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20 नवंबर 2022 ख्रीस्तराजा का समारोह

 

20 नवंबर 2022

ख्रीस्तराजा का समारोह



पहला पाठ : 2 समुएल 5:1-3


1) इस्राएल के सभी वंशों ने हेब्रोन में दाऊद के पास आकर कहा, "देखिए, हम आपके रक्त-सम्बन्धी हैं।

2) जब साऊल हम पर राज्य करते थे, तब पहले भी आप ही इस्राएलियों को युद्ध के लिए ले जाते और वापस लाते थे। प्रभु ने आप से कहा है, ‘तुम ही मेरी प्रजा इस्राएल के चरवाहा, इस्राएल के शासक बन जाओगे।"

3) इस्राएल के सभी नेता हेब्रोन में राजा के पास आये और दाऊद ने हेब्रोन में प्रभु के सामने उनके साथ समझौता कर लिया। उन्होंने दाऊद का इस्राएल के राजा के रूप में अभिशेक किया।



दूसरा पाठ : कलोसियों 1:12-20


12) सब कुछ आनन्द के साथ सह सकेंगे और पिता को धन्यवाद देंगे, जिसने आप को इस योग्य बनाया है कि आप ज्योति के राज्य में रहने वाले सन्तों के सहभागी बनें।

13) ईश्वर हमें अन्धकार की अधीनता से निकाल कर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में ले आया।

14) उस पुत्र के द्वारा हमारा उद्धार हुआ है, अर्थात् हमें पापों की क्षमा मिली है।

15) ईसा मसीह अदृश्य ईश्वर के प्रतिरूप तथा समस्त सृष्टि के पहलौठे हैं;

16) क्योंकि उन्हीं के द्वारा सब कुछ की सृष्टि हुई है। सब कुछ - चाहे वह स्वर्ग में हो या पृथ्वी पर, चाहे दृश्य हो या अदृश्य, और स्वर्गदूतों की श्रेणियां भी - सब कुछ उनके द्वारा और उनके लिए सृष्ट किया गया है।

17) वह समस्त सृष्टि के पहले से विद्यमान हैं और समस्त सृष्टि उन में ही टिकी हुई है।

18) वही शरीर अर्थात् कलीसिया के शीर्ष हैं। वही मूल कारण हैं और मृतकों में से प्रथम जी उठने वाले भी, इसलिए वह सभी बातों में सर्वश्रेष्ठ हैं।

19) ईश्वर ने चाहा कि उन में सब प्रकार की परिपूर्णता हो।

20) मसीह ने क्रूस पर जो रक्त बहाया, उसके द्वारा ईश्वर ने शान्ति की स्थापना की। इस तरह ईश्वर ने उन्हीं के द्वारा सब कुछ का, चाहे वह पृथ्वी पर हो या स्वर्ग में, अपने से मेल कराया।



सुसमाचार : लूकस 23:35-43



35) जनता खड़ी हो कर यह सब देख ही थी। नेता यह कहते हुए उनका उपहास करते थे, "इसने दूसरों को बचाया। यदि यह ईश्वर का मसीह और परमप्रिय है, तो अपने को बचाये।"

36) सैनिकों ने भी उनका उपहास किया। वे पास आ कर उन्हें खट्ठी अंगूरी देते हुए बोले,

37) "यदि तू यहूदियों का राजा है, तो अपने को बचा"।

38) ईसा के ऊपर लिखा हुआ था, "यह यहूदियों का राजा है"।

39) क्रूस पर चढ़ाये हुए कुकर्मियों में एक इस प्रकार ईसा की निन्दा करता था, "तू मसीह है न? तो अपने को और हमें भी बचा।"

40) पर दूसरे ने उसे डाँट कर कहा, "क्या तुझे ईश्वर का भी डर नहीं? तू भी तो वही दण्ड भोग रहा है।

41) हमारा दण्ड न्यायसंगत है, क्योंकि हम अपनी करनी का फल भोग रहे हैं; पर इन्होंने कोई अपराध नहीं किया है।"

42) तब उसने कहा, "ईसा! जब आप अपने राज्य में आयेंगे, तो मुझे याद कीजिएगा"।

43) उन्होंने उस से कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ कि तुम आज ही परलोक में मेरे साथ होगे"।



📚 मनन-चिंतन


इस संसार ने अपने अपने समय में न जाने कितने महान राजाओं और समाट्र को देखा। कितने बु़िद्धमान कुशल, ईमानदार और वीर राजाओं को देखा, इसके साथ साथ कई कमजोर और अकुशल, बेईमान और धोखेबाज राजाओं को भी देखा होगा। अब तक न जाने कितने राजा आयें और चले गयंे परंतु किसी भी राजा का राज्य ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया। आज हम ऐसे राजा का पर्व मना रहें है जो इस संसार से परे है जिसे सर्वोच्च प्रभु के पुत्र से जाना जाता है, जो पूरी कायनात का राजा है और वह है राजा येसु ख्रीस्त, जो प्रभुओं का प्रभु और राजाओं का राजा हैं तथा जिसका राज्य का कभी अंत नहीं होगा। जिसकी व्याख्या स्वर्गदूत गाब्रिएल मरियम को येसु के जन्म का संदेश देते समय करते हैं, ‘‘देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी। वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा, वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’ (लूकस 1ः31-33)

प्रभु येसु ख्रीस्त का साधारण से चरनी में जन्म लेना (लूकस 2ः7) और येसु को लोगो द्वारा राजा बनाये जाने का पता चलने पर स्वयं को अलग कर पहाड़ पर चले जाना (योहन 6ः15); ये घटना हमारे मन में प्रश्न करती हैं कि जब प्रभु अपने आप को राजा नहीं बनाना या कहलवाना चाहते थे तो फिर आज के पर्व क्या तात्पर्य है। इसे समझने के लिए हमें ईश्वर की दृष्टि से देखना होगा न की इस संसार की दृष्टि से; क्योकि ईश्वर का राज्य इस संसार का नहीं हैं, जिसे प्रभु येसु ख्रीस्त ने स्वयं योहन 18ः36 में कहा है, ‘‘मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता तो मेरे अनुयायी लडते और मैं यहुदियों के हवाले नहीं किया जाता। परंतु मेरा राज्य यहॉं का नहीं है।’’

प्रभु का राजत्व इस संसार के राजत्व से बिलकुल अलग है। जब येसु इस संसार में थे तब उनके शिष्य, यहुदी जनता और लोग प्रभु येसु को इस संसार के बाकी राजाओं के समान ही एक राजा बनाने के हिसाब से देख रहें थे। विशेषकर वह राजा जो उन्हें रोम के शासन से मुक्त करेगा, जिसकी विशाल सेना होगी, तथा वह अस्त्र और शस्त्र से युद्ध पर विजय प्राप्त करेगा। वे उन्हे एक करिश्माई इंसान के रूप में देख रहे थे जो आगे चल कर उनका राजा बनेगा परंतु शिष्यों को येसु के पुनरुत्थान एवं पेन्तेकोस्त के बाद ही समझ में आया कि येसु साधारण मनुष्य ही नहीं पर वह प्रभु है जो प्रभुओं का प्रभु और राजाओ का राजा है। वे केवल छोटे से राज्य के ही नहीं परंतु समस्त संसार, आकाश और पृथ्वी तथा समस्त सृष्टि के राजा है, स्वामि है।

आज का पर्व हमंे क्या संदेश देता हैं? आज का पर्व हमें यह संदेश देता है कि अगर हम येसु को इस संसार की दृष्टि से देखेंगे तो हम अपने आप को सच्चाई से दूर रखंेगे तथा येसु हमारे लिए बहुत ही सीमित हो जायेंगे परंतु जब हम येसु को ईश्वर की दृष्टि से देखेंगे तो हमें सच्चाई का पता चलेगा कि येसु एक महान और असीमित प्रभु है जो राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है (1 तिमथी 6ः15), जिसे स्वर्ग और पृथ्वी पर पूरा अधिकार अब पहले और सभी युगों के लिए दिया गया हैं (मत्ती 28ः18)।

आज का पर्व हमें प्रभु येसु को अपने जीवन का राजा बनाने के लिए आमंत्रित करता हैं। प्रभु येसु को अपने जीवन का राजा बनाना अर्थात् उसकी बातें सुनना, उससे प्रेम करना, उसकी सेवा करना और उसका अनुसरण करना है। जब हम उसके साथ चलने की कोशिश करते है, जब हम सम्पूर्ण रूप से अपना जीवन सुसमाचार की आत्मा के अनुसार जीते है और जब वह सुसमाचार की आत्मा हमारे जीवन के हर क्षेत्र पर समा जाता है तभी हम उसके राज्य के रहवासी कहलाते हैं। अगर येसु सच में हमारेे जीवन का राजा है तो वह हमारे जीवन के हर भाग का राजा होना चाहिए, तथा हमे उसे हमारे जीवन के हर क्षेत्र में राज करने देना चाहिए।

ख्रीस्त राजा का पर्व हर साल पूजनविधि के अंतिम रविवार में मनाया जाता है। यह पर्व हमें बताता हैं कि हमें याद रखना चाहिए कि अंत में हमारे साथ क्या होने वाला है। आज के पाठों द्वारा ईश्वर प्रकट करते है कि अंत मंे सबका न्याय होगा। अंत में प्रभु राजा अपनी महिमा के साथ आयेगा और एक चरवाहे की तरह न्याय करेगा। एज़केएिल 34ः17, ‘‘मेरी भेड़ों! तुम्हारे विषय में प्रभु-ईश्वर यह कहता है- मैं एक-एक कर के भेड़ों, मेढ़ों और बकरों का- सब का न्याय करूॅंगा।’’ मत्ती 25ः31-32, ‘‘जब मानव पुत्र सब स्वर्गदूतों के साथ महिमा-सहित आयेगा, तो वह अपने मिहमामय सिंहासन पर विराजमान होगा और सभी राष्ट्र उसके सम्मुख एकत्र किये जायेंगे। जिस तरह चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग करता है, उसी तरह वह लोगों को एक दूसरे से अलग कर देगा।’’

संत मत्ती के सुसमाचार में येसु भेडो़ को प्रभु के कृपापात्र कहते है। क्योंकि उन्होने अपने को प्रभु की कृपा प्राप्त करने लायक बनाया। ये वो लोग हैं जिन्होने ईश्वर के स्वाभाव को अपने जीवन द्वारा दर्शाया। ईश्वर के स्वाभाव के कुछ अंश एजे़किएल 34ः16 में बताया गया है, ‘‘प्रभु कहता है- जो भेड़ें खो गयी हैं, मैं उन्हें खोज निकालूॅंगा, जो भटक गयी हैं, मैं उन्हे लौटा लाऊॅंगा, जो घायल हो गयी हैं उनके घावों पर पट्टी बॉंधूगाा, जो बीमार हैं, उन्हें चंगा करूॅंगा, जो मोटी और भली चंगी हैं, उनकी देखरेख करूॅंगा।’’ यह वचन हमें बताता है कि किस प्रकार प्रभु अपने लोगों का ख्याल रखता है, रक्षा करता है, पट्टी लगाता है तथा देखरेख करता है। यहीं स्वाभाव को अपना कर जो दूसरों के लिए कार्य करता है जैसे भूखों को खिलाना, प्यासों को पिलाना, परदेशी को अपने यहॉं ठहराना, नंगों को पहनाना, बीमारों को भेंट करना, बंदी को मिलने जाना इत्यादि तो वह प्रभु का कृपापात्र बन जाता हैं, जिससे प्रभु कहते है, ‘तुमने मेरे भाइयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, जो कुछ किया, वह तुमने मेरे लिए ही किया। आओ और उस राज्य के अधिकारी बनो, जो संसार के प्रारंभ से तुम लोगों के लिए तैयार किया गया है।’ जो प्रभु को अपना राजा मानते हैं वह ईश्वरीय राज्य के अनुसार तथा उनके वचन के अनुसार कार्य भी करते हैं और इसका फल उन्हे जरूर प्राप्त होगा।

आईये आज के इस पर्व के दिन येसु को हम सच्चे हृदय से अपना राजा माने जो हमारी देखरेख एक सच्चे चरवाहा के समान करता है। तथा हम अपने आप को उसका सच्चा भेड़ कहलाने योग्य जीवन बिताये। आमेन!



