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बुधवार, 08 दिसंबर, 2021

 

बुधवार, 08 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

माता मरियम का निष्कलन्क गर्भागमन; आगमन काल का पहला सप्ताह

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पहला पाठ : उत्पत्ति ग्रन्थ 3:9-15.20


9) प्रभु-ईश्वर ने आदम से पुकार कर कहा, ''तुम कहाँ हो?''

10) उसने उत्तर दिया, ''मैं बगीचे में तेरी आवाज सुन कर डर गया, क्योंकि में नंगा हूँ और मैं छिप गया''।

11) प्रभु ने कहा, ''किसने तुम्हें बताया कि तुम नंगे हो? क्या तुमने उस वृक्ष का फल खाया, जिस को खाने से मैंने तुम्हें मना किया था?''

12) मनुष्य ने उत्तर दिया, ''मेरे साथ रहने कि लिए जिस स्त्री को तूने दिया, उसी ने मुझे फल दिया और मैंने खा लिया''।

13) प्रभु-ईश्वर ने स्त्री से कहा, ''तुमने क्या किया है?'' और उसने उत्तर दिया, ''साँप ने मुझे बहका दिया और मैंने खा लिया''।

14) तब ईश्वर ने साँप से कहा, ''चूँकि तूने यह किया है, तू सब घरेलू तथा जंगली जानवरों में शापित होगा। तू पेट के बल चलेगा और जीवन भर मिट्टी खायेगा।

15) मैं तेरे और स्त्री के बीच, तेरे वंश और उसके वंश में शत्रुता उत्पन्न करूँगा। वह तेरा सिर कुचल देगा और तू उसकी एड़ी काटेगा''।

20) पुरुष ने अपनी पत्नी का नाम 'हेवा' रखा, क्योंकि वह सभी मानव प्राणियों की माता है।


दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:3-6,11-12


3) धन्य है हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर और पिता! उसने मसीह द्वारा हम लोगों को स्वर्ग के हर प्रकार के आध्यात्मिक वरदान प्रदान किये हैं।

4) उसने संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हम को चुना, जिससे हम मसीह से संयुक्त हो कर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बनें।

5) उसने प्रेम से प्रेरित हो कर आदि में ही निर्धारित किया कि हम ईसा मसीह द्वारा उसके दत्तक पुत्र बनेंगे। इस प्रकार उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार

6) अपने अनुग्रह की महिमा प्रकट की है। वह अनुग्रह हमें उसके प्रिय पुत्र द्वारा मिला है,

11 (11-12) ईश्वर सब बातों में अपने मन की योजना पूरी करता है। उसके अनुसार उसने निर्धारित किया है कि हम (यहूदी) मसीह द्वारा बुलाये जायें और हम लोगों के कारण उसकी महिमा की स्तुति हो। हम लोगों ने तो सब से पहले मसीह पर भरोसा रखा था।


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 1:26-38


26) छठे महीने स्वर्गदूत गब्रिएल, ईश्वर की ओर से, गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया,

27) जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी, और उस कुँवारी का नाम था मरियम।

29) वह इन शब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है।

30) तब स्वर्गदूत ने उस से कहा, ’’मरियम! डरिए नहीं। आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है।

31) देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी।

32) वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा,

33) वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’

34) पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, ’’यह कैसे हो सकता है? मेरा तो पुरुष से संसर्ग नहीं है।’’

35) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ’’पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

36) देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीज़बेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है;

37) क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।’’

38) मरियम ने कहा, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।’’ और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।


📚 मनन-चिंतन


माता मरियम का निष्कलंक गर्भागमन का पर्व के द्वारा कलीसिया इस सच्चाई को घोषित करती है कि पिता ईश्वर ने अपने मुक्ति विधान की योजना में धन्य कुँवारी मरियम को अपने पुत्र की माँ होने के लिए चुना और उन पर आदि पाप का कलंक लगने नहीं दिया। इसलिये धन्य कुँवारी मरियम निष्कलंक गर्भागमन कहलाती है। ईश्वर ने माता मरियम को येसु के जन्म के लिए पहले ही से रचा था तथा आदि पाप से बचाये रखा था। "माता के गर्भ में रचने से पहले ही मैंने तुमको जान लिया। तुम्हारे जन्म से पहले ही मैंने तुम को पवित्र किया । (यिरमियाह 1:5 ) माता मरियम ने ईश्वर द्वारा प्रेषित स्वर्गदूत गब्रिएल के संदेश को विश्वासकर सहृदय ग्रहण किया। अपने विश्वास और स्वीकृती द्वारा हमारे मुक्तिदाता प्रभु की माँ होने का गौरव प्राप्त किया। हमारे लिए ईश्वरीय कृपाओं को प्रदान करने में माध्यम बनी। ईश्वर ने हमे भी बपतिस्मा मे कृपाओ से भरा है। हमें उन कृपाओ को बचाये रखना है। संत पौलुस (1 कुरि. 6:19) में कहते है, "आपका शरिर पवित्र आत्मा का मन्दिर है। वह आपने निवास करता है। और आपको ईश्वर से प्राप्त है।"

आइये हम प्रार्थना करे की ईश्वर से प्राप्त कृपाओं को संभाल कर रखे। और पवित्र जीवन जिये।



📚 REFLECTION




Today the Church celebrates the feast of the Immaculate Conception. Through this feast Mother Church declares the truth that God was preparing Mary to be the mother of his son. He chose Mary to be the part of his salvation plan and kept her holy. She was not affected by the original sin. That’s why she is called Immaculate Conception. God chose her to be the mother of God.

“Before I formed you in the womb I knew you and before you were born I consecrated you”(Jer 1:5)

In the Gospel, Mother Mary believed and accepted the message of Angel Gabriel. Through her faith and acceptance got the privilege to be the Mother of God. In this way she became the mediator between God and us. Through the baptism God has given us the ample blessings. St. Paul tells us in (I cor 6:19)

“Or do you not know that your body is a temple of the Holy Spirit within you, which you have from God” let us acknowledge blessings and graces which God has given us and be grateful to him. Let us make every effort to live a holy life.


