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गुरुवार, 15 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 15 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :निर्गमन 3:13-20


13) मूसा ने झाड़ी में से प्रभु की वाणी सुन कर उस से कहा, ''जब मैं इस्राएलियों के पास पहुँच कर उन से यह कहॅूँगा - तुम्हारें पूर्वजों के ईश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, और वे मुझ से पूछेंगे कि उसका नाम क्या है, तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?''

14) ईश्वर ने मूसा से कहा, ''मेरा नाम सत् है। उसने फिर कहा, ''तुम इस्राएलियों को यह उत्तर दोगे जिसका नाम "सत्" है, उसी ने मुझे भेजा है।''

15) इसके बाद ईश्वर मूसा से कहा, ''तुम इस्राएलियों से यह कहोगे - प्रभु तुम्हारे पूर्वजों के ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब के ईश्वर ने मुझे तुम लोगों के पास भेजा है। यह सदा के लिए मेरा नाम रहेगा और यही नाम ले कर सब पीढ़ियॉँ मुझ से प्रार्थना करेंगी।

16) अब जा कर इस्राएल के नेताओं को एकत्र करो और उन से यह कहो, "प्रभु तुम्हारे पूर्वजों का ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक और याकूब का ईश्वर, मुझे दिखाई दिया और उसने मुझ से कहा - मैंने तुम लोगों की सुध ली है और मैं जानता हॅूँ कि मिस्र देश में तुम पर क्या बीत रही है।

17) मैंने यह निर्णय किया है : मैं तुम्हें मिस्र की दीनता से निकाल कर कनानियों, हित्तियों, अमोरियों, परिज्जियों, हिव्वियों और यबूसियों के देश ले जाऊँगा। जहाँ दूध और मधु की नदियाँ बहती हैं।

18) ''वे तुम्हारी बात मानेंगे और तुम इस्राएल के नेताओं के साथ मिस्र के राजा के पास जाओगे और उस से यह कहोगे, "प्रभु इब्रानियों का ईश्वर, हमें दिखाई दिया। हमें मरुभूमि में तीन दिन की यात्रा करने दीजिए, जिससे हम अपने प्रभु-ईश्वर को बलि चढ़ायें।"

19) मैं जानता हॅूँ कि जब तक मिस्र के राजा को विवश नहीं किया जायेगा, वह तुम लोगों को नहीं जाने देगा।

20) इसलिए मैं अपना भुजबल प्रदर्शित करूँगा और विविध चमत्कार दिखाकर मिस्रियों को सन्तप्त करूँगा। इसके बाद वह तुम लोगों को जाने देगा।


सुसमाचार : मत्ती 11:28-30


28) ’’थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगो! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।

29) मेरा जूआ अपने ऊपर ले लो और मुझ से सीखो। मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूँ। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शान्ति पाओगे,

30) क्योंकि मेरा जूआ सहज है और मेरा बोझ हल्का।’’


📚 मनन-चिंतन


निर्गमन ग्रन्थ के आरम्भ में हम देखते हैं कि इस्राएलियों की दासता के समय मिस्री लोग उन पर बहुत अत्याचार करते थे, वे युसूफ द्वारा किये गये उपकारों को भूल गये थे. लोगों की आह भरी पुकार ईश्वर तक पहुँची और ईश्वर ने उनकी सुधि ली. उसके बाद भी हम देखते हैं कि जब-जब लोगों पर विपत्ति या संकट आया, तब-तब ईश्वर द्रवित हुआ और उनके दुःख-दर्द मिटाए. यही है ईश्वर का वास्तविक रूप, वह करुणामय ईश्वर है. और इसीलिए प्रभु येसु आज के सुसमाचार में पूरी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सान्त्वना भरे शब्द कहते है, “ थके-मांदे और बोझ से दबे हुए लोगों, तुम सब के सब मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूंगा.” शायद ये शब्द पूरे नए व्यवस्थान में सबसे अधिक बार दुहराए जाने वाले शब्द हैं. प्रभु येसु का यह निमंत्रण बिना किसी भेद-भाव के सभी के लिए खुला निमंत्रण है.

इस दुनिया की भाग-दौड़ में हम इतने थककर चकना-चूर हो जाते हैं कि हमें खुद नहीं पता चलता. इतनी सारी चिंताएं हमें घेर लेती हैं कि चरों तरफ कोई आशा की किरण दिखाई नहीं देती. प्रभु येसु हमें सान्त्वना देते हैं और विश्राम देने का वादा करते हैं. वे कहते हैं कि तुम मेरा जुआ अपने ऊपर ले लो. शायद अगर आपने जुआ देखा होगा तो आप जानते होंगे कि उसमें दो बैल एक साथ जोते जाते हैं. दोनों बैलों को एक साथ चलना पड़ता है, कोई टेड़ा-सीधा नहीं चल सकता, कोई तेज़ या अधिक धीमे नहीं चल सकता है, कोई अकेला नहीं चल सकता, दोनों को एक जैसी चाल में, एक साथ चलना पड़ता है. उसी तरह से हमारी जीवन रुपी गाड़ी के जुए में एक तरफ प्रभु येसु को लेना है, और दूसरी तरफ हमें चलना है. हम अकेले इस जुए को नहीं ढो सकते, ईश्वर के बिना जीवन रुपी यह गाड़ी सफलता पूर्वक आगे नहीं बढ़ेगी, पहिये फँस जायेंगे और हम खींचते-खींचते थक जायेंगे. आईये हम अपने जीवन का नियंत्रण ईश्वर को दे दें और उसकी शरण में आकर विश्राम कर लें. आमेन.



📚 REFLECTION



In the very beginning of the book of Exodus we see the misery of the Israelites, the unjust exploitation by the Egyptian who had forgotten the good works done by Joseph. The painful cry of the Israelites reaches to the ears of God and He remembers them. Even later on we see in their lives, that whenever they faced difficulties and persecutions, God felt compassionate towards them and came to their aid. This is the real nature of God, He is compassionate God. Perhaps it is this compassion of God that makes Jesus to utter the most consoling words in the human history, “Come to me all you that are weary and carrying heavy burdens, and I will give you rest.” These are perhaps most quoted words of Jesus in the New Testament. This is an open invitation of Jesus to whole humanity, without any reservations.

