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गुरुवार, 03 जून, 2021 वर्ष का नौवाँ सप्ताह

 

गुरुवार, 03 जून, 2021

वर्ष का नौवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 6:10-12; 7:1,9-12,15-16; 8:1,4-9



6:10) मेदिया में प्रवेश करने के बाद और एकबतना के पास पहुँच कर

11) रफ़ाएल ने युवक से कहा, "भाई टोबीयाह! "उसने उत्तर दिया, "मैं प्रस्तुत हूँ"। उसने कहा, "हमें यह रात रागुएल के यहाँ बितानी है। वह तुम्हारा सम्बन्धी है और उसके सारा नामक एक पुत्री है।

12) उसके कोई पुत्र नहीं है और सारा के सिवा उसके कोई पुत्री भी नहीं। तुम उसके सब से निकट सम्बन्धी हो। तुम को उसके साथ विवाह करने और उसके पिता की सम्पत्ति का पहला अधिकार है। क़न्या समझदार, स्वस्थ और बहुत भली है। उसका पिता उसे बहुत प्यार करता है।"

7:1) एकबतना पहुँच कर उसने कहा, "भाई अज़र्या! मुझे सीधे हमारे भाई रागुएल के पास ले जाओ"। वह उसे रागुएल के घर ले गया। वह अपने आँगन के द्वार पर बैठा हुआ था। उन्होंने उसे पहले प्रणाम किया। उसने उन से कहा, "भाइयो! भले-चंगे रहो। तुम्हारा स्वागत है|" वह उन्हें घर के अन्दर ले गया

9) रागुएल ने अपनी भेड़ों में से एक का वध किया और उनका सहर्ष स्वागत किया। उन्होंने नहाया और अपने को पवित्र किया और जब वे भोजन करने बैठे, तो टोबीयाह ने रफ़ाएल से कहा, "भाई अज़र्या! रागुएल से कहो कि वह मुझे मेरी बहन सारा को दे दें"।

10) रागुएल ने यह सुन कर युवक से कहा, "भाई! इस रात आनन्द मनाते हुए खाओ-पिओ तुम्हारे सिवा कोई मनुष्य मेरी पुत्री सारा से विवाह करने योग्य नहीं है। तुम को छोड़ कर उसे दूसरे पुरुष को देने का मुझे अधिकार भी नहीं है, क्योंकि तुम सब से निकट सम्बन्धी हो।

11) मैं उसे अपने भाइयों में से सात पुरुषों को दे चुका हूँ और जिस रात वे उसके पास गये, उसी रात सब की मृत्यु हो गयी। पुत्र! अब खाओ-पियो! प्रभु तुम दोनों का भला करे।" टोबीयाह ने उत्तर दिया, "जब तब आप मुझे अपनी पुत्री सारा को देने की प्रतिज्ञा नहीं करेंगे, तब तक मैं कुछ नहीं खाऊँगा-पिऊँगा"। रागुएल ने उस से कहा, "प्रतिज्ञा करता हूँ। मूसा की संहिता के निर्णयों के अनुसार वह तुम्हारी है। उसके साथ तुम्हारा विवाह स्वर्ग में निश्चित किया गया है। अपनी बहन को अपनाओ। अब से तुम उस के भाई हो और वह तुम्हारी बहन है। आज वह सदा के लिए तुम्हें दी जाती है। पुत्र! स्वर्ग का ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे और इस रात तुम पर दया करे और शान्ति प्रदान करे।"

12) रागुएल ने अपनी पुत्री सारा को बुलाया और वह उसके पास आयी। उसने उसका हाथ पकड़ कर यह कहते हुए उसे टोबीयाह को दिया, "मूसा के ग्रन्थ में निर्धारित विवाह-विधि के अनुसार इसे अपनाओ। यह तुम्हारी पत्नी है। इसे सकुशल अपने पिता के घर ले जाओ। स्वर्ग का ईश्वर तुम लोगों को सुरक्षित यात्रा और शान्ति प्रदान करे।"

15) रागुएल ने अपनी पत्नी एदना को बुला कर उस से कहा, "बहन! दूसरा कमरा तैयार करो और सारा को वहाँ ले जाओ"।

16) उसने जा कर उसके कहने के अनुसार पलंग तैयार किया और अपनी पुत्री को कमरे में ले जा कर उसके लिए रोने लगी। तब उसने आँसू पोंछ कर उस से कहा, "बेटी! ढारस रखो। स्वर्ग का ईश्वर तुम को दुःख के बदले आनन्द प्रदान करे। ढारस रखो।" इसके बाद वह चली गयी।

8:1) वे भोजन के बाद विश्राम करना चाहते थे। उन्होंने युवक को ले जा कर सारा के कमरे में पहुँचा दिया।

4) माता-पिता ने कमरे से बाहर आ कर उसका दरवाज़ा बन्द कर दिया। टोबीयाह ने पलंग से उठ कर सारा से कहा, "बहन! उठो। हम प्रार्थना करें और अपने प्रभु से निवेदन करें कि वह हम पर दया करें और हमें सुरक्षित रखे"।

5) वह उठी और दोनों प्रार्थना करने लगे। उन्होंने प्रभु से निवेदन किया कि वह उन्हें सुरक्षित रखे। वे कहने लगे, "हमारे पूर्वजों के प्रभु! तू धन्य है! तेरा नाम युग-युग तक धन्य है। आकाश और सारी सृष्टि तुझे अनन्त काल तक धन्य कहे।

6) तूने आदम की सृष्टि की और उसे स्थायी सहयोगिनी के रूप में हेवा को प्रदान किया। उन दोनों से मानवजाति की उत्पत्ति हुई है। तूने कहा कि अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं। इसलिए हम उसके लिए सदृश एक सहयोगिनी बनायें।

7) अब मैं काम-वासना से प्रेरित हो कर नहीं, बल्कि धर्म के अनुसार अपनी इस बहन को पत्नी के रूप में ग्रहण करता हूँ। इस पर और मुझ पर दया कर और ऐसा कर कि हम दोनों बुढ़ापे तक सकुशल साथ रहें।"

8) दोनों ने कहा, "आमेन! आमेन!

9) और वे रात बिताने के लिए पलंग पर लेट गये।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:28-34



28) तब एक शास्त्री ईसा के पास आया। उसने यह विवाद सुना था और यह देख कर कि ईसा ने सदूकियों को ठीक उत्तर दिया था, उन से पूछा, “सबसे पहली आज्ञा कौन सी है?“

29) ईसा ने उत्तर दिया, “पहली आज्ञा यह है- इस्राएल, सुनो! हमारा प्रभु-ईश्वर एकमात्र प्रभु है।

30) अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी बुद्धि और सारी शक्ति से प्यार करो।

31) दूसरी आज्ञा यह है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। इनसे बड़ी कोई आज्ञा नहीं।“

32) शास्त्री ने उन से कहा, “ठीक है, गुरुवर! आपने सच कहा है। एक ही ईश्वर है, उसके सिवा और कोई नहीं है।

33) उसे अपने सारे हृदय, अपनी सारी बुद्धि और अपने सारी शक्ति से प्यार करना और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करना, यह हर प्रकार के होम और बलिदान से बढ़ कर है।“

34) ईसा ने उसका विवेकपूर्ण उत्तर सुन कर उस से कहा, “तुम ईश्वर के राज्य से दूर नहीं हो"। इसके बाद किसी को ईसा से और प्रश्न करने का साहस नहीं हुआ।



