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सुख का खोज फादर पौल vc

सुख का खोज 

ईश्वर अनन्द ज्ञानी और परम भला है यदि यह किसी सृष्ट जीव का निर्माण करता है तो उसका कोई उदेश्य होता है जब उसने हमें विवेकशील और स्वतंत्र प्राणी बनाया तो उसका उदेश्य अपनी महिमा बढ़ाना नहीं था क्योंकि उसकी महिमा तो अनन्त है। असीम भला ईश्वर का एक ही उदेश्य हो सकता है। अपना जीवन और सुख हमें बाँटना चाहिए। इस दृढ़ विश्वास से हम आनन्द मना सकता है कि ईश्वर हम में से प्रत्येक को अपने जीवन और सुख का भागी बनाने के लिए हमारी सृष्टि की है, सभी मनुष्य धन, प्रसिद्धि या अधिकार नहीं चाहते किन्तु सभी सुख के लिए बनाये गये है। हम सुख के लिए बनाये गए है क्योंकि संसार में इतना दुःख होता है। दुःख एक समस्या है। कोई आचार्य इस समस्या का हल यह कह कर करना चाहता है कि संसार का अधिकांश बुराई ईश्वर के क्रोध का परिणाम नहीं किन्तु मनुष्यों के पापों और उनके दुष्टता का फल है। ईश्वर स्वतंत्रता को मानते है किन्तु पूर्ण रूप से आनन्त दायक नहीं क्योंकि बहुत सा दुःख, रोग और प्राकृतिक विपत्तियों से उत्पन्न होती है। मनुष्यों से उत्पन्न दु:ख के संबंध में हम ईश्वर से यह सवाल करते है कि क्यों हमारी जीवन में ऐसे होते है ? ईश्वर जो बुराई होने देते है उस से उच्चतम भलाई निकल सकते है। लेकिन यह पूर्णत: सन्तोष जनक समाधान नहीं। हम बुराई की समस्या के रहस्य के साथ स्थिर मन से और शांति पूर्वक जीने का संकल्प कर के हमें दुःख कष्ट का और अपने चारों और फैली हुई बुराई का सामना उनके यथार्थ रूप में समभाव से करना चाहिए और उदार मन से यहाँ तक आये हुये दुःख और बुराई को कम करने की अभिलाषा रखनी और परिश्रम भी करनी चाहिए। यदि हम विश्वास के साथ ईश्वर की योजना स्वीकार कर ले वह स्पष्ट हो आथ्वा रहस्यमय, तो हम बुराई की समस्या को अच्छा दिल से देख सकेंगे। ईश्वरीय वचन हमें सांत्वना देता है कि विपत्ती के समय तुम्हारा जी घबराये नहीं। ईश्वर से लिपटे रहो, उसे मन त्यागो जिससे अन्त में तुम्हारा कलयाण हो । जो कुछ तुम पर बीतेगा उसे स्वीकार करो तथा दुःख और विपत्ती में धीर बने रहो। (प्रवक्ता 2:2-4) आनन्द और खुशी से जीने केलिए ईश्वर ही हमें शक्ति देता । प्रभु कहता है कि धन्य हो तुम जब लोग मेरे कारण तुम्हारा अपमान करते है तुम पर अत्याचार करते और तरह-तरह के झूठे दोष लगते है। खुश हो और आनन्द मनाओ स्वर्ग में तुम्हें महान पुरस्कार प्राप्त होगा। स्तोत्र ग्रन्थ कार अनुभव करता था कि जो आनन्द तु मुझे प्रदान करता है वह उस आनन्द से गहरा है जो लोगों को अंगूर और गेहूँ की अच्छी फसल से मिलता है। (स्त्रोत्र 4:7) संत योहन के सुसमाचार द्वारा प्रभु हमसे कहते है कि हम ईश वचन पर ध्यान देता तभी हमें आनंद मिलेगा। मैं तुम लोगों से यह इसलिए कहा है कि तुम मेरे आनन्द के भागी बनो और तुम्हारा आनन्द पूर्ण हो । (योहन 15:11)। संत पौलूस और सीलास सुसमाचार की घोषण करके नगर पहूँचा। वहाँ उनको पकड कर खूब पिटवाकर बन्दीग्रह में डलवा दिया। पौलूस और सीलास प्रार्थना करते हुए ईश्वर की स्तुति गा रहे थे। उन लोग सुसमाचार के लिए पिटवाये गये, बन्दी हो गये, वे रोथे नहीं, खुशी से ईश्वर की स्तुति कर रहे थे। ईश्वर उनके मुक्ति के लिए आयें। (प्रेरित चरित 16:25) इस जीवन के दुःख संकट में हम लोग भी ईश्वर से शक्ति पाकर संकट का सामना करना चाहिए।       

                                                                            

                                                                              फादर पौल vc

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क्रूस का शिक्षा फादर येशुदास vc

                                                          


