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बुधवार, 10 नवंबर, 2021

 

बुधवार, 10 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: प्रज्ञा-ग्रन्थ 6:1-11


1) राजाओें! सुनो और समझो। पृथ्वी भर के शासको! शिक्षा ग्रहण करो।

2) तुम, जो बहुसंख्यक लोगों पर अधिकार जताते हो और बहुत-से राष्ट्रों का शासन करने पर गर्व करते हो, मेरी बातों पर कान दो ;

3) क्योंकि प्रभु ने तुम्हें प्रभुत्व प्रदान किया, सर्वोच्च ईश्वर ने तुम्हे अधिकार दिया। वही तुम्हारे कार्यों का लेखा लेगा और तुम्हारे विचारों की जाँच करेगा।

4) तुम उसके राज्य के सेवक मात्र हो। इसलिए यदि तुमने सच्चा न्याय नहीं किया, विधि का पालन नहीं किया और ईश्वर की इच्छा पूरी नहीं की,

5) तो वह भीषण रूप में अचानक तुम्हारे सामने प्रकट होगा; क्योंकि उच्च अधिकारियों का कठोर न्याय किया जायेगा।

6) जो दीन-हीन है, वह क्षमा और दया का पात्र है; किन्तु जो शक्तिशाली है, उनकी कड़ी परीक्षा ली जायेगी।

7) सर्वेश्वर पक्षपात नहीं करता और बड़ों के सामने नहीं झुकता; क्योंकि उसी ने छोटे और बड़े, दोनों को बनाया और वह सब का समान ध्यान रखता है,

8) किन्तु शक्तिशालियों की कठोर परीक्षा ली जायेगी।

9) इसलिए शासको! मैं तुम्हे शिक्षा देता हूँ, जिससे तुम प्रज्ञा प्राप्त करो और विनाश से बचे रहो;

10) क्योंकि जो पवत्रि नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वे पवत्रि माने जायेंगे और जो उन नियमों से शिक्षा ग्रहण करेंगे, वे उनके आधार पर अपनी सफाई दे सकेंगे।

11) इसलिए मेरी इन बातों को अपनाओ और इनका मनन करो, जिससे तुम्हें शिक्षा प्राप्त हो।



सुसमाचार : सन्त लूकस 17:11-19



11) ईसा येरुसालेम की यात्रा करते हुए समारिया और गलीलिया के सीमा-क्षेत्रों से हो कर जा रहे थे।

12) किसी गाँव में प्रवेश करने पर उन्हें दस कोढ़ी मिले,

13) जो दूर खड़े हो गये और ऊँचे स्वर से बोले, ’’ईसा! गुरूवर! हम पर दया कीजिए’’।

14) ईसा ने उन्हें देख कर कहा, ‘‘जाओ और अपने को याजकों को दिखलाओ’’, और ऐसा हुआ कि वे रास्ते में ही नीरोग हो गये।

15) तब उन में से एक यह देख कर कि वह नीरोग हो गया है, ऊँचे स्वर से ईश्वर की स्तुति करते हुए लौटा।

16) वह ईसा को धन्यवाद देते हुए उनके चरणों पर मुँह के बल गिर पड़ा, और वह समारी था।

17) ईसा ने कहा, ‘‘क्या दसों नीरोग नहीं हुए? तो बाक़ी नौ कहाँ हैं?

18) क्या इस परदेशी को छोड़ और कोई नहीं मिला, जो लौट कर ईश्वर की स्तुति करे?’’

19) तब उन्होंने उस से कहा, ‘‘उठो, जाओ। तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है।’’



मनन-चिंतन


प्रभु येसु के आज की चंगाई मिशन कार्य में तीन चरण हैं जिन्हें हमें प्रतिबिंबित करने की आवश्यकता है

1. बीमारी के समय में एकता

2. काढ़ियों का विश्वास

3. कोढ़ी की वफादारी

हालाँकि फिलिस्तीन के यहूदी समारी लोगों से घृणा करते थे, लेकिन आज के सुसमाचार में हम उन सभी को एक साथ देखते हैं। बीमारी से पीड़ित होने पर वे सभी एक साथ दूर खड़े रहते हैं और प्रभु को पुकारते हैं। उनके बीच अब कोई अलगाव नहीं रहा। दस कोढ़ियों के विश्वास की भी प्रशंसा करने की जरूरत है। येसु हर बार की तरह उन्हें उसी समय ठीक नहीं करते। वह उन्हें तुरंत जगह छोड़ने और चंगाई को प्रमाणित करने के लिए पुरोहित के सामने पेश करने के लिए कहते है। कोढ़ियों ने येसु के शब्दों में विश्वास किया और हालांकि उन्हें चंगाई नहीं मिला वे बिना एक भी शब्द बोले वहां से चले गए। उन्होंने येसु के शब्दों पर भरोसा किया और मंदिर में पुरोहित के पास प्रमाणित करने के लिए वे इस प्रकार आगे बढते हैं कि जैसे वे पहले से ही चंगे हो गये हो। येसु यह कहते हुए इसका साक्ष्य देते हैं कि आपके विश्वास ने आपको चंगा किया है।

वे सभी एक साथ आगे बढ़े और स्वयं को स्वच्छ साबित किया। हालाँकि उन्होंने महसूस किया कि वे शुद्ध हो गये थे, उनमें से केवल एक ही वापस आकर येसु को धन्यवाद देना चाहता था। सामरी के मन में कृतज्ञता का भाव देखा गया, जबकि दूसरों ने इसे हल्के में लिया। कृतज्ञ हृदय से उस को़ढ़ी की वापसी उसकी वफादारी को व्यक्त करती है। उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करना याजक के प्रमाण से बढ़कर था। जिस क्षण उसने चंगाई का अनुभव किया, उसका हृदय ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से भर गया। वह येसु के पास लौट आता है। हमें दैनिक जीवन में कई वरदान मिलते हैं लेकिन हम इसे हल्के में लेते हैं और उसका धन्यवाद करना भूल जाते हैं। प्राप्त उपकारों के लिए कृतज्ञता की अभिव्यक्ति हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण चीज है।


REFLECTION



There are three phases that we need to reflect in today’s healing miracle of Jesus

1. Unity in sickness

2. Faith of the leapers

3. Faithfulness of the leaper

Though the Jews in Palestine hated the Samaritans, in the gospel today we see all of them united. When affected with the sickness all of them stand together in a distance and call on the Lord. There was no separation anymore among them.

The faith of the ten leapers also needs to be admired. Jesus as usual does not heal them on the spot. He asks them to leave the place immediately and present themselves to the priest to certify the healing. The leapers believed in the words of Jesus and moved away from the place without uttering a word. They trusted the words of Jesus and proceeds to the priest in the temple to certify as if they are healed already. Jesus testifies it by saying that your faith has healed you.

All of them advanced together to prove themselves clean. Though they realized that they were clean only one of them wanted to come back and thank Jesus. An attitude of gratitude was seen in the mind of Samaritan where as others took it for granted. The return of the leaper with a grateful heart expresses his faithfulness. For him to render thanks to God was more than the certification from the priest. The moment he experienced healing he was filled with gratitude to God. He returned to Jesus.