 -Br. Biniush topno


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मंगलवार, 07 दिसंबर, 2021

 

मंगलवार, 07 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 40:1-11



1) तुम्हारा ईश्वर यह कहता है, “मेरी प्रजा को सान्त्वना दो, सान्त्वना दो।

2) यरुसालेम को ढारस बँधओ और पुकार कर उस से यह कहो कि उसकी विपत्ति के दिन समाप्त हो गये हैं और उसके पाप का प्रायश्चित हो चुका है। प्रभु-ईश्वर के हाथ से उसे सभी अपराधों का पूरा-पूरा दण्ड मिल चुका हैं।“

3) यह आवाज़ आ रही है, “निर्जन प्रदेश में प्रभु का मार्ग तैयार करो। हमारे ईश्वर के लिए मैदान में रास्ता सीधा कर दो।

4) हर एक घाटी भर दी जाये। हर एक पहाड़ और पहाड़ी समतल की जाये, खड़ी चट्ठान को मैदान और कगार को घाटी बना दिया जाये।

5) तब प्रभु-ईश्वर की महिमा प्रकट हो जायेगी और सब शरीरधारी उसे देखेंगे; क्योंकि प्रभु ने ऐसा ही कहा है।“

6) मुझे एक वाणी यह कहते हुए सुनाई पड़ी - “पुकार कर सुनाओ“

7) और मैंने यह कहा, “मैं क्या सुनाऊँ?“ “सब शरीरधारी घास के सदृश हैं और उनका सौन्दर्य खेत के फूलों के सदृश। जब प्रभु को श्वास उनका स्पर्श करता है, तो घास सूख जाती और फूल मुरझाता हैं। निश्चय ही मनुष्य घास के सदृश है।

8) घास सूख जाती और फूल मुरझाता हैं, किन्तु हमारे ईश्वर का वचन सदा-सर्वदा बना रहता है।“

9) सियोन को शुभ सन्देश सुनाने वाले! ऊँचे पहाड़ पर चढ़ो। यरुसालेम को शुभ सन्देश सुनाने वाले! अपनी आवाज़ ऊँची कर दो। निडर हो कर यूदा के नगरों से पुकार कर यह कहोः “यही तुम्हारा ईश्वर है।“

10) देखो प्रभु-ईश्वर सामध्र्य के साथ आ रहा है। वह सब कुछ अपने अधीन कर लेगा। वह अपना पुरस्कार अपने साथ ला रहा है और उसका विजयोपहार भी उसके साथ है।

11) वह गड़ेरिये की तरह अपना रेवड़ चराता है। वह मेमने को उठा कर अपनी छाती से लगा लेता और दूध पिलाने वाली भेडें धीरे-धीरे ले चलता है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:12-14



12) तुम्हारा क्या विचार है - यदि किसी के एक सौ भेड़ें हों और उन में से एक भी भटक जाये, तो क्या वह उन निन्यानबे भेड़ों को पहाड़ी पर छोड़ कर उस भटकी हुई को खोजने नहीं जायेगा?

13) और यदि वह उसे पाये, तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि उसे उन निन्यानबे की अपेक्षा, जो भटकी नहीं थी, उस भेड़ के कारण अधिक आनंद होगा।

14) इसी तरह मेरा स्वर्गिक पिता नहीं चाहता कि उन नन्हों में से एक भी खो जाये।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में प्रभु हमे बतलाना चाहते है की मनुष्य चाहे कितना भी पापी क्यों ना हो, चाहे वह ईश्वर को भूल गया व उनसे दूर चला गया हो। फिर भी ईश्वर हमें कभी नहीं त्यागता है। वह हमे कभी नही भुलाता है। क्योंकि वह हम सभी से असीम प्रेम करता है। "तुम मेरी दृष्टी में मूल्यवान हो और महत्व रखते हो । 'मैं तुमसे प्यार करता हूँ" (इसा० 4-3:4) हम सभी कभी न कभी हमारे जीवन मे भेड के समान भटक जाते है। "सभी भटक गये, सब समान रूप से भ्रष्ट हो गये हैं।" (रोमी० 3:12) जब हम संसारिक संसार की लुभावनी चीजों को ज्यादा महत्व देते हैं। तो हम ईश्वर से धीरे धीरे दूर होने लगते हैं और भटक जाते हैं। जब ईश्वर की उपस्थती हमारे जीवन में नहीं रहती है। तब हमारे पास सारी भौतिक वस्तुए होने के बाद भी हम जीवन में अकेलापन, खालीपन महसूस करने लगते है। फिर भी जब हम महसूस करते हैं, की हम भटक गये है और ईश्वर के पास आना चाहते हैं। तब भला चरवाहा हमे सहर्ष अपने झुण्ड में सम्मिलित करता है। आइये हम मनन चिंतन करें। क्या मैं ईश्वर से दूर हो रहा हूँ, क्या मैं अपने जीवन में कहीं भटक तो नहीं गया?



📚 REFLECTION




In today's gospel Jesus wants to tell us that even if a person is a Sinner even a person might have forgotten the Lord and went astray then also the God will not forsake the person. The God can never forget us; Because He loves us so much.

“Because you are precious in my sight, and honored, and I love you”. (Isaiah 43:4)

We too, in our lives are similar to a lost sheep.

“All have turned aside, together they have become worthless” (Rom 3:12)

When we give more importance to the attractive things of this world we slowly start withdrawing away from God and as a result sometimes we loose the way. When God is absent in our life, in spite of having all the physical luxuries we still feel emptiness. When we feel and realize that we have lost our way and wish to go back to God, the God very happily accepts us back.

Come, let us examine our conscience and ask the question to us that whether am I going away from God? Am I lost in the way of life?


