मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Duliajan, Assam, India
Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

आज का पवित्र वचन बुधवार, - 21 अप्रैल 2021

 

बुधवार, - 21 अप्रैल 2021

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ :प्रेरित-चरित 8:1ब-8


1) साऊल इस हत्या का समर्थन करता था। उसी दिन येरुसालेम में कलीसिया पर घोर अत्याचार प्रारम्भ हुआ। प्रेरितों को छोड़ सब-के-सब यहूदिया तथा समारिया के देहातों में बिखर गये।

2) भक्तों ने, स्तेफ़नुस पर करुण विलाप करते हुए, उसे कब्र में रख दिया।

3) साऊल उस समय कलीसिया को सता रहा था। वह घर-घर घुस जाया करता और स्त्री-पुरुषों को घसीट कर बन्दीगृह में डाल दिया करता था।

4) जो लोग बिखर गये थे, वे घूम-घूम कर सुसमाचार का प्रचार करते रहे।

5) फि़लिप समारिया के एक नगर जा कर वहाँ मसीह का प्रचार करता था।

6) लोग उसकी शिक्षा पर अच्छी तरह ध्यान देते थे, क्योंकि सब उसके द्वारा दिखाये हुए चमत्कारों की चर्चा सुनते या उन्हें स्वयं देखते थे।

7) दुष्ट आत्मा ऊँचे स्वर से चिल्लाते हुए बहुत-से अपदूतग्रस्त लोगों से निकलते थे और अनेक अद्र्धांगरोगी तथा लंगड़े भी चंगे किये जाते थे;

8) इसलिए उस नगर में आनन्द छा गया।


सुसमाचार : योहन 6:35-40


35) उन्होंने उत्तर दिया, "जीवन की रोटी मैं हूँ। जो मेरे पास आता है, उसे कभी भूख नहीं लगेगी और जो मुझ में विश्वास करता है, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।

36) फिर भी, जैसा कि मैंने तुम लोगों से कहा, तुम मुझे देख कर भी विश्वास नहीं करते।

37) पिता जिन्हें मुझ को सौंप देता है, वे सब मेरे पास आयेंगे और जो मेरे पास आता है, मैं उसे कभी नहीं ठुकराऊँगा ;

38) क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, बल्कि जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पूरी करने के लिए स्वर्ग से उतरा हूँ।

39) जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा यह है कि जिन्हें उसने मुझे सौंपा है, मैं उन में से एक का भी सर्वनाश न होने दूँ, बल्कि उन सब को अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँ।

40) मेरे पिता की इच्छा यह है कि जो पुत्र को पहचान कर उस में विश्वास करता है, उसे अनन्द जीवन प्राप्त हो। मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा।"


📚 मनन-चिंतन


स्तेफनुस की पत्थर मार कर हत्या करने की घटना का सामाज के सामाजिक तथा धार्मिक ढांचे पर बडा असर हुआ। येरूसालेम की कलीसिया पर व्यापक तौर पर अत्याचार होने लगा जिसका परिणाम यह हुआ कि ख्रीस्त विश्वास आसपास के इलाकों में बिखर गये। साउल उन लोगों में प्रमुख था जो कलीसिया या ख्राीस्तीय पर अत्याचार कर रहा था। यह वही साउल था जो उन लोगों के कपडें देख रहा था जो स्तेफनुस को पत्थर मार रही थी। ऐसा प्रतीत होता है कि जो उच्चस्तरीय तर्क, प्रज्ञा तथा चमत्कार एवं चिन्ह जो स्तेफनुस ने प्रदर्शित किये उनसे लोगों के हृदयों पर कोई खास असर नहीं पडा। साउल तो इस घटना के बाद और भी अधिक जोश से ख्राीस्तीयों पर अत्याचार कर रहा था।

साउल के हृदय परिवर्तन की घटना बाद में होती है जब वह दमिश्क जा रहा था। यह इस बात को साबित करता है कि मनुष्य या पापी का मन परिवर्तन तर्क, ज्ञान या चमत्कारों से नहीं बल्कि प्रभु की इच्छा से होता है।

इससे यह तात्पर्य नहीं है कि स्तेफनुस का जीवन एवं त्याग व्यर्थ या नाकाफी थे। उनका अपना असर तथा उददेश्य था किन्तु किसी का हृदय केवल ईश्वर के प्रभुत्व में आता है। ऐसा बताया जाता है कि संत मोनिका ने अपने पुत्र अगस्टीन के हृदय परिवर्तन के लिये लगभग 25 साल तक प्रार्थना की किन्तु इसका उस पर कोई प्रभाव पडता नहीं दिख रहा था। किन्तु एक दिन अचानक ईश्वर की दया से अगस्टीन का जीवन प्रभु की ओर अभिमुख हुआ। उनके मन परिवर्तन में उनकी मां मोनिका की प्रार्थनाओं का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण किन्तु अन्त में ईश्वर की इच्छा पर ही परिणाम निर्भर करता हैं।

स्तेफनुस की मृत्यु के उपरांत भीषण अत्याचार के कारण कलीसिया आसपास के इलाकों में बिखर गयी जिससे प्रभु में विश्वास की गवाह चारों ओर फैल गये थे। ईश्वर अपने कार्य करने के लिये रहस्यमय साधनों से चमत्कार करता है। चाहे धर्मी युवा ही मर जाये या विधर्मी दीर्घ आयु प्राप्त करे यह ईश्वर के प्रभुत्व के दायरे में आता है। हमारा मिशन तो यही है कि हम पूरी तंमयता के साथ प्रभु द्वारा सौंपे गये दायित्व को निभा सके तथा परिणााम का जिम्मा ईश्वर पर छोड दे। हम चाहे स्तेफनुस के समान शहादत प्राप्त करे या प्रभु के संक्षरण में जीते रहे पर हम स्तेफनुस के समाने विजेता का मुकुट अवश्य पहने।




📚 REFLECTION


The stoning of Stephen had an immediate andenormousbearing on the social and religious setting of the society. Church in Jerusalem experienced a massive persecution which resulted in the Christians getting scattered in and around the area. Saul was one of prominent names among those who persecuted the church. It was same Saul who was looking after the clothes of those who were stoning Stephen. It appears that superiour logic and wisdom which Stephen displayed, the great wonders and signs he performed did not break through the hardness of their hearts and of Saul in particular. For Saul continued to vigorously persecute the Church.

It was later on when Saul was on the way to Damascus that he encountered the Lord and got converted. It proves that the logic, wisdom and even miracles are not enough to convert sinners. Only God’s might power can do that as happened with Paul.

This does mean that the life and sacrifice of Stephen were inefficient. It had its own impact and purpose but to move the hearts of someone it is only in the mighty domain of God.It is said the St. Monica prayed for more than 25 years for the conversion of her son Augustine but it seemed to have no effect on him. However, one day the Lord in his mercy moved the heart of Augustin he was converted to Jesus and his work.

After Stephen’s death, first the church was scattered through persecution, resulting in a more widespread witness. God works in mysterious ways to perform His wonders! Whether the godly die young by violent deaths, and the wicked live long and prosper, is God’s sovereign business. Our mission is to be faithful to His Great Commission and leave the results to Him. Let us pray and ask God to give us the godly character of Stephen so that we will be courageous witnesses for Jesus Christ. Leave the results to Him. Whether we lose our life as a martyr or whether God protects us, we will, like Stephen, wear the victor’s crown.


