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इतवार, 07 नवंबर, 2021

 

इतवार, 07 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : 1 राजाओं 17:10-16


10) एलियाह उठ कर सरेप्ता गया। शहर के फाटक पर पहुँच कर उसने वहाँ लकड़ी बटोरती हुई एक विधवा को देखा और उसे बुला कर कहा, "मुझे पीने के लिए घड़े में थोड़ा-सा पानी ला दो"।

11) वह पानी लाने जा ही रही थी कि उसने उसे पुकार कर कहा, "मुझे थोड़ी-सी रोटी भी ला दो"।

12) उसने उत्तर दिया, "आपका ईश्वर, जीवन्त प्रभु इस बात का साक्षी है कि मेरे पास रोटी नहीं रह गयी है। मेरे पास बरतन में केवल मुट्ठी भर आटा और कुप्पी में थोड़ा सा तेल है। मैं दो-एक लकड़ियाँ बटोरने आयी हूँ। अब घर जा कर उसे अपने लिए और अपने बेटे के लिए पकाती हूँ। हम उसे खायेंगे और इसके बाद हम मर जायेंगे।

13) एलियाह ने उस से कहा, "मत डरो। जैसा तुमने कहा, वैसा ही करो। किन्तु पहले मेरे लिये एक छोटी-सी रोटी पका कर ले आओ। इसके बाद अपने लिए और अपने बेटे के लिए तैयार करना;

14) क्योंकि इस्राएल का प्रभु-ईश्वर यह कहता हैः जिस दिन तक प्रभु पृथ्वी पर पानी न बरसाये, उस दिन तक न तो बरतन में आटा समाप्त होगा और न तेल की कुप्पी खाली होगी ।"

15) एलियाह ने जैसा कहा था, स्त्री ने वैसा ही किया और बहुत दिनों तक उस स्त्री, उसके पुत्र और एलियाह को खाना मिलता रहा।

16) जैसा कि प्रभु ने एलियाह के मुख से कहा था, न तो बरतन में आटा समाप्त हुआ और न तेल की कुप्पी ख़ाली हुई।


दूसरा पाठ : इब्रानियों 9:24-28


24) क्योंकि ईसा ने हाथ के बने हुए उस मन्दिर में प्रवेश नहीं किया, जो वास्तविक मन्दिर का प्रतीक मात्र है। उन्होंने स्वर्ग में प्रवेश किया है, जिससे वह हमारी ओर से ईश्वर के सामने उपस्थित हो सकें।

25) प्रधानयाजक किसी दूसरे का रक्त ले कर प्रतिवर्ष परमपावन मन्दिर-गर्भ में प्रवेश करता है। ईसा के लिए इस तरह अपने को बार-बार अर्पित करने की आवश्यकता नहीं है।

26) यदि ऐसा होता तो संसार के प्रारम्भ से उन्हें बार-बार दुःख भोगना पड़ता, किन्तु अब युग के अन्त में वह एक ही बार प्रकट हुए, जिससे वह आत्मबलिदान द्वारा पाप को मिटा दें।

27) जिस तरह मनुष्यों के लिए एक ही बार मरना और इसके बाद उनका न्याय होना निर्धारित है,

28) उसी तरह मसीह बहुतों के पाप हरने के लिए एक ही बार अर्पित हुए। वह दूसरी बार प्रकट हो जायेंगे- पाप के कारण नहीं, बल्कि उन लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए, जो उनकी प्रतीक्षा करते हैं।



सुसमाचार : मारकुस 12:38-44



38) ईसा ने शिक्षा देते समय कहा, "शास्त्रियों से सावधान रहो। लम्बे लबादे पहन कर टहलने जाना, बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना,

39) सभागृहों में प्रथम आसनों पर और भोजों में प्रथम स्थानों पर विराजमान होना- यह सब उन्हें बहुत पसन्द है।

40) वे विधवाओं की सम्पत्ति चट कर जाते और दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करते हैं। उन लोगों को बड़ी कठोर दण्डाज्ञा मिलेगी।"

41) ईसा ख़जाने के सामने बैठ कर लोगों को उस में सिक्के डालते हुए देख रहे थे। बहुत-से धनी बहुत दे रहे थे।

42) एक कंगाल विधवा आयी और उसने दो अधेले अर्थात् एक पैसा डाल दिया।

43) इस पर ईसा ने अपने शिष्यों को बुला कर कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ- ख़जाने में पैसे डालने वालों में से इस विधवा ने सब से अधिक डाला है;

44) क्योंकि सब ने अपनी समृद्धि से कुछ डाला, परन्तु इसने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला।"


मनन-चिंतन



यह कहा गया है कि चार प्रकार के दाता हैंः द्वेष देने वाले, कार्य देने वाले, स्वयं-सेवा देने वाले और प्रेम देने वाले।

द्वेष देने वाले दूसरों को देते हैं लेकिन वह उसे द्वेषपूर्वक या अनिच्छा से करते हैं। वे देते हैं क्योंकि वे शर्मिंदा नहीं होना चाहते हैं।

कार्य दाता दायित्व की भावना के साथ देते हैं। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि उन पर दबाव या मजबूरी हो।

स्वयं-सेवा देने वाले वे हैं जो अपने सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए या बदले में कुछ पाने के लिए देते हैं। परन्तु येसु कहते हैं, ‘‘जब तू किसी दरिद्र को कुछ देते हो, तो कपटियों की तरह उसका बड़ा प्रदर्शन मत करों’’ (मत्ती 6ः2)।

प्यार देने वाले इसलिए देते हैं क्योंकि वे देना चाहते हैं। वे इसे प्यार या करुणा से प्रेरित स्वतंत्र रूप से और खुशी से करते हैं। संत मदर तेरेसा कहती हैं कि जब तक दर्द न हो तब तक दें।

पहले पाठ और सुसमाचार में दोनों विधवाएं हमें एक महत्वपूर्ण सबक सिखाती हैंः बलिदान का मूल्य।

विधवा ने आज के पहले पाठ में अपनी आखिरी रोटी का त्याग किया। वह मरने की तैयारी कर रही थी और वह अपने पास जो कुछ भी है, उसकी आखिरी ताकत, उसके पोषण का अंतिम स्रोत, उसके जीवन का अंतिम चिन्ह अर्थात् स्वयं को को दे देती है। तब घड़ा और जग भर जाता हैं । सुसमाचार में विधवा वह सब कुछ प्रदान करती है जिस पर उसकी जीविका टीकी थी। आज के सुसमाचार में येसु ने विधवा की ईमानदारी, उदारता और बलिदान के लिए उसकी प्रशंसा की है।

येसु ने अपने पीड़ा और मृत्यु के जरिए बलिदान की मिसाल कायम की। उन्होंने योहन 12ः24 में कहा ‘‘जब तक गेंहूँ का दाना मिटटी में गिर कर नहीं मर जाता, तब तक वह अकेला ही रहता है परन्तु यदि वह मर जाता है, तो बहुत फल देता है’’। अपने आप के लिए मर जाने के द्वारा ही हम वह बन पाते हैं जिसे ईश्वर ने हमें होने के लिए बुलाया है। बिना कष्ट किये फल नहीं मिलता।

हर दिन हमें उस आखिरी रोटी के लिए, उस आखिरी प्याले के तेल के लिए, उस आखिरी पैसे के लिए अपने दिलों की तलाश करनी चाहिए। हमें अपने हृदय में अहंकार के उस अंतिम अंश, क्रोध की अंतिम खुराक, शर्म के उस अंतिम संकेत, भय के उस अंतिम ठिकाने की तलाश करनी चाहिए, और यह सब प्रभु को समर्पित कर देना चाहिए। अरबी कहावत कहती है, ‘यदि आपके पास बहुत है, तो अपनी दौलत में से दो, यदि तुम्हारे पास थोड़ा है, तो अपने हृदय से दो।” हमें प्रभु के लिए अपना समय, प्रतिभा और खजाना बलिदान करने की आवश्यकता है। इससे चमत्कार होगा। उदारता को निश्चित रूप से पुरस्कृत किया जाएगा।



REFLECTION



It’s been said that there are four kinds of givers: GRUDGE givers, DUTY givers, Self- serving givers and LOVE givers.