 -Br. Biniush topno


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सोमवार, 06 दिसंबर, 2021

 

सोमवार, 06 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 35:1-10



1) मरुस्थल और निर्जल प्रदेश आनन्द मनायें। उजाड़ भूमि हर्शित हो कर फले-फूले,

2) वह कुमुदिनी की तरह खिल उठे, वह उल्लास और आनन्द के गीत गाये। उसे लेबानोन का गौरब दिया गया है, करमेल तथा शारोन की शोभा। लोग प्रभु की महिमा तथा हमारे ईश्वर के प्रताप के दर्शन करेंगे।

3 थके-माँदे हाथों को शक्ति दो, निर्बल पैरों को सुदढ़ बना दो।

4) घबराये हुए लोगों से कहो- “ढारस रखों डरो मत! देखो, तुम्हारा ईश्वर आ रहा है। वह बदला चुकाने आता है, वह प्रतिशोध लेने आता है, वह स्वयं तुम्हें बचाने आ रहा है।“

5) तब अन्धों की आँखें देखने और बहरों के कान सुनने लगेंगे। लँगड़ा हरिण की तरह छलाँग भरेगा। और गूँगे की जीभ आनन्द का गीत गायेगी।

6) मरुस्थल में जल की धाराएँ फूट निकलेंगी, रेतीले मैदानों में नदियाँ बह जायेंगी,

7) सूखी धरती झील बन जायेगी और प्यासी धरती में झरने निकलेंगे। जहाँ पहले सियारों की माँद थी, वहाँ सरकण्डे और बेंत उपजेंगे।

8) वहाँ एक राजमार्ग बिछा दिया जायेगा, जो ‘पवत्रि मार्ग’ कहलायेगा। कोई भी पापी उस पर नहीं चलेगा। प्रभु स्वयं यह मार्ग तैयार करेगा- नास्तिक भूल कर भी उस पर पैर नहीं रखेंगे।

9) वहाँ न तो कोई सिंह विचरेगा और न कोई हिंसक पशु मिलेगा। प्रभु की प्रजा उस पर चलेगी।

10) प्रभु ने जिन्हें मुक्त कर दिया है, वे ही उस पर लौटेंगे। वे गाते-बजाते हुए सियोन लौटेंगे, उनके मुख पर अपार आनन्द खिल उठेगा। वे हर्ष और उल्लास के साथ लौटेंगे। दुःख और विलाप का अन्त हो जायेगा।



सुसमाचार : सन्त लूकस 5:17-26



17) ईसा किसी दिन शिक्षा दे रहे थे। फरीसी और शास्त्री ईसा किसी दिन शिक्षा दे रहे थे। फ़रीसी और शास्त्री पास ही बैठे हुए थे। वे गलीलिया तथा यहूदिया के हर एक गाँव से और येरुसालेम से भी आये थे। प्रभु के सामर्थ्य से प्रेरित हो कर ईसा लोगों को चंगा क

18) उसी समय कुछ लोग खाट पर पड़े हुए एक अद्र्धांगरोगी को ले आये। वे उसे अन्दर ले जा कर ईसा के सामने रख देना चाहते थे।

19) भीड़ के कारण अद्र्धागरोगी को भीतर ले जाने का कोई उपाय न देख कर वे छत पर चढ़ गये और उन्होंने खपड़े हटा कर खाट के साथ अद्र्धांगरोगी को लोगों के बीच में ईसा सामने उतार दिया।

20) उनका विश्वास देख कर ईसा ने कहा, ’’भाई! तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं’’।

21) इस पर शास्त्री और फ़रीसी सोचने लगे, ’’ईश-निन्दा करने वाला यह कौन है? ईश्वर के सिवा कौन पाप क्षमा कर सकता है?’’

22) उनके ये विचार जान कर ईसा ने उन से कहा, ’’मन-ही-मन क्या सोच रहे हो?

23) अधिक सहज क्या है-यह कहना, ’तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं; अथवा यह कहना उठो, और चलो फिरो’?;

24) परन्तु इसलिए कि तुम लोग यह जान लो कि मानव पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है, वह अद्र्धांगरोगी से बोले मैं तुम से कहता हूँ, उठो और अपनी खाट उठा कर घर जाओ।

25) उसी क्षण वह सब के सामने उठ खड़ा हुआ और अपनी खाट उठा कर ईश्वर की स्तुति करते हुए अपने घर चला गया।

26) सब-के-सब विस्मित हो कर ईश्वर की स्तुति करते रहे। उन पर भय छा गया और वे कहते थे, ’’आज हमने अद्भुत कार्य देखे हैं’’।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में कुछ लोग एक अद्धांगरोगी को येसु के पास पूर्ण विश्वास के साथ लाते है। वहाँ पहुँचकर भारी भीड़ देखकर उन्हें सब कुछ असंभव सा लग रहा था। उन्हें लगा कि शायद हम येसु के पास नहीं पहुँच पायेंगे। फिर भी वह लोग सारी बाधाओ को पार कर छत से उस अर्धान्गरोगी को खाट सहित येसु के सामने उतार देते हैं। उसके विश्वास को देखकर येसु उसके पाप क्षमा कर देते हैं। वास्तव में वह मनुष्य पापमय जीवन में डूबा था। इसीलिये जैसे ही उसके पाप क्षमा हो गये। वह अपने आप स्वस्थ हो गया।

उसी प्रकार कभी कभी हमारे जीवन में परेशानिया आती है। हमे भी सब कुछ असंभव सा लगने लगता है। ऐसे विपरित परिस्थतियों में हमें अपने आपको येसु के पास लाना है। साथ ही साथ अपने ख्रीस्तीय भाई-बहनों को पवित्र यूखरिस्त में भाग लेने एवम पाप स्वीकार ग्रहण करने के लिए प्रेरित करना होगा। आइये हम येसु पर विशवास करें और एक दूसरे को क्षमा करे।




📚 REFLECTION



In today's gospel we hear that some people bring a paralytic to Jesus with a bright faith. After reaching to that place they saw a huge crowd and they felt it won't be possible to reach Jesus. By crossing all the barriers they brought down the paralytic by bringing him on a cot from terrace to Jesus. Looking on to the faith of the paralytic Jesus healed him. The paralytic was fully laid in the life of sins that is why when his sins were forgiven he was immediately healed.

