सुनते हो, कहता हूँ - अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करो।

28) जो तुम्हें शाप देते है, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।

29) जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारता है, दूसरा भी उसके सामने कर दो। जो तुम्हारी चादर छीनता है, उसे अपना कुरता भी ले लेने दो।

30) जो तुम से माँगता है, उसे दे दो और जो तुम से तुम्हारा अपना छीनता है, उसे वापस मत माँगो।

31) दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो।

32) यदि तुम उन्हीं को प्यार करते हो, जो तुम्हें प्यार करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी अपने प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं।

33) यदि तुम उन्हीं की भलाई करते हो, जो तुम्हारी भलाई करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी ऐसा करते हैं।

34) यदि तुम उन्हीं को उधार देते हो, जिन से वापस पाने की आशा करते हो, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पूरा-पूरा वापस पाने की आशा में पापी भी पापियों को उधार देते हैं।

35) परन्तु अपने शत्रुओं से प्रेम करो, उनकी भलाई करो और वापस पाने की आशा न रख कर उधार दो। तभी तुम्हारा पुरस्कार महान् होगा और तुम सर्वोच्च प्रभु के पुत्र बन जाओगे, क्योंकि वह भी कृतघ्नों और दुष्टों पर दया करता है।

36) "अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो। दोष न लगाओ और तुम पर भी दोष नहीं लगाया जायेगा।

37) किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा। क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जायेगी।

38) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा। दबा-दबा कर, हिला-हिला कर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी-की-पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जायेगी; क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जायेगा।"



📚 मनन-चिंतन


माता पिता अपने बच्चों से प्रेम करते है और कुछ हद तक प्रेम करना हम अपने माता पिता या परिावार से ही सीखते है। लेकिन संसार या परिवार का प्यार सीमित रहता है। प्रभु येसु हमें असीमित प्यार करना सीखाते है क्योंकि वे स्वयं असीमित प्यार करते है। अक्सर देखा जाता है कि लोग अपनो से या जो उन से अच्छा व्यवहार रखते है उन्ही से प्रेम या अच्छा बर्ताव करते है। परंतु प्रभु येसु सिखाते है कि न केवल अपनों से परंतु ‘‘अपने शत्रुओं से भी प्रेम करों। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करों। जो तुम्हें शाप देते है, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।‘‘

इस प्रकार का प्रेम करना शायद असंभव सा लगता है क्योंकि इस प्रकार केवल ईश्वर ही कर सकते है। परंतु प्रभु येसु ने इसे इस संसार में एक मानव के रूप में कर के दिखाया और बतलाया कि यह असंभव नहीं है। असंभव उनके लिए है जो अपने को बड़ा समझते है, जो अपने को छोटा नहीं मानना चाहते जो केवल अपन अहम् पर भरोसा रखते है, इसलिए प्रभु येसु ने कहा है कि ‘‘जो अपने को बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह तुम्हारा दास बने।’’(मत्ती 20ः26-27)।

जो प्रभु की शिक्षा के अनुसार प्रेम करता है, उसमें ईश्वरत्व झलकता है और वह ईश्वरता की ओर अग्रसर होता है। येसु ने भी यही कहा है, ’पूर्ण बनों जैसे कि तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।’



📚 REFLECTION



Parents love their children and to the some extent we learn to love from parents or family. But the love of the world or family is limited. Lord Jesus teaches us to love limitless or unconditionally because he himself loves unconditionally. Usually we find people love and behave good with the known persons or whose behavior is good towards them. but Jesus teaches us that not only with our loved ones but “love your enemies, do good to those who hate you, bless those who curse you, pray for those who abuse you.”

This type of love seems to be impossible because this can be done by God only, but Lord Jesus did this on this earth in the form of human and showed us that it is not impossible. It becomes impossible for those who think themselves big or great, who never wants them to be little, who trusts only in his ego, therefore Lord Jesus says, “Whoever wishes to be great among you must be your servant, and whoever wishes to be first among you must be your slave” (Mt 20:26-27).

One who loves according to the teaching of Jesus reflects the divinity in himself/herself and he moves towards the divinity. Jesus also told, ‘Be perfect as your Heavenly Father is perfect.’