📚 मनन-चिंतन



विधि-विवरण गंन्थ 6:4-5 में हम पढ़ते हैं। इस्राइल सुनो। हमारा प्रभु-ईश्वर एक मात्र प्रभु है। तुम अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी शक्ति से प्यार करो। ये पंक्तियाँ हर धर्म परायण व्यक्ति के लिए एक औषधि की तरह है। क्योंकि मनुष्य का जीवन एक संघर्ष है। संसार एव अध्यामिकता के बीच का संघर्ष है। जब हम आज के सुसमाचार पर मनन चितंन करते है, तो हमें ज्ञात होता है कि आज्ञापालन जीवन के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण है, चाहे यह पारिवारिक जीवन हो, समाजिक जीवन हो या अध्यात्मिक। इसलिए जब शास्त्री ने ईसा से पूछा, सबसे पहली आज्ञा कौन सी है। संत योहन के सुसमाचार में ईसा उसे कहते हैं, तुम लोग यह समझकर धर्मग्रन्थ का अनुशीलन करते हो कि उसमें तुम्हें अनन्त जीवन का मार्ग मिलेगा।

शास्त्री और ईसा के बीच का प्रसंग हमारे जीवन के लिए स्तंभ खडा करने जैसा है, जहाँ से हम ईसा की शिक्षा को अच्छी तरह सुन और समझ सकते है। इसे संत पौलुस तिमथी के नाम अपने दूसरे पत्र अध्याय 2:7 में कहते हैं, तुम मेरी बातों पर अच्छी तरह विचार करो, क्योंकि प्रभु सब बातें पूर्णरूप से समझने में तुम्हारी सहायता करेगा।

आइये हम आज के सुसमाचार को समझने का प्रयास करें तथा दृढ़ संकल्प लें कि हम ईश्वर के आज्ञापालन में हमेशा तत्पर रह कर ईश्वर के राज्य का रहस्य के योग्य रीति से जी सकें तथा इसके प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION



We read in the book of Deuteronomy 6:4-5, Hear, O Israel: The Lord is our God, the Lord alone. You shall love the Lord your God with all your heart, and with all your soul, and with all your might. These lines are like a medicine for a righteous man, because there is a constant tow between the powers of the just and the unjust powers. And when we reflect on this passage we come to know that obedience is an imperative in every aspect of our life; may it be the family life, social life, or religious life. Which is why the Scribe asks Jesus in the gospel today,” which commandment is the first of all’. In the gospel of St. John Jesus says,’ you search the scriptures because you think that in them you have eternal life; and it is they that testify on my behalf’.

The context between the Scribe and Jesus is like a foundation from where we can and understand the teachings of Jesus clearly. To this St. Paul in his epistle to Timothy says,’ Think over what I say, for the Lord will give you understanding in all things’.

Today let us try to understand the core message of the gospel and take a resolution to practice it in our daily lives; that we may be able to live the values of the kingdom of God.


 -Br Biniush Topno



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बुधवार, 02 जून, 2021 वर्ष का नौवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 02 जून, 2021

वर्ष का नौवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 3:1-11, 16-17


1) मैं बड़ा दुःखी हो कर कराहते और आँसू बहाते हुए इस प्रकार प्रार्थना करने लगा,

2) "प्रभु! तू न्यायी है और तेरे समस्त कार्य न्यायपूर्ण हैं। तेरे सभी मार्ग दया और सच्चाई के हैं। तू संसार का न्याय करता है।

3) प्रभु! अब मुझे याद कर। मुझे मेरे पापों का दण्ड न दे। मेरे और मेरे पूर्वजों के अपराध भुला।

4) हम लोगों ने तेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया, इसलिए हम लूट, निर्वासन एवं मृत्यु के शिकार बने हुए हैं और तूने हमें जिन राष्ट्रों में बिखेरा, वहाँ हम अपमानित हुए हैं।

5) प्रभु! तेरा दण्ड सही है; क्योंकि हमने तेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया और हम तेरे प्रति ईमानदार नहीं रहे।

6) इसलिए, प्रभु! जैसी तेरी इच्छा हो, मेरे साथ वैसा ही व्यवहार कर। मुझे उठा लेने की कृपा कर, क्योंकि मेरे लिए जीवन की अपेक्षा मरण अच्छा है। मैं झूठी निन्दा सुनते-सुनते तंग आ गया हूँ। मैं बड़ा दुःखी हूँ। प्रभु! मुझ से यह कष्ट दूर कर। मुझे अपने शाश्वत निवास में प्रवेश करने दे। प्रभु! मुझ से अपना मुख न छिपा। जीवन भर इस प्रकार का कष्ट सहते और निन्दा सुनते रहने की अपेक्षा मेरे लिए मरण अच्छा है।"

7) उसी दिन, मेदिया के एकबतना नामक नगर में, रागुएल की पुत्री सारा को भी अपने पिता की एक नौकरानी की फटकार सुननी पड़ी।

8) सारा का विवाह सात बार हुआ था और सारा के पति का संसर्ग होने के पहले ही अस्मादेव नामक पिशाच ने क्रमशः सातों को उसके पास आते ही मार डाला था। नौकरानी ने सारा से कहा, "पतियों की हत्यारिन! तुम को सात पति मिल चुके हैं और तुम किसी की नहीं बन सकी।

9) अपने मरे हुए पतियों के कारण हम को क्यों डाँटती हो? उनके पास चली जाओ। अच्छा हो कि हम तुम्हारे पुत्र या तुम्हारी पुत्री को कभी नहीं देखें।"

10) उस दिन सारा को बड़ा दुःख हुआ। वह रोते हुए पिता के घर की छत पर जा कर अपने को फाँसी लगाना चाहती थी। फिर वह सोचने लगी-कहीं ऐसा न हो कि लोग यह कहते हुए मेरे पिता का अपमान करें: "तुम्हारी एक ही प्यारी पुत्री थी और उसने अपने दुःख के कारण फाँसी लगा ली" और इस तरह मैं अपने बूढ़े पिता की मृत्यु का कारण बनूँगी। मेरे लिएक अच्छा यह है कि मैं अपने को फ़ाँसी न लगाऊँ, बल्कि ईश्वर से प्रार्थना करूँ कि मैं मर जाऊँ, जिससे मुझे अपने जीवन में मर जाऊँ, जिससे मुझे अपने जीवन में और अपमान नहीं सुनना पड़े।

11) इसके बाद वह खिड़की के पास हाथ पसारे इस प्रकार प्रार्थना करने लगीः "दयालु प्रभु-ईश्वर! तू धन्य है। तेरा पवित्र और सम्मान्य नाम सदा-सर्वदा धन्य है। तेरे सभी कार्य सदा-सर्वदा तुझे धन्य कहें।

16) प्रभु-ईश्वर ने उन दोनों की प्रार्थनाएँ सुनीं।

17) स्वर्गदूत रफ़ाएल उनके पास भेजा गया, जिससे वह उन दोनों को स्वस्थ करे-वह टोबीत का मोतियाबिन्द दूर करे और रागुएल की बेटी सारा का विवाह टोबीत के पुत्र टोबीयाह से कराये। साथ ही अस्मादेव पिशाच को बन्दी बना ले; क्योंकि सारा टोबीयाह की होने जा रही थी। इधर टोबीत घर लौटा और उधर रागुएल की पुत्री सारा छत से नीचे उतरी।

सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:18-27


18) इसके बाद सदूकी उनके पास आये। उनकी धारणा है कि पुनरुत्थान नहीं होता। उन्होंने ईसा के सामने यह प्रश्न रखा,

19) "गुरुवर! मूसा ने हमारे लिए यह नियम बनाया- यदि किसी का भाई, अपनी पत्नी के रहते निस्सन्तान मर जाये, तो वह उसकी विधवा को ब्याह कर अपने भाई के लिए सन्तान उत्पन्न करे।

20) सात भाई थे। पहले ने विवाह किया और वह निस्सन्तान मर गया।

21) दूसरा उसकी विधवा को ब्याह कर निस्सन्तान मर गया। तीसरे के साथ भी वही हुआ,

22) और सातों भाई निस्सन्तान मर गये। सब के बाद वह स्त्री भी मर गयी।

23) जब वे पुनरुत्थान में जी उठेंगे, तो वह किसकी पत्नी होगी? वह तो सातों की पत्नी रह चुकी है।"

24) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "कहीं तुम लोग इसीलिए तो भ्रम में नहीं पड़े हुए हो कि तुम न तो धर्मग्रन्थ जानते हो और न ईश्वर का सामर्थ्य?