We are so busy in rat race of daily life that we forget that we are heavily laden with so many burdens. So many worries surround us that sometimes no hope is seen anywhere. Jesus gives us consolation and assures us to give rest to our weary souls. He calls us to take His yoke. If you have seen a yoke, it has two sides and we need one each ox for each side. Both oxen have to move together with same momentum, one cannot go faster than the other or slower than the other. Yoke cannot be carried by a single ox alone. Same is the case of the yoke of our life. We alone cannot carry it, we need God the other side. We may not be able to pull this life alone without God, we may get tired and exhausted. Let us allow God to take control of our life and rest under the shade of His wings. Amen.


✍ -Fr. Johnson B


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बुधवार, 14 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 14 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ :निर्गमन 3:1-6, 9-12


1) मूसा अपने ससुर, मिदयान के याजक, यित्रों की भेडें चराया करता था। वह उन्हें बहुत दूर तक उजाड़ प्रदेश में ले जा कर ईश्वर के पर्वत होरेब के पास पहुँचा।

2) वहाँ उसे झाड़ी के बीच में से निकलती हुई आग की लपट के रूप में प्रभु का दूत दिखाई दिया। उसने देखा कि झाड़ी में तो आग लगी है, किन्तु वह भस्म नहीं हो रही है।

3) मूसा ने मन में कहा कि यह अनोखी बात निकट से देखने जाऊँगा और यह पता लगाऊँगा कि झाड़ी भस्म क्यों नहीं हो रही है।

4) निरीक्षण करने के लिए उसे निकट आते देख कर ईश्वर ने झाड़ी के बीच में से पुकार कर उससे कहा, ''मूसा! मूसा!'' उसने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।''

5) ईश्वर ने कहा, ''पास मत आओ। पैरों से जूते उतार दो, क्योंकि तुम जहाँ खड़े हो, वह पवित्र भूमि है।''

6) ईश्वर ने फिर उस से कहा, ''मैं तुम्हारे पिता का ईश्वर हूँ, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब का ईश्वर।'' इस पर मूसा ने अपना मुख ढक लिया; कहीं ऐसा न हो कि वह ईश्वर को देख ले।

9) मैंने इस्राएलियों की पुकार सुनी और उन पर मिस्रियों का अत्याचार देखा, इसलिए मैं तुम्हें फिराउन के पास भेजता हूँ।

10) तुम मेरी प्रजा इस्राएल को मिस्र देश से बाहर निकाल लाओ।

11) मूसा ने ईश्वर से कहा, ''मैं कौन हूँ जो फिराउन के पास जाऊॅँ और इस्राएलियों को मिस्र देश से बाहर निकाल ले जाऊॅँ?

12) ईश्वर ने उत्तर दिया, ''मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। मैंने तुम को भेजा है, तुम्हारे लिए इसका प्रमाण यह होगा कि जब तुम इस्राएल को मिस्र से निकाल लाओगें, तो तुम लोग इस पर्वत पर प्रभु की आराधना करोगें।''


सुसमाचार : मत्ती 11:25-27


25) उस समय ईसा ने कहा, ’’पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ; क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है।

26) हाँ, पिता! यही तुझे अच्छा लगा।

27) मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर कोई भी पुत्र को नहीं जानता। इसी तरह पिता को कोई भी नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है और वही, जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे।



📚 मनन-चिंतन


ईश्वर हमारा ह्रदय देखते हैं और खुद को हम पर प्रकट करते हैं. आज के पहले पाठ में हम नबी मूसा को देखते हैं, जिन पर ईश्वर खुद को प्रकट करते हैं एक जलती हुई झाड़ी के रूप में. नबी मूसा ईश्वर द्वारा चुने जाने से पूर्व एक साधारण मनुष्य थे, वह ठीक से बोल भी नहीं पाते थे, लेकिन ईश्वर उनको चुनते हैं और खुद को प्रकट करते हैं, अपना सामर्थ्य प्रकट करते हैं. कई बार हम मामूली इन्सान होने के बावज़ूद, हमारी बिना किसी योग्यता के ईश्वर हम पर स्वयं अपनी कृपा प्रकट करते हैं. और इसलिए प्रभु येसु आज के सुसमाचार में पिता ईश्वर की आराधना करते और उन्हें धन्यवाद देते हैं, क्योंकि वे अपने महान रहस्य हम निरे बच्चों पर प्रकट करते हैं. हम जानते हैं कि प्राचीन काल से ही ईश्वर ने विभिन्न नबियों द्वारा और महान कार्यों द्वारा अपने आप को हम पर प्रकट किया, लेकिन अब उसने अपने पुत्र के द्वारा स्वयं को प्रकट किया है (इब्रानियों 1:1-2).

किसी ने पिता ईश्वर को नहीं देखा है सिवाय उसके पुत्र हमारे प्रभु येसु ने. प्रभु येसु हमें बताते हैं कि पुत्र को छोड़कर कोई भी पिता को नहीं जानता. हम जानते हैं कि पुराने व्यवस्थान में जिस तरह से ईश्वर अपने आप को प्रकट किया उसी तरह से लोगों ने उनकी छवि बनाई. और कई बार वह छवि सटीक नहीं थी, उसमें कुछ खामियाँ थीं. लेकिन नये व्यवस्थान में प्रभु येसु पिता ईश्वर का वास्तविक चेहरा बनते हैं, और स्वर्ग और पिता ईश्वर के रहस्यों को हम पर प्रकट करते हैं. जितना हम प्रभु येसु को जानेंगे और समझेंगे उतना ही हम पिता ईश्वर को जानेंगे, क्योकि स्वयं प्रभु येसु ने कहा है, “जिसने मुझे देखा है, उसने पिता को भी देखा है" (योहन 14:9). और हम प्रभु येसु से होकर गये बिना पिता ईश्वर के पास नहीं आ सकते (योहन 14:6). आईये हम अपने जीवन में प्रभु येसु को और अधिक गहराई से जानने का प्रयास करें. आमेन.