                                                                     क्रूस का शिक्षा                            

सितम्बर 14 तारिख कलीसिया पवित्र कूस का विजयोत्सव मनाती है। यह पर्व काथलिक लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह मानवमुक्ति का यादगारी का दिन है। इस पर्व के पीछे कुछ ऐतिहासिक बातें जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जो कूस, जिस पर येसु अपना जीवन मानव मुक्ति के लिए चढाया, अधिकारियों द्वारा वह छिपा दिया गया था। सन् 326 में पवित्र आत्मा की विशेष प्रेरणा से संत हेलेना की अगुवाई में येसु के कूस को खोजना शुरू किये और यूदस नामक एक यहूदी को जानकारी मिला कि यह कहाँ छिपाया गया और पवित्र कूस पाया गया। उसके बाद सन् 335 में येसु के कब्र एवं कलवारी में सितम्बर 13 और 14 में गिरजाघर बनवाये गये। उसी समय से कलीसिया में यह पर्व मनाया जाता है। लोगों के अंदर एक ऐसा सवाल आता हैं, कि येसु के पुनरूत्थान के बाद क्रूस का क्या महत्व है? इसमें कोई संदेह नही है कि ईसाई की आशा येसु की पुनरूत्थान है। ऐसे है तो कूस का क्या महत्तव है। संत पौलुस हमें बताते है, “जो विनाश के मार्ग पर चलते है, वे कूस की शिक्षा को 'मूर्खता' समझते हैं। किन्तु हम लोगों के लिए, जो मुक्ति के मार्ग पर चलते है, वह ईश्वर का सामर्थ्य हैं” (कुरिन्थि 1:18) जी हाँ, ईसाई लोगों के लिए या येसु के मार्ग पर चलने वालों के लिए कूस की शिक्षा 'मूर्खता' नहीं है बल्कि वह ईश्वर का सामर्थ्य है। इसके लिए कूस की शिक्षा क्या है यह समझना अनिवार्य है। जीवन में होने वाले दुःख-दर्दो को प्यार से बिना भुन-भुनाये उठाना ही कूस की शिक्षा है। लेकिन मनुष्य का मनोभाव यही है कि जीवन की पीड़ाओ से तुरंत बच निकलना चाहते है। जब येसु ने अपने पीड़ासहन के बारे में शिष्यों को समझाने लगे तो पेत्रुस ने पूरे मानव जाति के कष्ट के प्रति मनोभाव इसी शब्दो में प्रकट किया, “ईश्वर ऐसा न करे। प्रभु! यह आप पर कभी नहीं बीतेगी” (संत मत्ती 16:22) तब येसु ने पेत्रुस को समझाते हुए कहा, तुम ईश्वर की बाते नही मनुष्यों की बाते सोचते हो” (संत मत्ती 16:23) येसु हमें समझाते हैं कि कष्टो से भागना मानवीय है बल्कि कष्टों को स्वीकार करना ईश्वरीय स्वभाव है। वही पेत्रुस, जिसके लिए कष्ट की बात समझ में नही आता था, बाद में पवित्र आत्मा से प्रेरित हो कर लिखता है, “ यदि ईश्वर की यही इच्छा है, तो बुराई करने की अपेक्षा भलाई करने के कारण दुःख  भोगना कहीं अच्छा है।”(1 पेत्रुस 3:17) हमारे जीवन के रोग- बिमारियाँ, मानसिक पीड़ाये, दूसरे लोगो से मिलने वाले अत्याचार ये सब का स्त्रोत ईश्वर नहीं बल्कि शैतान है। इसलिए कूस की शिक्षा का अर्थ यह है कि शैतान या संसार से मिलने-वाले कष्टों को ईश्वर की इच्छा के अनुसार स्वीकार करना है। इसलिए संत पेत्रुस लिखते है, “ इसलिए तो आप बुलाये गये हैं, क्योंकि मसीह ने आप लोगों के लिए दुःख भोगा और आप को उदाहरण दिया,                                                                                                                

                                            
                                                                                    फादर येशुदास vc


शनिवार, 19 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

शनिवार, 19 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 12:1-10



1) डींग मारने से कोई लाभ नहीं, फिर भी मुझे ऐसा ही करना पड़ रहा है। इसलिए दिव्य दर्शनों और प्रभु द्वारा प्रकट किये हुए रहस्यों की चर्चा करूँगा।

2) मैं मसीह के एक भक्त को जानता हूँ, जो चैदह वर्ष पहले तीसरे स्वर्ग तक ऊपर आरोहित कर लिया गया- सशरीर या दूसरे प्रकार से, यह मैं नहीं जानता, ईश्वर ही जानता है।

3) मैं उस मनुष्य के विषय में जानता हूँ कि वह स्वर्ग में आरोहित कर लिया गया-सशरीर या दूसरे प्रकार से, यह मैं नहीं जानता, ईश्वर ही जानता है।

4) उस मनुष्य ने ऐसी बातों की चर्चा सुनी, जो अनिर्वचनीय है और जिन्हें प्रकट करने की किसी मनुष्य को अनुमति नहीं है।

5) मैं ऐसे व्यक्ति पर गर्व करना चाहूँगा। अपनी दुर्बलताओं के अतिरिक्त मैं अपने विषय में किसी और बात पर गर्व नहीं करूँगा।