Grudge givers give but do it grudgingly or reluctantly. They give because they do not want to be embarrassed.

Duty givers give with a sense of obligation. It may be because they are pressurized or under compulsion.

Self – serving givers are those who give for their honor and prestige or to get something in return. But Jesus says “When you give something to a needy person, do not make a big show of it as the hypocrites do” (Mt 6:2).

Love givers give because they want to. They do it freely and joyfully motivated by love or compassion. Mother Theresa says give until it hurts.

Both the widows in the first reading and in the gospel teach us one important lesson: The value of sacrifice.

The widow in today’s first reading sacrificed her last bit of bread. She was preparing to die and she offers everything she has, her last bit of strength, her last source of nourishment, her last sign of life; she gives herself away. Then the jar and the jug remained full. The widow in the gospel offers all that she had to live on. Jesus in today’s gospel praises the widow for her sincerity, generosity and the sacrifice.

Jesus sets an example of sacrifice through his passion and death. He said in Jn. 12:24 “Unless a grain of wheat falls into the earth and dies, it remains just a single grain: but if it dies, it bears much fruit”. It is only through dying to ourselves that we become who god has called us to be. No pain, no gain.

Each day we must search our hearts for that last bit of bread, for that last cup of oil, for that last penny. We must search our hearts for that last ounce of pride, that last dose of anger, that last hint of shame, that last haunt of fear, and surrender it all to the lord. Arabic proverb says “If you have much, give of your wealth; if you have little, give of your heart.” We need to sacrifice our time, talent and treasure for the people for the Lord. The miracle will happen. Generosity will be rewarded for sure.v


मनन-चिंतन - 2



किसी अमुख पल्ली में, गिरजाघर की स्थिति दयनीय बन गयी थीl उस गिरजाघर का रंग उखड़ चुका था, उसके चारों ओर का दृश्य उजाड़ सा प्रतीत हो रहा था। उसकी मरम्मत कराने के प्रति लोग उदासीन थे। उसके अंदर के रखी किताबो और अलमारियो को प्रायः घुन खा चुका था। उसकी मरम्मत के लिए धन की कमी थी। अतः एक दिन वहाँ के पल्ली पुरोहित ने पल्लीवासियों की सभा बुलाई और पूछा कि कैसे गिरजाघर का नवीनीकरण किया जा सके। अतः सभी पल्लीवासियों ने अपनी-अपनी राय प्रस्तुत की और कहा कि सभी लोग अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देंगे। उसी पल्ली में ही एक अत्यंत धनी व्यक्ति था जो अत्यंत कठोर हदय का था। उसे कोई भी पल्लीवासी जागरूक नहीं कर सकता था। इसलिए पल्ली पुरोहित ने सभी पल्लीवासियों से कहा क्यों न हम गिरजाघर जाकर ईश्वर से प्रार्थना कर उस धनी व्यक्ति के हदय को ख्रीस्तीयमय बना सके। पल्ली पुरोहित ने भावुक होकर भक्तिभाव से प्रार्थना की। परिणाम स्वरूप तुंरत ही उस धनी व्यक्ति ने कहा कि मैं अब से सारे गिरजाघर के मरम्मत के कार्य में अपना संपूर्ण योगदान दूंगा। इसे सुनते ही सबों के दिल में खुशी की लहर दौड़ चली और उनकी खुशी की कोई सीमा न रही। इस घट्ना से उत्साहित होकर पल्ली पुरोहित और जोर-जोर से प्रार्थना करने लगा जिसे सभी के पत्थरमय हदय पिघल जाये।

आज के तीनों पाठों का निचोड़ है उदारता और त्याग की भावना। हम सभी इसी उदारता और त्याग की भावना में सहभागी होने के लिए ईश्वर द्वारा इस संसार में नाम लेकर बुलाये गये हैं। अब प्रश्न उठता है कि कैसे हम इसे अपने जीवन में कार्यरूप में परिणत करें। हम सभी ईश्वर की असीम दया के कारण किसी न किसी रूप में अवश्य धनी हैं। यही हमें स्मरण दिलाता है कि हमें जरूरतमदों की सहायता करनी है यही हमारे जीवन में भिन्नता दिखाती है।

आज के पहले पाठ और सुसमाचार में सच्चे मनुष्य के गुणों को दर्शाया गया है। पुराने और नये विधान में दो योग्य गरीब विधवाओं की उदारता और त्याग की मिसाल को निखारा गया है उनकी इस भावना को हम कभी भुला नहीं सकते हैं। पवित्र बाइबिल हमें बताती है कि उनकी उदारता और त्याग की भावना एक महान और अद्वितीय घटना थी। क्या आज हम अपने जीवन में इस प्रश्न का जवाब देने का हिम्मत रखते हैं? कि हम ख्रीस्तीय अनुकंपा, उदारता और त्याग से परिपूरित हैं?

आज के सुसमाचार में संत मारकुस हमारे सामने अंत्यत रोचकपूर्ण दृश्य प्रस्तुत करते हैं और वह है प्रभु येसु के मंदिर में दान देने वालों पर टिप्पणी करना। बहुत से धनी लोग अपनी समृध्दि में से दान दे रहे थे और उन्हीं के बीच एक कंगाल विधवा अपनी जीविका के सभी को दान कर देती है। उनकी उदारता की भावना को सराहे बिना येसु स्वय को रोक नहीं सके। वे अपने शिष्यों को उनकी उदारता की भावना का पाठ पढ़ाते हैं कि किसी की उदारता मनुष्य को कभी भी नीचा नहीं वरन् उसे महान बनाती है।

आज के पहले पाठ राजाओं का पहला ग्रंथ हमें एक गरीब विधवा की हदयस्पर्शी घटना की याद दिलाता है, जो अपने मुठ्ठी भर आटा और थोड़ी सी कुप्पी भर के तेल से भोजन बनाकर नबी एलियाह को खाना खिलाती है। यह किसी महान उदारता की भावना से कम नहीं था। क्या हम भी उस विधवा की तरह अपनी निर्धनता में भी परिपूर्णताः दिखाते हैं? उदारता महानता की वह भावना है जो ऊंच नीच की भावना को उखाड़कर फेंक देती है। आज के पुराने और नये विधान का सामान्य भाजक नबी एलियाह की कहानी और संत मारकुस के सुसमाचार में विधवाओं की कहानी जिनका उस दौर की यहूदी प्रथा में कोई सहारा नहीं था। वे मात्र ईश्वर पर आश्रित थे। प्रभु येसु ने इसी भावना को नया अर्थ और परिभाषा दी है।

आइये आज इस यूख्रीस्तीय समारोह में भाग लेकर अपने जीवन में इसे अमल मे करने का दृढ़ निश्चय लें। एक बार अलेक्जेन्डर महान ने दरबार में कहा, “भिखारी के लिए तांबे का सिक्का उसकी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए पर्याप्त है, अपितु सोने का सिक्का अलेक्जेन्डर की उदारता का प्रतीक है”। अर्थात् हमें मनुष्य के रंग रूप को देखकर उसकी सहायता नहीं करनी चाहिए वरन् इसलिए उसकी सहायाता करनी चाहिए कि वह ईश्वर का प्रतिरूप है।


-Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 05 नवंबर, 2021

 

शुक्रवार, 05 नवंबर, 2021

वर्ष का इकत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 15:14-21


14) भाइयो! मुझे दृढ़ विश्वास है कि आप लोग सद्भाव और हर प्रकार के ज्ञान से परिपूर्ण हो कर एक दूसरे को सत्परामर्श देने योग्य हैं।

15 (15-16) फिर भी कुछ बातों का स्मरण दिलाने के लिए मैंने आप को निस्संकोच हो कर लिखा है; क्योंकि ईश्वर ने मुझे गै़र-यहूदियों के बीच ईसा मसीह का सेवक तथा ईश्वर के सुसमाचार का पुरोहित होने का वरदान दिया है, जिससे ग़ैर-यहूदी, पवित्र आत्मा द्वारा पवित्र किये जाने के बाद, ईश्वर को अर्पित और सुग्राह्य हो जायें।