📚 REFLECTION


This world has seen so many kings and emperors in its own times; The wise, skilled, honest, and brave kings along with weak, unskilled, dishonest and double-dealer kings. Till now so many kings came and went but none of their kingdom could remain for longer times. Today we are celebrating the feast of that King who is apart from this world, who is the Son of the Most High, who is the King of the Universe and he is the King Jesus Christ who is Lord of lords and King of kings and his Kingdom will never end and this we find in the gospel of Luke 1:31-33 where angel Gabriel gives the message to Mary about the birth of Jesus, “You will conceive in your womb and bear a son, and you will name him Jesus. He will be great, and will be called the Son of the Most High, and the Lord God will give to him the throne of his ancestor David. He will reign over the house of Jacob forever, and of his kingdom there will be no end.”

Jesus taking birth in a manger (Lk 2:7) and Jesus withdrawing himself to the mountain after realizing that people were about to come and take him by force to make him king (Jn 6:1); these events put a question in our minds that when Jesus himself does not want to be called as king then what is the meaning of today’s feast. To understand this we have to see from the view point of God and not from the world’s point of view; because God’s kingdom is not of this world, as Jesus himself says in Jn 18:36, “My kingdom is not from this world. If my kingdom were from this world, my followers would be fighting to keep me from being handed over to the Jews. But as it is, my kingdom is not from here.”

God’s kingship is different from the world’s kingship. When Jesus was in this world in bodily form, his disciples, Jews people, and crowd understood Jesus to be the king like that of the other kings in the world. Especially to be the king who will free them from Romans, who will have large armies and will win the battle through weapons. They were looking him as a charismatic person who will become their king but only after the resurrection and Pentecost events the disciples understood that Jesus in not only a charismatic human person but He is real God who is Lord of lords and King of kings. He is not merely the king of small state but he is the King and owner of whole world, heaven and earth and whole creation.

What message do we get from today’s feast? Today’s feast gives us the message that if we look Jesus from the world’s point of view then we will limit ourselves from knowing the truth and Jesus will remain very limited to us but if we see Jesus from God’s point of view then we will know the reality that Jesus is mighty God without any limit who is King of kings and Lord of lords (1 Tim 6:15), who has been given all authority in heaven and on earth now and the ages to come (Mt 28:18).

Today’s feast invites us to make and acknowledge Lord Jesus the King of our lives. To make Jesus our King means to listen to him, to love him, serve him and follow him. We belong to his Kingdom only when we try to walk with him; try to live our lives fully in the spirit of the Gospel and when that Gospel spirit penetrates every facet of our living. If Jesus is really the King of our lives then he must be King of every part of our lives, and we must let him reign in all parts of our lives.

Christ the King feast is celebrated every year on the last Sunday of the liturgy. This feast tells us that we should remember what is going to happen to us at the end. Through today’s reading God reveals that at the end there will be a judgement for all. At the end God as King will come with his glory and judge as the Shepherd. As we read in Ezekiel 34:17, “As for you, my flock, thus says the Lord God: I shall judge between sheep and sheep, between rams and goats.” And Mt 25:31-32, “When the Son of Man comes in his glory, and all the angels with him, then he will sit on the throne of his glory. All the nations will be gathered before him, and he will separate people one from another as a shepherd separates the sheep from the goats.”

In gospel of Matthew Jesus calls the sheep ‘blessed by my father’ because they have made themselves worthy of receiving blessings from God. These are the people who have shown the glimpse of God’s nature through their lives. Glimpse of God’s nature is shown in Ezekiel 34:16, “I will seek the lost, and I will bring back the strayed, and I will bind up the injured, and I will strengthen the weak, but the fat and the strong I will destroy. I will feed them with justice.” This verse tells us that how God takes care, protects, nurses and look after his people. Imbibing this nature one who serve others like feeding the hungry, giving to drink for the thirsty, welcoming the stranger, clothing the naked, taking care of the sick, visiting the prisoner and so on then he/she becomes worthy of the blessings of the Father, to whom God says, ‘Just as you did it to one of the least of these who are members of my family, you did it to me. Come inherit the kingdom prepared for you from the foundation of the world.’ Those who accept God as their King they live and work according to God’s kingdom and his words and they will receive its fruit for sure.

On the occasion of today’s feast let’s accept Jesus with sincere heart as our King who takes care of us like a true shepherd and at the same time let us make ourselves worthy to be called his true sheep. Amen!



मनन-चिंतन -2


समुएल के पहले ग्रन्थ के अध्याय 8 में हम देखते हैं कि जब इस्राएली लोगों ने समुएल से उनके लिए एक राजा को नियुक्त करने की मांग की, तो वे वास्तव में, ईश्वर को अपने राजा के रूप में अस्वीकार कर रहे थे। प्रभु ने तब समुएल से कहा कि वे उनकी आवाज सुनें और साऊल को उनके राजा के रूप में अभिषिक्त करें, परन्तु उससे पहले वे उन्हें मानव राजाओं के शोषण और उत्पीड़न के तरीकों के बारे में चेतावनी दें। तत्पश्चात्‍ कई राजाओं ने इस्राएल का शासन किया। परन्तु इस्राएल में राजशाही विफल थी। प्रभु येसु ईश्वर के मन के अनुरूप राजा है। जब ज्योतिषी येसु की खोज में पूरब से आए थे, तो उन्होंने हेरोद से कहा, “यहूदियों के नवजात राजा कहाँ हैं? हमने उनका तारा उदित होते देखा। हम उन्हें दण्डवत् करने आये हैं।”(मत्ती 2:2) लेकिन इस राजा का जन्म एक चरनी में हुआ था। उन्हें हेरोद के प्रकोप से बचना था जो उसे मारना चाहते थे। इसलिए यूसुफ और मरियम उन्हें मिस्र ले गए। उन्होंने सादगी का जीवन व्यतीत किया। लगभग तीस वर्षों तक उन्होंने एक प्रकार से गुप्त जीवन जिया। उसके बाद उन्होंने लगभग तीन साल का सार्वजनिक जीवन बिताया। अपने सार्वजनिक कार्य की शुरुआत में नथानिएल ने उन्हें ’इस्राएल के राजा’ माना (देखें योहन 1:49)। रोटियों के चमत्कार के बाद, भीड़ उसे एक सांसारिक राजा बनाना चाहती थी, लेकिन वे बच कर पहाडी पर चले गये (देखें योहन 6:15)। अपने सार्वजनिक जीवन के अंत में, उन्हें बहुत कुछ सहना पड़ा और क्रूस पर मरना पड़ा। जब पिलातुस के द्वारा सवाल किया गया, तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे राजा हैं लेकिन उन्होंने कहा कि उनका राज्य इस दुनिया का नहीं है (देखें योहन 18:36)। येसु सांसारिक राजाओं के समान नहीं है। वे राजा है जो प्यार करता है और सेवा करता है। वे दया और करुणा से भरे हैं। वे राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु हैं। सन 1925 में संत पापा पीयुस ग्यारहवें ने हर चीज और हर किसी पर प्रभु येसु की संप्रभुता को स्वीकार करने के लिए ख्रीस्त राजा के पर्व की घोषणा की। जब वे सिंहासन पर विराजमान हैं तब हम सभी सेवक होते हैं। वे चाहते हैं कि हम नम्रता से एक-दूसरे की सेवा करें।



REFLECTION


In 1 Sam 8, when the people of Israel demanded Samuel to anoint someone as a king for them, they were, in fact, rejecting God as their king. God then told Samuel to listen to their voice and anoint Saul as their king, after warning them about the exploiting and harassing ways of human kings. Monarchy in Israel was a failure. Jesus is King according to God’s mind. When the wise men came from the east in search of child Jesus, they said to Herod, “Where is the child who has been born king of the Jews? For we observed his star at its rising, and have come to pay him homage.” (Mt 2:2) But this king was born in a manger. He had to also escape the fury of Herod who wanted to kill him. Hence Joseph and Mary carried him to Egypt. He lived a simple life. For almost thirty years he lived an unassuming life. Then he had about three years of public life. At the beginning of his ministry Nathanael acknowledged him as the king of Israel (cf. Jn 1:49). After the multiplication of the bread, the crowd wanted to make him an earthly king, but “he withdrew again to the mountain by himself” (Jn 6:15). At the end of his public ministry, he had to suffer so much and die on the cross. When questioned by Pilate, he acknowledged that he was king but he added that his kingdom was not of this world (cf. Jn 18:36). Jesus is king unlike other earthly kings. He is a king who loves and serves. He is full of mercy and compassion. He is the King of kings and the Lord of lords. In 1925 Pope Pius XI instituted the Feast of Christ the King to acknowledge Jesus’ sovereignty over everything and everyone. When he is on the throne we are all his servants. He wants us to serve one another in humility.



प्रवचन


आज हम राजाधिराज प्रभु येसु का माहोत्सव मना रहे हैं आज के दूसरे पाठ में हमने सुना कि प्रभु येसु “अदृष्य ईश्वर के प्रतिरूप तथा समस्त सृष्टी के पहलौटे हैं, क्योंकि उन्हीं के द्वारा सब कुछ की सृष्टी हुई है... वह समस्त सृष्टी के पहले से विद्यमान है और समस्त सृष्टी उन में ही टीकी हुई है।...इसलिए वह सभी बातों में सर्वश्रेठ है। ईश्वर ने चाहा कि उनमें सब प्रकार की परिपूर्णता है” (कोलो 1:15-18)। इसलिए प्रभु येसु एक सर्वश्रेष्ठ व सर्वोपरी राजा है। पर वे कहते हैं – “मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता तो मेरे अनुयायी लडते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं है’’ (योहन 18:36)। यह साफ तौर पर ज़ाहिर है कि येसु का राजत्व इस संसार के लिए नहीं है। वे दुनिया के सब राजाओं से भिन्न हैं। उनका राज-मुकुट काँटों का था; जो राजकीय वस्त्र उन्हें पहनाया गया था, वो मज़ाक व बेइज्जती का प्रतीक लाल चौगा था; उनका राजदंड था सरकंडा जिसे दुशमनों ने उनके ही सिर मारा था। ख्रीस्त ने, न तो दुनिया के जाने-माने राजाओं की श्रेणी में खुद को गिने जाने का दावा किया और न ही किसी राजा की बराबरी करना चाहा। उन्होंने हर प्रकार के सांसारिक वैभव व शानो-शौकत को ठुकरा दिया। उनका जन्म एक छोटी सी गौशाला में हुआ क्योंकि उनके लिए सराय में जगह नहीं थी (लुक 2:7), उनके सार्वजनिक जीवन की शुरूआत के पहले जब शैतान उन्हें ‘‘अत्यंत ऊँचे पहाड पर ले गया और संसार के सभी राज्य और वैभव दिखला कर बोला, ‘यदि आप दंडवत कर मेरी आराधना करें, तो मैं आप को यह सब दे दूँगा।’ येसु ने उत्तर दिया, ‘‘हट जा शैतान क्योँकि लिखा है - अपने प्रभु ईश्वर की आराधना करो और केवल उसी की सेवा करो’’ (मत्ती 4:8-10)। आज के सुसमाचार में हमने सुना कि जब सैनिकों ने उनकी हंसी उडाते हुए उनसे कहा है - ‘‘यदि तू यहूदियों का राजा है तो अपने को बचा।’’ पर प्रभु ने वहां पर भी अपने निजी महिमा दिखाने के लिए अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया।