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

मंगलवार, - 20 अप्रैल 2021

 

मंगलवार, - 20 अप्रैल 2021

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ :प्रेरित-चरित . 7:51-8,1a


51) "हठधर्मियो! आप लोग न तो सुनना चाहते हैं और न समझना। आप सदा ही पवित्र आत्मा का विरोध करते हैं, जैसा कि आपके पूर्वज किया करते थे।

52) आपके पूर्वजों ने किस नबी पर अत्याचार नहीं किया? उन्होंने उन लोगों का वध किया, जो धर्मात्मा के आगमन की भविष्यवाणी करते थे।

53) आप लोगों को स्वर्गदूतों के माध्यम से संहिता प्राप्त हुई, किन्तु आपने इसका पालन नहीं किया और अब आप उस धर्मात्मा के विश्वासघाती तथा हत्यारे बन गये हैं।"

54) वे स्तेफ़नुस की बातें सुन कर आगबबूला हो गये और दाँत पीसते रहे।

55) स्तेफ़नुस ने, पवित्र आत्मा से पूर्ण हो कर, स्वर्ग की ओर दृष्टि की और ईश्वर की महिमा को तथा ईश्वर के दाहिने विराजमान ईसा को देखा।

56) वह बोल उठा, "मैं स्वर्ग को खुला और ईश्वर के दाहिने विराजमान मानव पुत्र को देख रहा हूँ"।

57) इस पर उन्होंने ऊँचे स्वर से चिल्ला कर अपने कान बन्द कर लिये। वे सब मिल कर उस पर टूट पड़े

58) और उसे शहर के बाहर निकाल कर उस पर पत्थर मारते रहे। गवाहों ने अपने कपड़े साऊल नामक नवयुवक के पैरों पर रख दिये।

59) जब लोग स्तेफ़नुस पर पत्थर मार रहे थे, तो उसने यह प्रार्थना की, "प्रभु ईसा! मेरी आत्मा को ग्रहण कर!"

60) तब वह घुटने टेक कर ऊँचे स्वर से बोला, "प्रभु! यह पाप इन पर मत लगा!" और यह कह कर उसने प्राण त्याग दिये।

1) साऊल इस हत्या का समर्थन करता था। उसी दिन येरुसालेम में कलीसिया पर घोर अत्याचार प्रारम्भ हुआ।


सुसमाचार : योहन 6:30-35


30) लोगों ने उन से कहा, "आप हमें कौन सा चमत्कार दिखा सकते हैं, जिसे देख कर हम आप में विश्वास करें? आप क्या कर सकते हैं?

31) हमारे पुरखों ने मरुभूमि में मन्ना खाया था, जैसा कि लिखा है- उसने खाने के लिए उन्हें स्वर्ग से रोटी दी।"

32) ईसा ने उत्तर दिया, "मै तुम लोगों से यह कहता हूँ- मूसा ने तुम्हें जो दिया था, वह स्वर्ग की रोटी नहीं थी। मेरा पिता तुम्हें स्वर्ग की सच्ची रोटी देता है।

33) ईश्वर की रोटी तो वह है, जो स्वर्ग से उतर कर संसार को जीवन प्रदान करती है।"

34) लोगों ने ईसा से कहा, "प्रभु! आप हमें सदा वही रोटी दिया करें"।

35) उन्होंने उत्तर दिया, "जीवन की रोटी मैं हूँ। जो मेरे पास आता है, उसे कभी भूख नहीं लगेगी और जो मुझ में विश्वास करता है, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।


📚 मनन-चिंतन


ईश्वर का प्रचार करना निर्दयी तथा कठोर हृदय वाले लोगों के बीच कभी भी आसान काम नहीं रहा। विरोध तथा अत्याचार सुसमाचार की घोषणा का अभिन्न अंग है। प्रवक्ता ग्रंथ चेताते हुये कहता है, ’’पुत्र! यदि तुम प्रभु की सेवा करना चाहते हो, तो विपत्ति का सामना करने को तैयार हो जाओ। तुम्हारा हृदय निष्कपट हो, तुम दृढ़संकल्प बने रहो, विपत्ति के समय तुम्हारा जी नही घबराये। जो कुछ तुम पर बीतेगा, उसे स्वीकार करो तथा दुःख और विपत्ति में धीर बने रहो; क्योंकि अग्नि में स्वर्ण की परख होती है और दीन-हीनता की घरिया में ईश्वर के कृपापात्रों की।’’(प्रवक्ता 2:1,4-5)

स्तेफनुस को यहूदियों के घोर विरोध का सामना करना पडा। उन्होंने न तो स्तेफनुस की बात माना और न ही उन्हें कार्य करने दिया। स्तेफनुस उन्हें ’हठधर्मी कहता है जो पवित्र आत्मा का विरोध करते हैं।’ स्तेफनुस की प्रज्ञा, अनुग्रह, विश्वास, चमत्कारों एवं चिन्हों के बावजूद भी वे उनका निंरतर विरोध करते रहे। यह एक वास्तविकता है जब हम धर्मान्ध एवं कटट्र पंथी लोग से बात करते हैं तो हमारा दमन किया जाता है। स्तेफनुस जो सत्य तथा पश्चाताप का प्रचार कर रहा था उससे विरोधियों में खलबली मच गयी। स्तेफनुस के प्रचार ने उन्हें सच्ची धार्मिकता तथा उनके पापों की पहचान करवायी किन्तु अपने अंहकार के कारण वे केवल विरोध ही करते रहे। जब वह इसमें विफल रहे तो उन्होंने स्तेफनुस पर ही आक्रामण कर दिया। यह विरोधियों का सामान्य तरीका होता है। जब वे किसी को हरा नहीं सकते तो चाहे धुरर्ता से या फिर हिंसा से वे व्यक्ति को दबाने का प्रयत्न करते हैं। स्तेफनुस के विरूद्ध इन्होंने इन दोनों का प्रयोग किया।

स्तेफनुस के मेधावी तथा यशस्वी गवाही का अंत उनकी पत्थरों से मार कर हत्या के रूप में होता है। उन्होंने स्तेफनुस को मार तो दिया किन्तु उनके पवित्र एवं साहसी जीवन का संदेश आज भी हमारे बीच जीवित है।




📚 REFLECTION



Proclaiming God in the midst of hard-hearted people has never been an easy task. Opposition and persecution are the integral parts of the proclamation. Book of Sirach forewarns us, “My child, if you aspire to serve the Lord, prepare yourself for an ordeal… Whatever happens to you, accept it, and in the uncertainties of your humble state, be patient, since gold is tested in the fire, and the chosen in the furnace of humiliation.” (Sirach 2:1,4-5)

Stephen faced rigid resistance from the Jews. They neither accepted his arguments nor his allowed him to have his ways. Stephen called the Jews ‘Stiff-necked people who resisted the Holy Spirit.’ Inspite of the Stephen’s wisdom, grace, faith, miracles and power people remained opposed to him. It is a fact that when we talk to religious blinded and hardened sinners we need to be prepared for opposition. The truth that Stephen preached convicted these men of their sins and threatened their pride so they tried to refute it. when that failed, they attacked the messenger. This is a common ploy of the adversaries.When you can’t defeat the message, go after the messenger, either by deceit or by violence. These men used both against Stephen.

The glorious and sagacious witnessing of Stephen finally culminated in stoning of Stephen. Although he died but not before he had the beatic vision of Jesus sitting at the right hand of the Father. They succeeding in killing Stephen but his life and message lives on even today.


