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27 अगस्त का पवित्र वचन

 

27 अगस्त 2020
वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 1:1-9

1) कुरिन्थ में ईश्वर की कलीसिया के नाम पौलुस, जो ईश्वर द्वारा ईसा मसीह का प्रेरित नियुक्त हुआ है, और भाई सोस्थेनेस का पत्र।

2) आप लोग ईसा मसीह द्वारा पवित्र किये गये हैं और उन सबों के साथ सन्त बनने के लिए बुलाये गये हैं, जो कहीं भी हमारे प्रभु ईसा मसीह अर्थात् अपने तथा हमारे प्रभु का नाम लेते हैं।

3) हमारा पिता ईश्वर और प्रभु ईसा मसीह आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति प्रदान करें।

4) आप लोगों को ईसा मसीह द्वारा ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त हुआ है। इसके लिए मैं ईश्वर को निरन्तर धन्यवाद देता हूँ।

5 (5-6) मसीह का सन्देश आप लोगों के बीच इस प्रकार दृढ़ हो गया है कि आप लोग मसीह से संयुक्त होकर अभिव्यक्ति और ज्ञान के सब प्रकार के वरदानों से सम्पन्न हो गये हैं।

7) आप लोगों में किसी कृपादान की कमी नहीं है और सब आप हमारे प्रभु ईसा मसीह के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

8) ईश्वर अन्त तक आप लोगों को विश्वास में सुदृढ़ बनाये रखेगा, जिससे आप हमारे प्रभु ईसा मसीह के दिन निर्दोष पाये जायें।

9) ईश्वर सत्यप्रतिज्ञ है। उसने ने आप लोगों को अपने पुत्र हमारे प्रभु ईसा मसीह के सहभागी बनने के लिए बुलाया।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 24:42-51

42) ’’इसलिए जागते रहो, क्योकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारे प्रभु किस दिन आयेंगे।

43) यह अच्छी तरह समझ लो- यदि घर के स्वामी को मालूम होता कि चोर रात के किस पहर आयेगा, तो वह जागता रहता और अपने घर में सेंध लगने नहीं देता।

44) इसलिए तुम लोग भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी तुम उसके आने की नहीं सोचते, उसी घड़ी मानव पुत्र आयेगा।

45) ’’कौन ऐसा ईमानदार और बुद्धिमान् सेवक है, जिसे उसके स्वामी ने अपने नौकर-चाकरों पर नियुक्त किया है, ताकि वह समय पर उन्हें रसद बाँटा करे?

46) धन्य है वह सेवक, जिसका स्वामी आने पर उसे ऐसा करता हुआ पायेगा!

47) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- वह उसे अपनी सारी सम्पत्ति पर नियुक्त करेगा।

48) ’’परन्तु यदि वह बेईमान सेवक अपने मन में कहे, मेरा स्वामी आने में देर करता है,

49) और वह दूसरे नौकरों को पीटने और शराबियों के साथ खाने-पीने लगे,

50) तो उस सेवक का स्वामी ऐसे दिन आयेगा, जब वह उसकी प्रतिक्षा नहीं कर रहा होगा और ऐसी घड़ी, जिसे वह नहीं जान पायेगा।

51) तब वह स्वामी उसे कोड़े लगवायेगा और ढोंगियों का दण्ड देगा। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

📚 मनन-चिंतन

“इसलिए जागते रहो क्योंकि तुम नहीं जानते कि किस घड़ी प्रभु आएगा।” हम प्रभु के सेवक मात्र हैं। हमारे जन्म लेने से पहले ही ईश्वर ने हमें चुना है और एक ज़िम्मेदारी दी है (यिरमियाह 1:5)। ईश्वर ने हम में से प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योजना पूरी करने के लिए चुना है, लेकिन उसने समय निश्चित नहीं किया कब वह हमसे हमारे काम का लेखा-जोखा लेगा, और कब हमें अपने सामने प्रस्तुत होने के लिए बुलाएगा। आज का सुसमाचार हमारी उससे मुलाक़ात की तैयारी के बारे में ही है।

हमें प्रत्येक को जो ज़िम्मेदारी दी है उसे हमें पूरी वफ़ादारी और ईमानदारी से निभाना है। उदाहरण के लिए यदि मैं एक अध्यापक/अध्यापिका हूँ तो मुझे अपना काम इस तरह करना है मानो ईश्वर मुझसे लेखा-जोखा लेगा कि मैंने अपना काम कितनी ईमानदारी और लगन से किया। यही बात नर्स के कार्य के साथ भी है कि कितनी ईमानदारी और सेवा भाव से मैंने रोगियों के रूप में प्रभु की सेवा की, या फिर हम कोई प्राइवेट नौकरी या सरकारी नौकरी करते हों, क्या हम अपने काम को उसी तरह से करते हैं जैसे ईश्वर चाहते हैं? हम जीवन में अलग-अलग भूमिकाएँ भी निभाते हैं, माता, पिता, बहन, पुत्र/पुत्री, विद्यार्थी, आदि क्या मैं अपनी भूमिका पूर्ण ईमानदारी से निभा रहा हूँ? संत मोनिका एक आदर्श माँ हैं जिसने एक माँ होने की, पत्नी होने की, बहु होने की, आदर्श पड़ौसी होने की अपनी ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाया और आज वो एक संत हैं।

26 अगस्त का पवित्र वचन

 

26 अगस्त 2020
वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : 2 थेसलनीकियों 3:6-11, 16-18

6) भाइयों! हम आप को प्रभु ईसा मसीह के नाम पर आदेश देते हैं कि आप उन भाइयों से अलग रहें, जो काम नहीं करते और उस परम्परा के अनुसार नहीं चले, जो आप लोगों को मुझ से प्राप्त हुई।

7) आप लोगों को मेरा अनुकरण करना चाहिए- आप यह स्वयं जानते हैं। आपके बीच रहते समय हम अकर्मण्य नहीं थे।

8) हमने किसी के यहाँ मुफ़्त में रोटी नहीं खायी, बल्कि हम बड़े परिश्रम से दिन-रात काम करते रहे, जिससे आप लोगों में किसी के लिए भी भार न बनें।

9) इमें इसका अधिकार नहीं था- ऐसी बात नहीं, बल्कि हम आपके सामने एक आदर्श रखना चाहते थे, जिसका आप अनुकरण कर सकें।

10) आपके बीच रहते समय हमने आप को यह नियम दिया- ’जो काम करना नहीं चाहता, उसे भोजन नहीं दिया जाये’।

16) शान्ति का प्रभु स्वयं आप लोगों को हर समय और हर प्रकार शान्ति प्रदान करता रहे! प्रभु आप सब के साथ हो!

