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इतवार, 03 अक्टूबर, 2021

 

इतवार, 03 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : उत्पत्ति ग्रन्थ 2:18-24


18) प्रभु ने कहा, ''अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं। इसलिए मैं उसके लिए एक उपयुक्त सहयोगी बनाऊँगा।''

19) तब प्रभु ने मिट्ठी से पृथ्वी पर के सभी पशुओं और आकाश के सभी पक्षियों को गढ़ा और यह देखने के लिए कि मनुष्य उन्हें क्या नाम देगा, वह उन्हें मनुष्य के पास ले चला; क्योंकि मनुष्य ने प्रत्येक को जो नाम दिया होगा, वही उसका नाम रहेगा।

20) मनुष्य ने सभी घरेलू पशुओं, आकाश के पक्षियों और सभी जंगली जीव-जन्तुओं का नाम रखा। किन्तु उसे अपने लिए उपयुक्त सहयोगी नहीं मिला।

21) तब प्रभु-ईश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में सुला दिया और जब वह सो गया, तो प्रभु ने उसकी एक पसली निकाल ली और उसकी जगह को मांस से भर दिया।

22) इसके बाद प्रभु ने मनुष्य से निकाली हुई पसली से एक स्त्री को गढ़ा और उसे मनुष्य के पास ले गया।

23) इस पर मनुष्य बोल उठा, ''यह तो मेरी हड्डियों की हड्डी है और मेरे मांस का मांस। इसका नाम 'नारी' होगा, क्योंकि यह तो नर से निकाली गयी है।

24) इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे।



दूसरा पाठ: इब्रानियों के नाम पत्र 2:9-11



9) परन्तु हम यह देखते हैं कि मृत्यु की यन्त्रणा सहने के कारण ईसा को महिमा और सम्मान का मुकुट पहनाया गया है। वह स्वर्गदूतों से कुछ ही छोटे बनाये गये थे, जिससे वह ईश्वर की कृपा से प्रत्येक मनुष्य के लिए मर जायें।

10) ईश्वर, जिसके कारण और जिसके द्वारा सब कुछ होता है, बहुत-से पुत्रों को महिमा तक ले जाना चाहता था। इसलिए यह उचित था कि वह उन सबों की मुक्ति के प्रवर्तक हो, अर्थात् ईसा को दुःखभोग द्वारा पूर्णता तक पहुँचा दे।

11) जो पवित्र करता है और जो पवित्र किये जाते हैं, उन सबों का पिता एक ही है; इसलिए ईसा को उन्हें अपने भाई मानने में लज्जा नहीं होती और वह कहते हैं -



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 10:2-16



2 फ़रीसी ईसा के पास आये और उनकी परीक्षा लेते हुए उन्होंने प्रश्न किया, “क्या अपनी पत्नी का परित्याग करना पुरुष के लिए उचित है?“

3) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया? ’’मूसा ने तुम्हें क्या आदेश दिया?’’

4) उन्होंने कहा, “मूसा ने तो त्यागपत्र लिख कर पत्नी का परित्याग करने की अनुमति दी’’।

5) ईसा ने उन से कहा, ’’उन्होंने तुम्हारे हृदय की कठोरता के कारण ही यह आदेश लिखा।

6) किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ ही से ईश्वर ने उन्हें नर-नारी बनाया;

7) इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और दोनों एक शरीर हो जायेंगे।

8) इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर हैं।

9) इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’

10) शिष्यों ने, घर पहुँच कर, इस सम्बन्ध में ईसा से फिर प्रश्न किया

11) और उन्होंने यह उत्तर दिया, ’’जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह पहली के विरुद्ध व्यभिचार करता है

12) और यदि पत्नी अपने पति का त्याग करती और किसी दूसरे पुरुष से विवाह करती है, तो वह व्यभिचार करती है’’।

13) लोग ईसा के पास बच्चों को लाते थे, जिससे वे उन पर हाथ रख दें; परन्तु शिष्य लोगों को डाँटते थे।

14) ईसा यह देख कर बहुत अप्रसन्न हुए और उन्होंने कहा, ’’बच्चों को मेरे पास आने दो। उन्हें मत रोको, क्योंकि ईश्वर का राज्य उन-जैसे लोगों का है।

15) मैं तुम से यह कहता हूँ- जो छोटे बालक की तरह ईश्वर का राज्य ग्रहण नहीं करता, वह उस में प्रवेश नहीं करेगा।’’

16) तब ईसा ने बच्चों को छाती से लगा लिया और उन पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया।


📚 मनन-चिंतन



ईश्वर ने समस्त सृष्टि की रचना की तथा वह उसे अच्छी लगी। किन्तु मनुष्य को देखकर उसने कहा, ’’अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं। इसलिए मैं उसके लिए एक उपयुक्त सहयोगी बनाऊँगा।’’ (उत्पत्ति 2:18) इसलिए ईश्वर ने स्त्री की रचना की। इस प्रकार नर और नारी एक साथ जीवन बिताने लगे। ये नर और नारी आदम और हेवा थे। ईश्वर ने आदम को हेवा ’मनोरंजन’ के लिए प्रदान नहीं किया बल्कि एक उपयुक्त साथी के रूप में प्रदान किया था।

इस रिश्ते की अनिवार्यता एवं महत्वता पर संत पौलुस कहते हैं, ’’पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे। यह एक महान रहस्य है।" (ऐफिसियों 5:31-32) फ़िर वे आगे कहते है, ’’फिर भी प्रभु के विधान के अनुसार स्त्री के बिना पुरुष कुछ नहीं है और पुरुष के बिना स्त्री कुछ नहीं। यदि पुरुष से स्त्री की सृष्टि हुई, तो पुरुष का जन्म स्त्री से होता है और सब कुछ का मूलस्त्रोत ईश्वर है।’’ (1 कुरिन्थियों 7:11-12) प्रभु येसु ने सभी आशंकाओं और अनियमिताओं पर पूर्ण विराम लगाते हुये इस रिश्ते पर ईश्वरीय इच्छा को पुनः इंगित कर कहा, ’’किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ से ही ईश्वर ने उन्हें नर-नारी बनाया; इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोडेगा और दोनों एक शरीर हो जायेंगे। इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर है। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोडा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’ (मारकुस 10:6-9)

इस प्रकार यह निर्विवादित सत्य है कि पति-पत्नी का रिश्ता ईश्वर द्वारा ठहराया संबंध है। इस संबंध की बुनियाद पर दोनों का जीवन, परिवार तथा समस्त मानवजाति का भविष्य टिका रहता है। प्रवक्ता ग्रन्थ कहता है, ’’मैं तीन बातें पसन्द करता हूँ, वे प्रभु और मनुष्यों को प्रिय हैं भाइयों का मित्रभाव, पड़ोसी का प्रेम और पति-पत्नी का सामंजस्य।’’ (प्रवक्ता 25:1-2) पति-पत्नी को एक-दूसरे को ईश्वर द्वारा प्रदत्त उपहार मानकर अपने गृहस्थ जीवन को जीना चाहिए। यदि वे एक-दूसरे को उपहार मानेगें तो एक-दूसरे का ख्याल भी रखेंगे। इस दृष्टिकोण से वे आपस में प्रेम का तालमेल स्थापित करेंगे जो ईश्वर को प्रिय है। इसके विपरीत यदि वे अपने वैवाहिक साथी को समझौता मानकर इसे झंझट समझेंगे तो वे अपने दाम्पत्य जीवन के बोझ में दब जायेंगे।

दाम्पत्य जीवन में एकता एवं सामंजस्य का रहस्य प्रेम है। संत पौलुस इस प्रेम की व्याखा करते हुये कहते है, ’’प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या करता है, न डींग मारता, न घमण्ड, करता है। प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। प्रेम न तो झुंझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है। वह दूसरों के पाप से नहीं, बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है। वह सब-कुछ ढाँक देता है, सब-कुछ पर विश्वास करता है, सब-कुछ की आशा करता है और सब-कुछ सह लेता है।...प्रेम का कभी अन्त नहीं होगा... प्रेम ही सब से महान् हैं।’’ (1 कुरि. 13:4-8,13)

