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22 अगस्त का पवित्र वचन

 

22 अगस्त 2020
मरियम स्वर्ग की रानी

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📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 9:1-6

1) अन्धकार में भटकने वाले लोगों ने एक महती ज्योति देखी है, अन्धकारमय प्रदेश में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ है।

2) तूने उन लोगों का आनन्द और उल्लास प्रदान किया है। जैसे फ़सल लुनते समय या लूट बाँटते समय उल्लास होता है, वे वैसे ही तेरे सामने आनन्द मना रहे हैं।

3) उन पर रखा हुआ भारी जूआ, उनके कन्धों पर लटकने वाली बहँगी, उन पर अत्याचार करने वाले का डण्डा- यह सब तूने तोड़ डाला है, जैसा कि मिदयान के दिन हुआ था।

4) सैनिकों के सभी भारी जूते और समस्त रक्त-रंजित वस्त्र जला दिये गये हैं।

5) यह इस लिए हुआ कि हमारे लिए एक बालक उत्पन्न हुआ है, हम को एक पुत्र मिला है। उसके कन्धों पर राज्याधिकार रखा गया है और उसका नाम होगा- अपूर्व परामर्शदाता, शक्तिशाली ईश्वर, शाश्वत पिता, शान्ति का राजा।

6) वह दऊद के सिंहासन पर विराजमान हो कर सदा के लिए शन्ति, न्याय और धार्मिकता का साम्राज्य स्थापित करेगा। विश्वमण्डल के प्रभु का अनन्य प्रेम यह कार्य सम्पन्न करेगा।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 1:26-38

26) छठे महीने स्वर्गदूत गब्रिएल, ईश्वर की ओर से, गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया,

27) जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी, और उस कुँवारी का नाम था मरियम।

29) वह इन शब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है।

30) तब स्वर्गदूत ने उस से कहा, ’’मरियम! डरिए नहीं। आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है।

31) देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी।

32) वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा,

33) वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’

34) पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, ’’यह कैसे हो सकता है? मेरा तो पुरुष से संसर्ग नहीं है।’’

35) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ’’पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

36) देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीज़बेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है;

37) क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।’’

38) मरियम ने कहा, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।’’ और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम आदर-सम्मान की दो तस्वीरें देखते हैं, पहली तस्वीर ईश्वर के चुने हुए ज़िम्मेदार धर्मगुरुओं की है, जिन्हें लोगों को सही राह दिखाने की और खुद ईमानदारी से ईश्वर के रास्ते पर चलने की ज़िम्मेदारी दी गयी थी। वे धर्मग्रंथ की व्याख्या करके और लोगों को संहिता के नियमों को समझाते हुए अपना कार्य करते थे। लेकिन वे इसे सिर्फ़ एक पेशे के समान करते थे, उसे अपने जीवन में नहीं उतारते थे। उन्ही शिक्षाएँ उनके जीवन में परिणत नहीं हुईं, बल्कि उनके कार्य, उनकी शिक्षाओं के विपरीत थे। वे झूठा सम्मान चाहते थे।

दूसरी तस्वीर पहली के विपरीत है। प्रभु येसु अपने शिष्यों को उन धर्मगुरुओं का सम्मान करने के लिए कहते हैं, क्योंकि वे मूसा की गद्दी पर बैठे हैं, लेकिन उनके कर्मों का अनुसरण ना करो। वे सांसारिक आदर-सम्मान के भूखे हैं, लेकिन हमें ईश्वर की नज़रों में आदर-सम्मान पाने के लिए कार्य करना है। ऐसा हम तभी कर सकते हैं, जब हम अपने जीवन में सबसे अधिक ईश्वर को आदर-सम्मान और महिमा देंगे, और स्वयं को ईश्वर की नज़रों में विनम्र बना लेंगे।

आज की दुनिया में हम अपने चारों तरफ़ ऐसे लोगों को देखते हैं जो नाम और शोहरत कमा कर सम्मान पाना चाहते हैं। वे दौलत और शोहरत के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं और ईश्वर को भूल जाते हैं, जो हमें सब कुछ प्रदान करता है। आइए हम ईश्वर से विनम्रता का वरदान माँगें ताकि हम सबसे पीछे रहें और सबसे बढ़कर ईश्वर की महिमा करें।आमेन।

21 अगस्त का पवित्र वचन

 

21 अगस्त 2020
वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 37:1-14

1) प्रभु का हाथ मुझ पर पड़ा और प्रभु के आत्मा ने मुझे ले जा कर एक घाटी में उतार दिया, जो हड्डियों से भरी हुई थी।

2) उसने मुझे उनके बीच चारों ओर घुमाया। वे हाड्डियाँ बड़ी संख्या में घाटी के धरातल पर पड़ी हुई थीं और एकदम सूख गयी थीं।

3) उसने मुझ से कहा, "मानवपुत्र! क्या इन हाड्डियों में फिर जीवन आ सकता है?" मैंने उत्तर दिया, "प्रभु-ईश्वर! तू ही जानता है"।

4) इस पर उसने मुझ से कहा, "इन हाड्डियों से भवियवाणी करो। इन से यह कहो, ’सूखी’ हड्डियो! प्रभु की वाणी सुनो।

5) प्रभु-ईश्वर इन हड्डियों से यह कहता है: मैं तुम में प्राण डालूँगा और तुम जीवित हो जाओगी।

6) मैं तुम पर स्नायुएँ लगाऊँगा तुम में मांस भरूँगा, तुम पर चमड़ा चढाऊँगा। तुम में प्राण डालूँगा, तुम जीवित हो जाओगी और तुम जानोगी कि मैं प्रभु हूँ।"

