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शुक्रवार, 30 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 30 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : लेवी 23:1, 4-11, 15-16, 27, 34-37


1) प्रभु ने मूसा से कहा,

4) प्रभु के पुण्य-पर्व, जिन्हें समारोह के साथ निश्चित समय पर मनाना चाहिए, इस प्रकार हैं।

5) पहले महीने के चौदहवें दिन संध्या समय प्रभु के आदर में पास्का है

6) और उस महीने के पन्द्रहवें दिन प्रभु के आदर में बेख़मीर रोटियों का पर्व है। तुम सात दिन बेख़मीर रोटियाँ खाओगे।

7) पहले दिन तुम लोगों के लिए एक धर्म-सभा का आयोजन किया जाएगा और तुम किसी प्रकार का काम नहीं करोगे।

8) तुम सात दिन तक प्रभु को अन्न-बलि चढ़ाओगे। सातवें दिन एक धर्म-सभा का आयोजन किया जाएगा, और तुम किसी प्रकार का काम नहीं करोगे।''

9) प्रभु ने मूसा से कहा,

10) ''इस्राएलियों से यह कहो - जब तुम उस देश में पहुँच जाओगे, जिसे में तुम्हें देने जा रहा हूँ और तुम वहाँ फ़सल काटोगे, तो तुम अपनी फ़सल का पहला पूला याजक के पास ले आओगे।

11) वह विश्राम-दिवस के दूसरे दिन उसे प्रभु के सामने प्रस्तुत करेगा, जिससे तुम्हें ईश्वर की कृपा दृष्टि प्राप्त हो जाये।

15) ''विश्राम-दिवस के दूसरे दिन, जब तुम चढ़ावे का पूला लाते हो, उस दिन से तुम पूरे सात सप्ताह गिनोगे।

16) सातवें सप्ताह के दूसरे दिन अर्थात् पचासवें दिन से तुम प्रभु को नये अनाज का अन्न-बलि चढ़ाओगे।

27) ''सातवें महिने का दसवाँ दिन प्रायश्चित-दिवस है। उस दिन तुम लोगों के लिए धर्म-सभा का आयोजन किया जाएगा। तुम उपवास करोगे और प्रभु को होम-बलि चढ़ाओगे।

34) वह सात दिन तक मनाया जायेगा।

35) उसके प्रथम दिन धर्म-सभा का आयोजन किया जायेगा और तुम किसी प्रकार का काम नहीं करोगे।

36) तुम सात दिन प्रभु को होम-बलि चढ़ाओगे। आठवें दिन लोगों के लिए एक धर्म-सभा का आयोजन किया जायेगा और तुम प्रभु को होम-बलि चढ़ाओगे। उस दिन समापन समारोह होगा और तुम किसी प्रकार का काम नहीं करोगे।

37) ये प्रभु के पर्व हैं, जिन में तुम धर्म सभा का आयोजन करोगे और प्रत्येक की विधि के अनुसार प्रभु को होम-बलि, अन्न-बलि, शान्ति-बलि और अर्घ चढ़ाओगे।

38) इसके अतिरिक्त प्रभु को अर्पित सामान्य विश्राम दिवसों के बलिदान, मन्नत के कारण या स्वेच्छिक बलिदान चढ़ाओगे।



सुसमाचार : मत्ती 13:54-58


54) वे अपने नगर आये, जहाँ वे लोगों को उनके सभाग्रह में शिक्षा देते थे। वे अचम्भे में पड़ कर कहते थे, ’’इसे यह ज्ञान और यह सामर्थ्य कहाँ से मिला?

55) क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है? क्या मरियम इसकी माँ नहीं? क्या याकूब, यूसुफ, सिमोन और यूदस इसके भाई नहीं?

56) क्या इसके सब बहनें हमारे बीच नहीं रहतीं? तो यह सब इसे कहाँ से मिला?’’

57) पर वे ईसा में विश्वास नहीं कर सके। ईसा ने उन से कहा, ’’अपने नगर और अपने घर में नबी का आदर नहीं होता।’’

58) लोगों के अविश्वास के कारण उन्होंने वहाँ बहुत कम चमत्कार दिखाये।


📚 मनन-चिंतन


हर व्यक्ति में अच्छाईयां और बुराइयाँ दोनों होती हैं. लोग उसी अच्छाई या बुराई को देखते और समझते हैं. लेकिन कभी-कभी लोगों के हृदय पर कुछ ऐसा पर्दा पड़ जाता है कि वे एक अच्छे इन्सान में भी सिर्फ बुराइयाँ खोजते हैं, और अच्छाई को भूल जाते हैं. आज के सुसमाचार में जब प्रभु येसु अपने गृह नगर आते हैं, तो लोग उनकी बातें सुनकर और उनके महान चमत्कारों के बारे में सुनकर चकित हो जाते हैं और उनके बारे में अजीब बातें करने लगते हैं. वे उनके भाई-बहनों, माता-पिता आदि के बारे में बातें करते हैं और इस बात पर यकीन नहीं कर पाते कि उनके बीच में रहा, पला-बढ़ा यह व्यक्ति ईश्वर का पुत्र भी हो सकता है. वे प्रभु येसु की ईश्वरता को नहीं पहचान पाते.

हम जानते हैं कि प्रभु येसु पूर्ण रूप से मनुष्य और पूर्ण रूप से ईश्वर हैं. पूर्ण रूप से मनुष्य होने का अर्थ है कि जो भी एक मनुष्य के अनुभव के रूप में उन्हें अनुभव करना था वह सब उन्होंने अनुभव किया. वे साधारण मानव माता-पिता के अधीन रहे, उनसे सीखा और दुःख-दर्द को महसूस किया. वहीँ दूसरी ओर वह पूर्ण रूप से ईश्वर भी थे, मानव जाति के दुःख-दर्द को दूर करने का प्रयास किया, विभिन्न प्रकार के चिन्ह और चमत्कारों द्वारा अपने ईश्वर होने का प्रमाण दिया. उनके गृह नगर के लोगों की यह कमी थी कि वे प्रभु येसु की मनुष्यता से बढ़कर उनकी ईश्वरता को नहीं पहचान पाए. कभी-कभी हम भी अपने आस-पास लोगों में ईश्वर के निवास को नज़रन्दाज़ कर उनकी कमियों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं. हम दूसरों के अन्दर ईश्वर के दर्शन करने की कृपा माँगें. आमेन.


📚 REFLECTION


Every person has good things and also some short comings within themselves. People observe this goodness or weaknesses. But sometimes some people become so much veiled by their prejudiced mind set that they see only one aspect of a person’s life and ignore the other. When Jesus comes to his home town, people are surprised at the words and wisdom of Jesus, they had heard about the mighty works and miracles of Jesus, but still they talk strangely about Jesus. They talk about his parents, his brothers and sisters and are unable to accept and believe that this boy who grew amidst them and lived with them, could be the Son of God. They could not recognise the divinity of Jesus.

Our faith teaches us, that Jesus is fully human and fully God. To be fully human means, he experienced the joys and sorrows of human life. As a human he lived and obeyed human parents, he learnt the scriptures and underwent the pain and happiness like any ordinary human being. On the other hand, as God, he healed people, cast away the demons, changed the lives of people with his teachings and mighty works that proved him to be God. The people of his home town lacked the ability to see beyond the humanity of Jesus. They could not see God in Jesus. We have people around us in whom we look for shortcomings and weaknesses than to see the face of God in them. May God bless us with the grace to recognise the dwelling of divine within all. Amen.


