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Daily Mass Readings for Sunday, 13 June 2021

 Daily Mass Readings for Sunday,                       13 June 2021                

ELEVENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME

First Reading: Ezekiel 17: 22-24
Responsorial Psalm: Psalms 92: 2-3, 13-14, 15-16
Second Reading: Second Corinthians 5: 6-10
Gospel: Mark 4: 26-34

Also Read: Mass Reading Reflection for 13 June 2021


First Reading: Ezekiel 17: 22-24

22 Thus saith the Lord God: I myself will take of the marrow of the high cedar, and will set it: I will crop off a tender twig from the top of the branches thereof, and I will plant it on a mountain high and eminent.

23 On the high mountains of Israel will I plant it, and it shall shoot forth into branches, and shall bear fruit, and it shall become a great cedar: and all birds shall dwell under it, and every fowl shall make its nest under the shadow of the branches thereof.

24 And all the trees of the country shall know that I the Lord have brought down the high tree, and exalted the low tree: and have dried up the green tree, and have caused the dry tree to flourish. I the Lord have spoken and have done it.

Responsorial Psalm: Psalms 92: 2-3, 13-14, 15-16

R. (2a) Lord, it is good to give thanks to you.

2 It is good to give praise to the Lord: and to sing to thy name, O most High.

3 To shew forth thy mercy in the morning, and thy truth in the night:

R. Lord, it is good to give thanks to you.

13 The just shall flourish like the palm tree: he shall grow up like the cedar of Libanus.

14 They that are planted in the house of the Lord shall flourish in the courts of the house of our God.

R. Lord, it is good to give thanks to you.

15 They shall still increase in a fruitful old age: and shall be well treated,

16 That they may shew, That the Lord our God is righteous, and there is no iniquity in him.

R. Lord, it is good to give thanks to you.

Second Reading: Second Corinthians 5: 6-10

6 Therefore having always confidence, knowing that, while we are in the body, we are absent from the Lord.

7 (For we walk by faith, and not by sight.)

8 But we are confident, and have a good will to be absent rather from the body, and to be present with the Lord.

9 And therefore we labour, whether absent or present, to please him.

10 For we must all be manifested before the judgement seat of Christ, that every one may receive the proper things of the body, according as he hath done, whether it be good or evil.

Alleluia

R. Alleluia, alleluia.

The seed is the word of God, Christ is the sower. All who come to him will live forever.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 4: 26-34

26 And he said: So is the kingdom of God, as if a man should cast seed into the earth,

27 And should sleep, and rise, night and day, and the seed should spring, and grow up whilst he knoweth not.

28 For the earth of itself bringeth forth fruit, first the blade, then the ear, afterwards the full corn in the ear.

29 And when the fruit is brought forth, immediately he putteth in the sickle, because the harvest is come.

30 And he said: To what shall we liken the kingdom of God? or to what parable shall we compare it?

31 It is as a grain of mustard seed: which when it is sown in the earth, is less than all the seeds that are in the earth:

32 And when it is sown, it groweth up, and becometh greater than all herbs, and shooteth out great branches, so that the birds of the air may dwell under the shadow thereof.

33 And with many such parables, he spoke to them the word, according as they were able to hear.

34 And without parable he did not speak unto them; but apart, he explained all things to his disciples.

✍️Br. Biniush Topno

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                             Praise the lord

इतवार, 13 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ इतवार

 

इतवार, 13 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ इतवार

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पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 17:22-24



22) “प्रभु-ईश्वर यह कहता है- मैं देवदार की फुनगी से, उसकी ऊँची-ऊँची शाखाओं से एक टहनी काटूँगा। उसे मैं स्वयं एक ऊँचे पहाड़ पर लगाऊँगा,

23) उसे मैं इस्राएल के ऊँचे पहाड़ पर लगाऊँगा। उस में डालियाँ निकल आयेंगी। वह फल उत्पन्न करेगा और एक शानदार देवदार बन जायेगा। नाना प्रकार के पक्षी उसके नीचे आ जायेंगे; वे उसकी डालियों की छाया में बसेरा करेंगे

24) और मैदान के सभी पेड़ जान लेंगे कि मैं प्रभु, ऊँचे वृक्ष को नीचा बना देता हूँ और नीचे वृक्ष को ऊँचा। मैं हरे वृक्ष को सूखा बना देता हूँ और सूखे वृक्ष को हरा। मैं, प्रभु जो कह चुका हूँ, उसे पूरा कर देता हूँ।“



दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 5:6-10



6) इसलिए हम सदा ईश्वर का भरोसा रखते हैं। हम यह जानते हैं, कि हम जब तक इस शरीर में हैं, तब तक हम प्रभु से दूर, परदेश में निवास करते हैं;

7) क्योंकि हम आँखों-देखी बातों पर नहीं, बल्कि विश्वास पर चलते हैं। हमें तो ईश्वर पर पूरा भरोसा है।

8) हम शरीर का घर छोड़ कर प्रभु के यहाँ बसना अधिक पसन्द करते हैं।

9) इसलिए हम चाहे घर में हों चाहे परदेश में, हमारी एकमात्र अभिलाषा यह है कि हम प्रभु को अच्छे लगे;

10) क्योंकि हम सबों को मसीह के न्यायासन के सामने पेश किया जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति ने शरीर में रहते समय जो कुछ किया है, चाहे वह भलाई हो या बुराई, उसे उसका बदला चुकाया जायेगा।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 4:26-34



26) ईसा ने उन से कहा, ’’ईश्वर का राज्य उस मनुष्य के सदृश है, जो भूमि में बीज बोता है।

27) वह रात को सोने जाता और सुबह उठता है। बीज उगता है और बढ़ता जाता है हालाँकि उसे यह पता नहीं कि यह कैसे हो रहा है।

28) भूमि अपने आप फसल पैदा करती है- पहले अंकुर, फिर बाल और बाद में पूरा दाना।

29 फ़सल तैयार होते ही वह हँसिया चलाने लगता है, क्योंकि कटनी का समय आ गया है।’’

30) ईसा ने कहा, ’’हम ईश्वर के राज्य की तुलना किस से करें? हम किस दृष्टान्त द्वारा उसका निरूपण करें?