इस प्रकार पति-पत्नी को प्रेम के इन गुणों- सहनशीलता, दया, विनम्रता, सद्व्यवहार, विश्वास, आशा आदि को एक-दूसरे के प्रति अपने व्यवहार में ढालना चाहिए। यदि वे एक-दूसरे के बदलने का इंतजार किये बिना स्वयं को की बदलने लगे तो भी उनका साथी उनके भले व्यवहार के कारण बदल जायेगा। ’’क्या जाने, हो सकता है कि पत्नी अपने पति की मुक्ति का कारण बन जाये और पति अपनी पत्नी की मुक्ति का कारण।’’ (1 कुरि. 7:16) इस बात को संत पेत्रुस भी अपने पहले पत्र में लिखते है, ’’पत्नियो! आप अपने पतियों के अधीन रहें। यदि उन में कुछ व्यक्ति अब तक सुसमाचार स्वीकार नहीं करते, तो वे आपका श्रद्धापूर्व तथा पवित्र जीवन देख कर शब्दों के कारण नहीं, बल्कि अपनी पत्नियों के आचरण के कारण विश्वास की ओर आकर्षित हो जायेंगे। (1पेत्रुस 3:1-2)

साधारणः पति-पत्नी अपने जीवन में इस पहलू पर ध्यान नहीं देते हैं कि उनका व्यवहार एक दूसरे को प्रभावित करता है। यदि पत्नी अपने पति के व्यक्तित्व की कमियों के बावजूद भी उसके प्रति सकारात्मकता प्रदर्शित करते हुए उससे अच्छा व्यवहार करे तो अवश्य वह अपने अच्छे व्यवहार से पति का हृदय जीत लेगी। इसके विपरीत जैसा साधारणः देखा जाता है कि दोनों ही एक दूसरे से एक निश्चित व्यवहार की मांग करते हुए रस्साकशी का जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में वे अपने दाम्पत्य जीवन में ईश्वर के उस महान रहस्य को नहीं पहचान पायेंगे जैसा की धर्मग्रंथ हमें बताता है।

पति एंव पत्नी दोनों को विवाह संस्कार को ईश्वर का ठहराया विधान मानकर एक-दूसरे के अभावों का प्रेम एवं एकता के साथ पूरा करना चाहिये तथा अपनी परेशानियों को विवाह के संस्कार के दायरे में ही देखना चाहिये तथा एक दूसरे से छूटकारा पाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये।



📚 REFLECTION



God created the whole universe and he liked it. But seeing the man, he said, "It is not good for a man to be alone. Therefore, I will make a suitable companion for him." (Genesis 2:18) So God created the woman. Thus, male and female started living together. These men and women were Adam and Eve. God did not provide Eve to Adam for 'entertainment' but as a suitable companion.

On the inevitability and importance of this relationship, Saint Paul says, "The man will leave his parents and live with his wife and they will become one body." This is a great mystery." (Ephesians 5:31-32) Then he goes on to say, "Yet according to the law of the Lord, a man is nothing without a woman, and a woman is nothing without a man. When created, a man is born of a woman, and God is the source of everything." (1 Corinthians 7:11-12)

The Lord Jesus, putting a complete stop to all the apprehensions and irregularities, again pointed out the divine will on this relationship and said, "But from the very beginning of creation God made them male and female; Because of this man will leave his parents and both will become one body. So now they are not two, but one body. Therefore, what God has joined, that man shall not separate.” (Mark 10:6-9)

Thus, it is an indisputable truth that the husband-wife relationship is a God-ordained relationship. On the basis of this relationship rests the life of both, the family and the future of all mankind. The book of Sirach says, "Three things I like are dear to the Lord and men; Friendship of brothers, love of neighbour, and harmony of husband and wife." (Sirach 25:1-2) Husband and wife ought to consider each other as a gift given by God, should live their married life.

If they treat each other as a gift, then they will also take care of each other. From this point of view they will establish the harmony of love which is dear to God. On the contrary, if they consider their matrimonial partner as a compromise and consider it a hassle, then they will be buried in the burden of their married life.

The secret of unity and harmony in married life is love. Saint Paul explains this love by saying, "Love is tolerant and kind. Love is neither jealous, nor bragging, nor proud. Love does not behave indecently. He does not seek his own interest. Love neither annoys nor keeps an account of evil. He is pleased not by the sins of others, but by their good conduct. It envelops everything, believes in everything, hopes for everything and bears everything. ... Love will never end... Love is the greatest of all. '' (1 Cor. 13:4-8,13)

Thus, husband and wife should inculcate these qualities of love – tolerance, kindness, humility, good behaviour, trust, hope, etc. in their behaviour towards each other. Even if they change themselves without waiting for each other to change, their partner will change because of their good behaviour. "Who knows, maybe the wife may become the cause of her husband's salvation and the husband the cause of his wife's salvation." (1 Cor. 7:16) Saint Peter also writes this in his first letter, "Wives! Be subject to your husbands. If some of them do not yet accept the gospel, they will be attracted to the faith not because of the words, but because of the conduct of their wives, seeing your reverent and holy life. (1 Peter 3:1-2)

It is simple that the husband and wife do not pay attention to this aspect in their life that their behaviour affects each other. If the wife behaves well in spite of the shortcomings of her husband's personality by showing positivity towards him, then she will surely win the heart of the husband by her good behaviour. On the contrary, it is seen that both are forced to lead a life of tug of war demanding a certain behaviour from each other.

In such a situation, they will not be able to recognize the great mystery of God in their married life as the scriptures tell us. Both husband and wife should fulfil each other's shortcomings with love and unity, considering the marriage ceremony as the ordained law of God and should see their problems within the scope of marriage ceremony and should not try to get rid of each other.


मनन-चिंतन - 2


हमारा प्रभु ईश्वर एक है, और ईश्वर में तीन जन हैं: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। यह हमें ईश्वर और उसमें समाहित पवित्र रिश्ते की विशेषता बतलाता हैं। पवित्र त्रित्व का रिश्ता एक पवित्र, गूढ, अटूट और एकता का रिश्ता है। आज के सुसमाचार में भी हम एक ऐसे रिश्ते से रूबरू होते है जो कि एक पवित्र रिश्ता है और इस रिश्ते से परिवार का निर्माण होता है। यह रिश्ता पति और पत्नी के बीच का रिश्ता है जो विवाह के द्वारा एक दूसरे से जुडते है। यह कलीसिया का एक पवित्र संस्कार है।

प्रभु ईश्वर ने सृष्टि-कार्य से अपना रिश्ता सृष्टि से बनाये रखा हैं: सृष्टिकर्ता-सृष्टि का रिश्ता, विशेष रूप से ईश्वर और मनुष्य का रिश्ता। उन्होनें हमें अपना स्वरूप बनाकर एक रिश्ते को एक नयी दिशा देकर एक अमिट रिश्ते को कायम किया हैं। परन्तु मनुष्य ने पाप में गिरकर अपने आप को इस रिश्ते से दूर कर दिया। फिर भी प्रभु ईश्वर ने कभी भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ा और हमेशा किसी न किसी प्रकार से इस रिश्ते को बनाये रखने की कोशिश की। ‘‘मैं तुम्हे अपनी प्रजा मानूँगा और तुम्हारा ईश्वर होऊॅंगा।’’(निर्ग0 6:7; यिर 30:22; 31:1,33; 7:23; उत्पत्ति 17:8, निर्ग0 29:45, एजे0 20:20)