25) क्योंकि जब वे मृतकों में से जी उठते हैं, तब न तो पुरुष विवाह करते और न स्त्रियाँ विवाह में दी जाती है; बल्कि वे स्वर्गदूतों के सदृश होते हैं।

26) "जहाँ तक पुनरुत्थान का प्रश्न है, क्या तुम लोगों ने मूसा के ग्रन्थ में, झाड़ी की कथा में, यह नहीं पढ़ा कि ईश्वर ने मूसा से कहा- मैं इब्राहीम का ईश्वर, इसहाक का ईश्वर और याकूब का ईश्वर हूँ?

27) वह मृतकों का नहीं, जीवितों का ईश्वर है। यह तुम लोगों का भारी भ्रम है।“



📚 मनन-चिंतन


मानवीय इतिहास की प्रत्यके संस्कृति में जो अस्तित्व में आया है उसका मृत्यु और पुनरूत्थान के प्रति अलग-अलग धारणा है। हम ख्रीस्तीयों के लिए मृत्यु पुनरूत्थान की आशा है। इसको हम आज के सुसमाचार में पाते हैं जहाँ ईश्वर मूसा से कहते हैं,-’’मैं इब्राहीम का ईश्वर, इसहाक का ईश्वर और याकूब का ईश्वर हूँ’’(मारकुस 12ः26) लेकिन ईसा के प्रतिद्वन्दी पुनरूत्थान और अनन्त जीवन पर विश्वास नहीं करते थे। वे केवल मूसा की पाँच किताबों पर विश्वास करते थे। (उत्पत्ति ग्रंथ, निगर्मन ग्रंथ, लेवी ग्रंथ, गणना ग्रंथ और विधि विवरण ग्रंथ)। वे ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास तो करते है पर वे उन सभी तत्थयों को स्वीकार नहीं करते थे जो कि अप्राकृतिक था। वे अपने जीवन में शक्ति और फायदे के लिए जीते थे और मृतकों के पुनरूत्थान पर विश्वास नहीं करते थे। इस लिए वे सदूकी कहे गये। ’’क्योंकि सदूकीयों की धारणा है कि न तो पुनरूत्थान है, न स्वर्गदूत और न आत्मा। परन्तु फारीसी इन पर विश्वास करते हैं।’’ (प्रेरित चरित 23:8)।

ईसा ईश्वर के पुत्र हमें सिखाया है कि ईश्वर संपूर्ण विश्व का स्ष्टिकर्त्ता है और वह अपने मापदंड के अनुसार उसे बनाये रखता एवं उसकी देखभाल करता है वह हमें अंनन्त जीवन देता है। ईसा ने उसे कहा, -’’मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ। मुझसे होकर गये बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता।’’ (योहन 14:6)।

आइये हम आपने आपसे पुछें पुनरूत्थान पर हमारा विश्वास कितना गहरा है? क्या हम ईश्वर के सर्वशाक्तिमता पर विश्वास करते हैं?, या हम उन सदूकीयों की तरह अपने जीवनशैली या शाक्ति पर विश्वास करते हैं।

आइये आज हम पुनरूत्थान पर अटूट विश्वास करने के लिए वर मांगे।



📚 REFLECTION



In the history of mankind every culture that has come into existence, has its different belief systems on death and resurrection. For us Christian’s death is the hope of the resurrection. It is clear from the text (Mk.12:26), gospel reading of the day, where God says to Moses,” I am the God of Abraham, the God of Isaac, and the God of Jacob”. But the Sadducees didn’t believe in the resurrection and afterlife, they only believed in the five books of Moses (Genesis, Exodus, Leviticus, Numbers and Deuteronomy). The Sadducees only believed in their power and benefits. That is why they are called saddu –yu see. The Sadducees say that there is no resurrection, or angel, or spirit; but Pharisees acknowledge all three. (Acts 23:8)

Jesus the son of God teaches us that God is the creator of everything and he looks after in his own way and gives eternal life. Jesus said to him,” I am the way, and the truth, and the life”. No one comes to the father except through me. (Jn.14:6).

Let us ask ourselves, how deep is our faith in the resurrection? Do we believe in the almighty power of God? Or we also stumble and hesitate and depend on reasoning as the Sadducees do? Today let us ask God to give us grace to have a strong faith in the resurrection and eternal life.


 -Br Biniush Topno



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मंगलवार, 01 जून, 2021 वर्ष का नौवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 01 जून, 2021

वर्ष का नौवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 2:9-14



9) उस रात मैं उसे दफ़नाने के बाद लौट कर नहाया और आँगन की दीवार के पास लेट कर सो गया। गरमी के कारण मेरा चेहरा ढका नहीं था।

10) मुझे मालूम नहीं था कि दीवार पर गौरैयाँ रहती थीं। उनकी गरम बीट मेरी आँखों पर ंिगर पड़ी, जिससे मेरी आँखों में मोतियाबिन्द हो गया। मैं इलाज के लिए वैद्यों के पास गया, किन्तु उन्होंने मेरी आँखों पर जितना अधिक मरहम लगाया, मैं उतना ही कम देखने लगा और अन्त में मैं अन्धा हो गया। मैं चार वर्ष तक अन्धा रहा और सभी भाई मेरे कारण दुखी थे। जब तक अहीकार एलिमई नहीं गया, तब तक वह मेरी जीविका का प्रबन्ध करता रहा।

11) उस समय मेरी पत्नी अन्ना सिलाई-बुनाई का काम करती थी।

12) मालिक उसे पूरी मज़दूरी देते थे। ग्यारहवें महीने के सातवें दिन वह सिलाई का काम पूरा कर उसे मालिकों को देने गयी और उन्होंने मज़दूरी के सिवा बकरी का बच्चा दिया।

13) जब बच्चा घर आया और मिमियाने लगा, तो मैंने पत्नी से पूछा, "यह बच्चा कहाँ से आया? कहीं चोरी का तो नहीं है? इसे इसके मालिक को लौटा दो। हम चोरी की चीज़ नहीं खा सकते।"

14) उसने उत्तर दिया, "यह मुझे मज़दूरी के साथ बख़शीश में मिला है"। परन्तु मैंने उसका विश्वास नहीं किया और उसे उसके मालिक को लौटा देने को कहा। मुझे उसके इस काम से लज्जा हुई। किन्तु उसने मुझे यह उत्तर दिया, "कहाँ हैं तुम्हारे भिक्षादान? कहाँ है तुम्हारा धर्माचरण? अब पता चला कि तुम कितने पानी में हो!"



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:13-17



13) उन्होंने ईसा के पास कुछ फरीसियों और हेरोदियों को भेजा, जिससे वे उन्हें उनकी अपनी बात के फन्दे में फँसाये।

14) वे आ कर उन से बोले, "गुरुवर! हम यह जानते हैं कि आप सत्य बोलते हैं और किसी की परवाह नहीं करते। आप मुँह-देखी बात नहीं करते, बल्कि सच्चाई से ईश्वर के मार्ग की शिक्षा देते हैं। कैसर को कर देना उचित है या नहीं?"