We receive many gifts from God on daily basis but we take it for granted and forget to thank him. An expression of gratitude for the favours received is an important thing in our life



मनन-चिंतन - 2


आज के सुसमाचार में हम दस कोढ़ियों की चंगाई की घटना पाते हैं। वे प्रभु येसु से उनके भयानक रोग से निजात दिलाने का अनुरोध करते हैं। उनमें से केवल एक जब उसने पाया कि उसे चंगाई प्राप्त हुयी है, प्रभु येसु को धन्यवाद देने के लिए वापस आया। उन्होंने प्रभु को हृदय से धन्यवाद दिया। बाइबिल कहती है, "वह ईसा को धन्यवाद देते हुए उनके चरणों पर मुँह के बल गिर पड़ा"। इस सामरी कोढ़ी को पता चला कि येसु न केवल उसकी शारीरिक बीमारी को दूर कर सकते हैं, बल्कि वे उसे मुक्ति दिलाने में भी सक्षम हैं। उसने येसु के व्यक्तित्व को मात्र उपचार से अधिक महत्व दिया। कभी-कभी हम येसु को कुछ चंगाई, एक नौकरी, एक बच्चे, कुछ आर्थिक लाभ आदि के लिए संपर्क करते हैं। हमारी सूची में पाप-क्षमा, पवित्रता, अनन्त मुक्ति आदि नहीं है। आज पाठ से दो शिक्षा हम पा सकते हैं - पहला, हमें हर एक अनुग्रह के लिए ईश्वर का आभारी होना चाहिए; दूसरा, हमें सांसारिक लाभ की तुलना में श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपहार प्राप्त करने की आकांक्षा करनी होगी। तभी हम प्रभु से सुनने के लिए भाग्यशाली होंगे - "आपके विश्वास ने आपका उध्दार किया है"। सभी उपहारों में सबसे बड़ा स्वयं येसु ही है।



REFLECTION



In today’s gospel we have the incident of ten lepers requesting Jesus for cleansing from their dreaded disease. Only one among them finding that he received what he requested Jesus for, and came back to thank him. He profusely thanked the Lord. The Bible says, “He prostrated himself at Jesus’ feet and thanked him”. This Samaritan leper who came back realised that Jesus offered not only mere healing from his physical illness, but was able to give him eternal salvation. He valued the person of Jesus more than mere healing. Sometimes we approach Jesus for a healing, a job, a child, some economic gain etc. We do not have forgiveness of sin, holiness, eternal salvation etc. in our list. Two things we can take home from today’s readings – first, we have to be grateful to God for every single grace we receive; second, we have to aspire to receive superior spiritual gifts than earthly gains. Only then shall we be fortunate to hear from the Lord – “your faith has made you well”. The greatest of all gifts is Jesus himself.


 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 09 नवंबर, 2021

 

मंगलवार, 09 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

लातरेन महामन्दिर का प्रतिष्ठान - पर्व

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पहला पाठ: एज़ेकिएल का ग्रन्थ 47:1-2,8-9,12


1) वह मुझे मंदिर के द्वार पर वापस ले आया। वहाँ मैंने देखा कि मन्दिर की देहली के नीचे से पूर्व की ओर जल निकल कर बह रहा है, क्योंकि मन्दिर का मुख पूर्व की ओर था। जल वेदी के दक्षिण में मन्दिर के दक्षिण पाश्र्व के नीचे से बह रहा था।

2) वह मुझे उत्तरी फाटक से बाहर-बाहर घुमा कर पूर्व के बाह्य फाटक तक ले गया। वहाँ मैंने देखा कि जल दक्षिण पाश्र्व से टपक रहा है।

8) उसने मुझ से कहा, ’’यह जल पूर्व की ओर बह कर अराबा घाटी तक पहुँचता और समुद्र में गिरता है। यह उस समुद्र के खारे पानी को मीठा बना देता है।

9) यह नदी जहाँ कहीं गुज़रती है, वहाँ पृथ्वी पर विचरने वाले प्राणियों को जीवन प्रदान करती है। वहाँ बहुत-सी मछलिया पाय जायेंगी, क्योंकि वह धारा समुद्र का पानी मीठा कर देती है। और जहाँ कहीं भी पहुचती है, जीवन प्रदान करती है।

12) नदी के दोनों तटों पर हर प्रकार के फलदार पेड़े उगेंगे- उनके पत्ते नहीं मुरझायेंगें और उन पर कभी फलों की कमी नहीं होगी। वे हर महीने नये फल उत्पन्न करेंगे; क्योंकि उनका जल मंदिर से आता है। उनके फल भोजन और उनके पत्ते दवा के काम आयेंगे।



सुसमाचार : सन्त योहन 2:13-22



13) यहूदियों का पास्का पर्व निकट आने पर ईसा येरुसालेम गये।

14) उन्होंने मन्दिर में बैल, भेड़ें और कबूतर बेचने वालों को तथा अपनी मेंज़ों के सामने बैठे हुए सराफों को देखा।

15) उन्होंने रस्सियों का कोड़ा बना कर भेड़ों और बेलों-सहित सब को मन्दिर से बाहर निकाल दिया, सराफों के सिक्के छितरा दिये, उनकी मेजे़ं उलट दीं

16) और कबूतर बेचने वालों से कहा, ‘‘यह सब यहाँ से हटा ले जाओ। मेरे पिता के घर को बाजार मत बनाओ।’’

17) उनके शिष्यों को धर्मग्रन्थ का यह कथन याद आया- तेरे घर का उत्साह मुझे खा जायेगा।

18) यहूदियों ने ईसा से कहा, ‘‘आप हमें कौन-सा चमत्कार दिखा सकते हैं, जिससे हम यह जानें कि आप को ऐसा करने का अधिकार है?’’

19) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘इस मन्दिर को ढा दो और मैं इसे तीन दिनों के अन्दर फिर खड़ा कर दूँगा’’।

20) इस पर यहूदियों ने कहा, ‘‘इस मंदिर के निर्माण में छियालीस वर्ष लगे, और आप इसे तीन दिनों के अन्दर खड़ा कर देंगे?’’

21) ईसा तो अपने शरीर के मन्दिर के विषय में कह रहे थे।

22) जब वह मृतकों में से जी उठे, तो उनके शिष्यों को याद आया कि उन्होंने यह कहा था; इसलिए उन्होंने धर्मग्रन्ध और ईसा के इस कथन पर विश्वास किया।



मनन-चिंतन


आज हम संत योहन लातरेन महामन्दिर केे बेसिलिका का प्रतिष्ठांन का पर्व मनाते हैं। लातरेन बेसिलिका सभी ईसाई गिरजाघरों मातृ-गिरजाघर है, जिसे रोमन सम्राट कॉन्सटेंटाइन द्वारा चौथी शताब्दी में बनाया गया था। मूल इमारत भूकंप से नष्ट हो गई थी और इसके दो निम्नलिखित प्रतिस्थापन आग से नष्ट हो गए थे। वर्तमान इमारत 14वीं शताब्दी की है।

ऊँचा खड़ा लातरेन बेसिलिका हमें आशा का एक पाठ सिखाता है कि जो कुछ भी ईश्वर बचाना या रखना चाहता है वह उसकी योजना के अनुसार बचा रहेगा।

आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि एजिकिएल ने मंदिर को ईश्वर की आत्मा के स्रोत के रूप में देखा, जो एक शक्तिशाली नदी की तरह बह रहा था ताकि सभी को जीवन मिल सके। द्वितीय वेटिकन परिषद के अनुसार, येसु हमारे ईसाई धर्म का स्रोत और शिखर है। ईश्वर के वचन और येसु के अनमोल शरीर और रक्त से पोषित होने के बाद, ईश्वर का आत्मा हमारे द्वारा इस घायल संसार में प्रवाहित होना चाहिए।

बहुत अधिक गतिविधि और कम प्रार्थना के साथ लोगों ने मंदिर को सार्वजनिक बाजार में बदल दिया। प्रभु इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने मेजों को उलट दिया, और सराफों के उन सभी सिक्कों को छितरा दिये जो उन पर थे। उन्होनें उन्हें बाहर फेंक दिया और उनसे कहा, ‘‘मेरा घर प्रार्थना का घर कहलायेगा, परन्तु तुम लोग उसे लुटेंरों का अड्डा बनाते हो।’’ (मत्ती 21ः13;)

हम कैथोलिक विश्वासियों के लिए गिरजाघर को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है। यह सिर्फ एक इमारत नहीं है । यह एक ऐसा स्थान है जहां हम अपने सुख-दुख को पवित्र यूख्र्र्रीस्त के सामने प्रस्तुत करते हैं, यूख्र्र्रीस्त में प्रभु से मिलते हैं, क्षमा और दया प्राप्त करते हैं और संस्कारों के माध्यम से अपने विश्वास को मजबूत करते हैं। गिरजाधर में ही हमारे ईसाई जीवन के सभी सबसे महत्वपूर्ण चरण सम्पन्न होते हैं; हमारे बपतिस्मा से शुरू होकर हमारे जीवन के अंत में हमारे अंतिम संस्कार के साथ समाप्त होते हैं। आइए हम अपने गिरजाघरों का सम्मान करना और उनकी देखभाल करना सीखें।




REFLECTION



Today we celebrate the dedication of the Basilica of Saint John Lateran. Lateran Basilica is the mother church of all Christian churches, built in the fourth century by the Roman Emperor Constantine. The original building was destroyed by an earthquake and its two following replacements were destroyed by fire. The present building dates back to 14th century. The tall standing Lateran Basilica teaches us a lesson of hope that whatever God wants to endure will endure according to His plan.