जब हमारे प्रभु ने पाँच रोटियों और दो मछलियों से पाँच हज़ार लोगों को भोजन कराया, तो लोग उन्हें राजा बनाना चाहते थे। लेकिन प्रभु येसु राजा बनने से इनकार कर देते हैं क्योंकि वे उन्हें सांसारिक राजा बनाना चाहते थे (योहन 6:15)। उनका राज्य इस दुनिया के राजायों जैसा धन-दौलत, शक्ति, सेना, साम्राज्य, ज़मीन-जायदाद वाला राज्य नहीं है। वे कहते हैं मेरा राज्य इस दुनिया का नहीं है (योहन 18:36)। जिस राज्य की प्रभु येसु बात कर रहे थे उसे न तो पिलातुस, न यहूदी और दुनिया की कोई भी ताकत मिटा सकती है। उनका राज्य विश्वासियों के दिलों में स्थापित किया गया है। सम्राटों पर सम्राट पैदा हुए व प्रभु येसु को लोगों के दिलों के सिहासन से हटाने की नाकामियाब कोशिश की; कई प्रकार की भ्रांत व भटकाने वाली शिक्षायें व सिद्धांत आये, व राजनैतिक शक्तियों व असामाजिक ताकतों ने प्रभु येसु को लोगों के दिलों से दूर करने की लाखों कोशिश की व आज तक कोशिश की जा रही हैं पर सब व्यर्थ है। पिछले कुछ सालों से इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने कई मासूम व निर्दोष ईसाईयों का संहार किया; हमारे देश में ओडिशा के कंधमाल जिले में हजारों ईसाईयों का खून बहाया गया, परन्तु कोई भी लोगों के दिलों से येसु को अलग नहीं कर सके। और कभी कर भी नहीं पायेंगे। क्योंकि प्रभु येसु वह राजा है जिनके पास सर्वोच्च शक्ति है। वे सारे ब्रह्माण्ड के राजा है। संत मत्ती के सुसमाचार 28:18 में प्रभु ने कहा है - ‘‘मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है।’’

प्रभु एक ऐसे राज्य के राजा हैं जो इस संसार का नहीं है। उनका राज्य स्वर्ग का राज्य है। ये राज्य हम मनुष्यों की आसान पहुँच से दूर था। इसलिए हमारे राजा स्वयं इसे हमारे करीब लेकर आये हैं। प्रभु के आगमन पर संत योहन बपतिस्ता कहते हैं - ‘‘समय पूरा हो चुका है। ईश्वर का राज्य निकट आ गया है’’ (मारकुस 1:15)। प्रभु येसु के इस धरा पर आगमन के साथ ईश्वर का राज्य हमारे निकट, हमारे बीच आ गया। और इसमें प्रवेश करने के लिए वचन कहता है - ‘‘पश्चाताप करो और सुसमाचार में विश्वास करो’’ (मारकुस 1:15)। यदि हमें ख्रीस्त राजा की प्रजा बनना है, शैतान व उसके पाप व अंधकार के राज्य तथा उसकी शक्तियों से छुटकरा पाना है तो हमें हमारे गुनाहों पर पश्चताप करना होगा व सुसमाचार में विश्वास करना होगा, स्वयं को ईश्वर के आत्मा व उसके सामर्थ्य के सम्मुख समर्पित करना होगा। ईश्वर के राज्य की स्थापना करने का आधार है इन्सान का ईश्वर से मेल-मिलाप कराना। उस सदियों पुराने रिश्ते को पुनः जोडना जिसे हमारे आदि माता-पिता के पाप के द्वारा तोड दिया गया था। इस मेल-मिलाप का जिम्मा हमारे प्रभु येसु, हमारे राजा ने अपने ऊपर ले लिया है। उन्होंने अपने दुःखभोग, मरण एवं पुनरूत्थान द्वारा पिता से हमारा मेल कराया है। प्रभु येसु हमारे लिए क्रूस पर इसलिए मरे कि शैतान के राज्य का अंत हो जाये और प्रभु हम सब पर, हमारे दिलों पर हमेशा शासन करते रहें। बपतिस्मा में प्रभु येसु को धारण करके हम ज्योति की संतान बन गये हैं संत पौलुस हमसे कहते हैं ‘‘भाईयों आप लोग अंधकार में नहीं हैं ... आप सब ज्योति की संतान है,...हम रात या अंधकार के नहीं हैं’’ (1 थेस. 5:4)। अतः यदि हम ख्रीस्त राजा की प्रजा बन गये हैं, तो हम सब का ये फर्ज़ बनता है, कि हम उसके राज्य को फैलायें।

आज का यह पर्व ‘ख्रीस्त राजा की जय!‘ ‘प्रभु हमारा राजा है!‘ आदि नारे लगाने व गीत गाने भर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रभु आज हमें हमारी आध्यात्मिक निंद से जगाना चाहते हैं। प्रभु हमें अंधकार की शक्तियों से लडने को कहते हैं। प्रभु कहते हैं - ‘‘आप संयम रखें और जागते रहें। आपका शत्रु, शैतान, दहाडते हुवे सिंह की तरह विचरता है और ढूँढता रहता है कि किसे फाड खाये। आप विश्वास में दृढ़ रहकर उसका सामना करें’’ (1 पेत्रुस 5:8)। क्योंकि हम देखते हैं कि आज शैतान विभिन्न रूपों में अपने राज्य का विस्तार करते जा रहा है। किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लिजिए 70 से 80 प्रतिषत खबरें शैतान के राज्य से ताल्लुक रखती हैं - कहीं लडाई तो कहीं दंगे, कहीं बलात्कार तो कहीं हत्या, कहीं आतंकी हमला तो कहीं नरसंहार, कहीं चोरी तो कहीं धर्म के नाम पर खून-खराबा, कहीं ठगबाजी तो कहीं राजनैतिक सत्ता के लिए बेईमानी, धोखाधडी व झूठ फरेब। शैतान धीरे-धीरे अपने वर्चस्व, व अपने राज्य का विस्तार करते जा रहा है। उसके लुभावने प्रलोभनों से वह अधिक से अधिक लोगों को अपनी ओर खींच रहा है। इसलिए प्रभु ने हमें अपने राज्य की एक निष्क्रिय प्रजा बनने के लिए नहीं बुलाया है, परन्तु हम सब को एक सक्रिय सैनिक बनकर शैतान के विरूद्ध लडने के लिए बुलाया है। प्रभु का वचन कहता है - ‘‘आप लोग प्रभु से और उसके अपार सामर्थ्य से बल ग्रहण करें, आप ईश्वर के अस्त्र-सस्त्र धारण करें, जिससे आप शैतान की धूर्तता का सामना करने में समर्थ हों . . . और अन्त तक अपना कर्तव्य पूरा कर विजय प्राप्त करें’’ (एफे. 6:10-13) शैतान का सामना करने उसके राज्य पर विजय पाने के लिए हमें लाठी, डंडे, तलवार, बंदुक, व गोला-बारूद आदि की ज़रूरत नहीं। हमें ईश्वर के अस्त्र-सस्त्रों को धारण करने की ज़रूरत है। और ये अस्त्र-सस्त्र क्या हैं? संत पौलुस हमें बतलाते हैं ईश्वर के अस्त्र-सस्त्र हैं - सत्य का कमरबंद, धार्मिकता का कवच, शान्ति व सुसमाचार के जूते, विश्वास की ढाल, मुक्ति का टोप व आत्मा की तलवार अर्थात ईश वचन।

हमारे दिलों के राजा आज हमारे दिलों के द्वार पर आकर खडे होकर कह रहे हैं - ‘‘मैं द्वार के सामने खडा हो कर खटखटातो हूँ। यदि कोई मेरी वाणी सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके यहाँ आ कर उसके साथ भोजन करूंगा और वह मेरे साथ’’ (प्रकाशना 3:20)। प्रभु हमारे दिलों में जबरदस्ती करके नहीं आते, जब तक हम हमारे दिलों को उनके लिए नहीं खोलेंगे वे अंदर नहीं आयेंगे। हमारे दिलों का द्वार खोलने के लिए हमें, सबसे पहले सारी बूरी बातों, बूरे विचारों, व बूरी भावनाओं को हमारे दिलों से दूर करना होगा और उनकी जगह दुसरों के प्रति प्रेम, दया, करूणा, क्षमा व भाईचारी की भावनाओं से हमारे दिलों को सुसज्जित करना होगा। तभी हमारे दिलों के राजा प्रभु येसु ख्रीस्त हमारे भीतर आकर हमारे हृदयों के सिंहासन पर विराजमान होंगे और तब हम सच्चे अर्थों में कह पायेंगे कि ‘‘वह प्रभुओं का प्रभु और राजाओं का राजा है’’ (प्रकाशना 17:14)। आमेन।


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

13 नवंबर 2022 वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य इतवार

 

13 नवंबर 2022

वर्ष का तैंत्तीसवाँ सामान्य इतवार



पहला पाठ : मलआकी 3:19-20अ



19) क्योंकि वह दिन आ रहा है। वह धधकती भट्टी के सदृश है। सभी अभिमानी तथा कुकर्मी खूँटियों के सदृश होंगे। विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है: वह दिन उन्हें भस्म कर देगा। उनका न तो डंठल रह जायेगा और न जड़ ही।

20) किन्तु तुम पर, जो मुझ पर श्रद्धा रखते हो, धर्म के सूर्य का उदय होगा और उसकी किरणें तुम्हें स्वास्थ्य प्रदान करेंगी। तब तुम उसी प्रकार उछलने लगोगे, जैसे बछड़े बाड़े से निकल कर उछलने-कूदने लगते हैं।



दूसरा पाठ : 2 थेसलनीकियों 3:7-12



7) आप लोगों को मेरा अनुकरण करना चाहिए- आप यह स्वयं जानते हैं। आपके बीच रहते समय हम अकर्मण्य नहीं थे।

8) हमने किसी के यहाँ मुफ़्त में रोटी नहीं खायी, बल्कि हम बड़े परिश्रम से दिन-रात काम करते रहे, जिससे आप लोगों में किसी के लिए भी भार न बनें।

9) इमें इसका अधिकार नहीं था- ऐसी बात नहीं, बल्कि हम आपके सामने एक आदर्श रखना चाहते थे, जिसका आप अनुकरण कर सकें।

10) आपके बीच रहते समय हमने आप को यह नियम दिया- ’जो काम करना नहीं चाहता, उसे भोजन नहीं दिया जाये’।

11) अब हमारे सुनने में आता है कि आप में कुछ लोग आलस्य का जीवन बिताते हैं। वे स्वयं काम नहीं करते और दूसरों के काम में बाधा डालते हैं।

12) हम ऐसे लोगों को प्रभु ईसा मसीह के नाम पर यह आदेश देते हैं और उन से अनुरोध करते हैं कि वे चुपचाप काम करते रहें और अपनी कमाई की रोटी खायें।



सुसमाचार : लूकस 21:5-19



5) कुछ लोग मन्दिर के विषय में कह रहे थे कि वह सुन्दर पत्थरों और मनौती के उपहारों से सजा है। इस पर ईसा ने कहा,

6) "वे दिन आ रहे हैं, जब जो कुछ तुम देख रहे हो, उसका एक पत्थर भी दूसरे पत्थर पर नहीं पड़ा रहेगा-सब ढा दिया जायेगा"।

7) उन्होंने ईसा से पूछा, "गुरूवर! यह कब होगा और किस चिन्ह से पता चलेगा कि यह पूरा होने को है?"

