मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Duliajan, Assam, India
Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

Sunday mass Reading in English 27 June 2021

 Daily Mass Readings for Sunday, 27 June 2021



First Reading: Wisdom 1: 13-15; 2: 23-24

13 For God made not death, neither hath he pleasure in the destruction of the living.

14 For he created all things that they might be: and he made the nations of the earth for health: and there is no poison of destruction in them, nor kingdom of hell upon the earth.

15 For justice is perpetual and immortal.

2:23 For God created man incorruptible, and to the image of his own likeness he made him.

24 But by the envy of the devil, death came into the world: And they follow him that are of his side.

Responsorial Psalm: Psalms 30: 2, 4, 5-6, 11, 12, 13

R. (2a) I will praise you, Lord, for you have rescued me.

2 I will extol thee, O Lord, for thou hast upheld me: and hast not made my enemies to rejoice over me.

4 Thou hast brought forth, O Lord, my soul from hell: thou hast saved me from them that go down into the pit.

R. I will praise you, Lord, for you have rescued me.

5 Sing to the Lord, O ye his saints: and give praise to the memory of his holiness.

6 For wrath is in his indignation; and life in his good will. In the evening weeping shall have place, and in the morning gladness.

R. I will praise you, Lord, for you have rescued me.

11 The Lord hath heard, and hath had mercy on me: the Lord became my helper.

12 Thou hast turned for me my mourning into joy: thou hast cut my sackcloth, and hast compassed me with gladness:

13 To the end that my glory may sing to thee, and I may not regret: O Lord my God, I will give praise to thee for ever.

R. I will praise you, Lord, for you have rescued me.

Second Reading: Second Corinthians 8: 7, 9, 13-15

7 That as in all things you abound in faith, and word, and knowledge, and all carefulness; moreover also in your charity towards us, so in this grace also you may abound.

9 For you know the grace of our Lord Jesus Christ, that being rich he became poor, for your sakes; that through his poverty you might be rich.

13 For I mean not that others should be eased, and you burthened, but by an equality.

14 In this present time let your abundance supply their want, that their abundance also may supply your want, that there may be an equality,

15 As it is written: He that had much, had nothing over; and he that had little, had no want.

Alleluia: Second Timothy 1: 10

R. Alleluia, alleluia.

10 Our Savior Jesus Christ destroyed death and brought life to light through the Gospel.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 5: 21-43

21 And when Jesus had passed again in the ship over the strait, a great multitude assembled together unto him, and he was nigh unto the sea.

22 And there cometh one of the rulers of the synagogue named Jairus: and seeing him, falleth down at his feet.

23 And he besought him much, saying: My daughter is at the point of death, come, lay thy hand upon her, that she may be safe, and may live.

24 And he went with him, and a great multitude followed him, and they thronged him.

25 And a woman who was under an issue of blood twelve years,

26 And had suffered many things from many physicians; and had spent all that she had, and was nothing the better, but rather worse,

27 When she had heard of Jesus, came in the crowd behind him, and touched his garment.

28 For she said: If I shall touch but his garment, I shall be whole.

29 And forthwith the fountain of her blood was dried up, and she felt in her body that she was healed of the evil.

30 And immediately Jesus knowing in himself the virtue that had proceeded from him, turning to the multitude, said: Who hath touched my garments?

31 And his disciples said to him: Thou seest the multitude thronging thee, and sayest thou who hath touched me?

32 And he looked about to see her who had done this.

33 But the woman fearing and trembling, knowing what was done in her, came and fell down before him, and told him all the truth.

34 And he said to her: Daughter, thy faith hath made thee whole: go in peace, and be thou whole of thy disease.

35 While he was yet speaking, some come from the ruler of the synagogue’s house, saying: Thy daughter is dead: why dost thou trouble the master any further?

36 But Jesus having heard the word that was spoken, saith to the ruler of the synagogue: Fear not, only believe.

37 And he admitted not any man to follow him, but Peter, and James, and John the brother of James.

38 And they come to the house of the ruler of the synagogue; and he seeth a tumult, and people weeping and wailing much.

39 And going in, he saith to them: Why make you this ado, and weep? the damsel is not dead, but sleepeth.

40 And they laughed him to scorn. But he having put them all out, taketh the father and the mother of the damsel, and them that were with him, and entereth in where the damsel was lying.

41 And taking the damsel by the hand, he saith to her: Talitha cumi, which is, being interpreted: Damsel (I say to thee) arise.

42 And immediately the damsel rose up, and walked: and she was twelve years old: and they were astonished with a great astonishment.

43 And he charged them strictly that no man should know it: and commanded that something should be given her to eat.


✍-Br Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

इतवार, 27 जून, 2021 वर्ष का तेरहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 27 जून, 2021

वर्ष का तेरहवाँ सामान्य इतवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥


पहला पाठ :प्रज्ञा-ग्रन्थ 1:13-15;2:23-24



13) ईश्वर ने मृत्यु नहीं बनायी; वह प्राणियों की मृत्यु से प्रसन्न नहीं होता।

14) उसने सब कुछ की सृष्टि इसलिए की है कि वह अस्तित्व में बना रहे। संसार में जो कुछ है, वह हितकर है; उस में कहीं भी घातक विष नहीं। अधोलोक पृथ्वी पर शासन नहीं करता;

15) क्योंकि न्याय का कभी अन्त नहीं होगा।

23) ईश्वर ने मनुष्य को अमर बनाया; उसने उसे अपना ही प्रतिरूप बनाया।

24) शैतान की ईर्ष्या के कारण ही मृत्यु संसार में आयी है। जो लोग शैतान का साथ देते हैं, वे अवश्य ही मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।



दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 8:7,9,13-15



7) आप लोग हर बात में- विश्वास, अभिव्यक्ति, ज्ञान, सब प्रकार की धर्म-सेवा और हमारे प्रति प्रेम में बढ़े-चढ़ें हैं; इसलिए आप लोगों को इस परोपकार में भी बड़ी उदारता दिखानी चाहिए।

9) आप लोग हमारे प्रभु ईसा मसीह की उदारता जानते हैं। वह धनी थे, किन्तु आप लोगों के कारण निर्धन बन गये, जिससे आप उनकी निर्धनता द्वारा धनी बन गये।

13) मैं यह नहीं चाहता कि दूसरों को आराम देने से आप लोगों को कष्ट हो। यह बराबरी की बात है।

14) इस समय आप लोगों की समृद्धि उनकी तंगी दूर करेगी, जिससे किसी दिन उन की समृद्धि आपकी तंगी दूर कर दे और इस तरह बराबरी हो जाये।

15) जैसा कि लिखा है-जिसने बहुत बटोरा था, उसके पास अधिक नहीं निकला और जिसने थोड़ा बटोरा था, उसके पास कम नहीं निकला।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 5:21-43