6) यदि मैं गर्व करता, तो यह नादानी नहीं होती, क्योंकि मैं सत्य ही बोलता। किन्तु मैं यह नहीं करूँगा। लोग जैसा मुझे देखते और सुनते हैं, उस से बढ़ कर मुझे कुछ भी नहीं समझें।

7) मुझ पर बहुत-सी असाधारण बातों का रहस्य प्रकट किया गया है। मैं इस पर घमण्ड न करूँ, इसलिए मेरे शरीर में एक काँटा चुभा दिया गया है। मुझे शैतान का दूत मिला है, ताकि वह मुझे घूंसे मारता रहे और मैं घमण्ड न करूँ।

8) मैंने तीन बार प्रभु से निवेदन किया कि यह मुझ से दूर हो;

9) किन्तु प्रभु ने कहा-मेरी कृपा तुम्हारे लिए पर्याप्त है, क्योंकि हमारी दुर्बलता में मेरा सामर्थ्य पूर्ण रूप से प्रकट होता है।

10) इसलिए मैं बड़ी खुशी से अपनी दुर्बलताओं पर गौरव करूँगा, जिससे मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया रहे। मैं मसीह के कारण अपनी दुर्बलताओं पर, अपमानों, कष्टों, अत्याचारों और संकटों पर गर्व करता हूँ; क्योंकि मैं जब दुर्बल हूँ, तभी बलवान् हूँ।



सुसमाचार : मत्ती 6:24-34



24) "कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम ईश्वर और धन - दोनों की सेवा नहीं कर सकते।

25) मैं तुम लोगों से कहता हूँ, चिन्ता मत करो- न अपने जीवन-निर्वाह की, कि हम क्या खायें और न अपने शरीर की, कि हम क्या पहनें। क्या जीवन भोजन से बढ कर नहीं ? और क्या शरीर कपडे से बढ़ कर नहीं?

26) आकाश के पक्षियों को देखो। वे न तो बोते हैं, न लुनते हैं और न बखारों में जमा करते हैं। फिर भी तुम्हारा स्वर्गिक पिता उन्हें खिलाता है, क्या तुम उन से बढ़ कर नहीं हो?

27) चिंता करने से तुम में से कौन अपनी आयु घड़ी भर भी बढा सकता है?

28) और कपडों की चिन्ता क्यों करते हो? खेत के फूलों को देखो। वे कैसे बढ़ते हैं! वे न तो श्रम करते हैं और न कातते हैं।

29) फिर भी मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि सुलेमान अपने पूरे ठाट-बाट में उन में से एक की भी बराबरी नहीं कर सकता था।

30) रे अल्पविश्वासियों! खेत की घास आज भर है और कल चूल्हे में झोंक दी जायेगी। यदि उसे भी ईश्वर इस प्रकार सजाता है, तो वह तुम्हें क्यों नहीं पहनायेगा?

31) इसलिए यह कहते हुए चिंता मत करो- हम क्या खायें, क्या पियें, क्या पहनें।

32) इन सब चीजों की खोज में गैर-यहूदी लगे रहते हैं। तुम्हारा स्वर्गिक पिता जानता है कि तुम्हें इन सभी चीजों की ज़रूरत है।

33) तुम सब से पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें, तुम्हें यों ही मिल जायेंगी।

34) कल की चिन्ता मत करो। कल अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा। आज की मुसीबत आज के लिए बहुत है।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में प्रभु येसु मुख्यतः दो बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हैं, पहले पद पर वे ईश्वर और धन के बारे में बताते हैं, और अंतिम पदों पर वे ईश्वर पर भरोसा के बारे में बताते हैं। पहले पद में कहते हैं, कि ’’कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम ईश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।’’ (मत्ती 6:24)। प्रभु येसु इसे चेतावनी की तरह नहीं कहते, बल्कि इसकी वास्तविकता को बताते हैं। वे यह नहीं कहते कि हमें दो, स्वामियों की सेवा नहीं करनी चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं है। दोनों स्वामियों की सेवा का प्रयास केवल हमें निराशा और समय की बरबादी ही करेगी।

आज के सुसमाचार के दूसरे भाग में प्रभु येसु कहते हैं, ’’चिन्ता मत करो-न अपने जीवन-निवार्ह की, कि हम क्या खायें और न अपने शरीर की, कि हम क्या पहने।’’ (मत्ती 6:25)। चिन्ता और शंका परस्पर विरोधी हैं। रूथ ग्राहम बेल कहते हैं, ’’मैंने सीखा है कि पूजा (worship) और शंका एक हदय में निवास नही कर सकते, वे एक दूसरे के परस्पर अनन्य हैं। किसी ने कहा और अवलोकन कियाः ’’चिन्ता न केवल कल के प्रयास को छीनती, बल्कि आज के खुशी को स्वतः खाली कर देती है। चिन्ता न केवल कल के दुःख को खाली करती, बल्कि आज के शाक्ति को रिक्त कर देती है।’’




📚 REFLECTION



In today’s gospel Jesus mainly emphasizes on two points: in the first verse he tells about God and wealth and in the remaining nine verses he tells about trust in God. In the first verse he says, “ No one can serve two masters, for either he hate the one and love the other; or else he will be devoted to one and despise the other. You cannot serve both God and wealth”(Mt.6:24). Jesus does not state this as a warning, but as a fact. He doesn’t say that we shouldn’t serve two masters, but that isn’t possible. The attempt to serve two masters will just frustrate us and waste of time.