 -Br. Biniush Topno



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गुरुवार, 29 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 29 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : 1 योहन 4:7-16



7) प्रिय भाइयो! हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईश्वर से उत्पन्न होता है।

8) जौ प्यार करता है, वह ईश्वर की सन्तान है और ईश्वर को जानता है। जो प्यार नहीं करता, वह ईश्वर को नहीं जानता; क्येोंकि ईश्वर प्रेम है।

9) ईश्वर हम को प्यार करता है। यह इस से प्रकट हुआ है कि ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेजा, जिससे हम उसके द्वारा जीवन प्राप्त करें।

10) ईश्वर के प्रेम की पहचान इस में है कि पहले हमने ईश्वर को नहीं, बल्कि ईश्वर ने हम को प्यार किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा।

11) प्रयि भाइयो! यदि ईश्वर ने हम को इतना प्यार किया, तो हम को भी एक दूसरे को प्यार करना चाहिए।

12) ईश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा। यदि हम एक दूसरे को प्यार करते हैं, तो ईश्वर हम में निवास करता है और ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम पूर्णता प्राप्त करता है।

13) यदि वह इस प्रकार हमें अपना आत्मा प्रदान करता है, तो हम जान जाते हैं कि हम उस में और वह हम में निवास करता है।

14) पिता ने अपने पुत्र को संसार के मुक्तिदाता के रूप में भेजा। हमने यह देखा है और हम इसका साक्ष्य देते हैं।

15) जो यह स्वीकार करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं, ईश्वर उस में निवास करता है और वह ईश्वर में।

16) इस प्रकार हम अपने प्रति ईश्वर का प्रेम जान गये और इस में विश्वास करते हैं। ईश्वर प्रेम है और जो प्रेम में दृढ़ रहता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में।



सुसमाचार योहन 11:19-27



19) इसलिये भाई की मृत्यु पर संवेदना प्रकट करने के लिये बहुत से यहूदी मरथा और मरियम से मिलने आये थे।

20) ज्यों ही मरथा ने यह सुना कि ईसा आ रहे हैं, वह उन से मिलने गयी। मरियम घर में ही बैठी रहीं।

21) मरथा ने ईसा से कहा, “प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नही मरता

22) और मैं जानती हूँ कि आप अब भी ईश्वर से जो माँगेंगे, ईश्वर आप को वही प्रदान करेगा।“

23) ईसा ने उसी से कहा “तुम्हारा भाई जी उठेगा“।

24) मरथा ने उत्तर दिया, “मैं जानती हूँ कि वह अंतिम दिन के पुनरुथान के समय जी उठेगा“।

25) ईसा ने कहा, "पुनरुथान और जीवन में हूँ। जो मुझ में विश्वास करता है वह मरने पर भी जीवित रहेगा

26) और जो मुझ में विश्वास करते हुये जीता है वह कभी नहीं मरेगा। क्या तुम इस बात पर विश्वास करती हो?"

27) उसने उत्तर दिया, "हाँ प्रभु! मैं दृढ़ विश्वास करती हूँ कि आप वह मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं, जो संसार में आने वाले थे।"



अथवा लूकस 10:38-42



38) ईसा यात्रा करते-करते एक गाँव आये और मरथा नामक महिला ने अपने यहाँ उनका स्वागत किया।

39) उसके मरियम नामक एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही।

40) परन्तु मरथा सेवा-सत्कार के अनेक कार्यों में व्यस्त थी। उसने पास आ कर कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह ठीक समझते हैं कि मेरी बहन ने सेवा-सत्कार का पूरा भार मुझ पर ही छोड़ दिया है? उस से कहिए कि वह मेरी सहायता करे।’’

41) प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ’’मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो;

42) फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।’’



📚 मनन-चिंतन


आज माता कलीसिया सन्त मारथा का स्मृति दिवस मनाती है. हम जानते हैं कि सन्त मारथा मरियम और लज़ारस की बहन थी. वे येरुसालेम से कुछ ही दूर बेथानी नामक गॉंव में रहते थे. आज का सुसमाचार उस समय का दृश्य है जब मारथा और मरियम का भाई लाजरुस मर गया था, और प्रभु येसु मारथा और मरियम से मिलने उनके गॉंव आते हैं. मारथा रोती हुई उनसे मिलने के लिए बाहर जाती है, जबकि मरियम घर में ही बैठी रहती है. सन्त मारथा हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनके आंसुओं को देखकर प्रभु के मुख से एक महान शिक्षा हमें मिली. प्रभु येसु मारथा से कहते हैं, “पुनरुत्थान और जीवन मैं हूँ. जो मुझमें विश्वास करता है वह मरने पर भी जीवित रहेगा और जो मुझमें विश्वास करते हुए जीता है, वह कभी नहीं मरेगा.” प्रभु येसु अनन्त जीवन पाने का मन्त्र हमें देते हैं.

प्रभु येसु जीवन और पुनरुत्थान के बारे में दो चीज़ें समझाते हैं - प्रभु येसु में विश्वास करना और विश्वास करते हुए जीना. यह दो तरह के लोगों को इंगित करता है - एक वे जो प्रभु येसु में विश्वास करते हैं, लेकिन उनकी भक्ति अधिक गहरी नहीं है, लेकिन फिर भी मृत्यु के बाद प्रभु येसु उन्हें अनन्त जीवन देने का वादा करते हैं. और दूसरे वे लोग हैं, जिनमें प्रभु येसु के प्रति गहरी भक्ति है, इतनी गहरी कि उनके जीवन का हर पहलु प्रभु येसु में विश्वास के अनुसार है. उनका व्यवहार, उबकी बात-चीत, उनका स्वाभाव सब कुछ में प्रभु येसु और उनकी शिक्षाओं की झलक दिखती है. ऐसे लोग अमर हैं, वे मरने पर भी जीवित रहते हैं. ऐसे लोगों को हम सन्त कहते हैं. वे मरने के बाद भी हमारे बीच में जिंदा हैं. हमारे जीवन का उद्देश्य भी मरने के बाद भी सदा जीवित रहने में हो. आमेन.



📚 REFLECTION



Today we celebrate the memoria of St. Martha. St. Martha was the sister of Lazarus and Mary. They lived in a village called Bethany, little away from the Holy City Jerusalem. Today’s gospel shows the situation when Lazarus, the brother of Mary and Martha had died and Jesus comes their village to console Mary and Martha. Martha comes out to Jesus, crying while Mary remained in the house. St. Martha is important for us because it is through her pleading that Jesus utters very important words about christian faith. Jesus tells Martha, “I am the resurrection and the life. Those who believe in me, even though, they die, will live, and everyone who lives and believes in me will never die.” Jesus gives us the formula to enter into the eternal life.

Jesus explains two things about life and the resurrection – to believe in Jesus and to live a life believing in Jesus. This indicates two kinds of people – those who believe in Jesus, but their faith in Jesus is not so deep, but still Jesus promises eternal life to them after death. Second kind of people are the ones who have deeper faith in Jesus, every aspect of their life is governed by their faith in Jesus. Their behaviour, their talking, their nature, every aspect of their life expresses the teachings of Christ. Such people never die, even if they die, they still live forever. These are called the saints, they are very much alive even if they have physically died centuries ago. Our ultimate aim of life also should be to live forever, even after death. Amen.