21) जब ईसा नाव से उस पार पहॅूचे, तो समुद्र के तट पर उनके पास एक विशाल जनसमूह एकत्र हो गया।

22) उस समय सभागृह का जैरूस नाम एक अधिकारी आया। ईसा को देख कर वह उनके चरणों पर गिर पड़ा

23) और यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’’मेरी बेटी मरने पर है। आइए और उस पर हाथ रखिए, जिससे वह अच्छी हो जाये और जीवित रह सके।’’

24) ईसा उसके साथ चले। एक बड़ी भीड़ उनके पीछे हो ली और लोग चारों ओर से उन पर गिरे पड़ते थे।

25) एक स्त्री बारह बरस से रक्तस्राव से पीडि़त थी।

26) अनेकानेक वैद्यों के इलाज के कारण उसे बहुत कष्ट सहना पड़ा था और सब कुछ ख़र्च करने पर भी उसे कोई लाभ नहीं हुआ था।

27) उसने ईसा के विषय में सुना था और भीड़ में पीछे से आ कर उनका कपड़ा छू लिया,

28) क्योंकि वह मन-ही-मन कहती थी, ’यदि मैं उनका कपड़ा भर छूने पाऊॅ, तो अच्छी हो जाऊँगी’।

29) उसका रक्तस्राव उसी क्षण सूख गया और उसने अपने शरीर में अनुभव किया कि मेरा रोग दूर हो गया है।

30) ईसा उसी समय जान गये कि उन से शक्ति निकली है। भीड़ में मुड़ कर उन्होंने पूछा, ’’किसने मेरा कपड़ा छुआ?’’

31) उनके शिष्यों ने उन से कहा, ’’आप देखते ही है कि भीड़ आप पर गिरी पड़ती है। तब भी आप पूछते हैं- किसने मेरा स्पर्श किया?’’

32) जिसने ऐसा किया था, उसका पता लगाने के लिए ईसा ने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी।

33) वह स्त्री, यह जान कर कि उसे क्या हो गया है, डरती- काँपती हुई आयी और उन्हें दण्डवत् कर सारा हाल बता दिया।

34) ईसा ने उस से कहा, ’’बेटी! तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें चंगा कर दिया है। शान्ति प्राप्त कर जाओ और अपने रोग से मुक्त रहो।’’

35) ईसा यह कह ही रहे थे कि सभागृह के अधिकारी के यहाँ से लोग आये और बोले, ’’आपकी बेटी मर गयी है। अब गुरुवर को कष्ट देने की ज़रूरत ही क्या है?’’

36) ईसा ने उनकी बात सुन कर सभागृह के अधिकारी से कहा, ’’डरिए नहीं। बस, विश्वास कीजिए।’’

37) ईसा ने पेत्रुस, याकूब और याकूब के भाई योहन के सिवा किसी को भी अपने साथ आने नहीं दिया।

38) जब वे सभागृह के अधिकारी के यहाँ पहुँचे, तो ईसा ने देखा कि कोलाहल मचा हुआ है और लोग विलाप कर रहे हैं।

39) उन्होंने भीतर जा कर लोगों से कहा, ’’यह कोलाहल, यह विलाप क्यों? लड़की मरी नहीं, सो रही है।’’

40) इस पर वे उनकी हँसी उड़ाते रहे। ईसा ने सब को बाहर कर दिया और वह लड़की के माता-पिता और अपने साथियों के साथ उस जगह आये, जहाँ लड़की पड़ी हुई थी।

41) लड़की का हाथ पकड़ कर उस से कहा, ’तालिथा कुम’’। इसका अर्थ है- ओ लड़की! मैं तुम से कहता हूँः उठो।

42) लड़की उसी क्षण उठ खड़ी हुई और चलने-फिरने लगी, क्योंकि वह बारह बरस की थी। लोग बड़े अचम्भे में पड़ गये।

43) ईसा ने उन्हें बहुत समझा कर आदेश दिया कि यह बात कोई न जान पाये और कहा कि लड़की को कुछ खाने को दो।



📚 मनन-चिंतन



आज के पाठों में हमें जीवन का उपहार दोनों शारीरिक और अध्यात्मिक, जिसे ईश्वर ने हमें दिया है, के बारे में बताया गया है। वे हमें प्रेरित और चुनौती देता है कि हम कृतज्ञ बनकर अपने शरीर और आत्मा में ईश्वर के वरदान और स्वास्थ्य को जिम्मेदारी के साथ निभायें।

आज के पहले पाठ में प्रज्ञा ग्रन्थ हमें बताता है कि ईश्वर ने हमें जीवन और स्वास्थ्य दिया है, और शैतान की ईष्या के कारण बीमारी और मृत्यु उत्पन्न हुई। पाठ हमें आगे बताता है कि हमारे इस संसार में जीवन का उददेश्य इस पृथ्वी पर ईश्वर को जानना, प्रेम करना और उसकी सेवा एक स्वच्छ शरीर और आत्मा से उनके अमर जीवन का सहभागी बनना।

आज के दूसरे पाठ मे संत पौलुस कहते हैं कि कुरिन्थ के ख्रीस्तीय समुदाय को उनके समृध्दि, उनके तंगी में आये यहुदी भाइयो एवं बाहनों। जो योरूशालेम में उनके प्रति दया और सहानुभूति दिखाते हैं, जिसे प्रभु येसु ने अपनी स्वास्थ्य सेवा में प्रदर्शित किया था। संत पौलुस उनसे कहते हैं कि वे उदार हदय से तगीं में आये भाई-बहनों के लिए चन्दा जमा करें।

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु के दो चमत्कारों पर प्रकाश डाला गया है, रक्तस्राव से पीड़ित महिला का स्वास्थ्य जो रक्तस्राव के बीमारी से पीड़ित थी और जैरूस की बेटी का मृत्यु से जीवन में वापस आना। ये दोनों उपचार शिक्षा देता है कि प्रभु येसु जीवन चाहते हैं, एक भरपुर जीवन जो ईश्वर अपने बच्चों के लिए देता है। दोनों उपचार प्रभु येसु के उदारता, दयालुता और सहानुभूति को प्रकट करता है, जिससे मनुष्य को प्रभु की दैवी शक्ति और हमारे प्रभु की अनन्त दया का प्रमाण देते हैं। ये दोनों चमत्कार प्रभु द्वारा पुरूस्कार के लिए किया गये, सभाग्रह के शासक और रक्तस्राव से पीड़ित महिला द्वारा विश्वास कर सकें।




📚 REFLECTION


Today is the thirteenth Sunday of the year. Today’s readings speak about gift of life both physical and spiritual which God has given us. They urge and challenge us to be grateful for our health in body and soul and to use God’s gifts of life and health responsibly.