17) इसलिए मैं ईसा मसीह द्वारा ईश्वर की सेवा पर गौरव कर सकता हूँ।

18) मैं केवल उन बातों की चर्चा करने का साहस करूँगा, जिन्हें मसीह ने गैर-यहूदियों को विश्वास के अधीन करने के लिए मेरे द्वारा वचन और कर्म से,

19) शक्तिशाली चिन्हों और चमत्कारों से और आत्मा के सामर्थ्य से सम्पन्न किया है। मैंने येरुसालेम और उसके आसपास के प्रदेश से लेकर इल्लुरिकुम तक मसीह के सुसमाचार का कार्य पूरा किया है।

20) इस में मैंने एक बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा। मैंने कभी वहाँ सुसमाचार का प्रचार नहीं किया, जहाँ मसीह का नाम सुनाया जा चुका था; क्योंकि मैं दूसरों द्वारा डाली हुई नींव पर निर्माण करना नहीं चाहता था,

21) बल्कि धर्मग्रन्थ का यह कथन पूरा करना चाहता था-जिन्हें कभी उसका सन्देश नहीं मिला था, वे उसके दर्शन करेंगे और जिन्होंने कभी उसके विषय में नहीं सुना, वे समझेंगे।


सुसमाचार : सन्त लूकस 16:1-8


1) ईसा ने अपने शिष्यों से यह भी कहा, ’’किसी धनवान् का एक कारिन्दा था। लोगों ने उसके पास जा कर कारिन्दा पर यह दोष लगाया कि वह आपकी सम्पत्ति उड़ा रहा है।

2) इस पर स्वामी ने उसे बुला कर कहा, ‘यह मैं तुम्हारे विषय में क्या सुन रहा हूँ? अपनी कारिन्दगरी का हिसाब दो, क्योंकि तुम अब से कारिन्दा नहीं रह सकते।’

3) तब कारिन्दा ने मन-ही-मन यह कहा, ‘मै क्या करूँ? मेरा स्वामी मुझे कारिन्दगरी से हटा रहा है। मिट्टी खोदने का मुझ में बल नहीं; भीख माँगने में मुझे लज्जा आती है।

4) हाँ, अब समझ में आया कि मुझे क्या करना चाहिए, जिससे कारिन्दगरी से हटाये जाने के बाद लोग अपने घरों में मेरा स्वागत करें।’

5) उसने अपने मालिक के कर्ज़दारों को एक-एक कर बुला कर पहले से कहा, ’तुम पर मेरे स्वामी का कितना ऋण है?’

6) उसने उत्तर दिया, ‘सौ मन तेल’। कारिन्दा ने कहा, ‘अपना रुक्का लो और बैठ कर जल्दी पचास लिख दो’।

7) फिर उसने दूसरे से पूछा, ‘तुम पर कितना ऋण है?’ उसने कहा, ‘सौ मन गेंहूँ। कारिन्दा ने उस से कहा, ‘अपना रुक्का लो और अस्सी लिख दो’।

8) स्वामी ने बेईमान कारिन्दा को इसलिए सराहा कि उसने चतुराई से काम किया; क्योंकि इस संसार की सन्तान आपसी लेन-देन में ज्योति की सन्तान से अधिक चतुर है।


मनन-चिंतन


”मूर्ख व्यक्ति हर किसी की बात पर विश्वास करता, किन्तु समझदार सोच-विचार कर आगे बढता है” (सूक्ति 14ः15)

आज का सुसमाचार यीशु द्वारा बताए गए उलझा और गलत समझे गए दृष्टांतों में से एक प्रस्तुत करता हैं । पहली नजर में यह समझना मुशकिल है कि यीशु बेईमान सेवक की प्रशंसा कैसे कर सकता हैं ? लेकिन दृष्टांत में गहराई से जाने से यह स्पष्ट है कि यीशु ने नौकर की प्रशंसा बेईमानी के लिए नही बल्कि उसकी दूरदशर््िाता के लिए की है ।

आज का सुसमाचार में पूर्वाभास के साथ आध्यात्मिक संकट पर विजय पाने का संदेश हैं। किसी ने एक बार कहा था“, ”अगर बुराई इतना गंभीर है कि उसमे सफलता का दृढसंकल्प है तो उसके बराबर अच्चाई में भी यह दृढसंकल्प होनी चाहिए“। यह सच हैं कि अपने सांससारिक जीवन में व्यवसाय, कैरियर, दोस्ती और कई अन्य चिंताए है लेकिन आध्यात्मिक जीवन की चिंता बहुत कम है । आज पूछा जाने वाला प्रश्न यह है कि यदि दुनिया के बच्चे अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अनैतिक तरीका और चीजो का उपयोग कर रहे है, तो हम ईश्वरीय कृपाओं के लिए अच्छे तरीकों का उपयोग क्यों नही करते ?

यह सच है कि आज इस दुनिया में आध्यात्मिक संकट है । इसलिए हमें चाहिए आध्यात्मिकता को पुनर्जीवित करने के लिए विश्वास की बहुत सारी रचनात्मक साझेदारी करें । विभिन्न प्रकार के कमिशन कार्य इस आशय की पूर्ति कर रहे है जैसेः जेल मिशन, बंजारो का देखभाल, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, सामाजिक विकास कार्यक्रम नैतिक शिक्षा बाइबिल मूल्यों के आधार पर लघु फिल्मो का निर्माण, अध्यात्मिक पुस्तकालय, संगीत साधना, बाइबिल के कुछ पात्रो के नाम पर हास्य चित्र आदि। विश्वास के रचनात्मक आदान प्रदान के प्रति हमारी दूरदर्शिता हमारे भविष्य सुरक्षित कर सकती है ।



REFLECTION


“The simple believe everything, but the clever consider their steps” Prov. 14:15. Today’s gospel presents one of the perplexed and misunderstood parables told by Jesus. At first sight it is confusing as to how Jesus could praise the dishonest servant. But going deeper into the parable it is very clear that Jesus did not praise the servant for his dishonesty but for his farsightedness.

Overcoming the spiritual crisis with foresightedness is the message of the gospel today. Someone once said “If evil is serious in its craft and determined to succeed the good should be equally determined to succeed”. It is true that we take lot of effort in our earthly life to succeed in business, career, friendship and many other concerns but not in spiritual life. The question to be asked today is if the children of the world are using everything including immoral ways to secure their future then children of God should use every god given talent and good ways to win God’s favour?

It is a fact that there is a spiritual crisis in this world today. Therefore we require lot of creative sharing of faith to revive the spirituality. There are various ministries that are catering to this effect. Prison Ministry, Pastoral care for the Nomads, Village Health ministry, Social Development Programme, Value Education Ministry, Producing short films based on Bible Values, Spiritual Library on wheels, Music Ministry, Cartoons on biblical characters etc. are to name few. May our farsightedness through creative sharing of faith secure our future in heaven.



मनन-चिंतन - 2


दुनिया में हम जीवित रहने के लिए, अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए, अपनी आय में सुधार करने और अपने जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। हम अपने लक्ष्यों तक जल्द से जल्द पहुंचने और अपनी इच्छानुसार सब कुछ प्राप्त करने के सही और गलत तरीके अपनाते हैं। लेकिन हम शायद ही कभी अपनी मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में सोचते हैं। मेरे मरने पर मेरा क्या होगा? येसु चाहते हैं कि हम इस विषय के बारे में सोचें और उसके अनुसार कार्य करें। आज के सुसमाचार में एक कारिन्दा है जो जब उसे पता चलता है कि वह अपनी नौकरी खो देगा, तो वह अपने लिए नयी व्यवस्था (हालांकि वे सांसारिक तरीके हैं) करना शुरू कर देता है यह सुनिश्चित करने के लिए कि जब वह नौकरी से बाहर निकाल दिया जायेगा, तो लोग अपने घरों में उसका स्वागत करें। प्रभु येसु चाहते हैं कि हम अनंत जीवन के बारे में सोचें। क्या मैंने अपने शाश्वत जीवन की सुरक्षा के बारे में सोचा है? क्या मैं किसी भी घटना के मुकाबला करने लिए तैयार हूँ?