In the same way we also face numerous difficulties in our life and we see these difficulties as unsolving problems. We should bring these difficult situations to Lord Jesus. Along with this we should also inspire our Christian brothers and sisters to take part in holy Eucharist and in the sacrament of confession. Come, let us have faith in Jesus and forgive each other.


 -Br. Biniush topno


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इतवार, 05 दिसंबर, 2021 आगमन का दूसरा इतवार

 

इतवार, 05 दिसंबर, 2021

आगमन का दूसरा इतवार



पहला पाठ : बारूक का ग्रन्थ 5:1-9


1) येरुसालेम! अपने शोक और सन्ताप के वस्त्र उतार और सदा के लिए ईश्वर की महिमा का सौंदर्य धारण कर।

2) तू ईश्वरीय न्यास का लबादा पहन कर अपने सिर पर प्रभु का दिया हुआ गौरव का मुकुट रख ले;

3) क्योंकि ईश्वर पृथ्वी भर के लोगों पर तेरी महिमा प्रकट करेगा

4) और सदा के लिए तेरा यह नाम रखेगा- न्याय की शान्ति और धार्मिकता की महिमा।

5) येरुसालेम! उठ खड़ा हो जा, पर्वत पर चढ़ कर पूर्व की ओर दृष्टि लगा। देख, प्रभु की आज्ञा से तरे पुत्र पश्चिम और पूर्व से एकत्र हो गये हैं। वे आनन्द मना रहे हैं, क्योंकि ईश्वर ने उनकी सुध ली है।

6) शत्रुओं ने उन्हें बाध्य किया था कि वे तुझ को छोड़़ कर पैदल ही चले जायें, परन्तु ईश्वर उन्हें राजसी पालकी में ेबैठा कर तेरे पास वापस ले आ रहा है।

7) ईश्वर का आदेश है कि हर एक ऊँचा पहाड़ और सभी चिरस्थायी पहाडियाँ समतल की जायें और हर एक घाटी पाट कर भर दी जाये, जिससे इस्राएली महिमामय प्रभु की रक्षा में सुरक्षित आगे बढ़ सके।

8) ईश्वर के आदेश पर सभी वन और सुगन्धित वृक्ष इस्राएल पर छाया करेंगे;

9) क्योंकि दयामय तथा न्यायी ईश्वर इस्राएल को आनद प्रदान करेगा और अपनी महिमा के प्रकाश से उसका पथप्रदर्शन करेगा।



दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:4-6.8-11



4) मैं हमेशा अपनी हर प्रार्थना में आनन्द के साथ आप सबों के लिए विनती करता हूँ;

5) क्योंकि आप प्रारम्भ से अब तक सुसमाचार के कार्य में सहयोग देते आ रहे हैं।

6) जिसने आप लोगों में यह शुभ कार्य आरम्भ किया, वह उसे ईसा मसीह के आगमन के दिन तक पूर्णता तक पहुँचा देगा। इसका मुझे पक्का विश्वास है।

8) ईश्वर जानता है कि मैं ईसा मसीह के प्रेम से प्रेरित हो कर आप लोगों को कितना चाहता हूँ।

9) ईश्वर से मेरी प्रार्थना यह है कि आपका प्रेम, ज्ञान तथा हर प्रकार की अन्तर्दृष्टि में, बराबर बढ़ता जाये,

10) जिससे जो श्रेय है, आप उसे पहचानें और प्यार करें। इस तरह आप लोग मसीह के आगमन के दिन पवित्र तथा निर्दोष होंगे।

11) और ईश्वर की महिमा तथा प्रशंसा के लिए ईसा मसीह के द्वारा परिपूर्ण धार्मिकता तक पहुँच जायेंगे।



सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 3:1-6



1) जब कैसर तिबेरियुस के शासनकाल के पन्द्रहवें वर्ष में पोंतियुस पिलातुस यहूदिया का राज्यपाल था; हेरोद गलीलिया का राजा, उसका भाई फि़लिप इतूरैया और त्रखोनितिस का राजा और लुसानियस अबिलेने का राजा था;

2) जब अन्नस तथा कैफ़स प्रधानयाजक थे, उन्हीं दिनों ज़करियस के पुत्र योहन को निर्जन प्रदेश में प्रभु की वाणी सुनाई पड़ी।

3) वह यर्दन के आसपास के समस्त प्रदेश में घूम-घूम कर पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप के बपतिस्मा का उपदेश देता था,

4) जैसा कि नबी इसायस की पुस्तक में लिखा है: निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज़- प्रभु का मार्ग तैयार करो; उसके पथ सीधे कर दो।

5) हर एक घाटी भर दी जायेगी, हर एक पहाड़ और पहाड़ी समतल की जायेगी, टेढ़े रास्ते सीधे और ऊबड़-खाबड़ रास्ते बराबर कर दिये जायेंगे

6) और सब शरीरधारी ईश्वर के मुक्ति-विधान के दर्शन करेंगे।



📚 मनन-चिंतन



आगमन काल, अपने आप को प्रभु के लिए तैयार करने का समय है। आज के सुसमाचार में योहन बपतिस्ता प्रभु का मार्ग तैयार करने आते है। वह लोगों को पापक्षमा के पश्चताप का उपदेश देते हैं। "सारी जनता और नाकेदारों ने भी योहन की बात सुनकर और उसका बपतिस्मा ग्रहण कर ईश्वर की इच्छा पूरी की है (लूकस 7:29) आगमन काल का समय भी पश्चताप और पापक्षमा का समय है। जिन्होंने भी योहन की बातों पर विश्वास किया और पापक्षमा का बपतिस्मा ग्रहण किया। वे ईश्वर की मुक्ति योजना के भागी बने। आइये हम भी इस आगमन काल में प्रभु येसु के आगमन के के लिए अपने आप को तैयार करे ।



📚 REFLECTION




The season of advent is the time to prepare ourselves for Jesus. In today's gospel we see that how John the Baptist came and prepared the way for Jesus. He taught the people about repentance and urged them you seek forgiveness for their sins.