आज के सुसमाचार में हम पति-पत्नि के रिश्ते के बीच में उलझन सम्बद्धित प्रश्न के बारे में सुनते है, जो कि फरीसियों द्वारा ईसा से पूछा गया। यह प्रश्न पति-पत्नी के रिश्ते को सुलझाने हेतु नहीं परंतु प्रभु ईसा की परीक्षा और उन्हे किसी प्रकार से फॅंसाने हेतु पूछा गया। ईसा के साथ यह कोई नयी बात नहीं थी क्योकि अक्सर फरीसी और शास्त्री उन्हें किसी न किसी प्रकार से फॅसाने की कोशिश किया करते थे। इस बार वे पति द्वारा पत्नी को त्यागने के विषय को लेकर ईसा के पास आये थे। जो कि मूसा द्वारा दिया गया था, ‘‘यदि कोई व्यक्ति किसी स्त्री से विवाह करे, बाद में वह उसे इसलिए नापसन्द करे कि वह उस में कोई लज्जाजनक बात पाता हो और उसे त्याग पत्र दे’’ (विधि विवरण 24:1)। प्रभु इसका जवाब देते हुए कहते है ‘‘उन्होनें तुम्हारे हृदय की कठोरता के कारण ही यह आदेश लिखा’’ अर्थात् यह जो नियम या आदेश था ईश्वर द्वारा नहीं अपितु मनुष्य द्वारा प्रेरित था। इस पर प्रभु येसु ईश्वर के नियम या ईश्वर के विचार को प्रकट करते हैं। प्रभु कहते है, ‘‘किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ ही से ईश्वर ने उन्हें नर-नारी बनाया; इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोडे़गा और दोनो एक शरीर हो जायेंगे। इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर हैं। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’ ईसा का यह कथन हमें निम्न बातें बताता है।

पहलाः पति-पत्नि का रिश्ता अभी का बनाया हुआ नहीं परन्तु बहुत पहले से बनाया हुआ है, ‘‘सृष्टि के प्रारंभ से ही’’पति-पत्नि के जन्म से भी बहुत पहले। क्योकि ईश्वर जब हमें गढ़ता है, बनाता है तो वह हमारे जन्म से पूर्व ही हमें जानता है और हमारे लिए र्निधारित योजनाए बनाता हमारी हित की योजनाएं, हमारे मंगलमय जीवन की योजनाएं, आशामय भविष्य की महत्वपूर्ण योजनाएं जिनमें से विवाह का रिश्ता भी एक है।

दूसराः एकता का रिश्ता- विवाह के बाद वे दो नहीं अपितु एक हो जाते है जिस प्रकार पवित्र त्रित्व एक है। इसलिए संत पौलुस एफेसियों के नाम अपने पत्र में पतियों से कहते है, ‘‘पति अपनी पत्नी को इस तरह प्यार करे, मानो वह उसका शरीर हो। कोई अपने शरीर से बैर नहीं करता। उल्टे, वह उसका पालन-पोषण करता और उसकी देख-भाल करता रहता है।’’(एफे0 5:28-29) प्रभु ईश्वर ने नारी को नर के अंग से ही बनाया, ‘‘तब प्रभु-ईश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में सुला दिया और जब वह सो गया, तो प्रभु ने उसकी पसली निकाल ली और उसकी जगह को मांस से भर दिया। इसके बाद प्रभु ने मनुष्य से निकाली हुई पसली से एक स्त्री को गढ़ा और उसे मनुष्य के पास ले गया’’ (उत्पत्ति 2:21,22)

तीसराः ईश्वर की इच्छा- ईश्वर और मनुष्य के विचार में बहुत फर्क है ‘‘प्रभु यह कहता है-तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं। जिस तरह आकाश पृथ्वी से ऊॅंचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊॅंचे हैं।’’ यह रिश्ता किसी मनुष्य द्वारा नहीं परंतु ईश्वर द्वारा बनाया हुआ है, ‘‘जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’ जिस रिश्ते को ईश्वर ने जोड़ा है, र्निधारित किया है उसे मनुष्य केवल अपने स्वार्थ के लिए या अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए या किसी भी स्वार्थी मतलब से अलग नहीं करे।

संत मत्ती का सुसमाचार इस विषय को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है। ’’मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि व्यभिचार के सिवा किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है।’’ (मत्ती 19:9) आज कल का ज़माना बहुत ही अलग है आजकल परित्याग या डिवोर्स आम बात होती जा रही हैं। हर छोटी से छोटी बात पर परिवार टूटते जा रहें है, पति-पत्नी में झगड़े, विवाद बढ़कर डिवोर्स का रूप ले रही है। आज कल डिवोर्स के कई कारण हो सकते हैः बीमारी, गरीबी, दहेज, शराब, ससुराल की कड़वाहट आदि परन्तु संत मत्ती का वचन स्पष्ट रूप से बताता है कि व्यभिचार के सिवा किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है। पति और पत्नी के बीच झगड़ा, टकरार, परेशानी, मुसीबत, सुख-दुःख तो आम बात है परंतु इनको लेकर परित्याग करना अर्थात् ईश्वर के समक्ष की गई प्रतीज्ञा का निरादर हैं। विवाह के समय पति-पत्नी ईश्वर के समक्ष यह वादा करते हैं कि -चाहे सुख हो या दुःख हर परिस्थ्तिति में मैं आपका या आपकी पति या पत्नी बना रहूँगा/रहूँगी। विवाह का रिश्ता एक पवित्रता भरा रिश्ता है जो तोड़ने के लिए नही परंतु निभाने के लिए बना हुआ है। जिस प्रकार मसीह और कलीसिया का रिश्ता है उसी प्रकार पतिपती और पत्नी का भी रिश्ता होना चाहिए। एक दूसरे के प्रति प्रेम और सर्मपण (एफे0 5:21-33)। यह रिश्ता दुख, या समस्या देखकर भागने का नहीं परन्तु अपने जीवन, प्रार्थना एवं श्रद्धापूर्वक जीवन द्वारा विपरीत परिस्थिती को अनुकुल स्थ्तिी बनाने की है। संत जोसफ, संत मोनिका, संत रीता, संत थोमस मोर, बालक येसु की संत तेरेसा के माता-पिता, संत लूईस और ज़ेली मार्टिन इसके ज्वलंत उदाहरण है। और यह सब उनके त्यागपूर्ण, पवित्रता एवं संघर्षपूर्ण जीवन की कहानी है। ‘‘पत्नियों! आप अपने पतियों के अधीन रहें। यदि उन में कुछ व्यक्ति अब तक सुसमाचार स्वीकार नहीं करते, तो वे आपका श्रद्धापूर्ण तथा पवित्र जीवन देख कर शब्दों के कारण नहीं, बल्कि अपनी पत्नियों के आचरण के कारण विश्वास की ओर आकर्षित हो जायेंगे।’’(1 पेत्रुस 3:1-2)।

आज का सुसमाचार हमें अलग होने का नही अपितु एक रहकर ईश्वरीय रिश्ते को अनुभव करने का निमंत्रण है।


✍Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

शनिवार, 02 अक्टूबर, 2021

 

शनिवार, 02 अक्टूबर, 2021

वर्ष का छ्ब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह

रक्षक स्वर्गदूत -अनिवार्य स्मृति


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पहला पाठ : निर्गमन ग्रन्थ 23:20-23



20) मैं एक दूत को तुम्हारे आगे-आगे भेजता हूँ। वह रास्तें में तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें उस स्थान ले जायेगा, जिसे मैंने निश्चित किया है।

21) उसका सम्मान करो और उसकी बातें सुनो। उसके विरुद्ध विद्रोह मत करो। वह तुम्हारा अपराध नहीं क्षमा करेगा, क्योंकि उसे मेरी ओर से अधिकार मिला है।

22) यदि तुम उसकी बातें मानोगे, तो मैं तुम्हारे शत्रुओं का शत्रु और तुम्हारे विरोधियों का विरोधी बनूँगा।

23) मेरा दूत तुम्हारे आगे-आगे चलेगा और तुम्हें अमोरियों, हित्तियों, परिज्जियों, कनानियों, हिव्वियों, तथा यबूसियों के देश पहुँचा देगा और मैं उनका सर्वनाश करूँगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:1-5; 1


1) उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, ’’स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?’’

2) ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर

3) कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

4) इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।

5) और जो मेरे नाम पर ऐसे बालक का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है।

10) ’’सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुम से कहता हूँ- उनके दूत स्वर्ग में निरन्तर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं।


📚 मनन-चिंतन



ईश्वर हमें कभी अकेला नहीं छोड़ते। उन्होंने कभी भी सीधे रास्ते और आसान जीत का वादा नहीं किया, लेकिन उनकी उपस्थिति और ताकत का आश्वासन हमें हमारे संघर्षों और जीवन की दुर्बलताओं के साथ लड़ाई में आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रोत्साहन और प्रेरणा प्रदान करते है।

ईश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि वह मार्ग में हमारी रक्षा करने के लिये हमारे आगे आगे चलेगा और हमें उस स्थान पर लाएगा जिसे ईश्वर ने तैयार किया है। यह जानना बहुत उत्साहजनक है कि ईश्वर हमारे आगे आगे जाते है; कि वे जानते है कि जीवन की यात्रा में आगे क्या है और वे हमें सुरक्षित घर पहुंचाएगे। ईश्वर ने अपने दूत को रास्ते में हमारी रक्षा करने के लिए भेजने का वादा किया। लेकिन हमें उसकी आवाज सुननी चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हम में से बहुत से लोग अपने जीवन में ईश्वर के वादों को देखने के लिए तरसते हैं लेकिन प्रभु की वाणी को सुनने से चूक जाते हैं।

ईश्वर ने यह भी वादा किया कि वे हमारे शत्रुओं का शत्रु और हमारे विरोधियों का विरोधी होगा। हमारा दुश्मन शैतान और उसके जाल हैं। जब हम अपने दूत के निर्देशों को सुनते हैं, तो हम उन प्रलोभनों और परेशानियों से निपटने के लिए शक्तिशाली हो जाते हैं जो शैतान हमारे रास्ते में डालता है। ईश्वर हमारे जीवन के हर चरण में हम पर नजर रख रहे हैं। वे हमारी कमजोरियों और उन क्षेत्रों को जानते है जहां हमें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी। इसलिए, हम सतर्क रहें और अपने रक्षक देवदूत से लगातार प्रार्थना करें कि वह हमारे मार्ग को रोशन करे, हमें सशक्त करे और हमारे सामने जाए। हम उसे ईश्वचन में सुनते हैं और अपने जीवन की दैनिक घटनाओं में उसका अनुभव करते हैं।



📚 REFLECTION



God never leaves us alone. He never promised a straight path and an easy victory but the assurance of his presence and strength supply us the constant encouragement and inspiration to move on in our struggles and battle with the infirmities of life.

God promised that he would go before us to guard us along the way and to bring us to the place which God prepared. It is very encouraging to know that God goes before us; that he knows what is ahead in the journey of life and that he will bring us safely home. God promised to send His angel to guard us along the way. But we must listen to His voice. This is very important because many of us long to see the promises of God in our lives but miss the part about listening to the voice of the Lord.

God also promised that he would be an enemy to our enemies and an adversary to our adversaries. Our enemy is Satan and his entrapments. When we listen to the instructions of our angel, we become powerful to deal with the temptations and troubles that the devil puts in our path. God is watching over us at every stage of our life. he knows our weaknesses and areas where we would need him most. Therefore, let us remain alert and pray constantly to our guardian angel to enlighten our path, empower us and go before us. We listen to him in the scripture and experience him in the daily events of our life.



मनन-चिंतन - 2


निर्गमन 23:20-21 में प्रभु का वचन कहता है, “मैं एक दूत को तुम्हारे आगे-आगे भेजता हूँ। वह रास्तें में तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें उस स्थान ले जायेगा, जिसे मैंने निश्चित किया है। उसका सम्मान करो और उसकी बातें सुनो।” 2 अक्टूबर 2014 को संत पापा फ्रांसिस ने सुबह के मनन-चिंतन में कहा, “हम सभी के पास एक स्वर्गदूत होता है जो हमेशा हमारे साथ रहता है, जो हमें कभी नहीं छोड़ता है और हमें अपना रास्ता नहीं खोने में मदद करता है। … जीवन एक यात्रा है, हमारा जीवन एक यात्रा है जो हमें उस स्थान तक ले जाती है जिसे प्रभु ने तैयार किया है। ... कोई भी अकेला नहीं चलता: कोई भी नहीं!" काथलिक परम्परा के अनुसार हरेक व्यक्ति की देखरख के लिए प्रभु ने एक स्वर्गदूत को नियुक्त किया है। हरेक विश्वासी के बगल में एक चरवाहे या रक्षक के रूप में वह संरक्षक दूत रहता है। हमारे संरक्षक दूत हमें संरक्षण प्रदान करते हैं, हमारे लिए और हमारी ओर से प्रार्थना करते हैं तथा हमें राह दिखाते हैं। हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक वे हमारी देखभाल करते तथा हमारे लिए ईश्वर के समक्ष मध्यस्थता करते हैं। इस धरती पर ही हमें वे हमारे साथ रह कर स्वर्ग की अनुभूति प्रदान करते हैं। (देखें काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा 336) प्रभु येसु कहते हैं, “सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुम से कहता हूँ - उनके दूत स्वर्ग में निरन्तर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं।“ (मत्ति 18:10) हमारे संरक्षक दूत हमेशा हमारे साथ रहते हैं, लेकिन वे उसी समय निरन्तर प्रभु ईश्वर के दर्शन करते हैं।




In Ex 23:20-21 we read, “Behold, I send an angel before you, to guard you on the way and to bring you to the place which I have prepared. Give heed to him and hearken to his voice”. On October 2, 2014 in his morning meditation Pope Francis said, “We all have an angel who is always beside us, who never abandons us and helps us not to lose our way. … life is a journey, our life is a journey that leads us to the place that the Lord has prepared. But, no one walks alone: no one!... “ According to Catholic Tradition God has assigned an angel to protect and guide every human being. He protects us, guides us, shows us the way to the goal that the Lord has set for us. The guardian angel also prays constantly for and on behalf of us. The Catechism of the Catholic Church (No.336) teaches us, “Beside each believer stands an angel as protector and shepherd leading him to life. Already here on earth the Christian life shares by faith in the blessed company of angels and men united in God”. Jesus says, “See that you do not despise one of these little ones; for I tell you that in heaven their angels always behold the face of my Father who is in heaven” (Mt 18:10). Our guardian angel stays with us; yet at the same time he has the vision of God.


✍ -Br. Biniush Topno


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शुक्रवार, 01 अक्टूबर, 2021

 

शुक्रवार, 01 अक्टूबर, 2021

वर्ष का छ्ब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह

लिस्यु की संत तेरेसा -अनिवार्य स्मृति

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पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 66:10-14


10) “येरूसालेम के साथ आनन्द मनाओ। तुम, जो येरूसालेम को प्यार करते हो, उसके कारण उल्लास के गीत गाओ। तुम, जो उसके लिए विलाप करते थे, उसके कारण आनन्दित हो जाओ,

11) जिससे तुम उसकी संतान होने के नाते सान्त्वना का दूध पीते हुए तृप्त हो जाओ और उसकी गोद में बैठ कर उसकी महिमा पर गौरव करो“;

12) क्योंकि प्रभु यह कहता है, “मैं शान्ति को नदी की तरह और राष्ट्रों की महिमा को बाढ़ की तरह येरूसालेम की ओर बहा दूँगा। उसकी सन्तान को गोद में उठाया और घुटनों पर दुलारा जायेगा।

13) जिस तरह माँ अपने पुत्र को दिलासा देती है, उसी तरह मैं तुम्हें सान्त्वना दूँगा। तुम्हें येरूसालेम से दिलासा मिलेगा।“