 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 08 सितम्बर, 2021 धन्य कुँवारी मरियम का जन्मोत्सव

 

बुधवार, 08 सितम्बर, 2021
धन्य कुँवारी मरियम का जन्मोत्सव

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पहला पाठ : मीकाह 5:1-4


1) बेथलेहेम एफ्राता! तू यूदा के वंशों में छोटा है। जो इस्राएल का शासन करेगा, वह मेरे लिए तुझ में उत्पन्न होग। उसकी उत्पत्ति सुदूर अतीत में, अत्यन्त प्राचीन काल में हुई है।

2) इसलिए प्रभु उन्हें तब तक त्याग देगा, जब तक उसकी माता प्रसव न करे। तब उसके बचे हुए भाई इस्राएल के लोगों से मिल जायेंगे।

3) वह उठ खडा हो जायेगा, वह प्रभु के सामर्थ्य से तथा अपने ईश्वर के नाम प्रताप से अपना झुण्ड चरायेगा। वे सुरक्षा में जीवन बितायेंगे, क्योंकि वह देश के सीमान्तों तक अपना शासन फैलायेगा

4) और शांति बनाये रखेगा। जब अस्सूरी लोग हमारे देश पर आक्रमण करेंगे और हमारी भूमि में घुसपैठ करेंगे, तब हम उनके विरुद्ध सात चरवाहों और आठ शासकों को नियुक्त करेंगे।


अथवा - पहला पाठ : रोमियो 8:28-30


28) हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है;

29) क्योंकि ईश्पर ने निश्चित किया कि जिन्हें उसने पहले से अपना समझा, वे उसके पुत्र के प्रतिरूप बनाये जायेंगे, जिससे उसका पुत्र इस प्रकार बहुत-से भाइयों का पहलौठा हो।

30) उसने जिन्हें पहले से निश्चित किया, उन्हें बुलाया भी है: जिन्हें बुलाया, उन्हें पाप से मुक्त भी किया है और जिन्हें पाप से मुक्त किया, उन्हें महिमान्वित भी किया है।



सुसमाचार : मत्ती 1:1-6, 18-23


(1) इब्राहीम की सन्तान, दाऊद के पुत्र, ईसा मसीह की वंशावली।

(2) इब्राहीम से इसहाक उत्पन्न हुआ, इसहाक से याकूब, याकूब से यूदस और उसके भाई,

(3) यूदस और थामर से फ़़ारेस और ज़़ारा उत्पन्न हुए। फ़़ारेस से एस्रोम, एस्रोम से अराम,

(4) अराम से अमीनदाब, अमीनदाब से नास्सोन, नास्सोन से सलमोन,

(5) सलमोन और रखाब से बोज़़, बोज़ और रूथ से ओबेद, ओबेद से येस्से,

(6) येस्से से राजा दाऊद उत्पन्न हुआ। दाऊद और उरियस की विधवा से सुलेमान उत्पन्न हुआ।

(18) ईसा मसीह का जन्म इस प्रकार हुआ। उनकी माता मरियम की मँगनी यूसुफ से हुई थी, परंतु ऐसा हुआ कि उनके एक साथ रहने से पहले ही मरियम पवित्र आत्मा से गर्भवती हो गयी।

(19) उसका पति यूसुफ चुपके से उसका परित्याग करने की सोच रहा था, क्योंकि वह धर्मी था और मरियम को बदनाम नहीं करना चाहता था।

(20) वह इस पर विचार कर ही रहा था कि उसे स्वप्न में प्रभु का दूत यह कहते दिखाई दिया, "यूसुफ! दाऊद की संतान! अपनी पत्नी मरियम को अपने यहाँ लाने में नहीं डरे,क्योंकि उनके जो गर्भ है, वह पवित्र आत्मा से है।

(21) वे पुत्र प्रसव करेंगी और आप उसका नाम ईसा रखेंगें, क्योंकि वे अपने लोगों को उनके पापों से मुक्त करेगा।"

(22) यह सब इसलिए हुआ कि नबी के मुख से प्रभु ने जो कहा था, वह पूरा हो जाये -

(23) देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और पुत्र प्रसव करेगी, और उसका नाम एम्मानुएल रखा जायेगा, जिसका अर्थ हैः ईश्वर हमारे साथ है।



📚 मनन-चिंतन


जिस प्रकार हर एक व्यक्ति के लिए उनकी मॉं का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण रहता है, ठीक उसी प्रकार हम सभी कलीसिया के सदस्य के लिए कलीसिया की माता का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है और आज कलीसिया कुवारी मरियम का जन्मोत्सव मना रही है। यह पर्व मरियम के पर्वो में से एक बहुत ही प्रचलित पर्व है जिसे बडे़ जोर शोर से हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। कलीसिया में हम तीन व्यक्तियों का जन्मोत्सव मनाते है जिसमें प्रभु येसु का जन्म, मरियम का जन्म और संत योहन बपतिस्ता का जन्म है।

मरियम का जन्म इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि उनके द्वारा ही इस संसार के मुक्तिदाता का जन्म इस संसार में संभव हो पाया। ईश्वर ने मरियम को चुना जिससे कि वे संसार में अपने पुत्र को भेज सके और मरियम को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि वे गर्भ से ही निष्कलंक अर्थात पाप रहित थी। मरियम का निष्कलंक जन्म लेने से ज्यादा महत्वपूर्ण उस निष्कलंकता अर्थात् पवित्रता को बनाये रखना ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य था।