15) हम दें या नहीं दें?" उनकी धूर्तता भाँप कर ईसा ने कहा, "मेरी परीक्षा क्यों लेते हो? एक दीनार ला कर मुझे दिखलाओ।"

16) वे दीनार लाये और ईसा ने उन से पूछा, "यह किसका चेहरा और किसका लेख है?" उन्होंने उत्तर दिया, "कैसर का"।

17) इस पर ईसा ने उन से कहा, "जो कैसर का है, उसे कैसर को दो और जो ईश्वर का है, उसे ईश्वर को"। यह सुन कर वे बड़े अचम्भे में पड़ गये।



📚 मनन-चिंतन



ईसा सच्चाई के राह पर चलने वालों को मुक्ति प्रदान करने के लिए मानव रूप लेकर इस धरा पर आये थे। उनका सपूंर्ण जीवन सच्चाई पर आधारित था। उन्होंने कभी भी असत्य के राह को न अपनाया या स्वीकारा। लेकिन आज की दुनियाँ इसके विपरीत है वह आपसी लेन.देन और तर्क के अनुसार चलता है। इस परिवेष में आज का सुमाचार को एक चष्में में रखकर नहीं देखा जा सकता है।

सुसमाचार में आज प्रभु येसु कहते हैं जब वे फरीसियों एवं हेरोदयिों के द्वारा उन्हें फंसाने का प्रयास किया गया श्श्जोश्श् कैसर का हैए उसे कैसर को दो और ईष्वर का हैए उसे ईष्वर को। आज हमें आपने आप से प्रष्न करना है. क्या हम वास्तव में ईष्वर के प्रतिरूप को जो कि हम भी ईष्वर के प्रतिरूप है। उत्पत्ति ग्रंथ 01:26 को बरकार रखते हैघ् क्या हमें सच्चाई के राह पर चलते हैं जिन पर स्वंय प्रभु येसु ने चलकर हमें प्रेम किया और अपना जीवन दे दिया।



📚 REFLECTION




Jesus came into this world by taking human form to liberate all those who follow the path of truth; his entire life mission was based on truth. Jesus never comprised with falsehood nor did he appreciate it. But what we see and witness today is contrary to the teachings of Jesus. Today world believes and appreciates in give and take relationship and logic. From this angle we cannot see the gospel in a mirror.

In today’s gospel Jesus says when the Pharisees and Herodians wanted to trap him, “give to Caesar, what belongs to Caesar and give to God what belongs to God”.

Today we need to ask ourselves, do we really keep the image and likeness of God that we are? Or do we weaken it? We are all made in the image and likeness of God (Gen.1:26). Do we keep this image of God intact in us? Can we confidently say we belong to Jesus and Jesus belongs to us? Do we walk in the path of truth that Jesus walked in and gave his life for us all?


 -Br Biniush Topno



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सोमवार, 31 मई, 2021 एलिजबेथ से कुवारी मरियम की भेन्ट - पर्व

 

सोमवार, 31 मई, 2021

एलिजबेथ से कुवारी मरियम की भेन्ट - पर्व

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पहला पाठ : सफ़न्याह का ग्रन्थ 3:14-18



14) सियोन की पुत्री! आनन्द का गीत गा। इस्राएल! जयकार करो! येरुसालेम की पुत्री! सारे हृदय से आनन्द मना।

15) प्रभु ने तेरा दण्डादेश रद्द किया और तेरे शत्रुओं को भगा दिया है। प्रभु तेरे बीच इस्राएल का राजा है।

16) विपत्ति का डर तुझ से दूर हो गया है। उस दिन येरुसालेम से कहा जायेगा-’’सियोन! नहीं डरना, हिम्मत नहीं हारना। तेरा प्रभु-ईश्वर तेरे बीच है।

17) वह विजयी योद्धा है। वह तेरे कारण आनन्द मनायेगा, वह अपने प्रेम से तुझे नवजीवन प्रदान करेगा,

18) वह उत्सव के दिन की तरह तेरे कारण आनन्दविभोर हो जायेगा।’’ मैं तेरी विपत्ति को दूर करूँगा, मैं तेरा कलंक मिटा दूँगा।

अथवा - पहला पाठ : रोमियों 12:9-16



9) आप लोगों का प्रेम निष्कपट हो। आप बुराई से घृणा तथा भलाई से प्र्रेम करें।

10) आप सच्चे भाइयों की तरह एक दूसरे को सारे हृदय से प्यार करें। हर एक दूसरों को अपने से श्रेष्ठ माने।

11) आप लोग अथक परिश्रम तथा आध्यात्मिक उत्साह से प्रभु की सेवा करें।

12) आशा आप को आनन्दित बनाये रखे। आप संकट में धैर्य रखें तथा प्रार्थना में लगे रहें,

13) सन्तों की आवश्यकताओं के लिए चन्दा दिया करें और अतिथियों की सेवा करें।

14) अपने अत्याचारियों के लिए आशीर्वाद माँगें- हाँ, आशीर्वाद, न कि अभिशाप!

15) आनन्द मनाने वालों के साथ आनन्द मनायें, रोने वालों के साथ रोयें।

16) आपस में मेल-मिलाप का भाव बनाये रखें। घमण्डी न बनें, बल्कि दीन-दुःखियों से मिलते-जुलते रहें। अपने आप को बुद्धिमान् न समझें।




सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 1:39-56



39) उन दिनों मरियम पहाड़ी प्रदेश में यूदा के एक नगर के लिए शीघ्रता से चल पड़ी।

40) उसने ज़करियस के घर में प्रवेश कर एलीज़बेथ का अभिवादन किया।

41) ज्यों ही एलीज़बेथ ने मरियम का अभिवादन सुना, बच्चा उसके गर्भ में उछल पड़ा और एलीज़बेथ पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गयी।

42) वह ऊँचे स्वर से बोली उठी, ’’आप नारियों में धन्य हैं और धन्य है आपके गर्भ का फल!

43) मुझे यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आयीं?

44) क्योंकि देखिए, ज्यों ही आपका प्रणाम मेरे कानों में पड़ा, बच्चा मेरे गर्भ में आनन्द के मारे उछल पड़ा।

45) और धन्य हैं आप, जिन्होंने यह विश्वास किया कि प्रभु ने आप से जो कहा, वह पूरा हो जायेगा!’’

46) तब मरियम बोल उठी, ’’मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है,

47) मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्द मनाता है;

48) क्योंकि उसने अपनी दीन दासी पर कृपादृष्टि की है। अब से सब पीढि़याँ मुझे धन्य कहेंगी;

49) क्योंकि सर्वशक्तिमान् ने मेरे लिए महान् कार्य किये हैं। पवित्र है उसका नाम!

50) उसकी कृपा उसके श्रद्धालु भक्तों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।

51) उसने अपना बाहुबल प्रदर्शित किया है, उसने घमण्डियों को तितर-बितर कर दिया है।

52) उसने शक्तिशालियों को उनके आसनों से गिरा दिया और दीनों को महान् बना दिया है।

53) उसने दरिंद्रों को सम्पन्न किया और धनियों को ख़ाली हाथ लौटा दिया है।

54) इब्राहीम और उनके वंश के प्रति अपनी चिरस्थायी दया को स्मरण कर,

55) उसने हमारे पूर्वजों के प्रति अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपने दास इस्राएल की सुध ली है।’’

56) लगभग तीन महीने एलीज़बेथ के साथ रह कर मरियम अपने घर लौट गयी।



📚 मनन-चिंतन



एलिजबेथ से कुवारी मरियम की भेंट की घटना को आज सम्पूर्ण कलीसिया एक पर्व के रूप में मना रहीं है। यह मात्र दो व्यक्तियों का मिलन नहीं परंतु इसमें कई सारी महत्वपूर्ण चीज़े जुड़ी हुई है।

मरियम और एलिजबेथ यू तो कई बार मिली होंगी परंतु यह मिलन बाकि सभी मिलन से अलग और विशेष थी क्योंकि यह मिलन दोनो को एक ईश्वरीय अनुभव के बाद हुई थी तथा इस मिलन में केवल मरियम और एलिजबेथ ही नहीं परंतु येसु और योहन भी थे जो मरियम और एलिजबेथ के गर्भ में थे।

एलिजबेथ से कुवारी मरियम की भेंट पर एलिजबेथ को एक अनोखा अनुभव हुआ जहॉं पर मरियम का अभिवादन सुनकर बच्चा एलिजबेथ के गर्भ में आनंद के मारे उछल पड़ा और वह पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गयी। जिसके बाद उसे पता चला कि मरियम अब एक साधारण स्त्री नहीं परंतु वह प्रभु की माता है। यह पूरी घटना पूरे वातावरण को ईश्वरीय आनंद और ईश्वरीय अनुभव से भर देती है इन्हीं सभी के कारण यह पर्व कलीसिया के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व है। मरियम पवित्र आत्मा से गर्भवती होने के बाद एलिजबेथ के पास जाती है और उन्हें येसु का एहसास तथा पवित्र आत्मा की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यह पर्व हमें ईश्वरीयता से परिपूर्ण रहने के लिए प्रेरित करता है विशेष करके पवित्र आत्मा से परिपूर्ण रहने के लिए जिससे जिस किसी से भी हम मिले उन्हे येसु का अनुभव हो तथा पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो। आईये आज के दिन हम यहीं प्रार्थना करें कि हम हमेंशा पवित्र आत्मा से परिपूर्ण रहें तथा येसु को दूसरों को दे सकें। आमेन!



