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अप्रैल 07, 2023, शुक्रवार पुण्य शुक्रवार


अप्रैल 07, 2023, 

पुण्य शुक्रवार




📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 52:13-53:12

13) देखो! मेरा सेवक फलेगा-फूलेगा। वह महिमान्वित किया जायेगा और अत्यन्त महान् होगा।

14) उसकी आकृति इतनी विरूपित की गयी थी कि वह मनुय नही जान पड़ता था; लोग देख कर दंग रह गये थे।

15) उसकी ओर बहुत-से राष्ट्र आश्चर्यचकित हो कर देखेंगे और उसके सामने राजा मौन रहेंगे; क्योंकि उनके सामने एक अपूर्व दृश्य प्रकट होगा और जो बात कभी सुनने में नहीं आयी, वे उसे अपनी आँखों से देखेंगे।

1) किसने हमारे सन्देश पर विश्वास किया? प्रभु का सामर्थ्य किस पर प्रकट हुआ है?

2) वह हमारे सामने एक छोटे-से पौधे की तरह, सूखी भूमि की जड़ की तरह बढ़ा। हमने उसे देखा था; उसमें न तो सुन्दरता थी, न तेज और न कोई आकर्षण ही।

3) वह मनुयों द्वारा निन्दित और तिरस्कृत था, शोक का मारा और अत्यन्त दुःखी था। लोग जिन्हें देख कर मुँह फेर लेते हैं, उनकी तरह ही वह तिरस्कृत और तुच्छ समझा जाता था।

4) परन्तु वह हमारे ही रोगों का अपने ऊपर लेता था और हमारे ही दुःखों से लदा हुआ था और हम उसे दण्डित, ईश्वर का मारा हुआ और तिरस्कृत समझते थे।

5) हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया है। हमारे कूकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शान्ति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं।

6) हम सब अपना-अपना रास्ता पकड़ कर भेड़ों की तरह भटक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सब के पापों का भार डाला है।

7) वह अपने पर किया हुआ अत्याचार धैर्य से सहता गया और चुप रहा। वध के लिए ले जाये जाने वाले मेमने की तरह और ऊन कतरने वाले के सामने चुप रहने वाली भेड़ की तरह उसने अपना मुँह नहीं खोला।

8) वे उसे बन्दीगृह और अदालत ले गये; कोई उसकी परवाह नहीं करता था। वह जीवितों के बीच में से उठा लिया गया है और वह अपने लोगों के पापों के कारण मारा गया है।

9) यद्यपि उसने कोई अन्याय नहीं किया था और उसके मुँह से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली थी, फिर भी उसकी कब्र विधर्मियों के बीच बनायी गयी और वह धनियों के साथ दफ़नाया गया है।

10) प्रभु ने चाहा कि वह दुःख से रौंदा जाये। उसने प्रायश्चित के रूप में अपना जीवन अर्पित किया; इसलिए उसका वंश बहुत दिनों तक बना रहेगा और उसके द्वारा प्रभु की इच्छा पूरी होगी।

11) उसे दुःखभोग के कारण ज्योति और पूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा। उसने दुःख सह कर जिन लोगों का अधर्म अपने ऊपर लिया था, वह उन्हें उनके पापों से मुक्त करेगा।

12) इसलिए मैं उसका भाग महान् लोगों के बीच बाँटूँगा और वह शक्तिशाली राजाओं के साथ लूट का माल बाँटेगा; क्योंकि उसने बहुतों के अपराध अपने ऊपर लेते हुए और पापियों के लिए प्रार्थना करते हुए अपने को बलि चढ़ा दिया और उसकी गिनती कुकर्मियों में हुई।

📙 दूसरा पाठ : इब्रानियों के नाम पत्र 4:14-16;5:7-9

14) हमारे अपने एक महान् प्रधानयाजक हैं, अर्थात् ईश्वर के पुत्र ईसा, जो आकाश पार कर चुके हैं। इसलिए हम अपने विश्वास में सुदृढ़ रहें।

15) हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है।

16) इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी।

7) मसीह ने इस पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार कर और आँसू बहा कर ईश्वर से, जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थना और अनुनय-विनय की। श्रद्धालुता के कारण उनकी प्रार्थना सुनी गयी।

8) ईश्वर का पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख सह कर आज्ञापालन सीखा।

9 (9-10) वह पूर्ण रूप से सिद्ध बन कर और ईश्वर से मेलखि़सेदेक की तरह प्रधानयाजक की उपाधि प्राप्त कर उन सबों के लिए मुक्ति के स्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।

📚 सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 18:1-19:42

1) यह सब कहने के बाद ईसा अपने शिष्यों के साथ केद्रेान नाले के उस पार गये। वहाँ एक बारी थी। उन्होंने अपने शिष्यों के साथ उस में प्रवेश किया।

2) उनके विश्वासघाती यूदस को भी वह जगह मालूम थी, क्योंकि ईसा अक्सर अपने शिष्यों के साथ वहाँ गये थे।

3) इसलिये यूदस पलटन और महायाजकों तथा फ़रीसियों के भेजे हुये प्यादों के साथ वहाँ आ पहुँचा। वे लोग लालटेनें मशालें और हथियार लिये थे।

4) ईसा, यह जान कर कि मुझ पर क्या-क्या बीतेगी आगे बढे और उन से बोले, ’’किसे ढूढतें हो?’’

5) उन्होंने उत्तर दिया, ’’ईसा नाज़री को’’। ईसा ने उन से कहा, ’’मैं वही हूँ’’। वहाँ उनका विश्वासघाती यूदस भी उन लोगों के साथ खडा था।

6) जब ईसा ने उन से कहा, ’मैं वही हूँ’ तो वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पडे।

7) ईसा ने उन से फि़र पूछा, ’’किसे ढूढते हो?’’ वे बोले, ’’ईसा नाजरी को’’।

8) इस पर ईसा ने कहा, ’’मैं तुम लोगों से कह चुका हूँ कि मैं वही हूँ। यदि तुम मुझे ढूँढ़ते हो तो इन्हें जाने दो।’’

9) यह इसलिये हुआ कि उनका यह कथन पूरा हो जाये- तूने मुझ को जिन्हें सौंपा, मैंने उन में से एक का भी सर्वनाश नहीं होने दिया।

10) उस समय सिमोन पेत्रुस ने अपनी तलवार खींच ली और प्रधानयाजक के नौकर पर चलाकर उसका दाहिना कान उडा दिया। उस नौकर का नाम मलखुस था।

11) ईसा ने पेत्रुस से कहा, ’’तलवार म्यान में कर लो। जो प्याला पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे नहीं पिऊँ?’’

12) तब पलटन, कप्तान और यहूदियों के प्यादों ने ईसा को पकड कर बाँध लिया।

13) वे उन्हें पहले अन्नस के यहाँ ले गये; क्योंकि वह उस वर्ष के प्रधानयाजक कैफस का ससुर था।

14) यह वही कैफस था जिसने यहूदियों को यह परामर्श दिया था- अच्छा यही है कि राष्ट्र के लिये एक ही मनुष्य मरे।

15) सिमोन पेत्रुस और एक दूसरा शिष्य ईसा के पीछे-पीछे चले। यह शिष्य प्रधानयाजक का परिचित था और ईसा के साथ प्रधानयाजक के प्रांगण में गया,

16) किन्तु पेत्रुस फाटक के पास बाहर खडा रहा। इसलिये वह दूसरा शिष्य जो प्रधानयाजक का परिचित था, फि़र बाहर गया और द्वारपाली से कहकर पेत्रुस को भीतर ले आया।

17) द्वारपाली ने पेत्रुस से कहा, ’’कहीं तुम भी तो उस मनुष्य के शिष्य नहीं हो?’’ उसने उत्तर दिया, ’’नहीं हूँ’’।

18) जाड़े के कारण नौकर और प्यादे आग सुलगा कर ताप रहे थे। पेत्रुस भी उनके साथ आग तापता रहा।

19) प्रधानयाजक ने ईसा से उनके शिष्यों और उनकी शिक्षा के विषय में पूछा।

20) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं संसार के सामने प्रकट रूप से बोला हूँ। मैंने सदा सभागृह और मन्दिर में जहाँ सब यहूदी एकत्र हुआ करते हैं, शिक्षा दी है। मैंने गुप्त रूप से कुछ नहीं कहा।

21) यह आप मुझ से क्यों पूछते हैं? उन से पूछिये जिन्होंने मेरी शिक्षा सुनी है। वे जानते हैं कि मैंने क्या-क्या कहा।’’

22) इस पर पास खडे प्यादों में से एक ने ईसा को थप्पड मार कर कहा, “तुम प्रधानयाजक को इस तरह जवाब देते हो?“

23) ईसा ने उस से कहा, ’’यदि मैंने गलत कहा, तो गलती बता दो और यदि ठीक कहा तो, मुझे क्यों मारते हो?’’

24) इसके बाद अन्नस ने बाँधें हुये ईसा को प्रधानयाजक कैफस के पास भेजा।

25) सिमोन पेत्रुस उस समय आग ताप रहा था। कुछ लोगों ने उस से कहा, ’’कहीं तुम भी तो उसके शिष्य नहीं हो?’’ उसने अस्वीकार करते हुये कहा, ’’नहीं हूँ’’।

26) प्रधानयाजक का एक नौकर उस व्यक्ति का सम्बन्धी था जिसका कान पेत्रुस ने उडा दिया था। उसने कहा, ’’क्या मैंने तुम को उसके साथ बारी में नहीं देखा था?

27) पेत्रुस ने फिर अस्वीकार किया और उसी क्षण मुर्गे ने बाँग दी।

28) तब वे ईसा को कैफस के यहाँ से राज्य पाल के भवन ले गये। अब भोर हो गया था। वे भवन के अन्दर इसलिये नहीं गये कि अशुद्व न हो जायें, बल्कि पास्का का मेमना खा सकें।

29) पिलातुस बाहर आकर उन से मिला और बोला, ’’आप लोग इस मनुष्य पर कौन सा अभियोग लगाते हैं?’’