आज का पर्व हमें ईश्वर की योजना के बारे में बताता है कि किस प्रकार ईश्वर अपनी योजनाओ को बनाता है और वह यही चाहता है कि हम उसकी योजनों को पूर्ण करने में उनका साथ दे, जिस प्रकार मॉं मरियम ने साथ दिया।

इस संसार में हर स्त्री चाहेगी कि वह प्रभु कि मॉं बने। परंतु मरियम के सिवा शायद ही कोई इस भूमिका को निभा पाता। आज का पर्व हम सभी के लिए एक उल्लास का पर्व है क्यांेकि मरियम के जन्म के द्वारा प्रभु येसु का इस संसार में मानव के रूप में जन्म हुआ अन्यथा यह पल कब आता हम सोच भी नहीं पाते। आज का पर्व हम सब के लिए मॉं मरियम की अशिषों से भर दें। आमेन!



📚 REFLECTION



Just as for every person the place of mother is an important one, likewise for us members of the Church, the mother of the Church has an important place and today we the Church is celebrating the feast of Nativity of Virgin Mary. This feast is one of the popular feasts among the many feasts of Mary which is celebrated with lots of joy and enthusiasm. In the Catholic Church we celebrate the birthdays of three important persons in which there is birthday of Lord Jesus, birthday of Blessed Virgin Mary and the birthday of St. John the Baptist.

The birthday of Mary is important also for the reason that through her only the birth of Saviour became possible in this world. God chose Mary so that he can send his Son to the world and it was Mary’s good fortune that she remained immaculate or sinless from the moment of her conception. For Mary to remain sinless or holy was all the more important to be born sinless.

Today’s feast tells about the plan of God that how God makes the plan and He only wants our collaboration in the accomplishment of that plan just as Mary did.

In this world every woman may want to be the mother of God, but other than Mary nobody else would have been suitable for this. Today’s feast is a moment of joy for all of us because due to the birth of Mary the birth of Jesus could happen otherwise when this time would have come nobody could think of. May today’s feast fill all of us with the blessings of Mother Mary. Amen!


 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 07 सितम्बर, 2021

 

मंगलवार, 07 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : कलोसियों 2:6-15


6) आपने ईसा मसीह को प्रभु के रूप में स्वीकार किया है;

7) इसलिए उन्हीं से संयुक्त हो कर जीवन बितायें। उन्हीं से संयुक्त हो कर जीवन बितायें। उन्हीं में आपकी जड़ें गहरी हों और नींव सुदृढ़ हो। आप को जिस विश्वास की शिक्षा प्राप्त हुई है, उसी में दृढ़ बने रहें और आपके हृदयों में धन्यवाद की प्रार्थना उमड़ती रहे ।

8) सावधान रहें। कहीं ऐसा न हो कि कोई आप लोगों को ऐसे खोखले और भ्रामक दर्शन-शास्त्र द्वारा बहकाये, जो मनुष्यों की परम्परागत शिक्षा के अनुसार है और मसीह पर नहीं, बल्कि संसार के तत्वों पर आधारित हैं।

9) क्योंकि मसीह में ईश्वरीय तत्व की परिपूर्णता अवतरित हो कर निवास करती है

10) और उन में आप इस परिपूर्णता के सहभागी है। मसीह विश्व के सभी आधिपत्यों और अधिकारों के शीर्ष हैं- सभी मसीह के अधीन हैं।

11) उन्हीं में आप लोगों का ख़तना भी हुआ है। वह ख़तना हाथ से नहीं किया जाता, वह ख़तना मसीह का अर्थात् बपतिस्मा है, जिसके द्वारा पापमय शरीर को उतार कर फेंक दिया जाता है।

12) आप लोग बपतिस्मा के समय मसीह के साथ दफ़नाये गये और उन्हीं के साथ पुनर्जीवित भी किये गये हैं, क्योंकि आप लोगों ने ईश्वर के सामर्थ्य में विश्वास किया, जिसने उन्हें मृतकों में से पुनर्जीवित किया।

13) आप लोग पापों के कारण और अपने स्वभाव के ख़तने के अभाव के कारण मर गये थे। ईश्वर ने आप लोगों को मसीह के साथ पुनर्जीवित किया है और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया है।

14) उसने नियमों का वह बन्धपत्र, जो हमारे विरुद्ध था, रद्द कर दिया और उसे क्रूस पर ठोंक कर उठा दिया है।

15) उसने विश्व के प्रत्येक आधिपत्य और अधिकर को अपदस्थ किया, संसार की दृष्टि में उन को नीचा दिखाया और क्रूस के द्वारा उन्हें पराजित कर दिया है।



सुसमाचार : सन्त लूकस 6:12-19


12) उन दिनों ईसा प्रार्थना करने एक पहाड़ी पर चढ़े और वे रात भर ईश्वर की प्रार्थना में लीन रहे।