 Br. Biniush Topno


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बुधवार, 28 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 28 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : निर्गमन 34:29-35


29) जब मूसा नियम की दोनों पाटियाँ हाथ में लिये सीनई पर्वत से उतरा, तो उसे यह पता नहीं था कि ईश्वर से बातें करने के फलस्वरूप उसका मुखमण्डल देदीप्यमान है।

30) हारून और दूसरे इस्राएली मूसा का देदीप्यमान मुखमण्डल देख कर उसके निकट जाने से डरने लगे।

31) मूसा ने उन्हें बुलाया। इस पर हारून और समुदाय के नेता उसके पास आये और मूसा ने उन्हें सम्बोधित किया।

32) इसके बाद सभी इस्राएली उसके पास आये और मूसा ने उन्हें वे सब आदेश सुनाये, जिन्हें प्रभु ने सीनई पर्वत पर उसे दिया था।

33) लोगों को सम्बोधित करने के बाद मूसा ने अपना मुख परदे से ढक लिया।

34) जब-जब मूसा प्रभु से बातें करने तम्बू में प्रवेश करता था, तो वह बाहर निकलने तक वह परदा हटा दिया करता था। बाहर निकलने के बाद जब वह ईश्वर से मिले आदेश इस्राएलियों को सुनाता था,

35) तो इस्राएली मूसा का देदीप्यमान मुखमण्डल देखा करते थे। इसके बाद प्रभु से बात करने के लिए तम्बू में प्रवेश करने के समय तक, मूसा फिर अपना मुख परदे से ढक लिया करता था।



सुसमाचार : मत्ती 13:44-46



44) ’’स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए ख़ज़ाने के सदृश है, जिसे कोई मनुष्य पाता है और दुबारा छिपा देता है। तब वह उमंग में जाता और सब कुछ बेच कर उस खेत को ख़रीद लेता है।

45) ’’फिर, स्वर्ग का राज्य उत्तम मोती खोजने वाले व्यापारी के सदृश है।

46) एक बहुमूल्य मोती मिल जाने पर वह जाता और अपना सब कुछ बेच कर उस मोती को मोल ले लेता है।


📚 मनन-चिंतन


आज माता कलीसिया भारत की प्रथम महिला सन्त जो केरल में जन्मी, सन्त अलफोंसा का पर्व (स्मृति दिवस) मनाती है. आज के सुसमाचार में प्रभु येसु ईश्वरीय राज्य के बारे में दो और उदाहरण देते हैं. प्रभु येसु कहते हैं, ईश्वर का राज्य खेत में छिपे हुए खजाने के समान है. प्रभु येसु दूसरा उदाहरण अनमोल मोती का देते हैं. दोनों ही तरह के खजाने को पाने वाले अपना सब कुछ बेचकर उस खजाने को प्राप्त करते हैं. अर्थात एक तरफ उनकी सारी सम्पत्ति, और धन-दौलत और दूसरी तरफ ईश्वर का राज्य. लेकिन जो ईश्वर के राज्य को नहीं समझते हैं उनके लिए उसका कोई मूल्य नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह नासमझ व्यक्ति के लिए बहुमूल्य हीरे-मोती किसी सामान्य पत्थर जैसे हैं.

प्रभु येसु के इन दोनों उदाहरणों को हम बहुत से लोगों के जीवन में पूरा होते देखते हैं. एक उदाहरण आज की सन्त अलफोंसा हैं जिन्होंने बचपन से अपने जीवन की हर ख़ुशी को ईश्वर के समर्पित कर दिया. उन्होंने ईश्वर को पाने के लिए अपनी पत्रिक सम्पत्ति दान कर दी और एक धर्म बहन के रूप में ईश्वर की शरण में आ गयी. ऐसे अनेक संतों के उदाहरण हैं जिन्होंने ईश्वर के राज्य की खातिर इस संसार की बड़ी से बड़ी दौलत त्याग दी और अपना जीवन ईश्वरीय राज्य के लिए दे दिया, जैसे कि असीसी के सन्त फ्रांसिस, लोयोला के सन्त इग्नेशियस, सन्त फ्रांसिस ज़ेवियर, सन्त मदर टेरेसा आदि. अगर हम ऐसे लोगों की लिस्ट बनाएं तो वास्तव में एक बहुत लम्बी लिस्ट बन जाएगी. आइये हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें भी स्वर्गराज्य का महत्त्व और मूल्य समझने की कृपा प्रदान करे.आमेन.



📚 REFLECTION



We celebrate the feast (memorial) of St. Alphonsa, the first Indian woman saint from Kerala. Jesus gives us two more examples about the nature of the kingdom of God. Jesus tells that the kingdom of God is like a treasure hidden in field. Second example is that of specious pearl of great price. Those who desire to have both of these types of treasures, have to sell everything and own the treasure. In other words on one side is their all wealth and possessions and on the other side is the treasure of the kingdom of God. But those who do not know the kingdom of God, for them it has no value. It is like a person who has no understanding of diamonds and precious stones, for him they are like any other ordinary stones.

We can see these examples beings fulfilled in the lives of many. One such example is today’s saint Alphonsa who sacrificed all her joys and sorrows and offered them to God from her very childhood. She donated all her inheritance and dedicated her life for God as a nun. There are numerous examples of great saints who when found the treasure, gave up all their wordly wealth and possessions in order to own this pearl of great price, they gave their everything including their lives for the kingdom of God. Some of such examples are, St. Francis of Assisi, St. Ignatius of Loyola, St. Francis Xavier, St. Mother Teresa etc. If we make a list of such people, it will be very very long list of names. Let us pray to God to give us the grace to understand the price and importance of the Kingdom of God. Amen.


 -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, 27 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 27 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : निर्गमन 33:7-11, 34, 5-9, 28


7) मूसा ने तम्बू को उठवा कर शिविर के बाहर कुछ दूरी पर खड़ा कर दिया और उसका नाम दर्शन-कक्ष रखा। यदि कोई प्रभु से परामर्श लेना चाहता था, तो वह शिविर के बाहर उस दर्शन-कक्ष के पास चला जाता था।

8) जब मूसा उस तम्बू की ओर जाता था, तो सब लोग अपने-अपने तम्बू के द्वार पर खड़े हो जाते और मूसा को तब तक देखते रहते थे, जब तक वह तम्बू में प्रवेश न करे।

9) मूसा के प्रवेश करते ही बादल का खम्भा उतर कर तम्बू के द्वार पर खड़ा हो जाया करता था। तब प्रभु मूसा से बातें करता था।

10) तम्बू के द्वार पर बादल का खम्भा खड़ा देख कर सभी लोग तुरन्त अपने-अपने तम्बू के द्वार पर से उसे दण्डवत् किया करते थे।

11) जिस तरह एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से बात करता है, उसी तरह प्रभु मूसा के आमने-सामने प्रकट हो कर उस से बात करता था। जब मूसा शिविर में लौटता था, तो उसका सहायक नून का पुत्र, योशुआ नामक युवक तम्बू में रह जाता था।