30) उन्होने उत्तर दिया, ’’यदि यह कुकर्मी नहीं होता, तो हमने इसे आपके हवाले नहीं किया होता’’।

31) पिलातुस ने उन से कहा, ’’आप लोग इसे ले जाइए और अपनी संहिता के अनुसार इसका न्याय कीजिये।’’ यहूदियों ने उत्तर दिया, ’’हमें किसी को प्राणदंण्ड देने का अधिकार नहीं है’’।

32) यह इसलिये हुआ कि ईसा का वह कथन पूरा हो जाये, जिसके द्वारा उन्होने संकेत किया था कि उनकी मृत्यु किस प्रकार की होगी। 33) तब पिलातुस ने फिर भवन में जा कर ईसा को बुला भेजा और उन से कहा, ’’क्या तुम यहूदियों के राजा हो?’’

34) ईसा ने उत्तर दिया, ’’क्या आप यह अपनी ओर से कहते हैं या दूसरों ने आप से मेरे विषय में यह कहा है?’’

35) पिलातुस ने कहा, ’’क्या मैं यहूदी हूँ? तुम्हारे ही लोगों और महायाजकों ने तुम्हें मेरे हवाले किया। तुमने क्या किया है।’’

36) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता तो मेरे अनुयायी लडते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं है।’’

37) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, ’’तो तुम राजा हो?’’ ईसा ने उत्तर दिया, ’’आप ठीक ही कहते हैं। मैं राजा हूँ। मैं इसलिये जन्मा और इसलिये संसार में आया हूँ कि सत्य के विषय में साक्ष्य पेश कर सकूँ। जो सत्य के पक्ष में है, वह मेरी सुनता है।’’

38) पिलातुस ने उन से कहा, ’’सत्य क्या है?’’ वह यह कहकर फिर बाहर गया और यहूदियों के पास आ कर बोला, ’’मैं तो उस में कोई दोष नहीं पाता हूँ,

39) लेकिन तुम्हारे लिये पास्का के अवसर पर एक बन्दी को रिहा करने का रिवाज है। क्या तुम लोग चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये यहूदियों के राजा को रिहा कर दूँ?’’

40) इस पर वे चिल्ला उठे, ’’इसे नहीं, बराब्बस को’’। बराब्बस डाकू था।

1) तब पिलातुस ने ईसा को ले जा कर कोडे लगाने का आदेश दिया।

2) सैनिकेां ने काँटों का मुकुट गूँथ कर उनके सिर पर रख दिया और उन्हें बैंगनी कपडा पहनाया।

3) फिर वे उनके पास आ-आ कर कहते थे, ’’यहूदियों के राजा प्रणाम!’’ और वे उन्हें थप्पड मारते जाते थे।

4) पिलातुस ने फिर बाहर जा कर लोगों से कहा, ’’देखो मैं उसे तुम लोगों के सामने बाहर ले आता हूँ, जिससे तुम यह जान लो कि मैं उस में कोई दोष नहीं पाता’’।

5) तब ईसा काँटों का मुकुट और बैगनी कपडा पहने बाहर आये। पिलातुस ने लोगों से कहा, ’’यही है वह मनुष्य!’’

6) महायाजक और प्यादे उन्हें देखते ही चिल्ला उठे, ’’इसे क्रूस दीजिये! इसे क्रूस दीजिये!’’ पिलातुस ने उन से कहा, ’’इसे तुम्हीं ले जाओ और क्रूस पर चढाओ। मैं तो इस में कोई दोष नहीं पाता।’’

7) यहूदियों ने उत्तर दिया, ’’हमारी एक संहिता है और उस संहिता के अनुसार यह प्राणदंण्ड के योग्य है, क्योंकि इसने ईश्वर का पुत्र होने का दावा किया है।’’

8) पिलातुस यह सुनकर और भी डर गया।

9) उसने फिर भवन के अन्दर जा कर ईसा से पूछा, ’’तुम कहाँ के हो?’’ किन्तु ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया।

10) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, ’’तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा करने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी?

11) ईसा ने उत्तर दिया, ’’यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता। इसलिये जिसने मुझे आपके हवाले किया, वह अधिक दोषी है।’’

12) इसके बाद पिलातुस ईसा को मुक्त करने का उपाय ढूँढ़ता रहा, परन्तु यहूदी यह कहते हुये चिल्लाते रहे, ’’यदि आप इसे रिहा करते हैं, तो आप कैसर के हितेषी नहीं हैं। जो अपने को राजा कहता है वह कैसर का विरोध करता है।’’

13) यह सुनकर पिलातुस ने ईसा को बाहर ले आने का आदेश दिया। वह अपने न्यायासन पर उस जगह, जो लिथोस-त्रोतोस, और इब्रानी में गबूबथा, कहलाती है, बैठ गया।

14) पास्का की तैयारी का दिन था। लगभग दोपहर का समय था। पिलातुस ने यहूदियों से कहा, ’’यही ही तुम्हारा राजा!’’

15) इस पर वे चिल्ला उठे, ’’ले जाइये! ले जाइए! इसे क्रूस दीजिये!’’ पिलातुस ने उन से कहा क्या, ’’मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चढवा दूँ?’’ महायाजकों ने उत्तर दिया, ’’कैसर के सिवा हमारा कोई राजा नहीं’’।

16) तब पिलातुस ने ईसा को कू्रस पर चढाने के लिये उनके हवाले कर दिया।

17) वे ईसा को ले गये और वह अपना कू्रस ढोते हुये खोपडी की जगह नामक स्थान गये। इब्रानी में उसका नाम गोलगोथा है।

18) वहाँ उन्होंने ईसा को और उनके साथ और दो व्यक्तियों को कू्रस पर चढाया- एक को इस ओर, दूसरे को उस ओर और बीच में ईसा को।

19) पिलातुस ने एक दोषपत्र भी लिखवा कर क्रूस पर लगवा दिया। वह इस प्रकार था- ’’ईसा नाज़री यहूदियों का राजा।’’

20) बहुत-से यहूदियों ने यह दोषपत्र पढा क्योंकि वह स्थान जहाँ ईसा कू्स पर चढाये गय थे, शहर के पास ही था और दोष पत्र इब्रानी, लातीनी और यूनानी भाषा में लिखा हुआ था।

21) इसलिये यहूदियों के महायाजकों ने पिलातुस से कहा, ’’आप यह नहीं लिखिये- यहूदियों का राजा; बल्कि- इसने कहा कि मैं यहूदियों का राजा हूँ’’।

22) पिलातुस ने उत्तर दिया, ’’मैंने जो लिख दिया, सो लिख दिया।’’

23) ईसा को कू्रस पर चढाने के बाद सैनिकों ने उनके कपडे ले लिये और कुरते के सिवा उन कपडों के चार भाग कर दिये- हर सैनिक के लिये एक-एक भाग। उस कुरते में सीवन नहीं था, वह ऊपर से नीचे तक पूरा-का-पूरा बुना हुआ था।

24) उन्होंने आपस में कहा, ’’हम इसे नहीं फाडें। चिट्ठी डालकर देख लें कि यह किसे मिलता है। यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उन्होंने मेरे कपडे आपस में बाँट लिये और मेरे वस्त्र पर चिट्ठी डाली। सैनिकेां ने ऐसा ही किया।

25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं।

26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, ’’भद्रे! यह आपका पुत्र है’’।

27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, ’’यह तुम्हारी माता है’’। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।

28) तब ईसा ने यह जान कर कि अब सब कुछ पूरा हो चुका है, धर्मग्रन्थ का लेख पूरा करने के उद्देश्य से कहा, ’’मैं प्यासा हूँ’’।

29) वहाँ खट्ठी अंगूरी से भरा एक पात्र रखा हुआ था। लेागों ने उस में एक पनसोख्ता डुबाया और उसे जूफ़े की डण्डी पर रख कर ईसा के मुख से लगा दिया।

30) ईसा ने खट्ठी अंगूरी चखकर कहा, ’’सब पूरा हो चुका है’’। और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिये।

31) वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन कू्रस पर रह जाये क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्यौहार पडता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड दी जाये और शव हटा दिये जायें।

32) इसलिये सैनिकेां ने आकर ईसा के साथ क्रूस पर चढाये हुये पहले व्यक्ति की टाँगें तोड दी, फिर दूसरे की।

33) जब उन्होंने ईसा के पास आकर देखा कि वह मर चुके हैं तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोडी;

34) लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।

35) जिसने यह देखा है, वही इसका साक्ष्य देता है, और उसका साक्ष्य सच्चा है। वह जानता है कि वह सच बोलता है, जिससे आप लोग भी विश्वास करें।

36) यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उसकी एक भी हड्डी नहीं तोडी जायेगी;

37) फिर धर्मग्रन्थ का एक दूसरा कथन इस प्रकार है- उन्होंने जिसे छेदा, वे उसी की ओर देखेगें।

38) इसके बाद अरिमथिया के यूसुफ ने जो यहूदियों के भय के कारण ईसा का गुप्त शिष्य था, पिलातुस से ईसा का शब ले जाने की अनुमति माँगी। पिलातुस ने अनुमति दे दी। इसलिये यूसुफ आ कर ईसा का शव ले गया।

39) निकोदेमुस भी पहुँचा, जो पहले रात को ईसा से मिलने आया था। वह लगभग पचास सेर का गंधरस और अगरू का सम्मिश्रण लाया।

40) उन्होंने ईसा का शव लिया और यहूदियों की दफन की प्रथा के अनुसार उसे सुगंधित द्रव्यों के साथ छालटी की पट्टियों में लपेटा।

41) जहाँ ईसा कू्रस पर चढाये गये थे, वहाँ एक बारी थी और उस बारी में एक नयी कब्र, जिस में अब तक कोई नहीं रखा गया था।

42) उन्होंने ईसा को वहीं रख दिया, क्योंकि वह यहूदियों के लिये तेयारी का दिन था और वह कब्र निकट ही थी।


📚 मनन-चिंतन


कई लोगों को लगा कि ईश्वर का ईमानदार एवं नम्र सेवक आज अपने आप को बचाने में असमर्थ हैं। उनकी दशा ऐसी हो चूकी है कि कोई भी अब उसे पहचान नही पा रहा था। वह चुपचाप दुख भोगते हैं। उन्हें अपने ही लोगों ने तिरस्कृत और तुच्छ समझा। नबी इसायाह कहते हैं, “वह हमारे दुखों का भार अपने उपर लेता है, हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया।” उसकी दशा उस मेमने की तरह है जो मुह भी नहीं खोल सकता। इस मेमने की हर बात में परीक्षा ली गयी। उसने चुपचाप दुख सहकर आज्ञापालन सीख लिया।

उन्होंने मानव जाति के पापों के प्रायश्चित के लिए अपने आप को लोगों के हवाले कर दिया। प्रभु येसु का क्रुस पर मरना एक बहुमूल्य बलिदान था। अपने पवित्र शरीर एवं लहू के द्वारा प्रभु येसु हमें बचा लेते हैं। अब न किसी पशु या पंछी के रक्त से बल्कि स्वयं प्रभु अपने पवित्र रक्त से पवित्र कर हमें अपनी विरासत के अधिकारी बना लेते हैं।

क्या हम प्रभु के साथ उनके दुखों में भाग लेते हैं?आइये, हम प्रायश्चित कर हमारे जीवन को प्रभु के हवाले कर दें।


📚 REFLECTION

Many felt that the honest and humble servant of God was unable to save himself. His condition has become such that no one was able to recognize him. He suffers silently. He was despised by his own people. The prophet Isaiah says, "He bears the burden of our sorrows, for our sins he was pierced." His condition is like that of a lamb who cannot even open its mouth. This lamb was tested in everything. He learned obedience by suffering silently.