13) दिन होने पर उन्होंने अपने शिष्यों को पास बुलाया और उन में से बारह को चुन कर उनका नाम ’प्रेरित’ रखा-

14) सिमोन जिसे उन्होंने पेत्रुस नाम दिया और उसके भाई अन्द्रेयस को; याकूब और योहन को; फि़लिप और बरथोलोमी को,

15) मत्ती और थोमस को; अलफाई के पुत्र याकूब और सिमोन को, जो ’उत्साही’ कहलाता है;

16) याकूब के पुत्र यूदस और यूदस इसकारियोती को, जो विश्वासघाती निकला।

17) ईसा उनके साथ उतर कर एक मैदान में खड़े हो गये। वहाँ उनके बहुत-से शिष्य थे और समस्त यहूदिया तथा येरुसालेम का और समुद्र के किनारे तीरूस तथा सिदोन का एक विशाल जनसमूह भी था, जो उनका उपदेश सुनने और अपने रोगों से मुक्त होने के लिए आया था।

18) ईसा ने अपदूतग्रस्त लोगों को चंगा किया।

19) सभी लोग ईसा को स्पर्श करने का प्रयत्न कर रहे थे, क्योंकि उन से शक्ति निकलती थी और सब को चंगा करती थी।



📚 मनन-चिंतन


प्रार्थना प्रभु येसु के जीवन का एक अभिन्न अंग था जो उन्होने इस संसार में रहते हुए निरंतर किया। प्रार्थना से उन्हे बल और शक्ति मिलती थी जिससे वे पिता ईश्वर के कार्यो को पूरा कर सकें। प्रभु येसु ने हमेशा महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले देर रात तक या पूरी रात प्रार्थना किया करते थे। प्रार्थना के द्वारा वे पिता की ईच्छा को अच्छी तरह जान कर उन में आगे बढ़ने के लिए बल प्राप्त करते थे।

प्रभु येसु के लिए प्रार्थना सबसे महतवपूर्ण था, उन महान चिन्ह और चमत्कारों से भी महत्वपूर्ण जो उन्होंने किया। वे एक प्रार्थनामय इंसान थे और इस बात को उनके शिष्यों ने गहराई से जाना।

प्रार्थना एक ऐसा मधुर संवाद है जो मनुष्य और ईश्वर के बीच होता है। इस संवाद में दोनो तरफ से विचारों का आदान प्रदान होता है। हम भी प्रार्थना करते है परंतु अधिकतर लोगो की प्रार्थना केवल एक तरफा संवाद ही रहता है जहॉं पर हम केवल अपनी ही बाते करते जाते है परंतु प्रभु हम से क्या कहना चाहते है हम उनकी नहीं सुनतें। यही कारण है कि बहुत से लोग प्रार्थना में रुचि नहीं लेते क्योंकि उन्होने अभी तक प्रार्थना करना नहीं सीखा है। प्रार्थना वही सफल होती है जहॉं हम प्रभु के वचनो को भी सुनते है। हम प्रभु येसु के समान सच्चे प्रार्थनामय व्यक्ति बने।



📚 REFLECTION



Prayer was the integral part of Jesus’ life which he always did while living on this earth. He was receiving the strength and power from the prayer in order to accomplish the work of Father Almighty. Before taking any important decision Lord Jesus always used to spend late night or even whole night in prayer. Through prayer knowing the will of God he receives the strength to go forward.

For Lord Jesus prayer was very important, even from the mighty signs and miracles which he performed. He was a prayerful person and this the disciples knew in depth.

Prayer is a sweet conversation between the human and God. In this conversation there is exchange of thoughts or words from both the sides. We too also pray but very often many people prayer remains one sided talking where we share only our thoughts but fail to listen what God wants us to tell. For this reason only many don’t take interest in prayer because till now they have not learned to pray properly. The prayer is only meaningful when we also listen to the words of God. We all should be a prayerful person like Jesus.


 -Br Biniush Topno


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सोमवार, 06 सितम्बर, 2021

 

सोमवार, 06 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : कलोसियों 1:24-2:3


24) इस समय मैं आप लोगों के लिए जो कष्ट पाता हूँ, उसके कारण प्रसन्न हूँ। मसीह ने अपने शरीर अर्थात् कलीसिया के लिए जो दुःख भोगा है, उस में जो कमी रह गयी है, मैं उसे अपने शरीर में पूरा करता हूँ।

25) मैं ईश्वर के विधान के अनुसार कलीसिया का सेवक बन गया हूँ, जिससे मैं आप लोगों को ईश्वर का वह सन्देश,

26) वह रहस्य सुनाऊँ, जो युगों तथा पीढि़यों तक गुप्त रहा और अब उसके सन्तों के लिए प्रकट किया गया है।

27) ईश्वर ने उन्हें दिखलाना चाहा कि गैर-यहूदियों में इस रहस्य की कितनी महिमामय समृद्धि है। वह रहस्य यह है कि मसीह आप लोगों के बीच हैं और उन में आप लोगों की महिमा की आशा है।