In the second part of the gospel Jesus says, “Don’t be anxious for your life: what you will eat, or what you will drink; nor yet for our body, what you will wear”(Mt.6:25). Worry is the opposite of faith. As Ruth Graham says, “I have learned that worship and worry cannot live in the same heart: they are mutually exclusive.” Someone else made this observation: “Anxiety does not empty tomorrow of its trials—it simply empties today of its joy. Anxiety does not empty tomorrow of its sorrow—it empties today of its strength”.


 -Br. Biniush Topno


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शुक्रवार, 18 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

शुक्रवार, 18 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 11:18, 21-30



18) जब बहुत से लोग उन बातों की डींग मारते हैं, जो संसार की दृष्टि में महत्व रखती है, तो मैं भी वही करूँगा।

21) मैं संकोच के साथ स्वीकार करता हूँ कि आप लोगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करने का मुझे साहस नहीं हुआ। आप इसे मेरी नादानी समझें, किन्तु जिन बातों के विषय में वे लोग डींग मारने का साहस करते हैं, मैं भी उन बातों के विषय में वही कर सकता हूँ।

22) वे इब्रानी हैं? मैं भी हूँ! वे इस्राएली हैं? मैं भी हूँ! वे इब्राहीम की सन्तान हैं? मैं भी हूँ!

23) मैं नादानी की झोंक में कहता हूँ कि मैं इस में उन से बढ़ कर हूँ। मैंने उन से अधिक परिश्रम किया, अधिक समय बन्दीगृह में बिताया और अधिक बार कोड़े खाये। मैं बारम्बार प्राण संकट में पड़ा।

24) यहूदियों ने मुझ पाँच बार एक कम चालीस कोड़े लगाये।

25) मैं तीन बार बेंतों से पीटा और एक बार पत्थरों से मारा गया। तीन बार ऐसा हुआ कि जिस नाव पर मैं यात्रा कर कर रहा था, वह टूट गयी और एक बार वह पूरे चैबीस घण्टे खुले समुद्र पर इधर-उधर बहती रही।

26) मैं बारम्बार यात्रा करता रहा। मुझे नदियों के खतरे का सामना करना पड़ा, डाकुओं के खतरे, समुद्र के खतरे और कपटी भाइयो के खतरे का।

27) मैंने कठोर परिश्रम किया और बहुत-सी रातें जागते हुए बितायीं। मुझे अक्सर भोजन नहीं मिला। भूख-प्यास, ठण्ड और कपड़ों के अभाव-यह सब मैं सहता रहा

28) और इन बातों के अतिरिक्त सब कलीसियाओं के विषय में मेरी चिन्ता हर समय बनी रहती है।

29) जब कोई दुर्बल है, तो क्या मैं उसकी दुर्बलता से प्रभावित नहीं? जब किसी का पतन होता है, तो क्या मैं इसका तीखा अनुभव नहीं करता?

30) यदि किसी बात पर गर्व करना है, तो मैं अपनी दुर्बलताओं पर गर्व करूँगा।



सुसमाचार : मत्ती 6:19-23



19) पृथ्वी पर अपने लिए पूँजी जमा नहीं क जहाँ मोरचा लगता है, कीडे़ खाते हैं और चोर सेंध लगा कर चुराते हैं।

20) स्वर्ग में अपने लिए पूँजी जमा करो, जहाँ न तो मोरचा लगता है, न कीड़े खाते हैं और न चोर सेंध लगा कर चुराते हैं।

21) क्योंकि जहाँ तुम्हारी पूँजी है, वही तुम्हारा हृदय भी होगा।

22) आँख शरीर का दीपक है। यदि तुम्हारी आँख अच्छी है, तो तुम्हारा सारा शरीर प्रकाशमान होगा;

23) किन्तु यदि तुम्हारी आँख बीमार है, तो तुम्हारा सारा शरीर अंधकारमय होगा। इसलिए जो ज्योति तुम में है, यदि वही अंधकार है, तो यह कितना घोर अंधकार होगा!