He offered himself to the people to atone for the sins of mankind. The death of the Lord Jesus on the cross was a precious sacrifice. Lord Jesus saves us through his holy body and blood. Now not with the blood of any animal or bird, but the Lord Himself purifies us with His holy blood and makes us entitled to his inheritance.

Do we share with the Lord in His sufferings? Come, let us repent and surrender our lives to the Lord.



📚 मनन-चिंतन - 2

दुख-तकलीफ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा है। किन्तु फिर भी मनुष्य मुख्यतः यही प्रयास करता है कि वह दुख से बचकर सुख और आराम पाता रहें। ट्रेन, होटलों आदि में यात्रा करने या ठहरने की श्रेणीयॉ या वर्ग होते है। उच्च श्रेणीयों में यात्रा करने से हमें अधिक सुविधा और आराम मिलता है जिसके एवज में हमें ज्यादा पैसा खर्च करना पडता है। हांलाकि साधारण श्रेणी के टिकट से भी हम उसी जगह पहुंचते जहॉ उच्च श्रेणी के लोग लेकिन हम अधिकांशः सुविधाजनक एवं आरामदेह यात्रा को ही प्राथमिकता देते हैं। लेकिन प्रभु येसु दुख से बचने के लिये हमें कोई शिक्षा या मार्ग नहीं दिखाते है। उन्होंने दुखभोग एवं क्रूस-मरण को ही जीवन की प्राथमिकता तथा उददेश्य बताया। उन्होंने अपने दुखःभोग एवं मरण के द्वारा ही मानव-जाति की मुक्ति का द्वार खोला।

गेथसेमनी की बारी में येसु ने पिता से प्रार्थना की वे इस भावी प्राणा पीडा का प्याला उनसे हटा ले किन्तु उन्होंने पिता की इच्छा को पूरी करने में ही अपना सुख समझा फिर चाहे वह भले ही दुखभोग एवं मरण ही क्यों न हो। जीवन में स्थायी बने रहने वाले सुख और शांति तब आती है जब हम सही काम करे। ऐसा करने से भले ही कष्ट क्यों न हो किन्तु भलाई और सत्य के काम ही सच्ची और स्थायी शांति प्रदान करते हैं। जीवन में सांसारिक सुख के लिये हमें कई बार समझौते करने पडते हैं। हम चारों ओर से खतरे तथा असुरक्षा की भावना से घेरे रहते हैं। इसलिये हमारी कोशिश सुख सुनिश्चित करने की होती है तथा इसे हासिल करने के लिये हम अनेक बार नैतिक मूल्यों के साथ समझौता करते हैं। किन्तु अपनी नासमझी में हम यह भूल जाते ही सच्चा एवं स्थायी सुख तो ईश्वर का जीवन जी कर आता है उसके लिये चाहे हमें कष्ट ही क्यों न झेलना पडे।

येसु निर्दोष थे। उन्होंने कोई पाप नहीं किया था। उन्होंने सदैव वहीं किया जो सही था तथा अपने भलाई के कार्यों के द्वारा लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को पुनः लौटाया। उन्होंने खुले तौर पर सच्ची शिक्षा दी किन्तु फिर भी उन पर साजिश, ईशनिंदा आदि जैसे मनगणंत आरोप मढे गये। किन्तु येसु जानते थे कि उनका दुखभोग और मरण पिता की योजना का हिस्सा है। कोई भी उनका जीवन उनसे नहीं ले सकता था। जब पिलासुन ने उनसे कहा, ’’तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा करने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी? ईसा ने उत्तर दिया, ’’यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता।’’ (योहन 19:10-11) और यहूदियों को उन्होंने और भी स्पष्ट रूप से कहा, ’’मैं अपना जीवन अर्पित करता हूँ, बाद में मैं उसे फिर ग्रहण करूँगा। कोई मुझ से मेरा जीवन नहीं हर सकता, मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता की ओर से यह आदेश मिला है।’’ (योहन 10:17-18)

इस प्रकार येसु के दुखभोग में कुडवाहट एवं खेद की भावना नहीं। उनका दुखभोग कठिन है किन्तु वह उन्हें स्वीकार्य है क्योंकि यह पिता को प्रिय है। पुण्य शुक्रवार जीवन के दुख से भागने या बचने का कोई झूठा एवं छदम् सब्जबाग नहीं दिखाता है। वह जो सही और सच्चा है उसे अपनाकर, सबकुछ पिता की इच्छा पर छोडकर, बहादुरी के साथ आगे बढने का प्रस्ताव रखता है। हम हमारे दुख को किसी पुरस्कार से जोडकर देखते हैं। लोग दुख उठाने को तैयार हो जाते हैं किन्तु किसके एवज में। वह जानना चाहते है कि इससे क्या लाभ होगा। किन्तु धर्मग्रंथ हमें बताता है कि धर्मी के दुखभोग का पुरस्कार स्वयं ईश्वर होता है।

योब के दुख का कारण उसकी धार्मिकता थी। शैतान उसे दुख पहुंचाता है ताकि वह अपनी धार्मिकता त्याग दे। योब ने अत्याधिक दुख और हानि उठायी किन्तु उसने ईश्वर को और उसकी धार्मिकता को नहीं त्यागा। ईश्वर स्वयं उसका पुरस्कार था। कई नबियों ने भी धार्मिकता के कारण दुख उठाये वह पुरस्कार जो स्वयं ईश्वर होगा उस पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इसी प्रकार हमारे जीवन में भी दुखभोग आता है। हमें इससे घबरा कर भागना नहीं चाहिये और झूठी सुरक्षा के पीछे नहीं भागना चाहिये। इसके विपरीत जो भी हम अपनी मानवीय क्षमता के अनुसार कर सकते वही करना चाहिये बाकि जो भी हो उसे ईश्वर की इच्छा मानकर सहना चाहिये। हमें नहीं भूलना चाहिये कि पिता की इच्छा के बिना हमारे सिर का बाल भी नहीं गिरता तो फिर पिता के लिये हमारा जीवन कहीं अधिक मूल्यवान है। हमारे कष्ट और पीडा उससे छिपे हुये नहीं है। वह हमें न सिर्फ सहनशक्ति प्रदान करता है बल्कि जो ख्राीस्तीय साहस के साथ अपने दुःखों को वहन करते हैं उन्हें पुरस्कार भी उन्हें प्रदान करता है।



📚 REFLECTION

Suffering is the integral part of human life. Yet most common attempts of human beings have been to avoid suffering and gain comfort. In the trains, hotels etc. we have classes and categories to be availed while travelling and If we want more comfort then we must pay more. The general class will serve the same purpose and take you to same destination as the first-class but it won’t be comfortable. To avoid any inconvenience, we must take a premium class ticket or reservation. This has been the tendency in all ages. But Jesus does not offer a way out of suffering but a way to go through it. It was Cross that brought the salvation and eternal comfort.

In the Garden of Gethsemane Jesus prayed to have the cup of suffering be taken away yet he found comfort in doing the will of God. Lasting peace and happiness come when we do what is right even if it causes up pain and loss. To gain the worldly comfort and to prolong it we make a lot of compromises in life. We are surrounded by the threat of danger and insecurity. So, we try to ensure our safety and comfort by the worldly means even if they are unethical and corrupt. But when we stand for the right and even suffer for it we experience and gain God’s favour and lasting peace and happiness.

Jesus was innocent. He committed no sin. He did what was right and brought restoration of health and life to the people. He taught them the right things in the open, yet he was unjustly condemned of crimes which were far-fetched and flimsy. But Jesus already knew that no one can take away his life or do any harm to him. In response to Pilot’s exclamation, “Do you not know that I have power to release you, and power to crucify you?’ Jesus answered, “You would have no power over me unless it had been given you from above;” (John 19:10-11) and to the Jews he said even more clearly, “I lay down my life in order to take it up again. No one takes it from me, but I lay it down of my own accord. I have power to lay it down, and I have power to take it up again. I have received this command from my Father.’ (John 10:17-18)

So in Jesus’ suffering there are no grudges and force. It is difficult but it is acceptable because this is what pleases God. Good Friday offers no short cuts and false promises but a stark truth to accept life and its suffering and pain with a brave heart. Often suffering is related with a reward. People are ready to undergo suffering but for what. They would like to know the package. God himself is the reward of the suffering of the righteous. The reason of Job’s suffering was his righteousness. Devil wanted to trouble him so that he may forfeit his righteousness. He underwent extreme suffering but remained righteous. God was his reward. So therefore, in our life too there difficult and painful moments. We do not have get panicked and take all safety measure to avoid pain. But rather do all that in normal human capacity and rest accept it as the will of the father, without his knowledge not even the hair of your heads falls. Our pain and difficulties are not hidden from him. He provides endurance as well the reward to those who bravely take it upon himself.