📚 REFLECTION


God looks the disposition of our heart and accordingly reveals himself to us. The first reading today, describes about Moses to whom He revealed himself in the form of a burning bush which could consume itself. Moses was a very simple man before being chosen by God, in fact he could not even speak properly, but God chose him and revealed Himself and His glory to him. Very in spite of our nothingness and nothingness, God chooses to reveal Himself to us. That is why Jesus praises and adores the Heavenly Father for revealing Himself and the great mysteries to such simple children. We know that from very old times God spoke to us through various prophets and messengers, but now He has spoken to us through His son (cf Heb 1:1-2), He revealed Himself to us through His only son.

No one has seen the Father except the Son, our Lord Jesus Christ. Jesus tells us that no one knows the Father, except the Son. We know about the ways in which God revealed Himself to the people in the Old Testament Times, and people formed an image of God according to their understanding of that revelation. This image could not be fully correct, it was limited. But in the New Testament times, Jesus becomes the real face of God, He reveals the real image and the mysteries of the Father. The more we will try to understand and know Jesus, the more we will know the Father, because anyone who has seen Jesus, also has seen the Father (cf John 14:9). We cannot go to the Father except through Jesus (cf John 14:6). Let us ask the Lord for the grace to know Him more and more deeply. Amen.


✍ -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, 13 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 13 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :निर्गमन 2:1-15a



1) लेवी वंश के एक व्यक्ति ने एक लेवी वंशी कन्या से विवाह किया।

2) उसकी पत्नी गर्भवती हुई और उसको एक पुत्र उत्पन्ना हुआ। माता ने यह देख कर कि बच्चा सुन्दर है, उसे तीन महीनों तक छिपाये रखा।

3) जब वह उसे और अधिक समय तक छिपा कर नहीं रख सकी, तो उसने बेंत की एक टोकरी ले ली और उस पर चिकनी मिट्टी और डामर का लेप लगाया। उसने उस में बालक को रख कर उसे नील नदी के तट के सरकण्डों के बीच छोड़ दिया।

4) बालक की बहन कुछ दूरी पर यह देखने के लिए खड़ी रहा करती कि उस पर क्या बीतेगी।

5) फिराउन की पुत्री नील नदी में स्नान करने आयी। इस बीच उसकी सखियाँ नदी किनारे घूमती रहीं। उसने सरकण्डों के बीच उस टोकरी को देखा और अपनी दासी को उसे ले आने को भेजा।

6) उसने उसे खोल कर देखा कि उस में एक रोता हुआ बालक पड़ा है। उसे तरस आया और उसने कहा, यह इब्रानियों का कोई बालक होगा।

7) बालक की बहन ने फिराउन की पुत्री के पास आ कर पूछा, क्या मैं इब्रानी स्त्रियों में से किसी दाई को बुला लाऊँ, जो आपके लिए इस बालक को दूध पिलाया करे?

8) फिराउन की पुत्री ने उत्तर दिया, हाँ, यही करो। लड़की बालक की माता को बुला लायी।

9) फिराउन की पुत्री ने उस से कहा, इस बालक को ले जा कर मेरे लिए दूध पिलाओ। मैं तुम को वेतन दिया करूँगी। वह स्त्री बालक को ले गयी और उसने उसे दूध पिलाया।

10) जब बालक बड़ा हो गया, तो वह उसे फिराउन की पुत्री के पास ले गयी। इसने उसे गोद लिया और यह कहते हुए उसका नाम मूसा रखा कि ''मैंने इसे पानी में से निकाला।''

11) जब मूसा सयाना हो गया, तो वह किसी दिन अपने जाति-भाइयों से मिलने निकला। उसने उन्हें बेगार करते देखा और यह भी देखा कि एक मिस्री उसके एक इब्रानी भाई को पीट रहा है।

12) मूसा ने इधर-उधर दृष्टि दौड़ायी और जब उसे पता चला कि वहाँ कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हैं, तो उसने मिस्री को मार कर बालू में छिपा दिया।

13) वह दूसरे दिन फिर निकला और उसने दो इब्रानियों को लड़तें देखा। उसने अन्याय करने वाले से कहा, ''तुम अपने भाई को क्यों पीटते हो?''

14) उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, ''किसने तुम को हमारा शासक और न्यायकर्ता नियुक्त किया है? क्या तुम मुझ को भी मार डालना चाहते हो, जैसे कि तुमने उस मिस्री को मारा?'' मूसा यह सोच कर डर गया कि यह बात फैल गयी है।

15) फिराउन को भी इसका पता चला और उसने मूसा को मार डालना चाहा। मूसा फिराउन के अधिकार क्षेत्र से भाग निकला और मिदयान देश में बसने गया और वहाँ एक कुएँ के पास बैठ कर विश्राम करने लगा।



सुसमाचार : मत्ती 11:20-24



20) तब ईसा उन नगरों को धिक्कारने लगे, जिन्होंने उनके अधिकांश चमत्कार देख कर भी पश्चाताप नहीं किया था,

21) ’’धिक्कार तुझे, खोंराजि़न! धिक्कार तुझे, बेथसाइदा! जो चमत्कार तुम में किये गये हैं, यदि वे तीरूस और सिदोन में किये गये होते, तो उन्होंने न जाने कब से टाट ओढ़ कर और भस्म रमा कर पश्चाताप किया होता।

22) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, न्याय के दिन तेरी दशा की अपेक्षा तीरूस और सिदोन की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।

23) ’’और तू, कफ़रनाहूम! क्या तू स्वर्ग तक ऊँचा उठाया जायेगा? नहीं! तू अधोलोक तक नीचे गिरा दिया जायेगा; क्योंकि जो चमत्कार तुझ में किये गये हैं, यदि वे सोदोम में किये गये होते, तो वह आज तक बना रहता।

24) इसलिए मैं तुझ से कहता हूँ, न्याय के दिन तेरी दशा की अपेक्षा सोदोम की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।’’


📚 मनन-चिंतन


ईश्वर के आह्वान के प्रति उदासीन बने रहने से बड़ा कोई अपराध नहीं है. अगर ईश्वर हमें प्यार करते हैं तो बदले में हमें भी प्यार करना है, अगर ईश्वर हमसे मेल मिलाप करने के लिए कदम बढ़ाते हैं तो हमें भी अपने पापों को त्यागकर ईश्वर की कदम बढ़ाने हैं. आज के सुसमाचार में हम ऐसे नगरों को देखते हैं जो ईश्वर के प्रति न केवल उदासीन बने रहे बल्कि अपने पापों को भी नहीं त्यागा. ईश्वर ने उनके बीच खूब चिन्ह और चमत्कार दिखाए, जिसे देखकर उन्हें अपने पापों का अहसास होना था, ईश्वर की प्रभुता का अहसास होना था, लेकिन वे अपने पापों में ही मगन रहे. ऐसा कौन इन्सान या नगर है जिसे अपने पापों का हिसाब नहीं देना होगा? सभी पापी हैं, और ईश्वर हमें मौके पे मौका देते हैं कि हम अपने पापों के लिए पश्चाताप करें और दण्ड से बच जाएँ, जो इस पर ध्यान देते हैं वो बच भी जाते हैं.