14) तुम्हारा हृदय यह देख कर आनन्दित हो उठेगा, तुम्हारा हड्डियाँ हरी-भरी घास की तरह लहलहा उठेंगी। प्रभु अपने सेवकों के लिए अपना सामर्थ्य, किंतु अपने शत्रुओं पर अपना क्रोध प्रदर्शित करेगा।


दूसरा पाठ :कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 13:4-13


4) प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या करता है, न डींग मारता, न घमण्ड, करता है।

5) प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। प्रेम न तो झुंझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है।

6) वह दूसरों के पाप से नहीं, बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है।

7) वह सब-कुछ ढाँक देता है, सब-कुछ पर विश्वास करता है, सब-कुछ की आशा करता है और सब-कुछ सह लेता है।

8) भविष्यवाणियाँ जाती रहेंगी, भाषाएँ मौन हो जायेंगी और ज्ञान मिट जायेगा, किन्तु प्रेम का कभी अन्त नहीं होगा;

9) क्योंकि हमारा ज्ञान तथा हमारी भविष्यवाणियाँ अपूर्ण हैं

10) और जब पूर्णता आ जायेगी, तो जो अपूर्ण है, वह जाता रहेगा।

11) मैं जब बच्चा था, तो बच्चों की तरह बोलता, सोचता और समझता था; किन्तु सयाना हो जाने पर मैंने बचकानी बातें छोड़ दीं।

12) अभी तो हमें आईने में धुँधला-सा दिखाई देता है, परन्तु तब हम आमने-सामने देखेंगे। अभी तो मेरा ज्ञान अपूर्ण है; परन्तु तब मैं उसी तरह पूर्ण रूप से जान जाऊँगा, जिस तरह ईश्वर मुझे जान गया है।

13) अभी तो विश्वास, भरोसा और प्रेम-ये तीनों बने हुए हैं। किन्तु उनमें प्रेम ही सब से महान् हैं।


सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:1-4


1) उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, ’’स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?’’

2) ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर

3) कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

4) इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।


📚 मनन-चिंतन


शिष्य अक्सर महानता के प्रश्न के बारे में चिंतित रहते थे। ऐसा लगता है कि वे यह प्रश्न यह सोचकर पूछते हैं कि येसु ने उनमें से एक को पहले ही सबसे महान के रूप में चुन लिया है, या मानो वे चाहते हैं कि येसु ये निर्णय लें। वे आपस में बहस करते थे कि कौन सबसे बड़ा है। शिष्य जानना चाहते थे कि येसु के प्रशासन में सर्वोच्च पद कौन धारण करेगा। उन्होंने सम्मान तथा पद के सांसारिक साम्राज्य का सपना देखा।

येसु ने उनसे कहा कि जब तक तुम छोटे बच्चे जैसे नहीं बन जाते, तब तक तुम राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। यह शायद शिष्यों के लिए एक बड़ी निराशा की बात थी। बच्चों का समाज में कोई स्थान नहीं था। उन्हें जिम्मेदारी और संपत्ति के रूप में अधिक माना जाता था। येसु ने कहा कि हमें राज्य में प्रवेश करने के लिए इस प्रकार की विनम्रता की जगह लेनी होगी, राज्य में महानतम की बात को तो छोड़ ही दें।

बच्चे धमकाते नहीं हैं; लोग अँधेरे में भी उनसे मिलने से नहीं डरते। येसु एक ऐसे व्यक्ति थे जिनसे लोग मिलने से नहीं डरते थे। उनकी उपस्थिति खतरनाक नहीं थी। बच्चे वास्तव में धोखा भी नहीं देते। येसु भी कभी धोखा धडी की बात नहीं करते थे। येसु चाहते है कि हमारा स्वाभाव भी ऐसा बने।

येसु एक गैर-भ्रामक व्यक्ति थे। बच्चों की तरह, येसु नम्रता के एक आदर्श उदाहरण थे और सामाजिक स्थिति के बारे में बेफिक्र थे। बच्चे विनम्र होने की कोशिश नहीं करते हैं क्योंकि वे ऐसे होते ही हैं। चार्ल्स स्पर्जन इसे खूबसूरती से कहते हैं, "विनम्रता की नकल बीमार करती है; किन्तु वास्तविकता आकर्षक है।"

एक व्यक्ति जो वास्तव में राज्य में सबसे महान था वह येसु मसीह है। इसका अर्थ है कि येसु स्वयं एक छोटे बच्चे की तरह विनम्र थे। उन्हें अपनी हैसियत की चिंता नहीं थी। उन्हें ध्यान का केंद्र नहीं बनना था। वे धोखेबाज नहीं थे और उसके पास जाने से डर नहीं लगता था।

इसलिए, जब येसु ने उन्हें बच्चों की तरह बनने के लिए कहा, तो वह वास्तव में उन्हें अपने जैसा बनने के लिए कह रहे थे।



📚 REFLECTION



The disciples were often concerned about the question of greatness. They seem to ask this question thinking that Jesus has already chosen one of them as greatest, or as if they wanted Jesus to decide among them. They used to argue among themselves about which one was the greatest. The disciples wanted to know who would hold the highest position in the administration Jesus would soon establish. They dreamt of honours and offices, a worldly empire, the kingdoms of the earth.

Jesus told them that unless they become as little children you would not enter the kingdom. This was probably a great disappointment to the disciples. Children were no one in the society. They were regarded more as responsibility and property than individuals. Jesus said we have to take this kind of humble place to enter the kingdom, leave alone the greatest in the kingdom.

Children are not threatening; people are not afraid of meeting them even in the dark. Jesus was someone people were not afraid to meet. His presence was non-threatening. Children really do not deceive.

Jesus was such a non-deceptive person. Like children Jesus was an ideal example of humility and was unconcerned for social status. Children do not try to be humble but they are so. Charles Spurgeon beautifully puts it, “The imitation of humility is sickening; the reality is attractive.”

The one Man who was actually the greatest in the kingdom is Jesus Christ. This means that Jesus Himself was humble like a little child. He was not concerned about his own status. He did not have to be the center of attention. He was not deceptive and He didn’t have an intimidating presence.

So, when Jesus tells them to became like children, he was in fact telling them to be like him.



मनन-चिंतन - 2


प्रभु येसु अपने वचनों से प्रमाणित करते हैं कि स्वर्गराज्य के मापदंड और इस दुनिया के मापदंड में ज़मीन-आसमान का फ़रक है। जो इस दुनिया के सामने बड़े होते हैं, वे स्वर्गराज्य में बडे नहीं होते हैं। आशीर्वचनों (मत्ती 5:1-8) तथा अमीर और लाज़रूस के दृष्टान्त (लूकस 16:19-31) में यह बात हमारे सामने आती है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रभु एक बालक को शिष्यों के बीच खड़ा कर कहते हैं, “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।” बच्चे मासूम होते हैं। वे बड़ी जिज्ञासा रखते हैं। वे सब कुछ जानना चाहते हैं। वे सभी प्रकार के ज्ञान के लिए अपने हृदय तथा अपने मन-मस्तिष्क को खुले रखते हैं। वे अपने विरुध्द किये गये अपराधों को जल्दी ही भूल जाते हैं। ये सब गुण आध्यात्मिकता में आगे बढ़ने के लिए विश्वासियों की सहायता करते हैं।




Jesus testifies with his words that the yardsticks of the Kingdom of God and the yardsticks of the world are entirely different. Those who are great in the eyes of the world are small in the Kingdom of God and vice versa. In the beatitudes (cf. Mt 5:1-8) and in the parable of the rich man and Lazarus (Lk 16:19-31) this matter becomes clear to us. Taking this teaching further, Jesus makes a child stand in the midst of the disciples and tells them, “unless you change and become like little children you will never enter the kingdom of Heaven. And so, the one who makes himself as little as this little child is the greatest in the kingdom of Heaven.” Children are innocent. They are eager to know and learn. They keep their heart and the mind open to all types of knowledge. They easily forget the offences committed against them. All these qualities are indubitably helpful to the disciples of Christ.