मनन-चिंतन - 2



एक गैरख्रीस्तीय व्यक्ति अपनी पत्नी को लेकर ख्रीस्तीय मिशनरियों द्वारा संचालित एक अस्पताल गया। उसकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार थी। इसलिए वह बहुत चिंतित और बेचैन था। उसने वहाँ एक प्रार्थनालय देखा। उसने सोचा कि मन को शान्त करने के लिए थोडी देर प्रार्थनालय में बैठ जाता हूँ। उसने प्रार्थनालय में प्रवेश किया। उसने क्रूसित प्रभु की मूर्ति की ओर देखा और सोचने लगा कि यह तो मुझ से भी ज़्यादा परेशान दिख रहा है, यह मेरी मदद कैसे कर सकता है? परन्तु, कुछ ही क्षण में उसकी सोच बदल गयी। उसे लगा कि यह मुझ से भी ज़्यादा परेशान है, इसने मुझ से भी ज़्यादा दुख-दर्द का अनुभव किया। इसलिए यह मेरी परेशानी को आसानी से समझेगा, यह मेरे दुख-दर्द को ठीक से जानता है। फिर वह जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर अपनी समस्याओं को क्रूसित प्रभु के सामने रखने लगा। उसे एक प्रकार की शांति महसूस हुयी। उसे लगा कि उसका बोझ हलका हो गया।

पवित्र वचन कहता है, “हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है। इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी।” (इब्रानियों 4:15-16)

यह सच है कि इतिहास में प्रभु येसु के समान किसी ने इतना दुख-दर्द नहीं सहा। कई धर्मों के देवी-देवताएं शारीरिक रीति से ही बहुत शक्तिशाली दिखते हैं। किसी के कई हाथ होते हैं, किसी के कई सिर और कई देवताओं के हाथों में भाले या तलवार जैसे हथियार भी होते हैं। अगर कोई वर्तमान युग में देवी-देवताओं की कल्पना करता है तो वे शायद ए.के-47 राइफल लेकर खडे होते नजर आयेंगे। यह सच नहीं है कि हमारे प्रभु ईश्वर के पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं। उनके पास एक अन्य प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं। हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त के अस्त्र-शस्त्र आध्यात्मिक जीवन के अस्त्र-शस्त्र होते हैं। वे हमारे पास प्यार, दया और अनुकम्पा लेकर आते हैं। संत पौलुस हमें बताते हैं कि प्रभु येसु के अनुयायियों को किस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करना चाहिए। “आप ईश्वर के अस्त्र-शस्त्र धारण करें, जिससे आप दुर्दिन में शत्रु का सामना करने में समर्थ हों और अन्त तक अपना कर्तव्य पूरा कर विजय प्राप्त करें। आप सत्य का कमरबन्द कस कर, धार्मिकता का कवच धारण कर और शान्ति-सुसमाचार के उत्साह के जूते पहन कर खड़े हों। साथ ही विश्वास की ढाल धारण किये रहें। उस से आप दुष्ट के सब अग्निमय बाण बुझा सकेंगे। इसके अतिरिक्त मुक्ति का टोप पहन लें और आत्मा की तलवार - अर्थात् ईश्वर का वचन - ग्रहण करें।” (एफेसियों 6:13-17)

क्रूस पर टंगे प्रभु येसु हमारे लिए केवल एक आदर्श नहीं हैं। वह हमारे ईश्वर है जो हमारे सामने हमारे अपने जीवन के रहस्यों को प्रकट करते हैं। जो जीवन हमने उनसे पाया है, उस जीवन को हमें किस प्रकार निभाना चाहिए – यह भी प्रभु हमें बताते हैं। क्रूस विश्वासियों के दैनिक जीवन का अभिन्न अंग है। इसी कारण प्रभु ने अपने शिष्यों से अपने प्रतिदिन के क्रूस उठा कर उनके पीछे चलने को कहा है (देखिए लूकस 9:23)। क्रूस हमारी मुक्ति का मार्ग है। प्रवक्ता ग्रन्थ, अध्याय 4 इस बात पर प्रकाश डालता है कि ईश्वर की प्रज्ञा की खोज में निकलने वालों के साथ क्या होता है। ईश्वर उन्हें प्यार करते हैं, उन्हें आशीर्वाद और सुरक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन यह सब प्रदान करने की प्रक्रिया उतनी सरल नहीं है। पवित्र वचन कहता है, “प्रारम्भ में प्रज्ञा उसे टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर ले चलेगी और उसकी परीक्षा लेगी। वह उस में भय तथा आतंक उत्पन्न करेगी। वह अपने अनुशासन से उसे उत्पीड़ित करेगी और तब तक अपने नियमों से उसकी परीक्षा करती रहेगी, जब तक वह उस पूर्णतया विश्वास नहीं करती। इसके बाद वह उसे सीधे मार्ग पर ले जा कर आनन्दित कर देगी और उस पर अपने रहस्य प्रकट करेगी। वह उसे ज्ञान और न्याय का विवेक प्रदान करेगी।” (प्रवक्ता 4:18-21) अगर हम इन वचनों पर ध्यान देंगे तो हमें पता चलेगा कि मुक्ति का मार्ग क्रूस का मार्ग है और क्रूस के बिना हमें मुक्ति नहीं मिल सकती। जो ईश्वर की प्रज्ञा की इस प्रक्रिया में सकारात्मक रवैया नहीं अपनायेगा, वह मुक्ति से वंचित रह जायेगा। इसलिए पवित्र वचन आगे कहता है, “किन्तु यदि वह भटक जायेगा, तो वह उसका त्याग करेगी और उसे विनाश के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए छोड़ देगी” (प्रवक्ता 4:22)। यही प्रभु येसु की शिक्षा का सारांश भी है। प्रभु येसु कहते हैं, “सॅकरे द्वार से प्रवेश करो। चौड़ा है वह फाटक और विस्तृत है वह मार्ग, जो विनाश की ओर ले जाता है। उस पर चलने वालों की संख्या बड़ी है। किन्तु सॅकरा है वह द्वार और संकीर्ण है वह मार्ग, जो जीवन की ओर ले जाता है। जो उसे पाते हैं, उनकी संख्या थोड़ी है।” (मत्ती 7:13-14)

आईए, आज के दिन हम अपने क्रूस के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें, क्योंकि वह हमारी मुक्ति का मार्ग है। हम पिता ईश्वर से निवेदन करें कि वे हमें अपने क्रूस को ढोने की शक्ति प्रदान करें।


✍ -Biniush Topno


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मार्च 26, 2023, इतवार चालीसा काल का पाँचवाँ इतवार

 

मार्च 26, 2023, इतवार

चालीसा काल का पाँचवाँ इतवार


📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल 37:12-14

12) तुम उन से कहोगे, ’प्रभु यह कहता है: मैं तुम्हारी कब्रों को खोल दूँगा। मेरी प्रजा! में तुम लोगों को कब्रों से निकाल का इस्राएल की धरती पर वापस ले जाऊँगा।

13) मेरी प्रजा! जब मैं तुम्हारी कब्रों को खोल कर तुम लोगों को उन में से निकालूँगा, तो तुम लोग जान जाओगे कि मैं ही प्रभु हूँ।

14) मैं तुम्हें अपना आत्मा प्रदान करूँगा और तुम में जीवन आ जायेगा। मैं तुम्हें तुम्हारी अपनी धरती पर बसाऊँगा और तुम लोग जान जाओगे कि मैं, प्रभु, ने यह कहा और पूरा भी किया’।"

📕 दूसरा पाठ : रोमियों 8:8-11

8) जो लोग शरीर की वासनाओं से संचालित हैं, उन पर ईश्वर प्रसन्न नहीं होता।

9) यदि ईश्वर का आत्मा सचमुच आप लोगों में निवास करता है, तो आप शरीर की वासनाओं से नहीं, बल्कि आत्मा से संचालित हैं। जिस मनुष्य में मसीह का आत्मा निवास नहीं करता, वह मसीह का नहीं।

10) यदि मसीह आप में निवास करते हैं, तो पाप के फलस्वरूप शरीर भले ही मर जाये, किन्तु पापमुक्ति के फलस्वरूप आत्मा को जीवन प्राप्त है।

11) जिसने ईसा को मृतकों में से जिलाया, यदि उनका आत्मा आप लोगों में निवास करता है, तो जिसने ईसा मसीह को मृतकों में से जिलाया वह अपने आत्मा द्वारा, जो आप में निवास करता है, आपके नश्वर शरीरों को भी जीवन प्रदान करेगा।

📙 सुसमाचार : योहन 11:1-45 अथवा 11:3-7,17,20-27, 33-45

1) बेथानिया का निवासी लाज़रुस नामक व्यक्ति बीमार पड गया।

2) वेथानिया मरियम और उसकी बहन मरथा का गाँव था। यह वही मरियम थी, जिसने इत्र से प्रभु का विलेपन किया और अपने केशों से उनके चरण पोंछे। उसका भाई लाज़रुस बीमार था।

3) इसलिये बहनों ने ईसा को कहला भेजा, प्रभु! देखिये, जिसे आप प्यार करते हैं, वह बीमार है।

4) ईसा ने यह सुनकर कहा, "यह बीमारी मृत्यु के लिये नहीं, बल्कि ईश्वर की महिमा के लिये आयी है। इसके द्वारा ईश्वर का पुत्र महिमान्वित होगा।"

5) ईसा मरथा, उसकी बहन मरियम और लाज़रुस को प्यार करते थे।

6) यह सुनकर कि लाज़रुस बीमार है, वे जहाँ थे, वहाँ और दो दिन रह गये।

7) किन्तु इसके बाद उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, "आओ! हम फिर यहूदिया चलें"।

8) शिष्य बोले, "गुरुवर! कुछ ही दिन पहले तो यहूदी लोग आप को पत्थरों से मार डालना चाहते थे और आप फिर वहीं जा रहे हैं।"

9) ईसा ने उत्तर दिया, क्या दिन के बारह घण्टें नहीं होते? जो दिन में चलता है, वह ठोकर नहीं खाता, क्योंकि वह इस दुनिया का प्रकाश देखता है।

10) परन्तु जो रात में चलता है, वह ठोकर खाता है, क्योंकि उसे प्रकाश नहीं मिलता।"

11) इतना कहने के बाद वे फिर उन से बोले, "हमारा मित्र लाज़रुस सो रहा है। मैं उसे जगाने जा रहा हूँ।"

12) शिष्यों ने कहा, "प्रभु! यदि वह सो रहा है तो अच्छा हो जायेगा।"

13) ईसा ने यह उसकी मृत्यु के विषय में कहा था, लेकिन उनके शिष्यों ने समझा कि वह नींद के विश्राम के विषय में कह रहे हैं।

14) इसलिये ईसा ने उन से स्पष्ट शब्दों में कहा, "लाजरुस मर गया है।

15) मैं तुम्हारे कारण प्रसन्न हूँ कि मैं वहाँ नहीं था, जिससे तुम लोग विश्वास कर सको। आओ, हम उसके पास चलें।"

16) इस पर थोमस ने, जो यमल कहलाता था, अपने सहशिष्यों से कहा, "हम भी चलें और इनके साथ मर जायें।"

17) वहाँ पहुँचने पर ईसा को पता चला कि लाजरुस चार दिनों से कब्र में है।

18) बेथानिया येरूसालेम से दो मील से भी कम दूर था,

19) इसलिये भाई की मृत्यु पर संवेदना प्रकट करने के लिये बहुत से यहूदी मरथा और मरियम से मिलने आये थे।

20) ज्यों ही मरथा ने यह सुना कि ईसा आ रहे हैं, वह उन से मिलने गयी। मरियम घर में ही बैठी रहीं।

21) मरथा ने ईसा से कहा, “प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नही मरता

22) और मैं जानती हूँ कि आप अब भी ईश्वर से जो माँगेंगे, ईश्वर आप को वही प्रदान करेगा।“

23) ईसा ने उसी से कहा “तुम्हारा भाई जी उठेगा“।

24) मरथा ने उत्तर दिया, “मैं जानती हूँ कि वह अंतिम दिन के पुनरुथान के समय जी उठेगा“।

25) ईसा ने कहा, "पुनरुथान और जीवन में हूँ। जो मुझ में विश्वास करता है वह मरने पर भी जीवित रहेगा

26) और जो मुझ में विश्वास करते हुये जीता है वह कभी नहीं मरेगा। क्या तुम इस बात पर विश्वास करती हो?"