8) उन्होंने उत्तर दिया, "सावधान रहो तुम्हें कोई नहीं बहकाये; क्योंकि बहुत-से लोग मेरा नाम ले कर आयेंगे और कहेंगे, ‘मैं वही हूँ’ और ‘वह समय आ गया है’। उसके अनुयायी नहीं बनोगे।

9) जब तुम युद्धों और क्रांतियों की चर्चा सुनोगे, तो मत घबराना। पहले ऐसा हो जाना अनिवार्य है। परन्तु यही अन्त नहीं है।"

10) तब ईसा ने उन से कहा, "राष्ट्र के विरुद्ध राष्ट्र उठ खड़ा होगा और राज्य के विरुद्ध राज्य।

11) भारी भूकम्प होंगे; जहाँ-तहाँ महामारी तथा अकाल पड़ेगा। आतंकित करने वाले दृश्य दिखाई देंगे और आकाश में महान् चिन्ह प्रकट होंगे।

12) "यह सब घटित होने के पूर्व लोग मेरे नाम के कारण तुम पर हाथ डालेंगे, तुम पर अत्याचार करेंगे, तुम्हें सभागृहों तथा बन्दीगृहों के हवाले कर देंगे और राजाओं तथा शासकों के सामने खींच ले जायेंगे।

13) यह तुम्हारे लिए साक्ष्य देने का अवसर होगा।

14) अपने मन में निश्चय कर लो कि हम पहले से अपनी सफ़ाई की तैयारी नहीं करेंगे,

15) क्योंकि मैं तुम्हें ऐसी वाणी और बुद्धि प्रदान करूँगा, जिसका सामना अथवा खण्डन तुम्हारा कोई विरोधी नहीं कर सकेगा।

16) तुम्हारे माता-पिता, भाई, कुटुम्बी और मित्र भी तुम्हें पकड़वायेंगे। तुम में से कितनों को मार डाला जायेगा

17) और मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे।

18) फिर भी तुम्हारे सिर का एक बाल भी बाँका नहीं होगा।

19) अपने धैर्य से तुम अपनी आत्माओं को बचा लोगे।



📚 मनन-चिंतन



मनुष्य हमेशा भविष्य की ओर देखने, उसकी चिंता करने, उसे वास्तव में जो है उससे अधिक कुछ बनाने के लिए ललचाता है। हमारे पास यह तय करने की वह सामाजिक प्रवृत्ति होती है जो हमें यहां और अभी रहने के बजाय भविष्य के लिए जीने की जरूरत का अहसास कराता है। इसलिए हम अपने जीवन का निर्माण करते हैं जो हमारे भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करता है। हम नए और अधिक आकर्शषित घर, कार, बीमा पॉलिसियां और सेवानिवृत्ति योजनाएं खरीदते हैं क्योंकि हम भविष्य का निर्माण करने में सक्षम होना चाहते हैं। वास्तविकता यह है, जैसा कि येसु स्पष्ट रूप से और लगातार सिखाते हैं - हम नहीं जानते कि भविष्य कैसा होने वाला है, और हमको इसकी कीमत का अंदाज़ा नहीं होता है यदि हम येसु के शिष्य के रूप में जीना चाहते।

आज का सुसमाचार पढ़ना वास्तव में बहुत ही भयावह और संघर्षपूर्ण है। भविष्य के बारे में अनिश्चितता के कारण नहीं, बल्कि येसु के शिष्य होने की कीमत के कारण। येसुु उनके पीछे चलने की कीमत के बारे में स्पष्ट रूप से जानते है - और वह कीमत है ‘सब कुछ’। लेकिन हमें निराश या चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कीमत का दूसरा पहलू यह है कि हम, जो येसु का अनुसरण करते हैं और उनकी शरण लेने के लिए चुनते है, वे घनिष्ठ रूप से जाने जाते हैं, प्यार किये जाते हैं, पोषित होते हैं और संरक्षित होते हैं।

हमें येसु का अनुसरण करने हेतु विकल्प का सामना करना पड़ रहा है, न ही न करने का। येसु के पीछे चलने पर भारी कीमत चुकानी पड़ती है। कम से कम, जिस दुनिया में हम रहते हैं, इसका मतलब है गहराई से प्रतिसांस्कृतिक होना। इसका अर्थ है सादा, अगोचर जीवन जीना, गरीबों, टूटे और तिरस्कृतों की सेवा करने के लिए खुद को समर्पित करना। इसका मतलब है कि टीवी के बदले प्रार्थना को प्राथमिकता देना, भौतिक वस्तुओं के बदले दरिद्रता को प्राथमिकता देना। इसका अर्थ है येसु को हमारे सभी संबंधों का केंद्र बनाना। इसका अर्थ यह पहचानना है कि येसु के अनुयायी होने का अर्थ सभी से प्रेम करना है, चाहे हम उनके बारे में कैसा भी महसूस करें। हमें प्रेम का चुनाव करने, सेवा करने का चुनाव करने और सेवक के रूप में बने रहने का चुनाव करने और इन सभी में अंत तक बने रहने के लिए के लिए बुलावा मिला है।



📚 REFLECTION



Human beings are always tempted to look to the future, to worry about it, to make it into something more than it really is. We have this social tendency to decide that we need to live for the future, instead of living here and now. So we build ourselves lives that seek to secure our future. We buy new and more exciting houses, cars, insurance policies and superannuation plans because we want to be able to construct a future. The reality is, as Jesus clearly and consistently teaches - we don’t know what the future is going to be like, and we don’t quite get the cost of that if we seek to live as Jesus’ disciple.

Today’s gospel reading is actually be deeply frightening and confronting. Not because of the uncertainty about the future, but because of the cost of being Jesus’ disciple. Jesus is clear about the cost of following him - the cost is everything. But we’re not to despair or worry, because the flip side of the cost is that we, who follow Jesus and have chosen to take refuge in him, are intimately known, loved, cherished and preserved.

We’re faced with the choice to follow Jesus, nor not to. Following Jesus has tremendous costs. At the very least, in the world we live in, it means being profoundly countercultural. It means living simple inconspicuous lives, of devoting ourselves to serving the poor, the broken and the despised. It means preferring prayer to TV, preferring poverty to material goods. It means making Jesus the centre of all of our relationships. It means recognising that to be a follower of Jesus is to love everyone, regardless of how we feel about them. We are called to choose to love, to choose to serve, and to choose to keep going on as servants, staying with it till the end.



मनन-चिंतन -2



शान्त पानी में नाव चलाना आसान है। बहते पानी की दिशा में यात्रा करना और भी आसान है। पानी के प्रवाह के विरुध्द चलना मुश्किल है। यह हमारे जीवन की भी सच्चाई है। हम हमेशा शांतिपूर्ण समय की उम्मीद करते हैं ताकि हमारा जीवन आसान हो। प्रवाह के साथ चलने की हमारी प्रवृत्ति है। हम लोकप्रिय तरीकों और पथों का अनुसरण करते हैं। हम बहुमत की तरह रहना पसंद करते हैं। सहकर्मियों तथा सहपाठियों का दबाव हमें प्रभावित करता है, विशेष रूप से युवा अवस्था में। प्रभु येसु ने हमें बताया कि हमें भेड़ियों के बीच भेड़ों की तरह भेजा जाता है और इसलिए हमें सांपों के समान बुध्दिमान और कबूतर की तरह निर्दोष बने रहना चाहिए (देखें मत्ती 10:16)। यह स्पष्ट है कि हमें अशांत जल पर पाल चलाने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। प्रभु चाहते हैं कि न केवल हमारे लक्ष्य बल्कि हमारे साधन भी उचित हों। समाज में ऐसे कई लोग हैं जो हमें धोखा देना और गुमराह करना चाहते हैं। आज के सुसमाचार में प्रभु हमें चेतावनी देते हैं - "सावधान रहो तुम्हें कोई नहीं बहकाये"। सुसमाचार के लिए प्रतिबद्ध शिष्यों को सताया जाएगा। फिर भी हमें प्रभु से सुखदायक आश्वासन प्राप्त है, “…अपने मन में निश्चय कर लो कि हम पहले से अपनी सफ़ाई की तैयारी नहीं करेंगे, क्योंकि मैं तुम्हें ऐसी वाणी और बुद्धि प्रदान करूँगा, जिसका सामना अथवा खण्डन तुम्हारा कोई विरोधी नहीं कर सकेगा। तुम्हारे माता-पिता, भाई, कुटुम्बी और मित्र भी तुम्हें पकड़वायेंगे। तुम में से कितनों को मार डाला जायेगा और मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे। फिर भी तुम्हारे सिर का एक बाल भी बाँका नहीं होगा। अपने धैर्य से तुम अपनी आत्माओं को बचा लोगे।“ (लूकस 21: 14-19)



REFLECTION



It is easy to sail in still waters. It is easier to flow with the current. It is difficult to move against the current. This is true of our lives too. We expect calm and peaceful time always so that our lives are easy. We have a tendency to flow with the current. We follow popular ways and trodden paths. We like to be like the majority. Peer pressure influences us, especially the young. Jesus tells us that we are sent like lambs among wolves and so we have to be wise as serpents and innocent as doves (cf. Mt 10:16). It is evident that we are set to sail on troubled waters. He wants not only our goals but also our means to be proper. There are those who want to deceive and mislead us. In today’s Gospel he warns us – “Take care not to be deceived”. The disciples who are committed to the Gospel will be persecuted. Yet there is the soothing assurance from the Lord, “…make up your minds not to prepare your defense in advance; for I will give you words and a wisdom that none of your opponents will be able to withstand or contradict. You will be betrayed even by parents and brothers, by relatives and friends; and they will put some of you to death. You will be hated by all because of my name. But not a hair of your head will perish. By your endurance you will gain your souls.” (cf. Lk 21:14-19)