📚 REFLECTION



The event of Virgin Mary visiting Eilzabeth is being celebrated today as feast by the Universal Church. It is not merely the meeting of two persons but many important things are connected to this event.

Mary and Elizebeth might have met many times earlier but this visit or meeting was different and special from all that earlier meetings because this meeting happened after the divine encounter by both of them and in this meeting not only Mary and Elizabeth were there but also Jesus and John who were in the womb of Mary and Elizabeth.

Elizabeth had a unique experience in the visit of Mary where after hearing the greeting of Mary, the child leaped in her womb and she was filled with the Holy Spirit. After which she realized that Mary is now no more a simple woman but she is the mother of God. This whole event fills the whole atmosphere with divine joy and divine experience and because of all these; this feast is an important feast for the Catholic Church. After conceiving Jesus by the power of the Holy Spirit Mary goes to visit Elizabeth and gives her the presence of Jesus and plays an important role in receiving the Holy Spirit.

This feast inspire us to always remain filled with the godliness specially filled with the Holy Spirit so that whom so ever we may meet they may experience Jesus and be filled with the Holy Spirit. Come let’s pray today that we may always be filled with the Holy Spirit and can give Jesus to others. Amen!


 -Br Biniush Topno



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आज का पवित्र वचन इतवार, 30 मई, 2021 पवित्र त्रित्व का महापर्व

 

इतवार, 30 मई, 2021

पवित्र त्रित्व का महापर्व

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : विधि-विवरण ग्रन्थ 4:32-34,39-40



32) ईश्वर ने जब पृथ्वी पर मनुष्य की सृष्टि की थी, तुम सब से ले कर अपने पहले के प्राचीन युगों का हाल पूछो। क्या पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक कभी इतनी अद्भुत घटना हुई है?

33) क्या इस प्रकार की बात कभी सुनने में आयी है? क्या और कोई ऐसा राष्ट्र है, जिसने तुम लोगों की तरह अग्नि में से बोलते हुए ईश्वर की वाणी सुनी और जीवित बच गया हो?

34) ईश्वर ने आतंक दिखाकर, विपत्तियों, चिन्हों, चमत्कारों और युद्धों के माध्यम से, अपने सामर्थ्य तथा बाहुबल द्वारा तुम लोगों को मिस्र देश से निकाल लिया है - यह सब तुमने अपनी आँखों से देखा है। क्या और कोई ऐसा ईश्वर है, जिसने इस तरह किसी दूसरे राष्ट्र म

39) आज यह जान लो और इस पर मन-ही-मन विचार करो कि ऊपर आकाश में तथा नीचे पृथ्वी पर प्रभु ही ईश्वर है; उसके सिवा कोई और ईश्वर नहीं है।

40) मैं तुम लोगों को आज उसके नियम और आदेश सुनाता हूँ। तुम उनका पालन किया करो, जिससे जो देश तुम्हारा प्रभु-ईश्वर तुम्हें सदा के लिए देने वाला है, उस में तुम को और तुम्हारे पुत्रों को सुख-शांति तथा लम्बी आयु मिल सकें।“



दूसरा पाठ: रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 8:14-17



14) लेकिन यदि आप आत्मा की प्रेरणा से शरीर की वासनाओें का दमन करेंगे, तो आप को जीवन प्राप्त होगा।

15) जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित हैं, वे सब ईश्वर के पुत्र हैं- आप लोगों को दासों का मनोभाव नहीं मिला, जिस से प्रेरित हो कर आप फिर डरने लगें। आप लोगों को गोद लिये पुत्रों का मनोभाव मिला, जिस से प्रेरित हो कर हम पुकार कर कहते हैं, ’’अब्बा, हे पिता!

16) आत्मा स्वयं हमें आश्वासन देता है कि हम सचमुच ईश्वर की सन्तान हैं।

17) यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो हम उसकी विरासत के भागी हैं-हम मसीह के साथ ईश्वर की विरासत के भागी हैं। यदि हम उनके साथ दुःख भोगते हैं, तो हम उनके साथ महिमान्वित होंगे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 28:16-20



16) तब ग्यारह शिष्य गलीलिया की उस पहाड़ी के पास गये , जहाँ ईसा ने उन्हें बुलाया था।

17) उन्होंने ईसा को देख कर दण्डवत् किया, किन्तु किसी-किसी को सन्देह भी हुआ।

18) तब ईसा ने उनके पास आ कर कहा, ’’मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है।

19) इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।

20) मैंने तुम्हें जो-जो आदेश दिये हैं, तुम-लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ और याद रखो- मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ।’’



📚 मनन-चिंतन



हम सब ख्रीस्तीय पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर सभी कार्य करते है, विशेष रूप से प्रार्थना की शुरुआत और अंत। पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा तीन व्यक्ति है परंतु एक ईश्वर है और इसी त्रियेक ईश्वर का पर्व हम आज मनाते है, जिसे पवित्र त्रित्व के महापर्व से जाना जाता है।

मनुष्यों ने हमेशा से ही ईश्वर के बारे में जानने की कोशिश की है। प्रभु येसु और पवित्र आत्मा के द्वारा हमने ईश्वर और उनकी योजनाओं के बारे में कई रहस्य या सिद्धांत को समझा और जाना है परंतु जरूरी नहीं कि हम ईश्वर के हर रहस्य को समझ पाये। उनमें से एक रहस्य पवित्र त्रित्व का है जो हमारे इस क्षणिक दिमाग में कभी भी नहीं समा सकता।

आज के तीनों पाठ आज के पर्व के संदर्भ के अनुसार है। पहला पाठ में हमे शक्तिशाली पिता ईश्वर के विषय में बताया गया है जिसने इस अद्भुत सृष्टि की रचना की और महान चमत्कारों द्वारा इस्राएल को बचाया; वह पिता एक शक्तिशाली ईश्वर है और उसके सिवा कोई और ईश्वर नहीं है।

दूसरे पाठ में पवित्र आत्मा के विषय में बताया गया है। पवित्र आत्मा ईश्वर बाहर नहीं परंतु हमारे भीतर बसने वाला ईश्वर है क्योकि हमारा शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है। जो लोग ईश्वर के आत्मा से संचालित है उनमें ईश्वर के जीवन का संचार है और वह इस संसार से परे रहकर ईश्वर के पुत्र के मनोभाव के अनुसार जीवन बिताता है।

सुसमाचार में हम प्रभु येसु के अंतिम आदेश के बारे में जानते है जहॉं प्रभु येसु अपने शिष्यों से कहते है कि, ’’मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।’’ प्रभु येसु जाते जाते पवित्र त्रित्व के नाम को उजागर कर के जाते है।

पवित्र त्रित्व का पर्व हमारे लिए त्रियेक ईश्वर को जानने का और प्रार्थना करने का सुंदर अवसर है परंतु इस रहस्य या सिद्धांत को पूर्ण रूप से समझना हमारे दिमाग के बस की बात नहीं। एक ईश्वर में तीन जन- इस रहस्य को समझाने के लिए कई विद्वानों ने कई उदाहरण देकर समझना चाहा परंतु किसी ने भी एक ठोस रूप से इसकी गहराई को समझा नहीं पाया है।

पवित्र त्रित्व का पर्व एकता का पाठ पढ़ाती है। जिस प्रकार पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अलग अलग व्यक्ति है परंतु वे एक है। जिस प्रकार प्रभु येसु कहते है मै पिता में हूॅं और पिता मुझमें है ठीक उसी प्रकार पवित्र आत्मा भी पिता और पुत्र में हैं और वे पवित्र आत्मा में अर्थात् वे तीनों एक है। आज के पर्व की आशीष द्वारा हम भी ईश्वर में एक बनें रहें जिस प्रकार प्रभु येसु हमारे लिए चाह रखते है, ’’सब के सब एक हो जायें। पिता! जिस तरह तू मुझ में है और मैं तुझ में, उसी तरह वे भी हम में एक हो जायें’’ (योहन 17ः21)। आमेन!