27) उसने उत्तर दिया, "हाँ प्रभु! मैं दृढ़ विश्वास करती हूँ कि आप वह मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं, जो संसार में आने वाले थे।"

28) वह यह कह कर चली गयी और अपनी बहन मरियम को बुला कर उसने चुपके से उस से कहा, "गुरुवर आ गये हैं, तुम को बुलाते हैं।"

29) यह सुनते ही वह उठ खडी हुई और ईसा से मिलने गयी।

30) ईसा अब तक गाँव नहीं पहुँचें थे। वह उसी स्थान पर थे, जहाँ मरथा उन से मिली थी।

31) जो यहूदी लोग संवेदना प्रकट करने के लिये मरियम के साथ घर में थे, वे यह देख कर कि वह अचानक उठकर बाहर चली गयी उसके पीछे हो लिये क्योंकि वे समझते थे कि वह कब्र पर रोने जा रही है।

32) मरियम उस जगह पहुँची, जहाँ ईसा थे। उन्हें देखते ही वह उनके चरणेां पर गिर पडी और बोली, "प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नहीं मरता।"

33) ईसा उसे और उसके साथ आये हुये यहूदियों को रोते देखकर, बहुत व्याकुल हो उठे और आह भर कर

34) बोले तुम लोगों ने उसे कहाँ रखा हैं? उन्होनें कहा, "प्रभु! आइये और देखिये।"

35) ईसा रो पडे।

36) इस पर यहूदियों ने कहा, "देखो! वे उसे कितना प्यार करते थे";

37) किन्तु कुछ लोगो ने कहा, "इन्होंने तो अन्धे को आँखें दी। क्या वे उस को मृत्यु से नही बचा सकते थे।"

38) कब्र के पास पहुँचने पर ईसा फिर बहुत व्याकुल हो उठे। वह कब्र एक गुफा थी जिसके मुँह पर एक बडा पत्थर रखा हुआ था।

39) ईसा ने कहा, पत्थर हटा दो। मृतक की बहन मरथा ने उन से कहा, "प्रभु! अब तो दुर्गन्ध आती होगी। आज चैथा दिन है।"

40) ईसा ने उसे उत्तर दिया, "क्या मैंने तुम से यह नहीं कहा कि यदि तुम विश्वास करोगी तो ईश्वर की महिमा देखोगी?"

41) इस पर लोगों ने पत्थर हटा दिया। ईसा ने आँखें उपर उठाकर कहा, "पिता! मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ; तूने मेरी सुन ली है।

42) मैं जानता था कि तू सदा मेरी सुनता है। मैंने आसपास खडे लोगो के कारण ही ऐसा कहा, जिससे वे विश्वास करें कि तूने मुझे भेजा है।"

43) इतना कहने के बाद ईसा ने ऊँचें स्वर से पुकारा, "लाजरुस! बाहर निकल आओ!"

44) मृतक बाहर निकला। उसके हाथ और पैर पटिटयों से बँधे हुये थे और उसके मुख पर अँगोछा लपेटा हुआ था। ईसा ने लोगो से कहा, इसके बन्धन खोल दो और चलने-फिरने दो।

45) जो यहूदी मरियम से मिलने आये थे और जिन्होंने ईसा का यह चमत्कार देखा, उन में से बहुतों ने उन में विश्वास किया।



✍ -Br. BiniushTopno

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मार्च 19, 2023, इतवार चालीसा काल का चौथा इतवार

 

मार्च 19, 2023, इतवार

चालीसा काल का चौथा इतवार





📒 पहला पाठ : 1समुएल 16:1ब,6-7,10-13अ


1) प्रभु ने समूएल से कहा, "तुम कब तक उस साऊल के कारण शोक मनाते रहोगे, जिसे मैंने इस्राएल के राजा के रूप में अस्वीकार किया है? तुम सींग में तेल भर कर जाओ। मैं तुम्हें बेथलेहेम-निवासी यिशय के यहाँ भेजता हूँ, क्योंकि मैंने उसके पुत्रों में एक को राजा चुना है।"

6) जब वे आये और समूएल ने एलीआब को देखा, तो वह यह सोचने लगा कि निश्चय ही यही ईश्वर का अभिषिक्त है।

7) परन्तु ईश्वर ने समूएल से कहा, "उसके रूप-रंग और लम्बे क़द का ध्यान न रखो। मैं उसे नहीं चाहता। प्रभु मनुष्य की तरह विचार नहीं करता। मनुष्य तो बाहरी रूप-रंग देखता है, किन्तु प्रभु हृदय देखता है।"

10) इस प्रकार यिशय ने अपने सात पुत्रों को समूएल के सामने उपस्थित किया। किन्तु समूएल ने यिशय से कहा, "प्रभु ने उन में किसी को भी नहीं चुना।"

11) उसने यिशय से पूछा, "क्या तुम्हारे पुत्र इतने ही है? "यिशय ने उत्तर दिया, "सब से छोटा यहाँ नहीं है। वह भेडे़ चरा रहा है।" तब समूएल ने यिशय से कहा, "उसे बुला भेजो। जब तक वह नहीं आयेगा, हम भोजन पर नहीं बैठेंगे।"

12) इसलिए यिशय ने उसे बुला भेजा। लड़के का रंग गुलाबी, उसकी आँखें सुन्दर और उसका शरीर सुडौल था। ईश्वर ने समूएल से कहा, "उठो, इसका अभिशेक करो। यह वही है।"

13) समूएल ने तेल का सींग हाथ में ले लिया और उसके भाइयों के सामने उसका अभिशेक किया। ईश्वर का आत्मा दाऊद पर छा गया और उसी दिन से उसके साथ विद्यमान रहा। समूएल लौट कर रामा चल दिया।



📕 दूसरा पाठ : एफेसियों 5:8-14



8) आप लोग पहले ’अन्धकार’ थे, अब प्रभु के शिष्य होने के नाते ’ज्योति’ बन गये हैं। इसलिए ज्योति की सन्तान की तरह आचरण करें।

9) जहाँ ज्योति है, वहाँ पर हर प्रकार की भलाई, धार्मिकता तथा सच्चाई उत्पन्न होती है।

10) आप यह पता लगाते रहें कि प्रभु को कौन-सी बातें प्रिय हैं,

11) लोग जो व्यर्थ के काम अंधकार में करते हैं, उन से आप दूर रहें और उनकी बुराई प्रकट करें।

12) वे जो काम गुप्त रूप से करते हैं, उनकी चर्चा करने में भी लज्जा आती है।

13) ज्योति इन सब बातों की बुराई प्रकट करती और इनका वास्तविक रूप स्पष्ट कर देती है।

14) ज्योति जिसे आलोकित करती है, वह स्वयं ज्येाति बन जाता है। इसलिए कहा गया है -नींद से जागो, मृतकों में से जी उठो और मसीह तुम को आलोकित कर देंगे।



📙 सुसमाचार : योहन 9:1-41 अथवा 9:1,6-9,13-17,34-38



1) रास्ते में ईसा ने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म से अन्धा था।

2) उनके शिष्यों ने उन से पूछा, "गुरुवर! किसने पाप किया था, इसने अथवा इसके माँ-बाप ने, जो यह मनुष्य जन्म से अन्धा है?"

3) ईसा ने उत्तर दिया, "न तो इस मनुष्य ने पाप किया और न इसके माँ-बाप ने। यह इसलिए जन्म से अन्धा है कि इसे चंगा करने से ईश्वर का सामर्थ्य प्रकट हो जाये।

4) जिसने मुझे भेजा, हमें उसका कार्य दिन बीतने से पहले ही पूरा कर देना है। रात आ रही है, जब कोई भी काम नहीं कर सकता।

5) मैं जब तक संसार में हूँ, तब तक संसार की ज्योति हूँ।"

6) उन्होंने यह कह कर भूमि पर थूका, थूक से मिट्टी सानी और वह मिट्टी अन्धे की आँखों पर लगा कर

7) उस से कहा, "जाओ, सिलोआम के कुण्ड में नहा लो"। सिलोआम का अर्थ है ‘प्रेषित’। वह मनुष्य गया और नहा कर वहाँ से देखता हुआ लौटा।

8) उसके पड़ोसी और वे लोग, जो उसे पहले भीख माँगते देखा करते थे, बोले, "क्या यह वही नहीं है, जो बैठे हुए भीख माँगा करता था?"

9) कुछ लोगों ने कहा, "हाँ, यह वही है"। कुछ ने कहा, "नहीं, यह उस-जैसा कोई और होगा"। उसने कहा, मैं वही हूँ"।

10) इस पर लोगों ने उस से पूछा, "तो, तुम कैसे देखने लगे?"