Today’s first reading we see that Ezekiel perceived the temple as the source of God’s Spirit flowing like a mighty river to bring life to all that it touched. According to second Vatican Council, Jesus is the source and the summit of our Christian faith. Having nourished by God’s Word and the precious Body and Blood of Jesus, the Spirit of God should flow out from us into this wounded world.

With much activity and little prayer people turned temple into a public market. The Lord was so furious that he overturned the tables, spilling all of the moneychangers’ coins that were on them. He threw them out and said to them, “my house is a house of prayer but you have made it into a den of thieves.” (Mt 21:13)

For us Catholics the church has an important role to play. It is not just a building; it is a place where we present our joys and sorrows before the Blessed Sacrament, encounter the Lord in the Eucharist, receive pardon and mercy and strengthen our faith through the sacraments. It is in the church all the most important stages in our Christian life take place, beginning with our Baptism and ending with our funeral at the end of our lives. Let us learn to respect and take care of our churches.



मनन-चिंतन - 2



आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु येरूसालेम के मन्दिर में बैल, भेड़ें और कबूतर बेचने वालों को तथा अपनी मेंज़ों के सामने बैठे हुए सराफों को देखा। उन्होंने रस्सियों का कोड़ा बना कर भेड़ों और बेलों-सहित सब को मन्दिर से बाहर निकाल दिया, सराफों के सिक्के छितरा दिये, उनकी मेजे़ं उलट दीं और कबूतर बेचने वालों से कहा, “यह सब यहाँ से हटा ले जाओ। मेरे पिता के घर को बाजार मत बनाओ।” पवित्र बाइबिल में मन्दिर के चार अर्थ हैं।

1. येरूसालेम का मन्दिर

2. येसु ख्रीस्त का मानवीय शरीर

3. कलीसिया यानि विश्वासियों का समुदाय

4. मनुष्य का शरीर

आज का सुसमाचार येरूसालेम के मंदिर की पवित्रता के बारे में प्रभु येसु की चिंता को दर्शाता है। प्रभु येसु पापविहीन और पवित्र हैं। वे इस्राएल के परमपावन हैं। वे पवित्रता का स्रोत हैं। कलीसिया जो शिष्यों का समुदाय है - उसे सभी पापों और बुरी प्रथाओं से बचकर अपनी पवित्रता बनाए रखना चाहिए। हमें अपने शरीर को शुद्ध और पवित्र रखने की भी आवश्यकता है। संत पौलुस कहते हैं, “क्या आप लोग यह नहीं जानते कि आपका शरीर पवित्र आत्मा का मन्दिर है? वह आप में निवास करता है और आप को ईश्वर से प्राप्त हुआ है। आपका अपने पर अधिकार नहीं है; क्योंकि आप लोग कीमत पर खरीदे गये हैं। इसलिए आप लोग अपने शरीर में ईश्वर की महिमा प्रकट करें।” (1कुरिन्थियों 6: 19-20) लेवि 20:26 में हम पढ़ते हैं,“ मेरे लिये पवित्र बनो, क्योंकि मैं प्रभु पवित्र हूँ। मैंने तुम लोगों को अन्य राष्ट्रों से अपने लिये अलग कर लिया है”।



REFLECTION



In today’s Gospel we find Jesus entering the temple of Jerusalem, making a whip and chasing away those who were doing various types of business. He warned them, “Stop making my Father’s house a marketplace!” In the Bible we find the word ‘temple’ being used with four meanings.

1. Jerusalem Temple

2. The human body of Jesus

3. Church, the community of disciples

4. Our Human body

The Gospel passage shows the concern of Jesus about the sanctity of the Temple of Jerusalem. Jesus was sinless and impeccable. He is the Holy One of Israel. He is the source of holiness. The church which is the community of disciples needs to keep its sanctity by avoiding all sins and evil practices. We also need to keep our body pure and holy. St. Paul says, “do you not know that your body is a temple of the Holy Spirit within you, which you have from God, and that you are not your own? For you were bought with a price; therefore glorify God in your body.” (1Cor 6:19-20) In Lev 20:26, we read, “You shall be holy to me; for I the Lord am holy, and I have separated you from the other peoples to be mine”.


 -Br Biniush Topno


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सोमवार, 08 नवंबर, 2021

 

सोमवार, 08 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: प्रज्ञा-ग्रन्थ 1:1-7


1) पृथ्वी के शासको! न्याय से प्रेम रखो। प्रभु के विषय में ऊँचे विचार रखो और निष्कपट हृदय से उसे खोजते रहो;

2) क्योंकि जो उसकी परीक्षा नहीं लेते, वे उसे प्राप्त करते हैं। प्रभु अपने को उन लोगों पर प्रकट करता है, जो उस पर अविश्वास नहीं करते।

3) कुटिल विचार मनुष्य को ईश्वर से दूर करते हैं। सर्वशक्तिमत्ता उन मूर्खों को पराजित करती है, तो उसकी परीक्षा लेते हैं।

4) प्रज्ञा उस आत्मा में प्रवेश नहीं करती, जो बुराई की बातें सोचती है और उस शरीर में निवास नहीं करती, जो पाप के अधीन है;

5) क्योंकि शिक्षा प्रदान करने वाला पवत्रि आत्मा छल-कपट से घृणा करता है। वह मूर्खतापूर्ण विचारों को तुच्छ समझता और अन्याय से अलग रहता है।

6) प्रज्ञा मनुष्य का हित तो चाहती है, किन्तु वह ईषनिन्दक को उसके शब्दों का दण्ड दिये बिना नहीं छोड़ेगी; क्योंकि ईश्वर मनुष्य के अन्तरतम का साक्षी है। वह उसके हृदय की थाह लेता और उसके मुख के सभी शब्द सुनता है।

7) प्रभु का आत्मा संसार में व्याप्त है। वह सब कुछ को एकता में बाँधे रखता है और मनुष्य जो कुछ कहते हैं, वह सब जानता है।


सुसमाचार : सन्त लूकस 17:1-6


1) ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ‘‘प्रलोभन अनिवार्य है, किन्तु धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है!

2) उन नन्हों में एक के लिए भी पाप का कारण बनने की अपेक्षा उस मनुष्य के लिए अच्छा यही होता कि उसके गले में चक्की का पाटा बाँधा जाता और वह समुद्र में फेंक दिया जाता।

3) इसलिए सावधान रहो। ‘‘यदि तुम्हारा भाई कोई अपराध करता है, तो उसे डाँटो और यदि वह पश्चात्ताप करता है, तो उसे क्षमा कर दो।

4) यदि वह दिन में सात बार तुम्हारे विरुद्ध अपराध करता और सात बार आ कर कहता है कि मुझे खेद है, तो तुम उसे क्षमा करते जाओ।’’

5) प्रेरितों ने प्रभु से कहा, ‘‘हमारा विश्वास बढ़ाइए’’।

6) प्रभु ने उत्तर दिया, ‘‘यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी होता और तुम शहतूत के इस पेड़ से कहते, ‘उखड़ कर समुद्र में लग जा’, तो वह तुम्हारी बात मान लेता।