31) वह राई के दाने के सदृश है। मिट्टी में बोये जाते समय वह दुनिया भर का सब से छोटा दाना है;

32) परन्तु बाद में बढ़ते-बढ़ते वह सब पौधों से बड़ा हो जाता है और उस में इतनी बड़ी-बड़ी डालियाँ निकल आती हैं कि आकाश के पंछी उसकी छाया में बसेरा कर सकते हैं।

33) वह इस प्रकार के बहुत-से दृष्टान्तों द्वारा लोगों को उनकी समझ के अनुसार सुसमाचार सुनाते थे।

34) वह बिना दृष्टान्त के लोगों से कुछ नहीं कहते थे, लेकिन एकान्त में अपने शिष्यों को सब बातें समझाते थे।



📚 मनन-चिंतन



आज वर्ष का ग्यारहवाँ इतवार है। आज के पहले पाठ एवं सुसमाचार में हम एक आर्दश पिता के बारे में सुनते हैं, जो हमेशा अपने बच्चों की भलाई की कामना करता हैं। और हर संभव उनकी आवश्यकताओं को पुरा करने का प्रयास करता है। वह इसके लिए योजना बनाता है एवं हर सपनों को पुरा करने का भरसक प्रयास करता है। इसे हम संत योहन के सुसमाचार 3:16 में पढ़ते हैं, ’’ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उसमें विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि वह अनंन्त जीवन प्राप्त करे।’’ ईश्वर हर व्यक्ति के जीवन में कार्य करता है जैसा कि वह प्रकृति के साथ करता है। वह सृष्टि के हर एक चीज पर अपनी उपस्थिति एवं कार्य बनाये रखता है।

आज के पहले पाठ मे ंहम सुनते हैं कि ईश्वर (इसा्रलियों) लोगों की भलाई की पहल करता है वह एक छोटी सी टहनी से शक्तिशाली पेड़ बनाता है। प्रभु कहता है, वह इस्राएल को ऊँचे पहाड़ पर लगायेगा और उसमें डालियाँ निकल आएगी (ऐजेकिएल 17:23)। इससे ईश्वर यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह इस्राएल को एक महान राष्ट्र बनायेगा।

दूसरे पाठ में संत पौलुस कुरिन्थ के विश्वासियों को बताते हैं कि हमें ईश्वर को प्रसन्न रखना है। वे आगे बताते हैं कि हमें प्रभु येसु ने एक नये सृष्टि बनना है। प्रभु येसु के अनुयायी होने के नाते प्रभु के समनरूप बनना है। संत पौलुस की भी यही इच्छा थी कि वे भी हमेशा प्रभु के लिए एक नया जीवन जीयें।

आज के सुसमाचार में दो दृष्टांत है जो ईश्वर के राज्य की रहस्यों के बारे में बताते हैं इसके लिए वह बीज और पौधे का उपयोग करते हैं जिस प्रकार जब बीज बोया जाता है तो वह अंकुरित होकर बिना किसी बाहय दबाव से बढ़ता है उसी प्रकार हमारा ख्रीस्तीय विश्वास भी बढ़ता है जब हम ईश्वर पर सब कुछ समर्पित करते हैं और उसी प्रकार पौधा भी जब बढ़कर पेड़ में परिर्वत हो जाता है तब वह सबको आश्रय देता, और पंछी उसकी छाया में बसेरा करते हैं। (मारकुस 4:32)


फादर आइजक एक्का

📚 REFLECTION




Today is the eleventh Sunday of the year. In today’s first reading and in the gospel we hear about the benevolent father, who always wishes for the wellbeing of his children, and tries to fulfil every need. For this he plans a dream and dreams for them. He is a benevolent father who cares for his children. We read in gospel of John3:16, “For God so loved the world that he gave his only son, so that everyone who believes in him may not perish but may have eternal life.” God works in every human person as he would work in nature. We can see how God causes for each single item of his creation and builds into his own presence and action.

In today’s first reading we hear that God takes initiative for the wellbeing of the people of Israel. He causes a small shoot to grow into a mighty tree. God says he will plant Israel on high mountain and its branches shall spread (Ez.17:23); with this God wished to make Israel a great nation.

In the second reading Paul reminds the Corinthian that we need to always please God. And further he says that we have to become a new creation in Christ. As a follower of Christ we need to be like Christ. This was also the aim of Paul that we have to live a new life in Christ.

In the gospel today we have two parables concerning the growth and the mystery of the kingdom of God. For this he uses the images of seed and the plant. As the seed is sown it first sprouts and grows without any hindrance, likewise our Christian life grows without any external hurdles when we submit ourselves to God. And as the plant grows and becomes a tree, it gives shade and the birds make shelter in it (Mk.4:32).



 -Fr. Isaac Ekka

मनन-चिंतन-2


आज के सुसमाचार में प्रभु येसु कहते हैं, "ईश्वर का राज्य उस मनुष्य के सदृश है, जो भूमि में बीज बोता है। वह रात को सोने जाता और सुबह उठता है। बीज उगता है और बढ़ता जाता है हालाँकि उसे यह पता नहीं कि यह कैसे हो रहा है। भूमि अपने आप फसल पैदा करती है- पहले अंकुर, फिर बाल और बाद में पूरा दाना। फ़सल तैयार होते ही वह हँसिया चलाने लगता है, क्योंकि कटनी का समय आ गया है।" किसान खेत में मेहनत तो ज़रूर करता है, परन्तु वह यह नहीं कह सकता कि मैंने कुछ पैदा किया है। फ़सल तो ईश्वर की देन है। स्तोत्र 127:1-2 में हम पढ़ते हैं, “यदि प्रभु ही घर नहीं बनाये, तो राजमन्त्रियों का श्रम व्यर्थ है। यदि प्रभु ही नगर की रक्षा नहीं करे, तो पहरेदार व्यर्थ जागते हैं। कठोर परिश्रम की रोटी खानेवालो! तुम व्यर्थ ही सबेरे जागते और देर से सोने जाते हो; वह अपने सोये हुए भक्त का भरण-पोषण करता है।”