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

आज का पवित्र वचन सोमवार, - 19 अप्रैल 2021

 

सोमवार, - 19 अप्रैल 2021

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥


पहला पाठ :प्रेरित-चरित . 6:8-15


8) स्तेफनुस अनुग्रह तथा सामर्थ्य से परिपूर्ण हो कर जनता के सामने बहुत-से चमत्मकार तथा चिन्ह दिखाता था।

9) उस समय "दास्यमुक्त" नामक सभागृह के कुछ सदस्य और कुरेने, सिकन्दरिया, किलिकया तथा एशिया के कुछ लोग स्तेफनुस से विवाद करने आये।

10) किन्तु वे स्तेफ़नुस के ज्ञान का सामना करने में असमर्थ थे, क्योंकि वह आत्मा से प्रेरित हो कर बोलता था।

11) तब उन्होंने घूस दे कर कुछ व्यक्तियों से यह झूठी गवाही दिलवायी कि हमने स्तेफनुस को मूसा तथा ईश्वर की निन्दा करते सुना।

12) इस प्रकार जनता, नेताओं तथा शास्त्रियों को भड़काने के बाद वे अचानक स्तेफनुस के पास आ धमके और उसे पकड़ कर महासभा के सामने ले गये।

13) वहाँ उन्होंने झूठे गवाहों को खड़ा किया, जो बोले, "यह व्यक्ति निरन्तर मन्दिर तथा मूसा की निन्दा करता है।

14) हमने इसे यह कहते सुना कि ईसा नाज़री यह स्थान नष्ट करेगा और मूसा के समय से चले आ रहे हमारे रिवाजों को बदल देगा।"

15) महासभा के सब सदस्य स्थिर दृष्टि से स्तेफ़नुस की ओर देख रहे थे। उसका मुखमण्डल उन्हें स्वर्गदूत के जैसा दीख पड़ा।


सुसमाचार : योहन 6:22-29


22) जो लोग समुद्र के उस पास रह गये थे, उन्होंने देखा था कि वहाँ केवल एक ही नाव थी और ईसा अपने शिष्यों के साथ उस नाव पर सवार नहीं हुए थे- उनके शिष्य अकेले ही चले गये थे।

23) दूसरे दिन तिबेरियस से कुछ नावें उस स्थान के समीप आ गयीं, जहाँ ईसा की धन्यवाद की प्रार्थना के बाद लोगों ने रोटी खायी थी।

24) जब उन्होंने देखा कि वहाँ न तो ईसा हैं और न उनके शिष्य ही, तो वे नावों पर सवार हुए और ईसा की खोज में कफरनाहूम चले गये।

25) उन्होंने समुद्र पार किया और ईसा को वहाँ पा कर उन से कहा, "गुरुवर! आप यहाँ कब आये?"

26) ईसा ने उत्तर दिया, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुम चमत्कार देखने के कारण मुझे नहीं खोजते, बल्कि इसलिए कि तुम रोटियाँ खा कर तृप्त हो गये हो।

27) नश्वर भोजन के लिए नहीं, बल्कि उस भोजन के लिए परिश्रम करो, जो अनन्त जीवन तक बना रहता है और जिसे मानव पुत्र तुन्हें देगा ; क्योंकि पिता परमेश्वर ने मानव पुत्र को यह अधिकार दिया है।"

28) लोगों ने उन से कहा, "ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?"

29) ईसा ने उत्तर दिया, "ईश्वर की इच्छा यह है- उसने जिसे भेजा है, उस में विश्वास करो"।


📚 मनन-चिंतन


आज का पहला पाठ स्तेफनुस के धार्मिक व्यक्त्वि के बारे बताता है। स्तेफनुस उन सात धर्म सेवकों में सम्मल्लित था जिन्हें प्रेरितों पर भोजन के वितरण की जिम्मेदारी सौंपी थी। स्तेफनुस एक साहसी विश्वासी थे जिन्होंने येसु के लिये शहादत स्वीकारी तथा आने वाली पीढीयों के लिये इसका एक आदर्श रखा। वे पवित्र आत्मा से पूर्ण थे। उनमें पवित्र आत्मा की प्रज्ञा समायी थी। इनके विरोधी यहूदी लोग संहिता एवं पुरर्खों की पंरपरा में परांगत थे किन्तु स्तेफनुस की प्रज्ञा के सामने वे निरूत्तर रह गये थे। स्तेफनुस प्रभु ईश्वर के बारे में अकाट्य विश्वास के साथ बोल रहे थे। उनका विश्वास इतना दृढ था वे उनके विरोधियों के झूठे आरोपों के सामने भी अविचलित रहे। वे कृपा से पूर्ण थे। इससे यह तात्पर्य है कि उन्हें येसु का व्यक्तिगत अनुभव एवं समझ रही होगी। ईश्वर ने उन्हें असीम कृपा प्रदान की थी।

स्तेफनुस शक्ति और सामर्थ्य से भी पूर्ण थे। ईश्वर ने उन्हें जनता के सामने बहुत चमत्कार और चिन्ह दिखाने का सामर्थ्य प्रदान किया था। लोग उनके व्यक्त्वि एवं कार्यों से विस्मित थे। उनकी इस महानता तथा चमत्कारों के कारण यहूदी भीषण ईर्ष्या से भर गये थे।

इस प्रकार स्तेफनुस के ईश्वरीय गुण जैसे पवित्र आत्मा से परिपूर्णता, प्रज्ञा, विश्वास, अनुग्रह, साहस, शक्ति एवं सामर्थ्य इस बात की निशानी थे कि वे ईश्वर से बडी गहरायी से जुडे थे। स्तेफनुस ने इन सभी ईश्वर वरदानों को प्रभु येसु का साक्ष्य देने में लगाया।

हम में से हरेक बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति पर पवित्र आत्मा की मुहर अंकित है। हमने पवित्र आत्मा के उपहारों को ग्रहण किया है। हमें विवेचना करना चाहिये कि क्या हम इन वरदानों के बारे में जागरूक है या फिर ये वरदान हम में सुप्त अवस्था में है। हमें संत स्तेफनुस के सामन प्रार्थना और विश्वास के जीवन के द्वारा इस बात की खोज करना चाहिये तथा उनके समान इन वरदानों का उपयोग प्रभु के कार्यों में करना चाहिये।




📚 REFLECTION



Today’s first reading presents us the godly personality of Stephen who was one of seven deacons selected by the apostles to oversee the distribution of the food. Stephen was a courageous man who set a trend of martyrdom for the generations to follow. He was the man of full of Holy Spirit. He had the wisdom that the Holy Spirit provides. Those traditional Jews were well versed in their tradition however could not match the wisdom with which Stephen spoke. Stephen spoke with audacious conviction in the sovereign God. His faith was so strong that he remained undeterred by the false and manipulated accusations of the crowd. Stephen was also full of grace. It would mean that he had a personal understanding and experience of Jesus. And God had blessed him with his grace in great measure.

Stephen was also full of power. God gave Stephen the ability to perform “great wonders and signs among the people” (6:8). People were amazed and overwhelmed by Stephen. These works of power had definitely provoked great envy in the traditional Jews who were opposing him.

Thus, Stephen’s inner qualities, being full of the Holy Spirit, wisdom, faith, grace, and power, show his deep-rootedness in God. Stephen made use of these gifts to give powerful witnessing of Jesus whom he had trusted.

Every baptised person has been sealed with the Holy Spirit. We all have received the gifts of the Holy Spirit. Either we are not aware or they are in dormant state we need to discover it with a life of prayer and faith like Stephen and use them for the glory of God.


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

इतवार, - 18 अप्रैल 2021 पास्का का तीसरा इतवार

इतवार, - 18 अप्रैल 2021

पास्का का तीसरा इतवार






पहला पाठ :प्रेरित-चरित 3:13-15,17-19

13) इब्राहीम, इसहाक और याकूब के ईश्वर ने, हमारे पूर्वजों के ईश्वर ने अपने सेवक ईसा को महिमान्वित किया है। आप लोगों ने उन्हें पिलातुस के हवाले कर दिया और जब पिलातुस उन्हें छोड़ कर देने का निर्णय कर चुका था, तो आप लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया।

14) आप लोगों ने सन्त तथा धर्मात्मा को अस्वीकार कर हत्यारे की रिहाई की माँग की।

15) जीवन के अधिपति को आप लोगों ने मार डाला; किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया। हम इस बात के साक्षी हैं।

17) भाइयो! मैं जानता हूँ कि आप लोग, और आपके शासक भी, यह नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

18) ईश्वर ने इस प्रकार अपना वह कथन पूरा किया जिसके अनुसार उसके मसीह को दुःख भोगना था और जिसे उसने सब नबियों के मुख से घोषित किया था।

19) आप लोग पश्चात्ताप करें और ईश्वर के पास लौट आयें, जिससे आपके पाप मिट जायें

दूसरा पाठ 1 योहन 2:1-5a.