REFLECTION


In the world we strive hard to survive, to extend our influence, to improve our income, and raise our living standards. We take right and wrong methods of reaching our goals as quickly as possible and of obtaining what we desire. But we seldom think about our life after death. What will happen to me when I die? Jesus wants us to think about this question and act accordingly. We have a steward in the Gospel who when he realises that he would lose his job, starts making arrangements (although they are worldly ways) to see that when he is out of the job, there will be some to welcome him into their homes. Jesus wants us to think about eternal life. Have I thought about the security of my eternal life? Am I prepared for any eventuality?


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 04 नवंबर, 2021

 

गुरुवार, 04 नवंबर, 2021

वर्ष का इकत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: रोमियों 14:7-12

7) कारण, हम में कोई न तो अपने लिए जीता है और न अपने लिए मरता है।

8) यदि हम जीते रहते हैं, तो प्रभु के लिए जीते हैं और यदि मरते हैं, तो प्रभु के लिए मरते हैं। इस प्रकार हम चाहे जीते रहें या मर जायें, हम प्रभु के ही हैं।

9) मसीह इसलिए मर गये और जी उठे कि वह मृतकों तथा जीवितों, दोनों के प्रभु हो जायें।

10) तो, आप क्यों अपने भाई का न्याय करते हैं? आप क्यों अपने भाई को तुच्छ समझते हैं? हम सब ईश्वर के न्यायासन के सामने खड़े होंगे,

11) क्योंकि धर्मग्रन्थ में लिखा है-प्रभु यह कहता है, अपनी अमरता की सौगन्ध! हर घुटना मेरे सामने झुकेगा और हर कण्ठ ईश्वर को स्वीकार करेगा।

12) इस से स्पष्ट है कि हम में हर एक को अपने-अपने कर्मों का लेखा ईश्वर को देना पड़ेगा।

सुसमाचार : सन्त लूकस 15:1-10

1) ईसा का उपदेश सुनने के लिए नाकेदार और पापी उनके पास आया करते थे।

2 फ़रीसी और शास्त्री यह कहते हुए भुनभुनाते थे, "यह मनुष्य पापियों का स्वागत करता है और उनके साथ खाता-पीता है"।

3) इस पर ईसा ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया,

4) "यदि तुम्हारे एक सौ भेड़ें हों और उन में एक भी भटक जाये, तो तुम लोगों में कौन ऐसा होगा, जो निन्यानबे भेड़ों को निर्जन प्रदेश में छोड़ कर न जाये और उस भटकी हुई को तब तक न खोजता रहे, जब तक वह उसे नहीं पाये?

5) पाने पर वह आनन्दित हो कर उसे अपने कन्धों पर रख लेता है

6) और घर आ कर अपने मित्रों और पड़ोसियों को बुलाता है और उन से कहता है, ’मेरे साथ आनन्द मनाओ, क्योंकि मैंने अपनी भटकी हुई भेड़़ को पा लिया है’।

7) मैं तुम से कहता हूँ, इसी प्रकार निन्यानबे धर्मियों की अपेक्षा, जिन्हें पश्चात्ताप की आवश्यकता नहीं है, एक पश्चात्तापी पापी के लिए स्वर्ग में अधिक आनन्द मनाया जायेगा।

8) "अथवा कौन ऐसी स्त्री होगी, जिसके पास दस सिक्के हों और उन में एक भी खो जाये, तो बत्ती जला कर और घर बुहार कर सावधानी से तब तक न खोजती रहे, जब तक वह उसे नहीं पाये?

9) पाने पर वह अपनी सखियों और पड़ोसिनों को बुला कर कहती है, ’मेरे साथ आनन्द मनाओ, क्योंकि मैंने जो सिक्का खोया था, उसे पा लिया है’।

10) मैं तुम से कहता हूँ, इसी प्रकार ईश्वर के दूत एक पश्चात्तापी पापी के लिए आनन्द मनाते हैं।"

मनन-चिंतन

खाेई हुई भेड और खोए हुए सिक्के के दृष्टांत के माध्यम से प्रभु येसु कमजोर वर्गो के प्रति हमारी जिम्मेदारिया को ईश्वरी प्रेम के तीन पहलुओ द्वारा याद दिलाता है। दोनो घटनाओ से यह अभिव्यक्त किया है कि ।

(1) प्रत्येक के लिए चिंताः- ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत रूप से चिंतित रहते है। खोई भेड और खोए हुए सिक्के के प्रति चिंता महिला और चरवाहे को अपना समय और ऊर्जा देकर खतरनाक जोखिम उठाने की प्रेरणा देते है।

(2) प्यार की तलाशः- चरवाहा भेड को अपने आप लौटने का इंतजार नहीं करता न ही महिला खोए हुए सिक्के ढूडने के लिए उचित समय की प्रतिक्षा करती है ।

चरवाहा तुरन्त बाहर निकल जाता है, और महिला सूरज की रोशनी की प्रतिक्षा न करके दीया जलाती है । उसी तरह जब हम ईश्वर की दृष्टि से ओझल हो जाते है उसी क्षण ईश्वर हमारे खोज में निकल जाते है ।

(3) आनंदित होनाः- चरवाहा और महिला दोनो भेड और सिक्के मिलने पर अपनी खुशी को दूसरों के साथ बाटते है । भेड और सिक्के के मिलने की खुशी एक उत्सव जैसे सभी लोगों के साथ मिलकर मनाया जाते है । यह उत्सव खोये लोगो

या चीजो को अपने ही समाज में एक सुखद अनुभव देते है ।

रासता भटकने में भेड को उसके घमंड और लापरवाही के लिए दोषी ठहराया जा सकता है लेकिन चरवाहा भेडों की रक्षा करने की जिम्मेदारी से किसी भी तरह से बच नहीं सकता । सिक्के के गायब होने के लिए पूरी तरह से महिला की लापरवाही ही जिम्मेदार है ।

दोनों दृष्टांत समाज के कमजोर वर्गो का तिरसकार करने नहीं बल्कि सभी को गले लगाकर एक अच्छंे ईसाई का व्यवहार प्रदर्शित करने का आमंत्रण देते है ।



REFLECTION

Through the parable of the lost sheep and the lost coin Jesus brings out three main facets of God’s Love and reminds us of the responsibility over the weaker sections.

1. Concern for the individual: God’s personal interest in each individual is expressed in both the parables. Individual concern for the lost sheep and the lost coin urges the shepherd and the women to take dangerous risk and spend time and energy to seek out the lost.

2. Seeking Love: The shepherd does not wait for the sheep to return by itself nor the women wait for the appropriate time to search for the lost coin. The shepherd steps out immediately and the women lights the lamp not waiting for the sunlight. God steps out the moment we go out of His sight.

3. Rejoicing Love: The shepherd and the women do not stop at the finding of sheep and the coin. They share their joy of their result through a celebration. The celebration is to make the lost ones comfortable in the group again.

The sheep may be blamed for its pride and carelessness in losing the way but the shepherd can in no way evade from his responsibility of protecting the sheep. The carelessness of the women is solely responsible for the missing of the coin.

Both the parables call for a responsible Christian behavior especially towards the weaker ones of the society. Not to despise anyone but to embrace everyone with love.