“And all the people heard this, including the tax collectors, acknowledged the justice of God, because they had been baptized with John the Baptist”(Luke 7: 29).

The season of the advent is also the time of repentance and forgiveness. it invites us to prepare ourselves by asking forgiveness for our sins. Whoever believed in the word of John the Baptist they received the baptism of repentance and they became the part of salvation plan of God. Let us also prepare ourselves for the coming of our Lord Jesus Christ.




मनन-चिंतन - 2



नबी बारूक और नबी यिरमियाह का नबूबत कार्यकाल छठवें शताब्दी ई.पू. था। नबी बारूक, नबी यिरमियाह के सचिव थे। सन् 612 ई. पू. खलदैयियों के राजा नबूकदनेजर ने यूदा देश को अपने अधीन कर दिया। नबियों ने यहूदी लोगों को समझाया कि वे अपने पापों पर पश्चाताप करें और तभी उन्हें मुक्ति होगी। यहूदी नेताओं ने नबियों की बात न मानी और नबूकदनेजर के विरूद्ध विद्रोह किया और नबूकदनेजर ने 587 ई. पू. में येरूसलेम को तथा येरूसलेम मन्दिर को नष्ट कर दिया और यहूदि लोगों को निर्वासित कर बाबूल ले जाया गया। नबी बारूक और नबी यिरमियाह को भी निर्वासन में ले जाया गया।

नबी बारूक उन व्यथित, उदास, निर्वासित लोगों को बता रहे है, आज का पहला पाठ के द्वारा कि उनकी मुक्ति का दिन आ गया है और विलाप न करें। “येरूसलेम, अपने शोक और सन्ताप के वस्त्र उतार, और सदा के लिए ईश्वर की महिमा धारण कर। ... येरूसलेम, उठ खडे हो जा, पर्वत पर चढ कर पूर्व की ओर दृष्टि लगा। देख, प्रभु की आज्ञा से तेरे पुत्र पश्चिम और पूर्व से एकत्र हो गये है। वे आनन्द मना रहे है क्योंकि ईश्वर ने उन की सुध ली है (बारूक 5:1,5)। यह यहूदियों के लिए बहुत बडी खूशखबरी थी। नबी बारूक की यह भविष्यवाणी की पूर्ति सन् 538 ई. पू. में होती है जब पेसिया के राजा सैरा ने बाबूल पर कब्जा कर यहूदी लोगों को आजादी दी। उन लोगों ने यरूसलेम नगर की पुन:स्थापना और मन्दिर का पुनःनिर्माण किए। उस प्रकार यहूदी लोग यहोवा के नाम पर पुनः एकत्रित हो गए।

योहन बपतिस्ता आज के सुसमाचार में उद्घोषणा करते हैं कि न केवल यहूदी लोग बल्कि सब राष्ट्र के लोग मासीह की ओर आ जायेंगे। पाप की गुलामी में जीवन बिताने वाले लोगों को मसीह की ओर आना और मसीह को स्वीकार कर मसीह में जीना ही सच्ची आजादी है, सच्ची मुक्ति है। अतः पश्चाताप के जरिए ह्रदय को शुद्व करने के लिए योहन बपतिस्ता आह्वान करते है।

येरूसलेम शहर कलीसिया का प्रतीक है। कलीसिया में सब राष्ट्र के लोग एकत्रित हो जायेंगे और सब इश्वर के मुक्तिविधान का दर्शन करेंगे। मुक्ति केवल प्रभु येसु मसीह के द्वारा ही संभव है। “किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती; क्योंकि समस्त संसार में ईसा नाम के सिवा मनुष्यों को दूसरा नाम नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हमें मुक्ति मिल सकती है” (प्रेरित 4:12)।

विनम्र लोग ही ईश्वर द्वारा प्रदत्त मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। योहन बपतिस्ता येसु समक्ष विनम्र होकर दीनता से येसु से मुक्ति हाजि़ल करने की इच्छा जाहिर करते हुए कहते हैं – “मुझे तो आपसे बपतिस्मा पाने की जरूरत है...” (मत्ति 3:14)। ऐसे विनम्र योहन बपतिस्ता को ईश्वर ने यर्दन नदी के आसपास के लोगों को तथा अन्य जगहों सें आये लोगों को पश्चाताप का सन्देश सुनाने और मसीह के लिए रास्ता तैयार करने के हेतु भेजा है।

पौलुस तथा फिलीप्पि की छोटी सी कलीयिसा विनम्रता एवं सुसमाचर प्रचार का अनूठा उदाहरण है। पौलुस आज के दूसरे पाठ में फिलिप्पि के ख्रीस्तीय लोगों को बताते है कि -

☞ येसु ख्रीस्त तथा उनके मुक्ति कार्य की ज्ञान उनमें गहरा होता जायें;

☞उनके बीच का आपसी प्रेम दिनों दिन बढता जायें;

☞ वे कलंक रहित जीवन बिताने के लिए हरगिज प्रयास करते रहें ताकि येसु मसीह अपना मुक्ति कार्य उन लोगों में पूरा करें।

यह आगमन काल का समय हम लोगों में येसु की ज्ञान गहरा कर दें; हम लोगों में आपसी प्यार बढता जायें तथा निष्कलंक जीवन बिताते हुए येसु की मुक्ति हम लोंगों में सम्पन्न हो जायें एवं येसु के मुक्ति कार्य को हर दिलों तक पहुँचा सकें।



Br. Biniush topno


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Praise the Lord!