हमारे बच्चे भी ईश्वर के वरदान है। काईन को जन्म देने के बाद हेवा ने कहा, ''मैंने प्रभु की कृपा से एक मनुष्य को जन्म दिया'' (उत्पत्ति 4:1) ईश्वर ने पति-पत्नियों को विवाह संस्कार के अंतर्गत बच्चे पैदा करने की क्षमता दी है, परन्तु वास्तव मे बच्चे ईश्वर की देन है। उत्पत्ति 20:1-2 में हम देखते हैं, कि “जब राहेल ने देखा कि उससे याकूब को कोई पुत्र नहीं हुआ है, तब वह अपनी बहन से जलने लगी और उसने याकूब से कहा, ''मुझे बाल-बच्चे दो, नहीं तो मैं मर जाऊँगी'' याकूब को राहेल पर क्रोध आ गया। वह कहने लगा, ''मैं क्या ईश्वर बन सकता हूँ। उसी ने तो तुम्हें सन्तान से वंचित किया।'' ईश्वर ने इब्राहीम और सारा को उनके बुढ़ापे में एक बच्चे का वरदान दिया।

हम हर कार्य के लिए ईश्वर पर निर्भर है। इसलिए स्तोत्रकार कहते हैं,“यदि प्रभु ने हमारा साथ नहीं दिया होता, तो जब लोगों ने हम पर चढ़ाई की और हम पर उनका क्रोध भड़का, तब वे हमें जीवित ही निगल गये होते। बाढ़ हमें डुबा गयी होती, प्रचण्ड धारा ने हमें बहा दिया होता और चारों ओर उमड़ती लहरों में हम डूब कर मर गये होते।” (स्तोत्र 124:2-5) संत याकूब हम से कहते हैं, “आप लोग जो यह कहते हैं, "हम आज या कल अमुक नगर जायेंगे, एक वर्ष तक वहाँ रह कर व्यापार करेंगे और धन कमायेंगे", मेरी बात सुनें। आप नहीं जानते कि कल आपका क्या हाल होगा। आपका जीवन एक कुहरा मात्र है- वह एक क्षण दिखाई दे कर लुप्त हो जाता है। आप लोगों को यह कहना चाहिए, "यदि ईश्वर की इच्छा होगी, तो हम जीवित रहेंगे और यह या वह काम करेंगे"। याकूब 4:13-15)

इसी कारण हमें ईश्वर के प्रति हमेशा कृतज्ञ बने रहना चाहिए। एक डाक्टर ने एक 65 साल के मरीज के हृदय का ऑपरेशन किया। उसे यह कहा गया कि कम से कम 5 साल के लिए उसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। ऑपरेशन का खर्च था 3 लाख रुपये। बिल देख कर उस मरीज ने ईश्वर को धन्यवाद दिया। डाक्टर को आश्चर्य हुआ और उन्होंने उस मरीज से पूछा, “मैंने सोचा कि आप इतना बडा बिल देख कर दुखी होंगे। परन्तु आप खुशी से ईश्वर को धन्यवाद दे रहे हैं। ऐसा क्यों?” तब उसने उत्तर दिया, “आप पाँच साल मेरे हृदय को चलाने के लिए 3 लाख रुपये ले रहे हैं। परन्तु पिछले 65 सालों में उसे चलाने के लिए मेरे ईश्वर ने मुझ से एक पैसा नहीं लिया। यह सोच कर मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ।“

राजाओं तथा शासकों को भी ईश्वर के अधिकार का आदर करना चाहिए। प्रज्ञा ग्रन्थ 6:1-5 में कहा गया है, “राजाओें! सुनो और समझो। पृथ्वी भर के शासको! शिक्षा ग्रहण करो। तुम, जो बहुसंख्यक लोगों पर अधिकार जताते हो और बहुत-से राष्ट्रों का शासन करने पर गर्व करते हो, मेरी बातों पर कान दो; क्योंकि प्रभु ने तुम्हें प्रभुत्व प्रदान किया, सर्वोच्च ईश्वर ने तुम्हे अधिकार दिया। वही तुम्हारे कार्यों का लेखा लेगा और तुम्हारे विचारों की जाँच करेगा। तुम उसके राज्य के सेवक मात्र हो। इसलिए यदि तुमने सच्चा न्याय नहीं किया, विधि का पालन नहीं किया और ईश्वर की इच्छा पूरी नहीं की, तो वह भीषण रूप में अचानक तुम्हारे सामने प्रकट होगा; क्योंकि उच्च अधिकारियों का कठोर न्याय किया जायेगा।” समुएल के पहले ग्रन्थ, अध्याय 17 में हमे देखते हैं कि दाऊद फ़िलिस्ती महापराक्रमी गोलयत से कहते हैं, “तुम तलवार, भाला और बरछी लिये मुझ से लड़ने आ रहे हो। मैं तो विश्वमण्डल के प्रभु, इस्राएली सेनाओं के ईश्वर के नाम पर तुम से लड़ने आ रहा हूँ, जिसे तुमने चुनौती दी है।” उसी ईश्वर की शक्ति से बालक दाऊद ने फिलिस्ती महापराक्रमी को मार गिराया। बाद में दाऊद भी घमण्ड कर अपनी ताकत पर भरोसा रख कर जनगणना की आज्ञा दे कर पाप करते हैं। न्यायकर्ता के ग्रन्थ अध्याय 7 में हम देखते हैं कि गिदओन 32,000 सैनिकों को लेकर मिदियानियों के विरुध्द युध्द करने जाते हैं, तब ईश्वर उन से कहते हैं, "तुम्हारे पास लोगों की संख्या बहुत अधिक है। इसलिए मैं मिदयानियों को उनके हाथ नहीं दूँगा, क्योंकि इस से इस्राएली डींग मारेंगे कि हमने अपने बाहुबल से अपना उद्धार किया है।“ तब प्रभु 31,700 सैनिकों वापस भेजने की आज्ञा देते है। ईश्वर की शक्ति पर निर्भर रह कर गिदयोन ने केवल 300 सैनिकों के साथ युध्द में जा कर मिदियानियों को पराजित किया।