मनन-चिंतन


आज का सुसमाचार कमजोर विश्वास वाले लोगों के प्रति दो दृष्टिकोणों की बात करता है।

1. प्रभाव द्वारा गुमराह करना।

2. अनुकंपा भरा रवैया।

प्रभाव द्वारा गुमराह करनाः समाज में एक नेता होना हमेशा एक सम्मान और साथ ही एक व्यक्ति के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। नेता को हमेशा अपने सभी शब्दों और कार्यों में एक आदर्श के रूप में देखा जाता है। 2 मक्कबियों के किताब 6ः24-28 में हम एलीआजर में एक महान नेता को देखते हैं। अपने कुछ साथियों द्वारा सूअर का मांस न खाने के विकल्प को देखते हुए और यह महसूस करते हुए कि यह युवाओं को गुमराह कर सकता है, उन्होंने यह कहते हुए उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया कि ‘‘मेरे ढोंग के माध्यम से एक संक्षिप्त क्षण जीने के लिए, वे (युवा) भटक जाएंगे और उस दौरान मैं अपने बुढ़ापे को अपवित्र और अपमानित करता हूं।’’ उन्हें डर था कि हालांकि उनका कार्य सही था, यह युवा पीढ़ी को गुमराह कर सकता है। वह वास्तव में एक महान नेता थे।

कमजोर विश्वास के लोग अपने नेताओं और समाज के सम्मानित लोगों के प्रभाव में बहुत आसानी से पड़ सकते हैं। येसु कहते हैं कि वह प्रभाव मत बनो जो दूसरों को पाप करने के लिए प्रेरित करता है।

छोटों के प्रति करूणामयी मनोवृत्तिः कमजोर विश्वास वाले लोगों के प्रति असीम करुणा का भाव होना चाहिए। कठोरता तो लोगों को ईश्वर से दूर ही करेगी। इस पृथ्वी पर अपने मिशन कार्य के दौरान येसु ने स्वयं इसके लिए एक उदाहरण रखा। उसने व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री पर, जकेयुस पर, कर लेने वाले मत्ती इत्यादि पर दया दिखाई। येसु कहते हैं कि पापी के पश्चाताप को बिना अभिलेख रखे महत्व दिया जाना चाहिए। करुणा और क्षमा को सच्चे शिष्य की पहचान के रूप में दिखाया गया है।

हम जो मसीह के अनुयायी हैं, हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम कमजोरों को अपने शब्दों और कार्यों के माध्यम से गुमराह न करें और साथ ही साथ यह जिम्मेदारी भी बनती है हि हम करुणा और क्षमा के माध्यम से उन्हें मसीह के लिए वापस जीते।



REFLECTION


Today’s gospel speaks of two attitudes towards people of feeble faith.

1. Misleading through influence.

2. Compassionate attitude.

Misleading through influence: To be a leader in the society is always an honour and at the same time a great responsibility for a person. The leader is always looked up as an ideal in all his words and deeds. In the book of 2Macc. 6: 24-28 we see a great leader in Eleazar. Given the option of not eating the pork by some of his companions and sensing that it could mislead the young he rejected their offer saying “through my pretense for the sake of living a brief moment longer, they (young) would be led astray because of me while I defile and disgrace my old age” He was afraid that though his action was right, it could mislead the younger generation. He was truly a great leader.

People of shallow faith can very easily fall into the influence of their leaders and respectable people of the society. Jesus says not to become that influence that force which tempts others to sin.

Compassionate attitude to the little ones: Limitless compassion should be the attitude towards the people of shallow faith. Rigidity will only distance the people from God. Jesus himself set an example for this during his ministry on this earth. He showed compassion to the woman caught in adultery, to Zacchaeus, to Mathew the tax collector, so on and so forth. He showed that the repentance of the sinner should be valued without keeping a record. Compassion and forgiveness are shown as the identity of a true disciple.

We who are the followers of Christ have the responsibility not to mislead the weaker ones through our words and actions and at the same time a responsibility to win them back for Christ through compassion and forgiveness



मनन-चिंतन - 2


पाप संक्रामक है। पाप करने के बाद, हेवा ने अपने पति को भी पाप करने के लिए प्रेरित किया। राजा सुलेमान की गैरयहूदी पत्नियों ने उसे अन्य देवी-देवताओं की वेदियों पर बलिदान चढ़ाने के लिए प्रभावित किया। प्रभु येसु हमें दूसरों को प्रलोभन न देने की चेतावनी देता है। वे बहुत ही कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, “प्रलोभन अनिवार्य है, किन्तु धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है! उन नन्हों में एक के लिए भी पाप का कारण बनने की अपेक्षा उस मनुष्य के लिए अच्छा यही होता कि उसके गले में चक्की का पाटा बाँधा जाता और वह समुद्र में फेंक दिया जाता।” (लूकस 17:1-2) हम सभी से प्रभु उम्मीद रखते हैं कि हम न केवल पवित्र जीवन जीयें बल्कि दूसरों को भी पवित्रता की राह में अग्रसर होने के लिए प्रभावित करें। प्रभु चाहते हैं कि हम एक-दूसरे को सुधारें और एक-दूसरे को क्षमा करें। संक्षेप में, ख्रीस्तीय विश्वासियों को समाज पर अच्छा प्रभाव डालने के लिए कहा जाता है। हमें अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए काम करते रहना है। 'संसार की ज्योति’, 'आटा में खमीर' और 'पृथ्वी का नमक' इन सभी के द्वारा भी यही मांग की जाती है। समाज पर हम सकारात्मक प्रभाव डालें।



REFLECTION



Sin is contagious. After coming sin, Eve shared sin with her husband. King Solomon’s pagan wives influenced him to offer sacrifices at pagan altars. Jesus warns us about tempting others. He uses very strong words, “Occasions for stumbling are bound to come, but woe to anyone by whom they come! It would be better for you if a millstone were hung around your neck and you were thrown into the sea than for you to cause one of these little ones to stumble.” (Lk 17:1-2) All of us are expected not only to live a holy life but also influence others to live a holy life. The Lord wants us to correct each other and forgive each other. In short, Christians are called to be good influence on the society. We are to work to make our society better. This is what is demanded by the images of ‘the light of the world’, ‘leaven in the dough’ and ‘salt of the earth’. Be a positive influence on the society


 -Br Biniush Topno


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इतवार, 07 नवंबर, 2021

 

इतवार, 07 नवंबर, 2021

वर्ष का बत्तीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : 1 राजाओं 17:10-16


10) एलियाह उठ कर सरेप्ता गया। शहर के फाटक पर पहुँच कर उसने वहाँ लकड़ी बटोरती हुई एक विधवा को देखा और उसे बुला कर कहा, "मुझे पीने के लिए घड़े में थोड़ा-सा पानी ला दो"।

11) वह पानी लाने जा ही रही थी कि उसने उसे पुकार कर कहा, "मुझे थोड़ी-सी रोटी भी ला दो"।

12) उसने उत्तर दिया, "आपका ईश्वर, जीवन्त प्रभु इस बात का साक्षी है कि मेरे पास रोटी नहीं रह गयी है। मेरे पास बरतन में केवल मुट्ठी भर आटा और कुप्पी में थोड़ा सा तेल है। मैं दो-एक लकड़ियाँ बटोरने आयी हूँ। अब घर जा कर उसे अपने लिए और अपने बेटे के लिए पकाती हूँ। हम उसे खायेंगे और इसके बाद हम मर जायेंगे।

13) एलियाह ने उस से कहा, "मत डरो। जैसा तुमने कहा, वैसा ही करो। किन्तु पहले मेरे लिये एक छोटी-सी रोटी पका कर ले आओ। इसके बाद अपने लिए और अपने बेटे के लिए तैयार करना;

14) क्योंकि इस्राएल का प्रभु-ईश्वर यह कहता हैः जिस दिन तक प्रभु पृथ्वी पर पानी न बरसाये, उस दिन तक न तो बरतन में आटा समाप्त होगा और न तेल की कुप्पी खाली होगी ।"

15) एलियाह ने जैसा कहा था, स्त्री ने वैसा ही किया और बहुत दिनों तक उस स्त्री, उसके पुत्र और एलियाह को खाना मिलता रहा।

16) जैसा कि प्रभु ने एलियाह के मुख से कहा था, न तो बरतन में आटा समाप्त हुआ और न तेल की कुप्पी ख़ाली हुई।