शनिवार, 04 दिसंबर, 2021

 

शनिवार, 04 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

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पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 30:19-21,23-26


19) येरूसालेम में रहने वाली सियोन की प्रजा! अब से तुम लोगों को रोना नहीं पड़ेगा। प्रभु तुम पर अवश्य दया करेगा, वह तुम्हारी दुहाई सुनते ही तुम्हारी सहायता करेगा।

20) प्रभु ने तुम्हें विपत्ति की रोटी खिलायी और दुःख का जल पिलाया है; किन्तु अब तुम्हें शिक्षा प्रदान करने वाला प्रभु अदृश्य नहीं रहेगा- तुम अपनी आँखों से उसके दर्शन करोगे।

21) यदि तुम सन्मार्ग से दायें या बायें भटक जाओगे, तो तुम पीछे से यह वाणी अपने कानों से सुनोगे-“सच्चा मार्ग यह है; इसी पर चलते रहो“।

22) तुम चाँदी से मढ़ी हुई अपने द्वारा गढ़ी गयी प्रतिमाओं को और सोने से मढ़ी हुई अपनी देवमूर्तियों को अपवित्र मानोगे। तुम उन्हें दूशित समझ कर फेंक दोगे और कहोगे “उन्हें यहाँ से निकाल दो“।

23) प्रभु तुम्हारे बोये हुये बीजों को वर्षा प्रदान करेगा और तुम अपने खेतों की भरपूर उपज से पुष्टिदायक रोटी खाओगे। उस दिन तुम्हारे चैपाये विशाल चारागाहों में चरेंगे।

24) खेत में काम करने वाले बैल और गधे, सूप और डलिया से फटकी हुई, नमक मिली हुई भूसी खयेंगे।

25) महावध के दिन, जब गढ़ तोड़ दिये जायेंगे, तो हर एक उत्तंुग पर्वत और हर एक ऊँची पहाड़ी से उमड़ती हुई जलधाराएँ फूट निकलेंगी।

26) जिस दिन प्रभु अपनी प्रजा के टूटे हुए अंगों पर पट्टी बाँधेगा और उसकी चोटों के घावों को चंगा करेगा, उस दिन चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य की तरह होगा और सूर्य का प्रकाश- सात दिनों के सम्मिलित प्रकाश के सदृश-सतगुना प्रचण्ड हो उठेगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 9:35-10:1,5a,6-8



35) ईसा सभागृहों में शिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते, हर तरह की बीमारी और दुबर्लता दूर करते हुए, सब नगरों और गाँवों में घूमते थे।

36) लोगों को देखकर ईसा को उन पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थके माँदे पड़े हुए थे।

37) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, "फसल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं।

38) इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।"

10:1) ईसा ने अपने बारह शिष्यों को अपने पास बुला कर उन्हें अशुद्ध आत्माओं को निकालने तथा हर तरह की बीमारी और दुर्बलता दूर करने का अधिकार प्रदान किया।

5) ईसा ने इन बारहों को यह अनुदेश दे कर भेजा, "अन्य राष्ट्रों के यहाँ मत जाओ और समारियों के नगरों में प्रवेश मत करो,

6) बल्कि इस्राएल के घराने की खोयी हुई भेड़ों के यहाँ जाओ।

7) राह चलते यह उपदेश दिया करो- स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8) रोगियों को चंगा करो, मुरदों को जिलाओ, कोढि़यों को शुद्ध करो, नरकदूतों को निकालो। तुम्हें मुफ़्त में मिला है, मुफ़्त में दे दो।



📚 मनन-चिंतन



पिता ईश्वर इस संसार का सृष्ष्टिकृता है। वह हमे जल, थल, सूर्य की रोशनी, साँस लेने के लिए शुद्ध वायु, भोजन, प्रदान करता है । साथ ही साथ उन्होंने हमे बहुमुल्य जीवन प्रदान किया । आज के सुसमाचार मे येसु हमे बताना चाहते हैं कि तुम्हे मुफ्त में मिला है, मुफ्त में दे दो (मत्ती १०:8)

येसु ने स्वयं बीमारी को चंगा किया ,अंधो को आँखे दी, अपदूतों को निकाला, भूखों को आध्यत्मक एवं शारिरिक भोजन दिया प्रदान किया, मृतको को जीवनदान दिया। जिस प्रकार ईश्वर ने हमारे जीवन में बहुत कुछ प्रदान किया है। वैसे ही हमें भी ईश्वर के प्रेम, शांति, तथा उनके वचनों को दूसरों में बाँटना है एवम जरूरत के समय एक दूसरे का साथ देना है।

पिता ईश्वर ने येसु को जो मिशन कार्य सौंपा था। येसु ने उसे आगे बढ़ाने के लिए बारह शिष्यों को चुना और अधिकार एव्म शक्ति प्रदान की। शिष्यों ने उस संदेश को लोगों के बीच बाँटा। हम भी ख्रीस्तीय होने के नाते ईश्वरीय वचन को आपस में बाँटे । अपने वचन और कर्म से ईश्वर का साथ दूसरों को दे |




📚 REFLECTION




God the father is the creator of this universe. He has given to us the water, land, sun, light, fresh air to breathe, food etc. and in other hand he has also given to us the precious life to live.

In today's gospel Jesus wants to tell us that, “you received without payment; give without payment” (Mt 10:8) .

Jesus himself healed the sick, gave vision to the blind, cast it out the devil, nourished the hungry with both spiritual and physical food, and raised the dead. As Jesus has given us so much so shall we too Share the love, peace, the word of God to the people. Along with this we should always help the people who are in need.

As God the father gave a mission to Jesus Christ, in order to persuade that mission Jesus chose the twelve disciples and gave them the authority and the power. The disciples spread the message of Jesus to the people willingly. In the same way we as Christians should also spread the word of Lord both by our words and deeds.