इस प्रकार पवित्र वचन हमें यह शिक्षा देता है कि ईश्वर के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। प्रभु येसु कहते हैं, “जिस तरह दाखलता में रहे बिना डाली स्वयं नहीं फल सकती, उसी तरह मुझ में रहे बिना तुम भी नहीं फल सकते”। योहन 15:4)



-Br. Biniush Topno

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शनिवार, 12 जून, 2021 कुँवारी मरियम का निष्कलंक हृदय - अनिवार्य स्मृति

 

शनिवार, 12 जून, 2021

कुँवारी मरियम का निष्कलंक हृदय - अनिवार्य स्मृति

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पहला पाठ : इसायाह 61:9-11



9) उनके वंशज राष्ट्रों में प्रसिद्ध होंगे और उनकी सन्तति का नाम देश-विदेश में फैलेगा। उन्हें देखने वाले सब-के-सब जान जायेंगे कि वे प्रभु की चुनी हुई प्रजा है।“

10) मैं प्रभु में प्रफुल्लित हो उठता हूँ, मेरा मन अपने ईश्वर में आनन्द मनाता है। जिस प्रकार वह याजक की तरह मौर बाँध कर और वधू आभूषण पहन कर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार प्रभु ने मुझे मुक्ति के वस्त्र पहनाये और मुझे धार्मिकता की चादर ओढ़ा दी है।

11) जिस प्रकार पृथ्वी अपनी फ़सल उगाती है और बाग़ बीजों को अंकुरित करता है, उसी प्रकार प्रभु-ईश्वर सभी राष्ट्रों में धार्मिकता और भक्ति उत्पन्न करेगा।



सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 2:41-51



41) ईसा के माता-पिता प्रति वर्ष पास्का पर्व के लिए येरुसालेम जाया करते थे।

42) जब बालक बारह बरस का था, तो वे प्रथा के अनुसार पर्व के लिए येरुसालेम गये।

43) पर्व समाप्त हुआ और वे लौट पडे़; परन्तु बालक ईसा अपने माता-पिता के अनजाने में येरुसालेम में रह गया।

44) वे यह समझ रहे थे कि वह यात्रीदल के साथ है; इसलिए वे एक दिन की यात्रा पूरी करने के बाद ही उसे अपने कुटुम्बियों और परिचितों के बीच ढूँढ़ते रहे।

45) उन्होंने उसे नहीं पाया और वे उसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते येरुसालेम लौटे।

46) तीन दिनों के बाद उन्होंने ईसा को मन्दिर में शास्त्रियों के बीच बैठे, उनकी बातें सुनते और उन से प्रश्न करते पाया।

47) सभी सुनने वाले उसकी बुद्धि और उसके उत्तरों पर चकित रह जाते थे।

48) उसके माता-पिता उसे देख कर अचम्भे में पड़ गये और उसकी माता ने उस से कहा “बेटा! तुमने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? देखो तो, तुम्हारे पिता और मैं दुःखी हो कर तुम को ढूँढते रहे।“

49) उसने अपने माता-पिता से कहा, “मुझे ढूँढ़ने की ज़रूरत क्या थी? क्या आप यह नहीं जानते थे कि मैं निश्चय ही अपने पिता के घर होऊँगा?“

50) परन्तु ईसा का यह कथन उनकी समझ में नहीं आया।

51) ईसा उनके साथ नाज़रेत गये और उनके अधीन रहे। उनकी माता ने इन सब बातों को अपने हृदय में संचित रखा।



📚 मनन-चिंतन



आज के पहले पाठ में संत पौलुस अपने श्राताओं को याद दिलाते हैं कि वे मसीह में एक नये सृष्टि बन गये हैं। यदि कोई मसीह के साथ एक हो गया है, तो वह नयी सृष्टि बन गया है (2 कुरिन्थ 5:17)। मसीह मनुष्यों के प्रेम के कारण मरे और जी उठे हैं। इसीलिए मसीह का प्रेम हमारे हदयों में उमड़ पड़ा है। पौलुस कहते हैं कि यह सब ईश्वर ने किया है-उसने मसीह के द्वारा अपने से मेल कराया है। और हमारे अपराध उनके खर्चे में न लिखकर मसीह द्वारा अपने साथ संसार का मेल कराया है।

आज के सुसमाचर में प्रभु येसु शपथ और प्रतिज्ञा के बारे में बताते हैं कि झूठी शपथ कभी नहीं खानी चाहिए और प्रभु के सामने खायी शपथ हमेशा पुरी करना चाहिए (मत्ती 5:33) हमें किसी के सामने शपथ लेने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि हम ईश्वर के सामने शुन्य हैं। हम लेवी ग्रन्थ मे पढ़ते हैं-’’अपने ईश्वर का नाम अपवित्र करते हुए मेरे नाम की झूठी शपथ मत लो। मैं प्रभु हूँ।’’ (लेवी ग्रन्थ 19:12) प्रभु ने मुझे यह आदेश दिया है। यदि कोई प्रभु के लिए मन्नत या शपथ खाकर कोई दायित्व स्वीकार करता है, तो वह अपना वचन भंग न करे, बल्कि अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उसका ठीक-ठीक पालन करें। (गणना ग्रन्थ 30:3)।

आइये हम प्रभु के वचन को स्वीकार करें और हमेशा संजोये रखने का प्रयास करें। हमारी बात इतनी हो हाँ की हाँ, नहीं की नहीं (मत्ती 5:37)।



📚 REFLECTION




In the first reading, Paul reminds his listeners that they have become new creation in Christ. If anyone is in Christ, there is a new creation. (2cor5:17). Because of the love of the humanity Christ died on the cross and rose again. And that is why the love of Christ is flowing in us. St Paul says that, “All this is from God, who reconciled us to himself through Christ. And that is, in Christ God was reconciling the world to himself, not counting their trespasses against them, and entrusting the message of reconciliation to us.