5) प्रभु बादल के रूप में उतर कर उसके पास आया और अपना "प्रभु" नाम प्रकट किया।

6) प्रभु ने उसके सामने से निकल कर कहा, ''प्रभुः प्रभु एक करूणामय तथ कृपालु ईश्वर है। वह देर से क्रोध करता और अनुकम्पा तथा सत्यप्रतिज्ञता का धनी है।

7) वह हजार पीढ़ियों तक अपनी कृपा बनाये रखता और बुराई, अपराध और पाप क्षमा करता है।''

8) मूसा ने तुरन्त दण्डवत् कर उसकी आराधना की

9) और कहा, ''प्रभु; यदि मुझ पर तेरी कृपादृष्टि है, तो मेरा प्रभु हमारे साथ चले। ये लोग हठधर्मी तो हैं, किन्तु तू हमारे अपराध तथा पाप क्षमा कर दे और हमें अपनी निजी प्रजा बना ले।''

28) मूसा वहाँ चालीस दिन और चालीस रात प्रभु के साथ रहा। उसने न तो रोटी खायी और न पानी पिया। उसने विधान के शब्द, अर्थात दस नियम पाटियों पर अंकित किये।


सुसमाचार : मत्ती 13:36-43


36) ईसा लोगों को विदा कर घर लौटे। उनके शिष्यों ने उनके पास आ कर कहा, ’’खेत में जंगली बीज का दृष्टान्त हमें समझा दीजिए’’।

37) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’अच्छा बीज बोने बाला मानव पुत्र हैं;

38) खेत संसार है; अच्छा बीज राज्य की प्रजा है; जंगली बीज दृष्ट आत्मा की प्रजा है;

39) बोने बाला बैरी शैतान है; कटनी संसार का अंत है; लुनने वाले स्वर्गदूत हैं।

40) जिस तरह लोग जंगली बीज बटोर कर आग में जला देते हैं, वैसा ही संसार के अंत में होगा।

41) मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा और वे उसके राज्य क़़ी सब बाधाओं और कुकर्मियों को बटोर कर आग के कुण्ड में झोंक देंगें।

42) वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

43) तब धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की तरह चमकेंगे। जिसके कान हों, वह सुन ले।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में शिष्यों के आग्रह पर प्रभु येसु जंगली बीज के दृष्टान्त का अर्थ समझाते हैं. प्रभु येसु कहते हैं, कि बीज बोने वाला मानव पुत्र है, खेत संसार है, अच्छा बीज अच्छे लोग हैं, बैरी शैतान है और बुरे लोग जंगली बीज हैं, संसार का अन्त कटनी का समय है और काटने वाले मजदूर स्वर्गदूत हैं. अर्थात इस दुनिया में ईश्वर ने अच्छे लोगों को बनाया, ऐसे लोगों को जो ईश्वर के अपने प्रतिरूप में थे, जिनमें बिलकुल भी बुराई नहीं थी, लेकिन शैतान आकर इस दुनिया में बुराई के बीज बो देता है, लोगों के दिलों में जो दुर्गुण ईश्वर के विरुद्ध हैं, उन्हें बो देता है. शैतान मनुष्यों के दिलों में नफ़रत के बीज, ईर्ष्या, द्वेष, बदले भी भावना, लालच आदि के बीज बो देता है और फसल दो भागों में बंट जाती है - अच्छे लोग और बुरे लोग.

दृष्टान्त के अनुसार अच्छे और बुरे पौधों को कटनी के समय अलग किया जाता है यानि कि संसार के अन्त के समय पर. और हम जानते हैं कि अभी संसार का अन्त नहीं आया है और इसलिए अच्छे और बुरे, दोनों तरह के बीच साथ-साथ बढ़ते हैं. संसार रुपी खेत अभी भी वहीँ हैं, और वैरी शैतान अभी भी अपने काम में लगा है. जितनी बेचैनी से भले लोग भलाई करने में नहीं लगे उससे अधिक अधिक बेचैनी से शैतान अपने काम में लगा है. सन्त पेत्रुस हमें आगाह करते हैं, “आप संयम रखें और जागते रहें! आपका शत्रु शैतान दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचरता है और ढूंढता रहता है कि किसे फाड़ खाये.” (1 पेत्रुस 5:8). हमें शैतान और उसकी प्रजा से अधिक सक्रीय रहना है तभी अच्छे बीज अन्त तक डटे रह सकेंगे. आईये हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि अच्छे बीज बुरे बीजों से अधिक फलें-फूलें. आमेन.



📚 REFLECTION



Today we reflect on the meaning of the parable of the weeds. Jesus explains the meaning of the parable on the request of the disciples. He says, ‘sower of the seed is the Son of God, field is the world, good seeds are the people of God, weeds are the children of the evil one, end of the world is the harvesting time and labourers to who are to reap the crop are the angels. God created good people in the beginning of the world, the people who were created in His own image and likeness, who did not have any evil within themselves, but the evil one comes at night and sows the seeds of evil, all the works of dark that are against God. The devil sows the seeds of hatred, jealousy, revengefulness, and greed in the hearts of the people, and the people are divided into two, the good ones and the evil ones.

According to the miracle, the good and bad seeds are separated at the time of harvesting, that is, the end of the world. And we are aware that the end of the world has not yet reached, so good and bad, both types of plants grow together. The field is still there and the evil one is still at work. The devil is busy more zealously in sowing the seeds of evil then the people of God doing good. He is restless for his work. St. Peter warns us, “Discipline yourselves, keep alert. Like a roaring lion your adversary the devil prowls around, looking for someone to devour (1 Pet 5:8).” In order to stand till last, we have to be more active then the devil and his people. May God bless the good seeds to flourish more than the weeds. Amen.


 -Br. Biniush Topno



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सोमवार, 26 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 26 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : निर्गमन 32:15-24,30-34


15) मूसा विधान की दोनों पाटियाँ हाथ में लिये पर्वत से उतर कर लौटा। पाटियों पर सामने और पीछे, दोनों ओर लेख अंकित थे।

16) वे पाटियाँ ईश्वर की बनायी हुई थीं और उन पर जो लिपि अंकित थी, वह ईश्वर की अपनी लिपि थी।

17) योशुआ ने लोगों का कोलाहल सुन कर मूसा से कहा, शिविर में से लड़ाई जैसी आवाज़ आ रही है।

18) उसने उत्तर दिया, ''यह न तो विजेताओं का उल्लास है और न पराजितों का विलाप। मैं तो गाने की आवाज़ सुन रहा हूँ।''

19) शिविर के पास पहुँच कर मूसा ने बछड़े की प्रतिमा और लोगों का नृत्य देखा। उसका क्रोध भड़क उठा और उसने अपने हाथ की पाटियों को पहाड़ के निचले भाग पर पटक कर टुकड़े-टुकड़े कर दिये।

20) उसने लोगों का बनाया हुआ बछड़ा ले कर जला दिया। उसने उसकी राख पीस कर चूर-चूर कर डाली और उसे पानी में छिड़क कर इस्राएलियों को पिला दिया।

21) तब मूसा ने हारून से पूछा, ''इन लोगों ने तुम्हारे साथ कौन-सा अन्याय किया, जो तुमने इन्हें इतने घोर पाप में डाल दिया हैं?''