17) मैं, पौलुस, अपने हाथ से यह नमस्कार लिख देता हूँ। यह मेरे सब पत्रों की पहचान है। यह मेरी लिखावट है।

18) हमारे प्रभु ईसा मसीह की कृपा आप सब पर बनी रहे!

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 23:27-32

27) ’’ढोंगी शास्त्रियों ओर फ़रीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! तुम पुती हुई कब्रों के सदृश हो, जो बाहर से तो सुन्दर दीख पड़ती हैं, किन्तु भीतर से मुरदों की हड्डियों और हर तरह की गन्दगी से भरी हुई हैं।

28) इसी तरह तुम भी बाहर से लागों को धार्मिक दीख पड़ते हो, किन्तु भीतर से तुम पाखण्ड और अधर्म से भरे हुए हो।

29) ’’ढोंगी शास्त्रियों और फ़रीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! तुम नबियों के मकबरे बनवा कर और धर्मात्माओं के स्मारक सँवार कर

30) कहते हो, ’’यदि हम अपने पुरखों के समय जीवित होते, तो हम नबियों की हत्या करने में उनका साथ नहीं देते’।

31) इस तरह तुम लोग अपने विरुद्ध यह गवाही देते हो कि तुम नबियों के हत्यारों की संतान हो।

32) तो, अपने पुरखों की कसर पूरी कर लो।

📚 मनन-चिंतन

जीवित इंसानों के साथ क़ब्रों की तुलना करना उचित नहीं है, लेकिन प्रभु येसु अपने समय के शास्त्रियों और फरिसीयों को सफ़ेदी से पुती हुई क़ब्रों से तुलना करते हैं। कब्र के अंदर भयानक मंजर होता है। जब जीवित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसे कब्र में दफ़नाया जाता है, तो कुछ समय बाद वह लाश सड़ने और गलने लगती है और कुछ दिनों में भयंकर बदबू देने लगती है। विज्ञान के शब्दों में कहें तो एक कब्र के अंदर बहुत बड़ी विघटन क्रिया होती है, अंततः हड्डियों के सिवा कुछ नहीं बचता। लेकिन बाहर से कब्र के अंदर होने वाली क्रिया हमें दिखाई नहीं देती और इसलिए हम उसकी भयानक रूप की कल्पना भी नहीं कर सकते।

प्रभु येसु फरिसियों और शास्त्रियों को उन्हीं क़ब्रों से तुलना करते हैं। यहाँ हमें यह ध्यान देने की ज़रूरत है कि प्रभु येसु उन्हीं फरीसी और शास्त्रियों को धिक्कारते हैं जो अपनी बुलाहट अर्थात ईश्वर द्वारा दी ज़िम्मेदारी को बखूबी नहीं निभा रहे थे। वे बाहर से अपने आप को बहुत पवित्र और शरीफ़ दिखाते थे, लेकिन अंदर से वे घोर बुराई और पाप से भरे हुए थे। ईश्वर हमारे जीवन के छुपे हुए पहलुओं को भी देख सकते हैं, उसकी नज़रों से कुछ भी नहीं छुपा है। क्या मैं अंदर से बुरा और बाहर से अच्छा दिखने की कोशिश करता हूँ? आइए हम अपने आप को ईश्वर को समर्पित करें ताकि वह हमें सच्चे इंसान और अपनी महती दया के योग्य बना दे। आमेन।

25 अगस्त का पवित्र वचन

 

25 अगस्त 2020
वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : थेसलनीकियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 2:1-3a,14-17

1) भाइयो! हमारे प्रभु ईसा मसीह के पुनरागमन और उनके सामने हम लोगों के एकत्र होने के विषय में हमारा एक निवेदन, यह है।

2) किसी भविष्यवाणी, वक्तव्य अथवा पत्र से, जो मेरे कहे जाते हैं, आप लोग आसानी से यह समझ कर न उत्तेजित हों या घबरायें कि प्रभु का दिन आ चुका है।

3) कोई आप लोगों को किसी भी तरह न बहकाये।

14) उसने हमारे सुसमाचार द्वारा आप को बुलाया, जिससे आप हमारे प्रभु ईसा मसीह की महिमा के भागी बनें।

15) इसलिए, भाइयो! आप ढारस रखें और उस शिक्षा में दृढ़ बने रहें, जो आप को हम से मौखिक रूप से या पत्र द्वारा मिली है।

16) हमारे प्रभु ईसा मसीह स्वयं तथा ईश्वर, हमारा पिता - जिसने हमें इतना प्यार किया और हमें चिरस्थायी सान्त्वना तथा उज्जवल आशा का वरदान दिया है-

17) आप लोगों को सान्त्वना देते रहें तथा हर प्रकार के भले काम और बात में सुदृढ़़ बनाये रखें।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 23:23-26

23) ’’ढोंगी शास्त्रियों और फरीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! तुम पुदीने, सौंप और जीरे का दशमांश तो देते हो, किन्तु न्याय, दया और ईमानदारी, संहिता की मुख्य बातों की उपेक्षा करते हो। इन्हें करते रहना और उनकी भी उपेक्षा नहीं करना तुम्हारे लिए उचित था।