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में प्रभु येसु दो बातों पर हमारा ध्यान आर्कषित करते हैं - सच्चा धन और शरीर की ज्योति। आज हम अत्यधिक भौतिकवाद में जीवन-यापन कर रहे हैं, जहाँ ज्यादातर लोग धन पर विश्वास करते हैं, कि धन ही सभी समस्याओं का समाधान है। और ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे पैसे से खरीदा नहीं जा सकता, और ऐसा कोई भी समस्या नहीं है जिसे पैसे द्वारा हासिल न किया जा सके। इस प्रकार का विश्वास आज भी व्याप्त है यद्यपि यह कई बार गलत भी साबित हुआ है।

आज के सुसमाचार में प्रभु हमें से प्रेरित करते हुए कहते हैं अपना विश्वास और अपनी सुरक्षा ऐसी चीजों पर डालें जो कम अनश्वर हो और अधिक बना रहने वाला हो। वे कहते हैं, ’’स्वर्ग में अपने लिए पूँजी जमा करो, जहाँ न तो मोरचा लगता है, न कीडे़ खाते है और न चोर सेंध लगाकर चुराते हैं (मत्ती 6:20)। स्वर्ग में धन जमा करने का तात्पार्य यह है कि हम भले कार्य द्वारा धन कमायें जो हमारे भावी जीवन के लिए सार्थक होगा। और प्रभु येसु बड़ी चतुराई से कहते हैं, ’’जहाँ तुम्हारा धन है, वहीं तुम्हारा हदय भी होगा।’’ (मŸाी 5:21)। वास्तव हमें अपने आप से प्रश्न पूछना है, कहाँ मेरी पूंजी है? क्या मैं इसे अपनी जीवन में मूल्य देता हूँ? और कैसे मैं इसके अनुसार जीवन जीता हूँं।

सुसमाचार के दूसरे भाग में प्रभु येसु कहते हैं ’’आँख शरीर का दीपक है’’ (मत्ती 6:22) कहने का तात्पर्य यह है कि जो मैं अपने आंतरिक आँख से देखता हूँ वही मेरे जीवन का सब कुछ निर्धारित करता है।’’ यदि तुम्हारी आँख अच्छी है तो तुम्हारा सारा शरीर प्रकाशमान होगा, किन्तु यदि तुम्हारी आँख बीमार है, तो तुम्हारा सारा, शरीर अन्धकारमय होगा।’’ (मत्ती 6:23)



📚 REFLECTION




In today’s gospel Jesus brings out two things to our attention: the true treasure and lamp. Today we are living in a highly materialistic world where a very large number of people seem to believe that material wealth is the solution of every problem. There is nothing that money cannot buy, no problem it cannot solve. This belief prevails even though it is shown to be false.

In the gospel Jesus urges us to put our trust and security in something less perishable, something more lasting. He says, “Store up treasure for yourself with God. Where no moth or rust can destroy nor thief come and steal it” (Mt.6:20). To ‘store up treasure in heaven’ is not just to pile up a whole of ‘good works’ but it can to our credit for the next life. And as Jesus wisely says, ‘where your treasure is, there will your heart be also’ (Mt. 6:21). Obviously, the question for us today is: where is our treasure? What do I value most in life? And how do I live with?

In the second part of the gospel Jesus says, “The lamp of the body is the eye” (Mt.6:22). That is to say, what I see with my inner eye determines everything else about my life. “If your eye that is your vision is sound, your whole body, that is, your whole being will be filled with light. But if your eye is diseased, your whole body will be all darkness” (Mt.6:23).



 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 17 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

गुरुवार, 17 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 11:1-11



1) आप लोग मेरा अनुसरण करें, जिस तरह मैं मसीह का अनुसरण करता हूँ।

2) आप लोग हर बात में मुझे याद करते हैं और मुझसे जो शिक्षा मिलती है, उसमें दृढ़ बने रहते हैं। इसलिए मैं आप लोगों की प्रशंसा करता हूँ।

3) फिर भी मैं आप को यह बताना चाहता हूँ कि मसीह प्रत्येक पुरुष के शीर्ष हैं, पुरुष स्त्री का शीर्ष है और ईश्वर मसीह का शीर्ष।

4) जो पुरुष सिर ढक कर प्रार्थना या भविष्यवाणी करता है, वह अपने सिर का अपमान करता है

5) और जो स्त्री बिना सिर ढ़के प्रार्थना या भविष्यवाणी करती है, वह अपने सिर का अपमान करती है; क्योंकि वह उस स्त्री-जैसी है, जिसका सिर मूँड़ा हुआ है।

6) यदि कोई स्त्री अपना सिर नहीं ढकती, तो सिर मुँड़वा ले। यदि कटे हुए केश या मूँड़ा हुआ सिर स्त्री के लिए लज्जा की बात है, तो वह अपना सिर ढ़क ले।

7) पुरुष को अपना सिर नहीं ढकना चाहिए; क्योंकि वह ईश्वर का प्रतिरूप और उसकी महिमा का प्रतिबिम्ब है। जब कि स्त्री पुरुष की महिमा का प्रतिबिम्ब है।

8) पुरुष स्त्री से नहीं बना, बल्कि स्त्री पुरुष से बनी

9) और पुरुष की सृष्टि स्त्री के लिए नहीं हुई, बल्कि पुरुष के लिए स्त्री की सृष्टि हुई।

10) इसलिए स्वर्गदूतों के कारण स्त्री को अधीनता का चिन्ह अपने सिर पर पहनना चाहिए।

11) फिर भी प्रभु के विधान के अनुसार स्त्री के बिना पुरुष कुछ नहीं है और पुरुष के बिना स्त्री कुछ नहीं।