7) मैं उसके आदेश के अनुसार भवियवाणी करने लगा। मैं भवियवाणी कर ही रहा था कि एक खडखडाती आवाज सुनाई पडी और वे हाड्डिया एक दूसरी से जुडने लगीं।

8) मैं देख रहा था कि उन पर स्नायुएँ लगीं; उन में मांस भर गया, उन पर चमड़ा चढ गया, किंतु उन में प्राण नहीं थे।

9) उसने मुझ से कहा, "मानवपुत्र! प्राणवायु को सम्बोधिक कर भवियवाणी करो। यह कह कर भवियवाणी करो: ’प्रभु-ईश्वर यह कहता है। प्राणवायु! चारों दिशाओं में आओ और उन मृतकों में प्राण फूँक दो, जिससे उन में जीवन आ जाये।"

10) मैंने उसके आदेशानुसार भवियवाणी की और उन में प्राण आये। वे पुनर्जीवित हो कर अपने पैरों पर खड़ी हो गयी- वह एक विशाल बहुसंख्यक सेना थी।

11) तब उसने मुझ से कहा, "मानवपुत्र! ये हड्डियाँ समस्त इस्राएली हैं। वे कहते रहते हैं- ’हमारी हड्डियाँ सूख गयी हैं। हमारी आशा टूट गय है। हमारा सर्वनाश हो गया है।

12) तुम उन से कहोगे, ’प्रभु यह कहता है: मैं तुम्हारी कब्रों को खोल दूँगा। मेरी प्रजा! में तुम लोगों को कब्रों से निकाल का इस्राएल की धरती पर वापस ले जाऊँगा।

13) मेरी प्रजा! जब मैं तुम्हारी कब्रों को खोल कर तुम लोगों को उन में से निकालूँगा, तो तुम लोग जान जाओगे कि मैं ही प्रभु हूँ।

14) मैं तुम्हें अपना आत्मा प्रदान करूँगा और तुम में जीवन आ जायेगा। मैं तुम्हें तुम्हारी अपनी धरती पर बसाऊँगा और तुम लोग जान जाओगे कि मैं, प्रभु, ने यह कहा और पूरा भी किया’।"

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:34-40

34) जब फरीसियों ने यह सुना कि ईसा ने सदूकियों का मुँह बन्द कर दिया था, तो वे इकट्ठे हो गये।

35) और उन में से एक शास्त्री ने ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से पूछा,

36) गुरुवर! संहिता में सब से बड़ी आज्ञा कौन-सी है?’’

37) ईसा ने उस से कहा, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो।

38) यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है।

39) दूसरी आज्ञा इसी के सदृश है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

40) इन्हीं दो आज्ञायों पर समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलम्बित हैं।’’

📚 मनन-चिंतन

जब इस्राएली लोग हताश-निराश हो हो गये तो कराह उठे, “हमारी हड्डियाँ सूख गयी हैं, हमारी आशा टूट गयी है, हमारा सर्वनाश हो गया है।” लेकिन ईश्वर उन्हें भरोसा दिलाता है कि उसका प्रेम उनके लिए अनन्त है और उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। नबी एजेकियेल के माध्यम से वह बताते हैं कि वह सूखी हड्डियों में भी जान फूंक सकता है क्योंकि उसका प्रेम असीम है। पहला पाठ लोगों के लिए ईश्वर प्रेम को दर्शाता है और सुसमाचार उस प्रेम के प्रति हमारे प्रत्युत्तर को दर्शाता है। इसलिए हमें अपने प्रभु ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी शक्ति से प्रेम करना है, और ऐसा करने का पहला कदम है अपने पड़ौसी को प्यार करना।

ईश्वर की पहली और सबसे महत्वपूर्ण आज्ञा है ईश्वर को सबसे अधिक और सबसे बढ़कर प्यार करना, और इस आज्ञा का दूसरा पहलू अपने पड़ौसी को अपने समान प्यार करना क्योंकि अपने पड़ौसी को प्यार किए बिना हम ईश्वर को प्यार नहीं कर सकते। सन्त योहन कहते हैं कि यदि तुम अपने भाई या बहन से नफ़रत करते हो तो ईश्वर को प्यार नहीं कर सकते, (1 योहन 4:20-21)। चूँकि दूसरी आज्ञा के बिना पहली आज्ञा का पालन नहीं कर सकते, इसलिए प्रभु येसु इन दोनों आज्ञाओं को एक साथ रखते हैं। लेकिन इन दोनों आज्ञाओं से पहले एक तीसरी आज्ञा भी है जो इन दोनों के बीच में छुपी हुई है, वह है - अपने आप को प्यार करना। यदि आप खुद को प्यार नहीं कर सकते तो दूसरों को कैसे प्यार करोगे, और यदि आप दूसरों को प्यार नहीं कर सकते तो ईश्वर को प्यार कैसे करोगे? आइए हम ईश्वर से कृपा माँगें कि हम दूसरों में और खुद के अन्दर ईश्वर की उपस्थिति को पहचानें और सबसे बढ़कर उसे प्यार करें। आमेन।

✍️-Bro. Biniush Topno


📚 REFLECTION

When the Israelites became hopeless and moaned “Our bones are dried up, our hope is lost and we are cut off.” But God gives them assurance that he loves them and for him nothing is impossible. Through prophet Ezekiel he shows that he can give new life even to the dry bones, because his love is everlasting. The first reading indicates God’s love towards people and gospel of today tells about our response to God’s love. That is why we have to love our God with all our heart, with all our soul and with all our mind and to do that first step is to love our neighbour as ourselves.

