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Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

25 सितंबर का पवित्र वचन

 

25 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : उपदेशक 3:1-11

1) पृथ्वी पर हर बात का अपना वक्त और हर काम का अपना समय होता है:

2) प्रसव करने का समय और मरने का समय; रोपने का समय और पौधा उखाड़ने का समय;

3) मारने का समय और स्वस्थ करने का समय; गिराने का समय और उठाने का समय;

4) रोने का समय और हँसने का समय; विलाप करने का समय और नाचने का समय;

5) पत्थर बिखेरने का समय और पत्थर एकत्र करने का समय; आलिंगन करने का समय और आलिंगन नहीं करने का समय;

6) खोजने का समय और खोने का समय; अपने पास रखने का समय और फेंक देने का समय;

7 फाड़ने का समय और सीने का समय; चुप रहने का समय और बोलने का समय;

8) प्यार करने का समय और बैर करने का समय; युद्ध का समय और शान्ति का समय।

9) मनुष्य को अपने सारे परिश्रम से क्या लाभ ?

10) ईश्वर ने मनुष्यों को जो कार्य सौंपा है, मैंने उस पर विचार किया।

11) उसने सब कुछ उपयुक्त समय के अनुसार सुन्दर बनाया है। उसने मनुष्य को भूत और भविष्य का विवेक दिया है; किन्तु ईश्वर ने प्रारम्भ से अन्त तक जो कुछ किया, उसे मनुष्य कभी नहीं समझ सका।


सुसमाचार :लूकस 9:18-22

18) ईसा किसी दिन एकान्त में प्रार्थना कर रहे थे और उनके शिष्य उनके साथ थे। ईसा ने उन से पूछा, "मैं कौन हूँ, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?"

19) उन्होंने उत्तर दिया, "योहन बपतिस्ता; कुछ लोग कहतें-एलियस; और कुछ लोग कहते हैं-प्राचीन नबियों में से कोई पुनर्जीवित हो गया है"।

20) ईसा ने उन से कहा, "और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?" पेत्रुस ने उत्तर दिया, "ईश्वर के मसीह"।

21) उन्होंने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि वे यह बात किसी को भी नहीं बतायें।

22) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, "मानव पुत्र को बहुत दुःख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा"।

📚 मनन-चिंतन

किसी भी अन्य सुसमाचार लेखक की तुलना में, संत लूकस येसु को एक प्रार्थनामय व्यक्ति के रूप में अधिक चित्रित करता है, जिसने नियमित रूप से प्रार्थना की, विशेष रूप से अपने जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में। आज के सुसमाचार की शुरुआत में हम येसु को प्रार्थना में पाते हैं। प्रभु येसु ने हमें प्रार्थना करने की न केवल हमें शिक्षा दी पर उन्होंने हमें अपने प्रार्थनामय जीवन द्वारा यह बतलाया कि प्रार्थना के बिना हमें हमारे जीवन में कुछ भी कार्य नहीं करना चाहिए। वे ईश पुत्र थे परन्तु फिर भी उन्होंने बिना प्रार्थना के कुछ भी काम नहीं किया: चाहे वह उनकी सेवकाई हो, प्रेरितों को चुनना हो, कोई चिन्ह अथवा चमत्कार करना हो, दुःख भोगना हो या फिर क्रूस पर मरना हर बार उन्होंने प्रार्थना की। प्रार्थना के बाद किये हर काम में प्रभु येसु को विजय मिली। चाहे वह कोई निर्णय हो, कोई कार्य हो, कोई चमत्कार हो या फिर उनकी मौर ही हो वे हर बार विजय ही रहे।

प्रभु येसु, प्रार्थना की इसी ताकत से हमें रूबरू कराते हैं और हमारा आह्वान करते हैं कि हम हमारे जीवन में उनकी ही तरह प्रार्थना को अपना हथियार और जीवन की ताकत बना लें और प्रार्थना के बिना कुछ की भी शुरुआत न करें। तब हम चीज़ों को बदलते हुए देखेंगे, हमारे जीवन में ईश्वर के सामर्थ्य को देखेंगे और प्रार्थना में ईश्वर हमारे जीवन की अगुवाई अपनी राहों पर करेंगे। आमेन



📚 REFLECTION

Compared to any other gospel writer, St. Luke portrays Jesus as more of a prayerful person who prayed regularly, especially at key moments of his life. At the beginning of today's Gospel we find Jesus in prayer. Lord Jesus not only prayed, but he taught us through his prayerful life that without prayer we should not do anything in our life. He was the son of God, but yet he did nothing without prayer: whether it was his ministry, choosing the Apostles, performing signs or miracles, suffering or dying on the cross each time He prayed. Jesus got victory in everything he did after praying; whether it is a decision, a task, or a miracle.