In today’s gospel Jesus tells about oaths and promises. We should never swear falsely, but carry out the vows made before God (Mt.5:33). No one has the right to take oaths and promises, because we are insignificant before God. We read in the book of Leviticus 19:12, “And you shall not swear falsely by my name, profaning the name of your God: I am the Lord”. The Lord has commanded us that, when a man makes a vow to the Lord, or swears an oath to bind himself by a pledge, he shall not break his word; he shall do according to all that proceeds out of his mouth (Num.30:2).Let us accept the word of the Lord and try to assimilate it. “Let our words be ‘yes, ‘yes or ‘no, ‘no (Mt5:37).



 -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 11 जून, 2021

येसु के पवित्रतम हृदय का महोत्सव


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पहला पाठ : होशेआ 11:1, 3-4, 8स-9



1) इस्राएल जब बालक था, तो मैं उसे प्यार करता था और मैंने मिस्र देश से अपने पुत्र को बुलाया।

3) मैंने एफ्राईम को चलना सिखाया। मैं उन्हें गोद में उठाय करता था, किन्तु वे नहीं समझे कि मैं उनकी देखरेख करता था।

4) मैं उन्हें दया तथा प्रेम की बागडोर से टहलाता था। जिस तरह कोई बच्चे को उठा कर गले लगाता है, उसी तरह मैं भी उनके साथ व्यवहार करता था। मैं झुक कर उन्हें भोजन दिया करता था।

8) एफ्राईम! मैं तुम्हें कैसे त्याग दूँ? इस्राएल! मैं तुम्हें कैसे शत्रु के हाथों सौप दूँ? मैं तुम्हें अदमा के समान कैसे राख में मिला दूँ? मैं तुम्हें सबोयीम के समान कैसे भस्म कर दूँ? मेरा हृदय यह नहीं मानता, मुझ में दया उमड आती है।

9) मैं अपना क्रोध भडकने नहीं दूँगा, मैं फिर एफ्राईम का विनाश नहीं करूँगा, क्योंकि मैं मनुय नहीं, ईश्वर हूँ। मैं तुम्हारे बीच परमपावन प्रभु हूँ- मुझे विनाश करने से घृणा है।



दूसरा पाठ: एफेसियों 3:8-12, 14-19



8) मुझे, जो सतों में सब से छोटा हूँ, यह वरदान मिला है कि मैं गैर-यहूदियों को मसीह की अपार कृपानिधि का सुसमाचार सुनाऊँ

9) और मुक्ति-विधान का वह रहस्य पूर्ण रूप से प्रकट करूँ, जिसे समस्त विश्व के सृष्टिकर्ता ने अब तक गुप्त रखा था।

10) इस तरह, कलीसिया के माध्यम से स्वर्ग के दूत ईश्वर की बहुविध प्रज्ञा का ज्ञान प्राप्त करेंगे।

11) ईश्वर ने अनन्त काल से जो उद्देश्य अपने मन में रखा, उसने उसे हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा पूरा किया।

12) हम मसीह में विश्वास करते हैं और इस कारण हम पूरे भरोसे के साथ निर्भय हो कर ईश्वर के पास जाते हैं।

14 (14-15) मैं उस पिता के सामने, जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर प्रत्येक परिवार का मूल आधार है, घुटने टेक कर यह प्रार्थना करता हूँ

16) कि वह अपने आत्मा द्वारा आप लोगों को अपनी अपार कृपानिधि से आभ्यन्तर शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें,

17) जिससे विश्वास द्वारा मसीह आपके हृदयों में निवास करें, प्रेम में आपकी जड़ें गहरी हों और नींव सुदृढ़ हो।

18) इस तरह आप लोग अन्य सभी सन्तों के साथ मसीह के प्रेम की लम्बाई, चैड़ाई, ऊँचाई और गहराई समझ सकेंगे।

19) आप लोगों को उनके प्रेम का ज्ञान प्राप्त होगा, यद्यपि वह ज्ञाने से परे है। इस प्रकार आप लोग, ईश्वर की पूर्णता तक पहुँच कर, स्वयं परिपूर्ण हो जायेंगे।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 19:31-37



31) वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन कू्रस पर रह जाये क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्यौहार पडता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड दी जाये और शव हटा दिये जायें।

32) इसलिये सैनिकों ने आकर ईसा के साथ क्रूस पर चढाये हुये पहले व्यक्ति की टाँगें तोड दी, फिर दूसरे की।

33) जब उन्होंने ईसा के पास आकर देखा कि वह मर चुके हैं तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोडी;

34) लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।

35) जिसने यह देखा है, वही इसका साक्ष्य देता है, और उसका साक्ष्य सच्चा है। वह जानता है कि वह सच बोलता है, जिससे आप लोग भी विश्वास करें।

36) यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उसकी एक भी हड्डी नहीं तोडी जायेगी;

37) फिर धर्मग्रन्थ का एक दूसरा कथन इस प्रकार है- उन्होंने जिसे छेदा, वे उसी की ओर देखेगें।



📚 मनन-चिंतन



आज हम प्रभु येसु के पवित्र हदय का पर्व मनाते हैं। प्रभु येसु के पवित्र हदय हम मानवों के लिए अथाह प्रेम का चिन्ह है। प्रभु येसु इसे अपने जीवन, दुःख भोग एवं मृत्यु द्वारा हमें प्रदर्शित करते हैं। यदि हमें प्रभु येसु के प्यार की गहराई को समझना है तो हमें उनके हदय जो हमारे लिए छेदा गया, उसेे देखना होगा। यही कारण था कि उन्होंने क्रूस पर से हमें पाप और उसकी गुलामी से मुक्त किया। सच्चा प्यार कभी कीमत पर निर्भर नहीं रहता, लेकिन सब कुछ सह लेता है। प्रभु येसु का पवित्र क्रूस उनके प्यार का चिन्ह है जो हमारे लिए छेदा गया। कौन ईश्वर के इस प्रेम के गहराई को समझ सकता है? वही समझ सकता है जो पश्चातापी हदय से ईश्वर की प्रेम को जो प्रभु येसु में देखता है। प्रभु हमें इस प्रेम को अपने जीवन को समर्पित करने एवं एक दूसरे के प्रेम से प्रदर्शित करने का निमत्रंण देते हैं।