First and most important commandment is to love God above and more than everything and the second part of this commandment is love our neighbour as ourselves because without loving our neighbour we cannot love God. St. John says that you cannot love God if you hate your brother or sisters (Cf. 1Jn.4:20-21). That’s why first commandment cannot be fulfilled without the second one and therefore Jesus puts them together. But before these both, there is third commandment hidden in the second, that is love yourself. If you do not love yourself how can you love others and if you cannot love others, then how can you love God? Let us pray for the grace to realise the presence of God within us and others and love him above everything else.

 -Bro. Biniush Topno





20 अगस्त का पवित्र वचन

 

20 अगस्त 2020
वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 36:23-28

23) मैं अपने महान् नाम की पवत्रिता प्रमाणित करूँगा, जिस पर देश-विदेश में कलंक लग गया है और जिसका अनादर तुम लोगों ने वहाँ जा कर कराया है। जब मैं तुम लोगों के द्वारा राष्ट्रों के सामने अपने पवत्रि नाम की महिमा प्रदर्शित करूँगा, तब वे जान जायेंगे कि मैं ही प्रभु हूँ।

24) ’’मैं तुम लोगों को राष्ट्रों में से निकाल कर और देश-विदेश से एकत्र कर तुम्हारे अपने देश वापस ले जाऊँगा।

25) मैं तुम लोगों पर पवत्रि जल छिडकूँगा और तुम पवत्रि हो जाओगे। मैं तुम लोगों को तुम्हारी सारी अपवत्रिता से और तुम्हारी सब देवमूर्तियों के दूषण से शुद्ध कर दूँगा।

26) मैं तुम लोगों को एक नया हृदय दूँगा और तुम में एक नया आत्मा रख दूँगा। मैं तुम्हारे शरीर से पत्थर का हृदय निाकल कर तुम लोगों को रक्त-मांस का हृदय प्रदान करूँगा।

27) मैं तुम लोगों में अपना आत्मा रख दूँगा, जिससे तुम मेरी संहिता पर चलोगे और ईमानदारी से मेरी आज्ञाओं का पालन करोग।

28) तुम लोग उस देश में निवास करोगे, जिसे मैंने तुम्हारे पूर्वजों को दिया है। तुम मेरी प्रजा होगे और मैं तुम्हारा ईश्वर होऊँगा।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 22:1-14

1) ईसा उन्हें फिर दृष्टान्त सुनाने लगे। उन्होंने कहा,

2) ’’स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जिसने अपने पुत्र के विवाह में भोज दिया।

3) उसने आमन्त्रित लोगों को बुला लाने के लिए अपने सेवकों को भेजा, लेकिन वे आना नहीं चाहते थे।

4) राजा ने फिर दूसरे सेवकों को यह कहते हुए भेजा, ’अतिथियों से कह दो- देखिए! मैंने अपने भोज की तैयारी कर ली है। मेरे बैल और मोटे-मोटे जानवर मारे जा चुके हैं। सब कुछ तैयार है; विवाह-भोज में पधारिये।’

5) अतिथियों ने इस की परवाहा नहीं की। कोई अपने खेत की और चला गया, तो कोई अपना व्यापार देखने।

6) दूसरे अतिथियों ने राजा के सेवकों को पकड़ कर उनका अपमान किया और उन्हें मार डाला।

7) राजा को बहुत क्रोध आया। उसने अपनी सेना भेज कर उन हत्यारों का सर्वनाश किया और उनका नगर जला दिया।

8) ’’तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’विवाह-भोज की तैयारी तो हो चुकी है, किन्तु अतिथि इसके योग्य नहीं ठहरे।

9) इसलिए चैराहों पर जाओ और जितने भी लोग मिल जायें, सब को विवाह-भोज में बुला लाओ।’

10) सेवक सड़कों पर गये और भले-बुरे जो भी मिले, सब को बटोर कर ले आये और विवाह-मण्डप अतिथियों से भर गया।

11) ’’राजा अतिथियों को देखने आया, तो वहाँ उसकी दृष्टि एक ऐसे मनुष्य पर पड़ी, जो विवाहोत्सव के वस्त्र नहीं पहने था।

12) उसने उस से कहा, ’भई विवाहोत्सव के वस्त्र पहने बिना तुम यहाँ कैसे आ गये?’ वह मनुष्य चुप रहा।

13) तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’इसके हाथ-पैर बाँध कर इसे बाहर, अन्धकार में फेंक दो। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।’

14) क्योंकि बुलाये हुए तो बहुत हैं, लेकिन चुने हुए थोडे़ हैं।’’

📚 मनन-चिंतन

आज हम एक बड़े ही सुंदर दृष्टांत पर मनन-चिंतन करेंगे। एक ऐसा दृष्टांत जिसमें एक राजा है जो सब प्रकार के लोगों को चाहे भले हों या बुरे, भोज में शामिल करता है क्योंकि बुलाए गये लोग उसके बुलावे का सम्मान नहीं करते। तब वह उन सभी का सर्वनाश करता है जो उसके बुलावे के अस्वीकार करते हैं। साथ ही हम यह भी देखते हैं कि भले ही राजा ने सबको बुला लिया लेकिन एक व्यक्ति विवाह की पोशाक के बिना ही अर्थात् बिना तैयारी के आ जाता है, और राजा उसके हाथ-पैर बांधकर बाहर अंधकार में फेंकने का आदेश देता है, जहाँ वे रोयेंगे और दाँत पीसेंगे।