✍ -Br. Biniush Topno


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गुरुवार, 30 सितम्बर, 2021 वर्ष का छ्ब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 30 सितम्बर, 2021

वर्ष का छ्ब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : नहेम्या का ग्रन्थ 8:1-12


1) समस्त इस्राएली जलद्वार के सामने के चैक में एकत्र हुए और उन्होंने एज़्रा से निवेदन किया कि वह प्रभु द्वारा इस्राएल को प्रदत्त मूसा की संहिता का ग्रन्थ ले आये।

2) पुरोहित एज्ऱा सभा में संहिता का ग्रन्थ ले आया। सभा में पुरुष, स्त्रियाँ और समझ सकने वाले बालक उपस्थित थे। यह सातवें मास का पहला दिन था।

3) उसने सबेरे से ले कर दोपहर तक जलद्वार के सामने के चैक में स्त्री-पुरुषों और समझ सकने वाले बालकों को ग्रन्थ पढ़ कर सुनाया। सब लोग संहिता का ग्रन्थ ध्यान से सुनते रहे।

4) शास्त्री एज़ा विशेष रूप से तैयार किये हुए लकड़ी के मंच पर खड़ा था। उसकी दाहिनी और मत्तित्या, शेमा, अनाया, ऊरीया, हिलकीया और मासेया थे और उसकी बायीं ओर पदाया, मीशाएल, मलकीया, हाशुम, हशबद्दाना, ज़कर्या और मशुल्लाम थे।

5) एज्ऱा लोगों से ऊँची जगह पर था। उसने सबों के देखने में ग्रन्थ खोल दिया। जब ग्रन्थ खोला गया, तो सारी जनता उठ खड़ी हुई।

6) तब एज्ऱा ने प्रभु, महान् ईश्वर का स्तुतिगान किया और सब लोगों ने हाथ उठा कर उत्तर दिया, "आमेन, आमेन!" इसके बाद वे झुक गये और मुँह के बल गिर कर उन्होंने प्रभु को दण्डवत् किया।

7) इसके बाद येशूआ, बानी, शेरेब्या, यामीन, अक्कूब, शब्बतय, होदीया, मासेया, कलीटा, अज़र्या, योज़ाबाद, हानान और पलाया, इन लेवियों ने लोगों को संहिता का अर्थ समझाया और वे खड़े हो कर सुनते रहे।

8) उन्होंने ईश्वर की संहिता का ग्रन्थ पढ़ कर सुनाया, इसका अनुवाद किया और इसका अर्थ समझाया, जिससे लोग पाठ समझ सकें।

9) इसके बाद राज्यपाल, नहेम्या, याजक तथा शास्त्री एज़्रा और लोगों को समझाने वाले लेवियों ने सारी जनता से कहा, "यह दिन तुम्हारे प्रभु-ईश्वर के लिए पवित्र है। उदास हो कर मत रोओ"; क्योंकि सब लोग संहिता का पाठ सुन कर रोते थे।

10) तब एज्ऱा ने उन से कहा, "जा कर रसदार मांस खाओ, मीठी अंगूरी पी लो और जिसके लिए कुछ नहीं बन सका, उसके पास एक हिस्सा भेज दो; क्योंकि यह दिन हमारे प्रभु के लिए पवित्र है। उदास मत हो। प्रभु के आनन्द में तुम्हारा बल है।"

11) लेवियों ने यह कहते हुए लोगों को शान्त कर दिया, "शान्त रहो, क्योंकि यह दिन पवित्र है। उदास मत हो।"

12) तब सब लोग खाने-पीने गये। उन्होंने दूसरों के पास हिस्से भेज दिये और उल्लास के साथ आनन्द मनाया; क्योंकि उन्होंने अपने को दी हुई शिक्षा को समझा था।



सुसमाचार : लूकस 10:1-12


1) इसके बाद प्रभु ने अन्य बहत्तर शिष्य नियुक्त किये और जिस-जिस नगर और गाँव में वे स्वयं जाने वाले थे, वहाँ दो-दो करके उन्हें अपने आगे भेजा।

2) उन्होंने उन से कहा, "फ़सल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं; इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।

3) जाओ, मैं तुम्हें भेडि़यों के बीच भेड़ों की तरह भेजता हूँ।

4) तुम न थैली, न झोली और न जूते ले जाओ और रास्तें में किसी को नमस्कार मत करो।

5) जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ’इस घर को शान्ति!’

6) यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।

7) उसी घर में ठहरे रहो और उनके पास जो हो, वही खाओ-पियो; क्योंकि मज़दूर को मज़दूरी का अधिकार है। घर पर घर बदलते न रहो।

8) जिस नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो जो कुछ तुम्हें परोसा जाये, वही खा लो।

9) वहाँ के रोगियों को चंगा करो और उन से कहो, ’ईश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ गया है’।

10) परन्तु यदि किसी नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत नहीं करते, तो वहाँ के बाज़ारों में जा कर कहो,

11 ’अपने पैरों में लगी तुम्हारे नगर की धूल तक हम तुम्हारे सामने झाड़ देते हैं। तब भी यह जान लो कि ईश्वर का राज्य आ गया है।’

12) मैं तुम से यह कहता हूँ - न्याय के दिन उस नगर की दशा की अपेक्षा सोदोम की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।


मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में पुनः प्रभु येसु अपने बहत्तर शिष्यों को दो-दो करके ईश्वर का राज्य सुनाने और चंगाई करने भेजते हुये कहते है मै तुम्हें भेड़ियों के बीच भेड़ों की तरह भेजता हॅूं। भेडिया एक खूंखार जंगली जानवर है वहीं भेड़ निर्मल निर्दोष जानवर है। प्रभु को मालूम था कि संसार में लोग भेडियें के समान है इस पर भी वे अपने शिष्यों को भेड़ियों के समान नही परंतु एक भेड़ के समान भेजते है। संसार में कहावत है लोहा लोहे को काटता है अर्थात् अगर हमें दुश्मन को हराना है तो हमें उसके समान या उससे भी अधिक शक्तिशाली बनना है। परंतु प्रभु का दूसरा नजरियॉं है- प्रभु जानते थे कि नफरत से नफरत को नहीं हराया जा सकता, शत्रुता को शत्रुता से नहीं हराया जा सकता, कोध्र को कोध्र से नहीं हराया जा सकता परंतु दुश्मन को प्रेम से दोस्त बनाया जा सकता है जो अत्याचार करते है उनके लिए प्रार्थना करके उनको उनके पापो से बचाया जा सकता है। इसलिए वे उन्हें भेड़ के समान बिना संसारिक चीज़ों पर आश्रित हुये संसार में भेजते है क्योंकि देने वाला तो ईश्वर है।



📚 REFLECTION


In today’s gospel Jesus once again sends his 72 disciples two by two to proclaim God’s Kingdom and to heal by saying to them. Go on your way. See, I am sending you out like lambs into the midst of wolves. Wolf is a ravaneous animal whereas lamb is a simple and innocent animal. Jesus knew that people in the world be like the wolves even then also he sends his disciples not as a wolf but as a lamb. There is a saying in the world that Iron cuts iron that means to say if we want to defeat an enemy then we have to become strong like him or even stronger than him. But Jesus had different view- He knew that hatred cannot be defeated by hatred, enimity cannot be defeated by enemity, anger cannot be defeated by anger but an enemy can become a friend by love and those who persecute us can be saved from their sins by praying for them. That is why he sends them in the world without depending on the things of the world because the provider is God himself.