प्रवचन



आज के तीनों पाठों में हम अंत के बारे में सुनते हैं। पवित्र धर्मग्रंथ बाइबल हमें बताता है कि इस दुनिया का अंत होगा। और अंतिम दिनों में हमें विचलित करने वाली कई घटनायें घटेगी। हमारे सेमिनारी जीवन में एक पूरा साल सिर्फ अध्यात्मिकता के लिए होता है जिसमें हम सालभर बाइबल के गहन पठन, मनन चिंतन प्रार्थना व त्याग तपस्या में बिताते हैं। इसी के तहत, मैं अपने साथियों के साथ वर्ष 2011-12 में आद्यात्मिक साधना केंद्र रिसदा, बिलासपुर में था। और शायद आप लोगों को याद होगा कि उन दिनों 2012 में दुनिया के अंत होने की एक अपवाह फैली थी। जिसे टीवी, अखबार व सोशल मिडिया ने भी बहुत जोर-शोर से उछाला था। मैं वास्तव में इस प्रकार की बातों पर न तो विश्वास करता हूँ और न ही इन्हें अधिक महत्व देता हूँ। पर उस साल हुआ यूँ कि 31 दिसम्बर मध्य रात्री की मिस्सा के बाद बारिश शुरू हुई, इसलिए मिस्सा के तुरन्त बाद हम सब जाकर सो गये। हम जाकर सोये ही थे कि इतनी तेज हवा चलने लगी कि कई खडकी दरवाजे जोर-जोर से टकराने लगे। कुछ खिडिकियों के काँच भी टूट गये। बाहर झाँककर देखा तो बडे-बडे ओले गिर रहे थे। मुझे ये सब देखकर डर लगने लगा, मैं सोचने लगा कि कहीं जो भविष्यवाणी की गयी थी वो सही तो नहीं हो रही है। लेकिन थोडे समय बाद सब कुछ सामान्य हो गया। आज जब मैं उस समय के बारे में सोचता हूँ तो स्वयं से पूछता हूँ कि मुझे आखिर डर किस बात का लग रहा था। मरने का? मरना तो मुझे एक न एक दिन है ही। तो फिर डर किस बात का था? मुझे डर इस बात का था कि मैं तैयार नहीं था। मैं मरने के लिए तैयार नहीं था। मुझे यह भय सता रहा था कि अगर मैं उस घडी मर जाता तो क्या मैं स्वर्ग पहूँच पाता? क्या मैं प्रभु के न्याय-सिंहासन के सामने खडे होकर खुद को निर्दोष साबित करने की स्थिति में था? वो दिन भले ही मेरे जीवन का अंतिम दिन नहीं था पर मेरे अंतिम दिन के बारे में मुझे कुछ सिखा गया।

आज के पहले पाठ में प्रभु का वचन कहता है- ‘‘वह दिन उन्हें भस्म कर देगा। उनका न तो डंठल रह जायेगा और न जड ही।’’ वहीं प्रभु येसु आज के सुसमाचार में कहते हैं - ‘‘राष्ट के विरूद्ध,राष्ट उठ खडा होगा, ... भारी भूकम्प होंगे; जहाँ-तहाँ महामारी तथा अकाल पडेगा। आतंकित करने वाले दृष्य दिखाई देंगे।’’ कुल मिलाकर अंत में एक भयंकर तबाही का मंज़र होगा। अंत के बारे में ये सारी बातें एक सामन्य व्यक्ति को बहुत विचलित कर सकती हैं। परन्तु इन सब भयभीत करने वाली बातों के बाद प्रभु येसु हमें एक बहुत ही सांत्वना भरी बात कहते हैं – “फिर भी तुम्हारे सिर का बाल भी बाँका नहीं होगा। अपने धैर्य से तुम अपनी आत्माओं को बचा लोगे”। कितनी सुन्दर बात प्रभु ने हम से कही है कि इतनी सारी तबाही के बाद भी हमारे सिर का बाल भी बाँका नहीं होगा। आज के पहले पाठ में भी प्रभु ने कहा है – “किंतु तुम जो मुझ पर श्रद्धा रखते हो, तुम्हारे ऊपर धर्म के सूर्य का उदय होगा और उसकी किरणें तुम्हें स्वास्थ्य प्रदान करेंगी। तब तुम उसी प्रकार उछलोगे, जैसे बछडे बाडे से निकल कर उछलने कूदने लगते हैं।“

हम पर, जो उनपर श्रद्धा रखते हैं प्रभु यह कृपा करेंगे और हमें अपने सूर्य जैसे स्वर्गिक प्रकाश में ले जायेंगे। स्वर्गिक आनन्द की तुलना यहाँ बाडे से बाहर निकलने पर मस्ती में उछलते बछडे से की गई है। जिसने अपने बाडे से बाहर निकले बछडे या फिर रस्सी से छोडे गये बछडे को देखा है वही इस आज़दी के आनन्द को समझ सकता है।

परन्तु यह आनन्द हमें यूँ ही नहीं मिल जाने वाला है। संत पौलुस अपने जीवन के अंत में इस आनन्द व मुक्ति के मुकुट को पाने की अभिलाषा रखते हुए कहते हैं – “अब मेरे लिए धार्मिकता का वह मुकुट तैयार है, जिसे न्यायी विचारपति प्रभु मुझे उस दिन (न्याय के दिन) प्रदान करेंगे।”

परन्तु उस मुकुट को प्राप्त करने के लिए वे कहते हैं - उन्हें एक अच्छी लडाई लडनी पडी, उन्हें एक दौड पूरी करनी पडी, और वे पूर्ण रूप से उन सब बातों में वफादार व ईमानदार रहे जिसे प्रभु ने उन्हें सौंपा था। जी हाँ, प्यारे मित्रों, हमें भी हमारे इस दुनियाई जीवन में एक अच्छी लडाई लडनी है। अपने मित्रों व परिजनों से नहीं बल्कि शैतान और उसकी ताकतों से जैसा कि एफेसियों को लिखे पत्र 6:12 में संत पौलुस स्वयं कहते हैं – “हमें निरे मनुष्यों से नहीं, बल्कि अंधकारमय संसार के अधिपतियों, अधिकारियों तथा शासकों और आकाश के दुष्ट आत्माओं से संघर्ष करना पडता है।’’

और आगे संत पौलुस हमें बताते हैं कि हमें कैसे शैतान व उसकी सारी शक्तियों को कुचलना है। उसके लिए हमें आध्यात्मिक हत्यारों से अपने को लेस करना है। ये हत्यार हैं - सत्य, धार्मिकता, सुसमाचार का उत्साह, विश्वास, तथा ईश्वर का का वचन।

पहले पाठ में जिन्हें प्रभु पर श्रद्धा रखने वाले लोग कहा गया है वे वही लोग होंगे जो अपने जीवन संघर्ष में इन अध्यात्मिक हत्यारों का उपयोग करते हुए हमेशा, शैतान का सामना करते हैं और कभी भी उसकी अधीनता स्वीकार नहीं करते। वे सब अंत में महिमा और सम्मान का मुकुट प्राप्त करेंगे। ऐसे लोगों को अंत समय का डर नहीं सताता, वे तो संत पौलुस की तरह बडी उत्सुकता से उस महिमामय समय की राह देखते रहते हैं। हम अपने आप से पूछें, क्या हम संत पौलुस की तरह हमारे अंत का इंतजार करते हैं या फिर हमारे अंत की खबर हमें विचलित कर देती है? आमेन।


 -Br. Biniush Topno


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30 अक्टूबर 2022 वर्ष का इकत्तीसवाँ सामान्य इतवार

 

30 अक्टूबर 2022

वर्ष का इकत्तीसवाँ सामान्य इतवार



पहला पाठ : प्रज्ञा ग्रन्थ 11:22-12:2

22) प्रभु! तेरी दृष्टि में समस्त संसार तराजू के पासंग के बराबर है अथवा प्रातःकाल भूमि पर गिरने वाली ओस की बूँद की तरह।

23) तू सब पर दया करता है, क्योंकि तू सर्वशक्तिमान् है। तू मनुष्य के पापों को इसलिए अनदेखा करता है, कि वह पश्चात्ताप करें।

24) तू सब प्राणियों को प्यार करता है और अपनी बनायी हुई किसी वस्तु से घृणा नहीं करता। यदि तुझे किसी वस्तु से घृणा हुई होती तो तूने उसे नहीं बनाया होता।

25) यदि तू उसे नहीं चाहता, तो कुछ भी अस्तित्व में नहीं बना रहता; यदि तूने उसे नहीं बुलाया होता, तो कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता।

26) प्रभु! तू सारी सृष्टि की रक्षा करता है, क्योंकि वह तेरी है। तू सब प्राणियों को प्यार करता है;

12:1) क्योंकि तेरा अविनाशी आत्मा सब में व्याप्त है।

2) प्रभु! तू अपराधियों को थोड़ा-थोड़ा कर के दण्ड देता है। तू उन्हें चेतावनी देता और उन्हें उनके पापों का स्मरण दिलाता है, जिससे वे बुराई से दूर रहे और तुझ पर भरोसा रखें।

3) तूने अपनी पवित्र भूमि के पुराने निवासियों के साथ ऐसा व्यवहार किया,

दूसरा पाठ : 2 थेसलनीकियों 1:11-2:2

11) हम निरन्तर आप लोगों के लिए यह प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर आप को अपने बुलावे के योग्य बनाये और आपकी प्रत्येक सदिच्छा तथा विश्वास से किया हुआ आपका प्रत्येक कार्य अपने सामर्थ्य से पूर्णता तक पहुँचा दे।

12) इस प्रकार हमारे ईश्वर की और प्रभु ईसा मसीह की कृपा के द्वारा हमारे प्रभु ईसा मसीह का नाम आप में गौरवान्वित होगा और आप लोग भी उन में गौरवान्वित होंगे।

2:1) भाइयो! हमारे प्रभु ईसा मसीह के पुनरागमन और उनके सामने हम लोगों के एकत्र होने के विषय में हमारा एक निवेदन, यह है।

2) किसी भविष्यवाणी, वक्तव्य अथवा पत्र से, जो मेरे कहे जाते हैं, आप लोग आसानी से यह समझ कर न उत्तेजित हों या घबरायें कि प्रभु का दिन आ चुका है।

सुसमाचार : लूकस 19:1-10

1) ईसा येरीख़ो में प्रवेश कर आगे बढ़ रहे थे।

2) ज़केयुस नामक एक प्रमुख और धनी नाकेदार

3) यह देखना चाहता था कि ईसा कैसे हैं। परन्तु वह छोटे क़द का था, इसलिए वह भीड़ में उन्हें नहीं देख सका।

4) वह आगे दौड़ कर ईसा को देखने के लिए एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि वह उसी रास्ते से आने वाले थे।

5) जब ईसा उस जगह पहुँचे, तो उन्होंने आँखें ऊपर उठा कर ज़केयुस से कहा, "ज़केयुस! जल्दी नीचे आओ, क्योंकि आज मुझे तुम्हारे यहाँ ठहरना है"।

6) उसने, तुरन्त उतर कर आनन्द के साथ अपने यहाँ ईसा का स्वागत किया।

7) इस पर सब लोग यह कहते हुए भुनभुनाते रहे, "वे एक पापी के यहाँ ठहरने गये"।

8) ज़केयुस ने दृढ़ता से प्रभु ने कहा, "प्रभु! देखिए, मैं अपनी आधी सम्पत्ति ग़रीबों को दूँगा और मैंने जिन लोगों के साथ किसी बात में बेईमानी की है, उन्हें उसका चैगुना लौटा दूँगा"।

9) ईसा ने उस से कहा, "आज इस घर में मुक्ति का आगमन हुआ है, क्योंकि यह भी इब्राहीम का बेटा है।

10) जो खो गया था, मानव पुत्र उसी को खोजने और बचाने आया है।"