यह बात स्पष्ट है कि यह दृष्टांत यहूदियों के लिए था जो स्वर्गराज्य के उत्तराधिकारी बनने के लिए बुलाए गए थे, लेकिन वे ईश्वर के बुलावे को अस्वीकार कर देते हैं, और प्रभु येसु को मुक्तिदाता मसीह के रूप में स्वीकार नहीं करते जिसके कारण ईश्वर की मुक्ति सभी के लिए उपलब्ध हो जाती है, सारी बंदिशें तोड़ दी जाती हैं। सब तरह के लोग चाहे अच्छे हों या बुरे, सब ईश्वर के विवाह भोज में भाग ले सकते हैं, बशर्ते वे विवाह की पोशाक में हों। जब ईश्वर पापियों के लिए खुला निमंत्रण देते हैं तो अपने पापों को त्यागकर पश्चाताप रूपी पोशाक की आवश्यकता है। यदि हम पश्चाताप रूपी पोशाक में नहीं हैं तो ईश्वर के विवाह भोज में शामिल नहीं हो सकते। ईश्वर हमें ईश्वरीय राज्य के योग्य बना सकते हैं, लेकिन पहला कदम पश्चाताप के रूप में हमारी तरफ़ से होना है।

 -बिनियुश टोपनो


📚 REFLECTION

We have a beautiful parable for our reflection today. A parable of the king who brings all kinds of people, bad and good alike because invited and chosen people did not respond positively. Then he destroys those who refuse his invitation. At the same time we see, though the king brought in everyone but one of them was not in wedding garments which means he came unprepared and king orders the attendants to bind his hands and feet and cast outside into the darkness where there will be wailing and grinding of teeth.

This is certainly clear that this parable is about Jews who were chosen to be the heirs of the kingdom of God and yet they refused to accept Jesus as their Messiah and therefore salvation is opened for all, all boundaries are removed. All people whether good or bad, worthy or unworthy can partake in God’s banquet, but only one thing is needed, the wedding garment. When God gives an open invitation to the sinners, what is most required is the wedding garment of repentance, giving up of our sins. If we do not wear the garment of repentance, we cannot partake in the banquet of God. God can make us worthy but first step is repentance, which is from our side.

 -Br. Biniush Topno

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19 अगस्त का पवित्र वचन

 

19 अगस्त 2020
वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 34:1-11

1) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई दी,

2) “मानवपुत्र! इस्राएल के चरवाहों के विरुद्ध भवियवाणी करो। भवियवाणी करो और उन से कहोः चरवाहो! प्रभु-ईश्वर यह कहता है! धिक्कार इस्राएल के चरवाहों को! वे केवल अपनी देखभाल करते हैं। क्या चरवाहों को झुुण्ड की देखवाल नहीं करनी चाहिए।

3) तुम भेड़ों का दूध पीते हो, उनका ऊन पहनते और मोटे पशुओं का वध करते हो, किन्तु तुम भेड़ों को नहीं चराते।

4) तुमने कमजोर भेड़ों को पौष्टिक भोजन नहीं दिया, बीमारों को चंगा नहीं किया, घायलों के घावों पर पटटी नहीं बाँधी, भूली-भटकी हुई भेड़ों को नहीं लौटा लाये और जो खो गयी थीं, उनका पता नहीं लगाया। तुमने भेड़ों के साथ निर्दय और कठोर व्यवहार किया है।

5) वे बिखर गयी, क्योंकि उन को चराने वाला कोई नहीं रहा और वे बनैले पशुओं को शिकार बन गयीं।

6) मेरी भेड़ें सब पर्वतों और ऊँची पहाडियों पर भटकती फिरती हैं: वे समस्त देश में बिखर गयी हैं, और उनकी परवाह कोई नहीं करता, उनकी खोज में कोई नहीं निकलता।

7) “इसलिए चरवाहो! प्रभु की वाणी सुनो।

8) प्रभु-ईश्वर यह कहता है -अपने अस्तित्व की शपथ! मेरी भेड़ें, चराने वालों के अभाव में, बनैले पशुओं का शिकार और भक्य बन गयी हैं: मेरे चरवाहों ने भेडो़ं की परवाह नहीं की - उन्होंने भेडांे की नहीं, बल्कि अपनी देखभाल की है;

9) इसलिए चरवाहो! प्रभु की वाणी सुनों।

10) प्रभु यह कहता हैं; मै उन चरवाहों का विरोधी बन गया हूँ। मैं उन से अपनी भेड़ें वापस माँगूंगा। मैं उनकी चरवाही बन्द करूँगा। वे फिर अपनी ही देखभाल नहीं कर पायेंगे। मैं अपनी भेड़ों को उनके पँजे से छुडाऊँगा और वे फिर उनकी शिकार नहीं बनेंगी।

11) “क्योंकि प्रभु-ईश्वर यह कहता है- मैं स्वयं अपनी भेड़ों को सुध लूँगा और उनकी देखभाल करूँगा।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 20:1-16

1) ’’स्वर्ग का राज्य उस भूमिधर के सदृश है, जो अपनी दाखबारी में मज़दूरों को लगाने के लिए बहुत सबेरे घर से निकला।

2) उसने मज़दूरों के साथ एक दीनार का रोज़ाना तय किया और उन्हें अपनी दाखबारी भेजा।

3) लगभग पहले पहर वह बाहर निकला और उसने दूसरों को चैक में बेकार खड़ा देख कर

4) कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ, मैं तुम्हें उचित मज़दूरी दे दूँगा’ और वे वहाँ गये।

5) लगभग दूसरे और तीसरे पहर भी उसने बाहर निकल कर ऐसा ही किया।

6) वह एक घण्टा दिन रहे फिर बाहर निकला और वहाँ दूसरों को खड़ा देख कर उन से बोला, ’तुम लोग यहाँ दिन भर क्यों बेकार खड़े हो’