मनन-चिंतन - 2

संत लूकस के सुसमाचार के पंद्रहवें अध्याय में तीन दृष्टांत हैं - खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त, खोये हुए सिक्के का और उड़ाऊ पुत्र का। इन सभी दृष्टान्तों में जो कुछ खो गया था उसे पाने पर खुशी मनायी जाती है। प्रभु येसु कहते हैं, "मैं तुम से कहता हूँ, निन्यानबे धर्मियों की अपेक्षा, जिन्हें पश्चात्ताप की आवश्यकता नहीं है, एक पश्चात्तापी पापी के लिए स्वर्ग में अधिक आनन्द मनाया जायेगा।" मेल-मिलाप एक ऐसा सेवा-कार्य है जो स्वर्ग में बहुत खुशी लाता है। इससे पता चलता है कि प्रभु पापियों के पश्चाताप की कितनी इच्छा रखते हैं। ईश्वर को अपने बच्चों के पापमय जीवन से बहुत दुख होता है। येसु के दुनिया में आने का उद्देश्य खोए हुए लोगों की तलाश करना और उन्हें बचाना था। वे कहते हैं, "मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूँ” (लूकस 5:32)। यदि हम येसु से प्यार करते हैं, तो हमें पापियों को उनके पास वापस लाने के लिए उनको सहयोग देना होगा। संत याकूब कहते हैं, "मेरे भाइयो! यदि आप लोगों में कोई सच्चे मार्ग से भटके और कोई दूसरा उसे वापस ले आये, तो यह समझें कि जो किसी पापी को कुमार्ग से वापस ले आता है, वह उसकी आत्मा को मृत्यु से बचाता है और बहुत-से पाप ढाँक देता है।" (याकूब 5: 19-20)



REFLECTION

The fifteenth chapter of the Gospel of St. Luke has three parables – the parable of the lost sheep, that of the lost coin and that of the prodigal son. In all these parables there is great joy and celebration on finding what was lost. Jesus says, “I tell you, there will be more rejoicing in heaven over one sinner repenting than over ninety-nine upright people who have no need of repentance”. Reconciliation is a ministry which bring great joy to heaven. This shows how much the Lord desires the repentance of the sinful people. It pains God to find his children leading sinful life. The very purpose of Jesus’ coming into the world is to seek and save the lost. He says, “I have come to call not the righteous but sinners to repentance”. If we love Jesus, we need to join hands with him to bring the sinners back to him. St. James says, “My brethren, if any among you strays from the truth and one turns him back, let him know that he who turns a sinner from the error of his way will save his soul from death and will cover a multitude of sins.” (Jam 5:19-20)


 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 03 नवंबर, 2021

 

बुधवार, 03 नवंबर, 2021

वर्ष का इकत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 13:8-10


8) भातृप्रेम का ऋण छोड़कर और किसी बात में किसी के ऋणी न बनें। जो दूसरों को प्यार करता है, उसने संहिता के सभी नियमों का पालन किया है।

9 ’व्यभिचार मत करो, हत्या मत करो, चोरी मत करो, लालच मत करो’ -इनका तथा अन्य सभी दूसरी आज्ञाओं का सारांश यह है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

10) प्रेम पड़ोसी के साथ अन्याय नहीं करता। इसलिए जो प्यार करता है, वह संहिता के सभी नियमों का पालन करता है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 14:25-33


25) ईसा के साथ-साथ एक विशाल जन-समूह चल रहा था। उन्होंने मुड़ कर लोगों से कहा,

26) ’’यदि कोई मेरे पास आता है और अपने माता-पिता, पत्नी, सन्तान, भाई बहनों और यहाँ तक कि अपने जीवन से बैर नहीं करता, तो वह मेरा शिष्य नहीं हो सकता।

27) जो अपना क्रूस उठा कर मेरा अनुसरण नहीं करता, वह मेरा शिष्य नहीं हो सकता।

28) ’’तुम में ऐसा कौन होगा, जो मीनार बनवाना चाहे और पहले बैठ कर ख़र्च का हिसाब न लगाये और यह न देखे कि क्या उसे पूरा करने की पूँजी उसके पास है?

29) कहीं ऐसा न हो कि नींव डालने के बाद वह पूरा न कर सके और देखने वाले यह कहते हुए उसकी हँसी उड़ाने लगें,

30 ’इस मनुष्य ने निर्माण-कार्य प्रारम्भ तो किया, किन्तु यह उसे पूरा नहीं कर सका’।

31) ’’अथवा कौन ऐसा राजा होगा, जो दूसरे राजा से युद्ध करने जाता हो और पहले बैठ कर यह विचार न करे कि जो बीस हज़ार की फ़ौज के साथ उस पर चढ़ा आ रहा है, क्या वह दस हज़ार की फौज़ से उसका सामना कर सकता है?

32) यदि वह सामना नहीं कर सकता, तो जब तक दूसरा राजा दूर है, वह राजदूतों को भेज कर सन्धि के लिए निवेदन करेगा।

33) ’’इसी तरह तुम में जो अपना सब कुछ नहीं त्याग देता, वह मेरा शिष्य नहीं हो सकता।


मनन-चिंतन


मार्टिन लूथर कहते हैं कि धर्म, जो कुछ नही देता, कुछ भी बलिदान नहीं करता है और कुछ भी नहीं सहता इस प्रकार के धर्म का कोई मूल्य नहीं है । आज का सुसमाचार हमको दो महत्वपूर्ण दिशा-निर्देशों द्वारा येसु का अनुयायी बनने के लिए तैयार करतंे है ।

प्राथमिकता तय करनाः- किसी भी नए उदयम् के लिए पहला कदम होता है प्राथमिकता तय करना, इसी प्राथमिकता के आधार पर ही हम लक्ष्य प्राप्त कर सकते है । प्राथमिकता निर्धारण करते ही हमें जीवन के कई सुखो को त्यागना पडता हैं । ये सुख सुविधा कोई चीज, कोई व्यक्ति या कोई जगह हो सकती है जिससे हम जूडे हैं । आज येसु अपने शिष्यों को रिस्तेे और संबंधों से एक कदम आगे के लिए आमंत्रित करते है । जो हम अपने लिए सबसे महत्वपूर्ण मानते है । प्रभु के लिए किये कुर्बान की सुन्दरता को हर एक श्क्ष्यि अपने जीवन में तब भी महसूस करते है जब प्रभु से उनका सबंध मजबूत हो और दुनिया के हर एक व्यक्ति उनके लिए मॉं-बाप और भाई-बहन बन जाते है।

अनुमान लगानाः- जब प्राथमिकताएॅ निर्धारित हो जाती हैं तब लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लागत का अनुमान लगाना आवश्यक होता है । जब हम लक्ष्य की ओर बढते हैं तो निर्माण और खरीद से पहले यह सुनिश्चित कर लेते है कि हमारे पास कार्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन है या नहीं । इस प्रक्रिया में हमे अनावश्यक तनाव, निराशा, और भारी नुकसान हो सकता है। मत्ती 25ः 1-25 में येसु दस कुवारियों के दृष्टान्त के माध्यम से समझाते है कि जब उन कुवारियों में तैयारी की समुचित व्यवस्था का अभाव था, तो उन्हे दुल्हे का देखने का मौका नहीं दिया गया और विवाह समारोह से बाहर निकाल दिया ।

जैसा कि हमने प्रभु के अनुसरण का निर्णय लिया हैं, तो आइए आज हम उनके साथ अपने संबंध को मजबूत करें । और सभी को अपना भाई-बहन समझो। प्रभू हमारे सभी साधनो व ऊर्जाओं को एकत्र कर परमेश्वर के राज्य के प्रसार के लिए हमें तैयार करें ।



REFLECTION



A religion that gives nothing, costs nothing, and suffers nothing, is worth nothing” Says Martin Luther. Today’s gospel places two important guidelines to prepare oneself to be the follower of Jesus.

1. Setting Priorities: Setting priority is the first step of any new venture we enter into. It is important for any firm or a group to achieve the target. Setting priorities presupposes foregoing many other comforts of life. These comforts may be a thing, person or a place we are attached to or comfortable with. Jesus today invites his disciples to move beyond blood relationships which we consider as most important in our life. The beauty of the renunciation is experienced only when the new relationship is built up with Jesus, where everyone in the world becomes a brother, sister, mother or father to the disciple.