Today’s first reading taken from the book of Wisdom tells us that God has given us life and health and it is Satan’s jealousy which produced illness and death. The readings also further tell the goal of our life is to know, to love and to serve God here on earth with perfect health in body and soul and share immortal life forever.

In today’s second reading Paul tells the Corinthian Christian community to show their impoverished, suffering Jewish brothers and sisters in Jerusalem the kindness and compassion which Jesus expressed in his healing ministry. Paul asks the community to be generous in their contributions to a fund collected for these suffering brothers and sisters.

In today’s gospel Jesus’ two miracles have been highlighted: healing of a woman who suffered from a chronic bleeding disease and the returning of the dead daughter of Jairus to life. These both healings teach us that Jesus wills life, the full life, for all God’s children. These healings also reveal Jesus as a generous, kind and compassion God who wills that men should live their lives fully. They also give us further proof of the divine power and infinite mercy of our saviour. These miracles were performed by Jesus as a reward for trusting faith of the synagogue ruler and of the woman with a haemorrhage.




मनन-चिंतन-2



आज के सुसमाचार को सैंडविच सुसमाचार भी कहते है। क्योंकि येसु जैरूस की मृत पुत्री को जिलाने जाने के रास्ते में ही बारह साल से रक्तस्राव से पीडित महिला को चंगाई प्रदान करते हैं। इन दोनों चमत्कारों को देखते हुए हमें दो बिन्दुओं पर नज़र डालना चाहिए।

1. दुःख तकलीफ में प्रभु पर विश्वास रखना है।

2. प्रभु छोटे विश्वास को भी बढावा देते है।

रक्तस्राव से पीडित महिला बारह साल से परेशान थी। लेवी ग्रंथ 15:19 में लिखा है ‘‘यदि किसी स्त्री का मासिक स्राव हो, तो वह सात दिन तक अशुद्ध रहेगी और जो उसका स्पर्श करेगा, वह शाम तक अशुद्ध रहेगा।’’ आगे लेवी 15:25 में लिखा है ‘‘यदि किसी स्त्री को उसके मासिक धर्म के दिनों के सिवा अन्य दिनों में अथवा मासिक धर्म पूरा होने के बाद रक्तस्राव होता रहे, तो वह उस समय ऋतुकाल की तरह अशुद्ध है।’’ इससे हम अंदाजा लगा सकते है कि बारह साल की इस बीमारी से वह कितनी परेशान हो गयी होगी। बारह साल तक किसी ने उसको स्पर्श नहीं किया होगा। लोगों को या किसी वस्तु को स्पर्श करने से वह डरती थी। उसे येसु को स्पर्श करने की हिम्मत नहीं थी। इसलिए उसने पीछे से जाकर उनका कपडा छू लिया। इसके पूर्व उसने बहुत से वेदयों के पास इलाज करवाया और बहुत पैसा भी खर्च किया लेकिन बावजूद भी उसे कोई राहत नहीं मिली। तब वह प्रभु पर आखरी भरोसा रखते हुए उनके पास आती है। उसका विश्वास था कि प्रभु उसे ठीक कर सकते है।

जैरूस सभागृह का अधिकारी था उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। शायद उसने बहुत लोगों की मदद भी की होगी। अपनी बेटी को अच्छा से अच्छा इलाज दिया होगा इसके बावजूद भी जब बीमारी में कोई फर्क नहीं दिखा तो वह प्रभु के पास जाता है। उसकी निस्सहाय अवस्था को दर्शाते हुए बाइबिल में लिखा है कि वह प्रभु से अनुनय विनय करने लगा। एक अधिकारी प्रभु के सामने अपने आपको दीन हीन बनाता है। उसको प्रभु पर भरोसा था। प्रभु पर आसरा और भरोसा रखने वालों को प्रभु कभी नहीं छोडते।

2. प्रभु छोटे विश्वास को भी बढ़ावा देते हैः

रक्तस्राव से पीडित स्त्री के मन में यह विचार था कि वह प्रभु के वस्त्र के पल्ले को छू भी ले तो वह ठीक हो जायेगी। और जैसे ही वह ठीक हुई वह संतुष्ट थी और वहॉं से चुपचाप निकलने का इरादा थी। लेकिन प्रभु ने उसके इस विश्वास को लोगों के सामने प्रस्तुत किया। वे उसको सबके सामने लाये और अपने विश्वास का साक्ष्य करवाया। उस स्त्री के विश्वास के कारण वहॉं पर प्रभु ने एक विश्वास भरे जन समूह की स्थापना की।

जैरूस जब प्रभु से मिलने आये तब उनके मन में केवल एक ही चिन्ता थी कि उसकी बेटी ठीक हो जाये। वह प्रभु के पास इसलिए आया कि उसको प्रभु पर विश्वास था। प्रभु ने उनके विश्वास को बनाये रखते हुए बेटी की मृत्यु होने पर भी उसको जिलाया। प्रभु द्वारा अपने बेटी को चंगाई दिलाने का जैरूस का विश्वास बडी मात्रा में वहॉं पर उपस्थित लोगों के विश्वास में परिवर्तन होता है।

हरेक व्यक्ति का ईश्वर पर विश्वास करने और उस विश्वास को प्रकट करने का अपना अलग अलग तरीका है। कुछ लोग ऊॅंची आवाज से प्रार्थना करते हुए प्रभु की स्तुति करते है इसी प्रकार कुछ लोग मौन रुप से प्राथना करना पसंद करते है और कुछ लोगों को लगातार बाईबिल या कोई आध्यात्मिक किताब पढ़ना अच्छा लगता है। हम जैसे भी अपने विश्वास की साधना करते है या प्रकट करते है उन सब को प्रभु देखते है। हमारा छोटा विश्वास भी बडा काम कर सकते है इसलिए प्रभु ने कहा ‘‘यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो और तुम इस पहाड से यह कहो यहॉं से वहॉं तक हट जा, तो यह हट जायोगा; और तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा (मती 17:20).