28) हम उन्हीं मसीह का प्रचार करते हैं, प्रत्येक मनुष्य को उपदेश देते और प्रत्येक मनुष्य को पूर्ण ज्ञान की शिक्षा देते हैं, जिससे हम प्रत्येक मनुष्य को मसीह में पूर्णता तक पहुँचा सकें।

29) इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मैं उनके सामर्थ्य से, जो मुझ में प्रबल रूप से क्रियाशील है, प्रेरित हो कर कठिन परिश्रम करते हुए संघर्ष में लगा रहता हूँ।

1) मैं चाहता हूँ कि आप यह जानें कि मैं आप लोगों के लिए, लौदीकिया के विश्वासियों और उन सबों के लिए, जिन्होंने मुझे कभी नहीं देखा, कितना कठोर परिश्रम करता रहता हूँ,

2) जिससे वे हिम्मत न हारें, पे्रेम की एकता में बंधे रहें, ज्ञान की परिपूर्णता प्राप्त करें और इस प्रकार ईश्वर के रहस्य के मर्म तक पहुँच जायें।

3) वह रहस्य है मसीह, जिन में प्रज्ञा तथा ज्ञान की सम्पूर्ण निधि निहित है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 6:6-11


6) किसी दूसरे विश्राम के दिन ईसा सभागृह जा कर शिक्षा दे रहे थे। वहाँ एक मनुष्य था, जिसका दायाँ हाथ सूख गया था।

7) शास्त्री और फ़रीसी इस बात की ताक में थे कि यदि ईसा विश्राम के दिन किसी को चंगा करें, तो हम उन पर दोष लगायें।

8) ईसा ने उनके विचार जान कर सूखे हाथ वाले से कहा, ’’उठो और बीच में खड़े हो जाओ’’। वह उठ खड़ा हो गया।

9) ईसा ने उन से कहा, ’’मैं तुम से पूछ़ता हूँ-विश्राम के दिन भलाई करना उचित है या बुराई, जान बचाना या नष्ट करना?’’

10) तब उन सबों पर दृष्टि दौड़ा कर उन्होंने उस मनुष्य से कहा, ’’अपना हाथ बढ़ाओ’’। उसने ऐसा किया और उसका हाथ अच्छा हो गया।

11) वे बहुत क्रुद्ध हो गये और आपस में परामर्श करते रहे कि हम ईसा के विरुद्ध क्या करें।


📚 मनन-चिंतन


शास्त्री और फरीसी येसु से इतना घृणा करने लग गये थें कि वे येसु के महान चमत्कारों को देखते हुए भी उनमें ईश्वरत्व को नहीं पहचान पा रहें थे और इसके विपरीत वे हर क्षण येसु को किसी न किसी बातों में फसाना चाहते थे।

भलाई करना एक महान काम है, जिसके लिए न तो कोई सीमा है और न कोई बंदिशे। फरीसी और शास्त्री यह देखना चाहते थे येसु विश्राम के दिवस रोगियों को चंगा करते है कि नहंीं। येसु उनके मन की बातो को जानकर उस सूखे हाथ वाले व्यक्ति को चंगा करते हुए या बात को सिद्ध करते है कि भलाई के लिए कोई सीमा नहीं; न दिन की न जाति की। इसे हम प्रभु येसु द्वारा बताये गये भले समारी के दृष्टांत से भी समझ सकते है जहॉं पर एक समारी यह न देखते हुए कि एक व्यक्ति जो घायल है वह यहूदी है या कोई और वह उसकी सेवा सुश्रुषा करता है। प्रभु येसु हमें निरंतर भलाई करते रहने की शिक्षा देते है। हमारे साथ तो बुराई हर कोई कर सकता है परंतु हमें भलाई करने से कौन रोक सकता है, क्योंकि भलाई की न कोई सीमा है न बंदिशे।



📚 REFLECTION



The Pharisees and Scribes were envying Jesus to that extent that even after seeing the great miracles they were not able to recognize the divinity in him and on the contrary they wanted to trap him in every moment.

To good is a noble work, for which there is neither boundary nor limits. Pharisees and Scribes wanted to see whether Jesus heals the sick on the Sabbath or not. Understanding the mind of them Jesus heals the man with withered hand and hence affirming that there is no limit, neither of day nor of caste for doing any good. This we can also understand with the parable given by Jesus of the Good Samaritan, where one samaritan helps the wounded person withou seeing whether the person who is wounded is Jew or some one else. Lord Jesus always teaches us to do good. Any one can do wrong to us but no one can stop us from doing good because for goodness there is neither the boundary nor any limit.


 -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!