📚 मनन-चिंतन



आज का पहला पाठ हमें ईश्वर की दया और करुणा की याद दिलाता है। ईश्वर पापियों पर दया करता है, ताकि वे अपना मन फिरायें और ईश्वर की ओर लौट आएँ। वह किसी से नफ़रत नहीं करते क्योंकि ईश्वर की नफ़रत के सामने कोई भी नहीं टिक पाएगा। ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। दूसरा पाठ हमें याद दिलाता है कि ईश्वर ही हमें बुलाहट प्रदान करता है और उस बुलाहट के योग्य भी बनाता है। वह स्वयं हमसे मिलने आते हैं। प्रभु येसु जो स्वर्ग में अरोहित कर लिए गए हैं, वह फिर आएँगे और सब कुछ नवीन कर देंगे। आज का सुसमाचार जकेयुस के जीवन में ईश्वर की दया और क्षमा का सजीव उदाहरण देता है। वह अपनी सम्पत्ति का आधा हिस्सा ग़रीबों में बाँटने के लिए तैयार हो जाता है। इतना ही नहीं, यदि उसने किसी से बेमानी की है तो वह उसका चौगुना लौटाने के लिए तैयार है।

सामान्यतः जब हम एक पापी व्यक्ति या समाज में जाने-माने बुरे व्यक्ति को देखते हैं तो हम तुरंत ही उस व्यक्ति का तिरस्कार कर देते है। ईश्वर से पहले हम स्वयं उस व्यक्ति दोषी करार दे देते हैं। हम कभी भी यह नहीं सोचते कि उस व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है, और उस व्यक्ति के लिए ईश्वर की क्या योजना है। हम जकेयुस को देखते हैं जो नाकेदार था। अक्सर नाकेदारों को समाज में स्वीकार नहीं किया जाता था, क्योंकि लोग उन्हें ग़द्दार के रूप में देखते थे जो दुश्मन के लिए काम करता था और अपने ही समाज के विरुद्ध काम करता था। इसलिए समाज में किसी के भी दिल में ऐसे लोगों के लिए कोई सम्मान नहीं था, भले ही उनके पास धन-दौलत थी, सारे सुख-सुविधाएँ थीं लेकिन लोगों का भरोसा नहीं था।

लोगों का यह मानना था कि नाकेदार अधिक धन कमाने के लिए लोगों से बेमानी करते थे। उसी प्रकार इस नाटे से आदमी जकेयुस के मन में किसी ने भी झांकने की कोशिश नहीं की। केवल प्रभु येसु की हृदय की गहराइयों के रहस्य जानते थे। जकेयुस जानता था कि कोई भी उसे पसंद नहीं करता था, वह जानता था कि लोग उसे मक्कार, पापी और धोखेबाज़ समझते थे। लेकिन उसकी इच्छा ईश्वर के दर्शन करने की थी। मन के पवित्र लोग ही ईश्वर के दर्शन कर सकते थे। प्रभु येसु को देखने की इच्छा ही उसके लिए नए जीवन की तरफ़ पहला कदम था। क्या हमारे मन में प्रभु येसु को देखने की इच्छा है?

प्रभु येसु उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए न केवल अपने आप को प्रकट करते हैं, बल्कि उसके घर जाते हैं, और उसके साथ भोजन भी करते हैं। हमसे भी प्रभु येसु कहते हैं - “मैं द्वार के सामने खड़ा होकर खटखटाता हूँ। यदि कोई मेरी वाणी सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके यहाँ आकर उसके साथ भोजन करूँगा, और वह मेरे साथ। (प्रकाशना ३:२०)। जकेयुस के घर में प्रभु येसु प्रवेश करने के कारण ना केवल उसका हृदय परिवर्तन होता है बल्कि वह एक कदम और आगे बढ़ता है और अपनी सम्पत्ति का आधा हिस्सा ग़रीबों में बाँटने के लिए तैयार हो जाता है। यदि उसने किसी के साथ बेमानी की है तो वह उसका चौगुना लौटा देगा। इस तरह का आत्मविश्वास तभी आ सकता है जब उसने किसी के साथ बेमानी नहीं की हो, नहीं तो वह चौगुना कहाँ से लौटाएगा? ईश्वर की दया कठोर से कठोर हृदय को भी बदल सकती है।





📚 REFLECTION

The first reading of today reminds us of God's mercy. God is merciful to the sinners, so that they repent and return to God. He does not hate anyone, because if He hates, how can that person survive? All power is of God, nothing is impossible for God. Second reading reminds us that it is God who calls us and makes worthy of our calling. He comes to meet us. Jesus, although taken up into heaven will come and receive us and renew all things. Gospel portrays God's mercy and forgiveness in the life of Zacchaeus. He is ready to give to the poor, half of what he owns, even restore four fold if he has defrauded anyone.

Normally when we see a sinner or socially acclaimed bad person, we straightway declare him to be condemned. We give judgment even before God. we hardly try to see what is going on within that person and what God has in store for him. We see Zacchaeus who was a tax collector. Usually the tax collectors were not accepted in society because they were considered like traitors who worked for enemy and worked against their own people. So people in society generally had no respect for them, even though they possessed enough wealth and luxuries but could not gain people's trust.

People believed that the tax collectors cheated people in order to earn more money. Hardly anybody could see beyond into the heart of this short man called Zacchaeus. Only Jesus could penetrate the secrets of the hearts. Zacchaeus knew that people did not welcome him, he knew that he was considered a cheat and a sinner. But he had desire to see God. Only pure of heart can see God. The very desire to see Jesus was the first step towards conversion to new life. Do we have a desire to see God?

Jesus honouring his desire not only shows himself to Zacchaeus but also goes and dines with him. Even to us he says, " Listen! am standing at the door, knocking, if you hear my voice and open the door, I will come in to you and eat with you and you with me" (Rev. 3:20). Jesus' coming into Zacchaeus house not only converts him, but he goes one step further to share his wealth with the poor and is ready to give back four fold if he has defrauded anybody. This confidence can come only when he had not defrauded anybody, otherwise from where will he restore four fold? God's mercy can change even the hardest hearts.




मनन-चिंतन -2



स्तोत्र 14:1-2 में, प्रभु का वचन हमें बताता है कि मूर्ख प्रभु ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं जबकि बुद्धिमान उनको खोजते रहते हैं। इसी बात को Ps 53:1-2 में भी दोहराया गया है। पवित्र वचन हमें बताता है, "ईश्वर यह जानने के लिए स्वर्ग से मनुष्यों पर दृष्टि दौड़ाता है कि उन में कोई बुद्धिमान हो, जो ईश्वर की खोज में लगा रहता हो" (स्तोत्र 14: 2)। 1इतिहास 22:19 हमें निमन्त्रण देता है, "अब अपने सारे हृदय और सारी आत्मा से प्रभु, अपने ईश्वर की खोज में लगे रहो"। यिरमियाह 29: 13-14 एक बहुत बड़ा वादा करता है- “यदि तुम मुझे सम्पूर्ण हृदय से ढूँढ़ोगे, तो मैं तुम्हे मिल जाऊँगा“- यह प्रभु की वाणी है- “और मैं तुम्हारा भाग्य पलट दूँगा। मैं तुम्हें उन सब राष्ट्रों और उन सब स्थानों से, जहाँ मैंने तुम्हें निर्वासित कर दिया है, यहाँ फिर एकत्रित करूँगा।“ यह प्रभु की वाणी है। “मैं तुम्हें फिर उसी जगह ले आऊँगा, जहाँ से मैंने तुम्हें निर्वासित कर दिया था।'' ज़केयुस और येसु के बीच हुई मुलाकात में प्रभु के ये सभी उदार वचन पूरे हुए। ज़केयुस उत्सुकता से प्रभु की तलाश कर रहा था और प्रभु ने खुद को ढूंढने दिया, न केवल पाये जाने दिया, बल्कि ज़कयुस को उनकी निकटता का अनुभव भी करने दिया। ज़केयुस प्रभु के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता था। उसने अपनी संपत्ति के प्रति आसक्ति और अपने पिछले सभी लगाव को छोड़ दिया क्योंकि उसने येसु में सबसे बड़ा खजाना पाया। ज़केयुस ने प्रभु को पाने के लिए अपना सब कुछ छोड दिया, तो इसके ठीक विपरीत मारकुस 10:17-31 में हम उस अमीर युवक को पाते हैं जो उदास होकर चला गया था क्योंकि वह अपनी सम्पत्ति का त्याग करना नहीं चाहता था। ज़केयुस ने पवित्र ग्रन्थ के उस आह्वान को समझ लिया जो कहता है, “प्रभु-भक्तों! प्रभु पर श्रद्धा रखो! श्रद्धालु भक्तों को किसी बात की कमी नहीं।" (स्तोत्र 34:10)।





REFLECTION



In Psalm 14: 1-2, the Word of God tells us that the foolish negate the existence of God while the wise seek God. This is repeated in Ps 53 too. The Word tells us, “The Lord looks down from heaven on humankind to see if there are any who are wise, who seek after God” (Ps 14:2). 1Chron 22:19 admonishes us, “Now set your mind and heart to seek the Lord your God”. Jer 29:13-14 makes a huge promise- “When you search for me, you will find me; if you seek me with all your heart, I will let you find me, says the Lord, and I will restore your fortunes and gather you from all the nations and all the places where I have driven you, says the Lord, and I will bring you back to the place from which I sent you into exile.” All these magnanimous words of the Lord are fulfilled in the meeting between Zachaeus and Jesus. Zachaeus was eagerly seeking the Lord and the Lord let himself be found, not only to be found but also to be experienced closely by Zachaeus. Zachaeus could not remain unchanged. He gives up all his previous attachment to properties and possessions as he finds the greatest treasure in Jesus. We can very find the contrast between the Rich Tax Collector Zachaeus gave up everything for the sake of Jesus and the Rich young man who went away sad for he was unwilling to give up what he possessed (cf. Mk 10:17-31) Zachaeus was able to give up everything because he has come to believe the Word that tells, “The young lions suffer want and hunger, but those who seek the Lord lack no good thing” (Ps 34:10).