दूसरा पाठ : इब्रानियों 9:24-28


24) क्योंकि ईसा ने हाथ के बने हुए उस मन्दिर में प्रवेश नहीं किया, जो वास्तविक मन्दिर का प्रतीक मात्र है। उन्होंने स्वर्ग में प्रवेश किया है, जिससे वह हमारी ओर से ईश्वर के सामने उपस्थित हो सकें।

25) प्रधानयाजक किसी दूसरे का रक्त ले कर प्रतिवर्ष परमपावन मन्दिर-गर्भ में प्रवेश करता है। ईसा के लिए इस तरह अपने को बार-बार अर्पित करने की आवश्यकता नहीं है।

26) यदि ऐसा होता तो संसार के प्रारम्भ से उन्हें बार-बार दुःख भोगना पड़ता, किन्तु अब युग के अन्त में वह एक ही बार प्रकट हुए, जिससे वह आत्मबलिदान द्वारा पाप को मिटा दें।

27) जिस तरह मनुष्यों के लिए एक ही बार मरना और इसके बाद उनका न्याय होना निर्धारित है,

28) उसी तरह मसीह बहुतों के पाप हरने के लिए एक ही बार अर्पित हुए। वह दूसरी बार प्रकट हो जायेंगे- पाप के कारण नहीं, बल्कि उन लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए, जो उनकी प्रतीक्षा करते हैं।



सुसमाचार : मारकुस 12:38-44



38) ईसा ने शिक्षा देते समय कहा, "शास्त्रियों से सावधान रहो। लम्बे लबादे पहन कर टहलने जाना, बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना,

39) सभागृहों में प्रथम आसनों पर और भोजों में प्रथम स्थानों पर विराजमान होना- यह सब उन्हें बहुत पसन्द है।

40) वे विधवाओं की सम्पत्ति चट कर जाते और दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करते हैं। उन लोगों को बड़ी कठोर दण्डाज्ञा मिलेगी।"

41) ईसा ख़जाने के सामने बैठ कर लोगों को उस में सिक्के डालते हुए देख रहे थे। बहुत-से धनी बहुत दे रहे थे।

42) एक कंगाल विधवा आयी और उसने दो अधेले अर्थात् एक पैसा डाल दिया।

43) इस पर ईसा ने अपने शिष्यों को बुला कर कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ- ख़जाने में पैसे डालने वालों में से इस विधवा ने सब से अधिक डाला है;

44) क्योंकि सब ने अपनी समृद्धि से कुछ डाला, परन्तु इसने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला।"


मनन-चिंतन



यह कहा गया है कि चार प्रकार के दाता हैंः द्वेष देने वाले, कार्य देने वाले, स्वयं-सेवा देने वाले और प्रेम देने वाले।

द्वेष देने वाले दूसरों को देते हैं लेकिन वह उसे द्वेषपूर्वक या अनिच्छा से करते हैं। वे देते हैं क्योंकि वे शर्मिंदा नहीं होना चाहते हैं।

कार्य दाता दायित्व की भावना के साथ देते हैं। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि उन पर दबाव या मजबूरी हो।

स्वयं-सेवा देने वाले वे हैं जो अपने सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए या बदले में कुछ पाने के लिए देते हैं। परन्तु येसु कहते हैं, ‘‘जब तू किसी दरिद्र को कुछ देते हो, तो कपटियों की तरह उसका बड़ा प्रदर्शन मत करों’’ (मत्ती 6ः2)।

प्यार देने वाले इसलिए देते हैं क्योंकि वे देना चाहते हैं। वे इसे प्यार या करुणा से प्रेरित स्वतंत्र रूप से और खुशी से करते हैं। संत मदर तेरेसा कहती हैं कि जब तक दर्द न हो तब तक दें।

पहले पाठ और सुसमाचार में दोनों विधवाएं हमें एक महत्वपूर्ण सबक सिखाती हैंः बलिदान का मूल्य।

विधवा ने आज के पहले पाठ में अपनी आखिरी रोटी का त्याग किया। वह मरने की तैयारी कर रही थी और वह अपने पास जो कुछ भी है, उसकी आखिरी ताकत, उसके पोषण का अंतिम स्रोत, उसके जीवन का अंतिम चिन्ह अर्थात् स्वयं को को दे देती है। तब घड़ा और जग भर जाता हैं । सुसमाचार में विधवा वह सब कुछ प्रदान करती है जिस पर उसकी जीविका टीकी थी। आज के सुसमाचार में येसु ने विधवा की ईमानदारी, उदारता और बलिदान के लिए उसकी प्रशंसा की है।

येसु ने अपने पीड़ा और मृत्यु के जरिए बलिदान की मिसाल कायम की। उन्होंने योहन 12ः24 में कहा ‘‘जब तक गेंहूँ का दाना मिटटी में गिर कर नहीं मर जाता, तब तक वह अकेला ही रहता है परन्तु यदि वह मर जाता है, तो बहुत फल देता है’’। अपने आप के लिए मर जाने के द्वारा ही हम वह बन पाते हैं जिसे ईश्वर ने हमें होने के लिए बुलाया है। बिना कष्ट किये फल नहीं मिलता।

हर दिन हमें उस आखिरी रोटी के लिए, उस आखिरी प्याले के तेल के लिए, उस आखिरी पैसे के लिए अपने दिलों की तलाश करनी चाहिए। हमें अपने हृदय में अहंकार के उस अंतिम अंश, क्रोध की अंतिम खुराक, शर्म के उस अंतिम संकेत, भय के उस अंतिम ठिकाने की तलाश करनी चाहिए, और यह सब प्रभु को समर्पित कर देना चाहिए। अरबी कहावत कहती है, ‘यदि आपके पास बहुत है, तो अपनी दौलत में से दो, यदि तुम्हारे पास थोड़ा है, तो अपने हृदय से दो।” हमें प्रभु के लिए अपना समय, प्रतिभा और खजाना बलिदान करने की आवश्यकता है। इससे चमत्कार होगा। उदारता को निश्चित रूप से पुरस्कृत किया जाएगा।



REFLECTION



It’s been said that there are four kinds of givers: GRUDGE givers, DUTY givers, Self- serving givers and LOVE givers.

Grudge givers give but do it grudgingly or reluctantly. They give because they do not want to be embarrassed.

Duty givers give with a sense of obligation. It may be because they are pressurized or under compulsion.

Self – serving givers are those who give for their honor and prestige or to get something in return. But Jesus says “When you give something to a needy person, do not make a big show of it as the hypocrites do” (Mt 6:2).

Love givers give because they want to. They do it freely and joyfully motivated by love or compassion. Mother Theresa says give until it hurts.

Both the widows in the first reading and in the gospel teach us one important lesson: The value of sacrifice.

The widow in today’s first reading sacrificed her last bit of bread. She was preparing to die and she offers everything she has, her last bit of strength, her last source of nourishment, her last sign of life; she gives herself away. Then the jar and the jug remained full. The widow in the gospel offers all that she had to live on. Jesus in today’s gospel praises the widow for her sincerity, generosity and the sacrifice.

Jesus sets an example of sacrifice through his passion and death. He said in Jn. 12:24 “Unless a grain of wheat falls into the earth and dies, it remains just a single grain: but if it dies, it bears much fruit”. It is only through dying to ourselves that we become who god has called us to be. No pain, no gain.