ईश शास्त्र के अनुसार विश्वास की परिभाषा है - ईश्वर के कार्यों के प्रति हमारा प्रत्युत्तर. ईश्वर विभिन्न रूप में हमारे जीवन में चिन्ह और चमत्कार दिखाता है, और हम उन चिन्हों और चमत्कारों के प्रति क्या नजरिया रखते वही हमारे विश्वास का मापदण्ड है. कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके जीवन में ईश्वर अपनी उपस्थिति का आभास नहीं कराते. बहुत से लोग ईश्वर की उस उपस्थिति का अहसास कर अपने जीवन को बदल लेते हैं, और बहुत से लोग ईश्वर की उस उपस्थिति के प्रति अपना ह्रदय बन्द कर लेते हैं और पाप के रास्ते पर चलते रहते हैं. प्रभु येसु के द्वारा उन नगरों के लिए कहे गये धिक्कार भरे ये शब्द कहीं मेरे जीवन में भी लागू नहीं होते? आमेन.



📚 REFLECTION



There is no greater spiritual offence than to remain neutral or lukewarm to the intervention of God. If God loves us, then we also must love Him in return, If He takes a one step towards us to reconcile us to Himself, then we need to take more steps towards Him, leaving our sins behind and coming back to Him. In the gospel today we seen some cities which not only remained unresponsive to God’s call for repentance but also did not give up their sinful ways. God intervened in their lives by various mighty deeds, which were supposed to arouse them to repentance, supposed to arouse the fear of the Lord, but they happily remained in their sins. Who is there in this world who is not accountable for their sins before God? All have sinned and God time and again God gives us opportunity to repent for our sins and thus save ourselves from the wrath of the judgement day, and those who pay heed to this, save their souls.

According to theology, the faith is defined as our response towards God’s intervention in and around our lives. God intervenes in our lives through various events and persons, He shows signs and miracles and our response to those interventions of God decides our depth of faith. There is no one in this world in whose life God doesn’t show His presence. Many people respond positively to that divine presence and change their lives, and there are many who turn a deaf ear to the divine inspiration, they shut their hearts and continue to tread on the path of sin. Do the condemning words uttered by Jesus for the unrepentant cities, apply to my life as well? Let us ask ourselves. Amen.


✍ -Fr. Johnson B


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सोमवार, 12 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 12 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य सप्ताह




पहला पाठ :निर्गमन 1:8-14, 22


8) मिस्र देश में एक नये राजा का उदय हुआ, जो यूसुफ़ के विषय में कुछ नहीं जानता था।

9) उसने अपनी प्रजा से कहा, सुनो ये इस्राएली संख्या और शक्ति में हम से अधिक हो गये हैं।

10) हमें ऐसा उपाय सोच निकालना चाहिए, जिससे उनकी संख्या न बढ़ने पाये। कहीं ऐसा न हो कि युद्व छिड़ने पर ये हमारे शत्रुओं का साथ दें और हमारे विरुद्ध लड़ने के बाद देश से निकल भागें।

11) उन्होंने इस्राएलियों पर ऐसे अधिकारियों को नियुक्त किया, जो उन्हें बेगार में लगा कर उनका दमन करें। इस्राएलियों ने इस प्रकार फिराउन के लिए पितोम और रामसेस नामक गोदाम वाले नगर बनाये।

12) किन्तु उन पर जितना अधिक अत्याचार किया जाता था, उतना ही अधिक वे संख्या में बढ़ते और फैलते जाते थे। इस करण मिस्री उन से डरने लगे।

13) उन्होंने इस्राएलियों को बेगार में लगाया।

14) और उन से कठोर परिश्रम करा कर उनका जीवन कड़वा बना दिया। उन्होंने गारा और ईट बनाने और खेत में हर प्रकार का काम करने के लिए उन्हें बाध्य किया।

22) इसके बाद फिराउन ने अपनी समस्त प्रजा को यह आदेश दिया कि वह प्रत्येक नवजात इब्रानी लड़के को नील नदी में फेंक दे, किन्तु सब लड़कियों को जीवित रहने दे।



सुसमाचार : मत्ती 10:34-11:1


34) ’’यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर शांति लेकर आया हूँ। मैं शान्ति नहीं, बल्कि तलवार लेकर आया हूँ।

35) मैं पुत्र और पिता में, पुत्री और माता में, बहू और सास में फूट डालने आया हूँ।

36) मनुष्य के घर वाले ही उसके शत्रु बन जायेंगे।

37) जो अपने पिता या अपनी माता को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं है। जो अपने पुत्र या अपनी पुत्री को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं।

38) जो अपना क्रूस उठा कर मेरा अनुसरण नहीं करता, वह मेरे योग्य नहीं।

39) जिसने अपना जीवन सुरक्षित रखा है, वह उसे खो देगा और जिसने मेरे कारण अपना जीवन खो दिया है, वह उसे सुरक्षित रख सकेगा।

40) ’’जो तुम्हारा स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है वह उसका स्वागत करता है, जिसने मुझे भेजा है।

41) जो नबी का इसलिए स्वागत करता है कि वह नबी है, वह नबी का पुरस्कार पायेगा और जो धर्मी का इसलिए स्वागत करता है कि वह धर्मी है, वह धर्मी का पुरस्कार पायेगा।