प्रवचन

आज के तीनों पाठों के जरिये प्रभु एक बार फिर से अपना प्रेम व करूणामय चेहरा हमारे सामने पेश करते हैं। पहले पाठ से प्रज्ञा ग्रंथ 11:23 में लेखक कहता है - ‘‘तू सबों पर दया करता है, क्योंकि तू सर्वशक्तिमान है। तू मनुष्य के पापों को इसलिए अनदेखा करता है कि वह पश्चाताप करे।’’

पश्चाताप, हमारे पूरे मुक्ति-इतिहास के पीछे बस एक यही कारण है और यूँ कहें कि पूरे धर्मग्रंथ के लिखे जाने के पीछे यही उद्देश्य है - पश्चाताप। पिता ईश्वर के द्वारा अपने एकलौते को इस संसार में भेजने के पीछे भी यही कारण था। इसलिए संत मारकुस के सुसमाचार 1:14-15 में हम पढते हैं कि जब प्रभु येसु ने अपनी सेवकाई प्रारम्भ की तो उनके मुख से निकले पहले शब्द यही थे- ‘‘समय पूरा हो चुका है। ईश्वर का राज्य निकट आ गया है। पश्चाताप करो और सुसमाचार में विश्वास करो।’’ संत लूकस 24-47 में वचन कहता है - ‘‘उनके येसु नाम पर येुरूसालेम से लेकर सभी राष्टों को पाप क्षमा के लिए पश्चाताप का उपदेश दिया जायेगा। पूरे धर्मग्रंथ का संदेश इसी विषय के ईर्द-गिर्द घुमता है।

इससे हमें यह समझ में आता है कि मनुष्य की सबसे बडी समस्या जो हैं, वो हैं उसका पाप। और उसका सबसे उत्तम समाधान जो हैं वो है पश्चाताप। पाप किस प्रकार से हमारी सबसे बडी समस्या है इसे संत योहन 8:34 के द्वारा समझा जा सकता है जहॉं प्रभु का वचन कहता है- ‘‘जो पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता, पुत्र सदा रहता है।’’ यहॉं पुत्र के घर में रहने की बात कही गयी है। पुत्र जो है वह हमेशा घर में रहता है। यहॉं पर कौन से घर की बात कही गई है? यह पिता का घर है जो स्वर्ग में है। तो जो पाप करता है वह इस घर में हमेशा नहीं रहता। वह इसे छोडर दूर चला जाता है जैसा कि हम खोये हुए बेटे के दृष्टांत में पढते हैं। छोटा बेटा जो कि अपने पिता के विरूद्ध पाप करता है, वह अपने घर से दूर चला जाता है। यही हमारे इस दुनियाई जीवन की वास्तविकता है। हम अपने पिता के घर से दूर आ गये हैं। जैसा कि संत पौलुस फिलिपियों 3:20 में कहते हैं - ‘‘हमारा स्वदेश तो स्वर्ग है।’’ तो हम उस स्वर्ग बहुत दूर आ गये हैं।

इन सब बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी सब से बडी समस्या हमारा ईश्वर के घर से दूर हो जाना है। और परम पिता ईश्वर ने इस समस्या के समाधान हेतु अपने इकलौते बेटे को दे दिया है ताकि जो कोई उनमें विश्वास करें, उनका सर्वनाश न हो बल्कि वे अनंनत जीवन प्राप्त करें। परन्तु इस ओर एक कदम हमें भी बढाने की ज़रूरत है। जैसा कि आज के सुसमाचार में ज़केयुस ने किया। वह एक पापी था। उसने बेईमानी की कमाई से, गरीबों को लूटकर काफी धन जमा कर लिया था। लेकिन येसु को अपने घर में पाकर उसे अपनी गलती का एहसास हो जाता है। वह पश्चाताप से भर कर बोल उठता है - ‘‘प्रभु! देखिए, मैं अपनी आधी संपत्ती गरीबों को दूँगा और मैंने जिन जिन लोगों के साथ किसी भी बात में बेईमानी की है, उन्हें उसका चौगुना लौटा दूँगा।’’ तब प्रभु ने उससे कहा - ‘‘आज इस घर में मुक्ति का आगमन हुआ है...जो खो गया था मानव पुत्र उसी को खोजने और बचाने आया है।’’ दूसरे शब्दों में कहें तो, जो अपने पिता के घर से दूर हो गया था, उसी को वापस अपने पिता के घर ले जाने के लिए येसु इस दुनिया में आये हैं।

यह मुक्ति तभी संभव है जब हम येसु से मिलने के लिए बेताब हैं और ज़केयुस जैसे अपने जीवन में येसु को कार्य करने दें। उनकी कृपा के लिए हमारे जीवन के दरवाजे़ खोल दें। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि हम हमारे पापों के ऊपर पश्चाताप करें। तब प्रभु येसु हमसे भी यही कहेंगे - आज इस घर में, इस पल्ली में, इस व्यक्ति के जीवन में मुक्ति का आगमन हुआ है।

आईये हम हमारी मुक्ति के स्रोत येसु को अपने जीवन में बुलाने में न हिचकें। और उनकी कृपा के लिए अपने जीवन के द्वार को खोल दें। ताकि हम जो अपने पिता के घर से दूर हो गये हैं प्र्रभु येसु के द्वारा, उनके साथ वापस अपने पिता के घर उस अनन्त निवास में लौट सकें, जहॉं हमारा स्वर्गिक पिता हम सब का इंतजार कर रहा है। आमेन।  


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

23 अक्टूबर 2022 वर्ष का तीसवाँ सामान्य इतवार

 

23 अक्टूबर 2022

वर्ष का तीसवाँ सामान्य इतवार




पहला पाठ : प्रवक्ता 35:12-14; 16-18



12) जिस प्रकार सर्वोच्च ईश्वर ने तुम्हें दिया है, उसकी प्रकार तुम भी उसे सामर्थ्य के अनुसार उदारतापूर्वक दो;

13) क्योंकि प्रभु प्रतिदान करता है, वह तुम्हें सात गुना लौटायेगा।

14) उसे घूस मत दो, वह उसे स्वीकार नहीं करता।

16) वह दरिद्र के साथ अन्याय नहीं करता और पद्दलित की पुकार सुनता है।

17) वह विनय करने वाले अनाथ अथवा अपना दुःखड़ा रोने वाली विधवा का तिरस्कार नहीं करता।

18) उसके आँसू उसके चेहरे पर झरते हैं और उसकी आह उत्याचारी पर अभियोग लगाती है।



दूसरा पाठ : 2तिमथी 4:6-8,16-18



6) मैं प्रभु को अर्पित किया जा रहा हूँ। मेरे चले जाने का समय आ गया है।

7) मैं अच्छी लड़ाई लड़ चुका हूँ, अपनी दौड़ पूरी कर चुका हूँ और पूर्ण रूप से ईमानदार रहा हूँ।

8) अब मेरे लिए धार्मिकता का वह मुकुट तैयार है, जिसे न्यायी विचारपति प्रभु मुझे उस दिन प्रदान करेंगे - मुझ को ही नहीं, बल्कि उन सब को, जिन्होंने प्रेम के साथ उनके प्रकट होने के दिन की प्रतीक्षा की है।

16) जब मुझे पहली बार कचहरी में अपनी सफाई देनी पड़ी, तो किसी ने मेरा साथ नहीं दिया -सब ने मुझे छोड़ दिया। आशा है, उन्हें इसका लेखा देना नहीं पड़ेगा।

17) परन्तु प्रभु ने मेरी सहायता की और मुझे बल प्रदान किया, जिससे मैं सुसमाचार का प्रचार कर सकूँ और सभी राष्ट्र उसे सुन सकें। मैं सिंह के मुँह से बच निकला।

18) प्रभु मुझे दुष्टों के हर फन्दे से छुड़ायेगा। वह मुझे सुरक्षित रखेगा और अपने स्वर्गराज्य तक पहुँचा देगा। उसी को अनन्त काल तक महिमा! आमेन!



सुसमाचार : सन्त लूकस 18:9-14



9) कुछ लोग बड़े आत्मविश्वास के साथ अपने को धर्मी मानते और दूसरों को तुच्छ समझते थे। ईसा ने ऐसे लोगों के लिए यह दृष्टान्त सुनाया,

10) "दो मनुष्य प्रार्थना करने मन्दिर गये, एक फ़रीसी और दूसरा नाकेदार।

11) फ़रीसी तन कर खड़ा हो गया और मन-ही-मन इस प्रकार प्रार्थना करता रहा, ’ईश्वर! मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ कि मैं दूसरे लोगों की तरह लोभी, अन्यायी, व्यभिचारी नहीं हूँ और न इस नाकेदार की तरह ही।

12) मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूँ और अपनी सारी आय का दशमांश चुका देता हूँ।’

13) नाकेदार कुछ दूरी पर खड़ा रहा। उसे स्वर्ग की ओर आँख उठाने तक का साहस नहीं हो रहा था। वह अपनी छाती पीट-पीट कर यह कह रहा था, ‘ईश्वर! मुझ पापी पर दया कर’।

14) मैं तुम से कहता हूँ - वह नहीं, बल्कि यही पापमुक्त हो कर अपने घर गया। क्योंकि जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा; परन्तु जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जायेगा।"



📚 मनन-चिंतन



आज के इस रविवार को माता कलीसिया मिशन रविवार के रूप में मनाती है। यह एक ऐसा दिन है (या कुछ ऐसे दिन हैं) जिनमें हम मिशन के लिए विशेष प्रार्थना करते हैं और उदारतापूर्वक मिशन के विकास और जारी रखने के लिए दान देते हैं। आज की पूजन विधि हमें दरिद्रों, विधवाओं एवं पापियों के लिए ईश्वर के विशेष प्रेम की याद दिलाती है। जब दरिद्र, निराश्रित और अनाथ प्रभु को पुकारते हैं तो उनकी आह भरी पुकार बादलों को चीरकर प्रभु के कानों तक पहुँच जाती है। ईश्वर उनकी पुकार को अनसुना नहीं करता, वह तुरन्त उस पर ध्यान देता है। यदि हमारा स्वर्गीय पिता दरिद्रों और दिन-हीनों का इतना ख़्याल रखते हैं तो हमें, उनकी प्रिय सन्तानों को उनका कितना ख़्याल रखना चाहिए?

आज का दूसरा पाठ हमें सन्त पौलुस के मिशन एवं उनकी चुनौतियों तथा कठिनाइयों का वर्णन करता है। वह कलिसिया के अगुआ लोगों को प्रेरित करते हैं कि वे जो भी करें प्रभु के मिशन को ध्यान में रखकर करें और निरंतर उसी की सफलता के लिए अथक प्रयास करते रहें। आज का यह रविवार हमें हमारे मिशन की भी याद दिलाता है, ईश्वर ने हममें से प्रत्येक व्यक्ति को भी एक-एक मिशन सौंपा है, और वह मिशन है, संसार के कौने-कौने में सुसमाचार का प्रचार करना। दुनिया में ऐसे अनेक लोग हैं जिन्हें आधारभूत सुविधाएँ भी नसीब नहीं होतीं। हमारे देश में ही ऐसे गाँव हैं जहाँ शिक्षा का उजाला अभी तक नहीं पहुँच पाया है।

ऐसे लोग हैं जिन्हें पीने का स्वच्छ जल नहीं मिल पाता है, उचित स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं मिल पाती हैं, ऐसे गाँव हैं जो बरसात के मौसम में मुख्य धारा से कट जाते हैं क्योंकि वहाँ उचित सड़क नहीं है। कई गाँव में बिजली तक नहीं पहुँची है। ऐसे लोग हैं जो कमजोर और गरीब हैं, जिनका शक्तिशाली और धनवान लोगों द्वारा शोषण किया जाता है, ग़रीबों के साथ तरह-तरह से अन्याय किया जाता है। उनका हृदय मदद के लिए ईश्वर को पुकारता है। ईश्वर आज आपसे और मुझसे पूछते हैं - “मेरी प्रजा की करुण पुकार मेरे कानों तक पहुँची है, उनकी मदद के लिए मैं किसे भेजूँ?” क्या ईश्वर के इस सवाल का जवाब देने की हिम्मत है मुझमें?