11) उसने उत्तर दिया, "जो मनुष्य ईसा कहलाते हैं, उन्होंने मिट्टी सानी और उसे मेरी आँखों पर लगा कर कहा- सिलोआम जाओ और नहा लो। मैं गया और नहाने के बाद देखने लगा।"

12) उन्होंने उस से पूछा, "वह कहाँ है?" और उसने उत्तर दिया, "मैं नहीं जानता"।

13) लोग उस मनुष्य को, जो पहले अन्धा था, फरीसियों के पास ले गये।

14) जिस दिन ईसा ने मिट्टी सान कर उसकी आँखें अच्छी की थीं, वह विश्राम का दिन था।

15) फिरीसियों ने भी उस से पूछा कि वह कैसे देखने लगा। उसने उन से कहा, "उन्होंने मेरी आँखों पर मिट्टी लगा दी, मैंने नहाया और अब मैं देखता हूँ"।

16) इस पर कुछ फरीसियों ने कहा, "वह मनुष्य ईश्वर के यहाँ से नहीं आया है; क्योंकि वह विश्राम-दिवस के नियम का पालन नहीं करता"। कुछ लोगों ने कहा, "पापी मनुष्य ऐसे चमत्कार कैसे दिखा सकता है?" इस तरह उन में मतभेद हो गया।

17) उन्होंने फिर अन्धे से पूछा, "जिस मनुष्य ने तुम्हारी आँखें अच्छी की हैं, उसके विषय में तुम क्या कहते हो?" उसने उत्तर दिया, "वह नबी है"।

18) यहूदियों को विश्वास नहीं हो रहा था कि वह अन्धा था और अब देखने लगा है। इसलिए उन्होंने उसके माता-पिता को बुला भेजा

19) और पूछा, "क्या यह तुम्हारा बेटा है, जिसके विषय में तुम यह कहते हो कि यह जन्म से अन्धा था? तो अब यह कैसे देखता है?"

20) उसके माता-पिता ने उत्तर दिया, "हम जानते हैं कि यह हमारा बेटा है और यह जन्म से अन्धा था;

21) किन्तु अब यह कैसे देखता है- हम यह नहीं जानते। हम यह भी नहीं जानते कि किसने इसकी आँखें अच्छी की हैं। यह सयाना है, इसी से पूछ लीजिए। यह अपनी बात आप ही बोलगा।"

22) उसके माता-पिता ने यह इसलिए कहा कि वे यहूदियों से डरते थे। यहूदी यह निर्णय कर चूके थे कि यदि कोई ईसा को मसीह मानेगा, तो वह सभागृह से बहिष्कृत कर दिया जायेगा।

23) इसलिए उसके माता-पिता ने कहा-"यह सयाना है, इसी से पूछ लीजिए’।

24) उन्होंने उस मनुष्य को, जो पहले अन्धा था, फिर बुला भेजा और उसे शपथ दिला कर कहा, "हम जानते हैं कि वह मनुष्य पापी है"।

25) उसने उत्तर दिया, "वह पापी है या नहीं, इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। मैं यही जानता हूँ कि मैं अन्धा था और अब देखता हूँ।"

26) इस पर उन्होंने उस से फिर पूछा, "उसने तुम्हारे साथ क्या किया? उसने तुम्हारी आँखे कैसे अच्छी कीं?

27) उसने उत्तर दिया, "मैं आप लोगों को बता चुका हूँ, लेकिन आपने उस पर ध्यान नहीं दिया। अब फिर क्यों सुनना चाहते हैं? क्या आप लोग भी उनके शिष्य बनना चाहते हैं?"

28) वे उसे बुरा-भला कहते हुए बोले, "तू ही उसका शिष्य बन जा। हम तो मूसा के शिष्य हैं।

29) हम जानते हैं कि ईश्वर ने मूसा से बात की है, किन्तु उस मनुष्य के विषय में हम नहीं जानते कि वह कहाँ का है।"

30) उसने उन्हें उत्तर दिया, "यही तो आश्चर्य की बात है। उन्होंने मुझे आँखे दी हैं और आप लोग यह भी नहीं जानते कि वह कहाँ के हैं।

31) हम जानते हैं कि ईश्वर पापियों की नहीं सुनता। वह उन लोगों की सुनता है, जो भक्त हैं और उसकी इच्छा पूरी करते हैं।

32) यह कभी सुनने में नही आया कि किसी ने जन्मान्ध को आँखें दी हैं।

33) यदि वह मनुष्य ईश्वर के यहाँ से नहीं आया होता, तो वह कुछ भी नहीं कर सकता।"

34) उन्होंने उस से कहा, "तू तो बिलकुल पाप में ही जन्मा है। तू हमें सिखाने चला है?" और उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया।

35) ईसा ने सुना कि फरीसियों ने उसे बाहर निकाल दिया है; इसलिए मिलने पर उन्होंने उस से कहा, "क्या तुम मानव पूत्र में विश्वास करते हो?"

36) उसने उत्तर दिया, "महोदय! मुझे बता दीजिए कि वह कौन है, जिससे मैं उस में विश्वास कर सकूँ।

37) ईसा ने उस से कहा, "तुमने उसे देखा है। वह तो तुम से बातें कर रहा है।"

38) उसने उन्हें दण्डवत् करते हुए कहा "प्र्रभु! मैं विश्वास करता हूँ"।

39) ईसा ने कहा, "मैं लोगों के प्रथक्करण का निमित्त बन कर संसार में आया हूँ, जिससे जो अन्धे हैं, वे देखने लगें और जो देखते हैं, वे अन्धे हो जायें"।

40) जो फरीसी उनके साथ थे, वे यह सुन कर बोले, "क्या हम भी अन्धे हैं?"

41) ईसा ने उन से कहा, "यदि तुम लोग अन्धे होते, तो तुम्हें पाप नहीं लगता, परन्तु तुम तो कहते हो कि हम देखते हैं; इसलिए तुम्हारा पाप बना रहता है।



📚 मनन-चिंतन


प्रभु का बुलावा किसी की योग्यता या किसी की कला को नही देखता है। प्रभु अयोग्य को भी योग्य बनाता है। वह उनके बाहरी रंग रूप को नहीं देखता बल्कि वह हृदय को देखता है। प्रभु की ज्योति की चमक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो सारे इस्त्राएल का चरवाहा बना। एक साधारण चरवाहा इ़स्त्राएल का राजा बना। प्रभु ने उसका अभिपेक कर अपना आत्मा उसे प्रदान किया, जिससे वह सब को ज्योति की राह पे ले चले।

प्रभु येसु के अनुयायी होने के नाते हम ज्योति बन गये। हम अंधकार में छिप गये थे। प्रभु ज्योति बन कर इस अंधकार से बहार निकालने आये। यह ज्योति अंनत जीवन देने वाली ज्याति है। जो उसका अनुसरण करेगा, वह अंधेरे मे नहीं भटकेगा। हम इस ज्योति को हमारे जीवन में चमकने दें।

ज्योति के आभाव से मनुष्य अंधकार में भटकता है। उसे अपने मार्ग पर चलने से कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अंधकार उसके जीवन को खाली कर छोड़ देता है। वह उस अंधकार से बहार आकर ज्योति के मार्ग पर चलना चाहता है। प्रभु येसु जन्म से अन्धे उस व्यक्ति की आखों को ज्योति प्रदान करते हैं। वह उस ज्योति से आलोकित होकर प्रभु की स्तुति करता है।

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु एक जन्मान्ध को चंगा करते हैं। साथ-साथ प्रभु हमें यह शिक्षा देना चाहते हैं कि अच्छे सास्थ्य तथा बीमारी – दोनों में प्रभु का सामर्थ्य प्रकट होता है; समृद्धि और कष्ट – दोनों में प्रभु का सामर्थ्य प्रकट होता है।




📚 REFLECTION

The call of the Lord does not look at one's ability or one's skill. The Lord makes even the unworthy worthy. He does not see their outer appearance but sees the heart. The light of the Lord shone upon such a man who became the shepherd of all Israel. A simple shepherd became the king of Israel. The Lord blessed him and gave his Spirit to him, so that he could lead everyone on the path of light.

As followers of the Lord Jesus, we have become light. But we often hide in the dark. The Lord came as the light to bring us out of this darkness. This light is the flame that gives eternal life. He who follows him will not wander in the dark. Let us let this light shine in our lives.

Man wanders in darkness due to lack of light. He has to face many problems while walking on his path. The darkness leaves his life empty. He wants us to come out of that darkness and walk on the path of light. In today's Gospel, the Lord Jesus heals a man who was born blind. Jesus gives light to his eyes. Enlightened by that light, he praises the Lord.

At the same time, the Lord wants to teach us that the power of the Lord is manifested both in good health and in illness. The power of the Lord is manifested in both prosperity and suffering. We need to learn to see the hand of the Lord in all circumstances.




प्रवचन - 01

समस्याएं, बीमारी, परेशानियॉ जीवन का अभिन्न अंग है। ये बातें सामान्य जीवन में अवरोधक हैं। सभी इससे बचने का प्रयत्न करते हैं किन्तु कोई भी प्राणी इससे अछूता नहीं रह सकता है। जिस प्रकार हम इन अवरोधों का सामना करते हैं वह हमारे जीवन को परिभाषित करता था उसे निर्धारित करता है। संत योहन के सुसमाचार अध्याय 9 में हम जंमांध अंधे को पाते हैं। उस जंमांध अंधे को देखकर सभी लोग अपना-अपना राग अलाप रहे थे। शिष्य भी इसके बारे में अधिक सकारात्मक नहीं सोचते थे। वे येसु से पूछते हैं, ’’गुरुवर! किसने पाप किया था, इसने अथवा इसके माँ-बाप ने, जो यह मनुष्य जन्म से अन्धा है?’’ शिष्यों तथा शायद अधिकांश लोगों के लिये उस व्यक्ति का अंधापन एक समस्या है। उसका अंधापन किसी के पाप का कारण है किन्तु येसु के लिये यह समस्या एक अवसर है। येसु के लिये अंधकार, ज्योति को लाने का अवसर है। इसलिये वे कहते हैं, ’’न तो इस मनुष्य ने पाप किया और न इसके माँ-बाप ने। यह इसलिए जन्म से अन्धा है कि इसे चंगा करने से ईश्वर का सामर्थ्य प्रकट हो जाये।’’ येसु के लिये उसका अंधापन पिता ईश्वर की कृपा को चंगाई के रूप में उस पर प्रकट करने का अवसर था।