22) हारून ने उत्तर दिया, ''महोदय आप क्रोध न करें। आप जानते ही हैं कि इन लोगों का झुकाव पाप की ओर है।

23) इन्होंने मुझ से कहा, "हमारे लिए एक ऐसा देवता बनाइए, जो हमारे आगे-आगे चले, क्योंकि हम नहीं जानते कि जो मनुष्य हम को मिस्र से निकाल लाया, उस मूसा का क्या हुआ।÷

24) तब मैंने इन से कहा, ''जिसके पास सोने के आभूषण हों, वे उन्हें उतार कर ला दें उन्होंने मुझे सोना ला दिया। मैंने उसे आग में डाला और इस प्रकार यह बछड़ा बन गया।''

30) दूसरे दिन मूसा ने इस्राएलियों से कहा, ''तुम लोगों ने घोर पाप किया है। मैं अब पर्वत पर प्रभु के पास जा रहा हूँ। यदि हो सका, तो मैं तुम्हारे पाप का प्रायश्चित करूँगा।''

31) मूसा ने प्रभु के पास आ कर कहा, हाय; इन लोगों ने घोर पाप किया है। इन्होंने अपने लिए सोने का देवता बनाया है।

32) ओह; यदि तू इन्हें क्षमा कर दे; नहीं तो, मेरा नाम अपनी लिखी हुई पुस्तक से निकाल दे।

33) प्रभु ने उत्तर दिया, ''जिसने मेरे विरुद्ध पाप किया है, उसी को मैं अपनी पुस्तक से निकाल दूँगा।

34) अब तुम जा कर लोगों को उस स्थान ले चलो, जिसे मैंने तुम्हें बताया हैं। मेरा दूत तुम्हारे आग-आगे चलेगा। जब दण्ड देने का दिन आयेगा, तब मैं लोगों को उनके पाप का दण्ड दूँगा।''



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:31-35



31) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, "स्वर्ग का राज्य राई के दाने के सदृश है, जिसे ले कर किसी मनुष्य ने अपने खेत में बोया।

32) वह तो सब बीजों से छोटा है, परन्तु बढ़ कर सब पोधों से बड़ा हो जाता है और ऐसा पेड़ बनता है कि आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करते हैं।"

33) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया,"स्वर्ग का राज्य उस ख़मीर के सदृश है, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया"।

34) ईसा दृष्टान्तों में ही ये सब बातें लोगों को समझाते थे। वह बिना दृष्टान्त के उन से कुछ नहीं कहते थे,

35) जिससे नबी का यह कथन पूरा हो जाये- मैं दृष्टान्तों में बोलूँगा। पृथ्वी के आरम्भ से जो गुप्त रहा, उसे मैं प्रकट करूँगा।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ईश्वर के राज्य के रहस्यों को आसानी से हमें समझाने के लिए हमारे ही दिन-प्रतिदिन में उपयोग की जाने वाली वस्तुओं का उदाहरण देते हैं. आज के सुसमाचार में प्रभु येसु दो दृष्टान्तों द्वारा स्वर्ग के राज्य स्वाभाव को समझाते हैं. पहला उदाहरण है, राई का दाना. हम जानते हैं कि राई का दाना बहुत छोटा होता है, लेकिन जब वह धीरे-धीरे फूट कर पौधा बनता है तो अपने से कई गुना बड़ा बन जाता है, और अनेकों दाने पैदा कर देता है. उसी तरह से दूसरा उदाहरण खमीर का है, जब थोड़ा सा खमीर आटे में मिलाया जाता है तो वह सारे आटे को खमीरा बना देता है. इन दोनों उदाहरणों से हमें पता चलता है कि ईश्वर के राज्य की शुरुआत बहुत छोटी होती है, लेकिन जब वह बढ़ता है तो सब कुछ को अपने में समाहित कर लेता है.

यही बात हमारे ख्रीस्तीय जीवन में लागू होती है. ईश्वरीय राज्य के गुण जैसे कि सत्य, प्रेम, भाईचारा,एकता, सहनशीलता, क्षमाशीलता आदि एक छोटे से रूप में शुरू होते हैं, लेकिन जब बढ़ते हैं, तो सब कुछ पर जीत हासिल कर लेते हैं. हम ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ ख्रीस्तीय मूल्यों पर चलने वालों की संख्या बहुत कम है. 130 करोड़ लोगों की जनसँख्या वाले देश में प्रभु येसु के अनुयायी सिर्फ 2 प्रतिशत के आस-पास ही हैं, लेकिन यदि दो प्रतिशत लोग सच्चे दिल से पूरी ईमानदारी के साथ प्रभु येसु के बताये मार्ग पर चलें तो सारे देश को बदल सकते हैं. आईये हम प्रार्थना करें कि ईश्वर का राज्य हमारे जीवन में फलीभूत हो और हमारे द्वारा दूसरों के जीवन में. आमेन.



📚 REFLECTION



In order to explain about the kingdom of heaven, Jesus gives examples from the things used in our day-to-day life. In the gospel today, Jesus gives two examples t explain the nature of the kingdom of God. First example is of a mustard seed. We know that mustard seed is very tiny, but once it sprouts and becomes a plant, it becomes so large that it produces numerable other seeds. Similarly, second example given by Jesus is that of yeast. When a very small quantity is mixed in the flour, the whole flour becomes fermented. These both examples show us that the kingdom has a very humble beginning but when it starts growing, it overtakes everything.

This is also applicable in our christian life. The values of the kingdom of God, like Truth, justice, love, unity, tolerance, forgiveness etc, begin in a small manner and grow in such a way that they conquer everything. We live in a land where people who follow Christ and the kingdom values are very few. The followers of Jesus are hardly 2% out of about 130 corore people, but if these few people sincerely and whole heartedly bear witness with their lives to the teachings of Christ they can bring a dynamic change. Let us pray to God to enable us to live the values of the kingdom of God and take it others. Amen.


 -Br. Biniush Topno


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इतवार, 25 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 25 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : राजाओं का दुसरा ग्रन्थ 4:42-44

42) एक मनुष्य बाल-शालिशा से आया और उसने ईश्वर -भक्त को प्रथम फल के रूप में जौ की बीस रोटियाँ और नये अनाज का बोरा दिया। तब एलीशा ने कहा ‘‘लोगों को खाने के लिए दे दो’’

43) किन्तु उसके नौकर ने कहा, ‘‘मैं इतने को ही एक सौ लोगों में कैसे बाँट सकता हूँ?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘लोगों को खाने के लिए दो, क्योंकि प्रभु ने यह कहा है- वे खायेंगे और उस में से कुछ बच भी जायेगा’’।

44) उसने लोगों को खिलाया। उन्होंने खा लिया और जैसा कि प्रभु ने कहा था, उस में से कुछ बच भी गया।


दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:1-6


1) ईश्वर ने आप लोगों को बुलाया है। आप अपने इस बुलावे के अनुसार आचरण करें - यह आप लोगों से मेरा अनुरोध है, जो प्रभु के कारण कै़दी हूँ।

2) आप पूर्ण रूप से विनम्र, सौम्य तथा सहनशील बनें, प्रेम से एक दूसरे को सहन करें

3) और शान्ति के सूत्र में बँध कर उस एकता को बनाये रखने का प्रयत्न करते रहें, जिसे पवित्र आत्मा प्रदान करता है।

4) एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए आप लोग बुलाये गये हैं।

5) एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास और एक ही बपतिस्मा।

6) एक ही ईश्वर है, जो सबों का पिता, सब के ऊपर, सब के साथ और सब में व्याप्त है।


सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 6:1-15


1) इसके बाद ईसा गलीलिया अर्थात् तिबेरियस के समुद्र के उस पर गये।

2) एक विशाल जनसमूह उनके पीछे हो लिया, क्योंकि लोगों ने वे चमत्कार देखे थे, जो ईसा बीमारों के लिए करते थे।

3) ईसा पहाड़ी पर चढ़े और वहाँ अपने शिष्यों के साथ बैठ गये।

4) यहूदियों का पास्का पर्व निकट था।

5) ईसा ने अपनी आँखें ऊपर उठायीं और देखा कि एक विशाल जनसमूह उनकी ओर आ रहा है। उन्होंने फिलिप से यह कहा, ‘‘हम इन्हें खिलाने के लिए कहाँ से रोटियाँ खरीदें?’’