7) उन्होंने उत्तर दिया, ’इसलिए कि किसी ने हमें मज़दूरी में नहीं लगाया’ उसने उन से कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ।

8) ’’सन्ध्या होने पर दाखबारी के मालिक ने अपने कारिन्दों से कहा, ’मज़दूरों को बुलाओ। बाद में आने वालों से ले कर पहले आने वालों तक, सब को मज़दूरी दे दो’।

9) जब वे मज़दूर आये, जो एक घण्टा दिन रहे काम पर लगाये गये थे, तो उन्हें एक एक दीनार मिला।

10) जब पहले मज़दूर आये, तो वे समझ रहे थे कि हमें अधिक मिलेगा; लेकिन उन्हें भी एक-एक दीनार ही मिला।

11) उसे पाकर वे यह कहते हुए भूमिधर के विरुद्ध भुनभुनाते थे,

12) इन पिछले मज़दूरों ने केवल घण्टे भर काम किया। तब भी आपने इन्हें हमारे बराबर बना दिया, जो दिन भर कठोर परिश्रम करते और धूप सहते रहे।’

13) उसने उन में से एक को यह कहते हुए उत्तर दिया, ’भई! मैं तुम्हारे साथ अन्याय नहीं कर रहा हूँ। क्या तुमने मेरे साथ एक दीनार नहीं तय किया था?

14) अपनी मजदूरी लो और जाओ। मैं इस पिछले मजदूर को भी तुम्हारे जितना देना चाहता हूँ।

15) क्या मैं अपनी इच्छा के अनुसार अपनी सम्पत्ति का उपयोग नहीं कर सकता? तुम मेरी उदारता पर क्यों जलते हो?

16) इस प्रकार जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे और जो अगले है, पिछले हो जायेंगे।’’

📚 मनन-चिंतन

आज हम प्रभु की असीम उदारता के बारे में मनन-चिंतन करते हैं। पहले पाठ में हम देखते हैं कि जिन चरवाहों को प्रभु ने अपनी भेड़ों को सम्भालने के लिए नियुक्त किया था, वे रक्षक ही उन भेड़ों के भक्षक बन गए, इसलिए प्रभु स्वयं अपनी रक्षा करते हैं और स्वार्थी एवं धोखेबाज़ चरवाहों को दण्ड देते हैं। सुसमाचार में हम प्रभु येसु को देखते हैं जो केवल उन भेड़ों की देखभाल करते हैं जो उनकी अपनी हैं, बल्कि उनकी भी जो उनकी भेडशाला की नहीं हैं। उनकी उदारता यही है कि वह सब की देख-भाल की ज़िम्मेदारी लेते हैं, उनकी भी जो बिना चरवाहे की भेड़ें हैं।

आज के सुसमाचार के दृष्टांत में ज़मींदार पूरे दिन में कम से कम चार बार अलग-अलग समय पर मज़दूर खोजने जाता है, और चारों बार वह कुछ न कुछ मज़दूर काम पर लगा लेता है और अन्त में संध्या समय सभी को बराबर मज़दूरी देता है। शायद उस दाखबारी के स्वामी को बहुत सारे मज़दूरों की आवश्यकता थी और इसलिए वह अलग-अलग समय पर मज़दूर खोजने जाता है। या फिर शायद मज़दूर ही बहुत अधिक थे और अपने परिवार का पेट पालने की ख़ातिर पूरे दिन काम की तलाश में मजबूर थे। स्वामी उन्हें उनके काम के अनुसार भुगतान नहीं करता बल्कि उनकी ज़रूरत के अनुसार भुगतान करता है। एक पिता अपने बच्चों की ज़रूरतों को जानता है और उन्हें पूरा करने की क़ीमत की फ़िक्र नहीं करता। कभी-कभी उदारता और करुणा न्याय से बढ़कर हैं।

 -Br. Biniush Topno


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18 अगस्त का पवित्र वचन

 

18 अगस्त 2020
वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 28:1-10

1) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई दी,

2) “मानवपुत्र तीरुस के शासक से कहो, ’प्रभु-ईश्वर यह कहता हैः तुमने अपने घमण्ड में कहाः “मैं ईश्वर हूँ। मैं समुद्र के बीच एक दिव्य सिंहासन पर विराजमान हूँ।“ किन्तु तुम ईश्वर नहीं, बल्कि निरे मनुय हो। फिर भी तुम अपने को ईश्वर के बराबर समझते हो।

3) हाँ, तुम दानेल से भी बुद्धिमान हो और कोई भी रहस्य तुम से छिपा हुआ नहीं है।

4) तुमने अपनी बुद्धिमानी और सूझ-बूझ से धन कमाया और अपने कोषों में चाँदी-सोना एकत्र किया है।

5) तुम अपने व्यापार-कौशल के कारण बड़े धनी बन गये हो और इस धन के साथ-साथ तुम्हारा घमण्ड भी बढ़ गया है।

6) इसलिए प्रभु-ईश्वर यह कहता है: तुम अपने को ईश्वर के बराबर समझते हो,

7) इसलिए मैं विदेशियों को, सब से निष्ठुर राष्ट्रों को तुम्हारे पास भेजूँगा। वे तलवार खींच कर तुम्हारी अपूर्व बुद्धिमानी पर आक्रमण करेंगे और तुम्हारा घमण्ड चकनाचूर कर देंगे।

8) “वे तुम्हें अधोलोक पहुँचा देंगे और तुम समुद्र के बीच तलवार के घाट उतार दिये जाओगे।