1) बच्चो! मैं तुम लोगों को यह इसलिए लिख रहा हूँ कि तुम पाप न करो। किन्तु यदि कोई पाप करता, तो पिता के पास हमारे एक सहायक विद्यमान हैं, अर्थात् धर्मात्मा ईसा मसीह।

2) उन्होंने हमारे पापों के लिए प्रायश्चित किया है और न केवल हमारे पापों के लिए, बल्कि समस्त संसार के पापों के लिए भी।

3) यदि हम उनकी आज्ञाओं का पालन करेंगे, तो उस से हमें पता चलेगा कि हम उन्हें जानते हैं।

4) जो कहता है कि मैं उन्हें जानता हूँ, किन्तु उनकी आज्ञाओं का पालन नहीं करता वह झूठा है और उस में सच्चाई नहीं है।

5) परन्तु जो उनकी आज्ञाओं का पालन करता है, उस में ईश्वर का प्रेम परिपूर्णता तक पहुँचता है।

सुसमाचार : लूकस 24:35-48

35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।

36) वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, "तुम्हें शान्ति मिले!"

37) परन्तु वे विस्मित और भयभीत हो कर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं।

38) ईसा ने उन से कहा, "तुम लोग घबराते क्यों हो? तुम्हारे मन में सन्देह क्यों होता है?

39) मेरे हाथ और मेरे पैर देखो- मैं ही हूँ। मुझे स्पर्श कर देख लो- प्रेत के मेरे-जैसा हाड़-मांस नहीं होता।"

40) उन्होंने यह कह कर उन को अपने हाथ और पैर दिखाये।

41) जब इस पर भी शिष्यों को आनन्द के मारे विश्वास नहीं हो रहा था और वे आश्चर्यचकित बने हुए थे, तो ईसा ने कहा, "क्या वहाँ तुम्हारे पास खाने को कुछ है?"

42) उन्होंने ईसा को भुनी मछली का एक टुकड़ा दिया।

43) उन्होंने उसे लिया और उनके सामने खाया।

44) ईसा ने उन से कहा, "मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है"।

45) तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया

46) और उन से कहा, "ऐसा ही लिखा है कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे

47) और उनके नाम पर येरुसालेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप का उपदेश दिया जायेगा।

48) तुम इन बातों के साक्षी हो।

📚 मनन-चिंतन

प्रभु येसु का दुखभोग एवं मृत्यु ऐतिहासिक सत्य था। शिष्यों ने यह स्वयं देखा था तथा कुछ एक तो उनके दफन के समय भी मौजूद थे। इस प्रकार वे निश्चित तौर पर जानते थे कि येसु मर चुके थे। वे इन घटनाओं के कारण बेहद उदास थे। येसु की उनके दुखभोग तथा मृत्यु की भविष्यवाणी के बावजूद भी वे यही सोच रहे थे ऐसा कुछ नहीं होगा तथा अंत में येसु नाटकीय ढंग से राजनैतिक उलटफेर करेंगे। किन्तु क्रूस मरण ने उनकी सारी उम्मीदें छीन ली थी। ऐसी निराशाजनक अवस्था में पुनरूत्थान की खबर ने उन्हें संशय में डाल दिया था। ऐसी परिस्थिति में ईश्वर स्वयं उनके विश्वास को पुनःस्थापित करने की पहल करते हैं।

येसु पहले दो शिष्यों से एम्माउस के मार्ग में मिले थे तथा अब वे एक बंद कमरे में उन्हें दर्शन देते हैं। येसु अपने शिष्यों को आश्वसन देने के लिये तत्पर थे कि वे भूत-प्रेत नहीं वरन एक नयी अवस्था में वहीं येसु है जिन्हें वे जानते थे। उनकी पहचान का सबसे मजबूत सबूत उनके घाव थे, जो मसीह के चिन्ह थे, तथा उनकी भविष्य्वाणी के अनुरूप थे कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे। येसु मानवीय ढंग से उनके विश्वास को जीतना चाहते थे। वे अपने घावों को दिखाते तथा उनका स्पर्श करने का निमंत्रण देकर बताना चाहते हैं कि वे सचमुच के है। वे उनके सामने खाते हैं। फिर उन्हें समझाते हैं कि जो कुछ भी उनके साथ हुआ वह धर्मग्रंथ के अनुसार हुआ। संहिता, नबी, तथा स्तोत्र, जो कि धर्मग्रंथ के तीन भाग थे को उल्लेखित कर येसु यही बताते हैं कि मसीह के बारे में भविष्यवाणी सम्पूर्ण धर्मग्रंथ में की गयी है।

येसु के दुखभोग, मृत्यु तथा पुनरूत्थान से ईश्वर से मानवजाति के मिलन का मिशन उत्प्रेरित होता है जैसा कि प्रभु कहते हैं, ’’तुम इन बातों के साक्षी हो।’’ यह शिष्यों का मिशन है कि सारे संसार में ईश्वर के राज्य की स्थापन के लिये कार्यरत रहे। उन्हें येसु के नाम पर येरुसालेम से लेकर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिये पश्चाताप का उपदेश देना होगा।

कलीसिया अपने स्वाभाव से ही मिश्नरी है। ईश्वर के अनुभव तथा वरदानों को सभी के साथ बांटा जाना चाहिये ताकि सभी मुक्ति प्राप्त कर सके। यह कारण था कि शिष्यों ने ज्ञात दुनिया के सभी हिस्सों को येसु की शिक्षा तथा उनके पुनरूत्थान की सच्चाई से भर दिया था। कुरिन्थियों के नाम अपने पहले पत्र में संत पौलुस जिन्होंने स्वयं पुनरूत्थान की सच्चाई का अनुभव किया था, कहते हैं, ’’धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूं।’’(1 कुरि.9:16)

हम भी ईश्वर का अनुभव करते तथा उनके उपहारों को ग्रहण करते हैं। ये हमारी स्वयं की महिमा तथा उपभोग के लिये नहीं बल्कि दूसरों के कल्याण के लिये दिये गये हैं। हमें दूसरों के साथ येसु के पुनरूत्थान का सुसमाचार तथा ईश्वर के क्रियाशील सामर्थ्य को बांटना चाहिये। प्रेरितों के समान हम भी केवल वहीं बांट सकते हैं जो हमने अनुभव किया है तथा प्रभु से विनती करे कि वे हमारे हृदयों को धर्मग्रंथ को समझने के लिये खोले। केवल ईश्वर ही ऐसा कर सकते है। ईश्वर हमें उनकी राह देखते तथा उनके लिये पुनःआगमन के लिये उल्सित पाये।

📚 REFLECTION

The passion and death of the Jesus was a historical reality. The disciples had witnessed it and they and some of had been present at burial of Jesus. So, they knew for sure that Jesus was dead. They were dismayed at the turn of event for obvious reasons. Inspite of Jesus’ forewarning of his passion and death they had continued to hope for the sensational triumphant resurgence of Jesus at political platform. Now the news of resurrection had terribly confused them. They had already been devastated by the death and now the rising from the death had been too much to digest. But it was God who takes initiative in restoration of their faith.