अब हमे मनन चिंतन करना चाहिए कि हमारा विश्वास कितना मजबूत है? क्या हम अपनी दुःख तकलीफ में प्रभु के पास जाने की हिम्मत रखते हैं? प्रभु को हमारा इंतज़ार है। वे हमारा विश्वास मजबूत करना और बढ़ाना चाहते है। हम प्रभु में भरोसा रखना सीखे वह हमें संभालेगे। हमारा विश्वास कुछ एैसा रहे वैसे कोलोन शहर की एक दीवार पर लिखा है, ’’सूरज की किरण नहीं देखने पर भी मैं सूरज पर विश्वास करता हूँ। प्यार का एहसास नहीं होने पर भी मुझे प्यार में विश्वास है। ईश्वर को नहीं देखने से भी मैं उन पर विश्वास करता हूँ।’’



✍-Br Biniush Topno



Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

शनिवार, 26 जून, 2021 वर्ष का बारहवाँ सप्ताह

 शनिवार, 26 जून, 2021

वर्ष का बारहवाँ सप्ताह


पहला पाठ : उत्पत्ति 18:1-15



1) इब्राहीम मामरे के बलूत के पास दिन की तेज गरमी के समय अपने तम्बू के द्वार पर बैठा हुआ था कि प्रभु उस को दिखाई दिया।

2) इब्राहीम ने आँख उठा कर देखा कि तीन पुरुष उसके सामने खडे हैं। उन्हें देखते ही वह तम्बू के द्वार से उन से मिलने के लिए दौड़ा और दण्डवत् कर

3) बोला, ''प्रभु! यदि मुझ पर आपकी कृपा हो, तो अपने सेवक के सामने से यों ही न चले जायें।

4) आप आज्ञा दे, तो मैं पानी मंगवाता हूँ। आप पैर धो कर वृक्ष के नीचे विश्राम करें।

5) इतने में मैं रोटी लाऊँगा। आप जलपान करने के बाद ही आगे बढ़ें। आप तो इसलिए अपने सेवक के यहाँ आए हैं।''

6) उन्होंने उत्तर दिया, ''तुम जैसा कहते हो, वैसा ही करो''। इब्राहीम ने तम्बू के भीतर दौड़ कर सारा से कहा ''जल्दी से तीन पसेरी मैदा गूंध कर फुलके तैयार करो''।

7) तब इब्राहीम ने ढोरों के पास दौड़ कर एक अच्छा मोटा बछड़ा लिया और नौकर को दिया, जो उसे जल्दी से पकाने गया।

8) बाद में इब्राहीम ने दही, दूध और पकाया हुआ बछड़ा ले कर उनके सामने रख दिया और जब तक वे खाते रहे, वह वृक्ष के नीचे खड़ा रहा।

9) उन्होंने इब्राहीम से पूछा, ''तुम्हारी पत्नी सारा कहाँ है?'' उसने उत्तर दिया, ''वह तम्बू के अन्दर है''।

10) इस पर अतिथि ने कहा, ''मैं एक वर्ष के बाद फिर तुम्हारे पास आऊँगा। उस समय तक तुम्हारी पत्नी को एक पुत्र होगा।''

11) इब्राहीम और सारा, दोनो बूढ़े हो चले थे; उनकी आयु बहुत अधिक हो गयी थी और सारा का मासिक धर्म बन्द हो गया था।

12) इसलिए सारा हँसने लगी और उसने अपने मन में कहा, ''क्या मैं अब भी पति के साथ रमण करूँ? मैं तो मुरझा गयी हूँ और मेरा पति भी बूढ़ा हो गया है।''

13) किन्तु प्रभु ने इब्राहीम से कहा, ''सारा यह सोच कर क्यों हँसी कि क्या सचमुच बुढ़ापे में भी मैं माता बन सकती हूँ?

14) क्या प्रभु के लिए कोई बात कठिन है? मैं अगले वर्ष इसी समय तुम्हारे यहाँ फिर आऊँगा और तब सारा को एक पुत्र होगा।''

15) सारा ने कहा, ''मैं नहीं हँसी'', क्योंकि वह डर गयी। किन्तु उसने उत्तर दिया, ''तुम निश्चय ही हँसी थी।''



सुसमाचार : मत्ती 8:5-17



5) ईसा कफरनाहूम में प्रवेश कर ही रहे थे कि एक शतपति उनके पास आया और उसने उन से यह निवेदन किया,

6) "प्रभु! मेरा नौकर घर में पड़ा हुआ है। उसे लक़वा हो गया है और वह घोर पीड़ा सह रहा है।"

7) ईसा ने उस से कहा, "मैं आ कर उसे चंगा कर दूँगा"।

8) शतपति नें उत्तर दिया, "प्रभु! मैं इस योग्य नहीं हूँ कि आप मेरे यहाँ आयें। आप एक ही शब्द कह दीजिए और मेरा नौकर चंगा हो जायेगा।

9) मैं एक छोटा-सा अधिकारी हूँ। मेरे अधीन सिपाही रहते हैं। जब मैं एक से कहता हूँ - ’जाओ’, तो वह जाता है और दूसरे से- ’आओ’, तो वह आता है और अपने नौकर से-’यह करो’, तो वह यह करता है।"

10) ईसा यह सुन कर चकित हो गये और उन्होंने अपने पीछे आने वालों से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - इस्राएल में भी मैंने किसी में इतना दृढ़ विश्वास नहीं पाया"।

11) "मैं तुम से कहता हूँ - बहुत से लोग पूर्व और पश्चिम से आ कर इब्राहीम, इसहाक और याकूब के साथ स्वर्गराज्य के भोज में सम्मिलित होंगे,

12) परन्तु राज्य की प्रजा को बाहर, अन्धकार में फेंक दिया जायेगा। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।"

13) शतपति से ईसा ने कहा, "जाइए आपने जैसा विश्वास किया, वैसा ही हो जाये।" और उस घड़ी उसका नौकर चंगा हो गया।

14) पेत्रुस के घर पहुँचने पर ईसा को पता चला कि पेत्रुस की सास बुखार में पड़ी हुई है।

15) उन्होंने उसका हाथ स्पर्श किया और उसका बुखार जाता रहा और वह उठ कर उनके सेवा-सत्कार में लग गयी।

16) संध्या होने पर लोग बहुत-से अपदूतग्रस्तों को ईसा के पास ले आये। ईसा ने शब्द मात्र से अपदूतों को निकाला और सब रोगियों को चंगा किया।

17) इस प्रकार नबी इसायस का यह कथन पूरा हुआ- उसने हमारी दुर्बलताओं को दूर कर दिया और हमारे रोगों को अपने ऊपर ले लिया।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में हम दो लोगों को पाते हैं, शतपति का नौकर और पेत्रुस की सास। ये दोनों अपने-अपने बीमारों से पीड़ित थे। शतपति जो कि गैर-यहूदी था और स्वयं एक अधिकारी था उसके अधीन कई काम करने वाले थे। उन्होंने प्रभु से कहा, ’’प्रभु! मेरा नौकर घर में पड़ा हुआ है। उसे लकवा हो गया है और वह घोर पीड़ा सह रहा है।’’ प्रभु ने उस से कहा, ’’मैं आकर उसे चंगा कर दूँगा।’’ लेकिन शतपति प्रभु से कहते हैं, ’’प्रभु। मैं इस योग्य नहीं हूँ, कि आप मेरे यहाँ आये। आप एक ही शब्द कह दीजिये और मेरा नौकर चंगा हो जायेगा। ’’प्रभु येसु उनके कथन को सुनकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं और कहते हैं कि इस्राइल में भी मैंने किसी में इतना दृढ़ विश्वास नहीं पाया।’’