📚 REFLECTION



We all Christians do all the works in the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit, especially before and after the prayer. Father, Son and Holy Spirit are three persons but one God and this triune God’s feast we are celebrating today which is popularly known as Feast of Holy Trinity.

Humans have always tried to know about God. Because of Jesus and the Holy Spirit we understood many mysteries or concept about God and his plans but it is not necessary that we may understand every mystery. Among those mystery is the mystery of Holy Trinity which our temporary minds cannot contain it.

Today’s all the three readings are based on today’s feast. First reading is about the Almighty Father who created this wonderful creation and with great miracles He rescued Israelites; The Father is Almighty God and there is no other.

Second Reading is about the Holy Spirit. Holy Spirit God is a God who wants to live not outside but inside of us because our body is the temple of the Holy Spirit. Those who are led by the Spirit in them God’s power flows and setting themselves apart they live according to the mind of children of God.

In the Gospel we read about the mandate of Jesus where Lord Jesus says to the disciples, “All authority in heaven and on earth has been given to me. Go therefore and make disciples of all nations, baptizing them in the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit.” Before going Jesus manifest the name of the Holy Trinity.

The feast of Holy Trinity is a beautiful opportunity to know about triune God and to pray to Him, but to understand the mystery or concept fully is out of our brain. Three persons in one God- to understand this mystery many scholars tried to understand through various examples but none of them have explained the depth of it in a concrete manner.

The feast of Holy Trinity teaches us the lesson of unity. As the Father, Son and the Holy Spirit are three different persons but they are united as one. As Lord Jesus says I am in the Father and Father is in me similarly Holy Spirit is also in the Father and the Son and they in the Holy Spirit that is to say they three are one. By the grace of today’s feast we also may remain one in God as Lord Jesus wants for us, “that they may be one, as you, Father, are in me and I am in you, may they also be in us.” Amen!



मनन-चिंतन -2


आज माता कलीसिया परम पवित्र त्रित्व का महापर्व मनाती है। कलीसिया की शिक्षायें हमें बताती हैं कि हमारे विश्वास का आधार ही पवित्र त्रित्व है। पवित्र त्रित्व के बारे में हमारा ज्ञान पवित्र धर्मग्रन्थ में वर्णित बातों पर आधारित है। हमारी धर्मशिक्षा में भी हमें सिखाया जाता है कि हमारे धर्म की चार बड़ी सच्चाइयों में से एक यह भी है कि केवल एक ईश्वर है और एक ईश्वर में तीन जन हैं- पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। इस परम सच्चाई के बारे में यह भी सच है कि पवित्र त्रित्व के इस रहस्य को समझना टेढ़ी खीर है अर्थात् इसे समझना बहुत मुश्किल है, क्योंकि माता कलीसिया हमें सिखाती है कि तीनों एक ही ईश्वर हैं और तीनों सिर्फ एक ही नहीं बल्कि पूर्ण रूप से एक दूसरे से भिन्न व अलग-अलग जन हैं।

मनुष्य की सृष्टि ईश्वर ने की है। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान एवं सर्वत्र है। वहीं दूसरी ओर मनुष्य का ज्ञान, शक्ति और क्षमता सीमित है। इस सीमित क्षमता के साथ उस असीम ईश्वर व सृष्टिकर्ता के रहस्य को पूर्ण रूप से समझना असम्भव है। पवित्र त्रित्व के रहस्य को समझने की कठिनाई के बारे में सन्त अगस्टीन की लोकप्रिय कहानी प्रचलित हैः सन्त अगस्टीन पवित्र त्रित्व के रहस्य को समझने के लिए तीस वर्षों तक अध्ययन करते रहे। एक बार वे समुन्द्र के किनारे इसी रहस्य को समझने के लिये मनन-चिन्तन में व्यस्त थे कि तभी उनकी नज़र एक छोटे बालक पर पड़ी जो समुन्द्र के किनारे पर एक छोटा सा गड्ढा बनाकर एक सीप के माध्यम से उस गड्ढे को भरने का प्रयास कर रहा था। सन्त अगस्टीन ने जब उससे पूछा कि वह क्या करना चाहता है तो बालक ने उत्तर दिया कि वह उस समुन्द्र के पूरे जल को उस छोटे से गड्ढे में भरना चाहता है। सन्त अगस्टीन को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे सम्भव है, इतना विशाल सागर उस छोटे से गड्ढे में कैसे समा सकता है। उस बालक ने उत्तर दिया कि तुम भी तो वही कर रहे हो, सर्वशक्तिमान ईश्वर के रहस्य को अपने छोटे से सीमित ज्ञान से समझने का प्रयास कर रहे हो। और यह बताकर वह बालक अन्तर्ध्यान हो गया।

पवित्र बाईबिल का अध्ययन करने पर हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तीनों जन - पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अलग-अलग हैं और अलग-अलग समय पर सक्रिय हैं। पुराने व्यवस्थान में सिर्फ पिता ईश्वर ही कार्य करते हुए दिखाई देते हैं। चाहे वह सृष्टि की रचना हो, इब्राहीम का बुलावा हो, या मिश्र की दासता से इस्रायलियों को बाहर निकालने का कार्य हो, अथवा नबियों को भेजकर लोगों को सही मार्ग पर लाने का कार्य हो। ऐसा प्र्रतीत होता है कि पुराने व्यवस्थान का युग पिता ईश्वर का युग है और पुत्र और पवित्र आत्मा कहीं स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते। उसी तरह चारों सुसमाचारों में हम मुख्य रूप से प्रभु येसु के बारे में पढते और सुनते हैं। हालांकि पिता और पवित्र आत्मा भी यदा-कदा दिखाई देते हैं। वहीं सुसमाचारों के बाद की पुस्तकों में हमें मुख्य रूप से पवित्र आत्मा की भूमिका दिखाई देती है। लेकिन सत्य तो यह है कि तीनों जन एक साथ, एक समान रूप से सदैव सक्रिय हैं। क्योंकि वे एक ही हैं, अलग नहीं हैं। जब प्रभु येसु क्रूस पर मरकर दुनिया को मुक्ति प्रदान करते हैं तो इसमें वे अकेले नहीं, बल्कि तीनों जन एक साथ हैं।

जब पिता ईश्वर इस दुनिया की रचना करते हैं तो हमें तीनों के दर्शन होते हैं। ’’... अथाह गर्त पर अन्धकार छाया हुआ था और ईश्वर का आत्मा सागर पर विचरता था।’’ (उत्पत्ति ग्रन्थ 1:2) आत्मा भी प्रारम्भ से विद्यमान था। सन्त योहन के सुसमाचार के प्रारम्भ में हम पढते हैं- ’’आदि में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था, और शब्द ईश्वर था।’’ (योहन 1:1) आगे पढते हैं कि सब कुछ शब्द के द्वारा ही उत्पन्न हुआ। यानि कि सृष्टि के पहले कार्य से ही हर कार्य में वे एक साथ हैं। प्रभु येसु के मिशन के प्रारम्भ में भी हम तीनों को एक साथ देखते हैं। मत्ती 3:16-17 में हम पढते हैं कि बपतिस्मा के समय पवित्र आत्मा कपोत के रूप में उन पर उतरा और स्वर्ग से पिता ईश्वर की वाणी सुनाई दी, ’’यह मेरा प्रिय पुत्र है...।’’ बल्कि प्रभु येसु के हर कार्य में पवित्र आत्मा उनके साथ था। प्रभु येसु पिता का कार्य करते थे (देखें योहन 4:34) “मेरे पिता का कार्य करना ही मेरा भोजन है”। लूकस 4:18 में लिखा है - ’’प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है...।’’ पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा तीनों अलग होते हुए भी एक हैं और एक होते हुए भी अलग हैं।