42) ’’जो इन छोटों में से किसी को एक प्याला ठंडा पानी भी इसलिए पिलायेगा कि वह मेरा शिष्य है, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि वह अपने पुरस्कार से वंचित नहीं रहेगा।

1) अपने बारह शिष्यों को ये उपदेश देने के बाद ईसा यहूदियों के नगरों में शिक्षा देने और सुसमाचार का प्रचार करने वहाँ से चल दिये।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु आज हमसे कहते हैं, ‘जिसने अपना जीवन सुरक्षित रखा है वह उसे खो देगा और जिसने मेरे कारण अपना जीवन खो दिया है, वह उसे सुरक्षित रख सकेगा.” मनुष्य के जीवन की क्या कीमत है? क्या कोई ऐसी बस्तु या धन-दौलत है जिसके बदल में हम एक इन्सान के लिए जीवन खरीद सकते हैं? जीवन के वास्तविक मूल्य की झलक हमें कुछ दिन पहले कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान दिखी. जब लोग सांसों के लिए तड़प रहे थे, जब इलाज के लिए मारे-मारे फिर रहे थे, अपने जीवन के एक-एक पल के लिए लाखों रूपये लुटाने के लिए तैयार थे, चाहे कोई उनका सब कुछ ले ले लेकिन उनकी जान बचा ले. आपने जीवन की असली कीमत का एहसास हमें इस विपत्ति ने करा दिया, जीवन अनमोल है, अमूल्य है.

अगर हमारे जीवन की कोई भी कीमत नहीं लगा जा सकती तो सोचिये यह अमूल्य जीवन ईश्वर ने हमें मुफ्त में दिया है. क्या उसने हमसे हमारी सांसों के लिए कोई कीमत ली है? क्या हम अपने जीवन के बदले ईश्वर को कुछ दे सकते हैं? क्या हम अपनी खुद की ही कीमत चुका सकते हैं? स्तोत्रकार हमें समझाता है, “मनुष्य न तो अपने भाई का उद्धार कर सकता और न उसके जीवन का मूल्य ईश्वर को दे सकता है. प्राणों का मूल्य इतना ऊँचा है कि किसी के पास पर्याप्त धन नहीं है. (स्तोत्र-ग्रन्थ 49:8-9). क्या हमारा यह फ़र्ज़ नहीं बनता कि हम मुफ्त में मिले अपने इस अमूल्य जीवन के कुछ पल ईश्वर को दे दें. उसके साथ प्रार्थना में बिताएं, या उसके वचन को, उसके प्रेम को दूसरों तक ले जाने में बिताएं? अगर हम इस जीवन में ईश्वर से अन्जान बने रहेंगे तो ज़रूर प्रभु येसु भी अपने पिता के समक्ष हमें नकार देंगे, और हमारे लिए उससे बुरा कुछ नहीं हो सकता.



📚 REFLECTION



Today Jesus tells us, “Those who find their life, ill loose it, and those who loose their life for my sake will find it (Matthew 10:39). What is the price of human life? Is there any money or wealth that we can pay for buying life? We could see a glimpse of the real price of one’s life during the second wave of the ongoing pandemic. When people were gasping for breath, when we were running from one place to another for treatment, we were ready to pay lakhs of rupees for each moment of our life, we were ready to pay any price for saving our life. This situation has made us to realise the real worth of one’s life, it is priceless, no price is sufficient to buy life.

If this life is priceless, imagine how generous God must be to give us such a precious gift freely. Has He charged us any price for our breaths? Can we pay God something in return of our life? The psalmist says, “Truly no ransom avails for one’s life, there is no price one can give to God for it. For the ransom of life is costly, and can never suffice (Psalm 49:7-8). Don’t we feel obliged to give few moments from this freely received gift to God? Can we not spend few moments with Him in prayer, or in spreading His love to others? If we ignore God in this life then certainly Jesus also will ignore us before His Father in heaven, and there can nothing worse hen being disowned by the creator himself.



✍ -Fr. Johnson B


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Mass Readings for Sunday, 11 July 2021

Mass ReadingDaily Mass Readings for Sunday, 11 July 2021

Daily Mass Readings for Sunday, 11 July 2021



First Reading: Amos 7: 12-15

12 And Amasias said to Amos: Thou seer, go, flee away into the land of Juda: and eat bread there, and prophesy there.


c13t prophesy not again any more in Bethel: because it is the king’s sanctuary, and it is the house of the kingdom.

14 And Amos answered and said to Amasias: I am not a prophet, nor am I the son of a prophet: but I am a herdsman plucking wild figs.

15 And the Lord took me when I followed the flock, and the Lord said to me: Go, prophesy to my people Israel.

Responsorial Psalm: Psalms 85: 9-10, 11-12, 13-14

R. (8) Lord, let us see your kindness, and grant us your salvation.

9 I will hear what the Lord God will speak in me: for he will speak peace unto his people: And unto his saints: and unto them that are converted to the heart.

10 Surely his salvation is near to them that fear him: that glory may dwell in our land.

R. Lord, let us see your kindness, and grant us your salvation.

11 Mercy and truth have met each other: justice and peace have kissed.

12 Truth is sprung out of the earth: and justice hath looked down from heaven.

R. Lord, let us see your kindness, and grant us your salvation.

13 For the Lord will give goodness: and our earth shall yield her fruit.

14 Justice shall walk before him: and shall set his steps in the way.

R. Lord, let us see your kindness, and grant us your salvation.

Second Reading: Ephesians 1: 3-14

3 Blessed be the God and Father of our Lord Jesus Christ, who hath blessed us with spiritual blessings in heavenly places, in Christ:

4 As he chose us in him before the foundation of the world, that we should be holy and unspotted in his sight in charity.

5 Who hath predestinated us unto the adoption of children through Jesus Christ unto himself: according to the purpose of his will:

6 Unto the praise of the glory of his grace, in which he hath graced us in his beloved son.

7 In whom we have redemption through his blood, the remission of sins, according to the riches of his grace,

8 Which hath superabounded in us in all wisdom and prudence,

9 That he might make known unto us the mystery of his will, according to his good pleasure, which he hath purposed in him,

10 In the dispensation of the fulness of times, to re-establish all things in Christ, that are in heaven and on earth, in him.