उसी प्रकार पेत्रुस की सास भी प्रभु से चंगाई पाने के बाद, वह सेवा सत्कार के कार्य में लग जाती है। शतपति का विश्वास वाकई एक दृढ़विश्वास था जो प्रभु के कार्य का बाखान करता है, एवं हमें प्रेरित भी करता है। हम प्रभु से कृपा पाने के बाद उसे अपने तक सीमित न रखें, बल्कि उसका उपयोग दूसरों के लिए ईश्वर की महिमा के लिए करें।



📚 REFLECTION



In today’s gospel we find two persons; the Centurion’s servant and Peter’s mother-in-law. Both of them were suffering from their sicknesses. Centurion, who was a non-Jews and himself an officer, and there were many who worked under him. Centurion said to Jesus, “Lord my servant is lying at home paralysed in terrible distress.” And Jesus said to him, “I will come and cure him.” But the Centurion said to Jesus, “Lord I am not worthy to have you come under my roof; but only speak the word, and my servant will be healed.” Upon hearing the Centurion’s answer Jesus said, “Truly I tell you, no one in Israel have I found such faith.” Likewise, Peter’s mother- in-law too after getting healed; she didn’t keep quiet, but kept her busy in serving. The faith of the Centurion was indeed a strong faith which praises God’s works and inspires us. Let us not restrict God’s grace to ourselves but use it the glory of God.



✍ -Br Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

शुक्रवार, 25 जून, 2021 वर्ष का बारहवाँ सप्ताह

 

शुक्रवार, 25 जून, 2021

वर्ष का बारहवाँ सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : उत्पत्ति 17:1,9-10,15-22



1) जब अब्राम की उमर निन्यानबे वर्ष की थी, तो प्रभु ने उसे दर्शन दे कर कहा, ''मैं सर्वशक्तिमान् ईश्वर हूँ। तुम मेरे सम्मुख निर्दोष आचरण करते चलो।

9) प्रभु ने इब्राहीम से यह भी कहा, ''तुम को और तुम्हारे बाद तुम्हारे वंशजों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मेरे विधान का पालन करना चाहिए।

10) मैंने जो विधान तुम्हारे और तुम्हारे वंशजों के लिए निर्धारित किया और जिसका तुम को पालन करना चाहिए वह इस प्रकार है - तुम लोगों में से हर पुरुष का ख़तना किया जायेगा।

15) प्रभु ने इब्राहिम से कहा, ''तुम अपनी पत्नी को सारय नहीं, बल्कि सारा कह कर पुकारो।

16) मैं उसे आशीर्वाद दूँगा और वह तुम्हारे लिए पुत्र प्रसव करेगी। मैं उसे आशीर्वाद दूँगा-वह राष्ट्रों का माता बन जायेगी और उसे राष्ट्रों के राजा उत्पन्न होंगे।''

17) इब्राहीम मुँह के बल गिर कर हँसने लगा, क्योंकि उसने अपने मन में यह कहा, ''क्या सौ वर्ष के पुरुष को पुत्र हो सकता है? क्या नब्बे वर्ष की सारा प्रसव कर सकती है?''

18) उसने ईश्वर से कहा, ''इसमाएल तेरा कृपापात्र बने''।

19) ईश्वर ने उत्तर दिया, "नहीं! तुम्हारी पत्नी सारा तुम्हारे लिए पुत्र प्रसव करेगी। तुम उसका नाम इसहाक रखोगे। मैं उसके और उसके वंशजों के लिए अपना चिरस्थायी विधान बनाये रखूँगा। मैं उसके और उसके वंश का ईश्वर होऊँगा।

20) मैंने इसमाएल के लिए तुम्हारी प्रार्थना सुनी। मैं उसे आशीर्वाद दूँगा। मैं उसे सन्तति प्रदान करूँगा और उस के वंशजों की संख्या बढ़ाऊँगा। वह बारह कुलपतियों का पिता बनेगा और उस से एक महान् राष्ट्र उत्पन्न होगा।

21) किन्तु मैं इसहाक के लिए अपना विधान बनाये रखूँगा। अगले वर्ष के इस समय सारा उसे प्रसव करेगी।''

22) इतना कह कर ईश्वर इब्राहीम को छोड़ कर चला गया।



सुसमाचार : मत्ती 8:1-4



1) ईसा पहाडी से उतरे। एक विशाल जनसमूह उनके पीछे हो लिया।

2) उस समय एक कोढ़ी उनके पास आया और उसने यह कहते हुए उन्हें दण्डवत् किया, "प्रभु! आप चाहें, तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं"।

3) ईसा ने हाथ बढा कर यह कहते हुए उसका स्पर्श किया, "मैं यही चाहता हूँ- शुद्ध हो जाओ"। उसी क्षण उसका कोढ़ दूर हो गया।

4) ईसा ने उस से कहा, "सावधान! किसी से कुछ मत कहो। जा कर अपने को याजक को दिखाओ और मूसा द्वारा निर्धारित भेंट चढ़ाओ जिससे तुम्हारा स्वास्थ्यलाभ प्रमाणित हो जाये।"



📚 मनन-चिंतन



प्रभु येसु के समय में, यहुदियों के नियम कोढ़ की बीमारी एक बहुत ही गंभीर पाप या अपमान समझा जाता था। जब याजक उन्हें घोषित करते थे, कि उन्हें कोढ़ की बीमारी है, तो कोढ़ के कपडे़ को जाला दिया जाता था और उसके घर द्वार को भी उजाड़ दिया जाता था। वह व्यक्ति तुरन्त बेघरवार हो जाता, और उसे समुदाय से अलग जीना पड़ता था। वह एक शोकित की तरह फटा पुराना कपड़ा पहनता था और अशुध्द! अशुध्द कहकर चिल्लाता था। दूसरे शब्दों में कोई भी इस्राइली उनके साथ कोई भी संबध नहीं रखता था। ये सब होने के वौजुद प्रभु येसु ऐसे नियमों को तोड़कर, कोढ़ का स्वागत करते हैं। पर्वत पर प्रवचन देने के बाद येसु कोढ़ी को भीड़ के बीच चलने-फिरने देते हैं। और अन्त में येसु हाथ बढ़ाकर उसका र्स्पश करते हैं।

आइये हम आज प्रार्थना करें कि हम भी प्रभु येसु के पास विश्वास के साथ पहुँच सकें, जिससे वे हमें शुध्द कर सकें।



📚 REFLECTION




During the time of Jesus, Jewish law considered leprosy as a grave offense or sin. Upon declared by the priest, the leper’s clothes were burned, his house was razed or cut. He was immediately homeless, forced to live outside the community. He was to dress like a mourner and cry out unclean! Unclean! In other words, no Israelite was to have anything at all to do with any leper. In spite of that, Jesus broke the law; and Jesus welcomes the leper. He allowed the leper to walk in among the crowd that surrounded him when he came down from the mountain after delivering his sermon on Mount. And lastly, Jesus “reached out his hand, and touched him” (Mt 8:3). According to the Mosaic Law, by touching the leper Jesus himself was instantly made unclean too. Let us pray that we may have faith to reach Jesus, so that he may be able to heal us.