6) उन्होंने फिलिप की परीक्षा लेने के लिए यह कहा। वे तो जानते ही थे कि वे क्या करेंगे।

7) फिलिप ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘दो सौ दीनार की रोटियाँ भी इतनी नहीं होंगी कि हर एक को थोड़ी-थोड़ी मिल सके’’।

8) उनके शिष्यों में एक, सिमोन पेत्रुस के भाई अन्द्रेयस ने कहा,

9) ‘‘यहाँ एक लड़के के पास जौ की पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं, पर यह अतने लोगों के लिए क्या है,’’

10) ईसा ने कहा, ‘‘लोगों को बैठा दो’’। उस जगह बहुत घास थी। लोग बैठ गये। पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार थी।

11) ईसा ने रोटियाँ ले लीं, धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और बैठे हुए लोगों में उन्हें उनकी इच्छा भर बँटवाया। उन्होंने मछलियाँ भी इसी तरह बँटवायीं।

12) जब लोग खा कर तृत्त हो गये, तो ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ‘‘बचे हुए टुकड़े बटोर लो, जिससे कुछ भी बरबाद न हो’’।

13) इस लिए शिष्यों ने उन्हें बटोर लिया और उन टुकड़ों से बारह टोकरे भरे, जो लोगों के खाने के बाद जौ की पाँच रोटियों से बच गये थे।

14) लोग ईसा का यह चमत्कार देख कर बोल उठे, ‘‘निश्चय ही यह वे नबी हैं, जो संसार में आने वाले हैं’’।

15) ईसा समझ गये कि वे आ कर मुझे राजा बनाने के लिए पकड़ ले जायेंगे, इसलिए वे फिर अकेले ही पहाड़ी पर चले गये।



📚 मनन-चिंतन


आज के पहले पाठ और सुसमाचार में हम भोजन का चमत्कार देखते हैं. पहले पाठ में नबी एलिशय जौ की बीस रोटियों और कुछ बालियों को ईश्वर के सामर्थ्य से सौ लोगों में बाँटते हैं, और सब लोग खाकर तृप्त हो जाते हैं, और कुछ टुकड़े बचते भी हैं. सुसमाचार में भी हम रोटियों का चमत्कार देखते हैं जिसमें प्रभु येसु जौ की पाँच रोटियों और दो मछलियों को पाँच हजार लोगों में बाँटते हैं. सब लोग खूब खाते हैं, और तृप्त हो जाते हैं और खाने के बात बचे हुए टुकड़ों से 12 टोकरे भर जाते हैं. और दूसरे पाठ में सन्त पौलुस आपसी एकता के बारे में बात करते हैं. आखिर इन दोनों चमत्कारों में हमारे लिए ईश्वर का क्या सन्देश है?

सुसमाचार में हम देखते हैं कि भीड़ की भीड़ प्रभु येसु के वचन सुनने के लिए आ जाती है. बहुत सारे लोग हो सकता है बहुत दूर से आये थे. हम जानते हैं कि पुराने जमाने में ज्यादातर लोग पैदल ही यात्रा करते थे, और अक्सर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने के लिए काफी समय लग जाता था, कभी-कभी कई दिन भी लग जाते थे. ऐसी परिस्थिति में यह स्वाभाविक ही था कि अपनी यात्रा शुरू करने से पहले लोग अक्सर पूरी व्यवस्था करके चलते थे, जैसे कि अतिरिक्त जोड़ी जूते, रास्ते के लिए भोजन, पैसे इत्यादि. लेकिन प्रभु येसु के पास जो भीड़ की भीड़ आई थी, वे वचनों में इतने खो गये कि भूल गये कि उन्हें वापस लौटना है, भूल गये कि उन्हें अपने लिए भोजन की व्यवस्था करनी है. जब हम ईश्वर में इतने मगन हो जाते हैं, तो ईश्वर हमारी हर ज़रूरत का ख्याल रखते हैं.

प्रभु कहते हैं, “तुम जो प्यासे हो, पानी के पास चले आओ. यदि तुम्हारे पास रुपया नहीं हो, तो भी आओ. मुफ्त में अन्न खरीद कर खाओ. दाम चुकाए बिना अंगूरी और दूध खरीद लो. जो भोजन नहीं है उसके लिए तुम लोग अपना रुपया क्यों खर्च करते हो? जो तृप्ति नहीं दे सकता है उसके लिए परिश्रम क्यों करते हो?” (इसायाह 55:1-2). जब हम अपना सर्वस्व भूलकर प्रभु पर न्यौछावर कर देते हैं, तो प्रभु हमारी ज़रूरत पूरी करता है. जब लोग सब कुछ भूलकर प्रभु येसु के पीछे आये तो प्रभु येसु क्यों न द्रवित होकर उनकी भोजन की आवश्यकता को पूरी नहीं करेंगे. लेकिन सन्त पौलुस हमें याद दिलाते हैं, अगर हम चाहते हैं कि ईश्वर हमारे जीवन में चमत्कार दिखाएँ तो हमें अपनी बुलाहट के अनुसार जीवन बिताना है. एक दूसरे के साथ मिलकर प्रेम से रहना है.

रोटियों का चमत्कार मिल-बाँट कर खाने का चमत्कार है. अगर वह लड़का अपना भोजन दूसरों के साथ बाँटने के लिए तैयार नहीं होता तो शायद हमारे सामने दूसरा दृश्य होता. जब हम उदार होकर अपने भोजन, चीजों आदि को दूसरों के साथ बाँटते हैं, तो वे न केवल हमारे लिए बल्कि दूसरों के लिए भी खूब बढ़ जाते हैं, और इतने अधिक हो जाते हैं कि सब लोग ख़ुशी ख़ुशी उसे आपस में बाँट सकते हैं, और किसी को कोई कमी नहीं रहती. यही विशेषता प्रारंभिक कलीसिया में थी. विश्वासियों का समुदाय एक ह्रदय और एक प्राण था. वे अपनी सम्पत्ति अपनी नहीं समझते थे, जो कुछ उनके पास था उसमें सबों का साझा था. सब कुछ बेचकर प्रेरितों के चरणों पर रख देते थे, और वह ज़रूरतमंद लोगों में उनकी आवश्यकता अनुसार बांटा जाता था. (प्रेरित-चरित 4:32,34-35).