24) अन्धे नेताओ! तुम मच्छर छानते हो, किन्तु ऊँट निगल जाते हो।

25) ’’ढोंगी शास्त्रियों और फरीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! तुम प्याले और थाली को बाहर से माँजते हो, किन्तु भीतर वे लूट और असंयम से भरे हुए हैं।

26) अन्धे फ़रीसी! पहले भीतर से प्याले को साफ़ कर लो, जिससे वह बाहर से भी साफ़ हो जाये।

📚 मनन-चिंतन

आम तौर पर हम देखते हैं कि प्रभु येसु कठोर शब्दों अथवा ग़लत भाषा का प्रयोग नहीं करते भले ही उन्हें कोई कितना भी उकसाए। वे विरले ही क्रोधित या आपा खोते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन जब कुछ गम्भीर बात थी, तो उन्हें कभी-कभी ग़ुस्सा भी आया। ऐसा उदाहरण हम मन्दिर में देखते हैं। (देखें योहन 2:13-16)। वह क्रोधित हुए क्योंकि उन्होंने देखा कि लोगों ने ईश्वर के निवास स्थान को व्यवसाय के स्थान में बदल दिया है। वह ईश्वर को पाने का पवित्र स्थान था लेकिन उन्होंने उसे चोर और लुटेरों का अड्डा बना कर रख दिया था, इसलिए प्रभु को ग़ुस्सा आया।

आज की दुनिया में भी हम ऐसी स्थिति देखते हैं, जहाँ ज़िम्मेदार व्यक्ति ईश्वर के नियमों को बदलते और अपने स्वार्थ के लिए तोड़ते-मरोड़ते हैं। वे ईश्वर नियमों की ग़लत व्याख्या करते हैं। वे नियम जो लोगों के लिए ईश्वर के क़रीब आने के मार्गदर्शक थे, उन्हें कुछ ज़िम्मेदारों ने लोगों के लिए अनावश्यक भार में बदल दिया है। जो धर्मगुरु लोगों को ईश्वर के नियमों पर चलने में मदद करने के लिए थे, वे लोगों को ईश्वर से दूर जाने का कारण बन रहे थे। प्रभु येसु ऐसे नेताओं को ढोंगी कहकर बुलाते हैं, ढोंगी, अर्थात जो वास्तव में कुछ और हैं, लेकिन दिखाते कुछ और हैं। ऐसे लोगों से ईश्वर क्रुद्ध होता है। क्या मेरे किसी व्यवहार से ईश्वर को ग़ुस्सा आता है?

23 अगस्त का पवित्र वचन

 

23 अगस्त 2020
वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : इसायाह 22:19-23

19) मैं तुम को तुम्हारे पद से हटाऊँगा, मैं तुम को तुम्हारे स्थान से निकालूँगा।

20) “मैं उस दिन हिज़कीया के पुत्र एलियाकीम को बुलाऊँगा।

21) मैं उसे तुम्हारा परिधान और तुम्हारा कमरबन्द पहनाऊँगा। मैं उसे तुम्हारा अधिकार प्रदान करूँगा। वह येरुसालेम के निवासियों का तथा यूदा के घराने का पिता हो जायेगा।

22) मैं दाऊद के घराने की कुंजी उसके कन्धे पर रख दूँगा। यदि वह खोलेगा, तो कोई बन्द नहीं कर सकेगा। यदि वह बन्द करेगा, तो कोई नहीं खोल सकेगा।

23) मैं उसे खूँटे की तरह एक ठोस जगह पर गाड़ दूँगा। वह अपने पिता के घर के लिए एक महिमामय सिंहासन बन जायेगा।

📕 दूसरा पाठ : रोमियों 11:33-36

33) कितना अगाध है ईश्वर का वैभव, प्रज्ञा और ज्ञान! कितने दुर्बोध हैं उसके निर्णय! कितने रहस्यमय हैं उसके मार्ग!

34) प्रभु का मन कौन जान सका? उसका परामर्शदाता कौन हुआ?

35) किसने ईश्वर को कभी कुछ दिया है जो वह बदले में कुछ पाने का दावा कर सके?

36) ईश्वर सब कुछ का मूल कारण, प्रेरणा-स्रोत तथा लक्ष्य है - उसी को अनन्त काल तक महिमा! आमेन!

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 16:13-20

13) ईसा ने कैसरिया फि़लिपी प्रदेश पहुँच कर अपने शिष्यों से पूछा, ’’मानव पुत्र कौन है, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?’’

14) उन्होंने उत्तर दिया, ’’कुछ लोग कहते हैं- योहन बपतिस्ता; कुछ कहते हैं- एलियस; और कुछ लोग कहते हैं- येरेमियस अथवा नबियों में से कोई’’।

15) ईस पर ईसा ने कहा, ’’और तुम क्सा कहते हो कि मैं कौन हूँ?

16) सिमोन पुत्रुस ने उत्तर दिया, ’’आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं’’।

17) इस पर ईसा ने उस से कहा, ’’सिमोन, योनस के पुत्र, तुम धन्य हो, क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गिक पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है।

18) मैं तुम से कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात् चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा और अधोलोक के फाटक इसके सामने टिक नहीं पायेंगे।

19) मैं तुम्हें स्वर्गराज्य की कुंजिया प्रदान करूँगा। तुम पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।’’

20) इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि तुम लोग किसी को भी यह नहीं बताओ कि मैं मसीह हूँ।