क्या मुझमें हिम्मत है कि मैं कह सकूँ, “प्रभु मैं तैयार हूँ, अपने मिशन के लिए मुझे भेज?” हो सकता है मैं नौकरी करता हूँ, देख-भाल करने के लिए एक परिवार है, ऐसे लोग हैं मेरे जीवन में जिनकी ज़िम्मेदारी मेरे ही कंधों पर है, मैं अपने जीवन बहुत ज़्यादा व्यस्त हूँ। मैं दूर दराज स्थानों पर मिशन कार्य के लिए कैसे जा सकता हूँ? भले ही आप मिशन कार्य के लिए अपने घर से दूर नहीं जा सकते, लेकिन आप फिर भी मिशन के विकास के लिए अपना सहयोग दे सकते हैं। आप मिशन के लिए प्रार्थना करने के लिए अपना समय दे सकते हैं। प्रत्येक ख्रिस्तिय को अपनी कमाई का दशमांश कलिसिया के कार्यों के लिए देना चाहिए, लेकिन हम में से कितने लोग ऐसा करते हैं? मिशन के लिए और जो मिशन की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं, उन सब की ख़ातिर उदारतापूर्वक दान दें। याद रखिए ईश्वर के कार्य के लिए दिल से दिया हुआ छोटा सा दान भी ईश्वर की नज़र से नहीं छुपेगा।




📚 REFLECTION



Today the Mother Church celebrates the mission Sunday. It is a day (or few days together) specially meant for praying for missions and generously contributing for the growth and sustenance of the missions. Today's liturgy of the word reminds us about special love of God for poor, widows and sinners. When the poor, the orphan, the widows call upon the name of the Lord, their cry pierces the clouds and reaches straight to God, and God does not ignore their cries, He hears and attends to them immediately. If God our father is so concerned about the weak and the poor, how much more we, his beloved children, should be concerned about them all?

The second reading reminds us about the mission that St. Paul completes after so many hardships and rejections and persecutions. He encourages and inspires other church leaders to keep the mission in the mind and work tirelessly for the mission of the Lord. This Sunday reminds each one of us of the mission that is entrusted to us, to carry the good news to the ends of the world. There are innumerable people who are deprived of even the basic amenities. Even in our own country, there are places and people to whom the light of education has not reached yet.

There are people who have no access to clean water, no access to proper medical facilities, there are villages which are totally cut off from mainstream and rainy season, because of lack of proper roads, no electricity in many villages. There are poor people who are exploited by the rich and powerful, there is a lot of injustice done to the weak. Their heart cries out to God for help. And we know God will not leave them without help. Today God asks you and me - "I hear the cry of my people, whom shall I send?” Do I have an answer to God’s calling?

Do I have courage to say, Lord I am ready, send me for your mission? Maybe I have a job, a family to take care of, people around me who are depending on me, I am too busy in my life. How can I go for missions to far away places? Even though you cannot go to far away places for missions, you can still contribute in the growth of the mission. You can spend time in praying for the missions. Every Christian is expected to give 1/10 of the income to the church for works of charity. Contribute generously for the mission, for people who have given their life for the missions. Remember, the generous donations given for God’s mission, will not go unrewarded.



मनन-चिंतन -2




फरीसी और नाकेदार का दृष्टांत बताता है कि हम छोटे से छोटे से वरदान को खरीद नहीं सकते हैं। अनुग्रह मुफ़्त है; हम उसके लिए भुगतान नहीं कर सकते, न ही हम उसका हकदार बनने का दावा कर सकते हैं। स्वयं को धार्मिक मानने वाला व्यवहार हमें सब कुछ खोने के खतरे में डाल सकता है। धार्मिक प्रथाओं तथा अनुष्ठानों से हम ईश्वर के अनुग्रहों के लिए भुगतान नहीं कर सकते है। सभी धार्मिक अनुष्ठान हमें अपने महान और दयालु ईश्वर द्वारा हम पर बरसाने वाले अनुग्रहों की प्राप्ति के योग्य बना सकते हैं। नाकेदार स्तोत्रकार के साथ मिल कर सवाल करते हैं, "प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा?" (स्तोत्र 130: 3) उसके पास दावा करने के लिए कुछ भी नहीं है। वह बस ईश्वर की दया के लिए खुद को प्रस्तुत करता है। केवल विनम्रता ही हमारी प्रार्थना को ईश्वर के समक्ष स्वीकृति के योग्य बनाती है। विनम्रता हमें दूसरों को स्वीकार करने और उनकी सराहना करने में सक्षम भी बनाती है। संत पौलुस कहते हैं, "आप दलबन्दी तथा मिथ्याभिमान से दूर रहें। हर व्यक्ति नम्रतापूर्वक दूसरों को अपने से श्रेष्ठ समझे।" (फिलिप्पियों 2: 3)।




SHORT REFLECTION



The parable of the Pharisee and the tax collector tells us that we cannot pay for even the smallest of graces. Grace is gratuitous; we cannot pay for it, nor can we claim it. Self-righteous behavior can place us in danger of losing everything. Religious practices are not meant to be payments for graces. They are meant to create an adequate disposition to receive graces that are freely lavished upon us by our great and merciful God. The tax collector seems to join the psalmist in asking, “If you, O Lord, should mark iniquities, Lord, who could stand?” (Ps 130:3) He has nothing to claim for. He simply submits himself to the mercy of God. Only humility makes our prayer worthy of acceptance before God. It is humility that enables us to accept and appreciate others. St. Paul says, “Do nothing from selfish ambition or conceit, but in humility regard others as better than yourselves” (Phil 2:3).



प्रवचन


प्रार्थना मनुष्य को ईश्वर से जोडती है। प्रार्थना के माध्यम से हम ईश्वर से वह सबकुछ प्राप्त कर सकते हैं जो हम ईश्वर से प्रार्थना में मांगते हैं। प्रार्थना को अत्यंत शुद्ध तथा स्वच्छ मन से करना चाहिये। दिखावटीपन, आडंबर, अहं, डींग आदि बातें प्रार्थना के लिये दीमक की तरह होती है। यह हमारी प्रार्थनाओं को सार्वजनिक प्रदर्शन में बदल देता है। इस प्रकार से की गयी प्रार्थनाओं से कोई लाभ नहीं होता है। ऐसी गलत प्रवृत्तियों के प्रति आगाह करते हुये येसु कहते हैं, ’’ढोंगियों की तरह प्रार्थना नहीं करो। वे सभागृहों में और चौकों पर खड़ा होकर प्रार्थना करना पसंद करते हैं, जिससे लोग उन्हें देखें।’’ (मत्ती 6:5) सुसमाचार में प्रभु दो व्यक्तियों को प्रार्थना करते प्रस्तुत करते हैं। दोनों की प्रार्थना में जमीन-आसमान का फर्क है। एक अपनी स्वघोषित धार्मिकता के दंभ में चूर है। उसे ईश्वर की क्षमा या कृपा की आवश्यकता नहीं। वह यह भी मानता है कि वह दूसरों के समान पापी नहीं हैं।

दूसरी ओर नाकेदार अपने पाप और पश्चाताप के बोध के कारण ईश्वर की ओर ऑखें भी नहीं उठा पा रहा था। ईश्वर उसके पश्चातापी एवं विनम्रता के भाव को स्वीकार करते हैं। धर्मग्रंथ हमें सिखाता तथा आशवासन देता है कि जब भी हम विनम्रता एवं पश्चाताप के सच्चे भाव के साथ प्रार्थना करते हैं तो ईश्वर हमारी सुनता है। ’’यदि मेरी अपनी प्रजा विनयपूर्वक प्रार्थना करेगी, मेरे दर्शन चाहेगी और अपना कुमार्ग छोड़ देगी, तो मैं स्वर्ग से उसकी सुनूँगा, उसके पाप क्षमा करूँगा और उसके देश का कल्याण करूँगा। इस स्थान पर जो प्रार्थना की जाये, उसे मेरी आँखें, देखती रहेंगी और मेरे कान सुनते रहेंगे।’’ (2 इतिहास 7:14-15)

जब राजा दाऊद ने व्यभिचार और हत्या जैसा अपराधों को स्वीकारा, ’’मैंने प्रभु के विरूद्ध पाप किया है’’ तो प्रभु ने उनकी प्रार्थनाओं पर ध्यान दिया तथा उसका पश्चाताप स्वीकारा, ’’प्रभु ने आपका यह पाप क्षमा कर दिया है। आप नहीं मरेंगे। (2समूएल 12:13) जब अहाब ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर नाबोत को मरवा कर उसकी दाखबारी हथिया ली तो ईश्वर ने उनके लिये घोर सजा निर्धारित की। ’’अहाब ने ये शब्द सुन कर अपने वस्त्र फाड़ डाले और अपने शरीर पर टाट ओढ़ कर उपवास किया। वह टाट के कपड़े में सोता था और उदास हो कर इधर-उधर टहलता था।’’ जब अहाब ने प्रभु का भय खाकर, विनम्र तथा पश्चातापी हृदय से ईश्वर से इस प्रकार प्रार्थना की तो ईश्वर ने उनके घोर अपराधों को भी क्षमा करते हुये कहा, ’’क्या तुमने देखा है कि अहाब ने किस तरह अपने को मेरे सामने दीन बना लिया है? चूँकि उसने अपने को मेरे सामने दीन बना लिया, इसलिए मैं उसके जीवनकाल में उसके घराने पर विपत्ति नहीं ढाऊँगा।’’ (1 राजाओं 21:27,29) इसी प्रकार प्रभु के क्रूस-मरण के दौरान जब उनकी बगल में लटका डाकू उनसे कहता है, ’’ईसा, जब आप अपने राज्य में आयेंगे, तो मुझे याद कीजिएगा’’ तो ईसा उसे तुरंत पुरस्कृत करते हुये कहते हैं, ’’मैं तुम से यह कहता हूँ, तुम आज ही परलोक में मेरे साथ होगे।’’ (लूकस 23:42-43)

खोये हुये लडके के दृष्टांत के माध्यम से प्रभु इसी बात को रेखांकित करते है कि यदि पापी अपना भटका मार्ग छोड पश्चातापी हृदय से ईश्वर के पास लौटेगा तो ईश्वर उसे बेझिझक अपना लेंगे। (देखिये लूकस 15:11-32) जब जकेयुस प्रभु से कहता है, ’’प्रभु! देखिए, मैं अपनी आधी सम्पत्ति गरीबों को दूँगा और मैंने जिन लोगों के साथ किसी बात में बेईमानी की है, उन्हें उसका चौगुना लौटा दूँगा’ तब ईसा उसे तथा उसके परिवार को मुक्ति प्रदान करते हुये कहते हैं, ’’आज इस घर में मुक्ति का आगमन हुआ है, क्योंकि यह भी इब्राहीम का बेटा है। जो खो गया था, मानव पुत्र उसी को खोजने और बचाने आया है।’’ (लूकस 19:8-10)

इस प्रकार की विनम्रता एवं पश्चाताप के साथ की गयी प्रार्थनायें ईश्वर कभी नहीं ठुकराते हैं। हमें ईश्वर के सामने अपनी अयोग्यता को कभी नहीं भूलना चाहिये। हम अपनी योग्यता के बल पर नहीं बल्कि ईश्वर की दया से मुक्ति पाते हैं। येसु स्वयं ऐसे लोगों को बुलाने एवं बचाने आये थे जो स्वयं के पापों को जानते, स्वयं को अयोग्य समझते तथा पापमय जीवन से छुटकारा पाना चाहते थे। ’’निरोगियों को नहीं, रोगियों को वैद्य की जरूरत होती है। मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूँ।’’ (लूकस 5:31-32) हमें भी इन्हीं मनोभावों को अपना कर ईश्वर से पूरे विश्वास के साथ प्रार्थना करना चाहिये।


 -Br. Biniush Topno


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