सुसमाचार : मत्ती 6:7-15



7) ’’प्रार्थना करते समय ग़ैर-यहूदियों की तरह रट नहीं लगाओ। वे समझते हैं कि लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करने से हमारी सुनवाई होती है।

8) उनके समान नहीं बनो, क्योंकि तुम्हारे माँगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन किन चीज़ों की ज़रूरत है।

9) तो इस प्रकार प्रार्थना किया करो- स्वर्ग में विराजमान हमारे पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाये।

10) तेरा राज्य आये। तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में, वैसे पृथ्वी पर भी पूरी हो।

11) आज हमारा प्रतिदिन का आहार हमें दे।

12) हमारे अपराध क्षमा कर, जैसे हमने भी अपने अपराधियों को क्षमा किया है।

13) और हमें परीक्षा में न डाल, बल्कि बुराई से हमें बचा।

14) यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा।

15) परन्तु यदि तुम दूसरों को क्षमा नहीं करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा नहीं करेगा।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में प्रभु येसु प्रार्थना को एक अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करते हैं। वे प्रार्थना को ईश्वर से जोड़ते हैं क्योंकि प्रार्थना के द्वारा ही हम ईश्वर की इच्छा को जान सकते हैं आज प्रभु येसु हमें आर्दश प्रार्थना ’हे पिता’ सिखाते हैं जिसका उदेश्य है ईश्वर और मुनष्यों के बीच का संबध। वास्तव में प्रार्थना मनुष्य को ईश्वर से बांधे रखती है। प्रार्थना के द्वारा ही हम हमारी जरूरतों और आवश्यकताओं की पुरी करते हैं। सुसमाचार में प्रभु कहते हैं ’प्रार्थना करते समय गैर-यहूदियों की तरह रट नहीं लगाओ। वे समझते हैं कि लम्बी-लम्बी प्रार्थना करने से हमारी सुनवाई होती है। (मत्ती 6:7)।

इस संदर्भ में, जब हम करीबी से इन वाक्यों को देखते हैं, तो हमें पता चलता है कि प्रभु येसु गैर-यहूदियों के धार्मिक प्रार्थना, ईश्वर की महानता को स्वीकारना, उनकी महिमा और सम्मान, उनकी राज्य की खोज, उनकी इच्छा को पुरा करना, उन्हीं के द्वारा हमारी आवश्यकताओं को पुरा करना, उन्हीं से मेल-मिलाप करना और उन्हीं के द्वारा प्रलोभनों से दूर होना है। यही सच्ची और आर्दश प्रार्थना है।



📚 REFLECTION




In today’s gospel Jesus presents prayer in a beautiful manner. He connects prayer with God, because through prayer we can know the will of God. Today Jesus teaches us the ideal prayer ‘Our Father’ whose aim is to establish relationship between God and man. In reality, prayer holds human being with God. Through prayer we can fulfil our needs and desires. In the gospel Jesus says, “And in praying, do not heap up empty phrases as the Gentiles do; for they think that they will be heard for their many words”(Mt.6:7).

In this context, when we look closely at these verses we find that Jesus was pointing the religious principles of the Gentiles. In fact, the real prayer is; to acknowledge God’s greatness, ascribe glory and honour, seek his kingdom, long for his will to be done in our lives, putting forward our needs and offerings, being reconciled to be receive forgiveness, and imploring to keep away from sin and evil inclinations. This is the true and ideal prayer.



 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 16 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 16 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 9:6-11



6) इस बात का ध्यान रखें कि जो कम बोता है, वह कम लुनता है और जो अधिक बोता है, वह अधिक लुनता है।

7) हर एक ने अपने मन में जिनता निश्चित किया है, उतना ही दे। वह अनिच्छा से अथवा लाचारी से ऐसा न करे, क्योंकि ‘‘ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है’’।

8) ईश्वर आप लोगों को प्रचुर मात्रा में हर प्रकार का वरदान देने में समर्थ है, जिससे आप को कभी किसी तरह की कोई कमी नहीं हो, बल्कि हर भले काम के लिए चन्दा देने के लिए भी बहुत कुछ बच जाये।

9) धर्मग्रन्थ में लिखा है- उसने उदारतापूर्वक दरिद्रों को दान दिया है, उसकी धार्मिकता सदा बनी रहती है।

10) जो बोने वाले को बीज और खाने वाले को भोजन देता है, वह आप को बोने के लिए बीज देगा, उसे बढ़ायेगा और आपकी उदारता की अच्छी फसल उत्पन्न करेगा।

11) इस तरह आप लोग हर प्रकार के धन से सम्पन्न हो कर उदारता दिखाने में समर्थ होंगे।



सुसमाचार : मत्ती 6:1-6, 16-18



1) ’’सावधान रहो। लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने धर्मकार्यो का प्रदर्शन न करो, नहीं तो तुम अपने स्वर्गिक पिता के पुरस्कार से वंचित रह जाओगे।

2) जब तुम दान देते हो, तो इसका ढिंढोरा नहीं पिटवाओ।ढोंगी सभागृहों और गलियों में ऐसा ही किया करते हैं, जिससे लोग उनकी प्रशंसा करें। मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- वे अपना पुरस्कार पा चुके हैं।