11 In whom we also are called by lot, being predestinated according to the purpose of him who worketh all things according to the counsel of his will.

12 That we may be unto the praise of his glory, we who before hoped Christ:

13 In whom you also, after you had heard the word of truth, (the gospel of your salvation;) in whom also believing, you were signed with the holy Spirit of promise,

14 Who is the pledge of our inheritance, unto the redemption of acquisition, unto the praise of his glory.

Alleluia: Ephesians 1: 17-18

R. Alleluia, alleluia.

17-18 May the Father of our Lord Jesus Christ enlighten the eyes of our hearts, that we may know what is the hope that belongs to our call.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 6: 7-13

7 And he called the twelve; and began to send them two and two, and gave them power over unclean spirits.

8 And he commanded them that they should take nothing for the way, but a staff only: no scrip, no bread, nor money in their purse,

9 But to be shod with sandals, and that they should not put on two coats.

10 And he said to them: Wheresoever you shall enter into an house, there abide till you depart from that place.

11 And whosoever shall not receive you, nor hear you; going forth from thence, shake off the dust from your feet for a testimony to them.

12 And going forth they preached that men should do penance:

13 And they cast out many devils, and anointed with oil many that were sick, and healed them.

🙏Praise the lord


आज का पवित्र वचन इतवार, 11 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 11 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य इतवार



पहला पाठ : आमोस का ग्रन्थ 7:12-15



12) बेतेल के याजक अमस्या ने आमोस से कहा, ‘‘नबी! यहाँ से चले जाओ। यूदा के देश भाग जाओ। वहाँ भवियवाणी करते हुए अपनी जीविका चलाओ।

13) बेतेल में भवियवाणी करना बन्द करो; क्योंकि यह तो राजकीय पुण्य-स्थान है, यह राज मन्दिर है।’’

14) आमेास ने अमस्या को यह उत्तर दिया, ‘‘मैं न तो नबी था और न नबी की सन्तान। मैं चरवाहा था और गूलर के पेड़ छाँटने वाला।

15) मैं झुण्ड चरा ही रहा था कि प्रभु ने मुझे बुलाया मुझ से यह कहा, ‘जाओ! मेरी प्रजा इस्राएल के लिए भवियवाणी करो’।



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:3-14



3) धन्य है हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर और पिता! उसने मसीह द्वारा हम लोगों को स्वर्ग के हर प्रकार के आध्यात्मिक वरदान प्रदान किये हैं।

4) उसने संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हम को चुना, जिससे हम मसीह से संयुक्त हो कर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बनें।

5) उसने प्रेम से प्रेरित हो कर आदि में ही निर्धारित किया कि हम ईसा मसीह द्वारा उसके दत्तक पुत्र बनेंगे। इस प्रकार उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार

6) अपने अनुग्रह की महिमा प्रकट की है। वह अनुग्रह हमें उसके प्रिय पुत्र द्वारा मिला है,

7) जो अपने रक्त द्वारा हमें मुक्ति अर्थात् अपराधों की क्षमा दिलाते हैं। यह ईश्वर की अपार कृपा का परिणाम है,

8) जिसके द्वारा वह हमें प्रज्ञा तथा बुद्धि प्रदान करता रहता है।

9 (9-10) उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार निश्चय किया था कि वह समय पूरा हो जाने पर स्वर्ग तथा पृथ्वी में जो कुछ है, वह सब मसीह के अधीन कर एकता में बाँध देगा। उसने अपने संकल्प का यह रहस्य हम पर प्रकट किया है।

11 (11-12) ईश्वर सब बातों में अपने मन की योजना पूरी करता है। उसके अनुसार उसने निर्धारित किया है कि हम (यहूदी) मसीह द्वारा बुलाये जायें और हम लोगों के कारण उसकी महिमा की स्तुति हो। हम लोगों ने तो सब से पहले मसीह पर भरोसा रखा था।

13) आप लोगों ने भी सत्य का वचन, अपनी मुक्ति का सुसमाचार, सुनने के बाद मसीह में विश्वास किया है और आप पर उस पवित्र आत्मा की मुहर लग गयी, जिसकी प्रतिज्ञा की गयी थी।

14) वह हमारी विरासत का आश्वासन है और ईश्वर की प्रजा की मुक्ति की तैयारी, जिससे उसकी महिमा की स्तुति हो।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 6:7-13



7) ईसा शिक्षा देते हुए गाँव-गाँव घूमते थे। वे बारहों को अपने पास बुला कर और उन्हें अपदूतों पर अधिकार दे कर, दो-दो करके, भेजने लगे।

8) ईसा ने आदेश दिया कि वे लाठी के सिवा रास्ते के लिए कुछ भी नहीं ले जायें- न रोटी, न झोली, न फेंटे में पैसा।

9) वे पैरों में चप्पल बाँधें और दो कुरते नहीं पहनें

10) उन्होंने उन से कहा, ’’जिस घर में ठहरने जाओ, नगर से विदा होने तक वहीं रहो!

11) यदि किसी स्थान पर लोग तुम्हारा स्वागत न करें और तुम्हारी बातें न सुनें, तो वहाँ से निकलने पर उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ दो।’’

12) वे चले गये। उन्होंने लोगों को पश्चात्ताप का उपदेश दिया,

13) बहुत-से अपदूतों को निकाला और बहुत-से रोगियों पर तेल लगा कर उन्हें चंगा किया।



📚 मनन-चिंतन



क्या कभी आपने खुद से गहराई से पूछा है, कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है? आपको ईश्वर ने इस दुनिया में क्यों भेजा है? जब तक हमें इन दोनों सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे तब तक हम यह नहीं जान पायेंगे कि हम सही रास्ते पर चल रहे हैं, या सही रास्ते से भटक गये हैं. अक्सर कई बार हम अपने जीवन का उद्देश्य जाने बगैर जीवन की भाग-दौड़ में लगे रहते हैं, जब तक कि ईश्वर हमें कुछ घटनाओं के द्वारा या कुछ लोगों के द्वारा झकझोर कर हमें अपनी ईश्वरीय योजना और इच्छा का आभास न करा दे. ऐसा ही हुआ नबी आमोस के जीवन में. आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि वह न तो कोई नबी थे न उनके बाप-दादा नबी थे, वह गूलर काटते थे और भेड़ चराते थे, लेकिन ईश्वर ने उन्हें चुना, बुलाया और नबी नियुक्त किया. गूलर के पेड़ों और भेड़ों से बढ़कर भी उनके लिए कुछ और था.