Jesus meets them on the road to Emmaus previously and now when they had been closed up in a room the Lord Jesus appears to them. Jesus is keen to reassure his friends that he not a ghost, but the same one as before, though in a new state. The strongest proof of this identity are his wounds, a clear sign that ‘that the Messiah is to suffer and to rise from the dead on the third day’. Jesus tries to win over their confidence in a very human manner. He speaks to them of peace. He showed his wounds to be touched and felt. He eats with them. Definitely the Lord was not hungry but he wanted to be as human and normal as he was before. Jesus then goes on to explain, all that had happened to him was fully in harmony with and the fulfilment of the Law, the prophets and psalms. Mentioning the three parts of the Old Testament Jesus indicates that the Messiah was foretold through the whole of the scriptures.

Out of Christ’s suffering, death and resurrection comes the mission to proclaim reconciliation with God through Jesus to the whole word. “You are witnesses to this.” It is the mission of apostles to carry on the establishment of the Kingdom throughout the world. They are to preach “repentance, for the forgiveness of sin, in Jesus’ name to all the nations, beginning from Jerusalem”.

Church my nature is a missionary. God’s experience and gifts are to be shared so that all must obtain salvation. This is very reason the apostles would fill the whole known parts of the earth with the teachings and news of the resurrection of Jesus. Paul who come to the truth of the resurrection at a later stage would say, “Foe to me if I do not preach the gospel” and moreover if the Christ has not been risen then vain is our faith.” (1 Cor.9:16)

We too experience God and his gifts. They are not for self-glory or advantages but for the good of the others. We ought to be sharing with other the news of the risen Lord and his power working amidst us. Like the apostles we can only witness what we have already experienced and we ask the Lord to open our hearts to the understanding of the scripture and to the truth of his resurrection in our life. Only the Lord can do it and we shall be found waiting and thirsting for the his coming into our life.

मनन- चिं तन

मानव अनादि काल से ही शांति की खोज करता रहा है। इब्रानी भाषा में शांति को ’शालो’ कहते हैं जिसका अर्थ है, ’परिपूर्णता’, ’परिपक्वता’, ’सम्पूर्ण’। जब मनुष्य अपने अंतरतम में परिपूर्णता का अनुभव करता है तो उसे वह शांति प्राप्त होती है जिसकी तलाश उसे हमेशा से होती रही है। हम जिंदगी में शांति को समृद्धि में खोजने का प्रयत्न करते हैं। उपलब्धि, संपत्ति, अधिकार, विलक्षणता आदि के द्वारा भी हम परिपूर्णता या शांति को प्राप्त करना चाहते हैं। मानव पहाडों, गुफाओं, रेगिस्तानों जैसी एंकात स्थानों में शरण लेता है। जीवन जीने की विभिन्न शैलियॉ अपनाता तथा योग, प्राणिक चंगाई आदि कसरतें करता है। किन्तु ये मानवीय प्रयत्न क्षणिक सांसारिक उल्लास या सुख प्रदान करते हैं। स्थायी शांति फिर भी दूर बनी रहती है।

’शांति’ प्रभु येसु का वह अनमोल उपहार है जिसे उन्होंने अपने शिष्यों को दिया है। “मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो।” (योहन 14:27) प्रभु के जन्म पर भी स्वर्गदूतों के समूहों ने शांति के वरदान की घोषणा की थी, ‘‘सर्वोच्च स्वर्ग में ईश्वर की महिमा प्रकट हो और पृथ्वी पर उसके कृपापात्रों को शान्ति मिले!” (लूकस 2:14) प्रभु येसु के जन्म की भविष्यवाणी में भी नबी इसायाह उन्हें शांति का राजा कहते हैं, “....हम को एक पुत्र मिला है। उसके कन्धों पर राज्याधिकार रखा गया है और उसका नाम होगा- अपूर्व परामर्शदाता, शक्तिशाली ईश्वर, शाश्वत पिता, शान्ति का राजा।” (इसायाह 9:5) अपने शिष्यों का प्रेषण करते समय येसु उन्हें इसी शांति के साथ भेजते हैं। “जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ’इस घर को शान्ति!’ यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।” (लूकस 10:5-6) इब्रानियों के नाम पत्र का लेखक भी येसु को शांति का राजा बताते हैं। वे मेलखिसेदेक को, येसु का पूर्व-चिन्ह बताते हुये इंगित करते हैं, “सालेम के राजा और सर्वोच्च ईश्वर के पुरोहित ....मेलखिसेदेक का अर्थ है -धार्मिकता का राजा। वह सालेम के राजा भी है, जिसका अर्थ है- शान्ति के राजा।”(इब्रानियों 7:1-2)

प्रभु की मृत्यु के बाद जब शिष्य निराश एवं भयभीत थे तो पुनर्जीवित प्रभु तीन बार शिष्यों को पुनः शांति प्रदान करते है। “...ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, “तुम्हें शांति मिले!” और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, “तुम्हें शांति मिले!” (योहन 20:19-20) “वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, ‘‘तुम्हें शान्ति मिले!” (लूकस 24:36) इस प्रकार शांतिप्रदाता येसु शिष्यों के हृदयों की उथलपुथल को अपनी शांति से शांत करते हैं।

हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि हमारा ईश्वर शांति का ईश्वर है तथा उसने हमें शांति का जीवन जीने के लिए बुलाया है। जो शांति प्रभु हमें प्रदान करते हैं वह संसार की शांति के समान नहीं है जो कुछ क्षण के लिए हमें केवल शांति का अहसास कराती है। प्रभु की शांति उनके सानिध्य एवं सामिप्य से प्राप्त होती है।

जब येसु शिष्यों के साथ नाव में जा रहे थे तो नाव तूफान से घिर गयी थी। शिष्यों में भय छा गया था। वे इस डर और घबराहट के बीच येसु को जगाते हैं। येसु ने “वायु को डाँटा और समुद्र से कहा, “शान्त हो! थम जा!” वायु मन्द हो गयी और पूर्ण शान्ति छा गयी।” (मारकुस 4:39) संत पौलुस कहते हैं, “ईश्वर कोलाहल का नहीं, वरन् शान्ति का ईश्वर है।...” (1 कुरि. 14:33) हमारे जीवन में भी हम अव्यवस्था, अंशांति एवं तूफानों से गुजरते हैं। ऐसी परिस्थितियों में हमें शांति के राजा येसु को पुकारना चाहिए जो सारे कोलाहल को शांत करते हैं। यदि विषम परिस्थितियों में हम सांसारिक तिकडमों पर भरोसा करेंगे तो यह कोलाहल बढता ही जायेगा।

प्रभु की शांति को प्राप्त करने और उसमें बने रहने के लिए हमें लोगों के बीच शांति स्थापित करना चाहिए। जो व्यक्ति मेलमिलाप के कार्यों में लगे रहते हैं वे सचमुच में ऐसे लोग है जो प्रभु की शांति का अनुभव करते हैं। उसी शांति से प्रेरित होकर वे मेल कराते हैं। ऐसे शांतिप्रिय लोगों को येसु धन्य कह कर पुकारते हैं, “धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।” (मत्ती 5:9) इसी प्रकर अपने शिष्यों को नमक के समान बनने की चुनौती देने के साथ-साथ येसु हमें आपसी शांति एवं मेल-मिलाप को बनाये रखने का आव्हान करते हैं। “...अपने में नमक बनाये रखो और आपस में मेल रखो।” (मारकुस 9:50) ईश्वर जो शांति का ईश्वर है चाहते हैं कि हम अपने कार्यों के द्वारा शांति भंग न करें तथा शांति स्थापित कर प्रभु की धन्यता को धारण करना चाहिए। इस प्रकार “ईश्वर की शान्ति, जो हमारी समझ से परे हैं, आपके हृदयों और विचारों को ईसा मसीह में सुरक्षित रखेगी।” (फिलिल्पियों 4:7) यह वही शांति है जिसे येसु अपने भयभीत शिष्यों को अपने पुनरूत्थान के बाद प्रदान करते हैं।

✍ BR. BINIUSH TOPNO


copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the lord

आज का पवित्र वचन शनिवार, - 17 अप्रैल 2021

 