📚 मनन-चिंतन

हमारा देश बहुत से साधु-महात्माओं और ईश्वर को खोजने वाले ऋषि-मुनियों के उदाहरणों से भरा पड़ा है। हर देश में ईश्वर को खोजने वाले ऐसे लोग होते हैं। हम सन्त अगस्टिन की उस कहानी से परिचित हैं, जब वह ईश्वर के रहस्य को समझने की कोशिश कर रहे थे, और इसी कोशिश के दौरान एक बार जब वह अकेले समुंदर के किनारे गहन मनन-चिंतन में मगन टहल रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक छोटा सा बालक अपने नन्हे-नन्हे हाथों से समुंदर के पानी को भरकर किनारे पर बालू में बने एक छोटे से गड्डे में भरने की चेष्टा कर रहा था। वह पानी लाने के लिए बहुत कठिन प्रयास कर रहा थे, लेकिन कुछ नहीं हो पा रहा था। उसके अथक प्रयास को देखते हुए, सन्त अगस्टिन ने उससे पूछा, “क्या कर रहे हो मुन्ना?” बच्चे ने कहा, “मैं इस समुंदर के सारे पानी को इस छोटे से गड्डे में भर रहा हूँ।” सन्त अगस्टिन उस नन्हे बालक की अज्ञानता पर हँस पड़े और बोले, “बेटे इतने बड़े समुंदर को तुम इतने छोटे से गड्डे में कैसे भर सकते हो?” बच्चे ने उत्तर दिया, “वही तो आप कर रहे हैं।” संत अगस्टिन अपने छोटे से दिमाग़ में अनंत ईश्वर के रहस्य को समाने का असम्भव प्रयास कर रहे थे। बाद में उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। हमारे छोटे से मस्तिष्क में जिसे खुद ईश्वर ने बनाया है, उसी ईश्वर का रहस्य कैसे समा सकता है? कोई भी ईश्वर के रहस्य को पूरी तरह से नहीं जान सकता, क्योंकि हम उसी के हाथों की रचना हैं।

लेकिन आज हम देखते हैं कि प्रभु येसु यह पता लगाना चाहते थे कि क्या उनके शिष्य उन्हें जानते हैं। उन्होंने प्रभु येसु के बारे में दूसरों की राय बतायी। अक्सर हम स्वयं ईश्वर को जाने और अनुभव किए बिना दूसरों के अनुभव और ज्ञान में आनंद मनाते हैं, दूसरों का ईश्वरीय अनुभव और ज्ञान क्या है, और कैसा है। प्रभु येसु के बारे में दूसरों का ज्ञान भी पूर्ण नहीं था। कुछ लोगों ने प्रभु येसु को योहन बप्तिस्ता समझ लिया, शायद इसलिए कि प्रभु येसु में संत योहन से मिलती-जुलती कुछ समानताएँ थीं। उन्होंने सत्य बोला, ग़लत रास्ते पर जाने वाले लोगों को सही राह पर लाने का प्रयास किया, और उसने राजा को लौमडी कहकर पुकारा, क्योंकि वह उससे नहीं डरता था, उसने मौलिक जीवन जिया। लेकिन यह उसका असली परिचय नहीं था।

कुछ लोगों ने उसे महान नबी येरेमियाह अथवा नबी एलियस समझा, उनमें भी प्रभु येसु से मिलती-जुलती समानताएँ थीं, लेकिन वह भी उसका असली परिचय नहीं था। और अंततः प्रभु येसु अपने शिष्यों से उनके व्यक्तिगत अनुभव के बारे में पूछते हैं, और संत पेत्रुस जवाब देने के लिए आगे आते हैं। आज प्रभु येसु हममें से प्रत्येक को वहीं सवाल पूछते हैं, “तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?” मेरा उत्तर क्या होगा? मेरे व्यक्तिगत जीवन में प्रभु येसु को कैसे अनुभव किया है? ईश्वर या प्रभु येसु का मेरा अपना क्या अनुभव है? क्या वह मेरे मुक्तिदाता हैं, चंगाई दाता या चमत्कार करने वाला? एक मित्र या एक सान्त्वनादाता है? इसका जवाब पाने के लिए अपने मन में झांककर देखें।



📚 REFLECTION

India is a land known for its number of sages and seekers of God. In every land there are people having quest for knowing God. We are well familiar with the story of St. Augustine who was trying to understand God and in this pursuit, one day he was spending sometime walking and reflecting about understanding God. He was trying very hard and using his mind to understand God and then he saw a small child who was trying to fill water with his hands in a small pit that he had made in the sand. He was trying very hard to bring water but it was all in vain. Seeing how desperate he was, Augustine asked him, “What are you doing, child?” He said, “I am going to fill the whole water of this ocean into this small hole.” Augustine laughed at his ignorance and said, “How can you fill such a vast ocean into this small tiny hole?” The child replied, “That’s what you are doing.” St. Augustine was trying to understand the mystery of God with tiny small mind. How can our tiny brain contain such a vast mystery? No one can know God fully, we are just creation of his hands.

But today we see Jesus, trying to find out whether the disciples know him. They replied about what others said about Jesus. Very often instead of knowing and experiencing God for ourselves, we try to feast on others experience and explanation of God, what and how others understand God. Even others had not understood Jesus fully. Some understood Jesus as John the Baptist, perhaps because Jesus had some similarities with John. He spoke truth, he corrected those who went on wrong path, he was not afraid of the king whom he called ‘fox’, and he lived a radical life. But that was not his real identity.

Others understood him to be some great prophet like Elijah or Jeremiah, they both also had similarities that matched with Jesus, but that either was not his real identity. Then finally Jesus asks their personal experience of him and Peter comes forward with the answer. Today Jesus asks each one of us the same question “Who do you say that I am?” what will be my answer? How have I experienced Jesus in my personal life? What is my personal experience of God or Jesus? Is he a saviour for me? A healer, a miracle worker? A friend, a consoler? Let us ask ourselves.