2. Preparing Estimate: Once the priorities are set an estimate needs to be prepared to achieve the target. We are used to estimates and quotations before constructions and purchases. It is prepared only to make sure that we have the sufficient resources to complete the task. Failure in this procedure may invite unnecessary tension, despair and even a heavy loss. In Mat. 25: 1-13, Jesus himself gives an example of required preparation through the parable of Foolish Virgins. The failure of the foolish virgins in calculating the required oil puts them permanently out of the wedding party.

As we have decided to follow Jesus let us today strengthen our relationship with Jesus accepting everyone around us as brothers and sisters. May He use all our energy and recourses for spreading of Kingdom of God wherever we are.



मनन-चिंतन - 2


प्रभु येसु आज के सुसमाचार में शिष्यत्व के बारे में कम से कम चार बिंदुओं पर जोर देते हैं। सबसे पहले, वह सभी पारिवारिक संबंधों से अलगाव की मांग करता है क्योंकि यह रक्त-संबंध से परे जाने और ईश्वर के परिवार का हिस्सा बनने का आह्वान है जहां हर कोई भाई या बहन बन जाता है। दूसरा, प्रभु येसु चाहते हैं कि हर कोई यह समझे कि शिष्यत्व सुख और आनंद का जीवन जीने का आह्वान नहीं है, बल्कि उसमें दुख या क्रूस शामिल है। तीसरा, वे चाहते हैं कि जो कोई भी शिष्य बनना चाहता है, वह यह सुनिश्चित करे कि वह अपने मार्ग पर आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक धीरज रखता है या नहीं। चौथा, प्रभु चाहते हैं कि हमें पता चले कि शिष्यत्व का मतलब बुराई के खिलाफ निरंतर युद्ध करना है और इसलिए वे हमें चेतावनी देते हैं कि शैतान का विरोध करने हेतु खुद को सुसज्जित करने के लिए विवेकपूर्ण बनें।



REFLECTION


Jesus emphasises at least four points about discipleship in today’s Gospel. First, he demands detachment from all family ties because this is a call to go beyond blood-relationship and become part of the family of God where everyone becomes a brother or sister. Second, Jesus wants everyone to understand that discipleship is not a call to live a life of comfort and pleasure but one that involves suffering or cross. Third, he wants anyone who desires to become a disciple to plan properly to ensure that he or she has the endurance required for facing the challenges that may come on the way. Fourth, Jesus wants us to know that discipleship means to be in constant war against the evil one and so he warns us to be prudent to equip ourselves for resist the devil.


 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 02 नवंबर, 2021

 

मंगलवार, 02 नवंबर, 2021

सब मृतविश्वासियों का स्मरणोत्सव

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पहला मिस्सा

पहला पाठ : योब का ग्रन्थ 19:1,23-27


1) अय्यूब ने उत्तर देते हुए कहाः

23 (23-24) ओह! कौन मेरे ये शब्द लिखेगा? कौन इन्हें लोहे की छेनी और शीशे से किसी स्मारक पर अंकित करेगा? इन्हें सदा के लिए चट्टान पर उत्कीर्ण करेगा?

25) मैं यह जानता हूँ कि मेरा रक्षक जीवित हैं और वह अंत में पृथ्वी पर खड़ा हो जायेगा।

26) जब मैं जागूँगा, मैं खड़ा हो जाऊँगा, तब मैं इसी शरीर में ईश्वर के दर्शन करूँगा।

27) मैं स्वयं उसके दर्शन करूँगा, मेरी ही आँखे उसे देखेंगी। मेरा हृदय उसके दर्शनों के लिए तरसता है।


अथवा -पहला पाठ : रोमियों 5:5-11


5) आशा व्यर्थ नहीं होती, क्योंकि ईश्वर ने हमें पवित्र आत्मा प्रदान किया है और उसके द्वारा ही ईश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उमड़ पड़ा है।

6) हम निस्सहाय ही थे, जब मसीह निर्धारित समय पर विधर्मियों के लिए मर गये।

7) धार्मिक मनुष्य के लिए शायद ही कोई अपने प्राण अर्पित करे। फिर भी हो सकता है कि भले मनुष्य के लिए कोई मरने को तैयार हो जाये,

8) किन्तु हम पापी ही थे, जब मसीह हमारे लिए मर गये थे। इस से ईश्वर ने हमारे प्रति अपने प्रेम का प्रमाण दिया है।

9) जब हम मसीह के रक्त के कारण धार्मिक माने गये, तो हम निश्चिय ही मसीह द्वारा ईश्वर के दण्ड से बच जायेंगे।

10) हम शत्रु ही थे, जब ईश्वर के साथ हमारा मेल उसके पुत्र की मृत्यु द्वारा हो गया था और उसके साथ मेल हो जाने के बाद उसके पुत्र के जीवन द्वारा निश्चय ही हमारा उद्धार होगा।

11) इतना ही नहीं, अब तो हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा ईश्वर से हमारा मेल हो गया है; इसलिए हम उन्हीं के द्वारा ईश्वर पर भरोसा रख कर आनन्दित हैं।


सुसमाचार : योहन 6:37-40


37) पिता जिन्हें मुझ को सौंप देता है, वे सब मेरे पास आयेंगे और जो मेरे पास आता है, मैं उसे कभी नहीं ठुकराऊँगा ;

38) क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, बल्कि जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पूरी करने के लिए स्वर्ग से उतरा हूँ।

39) जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा यह है कि जिन्हें उसने मुझे सौंपा है, मैं उन में से एक का भी सर्वनाश न होने दूँ, बल्कि उन सब को अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँ।

40) मेरे पिता की इच्छा यह है कि जो पुत्र को पहचान कर उस में विश्वास करता है, उसे अनन्द जीवन प्राप्त हो। मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा।"


दूसरा मिस्सा

पहला पाठ : इसायाह 25:6-9


6) विश्वमण्डल का प्रभु इस प्रर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी।

7) वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा,

8) श्वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है।

9) उस दिन लोग कहेंगे - “देखो! यही हमारा ईश्वर है। इसका भरोसा था। यह हमारा उद्धार करता है। यही प्रभु है, इसी पर भरोसा था। हम उल्लसित हो कर आनन्द मनायें, क्योंकि यह हमें मुक्ति प्रदान करता है।“


अथवा -पहला पाठ : रोमियों 8:14-23


14) लेकिन यदि आप आत्मा की प्रेरणा से शरीर की वासनाओें का दमन करेंगे, तो आप को जीवन प्राप्त होगा।

15) जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित हैं, वे सब ईश्वर के पुत्र हैं- आप लोगों को दासों का मनोभाव नहीं मिला, जिस से प्रेरित हो कर आप फिर डरने लगें। आप लोगों को गोद लिये पुत्रों का मनोभाव मिला, जिस से प्रेरित हो कर हम पुकार कर कहते हैं, "अब्बा, हे पिता!

16) आत्मा स्वयं हमें आश्वासन देता है कि हम सचमुच ईश्वर की सन्तान हैं।

17) यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो हम उसकी विरासत के भागी हैं-हम मसीह के साथ ईश्वर की विरासत के भागी हैं। यदि हम उनके साथ दुःख भोगते हैं, तो हम उनके साथ महिमान्वित होंगे।

18) मैं समझता हूँ कि हम में जो महिमा प्रकट होने को है, उसकी तुलना में इस समय का दुःख नगण्य है;

19) क्योंकि समस्त सृष्टि उत्कण्ठा से उस दिन की प्रतीक्षा कर रही है, जब ईश्वर के पुत्र प्रकट हो जायेंगे।

20) यह सृष्टि तो इस संसार की असारता के अधीन हो गयी है-अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि उसकी इच्छा से, जिसने उसे अधीन बनाया है- किन्तु यह आशा भी बनी रही

21) कि वह असारता की दासता से मुक्त हो जायेगी और ईश्वर की सन्तान की महिमामय स्वतन्त्रता की सहभागी बनेगी।

22) हम जानते हैं कि समस्त सृष्टि अब तक मानो प्रसव-पीड़ा में कराहती रही है और सृष्टि ही नहीं, हम भी भीतर-ही-भीतर कराहते हैं।