Jesus, makes us aware of the power of prayer, and invites us to make pray our spiritual weapon and strength of life and do not start anything without prayer. Then we will see things changing, we will see the power of God in our life and in prayer God will lead our life in our own way. Amen.

24 सितंबर का पवित्र वचन

 

24 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : उपदेशक 1:2-11

2) उपदेशक कहता है, "व्यर्थ ही व्यर्थ; व्यर्थ ही व्यर्थ; सब कुछ व्यर्थ है।"

3) मनुष्य को इस पृथ्वी पर के अपने सारे परिश्रम से क्या लाभ?

4) एक पीढ़ी चली जाती है, दूसरी पीढ़ी आती है और पृथ्वी सदा के लिए बनी रहती है।

5) सूर्य उगता है और सूर्य अस्त हो जाता है। वह शीघ्र ही अपने उस स्थान पर जाता है, जहाँ से वह फिर उगता है।

6) हवा दक्षिण की ओर बहती है, वह उत्तर की ओर मुड़ती है; वह घूम-घूम कर पूरा चक्कर लगाती है।

7) सब नदियाँ समुद्र में गिरती हैं; किन्तु समुद्र नहीं भरता। और नदियाँ जिधर बहती है, उधर ही बहती रहती हैं।

8) यह सब इतना नीरस है, कि कोई भी इसका पूरा-पूरा वर्णन नहीं कर पाता। आँखें देखने से कभी तृप्त नहीं होतीं और कान सुनने से कभी नहीं भरते।

9) जो हो चुका है, वह फिर होगा। जो किया जा चुका है, वह फिर किया जायेगा। पृथ्वी भर में कोई भी बात नयी नहीं होती।

10) जिसके विषय में लोग कहते हैं, "देखों, यह तो नयी बात है" वह भी हमारे समय से बहुत पहले हो चुकी है।

11) पहली पीढ़ियों के लोगों की स्मृति मिट गयी है और आने वाली पीढ़ियों की भी स्मृति परवर्ती लोगों मे नहीं बनी रहेगी।


सुसमाचार :लूकस 9:7-9

7) राजा हेरोद उन सब बातों की चर्चा सुन कर असमंजस में पड़ गया, क्योंकि कुछ लोग कहते थे कि योहन मृतकों में से जी उठा है।

8) कुछ कहते थे कि एलियस प्रकट हुआ है और कुछ लोग कहते थे कि पुराने नबियों में से कोई जी उठा है।

9) हरोद ने कहा, "योहन का तो मैंने सिर कटवा दिया। फिर यह कौन है, जिसके विषय में ऐसी बातें सुनता हूँ?" और वह ईसा को देखने के लिए उत्सुक था।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में वर्णित हेरोद, हेरोद एंटिपस है, हेरोद महान का पुत्र है; वह येसु की सेवकाई दौरान गलीलिया में शासन करते थे । लूकस ने उन्हें येसु को लेकर जिज्ञासु व्यक्ति के रूप में उन्हें चित्रित किया है। उसने उन सभी बातों और कार्यों के बारे में सुना है जो येसु द्वारा किए जा रहे हैं और वह हैरान है। वह खुद से पूछता है, यह मैं किसके बारे में ऐसी खबरें सुन रहा हूं? ’वह येसु को देखने के लिए बेचैन है। येसु के बारे में इस तरह की जिज्ञासा और जानने की इच्छा, कुछ लोगों के लिए विश्वास की शुरुआत हो सकती है। फिर भी, यहां तक कि जो लोग जीवन भर विश्वासी रहे हैं, और यीशु के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, वे भी हैरान रहेंगे, और यह मौलिक सवाल पूछना जारी रखेंगे , 'यह कौन है?' येसु के रहस्य की गहराई, ऊंचाई चौड़ाई है वह अनंत है इस रहस्य को हम कभी पूरी तरह से समझ नहीं पाएंगे। पर एक विश्वासियों होने के नाते हम उन्हें आधी से अधिक जानने के की साथ करते रहें, प्रयत्न करते रहें, न केवल दिमाग से पर दिल व आत्मा से भी।

संत रिचर्ड की एक छोटी सी प्रार्थना मुझे याद आ रही है - Day by day, day by day, O, dear Lord, three things I pray: to see thee more clearly, love thee more dearly, follow thee more nearly, day by day. हे प्रभु ! दिन-ब-दिन मैं बस तीन चीज़ों के लिए हूँ: कि मैं तुझे और स्पष्टता से देख सकूँ; तुझे और गहराई से प्यार कर सकूँ , और करीबी से तेरा अनुसरण कर सकूँ।



📚 REFLECTION

The Herod, mentioned in today's gospel, is Herod Antipas, the son of Herod the Great; He ruled in Galilee during Jesus’ ministry. Luke portrays him as a curious person about Jesus. He has heard about all the works which were being done by Jesus and he was surprised. He asked himself, ‘who am I hearing such news about? 'He was restless to see Jesus. Such curiosity and desire to know about Jesus may be the beginning of faith for some people. Yet, even those who have been believers for whole life also will not be able to comprehend Jesus fully. They will continue to ask the fundamental question, 'Who is this?’