Each day we must search our hearts for that last bit of bread, for that last cup of oil, for that last penny. We must search our hearts for that last ounce of pride, that last dose of anger, that last hint of shame, that last haunt of fear, and surrender it all to the lord. Arabic proverb says “If you have much, give of your wealth; if you have little, give of your heart.” We need to sacrifice our time, talent and treasure for the people for the Lord. The miracle will happen. Generosity will be rewarded for sure.v


मनन-चिंतन - 2



किसी अमुख पल्ली में, गिरजाघर की स्थिति दयनीय बन गयी थीl उस गिरजाघर का रंग उखड़ चुका था, उसके चारों ओर का दृश्य उजाड़ सा प्रतीत हो रहा था। उसकी मरम्मत कराने के प्रति लोग उदासीन थे। उसके अंदर के रखी किताबो और अलमारियो को प्रायः घुन खा चुका था। उसकी मरम्मत के लिए धन की कमी थी। अतः एक दिन वहाँ के पल्ली पुरोहित ने पल्लीवासियों की सभा बुलाई और पूछा कि कैसे गिरजाघर का नवीनीकरण किया जा सके। अतः सभी पल्लीवासियों ने अपनी-अपनी राय प्रस्तुत की और कहा कि सभी लोग अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देंगे। उसी पल्ली में ही एक अत्यंत धनी व्यक्ति था जो अत्यंत कठोर हदय का था। उसे कोई भी पल्लीवासी जागरूक नहीं कर सकता था। इसलिए पल्ली पुरोहित ने सभी पल्लीवासियों से कहा क्यों न हम गिरजाघर जाकर ईश्वर से प्रार्थना कर उस धनी व्यक्ति के हदय को ख्रीस्तीयमय बना सके। पल्ली पुरोहित ने भावुक होकर भक्तिभाव से प्रार्थना की। परिणाम स्वरूप तुंरत ही उस धनी व्यक्ति ने कहा कि मैं अब से सारे गिरजाघर के मरम्मत के कार्य में अपना संपूर्ण योगदान दूंगा। इसे सुनते ही सबों के दिल में खुशी की लहर दौड़ चली और उनकी खुशी की कोई सीमा न रही। इस घट्ना से उत्साहित होकर पल्ली पुरोहित और जोर-जोर से प्रार्थना करने लगा जिसे सभी के पत्थरमय हदय पिघल जाये।

आज के तीनों पाठों का निचोड़ है उदारता और त्याग की भावना। हम सभी इसी उदारता और त्याग की भावना में सहभागी होने के लिए ईश्वर द्वारा इस संसार में नाम लेकर बुलाये गये हैं। अब प्रश्न उठता है कि कैसे हम इसे अपने जीवन में कार्यरूप में परिणत करें। हम सभी ईश्वर की असीम दया के कारण किसी न किसी रूप में अवश्य धनी हैं। यही हमें स्मरण दिलाता है कि हमें जरूरतमदों की सहायता करनी है यही हमारे जीवन में भिन्नता दिखाती है।

आज के पहले पाठ और सुसमाचार में सच्चे मनुष्य के गुणों को दर्शाया गया है। पुराने और नये विधान में दो योग्य गरीब विधवाओं की उदारता और त्याग की मिसाल को निखारा गया है उनकी इस भावना को हम कभी भुला नहीं सकते हैं। पवित्र बाइबिल हमें बताती है कि उनकी उदारता और त्याग की भावना एक महान और अद्वितीय घटना थी। क्या आज हम अपने जीवन में इस प्रश्न का जवाब देने का हिम्मत रखते हैं? कि हम ख्रीस्तीय अनुकंपा, उदारता और त्याग से परिपूरित हैं?

आज के सुसमाचार में संत मारकुस हमारे सामने अंत्यत रोचकपूर्ण दृश्य प्रस्तुत करते हैं और वह है प्रभु येसु के मंदिर में दान देने वालों पर टिप्पणी करना। बहुत से धनी लोग अपनी समृध्दि में से दान दे रहे थे और उन्हीं के बीच एक कंगाल विधवा अपनी जीविका के सभी को दान कर देती है। उनकी उदारता की भावना को सराहे बिना येसु स्वय को रोक नहीं सके। वे अपने शिष्यों को उनकी उदारता की भावना का पाठ पढ़ाते हैं कि किसी की उदारता मनुष्य को कभी भी नीचा नहीं वरन् उसे महान बनाती है।

आज के पहले पाठ राजाओं का पहला ग्रंथ हमें एक गरीब विधवा की हदयस्पर्शी घटना की याद दिलाता है, जो अपने मुठ्ठी भर आटा और थोड़ी सी कुप्पी भर के तेल से भोजन बनाकर नबी एलियाह को खाना खिलाती है। यह किसी महान उदारता की भावना से कम नहीं था। क्या हम भी उस विधवा की तरह अपनी निर्धनता में भी परिपूर्णताः दिखाते हैं? उदारता महानता की वह भावना है जो ऊंच नीच की भावना को उखाड़कर फेंक देती है। आज के पुराने और नये विधान का सामान्य भाजक नबी एलियाह की कहानी और संत मारकुस के सुसमाचार में विधवाओं की कहानी जिनका उस दौर की यहूदी प्रथा में कोई सहारा नहीं था। वे मात्र ईश्वर पर आश्रित थे। प्रभु येसु ने इसी भावना को नया अर्थ और परिभाषा दी है।

आइये आज इस यूख्रीस्तीय समारोह में भाग लेकर अपने जीवन में इसे अमल मे करने का दृढ़ निश्चय लें। एक बार अलेक्जेन्डर महान ने दरबार में कहा, “भिखारी के लिए तांबे का सिक्का उसकी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए पर्याप्त है, अपितु सोने का सिक्का अलेक्जेन्डर की उदारता का प्रतीक है”। अर्थात् हमें मनुष्य के रंग रूप को देखकर उसकी सहायता नहीं करनी चाहिए वरन् इसलिए उसकी सहायाता करनी चाहिए कि वह ईश्वर का प्रतिरूप है।


-Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 05 नवंबर, 2021

 

शुक्रवार, 05 नवंबर, 2021

वर्ष का इकत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 15:14-21


14) भाइयो! मुझे दृढ़ विश्वास है कि आप लोग सद्भाव और हर प्रकार के ज्ञान से परिपूर्ण हो कर एक दूसरे को सत्परामर्श देने योग्य हैं।

15 (15-16) फिर भी कुछ बातों का स्मरण दिलाने के लिए मैंने आप को निस्संकोच हो कर लिखा है; क्योंकि ईश्वर ने मुझे गै़र-यहूदियों के बीच ईसा मसीह का सेवक तथा ईश्वर के सुसमाचार का पुरोहित होने का वरदान दिया है, जिससे ग़ैर-यहूदी, पवित्र आत्मा द्वारा पवित्र किये जाने के बाद, ईश्वर को अर्पित और सुग्राह्य हो जायें।

17) इसलिए मैं ईसा मसीह द्वारा ईश्वर की सेवा पर गौरव कर सकता हूँ।

18) मैं केवल उन बातों की चर्चा करने का साहस करूँगा, जिन्हें मसीह ने गैर-यहूदियों को विश्वास के अधीन करने के लिए मेरे द्वारा वचन और कर्म से,

19) शक्तिशाली चिन्हों और चमत्कारों से और आत्मा के सामर्थ्य से सम्पन्न किया है। मैंने येरुसालेम और उसके आसपास के प्रदेश से लेकर इल्लुरिकुम तक मसीह के सुसमाचार का कार्य पूरा किया है।

20) इस में मैंने एक बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा। मैंने कभी वहाँ सुसमाचार का प्रचार नहीं किया, जहाँ मसीह का नाम सुनाया जा चुका था; क्योंकि मैं दूसरों द्वारा डाली हुई नींव पर निर्माण करना नहीं चाहता था,

21) बल्कि धर्मग्रन्थ का यह कथन पूरा करना चाहता था-जिन्हें कभी उसका सन्देश नहीं मिला था, वे उसके दर्शन करेंगे और जिन्होंने कभी उसके विषय में नहीं सुना, वे समझेंगे।


सुसमाचार : सन्त लूकस 16:1-8


1) ईसा ने अपने शिष्यों से यह भी कहा, ’’किसी धनवान् का एक कारिन्दा था। लोगों ने उसके पास जा कर कारिन्दा पर यह दोष लगाया कि वह आपकी सम्पत्ति उड़ा रहा है।

2) इस पर स्वामी ने उसे बुला कर कहा, ‘यह मैं तुम्हारे विषय में क्या सुन रहा हूँ? अपनी कारिन्दगरी का हिसाब दो, क्योंकि तुम अब से कारिन्दा नहीं रह सकते।’

3) तब कारिन्दा ने मन-ही-मन यह कहा, ‘मै क्या करूँ? मेरा स्वामी मुझे कारिन्दगरी से हटा रहा है। मिट्टी खोदने का मुझ में बल नहीं; भीख माँगने में मुझे लज्जा आती है।

4) हाँ, अब समझ में आया कि मुझे क्या करना चाहिए, जिससे कारिन्दगरी से हटाये जाने के बाद लोग अपने घरों में मेरा स्वागत करें।’

5) उसने अपने मालिक के कर्ज़दारों को एक-एक कर बुला कर पहले से कहा, ’तुम पर मेरे स्वामी का कितना ऋण है?’