23) हमें तो पवित्र आत्मा के पहले कृपा-दान मिल चुके हैं, लेकिन इस ईश्वर की सन्तान बनने की और अपने शरीर की मुक्ति की राह देख रहे हैं।


सुसमाचार : मत्ती 25:31-46


31) "जब मानव पुत्र सब स्वर्गदुतों के साथ अपनी महिमा-सहित आयेगा, तो वह अपने महिमामय सिंहासन पर विराजमान होगा

32) और सभी राष्ट्र उसके सम्मुख एकत्र किये जायेंगे। जिस तरह चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग करता है, उसी तरह वह लोगों को एक दूसरे से अलग कर देगा।

33) वह भेड़ों को अपने दायें और बकरियों को अपने बायें खड़ा कर देखा।

34) "तब राजा अपने दायें के लोगों से कहेंगे, ’मेरे पिता के कृपापात्रों! आओ और उस राज्य के अधिकारी बनो, जो संसार के प्रारम्भ से तुम लोगों के लिए तैयार किया गया है;

35) क्योंकि मैं भूखा था और तुमने मुझे खिलाया; मैं प्यासा था तुमने मुझे पिलाया; मैं परदेशी था और तुमने मुझको अपने यहाँ ठहराया;

36) मैं नंगा था तुमने मुझे पहनाया; मैं बीमार था और तुम मुझ से भेंट करने आये; मैं बन्दी था और तुम मुझ से मिलने आये।’

37) इस पर धर्मी उन कहेंगे, ’प्रभु! हमने कब आप को भूखा देखा और खिलाया? कब प्यासा देखा और पिलाया?

38) हमने कब आपको परदेशी देखा और अपने यहाँ ठहराया? कब नंगा देखा और पहनाया ?

39) कब आप को बीमार या बन्दी देखा और आप से मिलने आये?"

40) राजा उन्हें यह उत्तरदेंगे, ’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुमने मेरे भाइयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, जो कुछ किया, वह तुमने मेरे लिए ही किया’।

41) "तब वे अपने बायें के लोगों से कहेंगे, ’शापितों! मुझ से दूर हट जाओ। उस अनन्त आग में जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है;

42) क्योंकि मैं भूखा था और तुम लोगों ने मुझे नहीं खिलाया; मैं प्यासा था और तुमने मुझे नहीं पिलाया;

43) मैं परदेशी था और तुमने मुझे अपने यहाँ नहीं ठहराया; मैं नंगा था और तुमने मुझे नहीं पहनाया; मैं बीमार और बन्दी था और तुम मुझ से नहीं मिलने आये’।

44) इस पर वे भी उन से पूछेंगे, ’प्रभु! हमने कब आप को भूखा, प्यासा, परदेशी, नंगा, बीमार या बन्दी देखा और आपकी सेवा नहीं की?"

45) तब राजा उन्हें उत्तर देंगे, ’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - जो कुछ तुमने मेरे छोटे-से-छोटे भाइयों में से किसी एक के लिए नहीं किया, वह तुमने मेरे लिए भी नहीं किया’।

46) और ये अनन्त दण्ड भोगने जायेंगे, परन्तु धर्मी अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे।"


तीसरा मिस्सा

पहला पाठ : प्रज्ञा ग्रन्थ 3:1-9


1) धर्मियों की आत्माएँ ईश्वर के हाथ में हैं। उन्हें कभी कोई कष्ट नहीं होगा।

2) मूर्ख लोगों को लगा कि वे मर गये हैं। वे उनका संसार से उठ जाना घोर विपत्ति मानते थे।

3) और यह समझते थे कि हमारे बीच से चले जाने के बाद उनका सर्वनाश हो गया है; किन्तु धर्मियों को शान्ति का निवास मिला है।

4) मनुष्यों को लगा कि विधर्मियों को दण्ड मिल रहा है, किन्तु वे अमरत्व की आशा करते थे।

5 थोड़ा कष्ट सहने के बाद उन्हें महान् पुरस्कार दिया जायेगा। ईश्वर ने उनकी परीक्षा ली और उन्हें अपने योग्य पाया है।

6) ईश्वर ने घरिया में सोने की तरह उन्हें परखा और होम-बलि की तरह उन्हें स्वीकार किया।

7) ईश्वर के आगमन के दिन वे ठूँठी के खेत में धधकती चिनगारियों की तरह चमकेंगे।

8) वे राष्ट्रों का शासन करेंगे; वे देशों पर राज्य करेंगे, किन्तु प्रभु सदा-सर्वदा उनका राजा बना रहेगा।

9) जो ईश्वर पर भरोसा रखते हैं, वे सत्य को जान जायेंगे; जो प्रेम में दृढ़ रहते हैं, वे उसके पास रहेंगे; क्योंकि जिन्हें ईश्वर ने चुना है, वे कृपा तथा दया प्राप्त करेंगे।


अथवा -पहला पाठ : प्रकाशना 21:1-7


1) तब मैंने एक नया आकाश और एक नयी पृथ्वी देखी। पुराना आकाश तथा पुरानी पृथ्वी, दोनों लुप्त हो गये थे और समुद्र भी नहीं रह गया था।

2) मैंने पवित्र नगर, नवीन येरुसालेम को ईश्वर के यहाँ से आकाश में उतरते देखा। वह अपने दुल्हे के लिए सजायी हुई दुल्हन की तरह अलंकृत था।

3) तब मुझे सिंहासन से एक गम्भीर वाणी यह कहते सुनाई पड़ी, "देखो, यह है मनुष्यों के बीच ईश्वर का निवास! वह उनके बीच निवास करेगा। वे उसकी प्रजा होंगे और ईश्वर स्वयं उनके बीच रह कर उनका अपना ईश्वर होगा।

4) वह उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा। इसके बाद न मृत्यु रहेगी, न शोक, न विलाप और न दुःख, क्योंकि पुरानी बातें बीत चुकी हैं।"

5) तब सिंहासन पर विराजमान व्यक्ति ने कहा, "मैं सब कुछ नया बना देता हूँ"।

6) इसके बाद उसने कहा, "ये बातें लिखो, क्योंकि ये विश्वासनीय और सत्य हैं"। उसने मुझ से कहा, "समाप्त हो गया है। आल्फा और ओमेगा, आदि और अन्त, मैं हूँ। मैं प्यासे को संजीवन जल के स्त्रोत से मुफ़्त में पिलाउँगा।

7) यह विजयी की विरासत है। मैं उसका ईश्वर होउँगा और वह मेरा पुत्र होगा।


सुसमाचार : मत्ती 5:1-12


(1) ईसा यह विशाल जनसमूह देखकर पहाड़ी पर चढ़े और बैठ गए। उनके शिष्य उनके पास आये।

(2) और वे यह कहते हुए उन्हें शिक्षा देने लगेः

(3) "धन्य हैं वे, जो अपने को दीन-हीन समझते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(4) धन्य हैं वे जो नम्र हैं! उन्हें प्रतिज्ञात देश प्राप्त होगा।

(5) धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं! उन्हें सान्त्वना मिलेगी।

(6) घन्य हैं, वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं! वे तृप्त किये जायेंगे।

(7) धन्य हैं वे, जो दयालू हैं! उन पर दया की जायेगी।

(8) धन्य हैं वे, जिनका हृदय निर्मल हैं! वे ईश्वर के दर्शन करेंगे।

(9) धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

(10) धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(11) धन्य हो तुम जब लोग मेरे कारण तुम्हारा अपमान करते हैं, तुम पर अत्याचार करते हैं और तरह-तरह के झूठे दोष लगाते हैं।

(12) खुश हो और आनन्द मनाओ - स्वर्ग में तुम्हें महान् पुरस्कार प्राप्त होगा। तुम्हारे पहले के नबियों पर भी उन्होंने इसी तरह अत्याचार किया।