शनिवार, - 17 अप्रैल 2021

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ :प्रेरित-चरित 6:1-7


1) उन दिनों जब शिष्यों की संख्या बढ़ती जा रही थी, तो यूनानी-भाषियों ने इब्रानी-भाषियों के विरुद्ध यह शिकायत की कि रसद के दैनिक वितरण में उनकी विधवाओं की उपेक्षा हो रही है।

2) इसलिए बारहों ने शिष्यों की सभा बुला कर कहा, "यह उचित नहीं है कि हम भोजन परोसने के लिए ईश्वर का वचन छोड़ दे।

3) आप लोग अपने बीच से पवित्र आत्मा से परिपूर्ण सात बुद्धिमान् तथा ईमानदार व्यक्तियों का चुनाव कीजिए। हम उन्हें इस कार्य के लिए नियुक्त करेंगे,

4) और हम लोग प्रार्थना और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।"

5) यह बात सबों को अच्छी लगी। उन्होंने विश्वास तथा पवित्र आत्मा से परिपूर्ण स्तेफनुस के अतिरिक्त फिलिप, प्रोख़ोरुस, निकानोर, तिमोन, परमेनास और यहूदी धर्म में नवदीक्षित अन्ताखिया-निवासी निकोलास को चुना

6) और उन्हें प्रेरितों के सामने उपस्थित किया। प्रेरितों ने प्रार्थना करने के बाद उन पर अपने हाथ रखे।

7) ईश्वर का वचन फैलता गया, येरुसालेम में शिष्यों की संख्या बहुत अधिक बढ़ने लगी और बहुत-से याजकों ने विश्वास की अधीनता स्वीकार की।


सुसमाचार : योहन 6:16-21


16) सन्ध्या हो जाने पर शिष्य समुद्र के तट पर आये।

17) वे नाव पर सवार हो कर कफरनाहूम की ओर समुद्र पार कर रहे थे। रात हो चली थी और ईसा अब तक उनके पास नहीं आये थे।

18) इस बीच समुद्र में लहरें उठ रही थी, क्योंकि हवा जोरों से चल रही थी।

19) कोई तीन-चार मील तक नाव खेने के बाद शिष्यों ने देखा कि ईसा समुद्र पर चलते हुए, नाव की ओर आगे बढ़ रहे हैं। वे डर गये,

20) किन्तु ईसा ने उन से कहा, "मैं ही हूँ। डरो मत।"

21) वे उन्हें चढ़ाना चाहते ही थे कि नाव तुरन्त उस किनारे, जहाँ वे जा रहे थे, लग गयी।


📚 मनन-चिंतन


प्राथमिकतायें जीवन को दिशा और मकसद प्रदान करती है। यह आवश्यक है कि हम यह जाने कि हम क्या चाहते हैं तथा किन बातों पर केंद्रित होकर अपने लक्ष्यों की प्राप्ति करना चाहते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हमारी प्राथमिकताओं को छोडकर दूसरी बातें मायने नहीं रखती किन्तु जीवन की प्राथमिकतायें ही है जो हमें अन्य बातों से दूर रखती है। संत पौलुस बहुत खूबसूरती यह इस बात को बताते हुये कहते हैं, ’’मुझे सब कुछ करने की अनुमति है, किन्तु सब कुछ हितकर नहीं। मुझे सब कुछ करने की अनुमति है, किन्तु मैं किसी भी चीज का गुलाम नहीं बनूँगा।’’ (1 कुरि. 6:12)

आज के पहले पाठ में हमें पढते है भोजन वितरण के दौरान कुछ लोगों को भेदभाव का सामना पडता है। एक विशेष वर्ग की अवहेलना की जा रही है। यह एक वास्तविक समस्या थी जिसका शीघ्र निवारण किया जाना आवश्यक था। लेकिन प्रेरितों ने प्रार्थना तथा वचन के प्रचार को उनके जीवन की प्राथमिकता बताते हुये इस समस्या से सीधे रूप से जुडने से इंकार कर दिया। उन्होंने इसके लिये योग्य व्यक्तियों को चुनकर भेदभाव की समस्या को सुधारने को कहा।

हम निरंतर निर्णय लेते हैं। हमें प्राथमिकता पर ध्यान देना चाहिये अन्यथा हम मंजिल से भटक जायेंगे। प्राथमिकताओं से शुरूआती भटकाव इतना सूक्ष्म होता है कि हमें इसका अहसास ही नहीं होता है किन्तु जब इसका प्रभाव पडने लगता है तो जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है।

प्राथमिकतायें हमें प्रभावी तथा क्रियाशील बनाये रखती है। हमें अपने लक्ष्य का सदैव ध्यान रहता है क्योंकि हम निरंतर लक्ष्य के पक्ष में निर्णय लेते रहते हैं। यह प्रभावशीलता प्रेरितों के कार्यों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है जैसा कि बताया गया है, ’’ईश्वर का वचन फैलता गया, येरुसालेम में शिष्यों की सख्ंया बहुत बढने लगी और बहुत से याजकों ने विश्वास की अधीनता स्वीकार की।’’




📚 REFLECTION



Priorities are the things that give life meaning and a purpose. It is important to know what we want and focus on while trying to achieve the goal. That doesn’t mean that other things are not important or useful but it is matter of priority in life that we refrain from something. St. Paul beautifully describes it, "I have the right to do anything," you say--but not everything is beneficial. "I have the right to do anything"--but I will not be mastered by anything.” (1 Corinthians 6:12 )

Today’s first reading from the Acts of the Apostles describes a situation when people faced partiality in the distribution of food. They felt a certain section was being neglected. It was a genuine problem and demanded an immediate action. However, apostles refused to be drawn into it on the ground that their priority was to pray and preach. They decided to remain adhered to their priorities and found another solution for it. They appointed others trusted men to oversee the distribution and solve the issues.

We constantly make decisions. We need to prioritise the work otherwise the deviate from the destination would be inevitable. The problem is that the deviation can be so subtle that it may go unnoticed at initially but would land us on a distant territory.

Priorities keep us motivated and effected in our work. We are constantly reminded of our goal since we make conscious efforts and decisions in its favour. This effectiveness is extremely perceivable in the work of apostles as it reported in the following verses, “The word of God continued to increase and the number of the disciples multiplied greatly in Jerusalem…”

✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

शुक्रवार, - 16 अप्रैल 2021

 

शुक्रवार, - 16 अप्रैल 2021

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ :प्रेरित-चरित 5:34-42


34) उस समय गमालिएल नामक फ़रीसी, जो संहिता का शास्त्री और सारी जनता में सम्मानित था, महासभा में उठ खड़ा हुआ। उसने प्रेरितों को थोड़ी देर के लिए बाहर ले जाने का आदेश दिया

35) और महासभा के सदस्यों से यह कहा, "इस्राइली भाइयों! आप सावधानी से विचार करें कि इन लोगों के साथ क्या करने जा रहे हैं।

36) कुछ समय पहले थेउदस प्रकट हुआ। वह दावा करता था कि मैं भी कुछ हूँ और लगभग चार सौ लोग उसके अनुयायी बन गये। वह मारा गया, उसके सभी अनुयारी बिखर गये और उनका नाम-निशान भी नहीं रहा।

37) उसके बाद, जनगणना के समय, यूदस गलीली प्रकट हुआ। उसने बहुत-से लोगों को बहका कर अपने विद्रोह में सम्मिलित कर लिया। वह भी नष्ट हो गया और उसके सभी अनुयायी बिखर गये।

38) इसलिए इस मामले के सम्बन्ध में मैं आप लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि आप इनके काम में दखल न दें और इन्हें अपनी राह चलने दें। यदि यह योजना या आन्दोलन मनुष्यों का है, तो यह अपने आप नष्ट हो जायेगा।