मनन-चिंतन - 2

प्रभु येसु ने अपने जीवन काल में शिष्यों को शिक्षा दी, उनके साथ समय बिताया, उनके विश्वास को दृढ़ बनाया तथा अपने दुखभोग, मरण तथा पुनरुत्थान के बारे में उन्हें समझाया ताकि शिष्य भविष्य में निडर हो कर दृढ़तापूर्वक ईश्वर के राज्य की घोषणा कर सकें।

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु शिष्यों की परीक्षा लेते हैं। वे जानना चाहते हैं कि शिष्यों ने इतने वर्षों में क्या सीखा, क्या समझा और क्या अनुभव किया। इसलिए प्रभु येसु अपने शिष्यों से प्रश्न करते हैं कि ’मैं कौन हूँ’ इस विषय में लोग क्या कहते हैं। तुरन्त ही वे उन्हें बताने लगते हैं कि कुछ लोग आपको योहन बपतिस्ता, कुछ एलियस, कुछ यिरमियाह और कुछ नबियों में से कोई कहते हैं। फिर वे उनसे एक व्यक्तिगत प्रश्न करने लगते हैं कि तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ। इसका उत्तर देने में शिष्य सोच में पड जाते हैं। सिर्फ पेत्रुस उत्तर देते हैं, “आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं।”

पवित्र बाइबिल में हमें पढ़ने को मिलता है कि लोगों ने अपने अनुभव के आधार पर प्रभु येसु के बारे में कुछ न कुछ कहा। जैसे फरीसियों ने उन्हें बढई का बेटा माना, समारी स्त्री ने उन्हें नबी कहा और निकोदेमुस ने उन्हें गुरू तथा इस्राएल का राजा कहा। इस प्रकार अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने अनुभव के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

आज प्रभु येसु हम से भी व्यक्तिगत प्रश्न करते हैं कि तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ? हम सब इस प्रश्न का जवाब अपने ख्रीस्तीय जीवन के अनुभव के द्वारा ही दे सकते हैं। हम सबों के उत्तर शायद भिन्न-भिन्न होंगे। किसी के लिए वे चंगाईदाता हैं, तो किसी के लिए शांतिदाता या दयासागर, प्रेमी पिता या मित्र । अगर किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में येसु को करीब से अनुभव नहीं किया हो, तो उसके लिए इस प्रश्न का जवाब देना असंभव है।

जब पेत्रुस ने कहा, “आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं” तब येसु पेत्रुस से कहते हैं, “सिमोन, योनस के पुत्र, तुम धन्य हो, क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गिक पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है”। इसका यह मतलब है कि जब तक ईश्वर अपने आप को प्रकट नहीं करते हैं, तब तक हम उन्हें नहीं जान सकते हैं।

आज के पहले पाठ में संत पौलुस कहते हैं, “कितना अगाध है ईश्वर का वैभव, प्रज्ञा और ज्ञान! कितने दुर्बोध हैं उसके निर्णय! कितने रहस्यमय हैं उसके मार्ग! प्रभु का मन कौन जान सका?” (रोमियों 11:33-34)

हालाँकि हम ईश्वर का अनुभव कर सकते हैं और उस अनुभव के आधार पर उन के विषय में कुछ न कुछ कह सकते हैं, वह सब ज्ञान गहरा नहीं हो सकता जब तक ईश्वर स्वयं अपने आप को हमारे लिए प्रकट करने की कृपा न करें। ईश्वर को प्यार करने वालों को और उनके समक्ष बच्चों जैसा बनने वालों के सामने ईश्वर अपने आप को प्रकट करते हैं। मत्ती 11:25-27 में प्रभु येसु कहते हैं, “पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ; क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है। हाँ, पिता! यही तुझे अच्छा लगा। मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर कोई भी पुत्र को नहीं जानता। इसी तरह पिता को कोई भी नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है और वही, जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे।”

इस से हम यह समझ सकते हैं कि हम अपने दिमाग से ईश्वर का पक्का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते हैं। हमें ईश्वरीय ज्ञान के लिए ईश्वर से ही गिडगिडा कर याचना करना चाहिए। सूक्ति 2:1-6 में प्रभु का वचन कहता है, “पुत्र! यदि तुम मेरे शब्दों पर ध्यान दोगे, मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, प्रज्ञा की बातें कान लगा कर सुनोगे और सत्य में मन लगाओगे; यदि तुम विवेक की शरण लोगे और सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करोगे; यदि तुम उसे चाँदी की तरह ढूँढ़ते रहोगे और खजाना खोजने वाले की तरह उसके लिए खुदाई करोगे, तो तुम प्रभु-भक्ति का मर्म समझोगे और तुम्हें ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होगा; क्योंकि प्रभु ही प्रज्ञा प्रदान करता और ज्ञान तथा विवेक की शिक्षा देता है।”

नबी दानिएल कहते हैं “ईश्वर का नाम सदा-सर्वदा धन्य है, प्रज्ञा और शक्ति उसी की है; काल और ऋतु उसी के हाथ में हैं; वही राजाओं की प्रतिष्ठा करता और उनके सिंहासन उलटता है। वही विद्वानों को प्रज्ञा देता है और समझदारों को समझ। वही गूढ़ रहस्यों को प्रकट करता है, वही अंधकार में छिपे भेद जानता है, क्योंकि उस में ज्योति का निवास है। (दानिएल 2:20-22)



22 अगस्त का पवित्र वचन

 

22 अगस्त 2020
मरियम स्वर्ग की रानी

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📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 9:1-6

1) अन्धकार में भटकने वाले लोगों ने एक महती ज्योति देखी है, अन्धकारमय प्रदेश में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ है।

2) तूने उन लोगों का आनन्द और उल्लास प्रदान किया है। जैसे फ़सल लुनते समय या लूट बाँटते समय उल्लास होता है, वे वैसे ही तेरे सामने आनन्द मना रहे हैं।

3) उन पर रखा हुआ भारी जूआ, उनके कन्धों पर लटकने वाली बहँगी, उन पर अत्याचार करने वाले का डण्डा- यह सब तूने तोड़ डाला है, जैसा कि मिदयान के दिन हुआ था।

4) सैनिकों के सभी भारी जूते और समस्त रक्त-रंजित वस्त्र जला दिये गये हैं।

5) यह इस लिए हुआ कि हमारे लिए एक बालक उत्पन्न हुआ है, हम को एक पुत्र मिला है। उसके कन्धों पर राज्याधिकार रखा गया है और उसका नाम होगा- अपूर्व परामर्शदाता, शक्तिशाली ईश्वर, शाश्वत पिता, शान्ति का राजा।