✍ -Br Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

गुरुवार, 24 जून, 2021 सन्त योहन बपतिस्ता का जन्मोत्सव- समारोह

 

गुरुवार, 24 जून, 2021

सन्त योहन बपतिस्ता का जन्मोत्सव- समारोह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : इसायाह 49:1-6



1) दूरवर्ती द्वीप मेरी बात सुन¨। दूर के राष्ट्रों! कान लगा कर सुनो। प्रभु ने मुझे जन्म से पहले ही बुलाया, मैं माता के गर्भ में ही था, जब उसने मेरा नाम लिया।

2) उसने मेरी वाणी को अपनी तलवार बना दिया और मुझे अपने हाथ की छाया में छिपा लिया। उसने मुझे एक नुकीला तीर बना दिया और मुझे अपने तरकश में रख लिया

3) उसने मुझे से कहा, “तुम मेरे सेवक हो, मैं तुम में अपनी महिमा प्रकट करूँगा“।

4) मैं कहता था, “मैंने बेकार ही काम किया है, मैंने व्यर्थ ही अपनी शक्ति खर्च की है। प्रभु ही मेरा न्याय करेगा, मेरा पुरस्कार उसी के हाथ में है।“

5) परन्तु जिसने मुझे माता के गर्भ से ही अपना सेवक बना लिया है, जिससे मैं याकूब को उसके पास ले चलँू और उसके लिए इस्राएल को इकट्ठा कर लूँ, वही प्रभु बोला; उसने मेरा सम्मान किया, मेरा ईश्वर मेरा बल है।

6) उसने कहाः “याकूब के वंशों का उद्धार करने तथा इस्राएल के बचे हुए लोगों को वापस ले आने के लिए ही तुम मेरे सेवक नहीं बने। मैं तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बना दूँगा, जिससे मेरा मुक्ति-विधान पृथ्वी के सीमान्तों तक फैल जाये।“



दूसरा पाठ : प्रेरित-चरित 13:22-26



22) इसके बाद ईश्वर ने दाऊद को उनका राजा बनाया और उनके विषय में यह साक्ष्य दिया- मुझे अपने मन के अनुकूल एक मनुष्य, येस्से का पुत्र दाऊद मिल गया है। वह मेरी सभी इच्छाएँ पूरी करेगा।

23) ईश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उन्हीं दाऊद के वंश में इस्राएल के लिए एक मुक्तिदाता अर्थात् ईसा को उत्पन्न किया हैं।

24) उनके आगमन से पहले अग्रदूत योहन ने इस्राएल की सारी प्रजा को पश्चाताप के बपतिस्मा का उपदेश दिया था।

25) अपना जीवन-कार्य पूरा करते समय योहन ने कहा, ’तुम लोग मुझे जो समझते हो, मैं वह नहीं हूँ। किंतु देखो, मेरे बाद वह आने वाले हैं, जिनके चरणों के जूते खोलने योग्य भी मैं नहीं हूँ।’

26) ’’भाइयों! इब्राहीम के वंशजों और यहाँ उपस्थित ईश्वर के भक्तों! मुक्ति का यह संदेश हम सबों के पास भेजा गया है।



सुसमाचार : लूकस 1:57-66,80



57) एलीज़बेथ के प्रसव का समय पूरा हो गया और उसने एक पुत्र को जन्म दिया।

58) उसके पड़ोसियों और सम्बन्धियों ने सुना कि प्रभु ने उस पर इतनी बड़ी दया की है और उन्होंने उसके साथ आनन्द मनाया।

59) आठवें दिन वे बच्चे का ख़तना करने आये। वे उसका नाम उसके पिता के नाम पर ज़करियस रखना चाहते थे,

60) परन्तु उसकी माँ ने कहा, ’’जी नहीं, इसका नाम योहन रखा जायेगा।’’

61) उन्होंने उस से कहा, ’’तुम्हारे कुटुम्ब में यह नाम तो किसी का भी नहीं है’’।

62) तब उन्होंने उसके पिता से इशारे से पूछा कि वह उसका नाम क्या रखना चाहता है।

63) उसने पाटी मँगा कर लिखा, ’’इसका नाम योहन है’’। सब अचम्भे में पड़ गये।

64) उसी क्षण ज़करियस के मुख और जीभ के बन्धन खुल गये और वह ईश्वर की स्तुति करते हुए बोलने लगा।

65) सभी पड़ोसी विस्मित हो गये और यहूदिया के पहाड़ी प्रदेश में ये सब बातें चारों ओर फैल गयीं।

66) सभी सुनने वालों ने उन पर मन-ही-मन विचार कर कहा, ’’पता नहीं, यह बालक क्या होगा?’’ वास्तव में बालक पर प्रभु का अनुग्रह बना रहा।

80) बालक बढ़ता गया और उसकी आत्मिक शक्ति विकसित होती गयी। वह इस्राएल के सामने प्रकट होने के दिन तक निर्जन प्रदेश में रहा।



📚 मनन-चिंतन



आज हम योहन बपतिस्ता के जन्म का पर्व मना रहे है। योहन बपतिस्ता प्रभु येसु के अग्रदूत थे। उनका कार्य प्रभु के लिए लोगों को तैयार करना था। उन्होंने लोगों को पश्चाताप का उपदेश दिया। उनका जन्म, जैसा कि सुसमाचार हमें बताता है, बड़ी आश्चर्य पूर्ण था क्योंकि उनके माता-पिता बूढे़ हो चले थे और ऐसे समय में उनका जन्म लेना ईश्वर की कृपा को दर्शाता है। क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।

आज के पहले पाठ में नबी इसायस कहते हैं कि ’’प्रभु ने मुझे जन्म से पहले ही बुलाया, मैं माता के गर्भ में ही था, जब उसने मेरा नाम लिया’’ (इसायस 49:1)। यह बुलाहट एक ईश्वरीय वरदान है, जिसे हम अपने मानवीय ज्ञान से समझ नहीं सकते है। इसके लिए ईश्वरीय प्रेम का ज्ञान होना आवश्यक है। हम सभी अपने जन्म से पहले ही ईश्वर द्वारा बुलाये गये हैं। हम संत पापा फ्रांसिस अपने प्रेरितिक प्रबोधन गौदेते-ऐत-एक्सल्तेत में कहते हैं, कि ’’हम सभी पवित्र बनने के लिए बुलाये गयें हैं, अपने जीवन में प्रेम के साथ साक्षी देने केे लिए, चाहे हम जहाँ कहीं भी अपने को पाते हैं।’’ (14)।