The depth, height and breadth of the mystery of Jesus is infinite, we will never fully grasp this mystery. But as believers, we keep the process of knowing Jesus on. We keep exploring the height, depth and width of Jesus. We search Him with all our mind, heart and soul.

I am remember a small prayer from Saint Richard - Day by day, day by day, O, dear Lord, three things I pray: to see You more clearly, love You more dearly, follow You more nearly,

23 सितंबर का पवित्र वचन

23 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : सुक्ति 30:5-9

5) ईश्वर की प्रत्येक प्रतिज्ञा विश्वसनीय है। ईश्वर अपने शरणार्थियों की ढाल है।

6) उसके वचनों में अपनी और से कुछ मत जोड़ो, कहीं ऐसा न हो कि वह तुम को डाँटे और झूठा प्रमाणित करे।

7) मैं तुझ से दो वरदान माँगता हूँ, उन्हे मेरे जीवनकाल में ही प्रदान कर।

8) मुझ से कपट और झूठ को दूर कर दे। मुझे न तो गरीबी दे और न अमीरी- मुझे आवश्यक भोजन मात्र प्रदान कर।

9) कहीं ऐसा न हो कि मैं धनी बन कर तुझे अस्वीकार करते हुए कहूँ "प्रभु कौन है?" अथवा दरिद्र बन कर चोरी करने लगूँ और अपने ईश्वर का नाम कलंकित कर दूँ।


सुसमाचार :लूकस 9:1-6

1) ईसा ने बारहों को बुला कर उन्हें सब अपदूतों पर सामर्थ्य तथा अधिकार दिया और रोगों को दूर करने की शक्ति प्रदान की।

2) तब ईसा ने उन्हें ईश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाने और बीमारों को चंगा करने भेजा।

3) उन्होंने उन से कहा, "रास्ते के लिए कुछ भी न ले जाओ-न लाठी, न झोली, न रोटी, न रुपया। अपने लिए दो कुरते भी न रखो।

4) जिस घर में ठहरने जाओ, नगर से विदा होने तक वहीं रहो।

5) यदि लोग तुम्हारा स्वागत न करें, तो उनके नगर से निकलने पर उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ दो।"

6) वे चले गये और सुसमाचार सुनाते तथा लोगों को चंगा करते हुए गाँव-गाँव घूमते रहे।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार पाठ में जब येसु अपने शिष्यों मिशन पर भेजते है, तो वे उन्हें कम से कम सामान के साथ की यात्रा करने की हिदायत हैं। ऐसा कहकर वे उन्हें खुद पर ज़्यादा निर्भर न रहकर ईश्वर और उन लोगों के आतिथ्य पर निर्भर रहने के लिए कहते हैं, जिनको सुसमाचार सुनाते हैं। खुद पर अत्यधिक निर्भर होने के बजाय, ईश्वर पर भरोसा करने से हम सांसारिकता से खुद को दूर रखेंगे और अपना मन-ध्यान प्रभु और उनके वचनों पर लगाएंगे। कभी-कभी संसांरिक शक्तियों जैसे धन -दौलत, पद या फिर शारीरिक ताकत लोगों को इस भ्रम में डाल देती है कि वे अपने आप में पूर्ण हैं और उन्हें किसी की ज़रूरत नहीं।

आज का सुसमाचार हमें याद दिलाता है कि हम कभी भी पूरी तरह से खुद पर निर्भर नहीं हो सकते। हमने पाने जीवन के शुरुआत ही पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर रहते हुए शुरू की है, और जैसे-जैसे हम अपने जीवन के अंत की ओर आते हैं हम एक बार फिर खुद को दूसरों पर पूरी तरह से निर्भर पाते हैं। और पूर्ण- निर्भरता के इन दो मुकामों के बीच की ज़िन्दगी में भी, हम कई प्रकार से दूसरों पर निर्भर रहना जारी रखते हैं। अपने पूरे जीवन में हम दूसरों पर निर्भर रहते हैं कि दूसरे लोग हमें वो चीज़ें दे जो हमारे पास नहीं और हम उन चीजों के लिए उनपर निर्भर रहते हैं जो हमारे पास नहीं।