39) परन्तु यदि यह ईश्वर का है, तो आप इन्हें नहीं मिटा सकेंगे और ईश्वर के विरोधी प्रमाणित होंगे।"

40) वे उसकी बात मान गये। उन्होंने प्रेरितों को बुला भेजा, उन्हें कोड़े लगवाये और यह कड़ा आदेश दे कर छोड़ दिया कि तुम लोग ईसा का नाम ले कर उपदेश मत दिया करो।

41) प्रेरित इसलिए आनन्दित हो कर महासभा के भवन से निकले कि वे {ईसा के} नाम के कारण अपमानित होने योग्य समझे गये।

42) वे प्रतिदिन मन्दिर में और घर-घर जा कर शिक्षा देते रहे और ईसा मसीह का सुसमाचार सुनाते रहे।


सुसमाचार : योहन 6:1-15


1) इसके बाद ईसा गलीलिया अर्थात् तिबेरियस के समुद्र के उस पर गये।

2) एक विशाल जनसमूह उनके पीछे हो लिया, क्योंकि लोगों ने वे चमत्कार देखे थे, जो ईसा बीमारों के लिए करते थे।

3) ईसा पहाड़ी पर चढ़े और वहाँ अपने शिष्यों के साथ बैठ गये।

4) यहूदियों का पास्का पर्व निकट था।

5) ईसा ने अपनी आँखें ऊपर उठायीं और देखा कि एक विशाल जनसमूह उनकी ओर आ रहा है। उन्होंने फिलिप से यह कहा, "हम इन्हें खिलाने के लिए कहाँ से रोटियाँ खरीदें?"

6) उन्होंने फिलिप की परीक्षा लेने के लिए यह कहा। वे तो जानते ही थे कि वे क्या करेंगे।

7) फिलिप ने उन्हें उत्तर दिया, "दो सौ दीनार की रोटियाँ भी इतनी नहीं होंगी कि हर एक को थोड़ी-थोड़ी मिल सके"।

8) उनके शिष्यों में एक, सिमोन पेत्रुस के भाई अन्द्रेयस ने कहा,

9) "यहाँ एक लड़के के पास जौ की पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं, पर यह अतने लोगों के लिए क्या है,"

10) ईसा ने कहा, "लोगों को बैठा दो"। उस जगह बहुत घास थी। लोग बैठ गये। पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार थी।

11) ईसा ने रोटियाँ ले लीं, धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और बैठे हुए लोगों में उन्हें उनकी इच्छा भर बँटवाया। उन्होंने मछलियाँ भी इसी तरह बँटवायीं।

12) जब लोग खा कर तृत्त हो गये, तो ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो, जिससे कुछ भी बरबाद न हो"।

13) इस लिए शिष्यों ने उन्हें बटोर लिया और उन टुकड़ों से बारह टोकरे भरे, जो लोगों के खाने के बाद जौ की पाँच रोटियों से बच गये थे।

14) लोग ईसा का यह चमत्कार देख कर बोल उठे, "निश्चय ही यह वे नबी हैं, जो संसार में आने वाले हैं"।

15) ईसा समझ गये कि वे आ कर मुझे राजा बनाने के लिए पकड़ ले जायेंगे, इसलिए वे फिर अकेले ही पहाड़ी पर चले गये।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु के जीवन, मृत्यु एवं पुनरूत्थान की घटनाओं तथा पेंतेकोस्त के दिन पवित्र आत्मा के उतरने से प्रेरित नयी स्फूर्ति तथा सामर्थ्य से भर गये थे। वे पुनर्जीवित प्रभु का प्रचार साहस एवं बेहद प्रभावी रूप से कर रहे थे। यहूदी नेता येसु की सच्चाई के प्रति अंधे थे तथा किसी भी तरीके से वे प्रेरितों के प्रचार कार्य का दमन करना चाहते थे। उनके पास राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा वित्तीय ताकतें थी जिसके द्वारा वे आक्रामक रूप से इन्हें दबाने का प्रयत्न कर रहे थे। इस पृष्ठभूमि में एक फरीसी गमालिएल जो संहिता का शास्त्री था ने ईश्वर पर भरोसा रखने का सुझाव देते हुये बताया कि पहले भी ऐसे अनेक आंदोलन हुये जो ऐसे प्रतीत होते थे मानो वह सफल होंगे किन्तु उनका दुःखद अंत हुआ। इसी प्रकार ख्राीस्त के प्रचार का यह प्रयास यदि मानवीय प्रयास है तो यह भी विफल हो जायेगा।

गमालिएल ने ईश्वर के सामर्थ्य में सच्चा विश्वास दिखाया। वह महासभा के सदस्यों से कहता हैं, ’’आप इनके काम में दखल न दें और इन्हें अपनी राह चलने दें। यदि यह योजना या आन्दोलन मनुष्यों का है तो यह अपने आप नष्ट हो जायेगा। परन्तु यदि यह ईश्वर का है तो आप इन्हें नहीं मिटा सकेंगे और ईश्वर के विरोधी प्रमाणित होंगे। ईश्वर के हाथों में सारी स्थिति सौंपने की यह बात साहसपूर्ण थी। ऐसा करने के लिये हमें गहरे विश्वास की आवश्यकता होती है अन्यथा परिस्थितियां हमें तबाह कर सकती है। राजा दाउद ईश्वर की अभिमुख मनुष्य था। वे जीवन की घटनाओं को ईश्वर के दृष्टिकोण से देखते थे। जब उन्हें अपनी जान बचाने के भागना पडा तो साउल का वंशज शिमई उसे कोसता है किन्तु दाउद इस बात से कतई उत्तेजित नहीं होते तथा कहते हैं, ’’यदि वह इसलिए दाऊद को कोसता है कि प्रभु ने उसे ऐसा करने की प्रेरणा दी है, तो कौन पूछ सकता है कि तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?.....उसे कोसने दो, क्योंकि प्रभु ने उसे ऐसा करने की प्रेरणा दी है।’’ (2 समूएल 16:10-12) संत पौलुस ईश्वर की उदारता का आश्वासन देते हुये कहते हैं, ’’हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है’’। (रोमियों 8:28)




📚 REFLECTION



After the events related to Jesus’ life, death, resurrection and outpouring of the Holy Spirit at the Pentecost apostles were filled with great energy and strength. They were proclaiming the Risen Lord with unspoken boldness and emphatic. The Jews leaders being blind to the reality of the resurrection were terribly hostile and wanted to snub the apostles’ proclamation activities. They had the political, social, religious and financial muscle power to suppress the movement and in fact they were aggressively doing it. in such a scenario Gamaliel a Pharisee, a teacher of the law, dared to trust God, even if it means losing ground. He cited the earlier movements that seemed so real and powerful that everyone thought they might be game changer. However, after initial hype they were doomed to oblivion.