3) जब तुम दान देते हो, तो तुम्हारा बायाँ हाथ यह न जानने पाये कि तुम्हारा दायाँ हाथ क्या कर रहा है।

4) तुम्हारा दान गुप्त रहे और तुम्हारा पिता, जो सब कुछ देखता है, तुम्हें पुरस्कार देगा।

5) ’’ढोगियों की तरह प्रार्थना नहीं करो। वे सभागृहों में और चैकों पर खड़ा हो कर प्रार्थना करना पंसद करते हैं, जिससे लोग उन्हें देखें। मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- वे अपना पुरस्कार पा चुके हैं।

6) जब तुम प्रार्थना करते हो, तो अपने कमरें में जा कर द्वार बंद कर लो और एकान्त में अपने पिता से प्रार्थना करो। तुम्हारा पिता, जो एकांत को भी देखता है, तुम्हें पुरस्कार देगा।

16 ढोंगियों की तरह मुँह उदास बना कर उपवास नहीं करो। वे अपना मुँह मलिन बना लेते हैं, जिससे लोग यह समझें कि वे उपवास कर रहें हैं। मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- वे अपना पुरस्कार पा चुके हैं।

17) जब तुम उपवास करते हो, तो अपने सिर में तेल लगाओ और अपना मुँह धो लो,

18) जिससे लोगों को नहीं, केवल तुम्हारे पिता को, जो अदृश्य है, यह पता चले कि तुम उपवास कर रहे हो। तुम्हारा पिता, जो अदृश्य को भी देखता है, तुम्हें पुरस्कार देगा।



📚 मनन-चिंतन





’ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है’ (2 कुरिन्थ 9:7)। यह संत पौलुस के कुरिन्थियों के दूसरे पत्र का एक महत्वपूर्ण वाक्यांश है। यह सिर्फ न केवल दान या भले कार्य तक सीमित नहीं है। बल्कि यह व्यक्ति के आंतरिक स्वाभाव का परिचयक है। क्योंकि कि ईश्वर बोने वाले को बीज और खाने वाले को भोजन देता है, वह आप को बोने के लिए बीज देगा, उसे बढ़ायेगा और आपकी उदारता की अच्छी फसल उत्पन्न करेगा (2 कुरिन्थ 9:10)। यदि हमें जीवन में अच्छी बीज उत्पन्न करना है तो हमें ईश्वर से अपने हदय से जुड़ा रहना होगा, क्योंकि ईश्वर सबका सृष्टिकर्त्ता है। हमें ईश्वर को अपना सर्वस्व देना होगा। संत पिता फ्रांसिस आज के सुसमाचार पाठ को हमारे ख्रीस्तीय जीवन के तीन स्तंभ के रूप में देखते है प्रार्थना, उपवास और भिक्षादान। उनके अनुसार उपवास का अर्थ है प्रलोभनों से अपने को दूर रखना, प्रार्थना हमें अपने स्वर्थ से छुटकारा दिलाता और भिक्षादान हमें अनावश्यक चीजें के उपयोग से मुक्त करता है।

आज हमें अपने धर्मकार्यों को सफलतापूवर्क निभाने के लिए हमें शास्त्रियों और ढ़ोगियों की तरह नहीं, वरन एक सच्चे हदय से प्रार्थना, उपवास और भिक्षदान करना है। प्रार्थना का अर्थ ही है ईश्वर से वार्तालाप करना।



📚 REFLECTION




“God loves the cheerful giver” (2Cor.9:7). This is St Paul’s second letter to the Corinthians is an important verse; this is not limited only to almsgiving and good works, it reveals the inner attitude of the people. Because God supplies seed to the sower and bread for food will supply and multiply your seed for sowing and increase the harvest of your righteousness(2Cor.9:10). If we have to produce seed in life then we have to get connected with the Lord; for he is the creator of all, and offer everything.

Pope Francis sees today’s gospel as the three pillars of Christian life: prayer, fasting and almsgiving, he says fasting makes turn away from the temptation, prayer frees us from our ego, and almsgiving keeps us away from hoarding unnecessary things. To fulfil our piety today we have to surpass the righteousness of the Pharisees and the scribes, and live the true spirit of prayer, fasting and almsgiving. The very meaning of prayer is to have conversation with God.