6) उसने उत्तर दिया, ‘सौ मन तेल’। कारिन्दा ने कहा, ‘अपना रुक्का लो और बैठ कर जल्दी पचास लिख दो’।

7) फिर उसने दूसरे से पूछा, ‘तुम पर कितना ऋण है?’ उसने कहा, ‘सौ मन गेंहूँ। कारिन्दा ने उस से कहा, ‘अपना रुक्का लो और अस्सी लिख दो’।

8) स्वामी ने बेईमान कारिन्दा को इसलिए सराहा कि उसने चतुराई से काम किया; क्योंकि इस संसार की सन्तान आपसी लेन-देन में ज्योति की सन्तान से अधिक चतुर है।


मनन-चिंतन


”मूर्ख व्यक्ति हर किसी की बात पर विश्वास करता, किन्तु समझदार सोच-विचार कर आगे बढता है” (सूक्ति 14ः15)

आज का सुसमाचार यीशु द्वारा बताए गए उलझा और गलत समझे गए दृष्टांतों में से एक प्रस्तुत करता हैं । पहली नजर में यह समझना मुशकिल है कि यीशु बेईमान सेवक की प्रशंसा कैसे कर सकता हैं ? लेकिन दृष्टांत में गहराई से जाने से यह स्पष्ट है कि यीशु ने नौकर की प्रशंसा बेईमानी के लिए नही बल्कि उसकी दूरदशर््िाता के लिए की है ।

आज का सुसमाचार में पूर्वाभास के साथ आध्यात्मिक संकट पर विजय पाने का संदेश हैं। किसी ने एक बार कहा था“, ”अगर बुराई इतना गंभीर है कि उसमे सफलता का दृढसंकल्प है तो उसके बराबर अच्चाई में भी यह दृढसंकल्प होनी चाहिए“। यह सच हैं कि अपने सांससारिक जीवन में व्यवसाय, कैरियर, दोस्ती और कई अन्य चिंताए है लेकिन आध्यात्मिक जीवन की चिंता बहुत कम है । आज पूछा जाने वाला प्रश्न यह है कि यदि दुनिया के बच्चे अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अनैतिक तरीका और चीजो का उपयोग कर रहे है, तो हम ईश्वरीय कृपाओं के लिए अच्छे तरीकों का उपयोग क्यों नही करते ?

यह सच है कि आज इस दुनिया में आध्यात्मिक संकट है । इसलिए हमें चाहिए आध्यात्मिकता को पुनर्जीवित करने के लिए विश्वास की बहुत सारी रचनात्मक साझेदारी करें । विभिन्न प्रकार के कमिशन कार्य इस आशय की पूर्ति कर रहे है जैसेः जेल मिशन, बंजारो का देखभाल, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, सामाजिक विकास कार्यक्रम नैतिक शिक्षा बाइबिल मूल्यों के आधार पर लघु फिल्मो का निर्माण, अध्यात्मिक पुस्तकालय, संगीत साधना, बाइबिल के कुछ पात्रो के नाम पर हास्य चित्र आदि। विश्वास के रचनात्मक आदान प्रदान के प्रति हमारी दूरदर्शिता हमारे भविष्य सुरक्षित कर सकती है ।



REFLECTION


“The simple believe everything, but the clever consider their steps” Prov. 14:15. Today’s gospel presents one of the perplexed and misunderstood parables told by Jesus. At first sight it is confusing as to how Jesus could praise the dishonest servant. But going deeper into the parable it is very clear that Jesus did not praise the servant for his dishonesty but for his farsightedness.

Overcoming the spiritual crisis with foresightedness is the message of the gospel today. Someone once said “If evil is serious in its craft and determined to succeed the good should be equally determined to succeed”. It is true that we take lot of effort in our earthly life to succeed in business, career, friendship and many other concerns but not in spiritual life. The question to be asked today is if the children of the world are using everything including immoral ways to secure their future then children of God should use every god given talent and good ways to win God’s favour?

It is a fact that there is a spiritual crisis in this world today. Therefore we require lot of creative sharing of faith to revive the spirituality. There are various ministries that are catering to this effect. Prison Ministry, Pastoral care for the Nomads, Village Health ministry, Social Development Programme, Value Education Ministry, Producing short films based on Bible Values, Spiritual Library on wheels, Music Ministry, Cartoons on biblical characters etc. are to name few. May our farsightedness through creative sharing of faith secure our future in heaven.



मनन-चिंतन - 2


दुनिया में हम जीवित रहने के लिए, अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए, अपनी आय में सुधार करने और अपने जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। हम अपने लक्ष्यों तक जल्द से जल्द पहुंचने और अपनी इच्छानुसार सब कुछ प्राप्त करने के सही और गलत तरीके अपनाते हैं। लेकिन हम शायद ही कभी अपनी मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में सोचते हैं। मेरे मरने पर मेरा क्या होगा? येसु चाहते हैं कि हम इस विषय के बारे में सोचें और उसके अनुसार कार्य करें। आज के सुसमाचार में एक कारिन्दा है जो जब उसे पता चलता है कि वह अपनी नौकरी खो देगा, तो वह अपने लिए नयी व्यवस्था (हालांकि वे सांसारिक तरीके हैं) करना शुरू कर देता है यह सुनिश्चित करने के लिए कि जब वह नौकरी से बाहर निकाल दिया जायेगा, तो लोग अपने घरों में उसका स्वागत करें। प्रभु येसु चाहते हैं कि हम अनंत जीवन के बारे में सोचें। क्या मैंने अपने शाश्वत जीवन की सुरक्षा के बारे में सोचा है? क्या मैं किसी भी घटना के मुकाबला करने लिए तैयार हूँ?



REFLECTION


In the world we strive hard to survive, to extend our influence, to improve our income, and raise our living standards. We take right and wrong methods of reaching our goals as quickly as possible and of obtaining what we desire. But we seldom think about our life after death. What will happen to me when I die? Jesus wants us to think about this question and act accordingly. We have a steward in the Gospel who when he realises that he would lose his job, starts making arrangements (although they are worldly ways) to see that when he is out of the job, there will be some to welcome him into their homes. Jesus wants us to think about eternal life. Have I thought about the security of my eternal life? Am I prepared for any eventuality?


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 04 नवंबर, 2021

 

गुरुवार, 04 नवंबर, 2021

वर्ष का इकत्तीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ: रोमियों 14:7-12

7) कारण, हम में कोई न तो अपने लिए जीता है और न अपने लिए मरता है।

8) यदि हम जीते रहते हैं, तो प्रभु के लिए जीते हैं और यदि मरते हैं, तो प्रभु के लिए मरते हैं। इस प्रकार हम चाहे जीते रहें या मर जायें, हम प्रभु के ही हैं।

9) मसीह इसलिए मर गये और जी उठे कि वह मृतकों तथा जीवितों, दोनों के प्रभु हो जायें।

10) तो, आप क्यों अपने भाई का न्याय करते हैं? आप क्यों अपने भाई को तुच्छ समझते हैं? हम सब ईश्वर के न्यायासन के सामने खड़े होंगे,

11) क्योंकि धर्मग्रन्थ में लिखा है-प्रभु यह कहता है, अपनी अमरता की सौगन्ध! हर घुटना मेरे सामने झुकेगा और हर कण्ठ ईश्वर को स्वीकार करेगा।

12) इस से स्पष्ट है कि हम में हर एक को अपने-अपने कर्मों का लेखा ईश्वर को देना पड़ेगा।

सुसमाचार : सन्त लूकस 15:1-10

1) ईसा का उपदेश सुनने के लिए नाकेदार और पापी उनके पास आया करते थे।

2 फ़रीसी और शास्त्री यह कहते हुए भुनभुनाते थे, "यह मनुष्य पापियों का स्वागत करता है और उनके साथ खाता-पीता है"।

3) इस पर ईसा ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया,

4) "यदि तुम्हारे एक सौ भेड़ें हों और उन में एक भी भटक जाये, तो तुम लोगों में कौन ऐसा होगा, जो निन्यानबे भेड़ों को निर्जन प्रदेश में छोड़ कर न जाये और उस भटकी हुई को तब तक न खोजता रहे, जब तक वह उसे नहीं पाये?