पवित्र त्रित्व हमारे विश्वास का आधार है। हम पवित्र त्रित्व के नाम में ही बपतिस्मा ग्रहण कर ईश्वर की सन्तान व कलीसिया के सदस्य बनते हैं। पवित्र त्रित्व के ही नाम से हमारे सब कार्य प्रारम्भ और पूर्णता तक पहुँचते हैं। हमारी सारी प्रार्थनायें भी इसी पवित्र त्रित्व के नाम से प्रारम्भ होती हैं। आइये आज के इस पावन पर्व के अवसर पर हम प्रण लें कि पवित्र त्रित्व को हम अपने ख्रिस्तीय जीवन का आधार बनायेंगे और अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान देंगे। जिस तरह पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सदैव एक रहकर कार्य करते हैं उसी तरह हमारे परिवारों के सभी सदस्य सदा एक बने रहें। आमेन।


 फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)

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शनिवार, 29 मई, 2021 वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

 

शनिवार, 29 मई, 2021

वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह


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पहला पाठ : प्रवक्ता ग्रन्थ 51:12-20



12) तू अपने पर भरोसा रखने वालों की रक्षा करता और उन्हें उनके शत्रुओं के पंजे से छुड़ाता है।

13) मैंने पृथ्वी पर से प्रभु की दुहाई दी और मृत्यु से रक्षा की प्रार्थन की।

14) मैने कहा, "प्रभु! तू मेरा पिता है! घमण्डी शत्रुओं के सामने, मुझे विपत्ति के दिन, असहाय नहीं छोड़।

15) मैं निरन्तर तेरा नाम धन्य कहूँगा, मैं धन्यवाद के गीत गाता रहूँगा।" मेरी प्रार्थना सुनी गयी,

16) क्योंकि तूने मुझे विनाश से बचाया और विपत्ति से मेरा उद्धार किया।

17) इस कारण मैं तेरा धन्यवाद और तेरी स्तुति करूँगा, मैं प्रभु का नाम धन्य कहूँगा।

18) अपनी यात्राएँ प्रारम्भ करने से पहले मैं युवावस्था में आग्रह के साथ प्रज्ञा के लिए प्रार्थना करता था।

19) मैं मन्दिर के प्रांगण में उसके लिए अनुरोध करता था और अन्त तक उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहूँगा। वह फलते-फूलते हुए अंगूर की तरह मुझ में विकसित हो कर

20) मुझे आनन्दित करती रही। मैं सीधे मार्ग पर आगे बढ़ता गया और बचपन से ही प्रज्ञा का अनुगामी बना।



सुसमाचार : मारकुस 11:27-33



27) वे फिर येरूसालेम आये। जब ईसा मन्दिर में टहल रहे थे, तो महायाजक, शास्त्री और नेता उनेक पास आ कर बोले,

28) “आप किस अधिकार से यह सब कर रहे हैं? किसने आप को यह सब करने का अधिकार दिया?“

29) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं भी आप लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। यदि आप मुझे इसका उत्तर देंगे, तो मैं भी आप को बता दूँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।

30) बताइए, योहन का बपतिस्मा स्वर्ग का था अथवा मनुष्यों का?"

31) वे यह कहते हुए आपस में परामर्श करते थे- “यदि हम कहें, ’स्वर्ग का’, तो वह कहेंगे, ’तब आप लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया’।

32) यदि हम कहें, “मनुष्यों का, तो....।“ वे जनता से डरते थे। क्योंकि सब योहन को नबी मानते थे।

33) इसलिए उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, “हम नहीं जानते"। इस पर ईसा ने उन से कहा,“ तब मैं भी आप लोगों को नहीं बताऊँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ"।



📚 मनन-चिंतन



‘‘आप किस अधिकार से यह सब कर रहे हैं? किसने आप को यह सब करने का अधिकार दिया?’’ यह प्रश्न महायाजक, शास्त्री और नेताओं के द्वारा उस घटना के बाद पूॅंछा गया जब येसु ने मंदिर में बेचने और खरीदने वालों को बाहर कर दिया था। उस समय के अनुसार मंदिर और उसमें होने वाली गतिविधियों में महायाजक, शास्त्रियों और नेताओं का अधिकार होता था, वे वहॉं के कर्ता-धर्ता होते थे।

येसु द्वारा मंदिर में किये गये कार्य के लिए वे उनसे पॅूंछते है कि किस अधिकार के साथ यह सब किया। इस सवाल का जवाब देने के लिए येसु उनसे प्रश्न पूॅंछते है, ’योहन का बपतिस्मा स्वर्ग का था अथवा मनुष्यों का?’ उनके जवाब नहीं देने के कारण येसु उनसे कहते है, ’तब मै भी नहीं बताऊॅंगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हॅंू’।

इस पूरी घटना में हमें प्रभु येसु के अधिकार के विषय में मनन चिंतन करने का अवसर मिलता है। प्रभु येसु का अधिकार इस संसार से नहीं परंतु पिता ईश्वर से है। येसु मत्ती 28ः18 में कहते है, ’’मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है।’’ योहन 3ः31,33ब-35 कहता है, ‘‘जो ऊपर से आता है, वह सर्वोपरि है। जो पृथ्वी का है, वह पृथ्वी की बातें बोलता है। जो स्वर्ग से आता है, वह सर्वोपरि है। जिसे ईश्वर ने भेजा है, वह ईश्वर के ही शब्द बोलता है; क्योंकि ईश्वर उसे प्रचुर मात्रा में पवित्र आत्मा प्रदान करता है। पिता पुत्र को प्यार करता है औरउसने उसके हाथ सब कुछ दे दिया है।’’ इन वचनों से हमें पता चलता है कि येसु का सभी पर अधिकार है तथा जिसने येसु को भेजा है उन्हीं के द्वारा येसु को अधिकार भी प्राप्त है।

प्रभु येसु ने जो किया पूर्ण अधिकार के साथ किया जो उन्हें पिता से प्राप्त था। और उसी अधिकार के साथ वे अपने शिष्यों को इस संसार में भेजते है। आईये हम प्रार्थना करें कि जो अधिकार हमें येसु से मिला है इस संसार में ईश्वर की योजना को पूर्ण करने हेतु हम उसे पहचाने और उसी अनुसार कार्य करें। आमेन!



📚 REFLECTION



“By what authority are you doing these things? Who gave you this authority to do them?” This question was asked by the chief priest, scribes and the elders after the incident of chasing the buyers and sellers from the Temple by Jesus. According to that time chief priest, scribes and elders had the authority over the temple and the activities happening in the temple, they were the whole doer.

They ask Jesus’ authority over the things he did in the temple. Answering to the question Jesus asks them a question, ‘Did the baptism of John come from heaven, or was it of human origin? When they were not able to answer Jesus tells them, ‘Neither will I tell you by what authority I am doing these things.

In this whole incident we get an opportunity to meditate upon the authority of Jesus. The Authority of Jesus is not from this world but from the Father Almighty. Mt 28:18 says, “All authority in heaven and on earth has been given to me.” John 3:31, 34-35 says, “The one who comes from above is above all; the one who is of the earth belongs to the earth and speaks about earthly things. The one who comes from heaven is above all. He whom God has sent speaks the words of God, for he gives the Spirit without measure. The Father loves the Son and has placed all things in his hands.” Through these words of God we come to know that Jesus have authority over everything and the One who has send Jesus, from Him only he received the authority also.

Whatever Jesus did, he did with full authority which he received from the Father. And with that authority he sends his disciples to the world. Let’s pray that the authority what we have received from Jesus in order to fulfill God’s plan, we may able to recognize it and act according to it. Amen!