📚 REFLECTION



We see a miracle of multiplication of food in the first reading of today and also in the gospel. In the First reading we see Prophet Elisha who takes 20 loaves of barley and few ears of corn and it becomes sufficient for more than hundred people and there is also left over they collect. Similar incident we see in the Gospel of the day where Jesus multiplies the five loaves and two fish and distributes them among more than five thousand people. They eat and are filled and there remain crumbs which were collected into twelve big baskets. An in the second reading, St. Paul talks about unity and love for one another. What do these miracles of multiplication have for us?

In the gospel we see great crowds coming to listen to Jesus. Many of them perhaps had come from a long distance. We know that in those days most of the people travelled on foot, which took lot of time to reach from one place to another, it took even days. It is natural in such situation to make all arrangements before beginning the journey. These arrangements included an extra pair of footwear, food for the way, sufficient money etc. The people who came to listen to Jesus must have come with sufficient food, but they were lost so much that they forgot that they have to return, they have arrange food for themselves. When we are lost in the company of God, God will make sure that our every need in met.

The Lord says, “Everyone who thirsts, come to the waters; and you that have no money, come, buy and eat! Come buy wine and milk without money and without price. Why do you spend your money for that which is not bread, and your labour for that which does not satisfy? (Isa 55:1-2a).” When we surrender our life wholeheartedly to God, our every need is taken care of. When people came in great numbers to Jesus, forgetting everything, why wouldn’t Jesus have compassion on them and provide them with food? But St. Paul reminds us that if we want God to do miracles in our life, then we have to live our lives according to our calling. We need to live in unity with each other.

In fact the miracle of the multiplication of loaves is the miracle of sharing. If the boy were not willing to share what he had, then there would have a different picture all tother. When we are generous in sharing our things and gifts with others, they multiply not only for us but also for others. The blessings grow so much that they can be shared by everyone and nobody would lack anything. This was the characteristic of the early Church as well. The community was of one heart and soul, no one claimed private ownership of any possession, but everything they owned was held in common. There was not a needy person among them, for as many as owned lands or houses sold them and brought the proceeds of what was sold. They laid it at the apostles’ feet, and it was distributed to each as any had need (Acts 4:32, 34-35).



मनन-चिंतन - 2


एक बार एक चित्रकार वेदी पर चित्र बना रहे थे। चित्र पूरा होने पर लोग देखने आये। लोगों ने वेदी के चित्र पर एक टोकरी में चार रोटी और दो मच्छलियों का चित्र देखा। सब लोग उनसे पूछने लगे कि टोकरी में पॉंचवीं रोटी कहॉं गायब हो गयी। तब उसने कहा कि टोकरी की पॉंचवीं रोटी पवित्र यूखारिस्त है जो वेदी पर चढ़ायी जाती है।

आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु को पॉंच रोटियों और दो मच्छलियों से पॉंच हजार लोगों को खिलाते हुए पाते है। इस चमत्कार के एक प्रमुख बिन्दु पर आज हम मनन चिन्तन करेंगे।

उदारता से प्रचुरता की ओर और

आजकल फ्री या डिस्काउंट का नाम सुनते ही लोग इक्कट्ठा हो जाते हैं। प्रभु के पास इक्कट्ठा हुई भीड भी कुछ इस तरह की थी। वे प्रभु से कुछ पाना चाहते थे और प्रभु के चमत्कार देखना चाहते थे। येसु ने एक बहुत बडा चमत्कार उनके सामने किया। चमत्कार की शुरूआत एक छोटे लडके से होती है, जो अपने पास की पॉंच रोटियॉं और दो मच्छलियॉं दूसरों के साथ बाटने को तैयार हुआ। जब उस लडके ने अपनी पॉंच रोटियॉं और दो मच्छलियॉं बडी उदारता से दी तो वहॉं पर इक्कट्ठे पॉंच हजार से ज्यादा लोगों को इसका लाभ मिला।

बाईबिल में हम देखते हैं कि जितने लोगों ने उदारता का भाव अपनाया उन सब को प्रभु का आर्शीवाद मिला। उत्पत्ति ग्रंथ 13:9 में हम देखते है कि जब जमीन के बटवारे का समय आया तो इब्राहीम अपने भांजे लोट से कहते है कि ‘‘सारा प्रदेश तुम्हारे सामने है। हम एक दूसरे से अलग हो जायें यदि तुम बाएं जाओगे तो मैं दाहिने जाऊॅंगा और यदि दाहिने जाओगे तो मैं बाएं जाऊॅंगा’’। बडा होने के कारण इब्राहीम अच्छी जगह चुन सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। बडी उदारता से उन्होंने लोट को स्थान चुनने का अधिकार दिया। प्रभु ने इब्राहिम और उसके पूरे वंशजों को आर्शीवाद दिया। एक व्यक्ति की उदारता से उनके पूरे वंशजों को प्रचुरता की आशिष मिली।

राजाओं के पहले ग्रंथ 17:7 एवं आगे वाक्यांशों में एक और घटना हम पाते हैं। सरेप्ता की विधवा ने नबी एलियस को बहुत ही उदारता से अपनी आखरी रोटी खिलायी और प्रभु ने उसको प्रचुर मात्रा में आशिष दी। 16वें वाक्यांश में लिखा है कि ‘‘न तो बरतन में आटा समाप्त हुआ और न तेल की कुप्पी खाली हुई।

स्कूल के recess (अवकाश) के समय मैंने यह देखा है कि कुछ बच्चे टिफिन में जो खाने की चीज लाते हैं उसको कभी कभी सात या आठ दोस्तों को बांटते हैं और उनके लिए एक छोटा सा हिस्सा ही मिलता है या कभी-कभी तो वे स्वयं ही भूखे रह जाते हैं। लेकिन उनके चेहरे की मुस्कुराहट यह बताती है कि वे बहुत खुश हैं। आज की स्वार्थी दुनिया में ये बच्चे हमारे लिए एक नमूना है।

आज कल लोग इतने स्वार्थी हो गये हैं कि वे गरीब लाचार और भिखरियों से भी उनका सामान छीनने की कोशिश करते हैं। दूसरे लोगों को देने से हमें दो फायदे होते हैं। एक हमारे लिये खुशी की बात होती है कि हमने गरीबों के लिए कुछ दिया है और दूसरा यह है कि उनको हमारे द्वारा कुछ फायदा होता है। उनकी प्रार्थना और आर्शीवाद हमें मिलते रहते हैं। जब देने की बात होती है तो हमेशा हम पैसों के बारे में सोचते हैं। लेकिन हम पैसों के अलावा बहुत कुछ लोगों को दे सकते हैं। हमारा समय, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमता, हमारी मीठी बातें आदि हम दूसरे लोगों के साथ बाट सकते हैं। अगर प्रभु ने खुद अपना जीवन न्यौछावर करके हमारे लिए पवित्र यूखारिस्त की स्थापना की तो क्या हम प्रभु के लिए कुछ दे सकते है? आईए हम दूसरों से लेने से ज्यादा उनको देना सीखे और लोगों से और प्रभु से आर्शीवाद प्राप्त करे क्योंकि प्रभु ने कहा है कि ‘‘जो इन छोटों में से किसी को एक प्याला ठंडा पानी भी इसलिए पिलायेगा कि वह मेरा शिष्य है, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि वह अपने पुरस्कार से वंचित नहीं रहेगा।’’


फादर मेलविन चुल्लिकल


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शनिवार, 31 जुलाई, 2021 सत्रहवाँ सामान्य सप्

 