प्रभु हमेशा हमें उस सेवा के लिए खुले रहने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं जो वह हमें, दूसरों के माध्यम से प्रदान करता है। हम में से प्रत्येक को देने के लिए बहुत कुछ है और प्राप्त करने के लिए बहुत कुछ है। जो प्रभु, हमारे माध्यम से दूसरों की सेवा करना चाहता है, वह दूसरों के माध्यम से हमारी भी सेवा करना चाहता है। तो आइये हमारे जीवन में खुद पर ही भरोसा ना करके ईश्वर और ईश्वर द्वारा हमें दिए गए लोगों और संसाधनों पर भरोसा करें और ईश्वर के वचन की सेवा में लगे रहें।



📚 REFLECTION

In today's Gospel, when Jesus sends his disciples on a mission, He instructs them to travel with very little luggage. By saying this, He tells them not to depend too much on themselves but to depend on the providence of God and the hospitality of the people to whom they preach the Gospel. Instead of relying too much on ourselves, trusting in God will keep us away from worldliness and will help to focus our attention on the Lord and His words. Sometimes the worldly powers such as money, position or physical strength mislead people that they are complete in themselves and that they do not need anyone.

Today's gospel reminds us that we can never be completely self-sufficient. We began our life completely depending on others, and as we come to the end of our lives we once again find ourselves completely dependent on others. And even in the life between these two polar positions of complete dependence, we continue to depend on others in many ways. Throughout our lives we depend on others to give us things that we do not have.

The Lord invites us to be open to the service that He provides to us, through others. Each of us has so much to give and so much to receive. The Lord, who wants to serve others through us, also wants to serve us through others. So, instead of trusting arrogantly, on ourselves, let us trust God and the people and resources given to us by God and continue to serve the Word of God with whatever way we can.

✍Biniush Topno





आत्मिक भोज़न Gospel - (Lk 8:19-21

 .               22nd September- Tuesday

              ‌          आत्मिक भोज़न

                   Gospel - (Lk 8:19-21

     प्रिय दोस्तो! आप सबों को ज़य येसु। आज़ का 

1. सुसमाचार सन्त लुकस का सुसमाचार से लिया गया है। आज़ का मूल विषय है,".कौन हैं येसु का माता-पिता और भाई-बहन? प्रभु येसु कहते हैं, "मेरा माता और मेरा पिता वही लोग हैं जो ईश्वर का वचन को सुनते हैं और उसको पूरा करते हैं और उसके अनुसार जीते हैं (Lk 8:21)। जो लोग वचन के अनुसार जीते हैं वे प्रभु येसु के परिवार का सदस्य बन जाते हैं।  2. जिस वचन नें पृथ्वी कि सृष्टि किया, जिस वचन शरीर बन कर दुनिया में आया और जिस वचन कलवारी पहाड़ में  टुकड़ा-टुकड़ा हुआ, प्रभु येसु ख्रीस्त, हमारे मुक्तिदाता के द्वारा लोगों के बीच में बांटा गया और जो लोग उस वचन को हृदय में ग्रहण करते हैं वे येसु का भाई-बहन हैं। 3. वचन को सुनने का मतलब- येसु को प्यार करना, वचन को सुनना, वचन में विश्वास करना और वचन में विश्वास करके उसके अनुसार जीना,"। 4. जो लोग उन पर विश्वास करते हैं और जो लोग उसके वचन के अनुसार जीते है वे येसु के साथ और आपस में एक परिवार के समान अटुट सम्बन्ध जोड़ते हैं। यही परिवार येसु ख्रीस्त का शरीर है, जिसका सिर येसु है, और परिवार में रहने वाले लोग उसका सदस्य हैं। 5. निष्कलंक माता मरिया इस परिवार में प्रमुख स्थान को ग्रहण की। जैसे सबसे पहले उसने वचन को सुनी और वचन को अपने हृदय में ग्रहण की और वचन के अनुसार जीवन वितायी। परिवार में उसको सबसे उत्तम स्थान मिला। कुवारी मरिया दुनिया में पवित्र आत्मा कि शक्ति से गर्भवती हुई, और शरीर को दुनिया में जन्म देने का सौभाग्य मिला। वही माता मरियम को परिवार में मुख्य स्थान मिला, वह परिवार का मां है।

22 सितंबर का पवित्र वचन

 

22 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : सुक्ति 21:1-6, 10-13

1) राजा का हृदय प्रभु के हाथ में जल धारा की तरह है: वह जिधर चाहता, उसे मोड़ देता है।