Mass Readings for Sunday, 5 September 2021

 Daily Mass Readings for Sunday, 5 September 2021

TWENTY-THIRD SUNDAY IN ORDINARY TIME

First Reading: Isaiah 35: 4-7a
Responsorial Psalm: Psalms 146: 7, 8-9, 9-10
Second Reading: James 2: 1-5
Alleluia: Matthew 4: 23
Gospel: Mark 7: 31-37

First Reading: Isaiah 35: 4-7a

4 Say to the fainthearted: Take courage, and fear not: behold your God will bring the revenge of recompense: God himself will come and will save you.

5 Then shall the eyes of the blind be opened, and the ears of the deaf shall be unstopped.

6 Then shall the lame man leap as a hart, and the tongue of the dumb shall be free: for waters are broken out in the desert, and streams in the wilderness.

7 And that which was dry land, shall become a pool, and the thirsty land springs of water.

Responsorial Psalm: Psalms 146: 7, 8-9, 9-10

R. (1b) Praise the Lord, my soul!

or

R. Alleluia.

7 Who keepeth truth for ever: who executeth judgment for them that suffer wrong: who giveth food to the hungry. The Lord looseth them that are fettered:

R. Praise the Lord, my soul!

or

R. Alleluia.

8 The Lord enlighteneth the blind. The Lord lifteth up them that are cast down: the Lord loveth the just.

9 The Lord keepeth the strangers.

R. Praise the Lord, my soul!

or

R. Alleluia.

9 He will support the fatherless and the widow: and the ways of sinners he will destroy.

10 The Lord shall reign for ever: thy God, O Sion, unto generation and generation.

R. Praise the Lord, my soul!

or

R. Alleluia.

Second Reading: James 2: 1-5

1 My brethren, have not the faith of our Lord Jesus Christ of glory with respect of persons.

2 For if there shall come into your assembly a man having a golden ring, in fine apparel, and there shall come in also a poor man in mean attire,

3 And you have respect to him that is clothed with the fine apparel, and shall say to him: Sit thou here well; but say to the poor man: Stand thou there, or sit under my footstool:

4 Do you not judge within yourselves, and are become judges of unjust thoughts?

5 Hearken, my dearest brethren: hath not God chosen the poor in this world, rich in faith, and heirs of the kingdom which God hath promised to them that love him?

Alleluia: Matthew 4: 23

R. Alleluia, alleluia.

23 Jesus proclaimed the Gospel of the kingdom and cured every disease among the people.

R. Alleluia, alleluia.


Gospel: Mark 7: 31-37

31 And again going out of the coasts of Tyre, he came by Sidon to the sea of Galilee, through the midst of the coasts of Decapolis.

32 And they bring to him one deaf and dumb; and they besought him that he would lay his hand upon him.

33 And taking him from the multitude apart, he put his fingers into his ears, and spitting, he touched his tongue:

34 And looking up to heaven, he groaned, and said to him: Ephpheta, which is, Be thou opened.

35 And immediately his ears were opened, and the string of his tongue was loosed, and he spoke right.

36 And he charged them that they should tell no man. But the more he charged them, so much the more a great deal did they publish it.

37 And so much the more did they wonder, saying: He hath done all things well; he hath made both the deaf to hear, and the dumb to speak.

Br. Biniush Topno



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Praise the Lord!

इतवार, 05 सितम्बर, 2021

 

इतवार, 05 सितम्बर, 2021

वर्ष का तेईसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : इसायाह 35:4-7अ


4) घबराये हुए लोगों से कहो- “ढारस रखों डरो मत! देखो, तुम्हारा ईश्वर आ रहा है। वह बदला चुकाने आता है, वह प्रतिशोध लेने आता है, वह स्वयं तुम्हें बचाने आ रहा है।“

5) तब अन्धों की आँखें देखने और बहरों के कान सुनने लगेंगे। लँगड़ा हरिण की तरह छलाँग भरेगा। और गूँगे की जीभ आनन्द का गीत गायेगी।

6) मरुस्थल में जल की धाराएँ फूट निकलेंगी, रेतीले मैदानों में नदियाँ बह जायेंगी,

7) सूखी धरती झील बन जायेगी और प्यासी धरती में झरने निकलेंगे। जहाँ पहले सियारों की माँद थी, वहाँ सरकण्डे और बेंत उपजेंगे।



दूसरा पाठ : याकूब 2:1-5


1) भाइयो! आप लोग हमारे महिमान्वित प्रभु ईसा मसीह में विश्वास करते हैं, इसलिए भेदभाव और चापलूसी से दूर रहें।

2) मान लें कि आप लोगों की सभा में सोने की अंगूठी और कीमती वस्त्र पहने कोई व्यक्ति प्रवेश करता है और साथ ही फटे-पुराने कपड़े पहने कोई कंगाल।

3) यदि आप कीमती वस्त्र पहने व्यक्ति का विशेष ध्यान रख कर उस से कहें- "आप यहाँ इस आसन पर विराजिए" और कंगाल से कहें- "तुम वहाँ खड़ रहो" या "मेरे पांवदान के पास बैठ जाओ"।

4) तो क्या आपने अपने मन में भेदभाव नहीं आने दिया और गलत विचार के अनुसार निर्णय नहीं दिया।

5) प्यारे भाइयो! सुन लें। क्या ईश्वर ने उन लोगों को नहीं चुना है, जो संसार की दृष्टि में दरिद्र हैं, जिससे वे विश्वास के धनी हो जायें और उस राज्य के उत्तराधिकारी बनें, जिसे असने अपने भक्तों को प्रदान करने की प्रतिज्ञा की है?