शनिवार, 31 जुलाई, 2021

सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : लेवी 25:1, 8-17


1) प्रभु ने सीनई पर्वत पर मूसा से कहा,

8) वर्षों के सात सप्ताह, अर्थात् सात बार सात वर्ष, तदनुसार उनचास वर्ष बीत जाने पर

9) तुम सातवें महीने के दसवें दिन, प्रायश्चित के दिन, देश भर में तुरही बजवाओगे।

10) यह पचासवाँ वर्ष तुम दोनों के लिए एक पुष्प-वर्ष होगा और तुम देश में यह घोषित करोगे कि सभी निवासी अपने दासों को मुक्त कर दें। यह तुम्हारे लिए जयन्ती-वर्ष होगा - प्रत्येक अपनी पैतृक सम्पत्ति फिर प्राप्त करेगा और प्रत्येक अपने कुटुम्ब में लौटेगा।

11) पचासवाँ वर्ष तुम्हारे लिए जयन्ती-वर्ष होगा। इसमें तुम न तो बीच बोओगे, न पिछली फ़सल काटोगे और न अनछँटी दाखलताओं के अंगूर तोड़ोगे,

12) क्योंकि यह जयन्ती-वर्ष हैं तुम इसे पवित्र मानोगे और खेत में अपने आप उगी हुई उपज खाओगे।

13) इस जयन्ती-वर्ष में प्रत्येक अपनी पैतृक सम्पत्ति फ़िर प्राप्त करेगा।

14) जब तुम किसी देश-भाई के हाथ कोई जमीन बेचते हो अथवा उस से ख़रीद लेते हो, तो तुम एक दूसरे के साथ बेईमानी मत करो।

15) जब तुम किसी देश-भाई से कोई ज़मीन ख़रीदते हो, तो इसका ध्यान रखो कि पिछले जयन्ती-वर्ष के बाद कितने वर्ष बीत गये हैं और बाकी फ़सलों की संख्या के अनुसार बेचने वाले को विक्रय-मूल्य निर्धारित करना चाहिए।

16) जब अधिक वर्ष बाकी हों, तो मूल्य अधिक होगा और यदि कम वर्ष बाकी हों, तो मूल्य कम होगा; क्योंकि वह तुम्हें फसलों की एक निश्चित संख्या बेचता है।

17) तुम अपने देश-भाई के साथ बेईमानी मत करो, बल्कि अपने ईश्वर पर श्रद्वा रखो; क्योंकि मैं तुम्हारा प्रभु, ईश्वर हूँ।


सुसमाचार : मत्ती 14:1-12


1) उस समय राजा हेरोद ने ईसा की चर्चा सुनी।

2) और अपने दरबारियों से कहा, ’’यह योहन बपतिस्ता है। वह जी उठा है, इसलिए वह महान् चमत्कार दिखा रहा है।’’

3) हेरोद ने अपने भाई फि़लिप की पत्नी हेरोदियस के कारण योहन को गिरफ़्तार किया और बाँध कर बंदीगृह में डाल दिया था;

4) क्योंकि योहन ने उस से कहा था, ’’उसे रखना आपके लिए उचित नहीं है’’।

5) हेरोद योहन को मार डालना चाहता था; किन्तु वह जनता से डरता था, जो योहन को नबी मानती थी।

6) हेरोद के जन्मदिवस के अवसर पर हेरोदियस की बेटी ने अतिथियों के सामने नृत्य किया और हेरोद को मुग्ध कर दिया।

7) इसलिए उसने शपथ खा कर वचन दिया कि वह जो भी माँगेगी, उसे दे देगा।

8) उसकी माँ ने उसे पहले से सिखा दिया था। इसलिए वह बोली, ’’मुझे इसी समय थाली में योहन बपतिस्ता का सिर दीजिए’’।

9) हेरोद को धक्का लगा, परन्तु अपनी शपथ और अतिथियों के कारण उसने आदेश दिया कि उसे सिर दे दिया जाये।

10) और प्यादों को भेज कर उसने बंदीगृह में योहन का सिर कटवा दिया।

11) उसका सिर थाली में लाया गया और लड़की को दिया गया और वह उसे अपनी माँ के पास ले गयी।

12) योहन के शिष्य आ कर उसका शव ले गये। उन्होंने उसे दफ़नाया और जा कर ईसा को इसकी सूचना दी।


📚 मनन-चिंतन


जब हमारे मन में बुराई घर बना लेती है तो वह और दूसरी ऐसी चीज़ों को जन्म देती है जो हमें और अधिक गहरे पापों में धकेल देती हैं, दूसरी ओर जब हम निडरता से सत्य के साथ खड़े होते हैं, तो बुराई भी हमसे डरने लगती है. इसका जीता-जागता उदाहरण हम आज के सुसमाचार में देखते हैं. सन्त योहन बप्तिस्ता सत्य का जीवन जीते थे, अपने वचनों द्वारा निडर होकर ईश्वर का साक्ष्य देते थे, अपने जीवन द्वारा अपनी शिक्षाओं को प्रमाणित भी करते थे. वहीँ दूसरी ओर राजा हेरोद जिसके मन में बुराई ने घर कर लिया था, पाप ने उसे अपने चंगुल में फँसा लिया था, वह राजा होते हुए भी एक साधारण से दिखने वाले मामूली से इन्सान से डरता था.

सत्य के निडर सिपाही योहन बपतिस्ता का डर राजा हेरोद के मन में इस कदर समाया था, कि उसको अन्याय पूर्ण तरीके से मार डालने के बावजूद उसकी याद उसके मन में बनी हुई थी, इसलिए जब वह उसी सत्य के निडर सिपाही के दर्शन प्रभु येसु में करता है तो एक बार फिर डर जाता है. उसका डर उसके इन्ही शब्दों से बाहर आता है - कहीं यह योहन तो नहीं जिसे मैंने मरवा डाला था! हम जब भी कुछ गलत करते हैं, पाप करते हैं, अपनी अन्तरात्मा के विरुद्ध जाते हैं तो हम चैन से नहीं जी सकते. हमारा अपराध किसी न किसी रूप में हमें परेशान करता ही रहता है. मन की शान्ति पाने का एकमात्र उपाय है, अपनी गलती मानते हुए पश्चातापी करुणामय पिता के पास अपने पाप स्वीकार कर क्षमा माँगनी है.



📚 REFLECTION



When evil makes it dwelling place within us, then it gives birth to many other things that push us deeper into sin, whereas when we boldly stand with truth, the evil cannot withstand us. We see a living example of this in the gospel today. St. John the Baptist lived a life of Truth, he boldly bore witness to God through his life, and lived what he taught. On the other hand Herod being a king, whose heart was filled with darkness and evil, who was fully under the clutches of sin, was afraid of an ordinary homeless man.

The fear of the brave soldier of Truth, St. John the Baptist, was so much in his heart that, even after killing him unjustly, was afraid even of his memory. When saw same boldness and life of Truth in Jesus, he recalled John the Baptist. His fear is expressed in his own words from his mouth – “This is John the Baptist; he has been raised from the dead.” Whenever we commit sin or do wrong or go against our conscience, our heart cannot remain at peace. The guilt of sin keeps on bothering us, making us restless. There is only one way to attain the peace of mind, and that is, to accept the sinfulness, repent and turn to God and implore forgiveness, perhaps He may forgive us and accept us. Amen.


 -Fr. Johnson B. 



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