पहले पाठ नबी होसेया बताते हैं, ईश्वर एक पिता की तरह अपने प्रिय पुत्र से बात करते हैं। उसे चलना सिखाता है, अपने गोद में लेता है और उनकी देखरेख करता है। ईश्वर सब कुछ हमारे लिए अपने प्रेम के कारण करता है।

दूसरे पाठ में संत पौलुस एफेसियों को बताते हैं कि ईश्वर का प्रेम हमारे लिए अपार कृपा निधि हैं। यह हमें ईश्वर के प्रेम को जानने में हमारी सहायता करता है। आज जब हम प्रभु येसु के अनन्त प्रेम का पर्व मनाते हैं, आइये हम उनके प्रेम को पहचानने का प्रयास करें और अपनी इच्छाओं को उनकी इच्छा के अनुरूप बना सकें।




📚 REFLECTION




Today we celebrate the feast of the Sacred Heart of Jesus. Special love expressed through the life, sufferings and death of Jesus. If we want to fathom the love of God’s love, which was pierced with a lance for our sake, we have to gaze at his love. This is the reason why he went on the cross to redeem us from the slavery of sin and death. The true love does not count the cost, but gives everything for the beloved. The cross shows the love of Christ broken and pierced for our sake. Who can fathom the love of God? Only a broken and contrite heart can fathom the mercy of God revealed in Jesus Christ. The Lord Jesus calls us to lay down our lives in sacrificial love for one another.

In the first reading Hosea speaks that God speaks to us as a parent speaking to his son. He teaches him to walk, takes on his lap and looks after. God does everything for the sake of love. In the second reading, Paul speaks to the Ephesians that God’s love is a God’s gift of grace. This helps us to know the love of God and try to comprehend his will.


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 10 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

गुरुवार, 10 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 3:15-4:1,3-6



15) जब मूसा का ग्रन्थ पढ़ कर सुनाया जाता है, तो उनके मन पर आज भी वह परदा पड़ा रहता है।

16) किन्तु जब कोई प्रभु की ओर अभिमुख हो जाता है, तो वह परदा हटा दिया जाता है;

17) क्योंकि प्रभु तो आत्मा है, और जहाँ प्रभु का आत्मा है, वहाँ स्वतन्त्रता है।

18) जहाँ तक हम सबों का प्रश्न है, हमारे मुख पर परदा नहीं है और हम सब दर्पण की तरह प्रभु की महिमा प्रतिबिम्बित करते हैं। इस प्रकार हम धीरे-धीरे उसके महिमामय प्रतिरूप में रूपान्तरित हो जाते हैं और वह रूपान्तरण प्रभु अर्थात् आत्मा का कार्य है।

4:1) ईश्वर की दया ने हमें यह सेवा-कार्य सौंपा है, इसलिए हम कभी हार नहीं मानते।

3) यदि हमारा सुसमाचार किसी तरह गुप्त या अस्पष्ट है, तो उन लोगों के लिए, जो विनाश के मार्ग पर चलते हैं।

4) इस संसार के देवता ने अविश्वासियों का मन इतना अन्धा कर दिया है कि वे ईश्वर के प्रतिरूप, मसीह के महिमामय सुसमाचार की ज्योति को देखने में असमर्थ हैं।

5) हम अपना नहीं, बल्कि प्रभु ईसा मसीह का प्रचार करते हैं। हम ईसा के कारण अपने को आप लोगों का दास समझते हैं।

6) ईश्वर ने आदेश दिया था कि अन्धकार में प्रकाश हो जाये। उसी ने हमारे हृदयों को अपनी ज्योति से आलोकित कर दिया है, जिससे हम ईश्वर की वह महिमा जान जायें, जो मसीह के मुखमण्डल पर चमकती है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:20-26



(20) मैं तुम लोगों से कहता हूँ - यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फ़रीसियों की धार्मिकता से गहरी नहीं हुई, तो तुम स्वर्गराज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

(21) "तुम लोगों ने सुना है कि पूर्वजों से कहा गया है- हत्या मत करो। यदि कोई हत्या करे, तो वह कचहरी में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा।

(22) परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ - जो अपने भाई पर क्रोध करता है, वह कचहरी में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा। यदि वह अपने भाई से कहे, ’रे मूर्ख! तो वह महासभा में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा और यदि वह कहे, ’रे नास्तिक! तो वह नरक की आग के योग्य ठहराया जायेगा ।

(23) "जब तुम वेदी पर अपनी भेंट चढ़ा रहे हो और तुम्हें वहाँं याद आये कि मेरे भाई को मुझ से कोई शिकायत है,

(24) तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ कर पहले अपने भाई से मेल करने जाओ और तब आ कर अपनी भेंट चढ़ाओ।

(25) "कचहरी जाते समय रास्ते में ही अपने मुद्दई से समझौता कर लो। कहीं ऐसा न हो कि वह तुम्हें न्यायाकर्ता के हवाले कर दे, न्यायाकर्ता तुम्हें प्यादे के हवाले कर दे और प्यादा तुम्हें बन्दीगृह में डाल दे।

(26) मैं तुम से यह कहता हूँ - जब तक कौड़ी-कौड़ी न चुका दोगे, तब तक वहाँ से नहीं निकल पाओगे।



📚 मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार संत मत्ती 5:20-26, में हम सुनते हैं कि हमें किस प्रकार अधार्मिकता को नियंत्रित करना है, हमारी मानवीय स्वभाव है कि हम क्रोध, बदले की भवना, बुरी आदतें और घृणा से ग्रसित हैं। मैं समझता हूँ कि इस प्रकार की भावनाओं से कोई भी व्याक्ति अच्छूता नहीं है। इसे हम उत्पत्ति ग्रन्थ 4:6-7 में पाते हैं। प्रभु ने काइन से कहा, ’’तुम क्यों क्रोध करते हो और तुम्हारा चेहरा क्यों उतरा हुआ है? जब तुम भला करोगे, तो प्रसन्न होगे। यदि तुम भला नहीं करोगे, तो पाप हिंस्र पशु की तरह तुम पर झपटने के लिए तुम्हारे द्वार पर घात लगा कर बैठेगा। क्या तुम उसका दमन कर सकोगे? इस प्रकार की भावनाएँ हमारे जीवन का अंग है। हमारी भावनाएँ अच्छी या बुरी हो सकती है। अच्छी भावनाएँ हमें सदगुणों से सम्पन्न करती है, जबकि अवगुण हमें बुरी विचारों से भरकर बुरी सोचने के लिए बाध्य करता है।