हमारी धर्मशिक्षा हमें सिखाती है कि हम अपने बप्तिस्मा संस्कार द्वारा एक नबी, पुरोहित और राजा के रूप में नियुक्त होते हैं. नबी यानि कि हमें ईश्वर ज़िम्मेदारी देते हैं कि हमें उनकी बात दुनिया तक पहुँचानी है, उनकी आवाज़ बनना है. जब भी हमारे आस-पास कुछ गलत होता है, लोग ईश्वर के रास्ते से भटक कर गलत रास्ते पर चले जाते हैं तो हमें धर्मग्रन्थ के नबियों की भांति उन्हें ईश्वर का प्यार याद दिलाना है, ईश्वर की इच्छा याद दिलानी है. ज़रूरी नहीं है, कि लोग हमारी सुनेंगे, हो सकता है प्रभु येसु कि भांति हमारा तिरस्कार भी करेंगे, हम पर अत्याचार भी करेंगे, लेकिन इससे हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती. प्रभु येसु आज के सुसमाचार में हमें याद दिलाते हैं कि यदि लोग तुम्हारा स्वागत ना करें तो वहाँ से आगे बढ़ जाओ. प्रभु येसु के आगमन तक हमारा काम जारी रहना चाहिए.

ईश्वर हमें एक पुरोहित भी बनने के लिए बुलाते हैं. ज़रूरी नहीं है कि कई वर्षों की शिक्षा और प्रशिक्षण से ही हम पुरोहित बन सकते हैं, हमारे बप्तिस्मा के द्वारा ईश्वर हम में से हरेक व्यक्ति को एक पुरोहित की ज़िम्मेदारी सौंपते हैं. एक पुरोहित का क्या काम है? एक पुरोहित लोगों की तरफ से ईश्वर तक उनकी प्रार्थनाएं पहुंचाता है और ईश्वर की तरफ लोगों के लिए मध्यस्थ बनता है. वह लोगों के पापों के लिए और खुद के पापों के लिए बलिदान चढ़ाता है. अक्सर हम दूसरों के पापों को देखकर उनसे घृणा करने लगते हैं, उनके परिवर्तन के लिए कुछ भी नहीं करते. प्रभु येसु धर्मियों की अपेक्षा पापियों को बचाने आये हैं (मारकुस 2:17). क्या कभी हमने पापियों के मन परिवर्तन के लिए प्रार्थना की है, मिस्सा बलिदान चढ़वाया है? दूसरों को छोडिये, कभी-कभी हम अपने पापों के लिए भी पश्चाताप नहीं करते बल्कि उन्हें नज़र-अंदाज़ कर देते हैं. प्रभु येसु ने जब सुसमाचार प्रचार की शुरुआत की तो पश्चाताप के आह्वान के साथ की.

सन्त पौलुस हमें याद दिलाते हैं कि यदि हम प्रभु येसु के दुःख-भोग में भागी बनते हैं तो उनकी महिमा में भी सहभागी होंगे. अगर हम उनकी मृत्यु के सहभागी होते हैं तो उनके साथ अनन्त जीवन के सहभागी भी होंगे. (रोमियों 6:8). हम जानते हैं कि प्रभु येसु को सब कुछ के ऊपर अधिकार मिला है, स्वर्ग और सारी सृष्टि पर अधिकार मिला है (मत्ती 28:18). यह अधिकार उन्हें सारी मानव जाति के लिये दुःख उठाने के कारण मिला है. यदि हम एक नबी और पुरोहित होने के कारण कष्ट उठाते हैं, प्रभु येसु के नाम में विश्वास करने के कारण सताये जाते हैं तो निश्चय ही हम सारी सृष्टि के राजा अधिराज के साथ राज भी करेंगे. इसलिए ईश्वर हमें राजा होने का अधिकार देते हैं. आईये हम प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें हमारे जीवन के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाये, और अपने जीवन में उसकी इच्छा पूरी करने की शक्ति दे. आमेन.



📚 REFLECTION




Have your deeply reflected about the purpose of your life in this world? Why God has sent you in this world? Till we discover the answers to these questions, we wouldn’t know whether we are on the right path or have lost the way. Very often we forget our real purpose in this world and keep ourselves busy in the ways of the world till God intervenes in our life through various incidences or persons and reminds us His purpose of sending us into this world. We have several such examples of God intervening in people’s lives. Such an example can be seen in the first reading of today. Prophet Amos says he was not a prophet nor was his father. He was a dresser of sycamore trees and a herdsman but God called him for His work. There was something beyond the sycamore trees and herding the sheep for prophet Amos.

Our Catechism teaches us that our Baptism makes us a prophet, a king and a priest (CCC 783). The role of a prophet is to listen to God and reach His message to the people; he is called to be the voice of God to the people. Whenever there is something immoral or wrong taking place around us, when we see people loosing God’s path and going astray, in such situation we need to remind them of God’s love for them like prophets of old, we need to remind them God’s purpose and will or them. It is not necessary that people will welcome and accept us and listen to us; it is possible and sure that we will be rejected like Jesus our Lord, even persecuted but our obligation to share the mission of Jesus does not end here. Jesus reminds us in the gospel today, if people do not welcome you, then move on to next place. The mission must continue without interruption till our Lord comes again.

God has called us to be priests, a holy nation. We share in the universal priesthood of Jesus hence Jesus gives us the same mission as given to his own disciples. What does a priest do? A priest mediates people to God and works as mediator from God to the people. He offers sacrifice for the sins of the people and also for his own sins. Very often when we see others sinning we start hating them and condemning them, doing nothing for their conversion of heart. More than righteous, Jesus came to call sinners (cf Mark 2:17). Did we ever pray for the repentance of the sins of others, offered a mass for the conversion of the sinners? Forget about others, we don’t even bother to think and repent for our sins, we close our eyes towards our own sins. In fact Jesus began his ministry with a call to repent.