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 7:31-37



31) ईसा तीरूस प्रान्त से चले गये। वे सिदोन हो कर और देकापोलिस प्रान्त पार कर गलीलिया के समुद्र के पास पहुँचे।

32) लोग एक बहरे-गूँगे को उनके पास ले आये और उन्होंने यह प्रार्थना की कि आप उस पर हाथ रख दीजिए।

33) ईसा ने उसे भीड़ से अलग एकान्त में ले जा कर उसके कानों में अपनी उँगलियाँ डाल दीं और उसकी जीभ पर अपना थूक लगाया।

34) फिर आकाश की ओर आँखें उठा कर उन्होंने आह भरी और उससे कहा, "एफ़ेता", अर्थात् "खुल जा"।

35) उसी क्षण उसके कान खुल गये और उसकी जीभ का बन्धन छूट गया, जिससे वह अच्छी तरह बोला।

36) ईसा ने लोगों को आदेश दिया कि वे यह बात किसी से नहीं कहें, परन्तु वे जितना ही मना करते थे, लोग उतना ही इसका प्रचार करते थे।

37) लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही। वे कहते थे, "वे जो कुछ करते हैं, अच्छा ही करते है। वे बहरों को कान और गूँगों को वाणी देते हैं।"



📚 मनन-चिंतन


रोग ग्रस्त जीवन न केवल स्वयं के लिए परंतु पूरे परिवार के लिए एक बोझ सा बन जाता है। कोई उस बोझ को उठाता है तो कोई उस बोझ से दूरी बना लेता है। अक्सर हम देखते है परिवार के लोग जब उस रोग ग्रस्त व्यक्ति का बोझ नहीं उठा पाते तो उसे अपने हालात में छोड़ देते है। परंतु आज के सुसमाचार में मानवता का अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है जहॉं पर लोग एक बहरे-गूॅंगे को येसु के पास लाते है ताकि येसु उन्हे चंगाई प्रदान करें। लोगो ने उस बहरे-गूॅंगे व्यक्ति की बेबस हालत को देखकर उसके लिए कुछ अच्छा करने की सोची।

ईश्वर ने हम सब को पॉंच इंद्रियों से विभूषित किया है जिससे हमें ज्ञान प्राप्त होता है। इनमें से कोई भी इंद्रियॉं काम करना बंद करदे तो जीवन अधूरा अधूरा सा लगता है। प्रभु येसु इस संसार में जीवन नहीं परंतु परिपूर्ण जीवन देने आये। और इसलिए वे सर्वप्रथम उन लोगों का, जो गूॅंगे, बहरे है, बिमार है या किसी भी प्रकार की समस्या में है उनको चंगाई प्रदान करी जिससे वे समझ जाये कि येसु ही वह मसीह है जो उनके जीवन को पूरिपूर्णता तक ले जा सकता है। हम सब प्रभु येसु से अपने लिए परिपूर्ण जीवन प्राप्त करें।



📚 REFLECTION



Sickly life becomes a kind of burden not only for oneself but also for the whole family. Some carry the burden but some keep themselves away from the burden. Usually we see that the people of some family leave the person in his situation when they are unable to bear the burden. But in today’s gospel we come across the beautiful example of humanity where people bring the deaf man who had an impediment in his speech so that Jesus can heal him. Seeing the helpless condition of the deaf-dumb man people thought of doing good for him.

God has blessed us with the five senses with which we acquire the knowledge. Among them if any one senses stop working them life seems to be incomplete. Lord Jesus came in this world not only to give life but life in abundance and for this reason he first healed the persons who were dumb, deaf, sick or people with any infirmities he healed them so that they may understand He is the Christ who will take their life to the fulfillment. We all may receive the fullness of life from Lord Jesus.