आज प्रभु येसु अपने शिष्यों और हमें बताते हैं कि कैसे सही गुणों का चुनाव किया जाए। हम उन गुणों का चुनाव करें जिससे हमारी अधार्मिकता दूर हो सके। जैसे प्रेम, आशा, दया और विश्वास। सुसमाचार में हम पाते हैं कि नाकेदार, वेश्याएँ, परस्त्रीगामियों, अपराधियों समाज से तिरष्कृत लोगों ने प्रभु येसु को पहचाना, लेकिन स्थापित धार्मिक अधिकारियों ने नहीं। धर्मान्तरित अपने विश्वास पर हमेशा प्रसंनचित होगें क्योंकि उन्होंने अपने पुराने गहरे घाव (तिनका) अपने हदय में बसा था। और जो आंधे थे वे हमेशा खुशी महसूस करेगें क्योंकि उन्होंने अंधकार से ज्योति में प्रवेश किया।




📚 REFLECTION




In today’s gospel reading Mt.5: 20-26, we hear that how we need to control our unrighteousness. It is our human nature that we are easily prone to anger, hatred, jealousy, evil intention creep in us. I think from these nobody is an exception. We find it in Gen.4:6-7, The Lord said to Cain, “why are you angry and why has your countenance fallen? If you do well, will you not be accepted? And if you do not do well, sin is lurking at the door; its desire is for you, but you must master it.” As human beings we experience these emotions in our life. They are part and parcel of our life. Our emotions can be positive or negative. Positive emotions lead us to do well, whereas negative emotions compel us to think contrary or opposite.

Today Jesus tells his disciples choose the right perspective of life. We need to choose right perspective which enables us to overcome our unrighteousness. We find in the gospels that the tax collectors, prostitutes, adulterers, criminals, rejects of the society recognised who Christ was before most of the established religious authorities did. Converts to the faith will always have a much deeper appreciation for the faith because they had a deeper wound (splinter) in their heart. The blind will always cherish their sight more than those could see because they went from darkness to light.



 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 09 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 09 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 3:4-11



4) हम यह दावा इसलिए कर सकते हैं कि हमें मसीह के कारण ईश्वर पर भरोसा है।

5) इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी कोई अपनी योग्यता है। हम अपने को किसी बात का श्रेय नहीं दे सकते। हमारी योग्यता का स्त्रोत ईश्वर है। उसने हमें एक नये विधान के सेवक होने के योग्य बनाया है

6) और यह विधान अक्षरों का नहीं, बल्कि आत्मा का है; क्योंकि अक्षर तो घातक हैं, किन्तु आत्मा जीवनदायक हैं।

7) उस विधान के अक्षर पत्थर पर अंकित थे और उसके द्वारा प्राणदण्ड दिया जाता था। फिर भी उसकी महिमामय घोषणा के फलस्वरूप मूसा का मुखमण्डल इतना दीप्तिमय हो गया था कि इस्राएली उस पर आँख जमाने में असमर्थ थे, यद्यपि मूसा के मुखमण्डल की दीप्ति अस्थायी थी।

8) यदि पुराना विधान इतना महिमामय था, तो आत्मा का विधान कहीं अधिक महिमामय होगा।

9) यदि दोषी ठहराने वाले विधान का सेवा-कार्य इतना महिमामय था, तो दोषमुक्त करने वाले विधान का सेवा-कार्य कहीं अधिक महिमामय होगा।

10) इस वर्तमान परमश्रेष्ठ महिमा के सामने वह पूर्ववर्ती महिमा अब निस्तेज हो गयी है।

11) यदि अस्थायी विधान इतना महिमामय था, तो चिरस्थायी विधान कहीं अधिक महिमामय होगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:17-19



(17) "यह न समझो कि मैं संहिता अथवा नबियों के लेखों को रद्द करने आया हूँ। उन्हें रद्द करने नहीं, बल्कि पूरा करने आया हूँ।

(18) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - आकाश और पृथ्वी भले ही टल जाये, किन्तु संहिता की एक मात्रा अथवा एक बिन्दु भी पूरा हुए बिना नहीं टलेगा।

(19) इसलिए जो उन छोटी-से-छोटी आज्ञाओं में एक को भी भंग करता और दूसरों को ऐसा करना सिखाता है, वह स्वर्गराज्य में छोटा समझा जायेगा। जो उनका पालन करता और उन्हें सिखाता है, वह स्वर्गराज्य में बड़ा समझा जायेगा।



📚 मनन-चिंत


आज के सुसमाचार में केवल तीन ही पद है। तथापि, यह एक शाक्तिशाली संदेश है। प्रभु येसु अपने शिष्यों को यह कहते हुए शुरूआत करते हैं कि उनका उद्द्ेश्य संहिता को रद्द करना या आलोचना करना नहीं था जिन्हें नबियों ने घोषित और सिखाया था प्रभु येसु की इच्छा सभी लेखों को पुरा करना था। प्रभु येसु जोर देकर कहते हैं कि आज्ञाओं का पालन करना आवश्यक है।

हलाँकि फरीसियों की दृष्टि में, प्रभु येसु ने यहुदियों की आज्ञाओं का उलंघन भी किया। वे उनेकों बार प्रभु येसु की आलोचना किए कि वे उनके आज्ञाओं का पालन नहीं करते ऐसा उन्होंने विश्वास किया कि वे उन्हें इनका पालन करना चाहिए और उनके पास आलोचना करने का आधार था। उन्होंने उन लेखों को नहीं अपनाया जैसा फरीसियों में सोचा और पालन किया। फरीसियों ने लेखों का अक्षरसः पालन किया।