कई बार हम समस्याओं को बाधा मानते हैं किन्तु येसु हमें सिखाते हैं कि समस्याएं बाधा नहीं बल्कि अपनी क्षमताओं और सामर्थ्य को प्रदर्शित करने का अवसर है। संत मत्ती के सुसमाचार अध्याय 14 में हम रोटियों के चमत्कार का वर्णन पाते हैं। जब येसु भीड़ को देखते हैं तो उन्हें उन पर तरस आता है तथा वे उनमें जो रोगी थे उनको चंगा करते हैं। जब दिन ढलने को होता है तो शिष्यों के लिये यह भीड एक समस्या तथा बोझ बन जाती है। वे इससे छुटकारा पाने के लिये येसु को पूर्व में ही सूचित करते हुये कहते हैं, ’’यह स्थान निर्जन है और दिन ढल चुका है। लोगों को विदा कीजिए, जिससे वे गाँवों में जा कर अपने लिए खाना खरीद लें।’’ किन्तु येसु उनसे कहते हैं, ’’उन्हें जाने की जरूरत नहीं। तुम लोग ही उन्हें खाना दे दो। इस पर शिष्यों ने कहा ’पाँच रोटियों और दो मछलियों के सिवा यहाँ हमारे पास कुछ नहीं है।’’ येसु इस समस्या को अवसर के रूप में प्रदर्शित करते हुये शिष्यों से जो कुछ उनके पास था उसे उनके पास ले आने के लिये कहते हैं, ’’उन्हें यहाँ मेरे पास ले आओ।’’ (मत्ती 14:15-18) येसु उन पर आशिष की प्रार्थना कर उसे सभी के लिये भोजन में बना देते हैं। इस प्रकार जो शिष्यों के लिये समस्या थी उसे येसु पिता की दया को प्रदर्शित करने का अवसर बना देते हैं। रोचक तथ्य यह है कि बचे हुये टुकडों से बारह टोकरियॉ भर जाती है। ऐसा इसलिये प्रतीत होता है मानो बारह टोकरियॉ येसु के बारह शिष्यों के लिये एक पाठ या सीख हो कि समझों ईश्वर किस प्रकार हमारे अभावों या समस्याओं को अपने महान चमत्कार के द्वारा हमारी समझ से ज्यादा परितृप्त कर सकता है।

लाजरूस की बीमारी, उसकी मृत्यु तथा मृत अवस्था से पुनः जीवन पाने का घटनाक्रम इस बात को और भी अधिक रूप से प्रतिपादिक करता है कि येसु के लिये समस्या या जाटिल परिस्थिति पिता की महिमा प्रकट करने का अवसर है। लाजरूस की ’’बहनों ने ईसा को कहला भेजा, प्रभु! देखिये, जिसे आप प्यार करते हैं, वह बीमार है। ईसा ने यह सुनकर कहा, ’यह बीमारी मृत्यु के लिये नहीं, बल्कि ईश्वर की महिमा के लिये आयी है। इसके द्वारा ईश्वर का पुत्र महिमान्वित होगा।’’(योहन 11:3-4) येसु का यह कथन आने वाले घटनाक्रम के लिये था जिसके द्वारा वे न सिर्फ मृत लाजरूस को पुनः जीवन प्रदान करने का महान कार्य करेंगे बल्कि दूसरों तथा विशेषकर उनकी बहनों मरथा और मरियम में पुनरूत्थान के प्रति विश्वास भी दृढ़ बनायेंगे। (देखिये योहन 11:1-44)

संत लूकस के सुसमाचार 8:41-53 में जैरूस की पुत्री के पुनः जीवन पाने की घटना है। जब सभागृह का अधिकारी जैरूस येसु के पास आता है तो उसकी बारह बरस की बेटी मरने को थी। येसु के लिये उस तक जल्द-से-जल्द से पहुॅचना अनिवार्य था अन्यथा वह मर जायेगी। येसु इस कार्य हेतु निकल भी पडते हैं। किन्तु रास्ते में कोई उन्हें छू लेता है। ऐसी आपातकालीन परिस्थिति में भी येसु उस रक्तस्राव से पीडित महिला को नजरअंदाज नहीं करते वरन उस स्त्री के ’विश्वास के स्पर्श’, जो उसके विश्वास की अभिव्यक्ति थी, को सारी भीड के सामने दिखाने का अवसर देखते हैं। इस दौरान देर हो जाती तथा मार्ग में ही सूचना मिलती है कि जैरूस की बेटी मर चुकी है। येसु इस शोकमय परिस्थिति को पिता की महिमा दिखाने के अवसर के रूप में देखते हैं और घर जाकर मृत बालिका से कहते हैं, ’’ओ लड़की! उठो!’’ उसके प्राण लौट आये और वह उसी क्षण उठ खड़ी हो गयी। ईसा ने उसे कुछ खिलाने को कहा।’’ (लूकस 8:54-55)

इस प्रकार येसु हर बीमारी, विवाद, पूछताछ आदि की समस्याग्रसित परिस्थितियों को अपनी शिक्षा देने पिता ईश्वर की महिमा प्रकट करने तथा उनकी योजना को प्रदर्शित करने के अवसर के रूप में देखते हैं। यहॉ तक कि उनका दुखभोग, क्रूस पर प्राणपीडा, मृत्यु जैसी घोर परिस्थितियॉ भी येसु को इन्हें पिता का साक्ष्य देने के अवसर बनाने से नहीं रोक सके।

शिष्यों तथा अन्यों के लिये वह जंमांध व्यक्ति एक नकारात्मक समस्या था। उनके लिये वह पाप का प्रतीक था किन्तु येसु के लिये वह अवसर था। हम अपने जीवन की समस्यों एवं चुनौतियों को कैसे लेते हैं? शायद कुडकुडाकर या उदास होकर या फिर स्वयं को बेचारा समझकर। किन्तु यही वह समय होता जब हम अपने विश्वास के द्वारा इन्हें अपने विश्वास की अभिव्यक्ति के अवसर के रूप में देख सकते हैं। हमें जीवन की समस्याओं को अवसर मानना तथा बनाना चाहिये। येसु का जीवन हमें इसी बात को सिखाता है।




HOMILY - 01

Problems, sicknesses, tensions are integral part of human life. However, these things are deterrent to our normal life. We all try to escape and run away from these deterrents but no one can escape from them. Our problems do not define us but how we handle them shape and mould our life. In St. John’s gospel chapter 9 we encounter a man born blind. Many people have their own theories and opinions about his blindness. Even the disciples were not exception to this. They asked Jesus, “Rabbi, who sinned, this man or his parents, that he was born blind?” For them his blindness is a problem because they think it is an outcome of sin. But Jesus sees differently. For him it is an opportunity to manifest God’s glory as he says, “Neither this man nor his parents sinned; he was born blind so that God’s works might be revealed in him.”

Many a times and very often we consider our difficulties as problems but the Lord Jesus teaches us problems are occasion to show forth our strength and calibre. In Matthew 14 we have the miracle of multiplication of bread. When Jesus sees the crowd, he had pity on them and he healed many of them. When the day was coming to end the crowd become a problem for the disciples. So they caution Jesus to disperse them, ‘This is a deserted place, and the hour is now late; send the crowds away so that they may go into the villages and buy food for themselves.’ Jesus said to them, ‘They need not go away; you give them something to eat.’ They replied, ‘We have nothing here but five loaves and two fish.’ And he said, ‘Bring them here to me.’ (Mt. 14:15-18) Lord blesses the five loaves and two fish and turns them into a food for thousands of them. What was a problem for the disciples Jesus turns it into an occasion to manifest God’s glory. Interestingly the twelve baskets leftover crumbs seem to be left for the twelve disciples to believe and remember how a problem was turned into a miracle.

The events of Lazarus’s illness, his death and rising to life prove this point much more powerfully that a grave situation or a difficulty is an opportunity for Jesus. “So the sisters sent a message to Jesus, ‘Lord, he whom you love is ill.’ But when Jesus heard it, he said, ‘This illness does not lead to death; rather it is for God’s glory, so that the Son of God may be glorified through it.” (John 11:3-4) Jesus’ statement was an indication of the things that would follow and he would not only give life to dead Lazarus but also stir and strengthen the faith of others specially of Lazarus’ sisters Marth and Mary in the resurrection.

Luke’s gospel 8:41-53 narrates how the daughter of Jairus was raised to life. When the official Jairus approached Jesus, his daughter was about to die. It was important that Jesus should reach his house at the earliest. However, on the way Jesus encounter great crowd and in it a woman who touches the fringe of his garment to be healed. Jesus amidst this commotion makes this ‘touch of faith’ of the woman to become an example of faith to all. So, he calls her to bear witness to the healing she had received. All this happening had delayed Jesus and meanwhile the daughter had died. Yet Jesus is not discouraged but he further exploits the grave situation to manifest God’s glory and raises the dead girl to life. “He took her by the hand and called out, ‘Child, get up!’ Her spirit returned, and she got up at once. Then he directed them to give her something to eat.” (Luke 8:54-55)

Jesus always saw the sickness, opposition, inquiry etc. as occasions and opportunity to teach and give glory to God and manifest his plan for the world. Even he considered his trial, passion and death to be an occasion to bear witness to the will of God the father.

For the disciples and perhaps for many people the man born blind was a negative situation. It was perceived to be a cause of sin but for the Lord it was an occasion. How do we see the difficulties and challenges of our life? How do we accept and handle them? Many a times we grumble and curse the situation and sadly drag beneath them. But those are the moments we need to sum up our faith and turn them into opportunities to bear witness to the world of our faith.