योहन बपतिस्ता की तरह हम भी ईश्वर के मिशन को पहचानने के लिए, कि ईश्वर कौन है, वह कितना महान और पवित्र है कि हम सब उनके जूते का फीता भी खोल नहीं सकते (मारकुस 1:7, लूकस 3:16)। योहन बपतिस्ता की तरह हम पहचानते हैं कि हम मसीह नहीं है। हमें योहन की तरह उनके मार्ग सीधा करना है जिसे ईश्वर हमारे जीवन में शासन कर सकें।



📚 REFLECTION



Today we are celebration the birth of John the Baptist. He was the precursor of Jesus Christ; his work was to prepare the way for the Lord. He preached the gospel of repentance to the people. As the gospels tell us, John’s birth was miraculous, because his parents were advanced in age, and to be born at that time shows God’s special grace. For nothing is impossible for God.

In today’s first reading prophet Isaiah says, “The Lord called me from birth; from my mother’s womb he gave me my name.” Pope Francis in his Apostolic Exhortation Gaudete et Exsutate says, “We are called to be holy by living our lives with love and by bearing witness in everything we do, wherever we find ourselves” (14).

Like John the Baptist, we are called to recognise who God is, that he is so great and holy that none of us is worthy to loosen the strap of his sandals (Mk1:7). Like John the Baptist, we recognise that we are not Messiah. Like John the Baptist, we need to make straight the paths for God to rule in our life.



✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

आज का पवित्र वचन बुधवार 23 जून 2021

 

बुधवार, 23 जून, 2021

वर्ष का बारहवाँ सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : उत्पत्ति 15:1-12,17-18



1) इन घटनाओं के बाद अब्राम ने एक दिव्य दर्शन में ईश्वर की वाणी को यह कहते हुए सुना, ''अब्राम! मत डरो! मैं तुम्हारी ढाल हूँ। तुम्हारा पुरस्कार महान् होगा!''

2) अब्राम ने कहा, ''प्रभु-ईश्वर! तू मुझे क्या दे सकता है? मैं निस्सन्तान हूँ और मेरे घर का उत्तराधिकारी दमिश्क का एलीएजर है।''

3) अब्राम ने फिर कहा, ''तूने मुझे कोई सन्तान नहीं दी। मेरा नौकर मेरा उत्तराधिकारी होगा।''

4) तब प्रभु ने उस से यह कहा, ''वह तुम्हारा उत्तराधिकारी नहीं होगा। तुम्हारा औरस पुत्र ही तुम्हारा उत्तराधिकारी होगा।''

5) ईश्वर ने अब्राम को बाहर ले जाकर कहा, ''आकाश की और दृष्टि लगाओ और सम्भव हो, तो तारों की गिनती करो''। उसने उस से यह भी कहा, ''तुम्हारी सन्तति इतनी ही बड़ी होगी''।

6) अब्राम ने ईश्वर में विश्वास किया और इस कारण प्रभु ने उसे धार्मिक माना।

7) प्रभु ने उस से कहा, ''मैं वही प्रभु हूँ, जो तुम्हें इस देश का उत्तराधिकारी बनाने के लिए खल्दैयों के ऊर नामक नगर से निकाल लाया था।''

8) अब्राम ने उत्तर दिया, ''प्रभु! मेरे ईश्वर! मैं यह कैसे जान पाऊँगा कि इस पर मेरा अधिकार हो जायेगा?''

9) प्रभु ने कहा, ''तीन वर्ष की कलोर, तीन वर्ष की बकरी, तीन वर्ष का मेढा, एक पाण्डुक और एक कपोत का बच्चा यहाँ ले आना''।

10) अब्राम ये सब ले आया। उसने उनके दो-दो टुकड़े कर दिये और उन टुकड़ों को आमने-सामने रख दिया, किन्तु पक्षियों के दो-दो टुकड़े नहीं किये।

11) गीध लाशों पर उतर आये, किन्तु अब्राम ने उन्हें भगा दिया।

12) जब सूर्य डूबने पर था, तो अब्राम गहरी नींद में सो गया और उस पर आतंक छा गया।

17) सूर्य डूबने तथा गहरा अन्धकार हो जाने पर एक धुँआती हुई अंगीठी तथा एक जलती हुई मशाल दिखाई पड़ी, जो जानवरों के उन टुकडों के बीच से होते हुए आगे निकल गयीं।

18) उस दिन प्रभु ने यह कह कर अब्राम के लिए विधान प्रकट किया, मैं मिस्त्र की नदी से लेकर महानदी अर्थात् फ़रात नदी तक का यह देश तुम्हारे वंशजों को दे देता हूँ।



सुसमाचार : मत्ती 7:15-20



15) ’’झूठे नबियों से सावधान रहो। वे भेड़ों के वेश में तुम्हारे पास आते हैं, किन्तु वे भीतर से खूँखार भेडि़ये हैं।

16) उनके फलों से तुम उन्हें पहचान जाओगे। क्या लोग कँटीली झाडि़यों से अंगूर या ऊँट-कटारों से अंजीर तोड़ते हैं?।

17) इस तरह हर अच्छा पेड़ अच्छे फल देता है और बुरा पेड़ बुरे फल देता है।

18) अच्छा पेड़ बुरे फल नहीं दे सकता और न बुरा पेड़ अच्छे फल।

19) जो पेड़ अच्छा फल नहीं देता, उसे काटा और आग में झोंक दिया जाता है।

20) इसलिए उनके फलों से तुम उन्हें पहचान जाओगे।



📚 मनन-चिंतन



आज के पहले पाठ में अब्राम ईश्वर की प्रतिज्ञाओं पर संदेह करने लगते हैं, जो कि ईश्वर उनके लिए निर्धारित किया था। वे इतना सोचने लगते हैं कि वे अपने लिए पुत्र होने के बारे में भी सोचना नहीं चाहते। उसी समय ईश्वर उन्हें बाहर ले जाकर कहा, आकाश की ओर दृष्टि लगाओ और संभव हो, तो तारों की गिनती करो। तुम्हारी संन्तति इतनी ही बड़ी होगी। और जब अब्राम ने अपनी आँख ऊपर उठायी और आकाश के तारों को देखा, उसने ईश्वर पर विश्वास किया। इसी प्रकार जब हम ईश्वर पर दृष्टि लगाकर अपने विश्वास में आगे बढ़ते हैं, तब अच्छा फल उत्पन्न करते हैं। जब निराश होकर कुछ समय संसार की विरूपता को देखेतेे हैं तब हम संदेह के कारण निंदक एवं उलझन में पड़कर अच्छे फल उत्पन्न नहीं करते हैं।

आइये हम अपना सिर उठाकर आकाश और तारों को देखें एवं अपने विश्वास द्वारा ईश्वर के लिए सुन्दर फल उत्पन्न करें।



📚 REFLECTION




In the first reading, Abram was beginning to have his doubts about the promises that God made to him. He was almost thinking of giving up having a son of his own. It was then that God took him outside and said, “Look up to heavens and count the stars if you can. Such will be your descendants”. It was only when Abram lifted up his eyes to look at the heavens and the stars that he put his faith in God.