प्रभु येसु हलाँकि एक अलग तरह के लेख को अपनाया, प्रेम के लेख। प्रभु येसु बहुधा यहुदियों के लेखों और परम्पराओं का पालन किया। तथपि, जब भी मनुष्यों की आवश्यकता की जरूरत थी, तो उन्होंने प्रेम और दया को अपनाया, प्रभु येसु ईश्वर के लेख के अनुसार जीवन जीया। हाँ उनके लिए सभी आज्ञाएँ महत्वपूर्ण एवं आश्वयक है। प्रभु येसु के लिए पहले दो आज्ञाएँ महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। प्रभु येसु के लिए पहले दो आज्ञाएँ बाकी सभी आज्ञाओं का आधार है ईश्वरीय प्रेम और पड़ोसी प्रेम।



📚 REFLECTION



The gospel reading of today has only three verses. However, it has a powerful message. Jesus begins by telling his disciples that his purpose is not to abolish law or to criticize what the prophets proclaimed and taught. Jesus’ intent was to fulfil the law. Jesus emphasises that keeping the commandment is essential.

However, in the eyes of the Pharisees, Jesus frequently disobeyed Jewish law. They often criticized him for not following the law- at least as they believed it should be obeyed. And they did have grounds for their criticism of Jesus. He did not follow the law as the Pharisees thought it should be followed. The Pharisees lived by the letter of the law.

Jesus however, lived by a different law, the law of love! He followed most of the Jewish laws and customs. However, when it came to people in need of love and compassion, he lived by the law of God! Yes, all the commandments are important and necessary. For Jesus, the first two commandments are the foundation for the other eight commandments: love of God and love of neighbour.


 -Br Biniush Topno



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मंगलवार, 08 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 08 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 1:18-22



18) ईश्वर की सच्चाई की शपथ! मैंने आप लोगों को जो सन्देश दिया, उस में कभी ’हाँ’ और कभी ’नहीं’-जैसी बात नहीं है;

19) क्योंकि सिल्वानुस, तिमथी और मैंने आपके बीच जिनका प्रचार किया, उन ईश्वर के पुत्र ईसा मसीह में कभी ’हाँ’ और कभी ’नहीं’-जैसी बात नहीं - उन में मात्र ’हाँ’ है।

20) उन्हीं में ईश्वर की समस्त प्रतिज्ञाओं की ’हाँ’ विद्यमान है, इसलिए हम ईश्वर की महिमा के लिए उन्हीं के द्वारा ’आमेन’ कहते हैं।

21) ईश्वर आप लोगों के साथ हम को मसीह में सुदृढ़ बनाये रखता है और उसी ने हमारा अभिशेक किया है।

22) उसी ने हम पर अपनी मुहर लगायी और अग्रिम के रूप में हमारे हृदयों को पवित्र आत्मा प्रदान किया है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:13-16



(13) "तुम पृथ्वी के नमक हो। यदि नमक फीका पड़ जाये, तो वह किस से नमकीन किया जायेगा? वह किसी काम का नहीं रह जाता। वह बाहर फेंका और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाता है।

(14) "तुम संसार की ज्योति हो। पहाड़ पर बसा हुआ नगर छिप नहीं सकता।

(15) लोग दीपक जला कर पैमाने के नीचे नहीं, बल्कि दीवट पर रखते हैं, जहाँ से वह घर के सब लोगों को प्रकाश देता है।

(16) उसी प्रकार तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सामने चमकती रहे, जिससे वे तुम्हारे भले कामों को देख कर तुम्हारे स्वर्गिक पिता की महिमा करें।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार पर्वत प्रवचन में हम सुनते हैं कि प्रभु येसु हमें नमक और ज्योति के बारे में बताते हैं। नमक की अपने आप में कोई उपयोगिता नहीं है। यदि हमें कितनी ही मँहगी और स्वादिष्ट भोजन दिया जाए यदि उसमें नमक ना हो तो वह फीका ही समझा जायेगा। वह फेका और पैरों तले रौंदा जाता है। दोनों नमक और ज्योति अपने गुणों द्वारा अपने आस-पास के लोगों और वस्तुओं को प्रभावित करते हैं। नमक का अर्थ है कि हम अपने अच्छे गुणों द्वारा उनके जीवन को प्रभावित कर प्रभु येसु के असीम प्रेम को दूसरों तक अपने अच्छे कार्यों द्वारा दिखा सकें। नमक का उपयोग वस्तु को सड़ने या गलने से रोकने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है। उसी प्रकार ज्योति के महत्व को हम तब समझते हैं जब हम अंधकार में फंस जाते हैं।

हमें अपने ख्रीस्तीय जीवन में नमक और ज्योति तरह बनकर दुसरों के लिए सार्थक और उपयोगी बनना है। यही हमारे ख्रीस्तीय जीवन का सार है। इसीलिए प्रभु येसु हमे संत योहन के सुसमाचार 01:4-5 में कहते हैं, उसमें जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था। वह ज्योति अंधकार में चमकती रहती है - अंधकार ने उसे नहीं बुझाया।



📚 REFLECTION



In today’s gospel reading Sermon on the Mount, we hear very important things told by Jesus about salt and light. Salt by itself has no utility. If we are served a costly and delicious meal; but if it has no salt then it will be of no use. It will be thrown away and trampled by foot. Both salt and light have properties which affect things around them. To ‘be salt’ means to deliberately seek the influence the people in one’s life by showing them the unconditional love of Christ through good deeds. And also salt is used to enhance flavour and as a preservative. Similarly, we feel the importance light when we are in darkness; and we look for light; without light we cannot do anything.

In our Christian life we need to be useful as salt and light for others and make their lives meaningful and useful. This is the core message of Christian life. That’s why Jesus says in St.John’s gospel 1:4-5, in him was life, and the life was the light of all people. The light shines in the darkness, and the darkness did not overcome it.


 -Br Biniush Topno



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