 -Br Biniush Topno



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शुक्रवार, 28 मई, 2021 वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 28 मई, 2021

वर्ष का आठवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : प्रवक्ता ग्रन्थ 44:1,9-13



1) हम पीढ़ियों के क्रमानुसार अपने लब्ध प्रतिष्ठ पूर्वजों का गुणगान करें।

9) कुछ लोगों की स्मृति शेष नहीं रही। वे इस प्रकार लुप्त हो गये हैं, मानो कभी थे ही नहीं। वे इस प्रकार चले गये हैं, मानो उनका कभी जन्म नहीं हुआ और उनकी सन्तति की भी यही दशा है।

10) जिन लोगों के उपकार नहीं भुलाये गये हैं, उनके नाम यहाँ दिये जायेंगे।

11) उन्होनें जो सम्पत्ति छोड़ी है, वह उनके वंशजों में निहित है।

12) उनके वंशज आज्ञाओें का पालन करते हैं

13) और उनके कारण उनकी सन्तति भी। उनका वंश सदा बना रहेगा और उनकी कीर्ति कभी नहीं मिटेगी।



सुसमाचार : मारकुस 11:11-26



11) ईसा ने येरूसालेम पहुँच कर मन्दिर में प्रवेश किया। वहाँ सब कुछ अच्छी तरह देख कर वह अपने शिष्यों के साथ बेथानिया चले गये, क्योंकि सन्ध्या हो चली थी।

12) दूसरे दिन जब वे बेथानिया से आ रहे थे, तो ईसा को भूख लगी।

13) वे कुछ दूरी पर एक पत्तेदार अंजीर का पेड़ देख कर उसके पास गये कि शायद उस पर कुछ फल मिलें; किन्तु पास आने पर उन्होंने पत्तों के सिवा और कुछ नहीं पाया, क्योंकि वह अंजीर का मौसम नहीं था।

14) ईसा ने पेड़ से कहा, "फिर कभी कोई तेरे फल न खाये"। उनके शिष्यों ने उन्हें यह कहते सुना।

15) वे येरूसालेम पहुँचे। मन्दिर में प्रवेश कर ईसा वहाँ से बेचने और ख़रीदने वालों को बाहर निकालने लगे। उन्होंने सराफ़ों की मेज़ें और कबूतर बेचने वालों की चैकियाँ उलट दीं

16) और वे किसी को भी घड़ा लिये मन्दिर से हो कर आने-जाने नहीं देते थे।

17) उन्होंने, लोगों को शिक्षा देते हुए कहा, "क्या यह नहीं लिखा है- मेरा घर सब राष्ट्रों के लिए प्रार्थना का घर कहलायेगा; परन्तु तुम लोगों ने उसे लुटेरों का अड्डा बनाया है"।

18) महायाजकों तथा शास्त्रियों को इसका पता चला और वे ईसा के सर्वनाश का उपाय ढूँढ़ते रहे। वे उन से डरते थे, क्योंकि लोग मन्त्रमुग्ध हो कर उनकी शिक्षा सुनते थे।

19) सन्ध्या हो जाने पर वे शहर के बाहर चले जाते थे।

20) प्रातः जब वे उधर से आ रहे थे, तो शिष्यों ने देखा कि अंजीर का वह पेड़ जड़ से सूख गया है।

21) पेत्रुस को वह बात याद आयी और उसने कहा, "गुरुवर! देखिए, अंजीर का वह पेड़, जिसे आपने शाप दिया था, सूख गया है"।

22) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "ईश्वर में विश्वास करो।

23) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - यदि कोई इस पहाड़ से यह कहे, ’उठ, समुद्र में गिर जा’ , और मन में सन्देह न करे, बल्कि यह विश्वास करे कि मैं जो कह रहा हूँ, वह पूरा होगा, तो उसके लिए वैसा ही हो जायेगा।

24) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ - तुम जो कुछ प्रार्थना में माँगते हो, विश्वास करो कि वह तुम्हें मिल गया है और वह तुम्हें दिया जायेगा।

25) "जब तुम प्रार्थना के लिए खड़े हो और तुम्हें किसी से कोई शिकायत हो, तो क्षमा कर दो,

26) जिससे तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा कर दे।"


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार को जब हम ध्यान से समझेंगे तो हमे पता चलेगा कि आज के सुसमाचार के अंश में तीन भाग हैः पहला- अंजीर पेड़ और येसु के बीच संवाद, दूसरा- येरूसालेम मंदिर में येसु द्वारा बेचने और खरीददारों को बाहर निकालना और तीसरा- विश्वास के विषय में शिक्षा।

पहले घटना में प्रभु येसु अंजीर के पेड़ से फल न मिलने के कारण कहते है, ’फिर कभी कोई तेरे फल न खायें’। प्रभु फल की आशा के साथ उस अंजीर के पेड़ के पास गये जो पत्तेदार था यह सोच कर कि जिसमें पत्ते लगें है उसमें फल भी जरूर होगा, अक्सर अंजीर के पेड़ मंे पतझड़ के बाद जब पत्ते आ जाते है तब उसमें फल के अंकुर भी आ जाते है। जब येसु को वह नही मिला तो वह नाखुश हो जाते है। प्रभु हममें भी न केवल पत्ते परंतु फल भी देखना चाहते हैं। वह चाहते है कि हम न केवल बातें करें परंतु अपने जीवन में फल भी उत्पन्न करें।

दूसरी घटना में प्रभु येसु येरुसालेम मंदिर से बेचने और खरीददारों को बहार निकाल देतें है। प्रभु का मंदिर एक पवित्र जगह है जहॉं पर आराधना, प्रार्थना तथा बलि चढ़ायी जाती है। ऐसे पवित्र स्थान को कारोबार के लिए इस्तेमाल करना वहॉं पर हो रहें पवित्रता के कार्यो की अवहेलना है। हमें हर हालत में मंदिर की गरिमा और पवित्रता को बनाये रखना चाहिए।

तीसरी घटना में प्रभु येसु विश्वास का महत्व शिष्यों को समझाते है और कहते है, ‘तुम जो कुछ प्रार्थना में मॉंगते हो, विश्वास करों कि वह तुम्हें मिल गया है और वह तुम्हें दिया जायेगा’। हमारी प्रार्थनाआंे में विश्वास का होना बहुत जरूरी है।

आईये हम प्रार्थना करें कि हम अपने जीवन में फल उत्पन्न करें, गिरजाघरों और अपने शरीर रूपी मंदिर को पवित्र बनाये रखें तथा हमेंशा विश्वास के साथ प्रार्थना करें। आमेन!



📚 REFLECTION



When we will understand today’s gospel carefully then we will know that today’s gospel passage has got three parts: First- The conversation between fig tree and Jesus, Second- Jesus driving out sellers and buyers in the Jerusalem Temple and Third- Teaching about faith.

In First incident because of not receiving fruit from the fig trees Jesus says, ‘May no one ever eat fruit from you again.’ Lord Jesus went to the fig tree which was with leaves hoping to get the fruit from it thinking that if leaves are there then there will be fruit also. Usually after the leaf shed when leaves come in the fig tree then the bud of fruit also comes. When Jesus did not get that then he was sad. Lord doesn’t only want leaves in us but also the fruit. He wants that we not only talk about but bear fruits in our lives.

In Second incident Lord Jesus chases away the buyers and sellers from the Jerusalem temple. God’ temple is a holy place where prayer and worship and sacrifice are being done. Using Like this holy place for business is a disregard to the sacred work that is going on there. With all means we need to keep up the dignity and holiness of the Temple.

In the Third incident Lord Jesus make the disciples to understand the importance of faith and says, ‘Whatever you ask for in prayer, believe that you have received it, and it will be yours’. Faith is very necessary to have in our prayers.

Let’s pray that we may always bear fruit in our lives, keep holy the churches and our bodies which are like temple and always pray with faith. Amen!

 -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!