6) वह दऊद के सिंहासन पर विराजमान हो कर सदा के लिए शन्ति, न्याय और धार्मिकता का साम्राज्य स्थापित करेगा। विश्वमण्डल के प्रभु का अनन्य प्रेम यह कार्य सम्पन्न करेगा।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 1:26-38

26) छठे महीने स्वर्गदूत गब्रिएल, ईश्वर की ओर से, गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया,

27) जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी, और उस कुँवारी का नाम था मरियम।

29) वह इन शब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है।

30) तब स्वर्गदूत ने उस से कहा, ’’मरियम! डरिए नहीं। आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है।

31) देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी।

32) वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा,

33) वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’

34) पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, ’’यह कैसे हो सकता है? मेरा तो पुरुष से संसर्ग नहीं है।’’

35) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ’’पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

36) देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीज़बेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है;

37) क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।’’

38) मरियम ने कहा, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।’’ और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम आदर-सम्मान की दो तस्वीरें देखते हैं, पहली तस्वीर ईश्वर के चुने हुए ज़िम्मेदार धर्मगुरुओं की है, जिन्हें लोगों को सही राह दिखाने की और खुद ईमानदारी से ईश्वर के रास्ते पर चलने की ज़िम्मेदारी दी गयी थी। वे धर्मग्रंथ की व्याख्या करके और लोगों को संहिता के नियमों को समझाते हुए अपना कार्य करते थे। लेकिन वे इसे सिर्फ़ एक पेशे के समान करते थे, उसे अपने जीवन में नहीं उतारते थे। उन्ही शिक्षाएँ उनके जीवन में परिणत नहीं हुईं, बल्कि उनके कार्य, उनकी शिक्षाओं के विपरीत थे। वे झूठा सम्मान चाहते थे।

दूसरी तस्वीर पहली के विपरीत है। प्रभु येसु अपने शिष्यों को उन धर्मगुरुओं का सम्मान करने के लिए कहते हैं, क्योंकि वे मूसा की गद्दी पर बैठे हैं, लेकिन उनके कर्मों का अनुसरण ना करो। वे सांसारिक आदर-सम्मान के भूखे हैं, लेकिन हमें ईश्वर की नज़रों में आदर-सम्मान पाने के लिए कार्य करना है। ऐसा हम तभी कर सकते हैं, जब हम अपने जीवन में सबसे अधिक ईश्वर को आदर-सम्मान और महिमा देंगे, और स्वयं को ईश्वर की नज़रों में विनम्र बना लेंगे।

आज की दुनिया में हम अपने चारों तरफ़ ऐसे लोगों को देखते हैं जो नाम और शोहरत कमा कर सम्मान पाना चाहते हैं। वे दौलत और शोहरत के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं और ईश्वर को भूल जाते हैं, जो हमें सब कुछ प्रदान करता है। आइए हम ईश्वर से विनम्रता का वरदान माँगें ताकि हम सबसे पीछे रहें और सबसे बढ़कर ईश्वर की महिमा करें।आमेन।

21 अगस्त का पवित्र वचन

 

21 अगस्त 2020
वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 37:1-14

1) प्रभु का हाथ मुझ पर पड़ा और प्रभु के आत्मा ने मुझे ले जा कर एक घाटी में उतार दिया, जो हड्डियों से भरी हुई थी।

2) उसने मुझे उनके बीच चारों ओर घुमाया। वे हाड्डियाँ बड़ी संख्या में घाटी के धरातल पर पड़ी हुई थीं और एकदम सूख गयी थीं।

3) उसने मुझ से कहा, "मानवपुत्र! क्या इन हाड्डियों में फिर जीवन आ सकता है?" मैंने उत्तर दिया, "प्रभु-ईश्वर! तू ही जानता है"।

4) इस पर उसने मुझ से कहा, "इन हाड्डियों से भवियवाणी करो। इन से यह कहो, ’सूखी’ हड्डियो! प्रभु की वाणी सुनो।

5) प्रभु-ईश्वर इन हड्डियों से यह कहता है: मैं तुम में प्राण डालूँगा और तुम जीवित हो जाओगी।

6) मैं तुम पर स्नायुएँ लगाऊँगा तुम में मांस भरूँगा, तुम पर चमड़ा चढाऊँगा। तुम में प्राण डालूँगा, तुम जीवित हो जाओगी और तुम जानोगी कि मैं प्रभु हूँ।"

7) मैं उसके आदेश के अनुसार भवियवाणी करने लगा। मैं भवियवाणी कर ही रहा था कि एक खडखडाती आवाज सुनाई पडी और वे हाड्डिया एक दूसरी से जुडने लगीं।

8) मैं देख रहा था कि उन पर स्नायुएँ लगीं; उन में मांस भर गया, उन पर चमड़ा चढ गया, किंतु उन में प्राण नहीं थे।

9) उसने मुझ से कहा, "मानवपुत्र! प्राणवायु को सम्बोधिक कर भवियवाणी करो। यह कह कर भवियवाणी करो: ’प्रभु-ईश्वर यह कहता है। प्राणवायु! चारों दिशाओं में आओ और उन मृतकों में प्राण फूँक दो, जिससे उन में जीवन आ जाये।"

10) मैंने उसके आदेशानुसार भवियवाणी की और उन में प्राण आये। वे पुनर्जीवित हो कर अपने पैरों पर खड़ी हो गयी- वह एक विशाल बहुसंख्यक सेना थी।

11) तब उसने मुझ से कहा, "मानवपुत्र! ये हड्डियाँ समस्त इस्राएली हैं। वे कहते रहते हैं- ’हमारी हड्डियाँ सूख गयी हैं। हमारी आशा टूट गय है। हमारा सर्वनाश हो गया है।