मनन-चिंतन - 2


आज के सुसमाचार में हम एक बहरे और गूँगे व्यक्ति को देखते हैं जिसे प्रभु येसु चंगाई प्रदान करने का चमत्कार करते हैं। प्रभु येसु के हर चमत्कार के पीछे कुछ न कुछ कारण होता है। कभी प्रभु येसु पिता ईश्वर के सन्देश व इस दुनिया में स्वयं के आने के उद्देश्य को भली-भाँति समझाना चाहते हैं, इसलिये चमत्कार करते हैं (देखिये योहन 9:1-7)। तो कभी अपने मानव स्वभाव के भावुक पहलू को प्रकट करने के लिये (देखिये लूकस 7:11-17)। इसको हम यों भी समझ सकते हैं कि जिस परिस्थिति में चमत्कार किया जाता है, उस परिस्थिति को उत्पन्न करने में ईश्वर की कुछ न कुछ भूमिका भी हो सकती है। उदाहरण के लिए जैसे ईश्वर किसी व्यक्ति का ध्यान एक विशेष पहलू या आदत या जीवन के बारे में खींचना चाहते हैं तो हो सकता है उस व्यक्ति के साथ ऐसी घटना घटे कि उसे उसमें ईश्वर का वह प्रयोजन समझ में आये या उसके द्वारा दूसरों को कोई सन्देश मिले।

सन्त आइरेनियुस का कहना है, ’’ईश्वर की महिमा इसमें है कि इन्सान पूर्ण रूप से जीवित हो।’’ इसे और साधारण भाषा में समझे तो यों कहेंगे ’कोई इन्सान ज़िन्दादिल है, स्वस्थ है, पूर्ण है, वही ईश्वर की महिमा को प्रकट करता है, क्योंकि हम सब ईश्वर के प्रतिरूप हैं और ईश्वर में कुछ भी कमी नहीं है। आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि लोग उस बहरे व्यक्ति को लेकर आते हैं जो गूँगा भी था। हम ज़रा और गहराई से उस व्यक्ति के बारे में सोचें। अगर कोई व्यक्ति बहरा है तो स्वाभाविक तौर से इसकी बहुत अधिक सम्भावना है कि वह व्यक्ति गूँगा भी हो क्योंकि प्रारम्भ में जब हम भाषा सीखते हैं तो अक्सर उसे सुनकर सीखते हैं। बाद में पढना-लिखना सीखते हैं और उस भाषा को और गहराई से व अन्य भाषाओं को भी सीखते हैं। उसके अलावा बोल-चाल के लिये शब्दों में ताल-मेल, उच्चारण, आवाज़ की तीव्रता, पिच आदि भी मायने रखते हैं। बहरे व्यक्ति को यह सब सीखना कठिन है, अतः वे स्वभावतः कुछ बोलना भी नहीं सीख पाते।

एक बहरा व्यक्ति अगर सुन नहीं सकता तो उसके लिये आधी दुनिया तो यों ही कट जाती है। लोग अपने बारे में क्या व्यक्त कर रहे हैं, बहरा व्यक्ति ना तो उसे समझ पाता है और न स्वयं को व्यक्त कर पाता है। अपनी अवाज़, अपनी भावनायें, अपना सुख-दुःख वह दूसरों के साथ नहीं बाँट सकता और न दूसरों के सुख-दुःख को समझ सकता है। आधुनिक युग में तकनीक के आगमन से ऐसे व्यक्तियों का जीवन अत्यन्त सुगम हो गया है लेकिन पुराने ज़माने में हालात बहुत बदतर थे। प्रभु येसु अक्सर व्यक्ति की परेशानी को महसूस कर उसे दूर कर देते थे। गूँगों को वाणी देना, बहरों को कान देना, अन्धों को रोशनी देना, लँगडों को चंगा करना ये सब मसीह के आगमन के लक्षण हैं। क्योंकि ईश्वर किसी को भी कष्ट में नहीं देख सकता। मनुष्यों के दुःख दूर करने, उन्हें मुक्ति प्रदान करने ही प्रभु येसु को पिता ईश्वर ने इस दुनिया में भेजा है।

हम प्रभु येसु के अनुयायी हैं, हम मसीह के प्रतिनिधि हैं। आज की दुनिया में हम हर जगह देखते हैं, सत्य को दबाया जाता है, कमजोरों पर अत्याचार किया जाता है, निर्बलों को परेशान किया जाता है। समाचार पत्र, दूरदर्शन समाचार आदि इसी प्रकार की खबरों से भरे पड़े हैं। उनमें से बहुत से अपराध या बुरे कर्म ऐसे हैं जिनके लिये अगर किसी ने आवाज़ उठाई होती तो वे अपराध किये ही नहीं जाते। अगर आस-पास के लोग गूँगे-बहरे नहीं बन जाते तो शायद किसी निर्दोष की रक्षा हो सकती थी। क्या आज हमें अपनी अन्तरात्मा का बहरापन और गूँगापन प्रभु येसु से दूर कराने की ज़रूरत तो नहीं है? क्या हम दूसरों के कष्टों और दुःखों को सुनते और समझते हैं? क्या हम मानव जीवन को नई राह दिखाने के लिये पिता ईश्वर के प्रतिनिधि बनने के लिये तैयार हैं? ईश्वर हमारी अन्तरात्मा के कान और जीभ के बन्धन खोल दे।


✍Br. Biniush Topno


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