9) जब तुम हत्यारों का सामना करोगे, तो क्या तुम ईश्वर होने का दावा करोगे? जब तुम अपने हत्यारों के हाथों पड़ जाओगे, तो तुम जान जाओगे कि तुम ईश्वर नहीं बल्कि निरे मनुय हो।

10) तुम विदेशियों के हाथों पड़ कर बेख़तना लोगों की मौत मरोगे, क्योंकि मैंने ऐसा कहा है। यह प्रभु-ईश्वर की वाणी है।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 19:23-30

23) तब ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- धनी के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन होगा।

24) मैं यह भी कहता हूँ कि सूई के नाके से हो कर ऊँट का निकलना अधिक सहज है, किन्तु धनी का ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना कठिन है।’’

25) यह सुनकर शिष्य बहुत अधिक विस्मित हो गये और बोले, ’’तो फिर कौन बच सकता है।’’

26) उन्हें स्थिर दृष्टि से देखते हुए ईसा ने कहा, ’’मनुष्यों के लिए तो यह असम्भव है। ईश्वर के लिए सब कुछ सम्भव है।’’

27) तब पेत्रुस ने ईसा से कहा, ’’देखिए, हम लोग अपना सब कुछ छोड़ कर आपके अनुयायी बन गये हैं। तो, हमें क्या मिलेगा?’’

28) ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ’’मैं तुम, अपने अनुयायियों से यह कहता हूँ- मानव पुत्र जब पुनरुत्थान में अपने महिमामय सिहांसन पर विराजमान होगा, तब तुम लोग भी बारह सिंहासनों पर बैठ कर इस्राएल के बारह वंशों का न्याय करोगे।

29) और जिसने मेरे लिए घर, भाई-बहनों, माता-पिता, पत्नी, बाल-बच्चों अथवा खेतों को छोड दिया है, वह सौ गुना पायेगा और अनन्त जीवन का अधिकारी होगा।

30) बहुत-से लोग, जो अगलें हैं, पिछले हो जायेंगे और जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे।

📚 मनन-चिंतन

आज हम सांसारिक सम्पत्ति की व्यर्थता और स्वर्गीय सम्पत्ति यानी ईश्वर के साथ अनन्त जीवन की आवश्यकता पर मनन-चिंतन करते हैं। पहले पाठ में तिरुस के राजकुमार को देखते हैं जिसे नबी एजेकिएल के द्वारा धिक्कारते हैं क्योंकि वह उसने अकूत सांसारिक सम्पत्ति जमा की और अपनी बुद्धिमानी और दौलत का घमण्ड करता था।(एजेकिएल 28:4-5)। सुसमाचार में प्रभु धन-सम्पत्ति के बारे में चेतावनी देते हैं कि धनी व्यक्ति के लिए स्वर्गराज्य में प्रवेश करना बहुत मुश्किल होगा।

क्या धन-सम्पत्ति इतनी बुरी है? हाँ, यदि वह ईश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में अवरोधक बनती है (जो कि वह अक्सर बनती है), तो वह बुरी है। यदि एक व्यक्ति के पास पर्याप्त धन-दौलत है, तो वह खुश और संतुष्ट जीवन जिएगा, लेकिन यदि उसके मन में लालच प्रवेश कर गया तो वह और अधिक धन-सम्पत्ति पाने के लिए लालायित हो उठेगा। जब उसे अधिक धन-दौलत मिल जाएगी तो वह और भी अधिक धन-दौलत के लिए भूखा हो जाएगा। और अगर आपको बहुत अधिक दौलत चाहिए तो या तो आपको बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ेगी या फिर ग़लत कार्यों के द्वारा अधिक दौलत कमानी पड़ेगी। लोग अक्सर दूसरा विकल्प ही चुनते हैं, क्योंकि पहला विकल्प कठिन और बहुत धीमा तरीक़ा है। प्रभु कहते हैं कि हमें स्वर्ग की सम्पत्ति कमानी है (मत्ती 6:19-20) जो हमारे स्वर्गीय निवास के लिए बहुत ज़रूरी है।

✍️ Biniush Topno






17 अगस्त का पवित्र वचन

 

17 अगस्त 2020
वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 24:15-24

15) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई दी,

16) “मानवपुत्र! तुम जिसे प्यार करते हो, मैं उसे आकस्मिक मृत्यु द्वारा तुम से अलग कर दूँगा। किन्तु तुम न तो शोक मनाओ, न विलाप करो और न रोओ।

17) तुम अपना दुःख पी कर चुप रहो और मृतक के लिए मातम मत मनाओ। तुम पगड़ी बाँधो, जूते पहनो, अपना मुँह मत ढको और जो रोटी लोग देने आते हैं, उसे मत खाओ।“

18) मैंने प्रातः लोगों को सम्बोधित किया और उसी शाम मेरी पत्नी चल बसी। दूसरे दिन, जो मुझ से कहा गया था, मैंने वही किया।

19) लोगों ने मुझ से कहा, “हमें बताइए कि हमारे लिए आपके आचरण का क्या अर्थ है“।

20) मैंने उत्तर दिया, “प्रभु ने मुझ से यह कहा:

21) इस्राएलियों से कहो- यह प्रभु-ईश्वर की वाणी है। मैं अपने मन्दिर को अपवत्रि कर दूँगा, जो तुम्हारे घमण्ड का कारण है। वह तुम्हारी आँखों की ज्योति और तुम्हारी आत्माओं को प्रिय है। तुम्हारे पुत्र-पुत्रियाँ, जिन्हें तुम छोड़ गये हो, तलवार के घाट उतार दिये जायेंगे।

22) तब तुम लोगों को वही करना होगा, जो मैंने किया। तुम अपना मुँह मत ढको और लोग जो रोटी तुम्हें देने आते हैं, उसे मत खाओे।

23) अपनी पगड़ी बाँधे रखो और जूते पहने रहो। तुम शोक नहीं मनाओ और नहीं रोओ। तुम अपने पापों के कारण गल जाओगे और एक दूसरे के सामने कराहते रहोगे।

24) एजे़किएल तुम्हारे लिए एक चिन्ह है। उसने जैसा किया, तुम लोग ऐसा ही करोगे। उस समय तुम जान जाओगे कि मैं ही प्रभु-ईश्वर हूँ।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 19:16-22

16) एक व्यक्ति ईसा के पास आ कर बोला, ’’गुरुवर! अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए मैं कौन-सा भला कार्य करूँ?’’