 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 15 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 15 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 8:1-9



1) भाइयो! मैं आप लोगों को उस अनुग्रह के विषय में बताना चाहता हूँ, जिसे ईश्वर ने मकेदूनिया की कलीसियाओं को प्रदान किया है।

2) संकटों की अग्नि-परीक्षा में भी उनका आनन्द अपार रहा और तंगहाली में रहते हुए भी उन्होंने बड़ी उदारता का परिचय दिया है।

3) उन्होंने अपने सामर्थ्य के अनुसार, बल्कि उस से भी अधिक, चन्दा दिया है।

4) उन्होंने स्वयं ही बड़े आग्रह के साथ मुझसे अनुरोध किया कि उन्हें भी सन्तों की सहायता के लिए चन्दा देने का सौभाग्य मिले।

5) वे अपनी उदारता में हमारी आशा से बहुत अधिक आगे बढ़ गये। उन्होंने पहले ईश्वर के प्रति और बाद में, ईश्वर की इच्छा के अनुसार, हमारे प्रति अपने को अर्पित किया।

6) इसलिए हमने तीतुस से अनुरोध किया है कि उन्होंने जिस परोपकार का कार्य प्रवर्तित किया था, वह उस को आप लोगों के बीच पूरा कर दें।

7) आप लोग हर बात में- विश्वास, अभिव्यक्ति, ज्ञान, सब प्रकार की धर्म-सेवा और हमारे प्रति प्रेम में बढ़े-चढ़ें हैं; इसलिए आप लोगों को इस परोपकार में भी बड़ी उदारता दिखानी चाहिए।

8) मैं इस सम्बन्ध में कोई आदेश नहीं दे रहा हूँ, बल्कि दूसरे लोगों की उदारता की चर्चा कर मैं आपके प्रेम की सच्चाई की परीक्षा लेना चाहता हूँ।

9) आप लोग हमारे प्रभु ईसा मसीह की उदारता जानते हैं। वह धनी थे, किन्तु आप लोगों के कारण निर्धन बन गये, जिससे आप उनकी निर्धनता द्वारा धनी बन गये।




सुसमाचार : मत्ती 5:43-48




(43) ’’तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है- अपने पड़ोसी से प्रेम करो और अपने बैरी से बैर।

(44) परन्तु में तुम से कहता हूँ- अपने शत्रुओं से प्रेम करों और जो तुम पर अत्याचार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।

(45) इस से तुम अपने स्वर्गिक पिता की संतान बन जाओगे; क्योंकि वह भले और बुरे, दोनों पर अपना सूर्य उगाता तथा धर्मी और अधर्मी, दोनों पर पानी बरसाता है।

(46) यदि तुम उन्हीं से प्रेम करत हो, जो तुम से प्रेम करते हैं, तो पुरस्कार का दावा कैसे कर सकते हो? क्या नाकेदार भी ऐसा नहीं करते ?

(47) और यदि तुम अपने भाइयों को ही नमस्कार करते हो, तो क्या बडा काम करते हो? क्या गै़र -यहूदी भी ऐसा नहीं करते?

(48) इसलिए तुम पूर्ण बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।



📚 मनन-चिंतन




आज हम पर्वत प्रवचन के अंतिम पदों में पहुँच चुके हैं, और प्रभु येसु हमें महत्वपूर्ण शिक्षा देते हुए कहते हैं कि अपने शत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम पर अत्याचार करते हैं उनके लिए प्रार्थना करो (मत्ती 5:44)। यह हम सभों के लिए प्रभु येसु का निमंत्रण एवं चुनौती है। निमंत्रण इसलिए क्योंकि इससे हम अपने को स्वर्गिक पिता की संतान बनाते हैं। चुनौती इसलिए क्योंकि यह हमारे प्राकृति के विरूध्द है। हम उन्हीं लोगों को प्यार करते हैं। जो हमें प्यार करते हैं। प्रभु हमें एक क्रांतिकारी शिक्षा दे रहे हैं। वे कहते हैं यदि तुम उन्हीं से प्रेम करते हो, जो तुम से प्रेम करते हैं तो पुस्कार का दावा कैसे कर सकते हो? क्या नाकेदार भी ऐसा नहीं करते? (मत्ती 5:46) इसलिए आज प्रभु येसु हमें पूर्ण बनने के लिए निमंत्रण देतें है, तुम पूर्ण बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है। (मत्ती 5:48) हम पूर्ण तभी बन सकते हैं जब हम सपूर्ण रूप से अपने जीवन मेें स्वर्थ और अहम से दूर होंगे। प्रभु येसु ने स्वयं क्रूस पर से कहा,-’’हे पिता, इन्हें माफ कर दे, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं?’’ ईश्वर सभों के लिए अपना सूर्य उगाता तथा धर्मी और अधर्मी, दोनों पर पानी बरसाता है (मत्ती 5:45)




📚 REFLECTION




Today we have reached the end of the verses of the Sermon on the Mount, and Jesus gives us an important lesson and says, “Love your enemies and pray for those who persecute you” (Mt.5:44). This is an invitation and a challenge today for us. It is an invitation for us because with this we can become the children of God and it is a challenge because it is against our nature. We love only those who love us. Today Jesus is giving us a revolutionary lesson. He says, “If you love those who love you, what reward do you have? Do not even the tax collectors do the same” (Mt.5:46). That is why Jesus today invites us to become perfect, “Be perfect, therefore, as your heavenly father is perfect” (Mt.5:48). We can become perfect only when keep aside our ego and selfishness. Jesus said, as he died on the cross, ‘Father, forgive them, for they do not know what they are doing’. God makes his sun rise on the evil and on the good, and sends rain on the righteous and on the unrighteous (Mt.5:45)



 -Br Biniush Topno


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