✍ -Br. Biniush Topno


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बुधवार, 29 सितम्बर, 2021 संत मिखाएल, गाब्रिएल और रफाएल - महादूत

 

बुधवार, 29 सितम्बर, 2021
संत मिखाएल, गाब्रिएल और रफाएल - महादूत

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पहला पाठ : दानिएल 7:9-10, 13-14



9) मैं देख ही रहा था कि सिंहासन रख दिये गये और एक वयोवृद्ध व्यक्ति बैठ गया। उसके वस्त्र हिम की तरह उज्जवल थे और उसके सिर के केश निर्मल ऊन की तरह।

10) उसका सिंहासन ज्वालाओं का समूह था और सिहंासन के पहिये धधकती अग्नि। उसके सामने से आग की धारा बह रही थी। सहस्रों उसकी सेवा कर रहे थे। लाखों उसके सामने खड़े थे। न्याय की कार्यवाही प्रारंभ हो रही थी। और पुस्तकें खोल दी गयीं।

13) तब मैंने रात्रि के दृश्य में देखा कि आकाश के बादलों पर मानवपुत्र-जैसा कोई आया। वह वयोवृद्ध के यहाँ पहुँचा और उसके सामने लाया गया।

14) उसे प्रभुत्व, सम्मान तथा राजत्व दिया गया। सभी देश, राष्ट्र और भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी उसकी सेवा करेंगे। उसका प्रभुत्व अनन्त है। वह सदा ही बना रहेगा। उसके राज्य का कभी विनाश नहीं होगा।



अथवा - पहला पाठ : प्रकाशना 12:7-12अ


7) तब स्वर्ग में युद्ध छिड़ गया। मिखाएल और उसके दूतों को पंखदार सर्प से लड़ना पड़ा। पंखदार सर्प और उसके दूतों ने उनका सामना किया,

8) किन्तु वे नहीं टिक सके। और स्वर्ग में उनके लिए कोई स्थान नहीं रहा।

9) तब वह विशालकाय पंखदार सर्प वह पुराना सांप, जो इबलीस या शैतान कहलाता और सारे संसार को भटकाता है- अपने दूतों के साथ पृथ्वी पर पटक दिया गया।

10) मैंने स्वर्ग में किसी को ऊँचे स्वर से यह कहते सुना, ’अब हमारे ईश्वर की विजय, सामर्थ्य तथा राजत्व और उसके मसीह का अधिकार प्रकट हुआ है; क्योंकि हमारे भाइयों का वह अभियोक्ता नीचे गिरा दिया गया है, जो दिन-रात ईश्वर के सामने उस पर अभियोग लगाया करता था।

11) "वे मेमने के रक्त और अपने साक्ष्य के द्वारा उस पर विजयी हुए, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का मोह छोड़ कर मृत्यु का स्वागत किया;

12) "इसलिए स्वर्ग और उसके निवासी आनन्द मनायें। किन्तु धिक्कार तुम्हें, ऐ पृथ्वी और समुद्र! क्योंकि शैतान, यह जान कर कि मेरा थोड़ा समय ही शेष है, तीव्र क्रोध के आवेश में तुम पर उतर आया है।"



सुसमाचार :योहन 1:47-51



47) ईसा ने नथानाएल को अपने पास आते देखा और उसके विषय में कहा, "देखो, यह एक सच्चा इस्राएली है। इस में कोई कपट नहीं।"

48) नथानाएल ने उन से कहा, "आप मुझे कैसे जानते हैं?" ईसा ने उत्तर दिया, "फिलिप द्वारा तुम्हारे बुलाये जाने से पहले ही मैंने तुम को अंजीर के पेड़ के नीचे देखा"।

49) नथानाएल ने उन से कहा, "गुरुवर! आप ईश्वर के पुत्र हैं, आप इस्राएल के राजा हैं"।

50) ईसा ने उत्तर दिया, "मैंने तुम से कहा, मैंने तुम्हें अंजीर के पेड़ के नीचे देखा, इसीलिए तुम विश्वास करते हो। तुम इस से भी महान् चमत्कार देखोगे।"

51) ईसा ने उस से यह भी कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ- तुम स्वर्ग को खुला हुआ और ईश्वर के दूतों को मानव पुत्र के ऊपर उतरते-चढ़ते हुए देखोगे"।



मनन-चिंतन


आज हम महादूतों- संत मिखाएल, गाब्रिएल और रफाएल का पर्व मनाते है। दूतगण दिव्य प्राणी है जो ईश्वर की स्तुति एवं मनुष्यों की संसार में मदद करते है। स्वर्ग में निरंतर दूतों द्वारा ईश्वर की स्तुति-आराधना, सेवा एवं आदार सम्मान किया जाता है। वे स्वर्गिक प्राणी ईश्वर की परिचर्या में लगे रहते है। तथा इस पृथ्वी पर मनुष्यों को ईश्वर के पथ पर चलने, शैतान की शक्तियों से लड़ने एवं प्रभु का संदेश समझनें में मदद करते हैं।

इन दूतांे में तीन दूत प्रमुख है जिन्हें हम महादूत भी कहते है और वे संत मिखाएल, संत गाब्रिएल एवं संत रफाएल। संत मिखाएल को अधिकतर रक्षक के रूप मंे जाना जाता है जो शैतान और उसके दूत से लड़कर हमारी रक्षा करता है। संत गाब्रिएल को संदेशवाहक के रूप में जाना जाता है जो ईश्वर का संदेश हम तक पहुॅचाने में मदद करता है जिस प्रकार उन्होंने मरियम के लिए ईश्वर का संदेश सुनाया था। संत रफाएल को एक रोगहारक के रूप में जाना जाता है जो मनुष्यों को जीवन के रास्ते में साथ देता है एवं चंगाई दिलाने में मदद करता है। ये तीन महादूत ईश्वर के प्रमुख है एवं निरंतर ईश्वर के राज्य फैलने में मनुष्यों की मदद करते है। हमारा जीवन इनकी मदद से और भी संुदर एवं ईश्वरीय राज्य फैलाने में सफल हो। आमेन!



📚 REFLECTION



Today we celebrate the feast of St. Michael, St. Gabriel and St. Raphael the Archangels of God. Angels are divine being who always praises God and helps the people in the world. In heaven there is a continuous praise and worship, serving and adoration of God by the angels. These heavenly beings are always at the service of God. And they help people in this world to walk in the path of God, to fight against evil powers and to understand God’s message.

Among the angels these Archangels that is to say St. Michael, St. Gabriel and St. Raphael are the main or chief angels. St. Michael is known as the protector who fights and protects us from satan and his angels. St. Gabriel is known as the God’s Messenger who brings God’s message to us as he brought the message of God to Mary in the event of Annuciation. St. Raphael is known as the Healer who accompanies the people on the way of life and helps in the healing. These three Archangels are the main angels of God and continuous help people in spreading God’s Kingdom. With the help of them may our lives become more beautiful and a success in spreading God’s Kingdom. Amen!


✍ -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, 28 सितम्बर, 2021

 

मंगलवार, 28 सितम्बर, 2021

वर्ष का छ्ब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : ज़करिया 8:20-23


20) "विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है- राष्ट्र तथा महानगरों के निवासी फिर आयेंगे।

21) एक नगर के लोग दूसरे नगर के लोगों के पास जा कर कहेंगे, ’आइए, हम प्रभु की कृपा माँगने चलें; हम विश्वमण्डल के प्रभु के दर्शन करने जायें। मैं तो जा रहा हूँ।’

22) इस प्रकार बहुसंख्यक लोग और शक्तिशाली राष्ट्र विश्वमण्डल के प्रभु के दर्शन करने और प्रभु की कृपा माªगने के लिए येरूसालेम आयेंगे।

23) विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है- उन दिनों राष्ट्रों में प्रचलित सभी भाषाएँ बोलने वाले दस मनुष्य एक यहूदी की चादर का पल्ला पकडेंगे और कहेंगे, ’हम आप लोगों के साथ चलना चाहते है, क्योंकि हमने सुना है कि ईश्वर आप लोगों के साथ है’।"



सुसमाचार : सन्त लूकस 9:51-56


51) अपने स्वर्गारोहण का समय निकट आने पर ईसा ने येरूसालेम जाने का निश्चय किया

52) और सन्देश देने वालों को अपने आगे भेजा। वे चले गये और उन्होंने ईसा के रहने का प्रबन्ध करने समारियों के एक गाँव में प्रवेश किया।