12) तुम उन से कहोगे, ’प्रभु यह कहता है: मैं तुम्हारी कब्रों को खोल दूँगा। मेरी प्रजा! में तुम लोगों को कब्रों से निकाल का इस्राएल की धरती पर वापस ले जाऊँगा।

13) मेरी प्रजा! जब मैं तुम्हारी कब्रों को खोल कर तुम लोगों को उन में से निकालूँगा, तो तुम लोग जान जाओगे कि मैं ही प्रभु हूँ।

14) मैं तुम्हें अपना आत्मा प्रदान करूँगा और तुम में जीवन आ जायेगा। मैं तुम्हें तुम्हारी अपनी धरती पर बसाऊँगा और तुम लोग जान जाओगे कि मैं, प्रभु, ने यह कहा और पूरा भी किया’।"

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:34-40

34) जब फरीसियों ने यह सुना कि ईसा ने सदूकियों का मुँह बन्द कर दिया था, तो वे इकट्ठे हो गये।

35) और उन में से एक शास्त्री ने ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से पूछा,

36) गुरुवर! संहिता में सब से बड़ी आज्ञा कौन-सी है?’’

37) ईसा ने उस से कहा, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो।

38) यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है।

39) दूसरी आज्ञा इसी के सदृश है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

40) इन्हीं दो आज्ञायों पर समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलम्बित हैं।’’

📚 मनन-चिंतन

जब इस्राएली लोग हताश-निराश हो हो गये तो कराह उठे, “हमारी हड्डियाँ सूख गयी हैं, हमारी आशा टूट गयी है, हमारा सर्वनाश हो गया है।” लेकिन ईश्वर उन्हें भरोसा दिलाता है कि उसका प्रेम उनके लिए अनन्त है और उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। नबी एजेकियेल के माध्यम से वह बताते हैं कि वह सूखी हड्डियों में भी जान फूंक सकता है क्योंकि उसका प्रेम असीम है। पहला पाठ लोगों के लिए ईश्वर प्रेम को दर्शाता है और सुसमाचार उस प्रेम के प्रति हमारे प्रत्युत्तर को दर्शाता है। इसलिए हमें अपने प्रभु ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी शक्ति से प्रेम करना है, और ऐसा करने का पहला कदम है अपने पड़ौसी को प्यार करना।

ईश्वर की पहली और सबसे महत्वपूर्ण आज्ञा है ईश्वर को सबसे अधिक और सबसे बढ़कर प्यार करना, और इस आज्ञा का दूसरा पहलू अपने पड़ौसी को अपने समान प्यार करना क्योंकि अपने पड़ौसी को प्यार किए बिना हम ईश्वर को प्यार नहीं कर सकते। सन्त योहन कहते हैं कि यदि तुम अपने भाई या बहन से नफ़रत करते हो तो ईश्वर को प्यार नहीं कर सकते, (1 योहन 4:20-21)। चूँकि दूसरी आज्ञा के बिना पहली आज्ञा का पालन नहीं कर सकते, इसलिए प्रभु येसु इन दोनों आज्ञाओं को एक साथ रखते हैं। लेकिन इन दोनों आज्ञाओं से पहले एक तीसरी आज्ञा भी है जो इन दोनों के बीच में छुपी हुई है, वह है - अपने आप को प्यार करना। यदि आप खुद को प्यार नहीं कर सकते तो दूसरों को कैसे प्यार करोगे, और यदि आप दूसरों को प्यार नहीं कर सकते तो ईश्वर को प्यार कैसे करोगे? आइए हम ईश्वर से कृपा माँगें कि हम दूसरों में और खुद के अन्दर ईश्वर की उपस्थिति को पहचानें और सबसे बढ़कर उसे प्यार करें। आमेन।

✍️-Bro. Biniush Topno


📚 REFLECTION

When the Israelites became hopeless and moaned “Our bones are dried up, our hope is lost and we are cut off.” But God gives them assurance that he loves them and for him nothing is impossible. Through prophet Ezekiel he shows that he can give new life even to the dry bones, because his love is everlasting. The first reading indicates God’s love towards people and gospel of today tells about our response to God’s love. That is why we have to love our God with all our heart, with all our soul and with all our mind and to do that first step is to love our neighbour as ourselves.

First and most important commandment is to love God above and more than everything and the second part of this commandment is love our neighbour as ourselves because without loving our neighbour we cannot love God. St. John says that you cannot love God if you hate your brother or sisters (Cf. 1Jn.4:20-21). That’s why first commandment cannot be fulfilled without the second one and therefore Jesus puts them together. But before these both, there is third commandment hidden in the second, that is love yourself. If you do not love yourself how can you love others and if you cannot love others, then how can you love God? Let us pray for the grace to realise the presence of God within us and others and love him above everything else.

 -Bro. Biniush Topno





20 अगस्त का पवित्र वचन

 

20 अगस्त 2020
वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 36:23-28

23) मैं अपने महान् नाम की पवत्रिता प्रमाणित करूँगा, जिस पर देश-विदेश में कलंक लग गया है और जिसका अनादर तुम लोगों ने वहाँ जा कर कराया है। जब मैं तुम लोगों के द्वारा राष्ट्रों के सामने अपने पवत्रि नाम की महिमा प्रदर्शित करूँगा, तब वे जान जायेंगे कि मैं ही प्रभु हूँ।

24) ’’मैं तुम लोगों को राष्ट्रों में से निकाल कर और देश-विदेश से एकत्र कर तुम्हारे अपने देश वापस ले जाऊँगा।

25) मैं तुम लोगों पर पवत्रि जल छिडकूँगा और तुम पवत्रि हो जाओगे। मैं तुम लोगों को तुम्हारी सारी अपवत्रिता से और तुम्हारी सब देवमूर्तियों के दूषण से शुद्ध कर दूँगा।

26) मैं तुम लोगों को एक नया हृदय दूँगा और तुम में एक नया आत्मा रख दूँगा। मैं तुम्हारे शरीर से पत्थर का हृदय निाकल कर तुम लोगों को रक्त-मांस का हृदय प्रदान करूँगा।