मनन-चिंतन - 2



अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में येसु ने इसायाह 61 की भविष्यवाणियों का हवाला देते हुए नाज़रेथ के सभागृह में अपनी कार्य-योजना की घोषणा की। फिर वे उस घोषणापत्र को साकार करने के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। वे ईश्वर के राज्य की खुशखबरी सुनाते हुए “सभी नगरों और गाँवों” में घूम रहे थे और “हर तरह की बीमारी और दुर्बलता” दूर कर रहे थे। उन्होंने किसी को अपने सेवाकार्य की सीमा के बाहर नहीं छोड़ा। उन्होंने लोगों की हर समस्या का समाधान किया। वे ईश्वर की प्रजा की 'संपूर्णता' में रुचि रखते थे। वे न केवल सभी को स्वर्गराज्य का संदेश सुनाना चाहते थे, बल्कि वे यह भी चाहते थे कि लोग स्वर्गराज्य के आगमन को अपने दैनिक जीवन में अनुभव करें। वे अपनी टीम में अधिक से अधिक सहकर्मियों को शामिल करना चाहते थे क्योंकि यह कार्य बहुत बड़ा था। उनके सहकर्मियों के चयन के लिए उनके पास केवल एक मानदंड था - उन्हें स्वर्गीय पिता द्वारा बुलाए जाने और भेजे जाने की आवश्यकता थी। इसलिए वे अपने शिष्यों को फसल के स्वामी से प्रार्थना करने को कहते हैं ताकि वे अपनी फसल काटने के लिए मजदूरों को भेजें। यह आज भी एक वास्तविकता है। एक बढ़िया फ़सल के कटने का इंतज़ार है। इस मिशन पर बुलाए जाने और भेजे जाने के लिए कई लोगों की आवश्यकता है, जिन्हें अपनी बुलाहट स्वीकार करने और उसकी पूर्ति के लिए कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है।




REFLECTION


At the beginning of his public ministry Jesus proclaimed his manifesto in the synagogue of Nazareth citing the prophecies in Isaiah 61. Then he was on his way to actualise that manifesto. He was going through “all the towns and villages” proclaiming the good news of the Kingdom of God and curing “all kinds of disease and all kinds of illness”. He did not leave anyone out. He addressed every problem of the people. He was interested in the ‘wholeness’ of the people of God. He not only wanted everyone to hear the message of the Kingdom, but he also wanted them experience the Kingdom in their own day to day lives. He wanted to induct into his team as many co-workers as possible because the task was huge. He had only one criterion for the selection of his co-workers – they needed to be called and sent out by the Heavenly Father. So he asks his disciples to pray to the Lord of the harvest to send out labourers into his harvest. This is a reality even today. A great crop is waiting to be harvested. We need many to be called and sent on this mission. Those called need to accept the call and work hard for its fulfilment.


 -Br. Biniush topno


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संत फ्रांसिस ज़ेवियर दिसंबर 03

 



संत फ्रांसिस ज़ेवियर

दिसंबर 03

फ्रांसिस ज़ेवियर का जन्म 7 अप्रैल 1506 को नवारे देश में हुआ। उनके बचपन में चारों तरफ़ युध्दों का माहौल था। जब युद्ध बंद हो गया तो उन्हें पेरिस विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए भेजा गया। वे अपने दोस्त पीटर फेवर के साथ कमरे में रहते थे। यह जोड़ी लोयोला के इग्नाटियस से बहुत प्रभावित हुई, जिसने फ्रांसिस को एक पुरोहित बनने के लिए प्रोत्साहित किया। 1530 में, फ्रांसिस ज़ेवियर ने अपनी मास्टर डिग्री हासिल की, और वे पेरिस विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाने लगे।

24 जून, 1537 को उनका पुरोहिताभिषेक हुआ। पोप पॉल III ने 1540 में येसु समाज धर्मसंघ की स्थापना के लिए मंजूरी दी। फ्रांसिस ज़ेवियर अपने पैंतीसवें जन्मदिन पर 1541 में भारत के लिए रवाना हुए। वे 6 मई, 1542 को गोवा पहुंचे। उन्होंने वहाँ सुसमाचार का प्रचार किया, गरीबों तथा जरूरतमंदों की सेवा की। वहाँ से वे जापान और चीन की भी यात्रा की।

3 दिसंबर 1552 को फ़्रांसिस ज़ेवियर की मृत्यु हुयी। 25 अक्टूबर, 1619 को संत पापा पौलुस तृतीय ने उन्हें धन्य घोषित किया। संत पापा ग्रेगोरी पन्द्रहवें ने द्वारा 12 मार्च, 1622 को लोयोला के इग्नाटियस के साथ फ्रांसिस ज़ेवियर को भी संत घोषित किया। वे काथलिक मिशनों के संरक्षक हैं और उनका पर्व 3 दिसंबर को है।


✍️-Br. Biniush topno



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शुक्रवार, 03 दिसंबर, 2021

 

शुक्रवार, 03 दिसंबर, 2021

आगमन का पहला सप्ताह

सन्त फ़्रासिस जेवियर

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 1:4-8


4) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई पड़ी-

5) “माता के गर्भ में तुम को रचने से पहले ही, मैंने तुम को जान लिया। तुम्हारे जन्म से पहले ही, मैंने तुम को पवत्रि किया। मैंने तुम को राष्ट्रों का नबी नियुक्त किया।“

6) मैंने कहा, “आह, प्रभु-ईश्वर! मुझे बोलना नहीं आता। मैं तो बच्चा हूँ।“

7) परन्तु प्रभु ने उत्तर दिया, “यह न कहो- मैं तो बच्चा हूँ। मैं जिन लोगों के पास तुम्हें भेजूँगा, तुम उनके पास जाओगे और जो कुछ तुम्हें बताऊगा, तुम वही कहोगे।

8) उन लोगों से मत डरो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। यह प्रभु वाणी है।“



दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 4:7-15



7) यह अमूल्य निधि हम में-मिट्टी के पात्रों में रखी रहती है, जिससे यह स्पष्ट हो जाये कि यह अलौकिक सामर्थ्य हमारा अपना नहीं, बल्कि ईश्वर का है।

8) हम कष्टों से घिरे रहते हैं, परन्तु कभी हार नहीं मानते, हम परेशान होते हैं, परन्तु कभी निराश नहीं होते।

9) हम पर अत्याचार किया जाता है, परन्तु हम अपने को परित्यक्त नहीं पाते। हम को पछाड़ दिया जाता है, परन्तु हम नष्ट नहीं होते।