It is when we keep looking at God and growing in faith towards him that we will bear good fruit. Looking down at the brokenness and at times, the ugliness of the world will only make us lose faith and get cynical and sceptical.

Let us lift up our heads and look at the heavens with its array of stars and we will also lift up our faith to bear beautiful fruits for God.



✍ -Br Biniush Topno


Copyright © www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

मंगलवार, 22 जून, 2021 वर्ष का बारहवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 22 जून, 2021

वर्ष का बारहवाँ सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : उत्पत्ति 13:2,5-18



2) अब्राम पशुओं और चाँदी-सोने से सम्पन्न था।

5) लोट अब्राम के साथ रहता था और उसके भी भेड़-बकरियाँ, चौपाये और तम्बू थे।

6) वह भूमि इतनी विस्तृत नहीं थी कि उस से दोनों का निर्वाह हो सके। उनकी इतनी अधिक सम्पत्ति थी कि वे दोनों साथ नहीं रह सकते थे।

7) इस कारण अब्राम और लोट के चरवाहों में झगडे हुआ करते थे। उस समय कनानी और परिज्जी उस देश में निवास करते थे।

8) इसलिए अब्राम ने लोट से यह कहा, ''हम दोनों में, मेरे और तुम्हारे चरवाहों में झगड़ा नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम तो भाई हैं।

9) सारा प्रदेश तुम्हारे सामने है, हम एक दूसरे से अलग हो जायें। यदि तुम बायें जाओगे, तो मैं दाहिने जाऊँगा और यदि दाहिने जाओगे तो मैं बायें जाऊँगा।''

10) लोट ने आँखें उठा कर देखा कि प्रभु की वाटिका तथा मिस्र देश के सदृश समस्त यर्दन नदी की खाटी सोअर तक अच्छी तरह सींची हुई है। उस समय तक प्रभु ने सोदोम और गोमोरा का विनाश नहीं किया था।

11) इसलिए लोट ने यर्दन नदी की समस्त घाटी चुनी। वह पूर्व की ओर चला गया और इस प्रकार दोनों अलग हो गये।

12) अब्राम कनान की भूमि में रह गया। लोट घाटी के नगरों के बीच बस गया और उसने सोदोम के निकट अपने तम्बू खड़े कर दिये।

13) सोदोम के निवासी बहुत दुष्ट और प्रभु की दृष्टि में पापी थे।

14) जब लोट चला गया, तो प्रभु ने अब्राम से यह कहा, ''तुम आँखें ऊपर उठाओ और जहाँ खड़े हो, वहाँ से उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की ओर दृष्टि दौड़ाओ -

15) मैं यह सारा देश, जो तुम्हें दिखाई दे, तुम्हें और तुम्हारे वंशजों को प्रदान करूँगा।

16) मैं तुम्हारे वंशजों को पृथ्वी की धूल की तरह असंख्य बना दूँगा - पृथ्वी के धूलि-कण भले ही कोई गिन सके, किन्तु तुम्हारे वंशजों की गिनती कोई नहीं कर पायेगा!

17) चलो; इस देश में चारों ओर घूमने जाओ, क्योंकि मैं इसे तुम को दे दूँगा।''

18) अब्राम अपना तम्बू उखाड़ कर हेब्रोन में मामरे के बलूत के पास बस गया और उसने वहाँ प्रभु के लिए एक वेदी बनायी।



सुसमाचार : मत्ती 7:6,12-14



6) ’’पवित्र वस्तु कुत्तों को मत दो और अपने मोती सूअरों के सामने मत फेंको। कहीं ऐसा न हो कि वे उन्हें अपने पैरों तले कुचलदें और पलट की तुम्हें फाड़ डालें।

12) ’’दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो। यही संहिता और नबियों की शिक्षा है।

13) ’’सॅकरे द्वार से प्रवेश करो। चैड़ा है वह फाटक और विस्तृत है वह मार्ग, जो विनाश की ओर ले जाता है। उस पर चलने वालों की संख्या बड़ी है।

14) किन्तु सॅकरा है वह द्वार और संकीर्ण है वह मागर्, जो जीवन की ओर ले जाता है। जो उसे पाते हैं, उनकी संख्या थोड़ी है।



📚 मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार हमारे ख्रीस्तीय जीवन के लिए निमत्रंण है। प्रभु येसु कहते हैं,’’सँकरे द्वार से प्रवेश करो। चौड़ा है वह फाटक और विस्तृत है वह मार्ग, जो विनाश की ओर ले जाता है। उस पर चलने वालों की संख्या बड़ी है। किन्तु सँकरा है वह द्वार और संकीर्ण वह मार्ग जो जीवन की ओर ले जाता है। जो उसे पाते हैं उनकी संख्या थोड़ी है।’’ (मत्ती 7:13-14)। पर्वत प्रवचन का अंश आज के पाठ में भी झलकती है क्योंकि प्रभु येसु स्वर्ग राज्य के संदेश को मौलिक आवश्यकता पर जोर देते हैं, कि किस प्रकार ख्रीस्तीयों को सही रास्ते का चुनाव करना है? यदि हमारा चुनाव सही है तब हम जीवन के रास्ते पर चलते हैं और चुनाव हमारे अनन्त जीवन को निर्धारित करता है। यदि हम विस्तृत मार्ग पर चलते हैं, तब हम अनन्त जीवन को नष्ट करते हैं, और यदि हम सँकरे मार्ग से चलते हैं जो कठिन है वह हमें जीवन को ओर ले जाती है। आइये हम अनन्त जीवन के राह पर चलने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें।




📚 REFLECTION



Today’s gospel is the invitation for our Christian life. Jesus says, “Enter through the narrow gate; for the gate is wide and the road is easy that leads to destruction, and there are many who take it. For the gate is narrow and the road is hard that leads to life, and there are few who find it (Mt 7:13-14). The Sermon on the Mount continues to be present in Jesus’ message and gives fundamental requirements, as to how the Christians are to make choices? If our choice is proper and right, we would be walking the path which determines eternal life. If we walk the broad road then it will destroy the eternal life; and if we take the narrow gate which is hard and it will lead to eternal life. Let pray to God that we may be able to walk in the path of eternal life.



✍ -Br. Biniush Topno


Copyright © wwwatpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!