5) पाने पर वह आनन्दित हो कर उसे अपने कन्धों पर रख लेता है

6) और घर आ कर अपने मित्रों और पड़ोसियों को बुलाता है और उन से कहता है, ’मेरे साथ आनन्द मनाओ, क्योंकि मैंने अपनी भटकी हुई भेड़़ को पा लिया है’।

7) मैं तुम से कहता हूँ, इसी प्रकार निन्यानबे धर्मियों की अपेक्षा, जिन्हें पश्चात्ताप की आवश्यकता नहीं है, एक पश्चात्तापी पापी के लिए स्वर्ग में अधिक आनन्द मनाया जायेगा।

8) "अथवा कौन ऐसी स्त्री होगी, जिसके पास दस सिक्के हों और उन में एक भी खो जाये, तो बत्ती जला कर और घर बुहार कर सावधानी से तब तक न खोजती रहे, जब तक वह उसे नहीं पाये?

9) पाने पर वह अपनी सखियों और पड़ोसिनों को बुला कर कहती है, ’मेरे साथ आनन्द मनाओ, क्योंकि मैंने जो सिक्का खोया था, उसे पा लिया है’।

10) मैं तुम से कहता हूँ, इसी प्रकार ईश्वर के दूत एक पश्चात्तापी पापी के लिए आनन्द मनाते हैं।"

मनन-चिंतन

खाेई हुई भेड और खोए हुए सिक्के के दृष्टांत के माध्यम से प्रभु येसु कमजोर वर्गो के प्रति हमारी जिम्मेदारिया को ईश्वरी प्रेम के तीन पहलुओ द्वारा याद दिलाता है। दोनो घटनाओ से यह अभिव्यक्त किया है कि ।

(1) प्रत्येक के लिए चिंताः- ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत रूप से चिंतित रहते है। खोई भेड और खोए हुए सिक्के के प्रति चिंता महिला और चरवाहे को अपना समय और ऊर्जा देकर खतरनाक जोखिम उठाने की प्रेरणा देते है।

(2) प्यार की तलाशः- चरवाहा भेड को अपने आप लौटने का इंतजार नहीं करता न ही महिला खोए हुए सिक्के ढूडने के लिए उचित समय की प्रतिक्षा करती है ।

चरवाहा तुरन्त बाहर निकल जाता है, और महिला सूरज की रोशनी की प्रतिक्षा न करके दीया जलाती है । उसी तरह जब हम ईश्वर की दृष्टि से ओझल हो जाते है उसी क्षण ईश्वर हमारे खोज में निकल जाते है ।

(3) आनंदित होनाः- चरवाहा और महिला दोनो भेड और सिक्के मिलने पर अपनी खुशी को दूसरों के साथ बाटते है । भेड और सिक्के के मिलने की खुशी एक उत्सव जैसे सभी लोगों के साथ मिलकर मनाया जाते है । यह उत्सव खोये लोगो

या चीजो को अपने ही समाज में एक सुखद अनुभव देते है ।

रासता भटकने में भेड को उसके घमंड और लापरवाही के लिए दोषी ठहराया जा सकता है लेकिन चरवाहा भेडों की रक्षा करने की जिम्मेदारी से किसी भी तरह से बच नहीं सकता । सिक्के के गायब होने के लिए पूरी तरह से महिला की लापरवाही ही जिम्मेदार है ।

दोनों दृष्टांत समाज के कमजोर वर्गो का तिरसकार करने नहीं बल्कि सभी को गले लगाकर एक अच्छंे ईसाई का व्यवहार प्रदर्शित करने का आमंत्रण देते है ।



REFLECTION

Through the parable of the lost sheep and the lost coin Jesus brings out three main facets of God’s Love and reminds us of the responsibility over the weaker sections.

1. Concern for the individual: God’s personal interest in each individual is expressed in both the parables. Individual concern for the lost sheep and the lost coin urges the shepherd and the women to take dangerous risk and spend time and energy to seek out the lost.

2. Seeking Love: The shepherd does not wait for the sheep to return by itself nor the women wait for the appropriate time to search for the lost coin. The shepherd steps out immediately and the women lights the lamp not waiting for the sunlight. God steps out the moment we go out of His sight.

3. Rejoicing Love: The shepherd and the women do not stop at the finding of sheep and the coin. They share their joy of their result through a celebration. The celebration is to make the lost ones comfortable in the group again.

The sheep may be blamed for its pride and carelessness in losing the way but the shepherd can in no way evade from his responsibility of protecting the sheep. The carelessness of the women is solely responsible for the missing of the coin.

Both the parables call for a responsible Christian behavior especially towards the weaker ones of the society. Not to despise anyone but to embrace everyone with love.


मनन-चिंतन - 2

संत लूकस के सुसमाचार के पंद्रहवें अध्याय में तीन दृष्टांत हैं - खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त, खोये हुए सिक्के का और उड़ाऊ पुत्र का। इन सभी दृष्टान्तों में जो कुछ खो गया था उसे पाने पर खुशी मनायी जाती है। प्रभु येसु कहते हैं, "मैं तुम से कहता हूँ, निन्यानबे धर्मियों की अपेक्षा, जिन्हें पश्चात्ताप की आवश्यकता नहीं है, एक पश्चात्तापी पापी के लिए स्वर्ग में अधिक आनन्द मनाया जायेगा।" मेल-मिलाप एक ऐसा सेवा-कार्य है जो स्वर्ग में बहुत खुशी लाता है। इससे पता चलता है कि प्रभु पापियों के पश्चाताप की कितनी इच्छा रखते हैं। ईश्वर को अपने बच्चों के पापमय जीवन से बहुत दुख होता है। येसु के दुनिया में आने का उद्देश्य खोए हुए लोगों की तलाश करना और उन्हें बचाना था। वे कहते हैं, "मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूँ” (लूकस 5:32)। यदि हम येसु से प्यार करते हैं, तो हमें पापियों को उनके पास वापस लाने के लिए उनको सहयोग देना होगा। संत याकूब कहते हैं, "मेरे भाइयो! यदि आप लोगों में कोई सच्चे मार्ग से भटके और कोई दूसरा उसे वापस ले आये, तो यह समझें कि जो किसी पापी को कुमार्ग से वापस ले आता है, वह उसकी आत्मा को मृत्यु से बचाता है और बहुत-से पाप ढाँक देता है।" (याकूब 5: 19-20)



REFLECTION

The fifteenth chapter of the Gospel of St. Luke has three parables – the parable of the lost sheep, that of the lost coin and that of the prodigal son. In all these parables there is great joy and celebration on finding what was lost. Jesus says, “I tell you, there will be more rejoicing in heaven over one sinner repenting than over ninety-nine upright people who have no need of repentance”. Reconciliation is a ministry which bring great joy to heaven. This shows how much the Lord desires the repentance of the sinful people. It pains God to find his children leading sinful life. The very purpose of Jesus’ coming into the world is to seek and save the lost. He says, “I have come to call not the righteous but sinners to repentance”. If we love Jesus, we need to join hands with him to bring the sinners back to him. St. James says, “My brethren, if any among you strays from the truth and one turns him back, let him know that he who turns a sinner from the error of his way will save his soul from death and will cover a multitude of sins.” (Jam 5:19-20)


 -Br Biniush Topno


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