प्रवचन - 02

सुख और दुःख हमारे जीवन के दो पहलू हैं। दोनों ही हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। कभी सुख आता तो कभी दुःख। सुख और दुःक का चक्कर हमारे जीवन में चलता ही रहता है। हम सब एक दूसरे को मद्द करने व अच्छाई कर ईश्वर को प्रकट करने के लिए बुलाये गये हैं।

एक बुजुर्ग व्यक्ति न्यू योर्क के ब्रुकलेन शहर के सड़क किनारे अचानक बेहोश हो गया। तुरन्त उसे किंग्स कौन्टी होस्पीटल में भर्ती कराया गया। नर्स अपनी ड्यूटी में, कुछ पूछ-ताछ करने के बाद पता चला कि कोई मारीन जो उत्तरी कारोलिना में रहता था उसका बेटा हो सकता है। नर्स ने उस मारीन को फोन कर अस्पताल बुलवाया। जब वह मारीन आ पहुँचा तो नर्स ने जल्दी से उस मरते हुए बुजुर्ग के बेड के पास ले गयी और उसने कहा-‘‘आपका बेटा आ गया है।’’ नर्स इस वाक्य को तबतक दुहराती रही जबतक बिमार व्यक्ति की ऑंखें नहीं खुल गयी। दिल का दौरा होने कारण दर्द निवारण दवा काफी मात्रा में दिया गया था। इस कारण उसे देखने में भी कठिनाई हो रही थी। जब उसने ऑंखे खोली तो देखा कि एक मारीन का व्यक्ति पूरी वरदी में ऑक्सीजन शिविर के बाहर खड़ा है। बुजुर्ग व्यक्ति ने अपना हाथ बढ़ाया। मारीन ने उसके कड़क हाथ को पकड़कर प्यार से सहलाने लगा। नर्स एक कुर्सी ले आया ताकि मारीन उसके बेड के बगल में बैठ सके। मरीन व्यक्ति पूरी रात भर उस बुजुर्ग व्यक्ति के हाथ को पकड़कर सहलाता रहा। उसे प्रेम और ढाड़स और बल देता रहा। कभी-कभी नर्स मरीन को दूसरे जगह जाकर थोड़ी आराम करने को कहा। लेकिन मारीन ने इन्कार कर दिया। मारीन उस बिमार बुजुर्ग को सहलाने और दिलासा देने में इतना लीन था कि नर्स के वार्ड आने-जाने व आस्पताल के विभिन्न प्रकार की आवाज से बिलकुल बेखबर था। कभी-कभी नर्स ने मारीन को कुछ हलका-हलका, कुछ कोमल शब्द कहते हुए सुना। मरता हुआ बुजुर्ग कुछ नहीं कहता सिवाय यह कि वह पूरी रात भर अपने बेटे का हाथ पकड़ा रहा। सवेरा होते-होते वह मर गया। मारीन ने धीरे से अपने हाथों को मृत्य शरीर के पकड़ से छुड़ाकर नर्स को खबर देने चला गया। जो कुछ नर्स को करना था वह करती रही, और मारीन प्रतीक्षा करता रहा। कुछ समय पश्चात नर्स वापस आयी। वह मारीन को संतवाना देने लगी। तभी मारीन ने बीच में पूछ दिया-‘‘कौन था यह आदमी?’’ नर्स अचम्भे में पड़ गयी। ‘‘वह आपका पिताजी था’’-नर्स ने कहा। ‘‘नहीं वह नहीं था’’-मारीन ने कहा-‘‘मैंने इसके पहले उसे कभी अपने जीवन में नहीं देखा।’’ ‘‘तो आप ने क्यों कुछ भी नहीं कहा जब मैं आप को उसके पास ले गई।’’ मैं जानता था कि कुछ गलतफामी हुई है। लेकिन मैं यह भी जानता था उस बुजुर्ग को अपने बेटे की जरूरत थी जो कि वहॉं था ही नहीं। जब मुझे लगा कि उसे अपने बेटे की सक्त जरूरत है और वह इतना बिमार था कि वह यह नहीं बता सकता था कि मैं वास्तव में उसका बेटा हूँ या नहीं, मैंने महसूस किया कि उसको मेरी जरूरत है, और इसलिए मैं रूक गया।’’

बाइबिलीय समय में मनवीय दुःख का प्रश्न सबसे विशाल समस्या थी अब भी विशाल समस्या ही है। और पुराना विधान दुःख वा पाप के संबन्ध को दर्शाता है। पुराना विधान बतलाता है कि दुःख और पाप एक साथ जुड़े हुए हैं। दुःख को ईश्वर के द्वारा दिया पाप की सजा के रूप में देखा जाता था। अतः जब कभी लोग किसी को दुःख सहते देखते तो यह निष्कर्ष निकालते थे कि पाप के कारण यह दुःख भोग रहा है। इस तरह से किसी भी प्रकार का दुःख लोगों को यही स्मरण दिलाती थी कि किसी ने पाप किया है। इस प्रकार लोगों में ईश्वर का भयंकर नाकारात्मक धारणा फैली हुई थी कि ईश्वर पाप करने वालों को सजा देता है, दुःख देता है। इस प्रकार लोगों में यह विश्वास था कि ईश्वर प्रतिशोधी है। इसलिए जब येसु के शिष्यों ने एक अन्धे को देखा तो तुरन्त वे इस निष्कर्ष पर पहुँच गये कि किसी ने पाप किया। उसके अन्धेपन का कारण पाप है। येसु के शिष्यों ने येसु से पूछा कि किसके पाप के कारण यह दुःख सह रहा है। समस्या, समस्या ही रही। यह उम्मीद करते हुए कि येसु इस समस्या का समाधान करे, उन्होंने येसु से पूछा- क्यों यह व्यक्ति जन्म से अन्धा है? किसने पाप किया? इसी ने पाप किया अथवा इसके माता-पिता ने? किसके पाप के कारण यह दुःख सह रहा है? येसु ने उत्तर दिया-‘‘न तो इस मनुष्य ने पाप किया और न इसके मॉं-बाप ने। वह इसलिए जन्म से अंधा है कि इसे चंगा करने से ईश्वर का सामर्थ्य प्रकट हो जाये।’’ इस प्रकार येसु यह नकारते हैं कि उस व्यक्ति के पाप और दुःख में कुछ संबन्ध है, पाप और दुःख में कुछ संयोजन है। उस व्यक्ति का अन्धापन ईश्वर की ओर से सजा नहीं था। ईश्वर बुराई नहीं करता है। ईश्वर अच्छाई करता है। हम इतने होशियार भी नहीं हैं कि यह जान पायें कि यह कैसे हुआ। यह हो सकता है कि यह आनुवंशिक हो, या फिर पालास्टाइन की स्वस्थ्य संबंधी लापरवाही का परिणाम हो। या ऐसे कुछ भी हुआ हो। हम नहीं जानते, और वास्तव में यह कोई महत्त्व की बात नहीं है। लेकिन महत्त्वपूर्ण बात ये है कि येसु आगे कहते हैं कि यह उसके लिए एक अवसर है, यह दर्शाने के कि ईश्वर का कार्य किस प्रकार है। फिर वह अन्धे को चंगा करने गया। तो व्यक्ति का अन्धापन बेशक यह दर्शाता कि ईश्वर किस प्रकार है। ये मानवीय दुःख के समक्ष ईश्वर की अनुकम्पा व करूणा को दर्शाता है। येसु के शिष्य शायद इस उत्तर से संतुष्ट नहीं रहे होंगे। लेकिन अन्धा व्यक्ति के लिए यह सर्वोत्तम उत्तर था। समस्याओं के बारे बात करना समस्या का समाधान नहीं करता, लेकिन कार्य अवश्य करता है। तो बुराई एक सच्चाई है। इस सच्चाई के प्रति प्रतिक्रिया अच्छा है। अन्धे व्यक्ति को जो आवश्यकता थी वह बुराई की उद्गम पर उपदेश नहीं बल्कि चंगाई की। इस प्रकार शिष्यों के लिए जो समस्या था येसु के लिए एक अवसर बनता है। ईश्वर के कार्य करने के लिए एक अवसर, ईश्वर किस प्रकार है इसे दर्शाने के लिए एक अवसर। और इसलिए येसु आगे कहते हैं कि समय बीतता जा रहा है। हमें उसका कार्य दिन बीतने से पहले पूरा कर देना है। पृथ्वी पर येसु का जीवन समाप्ति पर पहुँच रहा है। मृत्यु की रात जल्द आ रही है। इसलिए वह कहता है कि जबतक दिन बीतता है मुझे उसके कार्य को करते रहना है जिसने मुझे भेजा है। इसलिए येसु के शब्दों में शीघ्रता झलकती है। वे हर अवसर को ईश्वर को प्रकट करने के लिए उपयोग कर रहे थे। दूसरों के दुःख हमारे लिए भी अवसर बनता है, दूसरों की परवाह करने का अवसर। हमारे लिए भी रात आ रही है। हम नहीं जानते कि हमारी कितनी जिन्दगी बाकी है। इसलिए हमें जो भी अवसर प्राप्त होता है उन सभी अवसरों को अच्छाई करने के लिए स्तेमाल करना चाहिए। हमें किसी भी प्रकार के अन्धेपन से अशक्त नहीं होनी चाहिए। जैसे कि हमारी स्वार्थता हमें दूसरो की जरूरत को देखने नहीं देती। हमारी असंवेदनशीलता, हम जो दूसरों को दुःख देते उसे देखने नहीं देती है। हमारी अहंकार अपने ही गलतियों को स्वीकारने नहीं देती है। हमारी पूर्वधारणा सच्चाई से वंचित रखती है। हमारी जल्द-बाज वाली संस्कृति दुनिया की सौन्दर्य की निहारने नहीं देती है। भौतिकवाद हमें अध्यत्मिक मूल्यों को देखने नहीं देती है। छिछोरापन हमें लोगों के सच्ची मूल्यों व महत्त्वओं को देखने नहीं देती है। और हम वाह्य रंग-रूप से लागों को आंकते हैं जैसे कि आज के प्रथम पाठ में समूएल के साथ होता है। ये सभी एक तरह का अन्धापन है। हम सिर्फ ऑंखों से नहीं देखते हैं लेकिन हम अपने मन, दिल और कल्पनाशक्ति से भी देखते हैं। संकिर्ण दिमाग, लधु दिल और अशक्त, निर्बल कल्पनाशक्ति हमारी दष्टि को तीक्षण कर देती है। ये हमारे जीवन को अन्धकारमय बना देतीं है और हमारी दुनिया को सिकुड़कर छोटा कर देती है। यदि हम येसु को हमारे जीवन को ज्योतिमर्य बनाने देते हैं तो हम फिर से अपने आपको एवं हमारे जिन्दगी को उसी तरह, उसी प्रकाश में नहीं देखेंगे जैसे हम पहले देखते थे। आन्तरिक चमक से सबकुछ ज्योतिमर्य हो जायेगा। विश्वास हमें अधुनिक दुनिया की दुर्व्यवस्था, उलझन और अन्धकार में राह दिखाता है। हमें जो भी अवसर मिलता है हर अवसर में हमें अच्छाई करते हुए ईश्वर को प्रकट करना चाहिए, जिस प्रकार येसु ने किया। उस मारीन ने भी तो यही किया। वह बुजुर्ग उसका पिताजी नहीं था लेकिन मारीन ने उसके बेटे होने का एहसास दिलाया। किसी ने ठीक ही कहा है-‘‘हम इस दुनिया से एक बार गुजरते हैं कुछ अच्छाई जो हम कर सकते है, कुछ दया जो हम किसी पर कर सकते है अब करें। हम इसमें विलम्ब न करें और न ही उपेक्षा करें। क्योंकि हम फिर से इन राहों से नहीं गुजरेंगे।

✍ -Biniush Topno


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Praise the Lord!