27) मैं तुम लोगों में अपना आत्मा रख दूँगा, जिससे तुम मेरी संहिता पर चलोगे और ईमानदारी से मेरी आज्ञाओं का पालन करोग।

28) तुम लोग उस देश में निवास करोगे, जिसे मैंने तुम्हारे पूर्वजों को दिया है। तुम मेरी प्रजा होगे और मैं तुम्हारा ईश्वर होऊँगा।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 22:1-14

1) ईसा उन्हें फिर दृष्टान्त सुनाने लगे। उन्होंने कहा,

2) ’’स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जिसने अपने पुत्र के विवाह में भोज दिया।

3) उसने आमन्त्रित लोगों को बुला लाने के लिए अपने सेवकों को भेजा, लेकिन वे आना नहीं चाहते थे।

4) राजा ने फिर दूसरे सेवकों को यह कहते हुए भेजा, ’अतिथियों से कह दो- देखिए! मैंने अपने भोज की तैयारी कर ली है। मेरे बैल और मोटे-मोटे जानवर मारे जा चुके हैं। सब कुछ तैयार है; विवाह-भोज में पधारिये।’

5) अतिथियों ने इस की परवाहा नहीं की। कोई अपने खेत की और चला गया, तो कोई अपना व्यापार देखने।

6) दूसरे अतिथियों ने राजा के सेवकों को पकड़ कर उनका अपमान किया और उन्हें मार डाला।

7) राजा को बहुत क्रोध आया। उसने अपनी सेना भेज कर उन हत्यारों का सर्वनाश किया और उनका नगर जला दिया।

8) ’’तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’विवाह-भोज की तैयारी तो हो चुकी है, किन्तु अतिथि इसके योग्य नहीं ठहरे।

9) इसलिए चैराहों पर जाओ और जितने भी लोग मिल जायें, सब को विवाह-भोज में बुला लाओ।’

10) सेवक सड़कों पर गये और भले-बुरे जो भी मिले, सब को बटोर कर ले आये और विवाह-मण्डप अतिथियों से भर गया।

11) ’’राजा अतिथियों को देखने आया, तो वहाँ उसकी दृष्टि एक ऐसे मनुष्य पर पड़ी, जो विवाहोत्सव के वस्त्र नहीं पहने था।

12) उसने उस से कहा, ’भई विवाहोत्सव के वस्त्र पहने बिना तुम यहाँ कैसे आ गये?’ वह मनुष्य चुप रहा।

13) तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’इसके हाथ-पैर बाँध कर इसे बाहर, अन्धकार में फेंक दो। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।’

14) क्योंकि बुलाये हुए तो बहुत हैं, लेकिन चुने हुए थोडे़ हैं।’’

📚 मनन-चिंतन

आज हम एक बड़े ही सुंदर दृष्टांत पर मनन-चिंतन करेंगे। एक ऐसा दृष्टांत जिसमें एक राजा है जो सब प्रकार के लोगों को चाहे भले हों या बुरे, भोज में शामिल करता है क्योंकि बुलाए गये लोग उसके बुलावे का सम्मान नहीं करते। तब वह उन सभी का सर्वनाश करता है जो उसके बुलावे के अस्वीकार करते हैं। साथ ही हम यह भी देखते हैं कि भले ही राजा ने सबको बुला लिया लेकिन एक व्यक्ति विवाह की पोशाक के बिना ही अर्थात् बिना तैयारी के आ जाता है, और राजा उसके हाथ-पैर बांधकर बाहर अंधकार में फेंकने का आदेश देता है, जहाँ वे रोयेंगे और दाँत पीसेंगे।

यह बात स्पष्ट है कि यह दृष्टांत यहूदियों के लिए था जो स्वर्गराज्य के उत्तराधिकारी बनने के लिए बुलाए गए थे, लेकिन वे ईश्वर के बुलावे को अस्वीकार कर देते हैं, और प्रभु येसु को मुक्तिदाता मसीह के रूप में स्वीकार नहीं करते जिसके कारण ईश्वर की मुक्ति सभी के लिए उपलब्ध हो जाती है, सारी बंदिशें तोड़ दी जाती हैं। सब तरह के लोग चाहे अच्छे हों या बुरे, सब ईश्वर के विवाह भोज में भाग ले सकते हैं, बशर्ते वे विवाह की पोशाक में हों। जब ईश्वर पापियों के लिए खुला निमंत्रण देते हैं तो अपने पापों को त्यागकर पश्चाताप रूपी पोशाक की आवश्यकता है। यदि हम पश्चाताप रूपी पोशाक में नहीं हैं तो ईश्वर के विवाह भोज में शामिल नहीं हो सकते। ईश्वर हमें ईश्वरीय राज्य के योग्य बना सकते हैं, लेकिन पहला कदम पश्चाताप के रूप में हमारी तरफ़ से होना है।

 -बिनियुश टोपनो


📚 REFLECTION

We have a beautiful parable for our reflection today. A parable of the king who brings all kinds of people, bad and good alike because invited and chosen people did not respond positively. Then he destroys those who refuse his invitation. At the same time we see, though the king brought in everyone but one of them was not in wedding garments which means he came unprepared and king orders the attendants to bind his hands and feet and cast outside into the darkness where there will be wailing and grinding of teeth.

This is certainly clear that this parable is about Jews who were chosen to be the heirs of the kingdom of God and yet they refused to accept Jesus as their Messiah and therefore salvation is opened for all, all boundaries are removed. All people whether good or bad, worthy or unworthy can partake in God’s banquet, but only one thing is needed, the wedding garment. When God gives an open invitation to the sinners, what is most required is the wedding garment of repentance, giving up of our sins. If we do not wear the garment of repentance, we cannot partake in the banquet of God. God can make us worthy but first step is repentance, which is from our side.

 -Br. Biniush Topno

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