St. Paul reminds us about our share in the sufferings and glory of Christ. If we have died with him, then we shall also reign with him (cf Romans 6:8). We know that everything has been handed over to Christ, he says, “All authority in heaven and on earth has been given to me.” (Matthew 28:18). This authority has been given after the suffering of Jesus for whole humanity. Glorification or authority comes only after suffering and giving up oneself. If we face sufferings and persecutions because of being a prophet and a priest and because of the name of Jesus, then we will certainly reign with the most high king of the universe. God gives us a share in His kingship. Let us pray to God to give us the grace to discover the real purpose of our life and seek to do His will in everything. Amen.




मनन-चिंतन



पिछले इतवार के सुसमाचार में हमने प्रभु को लोगों द्वारा तिरस्कृत हुए पाया। इसलिए हम आज के सुसमाचार में प्रभु को अपनी रणनीति बदलते हुए देखते है। प्रभु अपने शिष्यों को स्वर्गराज्य के रह्स्यों की शिक्षा दे कर दो दो करके भेजते हैं। इससे प्रभु हमें एक सीख जरूर देते हैं कि जब भी हम कुछ कार्य करने निकलते हैं तो हमारे पास एक वैकल्पिक योजना होनी चाहिए। एक नहीं चले तो दूसरा चलेगा। अपने शिष्यों को भेजते समय प्रभु द्वारा दिये गये अनुदेशों या हिदायतों पर हम आज मनन चिन्तन करेंगे।

1. साधारण जीवन शैली

2. अच्छे लोगों की संगति

3. तिरस्कृति में धूल झाडना

4. लोगों को चंगा करना

1. साधारण जीवन शैली :- एक बार एक व्यक्ति एक ऋषि के दर्शन करने आया और वह उस संत का कमरा देख कर चकित हो गया। उसके कमरें में एक भी फर्नीचर नहीं था। उसने ऋषि से पूछा कि यह बहुत बुरी बात है कि आपके घर में मेहमान को बिठाने के लिए एक कुर्सी तक नहीं है। तो साधू ने उनसे पूछा आपकी कुर्सी कहाँ है? उसने कहा कि मुझे कुर्सी की ज़रूरत नहीं है क्योंकि मैं एक मुसाफिर हूँ। तब ऋषि ने उनसे कहा कि मैं भी इस संसार में एक मुसाफिर हूँ।

रेल गाडी के डिब्बे में कई जगह हम यह लिखा हुआ पाते हैं – Less luggage, more comfort - जितना कम वजन उतना आराम। आज के सुसमाचार में प्रभु यही बात अपने शिष्यों को समझाते हैं कि सुसमाचार प्रचार करते समय हम अपने आप को जितना विमुक्त रखते हैं, वह काम उतना ज़्यादा आसान बनता है। प्रभु अपने शिष्यों को मौलिक या बुनियादी आवश्यकताओं से भी वंचित कर देते हैं। उनका मतलब यह था कि एक सुसमाचार प्रचारक का मन और हृदय हमेशा प्रभु पर और केवल प्रभु पर निर्भर रहना चाहिए।

2. अच्छे लोगों की संगति :- हम तारामंडल में काले छेद के बारे में ये पढ़ते हैं। उनके पास इतनी ताकत होती है कि आस पास से गुजरने वाले हर तारे को अपनी ओर आकर्षित करके एक चक्की की तरह काम करते हुए उसे काला कर देता है। इसी प्रकार जब हम बुरे या गलत लोगों की संगति में आते है तब हम भी उसके जैसे बदल सकते हैं। इसीलिए प्रभु उन्हें चेतावनी देते हुए कहते हैं कि गाँव छोडने तक उन्हें अच्छे लोगों की संगति में रहना है।

3. धूल झाडना :- यहूदी लोग दूसरे गैरयहूदियों के देश घूमकर वापस आते समय उनके पैर और कपडे से धूल झाडने की एक प्रथा प्रचलित थी। इसी परंपरा को याद दिलाते हुए प्रभु अपने शिष्यों से कहते हैं कि जो उनका प्रवचन को अस्वीकार करते हैं, जो उनकी निन्दा करते हैं, जो उन पर विश्वास नहीं करते हैं, उनके वहाँ ठहरने की ज़रूरत नहीं है। आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि इस्राएल के राजा येरोबाम यहूदियों को आराधना के लिए येरूसलेम नहीं भेजता है बल्कि अपने देश में बाल देवता के लिए मंदिर बना कर लोगों को बाल देवता की आराधना करने के लिए बाध्य करता है। ना नबी आमोस ने इसके विरुध्द आवाज उठायी और न ही बतेल मंदिर के अमासिया ने उनकी निन्दा की। ईश्वरीय कार्य में निन्दा या तिरस्कार हमें मिलते रहेंगे लेकिन लोगों को चेतावनी देना हमारा कर्तव्य है। धूल झाडना एक प्रकार का चेतावनी है।

4. लोगों को चंगा करना :- आज की दुनिया को चंगाई की जरूरत है क्योंकि लोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों से गुजर रहे हैं। शारीरिक और मानसिक बीमारियों की चंगाई के अतिरिक्त आज समाज के हर क्षेत्र में फैल रही सामाजिक बीमारियों को भी चंगाई की आवश्यकता है। समाज में एक दूसरे के प्रति नफरत भेदभाव के व्यवहार, असहिष्णुता, नैतिक मूल्यों का उडेल, धोखेबाजी और अस्वस्थ प्रतियोगिता आदि इसके कुछ उदाहरण है। प्रभु ने हमें सबको इन बीमारियों से चंगाई प्रदान करने का माध्यम बनाया हैं।

हमें अपनी इस बुलाहट को पहचानना जरूरी है। हम प्रभु के इस मिशन-कार्य को गंभीरता से लें। लोगों की निन्दा से हताश न होते हुए अच्छे लोगों की संगति में रहते हुए प्रभु की योजना के अनुसार हम काम करते रहें, लोगों को और समाज को चंगाई देते रहें। प्रभु आज हम से यही अपेक्षा करते हैं।


✍-Br. Biniush Topno

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Praise the Lord!