10) हम हर समय अपने शरीर में ईसा के दुःखभोग तथा मृत्यु का अनुभव करते हैं, जिससे ईसा का जीवन भी हमारे शरीर में प्रत्यक्ष हो जाये।

11) हमें जीवित रहते हुए ईसा के कारण निरन्तर मृत्यु का सामना करना पड़ता है, जिससे ईसा का जीवन भी हमारे नश्वर शरीर में प्रत्यक्ष हो जाये।

12) इस प्रकार हम में मृत्यु क्रियाशील है और आप लोगों में जीवन।

13) धर्मग्रन्थ कहता है- मैंने विश्वास किया और इसलिए मैं बोला। हम विश्वास के उसी मनोभाव से प्रेरित हैं। हम विश्वास करते हैं और इसलिए हम बोलते हैं।

14) हम जानते हैं कि जिसने प्रभु ईसा को पुनर्जीवित किया, वही ईसा के साथ हम को भी पुनर्जीवित कर देगा और आप लागों के साथ हम को भी अपने पास रख लेगा।

15) सब कुछ आप लोगों के लिए हो रहा है, ताकि जिस प्रकार बहुतों में कृपा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार ईश्वर की महिमा के लिए धन्यवाद की प्रार्थना करने वालों की संख्या बढ़ती जाये।



सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 10:1-16



1) इसके बाद प्रभु ने अन्य बहत्तर शिष्य नियुक्त किये और जिस-जिस नगर और गाँव में वे स्वयं जाने वाले थे, वहाँ दो-दो करके उन्हें अपने आगे भेजा।

2) उन्होंने उन से कहा, ’’फ़सल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं; इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।

3) जाओ, मैं तुम्हें भेडि़यों के बीच भेड़ों की तरह भेजता हूँ।

4) तुम न थैली, न झोली और न जूते ले जाओ और रास्तें में किसी को नमस्कार मत करो।

5) जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ’इस घर को शान्ति!’

6) यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।

7) उसी घर में ठहरे रहो और उनके पास जो हो, वही खाओ-पियो; क्योंकि मज़दूर को मज़दूरी का अधिकार है। घर पर घर बदलते न रहो।

8) जिस नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो जो कुछ तुम्हें परोसा जाये, वही खा लो।

9) वहाँ के रोगियों को चंगा करो और उन से कहो, ’ईश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ गया है’।

10) परन्तु यदि किसी नगर में प्रवेश करते हो और लोग तुम्हारा स्वागत नहीं करते, तो वहाँ के बाज़ारों में जा कर कहो,

11 ’अपने पैरों में लगी तुम्हारे नगर की धूल तक हम तुम्हारे सामने झाड़ देते हैं। तब भी यह जान लो कि ईश्वर का राज्य आ गया है।’

12) मैं तुम से यह कहता हूँ- न्याय के दिन उस नगर की दशा की अपेक्षा सोदोम की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।

13) ’’धिक्कार तुझे, खोराजि़न! धिक्कार तुझे, बेथसाइदा! जो चमत्कार तुम में किये गये हैं, यदि वे तीरुस और सीदोन में किये गये होते, तो उन्होंने न जाने कब से टाट ओढ़ कर और भस्म रमा कर पश्चात्ताप किया होता।

14) इसलिए न्याय के दिन तुम्हारी दशा की अपेक्षा तीरुस और सिदोन की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।

15) और तू, कफ़रनाहूम! क्या तू स्वर्ग तक ऊँचा उठाया जायेगा? नहीं, तू अधोलोक तक नीचे गिरा दिया जायेगा?

16) ’’जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है और जो तुम्हारा तिरस्कार करता है, वह मेरा तिरस्कार करता है। जो मेरा तिरस्कार करता है, वह उसका तिरस्कार करता है, जिसने मुझे भेजा है।’’


📚 मनन-चिंतन


आजा माता कलीसिया संत फ़्रान्सिस जेवियर का पर्व मनाती है। सन्त फ्रांसिस जेवियर प्रभु येसु ख्रीस्त के प्रेम और मुकट का संदेश सुनाने भारत आये। वह ईश्वर की महिमा के लिए दिन रात प्रार्थना करते रहे। उन्होंने अपना सबकुछ त्याग कर ईश्वर के राज्य के लिए अपने को समर्पित कर दिया।

मनुष्य को इससे क्या लाभ यदि वह सारा संसार तो प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन ही गंवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता? (मारकुस 8:36-37)

सुसमाचार में भी येसु अपने बहतर शिष्यों को नियुक्त कर ईश्वर के राज्य कि घोषणा करने के लिए लोगों के बीच भेजते हैं। येसु शिष्यों को अकेले नहीं बल्कि दो-दो कर उन्हें भेजते हैं। जिससे वह एक दुसरे का सहयोग करते हुए, येसु की उपस्थिती को अपने बीच में महसूस करे। "क्योंकि जहां दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वंहा मै उनके बीच उपस्थित रहता हूँ" (मती 18:20) येसु आज हमसे आह्वान करते हैं कि हम ईश्वर के राज्य के लिए एक दूसरे के साथ मिल कर आपस में सहयोग करे। ताकि सभी लोग ईश्वर के बारे में जान सके और उनपर विश्वास करे ।



📚 REFLECTION



Today, the mother church celebrates the feast of Saint Xavier. Saint Francis Xavier came to India to proclaim the message of love and salvation of Jesus Christ. He used to pray to God for the glory of God. He gave up everything whatever he had and surrendered his life to the will of God.

Mark 8:36–37 “For what will it profit them to gain the whole world and forfeit their life? Indeed, what can they give in return for their life?’’

In today's gospel we hear that Lord Jesus sends his twelve disciples to proclaim the good news. Jesus did not send his disciples alone instead he sent them two by two so that by helping each other they may not feel the absence of Jesus among them.

Matthew (18:20) “For where two or three are gathered in my name, there I am there among them.”

Today, Jesus invites us to come together and help each other to enter the Kingdom of heaven so that each and everyone will know about God and believe in God.


 -Br. Biniush topno


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