2) मनुष्य जो कुछ करता है, उसे ठीक समझता है; किन्तु प्रभु हृदय की थाह लेता है।

3) बलिदान की अपेक्षा सदाचरण और न्याय प्रभु की दृष्टि में कहीं अधिक महत्व रखते हैं।

4) तिरस्कारपूर्ण आँखें और धमण्ड से भरा हुआ हृदय: ये पापी मनुष्य के लक्षण हैं।

5) जो परिश्रम करता है, उसकी योजनाएँ सफल हो जाती हैं। जो उतावली करता है, वह दरिद्र हो जाता है।

6) झूठ से कमाया हुआ धन असार है और वह मृत्यु के पाष में बाँध देता है।

10) दुष्ट बुराई की बातें सोचता रहता है, वह अपने पड़ोसी पर भी दया नहीं करता।

11) अविश्वासी को दण्डित देख कर, अज्ञानी सावधान हो जाता है। जब बुद्धिमान् को शिक्षा दी जाती है, तो उसका ज्ञान बढ़ता है।

12) न्यायप्रिय दुष्ट के घर पर दृष्टि रखता और कुकर्मियों का विनाश करता है।

13) जो दरिद्र का निवेदन ठुकराता है, उसकी दुहाई पर कोई कान नहीं देगा।


सुसमाचार :लूकस 8:19-21

19) ईसा की माता और भाई उन से मिलने आये, किन्तु भीड़ के कारण उनके पास नहीं पहुँच सके।

20) लोगों ने उन से कहा, "आपकी माता और आपके भाई बाहर हैं। वे आप से मिलना चाहते हैं।"

21) उन्होंने उत्तर दिया, "मेरी माता और मेरे भाई वहीं हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं"।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार को, ऊपरी तौर पर पढ़ने से, हमें जो समझ में आता है, वह यह है कि येसु अपने मूल परिवार से खुद को दूर कर रहे हैं। उनकी माँ और भाई घर के बाहर थे और वे उनसे मिलना चाहते थे। हालाँकि, जब उन्होंने येसु को बुला भेजा तो वे उनके पास नहीं आते, इसके बजाय, वे अपने परिवार को फिर से परिभाषित करते हैं। उनका नया परिवार व परिवार सदस्य अब वे लोग हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते, और उसे बनाए रखते हैं।

इस घटना के पहले येसु ने बोने वाले के दृष्टांत सुनाया था, जिसमें अच्छी मिट्टी पर गिरे हुए बीज की पहचान उन लोगों के रूप में की गई थी, जो ईश्वर का वचन को सुनते, और उसे अपने दिल में उतारते तथा फल उत्पन्न करते हैं । ये ऐसे लोग हैं जो अब येसु के सच्चे परिवार का गठन करते हैं। उनकी माँ और उनके रक्त सम्बन्धी व अन्य सदस्य तभी इस नए परिवार का हिस्सा बन सकते हैं जब वे भी ईश्वर के वचन को सुनें और उस पर चलें ।

जहाँ तक हम ईश्वर के वचन को स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं, हम भी येसु के नए विस्तृत, परिवार के सदस्य बन सकते हैं। हमारे बपतिस्मा की बुलाहट यही है कि हम ईश्वर के वचनों को सुनें और इसे व्यवहार में लाएं । हमें अपने जीवन को वह अच्छी भूमि बनाना है जहाँ पर बीज गिरकर फल लाता है। यदि हम ईश्वर के वचन को सुनने के लिए प्रयास करते रहते हैं और उनपर चलते हुए ईश्वर की मर्ज़ी को पूरा करते है तो प्रभु येसु हमें अपने परिवार सदस्य कहने में प्रसन्न होंगे।



📚 REFLECTION

Reading from the periphery, what we understand from the gospel today is that Jesus is distancing himself from his original family. His mother and brothers were outside the house and they wanted to meet him. However, He does not go out to meet them, when they called for him. Instead, He redefines his family and family relations. His new family and family members are now those who listen to, and keep the word of God. Before this event, Jesus narrated the parable of sower, identifying the seed fallen on good soil as those who would listen to the word of God, and keep it in their hearts and produce fruit. These are the people who now constitute the true family of Jesus. His mother and His blood relations and other members can become part of this new family only when they too listen to the word of God and follow it.

When we accept and obey the Word of God, we can also become members of the new extended family of Jesus. The call of our baptism is that we listen to the Words of God and put it into practice. We have to make our life the good and fertile land where the seed falls and brings fruit. If we listen to God's word and do the will of God, then our Lord Jesus will be happy to call us His family members. Amen.



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