Gamaliel displayed a real faith in the power of God. He exhorted the council with the words, “Keep away from these men and let them alone; because if this plan or this undertaking is of human origin, it will fail; but if it is of God, you will not be able to overthrow them—in that case you may even be found fighting against God!’ (Acts 5:38-39) It was a brave call to leave the things or situation into God’s hands. Many a times when we are at the cross roads and find it difficult to discern, it is better to leave the things in God’s hand. For this we need to have a depth in our faith otherwise things or situations will tear us apart. King David was the man after the heart of God. He would always see things from God’s perspective. He had to a flee to save his life and when during this run, he had to face the abusive curses of Shimei but David refused to take offence at the cursing of the Shimei, descendent of Saul saying, “If he is cursing because the Lord has said to him, “Curse David”, who then shall say, “Why have you done so?”….It may be that the Lord will look on my distress, and the Lord will repay me with good for this cursing of me today.’ (2 Samuel 16:10-12) St. Paul assures us of God’s benevolent help, “We know that in everything God works for good with those who love him, who are called according to his purpose. ” (Romans 8:28)


✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

आज का पवित्र वचन बुधवार - 14 अप्रैल 2021

 

बुधवार - 14 अप्रैल 2021

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : प्रेरित-चरित 5:17-26


17) यह सब देख कर प्रधानयाजक और उसके सब संगी-साथी, अर्थात् सदूकी सम्प्रदाय के सदस्य, ईर्ष्या से जलने लगे।

18) उन्होंने प्रेरितों को गिरफ्तार कर सरकारी बन्दीगृह में डाल दिया।

19) परन्तु ईश्वर के दूत ने रात को बन्दीगृह के द्वार खोल दिये और प्रेरितों को बाहर ले जा कर यह कहा,

20) "जाइए और निडर हो कर मन्दिर में जनता को इस नव-जीवन की पूरी-पूरी शिक्षा सुनाइए"। उन्होंने यह बात मान ली और भोर होते ही वे मन्दिर जा कर शिक्षा देने लगे।

21) जब प्रधानायाजक और उसके संगी-साथी आये, तो उन्होंने महासभा अर्थात् इस्राएली नेताओं की सर्वोच्च परिषद् बुलायी और प्रेरितों को ले आने के लिए प्यादों को बन्दी-गृह भेजा।

22) जब प्यादे वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने प्रेरितों को बन्दीगृह में नहीं पाया। उन्होंने लौट कर यह समाचार दिया,

23) "हमने देखा कि बन्दीगृह बड़ी सावधानी से बन्द किया हुआ है और पहरेदार फाटकों पर तैनात हैं, किन्तु खोलने पर हमें भीतर कोई नहीं मिला।

24) यह सुन कर मन्दिर-आरक्षी के नायक और महायाजक यह नहीं समझ पा रहे थे कि प्रेरितों का क्या हुआ है।

25) इतने में किसी ने आ कर उन्हें यह समाचार दिया, "देखिए, आप लोगों ने जिन व्यक्तियों को बन्दीगृह में डाल दिया, वे मन्दिर में जनता को शिक्षा दे रहे हैं"।

26) इस पर मन्दिर का नायक अपने प्यादों के साथ जा कर प्रेरितों को ले आया। वे प्रेरितो को बलपूर्वक नहीं लाये, क्योंकि वे लोगों से डरते थे कि कहीं हम पर पथराव न करें।


सुसमाचार : योहन 3:16-21


16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।

17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।

18) जो पुत्र में विश्वास करता है, वह दोषी नहीं ठहराया जाता है। जो विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहराया जा चुका है; क्योंकि वह ईश्वर के एकलौते पुत्र के नाम में विश्वास नहीं करता।

19) दण्डाज्ञा का कारण यह है कि ज्योति संसार में आयी है और मनुष्यों ने ज्योति की अपेक्षा अन्धकार को अधिक पसन्द किया, क्योंकि उनके कर्म बुरे थे।

20) जो बुराई करता है, वह ज्योंति से बैर करता है और ज्योति के पास इसलिए नहीं आता कि कहीं उसके कर्म प्रकट न हो जायें।

21) किन्तु जो सत्य पर चलता है, वह ज्योति के पास आता है, जिससे यह प्रकट हो कि उसके कर्म ईश्वर की प्रेरणा से हुए हैं।


📚 मनन-चिंतन


अधिकाश लोग चमत्कार एवं दिव्य उपहारों को खोजते हैं और ऐसा करने में कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन स्वयं से यह सवाल भी पूछना चाहिये कि हम इन्हें क्यों चाहते हैं। यदि इन अभिलाषाओं एवं उपहारों को व्यक्तिगत और सांसारिक लाभ के लिये की जा रही हो तो वे शायद ही हमें मिले। किन्तु यदि वे ईश्वर की महिमा के लिये हो तो ईश्वर लौकिक एवं अलौकिक रूप से अवश्य ही हस्तक्षेप कर सकते हैं। ईश्वर के उपहार समुदाय के कल्याण के लिये होते हैं। ये ईश्वर की शक्ति एवं सामर्थ्य के चिन्ह होते हैं। जब पावन आत्मा के वरदान प्रत्याक्ष रूप में विश्वासियों और गैर-विश्वासियों पर प्रकट होते हैं तो वह लोगों के विश्वास को बढाता तथा ढांढस देता है ईश्वर समीप ही है तथा वह हमारे कल्याण के लिये कार्यरत है। जब ईश्वर अपने प्रेम, शक्ति-सामर्थ्य और प्रज्ञा को विश्वाससियों के द्वारा प्रदर्शित करता है तो गैर-विश्वासी इस चमत्कारों के समक्ष ईश्वर की सत्यता से रूबरू होते हैं। जो लोग ईश्वर प्रद्त्त उपहारों या चमत्कारों को करते हैं, वे लोगों की सेवा एवं कल्याण के लिये, मात्र ईश्वर के उपकरण एवं माध्यम होते हैं। हमें इन चमत्कारों को तुच्छ मानवीय लाभ की दृष्टि या दायरे से नहीं देखना चाहिये।

जब ईर्ष्या की भावना से महायाजक तथा अन्यों ने प्रेरितों का गिरफतार कर जेल में डालवा दिया था तो ईश्वर ने उन्हें आश्चर्यजनक ढंग से मुक्त कर दिया। कारावास के द्वार अपने आप खुल जाते हैं और वे बाहर आ जाते हैं। पहरेदारों ने द्वारों को ताला बंद पाया किन्तु प्रेरित अंदर नहीं थे। ईश्वर ने प्रेरितों को इस अलौकिक रूप इसलिये मुक्त कराया ताकि वे जाकर उन्हीं लोगों के समक्ष गवाही दे सके जिन्होंने उन्हें गिरफतार किया था। इस मुक्तिकार्य से विरोधी अंचभित थे। वे उनके इस प्रकार कारावास से छुटने को लेकर विस्मित थे। वे आश्चर्यचकित तो थे किन्तु इस महान कार्य में ईश्वर का सामर्थ्य पहचानने से इंकार करते हैं। महायाजकों तथा अन्य पुनः उनके विरूद्ध षडयंत्र रचने लगते हैं।

हमें अपने जीवन में तथा योजनाओं में इतना अधिक नहीं डूबना चाहिये कि हम ईश्वर की उपस्थिति को ही न पहचान पाये।




📚 REFLECTION



We seek miracles and divine gifts and we are not wrong in seekingthem in our lives. Sometimes it is good to ask ourselves so as why do we need them. If the gifts or miracles are meant for individual gains or mundane reasons then they may be hard to come by, however, if they are for the glory of God and not for vain human self then God may intervene even in some supernatural and human ways. God’s gifts are meant for the welfare of a larger community. They merely reflect God’s power among men. When the Holy Spirit works in various ways that can be perceived by believers and unbelievers, this encourages people’s faith that God is near and active and that he is working to fulfil his purposes in us and to bring blessings to his people. The unbelievers come face to face with the reality of the living God as He displays His power, His love, and His wisdom through His people.Those who receive God’s gifts are merely instruments of God for others. We must never confuse the gifts with petty selfish motives or gains.

When out of jealously the high priest and others arrested and put the apostles in public prison the Lord rescued them in an astonishing manner. The prison gates were opened and they moved out of the prison. The gourds found the prison securely locked but the apostles had not been there. The Lord did this great thing only to send them back to bear witness to the very people they had been arrested by. This rescue work left the oppositions into in to perplexity. They wonder how could some people be out of the tightly secured prison. They wondered about the incident but refused to believe God’s hand in such an extra-ordinary way. The chief priests and others still refused to believe in the power working in and through the apostles. They again began to plot how to destroy them.

We should not so much engrossed in our thinking and understanding of the events of life that we may fail to see God and his ways.

✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!