17) ईसा ने उत्तर दिया, ’’भले के विषय में मुझ से क्यों पूछते हो? एक ही तो भला है। यदि तुम जीवन में प्रवेश करना चाहते हो, तो आज्ञाओं का पालन करो।’’

18) उसने पूछा, ’’कौन-सी आज्ञाएं?’’ ईसा ने कहा, ’’हत्या मत करो; व्यभिचार मत करो; चोरी मत करो; झूठी गवाही मत दो;

19) अपने माता पिता का आदर करो; और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो’’।

20) नवयुवक ने उन से कहा, ’’मैने इन सब का पालन किया है। मुझ में किस बात की कमी है?’’

21) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी, तब आकर मेरा अनुसरण करो।’’

22) यह सुन कर वह नव-युवक बहुत उदास हो कर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।

📚 मनन-चिंतन

हम सभी स्वर्ग की ओर जाने वाली एक तीर्थ यात्रा में हैं। यह संसार हमारा स्थायी निवास नहीं है, क्योंकि हम संसार के नहीं हैं। हमें ईश्वर ने भेजा है और स्वर्ग को हमारी अंतिम मंज़िल के रूप में दिया है, और उस मंज़िल को पाने के लिए हमें अनेक पथ प्रदर्शक संकेतक दिए हैं। ये संकेतक हमें बताते हैं कि हमें किस दिशा में आगे बढ़ना है और हम अपनी मंज़िल से कितना दूर हैं। जो व्यक्ति इन संकेतकों के अनुसार चलता है वह सफलतापूर्वक अपने गन्तव्य तक पहुँच जाता है।

ये पथ-प्रदर्शक संकेतक हमारे लिए प्रभु की आज्ञाएँ और नियम हैं। जो उन पर चलता है वह सही मार्ग पर आगे बढ़ता है और फल-फूलता है (स्त्रोत १:३)। लेकिन जो उनके विरुद्ध जाता है व ईश्वर के क्रोध का भागी और स्वयं के विनाश का भागी बनता है। यही हम आज के पहले पाठ में देखते हैं, जहाँ लिखा है “…तुम अपने पापों के कारण गल जाओगे और एक दूसरे के सामने कराहते रहोगे (एजेकिएल २४:२३ब)। इन संकेतकों के अलावा हमें उचित मनोभाव की भी ज़रूरत है। कभी कभी हम सही रास्ते पर चलते हैं लेकिन आज के सुसमाचार में धनी नवयुवक की तरह पूरे मन और आत्मा से नहीं। आइए हम पूरे मन और हृदय से प्रभु के मार्ग पर चलें ताकि ईश्वर की कृपा और आशीष हमें मिलते रहें। आमेन।

16 अगस्त का पवित्र वचन

 

16 अगस्त 2020
वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : इसायाह 56:1. 6-7

1) प्रभु यह कहता है- “न्याय बनाये रखो- और धर्म का पालन करो; क्योंकि मेरी मुक्ति निकट है और मेरी न्यायप्रियता शीघ्र ही प्रकट हो जायेगी।

6) “जो विदेशी प्रभु के अनुयायी बन गये हैं, जिससे वे उसकी सेवा करें, वे उसका नाम लेते रहें और उसके भक्त बन जायें और वे सब, जो विश्राम-दिवस मनाते हैं और उसे अपवत्रि नहीं करते-

7) मैं उन लोगों को अपने पवत्रि पर्वत तक ले जाऊँगा। मैं उन्हें अपने प्रार्थनागृह में आनन्द प्रदान करूँगा। मैं अपनी बेदी पर उनके होम और बलिदान स्वीकार करूँगा; क्योंकि मेरा घर सब राष्ट्रों का प्रार्थनागृह कहलायेगा।“

📕 दूसरा पाठ : रोमियों 11:13-15.29-32

13) मैं आप गैर-यहूदियों से यह कहता हूँ- ’मैं तो गैर-यहूदियों में प्रचार करने भेजा गया और इस धर्मसेवा पर गर्व भी करता हूँ।

14) किन्तु मैं अपने रक्त-भाइयों में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करने की और इस प्रकार उन में कुछ लोगों का उद्धार करने की आशा भी रखता हूँ;

15) क्योंकि यदि उनके परित्याग के फलस्वरूप ईश्वर के साथ संसार का मेल हो गया है, तो उनके अंगीकार का परिणाम मृतकों में से पुनरूत्थान होगा।

29) क्योंकि ईश्वर न तो अपने वरदान वापस लेता और न अपना बुलावा रद्द करता है।

30) जिस तरह आप लोग पहले ईश्वर की अवज्ञा करते थे और अब, जब कि वे अवज्ञा करते हैं, आप ईश्वर के कृपापात्र बन गये हैं,

31) उसी तरह अब, जब कि आप ईश्वर के कृपापात्र बन गये हैं, वे ईश्वर की अवज्ञा करते हैं, किन्तु बाद में वे भी दया प्राप्त करेंगे।