मनन-चिंतन - 2


आज के पाठ हमेे दिवंगत आत्माओ के लिए प्रार्थना करने के लिए और साथ ही साथ अपने जीवन और मृत्यु के विषय पर मनन् चिंतन करने के लिए आमंत्रित करते है । जो शुद्धिकरण अवस्था में है वे संत बनने/घोषित होने के मार्ग पर है इसलिए कलीसिया में दिवंगतों के लिए प्रार्थना करना एक प्राचीन प्रथा है । इसका आधार हम पढते है मक्काबियों के दूसरे ग्रन्थ 12ः45 ”इसलिए उसने (यूदस ने)े प्रायश्चित्त के बलिदान का प्रबन्ध किया, जिससे मृतक अपने पाप से मुक्त हो जाये“ । मृतकों के लिए प्रार्थना करने का प्राथमिक उद्धेश्य पापों का प्रायश्चित करना था । यह हमारा विश्वास है कि हमारी प्रार्थना और भेंट द्वारा ईश्वर शोधक अग्नि की आत्माओं पर दया दिखाएॅंगे और उनके पाप क्षमा कर उन्हें अनंत जीवन प्रदान करेंगे । आज के दिन हम भी अपने जीवन और मृत्यु पर चिंतन करें । प्रवक्ता ग्रन्ध 14ः18 में लिखा है “जिस तरह हरे पंेड के पत्तो में कुछ फूटकर निकलते और कुछ गिर जाते है उसी तरह शरीर धारियों कि पीढियों में होता है - कोेई मरती और कोई उत्पन्न होती है यह वाक्य हमें ब्रह्मांड़ के प्राकृतिक रखाव कि प्रक्रिया का स्मरण दिलाता है । एक दिन हम सबका मरना निश्चित है । हम स्वयं को उस दिन के लिए तैयार करने हेतु आज क्या कर सकते है ? आज हम एक अच्छे लक्ष्य/उद्धेश्य के साथ यात्रा कर सकते है। इस दौरान अपने प्रतिदिन जीवन में हमें छोटी-छोटी मृत्यु को बलिदानों और आत्मा रिक्तीकरण के माध्यम से अनुभव करने की आवश्यकता है । आज जब हम अपने प्रियजनो की दिवंगत आत्माओं का स्मरण कर उनके लिए प्रार्थना करते है, तो आइए हम भी भजनकार के साथ अपने लिए प्रार्थना करे, ”प्रभु ! मुझे बता कि मेरा अन्त कब होगा, मेंरे कितने दिन शेष है, जिससे मैं समॅझू कि मैं कितना क्षण भंगुर हूॅं ?“ स़्तोत्र 39ः5



REFLECTION


Today’s reading invites us to pray for the departed souls as well as to reflect about our life and death.

Those in purgatory are in the purification stage and they are saints in the making. Therefore to praying for the departed is a custom in the church. It has its base in 2Macc 12:45 where we read “Therefore he (Judas) made atonement for the dead, so that they might be delivered from their sins”. The primary purpose of praying for the dead was for the atonement of sins. It is our belief that through our prayers and offerings God will show mercy on the souls in purgatory, forgive their sins and reward them with eternal life.

We are also reminded to reflect on our life and death today. Sir. 14:18 reads “Like abundant leaves on a spreading tree that sheds some and puts forth others, so are the generations of flesh and blood; one dies and another is born”. This verse reminds us of the natural pattern and process of the universe in its maintenance.

One day all of us are sure to die. To prepare ourselves for that day is what we can do today. To journey with a good aim is what we can do today. For that we need to experience small deaths everyday of our life through sacrifices and self emptying.

As we pray for the departed souls of our beloved ones let us also pray for ourselves with the Psalmist “Lord let me know my end, and what is the measure of my days; let me know how fleeting my life is” Ps 39:4.



मनन-चिंतन - 2


आज कलीसिया सभी मृत विश्वासियों को याद करती है। मृत्यु के समय हमारा जीवन समाप्त नहीं होता बल्कि बदल जाता है। हम मृत्यु पर अमर हो जाते हैं। हमारी आत्मा सांसारिक निवास को छोड़कर स्वर्ग में चली जाती है। 1थेसलनीकियों 4: 13-20 में, संत पौलुस विश्वासियों से कहते हैं कि वे उन लोगों की तरह शोक न करें जिनकी कोई आशा नहीं है, लेकिन एक दूसरे को पुनर्जीवित प्रभु में आशा के साथ सांत्वना दें और प्रोत्साहित करें। काथलिक विश्वास के अनुसार मृत्यु पर प्रत्येक व्यक्ति विशेष न्याय (particular judgment) से गुजरता है और उसकी आत्मा की स्थिति के अनुसार कोई स्वर्ग या शोधकस्थल या नरक में जाता है। मृत्यु अनन्त जीवन का प्रवेश द्वार है। जो लोग स्वर्ग में हैं, उन्हें हमारी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है। जो नरक हैं उनकी मदद हमारी प्रार्थना से नहीं हो सकती। अमीर और लाज़रुस के दृष्टांत में, इब्राहीम नरक में पड़े अमीर आदमी से कहता है, “हमारे और तुम्हारे बीच एक भारी गर्त अवस्थित है; इसलिए यदि कोई तुम्हारे पास जाना भी चाहे, तो वह नहीं जा सकता और कोई भ़ी वहाँ से इस पार नहीं आ सकता” (लूकस 16:26)। जो नरक में हैं उनकी हालत अपरिवर्तनीय है। हमारी प्रार्थना केवल उन लोगों की मदद करती है जो शोधकस्थल में हैं, जो स्वर्गीय महिमा का आनंद लेने से पहले शुध्द किये जाने के समय से गुजरते हैं। चूँकि हम नहीं जानते कि कौन स्वर्ग में पहुँचा है या कौन नरक या शोधकस्थल में गया है, हम अपने सभी दिवंगत भाइयों और बहनों के लिए प्रार्थना करते रहते हैं। फिर भी हमारी प्रार्थनाएँ कभी बेकार नहीं जातीं। प्रभु प्रार्थना में हमारी उदारता और प्रेम को देखते हैं और बदले में हमें आशीर्वाद देते हैं। हम जिनके लिए प्रार्थना करते हैं अगर वे स्वर्ग में हैं, वे बदले में इश्वर के सिंहासन से सामने हमारे लिए मध्यस्थता करेंगे। हम सभी मृतविश्वासियों का स्मरणोत्सव मनाते हुए एक-दूसरे को भलाई करने के लिए प्रोत्साहित करें ताकि हम सब स्वर्ग पहुँच सकें और त्रिएकईश्वर के साथ अनन्त आनंद का अनुभव कर सकें। मृतविश्वासियों की आत्माएं ईश्वर की दया में शांति में निवास करें।



REFLECTION


Today the Church commemorates All the Faithful Departed. At death our life does not end but changes. We become immortal at death. Our soul leaves the earthly dwelling and moves to the heavenly one. In 1Thess 4:13-20, St. Paul tells the believers not to mourn like those who have no hope but to console and encourage one another with the hope in the Risen Lord. According to the Catholic faith at death each person undergoes the particular judgement and depending upon the status of one’s soul, one goes to heaven or purgatory or hell. Death is the entrance into everlasting life. Those who are in heaven do not need our prayers to assist them. Those who are hell cannot be helped by our prayers. In the parable of the rich man and Lazarus, Abraham tells the rich man in hell, “between you and us a great chasm has been fixed, so that those who might want to pass from here to you cannot do so, and no one can cross from there to us” (Lk 16:26). The condition of those who are hell is irreversible. Our prayer helps only those who are purgatory, who undergo a time of cleansing before they can enjoy the heavenly bliss. Since we do not know who has reached heaven or who has gone to hell or purgatory, we keep praying for all our departed brothers and sisters. Yet our prayers never go unrewarded. God sees our generosity and love in prayer and blesses us in return. If those for whom we pray are in heaven, they in turn will support us with their intercessions before the throne of God. As we celebrate the Commemoration of all the faithful departed, let us encourage one another to do good so as to reach heaven and enjoy the eternal bliss with the Holy Trinity.


 -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!