53) लोगों ने ईसा का स्वागत करने से इनकार किया, क्योंकि वे येरूसालेम जा रहे थे।

54) उनके शिष्य याकूब और योहन यह सुन कर बोल उठे, "प्रभु! आप चाहें, तो हम यह कह दें कि आकाश से आग बरसे और उन्हें भस्म कर दे"।

55) पर ईसा ने मुड़ कर उन्हें डाँटा

56) और वे दूसरी बस्ती चले गये।


मनन-चिंतन



तिरस्कार जीवन की ऐसी सच्चाई है जिसे जीवन में हर किसी को सामना करना पड़ता है क्योंकि यह जरूरी नहीं कि हर कोई हमारा स्वागत सत्कार करें। यहीं प्रभु येसु के साथ भी हुआ उन्हें अपने स्वयं के नगर के लोगों से तिरस्कार सहना पड़ा, फरीसी शास्त्री से तिरस्कार सहना पड़ा, गेरासेनियों के लोगो से तिरस्कार सहना पड़ा और आज के सुसमाचार में येसु को समारियों से तिरस्कार सहना पड़ा। परंतु येसु ने कभी भी उनका तिरस्कार करने वालो का बुरा नहीं चाहा परंतु उनका भला ही चाहा। जिस प्रकार वे कू्रस पर टॅंगे होने पर भी उनका अपमान करने वालों के लिए प्रार्थना करते है, ‘‘पिता! इन्हें क्षमा कर क्योंकि यह नहीं जानते कि क्या कर रहें है।’’ यह स्वभाव ईश्वर का स्वभाव को दर्शाता है जो भले और बुरे दोनो पर सूर्य उगाता तथा धर्मियों और अधर्मियों दोनो पर पानी बरसाता है।



📚 REFLECTION



Rejection is that reality of life which everyone has to face in their lives because it is not necessary that all will welcome us or all will be good to us. This happed with Jesus also; He bore the rejections of the people from his own home town, rejection from Pharisees and Scribes, rejection from the people of Gerasenes and in today’s gospel Jesus was rejected by the people of Samaria. But Jesus never thought of bad for the people who rejected him but instead thought only good for them. As being hung on the Cross he prays for those who humiliated him, “Father, forgive them; for they do not know what they are doing.” This nature reflects the nature of God who makes his sun rise on the evil and on the good, and sends rain on the righteous and on the unrighteous.


✍ -Br. Biniush Topno


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सितंबर 27 संत विन्सेंट डी पॉल

 

सितंबर 27

संत विन्सेंट डी पॉल




संत विन्सेंट डी पॉल का जन्म 24 अप्रैल, 1581 को फ्रांसीसी गांव पौय में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। उनकी पहली औपचारिक शिक्षा फ्रांसिसियों द्वारा प्रदान की गई थी। उन्होंने इतना अच्छा किया कि उन्हें पास के एक धनी परिवार के बच्चों को पढ़ाने के लिए काम पर रखा गया। उन्होंने टूलूज विश्वविद्यालय में अपनी औपचारिक पढ़ाई जारी रखने के लिए अध्यापन से अर्जित धन का उपयोग किया जहां उन्होंने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया।

उन्हें सन 1600 में पुरोहिताभिषेक दिया गया था और वे कुछ समय के लिए टूलूज में ही रहे। 1605 में, मार्सिले से नारबोन की यात्रा करने वाले एक जहाज पर, उन्हें पकड़ लिया गया, ट्यूनिस लाया गया और दास के रूप में बेचा गया। दो साल बाद वे अपने मालिक के साथ भागने में सफल रहे और दोनों फ्रांस लौट आए।

संत विन्सेंट डी पॉल अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए एविग्नन और बाद में रोम गए। वहाँ रहते हुए वे काउंट ऑफ गोगनी के याजक वर्ग बन गए और उन्हें जरूरतमंद गरीबों को पैसे बांटने का प्रभारी बनाया गया। वे थोड़े समय के लिए क्लिची में एक छोटे से पल्ली के पल्ली पुरोहित बने, साथ में उन्होंने एक शिक्षक और आध्यात्मिक निर्देशक के रूप में भी काम किया।

उस समय से उन्होंने अपना जीवन प्रचार मिशनों और गरीबों को राहत प्रदान करने में बिताया। उन्होंने उनके लिए अस्पताल भी स्थापित किए। यह काम उनके लिए जुनून बन गया। बाद में उन्होंने अपनी दिलचस्पी और प्रेरिताई को कैदीयों तक बढ़ा दिया। इन आत्माओं के बीच प्रचार करने और उनकी सहायता करने की आवश्यकता इतनी महान थी और इन मांगों को पूरा करने की उनकी अपनी क्षमता से परे कि उन्होंने मदद करने के लिए लेडीज ऑफ चैरिटी, एक सामान्य महिला संस्थान की स्थापना की, साथ ही पुरोहितों का एक धार्मिक संस्थान - पुरोहितों की मिशन मंडली, जिन्हें आमतौर पर अब विन्सेंशियन के रूप में जाना जाता है।

यह उस समय की बात है जब फ्रांस में बहुत से पुरोहित नहीं थे और वहां जो पुरोहित थे, वे न तो सुसंगठित थे और न ही अपने जीवन के प्रति वफादार थे। विन्सेंट ने याजक वर्ग को सुधारने में मदद की जिस तरीके से उन्हें निर्देश दिया जाता था और पौरोहित्य के लिए तैयार किया जाता था। उन्होंने इसे पहले रिट्रीट की प्रस्तुति के माध्यम से और बाद में हमारे आधुनिक दिन के सेमिनरी के लिए एक अग्रदूत विकसित करने में मदद करके किया। एक समय उनका समुदाय 53 उच्च स्तरीय सेमिनरी का निर्देशन कर रहा था। पुरोहितों और आम लोगों के लिए खुले उनके रिट्रीट में इतनी अच्छी तरह से भाग लिया गया था कि ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने ‘‘अपने पिछले 23 वर्षों में 20,000 से अधिक लोगों के बीच ख्रीस्तीय भावना का संचार किया।‘‘

86 देशों में लगभग 4,000 सदस्यों के साथ विंसेंशियन धर्मसमाजी आज हमारे साथ हैं। विंसेंशियन पुरोहितों के अपने तपस्वी धर्मसंघ के अलावा, संत विंसेंट ने संत लुईस डी मारिलैक के साथ डॉटर्स ऑफ चैरिटी की स्थापना की। आज 18,000 से अधिक धर्मबहने 94 देशों में गरीबों की जरूरतों को पूरा कर रही हैं। 27 सितम्बर, 1660 को जब पेरिस में उनकी मृत्यु हुई तब वे अस्सी वर्ष के थे। वे ‘‘फ्रांसीसी कलीसिया के सफल सुधारक के प्रतीक बन गए थे‘‘। संत विंसेंट को कभी-कभी ‘‘द एपोसल ऑफ चैरिटी‘‘ और ‘‘गरीबों के पिता‘‘ के रूप में जाना जाता है।

मृत्यु के बाद भी उनका हृदय अभ्रष्ट रहा और उसे कॉन्वेंट ऑफ द सिस्टर्स ऑफ चैरिटी में पाया जा सकता है और उनकी हड्डियों को चर्च ऑफ द लाजरिस्ट मिशन में स्थित संत के मोम के पुतले में जड़ा गया है। दोनों जगह पेरिस, फ्रांस में स्थित हैं।

संत विंसेंट को दो चमत्कारों के लिए श्रेय दिया गया है - अल्सर से ठीक हुई एक मठवासिनी और लकवा से ठीक हुई एक आम महिला। 16 जून, 1737 को उन्हें संत पिता क्लेमेंट तेरहवें द्वारा संत घोषित किया गया था। यह बताया गया है कि संत विंसेंट ने अपने जीवनकाल में 30,000 से अधिक पत्र लिखे थे और 18वीं शताब्दी में लगभग 7,000 पत्र एकत्र किए गए थे। उनके पत्रों के कम से कम पांच संग्रह आज अस्तित्व में हैं।



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