32) ईश्वर ने सबों को अवज्ञा के पाप में फंसने दिया, क्योंकि वह सबों पर दया दिखाना चाहता था।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 15:21-28

21) ईसा ने वहाँ से बिदा होकर तीरूस और सिदोन प्रान्तों के लिए प्रस्थान किया।

22) उस प्रदेश की एक कनानी स्त्री आयी और पुकार-पुकार कर कहती रही, ’’प्रभु दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए। मेरी बेटी एक अपदूत द्वारा बुरी तरह सतायी जा रही है।’’

23) ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया। उनके शिष्यों ने पास आ कर उनसे यह निवेदन किया, ’’उसकी बात मानकर उसे विदा कर दीजिए, क्योंकि वह हमारे पीछे-पीछे चिल्लाती आ रही है’’।

24) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं केवल इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास भेजा गया हूँ।

25) इतने में उस स्त्री ने आ कर ईसा को दण्डवत् किया और कहा, ’’प्रभु! मेरी सहायता कीजिए’’।

26) ईसा ने उत्तर दिया, ’’बच्चों की रोटी ले कर पिल्लों के सामने डालना ठीक नहीं है’’।

27) उसने कहा, ’’जी हाँ, प्रभु! फिर भी स्वामी की मेज़ से गिरा हुआ चूर पिल्ले खाते ही हैं’’।

28) इस पर ईसा ने उत्तर दिया ’’नारी! तुम्हारा विश्वास महान् है। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।’’ और उसी क्षण उसकी बेटी अच्छी हो गयी।

📚 मनन-चिंतन

आज के पाठ सभी के लिए मुक्तिदाता और सभी के लिए मुक्ति उपहार की उपलब्धता के बारे में समझाते हैं। पहले पाठ में ईश्वर वादा करते हैं कि यदि परदेशी भी ईश्वर की आराधना करें और उसी की आज्ञाओं और नियमों को मानें तो वह उन्हें स्वीकार कर लेंगे और अपने चुने हुए लोगों में शामिल कर लेंगे। दूसरे पाठ में भी सन्त पौलुस बताते हैं कि भले ही वह एक यहूदी थे लेकिन ईश्वर ने उन्हें ग़ैर-यहूदियों के लिए मुक्ति का संदेश सुनाने के लिए चुना। सुसमाचार में एक कनानी स्त्री को देखते हैं जो अपनी बेटी की चंगाई के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। प्रभु येसु उसके विश्वास और उत्साह को देखते हैं और उसकी बेटी को चंगाई प्रदान करते हैं।

आज के सुसमाचार को समझने के लिए हम संत योहन के सुसमाचार के प्रारम्भ में पहले अध्याय के 11वें एवं 12वें पद को देखें जहाँ लिखा है, “वह अपने यहाँ आया और उसके अपने लोगों ने उसे नहीं अपनाया। जितनों ने उसे अपनाया, और जो उसके नाम में विश्वास करते हैं, उन सबों को उसने ईश्वर की सन्तति बनने का अधिकार दिया। प्रारम्भ में यह समझा जाता था कि मसीह केवल यहूदी जाति के लिए हैं। इस्राएली प्रजा ईश्वर की अपनी चुनी हुई प्रजा थी और उसने उनके साथ अपना विधान स्थापित किया था, और अपनी प्रजा को पुनः एकत्रित करने के लिए ईश्वर बेचैन था। लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया, प्रभु येसु स्वयं अपनी बेचैनी और दर्द व्यक्त करते हैं, जब कहते हैं, “मैंने कितनी बार चाहा कि तेरी संतान को वैसे ही एकत्रित कर लूँ, जैसे मुर्गी अपने चूज़ों को अपने डैनों के नीचे एकत्र कर लेती है, परन्तु तुम लोगों ने इनकार कर दिया।” (मत्ती 23:37ब)।

जब प्रभु येसु यहूदियों और फरिसियों से तिरस्कार का सामना करते हैं तो वे चुपचाप तिरुस और सिदोन के प्रान्त में चले जाते हैं। यहीं पर वह कनानी स्त्री आती है और प्रभु को दाऊद के पुत्र कहकर सम्बोधित करते हुए दया की भीख माँगती है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रभु येसु वही मसीह हैं ईश्वर ने जिनकी प्रतिज्ञा राजा दाऊद से की थी, (सामुएल का दूसरा ग्रन्थ 7:12-13)। भले ही प्रभु येसु को इसराएल की संतानों ने मसीह के रूप में नहीं पहचाना और उन्हें अस्वीकार किया, लेकिन यह ग़ैर-यहूदी स्त्री उन्हें मसीह के रूप में ना स्वीकार करती है, बल्कि उनसे दया की भीख माँगती है। प्रभु उसके विश्वास की परीक्षा के लिए उसे अपमानित करने की चेष्टा करते हुए उसके लोगों को पिल्ले कहकर सम्बोधित करते हैं। लेकिन वह अपने विश्वास में अटल और अडिग है, और अपने विश्वास के कारण उसकी मनोकामना पूरी होती है।

हम भले ही ईश्वर चुनी हुई प्रजा यहूदी जाति में पैदा नहीं हुए लेकिन फिर भी हमें ईश्वर की दया और करुणा पाने का सौभाग्य मिला है। प्रभु येसु ने स्वयं को मात्र यहूदी जाति के लिए सीमित नहीं किया है, बल्कि उन सभी के लिए मुक्ति प्रदान करते हैं जो ‘मुख से स्वीकार करते हैं कि ईसा प्रभु हैं और हृदय से विश्वास करते हैं कि, ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया है।’ (रोमियों 10:9).